Hindi Story: 3 किरदारों का अनूठा नाटक

Hindi Story: पिछला टेलीफोन उस के लिए परेशानी भरा था. दूसरा फोन तो उसे खौफजदा करने के लिए काफी था. दोनों टेलीफोन दिन के वक्त आए थे. तब जब उस का हसबैंड सिकंदर अपने औफिस में था और वह घर पर अकेली थी.

‘‘मिसेज सिकंदर,’’ फोन पर एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी.

‘‘हां, बोल रही हूं. आप कौन हैं?’’ मिसेज सिकंदर ने कहा.

‘‘एक दोस्त हूं. मकसद है आप की मदद करना. क्या आप सलिलि को जानती हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘तो क्या आप सलिलि हैं?’’ मिसेज सिकंदर ने पूछा.

‘‘नहीं मिसेज सिकंदर, सलिलि तो आप के शौहर की सेक्रेटरी का नाम है. मिस्टर सिकंदर और सलिलि के बीच जो चल रहा है, आप के लिए ठीक नहीं है. मेरा फर्ज है कि मैं आप को सही हालात की जानकारी दे दूं.’’

मिसेज सिकंदर गुस्से से चिल्लाई, ‘‘यह सब फालतू बकवास है. सलिलि मेरे शौहर की सेक्रेटरी जरूर है. वह उस का जिक्र भी करते हैं. पर उन का उस से कोई चक्कर है, यह बिलकुल गलत है. सलिलि को दिल की बीमारी है, इसलिए वह उस से हमदर्दी रखते हैं. अबकी बार तो वह कह रहे थे, अगर अब उस ने ज्यादा छुट्टियां लीं तो उसे नौकरी से निकाल देंगे.’’

दूसरी तरफ से औरत की जहरीली हंसी की आवाज आई, ‘‘हां, आप यह सच कह रही हैं मिसेज सिकंदर. सलिलि को दिल की बीमारी है, लेकिन वह दूसरी तरह की दिल की बीमारी है. वैसे मुझे सलिलि से कोई जलन नहीं है. मैं तो आप का भला चाहती हूं. आप यह मालूम करने की कोशिश करें कि जब आप के शौहर पिछले महीने बिजनैस के सिलसिले में सिंगापुर गए थे, उस वक्त उन की खूबसूरत सेक्रेटरी सलिलि कहां थी?’’

‘‘आप हद से आगे बढ़ रही हैं मैडम, अपनी बेहूदा बकवास बंद कीजिए.’’ गुस्से से मिसेज सिकंदर ने फोन रख दिया. दोनों हाथों से सिर थाम कर मिसेज सिकंदर सोच में डूब गईं.

उन्हें याद आया, जब पिछले महीने सिकंदर बिजनैस के लिए सिंगापुर गया था, तो उस ने उसे सिंगापुर के उस होटल का नाम बताया था, जहां वह ठहरने वाला था. लेकिन एक जरूरी काम के सिलसिले में जब उस ने सिकंदर को होटल फोन किया था तो होटल से बताया गया था कि सिकंदर नाम का कोई आदमी उन के होटल में नहीं ठहरा है. उस वक्त उस ने सोचा था कि सिकंदर ने किसी वजह से होटल बदल लिया होगा. लेकिन अब?

सिकंदर से उस की शादी किसी रोमांस का नतीजा नहीं थी. उसे कहीं देख कर सिकंदर ने उस के हुस्न की तारीफ की तो वह सोच में पड़ गई थी. वह सिकंदर से उम्र में बड़ी थी. देखने में भी कोई खास अच्छी नहीं थी. उसे अपने हुस्न के बारे में कोई गलतफहमी नहीं थी.

सिकंदर ने उस से शादी सिर्फ इसलिए की थी कि वह एक बड़ी दौलत और जायदाद की वारिस थी. 14 साल से वह सिकंदर के साथ एक अच्छी जिंदगी गुजार रही थी. सिकंदर देखने में स्मार्ट था और बेहद जहीन भी.

उस ने रोमा की दौलत को इस तरह बिजनैस में लगाया कि कारोबार चमक उठा. बिजनैस खूब फलफूल रहा था. 14 साल के अरसे में उन की शादी को एक शानदार कारोबारी समझौता कहा जा सकता था. दोनों एकदूसरे से खुश थे और इस कामयाब फायदेमंद कौंट्रैक्ट को तोड़ने पर राजी नहीं थे. दोनों ही खुशहाल जिंदगी बसर कर रहे थे.

शाम को सिकंदर की वापसी पर रोमा ने फोन काल के बारे में कुछ नहीं बताया. एक हफ्ता आराम से गुजरा. इस बार किसी आदमी का फोन था. जिस ने उसे दहशतजदा कर दिया. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘इस बारे में आप को फिक्र करने की जरूरत नहीं है. जो मैं कह रहा हूं, उसे ध्यान से सुनो मिसेज सिकंदर. मैं एक पेशेवर कातिल हूं. मैं मोटी रकम के बदले किसी का भी कत्ल कर सकता हूं. शायद यह जान कर आप को ताज्जुब होगा कि आप के शौहर सिकंदर ने आप को कत्ल करने के लिए मुझे 10 लाख रुपए की औफर दी है.’’

रोमा डर कर चिल्लाई, ‘‘तुम पागल हो गए हो या मजाक कर रहे हो? मेरा शौहर हरगिज ऐसा नहीं कर सकता.’’

मरदाना आवाज फिर उभरी, ‘‘अगर आप को आप के शौहर के औफर के बारे में न बताता तो शायद मैं पागल कहलाता. मैं हर काम बहुत सोचसमझ कर करता हूं. 10 लाख का औफर मिलने के बाद मैं ने अपने शिकार के बारे में जानकारी हासिल की और आप तक पहुंचा.

‘‘मैं कोई मामूली ठग या चोर नहीं हूं. अपने मैदान का कामयाब खिलाड़ी हूं. मैं इस तरह कत्ल करता हूं कि मौत नेचुरल लगे. किसी को भी कोई शक न हो. मैं अपने काम में कभी भी नाकाम नहीं रहा.’’

मिसेज सिकंदर ने कंपकंपाती आवाज में कहा, ‘‘यह सब क्या कह रहे हो तुम, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’

अजनबी मर्द की आवाज गूंजी, ‘‘मैं आप को सब समझाता हूं. आप के हसबैंड की औफर कबूल करने के बाद मुझे आप के बारे में पता लगा कि सारी दौलत की मालिक आप हैं. आप का शौहर आप का कत्ल करवाने के बाद पूरी दौलत का मालिक बनना चाहता है.

‘‘तब मुझे एक खयाल आया कि अगर मिसेज सिकंदर मुझे डबल रकम देने पर राजी हो जाएं तो मैं उन की जगह उन के शौहर को ही ठिकाने लगा दूं. आप क्या कहती हैं, इस बारे में मिसेज सिकंदर?’’

मिसेज सिकंदर खौफ से चीखीं, ‘‘तुम एकदम पागल आदमी हो. मैं पुलिस को खबर कर रही हूं.’’

मर्द ने जोरों से हंसते हुए कहा, ‘‘पुलिस, आप उन्हें क्या बताएंगी. चलिए, अगर उन्होंने यकीन कर भी लिया तो आप मुझे कहां तलाश करेंगी? मैं पीसीओ से फोन कर रहा हूं. आप बेकार की बातें छोड़ें और गौर करें. आप दोनों में से कोई एक मरने वाला है. अब रहा सवाल यह कि मरने वाला कौन होगा? आप या आप का शौहर? इस का फैसला आप को करना होगा. आप तसल्ली से सोच लें. कल मैं इसी वक्त फिर फोन करूंगा. आप का आखिरी फैसला जानने के लिए.’’

दूसरी तरफ से फोन बंद हो गया.

शाम को सिकंदर घर नहीं आया. उस ने फोन कर दिया कि औफिस में काम ज्यादा है, वह देर रात तक काम करेगा. उस ने सोचा कि सलिलि के साथ ऐश करेगा. जब आधी रात को सिकंदर बैडरूम में दाखिल हुआ तो वह जाग रही थी और कुछ सोच रही थी.

सोचतेसोचते वह इस फैसले पर पहुंच गई कि सुबह सिकंदर को टेलीफोन के बारे में बताएगी. मगर सिर्फ पहले फोन के बारे में. वह उस से कहेगी कि अगर उसे कोई कीप रखनी है तो रखे. उसे कोई ऐतराज नहीं, पर यह बात राज रहे. कोई बदनामी न हो.

वह आखिर दूसरे फोन के बारे में क्या बताती कि एक आदमी ने कहा है कि मुझे कत्ल करने के लिए 10 लाख का औफर दिया गया है. अगर मैं औफर डबल कर दूं तो मेरी जगह वह मारा जाएगा. शायद यह सुन कर सिकंदर उसे पागलखाने में दाखिल करा दे.

फिर उसे खयाल आया कि क्यों न वह उस अजनबी मर्द के दूसरे फोन का इंतजार करे. हो सकता है बातचीत के दौरान उस की कोई ऐसी गलती पकड़ में आ जाए, जिस की वजह से सिकंदर और पुलिस दोनों को उस की बात का यकीन आ जाए. फिर उसे पागलखाने में डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

लेकिन उसे लगा कि पहले फोन के बारे में भी बताने की भी क्या जरूरत है. वह उस की कहानी सुन कर खूब हंसेगा. अफेयर से इनकार करेगा और चौकन्ना हो जाएगा.

जैसेजैसे वह सोच रही थी, उसे लग रहा था कि फोन करने वाला आदमी पागल है. आखिर सिकंदर उस का कत्ल क्यों करवाएगा? वह खुद बूढ़ा हो रहा है, तोंद निकल आई है. अब क्या इश्क लड़ाएगा. पर यह बात भी सच है कि वह उसे तलाक नहीं दे सकता, क्योंकि सारी दौलत उस के हाथ से निकल जाएगी.

पर अचानक एक खयाल ने उसे डरा दिया कि अगर आज वह मर जाती है तो सारी दौलत का मालिक सिकंदर होगा. इस तरह उसे अपनी बीवी से छुटकारा मिल जाएगा और वह सलिलि से शादी करने के लिए आजाद हो जाएगा.

इसी सोचविचार में सारी रात कट गई. दूसरे दिन जब फोन की घंटी बजी तो उसी मरदाना आवाज ने पूछा, ‘‘मैडम, आप ने क्या फैसला किया?’’

रोमा की पेशानी पसीने से भीग गई. उस ने कहा, ‘‘मैं तैयार हूं. मैं तुम्हें 20 लाख दूंगी, तुम शिकार बदल दो. पर शिकार सिकंदर नहीं, सलिलि होगी.’’

‘‘बहुत अच्छा फैसला है, मतलब अब इस लड़की को ठिकाने लगाना है.’’ मरदाना आवाज ने पूछा.

‘‘हां, मेरे शौहर के बजाए उस की सेक्रेटरी सलिलि को कत्ल करना बेहतर है. क्योंकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था, जैसे सलिलि और सिकंदर के अफेयर के बारे में सारी दुनिया जानती है. सलिलि के न रहने से वह खुद ही वफादार बन जाएगा और अगर उस ने अपनी बीवी को कत्ल कराने की कोशिश की थी तो वह उस से खौफजदा भी रहेगा.’’

उस के दिमाग में एक खयाल और आया कि ये सारी बातें लिख कर अपने वकील के पास हिफाजत से रखवा देगी कि उस की अननेचुरल डैथ के बाद इसे खोला जाए और मौत का जिम्मेदार सिकंदर को ठहराया जाए.

फोन में मरदाना आवाज उभरी, ‘‘मुझे इस से कोई मतलब नहीं कि शिकार कौन है? मैं अपना काम बहुत ईमानदारी और सलीके से करता हूं. मैं आज ही आप के शौहर के औफर से इनकार कर दूंगा.

‘‘आप का काम हो जाने के बाद फिर कभी आप मेरी आवाज नहीं सुनेंगी, पर एकदो चीजें बहुत जरूरी हैं. मैं अपनी फीस एडवांस में नहीं मांग रहा हूं पर आप को मेरे बताए पते पर मेरे कहे मुताबिक एक खत लिख कर भेजना पड़ेगा. मेरा पता है— रूस्तम, पोस्ट बौक्स-911, रौयल पैलेस.’’

रोमा ने घबरा कर पूछा, ‘‘मुझे क्या लिखना होगा?’’

‘‘आप को लिखना होगा कि आप ने 20 लाख के एवज में मुझे हायर किया है कि मैं आप के शौहर की सेक्रेटरी सलिलि फर्नांडीज को कत्ल कर दूं.’’ मरदानी आवाज सुनाई दी.

रोमा चीख पड़ी, ‘‘नहीं, हरगिज नहीं. इस तरह तो मैं कत्ल में शामिल हो जाऊंगी.’’

‘‘बेशक, पर यह खत मेरे लिए बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इसे लिखने के बाद आप मेरे बारे में छानबीन नहीं करेंगी. यही खत मेरी फीस की गारंटी भी है. जब आप को सबूत मिल जाए कि सलिलि मर चुकी है, आप मुझे 20 लाख की रकम भेजेंगी. उस के मिलते ही कुरियर से आप को आप का खत वापस मिल जाएगा.’’

‘‘नहीं नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती.’’ रोमा ने चिल्ला कर कहा.

‘‘मुझे बहुत दुख है मैडम कि आप के शौहर आप से कहीं ज्यादा अक्लमंद हैं. उन्होंने मेरी हर बात मंजूर कर ली थी. अब मैं आप के शौहर से ही सौदा कर लेता हूं.’’

रोमा ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘ठहरो, मुझे तुम्हारी बात मंजूर है. बताओ, मुझे क्या लिखना है?’’

‘‘हां, यह ठीक है. आप कागज पेन ले लें, मैं आप को लिखवाता हूं.’’

रोमा ने कांपते हाथों से खत लिखा. फिर उस ने कहा, ‘‘मैं आप को खबर करूंगा कि आप खत भेज दें. खत मिलने के 2-3 दिन के अंदर ही अखबार में आप को सलिलि फर्नांडीस की मौत की खबर मिल जाएगी. फिर मैं आप को रकम के बारे में बताऊंगा कि कहां और कैसे भेजनी है. और फिर आप का खत आप को वापस मिल जाएगा. इस के बाद हमारा ताल्लुक खत्म.’’ दूसरी तरफ से फोन बंद हो गया.

