आखिर क्यों Lockdown में जंगली जानवर शहरों की ओर भाग रहे हैं?

बिहार के पटना स्थित बिहटा में पिछले सप्ताह एक तेंदुआ बेखौफ घूमता हुआ नजर आया तो लोगों ने इस की सूचना प्रशासन को दी.

लौकडाउन के बीच दिल्ली से सटे नोएडा के जीआईपी मौल के पास नील गाय तो गुरूग्राम मार्केट में मोरों को नाचते तो वहीं हरिद्वार में हिरण को सैर करते देखा गया.

दिल्ली के एक गांव मुखमेलपुर से यमुना नदी पास ही बहती है. गांव के बाहर दूर तक पेङपौधे व जंगल हैं जहां नील गाय बराबर दिखती है. आजकल ये नील गाय गांव में भी आ जा रही हैं. गांव के रहने वाले किसान व समाजसेवी अरविंद राणा के घर पिछले कई दिनों से मोर आ रहे हैं. उन्होंने छिप कर वीडियो भी बनाया है. अरविंद राणा कहते हैं,”देश में जारी लौकडाउन के बीच इधर कई दिनों से मेरे घर के छत पर मोर आ रहे हैं. मोरनी को रिझाने के लिए मोर जब पंख फैला कर नाचते हैं तो देख कर मन भावविभोर हो जाता है.

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“ये मोर काफी पहले आते थे मगर कुछ दिनों से इन का आना बंद हो गया था. मगर अब ये बराबर मेरे ही नहीं गांव के कई घरों की छतों पर आ रहे हैं. नील गाएं कभीकभी आती थीं मगर इधर कुछ दिनों से बराबर ही आ जा रही हैं.”

चिड़ियों का चहचहाना फिर से शुरू

पिछले 23 मार्च के बाद देश में जारी लौकडाउन के बीच आज जहां प्रदूषण में भारी गिरावट आई है, हवा शुद्ध बह रही है, नदियों का पानी साफ दिख रहा है, वहीं चिड़ियों का चहचहाना भी फिर से शुरू हो गया है. लेकिन इस बीच हाथियों, तेंदुओं, हिरण और यहां तक कि जंगली बिलाव देश की सङकों पर खुलेआम घूमते हुए दिख रहे हैं.

पर्यावरणविद और विशेषज्ञ इस खबर को ले कर चिंतित हैं और कहते हैं कि शहरी केंद्रों में जंगली जानवरों का आना सही नहीं है. इन्हें इंसानों द्वारा या तो भगा दिया जाएगा या फिर मार दिया जाएगा.

पर्यावरण मित्र प्रवीण मिश्रा बताते हैं,”देखिए, इंसान की तरह ही जानवरों में भी अपनी सुरक्षा को ले कर एक भय होता है. ये जानवर पहले एक हैबिटेड बनाते हैं और एक जोन ढूंढ़ते हैं. लौकडाउन से पहले एक डिस्टरवैंस बनी हुई थी. अब इन्हें साइलैंस यानी शांत वातावरण मिल रहा है तो भोजन की तलाश में ये बाहर निकल कर शहरी केंद्रों पर आ रहे हैं. यहां अब इन्हें न तो गाङियां मिल रही हैं न कोई शोरगुल और न ही चकाचौंध करती गाड़ियों की लाइटें. पर यह भी तय है कि ये चलायमान प्राणी होते हैं. साइबेरिया से हजारों मील दूर सफर कर साइबेरियन पक्षी यहां तभी तो आते हैं. हां, कुछ जानवर नैटिव होते हैं और वे वहीं रहना चाहते हैं जहां उन का आशियाना है.

“लौकडाउन में अचानक से आने का यह मामला बिलकुल नया है और यह तब हुआ है जब इन्हें लग रहा है कि यह सेफ जोन है और यहां उन्हें कोई खतरा नहीं है. दरअसल, जानवरों का स्वभाव इंसानों से बिलकुल अलग होता है और इंसानों पर हमला भी ये तभी करते हैं जब उन में असुरक्षा की भावना न घर कर जाए. इंसानों को देख कर पहले ये भागते हैं और जब इन्हें लगता है कि ये भाग नहीं सकते तभी वे हमला करते हैं. जहरीला सांप भी किसी को तब तक नहीं डंसता जब तक उसे किसी तरह का नुकसान न पहुंचाया जाए या फिर उन्हें असुरक्षा का आभास हो.”

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भूख से बेहाल हैं जानवर

देश में लौकडाउन के बीच शहरी केंद्रों की ओर जानवरों के आने से पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा ने एक मीडिया से बात करते हुए कहा है कि जंगलों में इंसानी घुसपैठ और पेङपौधों की अंधाधुंध कटाई से उन के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है. इस वजह से वे भोजन की तलाश में शहरों की ओर आने लगे हैं. पहले के समय इंसान और जानवर एकदूसरे से तालमेल बैठा कर रखते थे. मगर आज की सरकारें जंगलों को केवल कारोबार के मकसद से इस्तेमाल कर रही हैं. भूख से बेहाल ये जानवर इंसानों की बस्ती में आ रहे हैं, जो चिंता का विषय है.”

इंसानों के लिए चेतावनी तो नहीं

पर्यावरण मित्र प्रवीण मिश्रा कहते हैं कि कोरोना वायरस मनुष्य जीवन के लिए एक चेतावनी है कि वे प्रकृति से छेड़छाड़ करना छोंङें और प्रकृति के बीच रहने की कोशिश करें. इस की शुरूआत वे घरों से कर सकते हैं और अपने बच्चों को शुरू से ही जागरूक बना सकते हैं. आज के अभिभावक बच्चों को प्रकृति के गुणों के बारे में बताएं ताकि आने वाली पीढ़ियों को बेहतर जीवन दिया जा सके.

कहीं कोरोना वायरस भी इसी छेङछाङ का परिणाम तो नहीं

पर कोरोना वायरस का प्रकोप प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम है इस पर बहस जारी है, शोध किए जा रहे हैं और इसलिए अभी यह कहना कि यह वायरस प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम है, कहना जल्दबाजी होगी. मगर इतना तो तय है कि इंसानों ने खुद को प्रकृति से दूर कर लिया है, खानपान की आदतों को बदतर बना लिया है. इंसान आज मरे हुए जानवरों की लाशों को नोचनोच कर स्वाद के लिए खा रहे हैं तो जाहिर है कुदरत का संतुलन बिगङेगा ही.

एक खबर के मुताबिक, गौरैआ अब कम दिख रही है, कौओं की संख्या में कमी आई है, गिद्ध अब न के बराबर दिख रहे हैं तो जाहिर है इंसानों ने खुद के सुख की खातिर पशुपक्षियों को अपने से दूर कर दिया या उन्हें मार कर खा रहे हैं.

बेजबानों की भी सुनें

झारखंड के दलमा वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी में लगातार हाथियों की संख्या में कमी आ रही है. ऐसा पेङों की अंधाधुंध कटाई से हो रहा है.

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हाथी पलायन कर बंगाल और उड़ीसा के जंगलों की तरफ जा रहे हैं. साल 2017 में जहां दलमा में 96 हाथी थे, अब 47 रह गए हैं. सिर्फ हाथी ही नहीं मोरों, लंगूरों की संख्या में भी भारी कमी आई है.

मगर क्या अब इंसान बदलेगा? बेजबान जानवरों, पशुपक्षियों पर जुल्म बंद करेगा? जंगलों की कटाई नहीं होगी? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन का जवाब आज देना होगा. मगर यदि इंसानों ने अपनी आदतें नहीं बदलीं तो इस खमियाजा उन्हें ही भुगतना होगा. कोरोना वायरस भी इंसानी भूल का ही परिणाम है, इस में कोई संदेह नहीं.

टूट गया शांति सागर के तनमन का संयम : भाग 3

दूसरा भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- टूट गया शांति सागर के तनमन का संयम : भाग 2

अब किसी को इस बात में कोई शक नहीं रह गया था कि बीसपंथी शांति सागर को सिद्धियां प्राप्त हो चुकी हैं. इसी तरह उस ने आग से एक साड़ी जलाई थी तो वह भी नहीं जली थी. जाहिर है यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि खालिस चालबाजी थी, जिसे कोई भी अंधविश्वास निवारण समिति साबित कर सकती है.

नेहा को पूरी तरह झांसे में लेने के अपने कामुक मकसद में वह कामयाब रहा था. हजारों भक्तों का सैलाब उस शांति सागर की जयजयकार करते उस के पांवों में लोट रहा था, जिस के दिलोदिमाग में वासना का सागर हिलोरें मार रहा था. इसी दिन भक्तों को उलझाए रखने के लिए उस ने 7 करोड़ 77 लाख मंत्रों का जाप कराया था.

अगले 2 दिन धार्मिक माहौल में रही नेहा अब अपने इस गुरु की आध्यात्मिक शक्तियों और चमत्कारों की पूरी तरह कायल हो चुकी थी. उसे विश्वास हो गया था कि अगर गुरुकृपा हुई तो कभी उस के परिवार पर कोई विघ्न या संकट नहीं आएगा.

आखिर वार कर ही दिया शांति सागर ने नेहा की इज्जत पर

1 अक्तूबर को शांति सागर ने अपनी कुत्सित मंशा पूरी करने के लिए नेहा के परिवार को कहा कि आज आप के परिवार की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष जाप किया जाना है, इसलिए परिवार के सभी सदस्य उस के साथ मंदिर में रहें. इस पेशकश पर यह परिवार बागबाग हो उठा. सभी लोग मय नेहा के उस के सान्निध्य के लिए पहुंच गए.

शांति सागर ने नेहा के मातापिता को एक कमरे में बैठा कर वैसी ही रेखा गोल घेरे की शक्ल में खींच दी, जैसी त्रेता युग में लक्ष्मण ने सीता के लिए खींची थी. उस ने इन दोनों को सख्त हिदायत यह दी कि कुछ भी हो जाए, उन्हें लगातार मंत्र जाप करना है और घेरे के बाहर नहीं आना है.

इन दोनों के मंत्र जाप में तल्लीन हो जाने पर उस ने नेहा के भाई को किसी बहाने से बाहर भेज दिया और नेहा को ले कर मंदिर के कमरे में चला गया. इस दौरान वह भी मंत्रोच्चारण करता रहा, जिस से कोई किसी तरह का शक न करे.

नेहा को अंदर ले जा कर उस ने बिठाया और उस के शरीर पर मोर पंख फेरने लगा. फिर कुछ देर बाद उस ने नेहा को कपड़े उतारने का आदेश दिया तो नेहा का सम्मोहन टूटा. गुरु क्या साक्षात भगवान भी उतर कर ऐसा कहे तो भी कोई युवती ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सकती. नेहा की हिचकिचाहट को दूर करने के लिए उस ने फिर उसे डराया कि इस स्टेज पर आने के बाद उस ने अगर बात नहीं मानी तो परिवार का अनिष्ट तय है.

इस के बाद नेहा ने सुबकते हुए पुलिस को बताया था ‘मेरे नग्न होने के बाद उस ने शरीर पर मोर पंख के बजाय हाथ फेरना शुरू कर दिया. इस पर मैंने उठने की कोशिश की तो वह गुस्से से भर उठा और फिर डराया. इस के बाद जो हुआ, वह मैं बयां नहीं कर सकती.’

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कुछ देर बाद लुटीपिटी नेहा बाहर आई और भाई से घर चलने के लिए कहा. भाई कुछ नहीं समझ पाया कि नेहा इतनी घबराई हुई क्यों है. बहरहाल नेहा घर आ कर सो गई. अगले दिन वह जागी तो उस का पूरा बदन दर्द कर रहा था, क्योंकि शांति सागर ने पूरी मर्दानगी और ताकत दिखाते हुए उसे बेरहमी से रौंदा था.

