5 टिप्स: बदमाश बच्चों को कैसे करें कंट्रोल

लेखक- गरिमा पंकज

बंगलुरु के जेपी नगर में रहने वाले 14 साल के रौनक बनर्जी को ऊंचाई से बहुत डर लगता था. वह बाल्डविन्स ( Baldwins ) बॉयज हाई स्कूल में कक्षा 9 का छात्र था. 29  जून 2016 को इसी रौनक ने अपने अपार्टमेंट के दसवें फ्लोर से कूद कर जान दे दी. मरने से पहले लिखे गए उस के सुसाइड नोट में इस बात का जिक्र था  कि वह अपने क्लासमेट्स द्वारा किए जा रहे बुलिंग से परेशान था. रौनक ने  पत्र में एक जगह लिखा था, “मेरे एक क्लासमेट ने मेरी बुलिंग की. यह मेरे  लिए बहुत ही ज्यादा शर्मनाक और असहनीय था. जिन्हें अपना दोस्त समझा  उन्होंने ही मुझे धोखा दिया. ”

पुलिस तहकीकात के मुताबिक रौनक की  क्लास का एक लड़का उस के फिजिकल अपीयरेंस को ले कर मजाक बनाता था और उस का अपमान करता था. जिस वक्त वह लड़का बुलिंग कर रहा होता बाकी सारे दोस्त रौनक  पर हंसते रहते. रौनक ने कई दफा उन्हें ऐसा करने से रोका. ड्राइवर से भी  शिकायत की मगर कोई परिणाम नहीं निकला. रौनक इस बुलिंग और अपमान से इतना आहत हो चुका था कि उस ने खुद को ही खत्म कर डाला. बाद में बुलिंग करने वाले उस लड़के को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत रिमांड पर स्टेट होम फॉर बॉयज भेज  दिया गया.

इस तरह की बुलिंग अक्सर स्कूली बच्चों को सहनी पड़ती  है. बच्चे अपना ज्यादातर समय स्कूल में बिताते हैं. यहाँ वे न सिर्फ अपने टीचर या किताबों से सीखते हैं बल्कि क्लास के दोस्तों से भी बहुत कुछ सीखते हैं. ऐसे में किसी बच्चे के साथ बुलिंग की घटना हो तो यह बहुत चिंताजनक बात है. बुलिंग अकेलापन ,डिप्रेशन और लो सेल्फ एस्टीम की वजह बनते हैं. जिस से व्यक्ति सुसाइड तक करने को मजबूर हो जाता है.

नॉन प्रॉफिट  टीचर फाउंडेशन द्वारा पूरे देश में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक बहुत से  विद्यार्थी अपमानित होने, बुली किये जाने या उपेक्षित महसूस करने को ले कर  तनावग्रस्त रहते हैं. कक्षा 4 से 8 तक के करीब 23% छात्रों और कक्षा 9 से 12 तक के करीब 14 % छात्रों ने स्वीकार किया कि लंच ब्रेक या प्ले टाइम के  समय वे उपेक्षित या छोड़ा हुआ महसूस करते हैं. कक्षा 4 से 8 तक के करीब 42 % छात्रों और कक्षा 9 से 12तक के करीब 36 % छात्रों ने स्वीकार किया कि  दूसरे बच्चे उन का मजाक बनाते हैं.

अच्छे पड़ोसी हैं जरूरी

यह सर्वे करीब 90  स्कूलों में किया गया. 850 शिक्षकों और 3,300 छात्रों से बात की गई. लड़के जहां फिजिकली   हैरेसमेंट के शिकार पाए गए तो वही लड़कियों को वर्बल आरगूमैंटस की परिस्थितियों को ज्यादा सहनी पड़ीं . वे इस बात से अधिक परेशान थी कि उन के पीठ पीछे बात की जाती है. अब्यूसिव वर्ड्स का इस्तेमाल किया जाता है.

यूके बेस्ड फर्म कौमपेरीटेक द्वारा 28 देशों में किए गए एक सर्वे के मुताबिक 2018 में साइबर बुलिंग के विक्टिम छात्रों की संख्या भारत में सब से अधिक है.

37% अभिभावकों ने यह स्वीकार किया कि उन के बच्चे कम से कम एक बार साइबर बुलिंग के शिकार जरूर बने हैं जब कि 2016  में 15%अभिभावकों ने ही ऐसा स्वीकारा था.

नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशनल स्टैटिस्टिक्स की एक  रिपोर्ट के मुताबिक 5 छात्रों में 1 छात्र से ज्यादा यानी करीब 20.8  छात्रों ने बुली का शिकार बनने की रिपोर्ट दर्ज कराई. ज्यादातर बुलिंग की  घटनाए मिडल स्कूल में होती हैं. वर्बल और सोशल बुलिंग ज्यादा किए जाते हैं.

सोशल मीडिया कुंठित लोगों का खतरनाक नशा

किंग्स  कॉलेज ऑफ़ लंदन में किये गए एक अध्ययन के मुताबिक जो बच्चे बारबार बुलिंग का शिकार होते हैं वे जीवन भर तनाव और घुटन में जीते हैं. वे कभी भी खुशहाल और संतुष्ट जीवन नहीं जी सकते.

बुलिंग करने वाले बच्चे को मारपीट करने के आरोप में सुधार गृह या फोस्टर होम्स भेजा जा सकता है. पर माइनर होने की वजह से उन पर आईपीसी की धाराएं नहीं लगाईं जा सकतीं.

क्या है बुलिंग

किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी बातों,  गतिविधियों या  हरकतों से चोट पहुंचाना,  परेशान करना, धमकाना या नीचा दिखाना बुलिंग है जो कमजोर है और अपनी रक्षा  करने में सक्षम नहीं है. बुलिंग वर्बल ,फिजिकल,  साइकोलॉजिकल ,साइबर या सोशल  किसी भी तरह का हो सकता है. बच्चों के मामले में इसे चाइल्ड बुलिंग कहते हैं.

कोई भी अभिभावक नहीं चाहता कि उसे यह सुनने को मिले कि उस का  बच्चा दूसरे बच्चे को परेशान कर रहा है. पर अक्सर ऐसा हो जाता है. यह बात  हमेशा ध्यान में रखें कि यदि बच्चा बुलिंग कर रहा है तो जरूरी नहीं कि वह  बुरा ही है. कई बार दिमागी तौर पर तेज और घरवालों की केयर करने वाले बच्चे  भी ऐसी हरकतें करने लग जाते हैं.

बुजुर्गों की सेवा फायदे का सौदा

फैक्टर्स जो बच्चे को बुलिंग करने को प्रेरित करते हैं…

  1. हो सकता है बच्चे को अपने दोस्तों के ग्रुप में बने रहने के लिए यह कदम उठाना पड़ा हो. उस के दोस्त किसी की बुलिंग कर रहे हों तो आप के बच्चे कोभी उन का साथ देना होगा.
  2. संभव है कि आप का बच्चा खुद किसी के द्वारा  बुलिंग का शिकार हो रहा हो. बुली विक्टिम्स अक्सर अपना रोष व्यक्त करने और  ताकत दिखाने के लिए कमजोर बच्चों के साथ बुलिंग करने लगते हैं. .
  3. संभव है कि बच्चा इस तरह अपने शिक्षक,अभिभावक या क्लासमैट्स  का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता हो क्यों कि वह अकेला महसूस कर रहा हो.
  4. क्रिमिनल बैकग्राउंड भी एक वजह हो सकती है. यदि बच्चे के अभिभावक या रिश्तेदार आपराधिक प्रवृत्ति के हैं तो बच्चे के जीन पर इस का असर पड़ता है . वह बचपन से ही ऐसे कार्यों को अंजाम देने लगेगा .स्वभाव से ही वह  डोमिनेटिंग और अग्रेसिव होगा .
  5. बायोलॉजिकल फैक्टर भी बच्चे के स्वभाव को प्रभावित करते हैं. कई दफा बच्चे का ब्रेन ओवर या अंडर डेवलप्डरहता है. दोनों ही स्थिति में बच्चा दूसरे बच्चों को डराने धमकाने या मारपीट करने की गतिविधियों में शामिल होने लगता है. ऐसी हालत में डॉक्टर से कंसल्ट करना जरुरी हो जाता है.
  6. वह समझ ही नहीं पा रहा हो कि उस के  व्यवहार से दूसरे बच्चों को चोट पहुंच रही है. खासकर छोटी उम्र के बच्चों  में प्रायः ऐसा देखा जाता है.
  7. कई बार बच्चे अपने अंदर की समस्याओं औरउलझनों को दबाने/छुपाने के लिए ऊपर से कठोर बन जाते हैं. बात फिजिकल  अपीयरेंस की हो, घरेलू परेशानियों की हो या पढ़ाई में कमजोर होना हो.  किसी  भी तरह से असुरक्षित और कमजोर महसूस कर रहे बच्चे अकसर सोशल स्ट्रक्चर में  अपनी जगह बनाए रखने और स्टेटस ऊंचा दिखाने की जद्दोजहद में बुलिंग का  सहारा लेने लगते हैं.

दिल्ली की मिसेज शोभा कहती हैं ,”मेरी दोस्त की बेटी अनुभा एक सकुचाई ,डरीसहमी सी रहने वाली लड़की थी. उस का आत्मविश्वास  काफी कमजोर था. पर जब उसे किसी और की बुलिंग करने का मौका मिला तो उस ने  ऐसा किया और अपने अंदर दूसरों को नियंत्रित करने,डरानेधमकाने की ताकत  महसूस की. उसे लगने लगा कि क्लास में किसी के द्वारा भी नोटिस न किए जाने  से अच्छा है एक गंदे बच्चे के तौर पर चर्चा का विषय बनना. ”

क्या मनुष्य पापात्मा है?

खासकर उन बच्चों के साथ अक्सर ऐसा होता है जो स्कूल /घर में तनाव, ट्रौमा या लो सेल्फ एस्टीम की समस्या से जूझ रहे होते हैं.

ध्यान  दें  कि क्या आप के बच्चे भी घर या स्कूल में किसी  तरह की परेशानी या दिक्कत महसूस कर रहे हैं. क्या उन्हें किसी तरह की एडजस्टमेंट प्रॉब्लम है , क्या वे अकेला महसूस करते हैं या हीन भावना का  शिकार है. यदि ऐसा है तो उस के साथ वक्त बिताएं और उस के मन से सारी  हीनभावनायें निकालने और परेशानियां दूर करने का प्रयास करें. ताकि उन के अंदर की तकलीफ बाहर किसी और रूप में निकल कर न आये.

यदि आप का बच्चा  भी किसी की बुलिंग कर रहा है तो आश्चर्य करने और उसे डांटनेफटकारने के बजाय बच्चे को समझने और इस समस्या से उबरने का प्रयास करें. बच्चे से बात  कर के उस के नजरिए को समझें. उसे सही दिशा देने का प्रयास करें.

रस्मों की मौजमस्ती धर्म में फंसाने का धंधा

  1. बात करें

जैसे ही आप को टीचर, दोस्त या किसी और अभिभावक द्वारा अपने बच्चे की इस हरकत का  खबर मिले तो सब से पहले बच्चे से बात करें. सीधे तौर पर उसे उस के विरुद्ध  आई शिकायत के बारे में सब कुछ बताएं और फिर शांति से बच्चे को अपना पक्ष  रखने दे. बच्चे से पूछे कि उस ने ऐसा क्यों किया. उसे डांटें नहीं बल्कि उस  के बंद एहसासों को खोलने का प्रयास करें.

  1. बंगलुरु के जेपी नगर में रहने वाले 14 साल के रौनक बनर्जी को ऊंचाई से बहुत डर लगता था. वह बाल्डविन्स ( Baldwins ) बॉयज हाई स्कूल में कक्षा 9 का छात्र था. 29  जून 2016 को इसी रौनक ने अपने अपार्टमेंट के दसवें फ्लोर से कूद कर जान दे दी. मरने से पहले लिखे गए उस के सुसाइड नोट में इस बात का जिक्र था  कि वह अपने क्लासमेट्स द्वारा किए जा रहे बुलिंग से परेशान था. रौनक ने  पत्र में एक जगह लिखा था, “मेरे एक क्लासमेट ने मेरी बुलिंग की. यह मेरे  लिए बहुत ही ज्यादा शर्मनाक और असहनीय था. जिन्हें अपना दोस्त समझा  उन्होंने ही मुझे धोखा दिया. “पुलिस तहकीकात के मुताबिक रौनक की  क्लास का एक लड़का उस के फिजिकल अपीयरेंस को ले कर मजाक बनाता था और उस का अपमान करता था. जिस वक्त वह लड़का बुलिंग कर रहा होता बाकी सारे दोस्त रौनक  पर हंसते रहते. रौनक ने कई दफा उन्हें ऐसा करने से रोका. ड्राइवर से भी  शिकायत की मगर कोई परिणाम नहीं निकला. रौनक इस बुलिंग और अपमान से इतना आहत हो चुका था कि उस ने खुद को ही खत्म कर डाला. बाद में बुलिंग करने वाले उस लड़के को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत रिमांड पर स्टेट होम फॉर बॉयज भेज  दिया गया.इस तरह की बुलिंग अक्सर स्कूली बच्चों को सहनी पड़ती  है. बच्चे अपना ज्यादातर समय स्कूल में बिताते हैं. यहाँ वे न सिर्फ अपने टीचर या किताबों से सीखते हैं बल्कि क्लास के दोस्तों से भी बहुत कुछ सीखते हैं. ऐसे में किसी बच्चे के साथ बुलिंग की घटना हो तो यह बहुत चिंताजनक बात है. बुलिंग अकेलापन ,डिप्रेशन और लो सेल्फ एस्टीम की वजह बनते हैं. जिस से व्यक्ति सुसाइड तक करने को मजबूर हो जाता है.धर्म के साए में पलते अधर्म

    नॉन प्रॉफिट टीचर फाउंडेशन द्वारा पूरे देश में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक बहुत से  विद्यार्थी अपमानित होने, बुली किये जाने या उपेक्षित महसूस करने को ले कर  तनावग्रस्त रहते हैं. कक्षा 4 से 8 तक के करीब 23% छात्रों और कक्षा 9 से 12 तक के करीब 14 % छात्रों ने स्वीकार किया कि लंच ब्रेक या प्ले टाइम के  समय वे उपेक्षित या छोड़ा हुआ महसूस करते हैं. कक्षा 4 से 8 तक के करीब 42 % छात्रों और कक्षा 9 से 12तक के करीब 36 % छात्रों ने स्वीकार किया कि  दूसरे बच्चे उन का मजाक बनाते हैं.

    यह सर्वे करीब 90  स्कूलों में किया गया. 850 शिक्षकों और 3,300 छात्रों से बात की गई. लड़के जहां फिजिकली   हैरेसमेंट के शिकार पाए गए तो वही लड़कियों को वर्बल आरगूमैंटस की परिस्थितियों को ज्यादा सहनी पड़ीं . वे इस बात से अधिक परेशान थी कि उन के पीठ पीछे बात की जाती है. अब्यूसिव वर्ड्स का इस्तेमाल किया जाता है.

     

    यूके बेस्ड फर्म कौमपेरीटेक द्वारा 28 देशों में किए गए एक सर्वे के मुताबिक 2018 में साइबर बुलिंग के विक्टिम छात्रों की संख्या भारत में सब से अधिक है.

    37% अभिभावकों ने यह स्वीकार किया कि उन के बच्चे कम से कम एक बार साइबर बुलिंग के शिकार जरूर बने हैं जब कि 2016  में 15%अभिभावकों ने ही ऐसा स्वीकारा था.

     

    नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशनल स्टैटिस्टिक्स की एक  रिपोर्ट के मुताबिक 5 छात्रों में 1 छात्र से ज्यादा यानी करीब 20.8  छात्रों ने बुली का शिकार बनने की रिपोर्ट दर्ज कराई. ज्यादातर बुलिंग की  घटनाए मिडल स्कूल में होती हैं. वर्बल और सोशल बुलिंग ज्यादा किए जाते हैं.

     

    किंग्स  कॉलेज ऑफ़ लंदन में किये गए एक अध्ययन के मुताबिक जो बच्चे बारबार बुलिंग का शिकार होते हैं वे जीवन भर तनाव और घुटन में जीते हैं. वे कभी भी खुशहाल और संतुष्ट जीवन नहीं जी सकते.

     

    बुलिंग करने वाले बच्चे को मारपीट करने के आरोप में सुधार गृह या फोस्टर होम्स भेजा जा सकता है. पर माइनर होने की वजह से उन पर आईपीसी की धाराएं नहीं लगाईं जा सकतीं.

     

    क्या है बुलिंग

    किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी बातों,  गतिविधियों या  हरकतों से चोट पहुंचाना,  परेशान करना, धमकाना या नीचा दिखाना बुलिंग है जो कमजोर है और अपनी रक्षा  करने में सक्षम नहीं है. बुलिंग वर्बल ,फिजिकल,  साइकोलॉजिकल ,साइबर या सोशल  किसी भी तरह का हो सकता है. बच्चों के मामले में इसे चाइल्ड बुलिंग कहते हैं.

    कोई भी अभिभावक नहीं चाहता कि उसे यह सुनने को मिले कि उस का  बच्चा दूसरे बच्चे को परेशान कर रहा है. पर अक्सर ऐसा हो जाता है. यह बात  हमेशा ध्यान में रखें कि यदि बच्चा बुलिंग कर रहा है तो जरूरी नहीं कि वह  बुरा ही है. कई बार दिमागी तौर पर तेज और घरवालों की केयर करने वाले बच्चे  भी ऐसी हरकतें करने लग जाते हैं.

     

    जानें अपने प्यार का सच

    फैक्टर्स जो बच्चे को बुलिंग करने को प्रेरित करते हैं;

     

    1. हो सकता है बच्चे को अपने दोस्तों के ग्रुप में बने रहने के लिए यह कदम उठाना पड़ा हो. उस के दोस्त किसी की बुलिंग कर रहे हों तो आप के बच्चे कोभी उन का साथ देना होगा.
    2. संभव है कि आप का बच्चा खुद किसी के द्वारा  बुलिंग का शिकार हो रहा हो. बुली विक्टिम्स अक्सर अपना रोष व्यक्त करने और  ताकत दिखाने के लिए कमजोर बच्चों के साथ बुलिंग करने लगते हैं. .
    3. संभव है कि बच्चा इस तरह अपने शिक्षक,अभिभावक या क्लासमैट्स  का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता हो क्यों कि वह अकेला महसूस कर रहा हो.
    4. क्रिमिनल बैकग्राउंड भी एक वजह हो सकती है. यदि बच्चे के अभिभावक या रिश्तेदार आपराधिक प्रवृत्ति के हैं तो बच्चे के जीन पर इस का असर पड़ता है . वह बचपन से ही ऐसे कार्यों को अंजाम देने लगेगा .स्वभाव से ही वह  डोमिनेटिंग और अग्रेसिव होगा .
    5. बायोलॉजिकल फैक्टर भी बच्चे के स्वभाव को प्रभावित करते हैं. कई दफा बच्चे का ब्रेन ओवर या अंडर डेवलप्डरहता है. दोनों ही स्थिति में बच्चा दूसरे बच्चों को डराने धमकाने या मारपीट करने की गतिविधियों में शामिल होने लगता है. ऐसी हालत में डॉक्टर से कंसल्ट करना जरुरी हो जाता है.
    6. वह समझ ही नहीं पा रहा हो कि उस के  व्यवहार से दूसरे बच्चों को चोट पहुंच रही है. खासकर छोटी उम्र के बच्चों  में प्रायः ऐसा देखा जाता है.
    7. कई बार बच्चे अपने अंदर की समस्याओं औरउलझनों को दबाने/छुपाने के लिए ऊपर से कठोर बन जाते हैं. बात फिजिकल  अपीयरेंस की हो, घरेलू परेशानियों की हो या पढ़ाई में कमजोर होना हो.  किसी  भी तरह से असुरक्षित और कमजोर महसूस कर रहे बच्चे अकसर सोशल स्ट्रक्चर में  अपनी जगह बनाए रखने और स्टेटस ऊंचा दिखाने की जद्दोजहद में बुलिंग का  सहारा लेने लगते हैं.