2 दिन बाद फिर फोन आया. उस ने खत भेजने की हिदायत दी. रोमा ने खत रवाना कर दिया. तीसरे दिन अखबार में सलिलि फर्नांडीस की मौत की खबर छपी कि कल रात सलिलि फर्नांडीस की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.

रोमा का शौहर सिकंदर काम के सिलसिले में कलकत्ता गया हुआ था. अब उसे कोई फिक्र नहीं थी. वह कहां जाता है, कहां ठहरता है, क्या करता है.

दूसरे दिन उसी आदमी ने रकम के बारे में कई हिदायतें दीं. रोमा ने अलगअलग बैंकों से रकम निकलवाई. कुछ अपने पास से मिलाई और बड़ी ईमानदारी से वहां पैसा पहुंचा दिया, जहां कहा गया था. वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. पेशेवर कातिल भी अपने वादे का पक्का निकला. दूसरे रोज ही रोमा को कुरियर से उस का खत वापस मिल गया. उस ने फौरन उसे जला दिया और चैन की नींद सो गई.

उसी रात रोमा का शौहर रोमा से कई सौ मील दूर अपनी खूबसूरत सेक्रेटरी सलिलि के साथ एक शानदार होटल में अपनी कामयाबी का जश्न मना रहा था. सलिलि ने पूछा, ‘‘सिकंदर, मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि यह सब कैसे हो गया? आखिर कैसे तुम ने मेरी मौत की खबर छपवा दी?’’

सिकंदर ने शराब का घूंट भरते हुए कहा, ‘‘बहुत आसानी से, तुम्हारे मरने की खबर और रकम मैं ने अखबार वालों को भेज दी थी और उस के साथ एक परचा रखा था—‘सलिलि फर्नांडीस का कोई रिश्तेदार या करीबी इस शहर में नहीं है और वह मेरी कंपनी में मुलाजिम थी. उस की सारी जिम्मेदारी मुझ पर आती है. उस के सारे मामलात मैं ही देख रहा हूं. बस अखबार के जरिए उस की मौत की खबर दुनिया को बताना चाहता हूं.’

उन लोगों ने दूसरे दिन ही यह खबर छाप दी. अच्छा जानेमन, तुम यह बताओ कि तुम ने फ्लैट छोड़ते वक्त अपनी मकान मालकिन से क्या कहा?’’

‘‘मैं ने मकान मालकिन से कहा था कि मैं दिल की मरीज हूं. अपने शहर वापस जा कर अपने डाक्टर से इलाज कराऊंगी, क्योंकि अब तकलीफ बहुत बढ़ गई है.’’

‘‘शाबाश, तुम्हें मुंबई आए अभी बहुत कम अरसा हुआ है. कोई तुम्हें जानता भी नहीं है, न कोई दोस्त है. अब तुम दूरदराज के इलाके में एक शानदार फ्लैट ले कर ठाठ से रहना. अपना नाम और पहचान भी बदल लेना. रोमा से मिले 20 लाख रुपए मैं किसी बिजनैस में लगा दूंगा ताकि हर महीने गुजारे के लिए अच्छीखासी रकम मिलती रहे.’’

‘‘डार्लिंग, तुम कितने अच्छे हो, सारी रकम मेरे नाम पर लगा रहे हो.’’

‘‘क्यों नहीं डियर, पहली बार टेलीफोन करने वाली तुम खुद थीं. तुम्हीं ने तो प्लान कामयाब बनाया.’’

‘‘मगर सिकंदर, सारी प्लानिंग तो तुम्हारी थी. तुम ने कितनी कामयाबी से आवाज बदल कर कातिल का रोल अदा किया. तुम्हारी आवाज सुन कर तो मैं भी धोखा खा गई थी. तुम वाकई में बहुत बड़े कलाकार हो.’’

‘‘चलो, फालतू बातें छोड़ो, अब हमारे मिलने में कोई रुकावट नहीं रहेगी. टूर का बहाना कर के मैं तुम्हारे पास आ जाया करूंगा. उधर रोमा अपनी दौलत पर नाज करते हुए चैन से सोएगी. अब मुझ पर शक भी नहीं करेगी.’’ Hindi Story

Hindi Funny Story: कुशल साहब, गुस्सा लाजवाब

Hindi Funny Story: कुरसी पर पसरे चाय की चुसकियां लेते हुए. उन के सामने हाथ में डायरी लिए उन का पीए खड़ा था. क्या पता वे कब क्या बक डालें. वैसे तो साहबजी अपनी कुरसी से जरा भी नहीं हिलते और यही वजह है कि हर 2 महीने बाद उन की घिसाई कुरसी बदलनी पड़ती है, पर इन दिनों वे पिछले महीने से रैगुलर धूप में अपनी गोरी चमड़ी काली करने इसलिए आ रहे हैं कि डाक्टर के पास अपने को चैक करवाने के बाद उस ने उन्हें सलाह दी है कि उन की पाचन पावर तो ठीक है, पर उन की हड्डियां पलपल कमजोर हो रही हैं. वे इन्हें मजबूत रखना चाहते हैं, तो उन्हें सरकारी के साथसाथ कुदरती तौर पर भी विटामिन डी लेना होगा, हर दिन कम से कम 3 घंटे अपने औफिस से बाहर धूप में बैठ कर.

बस, यही वजह है कि वे सुबह  10 बजे औफिस में आते ही बाहर धूप में कुरसी पर पसर जाते हैं, लेट आने वालों की तरफ से अपनी आधी आंखें मूंदे अपना हर अंग करवट बदलबदल कर सूरज को  दिखाते हुए.  कई बार उन के इस तरह कुरसी पर पसरे देख सूरज को भी शर्म आ जाती है, पर उन्हें नहीं आती. उन्हें पता है कि हड्डियों में दम है तो जिंदगी छमाछम है. उस वक्त धूप में आराम से कुरसी पर अपना अंगअंग सेंकते औफिस को भूल अचानक उन्हें पता नहीं क्या सूझी कि उन्होंने अपने सामने खड़े पीए को आदेश दिया, ‘‘पीए…’’ ‘‘जी, साहबजी…’’ ‘‘जनता के फायदे के लिए एक मीटिंग रखो.’’

‘‘पर साहबजी, अभी तो आप को विटामिन डी लेते हुए आधा ही घंटा  हुआ है और डाक्टर ने सलाह दी है  कि कम से कम 2 घंटे तक आप को अपना आगापीछा सूरज को हर हाल में दिखाना है.’’

‘‘तो कोई बात नहीं, 2 घंटे बाद एक मीटिंग रखो.’’ ‘‘जनता के किस फायदे को ले कर सर?’’ ‘‘हमें अपनी जनता को गरमियों से बचाने के लिए कल से ही आपदा तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू करनी हैं

जनता के लिए गरमियों वाला टोल फ्री नंबर जारी करना है और… और….’’ ‘‘लेकिन सौरी सर… माफ कीजिएगा… अभी तो जाड़ों के दिन हैं. उस के बाद वसंत आएगा, फिर गरमी का सीजन… तब तक कौन जाने कि कौन राजा हो और कौन प्रजा… इसलिए मेरा निवेदन है कि जो रखनी ही है तो वसंत की आपदा से जनता को बचाने के लिए मीटिंग रख ली जाए सर…’’

‘‘साहब कौन है… तुम कि हम?’’ वे बदन गरम करते सूरज से ज्यादा गरमाए. ‘‘आप साहब.’’ ‘‘तो कायदे से और्डर किस का चलेगा, मेरा कि तुम्हारा?’’ ‘‘आप का सर.’’ ‘‘तो जो मैं कहता हूं वह करो. अभी लंच टाइम में एक मीटिंग रखो. वैसे भी इन दिनों पूरा औफिस कमरे में हीटर जलाए और धूप सेंकने के सिवा  और कुछ नहीं कर रहा है. मतलब, धूप सेंकने की पगार? जनता के पैसे की बरबादी?’’

‘‘नो सर. दिस इज टोटली गलत सर.’’ ‘‘तो जाओ, अभी एक नोटिस निकालो कि सब के साहबजी ने चाहा है कि जनहित में लंच में गरमियों से निबटने के लिए सरकारी तैयारियों पर आपातकालीन बैठक होनी है.’’ ‘‘जी साहब,’’ पीए उन को मन ही मन गालियां देता अपने कमरे में नोटिस टाइप करने चला गया.

हद है यार, ये साहब जात के जीव समझते क्यों नहीं? हड्डियां क्या साहबों की ही कमजोर होती हैं, उन के मातहतों की नहीं? पता नहीं, ये स्वार्थी कब समझेंगे कि साहबों की कमजोर हड्डियों के बिना देश चल सकता है, पर उन के मातहतों की कमजोर हड्डियों के बिना यह देश कतई नहीं चल सकता.  अरे साहबो, देश हित में कभी अपने मातहतों की हड्डियों के बारे में भी सोचो, तो देश का शुद्ध विकास हो. और लंच टाइम में साहब के कमरे के साथ लगते कौंफ्रैंसरूम में उन के अंडर के सारे अफसर, मुलाजिम उन को गालियां देते जुट गए.

पता नहीं क्या साहब है यह. खुद तो चौबीसों घंटे यहांवहां से खाता ही रहता है, पर उन्हें लंच टाइम में भी उन का अपना लाया लंच तक नहीं खाने देता. जब साहब के पीए ने देखा कि सारे औफिस के लोग आ गए हैं तो उस ने साहब से आदेश मांगते पूछा, ‘‘साहबजी, अब सब आ गए हैं तो जो साहबजी का मन हो तो वे मीटिंग शुरू करवाएं,’’

पीए के दुम दबाए पूछने पर उन्होंने अपनी अकड़ी गरदन और अकड़ाई.  जब उन्हें लगा कि इस से ज्यादा वे अपनी गरदन नहीं अकड़ा सकते, तो उन्होंने बड़े ही मार्मिक स्टाइल से गरमी के सीजन में आने वाली जन आपदा की पीड़ा को अपने मन में महसूसते हुए रुंधे गले से कहना शुरू किया,

‘‘हे मेरे औफिस के परम डियरो, लगता है कि गरमी के सीजन में गरमी की किसी भी आपात स्थिति से निबटने के लिए जनता की रक्षा के लिए अब टोल फ्री नंबर जारी कर दिया जाए, क्योंकि मैं हर मौसम से सौ कदम आगे चलने का हिमायती रहा हूं.

‘‘जनता आपदा में है, तो हम हैं, इसलिए मैं ने चाहा है कि मेरे अंडर खाने… सौरी, आने वाले एरिया में अभी से गरमी से निबटने की तमाम सरकारी तैयारियां शुरू कर दी जाएं, ताकि गरमी खराब होने पर हमारा औफिस अलर्ट  पर रहे. इस के बाद भी जो जनता परेशानी में रहे तो हम कर भी क्या  सकते हैं?’’ ‘‘पर सर, अभी तो जनवरी चल रहा है. ये दिन जी भर कर धूप सेंकने के दिन होते हैं सर.

इस के बाद फरवरी आएगा और फिर मार्च. उस के बाद अप्रैलमई, उस के बाद जूनजुलाई में जा कर कहीं गरमी आएगी.  ‘‘आग लगने से पहले कुआं खुदाई क्यों? कोई जो कूद कर उस में खुदकुशी कर गया, तो मीडिया दोष किस के  सिर मढ़ेगा?’’

‘‘देखो दोस्तो, कोई खुदकुशी करे तो सारा दोष कुएं का. रही बात मीडिया की, तो उस को मैं हैंडल कर लूंगा. कुदरत का कुछ पता नहीं. हमें दुश्मनों पर भरोसा करना चाहिए, पर कुदरत पर बिलकुल भी नहीं. वह चाहे तो जनवरी में भी हमें झुलसा सकती है.

वह चाहे तो फरवरी में भी बाढ़ ला सकती है.  ‘‘हमें तब तक जनता को कुदरत के भरोसे बिलकुल नहीं छोड़ना है, जब तक हम उस के भरोसे हैं. इसलिए हम अभी गरमी से बचने के लिए जनता को टोल फ्री नंबर जारी कर रहे हैं.

‘‘यह टोल फ्री नंबर 24 मिनट, नहीं… सौरी… 24 घंटे लगातार चलेगा, हमारे औफिस का नंबर चले या न  चले, तब गरमी से परेशान कोई भी जरूरतमंद किसी भी हालात में इस नंबर पर हमें मदद के लिए मुफ्त में फोन कर सकता है.

‘‘अब मैं साहब, अपने सभी अफसरों और मुलाजिमों को निर्देश देता हूं कि तुम्हारे द्वारा गरमी के मौसम में जनहित में सभी सुविधाएं अभी से सुचारु रखनी शुरू कर दी जाएं. ‘‘मैं शर्माजी को आदेश देता हूं कि वे मेरे एरिया की जनता के लिए जनता के हित के लिए सड़क के दोनों ओर जल्द से जल्द ऐसे पेड़ लगवाएं, जो 4 महीनों में ही जनता को छाया देने लायक हो जाएं, भले ही पेड़ों की जातियां हमें विदेशों से क्यों न लानी पड़ें. इस के लिए मेरा विदेश जाना तय रहेगा, जितनी जल्दी मुमकिन हो. ‘‘वर्माजी को आदेश दिए जाते हैं कि वे गरमी से जनता को नजात दिलाने के लिए अभी से सड़कों पर पंखे, एसी लगवाने की प्रक्रिया शुरू करवा दें. जनता के लिए सड़क के हर मोड़ पर कूलर लगवाने के लिए सड़कों के मोड़ों की तुरंत गिनती कर रिपोर्ट 4 दिनों के भीतर मेरी टेबल पर आ जानी चाहिए.

‘‘और हां आप… आप कल से ही सड़कों पर जेसीबी मशीनों के साथ  24 घंटे खुद तैनात रहेंगे, ताकि गरमी के सीजन में हवा को सड़क से गुजरने में कोई दिक्कत न हो. सड़कों की देखभाल भी आप ही करेंगे, ताकि गरमी से पीडि़त एंबुलैंस बिना रोकटोक सरकारी अस्पताल पहुंच जाए.