शरीर तो दर्द कर ही रहा था, साथ ही तनाव के चलते नेहा की दिमागी हालत भी ठीक नहीं थी, इसलिए उस की मां उसे एक लेडी डाक्टर के पास ले गई. अनुभवी डाक्टर तुरंत समझ गई कि नेहा के साथ क्या हुआ है. नेहा की मानसिक हालत देख कर उस ने उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाने की सलाह भी दी और मुनि के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने को भी कहा.

अब शांति सागर का घिनौना चेहरा और कुत्सित हरकत दोनों ही सामने आ गए थे. लेकिन ये लोग समाज के डर से रिपोर्ट लिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें मालूम था कि कोई इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि जैन मुनि शांति सागर ने एक मासूम युवती का कौमार्य भंग कर के उस का बेरहमी से बलात्कार किया है. हालांकि यह बात वह परिवारजनों को बड़ौदा आने के बाद बता भी चुकी थी.

डर के चलते ये लोग शायद रिपोर्ट नहीं लिखाते, लेकिन जब तनावग्रस्त नेहा चक्कर खा कर गिर गई तो मनोचिकित्सक ने साफसाफ कहा कि अगर आप लोग मुनि के खिलाफ काररवाई नहीं करेंगे तो लड़की घुटघुट कर मर जाएगी.

यही सलाह लेडी डाक्टर ने भी दी तो इन लोगों ने हिम्मत जुटाई और न केवल कमिश्नर को चिट्ठी लिखी, बल्कि बड़ौदा के महिला थाने में जा कर रिपोर्ट भी लिखाई.

इस पूरे मामले में एकलौती अच्छी बात पुलिस वालों का सहयोगात्मक रवैया रहा. कमिश्नर सतीश शर्मा के अलावा क्राइम ब्रांच के डीसीपी मनोज कुमार और सूरत की एएसपी निधि चौधरी ने नेहा की हालत देखते हुए तुरंत काररवाई की, जिस के चलते पूरा मामला रोशनी में आ पाया. मामले की जांच कर रहे अधिकारी डी.के. राठौड़ के सामने 4 और लोगों ने बयान दर्ज कराते हुए यह दावा किया कि वे शांति सागर और नेहा की मौजूदगी में वहां थे. अगर यह सच है तो इसे बलात्कार साबित कैसे किया जाएगा. यह बात भी शांति सागर के पक्ष में जाती है.

क्या सजा हो पाएगी जैन मुनि शांति सागर को?

धर्म की आड़ में धर्मगुरु कैसेकैसे लड़कियों को हवस का शिकार बनाते हैं, यह बात तो एक बार फिर सामने आई ही, साथ ही धर्मांध लोगों द्वारा शांति सागर का बचाव भी जता गया कि उन के लिए अपने ही समाज की एक युवती की अस्मत से ज्यादा धर्म की प्रतिष्ठा अहम है.

मामला अब अदालत में है और शांति सागर जेल में. कानूनी तौर पर साफ दिख रहा है कि शांति सागर यह साबित करने की पूरी कोशिश करेगा कि नेहा ने सहमति से संबंध बनाए थे और उस का पिता कमीशन मांग रहा था. जैसे नेहा को यह साबित करना आसान नहीं होगा कि बलात्कार हुआ है, वैसे ही तर्क शांति सागर की ओर से भी पेश किए जाएंगे कि यह एक अफेयर था, जो लंबे समय से चल रहा था.

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उम्मीद की जानी चाहिए कि मासूम नेहा को इंसाफ मिलेगा. लेकिन इस मामले से जैन समाज की एक कमजोरी भी उजागर हुई कि मुनियों में अंधश्रद्धा उन की बच्चियों की जिंदगी भी बरबाद कर सकती है. नेहा के मातापिता को अपनी बेटी को एकांत में मुनि शांति सागर के साथ भेजा जाना भारी भूल साबित हुई, जिस का खामियाजा मासूम नेहा ने भुगता.

चाय वाला था शांति सागर  

जैसे ही शांति सागर की करतूत उजागर हुई, लोगों की जिज्ञासा इस बात में स्वाभाविक रूप से बढ़ी कि वह है कौन और कैसे इतना बड़ा नामी मुनि बन गया. जिज्ञासुओं ने उस का अतीत और जिंदगी खंगाला तो पता चला कि शांति सागर मूलरूप से राजस्थान के कोटा का रहने वाला है और उस का असली नाम गिरराज शर्मा है.

शांति सागर यानी गिरराज के पिता सज्जन लाल शर्मा कोटा में हलवाई थे. पढ़ाईलिखाई में फिसड्डी गिरराज उन्हीं की मिठाई की दुकान के आगे चाय का ठेला लगाता था. किशोर अवस्था में ही मांबाप चल बसे तो गिरराज का मन भी कोटा से उचट गया और वह मध्य प्रदेश के गुना में अपने ताऊ के पास आ गया.

गुना में उस के ताऊ ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए भतीजे का दाखिला एक स्कूल में करवा दिया. पर यहां भी पढ़ाईलिखाई में उस ने दिलचस्पी नहीं ली और चाय के एक ठेले पर काम करने लगा, जिस में बर्तन धोने का काम भी शामिल था. गुना में जवान हुए गिरराज को फैशन करने का खासा शौक था. वह तरहतरह के फैशन करता था और खाली समय में क्रिकेट खेलने का अपना शौक भी पूरा करता था. एक फैशनेबल लड़के को चाय के ठेले पर काम करते देख गुना के लोगों में वह मशहूर हो गया था.

साल 1993 में वह मंदसौर गया था, जहां जैन आचार्य कल्याण सागर के प्रवचन चल रहे थे. कल्याण सागर के प्रवचनों से वह इतना प्रभावित हुआ कि उस ने वहीं उन से दीक्षा ले ली. इस तरह वह गिरराज शर्मा से शांति सागर बन गया. जल्द ही अपना एक अलग संघ बना कर वह भी जैन मुनियों की तरह जगहजगह विहार करते हुए प्रवचन देने लगा. जल्दी ही जैन समुदाय में उस की खासी पैठ बन गई. उस के हजारों शिष्य बन गए थे.

जब पोल खुली तो उसे पूजने वाला जैन समाज भी उस पर थूथू करने लगा. क्रांतिकारी और कड़वे प्रवचनों के लिए मशहूर जैन मुनि तरूण सागर ने शांति सागर को पाखंडी बताते हुए मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, पर ऐसा तब हुआ, जब उस का असली चेहरा सामने आ चुका था. जाहिर है ऐसे में कोई उसे क्यों संत या मुनि कहता. यह तो एक उजागर सच से मुंह छिपाने जैसी बात थी.

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टूट गया शांति सागर के तनमन का संयम : भाग 2

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इसी दौरान नेहा के पिता ने शांति सागर के श्री चरणों में निवेदन किया था कि वे उन्हें अपना शिष्य बना लें. हजारों भक्तों की भीड़ में रोज कई लोग शिष्य बनने की अनुनयविनय करते रहते हैं, पर मुनियों का जिस पर मन आ जाता है, वे उसे ही शिष्य बनाते हैं. नेहा के पिता के आग्रह को शांति सागर टाल गया.

दूसरे दिन जब शांति सागर ने नेहा को देखा तो जाने क्या हुआ कि उस के दिलोदिमाग में अशांति  छा गई. सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और संयम जैसे शब्द उड़नछू हो गए और इस शातिर का दिमाग नेहा को हासिल करने की जुगत में जुट गया.

कुछ सोचते हुए शांति सागर ने नेहा के पिता को बुलाया और सपरिवार दीक्षा देने यानी शिष्य बनाने को तैयार हो गया. खुद मुनि ने बुला कर गुरू बनने की बात कही, यह नेहा के पिता के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं थी.

उन की बांछें खिल उठीं और फिर देखते ही देखते उन का पूरा परिवार शांति सागर की सेवा में लग गया.

नेहा कैसे आई मुनि शांति सागर के प्रभाव में

मांडवी में नेहा कुछ दिन रुकी, फिर भाई के पास वापस बड़ौदा चली गई. पर उसे सपने में भी अहसास नहीं था कि वह किसी ऐसेवैसे या ऐरेगैरेनत्थूखैरे का नहीं बल्कि आचार्य तक कहे जाने वाले मुनि शांति सागर का दिल चुरा कर ले जा रही है, जो अब तक तप में रमा था.

बड़ौदा आ कर वह अपने कामों में लग गई पर शांति सागर के चमत्कारों ने उस के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ दी थी. जैन धर्म में भी मंत्र जाप का काफी महत्व है. 4 फिरकों में बंटे जैन धर्म के 2 अहम संप्रदाय तेरापंथी और बीसपंथी हैं. तेरापंथी चमत्कारों में भरोसा नहीं करते, लेकिन बीसपंथी से जुड़ा शांति सागर कभीकभार ऐसा हैरतंगेज चमत्कार भक्तों, शिष्यों और श्रद्धालुओं को दिखा दिया करता था कि सभी हैरान रह जाते थे और उस में उन की आस्था और भी बढ़ जाती थी. कभीकभार गुस्से में आ कर वह अपने विरोधियों को कबूतर बनाने की धौंस देता था.

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कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए. लेकिन एक दिन नेहा उस वक्त हतप्रभ रह गई, जब उस के पास शांति सागर का फोन आया. चूंकि धर्म में उस की अगाध श्रद्धा थी, इस नाते वह जानती थी कि जैन मुनि मोबाइल फोन जैसे गैजेट्स का इस्तेमाल नहीं करते हैं. सांसारिक वस्तुओं से परहेज करने वाले गुरुजी के फोन से उसे खुशी तो हुई पर हैरानी भी कम नहीं हुई.

चिडि़या की तरह फंसी नेहा मुनि शांति सागर के जाल में

उस ने यह सोच कर खुद को तसल्ली दे ली कि यूं ही किसी भक्त के मोबाइल फोन से उन्होंने उसे काल कर दिया होगा. नेहा को इतनी जानकारी तो थी कि मुनि लोग अपने पास केवल पिच्छिका रखते हैं और आमतौर पर सूरज ढलने के बाद मौन धारण कर लेते हैं, लेकिन शांति सागर ने उसे रात को फोन कर के बात की थी.

बाद में यह जान कर तो उस की हैरानी और बढ़ गई कि शांति सागर के पास खुद के पांचपांच मोबाइल फोन हैं और वे वाट्सऐप का भी प्रयोग करते हैं. इस बाबत अपने मन में उमड़तीघुमड़ती शंकाओं को ले कर उस ने यह सोच कर खुद को तसल्ली दे ली कि उसे मुनियों के मामले में मीनमेख नहीं निकालनी चाहिए, यह अधर्म है.

फिर अकसर मोबाइल के जरिए शांति सागर नेहा के संपर्क में रहने लगा. एक दिन उस ने नेहा से उस की सब से बड़ी इच्छा पूछी तो अल्हड़ नेहा ने तुरंत कह दिया कि बस मैं और मेरे मम्मीपापा हमेशा खुश रहें.

चिडि़या को जाल में फंसते देख शांति सागर ने फोन पर ही तथास्तु की मुद्रा में उस से कहा कि ऐसा ही होगा, पर इस के लिए मंत्र जाप करना होगा, इसलिए तुम अपना एक फोटो वाट्सऐप पर भेज दो.

अपनी इच्छा पूरी होने की गारंटी मिलते देख नेहा ने तुरंत अपना फोटो वाट्सऐप पर भेज दिया. इस पर शांति सागर का फोन आया कि अरे ऐसा फोटो नहीं, बल्कि वैसा दिगंबर भेजो, जैसा मैं रहता हूं.

ऐसी बात या प्रस्ताव पर भला कौन भारतीय युवती होगी जो शर्म से लाल न हो उठे, यही नेहा के साथ हुआ. उस ने हिचकिचाहट दिखाते इनकार कर दिया तो शांति सागर ने बड़े दार्शनिक अंदाज में उसे समझाया कि अरे पगली भगवान तो सब को इसी अवस्था में पैदा करता है, ये वस्त्र तो दुनिया वाले पहना देते हैं.

