Dr Ak Jain: अंडकोष के दर्द को न करें अनदेखा

मैडिकल साइंस की एक पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ सालों से पुरुषों में अंडकोष के कैंसर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. अंडकोष में कैंसर 6 माह के अंदर खतरनाक हालत में पहुंच जाता है. इस का फैलाव पेड़ से दिमाग तक हो सकता है.

 पुरुष अंडकोष के दर्द को सामान्य रूप में लेते हैं जिस की वजह से वे डाक्टर के पास देर से जाते हैं. कुछ डाक्टर के पास जाते भी हैं तो डाक्टर पहचानने में गलती कर जाते हैं. साधारण बीमारी समझ कर उस का इलाज कर देते हैं. अधिकतर भारतीय पुरुष  अंडकोष के कैंसर से अनजान हैं जिस की वजह से वे अपने अंडकोष में आए परिवर्तन की ओर ध्यान नहीं देते हैं. जब समस्या बढ़ जाती है तब डाक्टर के पास पहुंचते हैं.

अगर आप भी ऐसी ही किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो संपर्क करिए लखनऊ के डॉक्टर ए. के. जैन से जो पिछले 40 सालों से इन समस्याओं का इलाज कर रहे हैं.

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हर पुरुष को चाहिए कि वह अपने अंडकोष  में आए परिवर्तन पर ध्यान रखे. अंडकोश में दर्द, सूजन, आसपास भारीपन, अजीब सा महसूस होना, लगातार हलका दर्द बना रहना, अचानक अंडकोष के साइज में काफी अंतर महसूस करना, अंडकोष पर गांठ, अंडकोश का धंसना आदि लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डाक्टर से मिलना चाहिए. पुरुषों में यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है.

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अंडकोष  कैंसर के कारण

किसी भी व्यक्ति के अंडकोष में कैंसर उत्पन्न हो सकता है. इस के होने की कुछ वजहें ये हैं :

क्रिस्टोरचाइडिज्म :

यदि किसी युवक के बचपन से ही अंडकोश शरीर के अंदर धंसे रहें तो उसे अंडकोष कैंसर की समस्या हो सकती है. क्रिप्टोरचाइडिज्म का इलाज बचपन में ही करवा लेना चाहिए ताकि बड़े होने पर उसे खतरनाक समस्या से न जूझना पड़े. सर्जन छोटा सा औपरेशन कर के अंडकोष को बाहर कर देते हैं.

आनुवंशिकता :

यदि पिता, चाचा, नाना, भाई आदि किसी को अंडकोष के कैंसर की समस्या हुई हो तो सावधान हो जाना चाहिए. टीएसई यानी टैस्टीक्युलर सैल्फ एक्जामिनेशन द्वारा अंडकोष की जांच करते रहना चाहिए.

बचपन की चोट :

बचपन में खेलते वक्त कभी किसी बच्चे को यदि अंडकोष में चोट लगी है तो बड़े होने पर उसे अंडकोष के कैंसर की समस्या उत्पन्न हो सकती है. बचपन में चोट लगने वाले पुरुषों के अंडकोष में किसी तरह का दर्द, सूजन आदि महसूस होने पर तुरंत डाक्टर को दिखाना चाहिए.

हर्निया :

हर्निया की समस्या की वजह से भी किसीकिसी के अंडकोश में दर्द व सूजन उत्पन्न हो जाती है. ऐसे में डाक्टर से शीघ्र मिलना चाहिए.

हाइड्रोसील :

हाइड्रोसील की समस्या होने पर अंडकोष की थैली में पानी जैसा द्रव्य जमा हो जाता है. इस में अंडकोष में दर्द भले ही न हो लेकिन थैली के भारीपन से अंडकोश प्रभावित हो जाते हैं जिस की वजह से अंडकोष का कैंसर हो सकता है.

इंपोटैंसी :

नई खोज के अनुसार, इंपोटैंसी की वजह से भी अंडकोष के कैंसर की समस्या उत्पन्न हो सकती है. डा. जूड मोले बताते हैं कि जिन लोगों को अंडकोष कैंसर की समस्या पाई गई है उन में से अधिकतर पुरुष इंपोटैंसी यानी नपुंसकता के शिकार थे.

अंडकोष का इलाज :

अंडकोष में असामान्यता दिखाई देने पर तुरंत डाक्टर से मिलना चाहिए. डा. राना का कहना है कि ब्लड, यूरिन टैस्ट व अल्ट्रासाउंड द्वारा बीमारी का पता लगा लिया जाता है. बीमारी की स्थिति के मद्देनजर मरीज को दवा, कीमोथेरैपी या सर्जरी की सलाह दी जाती है. जिस तरह से महिला अपने स्तन का सैल्फ टैस्ट करती है उसी प्रकार पुरुष अपने अंडकोश का सैल्फ टैस्ट कर के जोखिम से बच सकते हैं.

सावधानी

  1. विपरीत पोजिशन में संबंध बनाते वक्त ध्यान रखें कि अंडकोष में चोट न लगे.
  2. तेज गति से हस्तमैथुन न करें, इस से अंडकोष को चोट लग सकती है.
  3. किसी भी हालत में शुक्राणुओं को न रोकें. उन्हें बाहर निकल जाने दें नहीं तो यह शुक्रवाहिनियों में मर कर गांठ बना देते हैं. आगे चल कर कैंसर जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है.
  4. क्रिकेट, हौकी, फुटबाल, कुश्ती आदि खेल खेलते समय अपने अंडकोश का ध्यान रखें. उस में चोट न लग जाए. चोट लगने पर तुरंत डाक्टर को दिखाएं.
  5. टाइट अंडरवियर न पहनें, लंगोट बहुत अधिक कस कर न बांधें. इस से अंडकोष पर अधिक दबाव पड़ता है.
  6. सूती और हलके रंग के अंडरवियर पहनें. नायलोन के अंडरवियर पहनने से अंडकोष को हवा नहीं मिल पाती है. गहरे रंग का अंडरवियर अंडकोष को गरमी पहुंचाता है.
  7. हमेशा अंडरवियर पहन कर न रहें. रात के वक्त उसे उतार दें जिस से अंडकोष को हवा लग सके.
  8. अधिक गरम जगह जैसे भट्ठी, कोयला इंजन के ड्राइवर, लंबी दूरी के ट्रक ड्राइवर आदि अपने अंडकोष को तेज गरमी से बचाएं.
  9. अंडकोष पर किसी प्रकार के तेल की तेजी से मालिश न करें. यह नुकसान पहुंचा सकता है.