‘‘और ठाकुर साहब आप… आप को आदेश दिया जाता है कि आप गरमी में लू से हताहतों के लिए सरकारी अस्पतालों में अभी से बिस्तरों का मोरचा संभाल लें प्लीज. हम नहीं चाहते कि हमारे राज में गरमियों में कोई भी लू से सड़क पर मरे. ‘‘और पीए साहब आप… आप गरमी से लड़ने के लिए अपने औफिस के संसाधनों की लिस्ट अपडेट कीजिए. जोजो हमारे पास सामान कम हो, उस के लिए टैंडर बुलवाइए.

‘‘इस के साथसाथ आप पुलिस विभाग को मेरी ओर से चिट्ठी भेज दीजिए कि वे लोग कल से ही मेरे इलाके में बचे पेड़ों की शीतल हवा की कड़ी निगरानी करते हुए ईमानदारी से हर जरूरतमंद आम आदमी तक ड्रोन से पहुंचाना पक्का करें.

‘‘गरमियों में उन की हवा दूसरे न चुरा लें, इस के लिए वे हवा की सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम कर हमें समयसमय पर सूचित करेंगे, यह उन को हमारा आदेश है.  ‘‘और हां, मेरी ओर से सूरज को भी एक कड़ी चेतावनी वाली चिट्ठी लिखी जाए कि जो वह गरमियों में हमारी जनता को त्रस्त करने के लिए सरकार द्वारा तय गरमी के पैमाने से इंच भर भी ज्यादा गरम हुआ, तो हम उस के खिलाफ किसी भी हद तक कार्यवाही करने से गुरेज न करेंगे. हो सकता है कि तब हम उस के अपने पर किए अहसान भी भूल जाएं तो भूल जाएं. हमारे लिए जनहित सब से ऊपर है.

‘‘इसी के साथ यह आपातकालीन मीटिंग खत्म होती है. अगले जनहित को ले कर अगली मीटिंग में फिर मिलेंगे जल्दी ही,’’ साहब ने अपना संबोधन यों खत्म किया, ज्यों उन पर कोई आपदा आ गई हो और फिर औफिस के पिछली ओर के लान में बची धूप में आ कर अपनी हड्डियां मजबूत करने कुरसी पर आड़ेतिरछे पसर गए. Hindi Funny Story

Hindi Family Story: कर्मों का फल – कैसे बदली सुनील की जिदंगी

Hindi Family Story: हजारीबाग की हरीभरी वादियों में बसे टनकपुर गांव की गिनती आदर्श गांवों में होती थी. झिलिया नदी के तट पर बसे इस गांव की आबादी तकरीबन सवा सौ परिवारों की थी.अयोध्या राम गांव के अमीर लोगों में से एक थे. मजबूत कदकाठी के चलते उन की अलग पहचान थी. उन के पास खेतखलिहान, नौकरचाकर थे. वर्तमान समय में किसी चीज की कमी नहीं थी. लेकिन पर्वत्योहार के मौके पर उन की स्वर्गीय पत्नी सुलोचना की याद ताजा हो जाती थी, जिन्होंने बेटे सुनील को जन्म देने के बाद अस्पताल में ही दम तोड़ दिया था.सुनील का लालनपालन अयोध्या राम ने खुद किया था. पुत्र मोह में उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी. पता नहीं सौतेली मां कैसी मिलेगी, यह सोच कर उन्होंने अपने लिए आए हर रिश्ते को मना कर दिया था.

टनकपुर में हर साल हाई स्कूल के निकट बने मंदिर में भारी मेला लगता था, जिस में गांवदेहात में बनी चीजों से ले कर शहर में बने फैंसी सामान तक बिकते थे. 3 दिन के इस मेले में झूले, जादू घर, मौत का कुआं, कठ घोड़वा जैसे मनोरंजन के साधन थे, जो मेला देखने वालों के आकर्षण का केंद्र थे. बच्चों के लिए तरहतरह के खिलौने, औरतों के लिए सजनेसंवरने की चीजें भी खूब बिकती थीं. टनकपुर के आसपास के लोग भी मेले में पहुंचते थे. गांव के लोग बहती झिलिया नदी में स्नान कर मंदिर में पूजाअर्चना करते और मेले में से सामान खरीद कर घर लौट जाते. वहीं बगल में मवेशियों का हाट लगा हुआ था, जहां तरहतरह के मवेशी बिकने के लिए आए हुए थे. मेले में भेड़, बैल, बकरा, मुरगा की लड़ाई की प्रतियोगिता भी होती थी. जीतने वाले पशु मालिकों को नकद इनाम आयोजकों द्वारा दिया जाता था. पशुओं की सेहत व सुंदरता की परख भी की जाती थी.

अयोध्या राम अपने बैलों को नहला कर और रंगबिरंगे रंगों से सजा कर सजी हुई बैलगाड़ी में जोत कर मेले में पहुंचे. बैलगाड़ी को एक पेड़ की छाया में खड़ा कर बापबेटा लिट्टी की दुकान पर चले गए और वहां गरमागरम लिट्टीचोखा और हरी मिर्च का स्वाद लिया. लिट्टी खाते समय सुनील की नजर बकरी के एक नटखट खस्सी पर जा पड़ी. उस का सफेद रंग, शीशे जैसी चमचमाती आंखें, खड़़े कान, उस का उछलनाकूदना और मचलना बहुत ही मनभावन था. सुनील अपने पिता से वह खस्सी खरीदने की जिद करने लगा.

अयोध्या राम ने भी सोचा कि बेटा घर में अकेला रहता है. खस्सी का साथ मिलेगा, तो उस का समय अच्छा कट जाएगा. उन्होंने बिना मोलभाव किए उस खस्सी को 1,000 रुपए में खरीद लिया. घर के अहाते में ला कर खस्सी को छोड़ दिया. सुनील खस्सी के साथ इतना घुलमिल गया कि अब वह उसे अपने बिछावन पर सुलाने लगा. देखते ही देखते 4 साल में वह खस्सी बकरा बन गया. सुनील ने उस की निडरता को देख कर उस का नाम शेरा रख दिया था, साथ ही उस के गले में पीतल की एक घंटी भी बांध दी थी.

जब शेरा उछलताकूदता तो घंटी की ‘टनटन’ की मधुर आवाज सब का मन मोह लेती. पूरे गांव में शेरा की चर्चा होने लगी थी. गांव के मंदिर में फिर मेला लगा और उस में मवेशियों की प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिस में शेरा ने भी भाग लिया. उस ने खस्सी मुकाबला, परेड और दौड़ में पहला नंबर पाया. दूसरे खस्सी उस का मुकबला नहीं कर सके. तीनों प्रतियोगिताओं में सुनील को 3,000 रुपए मिले. शेरा की यह बढ़त कई साल तक जारी रही.

अब टनकपुर के लोग शेरा को इतना प्यार करते, जैसे वह उन के घर का सदस्य हो. वह दिनरात सुनील के साथ रहता, उस के साथ खातापीता और घूमता था. इधर सुनील ने अपने गांव के स्कूल से मैट्रिक पास कर ली थी. अयोध्या राम ने उस का दाखिला रांची के नामीगिरामी कालेज में करा दिया था. कालेज के होस्टल में उस के रहने का इंतजाम हो गया था. कालेज में सीधासादा सुनील बुरे लड़कों की संगत में पड़ गया. गबरी गाय का दूधदही खाने वाला सुनील अब कालेज में नशा करने लगा था. इतना ही नहीं, अब सुनील स्मैक की सप्लाई करने लगा था. वह अपनी फुजूलखर्ची को पूरा करने के लिए अपने पिता से और ज्यादा रुपयों की मांग करता था.

सुनील के ड्रग्स लेने की जानकारी कालेज के शिक्षकों द्वारा प्रिंसिपल तक पहुंच गई. नतीजतन, पहले उसे चेतावनी दी गई और बाद में जब वह नहीं माना, तो प्रिंसिपल ने उसे कालेज से निकाल दिया.

सुनील कालेज से अपना सामान समेट कर अपने घर टनकपुर पहुंचा. बेटे को देख कर अयोध्या राम ने कालेज छोड़ने की वजह पूछी, तो सुनील ने उन्हें बताया कि कोरोना काल में कालेज बंद हो गया है. कालेज की पढ़ाई औनलाइन घर पर होगी. इसी बहाने सुनील ने लैपटौप खरीदने के लिए अपने पिता से 65,000 रुपए झटक लिए. पैसा मिलते ही सुनील रांची चला गया. वहां उस ने 15,000 रुपए में एक पुराना लैपटौप खरीदा और बाकी रुपयों की उस ने स्मैक और नशे की गोलियां खरीद लीं.

रांची से लौटने के बाद वह घर में भी नशा करने लगा. जब उसे नशा हो जाता, तो वह शेरा को भी भूल जाता. शेरा को पहले जैसा प्यारदुलार नहीं दे पाता, जिस का आभास शेरा को हो चुका था. जब अयोध्या राम को सुनील के नशेड़ी होने की बात मालूम हुई, तो उन्होंने सुनील के जेबखर्च पर रोक लगा दी. तब सुनील ने अपना लैपटौप पतंग के भाव में बेच डाला. लेकिन, वह पैसा भी खत्म होने के बाद सुनील अपना सिर धुन रहा था कि स्मैक के लिए पैसा कहां से लाए. पास में बैठा शेरा उस को निरीह आंखों से देख रहा था.

गांव के एक कसाई जुम्मन की नजर शेरा पर थी. वह शेरा को खरीदने के लिए मौके की तलाश में था. एक दिन वह सुनील के पास पहुंचा और बोला, ‘‘सुनील बाबू, आप को कुछ पैसे चाहिए क्या?’’ चाहिए तो, पर कौन देगा पैसे? मेरे पास अब बेचने को है ही क्या?’’

सरकार अभी तो आप के पास खजाना है,’’ जुम्मन अपनी चाटुकारिता पर उतर आया. कैसा खजाना? क्यों मजाक करते हो जुम्मन भाई.’’‘हुजूर, शेरा तो आप का खजाना ही है. कहिए तो इस के लिए 12,000 रुपए अभी गिन दूं…’’12,000…’’ यह सुन कर सुनील का मुरझाया मन खिल उठा. उस की नजरें शेरा पर जा कर ठहर गईं. उस ने शेरा को देखा और जुम्मन से बोला, ‘‘अच्छा, लाओ रुपए.’’ जुम्मन ने रुपए निकालने में देर न की. उस ने तुरंत अपनी झोली में हाथ डाला और नोट सुनील के हाथों पर रख दिए.

अब जुम्मन शेरा के पास आया और उस के पुट्ठे पर हाथ फेरा. साथ ही, उस की कमर को ऊपर उठा कर वजन का अंदाजा लगाया. उस ने बिना देर किए शेरा को ले जाने के लिए उस की गरदन में रस्सी बांध कर खींचा, मगर शेरा अपनी जगह से हिला तक नहीं.जब जुम्मन ने पूरा जोर लगा कर शेरा को खींचा, तो वह मिमियाने लगा. पर सुनील को कोई खास फर्क नहीं पड़ा. उस का ध्यान तो जेब में रखे पैसों पर था. लेकिन रात को उसे शेरा की खूब याद आई और वह अगली ही सुबह बाजार में जुम्मन की दुकान पर जा पहुंचा. उस ने अपनी जेब से 12,000 रुपए निकाल कर जुम्मन की तरफ बढ़ाए, तो जुम्मन ने शेरा के कटे हुए सिर व टंगे हुए धड़ को दिखाया.

यह देख कर सुनील बेकाबू हो गया और वह एकाएक जुम्मन पर टूट पड़ा. उस ने जुम्मन का चाकू छीन लिया. उन दोनों में मारपीट होने लगी कि इसी दौरान वे एक दीवार से टकरा गए. दीवार सुनील के ऊपर भरभरा कर गिर पड़ी और वह गंभीर रूप से घायल हो कर बेहोश हो गया.

आसपास के लोगों ने सुनील को मलबे से बाहर निकाला. इस घटना की खबर अयोध्या राम को दी गई. वे एक डाक्टर और पंचायत के मुखिया के साथ वहां पहुंचे. डाक्टर ने सुनील के प्राथमिक उपचार के बाद उसे रांची ले जाने की सलाह दी.

अयोध्या राम की हिम्मत ने जवाब दे दिया. तब मुखियाजी ने एक एंबुलैंस मंगवाई और सुनील को ले कर रांची रवाना हुए.

अस्पताल के बड़े डाक्टर जल्दी ही वहां पहुंचे और स्ट्रैचर पर ही सुनील का चैकअप करते हुए बोले, ‘‘आप लोगों ने लाने में देर कर दी. यह लड़का अब इस दुनिया में नहीं है…’’

इतना सुनते ही उस माहौल में अयोध्या राम के चीखने की आवाज गूंजने लगी. गांव के मुखिया उन्हें समझाने में लगे हुए थे. वे किसी तरह उन्हें ले कर कार में बैठे और गांव जाने के लिए रवाना हो गए. Hindi Family Story

Story In Hindi: हरी चूडियां – सायरा ने क्या-क्या खरीदा

Story In Hindi: अम्मी खुश थीं सायरा को उस के शादी के बाद आए पहले तोहफे दिला कर. सायरा खुश थी अपनी पसंद के तोहफे पा कर. वह कभी हरा और रेशमी गरारा उठा कर देखती, तो कभी सलमासितारों से जड़ी हरी ओढ़नी अपने सिर पर रख कर कहती, ‘‘देखिए अम्मीजान, इस का हरा रंग कितना अलग सा है. इस पर जड़े सितारे तो ऐसे लगते हैं जैसे पूरी कायनात के सितारे मेरी ओढ़नी पर आ कर अपनी महफिल सजा कर बैठे हों.’’

अम्मी बोलीं, ‘‘मेरी बच्ची की ओढ़नी यों ही हरीभरी रहे…’’ फिर दोनों हाथों से सायरा की बलाएं ले कर अपने पान से सुर्ख हो रहे होंठों से उसे चूम लिया.मैं अभी भी किताब में अपना सिर झुकाए चोर नजरों से इन सासबहू का लाड़दुलार देख रहा था. मन ही मन कुढ़ भी रहा था

सायरा से मेरा निकाह हुए 2 महीने हो गए थे. मैं अभी तक उस से अपना जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहा था. जुड़ाव महसूस भी कैसे करता? कुछ ऐसा महसूस करने के लिए जुड़ना जरूरी होता है. केवल किसी को ‘कबूल’ बोल देने भर से तो वह कबूल नहीं हो जाता.