इस के बाद भी नेहा सहमत नहीं हुई तो मुनि ने समझाया कि अब जप शुरू हो चुका है और इसे बीच में छोड़ने से तुम्हारे मातापिता का अनिष्ट हो सकता है. यह चूंकि विशेष प्रकार का जप है जो नग्नावस्था में ही पूरा होता है, इसलिए अनिष्ट से बचने के लिए नग्न फोटो भेजो.

अनहोनी से डर गई नेहा ने अपने कपड़े उतारे और उसी अवस्था में अपना फोटो खींच कर शांति सागर को भेज दिया. इस वक्त वह बेहद दुविधा में थी और लजा भी रही थी, खुद अपने कपड़े उतारते बारबार उस के हाथ कांप रहे थे. बात थी ही कुछ ऐसी ही.

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फोटो भेज कर वह पूरी तरह बेफिक्र हो पाती कि 2 दिन बाद फिर इस कामुक मुनि का फोन आया, जिस का सार यह था कि चूंकि यह फोटो थोड़े अंधेरे में खींचा गया है, इसलिए मंत्र असर नहीं कर रहे हैं. उस ने इस बार नेहा को निर्देश दिया कि वह पूरी रोशनी में निर्वस्त्र हो कर फोटो खींच कर भेजे, तभी अनिष्ट से बचा जा सकता है.

अपने जाल को धीरेधीरे फैलाता रहा मुनि शांति सागर

2 दिन पहले अपना नग्न फोटो भेज चुकी नेहा की झिझक थोड़ी कम हो गई थी, इसलिए उस ने गुरु की इस आज्ञा का भी पालन किया और वे जैसा फोटो चाहते थे, वैसा भेज दिया. लेकिन इस बात की चर्चा उस ने घर वालों से नहीं की, जिन की सलामती के लिए उस ने नारीसुलभ लज्जा दांव पर लगा दी थी.

2 महीने गुजर गए तो नेहा के मन से डर जाता रहा और उस ने मन ही मान लिया कि मंत्र जाप के लिए निर्वस्त्र फोटो जरूरी होता होगा, इसलिए शंका और चिंता की कोई बात नहीं. इस चक्कर में उस ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उस का नग्न फोटो देख शांति सागर ने उस की खूबसूरती की भूरिभूरि प्रशंसा की थी, जैसे वह कोई मुनि न हो कर दिलफेंक आशिक हो. नेहा के मन में तो परिवार की सुरक्षा की चिंता थी. वह अज्ञात आशंकाओं से उबरना चाहती थी.

फिर एक दिन शांति सागर ने उसे बताया कि सब कुछ ठीकठाक है, लेकिन इस बार मेरे चातुर्मास में तुम परिवार सहित आना. उस वक्त एक और विशेष जाप करूंगा, जिस से फिर तुम्हें या तुम्हारे परिवार को कभी कोई खतरा नहीं रह होगा. शांति सागर ने किस धूर्तता से संभ्रांत घराने की एक सांस्कारिक युवती को अपने जाल में फंसा लिया था, यह बात कोई समझ नहीं पाया. क्योंकि नेहा सब कुछ छिपाने की गलती कर रही थी. उस ने चातुर्मास में आने सहमति दे दी.

दरअसल, नेहा के नग्न फोटो देख कर ही शांति सागर के तनमन का संयम दरक चुका था और अब वह इस कल्पना में डूबा रहता था कि जब नेहा साक्षात इस अवस्था में उस के सामने होगी तब…

इस बाबत यह बहेलिया एक और जाल बुन रहा था. लेकिन उस के प्रवचनों में जैन धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की रोजाना व्याख्या होती थी, जिसे सुन लोग अभिभूत हो उठते थे. शांति सागर को णमोकार बाबा के नाम से भी बुलाया जाता था.

जैन धर्म में मुनियों के चातुर्मास का विशेष महत्त्व होता है. बारिश के 4 महीनों में जैन धर्म के भव्य धार्मिक आयोजन शबाब पर होते हैं, जिन में भक्त दिल खोल कर धन लुटाते हैं. कौन कहां किस मुनि के सान्निध्य में चातुर्मास व्यतीत करेगा, यह जैन धर्मावलंबी काफी पहले तय कर लेते हैं और बढ़चढ़ कर उन में हिस्सा लेते हैं.

मुनि शांति सागर ने सही वक्त पर बांधी नेहा को फंसाने की भूमिका

इस बार शांति सागर ने अपने संघ का चातुर्मास सूरत जिले के नानपुरा टाटलियावाड़ स्थित जैन मंदिर में व्यतीत करने का फैसला लिया तो वहां के भक्तों ने शांति सागर की आगवानी में पलकपांवड़े बिछा दिए. समारोहपूर्वक चातुर्मास की तैयारियां करने में टाटलियावाड़ के जैनियों ने कोई कमी नहीं छोड़ी. मंदिर पहुंच कर शांति सागर ने प्रवचन शुरू किए तो रोज भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी.

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अपना कामुक मकसद पूरा करने के लिए शांति सागर ने ग्वालियर में नेहा के पिता को चातुर्मास में आने को कहा तो वे मानो धन्य हो उठे. ऐसा अपवाद स्वरूप ही होता है कि गुरु खुद शिष्य को आमंत्रित करे. शांति सागर का मुरीद हो चुका नेहा का परिवार सितंबर के महीने में टाटलियावाड़ पहुंच गया. इस के पहले शांति सागर ने नेहा को भी कह दिया था कि वह अपने घरवालों के साथ जरूर आए क्योंकि इन दिनों में विशेष जाप करना है.

धर्मज्ञानी और अनुभवी शांति सागर को इतना तो समझ आ गया था कि नेहा एकदम से उस के सामने समर्पण नहीं कर देने वाली, इसलिए नेहा को और गिरफ्त में लेने के लिए उस ने 29 सितंबर को सैकड़ों भक्तों के सामने एक पत्थर को पानी में तैराने का अविश्वसनीय कारनामा कर दिखाया.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

टूट गया शांति सागर के तनमन का संयम : भाग 1

19 वर्षीया नेहा जैन (बदला नाम) हद से ज्यादा धार्मिक और आस्तिक युवती थी. नेहा के पास वह सब कुछ था जिस पर वह चाहती तो घमंड कर सकती थी. एक धनाढ्य जैन परिवार में जन्मी नेहा की खूबसूरती में गजब की सादगी थी. गुरूर से कोसों दूर रहने वाली नेहा की कोई उम्रजनित इच्छा नहीं थी, सिवाय इस के कि उस के मम्मीपापा हमेशा खुश और स्वस्थ रहें.

नेहा के पिता का ग्वालियर में खासा रसूख और इज्जत दोनों है. वहां उन के कई लौज और धर्मशालाएं हैं, जिन से उन्हें खासी आमदनी होती है. धार्मिक माहौल नेहा को बचपन से ही मिला था, जहां घर में चाहे कुछ भी हो रहा हो, प्रतिदिन मंदिर जाना एक अनिवार्यता थी.

जैन मुनियों ओर गुरुओं में अपार आस्था रखने वाली नेहा चाहती थी कि ऐसी कोई गारंटी मिल जाए तो मजा आ जाए, जिस से कि उस के मम्मीपापा हमेशा खुश रहें, उन पर कभी कोई विपत्ति न आए. इस उम्र में मांबाप से इतना लगाव या चाहत कतई हैरानी की बात नहीं है. दूसरी तरफ उस के मम्मीपापा भी चाहते थे कि नेहा खूब पढ़लिख जाए और किसी अच्छे परिवार के लड़के से उस की शादी हो जाए तो उन की एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी.

व्यावसायिक बुद्धि के लिए पहचाने जाने वाले जैन समुदाय के अधिकांश लोग धनाढ्य होते हैं. अपनी संपन्नता की वजह वे अपने धर्म और उन मुनियों को बहुत मानते हैं, जिन के कठोर त्याग, तपस्या की माला हर कोई जपता रहता है. नेहा को भी ऐसे किसी गुरू की तलाश थी, जो एक बार उसे यह आश्वासन दे दे कि उस के मम्मीपापा को कुछ नहीं होगा. इस आश्वासन के बदले वह कुछ भी करने तैयार थी.

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पर 45 वर्षीय जैन मुनि शांति सागर ने उस से जो वसूला, उस की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. यह नेहा के सादगी भरे सौंदर्य का सम्मोहन ही था कि एक झटके में शांति सागर का संयम ऐसा टूटा कि देश भर के जैनी तो जैनी, गैरजैनी भी उस की करतूत पर शर्मिंदा हो उठे.

किसी धर्मगुरु का ऐसा घिनौना चेहरा पहली बार सामने नहीं आया था, लेकिन इस बार आरोप एक जैन मुनि पर लगा था, जिस से यह साबित हो गया कि ब्रह्मचर्य एक परिकल्पना या धारणा भर है, नहीं तो प्रकृति और इंद्रियों का द्वंद किसी तपस्या से खत्म नहीं हो जाता.

विरक्ति का राग अलापते रहने वाले धर्मगुरुओं में कामुकता या आसक्ति इस हद तक होती है कि वे या तो तमाम धार्मिक नियमों और सिद्धांतों को तोड़ने को बाध्य हो जाते हैं या फिर धर्म का वास्तविक चेहरा लोगों के सामने खुद उजागर कर देते हैं. इंद्रियों को वश में करने के नाम पर वे उन का दमन ही करते हैं.

नेहा की दुखद आपबीती या कहानी कहीं से भी शुरु कर लें, वह खत्म तो एक ऐसे बलात्कार पर जा कर होती है, जो धर्म की आड़ में एक जैन धर्मशाला में हुआ और इस की सुनवाई करने वाली अदालत को भी सहमति और असहमति के मुद्दे पर सोचने और फैसला देने में खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है. वजह यह कि शांति सागर निहायत ही धूर्त और रंगा सियार है, जिस ने अपने बचाव की भूमिका बलात्कार की योजना से पहले से ही बना रखी थी.

कैसे सामने आई पूरी कहानी की हकीकत

सूरत के पुलिस कमिश्नर सतीश शर्मा ने अपनी लंबी नौकरी में हर तरह के अपराध और अपराधी देखे हैं. बीती 12 अक्तूबर की डाक जब उन के दफ्तर में पहुंची तो एक लिफाफे पर गोपनीय लिखा हुआ था, लिहाजा उन के रीडर ने उस लिफाफे को खोलने के बजाय ज्यों का त्यों उन्हें सौंप दिया.

यह चिट्ठी नेहा ने उन्हें भेजी थी, जिसे खोलते ही सतीश शर्मा के होश फाख्ता हो गए. विस्तार से लिखी इस चिट्ठी में नेहा ने जैन मुनि शांति सागर महाराज पर अपने साथ बलात्कार का आरोप लगाते हुए सिलसिलेवार ब्यौरा भी दिया था. इस पत्र को एक सांस में पूरा पढ़ कर सतीश शर्मा को यकीन नहीं हो रहा था कि कोई नामी जैन मुनि बलात्कार जैसे घिनौने अपराध को भी अंजाम दे सकता है.

मामला गंभीर था और धर्म से ताल्लुक रखता था, इसलिए अनुभवी सतीश शर्मा ने इस की तह में जाने का फैसला कर लिया. उन्होंने चिट्ठी में लिखे मोबाइल नंबर पर फोन किया और नेहा को अभिभावकों सहित अपने औफिस में आने के लिए कहा. कोई भी कदम उठाने से पहले किसी भी जिम्मेदार और तजुर्बेकार पुलिस अधिकारी के लिए तसल्ली कर लेना जरूरी था कि वाकई जो लिखा है वह सच है या इस में कहीं कोई छलकपट या किसी की साजिश तो नहीं है.

नेहा अपने पिता के साथ कमिश्नर साहब के औफिस पहुंची और उस ने अपनी जुबानी सारी बात बताई. सतीश शर्मा को उस की बातों पर भरोसा न करने की कोई वजह नजर नहीं आई.

