आखिर क्यूं छोटे परदे पर काम नहीं करना चाहते टाइगर श्राफ

बौलीवुड स्टार टाइगर श्राफ अपने पांच साल के करियर में कई सफल फिल्में दे चुके है और अब वो करण जौहर और पुनीत मल्होत्रा की फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईयर 2’’ मे नजर आने वाले है, हाल ही मे उन्होंने इस फिल्म को लेकर हमसे खास बात की, चलिए पढ़ते हैं कि टाइगर श्राफ ने क्या कहा….

आपने बागी फिल्म के दोनो पार्ट किये है, मगर ‘‘स्टूडेंट आफ द ईयर 2’’ सीक्वअल फिल्म है, जिसके पहले भाग में आप नहीं थे. ऐसे में इस फिल्म में एक्टिंग करना कितना मुश्किल रहा?

सीक्वल और रीमेक फिल्म करते समय हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती दर्शको की अपेक्षा पर खरा उतरना होता है. ‘स्टूडेंट आफ द ईयर’ 2012 की सफल फिल्मों में से एक है. हमें याद रखना होगा कि सीक्वल इसलिए बनाई जाती है, क्योंकि पहली फिल्म को दर्शको ने पसंद किया था. इसलिय हम पर प्रेशर और बढ़ जाता है. हमें पहली फिल्म से इस फिल्म को दो कदम आगे ले जाना है. अगर हम फिल्म ‘बागी’ की बात करें, तो उसके लिए मुझ पर ज्यादा प्रेशर नहीं था. क्योंकि पहली फिल्म में भी मैंने ही उस रोल को किया था. तो वह किरदार मेरे दिमाग में था. लेकिन ‘स्टूडेंट आफ द ईयर 2’ का रोल मेरे लिए एकदम नया है.

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‘‘स्टूडेंट आफ द ईयर’’ और उसकी सीक्वल फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईयर 2’’ इन दोनों फिल्मों में क्या अंतर है?

दोनों में बहुत बड़ा अंतर है. सिर्फ सेंट टेरीस कौलेज की ही समानता है. इस फिल्म में हमने बहुत ही अलग तरह का स्पोर्ट्स किया है. इस फिल्म की दुनिया अलग है. मेरा रोल बहुत अलग है. पहले वाली फिल्म की दुनिया बहुत अलग थी. यदि आपको ‘जो जीता वही सिकंदर’ फिल्म की याद है, तो हमारी इस फिल्म का कौन्सेप्ट भी लगभग वही है.

फिल्म के किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

मैनें इसमें रोहन का किरदार निभाया है. रोहन एक बिंदास और हंसमुख लड़का है. कौलेज के हर स्टूडेंट के साथ वो मिल जुलकर रहता है. उसका एकमात्र मकसद अपने सपने को पूरा करना है. इस फिल्म का संदेश भी यही है कि किस तरह से आप सपना देखें और उसे पूरा भी करें. वह कबड्डी में विनर बनने के साथ ही ‘स्टूडेंट आफ द ईयर’ की ट्राफी भी जीतना चाहता है.

आप हर दिन जिम जाते हैं, मार्ल आर्ट की भी ट्रेनिंग ले रखी है. यह सबबड्डी खेलते समय मददगार साबित हुआ?

जी हां…..जिम और मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग के चलते जो फुर्तीलापन और फ्लेक्सिबिलिटी शरीर में आ जाती है, वो कबड्डी में बहुत जरूरी होती है. मैंने मार्शल आर्ट के सभी मूवमेंट कबड्डी खेलते समय यूज किये है. स्क्रीन पर कबड्डी की खूबसूरती को दिखाने के लिए भी यह सब लाना बहुत जरूरी था. यदि मैं यह कहूं कि मैंने अपनी खासियत को अपने किरदारों को निभाते समय एडाप्ट कर लिया है, तो वो गलत नहीं होगा. मुझे यकीन है कि इस फिल्म को देखते समय आप जरूर मेरे काम की तारीफ करेंगे.

 

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इस रोल की तैयारी के लिए कुछ करना पड़ा?

हमने दो महीने का वर्कशौप किया. इस दौरान मैने निर्देशक और दोनों एक्ट्रेसेस के साथ फिल्म की स्क्रिप्ट की रीडिंग की.

आप यह मानते हैं कि लुक और माहौल एक्टर्स को एक्टिंग में मदद करते हैं?

बहुत ज्यादा.. एक्टर का आधा काम उसका लुक कर देता है. फिल्म ‘दंगल’ याद कीजिए. आमिर सर ने एक यंग कुश्तीबाज और एक पिता बनने के बाद, शरीरिक रूप से मोटे होने के बावजूद कुश्ती लड़ते हुए दिखाई दिए थे. इसके लिए उन्होंने अपने लुक को बदला था. पिता और उम्रदराज और मोटे शरीर के इंसान के लिए उन्होंने अपना वजन बढ़ाया, दाढ़ी सफेद की ताकि अपने लुक पर पूरा काम कर सके. फिर यंग रोल के लिए वजन घटाकर एकदम फिट व चुस्त दुरूस्त नजर आए. उनके लुक के कारण उनकी एक्टिंग में इतना फर्क आया कि सभी ने उनके रोल की तारीफ की.

पति निक जोनस के साथ सेक्सी लुक में नजर आईं प्रियंका चोपड़ा

यदि लुक मायने रखता है, तो फिर कलाकार के चेहरे के भाव को क्या कहेंगे?

अरे, सर वही तो कलाकार का अभिनय है. यदि कलाकार अपने चेहरे से सही ढंग से एक्सप्रैशन नहीं दे पाएगा, तो लुक कोई मदद नही कर पाएगा. देखिए, थिएटर में तो कलाकार नंगे होकर भी काम चला लेता है. लेकिन सिनेमा में लोग कौस्ट्यूम और लुक के साथ चेहरे के एक्सप्रैशन भी बहुत जरूरी हैं. स्क्रीन पर आपके चेहरे के छोटे से छोटे एक्सप्रैशन दिख जाते हैं.

आप एक्शन और डांस में माहिर हैं. इससे आप हर फिल्म में कितना नया कर सकते हैं?

ये तो डांस डायरेक्टर, एक्शन मास्टर और डायरेक्टर पर निर्भर करता है कि वो मेरे टैलेंट का यूज किस तरह अपनी फिल्म में करते है और दर्शकों को भी पता है कि टाइगर श्राफ की फिल्म है तो इसमें एक्शन और डांस होगा ही है.

कुछ लोग वेब सीरीज भी कर रहें हैं. क्या आप भी करना चाहेंगे?

नहीं सर, मुझे बड़े परदे पर ही अपने आपको देखना अच्छा लगता है. मैं छोटी स्क्रीन के लिए अपनी मेहनत बर्बाद नहीं करना चाहता.

Edited by – Neelesh Singh Sisodia

यूपी ही तय करेगा दिल्ली का सरताज

लोकसभा चुनाव के पांचवे चरण में पहुंचते-पहुंचते यह साफ है कि चुनावी लड़ाई बेहद कठिन है. अपने नेताओं को दरकिनार करने के बाद फिल्म, टीवी और खेल के मैदान से नामचीन चेहरे लाने के बाद भी भाजपा 75 प्लस सीटे लाने की हालत में नहीं दिख रही है. उत्तर प्रदेश से भाजपा को जो चुनौती मिल रही है उस कमी को पूरा करने वाला देश का कोई दूसरा प्रदेश नहीं है. पहले उम्मीद की जा रही थी भाजपा कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी को चुनाव जीतने नहीं देगी.

अमेठी और रायबरेली दोनो संसदीय सीट पर भाजपा के प्रत्याशी किसी तरह की बड़ी चुनौती नहीं खड़ी कर पा रहे है. रायबरेली के लालगंज के पास सरेनी कस्बे में बातचीत में वहां के रहने वालों ने कहा कि सोनिया गांधी जिस तरह की राजनीति करती हैं और जितनी सहनशील हैं वो आज के नेताओं की बस की बात नहीं है.

मोदी जी की सेना कहने पर सैनिक हुए खफा

सवर्ण जातियों के प्रभाव वाला यह क्षेत्र विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ था. पर लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस के साथ खड़ा है. यहां राष्ट्रवाद कोई मुददा नहीं है. सवर्ण जातियां ठाकुर और ब्राह्मण की आपसी गुटबाजी से दूर केवल कांग्रेस को वोट देने जा रही है. किसी के मन में इस बात का भी कोई मलाल नहीं है कि सोनिया और प्रियंका यहां वोट मांगने क्यो नहीं आ रहीं? कमोवेश यहीं हालत अमेठी लोकसभा सीट की है. राहुल गांधी और स्मृति ईरानी के बीच केवल

वोट के अंतर को देखना भर रह गया है. 2014 में मोदी के मैजिक के समय भाजपा यहां 2 सीटें जीत नहीं पाई थी. 2014 के मुकाबले भाजपा 2019 की राह कठिन है. भाजपा को लग रहा था कि त्रिकोणीय लड़ाई होने का लाभ पार्टी को मिलेगा. पर यह लाभ होता नहीं दिख रहा है.

मीडियाकर्मियों का दिल जीत लिया राहुल ने

80 सीटों वाले इस प्रदेश में भाजपा के मुकाबले गैर भाजपा की सीटें अधिक होगी. जिससे भाजपा को केन्द्र में सरकार बनाने की राह कठिन हो जायेगी. विपक्ष इस बार उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करके सरकार बनाने लायक सीटों को लाने के प्रयास में लगा है. अगर उत्तर प्रदेश में विपक्ष का प्रदर्शन अचछा रहा, तभी वह केन्द्र की चाबी तैयार कर सकेगा. भाजपा में

उत्तर प्रदेश से प्रभाव कम होने से बहुमत की सरकार से वह दूर रह जायेगी. ऐसे में ‘शाह-मोदी’ का विरोध, विरोधी दल ही नहीं बल्कि इनके अपने लोग ही करने लगेगें.

ऐसे में यह साफ है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर ही जायेगा. भाजपा ने सभी जातियों के हिन्दू धुव्रीकरण का प्रयास किया है वह पूरी तरह से सफल नहीं है. प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या और अकबरपुर में अपनी चुनावी सभा की पर अयोध्या राम मंदिर का दर्शन करने अपने 5 साल के अपने पूरे कार्यकाल में नहीं गये.

बड़े सितारों पर भारी पड़ रहे क्षेत्रीय कलाकार

बाराबंकी जिले के पफतेहपुर के रहने वाले सामान्य वर्ग के सुरेश शर्मा कहते है ‘भाजपा ने राम मंदिर बनाने की बात की थी. ना तो राम मंदिर बना ना ही आयोध्या का विकास हुआ. ऐसे में अब लोग भाजपा को क्यो वोट दे?’

उत्तर प्रदेश में कमल को खिलने से रोकने के लिये हाथी और साइकिल के साथ पंजा भी मिल गया है. यह मिलकर भाजपा का दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता रोकने को सफल हो रहे है. अपने चुनावी प्रबंधन से भाजपा अपने चुनावी नुकसान को कम कर सकती है यह नुकसान बिलकुल नहीं होगा यह भाजपा को भी लग रहा है. यही वजह है कि भाजपा ने अपने उबाऊ और बासी दिखने वाले नेताओं की जगह पर फिल्म और खेल के मैदान के लोगों को उतारा है.

भाजपा के लिए चुनौती हैं प्रियंका

पति निक जोनस के साथ सेक्सी लुक में नजर आईं प्रियंका चोपड़ा

मशहूर एक्ट्रेस और एक सफल सिंगर के रुप मे अपनी पहचान बनाने वाली बौलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी काफी पौपुलर है. चाहे उनकी एक्टिंग हो या फिर उनका बेबाक अंदाज , प्रियंका चोपड़ा अपने फैन्स का दिल जीत ही लेती है. पर जब बात की जाए उनके ग्लैमरस लुक की तो वो हौलीवुड एक्ट्रेसेस पर भी भारी पड़ती हैं, वो जो कुछ भी करती है चर्चा का विषय बन ही जाता है. हाल ही मे प्रियंका चोपड़ा अपने पति निक जोनस के साथ लौस एंजेलिस में हुए बिलबोर्ड म्यूजिक अवार्ड में शिरकत करने पहुंची थी. इस दौरान अवार्ड नाइट में सभी की  निगाहे सिर्फ निक और प्रियंका पर टिकी थीं. इस दौरान ये दोनों बेहद ग्लैमरस अंदाज में दौरान नजर आए.

बता दें की प्रियंका चोपड़ा ‘बिलबोर्ड म्यूजिक अवार्ड’ के रेड कारपेट पर जुबैर मुरद स्प्रिंग 2019 के कलेक्शन के गाउन मे नजर आईं. इस म्यूजिक अवार्ड मे प्रियंका का गाउन काफी पौपुलर रहा.

 

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वही उनके पति निक जोनस चेक कोट पैंट मे नजर आए, दोनो की जोड़ी को सभी ने खूब पसंद किया, सोशल मीडिया पर दोनो की तस्वीर काफी वयरल हो रही है.

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बता दे प्रियंका कुछ दिन पहले भारत आई थी, अपने भाई सिद्धार्थ की शादी अंटेड करने लेकिन भाई की मंगेतर की अचानक सर्जरी के कारण शादी की तारीख कुछ महीनों के लिए टल गई, इसके बाद प्रियंका भी फिर से अपना ससुराल लौट गईं.

 

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प्रियंका और निक जोंस पिछले साल ही शादी के बंधन मे बंधे थे. दोनों ने भारत के जोधपुर शहर में शाही शादी की थी.

Edited By- Neelesh Singh Sisodia

ब्लैंक रिव्यू: फिल्म से दूरी ही भली

निर्देशकः बेहजाद खम्बाटा

कलाकारः सनी देओल, करण कापड़िया,करणवीर शर्मा, इषिता

दत्ता और स्पेशल अपीयरेंस अक्षय कुमार

अवधिः एक घंटा, 51 मिनट

रेटिंगः दो स्टार

कहानीः

फिल्म ‘‘ब्लैंक’’ की कहानी के केंद्र में आत्मघाती हमलावर/आतंकवादी हनीफ (करण कापड़िया) है, जो कि फोन पर कुछ लोगों को निर्देश दे रहा है. फिर वह एक दुकान से सिगरेट खरीदता है, सिगरेट जलाने के चक्कर में एक कार से उसका एक्सीडेंट हो जाता हे. उसे अस्पताल पहुंचाया जाता है. डाक्टरों को उसके सीने पर उसके हृदय के साथ जोड़ा गया आत्मघाती बम नजर आता है. एटीएस चीफ सिद्धू दीवान (सनी देओल) को खबर दी जाती है. पूरा पुलिस महकमा हरकत में आ जाता है. डाक्टर का कहना है कि हनीफ के मौत के साथ ही बम फटेगा. उधर एटीएस चीफ दीवान, हनीफ से कुछ भी कबूल करवाने में सफल नहीं होते हैं.तब पुलिस कमिश्नर अरूणा गुप्ता, शहर से दूर वीराने में ले जाकर हनीफ का इनकाउंटर करने का आदेश देती हैं. दीवान खुदइनकाउंटर करने के लिए जाता है. इधर हनीफ की तस्वीर के आधार पर इंस्पेक्टर रोहित (करणवीर शर्मा) और महिला इंस्पेक्टर हुस्ना (इशिता दत्ता) जांच में लगे हुए हैं. रोहित एक अपराधी फारूक को गिरफ्तार करता है, जिसके बैग में बम होता है, जबकि हुस्ना, हनीफ के अड्डे पर पहुंचती है. इधर दीवान, हनीफ के इनकाउंटर के गोली चलाने का आदेश देते हैं, तभी हुस्ना का फोन आता है और वह रूक जाता है, इस बीच हनीफ गैंग के लोग आकर हनीफ को वहां से ले जाते हैं. उधर हनीफ का सरदार आतंकवादी मकसूद (जमील खान) पाकिस्तान में बैठकर आदेश दे रहा होता है. हनीफ के पकड़े जाने की खबर पाते ही वह मुंबईमें बषीर से बात करता है और खुद वह भारत आने की तैयारी करता है. पता चलता है कि हनीफ के सीने पर लगे बम के साथ मकसूद के चार स्लीपर सेल के बम भी जुड़े हुए हैं.मकसूद ने छोटे छोटे बच्चों को जन्नत पाने के नाम पर जेहाद के लिए तैयार कर रखा है.उधर मकसूद का मकसद एक साथ 25 बम धमाकों के साथ भारत को दहलाने की है.