यह अलग बात है कि काजी साहब के सामने किए इजहार को मैं अपनी जिंदगी के कयामत वाले दिन तक निभाने को तैयार हूं. हां, मगर अभी मुझे वक्त चाहिए खुद को समेटने के लिए. सलमा को भुलाने के लिए.

मैं क्या करूं… नहीं लुभाती सायरा की खूबसूरती, उस की चुलबुली सी अदाएं, उस का चहकना और मचलना मुझे कुछ भी नहीं भाता. मुझे हर वक्त अपने आसपास सलमा का सांवला सा संजीदा चेहरा ही नजर आता है.

मैं मानता हूं कि सायरा रिमझिम बरखा सी है, पर मेरा इश्क मेरी सलमा… वह भी तो भादों से भरी घटा थी.फिर मेरे मिजाज में भी तो यह सब नहीं था. मुझे कभी अच्छा भी तो नहीं लगा बरसात में भीगना. चिढ़ थी मुझे भीगने से और फिर लौट कर अम्मी के तमाम नियमकायदे मानने से. गीले पैर पायदान पर रख कर उसे खिसकाते हुए गुसलखाने तक जाओ, कपड़े का पानी बाहर ही निचोड़ो, यह सब मुझे उकता देता था.

ऊपर से अम्मी का वह जोशांदा काढ़ा… उफ. वह तो मेरे हलक से नीचे ही नहीं उतरता था. जो चीज मेरे दिल से गुफ्तगू करती थी, वह थी घिरी हुई घटाओं के बीच दालान में बैठ कर किताबें पढ़ना.बादलों को एकदूसरे में सिमटते देखना, बादलों का गरजना यों लगता जैसे आसमां अपने भीतर के सारे मनोभाव जमीन से खुल कर कह रहा हो कि किसी से नहीं डरना हमें. हम तो तेरे आशिक हैं.अकसर सोचता एक दिन मैं भी खुशी से सब को बता दूंगा कि मुझे सलमा से मुहब्बत है.

मैं अपनी सोच में खोया हुआ था कि तभी सायरा ने अपने सामान का जखीरा मेरे सामने ला पटका और बोली, ‘‘देखिए साहिर साहब, हमें अम्मीजान ने कितने तोहफे दिलाए हैं. आप भी कुछ दिलाइए…’’

बिना मेरा जवाब सुने ही उस ने फिर से कहना शुरू किया, ‘‘यह हार देखिए, और ये झुमके भी. यह तो उन्होंने अपनी छोटी वाली पेटी से निकाल कर दिए हैं. कह रही थीं कि बड़े बेशकीमती हैं.

‘‘अम्मीजान बता रही थीं कि उन की दुबई वाली खाला ने उन्हें बतौर नजराना दिए थे. आप देखें, आज ये सब अम्मीजान ने हमें दे दिए.’’

मैं ने बड़ी बेतकल्लुफी से उन सब पर बिना नजर डाले ही कहा, ‘‘सब ले लो, आज भी यह सब तुम्हारा ही है. कल भी सब तुम्हारा ही तो होना है. अम्मी का मेरे सिवा है ही कौन?’’

री बात सुन कर बड़ी बेतकल्लुफी से वह बोली, ‘‘यह क्या बात हुई… हम भी तो हैं अम्मी के. साहिर, हम ने कितनी ही सासें देखी हैं. एकलौती बहू को भी अपना सब अपने जीतेजी नहीं सौंप देती हैं. अम्मीजान तो लाखों में एक हैं.

‘‘एक बात सुनें आप… फिर हों भी क्यों न? उन में हमारे सैयद खानदान का ही खून दौड़ रहा है. आखिर वे मेरी फूफी भी तो हैं.’’

मैं चुप हो गया. यह सैयद खानदान की जिद ही तो थी, जिस ने सलमा और मेरे इश्क को परवान नहीं चढ़ने दिया. अम्मी ने अपने एक फैसले से मेरी दुनिया बदल कर रख दी.

बहुत सालों बाद पिछले साल जब अम्मी अपने मायके गई थीं, तब वहीं से सायरा का रिश्ता मांग लाई थीं. बिना मुझ से पूछे, बिना मेरी मरजी जाने और वापस आ कर बस फरमान सुनाया था, ‘‘साहिर, तुम्हें सायरा याद है न? वही मेरे चचा भाई की मंझली बेटी… हम उसे तेरे लिए मांग आए हैं.’’

यह सुन कर बिना घबराए मैं ने बड़े यकीन से अम्मी को अपने दिल का हाल सुनाया था. लेकिन अम्मी ने चंद शब्दों में सारी बात खत्म कर दी, ‘बरखुरदार, हम सैयद खानदान से ताल्लुक रखते हैं. हम जबान दे कर पीछे नहीं हटते हैं. तुम्हें मेरी बात न माननी हो, तो शौक से तुम अपने मामू को फोन कर के मना कर दो.साथ ही साथ यह भी कह देना कि तुम्हारी बेवा मां का इंतकाल हो गया है, तभी तुम यह रिश्ता तोड़ रहे हो.’अम्मी की इस बात के बाद सिवा सेहरा पहनने के मेरे पास कुछ कहने को नहीं था.

सायरा अभी भी अपने तोहफे समेट रही थी, जबकि मैं यादों की बारादरी से गुजर कर वापस भी आ गया. कल सायरा की पहली विदाई है. वह अपने अरमान संजो रही थी.

सुबह ही मैं ने अपने मन में सोच लिया था कि कल कुछ भी कर के मैं सलमा से मुलाकात करूंगा. उस से सब कह दूंगा कि नहीं रहा जाता तुम्हारे बिना… बताओ क्या करूं? कोई तो रास्ता सुझाओ…

मैं अपनी ही उधेड़बुन में था कि तभी सायरा आ कर मेरे गले लग गई और चहक कर बोली, ‘‘आप तो बड़े छिपे रुस्तम हो जी. ये हरी चूडि़यां ले कर आए हो तो मुझे दी क्यों नहीं?’’फिर प्यार से हाथ आगे बढ़ाते हुए वह बोली, ‘‘आप जानते हैं… आप के नाम लिख गई है मेरी कलाई की एकएक नस, तो फिर शरमाना कैसा? चलिए, पहना दीजिए.’’

मैं पसोपेश में पड़ गया. कल सलमा से मुलाकात के लिए लाया हुआ तोहफा सायरा के हाथ में था. उन चूडि़यों की खनक सायरा की आवाज में थी. बिना कुछ भी बोले हुए मैं ने उस की कलाई में वे हरी चूडि़यां सजा दी थीं. वह एकएक चूड़ी को चूम रही थी.

मैं ने खुद को वफा की नजर में तोला तो पाया कि मैं भटक रहा था. खुद को झटकते हुए मैं ने अपने भटकते मन को सीधी राह पर चलाने के लिए नजरबंद कर लिया. मन की दबी हुई सारी काली घटाएं बूंद बन कर पिघलने लगीं. हवाओं का शोर बता रहा था कि बाहर जोर से पानी बरस रहा है. Story In Hindi

Hindi Family Story: सुबह अभी हुई नहीं थी – आखिर दीदी को क्या बताना चाहती थी मीनल

Hindi Family Story: सूरज निकलने में अभी कुछ वक्त और था. रात के कालेपन और सुबह के उजालेपन के बीच जो धूसर होता है वह अपने चरम पर चमक रहा था. चारों तरफ एक सर्द खामोशी छाई हुई थी. इस मुरदा सी खामोशी का हनन तब हुआ जब मीनल एकाएक हड़बड़ा कर उठ बैठी. वह कुछ इस तरह कांप रही थी जैसे उस के शरीर के भीतर बिजली सी कौंधी हो. उस की सांसें लगभग दौड़ रही थीं.

अपने आसपास देख उसे कुछ राहत हुई और उस ने तसल्ली जैसी किसी चीज की ठंडी आह भरी. वह एक बुरा सपना था. उसे अपने सपने पर खीज हो आई. ज्यादा खीज शायद इस बाबत कि आज भी कोई बुरा सपना आने पर वह बच्चों सी सहम जाती है. उस ने घड़ी की और देखा तो एक नई निराशा ने उसे घेर लिया. वह घंटों का जोड़भाग करती कि उसे याद हो आया की कमरे में वह अकेली नहीं है. उसे हैरत हुई कि जो कुछ सामने हो उसे कितनी आसानी से भूला जा सकता है. वह धीमे कदमों से हौल की तरफ बढ़ी. उसे यह देख राहत हुई की उस की हलचल से रजत की नींद में कोई खलल नहीं पड़ा था.

वह अपना सपना भूल एकटक रजत को निहारने लगी. जिसे आप प्रेम करते हों उसे चैन से सोते हुए देखना भी अपनेआप में एक बहुत बड़ा सुख होता है. वह खड़ी हुई और धीमे कदमों से, पूरी सावधानी बरतते हुए ताकि कोई शोर न हो, कमरे में टहलने लगी. अनायास ही कांच की लंबी खिड़की के सामने आ कर उस के कदम ठिठक गए. उस की नजर कांच की लंबी खिड़की से बाहर पड़ी तो उस की आखों में जादू भर आया.

खूब घने पाइन और देवदार के पेड़. हर जगह बर्फ और धीमी पड़ती बर्फबारी. दूर शून्य में दिखती हुई पहाड़ों की एक धुंधली सी परछाई. उसे ऐसा लग रहा था जैसे यह लैंडस्केप वास्तविकता में न हो कर किसी महान चित्रकार की उस के सामने की गई कोई पेंटिंग हो. यह नायाब नजारा धीरेधीरे उस के भीतर उतरने लगा.

अब उस के और इस अद्भुत नजारे के बीच बस कांच का एक टुकड़ा था, जैसे वह अपनी पूरी ताकत लगा बाहर की दुनिया के खुलेपन को मीनल के भीतर के बंद से मैला होने से बचाने की जद्दोजेहद में हो. मीनल को लगा जैसे उस की अपनी इस दुनिया से केवल 2 कदम दूर कोई दूसरी, बहुत ही खूबसूरत दुनिया बसती है, जैसे पहली बार उस की अपनी दुनिया और वह जिस दुनिया में होना चाहती है उन के बीच एक ऐसा फासला है जिसे वह सचमुच तय कर सकती है. उस ने मन ही मन कुछ निश्चय किया और शायद वहीं कुछ एक चिट में लिख शीशे पर चिपका कर और ठंड के मुताबिक कपड़े पहन अपने कमरे से बाहर आ गई.

मीनल को इस वक्त कोई जल्दी नहीं थी. वह बर्फ की फिसलन से बचते हुए, धीमे और सधे कदमों से आगे बढ़ने लगी. उस का बस चलता तो वह वक्त की धार को रोक इसी पल में सिमट जाती. शायद वह खुद को पूरा सोख लेना चाहती थी.

चलतेचलते उसे लगा कि यह वही समय है जब सबकुछ बहुत दूर नजर आता है, हमारी पहुंच से बिलकुल बाहर. रह जाते हैं केवल हम और बच जाता है हमारा नितांत अकेलापन या मीठा एकांत. वही समय है जो हमें परत दर परत खोलते हुए खुद ही के सामने उधेड़ कर रख देता है. हम अपने भीतर झांकते हैं, साहस से या किसी मजबूरीवश और खुद को आरपार देखते हैं.

पहले घड़ी देखने के बाद जो घंटों का हिसाब करना रह गया था, वह अब सालों के हिसाब का रूप ले चुका था. शायद सच ही है, जो कुछ भी हम सोचते हैं, करते हैं वह हम तक वापस लौटता है और वह भी इसी जीवन में.

मीनल चलते हुए बहुत दूर जा पहुंची थी और अब आसपास कोई जगह देखने लगी थी. जिस जगह वह बैठी वहां से दूर की पहाड़ियां भी एकदम साफ दिख रही थीं. शायद इसलिए ही उस ने यह जगह चुनी. उसे पहाड़ों से एक लगाव हमेशा से रहा था.

दूर पहाड़ियों की चोटियों पर पड़ी बर्फ की सफेद चादर उसे इस कदर आकर्षित करने लगी कि उस ने वह बर्फ नजदीक से देखने की जगह अगले जन्म बर्फ की चादर हो जाने की कामना की. होने को तो जिस पगडंडी पर चल कर वह इस जगह तक आई थी ढेर सारा बर्फ वहां भी जमा था, लेकिन उस की सतह से वह साफ सफेद होने की जगह धूल से मटमैली हो दागदार सी प्रतीत होती थी. यही कारण रहा होगा जिस की वजह से इस बर्फ ने उसे इस कदर प्रभावित नहीं किया. न ही उस ने इस बर्फ से गोले बना हाथों से कुछ खेलने की कोशिश की और न ही इस की छुअन के ठंडेपन को महसूस तक किया. वह उस के होने को जैसे नकार कर बिना कोई दिलचस्पी दिखाए आगे बढ़ती गई थी.

शायद जब हम किसी चीज को दूर से देखते हैं तो उस अनजान के झुरमुट में भी कुछ सुखद होने की आशा ही हमें विस्मित करती है. जब तक हम उस अनजान को नहीं जानते और उस के पास नहीं पहुंच जाते हमारा यह भ्रम बना रहता है और जैसे ही हम उस अनजान के नजदीक पहुंचते हैं हमारा यह भ्रम कुछ यों बिखरता है मानों भीतर बहुत कुछ टूट गया हो, ऐसा टूट जो किसी की नजर में आने का मोहताज नहीं होता. जिस टूट को केवल हम देख सकते हैं, जिस की पीड़ा केवल और केवल हम खुद महसूस कर सकते हैं.

