रानू मंडल को क्यों दिया मौका, हिमेश रेशमिया ने किया ये खुलासा

सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद स्टार बनीं रानू मंडल को आज-कल बौलीवुड से काफी गाने के औफर मिल रहे हैं. सोशल मीडिया पर रानू का वीडियो वायरल होने के बाद हिमेश रेशमिया ने उन्हें मौका दिया अपनी फिल्म में गाना गाने का. हिमेश का ऐसा करने के बाद से उनकी खूब तारीफ हुई. इसके बाद हिमेश के इस कदम को सबने खूब सराहा था.

रानू मंडल का गाना बना ग्लोबल नंबर वन…

हाल ही में हिमेश रेशमिया ने खुलासा किया कि उन्होंने रानू को ये मौका क्यों दिया. हिमेश ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, मैं फिल्म तेरी मेरी कहानी के लिए एक फीमेल वौयस ढूंढ रहा था. जब मैंने रानू की आवाज सुनी तो मुझे उनकी आवाज में एक कनेक्ट लगा. मैंने उन्हें अगले दिन बुला लिया. उन्होंने गाना गाया और मैंने इंस्टाग्राम पर कुछ पोस्ट किए. मैंने और कुछ भी नहीं किया और फिर वो इतिहास बन गया. वो गाना फिर ग्लोबल नंबर वन बन गया.

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इंस्टाग्राम पोस्ट से किया एक और खुलासा…

बता दें, कि हाल ही में हिमेश ने रानू मंडल के साथ एक वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया था. इस वीडियो में रानू मंडल गा रही थीं और उनके साथ उदित नारायण ने भी अपनी आवाज दी है. वीडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए हिमेश ने लिखा, ‘मुझे मेरे क्रिएटिव स्वाभाव ने बोला है कि ‘अपनी आने वाली फिल्म हैप्पी हार्डी एंड हीर के अगले क्लासिकल रोमांटिक सोन्ग “कह रही हैं नज़दीकियां” के लिए, मुझे सबसे टैलेंटेड और लेजेंडरी सिंगर को लेना चाहिए, फीचरिंग उदित नारायण, रानू मंडल, हिमेश रेशमिया और पायल देव, म्यूजिक इंडस्ट्री का ये खास दिन लता मंगेश्कर जी के जन्मदिन पर’.

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आपको बता दें कि सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहीं रानू मंडल ने हिमेश रेशमिया के गाने ‘तेरी मेरी कहानी’ से बौलीवुड में अपना डेब्यू किया था. जिसके बाद उन्होंने हिमेश के साथ कई गाने रिकौर्ड किए थे. अब रानू मंडल का ये नया गाना भी हिमेश रेशमिया की फिल्म ‘हैप्पी हार्डी और हीर’ का ही है.

पैसो का चक्कर, किन्नर की हत्या, किन्नर के हाथ!

पैसों का लेनदेन हत्या का सबब प्रारंभ से रहा है कहावत भी है कि जर जोरू और जमीन के कारण ही सारे अपराध घटित होते हैं. छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला में दो किन्नरों में पैसे की लेनदेन को लेकर मामला इतना आगे बढ़ गया एक ने अपने दूसरे साथी किन्नर को चाकू से गोद गोद कर मार डाला.

बच्चा तस्करी के आरोप में पूर्व मे गिरफ्तार किन्नर (थर्ड जेंडर) छाया उर्फ सोनू की हत्या  की गुत्थी  छत्तीसगढ़ की दुर्ग  पुलिस ने 24 घंटे में ही सुलझा ली. आरोपी कागज किन्नर, उर्फ शंकर बुद्धे, पिता गंगा राम बुद्धे, उम्र 30 ने अपना जुर्म कबूल करते हुए स्वीकार किया कि  उसने पैसों के लेन देन के कारण अपनी साथी किन्नर छाया को मौत के घाट उतार दिया था.

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छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला के पुलिस कप्तान विवेक शुक्ला (आई पी एस) ने  हमारे संवाददाता को बताया कि आरोपी और मृतक छाया एक ही मोहल्ले में रहते थे. घटना वाले दिन आरोपी ने छाया को घर पर रात का खाना खाने के लिए बुलाया. पहले तो दोनों ने खूब  शराब पी, इसके बाद ब्लेड और चाकू से वार कर उसने छाया की हत्या कर दी.

किन्नर काजल के अनुसार  छाया ने दो साल पहले करीब 70 हजार रुपए उससे उधार लिए थे. वह मांगने पर भी बहुत  दिनों से वह पैसे नहीं दे रही थी. इसी बात को लेकर विवाद हुआ और उसने तैश में आकर  छाया  की हत्या कर दी.रविवार 29 सितम्बर की सुबह किन्नर छाया की लाश राजीव नगर के तालाब के निकट  झाडिय़ों के पास बारदाने  मे लिपटी मिली थी.

शराब पिलाया और मार डाला

इस जघन्य हत्याकांड पर पुलिस की तत्परता से हालांकि पर्दा जल्दी उठ गया. मगर जो घटनाक्रम घटित हुआ है वह कई मायने में चौंकाने वाला है. घटना के दिन छाया को काजल ने अपने आवास पर बुलाया और खूब खाने पीने आवा भगत की व्यवस्था की, उसका आशय यह था कि या तो छाया उसके उधार लिए सतर  हजार रुपये बोलो लौटा दें,  खा पीकर प्रसन्न हो जाए या फिर वह इतना शराब पिला देगी की छाया होश में ना रहे और वह अपना बदला ले ले.