बहरहाल, अंडकोष में किसी भी प्रकार की तकलीफ या फर्क महसूस करने पर खामोश न रहें. डाक्टर से सलाह लें. अंडकोष की हर तकलीफ कैंसर नहीं होती लेकिन आगे चल कर वह कैंसर को जन्म दे सकती है इसलिए इस से पहले कि कोई तकलीफ गंभीर रूप ले, उस का निदान कर लें.

लखनऊ के डॉक्टर ए. के. जैन, पिछले 40 सालों से इन सभी समस्याओं का इलाज कर रहे हैं. तो आप भी पाइए अपनी सभी  सेक्स समस्या का बेहतर इलाज अंतर्राष्ट्रीय ख्याति एवं मान्यता प्राप्त डॉ. जैन द्वारा. 

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Corona से नहीं भूख से मर जायेंगे ऐसे लोग

लेखक- राजेश चौरसिया

  • बदहाल बुंदेलखंड की बे-दर्द दास्तां..
  • ऐसी भुखमरी से तो नासूर बन जाएगा बुंदेलखंड..
  • नमक पानी में डुबोकर सूखी रोटी खाते नौनिहाल..
  • सरकारी दावों की असलियत उजागर करते लाग डाउन की बेबसी भरी दास्तान..
  • लॉक डाउन में भूखे बच्चे और माँ की बेबसी..
  • सूखी रोटियां नमक के पानी में भिगोकर खाने को मज़बूर बच्चे..
  • पिछले एक माह से नहीं लग रही मज़दूरी तो पड़े खाने-पीने के लाले..
  • जानकारी लगते ही शहर के युवा समाजसेवियों ने पहुंचाया पूरे महीने भर का राशन..

【यहां 5 वर्षीय शैलेन्द्र, 3 वर्षीय अभय, 1 वर्षीय साधना, माँ संगीता, पिता तंनसु के साथ झोपड़ी बना रहते शहर छतरपुर में..】

एंकर- देश के कुछ राज्यों में नक्शलबाद पनपने का तर्क दिया जाता है कि भुख़मरी और आर्थिक अभाव में दूरियाँ बढ़ने के कारण अराजकता का जन्म होता है. मौजूदा हालात बुंदेलखंड में आर्थिक असमानता के बीच कोरोना विश्व व्यापी महामारी का है. जो आने बाले समय मे भयानक त्रासदी की चुनौती का डंका पीट रही है. हालांकि मौजूदा हालात महामारी के कारण लाग डाउन द्वितीय चरण के चलते कामकाज बंद है जिसकी बिभीषका का सबसे अधिक रोजमर्रा वाले दिहाड़ी श्रमिकों पर पड़ी है.

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छतरपुर कमजोर काया होने के बावजूद भी अपने मासूमों के पालन पोषण का बीड़ा उठाकर एक मजरा टोला से चल कर जिला मुख्यालय पहुंचे तनसु अहिरवार और उसकी पत्नी संगीता अहिरवार कोरोनावायरस महामारी के कारण लॉक डाउन में मजदूरी से भी हाथ धो बैठा.  बेबसी का ऐसा मंजर कि कठोर पत्थर दिल भी पिघल जाए. पत्नी संगीता अपने कलेजे के टुकड़ों को बासी सूखी रोटी नमक के पानी में भिगोकर खिलाती दिखी तो विपन्नता का असली चेहरा भी सामने आया. यह मंजर देख कर हैरत में पड़ना लाजिमी है. लेकिन भूख की बेबसी के आगे रूखी-सूखी रोटी नौनिहालों को मुस्कुराने को विवश कर देती है

नमक के पानी में रोटियां गलाकर खाते बच्चे..

मामला शहर जिला मुख्यालय का है जहां क्षेत्रीय विधायक आलोक चतुर्वेदी के आलीशान निवास (खेल ग्राम के सामने) सामने चल रही निर्माणधीन साईट पर यह दंपति (संगीता तंनसु अहिरवार) मजदूरी कर अपना भरण पोषण किया करती थी. कोरोनो और लॉक डाउन के चलते पिछले 1 माह से मजदूरी नहीं लग रही बचा खुचा राशन पानी था वह हफ़्ते भर में खत्म हो गया  अब यह आस-पड़ोस के लोगों की रहमत के सहारे उदर भरने लगे.

मौजूदा दौर में आखिर कौन कब तक किसको खिलाता है भला, रोजाना कोई किसी को मुफ्त में दुआएं तक नहीं देता फिर ऐसे बंद (लॉक डाउन) में रोजाना खाना देना तो दूर की बात है. यह निकल कर बाहर कहीं जा नहीं सकते लॉक डाउन जो है. अब मरता क्या न करता, जो लोगों से मिला हुआ बचा-खुचा था सब खत्म हो चुका था बचीं थीं तो महज़ सूखी रोटियां जिन्हें गरीब लोग (बतौर भविष्यनिधी) मुश्किल वक्त के लिये धूप में सुखाकर रख़ लेते थे. तो अब बच्चों का पेट भरने का एक यही आख़िरी तरीका बचा था जिसे माँ इन सूखी रोटियों को पानी में भिगोकर नमक डालकर खिला रही है. और तीनों मासूम भी अपनी माँ की बनाई दुनिया की सबसे लज़ीज़ डिस को खाकर प्रसन्न हैं उनके चेहरे पर भूख मिटने की चमक है पर माँ के चेहरे पर उदासी और सूनी आंखों में नमक का पानी छलक रहा है. जो मानो सैलाब बनकर सबको बहा ले जाये.

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हालांकि मानवता अभी भी जिंदा है के परिसंवाद को चरितार्थ करते हुए शहर के कुछ युवाओं ने तत्काल इस पीड़ित परिवार को ना सिर्फ राहत पहुंचाई, बल्कि खाद्य सामग्री पहनने के कपड़े इत्यादि मुहैया कराए.

इन्होंने की मदद..

मामले की जानकारी स्थानीय जनसेवक सुंदर रैकवार को लगी तो उन्होंने अपने घर से खाना बनवाया और पहुंच गये लेकर पर यह नाकाफी था इन्हें रोज़ जरूरत थी तो शहर के युवा समाजसेवी (सुऐब खान उर्फ सब्बू भाई और जवेद अख़्तर) से संपर्क किया गया (जो ऐसे लोगों की अक्सर मदद करते रहते हैं) जहां उन्होंने एक फोन कॉल पर महीने भर का राशन आटा, दाल, चावल, तेल, मसाले, नमक, शक्कर, चाय, तोष, बिस्किट, नमकीन, पेस्ट, गलूकोज, इलेक्ट्रॉल, सहित अन्य जरूरतक का एक ड़ेढ महीने का सामान अपनी गाड़ी में रखा और पहुंच गये लेकर जिसे पाकर बेबस माँ और बच्चों का चेहरा खिल उठा उनकी मुस्कान देनेवाले को दिली सुकून बिखेर रही थी.