पहाड़ों के सौंदर्य और सुनहले पुराने दिनों के बीच जरूर कोई अदृश्य लेकिन घनिष्ठ रिश्ता होता है, एक ऐसा रिश्ता जिस में कभी गांठें नहीं पड़तीं. मीनल को भी पहाड़ों की गोद में बैठ बीते किस्से याद हो आए. जीवन भले ही गंदे पानी के तलाब की तरह ही क्यों न रहा हो, उस गंदे से गंदे कीचड़ के बीच भी कुछ हसीन यादें दिलकश कमल की तरह उग आती हैं और यादें भी वे जिन के गुजरते वक्त हम अनुमान भी नहीं लगा सकते कि ये हमारे जेहन का हिस्सा बन हमारे अंत तक साथ रहेंगी और जिन से लिपट कर हम अपना सारा जीवन गुजार देना चाहेंगे.

याद आए किस्से अमूमन किसी बीते हुए प्रेम के होने चाहिए थे, किसी प्रेमी के होने चाहिए थे. लेकिन बादलों में मीनल को जो आकृति दिखाई दी वह बड़की दीदी की थी. उस ने एक गहरी सांस अंदर खींची और कस कर आंखें भींच लीं लेकिन इस के बाद भी पलकों के घने अंधेरेपन में जब बड़की दीदी नजर आईं तो वह कुछ कांप गई. उस ने कुछ धीरे से आंखें खोलीं.
यों बड़की दीदी को याद करने की कोई खास वजह नहीं थी. और इस वक्त तो बिलकुल भी नहीं. पर शायद हमारी जिंदगी के कुछ चुनिंदा खास लोग हमें इसी तरह याद आते हैं, बेवजह और बेवक्त.

बड़की दीदी से उस की 1 अरसे से मुलाकात नहीं हुई है. उसे अचरज हुआ कि इतना समय बीत जाने पर भी उन की छोड़ी छाप अमिट थी. बीते हुए दिन और ज्यादा पुरजोर तरीके से उस के सामने तैरने लगे थे. अतीत और वर्तमान के बीच की रेखा मद्धिम होती हुई एकदम धुंधली पड़ चुकी थी. वह बड़की दीदी को घर की कोई बात बता रही थी. जरूर कोई ऐसी बात रही होगी जिस के लिए मां ने उसे कहा होगा कि यह किसी को मत कहना. हर परिवार के अपने कुछ राज होते हैं. लेकिन बड़की दीदी भी तो उस परिवार में शामिल थीं. बड़की दीदी को वह बात कहते हुए उस की आवाज में कोई संकोच नहीं था और न ही कोई लागलपेट थी. वह बेधड़क हो धड़ल्ले से बोल रही थी.

बड़की दीदी एकमात्र इंसान थीं जिन के सामने वह अपनी हर बात रख सकती थी. जिन के सामने वह खुल कर रो सकती थी और जिंदगी में किसी ऐसे इंसान का होना जिस के सामने आप खुल कर रो सकें, किसी वरदान से कम नहीं हुआ करता

एक बार उस ने बड़की दीदी से कहा था,”काश, इंसान ने कोई ऐसी वाशिंग मशीन भी बनाई होती जिस में मैले हुए रिश्तों को चमकाया जा सकता, उस के सारे दागधब्बे साफ किए जा सकते और सारी गिरहें खोली जा सकतीं…”

बड़की दीदी उस से सहमत नहीं थीं. उन्होंने कहा था,”बिना गिरहों का रिश्ता कभी मुकम्मल नहीं होता. जब तक 2 लोग उन गिरहों को खोलने का खुद तकल्लुफ न उठाएं या उन गिरहों के साथ भी अपने रिश्तों को न सहेज पाएं वह रिश्ता मुकम्मल कैसे होगा…”

कई बार मीनल ने सोचा था कि बड़की दीदी उन के रिश्ते की गिरहें खोलने का प्रयास क्यों नहीं करतीं? पर उन के रिश्ते में दूरियां किस दिन या किस बाबत आईं इस पर ठीकठीक उंगली रखना मुमकिन नहीं है. कई बार रिश्तों में किसी की कोई गलती नहीं होती, वह रिश्ता धीरेधीरे स्वयं खोखला हो जाता है या समय की बली चढ़ जाता है. क्या प्रयास कर एक मरे हुए रिश्ते को जिंदा किया जा सकता है…

मीनल ने खुद को झंझोरा,’बड़की दीदी कहां सोचती होंगी मेरे बारे में, कहां मुझे याद करती होंगी? इतने सालों में एक फोन नहीं, एक मैसेज नहीं. क्या उन्हें कभी मेरी कमी महसूस नहीं हुई? मैं कैसी हूं यह जानने की इच्छा नहीं हुई? इतनी खट्टीमीठी स्मृतियां, साथ बिताए साल क्या सबकुछ… ‘

सवाल खुद से था, तो जवाब भी खुद ही देना था,’लेकिन मैं ने भी कहां किया उन से संपर्क? शायद उन्होंने भी कई दफा सोचा हो पर न कर सकी हों. अकसर रोजमर्रा की जिम्मेदारियां पुराने रिश्तों पर हावी हो जाया करती हैं…’ उस ने खुद ही को समझाने की कोशिश की.

उस ने अपने फोन में वह मैसेज खोला, जो वह लिख कर कई बार पढ़ चुकी है. वह मैसेज जो उस ने बड़की दीदी को लिखा तो था लेकिन कभी भेज नहीं सकी. वह यह सब सोचते हुए बर्फ में ही लेट गई. फिर अचानक लगा कि वह कुछ निश्चय करती इतने मे उसे रजत की आवाज करीब आती सुनाई दी,”मीनल, यह क्या… तुम्हारी सफेद जैकेट तो धूल में सन गई है. चलो, अब जल्दी इसे बदल लो फिर घूमने भी जाना है…” Hindi Family Story

Hindi Family Story: खडूस मकान मालकिन – क्या था आंटी का सच

Hindi Family Story: ‘‘साहबजी, आप अपने लिए मकान देख रहे हैं?’’ होटल वाला राहुल से पूछ रहा था. पिछले 2 हफ्ते से राहुल एक धर्मशाला में रह रहा था. दफ्तर से छुट्टी होने के बाद वह मकान ही देख रहा था. उस ने कई लोगों से कह रखा था. होटल वाला भी उन में से एक था. होटल का मालिक बता रहा था कि वेतन स्वीट्स के पास वाली गली में एक मकान है, 2 कमरे का. बस, एक ही कमी थी… उस की मकान मालकिन.

पर होटल वाले ने इस का एक हल निकाला था कि मकान ले लो और साथ में दूसरा मकान भी देखते रहो. उस मकान में कोई 2 महीने से ज्यादा नहीं रहा है.

‘‘आप मकान बता रहे हो या डरा रहे हो?’’ राहुल बोला, ‘‘मैं उस मकान को देख लूंगा. धर्मशाला से तो बेहतर ही रहेगा.’’

अगले दिन दफ्तर के बाद राहुल अपने एक दोस्त प्रशांत के साथ मकान देखने चला गया. मकान उसे पसंद था, पर मकान मालकिन ने यह कह कर उस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि रात को 10 बजे के बाद गेट नहीं खुलेगा.

राहुल ने सोचा, ‘मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर देर रात हो जाती है…’ वह बोला, ‘‘आंटी, मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर रात को देर हो सकती है.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ आंटी बोलीं, ‘‘अगर पसंद न हो, तो कोई बात नहीं.’’

राहुल कुछ देर खड़ा रहा और बोला, ‘‘आंटी, आप उस हिस्से में एक गेट और लगवा दो. उस की चाबी मैं अपने पास रख लूंगा.’’

आंटी ने अपनी मजबूरी बता दी, ‘‘मेरे पास खर्च करने के लिए एक भी पैसा नहीं है.’’

राहुल ने गेट बनाने का सारा खर्च खुद उठाने की बात की, तो आंटी राजी हो गईं. इस के साथ ही उस ने झगड़े की जड़ पानी और बिजली के कनैक्शन भी अलग करवा लिए. दोनों जगहों के बीच दीवार खड़ी करवा दी. उस में दरवाजा भी बनवा दिया, लेकिन दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ.

सारा काम पूरा हो जाने के बाद राहुल मकान में आ गया. उस ने मकान मालकिन द्वारा कही गई बातों का पालन किया. राहुल दिन में अपने मकान में कम ही रहता था. खाना भी वह होटल में ही खाता था. हां, रात में वह जरूर अपने कमरे पर आ जाता था. उस के हिस्से में ‘खटखट’ की आवाज से आंटी को पता चल जाता और वे आवाज लगा कर उस के आने की तसल्ली कर लेतीं.

उन आंटी का नाम प्रभा देवी था. वे अकेली रहती थीं. उन की 2 बेटियां थीं. दोनों शादीशुदा थीं. आंटी के पति की मौत कुछ साल पहले ही हुई थी. उन की मौत के बाद वे दोनों बेटियां उन को अपने साथ रखने को तैयार थीं, पर वे खुद ही नहीं रहना चाहती थीं. जब तक शरीर चल रहा है, तब तक क्यों उन के भरेपूरे परिवार को परेशान करें.

अपनी मां के एक फोन पर वे दोनों बेटियां दौड़ी चली आती थीं. आंटी और उन के पति ने मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार को पाला था. उन के पास अब केवल यह मकान ही बचा था, जिस को किराए पर उठा कर उस से मिले पैसे से उन का खर्च चल जाता था.

एक हिस्से में आंटी रहती थीं और दूसरे हिस्से को वे किराए पर उठा देती थीं. पर एक मजदूर के पास मजदूरी से इतना बड़ा मकान नहीं हो सकता. पतिपत्नी दोनों ने खूब मेहनत की और यहां जमीन खरीदी. धीरेधीरे इतना कर लिया कि मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा कर आमदनी का एक जरीया तैयार कर लिया था.

राहुल अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. नौकरी पर वह यहां आ गया और आंटी का किराएदार बन गया. दोनों ही अकेले थे. धीरेधीरे मांबेटे का रिश्ता बन गया.

घर के दोनों हिस्सों के बीच का दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ. हमेशा खुला रहा. राहुल को कभी ऐसा नहीं लगा कि आंटी गैर हैं. आंटी के बारे में जैसा सुना था, वैसा उस ने नहीं पाया. कभीकभी उसे लगता कि लोग बेवजह ही आंटी को बदनाम करते रहे हैं या राहुल का अपना स्वभाव अच्छा था, जिस ने कभी न करना नहीं सीखा था. आंटी जो भी कहतीं, उसे वह मान लेता.

आंटी हमेशा खुश रहने की कोशिश करतीं, पर राहुल को उन की खुशी खोखली लगती, जैसे वे जबरदस्ती खुश रहने की कोशिश कर रही हों. उसे लगता कि ऐसी जरूर कोई बात है, जो आंटी को परेशान करती है. उसे वे किसी से बताना भी नहीं चाहती हैं. उन की बेटियां भी अपनी मां की समस्या किसी से नहीं कहती थीं.

वैसे, दोनों बेटियों से भी राहुल का भाईबहन का रिश्ता बन गया था. उन के बच्चे उसे ‘मामामामा’ कहते नहीं थकते थे. फिर भी वह एक सीमा से ज्यादा आगे नहीं बढ़ता था. लोग हैरान थे कि राहुल अभी तक वहां कैस टिका हुआ है.

आज रात राहुल जल्दी घर आ गया था. एक बार वह जा कर आंटी से मिल आया था, जो एक नियम सा बन गया था. जब वह देर से घर आता था, तब यह नियम टूटता था. हां, तब आंटी अपने कमरे से ही आवाज लगा देती थीं.

रात के 11 बज रहे थे. राहुल ने सुना कि आंटी चीख रही थीं, ‘मेरा बच्चा… मेरा बच्चा… वह मेरे बच्चे को मुझ से छीन नहीं सकता…’ वे चीख रही थीं और रो भी रही थीं.

पहले तो राहुल ने इसे अनदेखा करने की कोशिश की, पर आंटी की चीखें बढ़ती ही जा रही थीं. इतनी रात को आंटी के पास जाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी, भले ही उन के बीच मांबेटे का अनकहा रिश्ता बन गया था.

राहुल ने अपने दोस्त प्रशांत को फोन किया और कहा, ‘‘भाभी को लेता आ.’’

थोड़ी देर बाद प्रशांत अपनी बीवी को साथ ले कर आ गया. आंटी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. यह उन के लिए हैरानी की बात थी. तीनों अंदर घुसे. राहुल सब से आगे था. उसे देखते ही पलंग पर लेटी आंटी चीखीं, ‘‘तू आ गया… मुझे पता था कि तू एक दिन जरूर अपनी मां की चीख सुनेगा और आएगा. उन्होंने तुझे छोड़ दिया. आ जा बेटा, आ जा, मेरी गोद में आ जा.’’

राहुल आगे बढ़ा और आंटी के सिर को अपनी गोद में ले कर सहलाने लगा. आंटी को बहुत अच्छा लग रहा था. उन को लग रहा था, जैसे उन का अपना बेटा आ गया. धीरेधीरे वे नौर्मल होने लगीं.

प्रशांत और उस की बीवी भी वहीं आ कर बैठ गए. उन्होंने आंटी से पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने टाल दिया. वे राहुल की गोद में ही सो गईं. उन की नींद को डिस्टर्ब न करने की खातिर राहुल बैठा रहा.

थोड़ी देर बाद प्रशांत और उस की बीवी चले गए. राहुल रातभर वहीं बैठा रहा. सुबह जब आंटी ने राहुल की गोद में अपना सिर देखा, तो राहुल के लिए उन के मन में प्यार हिलोरें मारने लगा. उन्होंने उस को चायनाश्ता किए बिना जाने नहीं दिया.

राहुल ने दफ्तर पहुंच कर आंटी की बड़ी बेटी को फोन किया और रात में जोकुछ घटा, सब बता दिया. फोन सुनते ही बेटी शाम तक घर पहुंच गई. उस बेटी ने बताया, ‘‘जब मेरी छोटी बहन 5 साल की हुई थी, तब हमारा भाई लापता हो गया था. उस की उम्र तब 3 साल की थी. मांबाप दोनों काम पर चले गए थे.

‘‘हम दोनों बहनें अपने भाई के साथ खेलती रहतीं, लेकिन एक दिन वह खेलतेखेलते घर से बाहर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया. ‘‘उस समय बच्चों को उठा ले जाने वाले बाबाओं के बारे में हल्ला मचा हुआ था. यही डर था कि उसे कोई बाबा न उठा ले गया हो.

