Lockdown में छत पर सजा मंडप और हो गई शादी

ये बात तो है 16 अप्रैल की लेकिन आप भी जानिए कि भला क्यों और कैसे हुई ये अनोखी शादी ? दरअसल जहां एक ओर लोग कोरोना के कारण अपने घर में कैद हैं, सारी शादियां, सारे फंक्शन लोगों ने कैंसिल कर दिये हैं, सारे सेलिब्रिटीज ने भी अपनी पिक्चरें, सिंगर ने अपने कौन्सर्ट, सब कुछ कैंसिल किया हुआ है वहीं दूसरी ओर राजस्थान में एक अनोखी शादी देखने को मिली.

जी हां अब चूंकि ये लौकडाउन जैसी स्थिति में हुई है तो ये अनोखी शादी ही है. दरअसल राजस्थान सूरत के रहने वाले एक व्यक्ति ने कोरोना को ही चुनौती दे दी.उसने इस लॉकडाउन में शादी रचा ली. ना ही बैंड-बाजा था, ना ही बाराती, बस पंडित थे और दुल्हा-दुल्हन और हो गई शादी. घर की छत पर ही मंडप बनवाया, पंडित जी आएं, सीमित परिजन थे,और सभी ने मास्क पहन रखा था बस इतने ही लोगों के बीच में सात फेरे हुए, सभी रस्में अदा हुईं और हो गई शादी.

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जिस व्यक्ति की शादी हुई है उसका नाम दिशांक पूनामिया है और लकड़ी का नाम पूजा बरलोता है. इनकी शादी 16 अप्रैल को तय हुई थी लेकिन इस कोरोना महामारी और लॉकडाउन के चक्कर में ये शादी टालने को मजबूर थे. लेकिन फिर दुल्हा-दुल्हन और उनके परिवार ने ये फैसला किया हम शादी उसी दिन करेंगे लेकिन सीमित लोग होंगे कोई नहीं आएगा. और फिर क्या था एकदम सादगी से दिनांक सोलह अप्रैल को ये विवाह संपन्न हो गया.

हालांकि इन्होंने काफी सपने संजोये थे कि राजस्थान में धूमधाम से सारी रस्में निभाएंगे जिसकी तैयारियां भी जोरो-शोरों से हो रही थीं. लेकिन इस कोरोना उने उनके सारे सपनों को तोड़ दिया. परिजनों का कहना था कि उनके पुरोहित हैं जिनकी राय ली गई इस विषय पर कि क्या करना चाहिए? फिर तो पुरोहित जी ने जो बताया उसके बाद एकमात्र ही उपाय था की शादी उसी तय किए हुए दिन कर दी जाए. पुरोहित जी ने बताया कि आने वाले डेढ़ साल तक शादी का कोई मुहूर्त नहीं है. और होगा भी तो ये उनके लिए ठीक नहीं होगा. फिर परिजनों ने ये फैसला लिया कि शादी कर दी जाए. अब भले ही लॉकडाउन के चलते तैयारियों पर पानी फिर गया हो लेकिन इन दो लोगों को शादी करने से तो कोरोना भी नहीं रोक पाया.

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छींक: भाग 1

हमारे बौस ने सभी को सख्त हिदायत दे दी थी कि चाहे आसमान टूट पड़े या धरती उलट जाए, हर किसी को समय से कुछ पहले दफ्तर पहुंचना है.

मैं ने सुबह जल्दी दफ्तर जाने की तैयारी कर ली और श्रीमतीजी को पुकार लगाते हुए कहा, ‘‘सुनती हो, नाश्ता तो अभी बना नहीं होगा, कल रात का कुछ बचाखुचा है, तो वही गरम कर दो. मु झे दफ्तर के लिए थोड़ा जल्दी निकलना है.’’

श्रीमतीजी पास आ कर चौंकने की ऐक्टिंग करते हुए बोलीं, ‘‘अरे, इतनी जल्दी. ऐसा था तो रात वहीं दफ्तर

में क्यों नहीं रह गए…’’मैं ने भी उन्हीं के अंदाज में जवाब दिया, ‘‘रह तो जाता, अगर आज नया वाला सूट पहन कर न जाना होता. आज दफ्तर में एक बड़े अफसर ‘आकस्मिक छापा’ मारने वाले हैं.’’

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‘‘अब मु झे इतना भी मूर्ख मत सम झो. आकस्मिक का मतलब अचानक होता है, मैं क्या जानती नहीं. ‘आकस्मिक छापा’ उसे कहते हैं, जैसे शादी से पहले मेरे पिताजी ने तुम्हारे घर पर मारा था और रिश्ता टूटने की नौबत आ गई थी. ऐसे छापे का पहले से पता थोड़े ही होता है,’’ श्रीमतीजी ने घूरते हुए कहा.

मु झे सफाई देते हुए राज खोलना पड़ा, ‘‘आजकल की दफ्तरचालीसी तुम कभी नहीं सम झोगी. हैड औफिस में हर किसी के मुखबिर होते हैं, जो वहां की गुप्त सूचनाएं पहले ही बाहर कर देते हैं. हमारे बौस के तो हैड औफिस में 2 मुखबिर हैं.’’

श्रीमतीजी को कुछ यकीन हुआ और वे थोड़ा मायूसी के साथ बोलीं, ‘‘रात का बचा हुआ खाना तो मैं ने कुत्ते को डाल दिया था. तुम ने पहले नहीं बताया, वरना तुम्हारे लिए रख देती… मगर चिंता मत करो, मैं थोड़ी पूजा कर लूं, उस के बाद परांठे सेंक देती हूं… और फिर पूजा तो आज तुम ने भी नहीं की. ऐसे ही चले जाओगे क्या? चलो, पहले पूजा कर लो.’’

अपने कानों को हाथ लगा कर मैं ने कहा, ‘‘मैं कल कर लूंगा. कहीं ऐसा न हो कि पूजा के चक्कर में वहां दफ्तर में मेरी ही पूजा हो जाए… और यह परांठेवरांठे का चक्कर भी रहने ही दो. मैं दफ्तर की कैंटीन में ही कुछ खा लूंगा.’’

मैं उठ कर बाहर की ओर चल दिया. श्रीमतीजी भी मायूसी के साथ मु झे बाहर तक छोड़ने आ गईं.

मैं ने अभी स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि अचानक लुंगीबनियान पहने हमारा पड़ोसी इतनी जोर से छींका कि मु झे लगा, जैसे उस के मकान के साथसाथ मेरा मकान भी हिल कर रह गया है.

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‘‘अरे ठहरो,’’ श्रीमतीजी ने पीछे से मेरा स्कूटर खींच लिया और मैं लहरा कर गिरतेगिरते बचा.

‘‘अरे… रे… रे… यह क्या करती हो,’’ मैं घबरा कर स्कूटर को संभालते हुए बोला.

श्रीमतीजी मेरे कान में फुसफुसाईं, ‘‘सुना नहीं, कितनी जबरदस्त छींक है. बड़ा अपशकुन होता है, अगर चलते समय कोई इस तरह से छींक दे. तुम थोड़ी देर रुक जाओ.’’

‘‘अरे, मुझे देर हो जाएगी,’’ मैं ने कहा, मगर श्रीमतीजी ने आगे बढ़ कर स्कूटर की चाबी अपने कब्जे में ले ली और थोड़ा डर कर बोलीं, ‘‘मौके की नजाकत सम झो. दफ्तर में बड़ा अफसर आ रहा है और इधर इस ने छींक दिया.’’

मु झे रुकता देख पड़ोसी सारी बात सम झ गया और  झेंपते हुए बोला, ‘‘चिंता मत कीजिए भाई साहब, मेरी छींक इतनी बुरी नहीं है, जितनी आप सम झ रहे हैं,’’ फिर वह हंसते हुए घर के अंदर चला गया.‘‘बेहया कहीं का…’’ श्रीमतीजी ने उस के लिए एक गाली निकाली और मु झ से बोलीं, ‘‘छींक तो छींक होती है. मेरी मानो तो तुम 10 मिनट रुक ही जाओ.’’‘‘अगर देर हो गई तो जरूर पछताना पड़ सकता है,’’ मैं ने कहा, मगर हमारी श्रीमतीजी नहीं मानीं.‘‘देखो, तुम्हारा कोई नुकसान हो गया तो वह मेरा ही नुकसान है. मैं तो बाबा रे, कोई खतरा मोल नहीं लूंगी. तुम थोड़ी देर ठहरो. मेरे पास टोनेटोटके वाली एक किताब है. उस में छींक की भी काट होगी. मैं अभी उस के मुताबिक उपाय कर देती हूं, फिर दिनभर मु झे चिंता नहीं रहेगी,’’ यह कह कर वे घर के अंदर चली गईं.

वह किताब पूरे आधे घंटे की तलाश के बाद ही मिल पाई, इस चक्कर में कुछ ऐसी चीजें भी मिल गई थीं, जो काफी समय से गुम थीं.

किताब मिलते ही श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘रोज काम में आने वाली चीज नहीं है न, इसलिए थोड़ी दब गई थी, लेकिन अब केवल 2 मिनट लगेंगे.’’

यह ‘2 मिनट’ कहना महंगा साबित हुआ और किताब में दिए गए टोटके का उपाय करने में श्रीमतीजी को 15-20 मिनट और लग ही गए. उस के बाद ही मु झे जाने की इजाजत मिल पाई.

समय तकरीबन रोज वाला ही हो चला था. मैं स्कूटर ले कर घर से ऐसे निकल भागा, जैसे दीवाली का रौकेट दियासलाई दिखाते ही बोतल से भाग छूटता है.

समय कम था, फिर भी मु झे यकीन था कि मैं 10 बजे से पहले दफ्तर पहुंच जाऊंगा.

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चिडि़या की आंख की तरह मु झे केवल दफ्तर की बिल्डिंग दिखाई दे रही थी और इस चक्कर में एक चौराहे पर लालबत्ती भी मु झे दिखाई नहीं दी.

इस का पता मु झे तब चला, जब अचानक तेज रफ्तार से चल रही एक मोटरसाइकिल पर 2 पुलिस वाले मेरे स्कूटर के बगल में दिखाई दिए और सीटी बजा कर मु झे रुकने का इशारा करने लगे.

मु झे रुकना पड़ा. पुलिस वाले भी रुके और पास आते ही उन में से एक ने सवाल दागा, ‘‘क्यों बे, लालबत्ती भी तुझे दिखाई नहीं दी?’’

शरीफ आदमी तो पुलिस वालों को देख कर वैसे ही कुछ बोल नहीं पाता, फिर मु झ से तो जुर्म हो गया था. मैं हकलाने लगा. कुछ बोल कर और कुछ इशारों से उन्हें अपनी मजबूरी सम झाने की कोशिश करने लगा.

हमारे यहां पुलिस वालों के अंदर एक अच्छी बात यह पाई जाती है कि वे लोगों की मजबूरी सम झ जाते हैं. बस, उन के दिमाग के दयालु हिस्से को जगाने के लिए अपने पर्स की थोड़ी सी भाप उन तक पहुंचानी पड़ती है.

वे शरीफ पुलिस वाले थे. मेरा पर्स सूंघ कर उन्हें 100 रुपए के 2 नोटों की महक भा गई और वे मेरी उन मजबूरियों को भी सम झ गए, जो मैं ने उन को बताई ही नहीं थीं.

मु झ से ज्यादा चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने मु झे फौरन जाने के लिए कहा और मेरे जो 10-15 मिनट बरबाद हो गए थे, उन की भरपाई के लिए आगे पड़ने वाले एक ‘शौर्टकट’ के बारे में भी मु झे जानकारी दे दी.

मैं ने उन का शुक्रिया अदा किया और वहां से छूट भागा. आगे चल कर मैं ने अपना स्कूटर उन के बताए छोटे रास्ते पर मोड़ दिया.

भले ही वह रास्ता ऊबड़खाबड़ था, लेकिन उस समय स्कूटर के टायरों से कहीं ज्यादा चिंता मु झे दफ्तर पहुंचने की सता रही थी.

मैं ताबड़तोड़ चला जा रहा था कि अचानक एक साइकिल वाला मेरे सामने आ गया. उसे बचाने के लिए मैं ने स्कूटर 90 डिगरी के कोण पर बाईं ओर मोड़ दिया और फिर तो अचानक वहां पर जलजला सा आ गया.

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बाईं ओर एक बहुत बड़ा गड्ढा था. उस में घुसते हुए मेरा स्कूटर फुटबाल की तरह उछल कर सीधा किनारे चल रहे एक अधेड़ सज्जन से जा टकराया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

सुबह की किरण: भाग 3

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उसे किसी ने बताया था कि उस दिन जिलाधिकारी न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई करेंगे. जब वह उस के न्यायालय में पहुंची तो समीर मुकदमे की कोई फाइल देख रहा था. वह न्यायालय में खड़ी थी किंतु समीर ने उसे नहीं देखा और वह झट न्यायालय के कमरे से बाहर आ गई. फिर अपने घर पहुंची. अब उस ने सोचा कि वह उस के आवास में जा कर मिलेगी. जब वह उस के आवास पहुंची तो फिर चपरासी ने स्लिप मांगी. उसे लगा, वह तो लड़की है, लोग जाने उस के बारे में क्याक्या सोचने लगें, इसलिए उस से बिना मिले ही वापस घर लौट आई.

समीर को जिला में पदस्थापित हुए 4 महीने से अधिक हो गए थे, किंतु उन दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी. अब तक मनोविज्ञान पर प्रीति की लिखी पुस्तक ‘आने वाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ को छापने के लिए दिल्ली का पाठ्यपुस्तकों से संबंधित एक प्रकाशक तैयार हो गया था. पुस्तक की पांडुलिपि उस ने प्रकाशक को सौंप दी थी जो अब मुद्रण के लिए भेजी जा चुकी थी.

अगले महीने उस की प्रतियां तैयार हो कर आ जाने वाली थीं और पुस्तक का विमोचन उस के कालेज के हौल में होना तय हुआ था. प्रिंसिपल के आग्रह पर जिलाधिकारी समीर ने भी विमोचन समारोह में आना स्वीकार कर लिया था और उसी के हाथों उस की पुस्तक का विमोचन होना था.

काम की बहुत ज्यादा व्यस्तता के कारण समीर का ध्यान इस ओर नहीं गया था कि इस की लेखिका वही प्रीति है जो कभी दिल्ली में उस के साथ मनोविज्ञान में एमए कर रही थी. पिं्रसिपल साहब खुद इन्विटेशन ले कर गए थे और प्रीति ने उन से कभी समीर की चर्चा नहीं की थी.

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प्रीति यह सोच कर काफी उत्सुक और रोमांचित थी कि उस की पुस्तक का विमोचन समीर के हाथों होगा और उसी के द्वारा वह सम्मानित की जाएगी. वह सोच रही थी कि वह क्षण कैसा होगा जब वह पहली बार इतने दिनों के बाद समीर के सामने जाएगी. आज वह दिन आ ही गया था.

रात में उसे नींद ठीक से नहीं आई थी. बारबार उसे समीर की बातें, उस के साथ घंटों मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर हुई चर्चाएं याद आ रही थीं. उस समय समीर उस से बारबार कहता था कि वह आईएएस बन कर समाज की सेवा करना चाहता है और अब उस की मनोकामना पूरी हो गईर् थी. उस ने जो सोचा था उसे वह मिल गया था.

क्या समीर की शादी हो गई है या अभी भी वह कुंआरा है, यह प्रश्न भी उस के मन में बारबार कौंध रहा था. वह सोच रही थी कि यदि समीर की शादी हो गई है तो उस की पत्नी कैसी होगी. यदि समीर ने उसे देख कर पुरानी बातों को कुरेदना शुरू किया तो उस की पत्नी की प्रतिक्रिया क्या होगी? कहीं वह उस के संबंधों को ले कर आशंकित तो न हो जाएगी.

उस के मन में पहली बार इतना उत्साह था. दिल में हलचल थी. वहीं, अंदर से समीर से मिलने का एक मधुर एहसास भी था. उस ने अपनी सब से अच्छी साड़ी निकाली और पहली बार अपना इतनी देर तक शृंगार किया. आज सच में वह काफी सुंदर लग रही थी.

पुस्तक विमोचन समारोह के लिए कालेज के हौल को काफी सजाया गया था. शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों को भी बुलाया गया था. दूसरे कालेजों के शिक्षक और कई विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया था. सब के खानेपीने का इंतजाम पुस्तक के प्रकाशक की ओर से था.

वह कालेज रिकशा से जाती थी, किंतु आज प्रिंसिपल ने उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी ड्राइवर के साथ भेजी थी और कालेज के एक जूनियर लैक्चरर को भी साथ लगा दिया था.

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जब वह कालेज के हौल में पहुंची तो अधिकतर मेहमान आ चुके थे. लाउडस्पीकर पर कोई पुराना संगीत काफी कम आवाज में बज रहा था. पुस्तक विमोचन की सारी आवश्यक तैयारियां कर ली गई थीं. अब जिलाधिकारी के आने की प्रतीक्षा थी.

तभी जिलाधिकारी समीर के आने का माइक पर अनाउंसमैंट हुआ. समीर के स्टेज पर पहुंचते ही सभी उपस्थित मेहमान उस के सम्मान में खड़े हो गए.  प्रिंसिपल ने समीर का स्टेज पर स्वागत किय??ा और उन्हें अपनी बगल में विशेष अतिथि के रूप में बैठाया. ठीक उस के बगल में प्रीति भी बैठी हुई थी. प्रीति ने समीर को देख कर हाथ जोड़े तो वह अप्रत्याशित रूप से उस को स्टेज पर देख कर विस्मित होते हुए बोला, ‘‘अरे तुम, प्रीति?…यहां?’’

‘‘क्या आप एकदूसरे को पहचानते हैं?’’ प्रिंसिपल ने पूछा.

‘‘हम दोनों ने एक ही साथ दिल्ली में एक ही कालेज से साइकोलौजी में एमए किया है.’’

‘‘लेकिन प्रीति ने यह कभी नहीं बताया,’’ प्रिंसिपल ने अब प्रीति की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘क्यों प्रीति, इतना बड़ा राज तुम छिपाए हुए हो. मुझे तो कम से कम बताया होता.’’

प्रीति प्रिंसिपल को क्या बताती कि उस ने कई बार समीर से मिलने की कोशिश की थी लेकिन कुछ संकोच, कुछ झिझक और परिस्थितियों ने उसे उस से नहीं मिलने दिया और चाह कर भी वह समीर से अपने संबंधों को अपने सहकर्मियों के साथ साझा न कर पाई.

‘‘समीर तुम से मिलने की मैं ने बहुत बार कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाई,’’ वह सकुचाते हुए धीरे से बोली.

‘‘अब यह बहानेबाजी न चलेगी प्रीति. फंक्शन के बाद मैं तुम्हारे घर पर आऊंगा. मां कैसी हैं?’’

सुनते ही प्रीति की आंखें नम होने लगीं और वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाई तो प्रिंसिपल ने मामले की नाजुकता को समझते हुए, बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘इत्मीनान से इस संबंध में बातें होंगी. अभी हम लोग पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम शुरू करते हैं.’’

पुस्तक का विमोचन करते हुए समीर ने प्रीति की सादगी, नम्रता और उस के कोमल भावों की विस्तृत चर्चा करते हुए अपने कालेज के दिनों की यादों को सब के साथ साझा करते हुए कहा कि प्रीति कालेज में एक ऐसी लड़की थी जिस से हमारे प्रोफैसर भी बहुत प्रभावित थे. प्रीति को साइकोलौजी पर जितनी पकड़ है उतनी बहुत कम लोगों को होती है. हमें गर्व है कि इस शहर में हमारे बीच प्रीति जैसी एक विदुषी हैं.’’

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समीर की बातों से पूरा हौल तालियों से गड़गड़ाने लगा तब प्रीति ने महसूस किया कि समीर, जिस के बारे में उस ने सोचा था कि वह उसे भूल गया है, बिलकुल उस की थोथी समझ थी. उस के दिल में उस के प्रति अभी भी उतना ही लगाव और प्रेम है जितना कालेज के दिनों में हुआ करता था.

फंक्शन के बाद समीर ने उस से उस का फोन नंबर लिया और उस के घर की लोकेशन नोट करते हुए कहा कि इस रविवार को वह उस के साथ ही लंच करेगा. अपना विजिटिंग कार्ड उसे थमाते हुए उस ने रविवार को इंतजार करने के लिए कहा.

फंक्शन के बाद उस के सभी सहकर्मी उस को आंखें फाड़ कर देख रहे थे. समीर ने सभी लोगों के बीच जिस प्रकार प्रीति की प्रशंसा की थी और सम्मान दिया था उस का किसी को भी अनुमान नहीं था. प्रीति ने घर आ कर पूरे घर को साफ किया, ड्राइंगरूम में सोफे को करीने से लगाया और घर के बाहर पड़े हुए गमलों को ठीक से लगाया और उन में पानी दिया.

मां के गुजर जाने के बाद प्रीति अंदर से काफी टूट गई थी. घर में कोई नहीं था और उस का जीवन अकेलेपन के दौर से गुजर रहा था, इसलिए पूरा घर ही अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था. किंतु समीर ने जब से कहा था कि रविवार को उस के घर आ कर उस के साथ लंच करेगा उस के शरीर में एक नया ही उत्साह पैदा हो गया था, मनमयूर नाचने लगा था और जीवन के प्रति एक नया नजरिया पैदा हो गया था.

रविवार को सुबह से ही प्रीति समीर के लिए लंच की तैयारी में लगी हुई थी. इस बीच फोन पर उस ने प्रयागराज से नीलम को भी बुला लिया था. वह पुस्तक विमोचन समारोह में कुछ जरूरी कामों में व्यस्त रहने के कारण नहीं आ पाई थी. नीलम भी समीर से मिलने के लिए उत्साहित थी. एक लंबे समय के बाद तीनों एकसाथ एक टेबल पर मिलने वाले थे.

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समीर ने उसे फोन पर सूचना दी थी कि वह रविवार को 2 बजे के बाद आएगा, उसे एक जरूरी मीटिंग में शामिल होना है क्योंकि जिले में सोमवार को सीएम का दौरा होने वाला था. किंतु वह उस दिन 12 बजे ही आ गया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

खाने को कुछ नहीं था तो कोबरा सांप को मार कर ही खा गए

पेट की भूख क्या न करा दे. देश में जारी लौकडाउन के बीच लोगों को जरूरी चीजें मुहैया कराने में एक बार फिर से सरकार विफल रही है. यह विफलता भी नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के बाद देश में फैली अव्यवस्था सरीखा ही है जब गरीब लोगों की जेब खाली है, खाने के लाले पङ गए हैं और तो और सरकार से मदद मांगने के बावजूद भी कोई ठोस व स्थाई मदद नहीं मिल रही.

इस खबर ने चौंका दिया

ताजा मामला अरूणाचल प्रदेश का है जहां भूख से बिलबिलाते लोगों तक सरकारी मदद नहीं पहुंच सकी तो कुछ लोग एक विषैला कोबरा को ही मार कर खा गए. हालांकि राज्य के लोगों के लिए मांसाहार मुख्य आहार है मगर किंग कोबरा संरक्षित प्राणी है और इसे मारना अथवा पङकना गैरकानूनी है.

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मगर देश में लागू लौकडाउन से आम लोगों को बहुत परेशानियां झेलनी पङ रही हैं. केंद्र और राज्य की सरकारें गरीब और जरूरतमंद लोगों को भले ही मुफ्त राशन और नकद राशि देने का दावा कर रही है मगर इस बीच अरूणाचल प्रदेश से आई इस खबर ने सब को चौंका दिया है.

कई दिनों से भूखे थे

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में घर में जरूरी राशन नहीं होने की वजह से कुछ लोग लगभग 10 फुट लंबे कोबरा को मार कर खा गए.

cobra

वायरल खबर के अनुसार 3 लोग एक मरे हुए कोबरा को गले में लटकाए खङे हैं. इन में से एक ने मास्क भी लगाया है. वे बता रहे हैं कि इस कोबरा को उन्होंने जंगल से पकङा है. घर में न तो आटाचावल है न ही सब्जी. हम कई दिनों से भूखे हैं लिहाजा अब इस सांप को खाएंगे.

खारिज किया सरकार ने दावा

उधर मामला अरूणाचल प्रदेश सरकार तक पहुंचा तो सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया और दावा किया कि राज्य में चावल की कोई कमी नहीं है.

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सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया,”राज्य में हर जगह लगभग 3 महीने का स्टौक है और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है.”

अब कानूनी काररवाई तय

मालूम हो कि अरूणाचल प्रदेश में  किंग कोबरा सहित कई दुर्लभ प्रजातियों के सांप बङी संख्या में पाए जाते हैं. वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत किंग कोबरा संरक्षित प्राणी है जिस को मारना अथवा पङकना गैरकानूनी है, इसलिए इन लोगों पर अब कानूनी कार्रवाई होनी तय है. इस के शिकार करने वाले को 5 साल तक का जेल और 25 हजार का जुरमाना भी हो सकता है.

सरकार की ओर से जारी बयान के अनुसार, “इन लोगों पर केस दर्ज हो चुका है और फिलहाल ये तीनों अभी फरार हैं. इन्हें जल्द ही पकङ कर उचित कानूनी काररवाई की जाएगी.”

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राज्य के डिप्टी चीफ, वाइल्ड लाइफ वार्डन उमेश कुमार ने मीडिया से बातचीत में बताया,”किंग कोबरा के शिकार की सूचना मिलने पर जब विभाग की टीम पहुंची तो तो जांच के बाद इस घटना की पुष्टि हुई है. आरोपी को पकङने की कोशिश की गई तो गांव वाले की आङ ले कर वे फरार हो गए.”

इस मामले पर राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी बयान दिया है और कहा है कि जंगली जानवरों का शिकार करना कानूनी अपराध है और संबंधित लोगों के खिलाफ हर हाल में काररवाई होगी.

छींक: भाग 2

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मैं ने उस दुकानदार की बात का जवाब देना जरूरी नहीं सम झा और उठ कर तेजी से बाहर आ गया. सब से पहले मैं ने अपना ही मुआयना किया. हैलमैट की वजह से सिर तो सलामत रह गया था, मगर घुटने और कुहनियां ऐसे लगने लगे थे, मानो किसी ने उन पर रंदा चला दिया हो. सूट भी फट गया था.

दूसरी ओर पड़े अधेड़ सज्जन बुरी तरह चीखते हुए मु झे गालियां दे रहे थे और मेरा ड्राइविंग लाइसैंस रद्द करने की मांग भी उठा रहे थे. आसपास के लोगों ने उन्हें अपने घेरे में ले रखा था और टटोलटटोल कर उन की चोटों का मुआयना कर रहे थे.

मैं ने वहां से निकल कर भागना चाहा और स्कूटर उठा कर उसे स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन नाजुक मौके पर वह भी धोखा दे गया.

तभी मोटाताजा सा एक आदमी मेरे पास आया और बोला, ‘‘अपनेआप को हवाईजहाज का पायलट सम झता है क्या? और अब भागता है, चल इधर, उस आदमी को अस्पताल पहुंचा.’’

उस ने मु झे घसीटा, तो मैं मिमियाया, ‘‘भाई साहब, मेरा स्कूटर…’’ सामने ही एक स्कूटर मेकैनिक ने अपना दरबार फैला रखा था. वह दौड़ कर आया और स्कूटर को अपने कब्जे में लेते हुए बोला, ‘‘आप का स्कूटर मेरे पास है, शाम तक इसे बिलकुल चकाचक कर दूंगा.’’

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मैं विरोध करने की हालत में नहीं था और घिसटता हुआ घायल आदमी के पास चला गया. वह लगातार मरनेमारने की बात कर रहा था.

वह आदमी तभी थोड़ा शांत हुआ, जब मैं ने उस के इलाज का पूरा खर्चा उठाने का वादा किया. उस ने मु झे गालियां देना तो बंद कर दिया, मगर कराहना उस के बाद भी जारी रखा.

मैं परेशानी की हालत में उसे एक टैक्सी में लाद कर अस्पताल ले गया. वहां पर एक डाक्टर ने दूर से ही देख कर बता दिया कि उस के पैर की हड्डी चटक गई है, फिर वह मु झ से बोला, ‘‘आप काउंटर पर पैसा जमा करा दें, उस के बाद हम इलाज शुरू कर देते हैं.’’

‘‘आप इलाज शुरू कर दीजिए डाक्टर साहब. अभी तो जेब में पैसे नहीं हैं, थोड़ी देर बाद घर से मंगवा लेंगे,’’ मैं ने गुजारिश की.

डाक्टर बोला, ‘‘कोई बात नहीं, इलाज भी थोड़ी देर बाद हो जाएगा.’’

मैं उसे घूर कर रह गया और श्रीमतीजी को टैलीफोन करने के लिए वहीं रिसैप्शन की ओर बढ़ गया.

पूरी बात बता कर मैं ने श्रीमतीजी को घर में रखा सारा पैसा और इमर्जैंसी के लिए 2-4 गहने भी साथ ले कर फौरन अस्पताल पहुंचने के लिए कह दिया. वे फोन पर ही रोने लगी थीं, मगर मैं ने फोन काट दिया.

दफ्तर तो अब अगले 2-4 दिन भी जाने के आसार खत्म हो गए थे, इसलिए अगला फोन मैं ने दफ्तर में अपने बौस को किया और सारा हादसा उन्हें बता दिया.उन्होंने हमदर्दी जताने के बजाय मु झे फटकारा, ‘तुम ठीक समय पर हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ कर देते हो. स्कूटर ढंग से नहीं चला सकते थे क्या? अगर बड़े साहब तुम्हारी सीट से जुड़ी कोई जानकारी मांगने लगते, तो मैं किस का मुंह देखता.

‘कान खोल कर सुन लो, चाहे पूरे बदन पर पट्टियां बांध कर आना पड़े, मगर कल ठीक समय पर दफ्तर पहुंच जाना. बड़े साहब ने आज आने का प्रोग्राम रद्द कर दिया है. अब वह कल आएंगे,’ यह कह कर उन्होंने फोन काट दिया.

मेरी इच्छा हुई कि अपना बचाखुचा सूट भी फाड़ कर बराबर कर दूं. कुछ ही देर बाद श्रीमतीजी अस्पताल पहुंच गईं और मु झे टटोलटटोल कर रोने लगीं.

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उन्हें देख कर घायल हुए सज्जन अपना दर्द भूल कर मु झ से पूछ बैठे, ‘‘किसी की मौत हो गई है क्या?’’

‘‘नहीं, होतेहोते रह गई,’’ मैं ने उन्हें घूरते हुए कहा और श्रीमतीजी से रुपए ले कर पहले उन का ‘कर्जा’ चुकाया और उस के बाद इलाज का पैसा भी जमा करा दिया.

पहले मैं ने उन सज्जन की टांग पर प्लास्टर चढ़वाया और बाहर ले जा कर उन्हें एक आटोरिकशा पर बैठा दिया.

मु झे चलताफिरता देख श्रीमतीजी ने रोना बंद कर दिया था और सारा कुसूर मेरे सिर थोपते हुए कहने लगीं, ‘‘तुम्हें आज घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहिए था. मु झे तो पहले ही पता था कि पड़ोसी की छींक कोई साधारण छींक नहीं है. दफ्तर में बड़ा अफसर ही तो आ रहा था, कोई जल्लाद तो नहीं जो तुम्हें फांसी पर चढ़ा देता… और आज आया भी नहीं, क्यों नहीं आया वह?’’

‘‘अरे, मु झे क्या पता?’’ मैं ने हकलाते हुए कहा.

श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘किसीकिसी छींक का असर टोटके से भी नहीं टूटता या टूटने में कुछ ज्यादा ही समय ले लेता है. तुम्हें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी.’’

डाक्टर हमारी बातें बड़े गौर से सुन रहा था. वह अचानक हंसने लगा और हमें देख कर बोल उठा, ‘‘शक्लसूरत से तो आप पढ़ेलिखे लगते हैं.’’

‘‘जी हां,’’ मैं ने अकड़ कर कहा.

डाक्टर मजाक उड़ाते हुए बोला, ‘‘कमाल है, फिर भी आप भूल गए कि ‘छींक’ आना एक आम बात है, अच्छेबुरे से इस का कोई संबंध नहीं होता. हमारे आतेजाते पता नहीं कितने लोग छींकते हैं. पता नहीं, कितनी बिल्लियां रास्ता काट जाती हैं. अगर हम भी रुक कर टोटका करवाने लगें, तो यहां अस्पताल में इस बीच पता नहीं क्याक्या हो जाए.’’

‘लेकिन डाक्टर साहब, हमारी हालत तो आप देख ही रहे हैं,’ हम दोनों एकसाथ बोले.

‘‘स्कूटर चलाते समय जल्दबाजी करोगे, तो हालत इस से भी बुरी हो सकती थी. छींक के चक्कर में न उल झ कर ठीक समय पर घर से निकलते तो यह सब क्यों होता? आप को तो अपनी बीवी को सम झाना चाहिए था, मगर आप भी उन का ही साथ देने लगे…

‘‘अगर आप सम झते हैं कि आप के साथ यह सबकुछ छींक की वजह से हुआ है, तो उस बेचारे की टांग क्यों टूटी? आप का पड़ोसी उस के सामने तो छींकने नहीं गया था.’’

हम शर्मिंदा हो उठे. हमारी श्रीमतीजी सोच में डूबी दिखाई देने लगी थीं.

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मेरी मरहमपट्टी करने के बाद डाक्टर बोला, ‘‘अब आप जा सकते हैं. 3 दिन बाद पट्टियां बदलवाने आ जाना और हो सके तो अपने पड़ोसी को भी यहां ले आना, हम उस की छींक भी बंद कर देंगे,’’ इतना सुन कर  झेंपी हुई मुसकान के साथ मैं अपनी श्रीमतीजी का हाथ पकड़े हुए अस्पताल से बाहर निकल गया.अभी हम अस्पताल से बाहर निकले ही थे कि एक आदमी ने सामने आ कर एक जोरदार छींक मारी. मैं ठिठक कर रुक गया, तभी श्रीमतीजी मु झे धकेलते हुए बोलीं, ‘‘अरे, छींक आना एक आम बात है, पढ़ेलिखे हो कर इतना भी नहीं जानते?’’मैं अपनी श्रीमतीजी के कंधे से कंधा मिला कर आगे की ओर बढ़ गया.

सुबह की किरण: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- सुबह की किरण: भाग 1

प्रीति अभी दिल्ली में ही थी कि एक दिन सुबह सुबह ही उसे खबर मिली कि उस की मां को हार्टअटैक आया है और वह अस्पताल में भरती है. सुनते ही वह आगरा के लिए भागी किंतु वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि उस की मां अब दुनिया में नहीं रहीं.

प्रीति पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. वह फफक कर रोने लगी. अब उस का एकमात्र सहारा मां भी उसे छोड़ गई थीं. अस्पताल में वह मां के शव को पकड़ कर रो रही थी. उस को सांत्वना देने वाला कोई नहीं था. उस की मां के औफिस वाले आए हुए थे. उन लोगों ने कहा, ‘‘बेटी, अब अपने को संभाल…यह समय रोने का नहीं है. उठो, अब मां का दाहसंस्कार करने की सोचो…अब आग भी तुम्हें ही देनी है.’’

इस दुखभरी घड़ी में अपनों की कितनी याद आती है. उस ने समीर को फोन लगाया लेकिन उस का फोन तो डैड था. शायद उस ने नंबर बदल लिया था. अंतिम बार जब उस से भेंट हुई थी तो कहा था, अब दूसरा सिम लेगा. हारथक कर उस ने नीलम को याद किया. नीलम से उस की शादी में अंतिम बार भेंट हुई थी. वैसे भी उस से कभीकभी बातें होती रहती थीं. उस के हस्बैंड की प्रयागराज में एक बड़ी कपड़े की दुकान थी. वह खुले विचारवाला युवक था, इसलिए नीलम को कहीं आनेजाने में रोक नहीं थी.

नीलम खबर सुनते ही आगरा के लिए अपनी गाड़ी से चल पड़ी. प्रीति के जिम्मे अभी काफी काम थे. अस्पताल का बिल चुकाना, मां का दाहसंस्कार क्रिया करना और अकेले पड़े घर को संभालना. एक युवती जिस को दुनियादारी का भी कोई ज्ञान न हो और जिस की जिंदगी मां पिता की छत्रछाया में बीती हो, व जिस को घर संभालने का कोई व्यावहारिक ज्ञान न हो, अचानक इस तरह की विपत्ति पड़ने पर क्या स्थिति हो सकती है, यह तो वही समझ सकती है जिस के सिर पर यह अचानक बोझ आ पड़ा हो.

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इस स्थिति में पड़ोसी भी बहुत काम नहीं आते सिवा सांत्वना के कुछ शब्द बोल देने के. और जिस का कोई अपना न हो उस के लिए तो यह क्षण बड़े ही धैर्य रखने और आत्मबल बनाए रखने का होता है और वह भी तब जब कोई अपना बहुत ही करीबी उसे छोड़ कर चला गया हो. सब से बड़़ी दिक्कत यह थी कि उस के पास पैसे नहीं थे और मां के बैंक अकाउंट का उस के पास कोई लेखाजोखा न था. पिछले महीने मां ने उस के खाते में जो पैसा ट्रांसफर किया था वह अब तक खर्च हो चुका था.

नीलम से वह कुछ मांगना तो न चाहती थी किंतु उस के पास इस के सिवा कोई रास्ता भी नहीं बचा था, इसलिए उस ने उस से कुछ मदद करने के लिए कहा. नीलम ने चलते वक्त चैकबुक और अपना डैबिट कार्ड भी पास में रख लिया. नीलम ने गांव के अपने सहोदर चाचाजी को बुला लिया जिन्होंने प्रीतिकी मां के दाहसंस्कार करवाने में बहुत मदद की. नीलम ने अस्पताल के सारे बिल भर दिए और मां के दाहसंस्कार व पारंपरिक विधि में होने वाले दूसरे आवश्यक खर्च को वहन किया.

प्रीति दकियानूसी विचारों वाली युवती नहीं थी, इसलिए उस ने विद्युत शवदाह द्वारा अपनी मां का दाहसंस्कार किया और अन्य पारंपरिक क्रियाएं भी बहुत सादे ढंग से संपन्न कीं. जब तक प्रीति सारी क्रियाओं से निबट नहीं गई तब तक नीलम उस के साथ रही.

परिस्थितियां चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों मनुष्य को उस से तो बाहर निकलना ही पड़ता है और प्रीति भी इस से निकल तो गई किंतु वह जिस खालीपन का एहसास कर रही थी उसे भरना बहुत ही मुश्किल था.

कुछ समय बाद नीलम प्रयागराज लौट गई और प्रीति अपने मकान को एक विश्वस्त आदमी को किराए पर दे कर अपना रिसर्च वाला काम पूरा करने के लिए दिल्ली लौट आई. उसे पता चला कि उस की मां ने अपने नाम से एक इंश्योरैंस भी कराया था जिस का अच्छाखासा पैसा नौमिनी होने के कारण उसे मिल गया.

मां के बैंक अकाउंट में भी काफी पैसे थे, इसलिए उस को अपने रिसर्च के काम में कोई दिक्कत न आई. उस ने नीलम का सारा पैसा लौटा दिया. समय बीतता गया और उस के साथसाथ प्रीति भी पहले से ज्यादा समझदार व परिपक्व होती गई. उसे आगरा के ही एक कालेज में लैक्चरर की नौकरी मिल गई.

इस दुनिया में कहां किसी को किसी से मतलब होता है. वह अकेली थी. समीर जो कभी उस के दिल के करीब आ चुका था उस से भी उस का संपर्क टूट गया था. नीलम अपने घर चली गई थी जिस से कभीकभी फोन पर बातचीत होती रहती थी.

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लड़कियों की शादी में तो वैसे ही काफी दिक्कतें होती हैं और उस का तो एक पैर भी खराब था. और उस की शादी के बारे में सोचने वाला भी कोई नहीं था. जो लोग उस के संपर्क में आते थे, वे उस की सुंदरता से आकर्षित हो कर आते थे न कि उस का जीवनसाथी बनने के लिए. इसलिए ऐसे लोगों से वह हमेशा ही अपने को दूर रखती थी. अब तो उस की जिंदगी का एक ही मकसद था घर से कालेज जाना, वहां मनोयोग से छात्रों को पढ़ाना और शाम को घर लौट कर मनोविज्ञान की पुस्तकों का गहरा अध्ययन करना.

इधर, वह मनोविज्ञान पर एक किताब लिख रही थी जिस से उस का खालीपन कट जाता था. कालेज के उस के सहकर्मी पढ़ाने में कम कालेज की आपसी राजनीति में ज्यादा इंटरैस्ट लेते थे और उन की इन बेवजह की चर्चाओं से वह अपने को हमेशा ही दूर रखती थी, इसलिए उन लोगों से भी उस का ज्यादा संबंध नहीं था.

किंतु कालेज के प्रिंसिपल उस को बहुत सम्मान देते थे क्योंकि उन की निगाहों में उसे इतनी कम उम्र में काफी अच्छी जानकारी थी, इसलिए वे उस की हर संभव मदद भी करते थे. कालेज के छात्र भी उस की कक्षाओं को कभी भी नहीं छोड़ते थे क्योंकि उस से अच्छा लैक्चर देने वाला कालेज में कोई अन्य लैक्चरर नहीं था.

एक दिन सुबह उस ने अखबार में देखा कि समीर नाम का कोई आईएएस अधिकारी उस के शहर में जिला अधिकारी बन कर आया हुआ है.

समीर नाम ने ही उस के दिल में हलचल पैदा कर दी. वह सोचने लगी यह वही समीर तो नहीं जो कभी उस के दिल के बहुत करीब हुआ करता था और घंटों मनोविज्ञान के किसी टौपिक पर उस से चर्चा करता था. क्या समीर आईएएस बन गया?

यह प्रश्न उस के जेहन में कौंध रहा था और वह बहुत देर तक समीर के साथ बिताए गए उन पलों को याद कर रही थी जो 5 वर्ष बाद भी अभी तक वैसे ही तरोताजा थे जैसे यह बस कुछ पलों पहले की बात हो.

यही पता लगाने के लिए एक दिन वह उस के औफिस पहुंची तो पता लगा कि साहब अभी मीटिंग में व्यस्त हैं. दूसरे दिन समीर से मिलने के लिए उस के चैंबर में जाना चाहा तो, दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे रोक दिया और उस से स्लिप मांगी. उस ने सोचा, पता नहीं वही समीर है या कोई और, इसलिए उस ने चैंबर में उस से मिलने का विचार त्याग दिया. वह सोचने लगी वैसे तो जिलाधिकारी आम आदमी के हितों के लिए जिला में पदस्थापित होता है और उस से मिलने के लिए कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र है लेकिन अफसरशाही ने आम आदमी से जिलाधिकारी को कितना दूर कर दिया है.

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वैसे जिलाधिकारी से उस के द्वारा समयसमय पर लगाए जाने वाले जनता दरबार में भी आसानी से भेंट हो सकती थी किंतु उस के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा इतनी थी कि वह बहुत समय तक इस के लिए इंतजार नहीं कर सकती थी. सो, जिलाधिकारी द्वारा राजस्व से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए किए जाने वाले कोर्ट के दौरान उस ने उसे देखने का मन बनाया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

पुलिसिया जुल्म का आतंक और Corona का कहर

दोनों मामले की ऊँच स्तरीय जाँच का मामला उठने लगा है.नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने ट्वीट कर कहा है कि पुलिसिया जुल्म अगर नहीं रुका तो आंदोलन चलाया जाएगा.बेगूसराय वाले मामले में एक युवा को दूसरी जाति के लड़की के साथ प्रेम था. उसे थाने में बन्द कर दिया .बाद में कस्टडी में ही उसकी आत्हत्या करने की खबर मिली.इस मामले का उच्चस्तरीय जाँच करने का मामला जब सामाजिक कार्यकर्ता सन्तोष शर्मा ने उठाया तो उसे पुलिस गिरफ्तार कर ली .जम कर उनकी पिटायी की जिन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया.

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बेगूसराय मामले में बताया जाता है कि वीरपुर थाना में प्रेम प्रसंग मामले में पुलिस ने विक्रम पोद्दार नाम के युवक को गिरफ्तार किया था.उसकी मौत पुलिस कस्टडी में हो गई . ठाकुर संतोष शर्मा पुलिस कस्टडी में हुए इस संदेहास्पद मौत की उच्च स्तरीय जांच की मांग को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे थे. इस वजह से पुलिस ने संतोष को गिरफ्तार कर उनकी पिटाई की.उन्हें कई गंभीर अंदरूनी चोटें आई औऱ इलाज के दौरान मौत हो गई. हत्या की उच्य स्तरीय जांच हो एवं दोषी पुलिसकर्मी एवं षड्यंत्र में शामिल व्यक्तियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई हो.साथ ही संतोष के परिजनों को 50 लाख मुआवजा दिया जाए.अन्यथा  जिला प्रशासन औऱ सरकार के खिलाफ जोरदार आंदोलन होगा.  सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार शर्मा की मौत की जांच में लापरवाही बरतने पर छात्र व युवा सड़क पर उतरेंगे.ये बातें एआईएसएफ के जिला परिषद सदस्य साकेत कुमार ने कहीं. एआईएसएफ के जिलाध्यक्ष सजग सिंह ने एसपी को आवेदन देकर संतोष शर्मा की मौत की जांच आडियो के आधार पर करने की मांग की. नावकोठी थाने की पुलिस ने संतोष को लॉकडाउन के नाम पर गिरफ्तार किया.उसकी बेरहमी से पिटाई की गई.मुकदमा नहीं करने की शर्त पर इलाज शुरू किया गया.कहा कि मौत की उच्च स्तरीय जांच के अलावा संतोष के परिजन को उचित मुआवजा दिया जाए. युवा नेता संतोष शर्मा की संदेहास्पद मौत के घटना की उच्च स्तरीय जांच की मांग को लेकर  भाकपा माले कार्यालय में आइसा एवं माले के कार्यकर्ता एक दिवसीय भूख हड़ताल पर रहे.माले के प्रखंड सचिव नूर आलम ने संतोष शर्मा की संदेहास्पद तरीके से हुई मौत की जांच कर दोषी पुलिसकर्मी एवं षडयंत्र में शामिल लोगों पर हत्या का मामला दर्ज करने व पीड़ित परिवार को ₹50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग सरकार से की है. भूख हड़ताल में माले नेता इंद्रदेव राम, लड्डू लाल दास, मोहम्मद सोहराब, प्रशांत कश्यप, सुधीर कुमार, शाहरुख आदि थे.एसपी अवकाश कुमार का कहना है कि संतोष शर्मा के परिजन ने अभी तक किसी तरह की आपत्ति दर्ज नहीं करायी है.उन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल आडियो के संबंध में कहा कि वॉयस सेंपल की जांच तभी हो पाती जब संतोष जिंदा होता. बताया कि डीएसपी को जांच के लिए कहा गया है.

इसी तरह दूसरा मामला है.औरंगाबाद के गोह में स्वास्थ्य विभाग की टीम पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया था. वहां सूचना थी कि दूसरे राज्य से लोग आए हैं तो स्वास्थ्य विभाग की टीम जांच करने गई.50-60 की संख्या में ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला कर दिया.गाड़ियां तोड़ दीं.जब पुलिस की टीम मामले की जांच के लिए गई तो लोगों ने पुलिस पर भी हमला कर दिया.जिसमें एसडीपीओ और उनका अंगरक्षक घायल हो गया.उधर स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला हुआ तो विरोध में डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी धरने पर बैठ गए.

रविकांत फ़िल्म इंडस्ट्रीज में लेखक डायरेक्टर और इसी क्षेत्र के रहने वाले हैं.उन्होंने इस घटना की तहकीकात करते हुवे जानकारी दी है कि

इस घटना का एक दूसरा पक्ष है….

लॉकडाउन के पहले चरण में गोह के अकौनी गाँव के रामजी यादव  का बेटा राधेश्याम भी दिल्ली से अपने गाँव लौटा. वो आराम से अपने गाँव में रहा.प्रशासन ने कोई खोज खबर नहीं ली. कुछ दिन बीतने के बाद पुलिस के लोग रामजी यादव को खोजते हुवे गाँव आये.उस गाँव में उनके अलावा कई रामजी यादव हैं.पुलिस दुसरे रामजी यादव के घर पहुच गयी.घर के बड़े लोग गेहूं की कटाई करने खेत गए थे.घर में बहुएं थीं.पुलिस उनसे ज़बरदस्ती रामजी यादव और राधेश्याम के बारे में पूछने लगी..राधेश्याम और रामजी यादव को खोजने लगी.अब चुकी राधेश्याम उस घर का था ही नहीं.तो वो वहां कहाँ मिलता.अब इसके बाद पुलिस का आतंक शुरू होता है.वो घर की बहुओं को पीटने लगती है..बड़ी बेरहमी से.हंगामा मच जाता है.आस पड़ोस के लोग जब देखते हैं की पुलिस बिना कारण महिलाओं को पीट रही है.तो वो लोग उसका विरोध करते हैं.गौर करने वाली बात है की उस पुलिस की टुकड़ी में एक भी महिला पुलिस नहीं थी.सभी पुरुष थे.और महिलाओं को बेरहमी से मार रहे थे.गाँव वालों ने पुलिस के इस कुकृत्य को रोकने के लिए पथराव किया.कुछ पुलिस वालों को भी चोट आई है.और पुलिस गाँव वालों का विरोध देख वापस चली गयी.पुलिस के जाने के थोड़ी देर बाद मेडिकल की टीम वहां पहुची.जिन्हें भी गाँव वालों के विरोध का सामना करना पड़ा.

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अब यहाँ से नया घटना क्रम शुरू होता है.

ये बात निकट के दूसरे थाने और और ऊपर के अधिकारी तक पहुची.फिर ज्यादा पुलिस बल गाँव आता है.गाँव वालों पर जुल्म शुरू होता है.गाँव वाले ईंट पत्थर चला रहे हैं.पुलिस लाठी.जिले के आला अधिकारी से लेकर बिहार के डी जी पी तक ये खबर पहुचती है.और फिर गाँव पुलिस छावनी में बदल दिया जाता है.मुक़दमें दर्ज होते हैं.गिरफ्तारियां शुरू होती है.डी जी पी  साहब का फरमान आता है.जेल में सडा देंगे.

कुछ प्रश्न जो अनुतरित हैं….

क्या पुलिस के पास इतना विवेक या कोई सिस्टम नहीं है.जो एक गाँव में सही रामजी यादव और उसके पुत्र राधेश्याम को खोज सके.पुलिस सिस्टम के सबसे नीचे के पायदान पर एक चौकीदार होता है.जो गाँव के हर व्यक्ति को जानता है.उस गाँव में वार्ड के मेम्बर होंगे.क्या पुलिस उनके माध्यम से सही रामजी यादव को ढूंढ नहीं सकती थी.या रामजी यादव राधेश्याम नाम के किसी भी व्यक्ति के साथ वो ये सब करेगी.क्या अभी तक पुलिस महकमे को नहीं पता की उसकी गलती के कारन इतना बड़ा बवाल हुआ है.

अब तो पुलिस के नाक का सवाल है.पुलिस घायल हुई.मेडिकल टीम पर हमला हुआ.साहब ये तो देखो की क्यूँ हुआ.गलती कहाँ से शुरू हुयी.और अब तो हर जगह एक ही नरेशन है.गाँव वालों ने पुलिस और मेडिकल टीम पर हमला किया.महिलाओं को  इतना अभद्र ढंग से पिटायी की गयी है.किसी भी संवेदनशील ब्यक्ति को सिर्फ फोटो देखकर रोंगटे खड़े हो जायेंगे.