इस बाबत स्थानीय पालिटिकल पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष और नगरपालिका अध्यक्ष पति पुष्पेंद्र प्रताप सिंह से बात की तो विधायक निवास के सामने भूखी महिला बच्चों की व्यथा को वीभत्स बताया. उन्होंने तत्काल हर संभव मदद करने की बात कही और अपने लोगों से उसे राशन भिजवाया साथ ही शासन प्रशासन से जरूरी मदद दिलाने का आस्वासन दिया.

मामला चाहे जी भी हो पर इतना तो तय है कि कोरोना कॉल की वानगी का इतिहास काल के पन्नों में समाहित होगा दूसरी ओर सभ्य समाज के बीच असमानता का भाव उजागर करता है. जबकि आज की युवा पीढ़ी के लिए एक सबक का आईना दिखाता है. उन्हें कथित युवाओं के लिए जो अपने माता पिता को राणा कसकर अपनी योग्यता पर इतराते हैं और मां-बाप का सम्मान नहीं करते.

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अपने लाड़ले बच्चों को यह दंपति भूखे रहकर सूखी ही सही, परंतु ममता की छांव में पानी में भिगोकर नमक रोटी खिलाते हैं और बचपन खिलखिलाता है.

मसलन यह तो मौजूदा परिदृश्य की पटकथा है लेकिन सरकारी सी स्वतंत्र से लेकर तमाम सेवादारों की सेवा को चुनौती भरा वाक्य है अलबत्ता यह भी नहीं की मौजूदा समय में शासन प्रशासन अनदेखी कर रहा है फिर भी सवाल उठना लाजमी है कि अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है.

यह कोरोना युद्ध का पड़ाव नहीं बल्कि इस लिहाज से तो विभीषिका के संकेत को नकारा नहीं जा  सकता.  फिर भरोसे के संकेतों पर भी गौर करना वाजिब होगा कि सामान्य स्थिति में दिहाड़ी ना मिले अथवा भूखे प्यासे इंसान कहीं इंसानी सरहदें पार ना करने लगें. इसकी चिंता भी सरकार और सरकारी अमले को करना होगी.

गौरतलब है कि बुंदेलखंड का परिदृश्य विकास के मुद्दे पर अभी भी लंबी कतार में पीछे है आर्थिक असमानता दबंगई सामंतवाद और जातीय वर्ग भेद भ्रष्टाचार का ताना-बाना यह ऐसे सवाल है जिसे हल करना ना सिर्फ जटिल है बल्कि इनका निराकरण करना अत्यावश्यक भी है.

वैश्विक महामारी में यह संकट का दौर है, दुःखद ही है कि बुंदेलखंड में योजनाओं का लाभ सीधे तौर पर उन्हें ही मिल पाता है जिनकी पहुंच सत्ता के पहरेदार हो तक हो या फिर रिश्वत की भेंट देने की दक्षता हो.

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तनसु और संगीता अहिरवार इन दोनों विधाओं में पारंगत नहीं है जिस कारण ना तो उस पंचायत में उसका गरीबी रेखा कार्ड बना और ना ही प्रधानमंत्री आवास सहित अन्य सरकारी राहत मिल सके जिससे परिवार पालने मजदूरी करने के लिए दंपति छतरपुर आ बसा.मजदूरी लगती रहती तो 2 जून की रोटी कमा खा सकता था. महामारी की परिस्थितियों से सामूहिक प्रयासों मे ही निराकृत के पायदान पर पहुंचाया जा सकता है.

मृत्युभोज: कोरोना में खत्म होने के कगार पर आर्थिक बर्बादी का वाहक सामाजिक कलंक

मृत्युभोज जैसी कुरीति को मात्र सामाजिक बुराई मानकर टालना जायज नहीं है. यह एक आर्थिक बर्बादी का बहुत बड़ा कारण है. गरीब परिवारों की तीन-तीन पीढियां इससे बर्बादी की कगार पर पहुंच जाती है.मृत्युभोज के खर्चे से बच्चों के अरमानों, मां-बाप के सपनों का कत्ल हो जाता है.जब एक पीढ़ी शिक्षा से वंचित हो जाती है तो उसका खामियाजा अगली तीन पीढ़ी भुगतती है.एक बड़ा तरक्की का जनरेशन गैप हो जाता है.

मृत्युभोज का खर्च बाकी बुनियादी जरूरतों पर होने वाले खर्च पर पाबंदियां लगा देता है.बुजुर्गों के इलाज में कोताही का कारण बन जाता है.जब कोई बुजुर्ग बीमार होता है और इलाज का बजट सामने आता है तो परिवार वालों के सामने सबसे पहले बड़ा संकट यही उभरकर सामने आता है कि इलाज पर पैसे खर्च करें व अगर नहीं बच पाया तो फिर मृत्युभोज के खर्च का इंतजाम कहाँ से होगा?ऐसे में मन मारकर परिवार वाले न्यूनतम खर्चे में इलाज करवाने का दिखावा मात्र करने को मजबूर हो जाते है.

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यह कोई सांस्कृतिक विरासत नहीं है और न धार्मिक रीति-रिवाज.यह पाखंड व बाजारवाद का गैर-मानवीय संगम है जो इंसानियत का कत्ल करके धंधे का स्वरूप लिए हुए है.एक परिवार की बर्बादी पर व्यापार होता है.रूसो ने कहा था “इंसान इतना भी अमीर नहीं होना चाहिए कि वह दूसरे इंसान को खरीद सके और इतना भी गरीब नहीं होना चाहिए कि खुद को बेचने के लिये मजबूर हो.”यहां सामाजिक बंधन या अनिवार्यता बताकर मानसिक दबाव के तहत इंसान को इतना मजबूर कर दिया जाता है कि वह खुद को बिकाऊ समझ बैठता है और चंद लोग अपने हिसाब से उसकी कीमत तय कर देते है.

तमाम मूढ़ बनी परंपरा के पीछे खड़े बेगैरत लोगों के बीच भी इंसानियत को जिंदा करने की एक खबर सामने आई है.समाज के गय्यूर नौजवानों व इज्जतदार बुजुर्गों ने एक नया चिराग दिखाया है.

मृत्युभोज जैसी विकराल कुरीति के पर कोरोना ने कतरकर सीमित कर दिए है और हमारा थोड़ा सा प्रयास इसको विदाई दे सकता है.उम्मीद की जानी चाहिए कि इस कुरीति के खिलाफ जिन जागरूक समाज बंधुओं ने जागृति की अलख जगाई वो रंग लाने लगी है.हमारे से पहले भी जागरूक बुजुर्गों ने कई प्रयास किये.हम भी पूर्ण पाबंदी की मुहिम चला रहे है और कई युवा लोग आगे आकर विभिन्न इलाकों में प्रयास कर रहे है.एक सामूहिक व सतत प्रयास जल्द ही इस बुराई से मुक्ति की राह दिखायेगा.

