नैशनल रजिस्टर सिटीजन्स औफ इंडिया यानी एनआरसी में नाम दर्ज कराने का मामला शहर से ले कर गांव तक में खासकर मुसलिम समुदाय में चर्चा का मुद्दा बना हुआ है. बहुत से लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और वे दहशत में जी रहे हैं. कुछ भक्तगण इस मुगालते में हैं कि ऐसे मुसलिम, जिन के पास कोई दस्तावेज नहीं हैं, वे पाकिस्तान और बंगलादेश वापस चले जाएंगे. उन की सारी जमीनजायदाद हम लोगों की हो जाएगी.

इस मामले पर शाक्य बीरेंद्र मौर्य का कहना है, ‘‘भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी औफ इंडिया’ में, राहुल सांस्कृत्यायन ने ‘वोल्गा से गंगा’ किताब में और तकरीबन सभी इतिहासकारों ने इस बात को माना है कि आर्य बाहर से आए हुए हैं और विदेशी हैं.

‘‘21 मई, 2001 को ‘टाइम्स औफ इंडिया’ ने छापा था कि आर्य विदेशी हैं. इन का डीएनए भारत के लोगों से मैच नहीं करता. इन सब पुरानी बातों के अलावा साल 2018 में एक नए शोध में फिर इस बात की तसदीक हुई कि आर्य बाहर से आए हुए हैं और विदेशी हैं.

ये बी पढ़ें- फेरी वालों के फरेब में फंसते लोग

‘‘जब इतिहासकारों और मैडिकल साइंस ने मान लिया है कि आर्य विदेशी हैं, तो इन विदेशी नागरिकों का एक बार फिर से डीएनए टैस्ट करा कर इन की पहचान कर, इन को वापस भेजना चाहिए. लेकिन दुख की बात है कि भारत में जो खुद विदेशी हैं, आज वही नागरिकता का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं और मूल भारतीय सांसद, विधायक, नेता, मंत्री सब मूकदर्शक बने तमाशा देख रहे हैं. अगर आप में जरा भी राष्ट्र प्रेम बचा है तो लोकसभा और राज्यसभा में इस मुद्दे को बेबाकी से उठाइए.’’

प्रोफैसर अलखदेव प्रसाद अचल ने बताया, ‘‘केंद्र सरकार द्वारा 10 करोड़ मुसलिम, ओबीसी, एससी व एसटी की नागरिकता खत्म करने की कोशिश की जा रही है. कैसे आप की नागरिकता खत्म होगी?

‘‘भारत सरकार सभी नागरिकों से कोई ऐसा दस्तावेज देने के लिए कह रही है, जिस से यह साबित हो पाए कि वह या उस के पूर्वज साल 1971 से पहले भी भारत के नागरिक थे. बहुत से लोगों के पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं होगा, जिसे वे सुबूत के रूप में पेश कर सकें.

‘‘जो लोग साल 1971 के बाद पैदा हुए, जिन के पास जमीनजायदाद होगी या जो लोग जमींदार थे, जिन की जमीनजायदाद है और खतियान में उन का नाम है, वे तो खतियान निकाल कर साबित कर देंगे कि 1971 से पहले भी भारत के नागरिक थे. लेकिन बाकी लोग ऐसा साबित नहीं कर पाएंगे.

‘‘भारत के नागरिकों में कितने लोग थे, जिन के पास साल 1971 से पहले जमीनजायदाद रही होगी? चंद लोगों के पास 1971 से पहले जमीन रही होगी. सिर्फ मुसलिम ही नहीं, बल्कि पिछडे़ और दलितों का एक बहुत बड़़ा तबका नागरिकता के इस पचड़े में फंस जाएगा.

‘‘फिर लोग अपनी नागरिकता बचाने के लिए सरकारी दफ्तरों में दौड़ लगाएंगे और भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने हाथपैर जोड़ेंगे कि उन की नागरिकता बचा ली जाए.’’

क्या कहता है संविधान

अनुच्छेद 5 में बताया गया है कि जब संविधान लागू हो रहा था तो उस वक्त कौन भारत का नागरिक होगा. अगर कोई व्यक्ति भारत में जनमा था या जिस के माता या पिता में से कोई भारत में जनमा हो या अगर कोई व्यक्ति संविधान लागू होने से पहले कम से कम 5 सालों तक भारत में रहा हो, तो वह भारत का नागरिक होगा.

नागरिकता का अधिकार

ऐसे में भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों को एक अधिकार दिया गया है कि कैसे वे लोगों से पैसा ले कर उन की नागरिकता बहाल कर दें. सिटीजनशिप ऐक्ट के जरीए उन्हें यह अधिकार दिया गया है.

सिटीजनशिप ऐक्ट में कोई भी व्यक्ति यह घोषणा कर सकता है कि वह नागरिक नहीं तो कम से कम इस देश में शरणार्थी तो है ही. फिर वह सिटीजनशिप ऐक्ट में नागरिकता के लिए आवेदन करे. अगर वह मुसलिम नहीं है तो उस के आवेदन पर विचार किया जाएगा.

ये भी पढ़ें- पर्यावरण पर भारी धर्म की दुकानदारी

अगर वह मुसलिम है तो आवेदन ही नहीं कर सकता, क्योंकि सिटीजनशिप ऐक्ट में ही ऐसा प्रावधान है कि इस ऐक्ट में सिर्फ उन्हीं लोगों को नागरिकता दी जाएगी, जो मुसलिम नहीं हैं.

मुसलिमों को नागरिकता देने का प्रावधान इस कानून के अंदर है ही नहीं, इसलिए मुसलिम आवेदन भी नहीं कर पाएंगे.

फिर करोड़ों दलित, आदिवासी और पिछडे़, जिन के पास 1971 से पहले कोई जमीनजायदाद नहीं थी, उन्हें शरणार्थी घोषित कर के सालों तक उन से वोट

देने का अधिकार भी छीन लिया जाएगा और उन से नागरिकता के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगवाए जाएंगे.

यह चक्कर कब खत्म होगा, कोई नहीं जानता, क्योंकि राजीव गांधी के जमाने से ऐसा ही चक्कर असम के लोग लगा रहे हैं और पिछले 30 सालों से उन्हें वोट देने के अधिकार को बहाल रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

आने वाले 50 साल तक भूमिहीन याद रखें, इस में वे सभी भूमिहीन लोग शामिल हैं, जो 1971 से पहले भूमिहीन थे, 1971 के बाद जिन लोगों ने आरक्षण पा कर नौकरी पाई और खुद जमीन खरीद ली, वे भी नागरिकता नहीं बचा पाएंगे क्योंकि आप को 1971 से पहले के दस्तावेज देने हैं. पिछडे़ व दलित और पूरे देश में अपनी नागरिकता को बहाल रखने के लिए संघर्ष करते दिख जाएंगे. इस का क्या नतीजा होगा, पता नहीं.

लेकिन उन के संघर्ष करने का एक अवसर होगा. मुसलिमों के पास ऐसा कोई अवसर नहीं होगा, क्योंकि कानून में ही उन को आवेदन देने का प्रावधान नहीं है. जिन मुसलिमों के पास साल 1971 से पहले अपने पूर्वज को इस देश का नागरिक साबित करने का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं होगा, उन्हें बंगलादेशी घोषित कर दिया जाएगा. उन के सारे नागरिक अधिकार खत्म हो जाएंगे.

हो सकता है कि उन के घर या मकान भी सरकार कब्जे में ले ले. ऐसे शरणार्थी लोगों को शहर के किसी बाहरी इलाकों में डिटैंशन सैंटर में डाल दिया जाएगा.

इस बारे में इंजीनियर सनाउल्लाह अहमद रिजवी ने बताया, ‘‘आप कल्पना नहीं कर सकते कि लोगों को कितनी परेशानी होगी. कितने शर्म की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी इस देश के नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी.

‘‘जिन लोगों के भूकंप, बाढ़ जैसी आपदा में कागजात खो गए हों या किसी गरीब ने अपनी अशिक्षा के चलते न बना पाया हो, उन बेचारों पर तो जैसे मुसीबत आ पड़ी है.’’