कहानी अतीत में जाती है, जब हनीफ दस साल का बच्चा था और उसकी एक बड़ी बहन थी. उन दिनों मकसूद एक गुंडा था,जिसने उसकी बस्ती के सारे घर जला दिए थे और सभी की हत्या कर दी थी. हनीफ के पिता ने पुलिस को फोन किया, पर पुलिस नहीं पहुंची, हनीफ के पिता को यकीन था कि एक पुलिस इंस्पेक्टर जरुर पहुंचेगा, पर उस पुलिस इंस्पेक्टर ने अपनामोबाइल फोन ही नहीं उठाया और हनीफ के पिता मारे गए. उसी दिन हनीफ ने बदला लेने की ठान ली थी. इसके बाद की कहानी जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.

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कमियां…

बेसिर पैर की कहानी और घटिया पटकथा के चलते यह फिल्म सिर्फ बोर करती है. इंटरवल से पहले अति धीमी गति के बावजूद हनीफ की असलियत जानने को लेकर दर्शकों में उत्सुकता बनी रहती है, जबकि पूरी कहानी बहुत ही कन्फ्यूजन पैदा करती है. इतना ही नहीं एक भी सीन तर्क की कसौटी पर सही नहीं ठहरता. जब डाक्टर कहता है कि हृदय की धड़कन के साथ हनीफ के सीने पर बंधे बम को जोड़ा गया है और यह बम हनीफ के दिन की धड़कन बंद होते ही फटेगा, तो दर्शक को हंसी आती है. मगर इंटरवल के बाद जिस तरह से उसका सच सामने आता है और जिस तरह कहानी बेतरतीब ढंग से चलती है, उसे देखकर कर दर्शक कह उठता है- ‘कहां फंसायोनाथ.’ फिल्म आतंकवाद पर है, मगर अंत में व्यक्तिगत बदले की कहानी के रूप में उभरती है.

निर्देशनः

बतौर निर्देशक बेहजाद खम्बाटा प्रभावित नहीं करते हैं. लेखक व निर्देशक के तौर पर उन्होने कहानी को फैला दिया, पर उसे किस दिशा में ले जाना है और किस तरह समेटना है, यह सब भूल गए हैं. दीवान के बेटे रौनक के ड्रग्स लेने की कहानी गढ़ी,मगर उसका क्या हुआ, दीवान की पत्नी ने क्या किया, सब गायब.

अभिनयः

यूं तो यह फिल्म करण कापड़िया को लांच करने के लिए बनी है, मगर वह बुरी तरह से हताश करते हैं. उनके चेहरे पर एक्सप्रेशन आते ही नहीं है. करण के किरदार के गढ़ने में भी बेहजाद खम्बाटा और प्रणव प्रियदर्षी मात खा गए हैं. पूरी फिल्म अकेले एटीएस चीफ दीवान के कंधो पर ही आ जाती है. इस किरदार में सनी देओल ने जानदार परफार्मेंस दी है. हुश्ना के किरदार में इशिता दत्ता के लिए कुछ जगह खूबसूरत लगने के अलावा करने को कुछ नहीं है. रोहित के किरदार में करणवीर शर्मा ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

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फिल्म के अंत में अक्षय कुमार का डांस नंबर ‘अली अली’ मजाक बनकर रह जाता है, दर्शक इस गाने को सुनने व डांस देखने के लिए रूकता ही नहीं है.

निर्माताः डा श्रीकांत भासी,निषांत पिट्टी, एंड पिक्चर्स,टोनी डिसूजा और विषाल राणा

लेखकः बेहजाद खम्बाटा,प्रणव प्रियदर्षी, प्रदीप अटलारी व राधिका आनंद.

संगीतकारः राघव सचर,अरको पारवो मुखर्जी व सोनल प्रधान

दिल्ली के लव कमांडो: हीरो नहीं विलेन

30 जनवरी, 2019 की शाम की बात है. मध्य दिल्ली के पहाड़गंज में चूनामंडी इलाके की गली नंबर 5 के प्रथम  तल स्थित मकान नंबर 2860 के बाहर भारी मात्रा में पुलिस तैनात थी. पुलिस ने यहां रहने वाले संजय सचदेव नाम के शख्स को हिरासत में लिया था. संजय सचदेव इस मकान में एक शेल्टर होम चलाता था. यहीं पर उस ने अपनी संस्था का अस्थाई औफिस भी बनाया हुआ था. पुलिस की इस काररवाई की भनक जल्द ही पूरे इलाके में सनसनी बन कर फैल गई. आननफानन में उस मकान के आगे लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा.

हर कोई जानना चाहता था कि इलाके में जिस इंसान को एक बड़े समाजसेवी की नजर से देखा जाता था, उसे पुलिस ने आखिर किस जुर्म में गिरफ्तार किया है. संजय सचदेव के छापे और उसे गिरफ्तार करने की सूचना मीडिया में भी जंगल की आग की तरह फैली, जिस के बाद पहाड़गंज के उस ठिकाने पर मीडिया के लोगों का भी हुजूम उमड़ आया.

दरअसल, संजय सचदेव ‘लव कमांडो’नाम से एक ऐसी संस्था चलाता था, जो उन प्रेमी जोड़ों को तथाकथित रूप से पनाह देती थी, जिन्हें समाज या अपने घरपरिवार वालों से जान का खतरा हो. ऐसे जोड़ों की एनजीओ में रहने की भी व्यवस्था थी. लेकिन यह केवल दिखावा भर था, सच्चाई कुछ और ही थी.

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आइए पहले इस संस्था के बारे में जान लें. साल 2001 में संजय सचदेव ने फरवरी महीने में अपने कुछ साथियों के साथ वैलेंटाइंस पीस कमांडो नाम का संगठन बनाया. दरअसल, वैलेंटाइंस डे करीब आते ही कुछ कट्टरपंथी संगठन दिल्ली व दूसरे महानगरों में प्रेमियों को यह त्यौहार मनाने पर बंदिशें लगा देते थे.

वैलेंटाइंस पीस कमांडो ने प्रेमियों के इस अवसर पर अपने कमांडो तैनात कर के प्रेमियों को सुरक्षा देने का काम शुरू किया. शुरुआती दौर में इस संगठन को ज्यादा रेस्पौंस नहीं मिला. 2006-07 तक ये संस्था ऐसे ही चलती रही.

लेकिन साल 2010 में हुई एक घटना ने संजय सचेदव की इस संस्था को विस्तार दे दिया. हुआ यूं कि संजय के एक रिश्तेदार के लड़के को एक लड़की से प्रेम विवाह करने की वजह से लड़की के परिजनों ने उस युवक को झूठे रेप केस में फंसा दिया.

संजय सचदेव को जब उस बात का पता चला तो उन्होंने खुद लड़की से बात की. लड़की ने उन्हें बताया कि मेरे पापा मुझ पर दबाव बना कर ऐसा करवा रहे हैं. जबकि हम दोनों रिलेशनशिप में हैं. इस के बाद संजय ने अदालत का सहारा लिया. कोर्ट ने प्रेमी को जमानत दे दी.

ऐसे आया लव कमांडो का आइडिया…

कोर्ट से बाहर निकलने पर एक दोस्त ने संजय सचदेव से कहा कि ऐसे लोगों को बचाने, पनाह देने और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए कुछ और बेहतर किया जाना चाहिए. बस इसी के बाद सचदेव ने इस संस्था का स्वरूप बदल दिया. उन्होंने 2 हेल्पलाइन नंबर भी जारी कर दिए.

संस्था के शुरुआती दौर से जुड़े सदस्य और संस्था के कोऔर्डिनेटर हर्ष मल्होत्रा ने सुझाव दिया कि संस्था का नाम अब पीस कमांडो से बदल कर ‘लव कमांडो’ रख दिया जाए. संजय सचदेव को नाम अच्छा लगा, लिहाजा 2010 में संस्था का नाम ‘लव कमांडो’कर दिया गया.

‘लव कमांडो’ संस्था की शुरुआत के समय इस में सिर्फ 200 लोग थे,लेकिन वक्त गुजरता रहा, लोग जुड़ते गए. नतीजतन अकेली दिल्ली में लव कमांडो ग्रुप के 7 शेल्टर होम हैं,जहां प्रेमियों को तथाकथित सुरक्षा के साथ नि:शुल्क रहनेखाने की सुविधा दी जाती है.

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लव कमांडो के कर्ताधर्ता संजय सचदेव आए दिन मीडिया की सुर्खियां बनने लगे,उनके इसी अद्भुत काम से प्रभावित हो कर आमिर खान ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम सत्यमेव जयते में लव कमांडो के चेयरमैन संजय सचदेव को बुलाया था, जिस के बाद संजय सचदेव की लोकप्रियता शिखर पर पहुंच गई थी.

लेकिन अचानक दिल्ली महिला आयोग और पुलिस के संयुक्त अभियान में लव कमांडो के बेस शेल्टर होम और अस्थाई मुख्यालय पर छापा मारने के बाद जो जानकारी सामने आई, उसे जान कर सभी हैरान रह गए.

दरअसल, हुआ यह कि दिल्ली के पहाड़गंज एरिया में लव कमांडोज का जो शेल्टर होम चल रहा था, वहां से 28 जनवरी 2019 को एक प्रेमी जोड़ा निकला और महिला आयोग की सदस्य किरण नेगी और फिरदौस से मिला.

इस जोड़े ने लव कमांडो के शेल्टर होम में प्रेमी जोड़े की मदद के नाम पर उन के साथ होने वाले अत्याचार और जबरन वसूली करने की एक ऐसी कहानी सुनाई,जिस से महिला आयोग की दोनों सदस्य उन की शिकायत को नजरअंदाज नहीं कर सकीं.

शिकायत गंभीर थी, इसलिए इसे महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के संज्ञान में लाया गया. स्वाति मालीवाल ने किरण नेगी और फिरदौस की अगुवाई में पुलिस के सहयोग से लव कमांडो के शेल्टर होम पर छापा मार कर सच्चाई का पता लगाने का फैसला लिया.

प्रेमी युगल की हिम्मत ने दिखाई राह

अगले दिन यानी 29 जनवरी को सदस्य किरण नेगी व फिरदौस को साथ ले कर दिल्ली महिला आयोग की मुखिया स्वाति मालीवाल मध्य दिल्ली जिला पुलिस के उपायुक्त मनदीप सिंह रंधावा से मिलीं और उन्हें एक दिन पहले प्रेमी जोड़े से मिली शिकायत से अवगत करा कर जांच के लिए पुलिस बल उपलब्ध कराने का अनुरोध किया.

डीसीपी रंधावा ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल पहाड़गंज इलाके के एसीपी संजीव गुप्ता और एसएचओ सुनील चौहान को एक रेडिंग पार्टी तैयार करने के लिए कहा, जिस के बाद महिला आयोग की टीम पहाड़गंज थाने पहुंच गई. एसीपी संजीव गुप्ता ने एसएचओ सुनील चौहान के साथ संगतराशां चौकी प्रभारी दीपक कुमार वर्मा और एसआई खजान सिंह को भी टीम के साथ वहां बुलवा लिया था.

महिला आयोग की टीम के साथ पुलिस लव कमांडो के शेल्टर होम पहुंची. संयोग से उस वक्त संजय सचदेव वहां मौजूद था. पुलिस को वहां से 4 प्रेमी जोड़े मिले. इन में से 2 जोड़े ऐसे थे, जिन में लड़के व लडकियां अलगअलग धर्म से संबधित थे.

पुलिस व महिला आयोग की टीम ने चारों जोड़ों को अपने साथ लिया और पहाड़गंज थाने ले आए. वहां महिला आयोग की टीम ने चारों जोड़ों की काउंसलिंग कर के उन्हें समझाया कि शेल्टर होम में उन के साथ जो कुछ भी हुआ, बिना किसी डर या दबाव के बताएं.

चारों प्रेमी जोड़े पहले कुछ झिझक रहे थे लेकिन थोड़ी देर बाद वे खुल गए. इस के बाद उन्होंने शेल्टर होम में होने वाली कारगुजारियों के बारे में जो हकीकत बयान की,उसे सुन कर सब सकते में आ गए.

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प्रेमी जोड़ों ने बताया कि लव कमांडो प्रेमी जोड़ों की मदद करने व उन्हें पनाह देने के नाम पर संगठित रूप से जबरन वसूली का एक गिरोह चला रहा था.

महिला आयोग की टीम ने पुलिस से इस मामले की एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया. 29 जनवरी को ही प्रेमी जोड़ों के बयान के आधार पर थाना पहाड़गंज में भारतीय दंड संहिता की धारा 342, 384, 386, 506, 509 व 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. इस की जांच का काम संगतराशां चौकी प्रभारी दीपक वर्मा की निगरानी में एसआई खजान सिंह को सौंपा गया.

खजान सिंह ने उसी दिन चारों प्रेमी जोड़ों को अदालत में पेश कर मजिस्ट्रैट के सामने उन के बयान दर्ज करवा दिए. पुलिस को अपना विस्तृत बयान देने के बाद महिला आयोग की टीम चारों प्रेमी जोड़ों को अपने साथ ले गई और उन्हें दिल्ली सरकार के अलगअलग शेल्टर होम में शरण दे दी.

इस के बाद शुरू हुआ पुलिस की पड़ताल का काम. 30 जनवरी को एचएचओ सुनील चौहान और चौकी प्रभारी दीपक कुमार के नेतृत्व में एक टीम फिर से लव कमांडो के शेल्टर होम पहुंची. शेल्टर होम में 2 छोटे कमरे थे. उन में सभी प्रेमी जोड़ों का रखा जाता था. घर से भागे हुए प्रेमी जोड़ों को चूंकि कोई रास्ता और नहीं दिखता था, इसलिए शरण पाने के लिए उन्हें लव कमांडोज के शेल्टर होम में मिली शरण स्वर्ग से कम नहीं लगती थी.

लेकिन शरण मिलने के बाद उन जोड़ों को जल्दी ही वहां की हकीकत पता चल जाती थी. उन्हें वहां के सारे काम करने पड़ते थे. युवक-युवतियों को झाड़ूपोंछा तक करना पड़ता था. शेल्टर होम में सारा स्टाफ पुरुषों का था,लेकिन मजबूरी में उस जोड़े को स्टाफ के पैर भी दबाने पड़ते थे. वहां मौजूद जोड़ों ने पूछताछ में बताया था कि संजय सचदेव शाम होते ही शराब पी लेता था और लड़कों को जबरदस्ती अपने साथ शराब पिलाता था.