    दिल्ली की मिसेज शोभा कहती हैं ,”मेरी दोस्त की बेटी अनुभा एक सकुचाई ,डरीसहमी सी रहने वाली लड़की थी. उस का आत्मविश्वास  काफी कमजोर था. पर जब उसे किसी और की बुलिंग करने का मौका मिला तो उस ने  ऐसा किया और अपने अंदर दूसरों को नियंत्रित करने,डरानेधमकाने की ताकत  महसूस की. उसे लगने लगा कि क्लास में किसी के द्वारा भी नोटिस न किए जाने  से अच्छा है एक गंदे बच्चे के तौर पर चर्चा का विषय बनना. ”

     

    खासकर उन बच्चों के साथ अक्सर ऐसा होता है जो स्कूल /घर में तनाव, ट्रौमा या लो सेल्फ एस्टीम की समस्या से जूझ रहे होते हैं.

     

    ध्यान  दें  कि क्या आप के बच्चे भी घर या स्कूल में किसी  तरह की परेशानी या दिक्कत महसूस कर रहे हैं. क्या उन्हें किसी तरह की एडजस्टमेंट प्रॉब्लम है , क्या वे अकेला महसूस करते हैं या हीन भावना का  शिकार है. यदि ऐसा है तो उस के साथ वक्त बिताएं और उस के मन से सारी  हीनभावनायें निकालने और परेशानियां दूर करने का प्रयास करें. ताकि उन के अंदर की तकलीफ बाहर किसी और रूप में निकल कर न आये.

     

    यदि आप का बच्चा  भी किसी की बुलिंग कर रहा है तो आश्चर्य करने और उसे डांटनेफटकारने के बजाय बच्चे को समझने और इस समस्या से उबरने का प्रयास करें. बच्चे से बात  कर के उस के नजरिए को समझें. उसे सही दिशा देने का प्रयास करें.

     

    1. बात करें

    जैसे ही आप को टीचर, दोस्त या किसी और अभिभावक द्वारा अपने बच्चे की इस हरकत का  खबर मिले तो सब से पहले बच्चे से बात करें. सीधे तौर पर उसे उस के विरुद्ध  आई शिकायत के बारे में सब कुछ बताएं और फिर शांति से बच्चे को अपना पक्ष  रखने दे. बच्चे से पूछे कि उस ने ऐसा क्यों किया. उसे डांटें नहीं बल्कि उस  के बंद एहसासों को खोलने का प्रयास करें.

     

    1. वजह पता लगाएं और लॉजिकल दंड दें

    पता  लगाइये कि आप का बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है. बच्चे के टीचर या दोस्तों से बात कीजिये और इस व्यवहार के पीछे मौजूद सही वजह जानने का प्रयास करें. यदि बच्चा खुद बुली विक्टिम है तो उसे इस स्थिति से निकालने में मदद  करें. यदि वह स्कूल में लोकप्रियता हासिल करने के लिए ऐसा कर रहा है तो आप  उस को स्वस्थ दोस्ती और सब को साथ ले कर चलने की अहमियत बताएं.

     

    यदि  आप का बच्चा कंप्यूटर और सेलफोन के सहारे साइबर बुलिंग में इंवॉल्व है तो  तुरंत उस से फ़ोन और कंप्यूटर छीन लें. वह किसी दोस्त के साथ मिल कर ऐसा  करता है तो उस दोस्त से उस का मिलनाजुलना बंद करा दें. इसी तरह यदि वह रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बच्चों को खेलते समय तंग करता है तो आप उस का सोशल बायकोट करा दें. उस को फैमिली कार में घुमाना ,पार्टीज और सोशल  इवेंट्स में ले जाना ,सोशल मीडिया का प्रयोग करना वगैरह बंद करा दे. घर में  कभी भी उसे अकेला न छोड़ें.

     

    1. नजरिया बदलने का प्रयास करें

     

    एक  बार बच्चे की समस्या समझ लेने के बाद आप को उसे इन समस्याओं से निकालने का प्रयास करना पड़ेगा. उन परिस्थितियों को समझें जिन की वजह से वह दूसरे  बच्चों को परेशान करने का प्रयास कर रहा है. उस की सोच बदलने की कोशिश करें. यदि आप का बच्चा जानबूझ कर किसी को तकलीफ दे रहा है, अपने किसी  क्लासमेट को खेलकूद या सोशल एक्टिविटीज में हिस्सा लेने से रोक रहा है तो  उसे समझाएं कि यदि कोई उसे अपने साथ न खिलाए या अकेला छोड़ दे तो उसे कितना  बुरा लगेगा. इसलिए हमेशा दूसरों को साथ ले कर चलना चाहिए और अच्छा व्यवहार करना चाहिए. जब भी कोई बच्चा साथ खेलने के लिए पूछे तो तुरंत ग्रुप में शामिल कर लेना चाहिए.

     

    बहुत से बच्चों के लिए बुलिंग शक्ति और ताकत  दिखाने का जरिया होता है. वे अपना डोमिनेंस महसूस करते हैं. मगर याद रखें  कहीं न कहीं यह एक  गलत ,ओछा , क्रूर और दर्द से भरा हुआ जरिया है. यह बात  आप को ही अपने बच्चे को समझानी होगी कि ताकत सही रास्ते से दिखाई जाती है. आप उस की एनर्जी को सही रास्ता दिखाएं. उसे लीडर बनने को प्रेरित करें ताकि   वह दूसरों को अपने अधीन रखने की भूख मिटा सके और उस की जिंदगी में उस की  महत्वाकांक्षाओं को सही आधार भी मिल जाए.

     

    अक्षय तृतीया से जुड़े भ्रामक तथ्य

    1. खुद को भी देखें

    जब   बच्चे घर में मांबाप या दूसरे घरवालों को एकदूसरे के साथ लड़तेझगड़ते या बुरा व्यवहार करते देखते हैं तो वे वही बात स्कूल में दोहराने लगते हैं. अभिभावकों को इस बात का एहसास जरूर होना चाहिए कि उन का व्यवहार कैसे उन के  बच्चों को प्रभावित कर सकता है. वे अपने बच्चों और जीवनसाथी से कैसे बात करते हैं, अपने गुस्से को कैसे हैंडल करते हैं  इन सब का असर बच्चे के कोमल  मन और व्यवहार पर पड़ता है.

    अक्सर ऐसा होता है कि बुलिंग आप के घर में  आप के ही द्वारा होता है पर उस पर आप का ध्यान नहीं जाता. इस लिए सब से  पहले घर से शुरुआत करें. घर के प्रत्येक सदस्य को आगाह करें. एकदूसरे के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें. घर में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें.

     

    1. बच्चे को शर्मिंदा न करें

    कुछ अभिभावक बुली चाइल्ड को सजा के तौर पर शर्मिंदा करने लगते हैं जैसे दूसरों   के आगे डांटना फटकारना ,कान पकड़ कर दरवाजे के बाहर खड़ा रखना वगैरह. इस  तरह उन के व्यवहार पर काबू नहीं पाया जा सकता. उलटा ऐसा करने पर वह  प्रतिशोध के साथ इस तरह की हरकतें ज्यादा करने लगते हैं.

    इसी तरह बच्चा  जब किसी का बुलिंग कर रहा होता है तो उस वक्त से बहुत अच्छा लगता है. मगर  यदि उसे विक्टिम से माफी मांगने को कहा जाए तो यह बात उसे बहुत ही अपमानजनक लगती है. शर्मिंदगी और गिल्ट की भावना उस के व्यक्तित्व पर बुरा असर डाल  सकती है. इसलिए यदि आप के बच्चे ने किसी की बुलिंग की यह जानने के बाद उसे डांटे फटकारें नहीं और माफी मांगने को भी विवश न करें. इस से बच्चा बहुत शर्मिंदगी महसूस करेगा. इस के विपरीत खूबसूरत तरीकों से भी रिश्ते में  सुधार लाया जा सकता है.

    अपने बच्चे से कहें कि जिसे उस ने परेशान किया है उसे लेटर लिख कर ,मैसेज कर या सामने जा कर माफी मांग लें ताकि  दोनों के बीच रिश्ते सुधर जाए.

    आप अपने बच्चे से पूरे क्लास के लिए कुकीज बनवा के ले जाने या क्लासमेट्स को सरप्राइज पार्टी देने जैसे काम  करवा सकते हैं. इस से बच्चे के मन में गिल्ट भी पैदा नहीं होगा और दूसरों  के साथ उस का रिश्ता भी सुधर जाएगा.

    पता  लगाइये कि आप का बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है. बच्चे के टीचर या दोस्तों से बात कीजिये और इस व्यवहार के पीछे मौजूद सही वजह जानने का प्रयास करें. यदि बच्चा खुद बुली विक्टिम है तो उसे इस स्थिति से निकालने में मदद  करें. यदि वह स्कूल में लोकप्रियता हासिल करने के लिए ऐसा कर रहा है तो आप  उस को स्वस्थ दोस्ती और सब को साथ ले कर चलने की अहमियत बताएं.

    समाधि की दुकानदारी कितना कमजोर धर्म

यदि  आप का बच्चा कंप्यूटर और सेलफोन के सहारे साइबर बुलिंग में इंवॉल्व है तो  तुरंत उस से फ़ोन और कंप्यूटर छीन लें. वह किसी दोस्त के साथ मिल कर ऐसा  करता है तो उस दोस्त से उस का मिलनाजुलना बंद करा दें. इसी तरह यदि वह रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बच्चों को खेलते समय तंग करता है तो आप उस का सोशल बायकोट करा दें. उस को फैमिली कार में घुमाना ,पार्टीज और सोशल  इवेंट्स में ले जाना ,सोशल मीडिया का प्रयोग करना वगैरह बंद करा दे. घर में  कभी भी उसे अकेला न छोड़ें.

  1. नजरिया बदलने का प्रयास करें

एक  बार बच्चे की समस्या समझ लेने के बाद आप को उसे इन समस्याओं से निकालने का प्रयास करना पड़ेगा. उन परिस्थितियों को समझें जिन की वजह से वह दूसरे  बच्चों को परेशान करने का प्रयास कर रहा है. उस की सोच बदलने की कोशिश करें. यदि आप का बच्चा जानबूझ कर किसी को तकलीफ दे रहा है, अपने किसी  क्लासमेट को खेलकूद या सोशल एक्टिविटीज में हिस्सा लेने से रोक रहा है तो  उसे समझाएं कि यदि कोई उसे अपने साथ न खिलाए या अकेला छोड़ दे तो उसे कितना  बुरा लगेगा. इसलिए हमेशा दूसरों को साथ ले कर चलना चाहिए और अच्छा व्यवहार करना चाहिए. जब भी कोई बच्चा साथ खेलने के लिए पूछे तो तुरंत ग्रुप में शामिल कर लेना चाहिए.

बहुत से बच्चों के लिए बुलिंग शक्ति और ताकत  दिखाने का जरिया होता है. वे अपना डोमिनेंस महसूस करते हैं. मगर याद रखें  कहीं न कहीं यह एक  गलत ,ओछा , क्रूर और दर्द से भरा हुआ जरिया है. यह बात  आप को ही अपने बच्चे को समझानी होगी कि ताकत सही रास्ते से दिखाई जाती है. आप उस की एनर्जी को सही रास्ता दिखाएं. उसे लीडर बनने को प्रेरित करें ताकि   वह दूसरों को अपने अधीन रखने की भूख मिटा सके और उस की जिंदगी में उस की  महत्वाकांक्षाओं को सही आधार भी मिल जाए.

  1. खुद को भी देखें

जब बच्चे घर में मांबाप या दूसरे घरवालों को एकदूसरे के साथ लड़तेझगड़ते या बुरा व्यवहार करते देखते हैं तो वे वही बात स्कूल में दोहराने लगते हैं. अभिभावकों को इस बात का एहसास जरूर होना चाहिए कि उन का व्यवहार कैसे उन के  बच्चों को प्रभावित कर सकता है. वे अपने बच्चों और जीवनसाथी से कैसे बात करते हैं, अपने गुस्से को कैसे हैंडल करते हैं  इन सब का असर बच्चे के कोमल  मन और व्यवहार पर पड़ता है.

अक्सर ऐसा होता है कि बुलिंग आप के घर में  आप के ही द्वारा होता है पर उस पर आप का ध्यान नहीं जाता. इस लिए सब से  पहले घर से शुरुआत करें. घर के प्रत्येक सदस्य को आगाह करें. एकदूसरे के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें. घर में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें.

  1. बच्चे को शर्मिंदा न करें

कुछ अभिभावक बुली चाइल्ड को सजा के तौर पर शर्मिंदा करने लगते हैं जैसे दूसरों   के आगे डांटना फटकारना ,कान पकड़ कर दरवाजे के बाहर खड़ा रखना वगैरह. इस  तरह उन के व्यवहार पर काबू नहीं पाया जा सकता. उलटा ऐसा करने पर वह  प्रतिशोध के साथ इस तरह की हरकतें ज्यादा करने लगते हैं.

इसी तरह बच्चा  जब किसी का बुलिंग कर रहा होता है तो उस वक्त से बहुत अच्छा लगता है. मगर  यदि उसे विक्टिम से माफी मांगने को कहा जाए तो यह बात उसे बहुत ही अपमानजनक लगती है. शर्मिंदगी और गिल्ट की भावना उस के व्यक्तित्व पर बुरा असर डाल  सकती है. इसलिए यदि आप के बच्चे ने किसी की बुलिंग की यह जानने के बाद उसे डांटे फटकारें नहीं और माफी मांगने को भी विवश न करें. इस से बच्चा बहुत शर्मिंदगी महसूस करेगा. इस के विपरीत खूबसूरत तरीकों से भी रिश्ते में  सुधार लाया जा सकता है.

समाधि की दुकानदारी कितना कमजोर धर्म

अपने बच्चे से कहें कि जिसे उस ने परेशान किया है उसे लेटर लिख कर ,मैसेज कर या सामने जा कर माफी मांग लें ताकि  दोनों के बीच रिश्ते सुधर जाए.

आप अपने बच्चे से पूरे क्लास के लिए कुकीज बनवा के ले जाने या क्लासमेट्स को सरप्राइज पार्टी देने जैसे काम  करवा सकते हैं. इस से बच्चे के मन में गिल्ट भी पैदा नहीं होगा और दूसरों  के साथ उस का रिश्ता भी सुधर जाएगा.

बेवफाई की लाश

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के सिंगरा थाना क्षेत्र में एक गांव है बड़गांव. कल्लू निषाद अपने
परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे रमेश, दिनेश, संतोष के अलावा एक बेटी थी उमा. कल्लू किसान था. खेती की आय से परिवार चलता था. समय बीतते कल्लू ने अपने सभी बच्चों की शादियां कर दीं. तीनों भाइयों ने पिता के रहते ही घर और खेती की जमीन का बंटवारा भी कर लिया. भाईबहनों में संतोष सब से छोटा था. उस का विवाह गुडि़या से हुआ था. गुडि़या के पिता रघुवीर निषाद गाजीपुर जिले के सुहावल गांव के रहने वाले थे. गुडि़या से शादी कर के संतोष बहुत खुश था.

कातिल बहन की आशिकी

बंटवारे के बाद संतोष के पास खेती की इतनी जमीन नहीं बची थी जिस से परिवार का गुजारा हो सके. फिर भी सालों तक हालात से उबरने की जद्दोजहद चलती रही.
धीरेधीरे वक्त गुजरता गया और इस गुजरते वक्त के साथ गुडि़या एक बेटे कृष्णा और 2 बेटियों की मां बन गई. गुडि़या 3 बच्चों की मां भले ही बन गई थी, लेकिन उस की देहयष्टि से ऐसा लगता नहीं था.
वह पति को अकसर खेती के अलावा कोई और काम करने की सलाह देती थी. लेकिन संतोष खेतीकिसानी में ही खुश था. बाहर जा कर नौकरी करने की बात न मानने पर संतोष का पत्नी के साथ झगड़ा होता रहता था.

संतोष अपनी जमीन पर खेती करने के साथसाथ दूसरों की जमीन भी बंटाई पर लेता था. तब कहीं जा कर परिवार का भरणपोषण हो पाता था. अगर बाढ़ या सूखे से फसल चौपट हो जाती तो उस के पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं बचता था. इस सब के चलते जब संतोष पर कर्ज हो गया तो उस ने गांव छोड़ दिया.
संतोष ने अपने गांव के कुछ लोगों से सुन रखा था कि कानपुर उद्योग नगरी है और वहां नौकरी आसानी से मिल जाती है. संतोष भी नौकरी की तलाश में कानपुर शहर पहुंच गया. वहां कई दिनों तक भागदौड़ करने के बाद संतोष को पनकी स्थित एक रिक्शा कंपनी में काम मिल गया. वह रिक्शा कंपनी किराए पर रिक्शा भी चलवाती थी.

रहस्य में लिपटी विधायक की मौत

संतोष मेहनती व ईमानदार था. जल्द ही उस ने वहां अपनी अच्छी छवि बना ली, उस की लगन और मेहनत को देख कर मालिक ने उसे किराए पर चलने वाले रिक्शों के चालकों से किराया वसूलने की जिम्मेदारी सौंप दी. इस के साथ ही वह किराए के रिक्शों की भी मरम्मत भी करता था. ज्यादा कमाने के चक्कर में संतोष नौकरी के बाद खुद भी रिक्शा चला लेता था.
संतोष महीने-2 महीने में कानपुर से घर लौटता था और 2-3 दिन घर रुक कर कानपुर चला जाता था. गुडि़या उन दिनों उम्र के उस दौर से गुजर रही थी, जब औरत को पुरुष की नजदीकियों की ज्यादा जरूरत होती है. एक बार संतोष घर आया तो गुडि़या ने उस से कहा कि बच्चों की अब पढ़ने की उम्र है. गांव में रह कर पढ़ नहीं पाएंगे, अत: उसे व बच्चों को साथ ले चले.
संतोष को गुडि़या की बात सही लगी. उस ने पत्नी को आश्वासन दिया कि जब वह अगली बार आएगा, तो उसे व बच्चों को अपने साथ ले जाएगा. संतोष कानपुर पहुंच कर कमरे की खोज में जुट गया. काफी कोशिश के बाद उसे अरमापुर में किराए पर कमरा मिल गया.