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खूब आवभगत के बाद भी जब छाया ने काजल को रुपए देने से मना कर दिया तो काजल ने छाया की हत्या को दे अंजाम दिया.

जांच अधिकारी सुरेश ध्रुव ने बताया के हत्या गला रेत कर की गई थी. पेट में आधा दर्जन वार करने के निशान भी पुलिस को मिले थे. सबसे  बड़ी  बात मृतक किन्नर के हाथ भी बंधे हुए थे.पुलिस को शक था कि आरोपी ने पहले किन्नर के हाथ बांधे उसके बाद हत्या को अंजाम दिया .हत्या के बाद लाश पहले कपड़े में लपेटा गया और बारदाने  में डालकर फेंक दिया गया.

मृतक पर था बच्चा चोरी का गंभीर आरोप

नगर निरीक्षक एवं इस प्रकरण के जांच अधिकारी सुरेश ध्रुव ने बताया पहले पुलिस इस हत्या को किन्नरों के दो गुटों के बीच रंजिश मान कर जांच करती रही . पुलिस ने 2 किन्नर समेत 4 संदेहियों को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ भी की थी . यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि गया नगर निवासी किन्नर छाया बच्चा तस्करी के आरोप में पखवाड़े भर जेल में रहने के बाद 12 दिन पहले जमानत पर रिहा हुई थी.

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मृतक किन्नर छाया उर्फ सोनू पर डेढ़ साल के बच्चे की तस्करी का आरोप है. कोतवाली पुलिस ने उसके खिलाफ बच्चा तस्करी का प्रकरण दर्ज किया था. फर्जी गोद नामा की आड़ में बच्चा तस्करी के खुलासे के बाद छाया को पुलिस ने 1 सितंबर को गया नगर के झंडा चौक से उसके किराए के घर से गिरफ्तार किया था। उसके पास से डेढ़ साल का बच्चा मिला था. किन्नर ने बच्चे को उसकी मां मोना सागर के हमेशा नशे की हालत मे रहने के कारण, रायगढ़, छत्तीसगढ़ से उठा लाने की पुलिस में स्वीकारोक्ति की थी.

कहानी सौजन्य – मनोहर कहानियां

खेसारी लाल ने अपनी फिल्म ‘बागी’ की कमाई बाढ़ पीड़ितों में की दान

ऐसे में तमाम लोग बिहार के बाढ़ पीड़ितों के मदद के लिए आगे आ रहें हैं. इनमें एक नाम और जुड़ गया है, यह नाम है भोजपुरी के सुपरस्टार गायक और अभिनेता खेसारी लाल का. इन्होने पटना के बाढ़ पीड़ितों के लिए 9 गाड़ी राहत सामग्री और पांच हजार लीटर दूध व और 20 हजार लीटर साफ़ पानी अपने खेसारी फाउंडेशन के जरिये वितरण के लिए भेजी है. इनके द्वारा बाढ़ पीड़ितों के लिए मुहैया कराये गए राहत सामग्री के वितरण की जिम्मेदारी गीतकार पवन पाण्डेय नें 500 बच्चों के साथ संभाली है.

खेसारी लाल ने पटना बाढ़ पीड़ितों के मदद के लिए इस मसले पर अपने फेसबुक पेज पर 16 मिनट 36 सेकेण्ड लाइव आकर लोगों से पटना बाढ़ पीड़ितों के मदद के लिए आगे आने की अपील की है. उन्होंने अपने लाइव में कहा की जिस तरह भोजपुरी बेल्ट की 30 करोड़ की जनता ने उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाया है. ऐसे में उनकी भी जिम्मेदारी बनती है की वह अपने प्रसंसको के मुसीबत में काम आयें.

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उन्होंने अपने फेसबुक लाइव में कहा की “जिस तरह भोजपुरी अभिनेता अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए फेसबुक पर औनलाइन आकर लोगों से फिल्मों को देखने की अपील करते हैं, उसी तरह से सभी लोग बाढ़ में फंसे लोगों के लिए लाइव आकर खुद द्वारा किये जा रहें मदद की बात सामने रखें. साथ ही लोगों से भी मदद के लिए आगे आने की अपील करें.”

उन्होंने अपने लाइव मे कहा की “मै गरीबी से आया हूं. इस लिए मैं लोगों की मदद करता हूं. मुझे लोगों का दर्द पता है. मेरा फेसबुक पर लाइव आने का उद्देश्य सिर्फ यह है लोग भी देख कर मदद के लिए आगे आएं.”

पटना बाढ़ पीड़ितों के मदद में आगे आये खेसारी ने अपने फेसबुक लाइव में बताया की उन्होंने भैंस चरा कर और लिट्टी बेंच कर अपना बचपन गुजारा है. उन्होंने कहा की आज अभिनय के जिस मुकाम पर वह हैं वहां  पहुंचाने में बिहार की जनता का बड़ा योगदान रहा है. उन्होंने भोजपुरी के सभी अभिनेताओं से भी अपील किया की अपने फैन्स के जरिये बाढ़ पीड़ितों को मदद पहुचाएं.