नेहा के बयान की बिनाह पर पुलिस ने शांति सागर को गिरफ्तार कर लिया. इस गिरफ्तारी का जैन समुदाय के लोगों ने हर मुमकिन विरोध किया. दिगंबर जैन समाज के वरिष्ठ लोग कमिश्नर से मिले और उन्हें बताया कि यह लड़की (नेहा) समाज को बदनाम करना चाहती है, इसलिए मुनि पर झूठा आरोप लगा रही है.

धर्म की दुनिया कितनी पूर्वाग्रही और विरोधाभासी होती है, यह साबित हुआ महावीर दिगंबर जैन मंदिर के एक ट्रस्टी आर.जी. शाह के इस कथन से. शाह ने बताया कि 29 सितंबर को सूरत के परवट पारिया के पास बनी मौडल टाउनशिप में जैन मुनि शांति सागर का पिच्छी परिवर्तन का आयोजन हुआ था. इस आयोजन में 2 करोड़ 92 लाख रुपए की बोली लगी थी. बकौल आर.जी. शाह नेहा के पिता इस राशि में से 40 फीसदी कमीशन मांग रहे थे, जो मुनिजी ने देने से इंकार कर दिया था. तब उन के इशारे पर नेहा ने मुनिजी पर बलात्कार का आरोप लगा दिया.

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जब एक संयमी दिगंबर जैन मुनि बलात्कार कर सकता है तो उसी समुदाय का एक परिवार कुछ लाख रुपए झटकने के लिए अपनी बेटी की इज्जत दांव पर लगा कर सौदेबाजी क्यों नहीं कर सकता? इस बात की अहमियत न केवल इस मुकदमे में बल्कि हमेशा बनी रहेगी, क्योंकि जैन धर्म में बातबात पर लाखोंकरोड़ों की बोलियां लगती हैं, यह हर कोई जानता है.

किसी भी जैन मुनि पर आरोप लगाना आसान नहीं

सच क्या है यह जानने के लिए जरूरी था कि नेहा की मैडिकल जांच कराई जाए. जांच में डाक्टर ने दुष्कर्म होने की पुष्टि की तो शांति सागर को गिरफ्तार कर आठवा थाने लाया गया. अब तक देश भर में जैन मुनि के इस कुकर्म का हल्ला मच चुका था. यह भी शायद पहला मौका था, जब किसी दिगंबर जैन मुनि को पुलिस ने कपड़े पहनाए हों.

शांति सागर को भी जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन कपड़े पहना कर. इस बात पर भी सूरत की धार्मिक फिजा बिगड़ती दिख रही थी.

आठवा थाने के बाहर जैन समुदाय के लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी, इसलिए पुलिस ने ऐहतियात बरतते हुए शांति सागर को आधी रात में मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के उसे लाजपोक जेल में शिफ्ट कर दिया था. ऐसा इसलिए किया गया ताकि धर्मांध लोग किसी तरह का फसाद खड़ा न कर पाएं. जैन समुदाय के अधिकांश लोग नेहा के बयान पर भरोसा नहीं कर रहे थे, बल्कि यह मान रहे थे कि पैसों के लालच में उन के मुनि पर यह आरोप मढ़ा गया है, जिस की न्यायिक जांच होनी चाहिए.

निश्चित रूप से मामला न केवल तूल पकड़ लेता, बल्कि हिंसा भी हो सकती थी, लेकिन खुद शांति सागर ने एक सधे हुए खिलाड़ी की तरह अपनी और नेहा की मैडिकल जांच के बाद यह स्वीकार कर लिया कि उस ने नेहा से शारीरिक संबंध स्थापित किए थे. मुनि ने कहा कि इस के लिए उस ने कोई जबरदस्ती नहीं की थी, संबंध नेहा की सहमति से बने थे.

मैडिकल जांच के दौरान उस ने माना कि इस से पहले उस ने कभी देहसुख नहीं भोगा है. डाक्टर के यह पूछने पर कि आप तो मुनि हैं, फिर आप ने ऐसा क्यों किया? इस पर वह खामोश रहा और सिर झुका लिया.

यह इस मामले की दूसरी चौंका देने वाली बात थी. शांति सागर के इस बयान ने कमीशन और सौदेबाजी का आरोप लगा कर हायहाय करने वाले समर्थकों के गुस्से को ठंडा कर दिया, बात आईगई हो गई. कल का ईश्वरतुल्य पूजनीय मुनि शांति सागर लाजपोर जेल का कैदी नंबर 11035 हो गया.

नेहा के बयान से जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस तरह है –

कैसे बना नेहा जैन का परिवार शांति सागर का शिष्य

ग्वालियर में नेहा के पिता ने काफी पैसा कमा लिया था और वे व्यवसाय बढ़ाने के लिए गुजरात का रुख कर चुके थे. इस बाबत उन्होंने अपने बेटे को 4 साल पहले बड़ौदा भेज दिया था.

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भाई भी पिता की तरह तीक्ष्ण व्यवसायिक बुद्धि वाला था. इसलिए उस का कारोबार वहां भी चल निकला. ग्वालियर में स्कूली पढ़ाई पूरी कर चुकी नेहा को भाई ने अपने पास बड़ौदा बुला लिया और वहां के एक कालेज में उस का दाखिला करा दिया.

इसी साल मार्च के महीने में नेहा मातापिता के साथ मांडवी गई थी, जहां जैन मंदिर में शांति सागर के प्रवचन चल रहे थे. शांति सागर के प्रवचन सुन कर नेहा तो प्रभावित हुई ही थी, उस के मातापिता उस से भी ज्यादा प्रभावित हुए थे. शांति सागर के दर्शन मात्र से ही इस जैन परिवार को असीम सुख की प्राप्ति हुई थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

सारा जहां अपना: भाग 2

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लेखक- शिव अवतार पाल

एक सुबह अंजलि आफिस के लिए तैयार हो रही थी कि तेज चक्कर आने लगे. मयंक उसे तुरंत अस्पताल ले गया. चैकअप कर के डाक्टर ने बधाई दी कि वह मां बनने वाली है.

‘मैं अभी बच्चा अफोर्ड नहीं कर सकती.’

‘तो पहले से सेफ्टी करनी थी.’

‘आगे से ध्यान रखूंगी,’ उस ने लापरवाही से कंधे उचकाए, ‘फिलहाल तो इस बच्चे का गर्भपात चाहती हूं.’

‘ये खतरनाक हो सकता है,’ डाक्टर गंभीरता से बोली, ‘संभव है आप भविष्य में फिर कभी मां न बन सकें.’

‘अपना भलाबुरा मैं बेहतर समझती हूं. आप अपनी फीस बताइए.’

‘अंजलिजी,’ वह सख्ती से बोली, ‘डाक्टर के लिए मरीज का हित सर्वोपरि होता है. आप के लिए जो उचित था, मैं ने बता दिया. वैसे भी यहां भू्रणहत्या नहीं की जाती है.’

‘आप नहीं करेंगी तो कोई और कर देगा.’

‘बेशक, शहर में ऐसे डाक्टरों की कमी नहीं है जो रुपयों के लालच में इस घिनौने काम को अंजाम दे देंगे, पर मैं ने कइयों को जिद पूरी होने के बाद औलाद के लिए तड़पते देखा है.’

उस दिन घर में तनाव का माहौल रहा. मयंक चाहता था कि आंगन मासूम किलकारियों से गुलजार हो. हो सकता है मां बनने के बाद अंजलि के स्वभाव में परिवर्तन आ जाए, तब गृहस्थी की बगिया महक उठेगी, पर अंजलि तैयार नहीं थी. उस का तर्क था कि यही तो उम्र है कुछ कर गुजरने की. अभी से बालबच्चों के भंवर में उलझ गई तो लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकेगी? सफलता की सीढि़यां चढ़ने के लिए टैलेंट के साथ आकर्षक फिगर भी चाहिए, वरना कौन पूछता है.

मयंक बड़ी मुश्किल और मिन्नतों के बाद उसे राजी कर सका.

अंजलि ने ठीक समय पर स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. अपने प्रतिरूप को देख मयंक निहाल हो गया. बेटे ने उस का उजड़ा मन प्रकाश से भर दिया था इसलिए बड़े प्यार से उस का नाम दीप रखा. दिन में उस की देखभाल करने के लिए मयंक ने एक अच्छी आया का प्रबंध कर लिया था.

बेटे को जन्म तो अंजलि ने दिया था, पर मां की भूमिका मयंक निभा रहा था. दीप सुबहशाम उस की बांहों के झूले में झूल कर बड़ा होने लगा.

वह 4 साल का हो गया था.

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रात के 10 बज चुके थे, अंजलि आफिस से नहीं लौटी थी. मयंक उस के मोबाइल पर कई बार फोन कर चुका था. घंटी जा रही थी, पर वह रिसीव नहीं कर रही थी. उस ने आफिस फोन किया, वहां से भी कोई उत्तर नहीं मिला. वैसे भी इस वक्त वहां किसी को नहीं होना था. दीप को सुला कर वह जागता रहा. अंजलि 12 बजे के बाद आई.

‘कहां थी अब तक?’ मयंक ने सवाल दागा, ‘मैं कितना परेशान हो गया था.’

‘मेरा प्रमोशन बौस की प्राइवेट सेके्रटरी के पद पर हो गया,’ उस की चिंता से बेफिक्र वह मुदित मन से बोली, ‘कंपनी की ओर से शानदार बंगला और ए.सी. गाड़ी मिलेगी. प्रमोशन की खुशी में बौस ने पार्टी दी थी, वहीं बिजी थी.’

‘फोन तो रिसीव कर लेती.’

‘शोरशराबे में आवाज नहीं सुनाई दी.’

‘तुम ने ड्रिंक ली है?’ उस के मुंह से आती महक ने उसे आंदोलित कर दिया.

‘कम आन डियर,’ अंजलि ने लापरवाही से कहा, ‘बौस नहीं माने तो थोड़ी सी लेनी पड़ी. उन्हें नाराज तो नहीं कर सकती न, सब का खयाल रखना पड़ता है.’

‘शर्म आती है तुम्हारी बातें सुन कर. मेरी कभी परवा नहीं की और दूसरों की खुशी के लिए मानमर्यादा ताक पर रख दी.’

‘व्हाट नौनसेंस,’ वह बिफर पड़ी, ‘यू आर मेंटली इल. मेरा कद तुम से ऊंचा हो गया तो जलन होने लगी.’

‘तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो इसलिए ऐसे घटिया विचार तुम्हारे दिमाग में ही आ सकते हैं.’

‘तुम ने मुझे नीच कहा,’ वह क्रोध से कांपने लगी.

‘अभी तुम होश में नहीं हो,’ मयंक ने विस्फोटक होती स्थिति को संभालने की कोशिश की, ‘सुबह बात करेंगे.’

‘तुम्हारा असली रूप देख कर होश में तो आज आई हूं. मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुम जैसे संकीर्ण इनसान के साथ मैं ने इतने दिन कैसे गुजार लिए.’

पानी सिर के ऊपर बहने लगा था. मयंक की इच्छा हुई कि उस का नशा हिरन कर दे, पर इस से बात बिगड़ सकती थी.

दीप जाग गया था और मम्मीपापा को चीखतेचिल्लाते देख सहमा सा खड़ा था. मयंक उसे ले कर दूसरे कमरे में चला गया. अंजलि इस के बाद भी काफी देर तक बड़बड़ाती रही.

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अब वह अकसर देर रात को लौटती और कभीकभी अगले दिन. मयंक पूछता तो पार्टी या टूर की बात कह कर बेरुखी से टाल देती. अब तो डिं्रक लेना उस के लिए रोजमर्रा की बात हो गई थी. मयंक समझाने की कोशिश करता तो दंगाफसाद शुरू हो जाता था. इस दमघोंटू माहौल में दीप अंतर्मुखी होता जा रहा था. उस का बचपन जैसे उस के भीतर सिमट चुका था. मयंक ने हर संभव कोशिश की पर उस के होंठों पर मुसकान न ला सका. वह घबरा कर उसे मनोचिकित्सक के पास ले गया.