सपा नेत्री की गहरी चाल

कमरा मिल जाने के बाद वह पत्नी व बच्चों को कानपुर शहर ले आया. बच्चों का दाखिला उस ने अरमापुर के सरकारी स्कूल में करा दिया. गुडि़या शहर आई तो उस के रंगढंग ही बदल गए. वह खूब सजसंवर कर रहने लगी. अपने व्यवहार की वजह से उस ने आसपड़ोस की महिलाओं से भी अच्छे संबंध बना लिए थे.

संतोष जिस रिक्शा कंपनी में काम करता था, उसी में राजू नाम का युवक भी काम करता था. हालांकि राजू संतोष से कई साल छोटा था, फिर भी दोनों में खूब पटती थी. दोनों साथसाथ लंच करते थे. जरूरत पड़ने पर राजू संतोष की आर्थिक मदद भी कर देता था.
राजू पनकी स्थित रतनपुर कालोनी में अकेला रहता था. वैसे वह मूलरूप से इटावा जिले के अजीतमल गांव का रहने वाला था. उस के मातापिता की मृत्यु हो चुकी थी और भाइयों से उस की पटती नहीं थी. इसलिए कानपुर आ कर रिक्शा कंपनी में काम करने लगा था.

सपा नेत्री की गहरी चाल

एक दिन संतोष ने राजू को बताया कि आज उस के बेटे कृष्णा का जन्मदिन है. उस ने किसी और को तो नहीं बुलाया लेकिन उसे जरूर आना है. अपनेपन की इस बात से राजू खुश हुआ. उस ने कहा, ‘‘संतोष भैया, मैं शाम को जरूर आऊंगा. शाम की पार्टी भी मेरी तरफ से रहेगी.’’

राजू दिन भर काम में व्यस्त रहा. शाम होते ही वह अपने घर पहुंचा और अच्छे कपड़े पहने. फिर सजसंवर कर संतोष के घर पहुंच गया. राजू के पहुंचने पर संतोष बहुत खुश हुआ. उस ने राजू का अपनी पत्नी से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा अच्छा दोस्त और हमदर्द है.

गुडि़या ने मुसकरा कर राजू का स्वागत किया और बोली, ‘‘यह आप के बारे में बताते रहते हैं और बहुत तारीफ करते हैं.’’
गुडि़या ने राजू की आवभगत की. राजू भी गुडि़या की खूबसूरती में खो गया. कुल मिला कर गुडि़या पहली ही नजर में राजू के दिलोदिमाग पर छा गई.
इस के बाद वह किसी न किसी बहाने संतोष के साथ उस के घर जाने लगा. वह जब भी घर जाता, बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें जरूर ले कर आता. बच्चों को उन की मनपसंद चीजें मिलने लगीं तो वह ‘चाचाचाचा’ कह कर उस से घुलमिल गए.

प्यार का खौफनाक पहलू

जल्दी ही राजू ने संतोष के घर में अपनी पैठ बना ली. राजू का घर आना बच्चों को ही नहीं, बल्कि गुडि़या को भी अच्छा लगता था. राजू की लच्छेदार बातें उसे खूब भाती थीं. धीरेधीरे गुडि़या के मन में भी राजू के प्रति चाहत बढ़ गई.

एक रोज गुडि़या कमरे के बाहर खड़ी धूप में बाल सुखा रही थी, तभी अचानक राजू उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. गुडि़या ने उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछा, ‘‘अरे तुम, इस तरह अचानक, क्या ड्यूटी नहीं गए?’’

‘‘ड्यूटी गया तो था भाभी, पर तुम्हारी याद आई तो चला आया.’’ राजू ने मुसकरा कर जवाब दिया. उस दिन राजू को गुडि़या बहुत ज्यादा खूबसूरत लगी. उस की निगाहें गुडि़या के चेहरे पर जम गईं. यही हाल गुडि़या का भी था. राजू को इस तरह देखते हुए गुडि़या बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो मुझे? क्या पहली बार देखा है? बोलो, किस सोच में डूबे हो?’’
‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो देख रहा था कि खुले बालों में आप कितनी सुंदर लग रही हैं. वैसे एक बात कहूं, आप के अलावा पासपडोस में और भी हैं, पर आप जैसी सुंदर कोई नहीं है.’’
‘‘बस…बस रहने दो. बहुत बातें बनाने लगे हो. तुम्हारे भैया तो कभी तारीफ नहीं करते. काम के बोझ से इतने थके होते हैं कि खाना खा कर बिस्तर पर लुढ़क जाते हैं और अगर उन से कुछ कहो तो किसी न किसी बात को ले कर झगड़ने लगते हैं.’’

‘‘अरे भाभी, औरत की खूबसूरती सब को रास थोड़े ही आती है. भैया तो लापरवाह हैं. शराब में डूबे रहते हैं, इसलिए तुम्हारी कद्र नहीं करते.’’ राजू बोला.
‘‘तू तो मेरी बहुत कद्र करता है? हफ्ते बीत जाते हैं, झांकने तक नहीं आता. जा बहुत देखे हैं तेरे जैसे बातें बनाने वाले.’’ गुडि़या उसे उकसाते हुए बोली.
‘‘मुझे सचमुच आप की बहुत फिक्र है भाभी. यकीन न हो तो परख लो. अब मैं आप की खैरखबर लेने जल्दीजल्दी आता रहूंगा. छोटाबड़ा जो भी काम कहोगी, मैं करूंगा.’’ राजू ने गुडि़या की चिरौरी सी की.
राजू की यह बात सुन कर गुडि़या खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘तू आराम से चारपाई पर बैठ. मैं तेरे लिए चाय बनाती हूं.’’

थोड़ी देर में गुडि़या 2 कप चाय और प्लेट में बिस्कुट व नमकीन ले आई. दोनों पासपास बैठ कर गपशप लड़ाते हुए चाय पीते रहे और चोरीछिपे एकदूसरे को देखते रहे. दोनों के ही दिलोदिमाग में हलचल मची हुई थी. सच तो यह था कि गुडि़या गबरू जवान राजू पर फिदा हो गई थी. वह ही नहीं, राजू भी मतवाली भाभी का दीवाना बन गया था.
दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद राजू अकसर गुडि़या से मिलने आने लगा. गुडि़या को उस का आना अच्छा लगता था. जल्द ही वह एकदूसरे से खुल गए और दोनों के बीच हंसीमजाक होने लगा.
इन्हीं दिनों संतोष खेतों की देखभाल के लिए एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने गांव चला गया. गुडि़या को यह मौका अच्छा लगा तो उस ने एक रोज रात में राजू को अपने कमरे पर रोक लिया. खाना खाने के बाद एक चारपाई पर राजू लेट गया और दूसरी पर गुडि़या.

राजू सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. उस का मन भाभी गुडि़या की तरफ ही लगा हुआ था. तभी आधी रात के बाद गुडि़या अपनी चारपाई से उठ कर उस के पास आ लेटी. इस के बाद तो राजू की खुशी का ठिकाना न रहा. वह गुडि़या से बोला, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’
‘‘डर लग रहा था, इसलिए तुम्हारे पास चली आई.’’ गुडि़या ने उस से सटते हुए कहा.
‘‘डर लग रहा है तो लाइट जला दूं क्या?’’ राजू ने पूछा.
‘‘नहीं, लाइट जलाने की अब कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि अब तुम मेरे पास हो.’’ कहते हुए वह उस से लिपट गई.
राजू गुडि़या की मंशा समझ चुका था. वह भी जवान था. गुडि़या के स्पर्श से उस के शरीर में भी सरसराहट दौड़ गई थी. फिर जब गुडि़या ने उसे उकसाया तो ऐसे में भला वह कैसे शांत रह सकता था. नतीजतन दोनों ने ही उस रात अपनी हसरतें पूरी कीं.

उस दिन के बाद राजू और गुडि़या अकसर कामलीला रचाने लगे. राजू अपनी अधिकांश कमाई गुडि़या व उस के बच्चों पर खर्च करने लगा. उस के घर आने का विरोध संतोष न करे, इसलिए वह उस की भी आर्थिक मदद करने लगा.
इस के अलावा संतोष जब भी शराब पीने की इच्छा जताता तो राजू उसे ठेके पर ले जाता और शराब पिलाता. इतना ही नहीं, राजू अब गुडि़या के घरेलू काम में भी हाथ बंटाने लगा. राशन लाना, बच्चों को स्कूल छोड़ना तथा शाम को सब्जी लाना उस की दिनचर्या बन गई थी.

परफेक्ट षड्यंत्र

संतोष जब गांव चला जाता तो राजू रात में उस के घर रुकता और फिर दोनों रात भर रंगरलियां मनाते. राजू जब संतोष के साथ उस के घर आता तब तो कोई बात नहीं थी, लेकिन उस की गैरमौजूदगी में जब वह अकसर उस के घर पड़ा रहने लगा तो पड़ोसियों के मन में शंका पैदा होने लगी. धीरेधीरे मोहल्ले में गुडि़या और राजू के संबंधों की चर्चा फैल गई.

एक दिन संतोष को उस के पड़ोसी रामसिंह भदौरिया ने अपने पास बुला कर कहा, ‘‘संतोष, तुम रातदिन काम में व्यस्त रहते हो और घर आ कर नशे में डूब जाते हो. कभी अपने घर की तरफ भी ध्यान दिया करो कि तुम्हारे यहां कौन आता है कौन जाता है. तुम्हें कुछ पता भी है?’’
‘‘चाचा, मेरे घर में तो सब ठीक चल रहा है. अगर कोई गड़बड़ है तो बताओ. हमें आप की बात पर पूरा भरोसा है.’’ संतोष ने पूछा.
‘‘वह जो तुम्हारा दोस्त राजू है न, वह ठीक नहीं है. तुम घर पर नहीं होते तब वह तुम्हारे घर आता है. बच्चों को पैसे दे कर घर के बाहर भेज देता है. फिर तुम्हारे घर का दरवाजा बंद हो जाता है. पूरे मोहल्ले में तुम्हारी बीवी और राजू के नाजायज संबंधों की चर्चा हो रही है और तुम कान बंद किए बैठे हो.’’ राम सिंह ने बताया.
संतोष निषाद को जब यह बात पता चली तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व राजू से बात की तो दोनों ने साफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. गुडि़या ने कहा कि राजू उस की मदद करता है, इसलिए पड़ोसी जलते हैं. घर में झगड़ा कराने के लिए वे तुम्हारे कान भर रहे हैं.
संतोष ने उस समय तो पत्नी की बात पर विश्वास कर लिया और फिर कुछ दिनों के लिए जरूरी काम से अपने गांव चला गया. लगभग एक सप्ताह बाद जब वह गांव से लौटा तो घर में राजू मौजूद था. उस समय राजू और गुडि़या हंसीठिठोली और शारीरिक छेड़छाड़ कर रहे थे.
अब उसे विश्वास हो गया कि राम सिंह चाचा ने जो बात उसे बताई थी, वह सच थी. यह देख कर संतोष का पारा चढ़ गया. उसी समय उस ने गुडि़या की जम कर पिटाई कर दी. मौका पा कर राजू वहां से खिसक गया.

अगले दिन संतोष जब अपनी ड्यूटी पर पहुंचा तो कंपनी में उसे राजू मिल गया. संतोष ने राजू को वहीं पर खूब फटकारा. राजू ने उस समय उस से माफी मांग ली, पर बाद में राजू और गुडि़या पहले की तरह मिलते रहे. किसी न किसी तरह संतोष को इस की जानकारी मिलती रही.
पत्नी की इस बेवफाई से संतोष टूट गया था. वह शराब तो पहले भी पीता था लेकिन अब और ज्यादा पीने लगा. उसे गुडि़या से इतनी अधिक नफरत हो गई थी कि उस ने उस से बातचीत तक करनी बंद कर दी.
लेकिन जिस दिन राजू घर के पास दिख जाता था, उस दिन गुस्से से संतोष का खून खौल जाता था. राजू को ले कर गुडि़या से उस की तकरार होती थी. नौबत मारपीट तक आ जाती थी. पूरा मोहल्ला जान गया था कि झगड़े की जड़ राजू और गुडि़या के अवैध संबंध हैं.
इस के बाद तो खुल्लमखुल्ला पूरे मोहल्ले में दोनों के संबंधों की चर्चा होने लगी. इस से संतोष की खूब बदनामी हो रही थी. तब संतोष ने राजू के घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया. गुडि़या अपने से 10 साल छोटे प्रेमी राजू की दीवानी थी. वह किसी भी हाल में उस से अलग नहीं होना चाहती थी.

बेरोजगारी ने बनाया पत्नी और बच्चों का कातिल

पति के चौकस हो जाने पर गुडि़या भी सतर्क हो गई. गुडि़या को जब भी मौका मिलता था, वह फोन कर के राजू को बुला लेती थी. पड़ोसियों को भनक न लगे, इस के लिए वह राजू को कमरे के पीछे खुलने वाली खिड़की से अंदर बुलाती थी, फिर शारीरिक मिलन के बाद वह उसी खिड़की से चला जाता था.
लेकिन सतर्कता के बावजूद एक रोज पड़ोसन रेखा निषाद ने राजू को खिड़की के रास्ते गुडि़या के घर में जाते देख लिया. उस ने यह बात संतोष को बताई तो उस का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने गुडि़या की जम कर पिटाई की और दूसरे दिन बच्चों सहित गुडि़या को अपने गांव वाले घर भेज दिया. गुडि़या ने गांव पहुंचने की जानकारी राजू को दे दी.
गुडि़या के गांव जाने पर राजू परेशान रहने लगा. अब दोनों की बात मोबाइल पर ही हो पाती थी. राजू गुडि़या पर दबाव बनाने लगा कि वह किसी न किसी बहाने से वापस आ जाए. उस के बिना उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. गुडि़या राजू को आश्वासन देती कि अभी उचित समय नहीं है. संतोष का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तब वह उस से बात कर के आ जाएगी.
संतोष ने पत्नी को मजबूरी में गांव भेज तो दिया था लेकिन उस के जाने के बाद वह भी परेशान हो गया था. अब उसे खाना खुद ही बनाना पड़ता था. काम में व्यस्त रहने से वह इतना थक जाता था कि कभी बिना खाना खाए ही सो जाता था.
उसे बच्चों की भी याद आ रही थी. स्कूल से भी खबर आ रही थी कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं आ रहे हैं? संतोष का मन करता कि वह बच्चों को ले आए, लेकिन पत्नी की चरित्रहीनता याद आते ही वह अपना विचार बदल देता.
जब गुडि़या को गांव से कानपुर आने का मौका नहीं मिला तो राजू संतोष को मनाने तथा उस से फिर से दोस्ती करने का प्रयास करने लगा. लेकिन संतोष उसे झिड़क देता था. एक दिन उस ने कह दिया, ‘‘तू आस्तीन का सांप है. अब मैं तेरे झांसे में नहीं आऊंगा. मैं ने तुझे भाई जैसा मानसम्मान दिया, पर तूने मुझे ही डंस लिया.’’

खाकी वरदी वाले डकैत

‘‘बड़े भैया, मुझे अपनी गलती का अहसास है. बस मुझे एक बार माफ कर दो, फिर ऐसी गलती दोबारा नहीं करूंगा.’’

राजू ने बारबार मिन्नत की तो संतोष का दिल पसीज गया. फिर से दोस्ती बहाल हो जाने पर उस दिन दोनों ने दोस्ती के नाम पर फिर से जाम पर जाम टकराए. राजू ने अपनी कामयाबी की जानकारी गुडि़या को दी तो उस के मन में आस जगी कि संतोष अब उसे अपने पास बुला लेगा.
उन्हीं दिनों संतोष वायरल फीवर की चपेट में आ गया. राजू ही उसे अस्पताल ले गया. राजू ने संतोष को सलाह दी कि वह भाभी को बुला ले तो उस की सही तरीके से देखभाल हो जाएगी. संतोष ने पहले तो मुंह बनाया फिर कुछ सोच कर गुडि़या को फोन कर बताया कि वह बीमार है, अत: बच्चों के साथ जल्दी आ जाए.
पति की बात सुन कर गुडि़या खुशी से उछल पड़ी. उस ने फटाफट अपना सामान बांध कर बच्चों को तैयार किया और दूसरे दिन कानपुर आ गई. गुडि़या की सेवा से संतोष ठीक हो गया और बच्चे भी स्कूल जाने लगे.
राजू और गुडि़या कुछ दिनों तक तो अंजान बने रहे, उस के बाद फिर से दोनों का चोरीछिपे मिलन शुरू हो गया. गुडि़या के आने के बाद राजू संतोष से किए गए अपने वादे को भूल गया.
एक रोज संतोष की अपनी कंपनी में ही तबीयत खराब हो गई. उस का बदन बुखार से तप रहा था इसलिए वह दोपहर के समय ही कंपनी से घर की ओर चल दिया. दरवाजे पर पहुंचते ही उस ने आवाज लगाई, ‘‘गुडि़या, दरवाजा खोल.’’

कई बार दरवाजा खटखटाने के बाद गुडि़या ने दरवाजा खोला. वह कमरे में पहुंचा तो उस ने खिड़की से किसी को भागते देखा. पत्नी से पूछा तो वह साफ मुकर गई. लेकिन गुडि़या के उलझे बाल, बिस्तर की हालत तो कुछ और ही बयां कर रही थी.
वह समझ गया कि जरूर इस का यार राजू यहां से भागा है. यानी इस ने अपने यार से मिलना बंद नहीं किया है. गुस्से में संतोष ने गुडि़या की चोटी पकड़ कर पूछा, ‘‘बता, तेरे साथ कमरे में कौन था? सचसच बता वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’
गुडि़या घबरा तो गई, लेकिन फिर संभलते हुए बोली, ‘‘कोई भी नहीं था. तुम्हें जरूर कोई वहम हुआ है. तुम्हारी तबीयत शायद ठीक नहीं है.’’

गुडि़या ने हमदर्दी जताई तो संतोष को लगा कि शायद उसे बुखार है, इसलिए गलतफहमी हुई है. लेकिन उस का मन बारबार कह रहा था कि कमरे के अंदर राजू था जो उस के साथ सोया था. उस रात राजू को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहा.

पहले की छेड़छाड़, फिर जिंदा जलाया

संतोष के मन में शक पैदा हुआ तो फिर बढ़ता ही गया. अब तो संतोष राजू की मौजूदगी में भी गुडि़या की पिटाई कर देता. राजू बीचबचाव करने आता तो उसे झिड़क देता.
गुडि़या राजू की दीवानी थी, इसलिए उसे न तो पति की परवाह थी और ही परिवार के इज्जत की. इसी दीवानगी में एक दिन गुडि़या ने राजू से कहा, ‘‘तुम्हारी वजह से संतोष मुझे मारतापीटता है और तुम दुम दबा कर भाग जाते हो. आखिर तुम कैसे प्रेमी हो, कुछ करते क्यों नहीं?’’
‘‘घर का मामला है भाभी, मैं कर भी क्या सकता हूं.’’ राजू ने मजबूरी जाहिर की तभी गुडि़या बोली, ‘‘विरोध तो कर सकते हो. मुझ पर उठने वाला उस का हाथ तो मरोड़ सकते हो.’’
‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकता भाभी. क्योंकि तुम पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. फिर भी मैं तुम्हारी बात पर गौर करूंगा.’’ राजू ने कहा.