पूर्व विधायक और पुलिस प्रशासन में रह चुके सोमप्रकाश ने इस घटना के सम्बंध में जानकारी दी कि इस गाँव में दलित और पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं. उस गाँव में जितने भी लोग मिले सबकि जबरजस्त पिटायी की गयी और 44 लोगों को जेल भेजा गया जिसमें करीब 14 महिलाएँ हैं.9 महिलाएँ गर्भवती हैं.11 लोग नाबालिग हैं.

सोमप्रकाश ने कहा कि इस महामारी में जनता के लिए सबसे अधिक कोई घृणा का पात्र है तो वह पुलिस है. आखिर इसका कारण क्या है. अपनी पुरानी नीति को बदलनी होगी.पहले लात और फिर बात करने की शैली में बदलाव लाना होगा.इस लॉक डाउन में अगर कोई बाहर घूमते मिलता है तो पहले उसे पीटने की जरूरत नहीं है. उससे पूछा जाना चाहिए.हो सकता है वह अपने परिजन के लिए दवा लेने के लिए जा रहा हो.लॉक डाउन में भी दवा और राशन की दूकानें खुली हुवी है. जरूरत पर लोग जायेंगे ही.इस घटना की निंदा तमाम बुद्धजीवी और राजनीतिक दल के लोग कर रहे हैं. जाप नेता स्यामसुंदर ने कहा है कि इस घटना की हम घोर निंदा करते हैं और इसकी ऊँच स्तरीय जाँच की माँग करते हैं.

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लॉक डाउन के दौरान पूरे देश में पुलिस जुल्म और पिटायी की वजह से कितने लोगों ने दम तोड़ दिया है. रक्षक ही भक्षक बन गए हैं.

Corona Virus : नहीं बदली फितरत, जमाती फिर धरे गए

कोरोना के इस बिजूके से अमेरिका, स्पेन, ब्रिटेन, ईरान, पाकिस्तान समेत भारत भी इस से अछूता नहीं रहा है. इस के चलते देश की मोदी सरकार ने भी तमाम बंदिशें लगाई हैं. इन्हीं बंदिशों के चलते पूरे देश में 3 मई तक लाॅकडाउन है. भले ही कुछ जगहों पर काम करने की छूट दी है, पर इस के तहत लोग अभी भी काम पर नहीं जा पा रहे यानी अपने घरों में कैद हैं. बैंकें खुली हुई हैं, सरकारी अस्पताल खुले हुए हैं, सफाई वाले हर रोज कूड़ा उठाने आ रहे हैं, सब्जी बेचने वाले गलियों में दिख रहे हैं वहीं आदेश का पालन कराने के लिए पुलिस भी अपना काम मुस्तैदी से कर रही है.

इस महामारी को ले कर सरकार के साथसाथ पुलिस भी बारबार अपील कर रही है कि छिपाइए मत, अपना चैकअप कराइए. अगर कोई पॉजिटिव है भी तो इलाज कराइए. वहीं डाक्टरों की चैकअप टीम भी अलगअलग राज्यों के गांवगांव, गलीगली घूम कर कोरोन मरीज खोजने में जुटी है. पर इतना समझाने के बाद भी अपढ़ता व नासमझी के चलते कई लोग अब भी खुलेआम उल्लंघन करते दिख जा रहे हैं.

ऐसा ही एक मामला तब सामने आया, जब दिल्ली के निजामुददीन मरकज में मार्च माह में तबलीगी जमात का जलसा हुआ. इस जलसे में हजारों लोग शामिल हुए थे. जलसा हो जाने के बाद भी लोग अपने धर्म का प्रचार करने के लिए टूरिस्ट वीजा पर रुके हुए थे.

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निजामुददीन मरकज में तमाम जमातियों के पकडे़ जाने पर खुलासा हुआ था कि इन में से कई जमाती कोराना पोजिटिव हैं. साथ ही, ये जमाती पूरे देश में फैले हुए हैं, तब पुलिस ने अलगअलग राज्यों में इन की धरपकड़ शुरू की. इन जमातियों को सामने आने और क्वारंटीन होने को कहा गया, फिर भी प्रयागराज में कई जमाती छिपे हुए थे क्योंकि इन जमात के लोगों कों अपने मौलानाओं पर ज्यादा भरोसा था, सरकार पर नहीं.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी सख्त हिदायत दी थी कि समय रहते ये जमाती सामने आ जाएं, पर ऐसा हो न सका. प्रयागराज में 20 अप्रैल की रात उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक प्रोफेसर के अलावा 16 विदेशी जमातियों समेत कुल 30 लोगों को पकड़ा.

प्रोफेसर को शहर में जमातियों को चोरीछिपे शरण देने और कोरोना महामारी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया. जबकि ये सभी जमाती दिल्ली के निजामुददीन मरकज में आयोजित तबलीगी जमात के जलसे में शरीक हुए थे.

कुछ दिन पहले पुलिस को खबर मिली थी कि शिवकुटी के रसूलाबाद के रहने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर मो. शाहिद दिल्ली में आयोजित तबलीगी जमात के जलसे में शामिल हो कर लौटे हैं और चुपचाप शहर में रह रहे हैं. इस के बाद उन्हें क्वारंटीन कर दिया गया. पर तबलीगी जमातियों की मदद करने यानी उन के रहनेखाने का इंतजाम करना ही उन की भूल बन गया.

यही वजह थी कि 20 अप्रैल की रात इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मो. शाहिद सहित 30 लोगों को पकड़ लिया. इन में 16 विदेशी थाईलैंड के 9 व इंडोनेशिया के7 नागरिक हैं.  अगले दिन मैडिकल चैकअप के बाद सभी आरोपी खुल्दाबाद थाने में मजिस्टेट के सामने पेश हुए और कड़ी सुरक्षा के बीच इन सभी को नैनी जेल भेज दिया.

इन विदेशियों को विदेशी अधिनियम का उल्लंघन करने, साजिश में शामिल होने और मदद करने के आरोप में पकड़ा गया.

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जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि सभी जमाती टूरिस्ट वीजा के जरिए भारत आ कर अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे. उन के वीजा में प्रयागराज आने पर रोक थी, इस के बावजूद वे यहां आ कर छिपे थे, जो गलत था. इस पर उन के खिलाफ करेली व शाहगंज थाने में एफआईआर दर्ज हुई. इंडोनेशियाई जमातियों के गुप्त रूप से रहने व खानेपीने का इंतजाम इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मो. शाहिद ने कराया था.

एक अनपढ़, नासमझ ऐसी हरकत करता तो बात समझने की थी, पर प्रोफेसर मो. शाहिद तो पढे़लिखे थे. समझदार थे, पर उन की यह गुस्ताखी समझ से परे है? इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर मो. शाहिद जैसे लोग समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं, यानी अच्छी सीख देने की कोशिश करते हैं, पर जब ऐसी करतूतें सामने आती हैं तो चेहरा शर्मसार हो जाता है.

इन जमातियों का अपने धर्म के प्रचार के अलावा और क्या मकसद था, समझ से परे है, जब इन्हें प्रयागराज आने की मनाही थी, तो क्यों आ कर छिपे वहां? वहीं प्रोफेसर जैसे पद पर काम करने वाले मो. शाहिद का इन की मदद करना गले के नीचे नहीं उतर रहा?

वे खुद तो धरे ही गए, साथ ही 30 लोगों को भी अपने साथ ले डूबे. मजिस्टेट ने इन सभी को नैनी जेल भेज दिया. पर कोर्ट में ये लोग अपने को कैसे बेकुसूर साबित कर पाएंगे, कहना मुश्किल है.

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