पूरी बात सुन कर डाक्टर बोले, ‘बच्चों में फूल सी कोमलता और मासूमियत होती है, जिस की खुशबू से घर का उपवन महकता है. वह जिस डाल पर खिलते हैं, उस की जड़ मातापिता होते हैं. जब जड़ को घुन लग जाए तो फूल खिले नहीं रह सकते.’

थोड़ा रुक कर डाक्टर फिर बोले,

‘मि. मयंक आप इस तरह भी समझ सकते हैं कि बच्चा अपने आसपास के वातावरण को बारीकी से महसूस करता है और उसी के अनुरूप ढलता है. मांबाप के झगड़े में वह स्वयं को भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस करता है, इस स्थिति में उस के भीतर कुंठा या हिंसा की प्रवृत्ति पनपने लगती है. कभीकभी वह विक्षिप्त अथवा कई तरह के मानसिक रोगों का शिकार भी हो जाता है. पतिपत्नी के ईगो में उस का वर्तमान व भविष्य दोनों अंधकारमय हो जाते हैं. मेरी राय में आप घर में शांति स्थापित करें या दीप को इस माहौल से कहीं दूर ले जाएं.’

मयंक ने अंजलि को सबकुछ बताया पर उस के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. उसे बेटे से अधिक अपने कैरियर से लगाव था. मयंक ने बहुत सोचसमझ कर उसे शहर से दूर आवासीय विद्यालय में एडमिशन दिला दिया था. इस के अलावा और कोई चारा भी तो नहीं था.

सफलता का नशा अंजलि के सिर इस कदर चढ़ कर बोल रहा था कि एक दिन मयंक से नाता तोड़ कर नए बंगले में शिफ्ट हो गई. उस ने मयंक को जीवन के उस मोड़ पर छोड़ दिया था जिस के आगे कोई रास्ता नहीं था. बेवफाई से वह टूट चुका था. वह तो दीप के लिए जी रहा था, वरना उस के मन में कोई चाह शेष नहीं थी.

बिजली आ गई थी. खिड़की बंद कर उस ने गालों पर ढुलक आए आंसू पोंछे और वापस सोफे पर आ कर बैठ गया.

वह सुबह स्कूल पहुंचा. बेटे को सहीसलामत देख कर उस की जान में जान आई. दीप भी उस से ऐसे लिपट गया मानो वर्षों बाद मिला हो.

‘‘पापा,’’ उस ने सुबकते हुए कहा, ‘‘आप भी यहीं आ जाओ. मैं आप के बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘तुझे लेने ही तो आया हूं, सदा के लिए,’’ उसे प्यार कर के वह बोला, ‘‘मेरा बेटा हमेशा पापा के पास रहेगा.’’

‘‘मैं घर नहीं जाऊंगा,’’ दीप की आंखों में आतंक की परछाइयां तैरने लगीं, ‘‘मम्मी से बहुत डर लगता है.’’

‘‘हम दोनों के अलावा वहां कोई नहीं रहेगा. अब सारा जहां अपना है, खूब खेलेंगे, खाएंगे और मस्ती करेंगे. दीप अपनी मर्जी की जिंदगी जिएगा.’’

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‘‘सच, पापा,’’ वह खिल गया.

मयंक ने उस का माथा चूम लिया.

रश्मि और अरहान की Controversy के चलते देवोलीना ने कही ये बड़ी बात, पढ़ें खबर

टेलिविजन इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेस रश्मि देसाई (Rashmi Desai) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. रश्मि ने बिग बौस सीजन 13 (Bigg Boss 13) के घर में खूब सुर्खियां बटोरी और फैंस ने भी रश्मि को काफी पसंद किया और साथ ही सपोर्ट भी किया. रश्मि देसाई का उनके एक्स बौयफ्रेंड अरहान खान (Arhaan Khan) के साथ रिश्ता काफी कौन्ट्रोवर्शियल (Controversial) रहा और अब एक बार फिर से रश्मि और अरहान सुर्खियों में बने दिखाई दे रहे हैं.

 

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दरअसल रश्मि का ये कहना है कि अरहान खान ने उनके काफी सारे पैसे वापस करने हैं जो कि वे नहीं कर रहा और तो और जब वे बिग बौस के घर में थी तक अरहान ने रश्मि के अकाउंट से 15 लाख रुपए निकाले थे. जबकि इस बारे में अरहान का कहना ये है कि उन दोनों ने साथ मिलकर एक प्रोडक्शन हाउस (Production House) खोला था जिसमें वे दोनों पार्टनर्स थे तो जो रश्मि की बैंक स्टेटमेंट (Bank Statement) का स्क्रीनशौट लीक हुआ है वो उसी वक्त का है.

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अरहान का कहना ये भी है कि रश्मि उनको जान बूझ के बदनाम करना चाहती हैं. इसी बीच रश्मि देसाई की सबसे अच्छी दोस्त और जानी मानी एक्ट्रेस देवोलीना भट्टाचार्जी (Devoleena Bhattacharjee) का बयान सामने आया है. देवोलीना ने एक इंटरव्यू में रश्मि और अरहान के बारे में बात करते हुए कहा कि,- ‘रश्मि देसाई मेरी अच्छी दोस्त है और वो अपनी लड़ाई खुद लड़ सकती है. मैं उसे सपोर्ट करती हूं लेकिन मैं उसे स्पेस दे रही हूं. उसने एक फ्रौड पर भरोसा किया और उसका खामियाजा उसे भरना पड़ रहा है. उसने अरहान पर भरोसा करके अपनी चीजें उसे दी थीं लेकिन उसने रश्मि को धोखा दिया है. रश्मि को अरहान की असली नियत के बारे में पता ही नहीं था.’

 

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इससे आगे देवोलीना ने कहा कि,- ‘मैं सलमान खान (Salman Khan) सर का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं जिन्होंने अरहान को सही समय पर एक्सपोज किया. उन्होंने रश्मि देसाई की आंखें खोल दी. अरहान खान ने रश्मि देसाई का फायदा उठाया है. उसने रश्मि के नाम पर ही पब्लिसिटी हासिल की और खूब पैसे उड़ाए. अब वो मेरी दोस्त को मानसिक तौर पर प्रताड़ित कर रहा है.’

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अब देखने वाली बात ये होगी कि आखिर रश्मि देसाई और अरहान खान की ये लड़ाई कहां तक जाएगी और साथ ही ये पता चलना बेहद जरूरी है कि आखिर अरहान ने सच में रश्मि के साथ धोखा किया है या नहीं.

जिएं तो जिएं कैसे

अस्पताल में अफरा तफरी का माहौल था. हर ओर भय में जकड़ी निगाहें और चिंता में डूबे चेहरे थे. ऐसा समय आ गया जिसके बारे में किसी ने सोचा भी ना था. आज तक जितनी पीढ़ियां पैदा हुई कौन जानता था कि एक यह वक्त भी आएगा जब इंसान ही इंसान का दुश्मन लगने लगेगा और वह भी बिना किसी दोष के. कोरोना जैसे छोटे से वायरस ने किसी एक समाज को नहीं अपितु समूची दुनिया को हिला कर रख दिया. बीमारी ऐसी जो हर रोज तेजी से फैल रही और जिसका कोई इलाज भी नहीं. कोरोना पर देश में गंभीरता कम और चुटकुले ज्यादा बनने लगे. कई अफवाहें भी उड़ी. लेकिन जरूरी नहीं कि हर अफवाह केवल अफवाह ही हो. अनपढ़ों के मोहल्ले से आती अफवाहें और उनसे उपजी आशंका और भय का आधार झूठा हो यह जरूरी नहीं.

बीमारी से जनता को बचाने के लिए लॉक डाउन किया गया. जो लोग दूसरे देशों में फंस गए थे वो अपने घर आने को आतुर, मजदूर वर्ग जो दूसरे राज्यों में फंस गया वह भी अपने घरों को लौटने को बेचैन. सारी सुविधाओं को विराम लग चुका था लॉक डाउन के कारण. ऐसे में कोई करे तो क्या करे, खासकर वह जिन्हें ऐसी आपदा में सारे देश की सेवा करनी है जैसे हमारे सफाई कर्मचारी, पुलिस व डॉक्टर.

डॉ. बंसी लाल जी भी एक सरकारी कर्मचारी हैं जो इस आपदा के समय में अपने अस्पताल में आने वाले मरीजों की देखभाल करना चाहते हैं. सरकारी अस्पताल के अधीक्षक होने के नाते उनके कई कर्तव्य भी हैं. लेकिन कई बार केवल हक की लड़ाई के लिए नहीं बल्कि कर्तव्य निभाने के लिए भी ठोकरें खानी पड़ती है.

“कैसे हैं डॉक्टर साहब?”, डॉ. महेंद्र ने अपना मास्क एड्जस्ट करते हुए पूछा. डॉ. महेंद्र भी इसी सरकारी अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर थे.

“अनिश्चितता के इस वातावरण में जैसे हो सकते हैं, बस वैसे ही हैं डॉक्टर साहब”, डॉ बंसीलाल ने उत्तर दिया. दोनों की अच्छी घुटती थी सो कुछ देर बातें करके लंबी सर्विस ड्यूटी को थोड़ा विराम दे लिया करते.

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तभी वहाँ एक जूनियर डॉक्टर आयी और ज़रा तल्खी में कहने लगी, “सर, पिछले न जाने कितने हफ्तों से हम लोग यहां अस्पताल में लगातार ड्यूटी कर रहे हैं. हम अपने लिए कुछ नहीं मांगते लेकिन अगर हम ढंग का खाना भी नहीं खाएंगे तो हमारी इम्यूनिटी का क्या होगा? क्या फिर हमें ही कोरोना नहीं हो जाएगा? क्या आपने हमको दिया जाने वाला खाना देखा है – फ्रिज से निकाला हुआ ठंडा खाना! जिसकी मात्रा भी इतनी कम है कि किसी का पेट उसमें ना भरे. नाश्ते में हमें दो ब्रेड और एक केला देते हैं, लंच और डिनर में ठंडे चावल और जरा सी दाल देते हैं. कितनी बार कह दिया कि यह खाना खाने लायक नहीं है. आप लोग हमसे क्या उम्मीद करते हैं?” ज़ाहिर था कि ये शिकायत केवल इसी एक डॉक्टर की नहीं अपितु सभी डॉक्टरों की सामूहिक शिकायत थी जो ये अकेली अपने सीनियर्स तक पहुंचाने आई थी.

डॉ बंसीलाल उसकी बात सुनकर कुछ मायूस हो उठे. वो तो पहले से ही वर्तमान स्थिति के कारण परेशान थे. उन्होंने बस इतना ही कहा, “राष्ट्रीय आपदा के इस समय में जो आप सब का योगदान है उसे पूरा देश याद रखेगा.”

जूनियर डॉक्टर अपनी भड़ास निकालकर चली गई तो डॉ महेंद्र कहने लगे, “आपकी बात पर विश्वास करने का मन तो करता है परन्तु जो खबरें सुन रहे हैं उनसे तो कुछ और ही लग रहा है. कहीं डॉक्टरों को सोसायटी में आने नहीं दिया जा रहा, कहीं एम्ब्युलेंस पर पथराव हो रहा है. चेन्नई में तो हद ही हो गई जब कोरोना के कारण डॉ सायमन की मृत्यु के उपरांत उन्हें दफनाने भी नहीं दिया जा रहा था. उनके मित्र डॉ प्रदीप कुमार ने स्वयं गड्ढा खोदकर उन्हें दफनाया!”

“ऐसी खबरों से हमारा मनोबल कैसे न गिरे…”, डॉ बंसीलाल कह रहे थे तभी हेड नर्स ने आकर बताया कि सीएमओ की जानपहचान का एक मरीज़ दाखिल हुआ है. उनके लिए खास कमरा, साफ बिस्तर का इंतजाम किया जा रहा है. “पहले आओ पहले पाओ का जो जाल फैला हुआ है इसका फायदा केवल अमीर और रसूख वाले लोग उठा पा रहे हैं क्योंकि इस लॉक डाउन में केवल उन्हीं के बस में है ये पता करना कि कहां क्या मिल रहा है. कहां पर वेंटिलेटर हैं, कहां पर बेड उपलब्ध है और वही सही डॉक्टर के पास समय पर पहुंच पाते हैं. आम आदमी तो बेचारा दर-दर की ठोकर खाता भटकता फिरता है.”

डॉ बंसीलाल की बात से डॉ महेंद्र ने सहमति जताई. दोनों बात कर अपना मन हल्का कर रहे थे तभी बंसी लाल जी की पत्नी का फोन आया.

“अरे, क्यों इतनी चिंता करती हो ? सभी तो यहां काम कर रहे हैं – डॉक्टर्स है, नर्सें हैं, वार्डबॉय हैं, सफाई कर्मचारी हैं, टेस्ट करने वाले और उन्हें जांचने वाली टीम्स है, और भी न जाने कितना स्टाफ काम कर रहा है. तुम अगर यूं बार बार मुझ पर दबाव डालोगी कि मैं घर आ जाऊं तो यह न तो संभव है और ना ही मैं इस तरीके से काम कर पाऊंगा… अब नाराज क्यों होती हो? मैं समझता हूं इसके पीछे तुम्हारी चिंता है, मेरे लिए फिक्र है.” बंसी लाल जी की पत्नी ने फोन काट दिया.

“हम सभी के घरवालों का यही हाल है. सभी एक ही चिंता में घुल रहे हैं कि कहीं हमें भी कोरोना ना हो जाए, और ठीक भी है. लगभग हर अस्पताल से डॉक्टरों और नर्सों को कोरोना होने की खबरें आ ही रही है”, डॉ महेंद्र ने भी अपना पुट लगाया.

डॉ बंसीलाल के पास अस्पताल की कोऑर्डिनेटर का फोन आया और उन्होंने बताया कि पीपीई किट्स खत्म हो रहे हैं, और की जरूरत है. उस पर टेस्टिंग किट्स भी कम पड़ रहे हैं.

“हम डॉक्टरों और नर्सों को युद्ध स्तर पर काम करवा रहे हैं लेकिन अगर अच्छी क्वालिटी की पीपीई किट्स उन्हें नहीं दे सके तो यह उनके लिए मौत का खेल बन जाएगा. यही बात टेस्टिंग किट्स पर भी लागू होती है. बिना टेस्टिंग के डॉक्टरों को इतने सारे मरीजों में जाने देना एक तरह से उनकी जान से खेलने वाली बात होगी”, कोऑर्डिनेटर अपनी बात पर ज़ोर डाल रही थी.

डॉ बंसीलाल क्या करें! सामान काफी कब मात्रा में आ रहा है. क्या करें सरकारी काम की अपनी एक गति होती है. ऐसे में प्राइवेट सेक्टर से सीएसआर के माध्यम से काफी सामान आने की उम्मीद रहती है लेकिन अधिकतर सामान लॉक डाउन के कारण दूर दूसरी जगहों से आ नहीं पा रहा.

एक युगल जोड़ा जिसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी एंबुलेंस में अस्पताल लाया गया. सरकारी अस्पताल के हालात देखकर मयंक और प्रेरणा उद्वेलित हो उठे. अस्पताल में बेहद भीड़ थी. सभी लोग आसपास बैठे थे कोई ऊपर बेंचो पर तो कोई जमीन पर. हांलाकि अधिकतर लोगों ने मास्क लगाए हुए थे लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग कर पाना शायद इतनी जगह में संभव नहीं था.

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वहां उस समय ऑन ड्यूटी जो डॉक्टर थी उसने दूर से ही प्रेरणा से उसके  सिम्टम्स पूछे. प्रेरणा के बताने पर उन्होंने कहा कि आप दोनों को कोरोना का टेस्ट करना पड़ेगा. रिपोर्ट 48 घंटे में आ जाएगी. और अगर आप कोरोना का टेस्ट करवाते हैं तो आपको आईसोलेट होना पड़ेगा, “अब आप अपना सैंपल दे दो.”

यूं भीड़ में पास पास बैठने से मयंक की चिंता और बढ़ गई. उसे आशंका होने लगी कि यदि इनमें से कोई कोरोना पॉजिटिव निकला तो अब उन्हें कोरोना होने के पूरे चांस थे.

“सरकार इतना शोर मचा रही है की सोशल डिस्टेंसिंग करो और आप लोगों ने यहां पर इतनी भीड़ मचा रखी है. ऐसे करेंगे आप लोगों का इलाज? जिनको कोरोना नहीं है उन्हें भी हो जाएगा”, अस्पताल की हालत देखकर मयंक जोर जोर से चिल्लाने लगा. आइसोलेशन की बात सुनकर अधिकतर लोग ऐसे ही बौखला जाते हैं.

स्थिति को काबू करने पास के कॉरिडोर में खड़े बंसी लाल जी वही पहुंच गए और मयंक व प्रेरणा को आश्वस्त करने लगे की वह हालातों को संभाल लेंगे.

“क्या संभालेंगे आप? जब तक यह सच्चाई लोगों तक नहीं पहुंचेगी, इस जगह का कुछ नहीं होगा. पर आप चिंता मत कीजिए, मैंने यहां का एक वीडियो बनाकर अपने ट्विटर अकाउंट पर डाल दिया है. अब जल्दी ही कुछ होगा इंटरनेट में बहुत ताकत है”, मयंक ने तल्खी से बोला.

तभी वहां एक भिकारिन सी दिखने वाली बुढ़िया को पुलिस लेकर पहुंची.

“इसे मास्क दिलवाइए साहब”, पुलिसवाला बोला.

“अरे, कहां से दिलवाऊँ! सब कुछ सरकार की मर्जी से कहां होता है सरकारी महकमों में”, फिर बंसी लाल जी धीरे से पुलिसवाले के कान में खुसफुसाए, “अपनी कमाई तो सबको चाहिए न, सो मास्क तो अब है नहीं.” पुलिसवाला फौरन उनकी बात का आशय समझ गया.

सैंपलिंग के बाद मयंक और प्रेरणा को आइसोलेशन के लिए ले जाया गया. प्रेरणा को लेडीज वार्ड भेज दिया गया और मयंक को जेंट्स वार्ड में ले जाया गया.

जेंट्स और लेडीज़ दोनों का वॉशरूम कॉमन था. जब मयंक को एक रूम दिया गया तो वहां चारपाई पर बेडशीट के नाम पर एक पतला सा कपड़ा पड़ा हुआ था. मयंक को दूसरा कपड़ा दिया गया और बोला गया कि आप पुराना बेडशीट हटा कर ये बिछा लेना.

रात के एक बज रहे थे, मयंक ने बेड शीट चेंज की और सो गया.

उसके बाद जब वो सुबह उठा तो फ्रेश होने बाथरूम गया. जब दिन के उजाले में वह बाहर पहुंचा तो उसने अपने आसपास का नजारा देखा – बाथरूम बेहद गंदा था, शायद कई लोगों के इस्तेमाल करने के कारण. इंडियन स्टाइल टॉयलेट का बुरा हाल था, वाश बेसिन में पान की पीक पड़ी थी, सीढ़ियों के नीचे कूड़े का ढेर जमा था जिससे काफी बदबू आ रही थी. हर विभाग बहुत कम लोगों के साथ काम कर रहा था इसलिए हालात भी वैसे ही थे.

मयंक का मन खराब हो गया. लेकिन क्या करता मजबूरी थी, इस्तमाल तो यही करना पड़ेगा. वहां रह रहे करीब 30 लोगों के लिए एक ही साबुन की बट्टी थी जिससे सभी नहा धो रहे थे. मयंक ने अपने दिल को बहलाया कि केवल 48 घंटे की बात है, काट लेंगे

वहां बदलने के कपड़ों के ना होने की वजह से मयंक और प्रेरणा की हालत खराब हो रही थी.

48 घंटे के बाद जब मयंक पूछने गया तो उसे बताया गया कि इतनी जल्दी नहीं आती है रिपोर्ट, 3-4 दिन इंतजार करना होगा.

मयंक ने सीएमओ को कॉल करना शुरू किया किंतु उन्होंने कॉल नहीं उठाया. फिर उसने डिप्टी सीएमओ को भी कॉल किया लेकिन फोन नहीं उठा. काफी हाथ-पैर मारने के कारण मयंक का फ्रस्ट्रेशन बहुत बढ गया.

दरअसल मयंक वाले कमरे के साथ लगे कमरे में विदेश से आए एक लड़के को शिफ्ट किया गया. वह लड़का खुद ही अपना भारी सामान सीढ़ियों से घसीटा हुआ कमरे तक लाया, और वहां पहुंचकर गंदगी और गर्मी के कारण बेहोश हो गया. कोई उसे उठाने, उसे छूने के लिए, उसके पास जाने को राजी नहीं था.

एक वार्डबॉय ने तो बेहद रुखाई से ये तक।कह कि दूर रहो हमसे, तुम सब मरने वाले हो…

अपने अपने घरों से जुदा, अपने परिवारजनों से दूर, चिंता की इस घड़ी में ऐसा कुछ सुन लेने से किसी पर क्या बीत सकती है यह वही जानता है.

दिन चढ़ते हुए जब मयंक और प्रेरणा को खाना दिया गया तो वह भी ठीक नहीं था. इस बार मयंक को फिर गुस्सा आया और उसने अपने बेड के पास ही खड़े होकर चिल्लाना शुरू किया, “इतनी बड़ी महामारी के समय में आप लोग इतने सारे लोगों को एक साबुन की टिक्की दे रहे हैं, पीने के पानी की खुली बोतलों में दे रहे हैं, खाने का हालत देखिए कितना खराब खाना है. क्या इस तरह लड़ेगा भारत इस बीमारी से?”

इस बात का जवाब जब तक बंसी लाल जी देते तब तक क्षेत्र की कॉरपोरेटर, जो वहां दौरे पर आई हुई थी, उन्होंने बीच बचाव करना शुरू कर दिया. उन्होंने वहां मौजूद सरकारी मुलाजिमों को ऑर्डर देने शुरू किए. जो सरकारी मुलाजिम बंसी लाल जी की बात पूरी तरह से नहीं मानते थे वह कॉरपोरेटर साहिबा के सामने उनकी बात सुनने लगे.

“आप किसी प्रकार की कोई चिंता न करें. आपको जो चाहिए होगा वह हम दिलवा देंगे”,     कॉरपोरेटर साहिबा मयंक द्वारा उठाई गई मांगों को जांचने लगी और वहां मौजूद मुलाजिमों से उनको पूरा करने की बात कहने लगी, “आप लोगों को आम आदमी की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए. यह जो मांग रहे हैं इनके लिए फौरन लेकर आइए”.

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उनके कहते ही मयंक को एक नई साबुन की बट्टी दी गई, पीने के पानी को बदलकर बिसलेरी की बोतल दी गई.

इस प्रकरण से बंसी लाल जी बेहद चिढ़ गए. आखिर वह भी तो यही चाहते थे कि अस्पताल में जो मरीज आए उनकी अच्छी तरह देखभाल हो, उन्हें किसी प्रकार की कोई शिकायत ना हो. और वह इसके लिए पूरी मेहनत, पूरे परिश्रम से कदम उठाने के भरसक प्रयास कर रहे थे. लेकिन उनके मातहत थे तो सरकारी मुलाजिम ही और उनके ऊपर जितना बंसी लाल जी का जोर चलता वह उतना ही सुन रहे थे. लेकिन एक सत्ताधारी के दृश्य में आ जाने से पूरी काया ही पलटने लगी थी.