28 नवंबर, 2018 की रात संतोष यह कह कर घर से निकला कि वह अपनी ड्यूटी पर जा रहा है. संतोष चला गया तो गुडि़या ने राजू से मोबाइल पर बात की, ‘‘राजू तुम फटाफट आ जाओ. आज तो मौज ही मौज है. वह घर पर नहीं है. पूरी रात अपनी है. जम कर मौजमस्ती करेंगे.’’
रात 12 बजे के आसपास राजू खिड़की के रास्ते गुडि़या के कमरे में पहुंच गया. गुडि़या ने एक कमरे में अपने बच्चों को सुला दिया था. दूसरे कमरे में गुडि़या सजीसंवरी बैठी थी. आते ही राजू ने गुडि़या को अपने बाहुपाश में लिया और दोनों जिस्मानी भूख मिटाने लगे.
इधर सुबह 5 बजे संतोष घर आया. वह कमरे के पास पहुंचा तो उस ने कमरे के अंदर हंसने की आवाजें सुनीं. संतोष का माथा ठनका, वह समझ गया कि कमरे के अंदर गुडि़या और राजू ही होंगे.
गुस्से में उस ने दरवाजा पीटना शुरू किया तो कुछ देर बाद गुडि़या ने दरवाजा खोला, तो उस ने खिड़की से कूदते राजू को देख लिया था. संतोष ने गुस्से में गुडि़या के बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. फिर वह उसे लातघूंसों से पीटने लगा.
अचानक संतोष की नजर कमरे में रखी कुल्हाड़ी पर पड़ी. उस ने कुल्हाड़ी उठाई और ताबड़तोड़ कई वार गुडि़या के सिर और गरदन पर किए. गुडि़या खून से लथपथ हो कर जान बख्श देने की गुहार लगाने लगी.
शोर सुन कर बच्चे भी जाग गए लेकिन पिता का रौद्र रूप देख कर वे सहम गए. फिर भी कृष्णा ने बाप के हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और बोला, ‘‘पापा, मम्मी को मत मारो. हम लोगों को रोटी कौन देगा.’’
कहते हुए कृष्णा कुल्हाड़ी ले कर घर के बाहर भागा.
उस ने पड़ोस में रहने वाली रेखा आंटी को बताया कि उस के पापा उस की मम्मी को कुल्हाड़ी से मार रहे हैं. रेखा भागीभागी गुडि़या के कमरे में पहुंची. गुडि़या की उस समय सांसें चल रही थीं. रेखा पुलिस को फोन करने कमरे से बाहर आई तो संतोष ने कमरे में रखा फावड़ा उठा लिया और जोरदार वार कर के गुडि़या को मौत के घाट उतार दिया. हत्या करने के बाद संतोष भागा नहीं बल्कि पत्नी के शव के पास बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.
इधर रेखा निषाद ने पड़ोसियों व थाना अरमापुर पुलिस को सूचना दे दी. खबर मिलते ही अरमापुर थानाप्रभारी आर.के. सिंह भी वहां आ गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर मृतका के पति संतोष व उस के बच्चों से बात की.

खूनी पेंच: आखिर क्यों साधना को गंवानी पड़ी जान

संतोष ने हत्या का जुर्म कबूलते हुए पुलिस अधिकारियों को बताया कि उस की पत्नी बदचलन थी, इसलिए उसे मार दिया. उसे हत्या का कोई अफसोस नहीं है. मृतका के बच्चों ने बताया कि मां की हत्या उस के पिता संतोष ने उन की आंखों के सामने की थी. उन्होंने मां को बचाने का प्रयास भी किया था, लेकिन बचा नहीं सके. पड़ोसी रेखा भी हत्या की चश्मदीद गवाह बनी.
थाना अरमापुर के इंसपेक्टर आर.के. सिंह ने मृतका गुडि़या के शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया. फिर रेखा निषाद को वादी बना कर संतोष निषाद के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. पोस्टमार्टम के बाद शव को मृतका के मातापिता को सौंप दिया गया. कृष्णा, नंदिनी व लाडो को भी पालनपोषण के लिए नानानानी अपने साथ ले गए.
30 नवंबर, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त संतोष निषाद को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. सभी बच्चे अपनी ननिहाल में थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

केजरीवाल को थप्पड़ मारने का मतलब

लेखक- सुनील शर्मा

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का विवादों से मानो गहरा नाता रहा है. आज से तकरीबन 5 साल पहले अन्ना आंदोलन से उपजे इस आम आदमी ने दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो कर साबित कर दिया था कि इस देश में जनता ही जनार्दन है. अगर कोई उस के मन की पढ़ ले तो वह उसे फर्श से अर्श तक ले जाती है. बाद में अरविंद केजरीवाल का सादापन और काम करने का तरीका बहुतों को पसंद आया तो कइयों को यह नौटंकी भी लगा और चूंकि मुख्यमंत्री बनने के बावजूद अरविंद केजरीवाल हर आम आदमी की जद में रहते थे तो उन पर निशाना साधना भी आसान ही था.

लिहाजा, कभी उन पर स्याही फेंकी गई तो कभी किसी ने थप्पड़ ही रसीद कर दिया. हाल ही में लोकसभा चुनाव के उन के एक रोड शो में एक आदमी ने उन्हें फिर थप्पड़ मारा. दरअसल, शनिवार, 4 मई की शाम को दिल्ली के मोती नगर इलाके में अरविंद केजरीवाल अपनी पार्टी के उम्मीदवार बृजेश गोयल का प्रचार कर रहे थे. वे एक खुली जीप में आगे खड़े थे कि तभी लाल रंग की टीशर्ट पहने

हालांकि वहां मौजूद आम आदमी पार्टी के लोगों ने उस आदमी को बख्शा नहीं और धुन दिया, बाद में पुलिस के हवाले भी कर दिया, पर तब तक वह आदमी अपने मकसद में कामयाब हो चुका था.

यूपी ही तय करेगा दिल्ली का सरताज

इस थप्पड़ कांड से पहले अरविंद केजरीवाल पर अक्टूबर 2011 से ले कर अब तक 11 बार हमले हो चुके हैं जबकि पिछले साल के नवंबर महीने में उन पर मिर्च से हमला हुआ था. इतना ही नहीं, अरविंद केजरीवाल पर कभी पत्थर फेंक कर तो कभी जूता उछाल कर भी विरोध जताया गया. आम आदमी पार्टी इस ताजा  थप्पड़ कांड के पीछे भारतीय जनता पार्टी का हाथ मानती है और सवाल उठती है कि क्या वे लोग अरविंद केजरीवाल की हत्या कराना चाहते हैं?

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया कि क्या मोदी और अमित शाह अब केजरीवाल की हत्या करवाना चाहते हैं? 5 साल सारी ताकत लगा कर जिस का मनोबल नहीं तोड़ सके, अब उसे रास्ते से हटाना चाहते हो?आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन आती है और जानबूझ कर मुख्यमंत्री की सुरक्षा में चूक की जा रही है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का जीवन सब से असुरक्षित है.

आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक गोपाल राय ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि दिल्ली में वह बुरी तरह से हार रही है और यह उस की बौखलाहट को दिखा रहा है. पहले भाजपा ने उम्मीदवार बदले, विधायकों की खरीदफरोख्त की मंडी लगाई लेकिन जब इस से भी काम नहीं चला तो मुख्यमंत्री पर हमला करवाया गया. खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मसले पर कहा, “हमला मुझ पर नहीं दिल्ली की जनता पर है. प्रधानमंत्री मोदी से पाकिस्तान संग रिश्तों पर पूछा सवाल, इसलिए मारा.”

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सवाल उठता है कि अरविंद केजरीवाल तक ऐसे लोग कैसे पहुंच जाते हैं जो उन पर हमला भी कर देते हैं? वैसे, ऐसा सिर्फ उन्हीं के साथ ही नहीं हुआ है. देश का पहला बड़ा जूता कांड कांग्रेस के नेता और तब के गृह मंत्री पी. चिदंबरम के साथ हुआ था. साल 2009 में कांग्रेस के दिल्ली मुख्यालय में 1984 के सिख दंगों में जगदीश टाइटलर को सीबीआई द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के सवाल पर मनमुताबिक जवाब न मिलने से गुस्साए एक पत्रकार जरनैल सिंह ने उन पर जूता फेंक कर मारा था.

अब बात करते हैं अरविंद केजरीवाल की सिक्योरिटी की. उन की पार्टी की नाराजगी इस बात को ले कर है कि क्योंकि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के हाथ में है तो वह अपना काम ढंग से नहीं करती है. मनीष सिसोदिया ने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस के जरीए भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि अगर कोई दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर करे, यहां तक कि उन की हत्या भी कर दे तो वह भी साफ बचा लिया जाएगा. इस के उलट भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने पूछा कि केजरीवाल ने सिक्योरिटी क्यों हटवाई? दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने दावा किया कि केजरीवाल ने शनिवार को ही अपनी सिक्योरिटी के लाइजनिंग अफसर को आदेश दिया था कि जब वे रोड शो के लिए निकलते हैं तब उन की गाड़ी के आसपास कोई भी सिक्योरिटी वाला नहीं रहना चाहिए. उन्होंने ऐसा क्यों किया और उस आदेश के पालन के बाद ही उन पर हमला क्यों हुआ?

मीडियाकर्मियों का दिल जीत लिया राहुल ने

विजेंद्र गुप्ता ने आगे बताया कि पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, हमलावर आप का कार्यकर्ता था और उस की पार्टी के नेताओं द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने की वजह से नाराज था…असल में अरविंद केजरीवाल को अपनी हार का डर सता रहा है और कोई उन्हें भाव नहीं दे रहा है. यह तो बात रही सियासी आरोपों की लेकिन सच तो यह है कि अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े कद के नेताओं को अपने पास इतनी सिक्योरिटी तो रखनी ही होगी कि कोई सिरफिरा बड़ा कांड न कर दे. किसी नेता के विचारों या कामों से असहमत हुआ जा सकता है पर जिस पद पर वह बैठा है उस की गरिमा का खयाल रखते हुए उस पर हमला करना कहीं से भी जायज नहीं है. ऐसे मामलों में कुसूरवार पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए. वैसे, जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने पी. चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह को आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़वा कर बाद में विधायक बनवा दिया था, उस से कई लोगों के मन में यह बात घर कर गई होगी कि नेता पर जूता चलाओ और बाद में किसी पार्टी में शामिल हो कर खुद नेता बन जाओ. राजनीति में थप्पड़वाद को बढ़ावा देने के पीछे यह सोच भी काम करती है.

“चंद्रमुखी चौटाला” का हौट वर्कआउट, फोटो हुई वायरल

कविता कौशिक का नाम जब भी किसी को याद आता है तो एक लेडी अफसर या हवलदार गुलगुले को थप्पड़ मारती चंद्रमुखी चौटाला याद आ जाती है. पर इन दिनों सोशल मीडिया मे उनकी ग्लैमरस तस्वीर वायरल हो रही है. इन तस्वीरो मे कविता कौशिक वर्कआउट करती नजर आ रही हैं.

टाइगर के बारे मे अनन्या ने कही ऐसी बात की दिशा को भी होगी जलन          

कविता अक्सर ऐसी तस्वीरे शेयर करती रहती है जिससे उनके फैंस को पता चलता रहे की वो कितनी फिटनेस फ्रीक है. कविता के वर्कआउट आसन बहुत टफ होते है, जिसको करने के लिये कविता ने महीनों प्रेक्टस की है. कविता की फिटनेस फ्रीक तस्वीर उनके सोशल मीडिया अकाउन्ट में भरी पड़ी है. इसके पहले भी कवित की समुंद्र किनारे पिंक बिक्नी मे नजर आ चुकी है.

 

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कविता बहुत जल्द ‘Mindo Taseeldarni’  में नजर आने वाली है. हाल ही में उन्होंने इसकी शूटिंग खत्म की है. फिल्म में कविता कौशिक के अलावा अवतार सिंह, राजवीर जवांदा, करमजीत अनमोल और ईशा रिखी मेन लीड में हैं. ये फिल्म 28 जून को रिलीज होगी.

आखिर क्यूं छोटे परदे पर काम नहीं करना चाहते 

कोमेडी सीरियल ‘एफआईआर’ से कविता कौशिक को अलग पहचान मिली, इसमें उनका किरदार इंस्पेक्टर चंद्रमुखी चौटाला का था.

बेहाल कर रही चुनावी डयूटी

लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया बेहद लंबी है. लगभग 2 महीने तकचुनाव का कामकाज चल रहा है. बहुत सारे सरकारी विभागों में कामकाज ठप्प है. सरकारी कर्मचारी चुनावी डयूटी पर है. यहा तक की पुलिस विभाग मेंभी बहुत सारे केस पेडिंग है. पुलिस चुनावी डयूटी में लगी है. सबसे खराबहालत पोलिंग बूथ पर डयूटी देने वाले कर्मचारियों की होती है. इनको अपने घर से दूर गांवगांव ऐसी जगहों पर जाना होता है जहां रहनेखाने तक की कोई व्यवस्था नहीं होती है.

यूपी ही तय करेगा दिल्ली का सरताज

किसी जानपहचान वाले के घर रूकना या फिर मतदान स्थल पर रात गुजारनी पडती है.इस दौरान वह अपने घर परिवार के संपर्क से भी दूर रहते है. डयूटी के समय उनको अपने फोन तक के प्रयोग की अनुमति नही होती है. सबसे अधिक परेशानी शिक्षा विभाग में काम करने वाली शिक्षिकाओं की है. इनमें से तमाम के छोटे बच्चे है. एकल परिवार में रहने के कारणवह बच्चों को छोड नहीं सकती और डयूटी के समय साथ भी नहीं रख सकती. इनकी डयूटी जब गांव देहात के एरिया में लग जाती है तो उसको संभालना मुश्किल हो जाता है. मतदान वाले दिन की डयूटी ज्यादा कठिन होती है. सुबह 5 बजे मतदान स्थल पर पहंुचना पडता है. इसके लिये रात भर का सफर करना पडता है. मतदान खत्म होने के बाद भी उनको छुटटी तब मिलती है जब मतपेटी जमा हो जाती है और सारे कागजात का मिलान हो जाता है. बहुत सारे मतदान स्थल गांव के सरकारी स्कूलों में होते है. जहां आज भी महिलाओं के लिये साफ सुथरे शौचालय नहीं है.

मोदी जी की सेना कहने पर सैनिक हुए खफा

स्कूल में एकही शौचालय होता भी है तो उसका प्रयोग करने वालों की संख्या बढ जाती है. शौचालय को साफ करने वाले नहीं होते है. इसके अलावा रात रूकने की व्यवस्था गांव में नहीं होती. गरमी और मच्छरों से भरी रात किसी कैदखाने से कम नहीं होती है. चुनावी डयूटी से बचने के लिये कर्मचारी बहुत तरह से कोशिश करते है. इसके बाद भी उनको चुनावी डयूटी मेंजाना ही पडता है.लोकसभा चुनाव में 7 चरण पूरे 2 माह के कार्यक्रम से बनाये गये है. ऐसे में मतगणना के बाद ही चुनावी छुटटी से मुक्ति मिलती है. इस दौरान तमाम कर्मचारी बीमार हो जाते है. गर्मी में चुनाव होने के कारण परेशानी और भी अधिक होती है. चुनाव दर चुनाव यह परेशानियांबढती जा रही है. इसके अलावा महिला कर्मचारियों को चुनाव के दिन मतदान स्थल पर तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पडता है. कई बार यहां पर लडाई झगडा, गाली गलौच भी होता है. ऐसे में उनको यह सब भी सहना पडता है. नाम ना छापने की शर्त पर कई महिला कर्मचारियों ने बताया कि मतदान वाले दिन वह लोग पानी कम पीते है.

मोदी जी की सेना कहने पर सैनिक हुए खफा

जिससे उनको कम से कम शौचालय का प्रयोग करना पडे. इससे शाम तक कई की तबीयत खराब हो गई. अपने 5 माह के बच्चे को छोड कर मतदान स्थल पर डयूटी दे रही महिला टीचर ने बताया कि चुनावी डयूटी किसी प्रताडना से कम नहीं होती है. सरकार किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं करती. अधिकारी कोई बात सुनते नहीं. ज्यादा कहों तो निजी दुश्मनी मानकर प्रताडित करते है. कई बार तो साथी पुरूष कर्मचारी इन हालातों से मजा लेते है. चुनाव सुधार की बात करते समय ऐसी चुनावी

डयूटी को भी सरल करने पर विचार करना चाहिये.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia

 

गृहस्थी की डोर

लेखक- एन.के. सोमानी 

मनीष उस समय 27 साल का था. उस ने अपनी शिक्षा पूरी कर मुंबई के उपनगर शिवड़ी स्थित एक काल सेंटर से अपने कैरियर की शुरुआत की, जहां का ज्यादातर काम रात को ही होता था. अमेरिका के ग्राहकों का जब दिन होता तो भारत की रात, अत: दिनचर्या अब रातचर्या में बदल गई.

मनीष एक खातेपीते परिवार का बेटा था. सातरस्ते पर उस का परिवार एक ऊंची इमारत में रहता था. पिता का मंगलदास मार्केट में कपड़े का थोक व्यापार था. मनीष की उस पुरानी गंदी गलियों में स्थित मार्केट में पुश्तैनी काम करने में कोई रुचि नहीं थी. परिवार के मना करने पर भी आई.टी. क्षेत्र में नौकरी शुरू की, जो रात को 9 बजे से सुबह 8 बजे तक की ड्यूटी के रूप में करनी पड़ती. खानापीना, सोनाउठना सभी उलटे हो गए थे.

जवानी व नई नौकरी का जोश, सभी साथी लड़केलड़कियां उसी की उम्र के थे. दफ्तर में ही कैंटीन का खाना, व्यायाम का जिमनेजियम व आराम करने के लिए रूम थे. उस कमरे में जोरजोर से पश्चिमी तर्ज व ताल पर संगीत चीखता रहता. सभी युवा काम से ऊबने पर थोड़ी देर आ कर नाच लेते. साथ ही सिगरेट के साथ एक्स्टेसी की गोली का भी बियर के साथ प्रचलन था, जिस से होश, बदहोश, मदहोश का सिलसिला चलता रहता.

उस रात अचानक

शोभना एक आम मध्यम आय वाले परिवार की लड़की थी. हैदराबाद से शिक्षा पूरी कर मुंबई आई थी और मनीष के ही काल सेंटर में काम करती थी. वह 3 अन्य सहेलियों के साथ एक छोटे से फ्लैट में रहती थी. फ्लैट का किराया व बिजलीपानी का जो भी खर्च आता वे तीनों सहेलियां आपस में बांट लेतीं. भोजन दोनों समय बाहर ही होता. एक समय तो कंपनी की कैंटीन में और दिन में कहीं भी सुविधानुसार.