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुसलिम नहीं फंसेंगे. असम में 19 लाख में से तकरीबन 14 लाख गैरमुसलिम हैं, वैसे ही हर राज्य में उन की तादाद होगी.

तब गैरमुसलिमों यानी हिंदुओं को भी नहीं बख्शा जाएगा और रिफ्यूजी मान कर ही कुछ दिनों की नागरिकता दी जाएगी. वे बैठेबिठाए पाकिस्तानी या बंगलादेशी बन जाएंगे.

जरा गौर से सोचिए और इस काले कानून का विरोध कीजिए. खुश होने वाले यह जान लें कि जिस तरह गांधी, मौलाना, आजाद, भगत सिंह व अशफाकउल्ला ने मिल कर हमें अंगरेजों से नजात दी थी, वैसे ही आज उन के ख्वाबों के साथ जीने वाले लोग मिल कर इन काले अंगरेजों से भी लडें़गे और इस काले कानून का विरोध करेंगे.

ये भी पढ़ें- “अंधविश्वास” ने ली, रुद्र की ‘नरबलि’

बरसों से अपने गांवकसबों से दूर रह रहे लोग, सारे कामकाज छोड़ कर जमीनों की मिल्कीयत और रिहाइश के सुबूत लेने के लिए अपने गांव आएंगे. इन में से कुछ यह भी पाएंगे कि कर्मचारी व पदाधिकारी से सांठगांठ कर के लोगों ने अपनी जमीनों की मिल्कीयत बदल दी है. बहुत बडे़ पैमाने पर संपत्ति के विवाद सामने आएंगे. खूनखराबा भी होगा.

ये दस्तावेज नहीं होंगे मान्य

आधारकार्ड, पैनकार्ड दिखा कर आप अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकते. जो लोग यह सम झ रहे हैं कि एनआरसी के तहत सरकारी कर्मचारी घरघर आ कर कागज देखेंगे, यह उन की भूल होगी. नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी व्यक्ति की होगी, सरकार की नहीं.

इस के अलावा जिस की नागरिकता जहां से सिद्ध होगी, उसे शायद हफ्तों वहीं रहना पडे़. करोड़ों लोगों के कामकाज छोड़ कर लाइनों में लगे होने से देश का उद्योग, व्यापार और वाणिज्य, और सरकारी व गैरसरकारी दफ्तरों का कामकाज चौपट होगा.

अर्थव्यवस्था पर असर

सनक में लाई गई नोटबंदी और जल्दबाजी में लाए गए जीएसटी ने पहले ही हमारी अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है. इक्कादुक्का घुसपैठियों को छोड़ कर ज्यादातर वास्तविक लोग ही परेशान होंगे.

श्रीलंकाई, नेपाली और भूटानी मूल के लोग, जो सदियों से इस पार से उस पार आतेजाते रहते हैं, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने में दांतों से पसीना आ जाएगा. जाहिर है, इन में से ज्यादातर हिंदू ही होंगे.

लगातार अपनी जगह बदलते रहने वाले आदिवासी समुदायों को तो सब से ज्यादा दिक्कत आने वाली है. वन क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोग वहां की जमीनों पर वन अधिकार कानून के तहत अपना कब्जा तो साबित कर नहीं पा रहे हैं, वे नागरिकता कैसे साबित करेंगे?

दूरदराज के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोग, घुमंतू समुदाय, अकेले रहने वाले बुजुर्ग, अनाथ बच्चे, बेसहारा महिलाएं, विकलांग लोग और भी इस से प्रभावित होंगे.

इन की होगी चांदी

इस में कुछ लोगों की पौबारह भी हो जाएगी. बडे़ पैमाने पर दलाल सामने आएंगे. जिस के पास पैसा है, वे नागरिक न होने के बावजूद फर्जी कागजात बनवा लेंगे. नागरिकता साबित करने में सब से ज्यादा दिक्कत उसे होगी, जो सब से ज्यादा लाचार, बेबस और वंचित हैं.

बनेंगे डिटैंशन सैंटर

जो लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे, उन के लिए देश में डिटैंशन सैंटर बनेंगे. इन सैंटरों को बनाने और चलाने में देश के अरबों रुपए खर्च होंगे. कुलमिला कर देश के सामाजिक, माली और राजनीतिक हालात बेहाल हो जाएंगे.