‘‘मां कभीकभी हमारे भाई की याद में बहक जाती हैं. तभी वे परेशानी में अपने बेटे के लिए रोने लगती हैं.’’ आंटी की बड़ी बेटी कुछ दिन वहीं रही. बड़ी बेटी के जाने के बाद छोटी बेटी आ गई. आंटी को फिर कोई दौरा नहीं पड़ा.

2 दिन हो गए आंटी को. राहुल नहीं दिखा. ‘खटखट’ की आवाज से उन को यह तो अंदाजा था कि राहुल यहीं है, लेकिन वह अपनी आंटी से मिलने क्यों नहीं आया, जबकि तकरीबन रोज एक बार जरूर वह उन से मिलने आ जाता था. उस के मिलने आने से ही आंटी को तसल्ली हो जाती थी कि उन के बेटे को उन की फिक्र है. अगर वह बाहर जाता, तो कह कर जाता, पर उस के कमरे की ‘खटखट’ बता रही थी कि वह यहीं है. तो क्या वह बीमार है? यही देखने के लिए आंटी उस के कमरे पर आ गईं.

राहुल बुखार में तप रहा था. आंटी उस से नाराज हो गईं. उन की नाराजगी जायज थी. उन्होंने उसे डांटा और बोलीं, ‘‘तू ने अपनी आंटी को पराया कर दिया…’’ वे राहुल की तीमारदारी में जुट गईं. उन्होंने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारे मांबाप जब तक आएंगे, तब तक हम ही तेरे अपने हैं.’’

राहुल के ठीक होने तक आंटी ने उसे कोई भी काम करने से मना कर दिया. उसे बाजार का खाना नहीं खाने दिया. वे उस का खाना खुद ही बनाती थीं.

राहुल को वहां रहते तकरीबन 9 महीने हो गए थे. समय का पता ही नहीं चला. वह यह भी भूल गया कि उस का जन्मदिन नजदीक आ रहा है. उस की मम्मी सविता ने फोन पर बताया था, ‘हम दोनों तेरा जन्मदिन तेरे साथ मनाएंगे. इस बहाने तेरा मकान भी देख लेंगे.’

आज राहुल की मम्मी सविता और पापा रामलाल आ गए. उन को चिंता थी कि राहुल एक अनजान शहर में कैसे रह रहा है. वैसे, राहुल फोन पर अपने और आंटी के बारे में बताता रहता था और कहता था, ‘‘मम्मी, मुझे आप जैसी एक मां और मिल गई हैं.’’

फोन पर ही उस ने अपनी मम्मी को यह भी बताया था, ‘‘मकान किराए पर लेने से पहले लोगों ने मुझे बहुत डराया था कि मकान मालकिन बहुत खड़ूस हैं. ज्यादा दिन नहीं रह पाओगे. लेकिन मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं देखा.’’ तब उस की मम्मी बोली थीं, ‘बेटा, जब खुद अच्छे तो जग अच्छा होता है. हमें जग से अच्छे की उम्मीद करने से पहले खुद को अच्छा करना पड़ेगा. तेरी अच्छाइयों के चलते तेरी आंटी भी बदल गई हैं,’ अपने बेटे के मुंह से आंटी की तारीफ सुन कर वे भी उन से मिलने को बेचैन थीं.

राहुल मां को आंटी के पास बैठा कर अपने दफ्तर चला गया. दोनों के बीच की बातचीत से जो नतीजा सामने आया, वह हैरान कर देने वाला था.

राहुल के लिए तो जो सच सामने आया, वह किसी बम धमाके से कम नहीं था. उस की आंटी जिस बच्चे के लिए तड़प रही थीं, वह खुद राहुल था. मां ने अपने बेटे को उस की आंटी की सचाई बता दी और बोलीं, ‘‘बेटा, ये ही तेरी मां हैं. हम ने तो तुझे एक बाबा के पास देखा था. तू रो रहा था और बारबार उस के हाथ से भागने की कोशिश कर रहा था. हम ने तुझे उस से छुड़ाया. तेरे मांबाप को खोजने की कोशिश की, पर वे नहीं मिले.

‘‘हमारा खुद का कोई बच्चा नहीं था. हम ने तुझे पाला और पढ़ाया. जिस दिन तू हमें मिला, हम ने उसी दिन को तेरा जन्मदिन मान लिया. अब तू अपने ही घर में है. हमें खुशी है कि तुझे तेरा परिवार मिल गया.’’ राहुल बोला, ‘‘आप भी मेरी मां हैं. मेरी अब 2-2 मांएं हैं.’’ इस के बाद घर के दोनों हिस्से के बीच की दीवार टूट गई. Hindi Family Story

Loyalty In Love: मेरे 3 बौयफ्रैंड हैं कैसे पता करूं मुझ से सच्चा प्यार कौन करता है

Loyalty In Love: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 23 साल है और मैं शिमला की रहने वाली हूं. मेरे पिताजी बहुत बड़े बिजनैसमैन है और हमारे पास काफी जमी जायदाद है. मैं दिखने में भी काफी सुंदर हूं और इस वजह से मेरे कई बौयफफ्रैंड रह चुके हैं. अभी भी मैं 3 लड़कों के साथ रिलेशनशिप में हूं और हर कोई कहता है कि वह मेरे साथ काफी लौयल है और मुझ से बेहद प्यार करता है. मेरे दिमाग में कई बार एक सवाल आता है कि कहीं वे सब मेरी जमीनजायदाद और पैसों के लिए तो मेरे साथ रिश्ते में नहीं हैं. मेरे घर वाले अकसर मुझ से पूछते हैं कि अगर मैं किसी को पसंद करती हूं तो उन्हें बता दूं ताकि वे मेरी शादी के बारे में सोच पाएं. आप ही मुझे बताइए कि मैं किस लड़के पर विश्वास करूं और किसी पर नहीं? मुझे डर है कि कहीं मेरी शादी किसी ऐसे लड़के से न हो जाए जिसे मुझ से ज्यादा पैसों से प्यार हो.

जवाब –

आप की चिंता जायज है कि आप को एक ऐसा पार्टनर चाहिए जो आप को ज्यादा प्यार करे न कि आप के पैसों से लेकिन आप का तरीका बेहद ही गलत है. आप ने खुद बताया कि आप के 3 बौयफ्रैंड हैं तो आप खुद ही बताइए कि जब आप के अंदर ही किसी के लिए वफादारी नहीं है तो आप को एक वफादार पार्टनर कैसे मिल सकता है.

आप खुद उन लड़कों को धोखे में रख रही हैं सिर्फ यह जानने के लिए कौन आप से प्यार करता है और कौन नहीं. अच्छे पार्टनर ऐसे नहीं ढूंढ़े जाते. जो इनसान आप से सच्चा प्यार करेगा उस का पता आप को खुद लग जाएगा, क्योंकि प्यार करने वाले पार्टनर को आप के पैसों में कोई इंट्रस्ट नहीं होगा.

वह लड़का खुद हर चीज करेगा जो आप को पसंद होगी और साथ ही आप की जिम्मेदारी उठाने लगेगा, क्योंकि अच्छे लड़कों को पैसों से ज्यादा वफादार पार्टनर चाहिए होता है. आप खुद नोटिस करेंगी कि वह लड़का सिर्फ आप के लिए खुद को जिम्मेदार बनाने लगेगा और साथ ही आप की केयर भी करेगा. अगर आप ऐसा लड़का तलाशने में असफल रहीं तो आप अपने मातापिता से कह कर अरेंज मैरिज भी कर सकती हैं, क्योंकि हमारे मांबाप के पास हम से ज्यादा ऐक्सपीरियंस होता है, तो वे आप के लिए जरूर अच्छा लड़का तलाश कर लेंगे.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Loyalty In Love

Hindi Story: मालती – पति के शराब की लत देखकर क्या था मालती का फैसला

Hindi Story: कदमों के लड़खड़ाने और कुंडी खटखटाने की आवाज सुन कर मालती चौकन्नी हो उठी और बड़बड़ाई, ‘‘आज फिर…?’’

आंखों में नींद तो थी ही नहीं. झटपट दरवाजा खोला. तेजा को दुख और नफरत से ताकते हुए वह बुदबुदाई, ‘‘क्या करूं? इन का इस शराब से पिंड छूटे तो कैसे?’’

‘‘ऐसे क्या ताक रही है? मैं… कोई तमाशा हूं क्या…? क्या… मैं… कोई भूत हूं?’’ तेजा बहकती आवाज में बड़बड़ाया.

‘‘नहीं, कुछ नहीं…’’ कुछ कदम पीछे हट कर मालती बोली.

‘‘तो फिर… एं… तमाशा ही हूं… न? बोलती… क्यों नहीं…? ’’ कहता हुआ तेजा धड़ाम से सामने रखी चौकी पर पसर गया.

मालती झटपट रसोईघर से एक गिलास पानी ले आई.

तेजा की ओर पानी का गिलास बढ़ा कर मालती बोली, ‘‘लो, पानी पी लो.’’

‘‘पी… लो? पी कर तो आया हूं… कितना… पी लूं? अपने पैसे से पीया… अकबर ने भी पिला दी… अब तुम भी पिलाने… चली हो…’’

मालती कुछ बोलती कि तेजा ने उस के हाथ से गिलास झपट कर दीवार पर पटकते हुए चिल्लाया, ‘‘मजाक करती है…एं… मजाक करती है मुझ से… पति के साथ… मजाक करती है. …पानी… पानी… देती है,’’ तेजा उठ कर मालती की ओर बढ़ा.

मालती सहम कर पीछे हटी ही थी कि तेजा डगमगाता हुआ सामने की मेज से जा टकराया. मेज एक तरफ उलट गई. मेज पर रखा सारा सामान जोर की आवाज के साथ नीचे बिखर गया. खुद उस का सिर दीवार से जा टकराया और गुस्से में बड़बड़ाता हुआ वह मालती की ओर झपट पड़ा.

मालती को सामने न पा कर तेजा फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.

तेजा के सामने से हट कर मालती एक कोने में दुबकी खड़ी थी. उसे काटो तो खून नहीं. वह एकटक नशे में धुत्त अपने पति को देख रही थी. उस का कलेजा फटा जा रहा था.

तेजा के रोने की आवाज सुन कर बगल के कमरे में सोए दोनों बच्चों की नींद टूट गई. आंखें मलती 10 साल की मुन्नी और उस के पीछे 8 साल का बेटा रमेश पिता की ऐसी हालत देख कर हैरानपरेशान थे.

पिता के इस तरह के बरताव के वे दोनों आदी थे. आज पिता के रोने से उन्हें बड़ी तकलीफ हो रही थी, पर मां के गालों से लुढ़कते आंसुओं को देख कर वे और भी दुखी हो गए.

बेटी मुन्नी मां का हाथ पकड़

कर रोने लगी. रमेश डरासहमा कभी बाप को देखता, तो कभी मां के आंसुओं को.

तेजा को लड़खड़ा कर खड़ा होता देख तीनों का कलेजा पसीज गया.

तभी तेजा मालती पर झपट पड़ा, ‘‘मुझे भूख नहीं लगती क्या?… तुझे मार डालूंगा… तुम ने मुझे नीचे… गिरा दिया और… आंसू बहा रही है… झूठमूठ

के आंसू… तुम ने मुझे मारा… मैं ने

तेरा क्या बिगाड़ा?… एं… क्या बिगाड़ा… बता…?’’

मालती के बाल उस के हाथों

की गिरफ्त में आ गए. वह उन्हें छुड़ाने की नाकाम कोशिश करने लगी. बेटी मुन्नी जोरों से रोने लगी. रमेश अपने पिता का हाथ अपने नन्हे हाथों से पकड़ कर हटाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

मालती ने चिल्ला कर रमेश को मना किया, पर वह नहीं माना. इस बीच तेजा ने रमेश को धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. उस का सिर फर्श से टकराया और देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा.

खून देख कर मालती बदहवास हो कर चिल्ला पड़ी, ‘‘खून… रमेश… मेरे बेटे के सिर से खून…’’

खून देख कर तेजा का हाथ ढीला पड़ा.

मालती और मुन्नी दहाड़ें मार कर रोने लगीं. पड़ोसियों ने आ कर सारा माजरा देखा और रमेश को अस्पताल ले जा कर मरहमपट्टी करवाई. खाना रसोईघर में यों ही पड़ा रहा. मालती रातभर रमेश को सीने से लगाए रोती रही. नींद आंखों से गायब थी.

अपनी औलाद के लिए घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर थी मालती. मन ही मन उस ने तेजा से हार मान ली थी. हालात से समझौता कर मालती ने मान लिया था कि यही उस की किस्मत में लिखा है.

पर, तेजा ने शराब से हार नहीं मानी. रात के अंधेरे में तेजा राक्षस बन कर घर में कुहराम मचाता, तो दिन की रोशनी में भले आदमी की तरह मुसकान बिखेरता मालती और बेटीबेटे को लाड़प्यार करता. ऐसा लगता कि जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं. पर अंदर ही अंदर मालती की घुटन एक चिनगारी का रूप लेने लगी थी.

एक दिन तो मालती की खिलाफत ने अजीब रंग दिखाया. उस दिन मालती ने दोनों बच्चों को स्कूल जाने से रोक दिया.

तेजा ने पूछा, ‘‘क्या आज स्कूल बंद है? ये तैयार क्यों नहीं हो रहे हैं?’’

‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. इसी वजह से इन्हें रोक लिया,’’ मालती गंभीर हो कर बोली.

‘‘तो मैं आज काम पर नहीं जाता. तुम्हारे पास रहूंगा. इन्हें जाने दो,’’ तेजा बोला.

‘‘नहीं, ये आज नहीं जाएंगे. मेरे पास ही रहेंगे,’’ मालती बोली.

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. ज्यादा तबीयत खराब हो, तो मुझे बुलवा लेना. डाक्टर के  पास ले जाऊंगा,’’ तेजा बड़े प्यार से बोला.

मालती और बच्चों को छोड़ तेजा काम पर चला गया.

एक घंटे बाद मालती ने मुन्नी के हाथों शराब की भट्ठी से 4 बोतल शराब मंगवाई. दरवाजा बंद कर धीरेधीरे एक बोतल वह खुद पी गई. फिर मुन्नी व रमेश को पिलाने लगी. मुन्नी ज्यादा पीने की वजह से रोने लगी.