हालांकि लव कमांडो की हेल्पलाइन और प्रचार माध्यमों में यही कहा जाता था कि किसी भी प्रेमी जोड़े को शेल्टर होम में रहने या खाने की व्यवस्था मुफ्त है. लेकिन 1-2 दिन बाद जब कपल से शादी कराने के लिए उन के सभी मूल दस्तावेज लव कमांडो अपने कब्जे में लेते, उस के बाद कानूनी खर्चों के नाम पर और वहां शरण देने के लिए कपल से उस के एवज में मोटी फीस वसूली जाती थी.

इतना ही नहीं, अगर किसी कपल के घर वाले उन्हें पैसे भेजते तो लव कमांडो की टीम थोड़ा सा पैसा कपल को दे कर बाकी सारा खुद अपने पास रख लेते थे. इतना ही नहीं, छोटीछोटी बातों पर प्रेमी जोड़ों से बदसलूकी, गालीगलौज, यहां तक कि कभीकभी मारपीट तक की जाती थी.

वसूली के लिए ले लेते थे पहचान से जुड़े मूल कागजात…….

 यही नहीं, लव कमांडो की टीम सभी प्रेमी जोड़ों के आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और पहचान से जुड़े दूसरे दस्तावेजों की मूल प्रति तब तक के लिए अपने पास रख लेते थे,जब तक कपल से मोटी रकम नहीं वसूल हो जाती थी. ऐसा नहीं था कि प्रेमी जोडे़ इस का विरोध नहीं करते थे, लेकिन वे यह सोच कर चुप रह जाते थे कि चलो, जब तक शादी हो या कोई दूसरा सुरक्षित ठिकाना न मिले, तक तक लव कमांडो की जबरन वसूली को पूरा कर देते हैं.

प्रेमी जोड़े महीना-2 महीना जब तक लव कमांडो के किसी भी शेल्टर होम में पनाह ले कर रहते थे,तब तक उन के दस्तावेज वापस नहीं किए जाते थे. इस बीच लव कमांडो की टीम अलग-अलग बहाने से मोटी रकम ऐंठती रहती थी.

महिला आयोग और पुलिस की टीम ने जिन प्रेमी जोड़ों को वहां से निकलवाया था,उन सब की उम्र 25 साल के आसपास थी. पुलिस टीम ने शेल्टर होम में छापा मार कर तलाशी ली तो वहां उस कमरे से शराब की बहुत सारी खाली बोतलें मिलीं, जहां एक कमरे में संजय सचदेव आराम करता था.

इस के अलावा भी पुलिस को वहां रखी फाइलों से बहुत सारे जोड़ों की पहचान से जुड़े मूल दस्तावेज मिले. पुलिस को वहां से संजय के एक बैंक अकाउंट की पासबुक भी मिली. पुलिस का कहना है कि जब इस खाते की पड़ताल की गई तो पता चला कि संजय सचदेव के निजी खाते में पिछले 6 महीनों के दौरान ही 40 लाख से अधिक का ट्रांजैक्शन हुआ है.

संजय सचदेव पूछताछ में यह नहीं बता सका कि इतना पैसा उसे कहां से मिला. इस के बाद पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि प्रेमी जोड़ों ने संजय सचदेव पर जबरन वसूली का जो आरोप लगाया था, वह कहीं न कहीं सच है. इस के बाद संजय सचदेव के पास बचाव के लिए बहुत कुछ नहीं रह गया था. इसलिए पुलिस ने उसे उसी दिन गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर संजय सचदेव से पूछताछ हुई. उस के बाद लव कमांडो चेयरमैन को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

दरअसल, 28 दिसंबर को दिल्ली महिला आयोग के सामने जिस प्रेमी जोड़े ने लव कमांडो संगठन की शिकायत की थी, वह 20 दिसंबर को लव कमांडो के दफ्तर में शरण मांगने पहुंचा था.

वे दोनों संजय सचदेव से फोन पर बात करने के बाद अपनेअपने आईडी प्रूफ के साथ संजय के पास गए थे. वहां पहुंचते ही दोनों के फोन बंद करा दिए गए. प्रोटेक्शन देने व शादी कराने के नाम पर उन से 50 हजार रुपए ले लिए गए. प्रेमी के पास 55 हजार रुपए ही थे. वो भी बैंक में थे. चूंकि उन के दस्तावेज संजय सचदेव ने अपने कब्जे में ले लिए थे, इसलिए पैसा देना मजबूरी हो गई.

और पैसा मिलना नहीं था इसलिए छोड़ दिया गया प्रेमी जोड़े को…

संजय ने अपने 2 आदमी प्रेमी युवक के साथ भेजे और कहा कि एटीएम से पैसा निकाल कर इन को दे देना. सोनू नाम का एक कमांडो गया और प्रेमी ने उसे 40 हजार रुपए एटीएम से निकाल कर दे दिए. चूंकि पैसा पूरा नहीं मिला था, इसलिए इस प्रेमी जोड़े को वहां बंधक बना लिया गया.

लेकिन 28 जनवरी को किसी तरह उन्होंने संजय सचदेव को रजामंद कर लिया कि उन के पास और पैसा नहीं है, उन्हें अब शादी भी नहीं करनी, लिहाजा वे उन्हें जाने दें. संजय सचदेव ने कुछ पेपर उन्हें लौटा दिए. जबकि कुछ अपने पास ही रख लिए और उन्हें जाने की इजाजत दे दी.

इस प्रेमी जोड़े ने उसी वक्त संजय सचदेव के वसूली धंधे की पोल खोलने का मन बना लिया. प्रेमी जोड़े ने समाचार पत्रों में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के बारे में बहुत पढ़ा था कि वे इस तरह के मामलों में बहुत संजीदगी से काम करती हैं.

उसी दिन प्रेमी जोड़ा दिल्ली महिला आयोग पहुंचा, जहां आयोग की सदस्य फिरदौस से उन की मुलाकात हुई. जोड़े ने उन्हें अपनी पीड़ा बताई. उस के बाद ही ये सारी काररवाई हुई. नतीजतन सालों से लव कमांडो संस्था की आड़ में चल रहे संजय सचदेव के वसूली धंधे का भंडाफोड़ हो गया.

संजय सचदेव से पूछताछ में पता चला कि इस संस्था में उस के बाद नंबर 2 की हैसियत हर्ष मल्होत्रा की है, जो संस्था का कोऔर्डिनेटर है. हालांकि हर्ष मल्होत्रा पहाड़गंज में ही रहता है और पेशे से प्रौपर्टी डीलर है. लव कमांडो की विशेष टीम में हर्ष मल्होत्रा का छोटा भाई राजेश मल्होत्रा भी शामिल है. इन के अलावा सोनू व गोविंदा नाम के 2 लव कमांडो प्रेमी जोड़ों पर निगाह रखने और उन की शादियां कराने की जिम्मेदारी उठाते थे.

पहाड़गंज थाने की पुलिस ने इन चारों की तलाश में उन के ठिकानों पर छापेमारी की तो हर्ष मल्होत्रा के अलावा तीनों लोग राजेश, सोनू व गोविंदा पुलिस के हत्थे चढ़ गए. उन से पूछताछ में पता चला कि प्रेमी जोड़ों से रकम मिलती थी, उस में से उन्हें भी हिस्सा मिलता था.

पुलिस ने तीनों को पूछताछ के बाद अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस हर्ष मल्होत्रा की तलाश में लगातार छापेमारी कर रही है, लेकिन कथा लिखे जाने तक वह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा था.

पुलिस को जांच में पता चला है कि संजय सचदेव के शेल्टर होम में प्रेमी जोड़ों को प्रताड़ना देने के अलावा उन से अवैध वसूली कई सालों से चली आ रही थी. पेशे से पत्रकार संजय सचदेव कुछ साल पहले जब रामविलास पासवान रेल मंत्री थे, तब उस ने उन के मीडिया सलाहकार के रूप में काम किया था.

इस के बाद से वह कोई काम नहीं करता था,लेकिन फिर भी ऐशो-आराम भरी जिदंगी बसर करता था. उस की आय का कोई स्थाई साधन नहीं था,फिर भी वह पूरे देश में घूमताफिरता था.

लव कमांडो के नाम पर मीडिया में जम कर अपना प्रचार करता था, जिस की वजह से उस की हैसियत इतनी बड़ी हो गई कि आमिर खान ने भी ‘सत्यमेव जयते’ के अपने कार्यक्रम में संजय सचदेव के अभियान की सराहना की. टीवी कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ से मिलने वाली ख्याति का उस ने अनुचित फायदा उठाया और अपने गलत इरादों को पूरा करने के लिए इस का सहारा लिया.

पीड़ितों ने मजिस्ट्रैट को दिए अपने बयान में भी आरोप लगाया कि संजय सचदेव अदालत द्वारा जारी किए गए उन के शादी के प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाण पत्र, कालेज की डिग्री और आधार कार्ड की मूल प्रति अपने पास रख लेता था. महिलाओं को बर्तन साफ करने पड़ते थे और साफसफाई करनी पड़ती थी.

यही नहीं, उन से और अधिक पैसे की मांग की जाती थी. जो लोग पैसे दे देते थे उन के प्रमाण पत्र वापस मिल जाते थे और उन्हें शेल्टर होम छोड़ कर जाने दिया जाता था. बाकियों को जबरन शेल्टर होम में रखा जाता था और उन को प्रताडि़त किया जाता था.

अगर कोई बीमार हो जाता तो वहां के कर्मचारी उसे डाक्टर के पास भी नहीं ले जाते थे. जांच में पुलिस को पता चला कि वहां एक व्यक्ति को 3 बार टायफाइड हो गया, लेकिन उस का उचित इलाज नहीं कराया गया. अगर कोई मनमानी फीस दिए बिना वहां से जाने का प्रयास करता तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती. साथ ही उस से कहा जाता कि वे उन के परिवार को बुला कर उन्हें उन के सुपुर्द कर देंगे.

संजय सचदेव की डार्लिंग

पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि संजय सचदेव शेल्टर होम में रह रही एक शादीशुदा युवती को हमेशा डार्लिंग कह कर बुलाता था. युवती के इसी आरोप के मद्देनजर पुलिस ने दर्ज केस में आईपीसी की धारा 509 जोड़ी गई.

संजय का एक बेटा नेवी में है. वह भी इसी होम में रहता था. दूसरा बेटा एयरफोर्स में है. वैसे लव कमांडो की टीम के लोग प्रेमी जोड़ों से संजय सचदेव को पापा कह कर बुलाने के लिए कहते थे,ताकि सब को लगे कि संजय सचदेव एक पिता की तरह प्रेमी जोड़ों का संरक्षण देता है.

युवतियों ने अपने बयान में यह भी बताया कि रात में चारों जोड़ों को अलगअलग कमरे में बंद कर दिया जाता था. भागने के डर से दोनों कमरों पर बाहर से ताले लगा दिए जाते थे. प्रेमी जोड़ों को बासी व साधारण खाना परोसा जाता था. शेल्टर होम के सामने ही संजय सचदेव का निजी घर था, वहां भी प्रेमी जोड़ों से काम करवाया जाता था. यहीं से राशन शेल्टर होम में जाता था.

शेल्टर होम के चेयरमैन संजय ने शेल्टर होम में 3 खूंखार कुत्ते पाल रखे थे. कोई प्रेमी जोड़ा बात नहीं मानता था तो ये उन पर कुत्ते छोड़ देते थे. इस के अलावा कोई बाहर जाने या भागने का प्रयास करता तो कुत्ते नहीं जाने देते थे.

जांच में पता चला कि जिस प्रौपर्टी पर यह शेल्टर होम चल रहा था, उसे ढाई साल पहले किराए पर लिया गया था. पुलिस ने शेल्टर होम का एक रजिस्टर भी जब्त किया है, जिस में तमाम जानकारियां मिलीं.

पुलिस को जांच में पता चला है कि लव कमांडो का यह गैंग अभी तक करीब 500 से ज्यादा कपल से रकम ऐंठ चुका था. कैश खत्म होने के बाद ये लोग कपल्स के रिश्तेदारों, परिवार, दोस्तों व जानकारों से रुपए मंगवाने का दबाव बनाने लगते थे. जो नहीं दे पाता, उसे प्रताडि़त कर वहां से भगाने की तैयारी शुरू कर दी जाती थी.

कपल्स को कम से कम 6 महीने तक रहने के लिए कहा जाता था. पुलिस का कहना है कि नौजवान युवा पीढ़ी में कानून के प्रति जानकारी का अभाव ही एक बड़ी वजह थी, जिस से वे ऐसे लोगों के जाल में फंस जाते थे.

पुलिस अब सभी आरोपियों व संस्था से जुड़े बैंक अकाउंट को भी खंगालने की तैयारी कर रही है ताकि साफ हो सके कि उन के खाते में बीते 9 साल में कितनी रकम जमा करवाई गई.

जांच सिर्फ दिल्ली तक ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों पर भी फोकस की गई है. 9 साल के भीतर कुल कितने लोग इस संस्था के संपर्क में आए, पुलिस इस का भी पूरा ब्यौरा जुटाने में लगी है ताकि उन्हें भी जरूरत पड़ने पर जांच में शामिल किया जा सके. इस शेल्टर होम में पहले रह चुके युवक-युवतियों से भी पुलिस संपर्क कर शारीरिक शोषण के एंगल से भी जांच करेगी.

लव कमांडो क्यों हुआ चर्चित…

आमतौर पर भारत के छोटे शहरों और गांवों में इज्जत के नाम बेगुनाहों की हत्या कर दी जाती है. लेकिन हाल के दिनों में मीडिया इस बारे में ज्यादा रिपोर्टिंग करने लगा है, जिस से लोग डरने लगे हैं. भारत के कई क्षेत्रों में आज भी प्रेमी युगलों के लिए अन्य जाति से विवाह करना मुश्किल होता है.

पारिवारिक सदस्यों के साथसाथ कुछ खाप पंचायतों ने भी अन्य जाति से प्यार करने वाले लोगों की जान लेने जैसे सख्त कानून बना रखे हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक स्वयंसेवी संस्था ‘शक्ति वाहिनी’ की याचिका पर स्वयंभू खाप पंचायतों और प्यार पर बंदिश लगाने वाले अभिभावकों को कड़ी फटकार लगाते हुए ये निर्देश दिया कि बालिग लड़केलड़की की शादी के फैसले में कोई भी दखल नहीं दे सकता.

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा कि ऐसे मामलों में जोड़ों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस पर होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि कोई शादी कानूनी तौर पर वैध है या नहीं, इस का फैसला अदालतें करेंगी न कि परिवार और खाप पंचायतें. अदालत के इस फरमान से पहले ही संजय सचदेव इस सोच को लव कमांडो बना कर अपनी राह पर बढ़ चुका था.

लव कमांडो संस्था ने कुछ कहानियों को मीडिया में इस तरह प्रचारित किया कि पूरे देश में लव कमांडोज के काम की तारीफ होने लगी. बाद में यह संस्था हर साल शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम भी और्गनाइज करने लगी.