रात को 2-3 बजे के बीच मनीष व शोभना को डिनर बे्रक व आराम का समय मिलता. डिनर तो पिज्जा या बर्गर के रूप में होता, बाकी समय डांस में गुजरता. थोड़े ही दिनों में दफ्तर के एक छोटे बूथ में दोनों का यौन संबंध हो गया. मित्रों के बीच उन के प्रेम के चर्चे आम होने लगे तो साल भर बीतने पर दोनों का विवाह भी हो गया, जिस में उन के काल सेंटर के अधिकांश सहकर्मी व स्टाफ आया था. विवाह उपनगर के एक हालीडे रिजोर्ट में हुआ. उस दिन सभी वहां से नशे में धुत हो कर निकले थे.

दूसरे साल मनीष ने काल सेंटर की नौकरी से इस्तीफा दे कर अपने एक मित्र के छोटे से दफ्तर में एक मेज लगवा कर एक्सपोर्ट का काम शुरू किया. उन दिनों रेडीमेड कपड़ों की पश्चिमी देशों में काफी मांग थी. अत: नियमित आर्डर के मुताबिक वह कंटेनर से कोच्चि से माल भिजवाने लगा. उधर शोभना उसी जगह काम करती रही थी. अब उन दोनों की दिनचर्या में इतना अंतराल आ गया कि वे एक जगह रहते हुए भी हफ्तों तक अपने दुखसुख की बात नहीं कर पाते, गपशप की तो बात ही क्या थी. दोनों ही को फिलहाल बच्चे नहीं चाहिए थे, अत: शोभना इस की व्यवस्था स्वयं रखती. इस के अलावा घर की साफसफाई तो दूर, फ्लैट में कपड़े भी ठीक से नहीं रखे जाते और वे चारों ओर बिखरे रहते. मनीष शोभना के भरोसे रहता और उसे काम से आने के बाद बिलकुल भी सुध न रहती. पलंग पर आ कर धम्म से पड़ जाती थी.

मनीष का रहनसहन व संगत अब ऐसी हो गई थी कि उसे हर दूसरे दिन पार्टियों में जाना पड़ता था जहां रात भर पी कर नाचना और उस पर से ड्रग लेना पड़ता था. इन सब में और दूसरी औरतों के संग शारीरिक संबंध बनाने में इतना समय व रुपए खर्च होने लगे कि उस के अच्छेभले व्यवसाय से अब खर्च पूरा नहीं पड़ता.

किसी विशेष दिन शोभना छुट्टी ले कर मनीष के साथ रहना चाहती तो वह उस से रूखा व्यवहार करता. साथ में रहना या रेस्तरां में जाना उसे गवारा न होता. शोभना मन मार कर अपने काम में लगी रहती.

यद्यपि शोभना ने कई बार मनीष को बातोंबातों में सावधान रहने व पीने, ड्रग  आदि से दूर रहने के संकेत दिए थे पर वह झुंझला कर सुनीअनसुनी कर देता, ‘‘तुम क्या जानो कमाई कैसे की जाती है. नेटवर्क तो बनाना ही पड़ता है.’’

कैक्टस के फूल

एक बार मनीष ने एक कंटेनर में फटेपुराने चिथड़े भर कर रेडीमेड के नाम से दस्तावेज बना कर बैंक से रकम ले ली, लेकिन जब पोर्ट के एक जूनियर अधिकारी ने कंटेनर खोल कर तलाशी ली तो मनीष के होश उड़ गए. कोर्ट में केस न दर्ज हो इस के लिए उस ने 15 लाख में मामला तय कर अपना पीछा छुड़ाया, लेकिन उस के लिए उसे कोच्चि का अपना फ्लैट बेचना पड़ा था. वहां से बैंक को बिना बताए वापस मुंबई शोभना के साथ आ कर रहने लगा. बैंक का अकाउंट भी गलत बयानी के आधार पर खोला था. अत: उन लोगों ने एफ.आई.आर. दर्ज करा कर फाइल बंद कर दी.

इस बीच मनीष की जीवनशैली के कारण उस के लिवर ने धीरेधीरे काम करना बंद कर दिया. खानापीना व किडनी के ठीक न चलने से डाक्टरों ने उसे सलाह दी कि लिवर ट्रांसप्लांट के बिना अब कुछ नहीं हो सकता. इस बीच 4-6 महीने मनीष आयुर्वेदिक दवाआें के चक्कर में भी पड़ा रहा. लेकिन कोई फायदा न होता देख कर आखिर शोभना से उसे बात करनी पड़ी कि लिवर नया लगा कर पूरी प्रक्रिया में 3-4 महीने लगेंगे, 12-15 लाख का खर्च है. पर सब से बड़ी दुविधा है नया लिवर मिलने की.

‘‘मैं ने आप से कितनी बार मना किया था कि खानेपीने व ड्रग के मामले में सावधानी बरतो पर आप मेरी सुनें तब न.’’

‘‘अब सुनासुना कर छलनी करने से क्या मैं ठीक हो जाऊंगा?’’

सारी परिस्थिति समझ कर शोभना ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल में जा कर अपने लिवर की जांच कराई. उस का लिवर ऐसा निकला जिसे मनीष के शरीर ने मंजूर कर लिया. अपने गहनेजेवर व फ्लैट को गिरवी रख एवं बाकी राशि मनीष के परिवार से जुटा कर दोनों अस्पताल में इस बड़ी शल्यक्रिया के लिए भरती हो गए.

मनीष को 6 महीने लगे पूरी तरह ठीक होने में. उस ने अब अपनी जीवन पद्धति को पूरी तरह से बदलने व शोभना के साथ संतोषपूर्वक जीवन बिताने का निश्चय कर लिया है. दोनों अब बच्चे की सोचने लगे हैं.

अजय विजय के बीच शिववती

लेखक – सुरेशचंद्र मिश्र  

कानपुर नगर से करीब 30 किलोमीटर दूर बेला विधूना रोड पर एक गांव है

अंगदपुर. राजबली अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी अनीता के अलावा 2 बेटे थे राजू व भीम. साथ ही 2 बेटियां शिववती व रामवती भी थीं. राजबली की कहिंजरी बस स्टाप पर मिठाई की दुकान थी, उसी से उस के परिवार का भरणपोषण होता था. उस के दोनों बेटे भी काम में उस का हाथ बंटाते थे.

दुकान बस स्टाप पर होने की वजह से अच्छी चलती थी. जैसेजैसे उस के बच्चे जवान होते गए, वह उन की शादी करता गया. छोटी बेटी शिववती की शादी उस ने थाना शिवली के अंतर्गत आने वाले गांव लुधौरा बाघपुर निवासी विजय लाल से करदी थी. विजय लाल खेतीकिसानी में अपने पिता गोपीचंद के हाथ बंटाता था.

शिववती से शादी कर के वह बहुत खुश था, लेकिन सुहागरात को वह पत्नी को खुश नहीं कर सका. पति की यह हालत देख कर शिववती के सारे सपने बिखर गए. पति को ले कर उस ने जो अरमान सजाए थे, आंसुओं में बह गए.

विजय ने पत्नी को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन शिववती की सुहागरात आंसुओं के साथ गुजरी. बहरहाल, शिववती ने संयम और समझदारी से काम लिया. चूंकि उसे विजय लाल के साथ ही रहना था, इसलिए उस ने पति को किसी डाक्टर से मिलने की सलाह दी. विजय ने अपना इलाज कराया और वह ठीक हो गया. बहरहाल, उस की गृहस्थी ठीक से चलने लगी.

सुंदरी की साजिश

समय अपनी गति से गुजरता रहा और करीब 4 साल बाद विजय एक बच्चे का बाप बन गया. बच्चा हो जाने के बाद पत्नी का खर्च बढ़ गया.

अब शिववती के खर्च के लिए घर में रोजरोज तो पैसे मांगे नहीं जा सकते थे, लिहाजा वह कोई दूसरा काम करने की सोचने लगा. उस के पास इतना पैसा तो था नहीं, जिस से वह कोई ढंग की दुकान वगैरह खोल लेता. लिहाजा वह कहीं नौकरी पाने की कोशिश करने लगा.

 

काफी कोशिश करने के बाद भी जब कोई नौकरी नहीं लगी तो विजय लाल शिवली कस्बा स्थित भगवती जनरल स्टोर पर नौकरी करने लगा. कस्बा शिवली उस के गांव से करीब 5 किलोमीटर दूर था. वह सुबह 8 बजे साइकिल से अपने काम पर निकलता था और रात 8 बजे घर लौटता था. दिन भर दुकान पर काम कर के वह काफी थक जाता था, जिस से वह पत्नी की शारीरिक जरूरत को नहीं समझ पाता था.

पति की कमाई से शिववती के हाथ में पैसा आने लगा तो उस की घरगृहस्थी की गाड़ी चलने लगी. शिववती आर्थिक रूप से तो पति से संतुष्ट थी, लेकिन शारीरिक रूप से नहीं. उस का दिन तो किसी तरह कट जाता, लेकिन रात की गहरी खामोशी उसे खाने को दौड़ती थी.

विजय लाल के साथ दीपू और श्यामू नाम के 2 युवक काम करते थे. तीनों में खूब पटती थी. दोनों ही पियक्कड़ थे. उन्होंने विजय लाल को भी शराब का चस्का लगा दिया था. शिववती को पति का शराब पीना पसंद नहीं था. वह जब भी शराब पी कर घर पहुंचता तो उस की पत्नी घर में कलह शुरू कर देती थी.

शिववती कहती, ‘एक तो तुम वैसे भी किसी काम के नहीं हो, ऊपर से शराब पी कर आ जाते हो. तुम्हें न मेरी चिंता है और न बच्चे की.’

 

विजय लाल अपनी कमजोरी समझता था, इसलिए वह बीवी की जलीकटी बातें सुन लेता था. विजय लाल के घर अजय कुमार का आनाजाना था. अजय कुमार रसूलाबाद थाने के अंतर्गत आने वाले गांव संभरपुर का रहने वाला था. विजय लाल उस का ममेरा भाई था.

अजय कुमार जब भी शिवली कस्बे से बीजखाद लेने आता था, मामा के घर जरूर जाता था. अजय कुमार शादीशुदा था और 2 बच्चों का बाप भी. उस की पत्नी अनपढ़ और सामान्य सी महिला थी, इसलिए वह उसे मन से नहीं चाहता था. अपनी पत्नी से उस की बिलकुल नहीं पटती थी.

शिववती ने अजय के आने पर पहले तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वह कामना की आग में झुलसने लगी तो उस ने अजय पर नजरें गड़ानी शुरू कर दीं. अब अजय जब भी घर आता, शिववती उसे चाहत भरी नजरों से देखती. उस से हंसीमजाक करती.

नशे और ग्लैमर का चक्रव्यूह

 

अजय पहले तो सकुचाया, क्योंकि वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. लेकिन जब उस ने शिववती की आंखों में चाहत देखी तो उस ने भी कदम आगे बढ़ा दिए.

अजय का शिववती के घर कभीकभी ही आ पाता था. उस रोज वह कई दिनों बाद आया तो काफी रोमांटिक मूड में था. शिववती भाभी के लिए वह गिफ्ट में एक साड़ी ले कर आया था, लेकिन वह उसे घर में दिखाई नहीं दी. उस की बेचैन निगाहें शिववती को देखने को बेचैन थीं. अजय को घर में बैठे काफी देर हो गई थी. लेकिन उसे भाभी का दीदार नहीं हुआ था.

कुरसी पर बैठेबैठे वह पहलू बदलने लगा. तभी गुसलखाने की किवाड़ें खुलीं और शिववती बाहर निकली. भीगे तनबदन पर लपेटी हुई साड़ी शरीर से चिपकी पड़ी थी. ऐसे में देह के सारे कटाव और उभार साफ दिख रहे थे.

 

अजय हैरान नजरों से शिववती के हुस्न और शबाब को देखता रहा. अजय को देख शिववती अपनी हालत पर थोड़ी लजाई, फिर गीले बालों को पीछे झटकते हुए बोली, ‘‘अजय, तुम कब आए?’’

‘‘अभीअभी आया हूं भाभी.’’ अजय की निगाहें अनीता के बदन पर ही चिपकी हुई थीं. वह बोला, ‘‘विजय भैया नजर नहीं आ रहे, कहीं गए हैं?’’

‘‘हां, वह दुकान पर गए हैं. अब तो रात तक ही वापस लौटेंगे. तुम बैठो, मैं कपड़े बदल कर आती हूं.’’ शिववती ने कहा तो अजय बोल पड़ा, ‘‘भाभी, एक मिनट ठहरो.’’

उस ने अपने बैग से साड़ी का एक लिफाफा निकाला और उसे शिववती की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘लो भाभी, यह मैं तुम्हारे लिए ही लाया हूं. कपड़े बदलने जा ही रही हो तो इसे ही पहन लो. मैं भी तो देखूं कि इस साड़ी में कैसी लगोगी.’’

शिववती ने साड़ी ली और मादक निगाहों के तीर चलाती हुई दूसरे कमरे में चली गई. कुछ देर बाद शिववती साड़ी पहन कर आई तो उस के हाथ में पानी का गिलास था. अजय ने पानी लिया और एक ही सांस में पी गया.

‘‘क्या बात है अजय, बहुत प्यासे नजर आ रहे हो.’’ शिववती ने चुहल की.

‘‘प्यासा था नहीं, पर अब प्यास जाग गई है.’’ अजय ने शिववती को गौर से देखा, ‘‘तुम पर साड़ी खूब फब रही है. अच्छी है न?’’

‘‘बहुत अच्छी है, तुम लाओ और अच्छी न हो, भला ऐसा हो सकता है?’’ शिववती मुसकराई.

 

यह देख कर कुरसी पर बैठा अजय खड़ा हो गया. वह शिववती की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘जानती हो भाभी, मैं यहां बारबार क्यों आता हूं.’’

‘‘यह भी कोई पूछने की बात है, तुम हमारे रिश्तेदार हो, जब चाहे आ सकते हो.’’ शिववती मुसकराई.

‘‘सच कहा तुम ने. पर मुझे तुम्हारी चाहत खींच लाती है. मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं.’’ अजय ने एकाएक उस का हाथ पकड़ लिया. फिर उसे अपनी बांहों में भर लिया. इस से शिववती की सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं.

वह कसमसाई, ‘‘यह ठीक नहीं है अजय.’’

‘‘ठीक तब नहीं होगा भाभी, जब हम अपनी चाहतों को अधूरा छोड़ देंगे.’’ कह कर अजय ने अपने हाथों की हरकत बढ़ा दी.

आखिर शिववती ने अपनी आंखें बंद कर के खुद को अजय की बांहों में छोड़ दिया. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं.

उस रोज शिववती ने वह सुख पा लिया, जो उसे पति से कभी नहीं मिला था. वह अजय की दीवानी हो गई.

उस दिन के बाद शिववती व अजय को जब भी मौका मिलता, वह मिलन कर लेते. जब विजय घर पर नहीं होता, तब अजय उस के ही कमरे में घुसा रहता. चूंकि अजय व शिववती करीबी रिश्ते में थे, इसलिए काफी दिनों तक गांव में किसी को उन के संबंधों पर शक नहीं हुआ. सब की आंखों में धूल झोंक कर दोनों अपनी मन की मुराद पूरी करते रहे.

खूनी नशा: ज्यादा होशियारी ऐसे पड़ गई भारी

शिववती अब पति के बजाए अजय के लिए शृंगार करने लगी. शिववती के व्यवहार में भी अब काफी बदलाव आ गया था. उस की चंचलता बढ़ गई थी और चेहरे पर लुनाई छाने लगी थी. उस का पति विजय इस बदलाव को महसूस कर रहा था, लेकिन उसे इस की वजह पता नहीं थी.

लेकिन मोहल्ले वालों की नजरों से हकीकत छिपी न रह सकी. विजय की गैरमौजूदगी में अजय का बारबार उस के घर आना लोगों के मन में शक पैदा कर रहा था. एक रोज एक पड़ोसी ने विजय को टोक ही दिया. उसे सारी बात बताई तथा सलाह दी कि वह नौकरी के साथसाथ घरवाली का भी खयाल रखे.

पड़ोसी की बात सुन कर विजय का माथा ठनका. उस रोज उस का मन काम में नहीं लगा और शाम को जल्द घर आ गया. आते ही उस ने पत्नी से सीधा सवाल किया, ‘‘ये अजय यहां बारबार क्यों आता है?’’

‘‘तुम्हारा रिश्तेदार है. तुम ममेरे भाई हो, इसलिए आता है.’’ शिववती बोली.

‘‘लेकिन वह मेरी गैरमौजूदगी में क्यों आता है?’’

‘‘तुम सुबह काम पर चले जाते हो और रात को लौटते हो. यदि वह तुम्हारी गैरमौजूदगी में आता है तो क्या मैं उसे घर से निकाल दूं.’’

‘‘निकालो या कुछ भी करो, लेकिन वह मेरी गैरहाजिरी में घर नहीं आना चाहिए.’’ विजय ने गुस्से में कहा.

‘‘पर हुआ क्या है, यह तो बताओ. आप इतने खफा क्यों हो?’’ शिववती ने पूछा.

‘‘देखो शिववती, मोहल्ले वाले तुम्हारे बारे में तरहतरह की बातें कर रहे हैं. इस से हमारी बदनामी हो रही है. मैं नहीं चाहता कि आज के बाद अजय के मनहूस कदम इस घर में पड़ें.’’ विजय ने तेज आवाज में कहा.

तभी शिववती चीख कर बोली, ‘‘मैं कौन होती हूं उसे रोकने वाली. तुम खुद रोको.’’

पत्नी की इस बेहयाई पर विजय ने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया, ‘‘बदचलन, अगर तू ही उसे मुंह नहीं लगाएगी तो वह कैसे आएगा?’’

 

पति का रौद्र रूप देख वह सकते में आ गई. अगले रोज जैसे ही विजय घर से काम पर जाने के लिए निकला, वैसे ही शिववती ने अजय को फोन मिलाया और उसे पूरी बात बता दी. अजय ने उसे दिलासा दी, ‘‘भाभी, तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. मैं हूं न.’’

‘‘नहीं अजय, मेरा दिल घबरा रहा है. हमारे रिश्तों की भनक विजय को लग गई है, इसलिए अब तुम यहां मत आना.’’

‘‘ऐसा मत कहो भाभी. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘अच्छा, ऐसी बात है तो कुछ दिन रह लो. फिर मैं कोई रास्ता निकालती हूं.’’

इस घटना के कुछ दिनों बाद तक अजय शिववती से मिलने नहीं आया. लेकिन जब शिववती को अजय की याद सताने लगी तो उस ने फोन कर के अजय को देर रात अपने यहां आने को कहा.

अजय की लुधौरा गांव के पश्चिमी छोर पर रहने वाले रमेश सरस से दोस्ती थी. दोनों हमउम्र थे. अजय और शिववती के नाजायज रिश्ते की जानकारी उसे भी थी. शराब के लालच में रमेश अजय को रात में अपने यहां ठहरा लेता था. शिववती ने जब उसे बुलाया तो वह देर शाम लुधौरा बाघपुर गांव पहुंच गया. उस ने अपनी साइकिल दोस्त रमेश के घर खड़ी कर दी फिर शिववती से मिलने उस के घर जा पहुंचा.