अगर फार्म भरना पड़े

वकील शेख बिलाल का सु झाव है कि सभी नियमों को बहुत ही ध्यान से पढे़ं और भरें. धर्म वाले कौलम में मुसलिम लोग इसलाम लिखें और समुदाय के कौलम में मुसलिम लिखें. इस के अलावा कुछ भी न जोडें़ जैसे शिया, सुन्नी, अहले, हदीस, तबलीग जमात वगैरह.

किसी फार्म को भरने के लिए किसी अधिकारी या कर्मचारी पर निर्भर न रहें. अपना नाम और बाकी डिटेल खुद ही भरें या अपने किसी भरोसेमंद आदमी से भरवाएं. फार्म भरने में बाल पैन का इस्तेमाल करें.

देश के सभी राज्यों में एनआरसी और कैब का विरोध स्वयंसेवी संगठन, शिक्षण संस्थान और राजनीतिक दल के साथसाथ लेखक व पत्रकार अपनेअपने लैवल से कर रहे हैं. इसे सुप्रीम कोर्ट में भी ले जाया गया है.

ये भी पढ़ें- दम तोड़ते परिवार

देश को आजाद कराने वाले और अपनी जान की कुरबानी देने वाले स्वतंत्रता सेनानी व हमारे राष्ट्रभक्तों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस आजादी के लिए हम सबकुछ लुटा रहे हैं, उस भारत का हश्र यह होगा. गुजरात में नर्मदा किनारे सैकड़ों मीटर की ऊंचाईर् पर खड़े पटेल अपने सपनों के भारत को बरबाद होता देखते रहेंगे.

असम में जो दस्तावेज मांगे गए

असम में रहने वाले लोगों को सूची ए में दिए गए कागजातों में से कोई एक जमा करना था. इस के अलावा दूसरी सूची बी में दिए गए दस्तावेजों में से किसी एक को दिखाना था जो कि आप अपने पूर्वजों से संबंध साबित कर सकें. लिस्ट ए में मांगे गए मुख्य दस्तावेजों की लिस्ट :

द्य 1951 का एनआरसी. द्य 24 मार्च, 1971 तक का मतदाता सूची में नाम. द्य जमीन का मालिकाना हक या किराएदार होने का रिकौर्ड. द्य नागरिकता प्रमाणपत्र. द्य स्थायी निवास प्रमाणपत्र. द्य शरणार्थी पंजीकरण प्रमाणपत्र. द्य किसी भी सरकारी प्राधिकरण द्वारा जारी लाइसैंस. द्य सरकार या सरकारी उपक्रम के तहत सेवा या नियुक्ति को प्रमाणित करने वाला दस्तावेज. द्य राज्य के ऐजूकेशन बोर्ड या यूनिवर्सिटी के प्रमाणपत्र. द्य अदालत के आदेश रिकौर्ड. द्य पासपोर्ट. द्य कोई भी एलआईसी पौलिसी.

ऊपर दिए गए दस्तावेजों में से कोई भी 24 मार्च, 1971 के बाद का नहीं होना चाहिए. अगर किसी नागरिक के पास इस तारीख से पहले का दस्तावेज नहीं है तो 24 मार्च, 1971 से पहले का अपने पिता या दादा के डौक्यूमैंट्स में से किसी एक को दिखा कर अपने पिता या दादा से संबंध स्थापित करना होगा. दी गई लिस्ट बी डौक्यूमैंट में उन का नाम होना चाहिए:

जन्म प्रमाणपत्र, भूमि दस्तावेज, बोर्ड या विश्वविद्यालय का प्रमाणपत्र, बैंक, एलआईसी, पोस्ट औफिस रिकौर्ड, राशनकार्ड, मतदाता सूची में नाम.

कानूनी रूप से स्वीकार किए गए दूसरे दस्तावेज-

शादीशुदा औरतों के केस में सर्कल अधिकारी या ग्राम पंचायत सचिव द्वारा दिया गया प्रमाणपत्र.

Tags:
COMMENT