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कोरोना के बाद भयंकर आर्थिक मंदी उभरकर सामने आएगी और हमारे सामने भूख सबसे बड़ा मुद्दा होगा.इसलिए ऐसी गैर जरूरी कुप्रथाओं पर अभी लगाम लगा दोगे तो बचने के बेहतर अवसर उपलब्ध रह जाएंगे.पढ़े-लिखे हम जागरूक युवाओं का दायित्व बनता है कि इस संकट की घड़ी में हालातों को भांपते हुए समझाइश करें व इस सामाजिक कलंक से पीछा छुड़ाएं.

Lockdown में अपने बौयफ्रेंड के साथ गोवा में फंसी रश्मि देसाई की ये को-एक्ट्रेस, शेयर की Hot Photos

टेलिविजन इंडस्ट्री (Television Industry) की पौपुलर और बोल्ड एक्ट्रेसेस में से एक श्रीजिता डे (Sreejita De) अपने फैंस के बीच काफी चर्चित रहती हैं. इन दिनों जब लौकडाउन (Lockdown) में लोग अपने-अपने घरों में कैद हैं तो वहीं श्रीजिता डे गोवा (Goa) में फंसी हुई हैं. लौकडाउन से पहले वे अपने बौयफ्रेंड के साथ गोवा हौलिडे (Holiday) मनाने आईं थी और फिलहाल में काफी समय से वहीं हैं. श्रीजिता सोशल मीडिया (Social Media) पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ ही वे अपने फैंस को अपने से जुड़ी हर अप्डेट देती रहती हैं.

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श्रीजिता डे आए दिन अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) से अपनी कुछ फोटोज फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं जिसे उनके फैंस काफी प्यार देते हैं और साथ ही उनकी फोटो वायरल करने में भी कोई कसर नहीं छाड़ते. श्रीजिता अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अक्सर अपनी हौट फोटोज शेयर करती ही रहती हैं जिसे देख उनके फैंस की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं रहता.

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This life is the most precious gift. Embrace it. #staysafe #stayhome #spreadlove . 📸 @aashkagoradia ❤️

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लौकडाउन का पूरा पूरा फायदा उठाते हुए श्रीजिता डे गोवा में काफी एंजौय कर रही हैं. उनकी फोटोज देख ऐसा लग रहा है कि उन्हें वहां रहना बेदह पसंद आ रहा है. इन फोटोज में श्रीजिता काफी सेक्सी (Sexy) लग रही हैं और वे अपना हर पल काफी एंजौय कर रही हैं. कभी हाथ में बीयर लिए तो कभी सुनसान सड़को पर वे हर पोज़ में फोटो क्लिक करवा रही हैं.

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आपको बता दें, श्रीजिता डे ने अब तक कई टीवी सीरियल्स में काम किया है जिसमें से सबसे पौपुलर सीरियल उनका था “उत्तरन” (Uttran) जिसमें उन्होनें बिग बौस सीजन 13 (Bigg Boss 13) की कंटेस्टेंट और टेलिवीजन इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेस रश्मि देसाई (Rashmi Desai) की बेटी का किरदार निभाया था.

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Me: Hello 🌞! . Sun: Hello! Everything’s gonna be okay. This too shall pass. Me: 😃😃😃 📸 @michael_b.p 💕

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Bhojpuri क्वीन मोनालिसा ने पति के साथ शेयर की रोमांटिक फोटो, कैप्शन में लिखी ये बात

भोजपुरी इंडस्ट्री (Bhojpuri Industry) की जानी मानी और बेहद पौपुलर एक्ट्रेस मोनालिसा (Monalisa) ज्यादातर सुर्खियों में बनी ही रहती हैं. मोनालिसा के फैंस उन्हें काफी पसंद करते हैं और उनकी हर फिल्म, हर वीडियो और यहां तक की हर फोटो पर भी फैंस जमकर प्यार बरसाते हैं और बहुत ही जल्द वायरल भी कर देते हैं. भोजपुरी फिल्मों की क्वीन (Bhojpuri Queen) मोनालिसा सोशल मीडिया (Social Media) पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ साथ वे अपने फैंस से जुड़ी रहती हैं.

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Kissed By The Sun… And I Couldn’t Stop Posing 🥰🤷‍♀️❤️❤️❤️…. #goodmorning #sunkissed #poser #happyme #selflove

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मोनालिसा आए दिन अपनी ग्लैमरस (Glamourous) और हौट (Hot) फोटोज अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) से फैंस के साथ शेयर करती ही रहती हैं और फैंस भी इस इंतजार में होते हैं कि कब मोनालिसा की कोई फोटो या वीडियो आए और वे उनपर जमकर प्यार बरसा सकें. यही कारण है मोनालिसा के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 3 मिलियल (3 Million) से भी ज्यादा फौलोवर्स हैं.

हाल ही में मोनालिसा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपने पति के साथ रोमांटिक फोटोज शेयर की हैं जिसमें वे काफी सुंदर लग रही हैं. इन फोटोज में मोनालिसा ने ब्लैक कलर का टौप (Black Top) और ब्लू कलर की शौर्ट्स (Blue Shorts) पहनी हुई है. वहीं दूसरी तरफ उनके पति विक्रांत सिंह (Vikrant Singh) भी काफी हैंडसम नजर आ रहे हैं. मोनालिसा ने ये फोटोज शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा कि,- “Happy ‘Jab We Met’ for the first time my love. Its 12 years today. Love You. #coactor #friend #lover #husbandwife #marriage #bonding #loveyou #togetherness #happiness”.

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Be Happy With What You Have…. Be Excited About What You Want …. ❤️❤️ #happy #selflove #picoftheday #red

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मोनालिसा के इस कैप्शन से साफ पता चलता है कि वे 12 साल पहले आज ही के दिन पहली बार मिले थे. उनके फ्रेंड्स और फैंस भी इस मौके पर मोनालिसा को कमेंट्स में बधाई देते नजर आ रहे हैं और मोनालिसा और उनके पति विक्रांत सिंह के बीच ऐसा ही प्यार बना रहे इसकी दुआ भी कर रहे हैं. आपको बता दें कि मोनालिसा की शादी टेलिविजन इंडस्ट्री का सबसे पौपुलर रिएलिटी शो बिग बौस (Bigg Boss) के 10वें सीजन में हुई थी.