रमेश भी रोता हुआ बड़बड़ाने लगा, ‘‘मम्मी, अच्छी नहीं लग रही है. अब मत पिलाओ मम्मी.’’

‘‘पी लो, थोड़ी और पी लो… देखो, मैं भी तो पी रही हूं…’’ रुकरुक कर मालती बोली और दोनों के मुंह में पूरा गिलास उडे़ल दिया. दोनों ही फर्श पर निढाल हो कर गिर पड़े. मालती ने दूसरी बोतल भी पी डाली और वह भी फर्श पर लुढ़क गई.

थोड़ी देर बाद बच्चे उलटी करने लगे और चिल्लाने लगे.

बच्चों की दर्दभरी कराह और चिल्लाहट सुन कर पड़ोसी दरवाजा तोड़ कर घर में घुसे. वहां की हालत देख कर सभी हैरान रह गए. कमरे में शराब की बदबू पा कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि तेजा की हरकतों से तंग आ कर ही मालती ने ऐसा किया है.

पड़ोसियों ने तीनों को अस्पताल पहुंचाया.

खबर पा कर तेजा अस्पताल की ओर भागा. मालती और बच्चों का हाल देख कर वह पछाड़ खा कर गिर पड़ा और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘बचा लो भैया… इन्हें बचा लो… मेरी मालती को बचा लो… मेरे बच्चों को बचा लो…’’ कहता हुआ तेजा अपनी छाती पीट रहा था.

‘‘और शराब पियो तेजा… और पियो… और जुल्म करो अपने बीवीबच्चों पर… देख लिया…’’ एक पड़ोसी ने गुस्साते हुए कहा.

‘‘नहीं, नहीं… मैं कुसूरवार हूं… मेरी वजह से ही यह सब हुआ… उस ने कई बार मुझे समझाने की कोशिश की, पर मैं ही अपनी शराब की बुरी आदत की वजह से मामले को समझ नहीं पाया,’’ रोतेरोते तेजा बोला.

करीब एक घंटे बाद डाक्टर ने आ कर बताया कि दोनों बच्चे तो ठीक हैं, पर मालती ने दम तोड़ दिया है. उसे बचाया नहीं जा सका. उस पर शराब के  असर के अलावा दिमागी दबाव बहुत ज्यादा था.

तेजा फूटफूट कर रोने लगा. उसे अक्ल तो आ गई थी, पर इतनी अच्छी बीवी को खोने के बाद. Hindi Story

Story In Hindi: अंधविश्वास का जाल – कैसी थी मनोरमा देवी

Story In Hindi: आज फिर सुबह से घर में उठापटक शुरू हो गई थी. मनोरमा देवी से सब को हिदायत मिल रही थी, ‘‘जल्दीजल्दी सब अपना काम निबटा कर तैयार हो जाओ. आज गुरुजी आएंगे. उन्हें इतनी अफरातफरी पसंद नहीं है.

‘‘और हां, जैसे ही गुरुजी आएं, तब सब उन के चरणों को धो कर चरणामृत लेना और साष्टांग प्रणाम करना. गुरुजी को भी तो पता चले कि मनोरमा देवी अपने बच्चों को कितने अच्छे संस्कार दे रही हैं.’’

मनोरमा देवी के अंदर अहम की भावना कूटकूट कर भरी थी, जो अपने हर काम में किसी न किसी बहाने खुद को ऊंचा रखने की कोशिश में लगी रहती थीं, चाहे वह काम ईमानदारी

का हो या फिर बेईमानी का.

छोटी बहू शिवानी सोच में पड़ गई, ‘गुरुजी के चरणों को धो कर पीना पड़ेगा… नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती. मांजी भी पता नहीं किस दुनिया में जीती रहती हैं. मैं उन से जा कर कह देती हूं कि ऐसा नहीं कर पाऊंगी.

‘पर कहीं मांजी का गुस्सा मेरे ऊपर ही फूट गया तो क्या होगा? मैं उस चरणामृत को फेंक दूंगी…’ और वह घर के कामों में लग गई.

गुरुजी आते हैं. उन के आवभगत में पूरा परिवार लगा हुआ था. गुरुजी अपनी सेवा का आनंद ले रहे थे. मनोरमा देवी अपनी बहुओं पर कड़ी निगरानी रख रही थीं. गुरुजी के स्वागत में कोई कमी न रह जाए.

दोनों बहुएं आपस में कानाफूसी कर रही थीं कि पता नहीं गुरुजी ने क्या जादूटोना कर दिया है मांजी के ऊपर. गुरुजी के कहने पर वे अपना सबकुछ लुटाने को तैयार रहती हैं.

बड़ी बहू ऊषा ने झेंपते हुए कहा, ‘‘मैं यह नाटक कई सालों से देखती आ रही हूं. अब तुम भी झेलो. मेरा मानो तो इस नाटक में तुम भी शामिल हो जाओ, इसी में ही तुम्हारी भलाई है.

‘‘मैं ने एक बार गुरुजी के खिलाफ आवाज उठाई थी, तो मेरे ऊपर किसी देवी की छाया कह कर मेरी बोलती बंद कर दी गई थी, जिस का शिकार मैं आज तक हूं.’’

‘‘ऐसा क्या कहा था आप ने गुरुजी को?’’ शिवानी ने पूछा.

‘‘गुरुजी की आदतें मुझे पसंद नहीं थीं. मैं ने सोहम से बात करने की कोशिश की, पर सोहम मेरी बातों को नहीं माना. सोहम ने मुझे ही समझा दिया था, ‘जब मैं एक बार बीमार पड़ा था, तो जब कोई डाक्टर मुझे ठीक नहीं कर पाया, तो गुरुजी की तंत्र विद्या ने ही मुझे ठीक किया था.’

‘‘इस के बाद गुरुजी और मांजी के कहने पर मुझे गांव से दूर जंगल में ले जा कर गरम चिमटे से मारना शुरू कर दिया गया. मेरी एक भी नहीं सुनी गई. मुझे सख्त हिदायत दी गई कि अगर कभी भी गुरुजी के खिलाफ आवाज उठाई, तो यहीं इस जंगल में ला कर

मार देंगे.

‘‘सच कहूं, तो इतना सब होने के बावजूद गुरुजी की हरकतें मुझे बिलकुल पसंद नहीं आती थीं. वे बारबार मेरे हाथ के बने भोजन की तारीफ करने के बहाने अपने पास बुलाते रहते थे.’’

गुरुजी के बारे में जब भी ऊषा सोहम से कुछ कहती, तो वह उस की बातें टाल देता था. वह अपनी कमी को छिपा कर सोहम ऊषा के बांझ होने की अफवाह फैला रहा था. इस अफवाह से लोग उस से नफरत करते थे. उस का सुबह मुंह देखना पसंद नहीं करते थे.

ऊषा के मुंह से ये सारी बातें सुन कर शिवानी हक्कीबक्की रह गई. वह मन ही मन उधेड़बुन में लग गई और रात का इंतजार करने लगी.

गुरुजी का समय तंत्र विद्या के लिए तय था. गुरुजी के आदेशानुसार पूजा की सारी सामग्री आ गई थी, जिस में एक जोड़ा सफेद कबूतर भी थे, जिन की बलि अगले दिन देनी थी.

यह देख कर शिवानी की रूह कांप गई. भला ये कैसे गुरुजी हैं, जो जीव हत्या को पूजा का नाम दे रहे हैं?

रात में गुरुजी एक कोठरी में आसीन होते थे. वहां सब हाथ जोड़ कर बैठते थे. यह पूजा शिवानी के नाम ही रखी गई थी. शिवानी भी वहां आई.

मनोरमा देवी ने शिवानी का परिचय गुरुजी को देते हुए कहा, ‘‘गुरुजी, यह मेरी छोटी बहू और छोटे बेटे सोहन की पत्नी है. काफी बड़े घराने की है. अच्छी पढ़ीलिखी है. जितनी यह देखने में खूबसूरत है, उतनी ही होशियार भी है. जिस चीज को छू देती है, वह चीज सोना हो जाती है. पर एक ही कमी है कि

यह अभी तक इस घर का चिराग नहीं दे पाई है.’’

शिवानी पसोपेश में पड़ गई कि मांजी उस की तारीफ कर रही हैं या फिर उसे नीचा दिखा रही हैं. लेकिन वह होशियार थी और भांप गई मनोरमा देवी की बातों को.

गुरुजी शिवानी को देख कर मन ही मन न जाने कितने सपनों को बुने जा रहे थे. वे अपनी तंत्र विद्या को भुला कर शिवानी को एकटक देखे जा रहे थे.

इतने में पंखों के फड़फड़ाने की आवाज आने लगी. शिवानी ने नजर दौड़ाई, तो उन कबूतरों पर चली गई.

‘मैं इन्हें मरते हुए कैसे देख सकती हूं. कैसे आजादी दिलाऊं इस जोड़े को ढोंगी से. दीदी सच ही कह रही थीं

इस पाखंडी के बारे में…’ शिवानी सोच रही थी.

पूजा खत्म होने के बाद गुरुजी ने शिवानी के सिर पर हाथ फेरते हुए ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ का आशीर्वाद दे दिया. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘मुझे ये कबूतर दे दीजिए. मैं इन्हें खुले आसमान में उड़ाना चाहती हूं.’’

गुरुजी भांप गए कि शिवानी उन की तंत्र विद्या को नाकाम कराना चाहती है.

वे उस से पूछ बैठे, ‘‘क्या तुम्हें मेरा आना यहां पसंद नहीं?’’

शिवानी बोल उठी, ‘‘नहीं गुरुजी, ऐसा कुछ नहीं है, पर मुझे इन बेजबानों की हत्या बरदाश्त नहीं होती.’’

गुरुजी सोच में पड़ गए, फिर वे बोले, ‘‘तुम इस घर की छोटी बहू हो, इसलिए मै तुम्हें अधिकार देता हूं कि तुम इस जोड़े को ले जा सकती हो.’’

शिवानी ने कबूतर के उस जोड़े को आसमान में छोड़ दिया. गुरुजी ने पिंजरे पर सफेद कपड़ा डाल दिया.

सुबह कबूतर के जोड़े को पिंजरे में न देख कर घर वाले काफी हैरान हुए, पर गुरुजी से पूछने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही थी.

लड़खड़ाती आवाज में मनोरमा देवी पूछ बैठीं, ‘‘गुरुजी, कबूतर का जोड़ा कहां है?’’

गुरुजी तपाक से बोल उठे, ‘‘तुम्हारे घर में किसी चुड़ैल का वास है, जो हमारी तंत्र विद्या में विघ्न डाल रही है. उस ने बलि दिए जाने वाले जोड़े को अपने हक में ले लिया है. आने वाला समय आप सब के लिए कठिन होगा. इस से बचने के लिए तुम्हें बहुत बड़ा अनुष्ठान करना पड़ेगा.’’

इस के बाद गुरुजी अपने आश्रम की ओर चल दिए. मनोरमा देवी गुरुजी की बात से परेशान रहने लगीं. धीरेधीरे वे बीमार रहने लगीं.

शिवानी से रहा नहीं गया. उस ने बताया, ‘‘हमारे परिवार पर किसी चुड़ैल का साया नहीं है. कबूतर के उस जोड़े को मैं ने आजाद किया था और वह पाखंडी गुरु भी इस बात को जानता था. वह अंधविश्वास के जाल में फंसा कर हमें और ज्यादा लूटना चाहता था. अब हम सब उस की तंत्र विद्या से आजाद हैं.’’

मनोरमा देवी को सारी बात समझ में आ गई थी. वे सब से कहे जा रही थीं, ‘‘मेरी बहू का जवाब नहीं.’’ Story In Hindi

Hindi Story: लाला भाई

Hindi Story: विजय शंकर श्रीवास्तव उर्फ लाला भाई को अपने गांव का सरपंच बनने की सनक थी, पर उन्हें वोट नहीं मिलते थे. इस चक्कर में उन्होंने गांव की हर जाति को साधना चाहा, पर क्या वे कामयाब रहे? टना में बोरिंग रोड पर बने अपने दफ्तर से दोपहर बाद की छुट्टी ले कर जब मैं सड़क पर आटोरिकशा का इंतजार कर रहा था तो वहां अचानक एक बेहद दुबलापतला, गंजा, ठिगना आदमी भगवा कपड़ों में भूरे रंग के देशी कुत्ते के साथ घूमता मिला.

उस ने कुत्ते को मजबूत डोरी से बांध रखा था और बीचबीच में उसे प्यार से सहलाता भी था. उस ने खुद के साथ कुत्ते को भी लाल रंग का लंबा तिलक लगा रखा था.  वह आदमी थोड़ा दिलचस्प लगा. थोड़ा और नजदीक आने पर महसूस हुआ कि शायद इस आदमी से मेरी कहीं मुलाकात हो चुकी है. दिमाग पर थोड़ा जोर लगाया तो याद आया कि यह तो लाला भाई है, जिस से मेरी मुलाकात आज से तकरीबन एक साल पहले सासाराम के तहसीलदार दफ्तर में हुई थी और यह आदमी तो अपने गांव का मुखिया बनना चाहता था. लेकिन पंचायत का इलैक्शन हुए तो 2 महीने हो चुके हैं, फिर यहां यह कैसे घूम रहा है? इस ड्रैस में आने का क्या मतलब है? क्या बुरा हो गया इस के साथ?

मैं यह सब सोच ही रहा था कि उस ने अचानक चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘जनता पर यकीन मत करना, सब दोगले होते हैं…’’ और फिर वह बहुत जोरजोर से हंसने लगा और काफी देर तक पागलों की तरह हंसता ही रहा. लेकिन यह पहले तो ऐसा नहीं था, बल्कि यह तो हुआ इनसान था, कम से कम मु? से हुई मुलाकात के हवाले से तो मैं यह कह ही सकता हूं. लेकिन, इस हालत में यहां कैसे? यादों को ताजा करने की कोशिश की तो सबकुछ परत दर परत याद आने लगा. आज से तकरीबन सालभर पहले, उस दिन अपने तहसीलदार दोस्त से मिलने के लिए मैं सुबह 10 बजे सासाराम में उन के दफ्तर पहुंच गया था.