कुछ चर्चित मामले जिन्होंने दिलाई सुर्खियां

2 दिसंबर, 2012 को बुलंदशहर के अब्दुल हकीम को उस के घर के पास गोलियों से भून दिया गया.

अब्दुल हकीम और महविश अड़ोसपड़ोस में रहते थे और बचपन से ही एकदूसरे को पसंद करते थे. लेकिन जब महविश के परिजनों को दोनों के प्रेमसंबधों का पता चला तो उस के घरवालों ने उस की पढ़ाई बंद करवा दी. साथ ही घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी. लेकिन वक्त बीतने के साथ जब हकीम शहर के स्कूल में पढ़ने लगा था तो महविश के परिजनों ने सोचा कि अब महविश अपना प्यार भूल चुकी होगी. उन्होंने धीरेधीरे बंदिशें कम कर दीं.

परिजनों को लगा कि बचपन की प्रेम कहानी खत्म हो गई है. इस बीच महविश का निकाह उस की मौसी के लड़के से तय कर दिया गया. 31 अक्तूबर, 2010 को निकाह की तारीख तय हुई. हकीम के अलावा किसी अन्य से महविश को निकाह कबूल नहीं था, लिहाजा 29 अक्तूबर, 2010 की रात वह अपने प्रेमी अब्दुल हकीम के साथ भाग गई. पहले महविश की तलाश शुरू हुई. शक अब्दुल पर गया. जब वह भी लापता मिला तो दोनों परिवारों के लोगों में तनातनी हो गई.

इस के बाद बिरादरी की खाप पंचायत में प्रेमी जोड़े की हत्या करने वर 50 हजार रुपए का नकद ईनाम देने की घोषणा की. घर से भाग कर महविश और अब्दुल ने पहले अलीगढ़ कोर्ट में 7 नवंबर, 2010 को कोर्ट मैरिज की, फिर मेरठ के तारापुरी के एक मोहल्ले में 11 नवंबर, 2010 को काजी से निकाह पढ़वा कर मजहबी शादी की.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले अब्दुल को दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ी. जब इस से काम नहीं चला तो दोनों दिल्ली आ गए और सीलमपुर में आ कर रहने लगे. जहां अब्दुल को औटोरिक्शा चलाना पड़ा. उधर महविश के घरवालों का अब्दुल के भाइयों और मां पर कहर टूटना शुरू हुआ.

प्रेमी जोड़े की हत्या पर रखा ईनाम

महविश अपने पति अब्दुल को ले कर हाईकोर्ट पहुंची और अपने पति के परिवार और अपनी सुरक्षा की मांग की. हाईकोर्ट ने महविश को इंसाफ दिया और बुलंदशहर पुलिस को सुरक्षा देने के आदेश दिए. लेकिन जिला पुलिस ने सुरक्षा नहीं दी.

महविश दोबारा हाईकोर्ट पहुंची. इसी बीच महविश के गांव अड़ौली के 2 दरजन लोगों ने पंचायत कर अब्दुल के पिता मोहम्मद लतीफ को पेड़ पर उलटा लटका दिया और मारपीट की, जिस से लतीफ की मौत हो गई.

पुलिस में हड़कंप मचा, लेकिन उसे नैचुरल मौत बता कर मामला रफादफा कर दिया गया. 21 जुलाई, 2011 को महविश ने एक बेटी को जन्म दिया. इसी बीच कुछ लोगों से जानकारी मिलने पर महविश पहाड़गंज में लव कमांडो के चेयरमैन संजय सचदेव से मिली और उसे अपनी प्रेम कहानी बताई.

संजय सचदेव ने उसे सुरक्षा देने की दिलासा दी. उन्होंने बुलंदशहर के एसएसपी राजेश कुमार राठौर से बात की और हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए राजी किया. इतना ही नहीं संजय सचदेव के जरिए महविश खाप पंचायत के फरमान से लड़ने के लिए आमिर खान के सीरियल सत्यमेव जयते के 5वें एपिसोड में आई और अपनी सुरक्षा की मांग की.

इस का असर ये हुआ कि पुलिस को उन्हें सुरक्षा दे कर गांव में पुनर्वासित कराना पड़ा. लेकिन दिसंबर महीने में महविश के चचेरे भाई व चाचा ने अब्दुल की हत्या कर दी. बाद में पुलिस ने  महविश की तहरीर पर हत्या व साजिश का मुकदमा दर्ज कर तीनों आरोपियों गुल्लू, आसिफ और सरवर को गिरफ्तार कर लिया.

हकीम हत्याकांड में इंसाफ दिलाने के लिए भी संजय सचदेव के संगठन लव कमांडो ने महविश की भरपूर मदद की जिस कारण लव कमांडो को खूब सुर्खिया मिलीं. प्रेमियों की मदद करने के नाम पर लव कमांडो ने एक ओर चर्चित मामले से सुर्खियां बटोरी थीं. 9 अक्तूबर, 2016 को संस्था के हेल्पलाइन नंबर पर एक फोन आया, जिस में एक महिला ने रोते हुए कहा, ‘मुझे और मेरे पति को औनर किलिंग से बचा लो, ये दरिंदे हमें जान से मार डालेंगे.’

महिला ने अपना नाम सोनिया शर्मा बताते हुए आगे कहा, ‘मैं पुंछ,जम्मू कश्मीर की रहने वाली हूं. मेरे पति जेल में हैं और उन का कसूर यह है हम ने पिछले महीने लवमैरिज की थी. मैं खुद जम्मू के एक मंदिर में छिप कर रहते हुए अपनी जान व इज्जत बचा रही हूं. हमारी मदद करो. मैं दिल्ली के बस अड्डे तक पहुंच जाऊंगी. लेकिन आगे क्या होगा, मुझे नहीं पता. मेरी जान बचा लो प्लीज.’

अलग कहानी निकली सोनिया शर्मा की
हर्ष ने सोनिया को दिल्ली आने और बस का नंबर बताने को कहा. सोनिया ने यह भी बताया कि वह ये फोन जम्मू के उस मंदिर में दर्शन के लिए आए किसी दर्शनार्थी के फोन से कर रही है और बस मिलने के बाद किसी यात्री से अनुरोध कर के उस के फोन से नंबर की जानकारी देने की कोशिश करेगी.

10 अक्तूबर की सुबह करीब 7 बजे दिल्ली के कश्मीरी गेट बसअड्डे पर लव कमांडो के कमांडो ट्रेनर सुनील सागर, एक्सपर्ट कमांडो गोविंदा महिला एवं पुरुष कमांडो दस्ते के साथ मौजूद थे और जम्मू से आने वाली हर बस पर निगाह रखे थे.

जम्मू-कश्मीर रोडवेज की एक बस से एक महिला उतरी, जिस की आखें इधरउधर किसी को तलाश रही थीं. लव कमांडो का दस्ता उस के पास पहुंचा और उस से पूछा कि क्या वह सोनिया शर्मा हैं? उस के पूछने पर उन्होंने खुद का परिचय लव कमांडो के रूप में दिया तो सोनिया ने तसल्ली करने के बाद अपना परिचय उन्हें बताया.

बाद में सोनिया को लव कमांडो के बेस शेल्टर पहाड़गंज में लाया गया. जहां संजय सचदेव से उस की मुलाकात हुई. सोनिया की कहानी सुन कर व उस के दस्तावेज देख कर संजय सचदेव चौंक पड़े.

क्योंकि सोनिया का असली नाम फरजाना कौसर था, जिस ने इसलाम धर्म से  हिंदू धर्म में परिवर्तित कर के अपना नाम सोनिया शर्मा कर लिया था और अपने प्रेमी रिंकू कुमार निवासी खौर जिला जम्मू से 7 सितंबर, 2015 को आर्यसमाज मंदिर में हिंदू रीतिरिवाज से शादी की थी. गाजियाबाद में शादी पंजीकृत भी करवा ली थी, तब से ये दोनों पतिपत्नी की तरह रह रहे थे.

लेकिन 16 सितंबर को जब ये अपने वकील से मिलने तीसहजारी अदालत स्थित उस के चैंबर की ओर जा रहे थे तो वहां पहुंचने से पहले ही जम्मूकश्मीर पुलिस की टुकड़ी और फरजाना कौसर उर्फ सोनिया शर्मा के भाई एवं परिजनों ने उन्हें दबोच लिया. जिसे देख किसी वकील ने पीसीआर को काल कर दी थी. जिस पर तीसहजारी कोर्ट स्थित पुलिस चौकी का स्टाफ सभी को वहां ले आया था.

इस के बाद स्थानीय पुलिस से मिलीभगत कर के जम्मूकश्मीर पुलिस व सोनिया के परिजनों ने मजिस्ट्रैट को गुमराह कर के फरजाना कौसर उर्फ सोनिया को उस के परिजनों के सुपुर्द कर दिया और प्रेमी रिंकू शर्मा को पुंछ पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया.

बाद में फरजाना का अपहरण कर उस के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में जम्मूकश्मीर पुलिस ने रिंकू को पुंछ जेल भेज दिया. कुछ दिन बाद सोनिया फिर अपने परिवार को झांसा दे कर घर से भाग निकली और लव कमांडो संगठन से बात कर के दिल्ली पहुंच गई.

सोनिया ने बताया कि उस का मकसद अपने पति रिंकू व उस के परिवार को बचाना है. संजय सचदेव ने पहले उसे अपने शेल्टर होम में शरण दी, फिर खतोखिताबत कर के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग सहित तमाम संवैधानिक संस्थाओं तक यह मामला पहुंचा दिया. जिस का असर यह हुआ कि कश्मीर पुलिस को संज्ञान ले कर मामले की जांच करनी पड़ी, जिस से सोनिया को तो न्याय मिला ही, साथ ही रिंकू को भी रिहा कर दिया गया.

हालांकि सोनिया को लंबी लड़ाई के बाद इंसाफ तो मिला, लेकिन इसे भी लव कमांडो ने अपनी उपलब्धि बता कर खूब प्रचारित किया. जबकि हकीकत यह थी कि इस पूरी लड़ाई में रिंकू के परिवार व सोनिया को लाखों रुपए खर्च करने पडे़ थे.

ऐसी ढेरों कहानियां हैं, जिन से प्रचार पा कर लव कमांडो ने शोहरत बटोरी और अपने जबरन वसूली के अनोखे धंधे को बड़े मुकाम तक पहुंचाया.

‘प्रेरणा’ और ‘कोमोलिका’ का बिकिनी अवतार, फोटोज हुईं वायरल

कुछ वक्त पहले ही ये खबरें सामने आई थीं कि, एकता कपूर के पौपुलर टीवी शो ‘कसौटी जिंदगी की-2’ की ‘प्रेरणा’ और ‘कोमोलिका’ यानी हिना खान और एरिका फर्नांडिस के बीच कोल्ड वार चल रही है. जिसकी वजह से दोनों आपस में बात भी करना पसंद नहीं करती हैं. लेकिन हाल ही में इनकी जो फोटोज सामने आई है, उससे ये साफ हो गया है कि दोनों के बीच कोई कोल्ड वार नहीं है और दोनों के बीच काफी अच्छी बान्डिंग है.

बिकिनी में छाई ‘प्रेरणा’ और ‘कोमोलिका’…

जी हां, टीवी की ‘प्रेरणा’ और ‘कोमोलिका’ ने अपने इंस्टाग्राम पर कई पूल फोटोज शेयर की हैं, जिसमें इनका हौट बिकिनी अवतार देखने को मिला. इतना ही नहीं इनके साथ अनुराग की बहन यानी की एक्ट्रेस पूजा बनर्जी भी इन फोटोज में नजर आईं. ये फोटोज तेजी से वायरल हो रही हैं. पूल किनारे इन तीनों हसीनाओं ने काफी मस्ती की. अब हिना खान ने अपने इंस्टाग्राम पर कुछ और तस्वीरें शेयर की हैं जिनमें ये तीनों अदाकाराएं स्वीमिंग पूल के गोते लगाती नजर आ रही हैं.

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हिना खान का हौटेस्ट अवतार…
जलपरी बनी हिना हिना खान स्वीमिंग पूल में डुबकियां लगाते हुए किसी जलपरी से कम नहीं लग रही थीं. इनके साथ फर्नांडिस और पूजा बनर्जी भी पानी के मजे लेती नजर आईं. जहां हिना और पूजा बिकिनी में नजर आई वहीं एरिका ने मोनोकिनी पहनकर हौटनेस में कोई कसर नहीं छोड़ी.

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प्रेरणा और कोमोलिका का धमाल…

स्वीमिंग पूल में मस्ती करने के अलावा हिना और एरिका ने एक दूसरे के साथ बेहतरीन समय भी बिताया. ये तीनों अदाकाराएं पानी के अंदर खूब पोज देती नजर आई. तस्वीरों से साफ है कि, ‘कसौटी जिंदगी के’ इन तीनों अदाकाराओं ने अपने हौलीडे को बखूबी इंजौय किया है. जब मौका मिला तो तीनों ने स्वीमिंग पूल में खूब मस्ती की. मस्ती मस्ती में पूजा ने कई बार हिना के पोज खराब किए. इस बात का खुलासा खुद हिना ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर किया है.

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edited by-nisha rai

अतीक जेल में भी बाहुबली

30 दिसंबर, 2018 की सुबह साढ़े 10 बजे देवरिया के जिला कारागार में उस समय अफरातफरी मच गई, जब जिलाधिकारी अमित किशोर ने एसडीएम (प्रशासन) राकेश कुमार पटेल, एडीएम रामकेश यादव, जिला सूचना विज्ञान अधिकारी कृष्णानंद यादव, एएसपी शिष्यपाल, सीओ (सदर) वरुण कुमार मिश्र और साइबर एक्सपर्ट सहित करीब 500 पुलिसकर्मियों के साथ जेल में छापा मारा. उन का मुख्य टारगेट था बैरक नंबर-7. इस बैरक में पूर्वांचल के कुख्यात बाहुबली पूर्व सांसद अतीक अहमद बंद थे.

जिलाधिकारी अमित किशोर ने यह काररवाई प्रमुख सचिव (गृह) अरविंद कुमार के निर्देश पर की थी. दरअसल एक दिन पहले 29 दिसंबर को राजधानी लखनऊ के रहने वाले रीयल एस्टेट कारोबारी मोहित जायसवाल ने लखनऊ के कृष्णानगर थाने में पूर्व सांसद अतीक अहमद, उन के बेटे उमर अहमद सहित 4 गुर्गों गुलाम इमामुद्दीन, गुलफाम, फारुख और इरफान के खिलाफ अपहरण, धोखाधड़ी, रंगदारी मांगने, जाली कागज तैयार करने और आपराधिक साजिश रचने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

मोहित जायसवाल ने पुलिस को बताया कि 26 दिसंबर, 2018 को लखनऊ से उन का अपहरण कर उन्हें देवरिया जेल लाया गया था. जेल में बंद पूर्व सांसद अतीक अहमद की बैरक नंबर-7 में उन के बेटे उमर अहमद, अतीक अहमद और 2 गुर्गों गुलाम इमामुद्दीन और इरफान ने उन्हें जान से मारने की नीयत से बुरी तरह पीटा.

इस के साथ ही इन लोगों ने उन की करीब 45 करोड़ रुपए की संपत्ति हथियाने के लिए उन से जबरन स्टांप पेपरों पर दस्तखत करा लिए थे. उस के बाद उन्हें जबरन गाड़ी में बैठा कर लखनऊ के गोमतीनगर में फेंक दिया और उन की गाड़ी लूट कर चारों गुर्गे मौके से फरार हो गए. गौरतलब है, इलाहाबाद के बहुचर्चित मरियाडीह दोहरे हत्याकांड के केस में अतीक अहमद देवरिया जेल की बैरक नंबर-7 में बंद थे.

अतीक अहमद के खिलाफ कृष्णानगर थाने में मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था. ये कोई मामूली बात नहीं थी. एक कैदी ने जेल के भीतर रहते हुए सारे कायदेकानून तोड़ते हुए प्रशासन की नाक के नीचे ऐसा दुस्साहस किया कि प्रशासन उस के सामने बौना बना रहा.

मामला जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचा तो उन्होंने इस की सच्चाई जानने के लिए प्रमुख सचिव (गृह) अरविंद कुमार को लगाया. सरकार ने एडीजी (जेल) डा. शरद से 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट मांगी ताकि देवरिया जेल प्रशासन पर जवाबदेही तय की जा सके.

एडीजी (जेल) डा. शरद के निर्देश पर इस मामले की जांच गोरखपुर मंडलीय कारागार के वरिष्ठ जेल अधीक्षक डा. रामधनी और एसपी (देवरिया) एन. कोलांची को सौंपी गई थी. दोनों अधिकारियों ने देवरिया जेल जा कर मामले की जांच की.

जेल प्रशासन भी डर गया अतीक अहमद से

जांच में मोहित जायसवाल द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए गए. इस में देवरिया जेल अधिकारियों की घोर लापरवाही उजागर हुई. 26 दिसंबर, 2018 की वह सीसीटीवी फुटेज भी डिलीट कर दी गई थी, जिस में कारोबारी मोहित जायसवाल के साथ मारपीट की घटना कैद थी. फुटेज की बारीकी से जांच करने पर एक जगह मोहित को दरजन भर लोगों के साथ जेल के भीतर जाते हुए देखा गया था, जबकि जेल के आगंतुक रजिस्टर में 26 दिसंबर को सिर्फ मोहित जायसवाल के अलावा एक और व्यक्ति के आने की एंट्री दर्ज थी.

यह मामला साफतौर पर घोर लापरवाही की ओर इशारा कर रहा था. जांच में डिप्टी जेलर देवकांत यादव, हेड वार्डन मुन्ना पांडे, वार्डन राकेश कुमार शर्मा और वार्डन रामआसरे की लापरवाही साफसाफ झलक रही थी. जेल अधीक्षक दिलीप पांडे और जेलर मुकेश कटियार की कार्यशैली भी काफी संदिग्ध पाई गई थी. 24 घंटों के भीतर जांच कर के दोनों अधिकारियों ने रिपोर्ट एडीजी (कारागार) डा. शरद को भेज दी थी.

जांच रिपोर्ट के आधार पर एडीजी (कारागार) डा. शरद ने डिप्टी जेलर देवकांत यादव, हेड वार्डन मुन्ना पांडे, वार्डन राकेश कुमार शर्मा और वार्डन रामआसरे को तत्काल निलंबित कर दिया और जेल अधीक्षक दिलीप पांडे व जेलर मुकेश कटियार के खिलाफ विभागीय काररवाई करने के निर्देश दिए.

जेल अधिकारियों द्वारा पूर्व सांसद अतीक अहमद के खिलाफ कानूनी काररवाई न करने पर ही प्रमुख सचिव (गृह) अरविंद कुमार ने जांच के आधार पर डीएम अमित किशोर को जेल में जा कर काररवाई करने के निर्देश दिए.

डीएम की मौजूदगी में अतीक अहमद के बैरक नंबर-7 की जांच की गई तो वहां सेलफोन, कई सिमकार्ड, खानेपीने की सामग्री (काजू, किशमिश, बादाम आदि) के अलावा और भी कई चीजें बरामद की गईं. पुलिस अधिकारियों ने बरामद चीजों को अपने कब्जे में ले लिया था.

इस मामले में साफतौर पर जेल अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी. जेल की गहनता से छानबीन करने पर डीएम अमित किशोर और एसपी एन. कोलांची ने जेल परिसर में बाहुबली अतीक अहमद के आतंक का अहसास महसूस किया.

अतीक का आतंक देख कर सरकार ने उसी दिन उसे देवरिया से बरेली जेल स्थानांतरित करने का फैसला ले लिया. बरेली जेल स्थानांतरित होने का फैसला सुनते ही अतीक अहमद का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. यही नहीं पति से मिलने आई उस की पत्नी शाइस्ता परवीन और बहन सलहा खान ने मीडियाकर्मियों को बयान देते हुए इस काररवाई को एक साजिश बताया.

खैर, सच और झूठ का पता तो अदालत में हो ही जाएगा. मुद्दा यह है कि बाहुबली के आतंक के सामने पुलिसप्रशासन ने घुटने क्यों टेक दिए थे? जेल प्रशासन उस के इशारे पर क्यों नाचता था? यह सब जानने के लिए अतीक अहमद के अतीत में झांकना होगा कि उस ने किस तरह जुर्म की दुनिया से राजनीति के गलियारों में कदम रखा.

अतीक अहमद की कर्मकथा

56 वर्षीय अतीक अहमद का जन्म 10 अगस्त, 1962 को हुआ था. मूलरूप से वह उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के रहने वाले थे, जो कालांतर में परिवार सहित इलाहाबाद, चकिया के कसारी मसारी में आ कर रहने लगे थे. बचपन से ही दबंग रहे अतीक अहमद की पढ़ाईलिखाई में कोई खास रुचि नहीं थी. सन 1979 में उन्होंने इलाहाबाद के एमआईसी विद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा दी थी लेकिन फेल हो जाने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई छोड़ दी. पढ़ाई से मुंह मोड़ लेने के बाद अतीक अहमद जुर्म की दुनिया में पहुंच गए.

जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही अतीक अहमद के खिलाफ कत्ल का पहला केस सन 1979 में इलाहाबाद के खुल्दाबाद थाने में दर्ज हुआ था. उस के बाद अतीक ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. साल दर साल उन के जुर्म की किताब के पन्ने थानों के रोजनामचे में दर्ज होते रहे.

1992 में इलाहाबाद पुलिस ने अतीक की हिस्ट्रीशीट खोल दी, जिस में बताया गया था कि अतीक अहमद के खिलाफ उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कौशांबी, चित्रकूट, इलाहाबाद, घूमनगंज, खुल्दाबाद, शाहगंज, कोतवाली, कर्नलगंज, बरेली, कीडगंज ही नहीं बल्कि बिहार राज्य में भी हत्या, अपहरण, जबरन वसूली, गुंडा ऐक्ट, अवैध हथियार रखने, गैंगस्टर, बलवा आदि के मामले दर्ज हैं.

अतीक के खिलाफ सब से ज्यादा मामले इलाहाबाद जिले में ही दर्ज हुए थे. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सन 1986 से 2007 तक अतीक अहमद के खिलाफ एक दरजन से ज्यादा मामले केवल गैंगस्टर ऐक्ट के तहत दर्ज किए गए थे.

अंतरराज्यीय गिरोह के सरगना खुल्दाबाद थाने के हिस्ट्रीशीटर अतीक अहमद के खिलाफ इस साल तक 75 मुकदमे दर्ज हो चुके थे. उन के गिरोह में 138 सदस्य थे. कचहरी में पुलिस वकीलों के बीच शूटआउट में 4 लोगों का कत्ल, चकिया में नस्सन हत्याकांड, चांद बाबा हत्याकांड, कचहरी परिसर में बम से हमला और चकिया में निवास के सामने भाजपा नेता अशरफ हत्याकांड से अतीक अहमद शहर और प्रदेश में सुर्खियों में बने रहे.

खैर, अपराध की दुनिया में नाम कमा चुके खूंखार अतीक अहमद को समझ आ चुका था कि सत्ता की ताकत कितनी अहम होती है. पुलिस से बचना है तो सत्ता का सुरक्षा कवच पहनना जरूरी है. इस के बाद अतीक ने राजनीति का रुख कर लिया.

सन 1989 में उन्होंने पहली बार इलाहाबाद (पश्चिमी) विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में किस्मत आजमाई. नतीजतन चुनाव जीत कर वह विधायक बन गए. विधायक बने अतीक अहमद ने सन 1991 और 1993 का विधानसभा चुनाव भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा और जीत हासिल कर विधायक बन गए.

अपराधी से विधायक बने अतीक अहमद की इलाहाबाद में तूती बोलती थी. समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की नजर दबंग अतीक अहमद पर पड़ी तो उन्होंने सन 1996 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी का टिकट दे कर उन्हें चुनाव लड़ाया. फलस्वरूप अतीक फिर से विधायक चुने गए.

दबंग से बाहुबली बने अतीक अहमद ने सन 1999 में समाजवादी पार्टी से रिश्ता तोड़ कर सोनेलाल पटेल की पार्टी अपना दल का दामन थाम लिया. अतीक अहमद की दबंगई का जलवा देख कर सोनेलाल पटेल ने इलाहाबाद के बजाए उन्हें प्रतापगढ़ से चुनाव मैदान में उतारा. विधानसभा के चुनाव में पहली बार अतीक को हार का मुंह देखना पड़ा. सन 2002 में अपना दल ने उन्हें उन के पुराने चुनावी मैदान से खड़ा किया. यहां से चुनाव जीत कर अतीक फिर से विधायक बन गए.

अतीक अहमद बने मुलायम सिंह के सिपहसालार

सन 2003 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो दल बदलने में माहिर अतीक अहमद ने फिर से मुलायम सिंह यादव का दामन पकड़ लिया. सपा मुखिया ने बाहुबली अतीक अहमद की पुरानी बातों को भुला कर अपने खेमे में पनाह दे दी. सन 2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अतीक अहमद को फूलपुर संसदीय क्षेत्र से टिकट दिया और वह सांसद बन गए.

राजनीति में आने के बाद अतीक अहमद ने खुल्दाबाद में रंगदारी को ले कर कपड़ा व्यवसाई नीटू सरदार की हत्या करा कर क्षेत्र में दहशत फैला दी. नीटू सरदार हत्याकांड को भले ही 15 साल बीत गए हैं, लेकिन लोगों के जहन में आज भी उस की टीस है. विधायक अतीक अहमद ने रंगदारी को ले कर हुए विवाद में नीटू सरदार की गोलियों से छलनी कर के दिनदहाड़े हत्या करा दी थी.

इस हत्या में तब के विधायक रहे बाहुबली अतीक अहमद सहित 7 लोग आरोपी बनाए गए थे, जिस में अतीक के अलावा मोहम्मद जाकिर, मोहम्मद अहमद फहीम, मोहम्मद कैफ, नरेंद्र सिंह, शेरू उर्फ शिराज और अशरफ शामिल थे. बाद के दिनों में शेरू उर्फ शिराज की मौत हो जाने के कारण उस पर से मुकदमा समाप्त कर दिया गया था और अशरफ के गैरहाजिर रहने के कारण उस की केस फाइल अलग कर दी गई थी.

लंबे समय तक विशेष अदालत में चले इस मुकदमे में विशेष जज पवन कुमार तिवारी ने पूर्व सांसद अतीक अहमद सहित पांचों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया. उन्होंने 16 दिसंबर, 2018 को यह फैसला खान फरहत, खान शौकत, एडवोकेट राधेश्याम पांडेय और शासकीय अधिवक्ता के तर्कों को सुनने के बाद दिया था.

कोर्ट ने साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद कहा कि इस मामले की कडि़यां पूरी तरह जुड़ नहीं पाईं, जिस से अपराध साबित होता है. बचावपक्ष के तर्क अभियोजन पक्ष के साक्ष्य के परिप्रेक्ष्य में आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सके.

हत्या एवं आपराधिक साजिश रचने के आरोप को संदेह से परे साबित करने में अभियोजन पक्ष असफल रहा है. न्यायहित की चिंतन की स्याही और चेतना की लेखनी का निष्कर्ष स्पष्ट व साफ है कि दंडित किया जाना न्यायहित में नहीं है, इसलिए सभी आरोपियों को बरी किया जाता है.

आरोपियों के बरी किए जाने का मुख्य आधार पुलिस द्वारा विवेचना के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्यों को कोर्ट में साबित नहीं कर पाना था, जो साक्ष्य प्रस्तुत हुए, उन से मुकदमे की पूरी कडि़यां जुड़ नहीं पाई थीं.

मुकदमे के वादी रहे नीटू के पिता की मौत 2004 में होने के कारण उन का कोर्ट में बयान दर्ज नहीं हो सका. नीटू के पिता ने नामजद आरोपी जोगेंद्र सिंह को बनाया था. लेकिन बाहुबली अतीक के दबाव में आ कर नामजदगी गलत बता कर पुलिस ने दूसरे को आरोपी बना दिया था. और तो और बाहुबली की दहशत का आलम यह था कि जितने भी गवाह पेश हुए, किसी ने भी घटना का समर्थन नहीं किया.

मृतक नीटू सरदार की पत्नी जितेंद्र कौर भी अपने बयान से पलट गई. मृतक की मां परमदीप कौर ने भी इसी तरह का बयान दिया. नीटू के भाई अरविंद सिंह ने भी घटना का समर्थन नहीं किया. इस का सीधा लाभ आरोपियों को मिला.

खैर, 2004 के आम चुनाव में फूलपुर से सपा के टिकट पर अतीक अहमद सांसद बन गए थे. उन के सांसद बनने पर इलाहाबाद (पश्चिम) विधानसभा सीट खाली हो गई थी. इस सीट पर उपचुनाव हुआ. सपा ने सांसद अतीक अहमद के छोटे भाई अशरफ को टिकट दिया था, वहीं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने कभी सांसद अतीक का दाहिना हाथ कहे जाने वाले राजू पाल को चुनावी मैदान में उतार दिया.

राजू पाल की हत्या

राजू पाल ने बाहुबली के दुलारे छोटे भाई अशरफ अहमद को हरा कर चुनाव जीत लिया. राजू पाल की जीत से सांसद अतीक अहमद खुश नहीं थे, क्योंकि उन के अपने ही प्यादे से उन्हें करारी शिकस्त मिली थी. इस शिकस्त को वह बरदाश्त नहीं कर पाए और उसे रास्ते से हटाने की खतरनाक साजिश रच डाली.

उपचुनाव में जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने राजू पाल की कुछ महीने बाद ही 25 फरवरी, 2005 को दोपहर 3 बजे दिनदहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी गई. राजू पाल एसआरएन अस्पताल स्थित पोस्टमार्टम हाउस से अपने समर्थकों के साथ 2 गाडि़यों में धूमनगंज के नीवां स्थित अपने घर लौट रहे थे, तभी सुलेमसराय में जीटी रोड पर अमितदीप मोटर्स के पास उन की गाड़ी को घेर कर गोलियों की बौछार कर दी गई थी.

उस वक्त विधायक राजू पाल खुद क्वालिस कार की ड्राइविंग सीट पर थे. उन के बगल में उन के दोस्त की पत्नी रुखसाना बैठी थी, जो उन्हें चौफटका के पास मिली थी. इसी गाड़ी में संदीप यादव और देवीलाल भी सवार थे. पीछे स्कौर्पियो में ड्राइवर महेंद्र पटेल और ओमप्रकाश तथा नीवां के सैफ समेत 4 लोग और थे. दोनों गाडि़यों में एकएक शस्त्रधारी सिपाही भी था.

राजू पाल ने सांसद अतीक अहमद से अपनी जान को खतरा बताया था, इसीलिए उन की सुरक्षा में सिपाही तैनात कर दिए गए थे. कई गोलियां लगने से घायल राजू पाल समेत सभी लोगों को औटो से जीवन ज्योति अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. इस शूटआउट में संदीप यादव और देवीलाल भी मारे गए थे.

घटना की सूचना पा कर तत्कालीन एसएसपी सुनील गुप्ता, एसपी (सिटी) राजेश कृष्ण और थानाप्रभारी (धूमनगंज) परशुराम सिंह मौके पर पहुंच गए थे. पुलिस ने राजू पाल का शव पोस्टमार्टम हाउस भेजा. लेकिन उन के समर्थक उन का शव वहां से उठा कर ले गए और सुलेमसराय में चक्काजाम कर दिया.

बसपा विधायक की हत्या से पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी. विधायक राजू पाल की नवविवाहिता पत्नी पूजा पाल ने धूमनगंज थाने में सपा सांसद अतीक अहमद, उन के छोटे भाई अशरफ, करीबियों फरहान, आबिद, रंजीत पाल, गुफरान समेत 9 लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 147, 148, 149, 307, 302, 120बी, 506 और 7 सीएल ऐक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. 9 दिन पहले ही राजू पाल ने पूजा से प्रेम विवाह किया था. अभी पूजा के हाथों की मेहंदी भी फीकी नहीं पड़ी थी.

बसपा विधायक राजू पाल की हत्या में नामजद आरोपी होने के बावजूद अतीक अहमद सांसद बने रहे. इस की वजह से चौतरफा आलोचनाओं का शिकार बनने के बाद मुलायम सिंह ने दिसंबर 2007 में सांसद अतीक अहमद को पार्टी से बाहर कर दिया.

मायावती ने अतीक को दिखाई अपनी हनक

अतीक अहमद ने राजू पाल हत्याकांड के गवाहों को भी डरानेधमकाने की कोशिश की. लेकिन मुलायम सिंह के सत्ता से बाहर हो जाने और मायावती के मुख्यमंत्री बन जाने की वजह से कामयाब नहीं हो सके. इस हत्याकांड में सीधे तौर पर सांसद अतीक अहमद और उन के भाई अशरफ को आरोपी बनाया गया था.

मुख्यमंत्री मायावती की हनक से अतीक अहमद के हौसले पस्त होने लगे थे. उन के खिलाफ एक के बाद एक मुकदमे दर्ज हो रहे थे. इसी दौरान बाहुबली अतीक अहमद भूमिगत हो गए.

बाहुबली सांसद अतीक के फरार होने के बाद न्यायालय के आदेश पर उन के घर, कार्यालय सहित 5 स्थानों की संपत्ति कुर्क की जा चुकी थी और 5 मामलों में उन की संपत्ति कुर्क करने के आदेश दिए गए थे. फरार अतीक अहमद की गिरफ्तारी पर पुलिस ने 20 हजार रुपए का ईनाम रख दिया था.

ईनामी सांसद की गिरफ्तारी के लिए पूरे देश में अलर्ट जारी किया गया था. इस के 6 महीने बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें पीतमपुरा के एक अपार्टमेंट से गिरफ्तार कर लिया था. उस वक्त अतीक ने कहा था कि उन्हें मुख्यमंत्री मायावती से जान का खतरा है, इसलिए शहर छोड़ कर वह फरार हो गए थे.

सांसद अतीक अहमद की उलटी गिनती शुरू हो गई थी. पुलिस और विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने अतीक अहमद की एक खास परियोजना अलीना सिटी को अवैध घोषित करते हुए उस का निर्माण ध्वस्त कर दिया था.

औपरेशन अतीक के तहत ही 5 जुलाई, 2007 को राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल ने अतीक के खिलाफ धूमनगंज थाने में अपहरण और जबरन बयान दिलाने का मुकदमा दर्ज करा दिया. दरअसल, सांसद अतीक अहमद ने राजू पाल कांड में उमेश पाल को गवाही देने से साफ मना कर दिया था.

ऐसा न करने पर इस का बुरा अंजाम भुगतने की धमकी भी दी थी. इसी के तहत उमेश पाल ने अतीक सहित 5 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था. इस के 4 अन्य गवाहों की ओर से भी उन के खिलाफ मामले दर्ज कराए गए थे.

सन 2013 में जब समाजवादी पार्टी की सरकार आई तो एक बार फिर अतीक साइकिल पर सवार हो गए. फिलहाल वह जमानत पर बाहर चल रहे थे. उन के छोटे भाई अशरफ भी जमानत पर बाहर थे और और अपना कारोबार कर रहे थे.

बाहुबली पूर्व सांसद के आतंक की दास्तान अभी खत्म नहीं हुई थी. अपराध के दस्तावेजों में एक और खूनी इबारत लिखे जाने की तैयारी चल रही थी. दहशत भरी यह कहानी मरियाडीह के दोहरे हत्याकांड के नाम से मशहूर हुई, जिसे सोच कर लोग आज भी दहशत में आ जाते हैं. यह लोमहर्षक घटना 25 सितंबर, 2015 को बकरीद के दिन घटी थी. उस दिन मरियाडीह निवासी आबिद प्रधान के घर जोशोखरोश से त्यौहार की खुशियां मनाई जा रही थीं.

रात के समय आबिद प्रधान का ड्राइवर सुरजीत उस की चचेरी बहन अल्कमा को गाड़ी से घर छोड़ने जा रहा था. वह एक दावत में शरीक होने के बाद लौट रही थी. अल्कमा बला की खूबसूरत थी. अपनी खूबसूरती पर उसे नाज था. वह ड्राइवर सुरजीत से जल्द घर पहुंचने को कह रही थी. अंधेरी रात की वजह से सुरजीत भी जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था. अभी वे घर के पास ही पहुंचे थे कि उन्हें नकाबपोश बंदूकधारियों ने चारों तरफ से घेर कर उन पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी.

बंदूकधारियों ने आबिद की चचेरी बहन अल्कमा और ड्राइवर को गोलियों से छलनी कर दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता चला कि अल्कमा को 17 और सुरजीत को 8 गोलियां मारी गई थीं.

मृतका के चचेरे भाई आबिद प्रधान ने इस केस में 7 लोगों उमरी के साबिर, वसी अहमद, मकसूद अहमद, बेली गांव के कम्मू, जाबिर मीरापट्टी के तौसीफ और इंतेखाब आलम के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कराया. इस में अल्कमा के सगे भाइयों बेली निवासी कम्मू और जाबिर को भी आरोपी बनाया गया था.

हत्याकांड की वजह प्रेम संबंध बताई गई थी. दरअसल, धूमनगंज के बेली निवासी अल्कमा एक लड़के से प्रेम करती थी. धीरेधीरे यह मामला पूरे गांव में फैल गया था. अल्कमा के भाइयों कम्मू और जाबिर को बहन के प्रेम संबंधों की जानकारी हुई तो वे इतना नाराज हुए कि बहन को प्रेमी से दूर रहने के लिए कह दिया.

लेकिन अल्कमा प्रेमी से चोरीछिपे मिलती रही. बहन के इश्किया मिजाज से समाज बिरादरी में दोनों की हंसी उड़ाई जा रही थी.

आबिद प्रधान ने नामजद रिपोर्ट जरूर लिखा दी थी, लेकिन वारदात के बाद से ही शक जताया जा रहा था कि इस हत्याकांड में खुद आबिद प्रधान का हाथ है. मामला प्रेम संबंध नहीं बल्कि कुछ और ही था.

आबिद प्रधान के सिर पर बाहुबली सांसद अतीक अहमद का हाथ था, इसलिए पुलिस उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी. उस के प्रभाव से पुलिस ने यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया.

उधर आबिद प्रधान ने अल्कमा के दोनों भाइयों कम्मू और जाबिर को आरोपी बनवा कर जिन 7 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी, वे सभी आरोपी फरार हो गए थे. तत्कालीन एसएसपी ने सभी आरोपियों पर 5-5 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया था.

जांच अधिकारी ने अपनी विवेचना में सातों आरोपियों, जिन पर ईनाम घोषित किया गया था, को विवेचना में क्लीनचिट दे दी और कहा कि नामजद सातों आरोपियों का घटना से कोई लेनादेना नहीं है. इस के बाद पुलिस ने केस फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी.

इस सनसनीखेज वारदात के करीब डेढ़ साल बाद आनंद कुलकर्णी ने इलाहाबाद के एसएसपी का पद संभाला. पद संभालने के बाद उन्होंने सभी थानों के अनसुलझे केसों की समीक्षा की तो सनसनीखेज मरियाडीह दोहरे हत्याकांड की फाइल भी उन के सामने आई.

उन्होंने फाइल गौर से देखी तो पाया कि न तो घटना का सही तरीके से खुलासा हुआ था और न ही आरोपी पकड़ गए थे. एसएसपी कुलकर्णी ने इस केस की समीक्षा की और सीओ (सिविल लाइंस) श्रीशचंद्र को इस केस की जांच सौंपी. सीओ श्रीशचंद्र इंसपेक्टर (धूमनगंज) अरुण त्यागी के साथ इस दोहरे हत्याकांड की जांच में जुट गए.

एसएसपी आनंद कुलकर्णी की जांच से सामने आई सच्चाई

उन्होंने वारदात के बाद पहली बार मरियाडीह गांव जा कर लोगों के बयान दर्ज किए. पुलिस को कई ऐसे प्रत्यक्षदर्शी मिले, जिन्होंने सरेआम गोली मारने वाले शूटरों को देखा था. उन के बयान और काल डिटेल्स की मदद से पुलिस ने मरियाडीह दोहरे हत्याकांड का खुलासा कर दिया. उन्होंने इस केस में बाहुबली पूर्व सांसद अतीक अहमद के साथ 15 लोगों को आरोपी बनाया. इस में पूर्व विधायक अशरफ, मोहम्मद आबिद प्रधान, फरहान, आबिद के भाई अकबर, जावेद, माजिद, अबूबकर, शेरू, फैजल, ऐजाज, आसिफ, जुल्फिकार उर्फ तोता, पप्पू उर्फ इम्तियाज और मुन्ना को आरोपी बनाया.

मरियाडीह दोहरे हत्याकांड में अतीक अहमद के कहने पर मुख्य भूमिका मोहम्मद आबिद प्रधान और उस के छोटे भाई मोहम्मद अकबर ने निभाई थी.

पुलिस के शक की सुई जब दोनों भाइयों पर जा कर टिकी तो वे फरार हो गए. पुलिस ने उन्हें वांछित बनाया. एसएसपी ने मोहम्मद आबिद प्रधान पर 20 हजार और उस के भाई अकबर पर 5 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया था. 27 अगस्त, 2017 को पुलिस ने मरियाडीह से फरार दोनों भाइयों मोहम्मद आबिद प्रधान और मोहम्मद अकबर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

जांच में इस कहानी के सूत्रधार पूर्व सांसद अतीक अहमद, उन के छोटे भाई अशरफ और मोहम्मद आबिद प्रधान का नाम सामने आया. दरअसल, कम्मू और जाबिर विधानसभा का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे. बाहुबली अतीक और उस के गैंग के जुल्मों से जनता त्रस्त हो चुकी थी.

जनता पश्चिमी इलाहाबाद से एक साफसुथरी छवि वाले ऐसे इंसान को विधायक चुनना चाहती थी, जो उस के सुखदुख में साथ खड़ा हो सके. जरूरत पड़ने पर उस के लिए 2 कदम साथ चल सके. इस के लिए बेली के कम्मू और जाबिर लोगों को बेहतर लगे. दोनों भाई आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए थे. कम्मू और जाबिर बाहुबली को टक्कर के लिए पर्याप्त थे.

कम्मू और जाबिर की क्षेत्र में लोकप्रियता बढ़ रही थी. उन की लोकप्रियता को अतीक गैंग स्वीकार नहीं कर पा रहा था. पूर्व सांसद अतीक अहमद और अशरफ ने उन्हें समझाया कि चुनाव में मत उतरो, जितने पैसे चाहो ले लो. लेकिन बात नहीं बनी. पूर्व सांसद अतीक अहमद कम्मू और जाबिर की चुनावी तैयारी को ले कर खफा थे.

फरमान का पालन न करने से अतीक अहमद का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा था. मोहम्मद आबिद प्रधान, बाहुबली अतीक का खासमखास था. आबिद प्रधान चचेरी बहन अल्कमा के प्रेम संबंध को ले कर नाखुश था, क्योंकि बिरादरी में बदनामी हो रही थी. अपने आका अतीक के रास्ते का रोड़ा बने कम्मू और जाबिर को आबिद इस तरह रास्ते से हटाना चाहता था, जिस से उस के आका पर किसी को शक भी न हो और दोनों भाई रास्ते से भी हट जाएं.

अपनी ताकत और रुतबे से फंसवा दिया भाइयों को

फिर क्या था. बाहुबली अतीक अहमद पूर्व विधायक अशरफ और मोहम्मद आबिद प्रधान ने मिल कर एक खतरनाक साजिश रच डाली. साजिश कम्मू और जाबिर को शिकार बनाने की नहीं थी, बल्कि बहन अल्कमा को शिकार बनाने की थी. अल्कमा को टारगेट इसलिए बनाया गया कि उस के प्रेम संबंधों को ले कर गांव में बदनामी हो रही थी.

कम्मू और जाबिर बहन की करतूत से परेशान थे, यह भी आबिद जानता था. आबिद इसी बात का फायदा उठाना चाहता था ताकि लोगों को यही लगे कि बदनामी से बचने के लिए कम्मू और जाबिर ने मिल कर अल्मका को मौत के घाट उतार दिया है. पुलिस का सारा शक कम्मू और जाबिर पर चला जाएगा. बहन के कत्ल में दोनों भाई जेल चले जाएंगे और उन के विधायक बनने का सपना धरा का धरा रह जाएगा.

योजना बन गई थी, बस उसे अंजाम देना शेष था. बकरीद के दिन अल्कमा की हत्या की तारीख तय की गई. 25 सितंबर, 2015 को अल्कमा एक रिश्तेदार की पार्टी से कार से अपने घर लौट रही थी. अतीक अहमद के करीब 6-7 बंदूकधारी गुर्गे मरियाडीह गांव में डेरा डाले उस के आने का इंतजार कर रहे थे. जैसे ही अल्कमा की कार मरियाडीह गांव के करीब पहुंची, पहले से घात लगाए बैठे बंदूकधारियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जिस से अल्कमा के साथ ड्राइवर सुरजीत को भी मार दिया गया ताकि वह कोर्ट में गवाही न दे सके.

त्यौहार के दिन इस सनसनीखेज घटना से इलाहाबाद थर्रा उठा था. अतीक ने जो सोचा, उसे पूरा कर दिया था. पुलिस को गुमराह करते हुए अल्कमा के चचेरे भाई मोहम्मद आबिद प्रधान ने कम्मू और जाबिर सहित 7 को आरोपी बना कर थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया था.