एक तो भयावह जमीनी स्तर पर काम करने की जटिल स्थिति, उसपर सत्ताधारियों के दखल की मार!

अगली शाम तक मयंक व प्रेरणा की रिपोर्ट आ गईं. उन दोनों ने संतोष की सांस ली जब दोनों की ही रिपोर्ट नेगेटिव आई. मगर मयंक का मन फिर परेशान हुआ जब उसने देखा कि इस बार उन्हें घर छोड़ने जो एंबुलेंस जा रही है उसमें भी चार-पांच लोग बैठे हैं. लेकिन क्या कर सकते थे. यह लॉकडाउन की सिचुएशन की बात है जिसमें कोई भी आने जाने का साधन सड़क पर नहीं मिलता है. और इस कारण मयंक और प्रेरणा एंबुलेंस में ही लौटने को विवश थे. एहतियातन इस बार इन दोनों के चेहरे पर मास्क था और उन्होंने किसी चीज को हाथ भी नहीं लगाया.

रास्ते में ड्राइवर बताने लगा, “ऐसे हालात हो गए हैं कि मैं आपको क्या बताऊं. मैं खुद 4 दिन से घर नहीं गया हूं. घर वाले अलग परेशान रहते हैं. जो आप और हम जैसे आम लोग हैं उनके सोलेशन के लिए हॉस्टलों व स्कूलों जैसी जगहों पर इंतजाम किए गए हैं. वरना जो खास लोग हैं या हमारे साहब लोगों के रिश्तेदार हैं उनके लिए तो फाइव स्टार बंदोबस्त किए जाते हैं. ऐसा नहीं है कि सरकार की तरफ से कोई कमी पेशी हो रही है. बस जमीनी हकीकत अलग है.”

यहां एंबुलेंस का ड्राइवर परेशान है और वहां बंसी लाल जी के घर वाले पूरा जोर लगा रहे हैं कि वह किसी भी बहाने अब अस्पताल में न जाया करें. उन्हें भी डर है कि कहीं कोरोना हमारे घर ही ना आ धमके.

सच ही है. विपदा अभी भी विकराल रूप धरे वहीं खड़ी है. घर परिवार वाले सबके चिंता करते हैं. यह तो कोरोना फाइटर्स ही है जो ऐसी स्थिति संभाले हुए हैं, और भयावह जमीनी हकीकत के सामने भी डटकर खड़े हुए हैं.

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मासूम हुए शिकार : इंसानियत हुई शर्मसार

समाज में आपराधिक व कुंठित लोगों की मानसिकता इस कदर बिगड़ती जा रही है कि उन को सही गलत का आभास ही नहीं है. पढ़ाई लिखाई से कोसों दूर और गलत आदतों के शिकार होने की वजह से कोई इन्हें पसंद नहीं करता, वहीं इन्हें कोई रोकने टोकने व समझाने वाला नहीं मिलता. यही वजह है कि इन के हाथ गलत काम करने से कांपते नहीं है. ये ऐसेऐसे काम कर जाते हैं कि दिल कांप जाए, पर ये न कांपे.

यही वजह है कि इन के सोचने और समझने की ताकत बिल्कुल ही खत्म हो गई है.

23 अप्रैल की अलसुबह एक वारदात 6 साल की मासूम के साथ हुई. पहले उस के साथ रेप किया गया और फिर दोनों आंखें ही फोड़ दीं.

मध्य प्रदेश के दमोह जिले के एक गांव में यह दिल दहला देने वाली घटना घटी. घर से अपहरण कर 6 साल की मासूम बच्ची के साथ आरोपियों ने दरिंदगी की.

उस बच्ची के साथ रेप करने के बाद दोनों आंखें फोड़ दी, ताकि वह किसी को पहचान न सके.

घटना जिले के जबेरा थाना क्षेत्र स्थित एक गांव की है. 23 अप्रैल की सुबह 7 बजे बच्ची गांव के बाहर खेत में स्थित एक सुनसान मकान में गंभीर हालत में पड़ी हुई मिली. उस के बाद घर वालों को जानकारी दी गई.

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मौके पर पहुंचे लोगों ने देखा कि मासूम के दोनों हाथ बंधे हुए थे और आंखें फोड़ दी गई थीं.

बताया जा रहा है कि 22 अप्रैल की शाम 6 बजे से बच्ची गायब थी, तभी से घर वाले उसे खोज रहे थे. 23 अप्रैल की सुबह जब बच्ची मिली तो उस की हालत देख कर सभी के दिल दहल गए.

बच्ची को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जबेरा लाया गया, जहां बच्ची की हालत देखते हुए उसे जबलपुर रेफर कर दिया गया.

गांव पहुंचे दमोह के एसपी हेमंत सिंह चौहान ने कहा कि 22 अप्रैल की शाम बच्ची दोस्तों के साथ खेल रही थी. कोई अनजान शख्स उसे यहां से ले गया. उस के साथ रेप किया गया, उस की आंखों में गंभीर चोट है. कई संदिग्धों से पूछताछ की गई है. मासूम की हालत गंभीर है और जबलपुर रेफर कर दिया गया है.

मौके पर जांच के लिए एफएसएल की टीम भी पहुंची. जल्द ही आरोपी को गिरफ्तार कर लेंगे.

इस घटना को ले कर लोगों में आक्रोश है. सूचना मिलते ही जबेरा के विधायक धमेंद्र सिंह मौके पर पहुंचे और उन्होंने कहा कि मामले की जांच चल रही है. दरिंदे किसी भी कीमत पर नहीं बचेंगे.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा  कि दमोह जिले में एक मासूम बिटिया के साथ दुष्कर्म की घटना शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है. घटना का संज्ञान ले कर अपराधी को जल्द ही पकड़ने के निर्देश दिए हैं. उन दरिंदों को सख्त से सख्त सजा दी जाएगी. बिटिया की समुचित इलाज में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आने दी जाएगी.

वहीं दूसरी वारदात उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के एक गांव में हुई. वहां 13 साल की किशोरी घर से बाहर टौयलेट के लिए गई तो पहले से ही घात लगा कर बैठे 6 लोगों ने उसे पकड़ लिया और सुनसान जगह पर ले गए.

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2 लोगों ने किशोरी के साथ रेप की घटना को अंजाम दिया, वहीं उस के आसपास खड़े 4 लड़के इस गैंगरेप का वीडियो बनाते रहे.

किशोरी रोतीबिलखती रही, लेकिन दरिंदों ने कोई रहम नहीं किया. वहां से जाते समय वह धमकी दे कर गए कि किसी को इस बारे में बताया तो वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड कर देंगे.

शर्मसार कर देने वाली यह घटना सीतापुर जिले में मिश्रिख कोतवाली क्षेत्र की है.

घर वालों के मुताबिक, जब किशोरी घर से बाहर टॉयलेट के लिए गई थी, उसी दौरान गांव के बाहर एक कॉलेज के पास पहले से मौजूद 6 लोगों ने उसे पकड़ लिया. 2 लोगों ने किशोरी से बारीबारी से दुष्कर्म किया, जबकि 4 साथियों ने गैंगरेप का वीडियो अपने मोबाइल में कैद कर लिया.

सभी आरोपी मुंह खोलने पर गैंगरेप का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर मौके से फरार हो गए.

घटना की जानकारी पा कर मौके पर पहुंची पुलिस ने मामले की तफ्तीश शुरू की.

पुलिस का कहना है कि मामले में पीड़िता की शिकायत के आधार सभी आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है और 2 मुख्य आरोपी धरे भी गए हैं.

दिल दहला देने वाली घटनाओं को बारीकी से देखा जाए तो ऐसा लगता है कि पहले से ही घात लगा कर घटना को अंजाम दिया गया. यह कोई और नहीं, हमारे आसपास के माहौल का ही नतीजा है.

भले ही अपराधी पकड़े जाएं, इन को इन के किए की सजा मिल भी जाए, पर इन कम उम्र बच्चियों का क्या कुसूर कि इन में से एक मासूम की दोनों आंखें ही फोड़ दी,वहीं दूसरी के साथ घटना की वीडियो तक बना डाली.

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क्या इन मासूमों का छीना हुआ कल लौट कर आ पाएगा? क्या ये इस कहर को भूल पाएंगे? क्या शर्मसार हुई इंसानियत समाज में फिर कायम हो पाएगी, कहना मुश्किल है.

विदेशी शोलों में झुलसते भारतीय : भाग 1

मोहाली के सेक्टर-70 की कोठी नंबर 2607 में रहने वाले रंजीत सिंह भंगू पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड से एक अच्छे पद से रिटायर हुए थे. उन की सब से बड़ी बेटी अमेरिका में, दूसरी न्यूजीलैंड में और तीसरी खरड़ के सन्नी एन्क्लेव में अपनेअपने परिवारों के साथ खुशहाल जीवन बिता रही थीं.

भंगू साहब का 20 वर्षीय एकलौता बेटा सिमरन सिंह गतवर्ष इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने अपनी बड़ी बहन के पास अमेरिका गया था. पढ़ाई के साथसाथ वह दक्षिण सेकरामेंटो स्थित चैवगन गैस स्टेशन पर पार्टटाइम नौकरी भी करता था. गैस स्टेशन परिसर में जनरल मर्चेंडाइज की एक छोटी सी दुकान थी. कभीकभी सिमरन की ड्यूटी इस दुकान पर भी लग जाती थी.

26 जुलाई, 2017 की रात को भी सिमरन दुकान की ड्यूटी पर था. कुछ स्थानीय लड़कों ने दुकान पर आ कर सिमरन से थोड़ाबहुत सामान खरीदा. फिर वे दुकान से थोड़ी दूरी पर खुले में खड़े हो कर शराब पीने लगे. गैस स्टेशन के एक भारतीय कर्मी ने उन के पास जा कर उन्हें वहां शराब पीने से मना किया तो वे लड़के खफा हो कर उसे ही धमकाने लगे. बात बढ़ती देख कर वह कर्मचारी कुछ इस अंदाज से भीतर चला गया, जैसे उन्हें सबक सिखाने के लिए किसी को बुलाने जा रहा हो.

इत्तफाक से तभी सिमरन को किसी काम से दुकान के बाहर उसी ओर जाना पड़ गया. उन लड़कों ने आव देखा न ताव गोलियां चला कर सिमरन को मौत के घाट उतार दिया. उन्होंने 11 गोलियां दागी थीं, जिन में से 7 गोलियां सिमरन की छाती में लगी थीं.

इसी साल 7 अगस्त को जब समूचा हिंदुस्तान भाईबहन के पवित्र रिश्ते वाला त्यौहार रक्षाबंधन मना रहा था, सिमरन की बड़ी बहन हरजिंदर कौर अपने एकलौते भाई का शव ले कर अमेरिका से मोहाली स्थित अपने मायके पहुंची.

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अमेरिका की सेकरामेंटो पुलिस ने इस केस में फिलहाल एक संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया था, जबकि आगे की छानबीन जारी थी.

बात थोड़ी पुरानी है. पंजाब स्थित फगवाड़ा के एक सिपाही की आतंकवादियों से मुठभेड़ में मौत हो गई थी. तब इस के एवज में अनुकंपा के आधार पर पंजाब पुलिस ने उस के छोटे भाई नीरज को नौकरी औफर की थी. नौकरी जौइन करने के बाद नीरज प्रशिक्षण के लिए पुलिस ट्रेनिंग सैंटर में गया तो किसी ने उस से कह दिया कि वह तो फिल्मी हीरो लगता है, कहां पुलिस की रफटफ नौकरी में चला आया.

नीरज शुरुआती दौर में ही पुलिस की नौकरी को अलविदा कह घर आ गया. फिल्मों में काम हासिल करने के लिए उस ने प्रयास भी किए, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

इस पर उस के एक पारिवारिक मित्र ने सलाह दी कि पहले विदेश जा कर वह खूब पैसा कमाए और फिर खुद अपनी फिल्म बनाए. नीरज को यह सलाह जंच गई.