वे दफ्तर में ही थे और लोगों से मिल कर उन की समस्याएं सुन रहे थे. मैं दफ्तर के बाहर लगी कुरसियों पर बैठ कर उन के खाली होने का इंतजार करने लगा. इस के साथ ही रास्ते में खरीदा गया अखबार उलटने लगा. थोड़ी देर में, मेरी बगल वाली सीट पर तकरीबन 55 साल का एक ठिगना दुबलापतला और गंजा इनसान कर बैठ गया. उसने  पूछा, ‘‘साहब कितनी देर से बैठे हैं?’’ मैं ने कहा, ‘‘काफी देर से.’’
वे सज्जन किसी औरत के खेत तक जाने वाले सरकारी रास्ते की पैमाइश चाहते थे और उस औरत का प्रार्थनापत्र ले कर तहसील आए थे. उन के हाथ में जो आवेदनपत्र था, जिस पर मारफत पूर्व मुखिया उम्मीदवार विजय शंकर लिखा था.

मेरी दिलचस्पी उन में बढ़ गई और मैं ने उन से बातचीत शुरू की. थोड़ी देर की बातचीत के बाद उन्होंने अपना पूरा संघर्ष  बयां किया. उन का नाम विजय शंकर श्रीवास्तव उर्फ लाला भाई था. 10वीं जमात तक पढ़े लाला भाई अपनी ग्राम पंचायत खुटहा का यह चौथा इलैक्शन लड़ने की तैयारी कर रहे थे, जो आगामी 10 महीने में होने वाले थे. इस से पहले के 3 पंचायत इलैक्शन वे हार चुके थे, जिन में से 2 मुखिया पद के लिए थे. पहली बार में, जहां वे 7वें नंबर पर थे, वहीं पिछले पंचायत चुनाव में वे तीसरे नंबर पर चुके थे. उन की केवल एक इच्छा थी कि वे अपनी ग्राम पंचायत खुटहा के एक बार मुखिया बन जाएं. इस के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे.

लाला भाई का गांव बिहार के सासाराम जिले में पड़ता था. 5,000 वोटर वाला गांव, जिस में यादव, कुर्मी और दलित ही मुख्य जातियां थीं. लेकिन, गांव में दबदबा कुर्मियों का था, क्योंकि वे पढ़ेलिखे और ज्यादा अमीर थे. यही नहीं, गांव के यादव भी काफी अमीर थे, लेकिन उन के उज्जड़पन, अक्खड़पन के चलते ज्यादातर गांव वाले उन से कम मेलजोल रखते थे. वहीं, गांव के दलित खेती और ईंटभट्ठे पर मजदूरी करते थे और ज्यादातर गांव के कुर्मियों के खेतों से ही अपने घर चलाते थे. वे लोग यादवों के यहां मजदूरी इसलिए नहीं करते थे, क्योंकि यादव लोग उन से ठीक से बात नहीं करते थे और उन के घर की बहूबेटियों पर गंदी नजर थे. लाला भाई की जातबिरादरी के लोग गांव में केवल 4 घर थे. कुल जमा 40 वोट, लेकिन उनका किसी से कोई बैर नहीं था. खेती भी जो थोड़ीबहुत थी, उसे उन लोगों ने दलितों को बंटाई पर दे दिया था.
गांव में इन जातियों के अपनेअपने महल्ले थे.

पंचायत की राजनीति शुरू करने के अपने शुरुआती दिनों में लाला भाई रोज सुबह खापी कर अपनी साइकिल ले कर पूरे गांव एक चक्कर मारते थे. गांव के लोगों से दुआसलाम के बाद, उन का बड़ा काम सरकारी योजनाओं तक गांव के लोगों की पहुंच पक्की करवाना और तहसील, पंचायत, थाना में लोगों की समस्याओं को डील कराना था. वे मानते थे कि इसी तरह वे गांव की जनता के दिल में उतर सकते हैं और उन का वोट ले सकते हैं. उन्होंने कभी इन सुविधाओं तक लोगों की पहुंच के लिए सरकारी महकमे में दिए जाने वाले सुविधा शुल्क को भी गांव के लोगों से नहीं लिया, बल्कि अपने घर से जो पिता के रिटायरमैंट का मिला पैसा था, उसे खर्च कर के मदद की. उन का मानना था कि एक बार मुखिया बनने के बाद, इन सब खर्चों की रिकवरी हो जाएगी. अभी सिर्फ गोल पर फोकस रहने की जरूरत है.

पहले पंचायत चुनाव में भाग लेने तक उन्होंने अपने रिटायर्ड पिता के फंड का आधा पैसा खर्च कर दिया था. फिर बड़े जोरशोर से परचा भी दाखिल किया और बहुत दिव्य और भव्य तरीके से अपना प्रचार किया. हालांकि वे केवल 40 वोट पा कर 7वें नंबर पर पहुंचे. यही हाल दूसरे पंचायत चुनाव में भी रहा. इस चुनाव में उन्हें बहुत कोशिश के बाद केवल 90 वोट हासिल हुए और तीसरे नंबर तक उन की गाड़ी पहुंच सकी.
2 बार की इस हार और बाप के रिटायरमैंट के फंड का 10 लाख रुपए खर्च करने के बाद उन के घर में भयानक कलह हो गई. उन के छोटे भाई ने उन्हें घर का पैसा बरबाद करने का दोषी ठहरा दिया. इस तरह से उन्हें घरपरिवार में अलग कर दिया गया और 2 एकड़ खेत और घर में एक कमरा उन के रहनेखाने के लिए दे दिया गया. इस तरह से उन के घर का बंटवारा हो गया.

2 पंचायत चुनाव हार जाने के बाद, लाख कोशिश के बाद भी यह बात उन्हें में नहीं आई कि जिस जनता के लिए, जिस के सुखदुख में वह चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं, वही उन्हें मुखिया लायक क्यों नहीं है? खैर, अब उन्होंने अपने हार की वजह की खोज शुरू की. उन के शुभचिंतक लोगों ने कहा कि बिना जातबिरादरी को साधे कोई चुनाव नहीं जीत सकता है. पहले कुछ जातियों पर पकड़ बनाओ, फिर वे ही तुम्हारा वोट बैंक बनेंगी. हर दिशा में तीर नहीं मारो. उन्होंने मामले को और गहराई में को ले कर बड़ी माथापच्ची की. ग्रहदशा ठीक करने का अनुष्ठान करवाया. बद्रीनाथ का दर्शन भी किया. इस के लिए उन्हें अपने 2 एकड़ खेत का आधा हिस्सा गिरवी रखना पड़ा. एक दिन एक ज्योतिषी उन के गांव में आया. उन का हाथ देख कर उस ने कहा कि जब तक शादी नहीं करोगे तुम चुनाव नहीं जीत पाओगे.

फिर क्या था. उन्होंने एक महीने के भीतर 55 साल की उम्र में 28 साल की एक ऐसी लड़की से शादी की जिस के मांबाप दोनों नहीं थे और जिस की परिवरिश उस की एक कथित मौसी ने की थी, जिसे उन्हें 30,000 रुपए देने पड़े. वह लड़की एक 4 महीने के बच्चे के साथ ससुराल आई थी. वह ससुराल में 5 महीने रही और बाद में गांव के ही एक दुसाध लड़के के साथ दिल्ली भाग गई, जो वहीं मजदूरी करता था.
खैर, इस घटना के बाद भी वे अपने लक्ष्य पर लगे रहे. चतुर लोगों से राय ली. अब उन्होंने तय किया कि वे यादवों को अपना वोट बैंक बनाएंगे. उन का विश्वास कुर्मियों पर इसलिए नहीं जमा, क्योंकि कुर्मी बहुत ज्यादा दिमाग खर्च करते हैं. वहां थोड़ा कम चांस हैं. फिर यादव समाज में उन्होंने जगह पाने की कोशिश में काफी पैसा खर्च किया. गांव के लोगों ने उन का भरपूर दोहन किया.

वे दलितों पर दांव इसलिए नहीं लगा सकते थे, क्योंकि बिना दारूनकदी के यह बिरादरी वोट नहीं देती. इस पर वे आखिर में दांव लगाते, यही सोच कर उन्हें इग्नोर किया. यादव बिरादरी को मैनेज करने के लिए उन्हें 5 लाख रुपए पर अपना बाकी खेत गिरवी रखना पड़ा. लेकिन, तीसरे चुनाव में उन्हें यह कह कर वोट नहीं दिया गया कि उन की जाति के लोग दब्बू होते हैं. यादव लोग एक दब्बू को अपना वोट नहीं दे सकते. वे फिर से चुनाव हार गए. असल में वे निहायत ही भावुक किस्म के आदर्शवादी इनसान थे. लेकिन गांव में उन की इमेज एक ऐसे बेवकूफ और पागल की थी, जिसे कोई भी गंभीरता से नहीं लेता. यहीं नहीं, गांव में जातीय तनाव के चलते मुखिया का चुनाव वही जीत सकता था जो कम से कम यादव या दलित बिरादरी का एकतरफा समर्थन हासिल करे.

यही नहीं, उस की अपनी जाति का भी एक मजबूत आधार उस के साथ होना चाहिए. लाला भाई का अपने खुद के समाज या बिरादरी का कोई खास वोट गांव में नहीं था. उन की दोस्ती गांव के यादवों से थी जरूर, लेकिन वे लोग मानते थे कि लाला एक डरपोक जाति है. यह आदमी हमारा प्रतिनिधि नहीं हो सकता.
फिर गांव में यादव और कुर्मी कुशवाहा जाति के लोगों में आपसी तनाव रहता था, जिस का फायदा चुनाव में दलित उठाते थे. वे दोनों तरफ से माल खाते थे. दलितों ने लाला भाई का कुछ इस्तेमाल देशी ठर्रे से ले कर विदेशी शराब खरीदवाने तक में किया. चुनाव लड़ने की इस सनक ने उन्हें बड़ा कर्जदार बना दिया था. मैंने उन की कहानी जानने के बाद आगे पूछा, ‘‘आप मुखिया बनना ही क्यों चाहते हैं?’’
खैनी मलते हुए मुसकरा कर वे बोले, ‘‘बस, लोगों की सेवा करना चाहते हैं सर, अपना नाम करना
चाहते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘लेकिन इतनी बार हारने से तो लगता है कि लोग आप से सेवा करवाने के इच्छुक ही नहीं हैं. फिर आप क्यों परेशान हैं?’’ लाला भाई ने कहा, ‘‘हां, लेकिन 6 नंबर से 3 नंबर पर गए हैं तो अगले चुनाव में मुखिया बन ही जाएंगे.’’
मैं ने पूछा, ‘‘गांव में आप की बिरादरी के कितने वोट हैं?’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘40 वोट.’’
मैं ने पूछा, ‘‘इतने कम वोट में बिहार जैसे जाति केंद्रित समाज में कैसे बनेंगे मुखिया?’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘जैसे छठवें नंबर से तीसरे नंबर पर गए, वैसे ही बन भी जाएंगे.’’
मैं ने कहा, ‘‘बड़ा सब्र है भाई आप के पास…’’
फिर उन्होंने मुसकरा कर आगे कहा, ‘‘अभी मु? पर 8 लाख रुपए का कर्ज है, जिसे मैं ने जनता की सेवा के लिए अपना 2 एकड़ खेत एक रुपए सैकड़ा पर ले कर गिरवी रखा है.’’ अचरज हुआ कि कितना
अजीब आदमी है, जो मुखिया बनने के पागलपन में इतना बड़ा कर्जदार हो चुका है.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘5 दिन हुए पिताजी मर गए. घर में होना चाहिए, लेकिन यहां हूं. साहूकारों का दबाव बहुत है कि पैसा लौटाओ नहीं तो खेत की रजिस्ट्री करो. लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा. इस बार किसी भी कीमत पर मुखिया बनना ही है.
‘‘हमारे आदर्श सुभाष चंद्र बोस हैं. संघर्ष में पीछे नहीं हटना है. उन से प्रेरणा मिलती रहती है. दिनरात एक कर दिया है मेहनत में.’’
मैं ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने तो कभी मुखिया का चुनाव नहीं लड़ा था.’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘जी, सही
कहा. वे भी हमारी बिरादरी के थे, कायस्थ थे सर. इसीलिए वे हमारे
आदर्श हैं. उन्होंने आखिरी दम तक संघर्ष किया, मैं भी आखिरी सांस तक संघर्ष करूंगा. हम मिट जाएंगे लेकिन पीछे नहीं हटेंगे.’’
मैं ने कहा कि अच्छी बात है और फिर लाला भाई की पर मुसकराने लगा. लगा कि इस आदमी की
सोच इतनी गंदी है कि एक महान क्रांतिकारी केवल इसलिए इस का नेता है, क्योंकि वह भी इस की बिरादरी या जात का था
मैं ने कहा, ‘‘आप सही जा रहे हैं. आप एक दिन जरूर मुखिया बनेंगे.’’
उस ने से हाथ जोड़ कर नमस्कार  किया और कमरे में चला गया.
आटोरिकशा ड्राइवर के हौर्न से
मेरा ध्यान टूटा. उस ने पूछा, ‘‘कहां जाना है सर?’’
मैं ने कहा, ‘‘महेश्वरी कालोनी,
डी ब्लौक, बंगला नंबर 2 ले चलो भाई.’’

इस के बाद आटोरिकशा बढ़ चला और लग गया कि जरूर इस चुनाव में भी यह हार गया होगा और साहूकारों ने इस का गिरवी रखा खेत हड़प लिया होगा, जिस के गम में यह पागल हो
गया है. इस आदमी का मुखिया बनने का नशा इसे इस तबाही की हद तक ले आया कि आज यह कुत्ते के साथ घूम रहा है. मैं इस के साथ उस दुखद घटना की कल्पना भर कर सकता था, जो इस के साथ घटी होगी. तकरीबन 10 मिनट के बाद मेरे घर का गेट गया. 20 रुपए ड्राइवर को दे कर दुखी मन से मैं घर के भीतर चला गया. गांव और पंचायत के सियासी दांवपेंच में एक आदमी केवल तबाह हो गया था, बल्कि पागल हो चुका था

हरे राम मिश्र                              

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें