सुबह की किरण: भाग 4

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उसे अचानक आया देख प्रीति और नीलम दोनों उठ खड़ी हुईं.

नीलम को देख कर उस ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘अरे तुम कब आईं. तुम भी आगरा में ही रहती हो क्या?’’

‘‘नहीं, तुम्हारे बारे में प्रीति ने बताया तो मिलने आ गई,’’ नीलम मुसकराते हुए बोली.

‘‘अच्छा हुआ तुम आ गईं. मैं इस शहर में पिछले 4 महीने से हूं लेकिन प्रीति को मेरी कभी याद न आई.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है समीर, तुम से मिलने का मैं ने कई बार सोचा लेकिन मिलने की हिम्मत न हुई.’’ प्रीति ने कहा.

‘‘क्यों, मैं तुम्हारे लिए गैर कब से हो गया. यह क्यों नहीं कहतीं कि तुम मुझ से मिलना ही नहीं चाहती थीं.’’ अब प्रीति उस से क्या कहती और कहती भी तो क्या उस की सफाई से समीर की उलाहना दूर हो जाती?

‘‘अच्छा, अब बता मां जी कहां हैं?’’

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‘‘समीर, अब प्रीति की मां इस दुनिया में नहीं हैं,’’ नीलम ने बताया.

कुछ देर तक समीर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘सौरी प्रीति, मैं ने तुम्हारे दिल के दर्द को कुरेदा. अब घर में कौन रहता है?’’

‘‘इस के साथ अब कोई रहने वाला नहीं है समीर. यह नितांत अकेलापन का जीवन जीती है. अपनी दुनिया में खोई हुई. जिस तरह कालेज में किताबों में खोई रहती थी, अब भी किताबें ही इस की साथी हैं,’’ नीलम बोली.

समीर थोड़ी देर तक घर में इधरउधर देखते रहा. उस की मां और बाबूजी का फोटो सामने की दीवार पर टंगा हुआ था. उस ने सोचा उस का ध्यान अब तक उन फोटो पर क्यों नहीं गया जो वह प्रीति को बारबार मां की याद दिलाता रहा. उस ने हाथ जोड़ कर उस के मातापिता के फोटो के सामने जा कर उन्हें प्रणाम किया और प्रीति से बोला, ‘‘जिंदगी इसी का नाम है. यह कोई नहीं जानता कि किस की जिंदगी उस को किस तरह जीने के लिए मजबूर करेगी. तुम से बिछुड़ने के बाद मैं एक बौयज होस्टल में शिफ्ट कर गया जहां सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले लड़के रहते थे. घर में पढ़ने का माहौल नहीं था.

‘‘वहां एक दिन किसी ने मेरा स्मार्टफोन चुरा लिया. उस फोन में बहुत सारी इन्फौर्मेशन थीं, उसी में तुम्हारा फोन नंबर भी था. मैं ने तुम्हें खोजने का प्रयास किया किंतु तुम्हें ढूंढ़ नहीं पाया. फिर मेरी कोचिंग की क्लासेज चलने लगीं और परीक्षा की तैयारी में इतनी बुरी तरह उलझा कि फिर तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं गया और इसी बीच मेरे बाबूजी का तबादला कंपनी वालों ने दूसरे शहर में कर दिया जहां वे मां के साथ शिफ्ट कर गए.

‘‘मैं इकलौती संतान था. घर में कोई रहने वाला नहीं था, इसलिए पिताजी ने 3 कमरों के इस अपार्टमैंट में एक कमरा निजी उपयोग के लिए रख कर 2 कमरे किराए पर दे दिए. लेकिन प्रीति तुम चाहतीं तो मेरे घर जा कर मेरे किराएदार से मेरा फोन नंबर मांग सकती थीं क्योंकि कभीकभी मैं वहां जाया करता था और किराएदार को मेरा फोन नंबर मालूम था. तुम तो मेरे घर आई थीं. मेरे मातापिता तुम्हें बहुत ही लाइक करते थे. मां तो हमेशा ही तुम्हारे सरल स्वभाव की प्रशंसा करती थीं और पिताजी अकसर कहा करते थे कि किसी भी व्यक्ति का गुण प्रधान होता है न कि उस का शरीर.

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‘‘मेरे मांबाबूजी इसी हफ्ते यहां घूमने आने वाले हैं. मैं तुम्हें उन से मिलवाऊंगा.’’

‘‘हां समीर, मुझे भी उन से मिलने की बहुत इच्छा है. उन से मिले हुए काफी दिन हो गए हैं. उन के आने के बाद तुम मुझे फोन करना, मैं उन से मिलने जरूर आऊंगी. लेकिन तुम अपनी पत्नी को ले कर क्यों नहीं आए?’’

समीर ने हंसते हुए कहा, ‘‘अभी तुम्हारी जैसी कोई मिली नहीं.’’

‘‘क्यों मजाक करते हो समीर. मेरे जैसी कोई मिले भी नहीं. हैंडीकैप होना एक अभिशाप से कम नहीं है.’’

‘‘ऐसा न कहो प्रीति, आज भी मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुम्हारा मुकाबला करने वाला इस शहर में कोई नहीं है.’’

यह तो प्रीति नहीं जानती थी कि समीर के साथ उस का क्या रिश्ता है किंतु अंदर ही अंदर यह जान कर कि वह अब तक कुंआरा है उस के मन के तार झंकृत हो उठे.

इस बीच समीर के मांबाबूजी के आने का वह बेसब्री से इंतजार करती रही और फिर कुछ ही दिनों बाद समीर ने उसे फोन कर बताया कि उस के मांबाबूजी आए हुए हैं और उस से मिलना चाहते हैं. आज रात का डिनर उन के साथ करोगी तो उसे खुशी होगी.

प्रीति तो इसी अवसर का इंतजार कर रही थी, इसलिए उस ने उस के निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उसे अंदर आने से कोई न रोके, इसलिए समीर ने उस को लाने के लिए अपनी प्राइवेट कार भेज दी थी.

प्रीति को लेने समीर अपने आवास के गेट तक स्वयं आया. जब वह उस के साथ ड्राइंगरूम में पहुंची तो उस के मांबाबूजी उस का इंतजार कर रहे थे. उस ने उन के पैर छुए. उन्होंने उसे अपनी बगल में बैठा लिया.

‘‘समीर तुम्हारी हमेशा चर्चा करता है. सुना मां भी नहीं रहीं. घर में अकेली हो. बेटी मैं समझ सकती हूं तुम्हारी तकलीफ को. लड़की वह भी अकेली,’’ समीर की मां बोलीं.

‘‘बेटी, अब आगे क्या करना है?’’ समीर के बाबूजी ने पूछा.

‘‘क्या करूंगी बाबूजी. दिन में कालेज में पढ़ाती हूं, रात में अध्ययन, कुछ लेखन.’’ उस ने नम्रता से कहा.

‘‘अभी क्या लिख रही हो?’’

‘‘अभी तो कुछ नहीं. इस पुस्तक का रिस्पौंस देख लेती हूं कैसा है, फिर आगे का प्लान बनाऊंगी.’’

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‘‘यह पुस्तक ‘आनेवाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ मैं ने पढ़ी. समीर ने दी थी. यह सच है कि मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांत आने वाली पीढि़यों के संदर्भ में वैसे ही न रहेंगे.’’

‘‘बाबूजी, आप भी क्या न… आते ही पुस्तक की चर्चा में लग गए. घर और बाहर रातदिन यही तो यह करती है. आज तो हम एंजौय करें. वैसे प्रीति, मैं तुम से पूछना भूल गया था, सारे आइटम वेज ही रखे हैं. मांबाबूजी वैजिटेरियन हैं.’’

‘‘मैं भी वैजिटेरियन ही हूं.’’

खाना खाने के बाद जब प्रीति जाने को हुई तो मां ने उसे रोका.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी की कहीं बात चल रही है क्या?’’

प्रीति कुछ न बोल पाई. जवाब देती भी क्या. उस की शादी के लिए कौन बात करने वाला था.

‘‘समझ गई बेटी. अब तो तुम्हारे घर में तुम्हारे सिवा कोई है नहीं जिस से तुम्हारी शादी के बारे में बात की जाए. समीर तुम्हारी बहुत प्रशंसा करता है. आईएएस में उस के सिलैक्शन के बाद कई अमीर घराने के लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए आए. वे सभी अपनी दौलत के बल पर समीर को खरीदना चाहते थे.

‘‘समीर का इस संबंध में स्पष्ट मत था कि शादी मन का मिलन होता है, सिर्फ शरीर का नहीं और जो लड़की अपने बाप की हैसियत के बल पर इस घर में आएगी वह कभी भी अपना दिल उसे न दे पाएगी. बेटी, अगर तुम्हें कोई आपत्ति न हो और समीर से तुम्हारा मन मिलता हो तो इस घर में तुम्हारी जैसी बहू पा कर हम प्रसन्न होंगे. समीर के पिताजी की भी यही इच्छा है. समीर भी यही चाहता है. अब सबकुछ तुम पर निर्भर करता है. तुम इत्मीनान से फैसला ले कर बताना. कोई जल्दी नहीं है, हम तुम्हारे जवाब का इंतजार करेंगे.’’

‘‘लेकिन मांजी, कहां समीर की पोस्ट और कहां मैं एक साधारण कालेज की लेक्चरार.’’

‘‘अब लज्जित न करो प्रीति,’’ समीर बोला, ‘‘मेरे और तुम्हारे संबंधों के बीच हमारी पोस्ट और हैसियत बीच में कहां से आ गई, इसी से बचने के लिए तो मैं ने

अब तक किसी शादी का प्र्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.’’

प्रीति ने लज्जा से सिर झुका लिया.

उस ने समीर के मांबाबूजी के पैर छूते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का आदेश मेरे लिए आज्ञा से कम नहीं.’’

फिर उस की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

समीर उसे छोड़ने उस के घर तक गया. जब वह लौटने लगा तो उस ने प्रीति को अपने गले से लगा लिया. और बोला, ‘‘प्रीति पतिपत्नी का रिश्ता बराबर का होता है, आज भी मैं वही समीर हूं जो कालेज के दिनों में हुआ करता था और आगे भी ऐसे ही रहूंगा.’’

समीर के गले लगी प्रीति को ऐसा लग रहा था मानो सारे जहां की खुशियां उसे मिल गई हैं. रात का सियाह अंधेरा अब समाप्त हो चुका था. सुबह की नई किरणें फूटने लगी थीं.

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सुबह की किरण: भाग 1

‘‘आओ, तुम यहां बैठ जाओ,’’ समीर ने प्रीति को अपने बगल में खड़ा देखा तो अपनी सीट से उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, तुम बैठो, मुझे अगले स्टैंड पर उतरना है.’’

‘‘तुम बैठो, तुम्हें खड़ा होने में तकलीफ हो रही है,’’ उस ने फिर आग्रह किया तो प्रीति उस की सीट पर बैठ गई.

बस में खचाखच भीड़ थी. तिल भर भी पैर रखने की जगह नहीं थी. प्रीति का एक पैर जन्मजात खराब था. इसलिए थोड़ा लंगड़ा कर चलती थी. नीलम ठीक उस के पीछे खड़ी थी. मुसकराती हुई बोली, ‘‘चलो तुम्हारी तकलीफ समझने वाला कोई तो मिला.’’

अगले स्टैंड पर दोनों सहेलियां उतर गईं. समीर भी उन के पीछेपीछे उतरा.

‘‘तुम्हारी सहेली के साथ मैं ने अन्याय किया,’’ वह प्रीति को देखते हुए मुसकरा कर बोला, ‘‘लेकिन क्या करूं, सीट एक थी और तुम दो.’’

‘‘कोई बात नहीं, अगली बार तुम मुझे लिफ्ट दे देना,’’ नीलम भी मुसकराते हुए बोली तो समीर ने पूछा, ‘‘वैसे, तुम दोनों यहां कहां रहती हो?’’

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‘‘बगल में ही, गौरव गर्ल्स होस्टल में,’’ नीलम ने बताया.

‘‘अच्छा है, अब तो हमारा इसी स्टैंड से कालेज आनाजाना होता रहेगा. मैं भी थोड़ी दूर पर ही रहता हूं. मेरे बाबूजी एक कंपनी में जौब करते हैं और यहीं उन्होंने एक अपार्टमैंट खरीदा हुआ है.’’

समीर, प्रीति और नीलम एक ही कालेज में थे. आज कालेज में उन का पहला दिन था.

प्रीति आगरा की रहने वाली थी और नीलम लखनऊ की. दोनों गौरव गर्ल्स होस्टल में एक रूम में रहती थीं. प्रीति के पिताजी एक अच्छे ओहदे वाली सर्विस में थे, किंतु असमय उन का देहांत हो गया था जिस के कारण उस की मां को अनुकंपा के आधार पर उसी औफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी.

प्रीति के बाबूजी बहुत पहले अपना गांव छोड़ कर आगरा में आ गए थे और यहीं उन्होंने एक छोटा सा मकान बना लिया था. गांव की जमीन और मकान उन्होंने बेच दिया था. प्रीति की मां चाहती थीं कि वह आईएएस की तैयारी करे ताकि एक ऊंची पोस्ट पर जा कर अपनी विकलांगता के दर्द को भुला सके, इसलिए उन्होंने उसे दिल्ली में एमए करने के लिए भेजा था. प्रीति को शुरू से ही साइकोलौजी में गहरी रुचि थी और बीए में भी उस का यह फेवरेट सब्जैक्ट था इसलिए उस ने इसी सब्जैक्ट से एमए करने का विचार किया. प्रीति को शुरू से ही कुछ सीखने और अधिकाधिक ज्ञानार्जन करने की इच्छा थी. वह साइकोलौजी में शोध कार्य करना चाहती थी और भविष्य में किसी कालेज में लैक्चरर बनने की ख्वाहिश पाले हुए थी.

नीलम एक बड़े बिजनैसमैन की बेटी थी. उस के पिताजी चाहते थे कि उन की बेटी दिल्ली के किसी कालेज से एमए कर ले और उस की सोसायटी मौडर्न हो जाए क्योंकि आजकल बिजनैसमैन के लड़के भी एक पढ़ीलिखी और मौडर्न लड़की को शादी के लिए प्रेफर करते थे. इसलिए उस ने दिल्ली के इसी कालेज में ऐडमिशन ले लिया था और ईजी सब्जैक्ट होने के कारण साइकोलौजी से एमए करना चाहती थी. समीर के पिताजी उसे आईएएस बनाना चाहते थे और समीर भी इस के लिए इच्छुक था, इसलिए वह भी साइकोलौजी से एमए करने के लिए कालेज में ऐडमिशन लिए हुए था.

प्रीति एक साधारण परिवार की थी और स्वभाव से भी बहुत ही सरल, इसलिए उस की वेशभूषा और पोशाकें भी साधारण थीं. पर वह सुंदर व स्मार्ट थी. उसे बनावशृंगार और मेकअप पसंद नहीं था किंतु दूसरी ओर नीलम सुंदर और छरहरे बदन की गोरी लड़की थी और अपने शरीर की सुंदरता पर उस का सब से ज्यादा ध्यान था. वह मेकअप करती और प्रतिदिन नईनई ड्रैस पहनती. कालेज में जहां प्रीति अपनी किताबों में उलझी रहती वहीं नीलम अपनी सहेलियों के साथ गपें मारती और मस्ती करती.

एक दिन प्रीति लंच के समय कालेज की लाइब्रेरी में कुछ किताबों से कुछ नोट्स तैयार कर रही थी. तभी नीलम उस के पास आई और बोली, ‘‘अरे पढ़ाकू, यह लंच का समय है और तुम किताबों से माथापच्ची कर रही हो जैसे रिसर्च कर रही हो. चलो चल कर कैफेटेरिया में चाय पीते हैं.’’

‘‘तुम जाओ, मैं थोड़ी देर बाद आऊंगी,’’ प्रीति ने कहा तो नीलम चली गई.

तभी उस ने महसूस किया कि उस के पीछे कोई खड़ा है. उस ने पलट कर पीछे की ओर देखा तो समीर था.

बस में मिलने के बाद समीर आज पहली बार उस के पास आ कर खड़ा हुआ था. क्लास में कभीकभी उस की ओर देख लिया करता था, किंतु बात नहीं करता था.

‘‘प्रीति सभी लोग कैफेटेरिया में चाय पी रहे हैं और तुम यहां बैठ कर नोट्स बना रही हो? अभी तो परीक्षा होने में काफी देर है. चलो, चाय पीते हैं.’’

‘‘बाद में आऊंगी समीर, थोड़े से नोट्स बनाने बाकी हैं, पूरा कर लेती हूं.’’

‘‘अब बंद भी करो,’’ समीर ने उस की नोटबुक को समेटते हुए कहा.

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‘‘अच्छा चलो,’’ प्रीति भी किताबों को नोटबुक के साथ हाथ में उठाते हुए उठ खड़ी हुई.

जब समीर और प्रीति कैफेटेरिया में पहुंचे तो वहां पहले से ही नीलम अपनी कुछ क्लासमेट्स के साथ बैठ कर चाय पी रही थी. अगलबगल और भी कई लड़केलड़कियां थीं.

‘‘आ गई पढ़ाकू,’’ सविता ने उस को देखते हुए चुटकी ली.

‘‘मैं ने कहा, तो मेरे साथ नहीं आई. अब समीर के एक बार कहने पर आ गई. हां भई, उस दिन बस में उठ कर अपनी सीट जो तुम्हें औफर की थी. अब उस का कुछ खयाल तो रखना ही पड़ेगा न.’’ नीलम की बात सुन कर उस की सहेलियां हंसने लगीं.

समीर कुछ झेंप सा गया. बात आईगई हो गई किंतु इस के बाद प्रीति और समीर अकसर आपस में मिलते. प्रीति को साइकोलौजी के कई टौपिक्स पर बहुत ही अच्छी पकड़ थी. उस ने साइकोलौजी में कई जानेमाने लेखकों की पुस्तकों का अध्ययन किया था. जब कभी क्लास में कोई लैक्चरर आता तो उस विषय के ऐसे गंभीर प्रश्नों को उठाती कि सभी उस की ओर ताकने लगते.

समीर को उस के पढ़ने में काफी मदद मिलती. समय के साथसाथ उन के बीच आपसी लगाव बढ़ रहा था. उन के बीच का गहराता संबंध कालेज में चर्चा का विषय था. कुछ साथी उस पर चुटकियां लेने से नहीं चूकते.

‘लंगड़ी ने समीर को अपने रूपजाल में फंसा लिया है,’ कोई कहता तो कोई उन दोनों की ओर इशारा करते हुए अपने मित्र के कान में कुछ फुसफुसाता, जिस का एक ही मतलब होता था कि उन दोनों के बीच कुछ पक रहा है. अब वह किसकिस को जवाब देता. इसलिए चुप रहता.

वैसे भी समीर अपने कैरियर के प्रति सीरियस था. उसे आईएएस की तैयारी करनी थी जिस में साइकोलौजी को मुख्य विषय रखना था. वह इस विषय के बारे में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त कर लेना चाहता था. उधर प्रीति को इसी विषय के किसी टौपिक पर रिसर्च करना था. इसलिए दोनों के अपनेअपने इंटरैस्ट थे. किंतु लगातार एकदूसरे के साथ संपर्क में रहने के कारण उन के अंदर प्रेम का भी अंकुरण होने लगा था जिस को दोनों महसूस तो करते किंतु इस की आपस में कभी चर्चा नहीं करते.

ऐसे ही कब 2 वर्ष गुजर गए उन्हें पता ही नहीं चला. दोनों ने एमए फर्स्ट डिवीजन से पास कर लिया. फिर समीर ने आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली में ही एक कोचिंग जौइन कर ली और प्रीति एक प्रोफैसर के अंडर पीएचडी करने लगी.

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नीलम ने किसी तरह एमए किया और घर चली गई. उस के पिता ने उस की शादी एक बिजनैसमैन से कर दी. उस के निमंत्रण पर प्रीति उस की शादी में गई. उस ने समीर को भी निमंत्रण दिया था लेकिन किसी कारणवश समीर नहीं पहुंच पाया. नीलम ने प्रीति से वादा किया था कि भले ही वह उस से दूर है लेकिन जब कभी वह याद करेगी वह जरूर उस से मिलेगी. बिछुड़ते वक्त दोनों सहेलियां खूब रोईं.

इधर समीर और प्रीति के बीच दूरी बढ़ी तो लगाव भी कम होने लगा. उन के बीच कुछ महीनों तक तो फोन पर संपर्क होता रहा, फिर धीरेधीरे वह समाप्त हो गया. यही दुनियादारी है. कभी समीर जब तक उस से एक बार नहीं मिल लेता उसे चैन न मिलता, अब उसे उस की याद ही नहीं रही. प्रीति ने भी उस से बात करनी बंद कर दी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Bhojpuri एक्ट्रेस अंजना सिंह ने Lockdown के दौरान बांटा गरीबों में राशन, देखें Photos

कोरोना वायरस (Corona Virus) की समस्या ना सिर्फ एक देश की है बल्कि यह संकट पूरे विश्व पर आया है और अब जब ये समस्या सबके ऊपर आई है तो ऐसे में हर कोई अपनी अपनी तरफ से इसमें योगदान दे रहा है फिर चाहे वे पैसो की मदद करके हो, राशन बांट के हो या फिर अपने अपने घरों में रह कर ही हो. ऐसे में बौलीवुड (Bollywood) से लेकर भोजपुरी इंडस्ट्री (Bhojpuri Industry) के कलाकार सामने आ रहे हैं और गरीबों की मदद कर रहे हैं.

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इसी बीच भोजपुरी सिनेमा (Bhojpuri Cinema) की पौपुलर एक्ट्रेस अंजना सिंह (Anjana Singh) भी सामने आई है और इसी के चलते मंगलवार के दिन उन्होनें गरीबों में राशन बांट कर लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) कर कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने की गुजारिश की है. खबरों की माने तो अंजना सिंह (Anjana Singh) ने लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके में पुलिस कर्मियों के साथ 200 से भी ज्यादा गरीब परिवारों की राशन बांट कर मदद की.

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लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) की गुजारिश करने के साथ साथ अंजना सिंह व पुलिस कर्मियों ने भी सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन करते हुए राशन का सामान बांटा. ऐसे में एक्ट्रेस अंजना सिंह ने कहा, “इस घड़ी में हम सब का दायित्व है कि हम सभी एक दूसरे के साथ खड़े रहे और कोरोना की जंग को साथ मिलकर लड़ें.”

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अंजना सिंह (Anjana Singh) का कहना है कि दूसरों कि मदद करने से जो दिल और आत्मा को सुकून मिलता है, वे एक लाजवाब एहसास होता है. उन्होंने आम लोगों से भी एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आने की अपील की.

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Rashmi के बाद अब Arhaan ने लगाया आरोप, एक्ट्रेस ने दिया करारा जवाब

टेलिविजन इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेस रश्मि देसाई (Rashmi Desai) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. रश्मि ने बिग बौस सीजन 13 (Bigg Boss 13) के घर में खूब सुर्खियां बटोरी और फैंस ने भी रश्मि को काफी पसंद किया और साथ ही सपोर्ट भी किया. रश्मि देसाई का उनके एक्स बौयफ्रेंड अरहान खान (Arhaan Khan) के साथ रिश्ता काफी कौन्ट्रोवर्शियल (Controversial) रहा और अब एक बार फिर रश्मि और अरहान सुर्खियों में आ गए हैं.

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दरअसल कुछ दिनों से रश्मि देसाई की बैंक स्टेटमेंट का एक स्क्रीनशौट सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरस हो रहा है वायरल हो रहा है और खबरों की माने तो उस बैंक स्टेटमेंट के स्क्रीनशौट में साफ दिखाई दे रहा है कि अरहान खान ने रश्मि देसाई के अकाउंट से अपने अकाउंट में 15 लाख रुपए ट्रांस्फर किए थे और ये बात तब की है जब रश्मि देसाई बिग बौस के घर में थी.

इन सब खबरों के चलते रश्मि देसाई के द्वारा दिया गया एक इंटरव्यू सामने आया है जिसमें वे ये कहती दिखाई दे रही हैं कि 15 लाख क्या अरहान ने उनके इससे भी ज्यादा पैसे लौटाने हैं. रश्मि कहती हैं कि,- “जब मैं बिग बौस के घर में थी तब अरहान ने मेरे अकाउंट से 15 लाख रुपए ट्रांस्फर किए थे और मैं उन लोगों को भी नहीं जानती जिसे अरहान ने आगे पैसे ट्रांस्फर किए. 15 लाख के अलावा अरहान को मुझे और भी पैसे वापस करने हैं. स्क्रीनशौट में जो पैसा दिख रहा है उससे भी ज्यादा पैसा उसे वापस करना है, लेकिन वह वापस करने से मना कर रहा है.”

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इसके आगे रश्मि देसाई का कहना है कि,- ये स्क्रीनशौट उन्होनें सोशल मीडिया पर लीक नहीं किए और अगर उन्हें ये ही करना होता तो वे कब का कर चुकी होतीं, इतना इंतजार ना करती. वहीं दूसरी तरफ अरहान खान ने दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि रश्मि ने ही ये बैंक स्टेटमेंट सोशल मीडिया पर लीक की है और अरहान के ऊपर पैसे ट्रांस्फर का झूठा आरोप लगाया है.

अरहान का कहना है कि उन्होनें और रश्मि ने मिलकर एक प्रोडक्शन हाउस बनाया था और उस प्रोडक्शन हाउस में दोनों ने मिलकर पैसा लगाया था. अब देखने वाली बात ये होगी कि आखिर रश्मि और अरहान में से किसकी बातों में सच्चाई है.

भूख से मरें या Corona से गरीबों को मरना ही है

प्रदीप कुमार और बिपिन कुमार बिहार के औरंगाबाद जिला अंतर्गत जम्होर और मुन्ना कुमार सहसपुर बारुण का रहने वाला है. इस राज्य के सैकड़ों युवा तमिलनाडु कृष्णागिरी में काम करते हैं. अधिकांशतः युवा अशोक लीलैंड कम्पनी में काम करते हैं. लौक डाउन की वजह से कम्पनी बन्द है. कम्पनी वाला पैसा नहीं दे रहा है. इन युवाओं के पास पैसे खत्म हो गए हैं. राशन और गैस तक नहीं है. यहाँ तक कि पीने वाले पानी की भी किल्लत है. मकान मालिक किराया माँग रहा है. घर से माँ बाबूजी का फोन आ रहा है. क्या बेटा क्या हाल चाल है ? कुछ पैसा हो तो भेजो.ये लड़के अपने घर वालों को वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं करा रहे हैं. ये लड़के समझ रहे हैं कि जब हमलोगों के वास्तविक स्थिति को घर वाले जानेंगे तो उनके पास रोने धोने के सिवा कोई उपाय नहीं है. कम्पनी के मैनेजर फोन करते हैं तो रिंग होते रहता है. उठाता तक नहीं है. हमलोगों के पास भूख से मरने वाली स्थिति पैदा हो गयी है. कुछ समझ मे नहीं आ रहा है.हमलोगों के शरीर में जान नहीं है. ताकत नहीं मिल पा रहा है.

बिस्कुट वैगरह खा कर किसी तरह दिन गुजार रहे हैं. टेलीफोन पर बात करते हुवे ये लड़के फफक कर रोते हुवे मुझसे आग्रह कर रहे हैं कि भैया हमलोगों को कोई उपाय निकालकर अपने घर बुलवा लीजिये.

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इन नौजवानों को पता नहीं है कि सरकार सिर्फ बड़े लोगों के बारे में सोंच रही है. बड़े लोगों के बेटा बेटी कोटा राजस्थान से चले आये.बिहार के हँसुआ नवादा के विधायक अनिल सिंह को कोटा से लाने के लिए एस डी एम ने स्पेशल पास निर्गत कर दिया.वे अपने बेटी को कोटा से वापस लेकर लौट गए.

परन्तु इन लाखों गरीब मजदूरों की कौन सुनेगा जो भूख गरीबी और बेबसी से तंग आकर आत्हत्या तक करने को विवश हैं. इन नौजवानों की मजबूरी को सुननेवाला कोई नहीं है.

गया जिले के बारा ग्राम निवासी तीस वर्षीय मुकेश कुमार उर्फ छब्बू मण्डल लॉक डाउन को लेकर आर्थिक तंगी की वजह से नोयडा दिल्ली के सेक्टर 53 की झुग्गियों में फंदे से लटककर आत्हत्या कर ली.लॉक डाउन की वजह से उसके पास काम नहीं थे.उसकी पत्नी पूनम का कहना है कि लॉक डाउन के दौरान जब पैसे खत्म हो गए तो ढाई हजार रुपये में अपना मोबाइल बेचकर घर का राशन और 400 रुपये में एक पंखा लेकर आया .हमलोगों के पास न काम थे न पैसे.हमलोग पूरी तरह से सरकार द्वारा बांटे जा रहे मुफ्त खाने पर निर्भर थे.लेकिन ये भी रोज नहीं मिल पा रहे थे. पत्नी पास में ही रहने वाले अपने पिता के घर गयी थी.उसके दो बच्चे बाहर में खेल रहे थे.मुकेश की स्थिति अत्यंत खस्ता हाल हो गयी थी.किराना दुकानदार उधार देने से इनकार कर दिया था.मुकेश के ससुर का भी पैर टूटने की वजह से वह लाचार थे.दाह संस्कार तक करने के लिए पैसे नहीं थे.लोगों ने चन्दा करके दाह संस्कार किया.

देश में जानलेवा कोरोना वायरस की वजह से आत्महत्या करने का मामला बढ़ते जा रहा है. लौक डाउन की वजह से काम धंधा बन्द है. इससे सबसे अधिक प्रवासी मजदूर भुक्तभोगी हो रहे हैं.

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उत्तरप्रदेश के बाँदा जिला के 52 वर्षीय रामभवन शुक्ला जिन्होंने एक पेड़ से फंदा लगाकर जान दे दी क्योंकि अपनी गेहूँ की फसल की कटाई के लिए मजदूर नहीं मिल रहे थे.परिवार चलाने की चिंता जब सताने लगी तो उन्होंने कोई उपाय नहीं देखकर जान की ही बाजी लगा दी.

मेघालय के एल्ड्रिन लिंगदोह नामक युवा को शांति फूड सेंटर नामक रेस्तरां के मालिक ने उसे काम से निकाल दिया.वह लड़का अनाथ था.उसका देख रेख करनेवाला कोई नहीं था.मजबूर होकर उसने आत्हत्या कर लिया.

गुरूग्राम से एक 29 वर्षीय युवा उत्तरप्रदेश अपने गाँव लौटा एक पुलिस कांस्टेबल ने उसकी पिटायी की इसकी वजह से वह मजबूर होकर आत्हत्या कर लिया.

उड़ीशा के सागर देवगढिया ने आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या कर ली.

किसी भी ब्यक्ति या जीव जंतु के लिए जान सबसे अधिक प्यारा होता है. जान के बाद ही दूसरी अन्य चीजें प्यारी होती है. लेकिन जहाँ चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखाई दे तो लोग मजबूर होकर मौत को गले लगाने के लिए विवश हो रहे हैं.ये चन्द उदाहरण आत्हत्या के हैं. बहुत मामले प्रकाश में भी नहीं आ रहे हैं.

इस बुरे परिस्थिति में भी बधाई के पात्र हैं. स्वयं सेवी संस्था एवं ब्यक्तिगत तौर पर भूखे मजबूर लोगों तक को खाना मुहैया कराने वाले लोग.

मस्ती उनको है. जिन्हें सरकारी मोटी रकम प्रतिमाह उनके खाते में आ जाती है और काम भी नहीं करना पड़ रहा है. वैसे लोगों पर लॉकडाउन का क्या असर होगा.. ?

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इसी तरह इस लौक डाउन ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली.इसका कोई रिकार्ड नहीं है. पुलिस प्रसाशन की पिटायी. भूख और दवा के अभाव में लोग प्रतिदिन दम तोड़ रहे हैं. दैनिक मजदूर,ठेला ,खोमचा और रिक्शा चलाने वाले लोग लोग भूख और दवा के अभाव में मौत के करीब हैं. अगर यह लॉक डाउन जारी रहा और इसके कारगर उपाय नहीं किये गए तो लोग कोरोना से नहीं भूख और अन्य दूसरे कारणों से मौत को गले लगा लेंगे.

भुखमरी,बेरोजगारी,सरकारी उदासीनता और पुलिस की बर्बरता न जाने कितने लोगों की जान ले लेगी.

नई सुबह : शीला के साथ उन लड़कों ने क्या किया

शीला का अंगअंग दुख रहा था. ऐसा लग रहा था कि वह उठ ही नहीं पाएगी. बेरहमों ने कीमत से कई गुना ज्यादा वसूल लिया था उस से. वह तो एक के साथ आई थी, पर उस ने अपने एक और साथी को बुला लिया था. फिर वे दोनों टूट पड़े थे उस पर जानवरों की तरह. वह दर्द से कराहती रही, पर उन लोगों ने तभी छोड़ा, जब उन की हसरत पूरी हो गई.

शीला ने दूसरे आदमी को मना भी किया था, पर नोट फेंक कर उसे मजबूर कर दिया गया था. ये कमबख्त नोट भी कितना मजबूर कर देते हैं.

जहां शीला लाश की तरह पड़ी थी, वह एक खंडहरनुमा घर था, जो शहर से अलग था. वह किसी तरह उठी, उस ने अपनी साड़ी को ठीक किया और ग्राहकों के फेंके सौसौ रुपए के नोटों को ब्लाउज में खोंस कर खंडहर से बाहर निकल आई. वह सुनसान इलाका था. दूर पगडंडी के रास्ते कुछ लोग जा रहे थे.

शीला से चला नहीं जा रहा था. अब समस्या थी कि घर जाए तो कैसे? वह ग्राहक के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर आई थी. उसे बूढ़ी सास की चिंता थी कि बेचारी उस का इंतजार कर रही होगी. वह जाएगी, तब खाना बनेगा. तब दोनों खाएंगी.

शीला भी क्या करती. शौक से तो नहीं आई थी इस धंधे में. उस के पति ने उसे तनहा छोड़ कर किसी और से शादी कर ली थी. काश, उस की शादी नवीन के साथ हुई होती. नवीन कितना अच्छा लड़का था. वह उस से बहुत प्यार करता था. वह यादों के गलियारों में भटकते हुए धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी.

शीला अपने मांबाप की एकलौती बेटी थी. गरीबी की वजह से उसे 10वीं जमात के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. उस के पिता नहीं थे. उस की मां बसस्टैंड पर ठेला लगा कर फल बेचा करती थी.

घर संभालना, सब्जी बाजार से सब्जी लाना और किराने की दुकान से राशन लाना शीला की जिम्मेदारी थी. वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती थी. साइकिल पकड़ती और निकल पड़ती. लोग उसे लड़की नहीं, लड़का कहते थे.

एक दिन शीला सब्जी बाजार से सब्जी खरीद कर साइकिल से आ रही थी कि मोड़ के पास अचानक एक मोटरसाइकिल से टकरा कर गिर गई. मोटरसाइकिल वाला एक खूबसूरत नौजवान था. उस के बाल घुंघराले थे. उस ने आंखों पर धूप का रंगीन चश्मा पहन रखा था. उस ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और शीला को उठाने लगा और बोला, ‘माफ करना, मेरी वजह से आप गिर गईं.’ ‘माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. मैं ने ही अचानक साइकिल मोड़ दी थी,’ शीला बोली.

‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. आप को कहीं चोट तो नहीं आई?’

‘नहीं, मैं ठीक हूं,’ शीला उठ कर साइकिल उठाने को हुई, पर उस नौजवान ने खुद साइकिल उठा कर खड़ी कर दी.

वह नौजवान अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो गया और स्टार्ट कर के बोला, ‘‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’

‘शीला… और आप का?’

‘नवीन… अच्छा चलता हूं.’

इस घटना के 4 दिन बाद फिर दोनों की सब्जी बाजार में मुलाकात हो गई.

‘अरे, शीलाजी आप…’ नवीन चहका, ‘सब्जी ले रही हो?’

‘हां, मैं तो हर दूसरेतीसरे दिन सब्जी खरीदने आती हूं. आप भी आते हैं…?’

‘नहीं, सच कहूं, तो मैं यह सोच कर आया था कि शायद आप से फिर मुलाकात हो जाए…’ कह कर नवीन मुसकराने लगा, ‘अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मेरे साथ चाय पी सकती हैं?’

‘चाय तो पीऊंगी… लेकिन यहां नहीं. कभी मेरे घर आइए, वहीं पीएंगे,’ कह कर शीला ने उसे घर का पता दे दिया.शीला आज सुबह से नवीन का इंतजार कर रही थी. उसे पूरा यकीन था कि नवीन जरूर आएगा. वह घर पर अकेली थी. उस की मां ठेला ले कर जा चुकी थी, तभी मोटरसाइकिल के रुकने की आवाज आई. वह दौड़ कर बाहर आ गई. नवीन को देख कर उस का मन खिल उठा, ‘आइए… आइए न…’

नवीन ने शीला के झोंपड़ी जैसे कच्चे मकान को गौर से देखा और फिर भीतर दाखिल हो गया. शीला ने बैठने के लिए लकड़ी की एक पुरानी कुरसी आगे बढ़ा दी और चाय बनाने के लिए चूल्हा फूंकने लगी.

‘रहने दो… क्यों तकलीफ करती हो. चाय तो आप के साथ कुछ पल बिताने का बहाना है. आइए, पास बैठिए कुछ बातें करते हैं.’

दोनों बातों में खो गए. नवीन के पिता सरकारी नौकरी में थे. घर में मां, दादी और बहन से भरापूरा परिवार था. वह एक दलित नौजवान था और शीला पिछड़े तबके से ताल्लुक रखती थी. पर जिन्हें प्यार हो जाता है, वे जातिधर्म नहीं देखते.

इस बात की खबर जब शीला की मां को हुई, तो उस ने आसमान सिर पर उठा लिया. दोनों के बीच जाति की दीवार खड़ी हो गई. शीला का घर से निकलना बंद कर दिया गया. शीला के मामाजी को बुला लिया गया और शीला की शादी बीड़ी कारखाने के मुनीम श्यामलाल से कर दी गई.

शीला की शादी होने की खबर जब नवीन को हुई, तो वह तड़प कर रह गया. उसे अफसोस इस बात का रहा कि वे दोनों भाग कर शादी नहीं कर पाए. सुहागरात को न चाहते हुए भी शीला को पति का इंतजार करना पड़ रहा था. उस का छोटा परिवार था. पति और उस की दादी मां. मांबाप किसी हादसे का शिकार हो कर गुजर गए थे.

श्यामलाल आया, तो शराब की बदबू से शीला को घुटन होने लगी, पर श्यामलाल को कोई फर्क नहीं पड़ना था, न पड़ा. आते ही उस ने शीला को ऐसे दबोच लिया मानो वह शेर हो और शीला बकरी. शीला सिसकने लगी. उसे ऐसा लग रहा था, जैसे आज उस की सुहागरात नहीं, बल्कि वह एक वहशी दरिंदे की हवस का शिकार हो गई हो.

सुबह दादी की अनुभवी आंखों ने ताड़ लिया कि शीला के साथ क्या हुआ है. उस ने शीला को हिम्मत दी कि सब ठीक हो जाएगा. श्यामलाल आदत से लाचार है, पर दिल का बुरा नहीं है. शीला को दादी मां की बातों से थोड़ी राहत मिली.

एक दिन शाम को श्यामलाल काम से लौटा, तो हमेशा की तरह शराब के नशे में धुत्त था. उस ने आते ही शीला को मारनापीटना शुरू कर दिया, ‘बेहया, तू ने मुझे धोखा दिया है. शादी से पहले तेरा किसी के साथ नाजायज संबंध था.’

‘नहीं…नहीं…’ शीला रोने लगी, ‘यह झूठ है.’

‘तो क्या मैं गलत हूं. मुझे सब पता चल गया है,’ कह कर वह शीला पर लातें बरसाने लगा. वह तो शायद आज उसे मार ही डालता, अगर बीच में दादी न आई होतीं, ‘श्याम, तू पागल हो गया है क्या? क्यों बहू को मार रहा है?’

‘दादी, शादी से पहले इस का किसी के साथ नाजायज संबंध था.’

‘चुप कर…’ दादी मां ने कहा, तो श्यामलाल खिसिया कर वहां से चला गया.

‘बहू, यह श्यामलाल क्या कह रहा था कि तुम्हारा किसी के साथ…’

‘नहीं दादी मां, यह सब झूठ है. यह बात सच है कि मैं किसी और से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी. मेरा विश्वास करो दादी, मैं ने कोई गलत काम नहीं किया.’

‘मैं जानती हूं बहू, तुम गलत नहीं हो. समय आने पर श्याम भी समझ जाएगा.’ और एक दिन ऐसी घटना घटी, जिस की कल्पना किसी ने नहीं की थी. श्यामलाल ने दूसरी शादी कर ली थी और अलग जगह रहने लगा था.

श्यामलाल की कमाई से किसी तरह घर चल रहा था. उस के जाने के बाद घर में भुखमरी छा गई. शीला मायके में कभी काम पर नहीं गई थी, ससुराल में किस के साथ जाती, कहां जाती. घर का राशन खत्म हो गया था.

दादी के कहने पर शीला राशन लाने महल्ले की लाला की किराने की दुकान पर पहुंच गई. लाला ने चश्मा लगा कर उसे ऊपर से नीचे तक घूर कर देखा, फिर उस की ललचाई आंखें शीला के उभारों पर जा टिकीं. ‘मुझे कुछ राशन चाहिए. दादी ने भेजा है,’ शीला को कहने में संकोच हो रहा था.

‘मिल जाएगा, आखिर हम दुकान खोल कर बैठे क्यों हैं? पैसे लाई हो?’

शीला चुप हो गई. ‘मुझे पता था कि तुम उधार मांगोगी. अपना भी परिवार है. पत्नी है, बच्चे हैं. उधारी दूंगा, तो परिवार कैसे पालूंगा? वैसे भी तुम्हारे पति ने पहले का उधार नहीं दिया है. अब और उधार कैसे दूं?’

शीला निराश हो कर जाने लगी.

‘सुनो…’

‘जी, लालाजी.’

‘एक शर्त पर राशन मिल सकता है.’

‘बोलो लालाजी, क्या शर्त है?’

‘अगर तुम मुझे खुश कर दो तो…’

‘लाला…’ शीला बिफरी, ‘पागल हो गए हो क्या? शर्म नहीं आती ऐसी बात करते हुए.’

लाला को भी गुस्सा आ गया, ‘निकलो यहां से. पैसे ले कर आते नहीं हैं. उधार में चाहिए. जाओ कहीं और से ले लो…’

शीला को खाली हाथ देख कर दादी ने पूछा, ‘क्यों बहू, लाला ने राशन नहीं दिया क्या?’

‘नहीं दादी…’

‘मुझ से अब भूख और बरदाश्त नहीं हो रही है. बहू, घर में कुछ तो होगा? ले आओ. ऐसा लग रहा है, मैं मर जाऊंगी.’

शीला तड़प उठी. मन ही मन शीला ने एक फैसला लिया और दादी मां से बोली, ‘दादी, मैं एक बार और कोशिश करती हूं. शायद इस बार लाला राशन दे दे.’

‘लाला, तुम्हें मेरा शरीर चाहिए न… अपनी इच्छा पूरी कर ले और मुझे राशन दे दे…’ लाला के होंठों पर कुटिल मुसकान तैर गई, ‘यह हुई न बात.’

लाला उसे दुकान के पिछवाड़े में ले गया और अपनी हवस मिटा कर उसे कुछ राशन दे दिया. इस के बाद शीला को जब भी राशन की जरूरत होती, वह लाला के पास पहुंच जाती. एक दिन हमेशा की तरह शीला लाला की दुकान पर पहुंची, पर लाला की जगह उस के बेटे को देख कर ठिठक गई.

‘‘क्या हुआ… अंदर आ जाओ.’’

‘लालाजी नहीं हैं क्या?’

‘पिताजी नहीं हैं तो क्या हुआ. मैं तो हूं न. तुम्हें राशन चाहिए और मुझे उस का दाम.’

‘इस का मतलब?’

‘मुझे सब पता है,’ कह कर शीला को दुकान के पिछवाड़े में जाने का इशारा किया. अब तो आएदिन बापबेटा दोनों शीला के शरीर से खेलने लगे. इस की खबर शीला के महल्ले के एक लड़के को हुई, तो वह उस के पीछे पड़ गया.

शीला बोली, ‘पैसे दे तो तेरी भी इच्छा पूरी कर दूं.’ यहीं से शीला ने अपना शरीर बेचना शुरू कर दिया था. एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे. इस तरह वह कई लोगों के साथ सो कर दाम वसूल कर चुकी थी. उस की दादी को इस बात की खबर थी, पर वह बूढ़ी जान भी क्या करती.

शीला अब यादों से बाहर निकल आई थी. दर्द सहते, लंगड़ाते हुए वह भीड़भाड़ वाले इलाके तक आ गई थी. उस ने रिकशा रोका और बैठ गई अपने घर की तरफ जाने के लिए.

एक दिन हमेशा की तरह शीला चौक में खड़े हो कर ग्राहक का इंतजार कर रही थी कि तभी उसे किसी ने पुकारा, ‘शीला…’

शीला ग्राहक समझ कर पलटी, लेकिन सामने नवीन को देख कर हैरान रह गई. वह अपनी मोटरसाइकिल पर था. ‘‘तुम यहां क्या कर रही हो?’’ नवीन ने पूछा.

शीला हड़बड़ा गई, ‘‘मैं… मैं अपनी सहेली का इंतजार कर रही थी.’’

‘‘शीला, मैं तुम से कुछ बात करना चाहता हूं.’’

‘‘बोलो…’’

‘‘यहां नहीं… चलो, कहीं बैठ कर चाय पीते हैं. वहीं बात करेंगे.’’

शीला नवीन के साथ नजदीक के एक रैस्टोरैंट में चली गई.

‘‘शीला,’’ नवीन ने बात की शुरुआत की, ‘‘मैं ने तुम से शादी करने के लिए अपने मांपापा को मना लिया था, लेकिन तुम्हारे परिवार वालों की नापसंद के चलते हम एक होने से रह गए.’’ ‘‘नवीन, मैं ने भी बहुत कोशिश की थी, लेकिन हम दोनों के बीच जाति की एक मजबूत दीवार खड़ी हो गई.’’

‘‘खैर, अब इन बातों का कोई मतलब नहीं. वैसे, तुम खुश तो हो न? क्या करता है तुम्हारा पति? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

शीला थोड़ी देर चुप रही, फिर सिसकने लगी, ‘‘नवीन, मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली है,’’ शीला ने अपनी आपबीती सुना दी.

‘‘तुम्हारे साथ तो बहुत बुरा हुआ,’’ नवीन ने कहा.

‘‘तुम अपनी सुनाओ. शादी किस से की? कितने बच्चे हैं?’’ शीला ने पूछा.

‘‘एक भी नहीं. मैं ने अब तक शादी नहीं की.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि मुझे तुम जैसी कोई लड़की नहीं मिली.’’

शीला एक बार फिर तड़प उठी.

‘‘शीला, मेरी जिंदगी में अभी भी जगह खाली है. क्या तुम मेरी पत्नी…’’

‘‘नहीं… नवीन, यह मुमकिन नहीं है. मैं पहली वाली शीला नहीं रही. मैं बहुत गंदी हो गई हूं. मेरा दामन मैला हो चुका है. मैं तुम्हारे लायक नहीं रह गई हूं.’’

‘‘मैं जानता हूं कि तुम गलत राह पर चल रही हो. पर, इस में तुम्हारा क्या कुसूर है? तुम्हें हालात ने इस रास्ते पर चलने को मजबूर कर दिया है. तुम चाहो, तो इस राह को अभी भी छोड़ सकती हो. मुझे कोई जल्दी नहीं है. तुम सोचसमझ कर जवाब देना.’’

इस के बाद नवीन ने चाय के पैसे काउंटर पर जमा कए और बाहर आ गया. शीला भी नवीन के पीछे हो ली.नवीन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट कर के कहा, ‘‘मुझे तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा. उम्मीद है कि तुम निराश नहीं करोगी,’’ कह कर नवीन आगे बढ़ गया.

शीला के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उस ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि वक्त उसे दलदल से निकलने का एक और मौका देगा. अभी शीला आगे बढ़ी ही थी कि एक नौजवान ने उस के सामने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी, ‘‘चलेगी क्या?’’

‘‘हट पीछे, नहीं तो चप्पल उतार कर मारूंगी…’’ शीला गुस्से से बोली और इठलातीइतराती अपने घर की तरफ बढ़ गई.

मर्डर मिस्ट्री

इंदौर शहर की रौनक  देखते ही बनती है. इंदौर शहर लजीज व्यंजन के लिए महशूर है. विशेषत: रात को सराफा बाजार बंद होने के बाद वहाँ खाने पीने की दुकानें लगती है. खाने के शौकीन लोगों का हुजुम  देर रात सराफा बाजार मेंं  ऐसे उमडता है जैसे कि दिन  निकला  हो.  वहां का स्वाद, खाने के लजीज व्यंजन, लोगों का जिंदगी को  जिंदादिली से  जीने की स्वभाव, मालवा की माटी में रचा बसा है.  एक बार जो शहर में आया तो वहीं का होकर रह जाता है. मालवा की माटी  की सौंधी महक किसी का भी मन मोह लेने में सक्षम है.

रात को शहरों की रौनक देखते ही बनती है, सराफा की गलियों में व्यजंनो की महक हवा में घुली होती है.  व्यजंनों का स्वाद व  राजवाडा की रौनक रात का भ्रम पैदा करतें है. रात 9 बजे के बाद जैसे यहाँ दिन निकलता है.

पुराने शहर की गलियों में लोग एक दूसरे से बहुत परिचित रहते हैं.  उनसे  परिवार के सदस्य क्या, पूरे खानदान का ब्यौरा मिल सकता है. शहर के कुछ नामी-गिरामी लोगों में राय साहब का रुतबा बहुत है. राजघराने से संबंधित होने के कारण मुख पर वही तेज सुशोभित रहता है.  कहतें है न कि  मिल्कियत भले चली जाये लेकिन शानो शौकत व जीने का अंदाज नहीं बदलता. यह इंसान के खून में ही शामिल होता है. यदि पुरखे राजा महाराजा रहे हों,  तब राजपुताना अंदाज  उनके रहन सहन में झलकता है.

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शहर के बीचों -बीच राय साहब का बंगला है. बाहर बडा सा शाही दरवाजा बंगले की शान है, जिसके भीतर देख पाना मुश्किल है . गेट पर छोटा सा कमरानुमा जगह है जहाँ  दरबान का पहरा रहता है.  या यह कहे कि दिन भर उसके रहने का आशियाना है. बंगले के एक कोने में शानदार 2-2  गाड़ियां खड़ी है. बंगले के चारों तरफ गुलमोहर, संतरा, चीकू, गुलाब, आम, पपई,  अनगिनत फूलों के पौधे बंगले की खूबसूरती में चार चांद लगा रहें हैं . लेकिन इतने बडे घर में रहने वाले सिर्फ दो लोग है . राय साहब और उनकी पत्नी दामिनी. एक  बेटा है जिसे लंदन पढ़ाई करने के लिए भेजा है. दोनों की खूबसूरती व सौंदर्य के चर्चे शहर भर में होते रहते हैं. रूप की रानी दामिनी जितनी सौंदर्य की स्वामिनी है , उतनी ही गुणों की खान  भी है. बंगले का चप्पा चप्पा दामिनी की कला व सौंदर्य से सुशोभित था.  वह दोनों जितने  बड़े बंगले के मालिक है उतने ही  दिल के बहुत अच्छे इंसान भी है .  वह दोनों लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे.

अमीर घरों में पार्टी का चलन आम बात है . जहाँ शबाब और कबाब पूरे चरम पर रहता है. कुछ समय पहले एक पार्टी में रात मालिनी को देखकर राय साहब की आंखें फटी रह गई. मालिनी उनके साथ लंदन में पढ़ती थी जिस पर राय साहब दिलों जान से फिदा थे. मालिनी स्वच्छंद विचरण में यकीन रखती थी. कोलेज के दिनों में  उसने राय साहब के प्रस्ताव को ठोकर मार दी. बात वही समाप्त हो गई . खानदानी परंपरा के अनुसार राय साहब का विवाह दामिनी से हुआ. अप्रतिम सौंदर्य के स्वामिनी दामिनी का शाही अंदाज उसके व्यक्तित्व में झलकता था.

लेकिन इतने बरसों बाद मालिनी को देखकर राय साहब को अपना पहला अधूरा प्यार याद आ गया.  ह्रदय में दबी हुई चिंगारी चुपके से सुलगने लगी. जिस की हवा देने में मालिनी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. अविवाहित मालिनी भी एक कांधे की तलाश में थी जो उसे अपने पुराने आशिक में मिल सकता था.

“और राय कैसे हो ?” … हाथों में जाम लिए,  अधरों पर छलकती मुस्कान व नशीली आंखों से भरी शरारती के साथ मालिनी ने साहब के कंधे पर हाथ रखा.

“अच्छा हूं … मालिनी  इतनी बरसो बाद यहां कैसे…?  मालिनी ने बात काटकर कहा

“काम के सिलसिले में आई थी, आजकल तुम कहां हो? लंबे समय बाद मुलाकत हो रही है . कभी अपने घर बुलाना… !

इससे पहले मालिनी  कुछ बोल पाती  कि  दामिनी ने आकर राय साहब के हाथों में हाथ डाल दिए.

“अब घर चलो, कितनी देर हो गई है, आज आपने बहुत पी रखी है”.

दामिनी के आने पर राय ने मालिनी को दामिनी का परिचय कराया और औपचारिक संवादों के बाद वह दोनों वहां से चले गए.

पर मुलाकाते यहां समाप्त नहीं हुई, यह मुलाकातों की शुरुआत थी. मालिनी  यदा कदा बंगले पर आने लगी. अविवाहित मालिनी को राय के जलवे,  मिल्कियत व दामिनी की किस्मत से रश्क होने लगा.  एक टीस सी उठती थी कि काश उसने राय के प्रस्ताव को उस समय ठुकराया ना होता,  तो आज दामिनी की जगह वह होती.

मालिनी के आने जाने से राय के हृदय में दबी हुई चिंगारी सुलग रही थी . जिसे मालिनी ने भी महसूस किया.  इस भावना ने  दबे पांव  उन्हें  एक दूसरे की तरफ धकेल दिया जिसका उन्हें एहसास भी नहीं हुआ.

दोनों उम्र के इस पड़ाव में आकर्षण ,नई ताजगी, रोमांस, रूमानियत से जीवन में रंग भर रहे थे . मालिनी अब अक्सर उनके घर  आने लगी व उसने दामिनी से भी उतने ही अपनत्व से मित्रता कर ली.

इन बढ़ते हुए कदमों ने मालिनी व राय साहब को एक दूसरे से बहुत करीब ला दिया. प्रेम में घायल पंछी अपनी उड़ान भर रहा था. एक दिन मौका पाकर मालिनी ने राय से कहा-

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“प्रिय कब तक ऐसा चलेगा, यह दूरी अब सही नहीं जाती है ” दोनों तड़प रहे थे लेकिन किस्मत ने जल्दी उन्हें मौका दे दिया .

आज बंगले पर कुछ करीबी दोस्तों के साथ पार्टी थी. इसमें मालिनी ने भी शिरकत की. देर रात तक चली पार्टी का नशा पूरे शबाब था. मालिनी ने चुपके से दामिनी के ड्रिंक में नशे व नींद की गोलियां मिला दी. अधूरी तमन्नाएं व जिंदगी को रंगीन करने की चाहत ने उसे अंधा बना दिया था.

नशे का असर जब शुरू होने लगा, तो वह दामिनी को लेकर उसके कमरे में गई. राय ने यह सब देखा तो पीछे – पीछे आकर पूछा कि – दामिनी को क्या हुआ?

मालिनी ने उसे चुप कराया, कहा-

“पार्टी समाप्त करो फिर बात करते हैं. सब ठीक है ”  कहकर उसने राय को सब कुछ बताकर कहा –

” राय तुम चिंता मत करो, नशा ज्यादा हो गया .अब वह सुबह तक नहीं उठेगी. उसे कुछ नही होगा, बस रात की ही बात है. ”

ऐसा कहकर मालिनी उसके गले लग गई. लेकिन दामिनी अचानक नशे की हालत में उठी तो डर कर मालिनी ने उसे धक्का दे दिया, जिससे वह पलंग से टकराकर वही लुढ़क गई. फिर उनसे वह गलती हो गई जो नहीं होनी चाहिए.

पार्टी को वहीं खत्म करके सबने विदा ली. सुबह जब नशे कि खुमारी उतरी तो राय को अपनी गलती का एहसास हुअा. वह  तेजी से अपने कमरे की तरफ भागा . लेकिन दामिनी कमरे में नहीं थी.  उसने बाथरूम का दरवाजा खोला तो उसकी चीख जोर से निकल गई .  दामिनी बाथटब में पानी के अंदर पड़ी हुई थी, उसने उसे बाहर निकालकर पेट से पानी निकालने का प्रयास किया.   मुख से साँस का प्रयास किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. शरीर निस्तेज हो चुका था.

राय की चीख सुनकर मालिनी दौड़ी आई.

“क्या हुआ… यह कैसे हो गया ? बात गले में अटक गई. “ वह बडबडाने लगी –

” मैंने ड्रिंक में सिर्फ नशे व नींद की गोलियां मिलाई थी,  मैं किसी की जान नहीं लेना चाहती थी….”

राय ने उसे गुस्से में परे धकेला-

” जाओ जल्दी से किसी डॉक्टर को बुलाओ… यह नही होना चाहिये था”.

भय से मालिनी ने उसे शांत करने का प्रयास किया-

” देखो तुम शांत हो जाओ. इसकी साँसे नहीं चल रही है . डाक्टर से क्या कहोगे. पुलिस केस बनेगा . तहकीकात होगी. बात का बतंगड़ बनेगा. शाम को चुपचाप दाह संस्कार करने में ही भलाई है.  इन परेशानियों  से बचने के लिए हमारा चुप रहना ही हितकर होगा . मैं तुम्हारे साथ हूं . चिंता मत करो . मैं रात को आऊंगी. घर के नौकर छुट्टी पर है.  किसी को पता नहीं चलेगा….” मालिनी उसे शांत करने का प्रयास करती रही.

राय, जब मालिनी की बात से सहमत हो गया तो उसने चैन की साँस ली . राय ने बाहर दरबान को आवाज दी

“रामू ,मैडम को घर छोड़ कर आओ और तुम कई दिनों से अपने घर जाना चाहते थे . दो-चार दिन गांव होकर आ जाओ, अभी ज्यादा कुछ काम भी नहीं है”

मालिनी ने जाते जाते इशारा किया घबराओ मत, हम शाम को मिलते हैं.

राय ने किसी तरह दिन काटा और शाम को मालिनी के आने का इंतजार करने लगा. मन को बहलाने के लिए वह टीवी में समाचार सुन रहा था कि एक खबर ने उसे चौंका दिया . देश में महामारी  फैलने के कारण कर्फ्यू दिया गया है. किसी को भी घर से बाहर निकलने की मनाही है. उसने कल ध्यान नही दिया था. मसलन आज रात को वह बाहर नही जा सकते है.

उसने जल्दी से मालिनी को फोन किया कि

” तुम अभी घर आ जाओ, हमें दाह संकार करना होगा. लाश को घर में नही रख सकतें है.”

लेकिन मालिनी ने असमर्थता जाहिर करके अाने से इंकार कर दिया कि आज शहर भर में पुलिस ड्यूटी पर है . मैं नहीं आ सकती हूं. कल मिलती हूँ एक दिन की बात है. अब राय अकेला‌ घर में परेशान घूम रहा था.

काल की मार देखो  कि वह अगला दिन नहीं आया ही नही.  लाक डाउन की मियाद बढाकर एक महीने कर दी गई . मालिनी आ नहीं सकी व इधर राय को आत्मग्लानि होने लगी. भय के बादल मँडरा रहे थे. उसने जल्दी से अपने घर के सब खिड़की दरवाजे सब बंद कर लिए,  बाहर गेट पर ताला लगा दिया जिससे कोई अंदर ना आ सके.

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कुछ पल बैठकर उसने खुद को संभाला. विचार किया कि घर में गाड़ी है. उसे निकालकार लाश को गाडी में ले जाकर रात को उसका क्रिया कर्म करवा दूंगा.  बंगले से बाहर के लोग अंदर कुछ नहीं देख सकता थे.  किंतु बंगले  के चारों तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे थे.  जिससे उसे घर से बाहर  सड़क पर अाने जाने वालों  की  सब जानकारी मिल जाती थी. उसमें अपने मोबाइल पर सीसीटीवी फुटेज देखें . चारों तरफ मुस्तैदी से तैनात पुलिस कर्मी नजर अाए. कर्फ्यू का सख्ती से पालन कराया जा रहा है. आने जाने ‌वालों की चेंकिग हो रही थी. ऐसे में बाहर जाना खतरे से खाली नही था.

एक लाश के साथ इतने दिन गुजारना भयावह था .  समय ने ऐसा चक्र घुमाया कि जिंदगी ठहर गई. राय की हालत अजीब सी होने लगी. लाश के साथ रहना उसकी मजबूरी थी. बार-बार बेडरूम में जाकर चेक करता कि शरीर सुरक्षित है या नहीं. पूरे बंगले में सिर्फ वह था और दामिनी का मृत शरीर .

लाश को घर में रखना चिंता का विषय था. शरीर के  सड़ने  से बदबू फैल सकती है. उसने बेडरूम में ऐसी चलाकर दामिनी के शरीर को पलंग पर लिटा दिया व कमरे का दरवाजा बंद कर दिया . कभी वह कमरे के बाहर जाता तो कभी वह खिड़कियों से झांकता वहीं बैठा रहता .

घबराहट धीरे-धीरे कुंठा में परिवर्तित हो रही थी. भय और ग्लानि के भाव मुख पर नजर आ रहे थे. वह खुद को संयत करने का जितना प्रयास करता उतना ही खुद को दामिनी का दोषी मानता.  अब इन हालातों में जैसे भी हो दिन काटना  मजबूरी है.

एक दिन वह कमरे में दामिनी को देखने गया तो जाने किस भावावेश मेंं उसके मृत शरीर से लिपट गया और पागलों की तरह चिल्लाने लगा.

“दामिनी मुझे माफ कर दो . मेरी गलती की सजा तुम्हें मिल रही है. घर का कोना कोना तुम्हारी महक में रचा बसा है, तुम्हारे बिना मैं नहीं जी सकता, प्लीज वापिस आ जाओ… मैने मालिनी पर विश्वास करके गलती की है…मुझे माफ कर दो ….”  रोते  हुए उसकी आंख लग गई.

थोड़ी देर बाद उसने महसूस किया कि कोई उसके हाथ को सहला रहा है. किसी की गर्म सांसे मुख पर महसूस हो रही है. चिर परिचित महक उसके आगोश में लिपटी हुई है. वह मदमस्त सा उस निश्चल धारा में बहने लगा. तभी अचानक ना जाने कहाँ से उसके पालतू कुत्ते आ गये, जो उनके साथ खेलने लगे.

लेकिन खेलते खेलते अचानक उन्होंने उसके हाथों की उंगलियों को मुंह में दबा लिया. वह उंगलियों को छुड़ाना चाहता है, लेकिन उनकी पकड मजबूत से दर्द का अहसास हो रहा था.  पैने नुकीले दांतो के बीच दबी उंगलियां कट सकती हैं. इस डर से जोर से चिल्लाने लगा. भयभीत आंखें खोली तो खुद को बिस्तर पर पाकर स्वप्न का अहसास हुआ.

लेकिन हाथ की मजबूत पकड अभी भी महसूस हो रही थी. तभी उसने देखा कि दामिनी के हाथ में उसका हाथ फंसा हुआ था और वह उसके शरीर से लिपटी हुई थी.  डर से चीखें निकल गई. वह पसीने से तरबतर, भय से कांपता हुआ जमीन पर बैठ गया.  सांसें उखड़ने लगी, गला सूख रहा था . किसी तरह उठ कर लडखडाते हुए कदमों से वह रसोई की तरफ भागा.  जग से पानी लेकर दो-तीन गिलास पानी पीकर खुद को संयत किया.

लाश  के साथ घर में रहते हुए उसे 15 20 दिन हो चुके थे. हर एक दिन एक  वर्ष के समान लग रहा था . बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे बाल, भयग्रस्त चेहरा उसके सुंदर मुख को डरावना बना रहे थे. घर में जो मिला वह खा लिया. पर अब खाने से ज्यादा पीने शुरू कर दिया .

धीरे-धीरे उसे इन बातों की आदत पडने लगी. पहले वह लाश को देखकर डरता था  लेकिन अब वह उससे बातें करने लगा.  उसकी मन: स्थिति अजीब सी हो रही थी. दामिनी उसकी कल्पना में फिर से जी उठी. दामिनी की अच्छाई  व उसका निस्वार्थ प्रेम अकल्पनीय था. उसकी दुनिया पुन:  दामिनी के इर्द-गिर्द सिमटने लगी. कल्पनिक दुनिया में उसने  अपने सारे गिले-शिकवे दूर कर लिए. अब काल्पनिक दामिनी  हर जगह उसके साथ थी.

घंटों नशे में धुत्त दामिनी से बातें करना, उसका श्रृंगार करना व उसके पास ही सो जाना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गए.

आत्मग्लानि, अकेलापन और दुख उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त कर रहा था . बिछोह की अग्नि प्रबल हो  रही थी . एक दिन वह पागलों जैसी हरकतें करने लगा. दामिनी के सडते हुए शरीर को गंदा समझकर गीले कपडे साफ करने लगा तो शरीर से चमडी निकलने लगी.  उसके पास से बदबू आ रही थी. पर पागल दीवाना राय उसका शृंगार कर रहा था. अंत में उसने शादी वाली साडी अलमारी से निकाली अौर शरीर पर डाल कर दुल्हन जैसा सजा दिया. माँग में सिंदूर भरकर अपनी मोहर लगा दी.

उसकी नजर में वह उसकी वही सुंदर दामिनी थी.  फिर वह उससे बातें करने लगा .देखो दामिनी कितनी सुंदर लग रही हो. उसने उसके माथे पर अपने प्यार की मोहर लगाई,  फिर गले लगकर .

“अब तुम आराम करों, तुम तैयार हो गई हो. मै भी नहाकर आता हूँ. हमें बाहर जाना है.  ”

पगला दीवाना मुस्कुराया.  वह कई दिनों से सोया नही था.  वह सुकुन से सोना चाहता था. आंखों में नींद भरी थी.  पर आंखे बंद नहीं हो रही थी. गला सूख रहा था.  उसने उठकर पानी पिया . फिर जाने किस नशे में अभिभूत होकर नींद की गोलियां खा ली.  उसके बाद वह बाथरूम में गया और टब से टकराकर गिर पडा. नींद मे अस्फुट शब्द फूट रहे थे कि आज उसका व  दामिनी आज पुनर्मिलन होगा.

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एक महीने बाद जब कर्फ्यू खत्म हुआ. तो घर के नौकर -चाकर काम पर वापिस लौट अाए.  घर का बंद दरवाजा देखा तो फोन लगाया लेकिन किसी ने भी फोन नही उठाया . काफी देर तक घंटी बजाने के बाद किसी ने दरवाजा नही खोला तो उन्होंने पुलिस को बुलाया.  बंगले के अंदर करीब जाने पर  तेज आती गंध से सभी को कुछ अनहोनी होने की आंशका  होने लगी.  अंदर जाकर देखा तो दोनो की लाशें पड़ी थी. लाशें सड रही थी. एक लाश पलंग पर सुंदर कपडों में सजी थी, दूसरी वहीं जमीन पर तकिए के साथ पडी थी. उनकी हालत देखकर सबका कलेजा मुँह को आ गया. दोनो का पोस्ट मार्टम कराया गया. रिपोर्ट आने पर पता चला कि दोनों की दम घुटने के कारण मौत हुई थी.  पुलिस आज तक इस मर्डर मिस्ट्री को सॉल्व करने का प्रयास कर रही है .  यह रहस्य कोई समझ नहीं सका कि बंद घर के अंदर दोनो का मर्डर कैसे हुआ.

बुद्धि का इस्तेमाल: भाग 2

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लेखिका- रेखा विनायक नावर

‘‘कैसी हो सुरभि, अब अच्छा लग रहा है न?’’

सिर हिलाते हुए उस ने हाथ से चौकलेट ली और हलके से मुसकराई.

‘‘मोरू, यह हंस रही है क्या? अब देख, उस डाक्टर ने सुरभि को 15 दिन के लिए गोवा बुलाया है, वहीं इस का इलाज होगा.’’

‘‘अरे बाप रे… यानी 15 दिन तक उसे अस्पताल में रहना होगा. मैं इतना खर्च नहीं उठा पाऊंगा,’’ मोरू ने कहा.

‘‘चुप बैठ. मेरा घर अस्पताल के नजदीक ही है. तेरी भाभी भी आई है. 2 दिन के लिए मैं सुरभि को ले कर जा रहा हूं. वह हर रोज इसे अस्पताल ले जाएगी. इलाज 15 दिन तक चलेगा. नतीजा देखने के बाद ट्रीटमैंट शुरू रखने के बारे में सोचेंगे.’’

‘‘ट्रीटमैंट क्या होगा?’’ भाभी ने घबराते हुए पूछा.

‘‘वह डाक्टर तय करेंगे. लेकिन आपरेशन बिलकुल नहीं.’’

सुरभि का ट्रीटमैंट तकरीबन 20 दिन चला. इस बीच मोरू और भाभी 2 बार गोवा आ कर गए. 20 दिन बाद आनंद और उस की पत्नी सुरभि को ले कर सावंतबाड़ी गए.

‘‘सुरभि बेटी, मां को बुलाओ,’’ आनंद ने कहा.

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सुरभि ने आवाज लगाई ‘‘आ… आ…’’ उस की आवाज सुन कर भाभी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

‘‘सुरभि, अपने पापा को नहीं बुलाओगी?’’

फिर उस ने ‘पा… पा…’ कहा. यह सुन कर दोनों की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.

‘‘भैयाजी, सुरभि बोलने लगी है, पर अभी ठीक से नहीं बोल पा रही है,’’ सुरभि की चाची ने कहा.

‘‘भाभी, इतने दिनों तक उस के गले से आवाज नहीं निकली. अभीअभी आई है तो प्रैक्टिस करने पर सुधर जाएगी.’’

‘‘लेकिन, यहां कैसे मुमकिन हो पाएगा यह सब?’’

‘‘यहां के सरकारी अस्पताल में शितोले नाम की एक औरत आती है. वह यही प्रैक्टिस कराती है. इसे स्पीच और आडियो थेरैपी कहते हैं. वह प्रैक्टिस कराएगी तो धीरेधीरे सुरभि बोलने लगेगी.’’

चाचीजी ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘अन्ना महाराज ने सालभर उपचार किया. बहू ने उपवास किए. यह सब उसी का फल है. आनंद, तेरा डाक्टर एक महीने में क्या करेगा.’’

‘‘चाचीजी, जो एक साल में नहीं हुआ, वह 15 दिन में हुआ है, और वह भी मैडिकल साइंस की वजह से. फिर भी सुरभि अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुई है.’’

‘‘लेकिन, उसे हुआ क्या था?’’

‘‘हम सब को अन्ना महाराज के पास जा कर यह जानकारी देनी चाहिए.’’

हम सभी लोग मठ में दाखिल हुए.

‘‘नमस्कार अन्ना महाराज. सुरभि, अन्ना महाराज को आवाज दो.’’

‘‘न… न…’’ ये शब्द सुन कर क्षणभर के लिए अन्ना चौंक गए.

‘‘अरे साहब, सालभर से हम ने कड़े प्रयास किए हैं. मां की तपस्या, भाभी की उपासना कामयाब हुई हैं.’’

‘‘अरे, वाह, पर इसे हुआ क्या था?’’

‘‘अरे, क्या बोलूं. पीपल से लटक कर एक लड़की ने खुदकुशी की थी, उसी के भूत ने इसे पकड़ लिया था, पर अब उस ने सुरभि को छोड़ दिया है.’’

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‘‘मैं खुद उस पीपल से लटक गया था. उस समय मेरे साथ उस की सहेलियां भी थीं. लेकिन, उस ने हमें तो नहीं पकड़ा.’’

‘‘सब लोगों को नहीं पकड़ते हैं. इस लड़की के नसीब में ही ऐसा लिखा था.’’

‘‘और, आप के नसीब में इस के मातापिता का पैसा था.’’

‘‘यह क्या बोल रहे हो तुम? मु झ पर शक कर रहे हो?’’ अन्ना ने तमतमाते हुए पूछा.

‘‘चिल्लाने से  झूठ सच नहीं हो जाता. तुम अपनी ओछी सोच से लोगों को गलत रास्ते पर धकेल रहे हो. सच बात तो कुछ और है.’’

‘‘क्या है सच बात…?’’ अन्ना की आवाज नरम हो गई.

‘‘सुरभि जन्म से ही गूंगी नहीं है, वह बोलती थी, लेकिन तुतला कर, क्लास में लड़कियां उसे ‘तोतली’ कह कर चिढ़ाती थीं, इसलिए वह बोलने से बचने लगी और मन ही मन कुढ़ने लगी.’’

‘‘फिर, तुम ने उस पर क्या उपाय किया. सिर्फ ये दवाएं?’’

‘‘ये दवाएं उस के लिए एक टौनिक थीं, सही माने में उसे ऐसे टौनिक की जरूरत थी, जो उस के मन को ठीक कर सके, जिसे मेरे डाक्टर दोस्त ने पहचाना.

‘‘ये सारी बातें मु झे सुरभि की सहेलियों ने बताईं. गोवा ले जा कर मैं ने उस की काउंसलिंग कराई. उसे निराशा के अंधेरे से बाहर निकाला. इस के बाद बोलने की कोशिश करना सिखाया. अब वह धीरेधीरे 2 महीने में अच्छी तरह से बोलना सीख जाएगी.’’

‘‘यह सब अपनेआप होगा क्या?’’ भाभी की चिंता वाजिब थी.

‘‘अपनेआप कैसे होगा? उस के लिए यहां के सरकारी अस्पताल में उसे ले जाना पड़ेगा. यह सब आप को करना होगा.’’

‘‘मैं करूंगी भाईजी, आप हमारे लिए एक फरिश्ते से कम नहीं हो.’’

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‘‘तो आप इस फरिश्ते को क्या खिलाओगी?’’ आनंद ने मजाक करते हुए पूछा.

‘‘कोंबडी बडे.’’

‘‘बहुत अच्छा. 2 दिन रहूंगा मैं यहां. पहले इस अन्ना महाराज को कौन सा नुसखा दें, क्यों महाराज?’’

‘‘मु झे कुछ नहीं चाहिए, अब मैं यहां से जा रहा हूं दूसरी जगह.’’

‘‘जाने से पहले सुरभि के हाथ से धागा निकालो. तुम्हें दूसरी जगह जाने की बिलकुल जरूरत नहीं है. वहां के लोगों के हाथ में भी धागा बांध कर उन्हें लूटोगे. इसलिए इसी मठ में रहना है. काम कर के खाना, मुफ्त का नहीं. यह गांव तुम छोड़ नहीं सकते. वह तुम्हें कहीं से भी खोज निकालेगा. सम झ

गया न.’’

‘‘डाक्टर साहब, आप जैसा बोलोगे, वैसा ही होगा.’’

घर आ कर मोरू को डांट लगाई,  ‘‘चाचीजी की बात अलग है, लेकिन, तू तो कम से कम सोच सकता था न. तंत्रमंत्र, धागा, धूपदान से किसी का भी भला नहीं होता है. श्रद्धा और अंधश्रद्धा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अंधश्रद्धा बुद्धि खराब कर के एक ही जगह पर जकड़ कर रखती है, इसलिए पहले सोचें कि अपनी बुद्धि का कैसे इस्तेमाल करें.’’

मोरू के दिमाग में आनंद की बात घर कर चुकी थी.

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बुद्धि का इस्तेमाल: भाग 1

लेखिका- रेखा विनायक नावर

2 साल स्कूल की पढ़ाई उस ने यहीं से की थी. एक दिन आनंद को उस समय के अपने सब से करीबी दोस्त रमाकांत मोरचकर यानी मोरू ने अपने घर बुलाया. वक्त मिलते ही आनंद भी अपना सामान बांध कर बिना बताए उस के पास पहुंच गया.

‘‘आओआओ… यह अपना ही घर है,’’ मोरू ने बहुत खुले दिल से आनंद का स्वागत किया, लेकिन उस के घर में एक अजीब तरह का सन्नाटा था.

‘‘क्या मोरू, सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, ऐसा ही सम झ लो.’’

‘‘बिना बताए आने से नाराज हो क्या?’’

तब तक भाभी पानी ले कर बाहर आईं. उन के चेहरे पर चिंता की रेखाएं साफ नजर आ रही थीं.

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‘‘सविता भाभी कैसी हैं आप?’’

‘‘ठीक हूं,’’ कहते समय उन के चेहरे पर कोई भाव नहीं था.

‘‘आनंद के लिए जरा चाय रखो.’’

देवघर में चाची (मोरू की मां) पूजा कर रही थीं. उन्हें नमस्कार किया.

‘‘बैठो बेटा,’’?चेहरे से चाची भी खुश नहीं लग रही थीं.

बैठक में आनंद की नजर गई तो 14-15 साल की एक लड़की चुपचाप बैठी थी, जो उस की उम्र को शोभा नहीं दे रही थी. दुबलेपतले हाथपैर और चेहरा मुर झाया हुआ था. आनंद ने बड़े ध्यान से देखा.

‘‘यह सुरभि है न…? चौकलेट अंकल को पहचाना नहीं क्या? हां, सम झ में आया. चौकलेट नहीं दी, इसलिए तू गुस्सा है. यह ले चौकलेट, यहां आओ,’’ पर सुरभि ने चौकलेट नहीं ली और अचानक से रोने लगी.

‘‘आनंद, वह बोल नहीं सकती है,’’ चाचीजी ने चौंकने वाली बात कही.

‘‘क्या…? बचपन में टपाटप बोलने वाली लड़की आज बोल नहीं सकती, लेकिन क्यों?’’

चाय ले कर आई भाभी ने तो और चौंका दिया, ‘‘सालभर पहले एक दिन जब से यह स्कूल से आई है, तब से कुछ नहीं बोल रही है.’’

‘‘क्या हुआ था…? अब क्यों स्कूल नहीं जाती है?’’

‘‘स्कूल जा कर क्या करेगी? घर में बैठी है,’’ भाभी ने उदास लहजे में कहा.

आनंद इस सदमे से संभला और सुरभि का नाक, गला, कान वगैरह सब चैक किया.

स्पीच आडियो आनंद का सब्जैक्ट नहीं था, फिर भी एक डाक्टर होने के नाते जानकारी तो है.

‘‘मोरू मु झे बता, आखिर यह सब कब हुआ? मु झे तुम लोगों ने बताया क्यों नहीं?’’

‘‘बीते साल अगस्त महीने में अपनी सहेली के साथ यह स्कूल से आई. हम ने देखा, इस की आवाज जैसे बैठ गई थी, लेकिन कुछ दिन बाद तो हमेशा के लिए ही बंद हो गई.’’

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‘‘अरे, यह उस पेड़ के नीचे गई थी, वह बता न…’’ चाचीजी ने कहा.

‘‘कौन से पेड़ के नीचे…? उस की टहनियां टूट कर इस के ऊपर गिर गई थीं क्या?’’

‘‘पीपल के नीचे… टहनी टूट कर कैसे लगेगी. उस पेड़ के नीचे अमावस्या के दिन ऐसे ही होता है. वह भी दोपहर 12 बजे.’’

‘‘यह अकेली थी क्या?’’

‘‘नहीं, 3-4 सहेलियां थीं. लेकिन इसी को पकड़ा न. अन्ना महाराज ने मु झे सबकुछ बताया,’’ काकी की बातें सुन कर अजीब सा लगा.

‘‘अब ये अन्ना महाराज कौन हैं?’’

‘‘पिछले एक साल से अन्ना बाबा गांव के बाहर मठ में अपने शिष्य के साथ रहते हैं और पूजापाठ करते हैं. भक्तों की कुछ भी समस्या हो, वे उन का निवारण करते हैं.’’

‘‘फिर, तुम उन के पास गए थे कि नहीं?’’

‘‘मां सुरभि को ले कर गई थीं. देखते ही उन्होंने कहा कि पीपल के नीचे की बाधा है… मंत्र पढ़ कर कोई धागा दिया और उपवास करने के लिए कहा, जो वे करती हैं.’’

‘‘वह तो दिख रहा है भाभी की तबीयत से. क्यों इन तंत्रमंत्र पर विश्वास करता है? यह सब अंधश्रद्धा नासम झी से आई है. विज्ञान के युग में हमारी सोच बदलनी चाहिए. इन बाबाओं की दवाओं से अगर हम अच्छे होने लगते तो मैडिकल साइंस किस काम की है. डाक्टर को दिखाया क्या?’’

‘‘दिखाया न. गोवा के एक डाक्टर को दिखाया. उन्होंने कहा कि आवाज आ सकती है, लेकिन आपरेशन करना पड़ेगा. एक तो काफी खर्चा, दूसरे कामयाब होने की गारंटी भी नहीं है.

‘‘ठीक है. इस की सहेलियां, जो उस समय इस के साथ थीं, मैं उन से मिलना चाहता हूं.’’

सुरभि की सहेलियों से बातचीत की. आनंद पीपल के नीचे गया और जांचा. यह देख कर मोरू, उस की मां और पत्नी सभी उल झन में थे.

‘‘मोरू, कल सुबह हम गोवा जाएंगे. मेरा दोस्त नाक, कान और गले का डाक्टर है. उस की सलाह ले कर आते हैं,’’ आनंद ने कहा.

‘‘गोवा का डाक्टर ही तो आपरेशन करने के लिए बोला है. फिर क्या यह कुछ अलग बोलेगा? जानेआने में तकलीफ और उस की फीस अलग से.’’

‘‘तुम उस की चिंता मत करो. वहां जाने के लिए मेरी गाड़ी है. आते वक्त तुम्हें बस में बैठा दूंगा. रात तक तुम लोग वापस आ जाओगे.’’

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‘‘लेकिन, अन्ना महाराज ने कहा है कि डाक्टर कुछ नहीं कर सकता है?’’ चाचीजी ने टोका.

‘‘चाचीजी, उस के दिए हुए धागे इस के हाथ में हैं. अब देखते हैं कि डाक्टर क्या बोलता है.’’

न चाहते हुए भी मोरू जाने के लिए तैयार हुआ. घर के बाहर निकलने की वजह से सुरभि की उदासी कुछ कम हुई.

डाक्टर ने चैक करने के बाद दवाएं दीं. कैसे लेनी हैं, यह भी बताया. इस के बाद हम ने आगे की कार्यवाही शुरू की.

सुरभि की तबीयत को ले कर आनंद फोन पर कुछ पूछ रहा था और भाई को भी उस पर ध्यान देने के लिए कहा था. आनंद ने मोरू की बेटी सुरभि के साथ कुछ समय बिताने को कहा था. उपवास,  झाड़फूंक, धागा, अन्ना महाराज के पास आनाजाना सबकुछ शुरू था.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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