किसी हद तक बाहुबली अतीक और उस के साथी अपने मंसूबों में कामयाब हो गए थे. लेकिन ईमानदार एसएसपी आनंद कुलकर्णी ने बाहुबली के मंसूबों पर पारी फेर दिया. उन की सूझबूझ से दोहरे हत्याकांड के सभी सही आरोपी गिरफ्त में आ गए. पूर्व विधायक अशरफ को छोड़ कर सभी आरोपी जेल में बंद हैं.

दोहरे हत्याकांड में पुलिस ने पूर्व सांसद अतीक अहमद समेत 15 आरोपियों पूर्व विधायक अशरफ, मोहम्मद आबिद प्रधान, फरहान, मोहम्मद अकबर, जावेद, माजिद, अबूबकर, शेरू, फैसल, एजाज, आसिफ, जुल्फिकार उर्फ तोता, पप्पू उर्फ इत्मियाज और मुन्ना के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल कर दिया.

अशरफ अभी फरार है. एसएसपी आनंद कुलकर्णी ने फरार अशरफ पर ढाई लाख रुपए का ईनाम घोषित करने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा था, लेकिन इस प्रस्ताव को अभी तक स्वीकृति नहीं मिली.

मोहित जायसवाल को जेल ले जाने की हकीकत

बहरहाल, कृष्णानगर थाने के इंसपेक्टर यशकांत सिंह मोहित जायसवाल कांड की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद टीम के साथ काररवाई में जुट गए.

पुलिस टीम ने गोमतीनगर के सिल्वरलाइन अपार्टमेंट से सुलतानपुर निवासी गुलाम इमामुद्दीन और प्रतापगढ़ निवासी इरफान को गिरफ्तार कर लिया. उन के पास से मोहित जायसवाल से लूटी गई एसयूवी गाड़ी भी बरामद हो गई. दूसरी ओर पुलिस टीमें बना कर अतीक के बेटे उमर अहमद, गुलफाम और फारुख की तलाश में जुट गई. उन की तलाश में एक टीम ने इलाहाबाद में डेरा डाल लिया.

पुलिस ने रियल एस्टेट कारोबारी मोहित जायसवाल और बाहुबली अतीक के बीच के संबंधों की पड़ताल की तो पता चला कि मोहित जायसवाल और अतीक अहमद पूर्व परिचित थे. दोनों के बीच कारोबारी रिश्ते थे. उन के बीच पैसों को ले कर विवाद चल रहा था.

इसी विवाद की कड़ी ने अपराध को जन्म दिया. बाहुबली अतीक अहमद के इशारे पर उन के गुर्गे मोहित जायसवाल को अगवा कर के देवरिया जेल में बंद अतीक अहमद के पास ले आए. जेल के भीतर अतीक अहमद, उस के बेटे उमर और चारों गुर्गों ने मोहित को बुरी तरह मारापीटा और 45 करोड़ की संपत्ति के स्टांप पेपरों पर उस से जबरन दस्तखत करवा लिए थे.

इधर देवरिया जेल प्रशासन ने भी मोहित के जेल में दाखिल होने की पुष्टि की. पुलिस सूत्रों के अनुसार, मोहित जायसवाल करीब 3 घंटे तक जिला जेल में रहे.

जेल नियमों के अनुसार कोई भी मुलाकाती अधिकतम आधे घंटे तक ही बंदी या कैदी से मिल सकता है. विशेष परिस्थिति में उसे कुछ अतिरिक्त समय के लिए छूट दी जा सकती है, पर अतीक के मामले में सारे नियम ताक पर रख दिए गए थे.

अव्वल तो कई मुलाकातियों की जेल के रजिस्टर में एंट्री तक नहीं की जाती थी और अगर एंट्री हुई भी तो उन के बाहर निकलने की कोई तय सीमा नहीं होती थी. भेंट पूरी होने और पूर्व सांसद की सहमति के बाद ही वह जेल से बाहर आता था.

इस बारे में जेल अधीक्षक दिलीप कुमार पांडेय का कहना था कि निर्धारित समय के बाद मुलाकातियों को बाहर कर दिया जाता है. विशेष परिस्थिति में ही उसे अतिरिक्त समय दिया जाता है. हालांकि वह यह नहीं बता सके कि मोहित जायसवाल के मामले में ऐसी कौन सी परिस्थिति थी, जो उसे 3 घंटे तक अतीक से मिलने की अनुमति दे दी गई थी.

डीएम अमित किशोर के नेतृत्व में गई टीम ने देवरिया जिला कारागार के 26 दिसंबर, 2018 के सीसीटीवी फुटेज खंगाले. इस में कई फुटेज गायब मिले. मुलाकाती रजिस्टर में मोहित जायसवाल और सिद्दीकी का नाम दर्ज मिला, लेकिन फुटेज में अतीक की बैरक की ओर आनेजाने वालों की संख्या अधिक दिख रही थी. मुलाकाती रजिस्टर में मुलाकातियों के जाने और निकलने का टाइम दर्ज नहीं किया गया था.

जेल के कैदी भी रहते थे डरे हुए

सजायाफ्ता कैदियों से भी टीम के सदस्यों ने पूछताछ की, लेकिन किसी ने मुंह नहीं खोला. एडीएम (प्रशासन) राकेश कुमार पटेल ने अपनी रिपोर्ट में सीसीटीवी फुटेज में छेड़छाड़ की बात बताई, जिस पर डीएम अमित किशोर ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज की जांच किसी एक्सपर्ट से कराई जाएगी. वारदात की वजह जेल प्रशासन की उदासीनता है, जिस की रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है.

जांचपड़ताल में यह भी पता चला कि जेल में अतीक अहमद के बंद होने के बाद शहर में अतीक के गुर्गों की आवाजाही बढ़ गई थी. शहर के एक खास मोहल्ले में अतीक का ड्राइवर और करीबी निवास करते थे और फौर्च्युनर गाड़ी से जेल आतेजाते थे.

पुलिस सूत्रों की मानें तो जेल में बंद लोगों की मदद भी अतीक करता था, जिस से उन का समर्थन उसे मिल जाता था. मोहित जायसवाल कांड ने अतीक अहमद की मुसीबत बढ़ा दी थी. इसी के चलते उसे बरेली जेल भेज दिया गया. बताया जा रहा है कि अतीक की वजह से बरेली जेल प्रशासन भी परेशान है. उसे वहां से कहीं और भेजने की तैयारी की जा रही थी.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पुनर्जन्म

‘‘आप को मालूम है मां, दीदी का प्रोमोशन के बाद भी जन कल्याण मंत्रालय से स्थानांतरण क्यों नहीं किया जा रहा, क्योंकि दीदी को व्यक्ति की पहचान है. वे बड़ी आसानी से पहचान लेती हैं कि किस समाजसेवी संस्था के लोग समाज का भला करने वाले हैं और कौन अपना. फिर आप लोग इतनी पारखी नजर वाली दीदी की जिंदगी का फैसला बगैर उन्हें भावी वर से मिलवाए खुद कैसे कर सकती हैं?’’ ऋचा ने तल्ख स्वर से पूछा, ‘‘पहले दीदी के अनुरूप सुव्यवस्थित 2 लोगों को आप ने इसलिए नकार दिया कि वे दुहाजू हैं और अब जब एक कुंआरा मिल रहा है तो आप इसलिए मना कर रही हैं कि उस में जरूर कुछ कमी होगी जो अब तक कुंआरा है. आखिर आप चाहती क्या हैं?’’

‘‘शिखा की भलाई और क्या?’’ मां भी चिढ़े स्वर में बोलीं.

‘‘मगर यह कैसी भलाई है, मां कि बस, वर का विवरण देखते ही आप और यश भैया ऐलान कर दें कि यह शिखा के उपयुक्त नहीं है. आप ने हर तरह से उपयुक्त उस कुंआरे आदमी के बारे में यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि उस की अब तक शादी न करने की क्या वजह है?’’

‘‘शादी के बाद यह कुछ ज्यादा नहीं बोलने लगी है, मां?’’ यश ने व्यंग्य से पूछा.

‘‘कम तो खैर मैं कभी भी नहीं बोलती थी, भैया. बस, शादी के बाद सही बोलने की हिम्मत आ गई है,’’ ऋचा व्यंग्य से मुसकराई.

‘‘बोलने की ही हिम्मत आई है, सोचने की नहीं,’’ यश ने कटाक्ष किया, ‘‘सीधी सी बात है, 35 साल तक कुंआरा रहने वाला आदमी दिलजला होगा…’’

‘‘फिर तो वह दीदी के लिए सर्वथा उपयुक्त है,’’ ऋचा ने बात काटी, ‘‘क्योंकि दीदी भी अपने बैचमेट सूरज के साथ दिल जला कर मसूरी की सर्द वादियों में अपने प्रणय की आग लगा चुकी हैं.’’

‘‘तुम तो शादी के बाद बेशर्म भी हो गई हो ऋचा, कैसे अपने परिवार और कैरियर के प्रति संप्रीत दीदी पर इतना घिनौना आरोप लगा रही हो?’’ यश की पत्नी शशि ने पूछा.

‘‘यह आरोप नहीं हकीकत है, भाभी. दीदी की सगाई उन के बैचमेट सूरज से होने वाली थी लेकिन उस से एक सप्ताह पहले ही पापा को हार्ट अटैक पड़ गया. पापा जब आईसीयू में थे तो मैं ने दीदी को फोन पर कहते सुना था, ‘पापा अगर बच भी गए तो सामान्य जीवन नहीं जी पाएंगे, इसलिए बड़ी और कमाऊ होने के नाते परिवार के भरणपोषण की जिम्मेदारी मेरी है. सो, जब तक यश आईएएस प्रतियोगिता में उत्तीर्ण न हो जाए और ऋचा डाक्टर न बन जाए, मैं शादी नहीं कर सकती, सूरज. इस सब में कई साल लग जाएंगे, सो बेहतर होगा कि तुम मुझे भूल जाओ.’

‘‘उस के बाद दीदी ने दृढ़ता से शादी करने से मना कर दिया, रिश्तेदारों ने भी उन का साथ दिया क्योंकि अपाहिज पापा की तीमारदारी का खर्च तो उन के परिवार का कमाऊ सदस्य ही उठा सकता था और वह सिर्फ दीदी थीं. पापा ने अंतिम सांस लेने से पहले दीदी से वचन लिया था कि यश भैया और मेरे व्यवस्थित होने के बाद वे अपनी शादी के लिए मना नहीं करेंगी. आप को पता ही है कि मैं ने डब्लूएचओ की स्कालरशिप छोड़ कर अरुण से शादी क्यों की, ताकि दीदी पापा की अंतिम इच्छा पूरी कर सकें.’’

‘‘हमारे लिए उस के पापा की अंतिम इच्छा से बढ़ कर शिखा की अपनी इच्छा और भलाई जरूरी है,’’ मां ने तटस्थता से कहा.

‘‘पापा की अंतिम इच्छा पूरी करना दीदी की इच्छाओं में से एक है,’’ ऋचा बोली, ‘‘रहा भलाई का सवाल तो आप लोग केवल उपयुक्त घरवर सुझाइए, उस के अपने अनुरूप या अनुकूल होने का फैसला दीदी को करने दीजिए.’’

‘‘और अगर हम ने ऐसा नहीं किया न मां तो यह दीदी की परम हितैषिणी स्वयं दीदी के लिए घरवर ढूंढ़ने निकल पड़ेगी,’’ यश व्यंग्य से हंसा.

‘‘बिलकुल सही समझा आप ने, भैया. इस से पहले कि मैं और अरुण अमेरिका जाएं मैं चाहूंगी कि दीदी का भी अपना घरसंसार हो. आज मैं जो हूं दीदी की मेहनत और त्याग के कारण. सच कहिए, अगर दीदी न होतीं तो आप लोग मेरी डाक्टरी की पढ़ाई का खर्च उठा सकते थे?’’ ऋचा ने तल्ख स्वर में पूछा, ‘‘आप के लिए तो पापा की मृत्यु मेहनत से बचने का बहाना बन गई भैया. बगैर यह परवा किए कि पापा का सपना आप को आईएएस अधिकारी बनाना था, आप ने उन की जगह अनुकंपा में मिल रही बैंक की नौकरी ले ली क्योंकि आप पढ़ना नहीं चाहते थे. मां भी आप से मेहनत करवाना नहीं चाहतीं. और फिर पापा के समय की आनबान बनाए रखने को आईएएस अफसर दीदी तो थीं ही. नहीं तो आप के बजाय यह नौकरी मां भी कर सकती थीं, आप पढ़ाई और दीदी शादी.’’

‘‘ये गड़े मुर्दे उखाड़ कर तू कहना क्या चाहती है?’’ मां ने झल्लाए स्वर में पूछा.

‘‘यही कि पुत्रमोह में दीदी के साथ अब और अन्याय मत कीजिए. भइया की गृहस्थी चलाने के बजाय उन्हें अब अपना घरसंसार बसाने दीजिए. फिलहाल उस डाक्टर का विवरण मुझे दे दीजिए. मैं उस के बारे में पता लगाती हूं,’’ ऋचा ने उठते हुए कहा.

‘‘वह हम लगा लेंगे मगर आप चली कहां, अभी बैठो न,’’ शशि ने आग्रह किया.

‘‘अस्पताल जाने का समय हो गया है, भाभी,’’ कह कर ऋचा चल पड़ी. मां और यश ने रोका भी नहीं जबकि मां को मालूम था कि आज उस की छुट्टी है.

ऋचा सीधे शिखा के आफिस गई.

‘‘आप से कुछ जरूरी बात करनी है, दीदी. अगर आप अभी व्यस्त हैं तो मैं इंतजार कर लेती हूं,’’ उस ने बगैर किसी भूमिका के कहा.

‘‘अभी मैं एक मीटिंग में जा रही हूं, घंटे भर तक तो वह चलेगी ही. तू ऐसा कर, घर चली जा. मैं मीटिंग खत्म होते ही आ आऊंगी.’’

‘‘घर से तो आ ही रही हूं. आप ऐसा करिए मेरे घर आ जाइए, अरुण की रात 10 बजे तक ड्यूटी है, वह जब तक आएंगे हमारी बात खत्म हो जाएगी.’’

‘‘ऐसी क्या बात है ऋचा, जो मां और अरुण के सामने नहीं हो सकती?’’

‘‘बहनों की बात बहनों में ही रहने दो न दीदी.’’

‘‘अच्छी बात है,’’ शिखा मुसकराई, ‘‘मीटिंग खत्म होते ही तेरे घर पहुंचती हूं.’’

उसे लगा कि ऋचा अमेरिका जाने से पहले कुछ खास खरीदने के लिए उस की सिफारिश चाहती होगी. मीटिंग खत्म होते ही वह ऋचा के घर आ गई.

‘‘अब बता, क्या बात है?’’ शिखा ने चाय पीने के बाद पूछा.

‘‘मैं चाहती हूं दीदी कि मेरे और अरुण के अमेरिका जाने से पहले आप पापा को दिया हुआ अपना वचन कि जिम्मेदारियां पूरी होते ही आप शादी कर लेंगी, पूरा कर लें,’’ ऋचा ने बगैर किसी भूमिका के कहा, ‘‘वैसे आप की जिम्मेदारी तो मेरे डाक्टर बनते ही पूरी हो गई थी फिर भी आप मेरी शादी करवाना चाहती थीं, सो मैं ने वह भी कर ली…’’

‘‘लेकिन मेरी जिम्मेदारियां तो खत्म नहीं हुईं, बहन,’’ शिखा ने बात काटी, ‘‘यश अपना परिवार ही नहीं संभाल पाता है तो मां को कैसे संभालेगा?’’