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फेसबुक लाइव लिंक-

बागी फिल्म ट्रेलर लिंक-

इस तारीख को रिलीज होगी बिहार क्रिकेट टीम में हावी राजनीति पर बेस्ड फिल्म ‘किरकेट’

येन मूवीज ए स्‍क्‍वायर प्रोडक्‍शंस, धर्मराज फिल्‍म्स और जे के एम फिल्‍म्स बैनर के तले बनी इस फिल्म में 1983 में पहली बार की क्रिकेट विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा रहें पूर्व क्रिकेटर और पूर्व सांसद कीर्ति आजाद प्रमुख भूमिका में हैं. फिल्‍म के निर्देशक  योगेंद्र सिंह हैं, जबकि इसके निर्माता आर के जलान, सोनू झा और विशाल तिवारी  हैं.

फिल्म के सह निर्माता यूसुफ शेख है. भोजपुरी फिल्मों के मसहूर विलेन देव सिंह भी फिल्म में दमदार अभिनय करते हुए नजर आ रहें है. वह अपनी पहली बौलीवुड फिल्म को लेकर खासा खुश नजर आ रहें हैं. उन्होंने बताया की फिल्म का नाम किरकेट है न की क्रिकेट. जो बिहार क्रिकेट टीम में हावी राजनीति को लेकर बनाई गई है.

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देव सिंह ने बताया की इस फिल्म का एक डायलौग ’11 बिहारी इकट्ठा होते हैं वहां क्रिकेट टीम नहीं, राजनीतिक टीम बन जाती है’ बिहार क्रिकेट के हालात को दर्शाता है. फिल्म में कीर्ति आजाद और देव सिंह के आलावा सोनम छाबड़ा, विशाल और प्रीतम नें इस फिल्म में भी निगेटिव किरदार निभाया है. उन्हें इस फिल्म में अपने किरदार को लेकर काफी मेहनत करनी पड़ी है. देव सिंह फिल्म में विकेट कीपर बल्लेबाज के रूप में नजर आ रहें हैं. जब की देव सिंह रियल लाइफ में बौलर रहें हैं, और क्रिकेट उनका पसंदीदा खेल भी है.

लेकिन इस फिल्म में अपने किरदार से इतर उन्होंने कभी भी  विकेट कीपिंग नहीं की है. लेकिन फिल्म में अपने किरदार को लेकर उन्होंने विकेट कीपिंग के लिए खूब पसीना बहाया है. देव सिंह का मानना है की यह फिल्म बिहार क्रिकेट के साथ दूसरे राज्यों के खिलाडियों के उनके खोये सम्मान को वापस दिलाने में मददगार साबित होगी. अभिनेत्री सोनम छाबडा इस फिल्म में एक पत्रकार के रूप में नजर आ रहीं है.
फिल्म में कीर्ति आज़ाद खिलाडियों के हक़ के लिए लड़ते हुए दिखाई देंगी. पहले क्रिकेट और बाद में राजनीति के बाद अब वह फिल्म अभिनेता के रूप में दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ने जा रहीं हैं.

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फिलहाल किरकेट फिल्म के रिलीजिंग की डेट फ़ाइनल हो चुकी है जो कि 18 अक्टूबर है. जिसमें दर्शक खेल के राजनीतिकरण को बहुत नजदीक से महसूस कर पाएंगे की किस तरह से बिहार क्रिकेट संघ का बंटवारा और उसके रणजी टीम की मान्‍यता रद्द करने की कहानी रची गई थी. इस फिल्म में बिहार के होनहार खिलाडियों को कई दशक बाद भी राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में मौका न दिए जाने जैसे गंभीर मुद्दे को भी उठाया गया है.

फिल्म का ट्रेलर लिंक-

पारिवारिक संबंधों के तानेबाने में बुनी भोजपुरी फिल्म ‘विवाह’ का ट्रेलर लौंच

भोजपुरी सिनेमा इन दिनों बड़े बदलाव के दौर में है. हाल के दिनों में जितनीं भी फिल्में बनी हैं वह बेहद साफ-सुथरी रहीं हैं. इस कड़ी में एक और फिल्म जुड़ गई है जिसका नाम है विवाह. जो पूरी तरह से पारिवारिक संबंधों के तानेबाने में बुनी गई है. इस फिल्म का  ट्रेलर 1 अक्बटूर की सुबह लांच किया गया. फिल्म के ट्रेलर लांच होने के कुछ देर बाद ही करीब पचास हजार व्यूअर हो गए.

इस फिल्म में सुपर स्टार प्रदीप पाण्डेय चिंटू, संचिता बनर्जी, काजल राघवनी, आकांक्षा अवस्‍थी, अवधेश मिश्रा, संजय महानंद, ऋतु सिंह, किरण यादव मुख्‍य भूमिका में हैं. साथ ही फिल्म में पाखी हेगड़े भी गेस्ट के रूप में नजर आयेंगी. विवाह भोजपुरी में बनी पारिवारिक फिल्मों में अब तक की सबसे अच्छी फिल्मों में गिनी जा सकती है इस फिल्म में फैमली ड्रामा, प्यार, रोमांस, एक्शन, कामेडी, इमोशंस का जबरदस्त तड़का देखने को मिलेगा.

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विवाह फिल्म के ट्रेलर में प्रदीप पाण्डेय चिंटू की शादी दूसरी लड़की (संचिता बनर्जी ) से होते हुए दिखाया गया है. जब की फिल्म में रोमांस का सीन काजल राघवनी के साथ है. ट्रेलर को देख कर भोजपुरी बेल्ट के दर्शकों में उत्साह देखते बन रहा है. क्यों की फिल्म का ट्रेलर ही दर्शकों को फिल्म के रिलीज होने तक फिल्म देखने के लिए बेसब्र करने वाला है.

इस फिल्म में भोजपुरी फिल्मों के निगेटिव अभिनेता अवधेश मिश्रा को बेहद सरल और सुलझे हुए पाजिटिव रोल में देखने को मिलेगा. विवाह फिल्म के ट्रेलर लांच होने के साथ ही इसके रिलीज होने की तैयारियां शुरू कर दी गई है जिस की तिथि की घोषणा जल्द ही की जाएगी.

यह फिल्म महिलाओं को भी खूब पसंद आएगी. क्यों की फिल्म में विवाह के दौरान नोक-झोक, चुहलबाजी, छेड़-छाड़ और विवाह से जुड़े लोकगीतों का भी जबरदस्त तड़का लगाया गया है. भोजपुरी में काफी अरसे बाद ऐसी फिल्म आ रही है जिसमें दो परिवारों के बीच उपजी गलतफहमियों और उससे उपजे हालात के बीच पिसते अभिनेता प्रदीप पाण्डेय चिंटू व संचिता बनर्जी बीच प्‍यारी सी लव स्‍टोरी को दिखाया गया है.

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फिल्म के निर्देशक मंजुल ठाकुर है जिनको इस फिल्म से बड़ी उम्मीदें है. उनका कहना है की इस फिल्म की कहानी को देखते हुए इसके लोकेशन, बैकग्राउंड और तकनीकी पक्षपर काफी मेहनत की गई है जो जल्द ही दर्शकों के समक्ष होगी।

यशी फिल्म और अभय सिन्हा की प्रस्तुति और वर्लडवाइड फिल्म प्रोडक्शन के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्माता प्रदीप सिंह, निशांत उज्जवल और प्रतिक सिंह हैं. फिल्‍म का संगीत दिया है छोटे बाबा और मधुकर आनंद ने. जबकि एक्‍शन श्री श्रेष्‍ठ, डीओपी सिद्धार्थ सिंह का है.

इस फिल्म के गीतकार राजेश मिश्रा, सुमित सिंह चंद्रवंशी, संतोष पुरी व अरविंद तिवारी हैं. फिल्म कहानी लिखी है प्रदीप सिंह ने और पटकथा अरविंद तिवारी  नीरज – रणधीर की है.

फिल्म का ट्रेलर लिंक- 

55 की उम्र में भी कम नहीं हुआ गोविंदा का स्टाइल, आप भी कर सकते हैं फौलो

गोविंदा का स्टाइल इतना इम्प्रेसिव है कि लोग उन्हें फौलो करे बिना रह ही नहीं पाते फिर चाहे वे 15-20 साल के बच्चे हों या 40-50 साल के पुरूष. गोविंदा हर लेटेस्ट ट्रेंड को फौलो करते हैं तो आज हम आपको बताएंगे गोविंदा के कुछ ऐसे लुकस जिसे देख कर आपका मन खुद उन्हें फौलो करने को कर जाएगा.

फ्यूजन लुक…

 

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In Kolkata for #Ganpatipuja 🙂 #Ganeshchaturthi #kolkata #ganpatibappamoriyaa

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इस फ्यूजन लुक में गोविंदा ने ग्रीन कलर की शर्ट के ऊपर मैरून कलर का बेस कोट और साथ ही ब्लैक कलर का ट्राउसर पहना हुआ है. इस लुक की सबसे खास चीज़ है उनका यैल्लो कलर का मफ्लर जो उन्होनें इस आउटफिट के साथ कैरी किया हुआ है. आप भी गोविंदा ये फ्यूजन लुक अपने फैमिली फंक्शनस में ट्राय कर सकते हैं.

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हीरो नम्बर 1 लुक…

 

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Off to #London ✈️

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इस लुक में गोविंदा रेड कलर के कुर्ते के ऊपर रेड कलर का ही इंडो वेस्टर्न पहने दिखाई दे रहे है. इस लुक के साथ उन्होनें ब्लैक कलर का ट्राउयर और फोर्मल शूज पहन रखे हैं. इस लुक के साथ गोविंदा के फेस पर ब्लैक शेड्स काफी सूट कर रहे हैं. आप भी गोविंदा के इस लुक को किसी भी फंक्शन में ट्राय कर सबको इम्प्रेस कर सकते हैं.

मेन इन व्हाइट…

 

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New Month New Weeks New Plans! 📸: @shivamduaphotography Styling by Me😉

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इस वहाइट लुक में गोविंदा काफी कूल नजर आ रहे हैं. इस लुक में गोविंदा ने व्हाइट कलर की शर्ट के ऊपर व्हाइट कलर की जैकेट और व्हाइट कलर का ही ट्राउसर पहना हुआ है. कलरफुल कपड़े पहनने के अंदाज से मशहूर गोविंदा वहाइट सिंपल कपड़ों में भी कहर बरसा रहे हैं. इस लुक में गोविंदा ने शूज भी व्हाइट कलर के ही पहने हुए हैं. आप भी गोविंदा जैसा व्हाइट लुक अपने कौलेज और इंस्टीट्यूट में ट्राय कर सकते हैं.

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कैसुअल लुक…

 

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📸 : @shivamduaphotography

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इस कैसुअल लुक में गोविंदा ने ब्लैक कलर की स्वेट शर्ट और ब्लू कलर की जींस पहनी हुई है. इस लुक में गोविंदा किसी कौलेज गोइंग स्टूडेंट से कम नहीं लग रहे. ऊपर से उन्होनें इस लुक में ब्लू कलर के शेड्स पहन रखे हैं जो काफी फंकी लग रहे हैं. आप भी गोविंदा का ये कैसुअल लुक अपनी डेली रूटीन में ट्राय कर सकते हैं.

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16 साल की इस लड़की ने दिया यूएन में भाषण, राष्ट्रपति ट्रंप से लेकर तमाम बड़े नेताओं को सुनाई खरी-खोटी

ग्रेटा ने बड़े तीखे शब्दों से विश्व के कई नेताओं पर इस त्रासदी से निपटने के लिए कुछ नहीं करने का भी आरोप लगाया. आपने हमें फेल कर दिया है. युवा पीढ़ी ये समझती है कि आपने हमसे धोका किया है. हम युवाओं की नजरें आप पर हैं और अगर आप लोगों ने हमें असफल किया तो हम आपको कभी भी माफ नहीं करेंगे.

आपको यहीं पर एक लाइन खींचनी होगी. दुनिया जाग चुकी है और चीजें अब बदल रही हैं..ये चाहे आपको पसंद हो या न हो.’ जानते  हैं ये भाषण किसका है. ये किसी देश के बड़े राजनेता का नहीं है न ही किसी मोटीवेशनल स्पीकर का है बल्कि ये कहना है 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग का. जोकि स्वीडन की पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं.

यूएन में आयोजित क्लाइमेट एक्शन समिट में दुनिया भर के नेताओं को फटकार लगाई. यूएन महासचिव गुतारेस के सामने दी गई ग्रेटा की स्पीच अब वायरल हो रही है और उनके सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है. इस स्पीच के अलावा ग्रेटा थनबर्ग की एक तस्वीर भी वायरल हो रही है. क्लाइमेट एक्शन समिट में पहुंचे ट्रंप के पीछे खड़ी ग्रेटा जिस निगाह से ट्रंप को देख रही हैं वो लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. ग्रेटा की आंखों में नाराजगी साफ नजर आ रही है.

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ग्रेटा ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और इस आंदोलन को ‘Friday for future’ नाम दिया है. ग्रेटा कौन हैं, स्कूल जाने की उम्र में धरती बचाने का जिम्मा उठाने की प्रेरणा कहां से मिली, आइए ये सब जानते हैं.

10वीं क्लास की छात्रा ग्रेटा थनबर्ग का जन्म 2003 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ था. मां मलेना अर्नमैन स्वीडन की मशहूर ओपेरा सिंगर और पिता स्वांते थनबर्ग एक्टर हैं.‘Charity begins at home’ वाली कहावत से प्रभावित ग्रेटा ने पर्यावरण बचाने की शुरुआत अपने घर से की.

इसके लिए उन्होंने सबसे पहले अपने माता पिता को लाइफ स्टाइल बदलने के लिए मनाया. पूरे परिवार ने नॉनवेज खाना छोड़ दिया और जानवरों के अंगों से बनी चीजों का इस्तेमाल बंद कर दिया. कार्बन उत्सर्जन जिन चीजों से होता है उन सब चीजों का इस्तेमाल सीमित कर दिया.

9 सितंबर 2018 को स्वीडन में आम चुनाव होने वाले थे. उससे पहले ही स्वीडन के जंगलों में आग लगी हुई थी और 262 सालों की सबसे भीषण गर्मी पड़ रही थी. ग्रेटा 9वीं क्लास में थीं और फैसला किया कि जब तक चुनाव नहीं निपट जाते, वो स्कूल नहीं जाएंगी.

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क्लाइमेट चेंज के खिलाफ ग्रेटा ने 20 अगस्त 2018 यानी आम चुनाव से पहले मोर्चा खोल दिया. सरकार के खिलाफ स्वीडन की संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. तीन हफ्ते तक प्रदर्शन करते हुए ग्रेटा ने पर्चियां बांटीं जिन पर लिखा होता था ‘मैं इसलिए ये कर रही हूं क्योंकि आप अडल्ट लोग मेरे भविष्य से खेल रहे हो.’ उस वक्त भी उनकी एक तस्वीर वायरल हुई थी.

ग्रेटा ने जमीन पर प्रदर्शन करते हुए सोशल मीडिया की ताकत को पहचाना और उसे अपना हथियार बनाया. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर अपने प्रोटेस्ट की तस्वीरें शेयर करके लोगों को इस मुहिम से जोड़ा. उन्हें कम समय में भारी समर्थन मिला.

फरवरी 2019 में ग्रेटा को वैश्विक पहचान तब मिली जब 224 शिक्षाविदों ने उनके समर्थन में एक ओपन लेटर पर साइन किए. पिछले महीने अमेरिका पहुंची ग्रेटा से एक रिपोर्टर ने पूछा कि क्या वो ट्रंप से मिलने वाली हैं? इस पर उन्होंने कहा कि जब ट्रंप मेरी बातों को सुनने वाले नहीं हैं तो उनसे मिलकर मैं अपना समय क्यों बरबाद करूंगी?डॉनल्ड ट्रंप ने ग्रेटा की स्पीच पर रिएक्शन दिया है. ट्वीट करते हुए ट्रंप ने लिखा ‘वह हैप्पी यंग गर्ल नजर आ रही है, जो उज्ज्वल और अद्भुत भविष्य की तलाश में है. देख कर अच्छा लगा.’ इस व्यंग्यात्मक कमेंट पर भी लोगों ने ट्रंप को आड़े हाथों लिया है.

Video Credit – Sky News

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मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कबड्डी

कबड्डी का खेल बड़ा ही दिलचस्प होता है. इस में कौन किस की टांग लाइन तक खींच रहा है, इस का सटीक अंदाजा तो कई बार रैफरी भी लगाने में गच्चा खा जाता है, तो मैदान से दूर खड़े दर्शकों की बिसात ही क्या, जो धूल फांकते किसी के आउट होने या पकड़े जाने पर तालियां पीटते रहते हैं.

आधी दौड़ और आधी कुश्ती के मिश्रण वाले इस देहाती खेल को मध्य प्रदेश के बड़ेबड़े कांग्रेसी इन दिनों पूरे दिलोदिमाग से खेल रहे हैं और जनता आंखें मिचमिचाते हुए इंतजार कर रही है कि कोई फैसला हो तो घर को जाए.

वैसे, नियमों और कायदेकानूनों के हिसाब से तो कबड्डी में 2 ही टीमें होनी चाहिए, लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस का हाल जरा सा अलग है. यहां कांग्रेस की 3 टीमें एकदूसरे से भिड़ रही हैं और उस से भी ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि कौन सा खिलाड़ी किस टीम से खेल रहा है, इस का अतापता भी किसी को नहीं है. फिर यह तय कर पाना तो और भी मुश्किल काम है कि कौन किस की टांग खींच रहा है.

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लेकिन, इन तमाम गफलतों के बाद भी खेल जारी है और राह चलते लोग तमाशा देखते ताजा गड्ढों में गिर रहे हैं. मनोरंजन का कोई दूसरा साधन उन के पास है भी नहीं, क्योंकि अघोषित बिजली कटौती के चलते घरों में टैलीविजन बंद पड़े हैं और पत्नियां भी अंबानी के ‘जियो’ की कृपा से मायके वालों और सहेलियों से चैटिंग करने में बिजी हैं.

इन तीनों टीमों में से पहली टीम के कैप्टन घोषित मुख्यमंत्री और विधायक दल द्वारा पूरे विधिविधान से चुने गए कमलनाथ हैं, वहीं दूसरी टीम की कैप्टनशिप मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह के पास है, जो घोषित तौर पर कांग्रेस विधायक दल द्वारा न चुने गए मुख्यमंत्री हैं और तीसरी टीम के उस्ताद चिकनेचुपड़े चेहरे वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं जो घोषित टीम के कैप्टन बनतेबनते रह गए थे, लेकिन लाइन में अभी भी लगे हैं, पर दिक्कत यह है कि न कोई छींक रहा है और न कोई छीका टूट रहा है.

सियासी उठापटक के लिए पहचाने जाने वाले दिग्विजय सिंह ने कुछ दिन पहले मंत्रियों को एक चिट्ठी लिखी थी, जिस में उन के द्वारा तबादलों के लिए की गई सिफारिशों पर कार्यवाही का हिसाब मांगा गया था.

इस धोबीपछाड़ दांव से कई मंत्री सही में घबरा उठे थे कि क्या जवाब दें. और मूल सवाल कहीं हिस्साबांटी का तो नहीं कि अच्छा, सारा का सारा खुद ही हजम कर गए और जिन मुलाजिमों और अफसरों से हम ने पेशगी ले रखी है, उन की फाइलें दबा गए.

अब सच जो भी हो, चिट्ठी का वाजिब असर हुआ और उन की टीम के मंत्री ब्योरा ले कर उन के बंगले पर पहुंच गए और एनओसी हासिल कर ली.

टीम नंबर 1 और टीम नंबर 3 के मंत्री यह कहते हुए बिदक गए कि आप होते कौन हैं हम से हिसाब मांगने वाले… एक युवा खिलाड़ी उमर सिंघार ने तो सीधे सोनिया गांधी को चिट्ठी लिख डाली कि टीम नंबर 2 के कैप्टन बेवजह टीम नंबर 1 यानी असली टीम के मुखिया बनने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें जनता यानी दर्शकों ने तकरीबन 15 साल पहले ही फाउल पर फाउल करने के चलते खेल से बाहर कर दिया था.

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चूंकि वे पकड़े जाने से बचने के लिए बदन पर सरसों का तेल लगाए रहते हैं, इसलिए उन के खिलाफ ऐक्शन लिया जाए, जिस से असली टीम बेहिचक खेल कर जनता का मनोरंजन कर सके. आखिर विधानसभा की 114 सीटें कबड्डी खेलने के लिए ही तो मिली हैं, नहीं तो जनता का टाइम पास कैसे होगा.

जैसा कि पुराना व पुश्तैनी कांग्रेसी रिवाज है, राष्ट्रीय टीम की अध्यक्ष जिन्हें पहले से ही स्कोर और नतीजा मालूम था, चुप रहीं और चश्मा पोंछते हुए कंप्यूटर स्क्रीन पर अपने ‘स्वाभिमान

से संविधान यात्रा’ वाले प्रोजैक्ट का गुणाभाग लगाते हुए उस का रूट देखते हुए सोचती रहीं कि इन 3 राज्यों से कब, क्यों और कैसे कांग्रेस की जड़ें उखड़ी थीं और क्या अब भी ऐसा कोई टोटका है, जिसे आजमा कर नवहिंदुत्व का चक्रव्यूह बेधा जा सके.