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चमत्कार: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- चमत्कार: भाग 1

रामबाबू ने प्रस्ताव रखा कि यदि वरपक्ष शांति बनाए रखने को तैयार हो तो वह कमरे के ताले खुलवा देंगे पर लाख प्रयत्न करने पर भी उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिला. साथ ही सब को गोलियों से भून कर रख देने की धमकी भी मिली.

इसी ऊहापोह में शादी के फूल मुरझाने लगे. बड़े परिश्रम और मनोयोग से बनाया गया भोजन यों ही पड़ापड़ा खराब होने लगा.

‘जयमाला’ के लिए सजधज कर बैठी मोहिनी की आंखें पथरा गईं. कुछ देर पहले तक सुनहरे भविष्य के सपनों में डूबी मोहिनी को वही सपने दंश देने लगे थे.

काफी प्रतीक्षा के बाद वह भलीभांति समझ गई कि दुर्भाग्य ने उस का और उस के परिवार का साथ अभी तक नहीं छोड़ा है. मन हुआ कि गले में फांसी का फंदा लगा कर लटक जाए, पर रमन का विचार मन में आते ही सब भूल गई. किस तरह कठिन परिश्रम कर के रमन भैया ने पिता के बाद कर्णधार बन कर परिवार की नैया पार लगाई थी. वह पहले ही इस अप्रत्याशित परिस्थिति से जूझ रहा था और एक घाव दे कर वह उसे दुख देने की बात सोच भी नहीं सकती थी.

उधर काफी देर होहल्ला करने के बाद बराती शांत हो गए थे. बरात में आए बच्चे भूखप्यास से रोबिलख रहे थे. बरातियों ने भी इस अजीबोगरीब स्थिति की कल्पना तक नहीं की थी.

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अत: जब मेयर रामबाबू ने फिर से कमरों के ताले खोलने का प्रस्ताव रखा, बशर्ते कि बराती शांति बनाए रखें तो वरपक्ष ने तुरंत स्वीकार कर लिया.

अब तक अधिकतर बरातियों का नशा उतर चुका था. पर रस्सी जलने पर भी ऐंठन नहीं गई थी. वर के पिता सुरेंद्रनाथ तथा अन्य संबंधियों ने बरात के वापस जाने का ऐलान कर दिया. रामबाबू भी कच्ची गोलियां नहीं खेले थे. उन के इशारा करते ही कालोनी के युवकों ने बरातियों को चारों ओर से घेर लिया था.

‘देखिए श्रीमान, मोहिनी केवल एक परिवार की नहीं सारी कालोनी की बेटी है. जो हुआ गलत हुआ पर उस में बरातियों का दोष भी कम नहीं था,’ रामबाबू ने बात सुलझानी चाही थी.

‘चलिए, मान लिया कि दोचार बरातियों ने नशे में हुड़दंग मचाया था तो क्या आप हम सब को सूली पर चढ़ा देंगे?’ वरपक्ष का एक वयोवद्ध व्यक्ति आपा खो बैठा था.

‘आप इसे केवल हुड़दंग कह रहे हैं? गोलियां चली हैं यहां. न जाने कितने घरातियों को चोटें आई हैं. आप के सम्मान की बात सोच कर ही कोई थानापुलिस के चक्कर में नहीं पड़ा,’ रमन के चाचाजी ने रामबाबू की हां में हां मिलाई थी.

‘तो आप हमें धमकी दे रहे हैं?’ वर के पिता पूछ बैठे थे.

‘धमकी क्यों देने लगे भला हम? हम तो केवल यह समझाना चाह रहे हैं कि आप बरात लौटा ले गए तो आप की कीर्ति तो बढ़ने से रही. जो लोग आप को उकसा रहे हैं, पीठ पीछे खिल्ली उड़ाएंगे.’

‘अजी छोडि़ए, इन सब बातों में क्या रखा है. अब तो विवाह का आनंद भी समाप्त हो गया और इच्छा भी,’ लड़के के पिता सुरेंद्रनाथ बोले थे.

‘आप हां तो कहिए, विवाह तो कभी भी हो सकता है,’ रामबाबू ने पुन: समझाया था.

काफी नानुकुर के बाद वरपक्ष ने विवाह के लिए सहमति दी थी.

‘इन के तैयार होने से क्या होता है. मैं तो तैयार नहीं हूं. यहां जो कुछ हुआ उस का बदला तो ये लोग मेरी बहन से ही लेंगे. आप ही कहिए कि उस की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा. माना हमारे सिर पर पिता का साया नहीं है पर हम इतने गएगुजरे भी नहीं हैं कि सबकुछ देखसमझ कर भी बहन को कुएं में झोंक दें,’ तभी रमन ने अपनी दोटूक बात कह कर सभी को चौंका दिया था और फूटफूट कर रोने लगा था.

कुछ क्षणों के लिए सभी स्तब्ध रह गए थे. रामबाबू से भी कुछ कहते नहीं बना था. पर तभी अप्रत्याशित सा कुछ घटित हो गया था. भावी वर राजीव स्वयं उठ कर रमन को सांत्वना देने लगा था, ‘मैं आप को आश्वासन देता हूं कि आप की बहन मोहिनी विवाह के बाद पूर्णतया सुरक्षित रहेगी. विवाह के बाद वह आप की बहन ही नहीं मेरी पत्नी भी होगी और उसे हमारे परिवार में वही सम्मान मिलेगा जो उसे मिलना चाहिए.’

‘ले, सुन ले रमन, अब तो आंसू पोंछ डाल. इस से बड़ी गारंटी और कोई क्या देगा,’ रामबाबू बोले थे.

धीरेधीरे असमंजस के काले मेघ छंटने लगे थे. नगाड़े बज उठे थे. बैंड वाले अपनी ही धुन पर थिरक रहे थे. रमन पुन: बरातियों के स्वागतसत्कार मेें जुट गया था.

रमन न जाने और कितनी देर अपने दिवास्वप्न में डूबा रहता कि तभी मोहिनी ने अपने दोनों हाथों से उस के नेत्र मूंद दिए थे.

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‘‘बूझो तो जानें,’’ वह अपने चिरपरिचित अंदाज में बोली थी.

रमन ने उसे गले से लगा लिया. सारा घर मेहमानों से भर गया था. सभी मोहिनी की एक झलक पाना चाहते थे.

मोहिनी भी सभी से मिल कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी. तभी रामबाबू ने वहां पहुंच कर सब के आनंद को दोगुना कर दिया था. रमन कृतज्ञतावश उन के चरणों में झुक गया था.

‘‘काकाजी उस दिन आप ने बीचबचाव न किया होता तो न जाने क्या होता,’’ वह रुंधे गले से बोला था.