दिल्ली के लव कमांडो: हीरो नहीं विलेन

शिववती उसी का इंतजार कर रही थी. उस का पति थकाहारा आ कर खाना खाने के बाद कब का सो चुका था. अजय के आते ही शिववती उसे छत पर बने कमरे में ले गई. वहां दोनों मौजमस्ती में जुट गए.

इस के बाद अजय दोस्त के घर चला गया. विजय के सोने के बाद उस के घर में कौन आया, कौन गया, उसे पता नहीं चला. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अजय सप्ताह में 1-2 बार शिववती से मिलने पहुंच जाता था.

गलत काम चाहे कितनी भी चालाकी से किया जाए, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक रात विजय दोस्तों के साथ शराब पी कर नशे में धुत हो कर घर आया. ज्यादा नशे में होने की वजह से वह बिस्तर पर गिरा और सो गया.

संयोग से उस शाम अजय भी गांव में अपने दोस्त रमेश के यहां आया हुआ था. शिववती ने अजय को फोन कर के घर बुला लिया. नशे में धुत विजय को खर्राटे लेते देख कर अजय का मन मचल उठा. उस ने शिववती से कहा, ‘‘भाभी, आज तो भैया इतने नशे में हैं कि इन की आंखें सुबह होने से पहले नहीं खुलने वालीं.’’

‘‘तभी तो मैं ने तुम्हें बुलाया है.’’ शिववती बोली.

इस के बाद दोनों इत्मीनान से कामलीला में मग्न हो गए.

संयोग से तभी विजय को प्यास लगी तो उस की नींद टूट गई. उस ने देखा कि शिववती चारपाई पर नहीं है. वह पानी पीना भूल गया और पत्नी को ढूंढने लगा, वह नहीं मिली. दबेपांव विजय सीढि़यों से छत पर जा पहुंचा. वहां कमरे में शिववती को अजय की बांहों में समाया देखा तो विजय के तनबदन में आग लग गई. उस दिन उसे पत्नी की सच्चाई का प्रमाण मिल गया था.

 

तेज कदमों से वह उन दोनों के करीब पहुंचा. लेकिन दोनों कामक्रीड़ा में इतने तल्लीन थे कि उन्हें विजय के आने का आभास तक नहीं हुआ. विजय ने अजय के बाल पकड़ कर उसे झिंझोड़ा. अचानक हुए इस हमले से अजय सकते में आ गया. उस ने खुद को संभालते हुए अपने कपड़े उठाए और फटाफट पहन कर वहां से भाग खड़ा हुआ. पति के रौद्र रूप को देख कर एक कोने में सिमटी शिववती समझ चुकी थी कि आज उस की खैर नहीं.

उस रात विजय ने शिववती को रुई की तरह धुना. उस के बाद उस ने पत्नी पर तमाम पाबंदियां लगा दीं. शिववती का प्रेमी से मिलन बंद हुआ तो वह घुटघुट कर जीने लगी. अजय भी परेशान था. लेकिन दोनों को मिलन की कोई राह नहीं सूझ रही थी.

 

आखिर जब शिववती से रहा नहीं गया तो उस ने एक रोज हिम्मत जुटा कर फोन कर अजय को घर बुला लिया. अजय घर आया तो शिववती उस के सीने से लग कर सुबकने लगी, ‘‘अजय, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती. मुझे कहीं भगा कर ले चलो.’’

‘‘पागल तो नहीं हो गई हो. विजय भैया का क्या होगा, पता है?’’ वह बोला.

‘‘तुम्हारी खातिर मैं उसे भी छोड़ दूंगी.’’

‘‘पर वह तो तुम्हें नहीं छोड़ेंगे.’’

‘‘हां, तुम्हारी यह बात सच है.’’ शिववती कुछ देर गहन सोच में डूबी रही फिर बोली, ‘‘तो फिर ऐसा करो कि किसी बदमाश से सौदा कर के विजय को जान से मरवा दो. कम से कम रोजरोज की कलह से तो मुक्ति मिलेगी.’’

शिववती के इरादे जान कर अजय हक्काबक्का रह गया कि यह औरत है या डायन, जो अपने ही पति की हत्या कराने की बात कर रही है.

वह सोचने लगा कि जो औरत आज अपने पति को कत्ल कराने पर आमादा है, कल वह उसे भी मरवा सकती है. यानी यह वफादार और भरोसेमंद नहीं है. इसलिए उस ने शिववती का साथ छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझी.

एक हत्या ऐसी भी

अजय ने किसी तरह शिववती को समझाया कि वह बावली न बने. वह कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा. समझाबुझा कर अजय चला गया. अजय न तो ममेरे भाई का कत्ल करना चाहता था और न ही अपनी पत्नीबच्चों से दूर जाना चाहता था. वह तो बस शिववती से शारीरिक सुख चाहता था. शिववती ने समस्या खड़ी कर दी तो वह इस समस्या से निजात पाने की सोचने लगा.

3 जनवरी, 2019 की रात 8 बजे विजय घर आया तो घर में उसे पत्नी नहीं दिखी. पड़ोसी के घर उस का बेटा मनीष बच्चों के साथ खेल रहा था. उस ने मनीष से पूछा तो उस ने बताया कि मम्मी जंगल गई है. विजय लाल का माथा ठनका. उस ने पत्नी की खोज शुरू की लेकिन शिववती का पता नहीं चला. सवेरा होतेहोते पूरे गांव में बात फैल गई कि शिववती घर से गायब है.

लुधौरा बाघपुर गांव के बाहर छिद्दू यादव का खेत था. इस में उस ने अरहर की फसल बोई थी. छिद्दू सुबह 10 बजे के करीब अपने खेत पर पहुंचा तो उस ने खेत में एक महिला की लाश देखी. वह लाश के पास गया तो उस ने शिववती को पहचान लिया. छिद्दू ने यह जानकारी गांव में दी तो लोग दौड़ पड़े.

विजय लाल भी वहां पहुंचा. लाश देखते ही विजय लाल फफक कर रो पड़ा. क्योंकि लाश उस की पत्नी शिववती की थी. गांव वालों ने पुलिस को सूचना दी.

हत्या की सूचना पाते ही शिवली कोतवाली निरीक्षक चंद्रशेखर दूबे ने एसआई ए.के. सिंह, आर.पी. राजपूत, कांस्टेबल राजेश, उमाशंकर तथा महिला सिपाही पूनम को साथ लिया और घटनास्थल की ओर रवाना हो लिए. इसी बीच उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी सूचना दे दी.

 

घटनास्थल कोतवाली से करीब 5 किलोमीटर दूर था. पुलिस फोर्स को वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. घटनास्थल पर लोगों की भीड़ जुटी थी. पुलिस को देखते ही भीड़ छंट गई. तब इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे ने लाश का निरीक्षण किया. मृतका गुलाबी रंग की साड़ी और उसी की मैचिंग का ब्लाउज पहने थी.

वह खूब शृंगार किए थी. उस के शरीर पर कोई जख्म नहीं था. ऐसा लग रहा था जैसे उस की हत्या गला घोंट कर की गई हो. जोरजबरदस्ती किए जाने का कोई सबूत नहीं मिला.

इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी (देहात) राधेश्याम विश्वकर्मा तथा सीओ अर्पित कपूर भी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतका के पति विजय लाल से हत्या के संबंध में पूछताछ की.

 

जरूरी काररवाई कर के पुलिस ने शिववती की लाश को पोस्टमार्टम हाउस माती भेज दिया. इस के बाद इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे ने विजय लाल की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी. उन्होंने सब से पहले विजय लाल से ही पूछताछ की. उस ने बताया, ‘‘साहब, शिववती की हत्या संभरपुर गांव के रहने वाले अजय कुमार ने की है. वह हमारा रिश्तेदार है.’’

‘‘उस से तुम्हारी क्या दुश्मनी थी?’’ दूबे ने विजय को कुरेदा.

‘‘साहब, दुश्मनी नहीं है. अजय कुमार के मेरी पत्नी से नाजायज संबंध थे. मैं ने उसे रंगेहाथों पकड़ा था. इस के बाद उस के घर आने पर भी पाबंदी लगा दी थी.’’ उस ने बताया.

विजय से बात करने के बाद इंसपेक्टर दूबे को शिववती की हत्या का कारण समझने में देर नहीं लगी. उन्होंने अजय के गांव संभरपुर में छापा मारा, लेकिन वह घर से फरार था. अजय कुमार को पकड़ने के लिए पुलिस ने झींझक, रसूलाबाद, मैथा, भाऊपुर में उस के रिश्तेदारों के घरों पर दबिश दी, लेकिन वह हाथ नहीं लगा.

फिर 7 जनवरी, 2019 को इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे को खास मुखबिर से जानकारी मिली कि हत्यारोपी अजय कुमार मैथा नहर पुल पर मौजूद है. इस सूचना पर दूबे अपनी पुलिस टीम के साथ मैथा नहर पुल पर पहुंचे. पुलिस जीप देखते ही अजय नहर की पटरी पर सरपट भागने लगा. पुलिस ने पीछा कर के उसे दबोच लिया. उसे थाना शिवली लाया गया.

सपनों के पीछे भागने का नतीजा

इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे ने जब अजय कुमार से शिववती की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गया. हत्या का जुर्म कबूलते हुए उस ने बताया कि विजय लाल उस के मामा का बेटा है. उस के घर आनेजाने पर विजय की पत्नी शिववती से उस के अवैध संबंध बन गए थे.

कुछ समय से शिववती उस पर शादी करने तथा घर से भाग जाने का दबाव बना रही थी. वह अपने पति विजय की हत्या भी कराना चाहती थी. लेकिन वह शादीशुदा तथा 2 बच्चों का बाप है, इसलिए यह सब करने के लिए तैयार नहीं हुआ.

जब शिववती ने उस पर दबाव बढ़ाया तो उस ने शिववती से छुटकारा पाने की योजना बना ली. घटना वाली शाम उस ने उसे गांव के बाहर मिलने को कहा. वह वहां पहुंचा तो शिववती उसे अरहर के खेत में ले गई. वह सजधज कर आई थी. उस ने उस पर दबाव बनाया कि वह उसे आज ही अपने साथ भगा कर ले चले.

उस ने शिववती को समझाना चाहा तो वह भड़क उठी. गुस्से में उस ने शिववती को दबोच लिया और उसी के शाल से उस का गला घोंट दिया. इस के बाद फरार हो गया. जुर्म कबूलने के बाद अजय ने वह शाल भी बरामद करा दिया, जिस से उस ने शिववती का गला घोंटा था.

8 जनवरी, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त अजय कुमार को कानपुर देहात की कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल माती भेज दिया गया.  द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

टाइगर के बारे मे अनन्या ने कही ऐसी बात की दिशा को भी होगी जलन

जल्द ही करण जौहर की फिल्म मे नजर आने वाले टाइगर श्राफ, अनन्या पांडे और तारा सुतारिया इन दिनों ‘स्टूडेंट औफ द ईयर 2’ के  जमकर प्रमोशन मे लगे है.  इसी दौरान तीनों स्टार्स एक रेडियो स्टेशन में अपनी फिल्म को प्रमोट करने पहुंचे. जहां अनन्या ने बताया की  टाइगर को किस करना उन्हें कैसा लगा.

आखिर क्यूं छोटे परदे पर काम नहीं करना चाहते 

इस फिल्म में अनन्या पांडे और टाइगर श्राफ का आन स्क्रीन एक किसिंग सीन दिखाया गया है. जब इसके बारे में अनन्या से बात की तो उन्होंने कहा, ये मेरी लाइफ की पहली किस थी,  मैंने इससे पहले कभी किसी को किस नहीं किया है. इसलिए मैं तुलना नहीं कर सकती लेकिन ये मेरी पहली बेस्ट किस थी. इसके बाद  अनन्या ने टाइगर को बेस्ट किसर कहा. अब अनन्या ने तो टाइगर की तारीफ कर दी लेकिन फैंस ये जानना चाहते हैं कि उनके इस बयान पर टाइगर की गर्लफ्रेंड दिशा पटानी का क्या रिएक्शन होगा जो पहले ही टाइगर को लेकर काफी पजेसिव हैं.

वहीं जब टाइगर से इस किस के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, मैं किस में बेस्ट हूं? मुझे नहीं पता मैं किस चीज में बेहतर हूं.

पति निक जोनस के साथ सेक्सी लुक में नजर आईं 

करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडेंट आफ द ईयर 2’ 10 मई को रिलीज होने वाली है.  उससे पहले फिल्म की पूरी स्टार कास्ट इसे जमकर प्रमोट करने मे लगी  है. अनन्या और तारा की ये बौलीवुड डेब्यू फिल्म  हैं. वहीं आलिया भट्ट का भी इस फिल्म में गेस्ट अपीयरेंस होगा, आलिया का गाना ‘हुक अप’ सान्ग रिलीज भी हो चुका है जो सोशल मीडिया पर खासा पसंद किया जा रहा है. गाने में आलिया और टाइगर की जबरदस्त कैमिस्ट्री देखने को मिल रही है.

बता दें कि ये फिल्म साल 2012 में आई फिल्म ‘स्टूडेंट आफ द ईयर’ का सीक्वल है. स्टूडेंट आफ द ईयर में आलिया भट्ट, वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा लीड रोल में थे.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia

उस रात अचानक

लेखिका- नीता दानी

पूर्व कथा

सुखसुविधा के हर साजोसामान के साथ प्रशांत और गुंजन खुशहाल जिंदगी जी रहे थे. इच्छा थी तो उन्हें एक संतान की. अचानक एक रात घर से बाहर टहलने के दौरान गुंजन का अपहरण हो जाता है. अपहरणकर्ता फिरौती में भारी रकम की मांग करते हैं. उधर, एक दिन अनजान महिला बंधी गुंजन की रस्सी खोल उसे अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुटकारा दिला देती है. रात बीतने का एक प्रहर अभी शेष है कि घंटी टनटनाती है. परेशान प्रशांत डरडर कर दरवाजा खोलता है, गुंजन को देख आश्चर्यमिश्रित हर्ष से उस का चेहरा खिल जाता है और डरीसहमी गुंजन पति के चौड़े सीने से लग रोतीबिसूरती बोलती है,

‘‘प्रशांत, अपहरणकर्ताओं ने मेरे खूबसूरत कंगन और कानों के कीमती टौप्स निकाल लिए…’’  गुंजन की सकुशल वापसी से सासससुर खुश थे. सास को बहू के गहनों की चिंता सता रही थी जबकि गुंजन को गहनों से अधिक अपनी घरवापसी प्रिय लग रही थी. वहीं, प्रशांत का बदलाबदला व्यवहार उसे बेचैन कर रहा था. वह गुंजन से कुछ खिंचाखिंचा रह रहा था. अपहरणकर्ताओं को फिरौती पहुंचाए बिना ही गुंजन का घर वापस आ जाना उसे अस्वाभाविक लग रहा था. ‘सिर्फ जेवर ले कर ही अपहरणकर्ता खुश हो गए…क्या गुंजन उन के पास सहीसलामत रही होगी?’

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गुंजन के प्रति प्रशांत के प्यार की गरमाहट समाप्त होती जा रही थी. प्रशांत द्वारा उपेक्षित गुंजन दुखी और निराश रहने लगती है. इसी बीच, एक दिन आफिस में काम के दौरान गुंजन को उबकाई का एहसास हुआ और वह उलटी के लिए टायलेट की ओर भागी. अस्वस्थ महसूस करने पर वह आफिस से छुट्टी ले कर सीधे डाक्टर के पास गई. लेडी डाक्टर ने उसे गर्भवती होने की खुशखबरी दी. खुशी से दीवानी गुंजन यह खुशखबरी प्रशांत को सुनाने को आतुर हो जाती है. ‘अब प्रशांत का व्यवहार अच्छा हो जाएगा. यह जान कर कि वह पिता बनने वाला है, खुश होगा,’ मन ही मन ऐसा सोचती गुंजन घर पहुंचती है…अब आगे…

गतांक से आगे…

गुंजन की आशा के विपरीत प्रशांत पिता बनने की बात जान कर स्तब्ध रह गया. उस के विचित्र हावभाव उस के भीतर छिपी बेचैनी को बयान कर रहे थे.‘‘तुम तो कहती थीं कि उन बदमाशों ने तुम्हारे साथ कोई बदतमीजी नहीं की… तो फिर…’’ कह कर उस ने गुंजन का हाथ जोर से झटक दिया था और फिर अंटशंट बकना शुरू कर दिया था. प्रशांत ने गुंजन से और अधिक दूरी बना ली थी. वह पति के समीप जाने को होती तो प्रशांत गुंजन पर कठोर नजर फेंक कर उस के समीप से हट जाता. और एक दिन प्रशांत के मन में छिपी बेचैनी उस के अधरों तक आ ही गई जब उस ने कड़े लहजे में कहा,  ‘उन डकैतों का बच्चा यहां इस घर में नहीं पलेगा.’

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गुंजन यह सुन कर अवाक् रह गई थी. पत्नी से दूरी बनाता प्रशांत इन दिनों किसी अन्य स्त्री के समीप जा रहा था. गुंजन दिल पर पत्थर रख चुपचाप बरदाश्त कर रही थी.

प्रशांत के मन में चल रही उथलपुथल का वाणी से खुलासा आज हो गया था. वह गुंजन के साथ संबंध तोड़ देना चाहता था. प्रशांत की इच्छा को अपनी नियति मान गुंजन छटपटा कर रह गई थी और आखिर में उसे मायके लौट आना पड़ा था.

समय गुजरता गया और वह एक स्वस्थ व सुंदर शिशु की मां बन गई. पुत्र को आंचल में समेट फूली नहीं समाई थी. किंतु प्रशांत की अनुपस्थिति एक टीस बन कर उसे तड़पा गई थी.

इस के कुछ माह बाद ही प्रशांत ने गुंजन को तलाक दे दिया और फिर दोनों नदी की 2 धाराओं की तरह अपनीअपनी राह बह चले.

रात्रि को प्राय: गुंजन को प्रशांत की यादें सतातीं और वह उस के साथ के लिए तड़प उठती तो कभी मन में प्रतिहिंसा की ज्वाला भड़क उठती.

समय सरकता जा रहा था. गुंजन अपनी नौकरी और पुत्र की परवरिश में व्यस्त थी. नौकरी में उस की लगन और काम के प्रति निष्ठा से उसे तरक्की मिलती जा रही थी.

पुत्र अभिराम भी दिन पर दिन बड़ा हो रहा था और उस के नैननक्श और चेहरा हूबहू अपने पिता प्रशांत पर जा रहे थे.

बेटे का चेहरा देख गुंजन के मन में उम्मीद का दीया जल उठता कि काश, प्रशांत एक बार अपने बेटे को देख लेता तो उस का संदेह पल भर में ही दूर हो जाता.

किंतु प्रशांत से संपर्क टूटे तो अरसा बीत चुका था.

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मेधावी अभिराम स्कूलकालेज और विश्वविद्यालय की हर परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करता इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में आ गया था. उच्च श्रेणी के इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई करता अभिराम स्कालर था.

उस के कालेज में छात्रों की प्लेसमेंट के लिए विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियां आनी शुरू हो गई थीं. कंपनियों के रिकू्रट आफिसर, मानव संसाधन अधिकारी और प्रबंध निदेशक की टीम सभी छात्रों की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार लेने के लिए छात्रों के चयन में जुटने शुरू हो गए थे.

अभिराम भी किसी उच्च स्तरीय कंपनी में नौकरी पाने के लिए परीक्षा की तैयारी में व्यस्त था. रात में सोने से पहले उस ने अपनी मां गुंजन से कहा था, ‘‘मम्मी, कल सुबह मुझे कालेज 7 बजे से पहले पहुंचना है और रात को भी देर हो जाएगी घर वापस आने में…पता नहीं कब तक इंटरव्यू चलते रहें.’’

अगले दिन अभिराम लिखित परीक्षा देने में व्यस्त हो गया और एक के बाद एक चरण पार करता हुआ वह अब साक्षात्कार के लिए अपना नाम पुकारे जाने की प्रतीक्षा में था.

अपना नंबर आया जान कर अभिराम ने आत्मविश्वास के साथ कमरे में प्रवेश किया. इंटरव्यू लेने के लिए 6 सदस्यों की टीम भीतर मौजूद थी.

सभी की दृष्टि अभिराम के चेहरे पर जमी थी. अभिराम को अपलक निहारते और ‘प्रबंध निदेशक’ के चेहरे की समानता को देख टीम के दूसरे सदस्य चकित थे.

अभिराम कुछ असहज हो उठा. उस के माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठी थीं.

‘‘तुम्हारा नाम अभिराम प्रशांत दीक्षित है…क्या तुम्हारे 2 नाम हैं?’’ एच.आर. अधिकारी उस के बायोडाटा को देख बोला.

‘‘सर, मेरा नाम अभिराम और पिता का नाम प्रशांत दीक्षित है.’’

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रिकू्रट अफसर एकदूसरे को हैरानी से देख रहे थे. मानो कह रहे हों कि चेहरे के साथसाथ नाम में भी समानता है. हमारे एम.डी. का नाम भी प्रशांत दीक्षित है.

‘‘क्या करते हैं तुम्हारे पिता?’’ प्रबंध निदेशक ने अभिराम की फाइल को सरसरी नजर से देखते हुए पूछा.

‘‘सर, अपने पिता के बारे में मैं अधिक नहीं जानता,’’ इतना कह कर अभिराम सकपका गया फिर संभल कर बोला, ‘‘सर, मेरे मातापिता वर्षों पहले एकदूसरे से अलग हो गए थे. मैं अपने पिता के बारे में कुछ नहीं जानता क्योंकि होश संभालने के बाद उन्हें कभी देखा ही नहीं.’’

‘‘तुम्हारी मां?’’ एम.डी. दीक्षित के सवाल में जिज्ञासा थी. किंतु व्यक्तिगत प्रश्न पूछने पर एच.आर. अधिकारी और रिकू्रट अफसर ने शिष्टतापूर्ण आपत्ति जताई, ‘‘सर, व्यक्तिगत प्रश्न का नौकरी से क्या लेनादेना. छात्र की योग्यता से संबंधित प्रश्न पूछने ही बेहतर होंगे,’’ एम.डी. के कान में फुसफुसाते एच.आर. ने कहा.

‘‘मुझे कुछ नहीं पूछना. आप लोग जो चाहें पूछ लें.’’

प्रबंध निदेशक ने टीम से आग्रह किया और स्वयं उठ कर रेस्ट रूम में चले गए.

अभिराम ने सभी प्रश्नों का शालीनता से जवाब दिया और धन्यवाद तथा अभिवादन करता बाहर आ गया था.

टीम के सभी सदस्य प्रबंध निदेशक से सवाल कर रहे थे, ‘‘सर, यह लड़का क्या आप की रिश्तेदारी में है? इस की शक्लसूरत और उपनाम आप से मेल खाते हैं.’’

‘‘हमें तो यों आभास हो रहा था कि आप का युवा संस्करण ही हमारे समक्ष बैठा था,’’ मानव संसाधन अधिकारी ने मुसकराते हुए कहा.

सहायक टीम की बातें सुन प्रबंध निदेशक दीक्षित के तेजस्वी चेहरे का ओज बुझ गया था, लेकिन अभिराम का चयन एक प्रथम श्रेणी की बहुराष्ट्रीय कंपनी में हो गया था और अपने मित्रों के साथ वह खुशी के उन पलों का आनंद ले रहा था.

मम्मी को पहले खबर दे दूं. यह सोच कर अभिराम ने तुरंत फोन कर मां को अपने चयन की सूचना दी.

‘‘मम्मी, हम सब दोस्त सेलीबे्रट कर रहे हैं. आप खाना खा लेना,’’ उस का स्वर अचानक थम गया क्योंकि सामने एम.डी. दीक्षित खड़े थे.

वह अपलक अपनी प्रतिमूर्ति को देख रहे थे. मन में कई सारे सवाल उठ रहे थे पर उन में इतनी शक्ति नहीं थी कि वे अभिराम से कुछ पूछते, अत: बिना कुछ कहे वे अपने रूम की ओर बढ़ गए. पूरे दिन की थकावट के बाद भी नींद उन की आंखों से कोसों दूर थी. रात भर करवटें बदलते रहे.

अगले दिन सुबह अभिराम के घर जाने के लिए निकल पड़े थे. घर का पता अभिराम की बायोडाटा फाइल से नोट कर लिया था.

रास्ते भर विचारों में लीन रहे. उन की 2 बेटियां हैं लेकिन पुत्र की इच्छा उन्हें बेचैन किए रखती है. अभिराम को देख कर उन की इच्छा और अधिक बलवती हो उठी है.

अभिराम के घर पहुंच कर प्रशांत दीक्षित ने दरवाजे पर लगी घंटी को कांपते हाथों से बजा दिया था पर यह करते समय उन के कदम लड़खड़ा गए थे. दरवाजा गुंजन ने खोला था. दोनों एकदूसरे को अपलक देखते रह गए थे. प्रशांत के अधर कांपे किंतु बोल नहीं फूट सके.

गुंजन की आंखों में आश्चर्यमिश्रित हर्ष के भाव थे. शायद अपनी वर्षों की अभिलाषा के पूरे होने के मौके की यह खुशी थी.

कब से गुंजन को प्रशांत के पदचापों की प्रतीक्षा थी. कब से उस की राह देखती यही सोचती आई थी कि एक बार प्रशांत से अवश्य उस का सामना हो जाए.

बिना किसी भूमिका के उस के अधरों पर प्रश्न आ गया, ‘‘आज यहां की याद कैसे आ गई?’’

गुंजन के स्वर में छिपे व्यंग्य को समझ प्रशांत सकपका गया था.

‘‘कल मैं अपने बेटे से मिला. अभिराम को देख कर मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया. कितना होनहार है मेरा बेटा,’’ प्रशांत भावावेश में बोल रहा था.

‘‘आप का पुत्र? आज वह आप का पुत्र कैसे हो गया?’’ गुंजन का स्वर ऊंचा हो गया था.

अतीत में जिस पुरुष को कसमें खाखा कर मैं विश्वास दिलाती रह गई थी अपने गर्भ में पल रहे शिशु के पिता होने का और वह निर्दयी विश्वास नहीं कर सका था. संदेह के कीड़े ने उस का विवेक हर लिया था. वह आज कैसे उसे अपना बेटा कह सकता है.

गुंजन के मन में तभी से पति के प्रति कहीं न कहीं प्रतिहिंसा की ज्वाला धधक रही थी और आज प्रशांत के मुख से पुत्रमोह की बातें सुन, गुंजन के तनबदन में आग लग गई थी.

‘‘अभिराम, सिर्फ और सिर्फ मेरा पुत्र है, मैं ही उस की मां हूं और मैं ही पिता भी हूं.’’

आज वह प्रशांत के सामने भावनाओं में बह कर दुर्बल हरगिज नहीं बनना चाहती थी. आज वह अपने मन की भड़ास निकाल लेना चाहती थी.

‘‘आप बहुत पहले ही अपने संदेह और बेबुनियाद शक के कारण अपनी पत्नी और अजन्मे शिशु को त्याग चुके हैं. अब वह सिर्फ मेरा पुत्र है.

‘‘बेहतर होगा अब आप यहां से चले जाएं और हमें हमारे हाल पर छोड़ दें. अब अभिराम बड़ा हो गया है. आप की सचाई जान कर उसे बहुत दुख होगा. आप का अपना एक परिवार है, उसे संभालिए.’’

‘‘मुझे माफ कर दो, गुंजन,’’ प्रशांत के स्वर में पश्चात्ताप और निराशा स्पष्ट थी.

‘‘मैं कौन होती हूं क्षमा करने वाली,’’ धीमे स्वर में बोली गुंजन अचानक उग्र हो उठी, ‘‘अगर आप के बेटे की शक्लसूरत आप पर न होती तो क्या वह आप का बेटा न होता. जरूरी नहीं कि बच्चों की शक्लसूरत हूबहू मातापिता से मिलने लगे. तो क्या ऐसी स्थिति में उन के जन्म पर संदेह करना होगा?

‘‘कुदरत ने मेरी सचाई को सही साबित करने के लिए ही शायद मेरे बेटे के चेहरे को हूबहू उस के पिता से मिला दिया है. किंतु प्रशांत दीक्षित, तलाक के बाद अब हमारे रास्ते अलग हैं. आप जा सकते हैं.’’

प्रशांत निढाल सा लड़खड़ाते कदमों को जबरदस्ती खींचता घर से बाहर आ गया था.

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प्रशांत के विदा होते ही गुंजन की आंखों से आंसू बह निकले थे. जिस पति को देखने, मिलने के लिए वह वर्षों से बेचैन थी वही आज उस के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था. किंतु आज उस के प्रति गुंजन की भावनाएं वर्षों पहले वाली नहीं थीं.

गुंजन के भीतर धधकती वर्षों की प्रतिहिंसा की ज्वाला धीरेधीरे शांत हो चली थी. शायद उसे अपनी बेगुनाही का सुबूत मिल गया था.

सुंदरी की साजिश

लेखक – नंदकिशोर गोयल

 

जून 2018 की तपती दोपहर थी. उस दिन गरमी पूरे शबाब पर थी. हनुमानगढ़ टाउन निवासी अशोक अरोड़ा जिला न्यायालय परिसर में
स्थित एक फोटोस्टेट दुकान में फोटोस्टेट करवाने को दाखिल हुए, तभी वहां खड़ी एक युवती ने मधुर स्वर में कहा, ‘‘भैया, 10 रुपए उधार देंगे क्या? मैं हड़बड़ाहट में अपना पर्स घर पर ही भूल आई हूं.’’
कुछ पल विचार कर अशोक ने एक 50 रुपए का नोट जेब से निकाल कर उस युवती की तरफ बढ़ा दिया. युवती ने नोट ले लिया व हाथ में पकड़े थैले में से कुछ ढूंढने लगी. तब तक अशोक के कागज फोटोस्टेट हो चुके थे. वह अपने कागज ले कर दुकान से बाहर निकल कर अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ चुके थे.
‘‘अरे भैया, बाकी 40 रुपए तो लेते जाइए.’’ कह कर हाथ में 10-10 के 4 नोट उठाए लगभग हांफती हुई वह युवती अशोक की कार के पास पहुंच चुकी थी. अशोक ने देखा युवती पसीने से तरबतर थी.
‘‘भाईसाहब, आज तो गरमी ने पसीनापसीना कर दिया है.’’ युवती ने फिर कहा और 40 रुपए उन्हें देते हुए बोली, ‘‘लीजिए, बाकी के 40 रुपए. मुझे 10 रुपए ही चाहिए थे.’’

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अशोक ने बाकी पैसे लेने से इनकार कर दिया. उन्होंने बगल में स्थित एक रेस्टोरेंट की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘गरमी बहुत है. चलो, वहां कुछ ठंडा पीते हैं.’’
दोनों रेस्टोरेंट में एक मेज के सामने बैठ गए. उस समय वहां इक्कादुक्का ग्राहक ही थे. वेटर के आने पर अशोक ने 2 गिलास लस्सी का और्डर दिया. इस के बाद अशोक ने उस युवती को अपने बारे में बताते हुए कहा, ‘‘मुझे अशोक अरोड़ा कहते हैं. मैं हनुमानगढ़ टाउन में रहता हूं. मेरे ईंट भट्ठे हैं. एक पार्टी पेमेंट देने में आनाकानी कर रही है. इसी चक्कर में कोर्ट आया था.’’
‘‘मेरा नाम सविता अरोड़ा है. मेरा पीहर टिब्बी का है और हनुमानगढ़ जंक्शन में मेरी ससुराल है. पति के साथ मेरी अनबन चल रही है और कोर्ट में तलाक का मामला डाल रखा है. इसी सिलसिले में मैं आज अदालत आई थी.’’ युवती ने अपने बारे में बताया.

‘‘आप यदि बुरा नहीं मानें तो एक बात कहूं?’’ अशोक ने उसे गौर से देखते हुए कहा.
‘‘हांहां, बेफिक्र हो कर कहिए.’’ वह बोली.
‘‘पिछले साल मैं अपने एक दोस्त की शादी में आप के टिब्बी के एक असीजा परिवार के यहां गया था. वहां लहंगाचुन्नी में सुंदर सलोनी एक युवती को देखा था. जहां तक मुझे अपनी याद्दाश्त पर भरोसा है, वह सुंदरी आप ही थीं.’’
इतना सुनते ही युवती खिलखिला पड़ी, ‘‘अशोक बाबू, मान गए आप की याद्दाश्त को. असीजा परिवार की सोनू मेरी पक्की सहेली है. उसी की शादी में मैं ने ही लहंगाचुन्नी पहना था.’’ सविता बोली.

बढ़ने लगीं नजदीकियां

तब तक लस्सी आ गई. सविता ने अशोक को बता दिया था कि कोर्ट में उस की अगली तारीख 17 जुलाई को होगी. उसी दौरान सविता ने अपना मोबाइल नंबर अशोक को दे दिया और अशोक ने भी अपना विजिटिंग कार्ड सविता को दे दिया था.
बता दें कि हनुमान टाउन मूल शहर है. वहीं हनुमानगढ़ जंक्शन में रेलवे स्टेशन सहित अन्य सभी सरकारी कार्यालय हैं. कुछ सालों में जंक्शन क्षेत्र भी किसी शहर का रूप ले चुका है. दोनों शहरों में लगभग 3 किलोमीटर का फासला है. इस फासला क्षेत्र में घग्घर नदी का बहाव क्षेत्र है.

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हालांकि अशोक अरोड़ा शादीशुदा व बालबच्चेदार थे. गाहेबगाहे सुंदर युवतियों द्वारा किसी मोटी आसामी को फांस कर ब्लैकमेल करने की खबरें वह अखबारों में पढ़ चुके थे. लिहाजा उन के मन में भी विचार आया कि कहीं वह भी तो इस तरह के जाल में नहीं फंस रहे.
तभी उन्होंने तय कर लिया कि वह किसी भी सूरत में अपनी सीमा नहीं लांघेंगे. हां, सविता से संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखेंगे. लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि विपरीत लिंगी का आकर्षण दोनों ही तरफ होता है. वही इन के बीच भी था.

सविता व अशोक दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे. एक हफ्ता गुजर चुका था, पर किसी ने भी फोन नहीं किया था. लगभग 10 दिन बाद सविता ने अशोक के मोबाइल पर घंटी मारी. सविता का फोन आया देखते ही अशोक की आंखें चमक उठीं और दिल की धड़कनें बढ़ गईं.
औफिस में अकेले बैठे अशोक ने फोन रिसीव कर कहा, ‘‘कहिए मैडम…’’
‘‘मैडम नहीं, सिर्फ सविता. हां याद रखना, 17 जुलाई को मैं कोर्ट में आऊंगी, पेशी है. आप भी आओगे न?’’ वह बोली.

‘‘कोशिश करूंगा.’’ अशोक ने कहा.
‘‘अरे साहब, कोशिशवोशिश का बहाना नहीं चलेगा. आप की उधारी भी चुकानी है. आप को मेरी कसम है, जरूर आना.’’ सविता ने जैसे अधिकारपूर्ण स्वर में अशोक को याद दिलाई.

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सविता के अपनत्व भरे मीठे बोल ने अशोक को अंदर तक गुदगुदा दिया था. पर युवतियों द्वारा ब्लैकमेल की खबरों ने जैसे उन के पैरों में बेडि़यां डाल दी थीं.
17 जुलाई, 2018 की सुबह रोजाना की तरह तैयार हो कर अशोक अपने कार्यालय पहुंच चुके थे. उन का अंतर्मन अदालत जाने के लिए मना कर रहा था, पर बाहरी मन उन्हें अदालत जाने के लिए उकसा रहा था.
आखिर उन्होंने अपने बाहरी मन की बात मानी और आधा घंटा पहले ही अदालत पहुंच गए और कचहरी के पास उसी रेस्टोरेंट में जा कर बैठ गए, जिस में बैठ कर पिछली बार सविता के साथ लस्सी पी थी.

सजधज कर गई थी सविता

सविता भी कहां कम थी. वह भी अदालत के समय से काफी देर पहले ही कचहरी पहुंच गई थी. उस दिन विशेष बात यह थी कि सविता हलकाफुलका मेकअप कर वही लहंगाचुन्नी पहन कर आई थी जो उस ने अपनी सहेली सोनू की शादी में पहना था.
कचहरी पहुंच कर सविता ने इधरउधर ताकझांक की पर अशोक कहीं दिखाई नहीं दिए तो वह कचहरी से बाहर रेस्टोरेंट के पास पहुंच गई. जब वहां भी अशोक दिखाई नहीं दिए तो सविता ने उन का फोन नंबर मिलाया.

अशोक ने काल रिसीव करते ही कहा, ‘‘लहंगाचुन्नी में बड़ी खूबसूरत लग रही हो. लग रहा है जैसे कि अप्सरा आसमान से उतर आई हो.’’
अपनी प्रशंसा सुन कर सविता खुश हो गई. वह बोली, ‘‘आप हैं कहां, यहां तो दिखाई नहीं दे रहे?’’
‘‘मैं इसी रेस्टोरेंट में शीशे के पीछे बैठा हूं. आ जाओ.’’ अशोक ने कहा तो सविता रेस्टोरेंट में चली गई.
अशोक को देख कर वह बहुत खुश हुई और उस की टेबल के सामने बैठ गई.
‘‘अशोक बाबू, क्या खाएंगेपिएंगे, आज की पार्टी मेरी तरफ से.’’ सविता ने कहा, ‘‘देखिए, मेरे परिवार में मेरे खैरख्वाह के नाम पर मात्र एक बूढ़ी मां है. मैं अपना पीहर छोड़ कर कामधंधे की तलाश में मां को ले कर हनुमानगढ़ आ गई हूं. किराए के एक कमरे में रह कर जैसेतैसे गुजरबसर कर रही हूं. खुद का मकान व आर्थिक हालत बेहतर होती तो आप के लिए लजीज भोज की व्यवस्था कर आप को घर पर आमंत्रित करती पर…’’

‘‘कोई बात नहीं. आप ने कह दिया यही बहुत है.’’ अशोक ने कहा. फिर दोनों में बातचीत चलती रही. वेटर के आने पर अशोक ने और्डर दिया. तब तक अशोक ने सविता के घर का एड्रैस ले लिया था.
कुछ देर बाद अशोक ने सविता से जाने की इजाजत मांगी. जातेजाते अशोक ने पर्स से एक 500 रुपए का नोट निकाला और सविता की तरफ बढ़ा दिया. सविता नोट पकड़ने में आनाकानी करने लगी तो अशोक ने कहा, ‘‘अरे भई, दोस्ती के नाम पर ही रख लो.’’

तब सविता ने वह नोट ले लिया. इस के बाद अशोक वहां से चले गए और सविता कोर्ट की तरफ चली गई.

अशोक की करने लगी छानबीन

उन के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो लगभग रोजाना ही फोन पर उन की बातें होने लगीं. सविता अब अशोक के औफिस में जाने लगी थी. अशोक के पास 2-3 गाडि़यां थीं. कभीकभी अशोक अपनी गाड़ी से सविता को उस के घर पहुंचवा देते थे.
सविता के बारबार आग्रह करने पर एक दिन अशोक समय निकाल कर उस के घर पहुंच गए. सविता ने दिल खोल कर उन का स्वागत किया. सविता ने अपनी मां को अशोक का परिचय एक दोस्त के रूप में दिया था.
समय गुजरता रहा. दोनों के बीच पनपा दोस्ती का पौधा धीरेधीरे वटवृक्ष बनता जा रहा था. कह सकते हैं कि दोनों के बीच दोस्ती का नाता जरूरत से ज्यादा प्रगाढ़ हो गया था. सविता समझ गई थी कि अशोक बहुत बड़ी आसामी है.

अशोक हो गए प्रभावित

एक दिन अशोक सविता के घर थे. तभी सविता बोली, ‘‘अशोक बाबू, अगर मैं आप को शौकी नाम से पुकारूं तो कैसे लगेगा?’’
‘‘मुझे मंजूर है. अब मेरी भी सुनो, मेरी एक कालेज की दोस्त थी तनु, पर एक ऐक्सीडेंट में उस की मौत हो गई. अगर आप को भी मैं तनु नाम देना चाहूं तो आप को कोई ऐतराज तो नहीं होगा.’’
‘‘नहीं, मुझे कोई ऐतराज नहीं,’’ सविता बोली, ‘‘देखो आप शब्द में अपनापन नहीं होता. अगर हम दोनों तुम शब्द का प्रयोग करेंगे तो अच्छा लगेगा.’’

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‘‘ओके.’’ अशोक ने सहमति जताई.
एक दिन सविता उर्फ तनु अशोक के कार्यालय गई. वहां अशोक को तनाव की हालत में देख कर तनु बोली, ‘‘शौकी, क्या बात है इतने परेशान क्यों हो?’’
‘‘तनु, बात तो कोई खास नहीं है, एकदो पार्टियों के यहां पैसा फंसा है. उसे ले कर टेंशन में हूं. दूसरी टेंशन यह है कि कुछ अरसा पहले भैया शेखावटी क्षेत्र से लाखों रुपयों की उगाही कर के लौट रहे थे, उन के साथ लूट हो गई थी. जो पुलिस अधिकारी इस केस की जांच कर रहे थे, उन से मेरी अभीअभी बात हुई है. उन्होंने कहा कि लुटेरों का कोई सुराग अभी तक नहीं लगा है.’’ अशोक ने बताया.
‘‘देखो शौकी, पुलिस अगर अपनी पर आ जाए तो आज नहीं तो कल लुटेरे जरूर पकड़े जाएंगे. रही बात फंसे पेमेंट की तो सुनो, मैं आज ही इस के लिए अपने ईस्टदेव की विशेष पूजाअर्चना शुरू करूंगी. मुझे विश्वास है कि हफ्ता-10 दिन में तुम्हारा फंसा हुआ पेमेंट मिल जाएगा.’’ तनु ने कहा.
कुछ देर बातचीत करने के बाद सविता उर्फ तनु अशोक की गाड़ी से अपने घर लौट गई थी.

उस दिन 15 सितंबर, 2018 की तारीख थी. अशोक अपने औफिस में पहुंचे ही थे कि डीडवाना निवासी सुशील शर्मा का फोन आ गया, ‘‘अशोक बाबू, आप 20 सितंबर को यहां आ जाइएगा. सभी पार्टियों का पेमेंट
तैयार है. मेरी सभी पार्टियों से बात हो गई है.’’ सुशील पैसों के लेनदेन में बिचौलिए का काम करता था.
यह मात्र संयोग ही था कि अशोक को पार्टियों ने स्वयं फोन कर पेमेंट के लिए उन्हें बुलाया था. लेकिन अशोक इसे सविता की पूजा का नतीजा समझ रहे थे. वह उस दिन बहुत खुश हुए. मारे खुशी के अशोक उछल पड़े थे.

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उसी समय अशोक ने फोन कर यह खुशखबरी तनु को दी, ‘‘भई तनु, मान गए तुम्हारी पूजाअर्चना व तुम्हारे ईस्टदेव को. पार्टियों ने 21 सितंबर को पेमेंट के लिए बुलाया है. और हां, सुनो मेरी तरफ से हीरा जडि़त एक अंगूठी तुम्हारे लिए गिफ्ट. दूसरा गिफ्ट तुम अपनी तरफ से मुझ से मांग लो. पेमेंट मिलते ही शेखावटी क्षेत्र से लाऊंगा तुम्हारा गिफ्ट, वहां की कारीगरी व सोने की क्वालिटी उच्चस्तर की होती है.’’
‘‘शौकी, एक बात सुनो. भैया की तरह पेमेंट ले कर बसों में सफर नहीं करना. कोई नशा सुंघा कर बेहोश कर सकता है. विश्वसनीय ड्राइवर के साथ अपनी कार से सफर करना.’’

सविता ने बना ली योजना

इधर अशोक खुश थे, वहीं सविता उर्फ तनु भी अपनी दिमागी खुराफात का पासा फेंक कर फूली नहीं समा रही थी.
सविता ने 16 सितंबर की सुबह अपने परिचित टैक्सी चालक सुनील नायक को फोन कर अपने घर बुला लिया था. सविता को जब भी इधरउधर जाना होता था, वह सुनील की टैक्सी ही ले जाती थी.
उस ने उस से कहा, ‘‘देखो सुनील, एक मालदार मुर्गी फंसी है. उसे बड़ी चतुराई व समझदारी से हलाल करना है. मामूली सी चूक या गड़बड़ हम दोनों को कालकोठरी में पहुंचा देगी. तुम इस में अपने 4-5 दोस्तों को और शामिल कर लो. क्योंकि मामला 50 लाख का है.’’

 

सुनील के पूछने पर सविता ने पूरा मामला उसे बता दिया था, ‘‘तुम उस शख्स की पहचान व उस की गाड़ी के बारे में जानना चाहते हो न, घबराओ मत पूरी जानकारी समय रहते तुम्हें मोबाइल से मिलती रहेगी. लेकिन याद रखना, इस योजना में अपने अति विश्वसनीय दोस्त ही शामिल करना.’’
सविता व सुनील ने अशोक को लूटने की पूरी योजना बना ली. दोनों की योजना फूलप्रूफ लग रही थी.

20 सितंबर को योजनानुसार सविता अशोक के औफिस में पहुंच गई. अशोक ने खड़े हो कर सविता की अगवानी की थी. उस ने नौकर से सविता के लिए मिठाइयां व समोसे मंगा लिए. वह बारबार सविता उर्फ तनु द्वारा की गई पूजाअर्चना की तारीफ कर रहे थे.
अशोक ने उस से कहा, ‘‘तनु, कल मैं अपने ड्राइवर विनोद के साथ कार से डीडवाना की तरफ उगाही करने जा रहा हूं. मेरी इच्छा है कि तुम भी साथ चलो.’’
‘‘अरे नहीं शौकी, मां की तबीयत ठीक नहीं है. मैं नहीं जा पाऊंगी.’’ तनु बोली.
‘‘अरे भाई, एक ही दिन की तो बात है, 22 को तो लौट ही आएंगे.’’ अशोक ने आग्रह किया.
‘‘तुम जाओ और पेमेंट मिलने पर मेरा गिफ्ट ले आना. और हां, वहां से एक चीज मेरी और लानी है. वह मैं तुम्हें फोन पर बता दूंगी.’’ तनु ने कहा.

‘‘जरूर ले आऊंगा.’’ अशोक ने कहा. फिर तनु अशोक की गाड़ी से घर लौट गई.
21 सितंबर, 2018 को अशोक अपनी गाड़ी से सरदारशहर के लिए रवाना हो गए. उधर सविता के बुलावे पर सुनील अपने 5 दोस्तों के साथ सविता के घर पहुंच गया था. सभी साथी युवा थे.

सविता ने सभी साथियों को योजना के बारे में विस्तार से बता दिया था. उस ने यह भी बता दिया था कि अशोक सरदारशहर से पहले इच्छापूर्ण बालाजी मंदिर के सामने से मेरे लिए अचार खरीदेगा. वह 22 सितंबर की दोपहर तक मंदिर पहुंच जाएगा. वैसे मैं उस की पलपल की लोकेशन मोबाइल से तुम्हें देती रहूंगी.
अशोक डीडवाना के सुशील शर्मा के पास पहुंच गए. उस क्षेत्र से कलेक्शन कर शर्मा के यहां रात को रुके.
डीडवाना से 22 सितंबर की सुबह वह रवाना हो कर रतनगढ़ पहुंच गए. उस क्षेत्र में कलेक्शन कर वह तनु के लिए हीरे की अंगूठी खरीदने के लिए सर्राफा बाजार में गए पर वहां उन्हें उन की इच्छा के मुताबिक अंगूठी नहीं मिली.

सविता लेती रही पलपल की जानकारी

यह जानकारी उन्होंने फोन द्वारा तनु को दे दी और यह भी कह दिया कि उन्होंने एक व्यापारी को 20 हजार रुपए एडवांस के तौर पर अंगूठी बनवाने के लिए दे दिए हैं. अगले हफ्ते वह उस से अंगूठी ले आएंगे. अशोक ने आगे कहा, ‘‘हां, तुम एक और चीज के लिए कह रही थी, बताओ क्या लाना है?’’
‘‘शौकी, शेखावटी क्षेत्र में कच्चे बांस का अचार बढि़या मिलता है. वह लाना है एक किलो.’’ तनु ने कहा था.
‘‘तनु, रतनगढ़ में भी बांस का अचार बढि़या मिलता है.’’ अशोक ने कहा तो वह बोली, ‘‘अरे नहीं शौकी, सरदारशहर से पहले इच्छापूर्ण बालाजी मंदिर के सामने अचार की बड़ी दुकान है. तुम उसी दुकान से अचार लाना. और हां, यह बताओ कितनी देर में वहां पहुंच जाओगे.’’ तनु ने अपने मतलब का प्रश्न दाग दिया.
‘‘बस आधे घंटे में अचार की दुकान पर पहुंच जाऊंगा.’’ अशोक ने बताया.

उधर सविता के कहने पर सुनील 22 सितंबर, 2018 की सुबह अपने दोस्तों के साथ इच्छापूर्ण बालाजी मंदिर पहुंच गया था. टैक्सी साइड में खड़ी कर सुनील अपने साथी बबलू के साथ अचार की दुकान के पास ही खड़ा हो गया था. अन्य साथी नजदीक के ढाबे पर चाय की चुस्कियां लेने लग गए थे. सविता के फोन करने पर पूरी चौकड़ी सतर्क हो गई थी.
करीब 20 मिनट बाद अशोक अपनी गाड़ी से मंदिर के सामने पहुंच गए. बांस का अचार खरीद कर वह जैसे ही दुकान से चले, वहां खड़े सुनील ने उन्हें पहचान लिया. और जब वह अपनी कार में जा कर बैठे तो सुनील ने उन की गाड़ी का नंबर आरजे31सी बी3927 को याद कर लिया. अशोक के वहां से चलते ही सविता ने फिर से अशोक को फोन किया तो अशोक ने बता दिया कि उन्होंने अचार ले लिया है.
सुनील करने लगा पीछा

सविता हर 10 मिनट बाद अशोक को फोन कर रही थी. तब एक बार अशोक ने कह दिया, ‘‘अरे तनु, परेशान क्यों हो रही हो. मैं ठीक हूं.’’
‘‘शौकी, बात यह है कि आज आप के लाए अचार के साथ ही मैं रोटी खाऊंगी. पेट में चूहे कूद रहे हैं इसलिए बारबार रिंग कर रही हूं.’’ सविता ने कह दिया. सविता की सफाई पर अशोक मुसकरा उठा था.

अशोक की गाड़ी के पीछे सुनील ने अपनी सफेद रंग की टैक्सी लगा दी. योजना बनी थी कि अशोक को ओवरटेक कर उन से नकदी लूट ली जाए, पर स्टेट हाइवे पर उस दिन ट्रैफिक ज्यादा था. एकदो बार सुनील ने अशोक की कार ओवरटेक करने की कोशिश की, पर सफलता नहीं मिली. अशोक की गाड़ी रावतसर पार कर गई थी.
तब सुनील ने फोन कर सविता को वस्तुस्थिति बता दी. सविता के निर्देश पर सुनील ने अशोक की गाड़ी का पीछा करना जारी रखा. अशोक की गाड़ी मैनावाली बसस्टैंड पर पहुंच गई थी. सुनसान जगह देख कर उन के चालक विनोद ने कहा, ‘‘भैयाजी, पेशाब कर लूं?’’
कह कर साइड में गाड़ी स्टार्ट हालत में खड़ी कर उतर गया. तभी पीछे से आ रही सुनील की टैक्सी वहां आ कर रुकी. उस में से 3 लोग उतरे. वे सभी अशोक की गाड़ी में फुरती से घुस गए. सुनील ने ड्राइविंग सीट संभाली और दोनों साथी अशोक के अगलबगल बैठ गए.
अनजान लोगों के गाड़ी में बैठने पर अशोक चौंके तो चुप रहने के लिए उन लोगों ने पिस्तौल दिखा दी, जिस से अशोक शांत हो गए. सुनील अशोक की गाड़ी तेज गति से ले गया.

लूट लिए 35 लाख रुपए

अशोक के अगलबगल बैठे रोहताश व बबलू ने अशोक के हाथपांव बांध दिए थे. बबलू ने हाथ में उठाए पिस्तौल को अशोक की कनपटी से सटा कर उसे गोली मारने
की धमकी दी. फिर सुनसान जगह देख कर उन्होंने अशोक को गाड़ी से निकाल दिया.
उन्होंने पिस्तौल के फायर से अशोक की गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिए. नकदी का बैग व मोबाइल उठा कर सभी पीछे आ रही टैक्सी में बैठ कर फरार हो गए. उन के बैग में 35 लाख रुपए थे.
जैसेतैसे कुछ देर में अशोक ने अपने हाथ खोले और वह हनुमानगढ़ टाउन पुलिस थाना पहुंच गए. थानाप्रभारी सीआई विष्णुदत्त बिश्नोई को अशोक ने आपबीती सुनाई. उन्होंने विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर इस की इत्तला उच्च अधिकारियों को दी.

एसपी अनिल कयाल ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र खुलासे के लिए कई टीमें गठित कर दीं. क्षेत्र में बढ़ रही लूटपाट व चोरी की घटनाओं से पुलिस की छिछालेदर हो रही थी. इस संगीन मामले की निगरानी खुद एसपी अनिल कर रहे थे.
काफी कोशिश के बाद भी पुलिस को लुटेरों के बारे में कोई सूचना नहीं मिली. इसी बीच एक मुखबिर ने सीआई विष्णुदत्त बिश्नोई को सविता व अशोक की प्रगाढ़ दोस्ती की सूचना दी.
हालांकि यह सूचना उन्हें अप्रभावी सी लग रही थी. पर पुलिस मामले के खुलासे की चाहत में किसी भी जानकारी को बेजा नहीं मानती. सीआई के निर्देश पर एसआई संध्या सविता को उस के घर से उठा लाईं. अशोक उस समय थाने में ही मौजूद थे.

अशोक ने सविता को देखते ही कहा, ‘‘सर, सविता मेरी शुभचिंतक है. इसे यहां क्यों ले आए. इसे क्यों परेशान कर रहे हैं?’’
‘‘अशोक बाबू, हम इन्हें कहां लुटेरा बता रहे हैं. बस मामूली पूछताछ ही तो करनी है.’’ सीआई ने कहा.
सविता को तलब करने से पहले जांच अधिकारी ने अशोक व सविता के फोन नंबरों की काल डिटेल्स प्राप्त कर ली थीं. वारदात के समय सविता व अशोक के बीच 8 बार बात हुई थी.
सविता के फोन की डिटेल्स में एक विशेष बात यह सामने आई कि अशोक से बात होने के तुरंत बाद सविता ने किसी अन्य फोन नंबर पर भी बात की थी. उस संदिग्ध नंबर की डिटेल्स भी पुलिस ने निकलवा ली.
सविता द्वारा अशोक को बारबार काल करने के बारे में पुलिस ने उस से पूछा तो सविता ने कहा, ‘‘सर, मैं ने अशोक बाबू से बांस का अचार मंगवाया था. चाहें तो आप इस बारे में इन्हीं से पूछ सकते हैं.’’

ऐसे खुला राज

पुलिस ने इस बारे में अशोक से पूछा तो उन्होंने सविता की बात की तसदीक कर दी. तब पुलिस ने सविता को घर भेज दिया. सुनीता की काल डिटेल्स में जो संदिग्ध नंबर आया था, वह नंबर सुनील नायक का निकला. पुलिस ने उस के घर पर दबिश दी तो वह नहीं मिला.
जांच अधिकारी ने अब तक की जांच रिपोर्ट एसपी अनिल कयाल तक पहुंचा दी थी. अधिकारियों की नजर में मामले का खुलासा हो चुका था व निकट भविष्य में किसी भी समय आरोपियों की गिरफ्तारी संभव थी.

अगले दिन सुनील नायक पुलिस के हत्थे चढ़ गया. जांच अधिकारी ने उस से पूछताछ शुरू कर दी. मनोवैज्ञानिक तरीके से की गई पूछताछ में सुनील ने सब कुछ पुलिस के सामने उगल दिया. उस ने अपने साथियों रोहताश, बबलू, कालू, मान सिंह, दीपक, मोहित व मनप्रीत के बारे में भी बता दिया.
पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भादंसं की धारा 323, 395, 365, 109, 143, 120बी व 27 व 3/25 आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर उन्हें अदालत में पेश कर सभी को पूछताछ हेतु रिमांड पर ले लिया.
काबिलेगौर यह भी था कि सभी का यह पहला अपराध था. आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने 35 लाख की लूट की राशि में से 16 लाख रुपए बरामद कर लिए. रिमांड अवधि पूरी होने के बाद उन्हें फिर से न्यायालय में पेश कर जेल भिजवा दिया गया.
बेशक अशोक ने सुंदरियों के मामले में सीमा नहीं लांघी थी, लेकिन दोस्ती की घनिष्ठता में फंस कर एक सुंदरी का शिकार हो ही गए.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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