अपने अभिमन्यु ने तो कुरुक्षेत्र छोड़ दिया है, लेकिन वे नहीं छोड़ सकतीं क्योंकि तेजी से देशभर के दलितों को हिंदू बना कर छला जा रहा है और यहां ये आपस में ही लड़ेमरे जा रहे हैं. जिन्हें अपने प्रदेश की परवाह नहीं, वे देश की परवाह क्या खाक करेंगे.

इस अनदेखी से भले ही तीनों टीमों के कप्तानों को ज्ञान प्राप्त हो गया है कि आलाकमान तो पहले से ही दुखी है, उसे और दुखी करना बेवकूफी की हद ही होगी.

लिहाजा, अब कबड्डी धीरेधीरे खेली जाए और लाइन छू कर वापस आ जाने का स्टाइल अपनाया जाए, क्योंकि बात अगर बढ़ी तो अब दूर तलक नहीं जा पाएगी और जनता बजाय तालियां पीटने के मुक्के मारने लगेगी. फिर सालोंसाल तक कबड्डी खेलने के लिए सत्ता का मैदान सपनों में भी नहीं मिलेगा, इसलिए बेहतरी इसी में है कि तीनों टीमों के कैप्टन पैवेलियन वापस लौट कर पंजा लड़ा कर मसला हल कर लें.

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चालान का डर

छोटेछोटे गुनाहों पर भारी रकम वसूल करना आज किसी भी कोने में खड़े वरदीधारी के लिए वैसा ही आसान हो गया है जैसा पहले सूनी राहों में ठगों और डकैतों के लिए हुआ करता था.

ट्रैफिक को सुधारने की जरूरत है, इस में शक नहीं है पर ट्रैफिक सुधारने के नाम पर कागजों की भरमार करना और किसी को भी जब चाहे पकड़ लेना एक आपातकाल का खौफ पैदा करना है. नियमकानून बनने चाहिए क्योंकि देश की सड़कों पर बेतहाशा अंधाधुंध टेढ़ीमेढ़ी गाडि़यां चलाने वालों ने अपना पैदायशी हक मान रखा था पर जिस तरह का जुर्माना लगाया गया है वह असल में उसी सोच का नतीजा है जिस में बिल्ली को मारने पर सोने की बिल्ली ब्राह्मण को दान में देने तक का विधान है.

ट्रैफिक कानून को सख्ती से लागू करना जरूरी था पर इस में फाइन बढ़ाना जरूरी नहीं. पहले भी जो जुर्माने थे वे कम नहीं थे और यदि उन्हें लागू किया जाता तो उन से ट्रैफिक संभाला जा सकता था, पर लगता है नीयत कुछ और है. नीयत यह है कि हर पुलिस कौंस्टेबल एक डर पैदा कर दे ताकि उस के मारफत घरघर में सरकार के बारे में खौफ का माहौल पैदा किया जा सके. यह साजिश का हिस्सा है.

इस की एक दूरगामी साजिश यह भी है कि ट्रक, टैंपो, आटो, टैक्सी, ट्रैक्टर, बस ड्राइवरों को इस तरह गरीब रखा जाए कि वे कभी न तो चार पैसे जमा कर सकें और न ही अपनी खुद की गाडि़यों के मालिक बन सकें. उन्हें आधा भूखा रखना ऐसे ही जरूरी है जैसे सदियों तक देश के कारीगरों को साल में 2 बार अनाज और कपड़े ही वेतन के बदले दिए जाते थे.

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पहले भी गाड़ीवानों, ठेला चलाने वालों, तांगा चलाने वालों, घोड़े वालों को बस इतना मिलता था कि वे घोड़े पाल सकें. मालिक तो कोई और ही होते थे. ये जुर्माने इतने ज्यादा हैं कि अगर सख्ती से लागू किए गए तो देश फिर पौराणिक युग में पहुंच जाएगा. यह गाज आम शहरी पर कम, उन पर ज्यादा पड़ेगी जो दिन में 10-12 घंटे गाडि़यां चलाते हैं.

आजकल इन कमर्शियल ड्राइवरों के लिए गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करना जरूरी हो गया है ताकि ग्राहक मिलते रहें. ट्रैफिक फाइन ज्यादातर उन्हीं से वसूले जाएंगे या फिर हफ्ता चालू कर दिया जाएगा जैसा शराब के ठेकों, वेश्याओं के कोठों, जुआघरों में होता है. एक इज्जत का काम सरकार ने बड़ी चालाकी से अपराध बना दिया है ताकि एक पूरी सेवादायी कौम को गुलाम बना कर रखा जा सके. यही तो हमारे पुराणों में कहा गया है.

दलितों की अनसुनी

देश का दलित समुदाय आजकल होहल्ला तो मचा रहा है कि उस के हकों पर डाके डालने की तैयारी हो रही है पर यह हल्ला सामने नहीं आ रहा क्योंकि न अखबार, न टीवी और न सोशल मीडिया उन की बातों को कोई भाव दे रहे हैं. दलितों में जो थोड़े पढ़ेलिखे हैं वे देख रहे हैं कि देश किस तरफ जा रहा है पर अपनी कमजोरी की वजह से वे वैसे ही कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे जैसे अमेरिका के काले नहीं कर पा रहे जिन्हें ज्यादातर गोरे आज भी गुलामों की गुलाम सरीखी संतानें मानते हैं. दलितों का हल्ला अनसुना करा जा रहा है.