‘‘लो और सुनो, बीचबचाव कैसे न करते. मोहिनी क्या हमारी कुछ नहीं लगती. वैसे भी यह हमारे साथ ही दो परिवार के सम्मान का भी प्रश्न था,’’ रामबाबू मुसकराए फिर

राजीव से बोले, ‘‘एक बात की बड़ी उत्सुकता है हम सभी को कि वे लोग थे कौन जिन्होंने इतना उत्पात मचाया था? मुझे तो ऐसा लगा कि बरात में 3-4 युवक जानबूझ कर आग को हवा दे रहे थे.’’

‘‘आप ने ठीक समझा, चाचाजी,’’ राजीव बोला, ‘‘वे चारों हमारे दूर के संबंधी हैं. संपत्ति को ले कर हमारे दादाजी से उन का विवाद हो गया था. वह मुकदमा हम जीत गए, तब से उन्होंने मानो हमें नीचा दिखाने की ठान ली है. सामने तो बड़ा मीठा व्यवहार करते हैं पर पीठ पीछे छुरा भोंकते हैं,’’ राजीव ने स्पष्ट किया.

‘‘देखा, रमन, मैं न कहता था. वे तो विवाह रुकवाने के इरादे से ही बरात में आए थे, पर उस दिन राजीव, तुम ने जिस साहस और सयानेपन का परिचय दिया, मैं तो तुम्हारा कायल हो गया. मोहिनी बेटी के रूप में हीरा मिला है तुम्हें. संभाल कर रखना इसे,’’ रामबाबू ने राजीव की प्रशंसा के पुल बांध दिए थे.

राजीव और मोहिनी की निगाहें एक क्षण को मिली थीं. नजरों में बहते अथाह प्रेम के सागर को देख कर ही रमन तृप्त हो गया था, ‘‘आप ठीक कहते हैं, काका. ऐसे संबंधी बड़े भाग्य से मिलते हैं.’’

वह आश्वस्त था कि मोहिनी का भविष्य उस ने सक्षम हाथों में सौंपा था.

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सारा जहां अपना: भाग 1

लेखक- शिव अवतार पाल

मयंक बेचैनी से कमरे में चहल- कदमी कर रहा था. रात के 10 बज चुके थे. वह सोने जा रहा था कि दीप के स्कूल से आए प्रधानाचार्य के फोन ने उसे परेशान कर दिया. प्रधानाचार्य ने कहा था कि दीप बीमार है और आप को याद कर रहा है.

‘‘उसे हुआ क्या है?’’ घबरा कर मयंक ने पूछा.

‘‘वायरल फीवर है.’’

‘‘कब से?’’

‘‘सुस्त तो वह कल शाम से ही था, पर फीवर आज सुबह हुआ है,’’ प्रधानाचार्य ने बताया.

‘‘क्या बेहूदा मजाक है,’’ मयंक के स्वर में सख्ती घुल गई थी, ‘‘तुरंत आप ने चैकअप क्यों नहीं करवाया? बच्चों की ऐसी ही देखभाल करते हैं आप लोग? मेरे बेटे को कुछ हो गया तो…’’

‘‘आप बेवजह नाराज हो रहे हैं,’’ प्रधानाचार्य ने उस की बात बीच में काट कर विनम्रता से कहा था, ‘‘यहां रहने वाले सभी बच्चों का घर की तरह खयाल रखा जाता है, पर उन्हें जब मांबाप की याद आने लगे तो उदास हो जाते हैं. यद्यपि हम पूरी कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो, पर नए बच्चों के साथ अकसर ऐसी समस्या आ जाती है.’’

‘‘दीप अब कैसा है?’’ प्रधानाचार्य की विनम्रता से प्रभावित हो कर मयंक सहजता से बोला था.

‘‘चिंता की कोई बात नहीं है. डाक्टर के साथ मैं लगातार उस की देखभाल कर रहा हूं. आप सुबह आ कर उस से मिल लें तो बेहतर रहेगा.’’

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वह तो इसी वक्त जाना चाहता था पर पिछले 2 घंटे से तेज बारिश हो रही थी. अब तक तो पूरा शहर टापू बन चुका होगा. रास्ते में कहीं स्कूटर फंस गया तो मुसीबत और बढ़ जाएगी. फिलहाल जाने का विचार छोड़ कर वह सोफे पर पसर गया. सामने फे्रम में जड़ी अंजलि की मुसकराती तसवीर रखी थी. उस के बारे में सोच कर उस के मुंह का स्वाद कसैला हो गया.

अंजलि सिर्फ बौस, आफिस और अपने बारे में ही सोचती थी और किसी विषय में सोचनेसमझने का उस के पास समय ही नहीं था. उस पर तो हर पल काम, तरक्की और अधिक से अधिक पैसा कमाने की धुन सवार थी. मशीनी युग में वह मशीन बन गई थी, शायद इसीलिए उस के दिल में बेटे और पति के लिए कोई संवेदना नहीं थी. अब तो मयंक अकेला रहने का अभ्यस्त हो गया था. कभीकभी न चाहते हुए भी समझौता करना पड़ता है. यही तो जिंदगी है.

अचानक बिजली चली गई. कमरा घने अंधकार के आगोश में सिमट गया. वह यों ही निश्चल और निश्चेष्ट बैठा अपने जीवन के बारे में सोचता रहा. अब उस के भीतर और बाहर फैली स्याही में कोई फर्क नहीं था. कुछ देर बाद गरमी से घुटन होने पर वह उठा और दीवार का सहारा लेते हुए खिड़की खोली. ठंडी हवा के झोंकों से उस के तपते दिमाग को राहत मिली.

बाहर बारिश का तेज शोर शांति भंग कर रहा था. सहसा तेज ध्वनि के साथ बिजली चमक कर कहीं दूर गिरी. उसे लगा कि ऐसी ही बिजली उस के आंगन में भी गिरी है, जिस में उस का सुखचैन, अंजलि का प्रेम और दीप का चुलबुला बचपन राख हो चुका है. उस ने तो सहेजने की बहुत कोशिश की पर सबकुछ बिखरता चला गया.

6 साल का दीप पहले कितना शरारती था. उस के साथ घर का हर कोना खिलखिलाता था पर अब तो वह हंसना ही भूल गया था. उस के और अंजलि के बीच आएदिन होने वाले झगड़ों में दीप का मासूम बचपन खो चुका था. विवाद टालने के लिए वह कितना एडजस्ट करता था और अंजलि थी कि छोटी से छोटी बात पर आसमान सिर पर उठा लेती थी. उस का छोटा सा घर, जिसे उस ने बड़े प्यार से सींचा था, ज्वालामुखी बन चुका था, जिस की आंच में अब वह हर पल सुलगता था. मयंक की आंखों में आंसुओं के साथ बीती यादें चुपके से उतर कर तैरने लगीं.

वह अपने आफिस की ओर से जिस मल्टी नेशनल कंपनी में फाइनेंशियल डील के लिए गया था, अंजलि वहां अकाउंटेंट थी. हायहैलो के साथ शुरू हुई औपचारिक मुलाकात रेस्तरां में चाय की चुस्कियों के साथ दिल की गहराई तक जा पहुंची थी. 1 साल के भीतर दोनों विवाह के बंधन में बंध गए. मयंक हनीमून के लिए किसी हिल स्टेशन पर जाना चाहता था. उस ने आफिस में छुट्टी के लिए अर्जी दे दी थी, पर अंजलि तैयार नहीं हुई.

‘पहले कैरियर सैटल हो जाने दो, हनीमून के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है.’

‘अच्छीखासी तो नौकरी है,’ मयंक ने उसे समझाने का प्रयास किया, ‘मोटी तनख्वाह मिलती है, और क्या चाहिए?‘

‘जो मिल जाए उसी में संतुष्ट रहने से इनसान कभी तरक्की नहीं कर सकता,’ अंजलि ने परोक्ष रूप से उस पर कटाक्ष किया, ‘मिडिल क्लास की सोच सीमित दायरे में सिमटी रहती है, इसीलिए वह हाई सोसायटी में एडजस्ट नहीं हो पाता.’

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मयंक तिलमिला कर रह गया.

‘बड़ा आदमी बनने के लिए बड़े ख्वाब देखने पड़ते हैं और उन्हें साकार करने के लिए कड़ी मेहनत,’ अंजलि बोली, ‘अभी स्टेटस सिंबल के नाम पर हमारे पास क्या है? कार, बंगला, ए.सी. और नौकरचाकर कुछ भी तो नहीं. इस खटारा स्कूटर और 2 कमरे के फ्लैट में कब तक खटते रहेंगे?’

‘तुम्हें तो किसी अरबपति से शादी करनी चाहिए थी,’ मयंक कुढ़ कर बोला, ‘मेरे साथ यह सब नहीं मिल सकेगा.’

मयंक को मन मार कर छुट्टी कैंसिल करानी पड़ी. घर की सफाई और खाना बनाने के लिए बाई थी. कई जगह काम करने के कारण वह शाम को कभीकभार लेट हो जाती थी.

मयंक कभी चाय की फरमाइश करता तो अंजलि टीवी प्रोग्राम पर निगाह जमाए बेरुखी से जवाब देती, ‘तुम आफिस से आए हो तो मैं भी घर में नहीं बैठी थी. 2 कप चाय बनाने में थक नहीं जाओगे.’

‘ये तुम्हारा काम है.’

‘मेरा क्यों?’ वह चिढ़ जाती, ‘तुम्हारा क्यों नहीं? तुम से पहले आफिस जाती हूं और काम भी तुम से अधिक टिपिकल करती हूं. अकाउंट संभालना हंसीखेल नहीं है.’

इस के बाद तो मयंक के पास 2 ही रास्ते बचते थे, खुद चाय बनाए या बाई के आने का इंतजार करे. दूसरा विकल्प उसे ज्यादा मुफीद लगता था. वह नारीपुरुष समानता का विरोधी नहीं था. पर अंजलि को भी तो उस के बारे में कुछ सोचना चाहिए. जब वह शांत हो जाता तो अंजलि अपने लिए एक कप चाय बना कर टीवी देखने में मशगूल हो जाती और वह अपमान के घूंट पी कर रह जाता था. उस के वैवाहिक जीवन की नौका डोलने लगी थी.

मयंक ने सदा ऐसी पत्नी की कल्पना की थी जो उस के प्रति समर्पित रहे. केवल अहं की तुष्टि के लिए समानता की बात न करे, बल्कि सुखदुख में बराबर की भागीदार रहे. उस के मन को समझे, हृदय की गहराई से प्यार करे और जिस के आंचल की छांव तले वह दो पल सुखशांति से विश्राम कर सके. बाई के बनाए खाने से पेट तो भर जाता था, पर मन भूखा ही रह जाता था. काश, अंजलि कभी अपने हाथ से एक कौर ही खिला देती तो वह तृप्त हो जाता.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

चमत्कार: भाग 1

‘‘मोहिनी दीदी पधार रही हैं,’’ रतन, जो दूसरी मंजिल की बालकनी में मोहिनी के लिए पलकपांवडे़ बिछाए बैठा था, एकाएक नाटकीय स्वर में चीखा और एकसाथ 3-3 सीढि़यां कूदता हुआ सीधा सड़क पर आ गया.

उस के ऐलान के साथ ही सुबह से इंतजार कर रहे घर और आसपड़ोस के लोग रमन के यहां जमा होने लगे.

‘‘एक बार अपनी आंखों से बिटिया को देख लें तो चैन आ जाए,’’ श्यामा दादी ने सिर का पल्ला संवारा और इधरउधर देखते हुए अपनी बहू सपना को पुकारा.

‘‘क्या है, अम्मां?’’ मोहिनी की मां सपना लपक कर आई थीं.

‘‘होना क्या है आंटी, दादी को सिर के पल्ले की चिंता है. क्या मजाल जो अपने स्थान से जरा सा भी खिसक जाए,’’ आपस में बतियाती खिलखिलाती मोहिनी की सहेलियों, ऋचा और रीमा ने व्यंग्य किया था.

‘‘आग लगे मुए नए जमाने को. शर्म नहीं आती अपनी पोशाक देख कर? न गला, न बांहें, न पल्ला, न दुपट्टा और चली हैं दादी की हंसी उड़ाने,’’ ऋचा और रीमा को आंखों से ही घुड़क दिया. वे दोनों चुपचाप दूसरे कमरे में चली गईं.

लगभग 2 साल पहले सपना ने अपने पति रामेश्वर बाबू को एक दुर्घटना में गंवा दिया था. श्यामा दादी ने अपना बेटा खोया था और परिवार ने अपना कर्णधार. दर्द की इस सांझी विरासत ने परिवार को एक सूत्र में बांध दिया था.

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‘‘चायनाश्ते का पूरा प्रबंध है या नहीं? पहली बार ससुराल से लौट रही है हमारी मोहिनी. और हां, बेटी की नजर उतारने का प्रबंध जरूर कर लेना,’’ दादी ने लाड़ जताते हुए कहा था.

‘‘सब प्रबंध है, अम्मां. आप तो सचमुच हाथपैर फुला देती हैं. नजर आदि कोरा अंधविश्वास है. पंडितों की साजिश है,’’ सपना अनचाहे ही झल्ला गई थी.

‘‘बुरा मानने जैसा तो कुछ कहा नहीं मैं ने. क्या करूं, जबान है, फिसल जाती है. नहीं तो मैं कौन होती हूं टांग अड़ाने वाली?’’ श्यामा दादी सदा की तरह भावुक हो उठी थीं.

‘‘अब तुम दोनों झगड़ने मत लगना. शुक्र मनाओ कि सबकुछ शांति से निबट गया नहीं तो न जाने क्या होता?’’ मोहिनी के बड़े भाई रमन ने बीचबचाव किया तो उस की मां सपना और दादी श्यामा तो चुप हो गईं पर उस के मन में बवंडर सा उठने लगा. क्या होता यदि मोहिनी के विवाह के दिन ऊंट दूसरी करवट बैठ जाता? वह तो अपनी सुधबुध ही खो बैठा था. उस की यादों में तो आज भी सबकुछ वैसा ही ताजा था.

‘भैया, ओ भैया. कहां हो तुम?’ रतन इतनी तीव्रता से दौड़ता हुआ घर में घुसा था कि सभी भौचक्के रह गए थे. वह आंगन में पड़ी कुरसी पर निढाल हो कर गिरा था और हांफने लगा था.

‘क्या हुआ?’ बाल संवारती हुई अम्मां कंघी हाथ में लिए दौड़ी आई थीं. रमन दहेज के सामान को करीने से संदूक में लगवा रहा था. उस ने रतन के स्वर को सुन कर भी अनसुना कर दिया था.

शादी का घर मेहमानों से भरा हुआ था. सभी जयमाला की रस्म के लिए सजसंवर रहे थे. सपना और रतन के बीच होने वाली बातचीत को सुनने के लिए सभी बेचैन हो उठे थे. पर रतन के मुख से कुछ निकले तब न. उस की आंखों से अनवरत आंसू बहे जा रहे थे.

‘अरे, कुछ तो बोल, हुआ क्या? किसी ने पीटा है क्या? हाय राम, इस की कनपटी से तो खून बह रहा है,’ सपना घबरा कर खून रोकने का प्रयत्न करने लगी थीं. सभी मेहमान आंगन में आ खड़े हुए थे.

श्यामा दादी दौड़ कर पानी ले आई थीं. घाव धो कर मरहमपट्टी की. रतन को पानी पिलाया तो उस की जान में जान आई.

‘मेरी छोड़ो, अम्मां, रमन भैया को बुलाओ…वहां मैरिज हाल में मारपीट हो गई है. नशे में धुत बराती अनापशनाप बक रहे थे.’’

सपना रमन को बुलातीं उस से पहले ही रतन के प्रलाप को सुन कर रमन दौड़ा आया था. रतन ने विस्तार से सब बताया तो वह दंग रह गया था. वह तेजी से मैरिज हाल की ओर लपका था उस के मित्र प्रभाकर, सुनील और अनिल भी उस के साथ थे.

रमन मैरिज हाल पहुंचा तो वहां कोहराम मचा हुआ था. करीने से सजी कुरसियांमेजें उलटी पड़ी थीं. आधी से अधिक कुरसियां टूटी पड़ी थीं.

‘यह सब क्या है? यहां हुआ क्या है, नरेंद्र?’ उस ने अपने चचेरे भाई से पूछा था.

‘बराती महिलाओं का स्वागत करने घराती महिलाओं की टोली आई थी. नशे में धुत कुछ बरातियों ने न केवल महिलाओं से छेड़छाड़ की बल्कि बदतमीजी पर भी उतर आए,’ नरेंद्र ने रमन को वस्तुस्थिति से अवगत कराया था.

रमन यह सब सुन कर भौचक खड़ा रह गया था. क्या करे क्या नहीं…कुछ समझ नहीं पा रहा था.

‘पर बराती गए कहां?’ रमन रोंआसा हो उठा था. कुछ देर में स्वयं को संभाला था उस ने.

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‘जाएंगे कहां? बात अधिक न बढ़ जाए इस डर से हम ने उन्हें सामने के दोनों कमरों में बंद कर के ताला लगा दिया,’ नरेंद्र ने क्षमायाचनापूर्ण स्वर में बोल कर नजरें झुका ली थीं.

‘यह क्या कर दिया तुम ने. क्या तुम नहीं जानते कि मैं ने कितनी कठिनाई से पाईपाई जोड़ कर मोहिनी के विवाह का प्रबंध किया था. तुम लोग क्या जानो कि पिता के साए के बिना जीवन बिताना कितना कठिन होता है,’ रमन प्रलाप करते हुए फूटफूट कर रो पड़ा था.

‘स्वयं को संभालो, रमन. मैं क्या मोहिनी का शत्रु हूं? तुम ने यहां का दृश्य देखा होता तो ऐसा नहीं कहते. तुम्हें हर तरफ फैला खून नजर नहीं आता? यदि हम करते इन्हें बंद न तो न जाने कितने लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते,’ नरेंद्र, उस के मित्र प्रभाकर, सुनील और अनिल भी उसे समझाबुझा कर शांत करने का प्रयत्न करने लगे थे.

किसी प्रकार साहस जुटा कर रमन उन कमरों की ओर गया जिन में बराती बंद थे. उसे देखते ही कुछ बराती मुक्के हवा में लहराने लगे थे.

‘तुम लोगों का साहस कैसे हुआ हमें इस तरह कमरों में बंद करने का,’ कहता हुआ एक बराती दौड़ कर खिड़की तक आया और गालियों की बौछार करने लगा. एक अन्य बराती ने दूसरी खिड़की से गोलियों की झड़ी लगा दी. रमन और उस के साथी लेट न गए होते तो शायद 1-2 की जान चली जाती.

दूल्हा ‘राजीव’ पगड़ी आदि निकाल ठगा सा बैठा था.

‘समझ क्या रखा है? एकएक को हथकडि़यां न लगवा दीं तो मेरा नाम सुरेंद्रनाथ नहीं,’ वर के पिता मुट्ठियां हवा में लहराते हुए धमकी दे रहे थे.

चंद्रा गार्डन नामक इस मैरिज हाल में घटी घटना का समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया था. समस्त मित्र व संबंधी घटनास्थल पर पहुंच कर विचारविमर्श कर रहे थे.

चंद्रा गार्डन से कुछ ही दूरी पर जानेमाने वकील और शहर के मेयर रामबाबू रहते थे. रमन के मित्र सुनील के वे दूर के संबंधी थे. उसे कुछ न सूझा तो वह अनिल और प्रभाकर के साथ उन के घर जा पहुंचा.

रामबाबू ने साथ चलने में थोड़ी नानुकुर की तो तीनों ने उन के पैर पकड़ लिए. हार कर उन को उन के साथ आना ही पड़ा.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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