जोड़तोड़ कर के नीरज को बेल्जियम जाने में सफलता मिल गई. जहां 2 साल रह कर उस ने कई तरह के काम किए. इस के बाद वह रोम चला गया. वहां इटली के एक होटल में उसे अच्छी नौकरी मिल गई. बड़ी बात यह थी कि होटल मालिक भी पंजाबी था. एक पंजाबी की सरपरस्ती में काम पा कर नीरज बहुत खुश था.

नीरज के परिवार के सभी पुरुष सदस्य अच्छी तरह स्थापित थे. घर में किसी को किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने नीरज से कह रखा था कि वह अपनी कमाई में से जितना भी बचा सकता है, वहीं अपने पास जमा करता रहे. नीरज के पारिवारिक सूत्रों के अनुसर उस ने कुछ ही समय में अपने पास काफी नकद पैसा और सोना जमा कर लिया था.

लेकिन एक दिन होटल मालिक का फोन आया कि नीरज का किसी से मामूली झगड़ा हो गया था. इसी से नाराज हो कर उस व्यक्ति ने नीरज की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी है.

कपूरथला के गांव नडाला के 600 से अधिक लोग किसी न किसी बाहरी देश में बसे हुए हैं. यहां का एक लड़का सुरजीत सिंह खेतीबाड़ी के अपने पुश्तैनी धंधे में मस्त था. उस की एक बुआ अमेरिका के कैलिफोर्निया में बस गई थी, जहां उस का जनरल स्टोर था. एक बार वह भारत आई तो सुरजीत को भी अपने साथ अमेरिका ले गई. वहां वह बुआ के जनरल स्टोर के काम में उन का हाथ बंटाने लगा. सुरजीत को वहां अपना भविष्य उज्ज्वल दिखाई देने लगा था.

स्टोर का काम अच्छी तरह सीख कर उस ने अपना अलग स्टोर खोलने की योजना बनाई. सुरजीत के इस काम में उस की बुआ भी मदद करने के लिए राजी थी.

मगर यह सपना उस वक्त धरा का धरा रह गया, जब एक दोपहर एक शख्स स्टोर पर बीयर लेने आया. सुरजीत स्टोर में अकेला था. उस की बुआ कुछ ही देर पहले घर चली गई थी. उस व्यक्ति ने 5 केन बीयर ली. बीयर देने के साथ ही सुरजीत ने बिल भी उस के सामने रख दिया. वह व्यक्ति बेरुखी से ‘इस का हिसाब मेरे खाते में डाल देना’ कहते हुए बीयर उठा कर स्टोर से बाहर निकल गया.

सुरजीत उस के पीछे भागा. बाहर जीप में 4 अन्य लोग बैठे थे. उस व्यक्ति ने उन के पास पहुंचते ही बीयर के केन उन के हवाले कर के अपनी भाषा में कुछ कहा. फलस्वरूप जीप में बैठे एक नौजवान ने रिवाल्वर निकाल कर सुरजीत पर फायर कर दिया. गोली लगते ही वह वहीं ढेर हो गया.

यह समाचार जब नडाला पहुंचा तो हाहाकार मच गया. दरअसल, चंद रोज पहले ही इसी गांव के एक अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा ही दर्दनाक हादसा हो चुका था.

नडाला निवासी जसवंत सिंह सोढी गांव के सरपंच तो थे ही, जालंधर की प्रसिद्ध दोआबा फैक्ट्री के चेयरमैन भी थे. उन के 8 लड़के थे, जिन में से 3 विदेश में जा बसे थे. इन तीनों सोढी भाइयों ने अमेरिका के शहर फिनिक्श में पैट्रोल व गैस का अपना अच्छाखासा बिजनैस जमा लिया था. स्थानीय लोगों के साथ उन का अच्छा रसूख भी बन गया था. तीनों भाइयों इंदरपाल सिंह, बलवंत सिंह और सुखपाल सिंह का जीवन खूब मजे से गुजर रहा था.

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उस दिन बलबीर सिंह सोढी ने अपने केश क्या धोए, लगा जैसे उन्होंने अपनी मौत को बुलावा दे दिया. केश धोने के बाद उन्होंने बालदाढ़ी खुली छोड़ कर सिर पर सफेद रंग का पटका बांध लिया था. इत्तफाक से उस दिन उन्होंने कुर्तापाजामा भी सफेद ही पहन रखा था. वह कदकाठी और हुलिए से पूरी तरह अफगानी लग रहे थे.

यह उन दिनों की बात है, जब न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सैंटर और रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन पर हुए दुस्साहिक हमलों के बाद अमेरिकी लोग अफगानियों से नफरत करने लगे थे. ऐसे में बलबीर सिंह सोढी को अफगानी समझ कर किसी कट्टरपंथी ने उन्हें तब निशाना बना दिया, जब वह अपने घर की छत पर खड़े थे. गोली उन के बदन को चीर गई थी.

जालंधर नकोदर मार्ग पर बसे गांव नीमियां मल्लियां निवासी रेशम सिंह का लड़का अमरीक सिंह कुछ सालों पहले रोजगार की तलाश में मनीला गया था. वहां उस के 2 भाई पहले से ही रहते थे. वे सामान खरीदनेबेचने का धंधा करते थे. अमरीक ने भी यही कारोबार शुरू कर दिया. उस का भी काम ठीक से चल निकला. लेकिन एक दिन उस की लाश वीराने में पड़ी मिली. पता चला कि उस के किसी देनदार ने उस की गोली मार कर हत्या कर दी थी.

सुनील विरमानी अपनी पत्नी के अलावा बेटी मनी और बेटे मानव के साथ लुधियाना के मौडल टाउन एरिया में रहते थे. मानव को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा गया. उस ने अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित न्यू इंग्लैंड इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी से 95 प्रतिशत अंकों के साथ विजुअल प्रोसेसिंग इन कंप्यूटर की डिग्री हासिल की.

इस के बाद वह छुट्टियां बिताने मिसीसिपी चला गया, जहां सुनील विरमानी के एक मित्र रहते थे. वहां उन का अपना जनरल स्टोर था. एक दिन दोपहर में मानव को स्टोर पर बैठा कर वह किसी काम से घर चले गए. तभी कुछ लुटेरे आए और उन्होंने मानव को कत्ल कर के स्टोर का कैश बौक्स लूट लिया.

जालंधर के गांव हरिपुर का युवक कमल वीर सिंह भी जीवन में कुछ बनने की तमन्ना ले कर कनाडा गया था. वहां उसे एक शराबखाने में नौकरी मिली. एक रात शराब ठीक से सर्व न करने के मुद्दे पर उस का एक अंगरेज ग्राहक से झगड़ा हो गया. तूतू, मैंमैं से बात आगे बढ़ी और हाथापाई तक पहुंच गई. स्थिति यह बनी कि उस ग्राहक ने कमलवीर सिंह की हत्या कर दी.

कपूरथला के गांव टिब्बा का नौजवान जसवंत सिंह अच्छे रोजगार के लिए जापान गया था. वहां उसे एक निजी कंपनी में कार मैकेनिक की नौकरी मिल गई. अपनी इस नौकरी से वह बहुत खुश था और सुनहरे भविष्य के प्रति आशावान भी. जापान के जिस नगर सिगमाहारा में जसवंत रहता था, वहां एक रात कुछ भारतीय और पाकिस्तानी युवकों की किसी बात पर कहासुनी हो गई.

जसवंत ने बीचबचाव कर के उन लड़कों का आपस में राजीनामा करवा दिया. एक पाकिस्तानी युवक इस सब से चिढ़ गया. उस ने अपने मन में रंजिश रखी, जिस के फलस्वरूप 2 दिन बाद वह अपने कुछ साथियों को ले कर जसवंत के घर आ गया. उन्होने लोहे की रौडों से घर का दरवाजा तोड़ कर जसवंत को मौत के घाट उतार दिया.

इस तरह की तमाम कहानियां हैं. दरअसल, युवा ज्यादा से ज्यादा धन कमाने और अपने भविष्य को सिक्योर करने के लिए विदेश चले जाते हैं, लेकिन कई बार ऐसा कुछ हो जाता है, जिस की कीमत उन्हें प्राण दे कर चुकानी पड़ती है.

वैसे परदे के पीछे मुद्दा यह भी है कि विदेश जा कर धन कमाने का सपना देखने वाले नौजवान कोई यूं ही विदेश नहीं पहुंच जाते. इस के लिए जो धन खर्च किया जाता है, अधिकांश लड़कों के परिवारों द्वारा वह धन जुटाना आसान नहीं होता. कहीं घर के गहने बिकते हैं तो कहीं उन के भविष्य के लिए महंगे ब्याज पर जमीन गिरवी रखी जाती है. लेकिन भविष्य संवारने की कथित होड़ में भारतीयों के विदेश जाने की दौड़ खत्म नहीं होती, भले ही उन के साथ कितना भी दुर्व्यवहार हो, मौत उन्हें अपनी आगोश में समेट ले.

पंजाब के लहरागागा कस्बे के रहने वाले पंजाबी सिंगर मनमीत अली शेर ने ख्याति तो खूब अर्जित की, लेकिन ज्यादा कमाई नहीं हो रही थी. करीब 10 साल पहले उस ने भी आस्ट्रेलिया का रुख किया था. अपनी लेखनी और गायकी को जिंदा रखने के लिए उस ने विदेशी धरती पर बहुत मेहनत से हर तरह के काम किए. वहां एक ओर तो वह पंजाबी समुदाय के लिए जानामाना गायक था, वहीं दूसरी ओर व्यवसाय के नाम पर क्वींसलैंड की राजधानी ब्रिसबेन में सिटी कौंसिल बस का ड्राइवर था.

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वह 28 अक्तूबर, 2016 को रात थी. मनमीत अली शेर ने ब्रिसबेन के मारूका कस्बे में एक बस स्टौप से सवारियां लेने के लिए बस रोकी. कुछेक सवारियां बस में चढ़ीं भी. तभी एक सवारी ने तेजी से ड्राइवर कक्ष की ओर बढ़ते हुए मनमीत पर कुछ फेंका, जिस से वहां आग भड़क उठी.

उस वक्त बस में 16 सवारियां थीं, जिन्हें पीछे आ रहे एक टैक्सी ड्राइवर की मुस्तैदी से बस का इमरजेंसी द्वार खोल कर सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया. लेकिन मनमीत अली शेर की मौके पर ही मौत हो गई. इस से चारों तरफ शोक एवं भय की लहर दौड़ गई. उस समय एक समाचार में बताया गया था कि पिछले 6 महीनों में बस ड्राइवरों पर 350 हमले हो चुके थे.

ब्रिसबेन पुलिस ने त्वरित काररवाई करते हुए इस हमले के आरोप में एक 48 वर्षीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया. मनमीत अली शेर की प्रसिद्धि इतनी ज्यादा थी कि अगले दिन उसे श्रद्धांजलि देने के लिए ब्रिसबेन में झंडे झुके रहने का ऐलान कर दिया गया था.

पंजाब के सांसद व पंजाबी एक्टर भगवंत मान ने इस मामले को उठाते हुए विदेशों में बसने वाले पंजाबियों की जानमाल की रक्षा को सुनिश्चित बनाने की केंद्र सरकार से मांग की थी. कुमार विश्वास ने भी इस संबंध में ट्वीट किया था.

पुलिस ने इस केस के संबंध में जिस आरोपी को पकड़ा था. उस का नाम का ऐंथनी मारक एडवर्ड डौनोहयू था. उस ने न तो पहले पुलिस के आगे मुंह खोला था, न ही अब अदालत के सामने खोला. अदालत के बाहर मौजूद पत्रकारों से आरोपी के वकील ऐडम मैगिल ने कहा कि इस की मानसिक हालत ठीक नहीं है और यह जुर्म एकदम समझ से परे है.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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