1947 के बाद कम्यूनिस्ट या समाजवादी सोच के दलितों को थोड़ी जगह देनी शुरू की थी क्योंकि तब गिनती में ज्यादा होने के बावजूद उन का कोई वजूद नहीं था. धीरेधीरे आरक्षण के कारण उन्हें कुछ जगह मिलने लगी तो ऊंची जातियों को एहसास हुआ कि सदियों से जो सामाजिक तौरतरीका बनाया गया है वह हाथ से निकल रहा है.

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उन्होंने मंडल कमीशन लागू करवा कर पिछड़ों को उन गरीब दलितों से अलग किया जो पहले जातिभेद के बावजूद साथ गरीबी में रहते थे और फिर इन पिछड़ों को भगवाई रस पिला कर अपनी ओर मिला लिया. यह काम बड़ी चतुराई और चुपचाप किया गया. लाखों ऊंची जातियों के कर्मठ और अपना पैसा लगाने वाले अलग काम करते हुए, अलग पार्टियों में रहते हुए धीरेधीरे उस समाज की सोच फिर से थोपने लगे जिस में खाइयां सिर्फ गरीबअमीर की नहीं हैं, जाति और वह भी जो जन्म से मिली है और पिछले जन्मों के कर्म का फल है, चौड़ी होने लगीं.

मजे की बात है कि दलितों और पिछड़ों ने इन खाइयों को बचाव का रास्ता मान लिया और खुद गहरी करनी शुरू कर दीं. आज इस का नतीजा देखा जा सकता है कि मायावती को भारतीय जनता पार्टी के पाले में बैठने को मजबूर होना पड़ रहा है और सभी पार्टियों के ऊंची जातियों के लोग बराबरी, आजादी, मेहनत वगैरह के हकों की जगह धर्म का नाम ले कर बहुतों की आवाज दबाने में अभी तो सफल हो रहे हैं.

जातिगत भेदभाव का सब से बड़ा नुकसान यह है कि उस से वे ताकतवर हो जाते हैं जो करतेधरते कम हैं और वे अधपढ़े आलसी हो जाते हैं जिन पर देश बनाने का जिम्मा है. हमारे समाज में खेती, मजदूरी, सेना, कारीगरी हमेशा उन हाथों में रही है जिन के पास न पढ़ाई है, न हक है. आज की तकनीक का युग हर हाथ को पढ़ालिखा मांगता है और जो पढ़ालिखा होगा वह हक भी मांगेगा. दलितों की आवाज दबा कर ऊंची जातियां खुश हो लें पर इस खमियाजा देश को भुगतना होगा. देश के किसान, मजदूर, कारीगर, सैनिक, छोटे काम करने वाले बहुत दिन चुप नहीं रहेंगे. वे या तो देश की जड़ें खोखली कर देंगे या कुछ करने के लिए खुल्लमखुल्ला बाहर आ जाएंगे.

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नहीं रहे ‘शोले’ के ‘कालिया’, 300 से ज्यादा फिल्मों में किया था काम

अपनी एक्टिंग के टैलेंट से पहचान बनाने वाले मराठी एक्टर विजू खोटे का आज निधन हो गया है. 77 साल के विजू खोटे ने बौलीवुड इंडस्ट्री में अपने डायलौग डिलीवरी सबका दिल जीत लिया था. विजू अब तक 300 से भी ज्यादा फिल्मों के साथ टेलीविजन में भी कई सीरियल्स में बेहतरीन किरदार निभा चुके थे.

विजू खोटे के सबसे पौपुलर डायलौग हैं, – अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की फिल्म ‘शोले’ से “सरदार मैने आपका नमक खाया है”, आमिर खान और सलमान खान की फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ में रोबर्ट के किरदार में “गल्ति से मिस्टेक हो गया”, और भी काफी सारे डायलौग्स से विजू खोटे दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रहे थे.

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इतना ही नहीं बल्कि 90’s के सबसे पौपुलर सीरियल ‘जबान संभाल के’ जो कि एक ब्रीटिश सीरियल ‘माइंड योर लैंग्वेज’ का इंडियन वर्जन था उसमें भी विजू खोटे ने करोडों लोगों को एंटरटेन कर अपनी एक अलग पहचान बनाई खी. भले ही इस सीरियल में पंकज कपूर लीड रोल निभा रहे थे लेकिन फिर भी लोगों ने विजू खोटे के किरदार को ज्यादा पसंद किया था.

विजू खोटे के किरदार इतने लोकप्रिय रहे थे कि लोग उन्हें उनके किरदारों के नाम से ही जानने लग गए थे. बल्कि आज भी लोग उन्हे ‘कालिया’ जो कि फिल्म ‘शोले’ में उनका नाम था और ‘रोबर्ट’ के नाम से ही जानते हैं.

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बता दें, विजू खोटे ने फिल्म ‘गोलमाल 3’, ‘अतिथी तुम कब जाओगे’, ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’, में अहम किरदार निभाए हैं और उन्हें आखिरी बार फिल्म ‘जाने क्यों दे यारों’ में देखा गया था. उनके निधन से ना ही बौलिवुड इंडस्ट्री को सदमा लगा है बल्कि मराठी इंडस्ट्री को भी काफी दुख पहुंचा है.

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