‘‘यानी न कभी जिम्मेदारियां पूरी होंगी और न पापा की अंतिम इच्छा. जीने वालों के लिए ही नहीं दिवंगत आत्मा के प्रति भी आप का कुछ कर्तव्य है, दीदी.’’

शिखा ने एक उसांस ली.

‘‘मैं ने यह वचन पापा को ही नहीं सूरज को भी दिया था ऋचा, और जो उस ने मेरे लिए किया है उस के बाद उसे दिया हुआ वचन पूरा करना भी मेरा फर्ज बनता है लेकिन महज वचन के कारण जिम्मेदारियों से मुंह तो नहीं मोड़ सकती.’’

‘‘मां के लिए पापा की पेंशन काफी है, दीदी, और जरूरत पड़ने पर पैसे से मैं और आप दोनों ही उन की मदद कर सकते हैं, उन्हें अपने पास रख सकते हैं. यश का परिवार उस की निजी समस्या है, मेहनत करें तो दोनों मियांबीवी अच्छाखासा कमा सकते हैं, उन के लिए आप को परेशान होने की जरूरत नहीं है,’’ ऋचा ने आवेश से कहा और फिर हिचकते हुए पूछा, ‘‘माफ करना, दीदी, मगर मुझे याद नहीं आ रहा कि सूरज ने आप के लिए क्या किया?’’

‘‘मुझे रुसवाई से बचाने के लिए सूरज ने मेहनत से मिली आईएएस की नौकरी छोड़ दी क्योंकि हमारे सभी साथियों को हमारी प्रेमकहानी और होने वाली सगाई के बारे में मालूम था. एक ही विभाग में होने के कारण गाहेबगाहे मुलाकात होती और अफवाहें भी उड़तीं, सो मुझे इस सब से बचाने के लिए सूरज नौकरी छोड़ कर जाने कहां चला गया.’’

‘‘आप ने उसे तलाशने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘उस के किएकराए यानी त्याग पर पानी फेरने के लिए?’’

‘‘यह बात भी ठीक है. देखिए दीदी, जब आप वचनबद्ध हुई थीं तब आप की जिम्मेदारी केवल भैया और मेरी पढ़ाई पूरी करवाने तक सीमित थी, लेकिन आप ने हमारी शादियां भी करवा दीं. अब उस के बाद की जिम्मेदारियां आप के वचन की परिधि से बाहर हैं और अब आप का फर्ज केवल अपना वचन निभाना है. बहुत जी लीं दूसरों के लिए और यादों के सहारे, अब अपने लिए जी कर देखिए दीदी, कुछ नए यादगार क्षण संजोने की कोशिश करिए.’’

‘‘कहती तो तू ठीक है…’’

‘‘तो फिर आज से ही इंटरनेट पर अपने मनपसंद जीवनसाथी की तलाश शुरू कर दीजिए. मां तो पुत्रमोह में आप की शादी करवाएंगी नहीं.’’

‘‘यही सब सोच कर तो मैं शादी नहीं करना चाहती, लेकिन तेरा यह कहना भी ठीक है कि पैसे से तो उन लोगों की मदद हमेशा की जा सकती है.’’

‘‘मैं आप को इंटरनेट पर उपलब्ध…’’

‘‘थोड़ा सब्र कर, ऋचा,’’ शिखा ने बात काटी, ‘‘उस से पहले मुझे स्वयं को किसी नितांत अजनबी के साथ जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना होगा और मुझे यह भी मालूम नहीं है कि मेरी उस से क्या अपेक्षाएं होंगी या व्यक्तिगत जीवन में मेरी अपनी मान्यताएं क्या हैं? इन सब के लिए चिंतन की आवश्यकता है.’’

‘‘और उस के लिए एकांत की, जो आप को दफ्तर और घर की जिम्मेदारियों के चलते तो मिलने से रहा. आप लंबी छुट्टी ले कर या तो सुदूर पहाडि़यों में या समुद्रतट पर एकांतवास कीजिए.’’

‘‘सुझाव तो अच्छा है, सोचूंगी.’’

‘‘मगर आज ही रात को,’’ ऋचा ने जिद की.

शिखा ने सोचा जरूर लेकिन अपनी पिछली जिंदगी के बारे में. पापा बैंक अधिकारी थे लेकिन चाहते थे कि उन के बच्चे उन से बढ़ कर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बनें. शिखा का तो प्रथम प्रयास में ही चयन हो गया. ऋचा ने हाईस्कूल में ही बता दिया था कि उस की रुचि जीव विज्ञान में है और वह डाक्टर बनेगी. पापा ने सहर्ष अनुमति दे दी थी. मां के लाड़ले यश का दिल पढ़ाई में नहीं लगता था फिर भी पापा के डर से पढ़ रहा था लेकिन पापा के जाते ही उस ने पढ़ाई छोड़ कर अनुकंपा में मिली बैंक की नौकरी कर ली.

मां ने भी उस का यह कह कर साथ दिया कि वह तेरा हाथ बटाना चाह रहा है शिखा, बैंक की प्रतियोगी परीक्षाएं दे कर तरक्की भी करता रहेगा, लेकिन हाथ बटाने के बजाय यश ने अपना भार भी उस पर डाल दिया था. जहां उस की नियुक्ति होती थी, वहीं यश भी अपना तबादला करवा लेता था आईएएस अफसर बहन का रोब डाल कर. तरक्की पाने की न तो लालसा थी और न ही जरूरत, क्योंकि शिखा को मिलने वाली सब सुविधाओं का उपभोग तो वही करता था.

यश और उस के परिवार की जरूरतों के लिए मां शिखा को उसी स्वर में याद दिलाया करती थीं जिस में वह कभी पापा से घर के बच्चों की जरूरतें पूरी करने को कहती थीं यानी मां के खयाल में यश का परिवार शिखा का उत्तरदायित्व था. शिखा को इस से कुछ एतराज भी नहीं था. उस की अपनी इच्छाएं तो सूरज से बिछुड़ने के साथ ही खत्म हो गई थीं. उसे यश या उस के परिवार से कोई शिकायत भी नहीं थी, बस, बीचबीच में पापा के अंतिम शब्द, ‘जब ये दोनों अपने घरपरिवार में व्यवस्थित हो जाएंगे तो तू अकेली क्या करेगी, बेटी? जिन सपनों की तू ने आज आहुति दी है उन्हें पुनर्जीवित कर के फिर जीएगी तो मेरी भटकती आत्मा को शांति मिल जाएगी. जिस तरह तू मेरी जिम्मेदारियां निभाने को कटिबद्ध है, उसी तरह मेरी अंतिम इच्छा पूरी करने को भी रहना,’ याद आ कर कचोट जाते थे.

ऐसा ही कुछ सूरज ने भी कहा था, ‘जिस तरह अपने परिवार के प्रति तुम्हारा फर्ज तुम्हें शादी करने से रोक रहा है उसी तरह अपने मातापिता की इच्छा के विरुद्ध कुछ साल तक तुम्हारी जिम्मेदारियां पूरी होने के इंतजार में शादी न करने के फैसले पर मैं चाह कर भी अडिग नहीं रह पा रहा. कैसे जी पाऊंगा किसी और के साथ, नहीं जानता, लेकिन फिलहाल दफ्तर और घर के दायित्व निभाने में मेरा और तुम्हारा समय कट ही जाया करेगा लेकिन जब तुम दायित्व मुक्त हो जाओगी तब क्या करोगी, शिखा? मैं यह सोचसोच कर विह्वल हो जाया करूंगा कि तुम अकेली क्या कर रही होगी.’

‘फुरसत से तुम्हारी यादों के सहारे जी रही हूंगी और क्या?’

‘जीने के लिए यादों के सहारे के अलावा किसी अपने के सहारे की भी जरूरत होती है. मैं तो खैर सहारे के लिए नहीं मांबाप की जिद से मजबूर हो कर शादी कर रहा हूं लेकिन तुम जीवन की सांध्यवेला में अकेली मत रहना. मेरे सुकून के लिए शादी कर लेना.’

यश के परिवार के रहते अकेली होने का तो सवाल ही नहीं था लेकिन घर में अपनेपन की ऊष्मा ऋचा के जाते ही खत्म हो गई थी और रह गया था फरमाइशों और शिकायतों का अंतहीन सिलसिला. शिकायत करते हुए यश और मां को अपनी फरमाइश की तारीख तो याद रहती थी लेकिन यह पूछना नहीं कि शिखा किस वजह से वह काम नहीं कर सकी.

वैसे भी लगातार काम करतेकरते वह काफी थक चुकी थी और छुट्टियां भी जमा थीं सो उस ने सोचा कि कुछ दिन को कहीं घूम ही आएं. उस की सचिव माधवी मेनन जबतब केरल की तारीफ करती रहती थी, ‘तनमन को शांति और स्फूर्ति से भरना हो तो कभी भी केरल जाने पर ऐसा लगेगा कि आप का पुनर्जन्म हो गया है.’

अगले रोज उस ने माधवी से पूछा कि वह काम की थकान उतारने को कुछ दिन शोरशराबे से दूर प्रकृति के किसी सुरम्य स्थान पर रहना चाहती है, सो कहां जाए?

‘‘वैसे तो केरल में ऐसी जगहों की भरमार है,’’ माधवी ने उत्साह से बताया, ‘‘लेकिन आप को त्रिचूर का अथरियापल्ली वाटरफाल बहुत पसंद आएगा. वहां वन विभाग का सभी सुखसुविधाओं से युक्त गेस्ट हाउस भी है. तिरुअनंतपुरम के अपने आफिस वाले त्रिचूर के जिलाध्यक्ष से कह कर आप के रहने का प्रबंध करवा देंगे.’’

‘‘लेकिन वहां तक जाना कैसे होगा?’’

‘‘तिरुअनंतपुरम तक प्लेन से, उस के बाद आप को एअरपोर्ट से अथरियापल्ली तक पहुंचाने की जिम्मेदारी अपने आफिस वालों की होगी. आप अपने जाने की तारीख तय करिए, बाकी सब व्यवस्था मुझ पर छोड़ दीजिए.’’

लंच ब्रेक में ऋचा का फोन आया.

‘‘हां भई, छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया है केरल जाने को,’’ शिखा ने उसे सब बताया.

‘‘लेकिन घर वालों के लिए आप छुट्टी पर नहीं टूर पर जा रही हैं दीदी, वरना सभी आप के साथ केरल घूमने चल पड़ेंगे,’’ ऋचा ने आगाह किया.

ऋचा का कहना ठीक था. सब तैयारी हो जाने से एक रोज पहले उस ने सब को बताया कि वह केरल जा रही है.

‘‘केरल घूमने तो हम सब भी चलेंगे,’’ शशि ने कहा.

‘‘मैं केरल प्लेन से जा रही हूं सरकारी गाड़ी से नहीं, जिस में बैठ कर तुम सब मेरे साथ टूर पर चल पड़ते हो.’’

‘‘हम क्या प्लेन में नहीं बैठ सकते?’’ यश ने पूछा.

‘‘जरूर बैठ सकते हो मगर टिकट ले कर और फिलहाल मेरा तो कल सुबह 9 बजे का टिकट कट चुका है,’’ कह कर शिखा अपने कमरे में चली गई.

अगली सुबह सब के सामने ड्राइवर को कुछ फाइलें पकड़ाते हुए उस ने कहा, ‘‘मुझे एअरपोर्ट छोड़ कर, मेहरा साहब के घर चले जाना, ये 2 फाइलें उन्हें दे देना और ये 2 आफिस में माधवी मेनन को.’’

प्लेन में अपनी बराबर की सीट पर बैठी युवती से यह सुन कर कि वह एक प्रकाशन संस्थान में काम करती है और एक लेखक के पास एक किताब की प्रस्तावना पर विचारविमर्श करने जा रही है, शिखा ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘अपने यहां लेखकों को कब से इतना सम्मान मिलने लगा?’’

‘‘मैडम, आप शायद नहीं जानतीं,’’ युवती खिसिया कर बोली, ‘‘बेस्ट सेलर के लेखक के लिए कुछ भी करना पड़ता है. ये महानुभाव केरल से बाहर आने को तैयार नहीं होते, सो बात करने के लिए हमें ही यहां आना पड़ता है.’’

इस से पहले कि शिखा पूछती कि वे महानुभाव हैं कौन, युवती ने उस का परिचय पूछ लिया और यह जानने पर कि वह आईएएस अधिकारी है और एकांत- वास करने के लिए अथरियापल्ली जा रही है, बड़ी प्रभावित हुई और उस के बारे में अधिक से अधिक पूछने लगी. शिखा ने उसे अपना कार्ड दे दिया.

माधवी का कहना ठीक था. अथरियापल्ली वाटरफाल वैसी ही जगह थी जैसी वह चाहती थी. गेस्ट हाउस में भी हर तरह का आराम था. बगैर अपने बारे में सोचे वह अभी प्रकृति की छटा और निरंतर बदलते रंग निहारने का आनंद ले रही थी कि अगली सुबह ही सूरज को देख कर हैरान रह गई.

‘‘तुम…यहां?’’ वह इतना ही कह सकी.

‘‘हां, मैं,’’ सूरज हंसा, ‘‘वैसे तो कहीं आताजाता नहीं, लेकिन यह जान कर कि तुम यहां हो, तुम से मिलने का लोभ संवरण न कर सका.’’

‘‘लेकिन तुम्हें किस ने बताया कि मैं यहां हूं?’’

‘‘पल्लवी यानी उस युवती ने जो कल तुम्हारे साथ प्लेन में थी,’’ सूरज ने सामने पत्थर पर बैठते हुए कहा, ‘‘असल में मैं उस के प्रकाशन संस्थान के लिए आईएएस प्रतियोगिता के लिए उपयोगी किताबें लिखता हूं. पल्लवी चाहती है कि प्रतियोगिता में सफल होने के बाद सफलता बनाए रखने के लिए क्या करें, इस विषय पर मैं कुछ लिखूं तो मैं ने कहा कि मुझे नौकरी छोड़े कई साल हो चुके हैं और आज के प्रशासन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है तो उस ने तुम्हारे बारे में बताया और कहा कि आप से मिल कर आजकल के हालात के बारे में जानकारी ले लूं. पल्लवी को तो तुम्हारे एकांतवास में खलल न डालने को मना कर दिया लेकिन खुद को आने से न रोक सका. ऐसे हैरानी से क्या देख रही हो, मैं सूरज ही हूं, शिखा.’’

‘‘उस में तो कोई शक नहीं है लेकिन तुम और लेखन. यकीन नहीं होता, सूरज.’’

‘‘यकीन न होने लायक ही तो अब तक मेरी जिंदगी में होता रहा है, शिखा,’’ सूरज उसांस ले कर बोला, ‘‘पुराने परिवेश से कटने के लिए मैं ने तिरुअनंतपुरम यूनिवर्सिटी में प्रवक्ता की नौकरी कर ली थी और वक्त काटने के लिए आईएएस प्रतियोगी परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों को पढ़ाया करता था. उन के सफल होने पर इतने विद्यार्थी आने लगे कि मुझे नौकरी छोड़ कर कोचिंग क्लास खोलनी पड़ी. मेरे एक शिष्य ने मेरे दिए क्लास नोट्स का संकलन कर प्रकाशन करवा दिया, वह बहुत ही लोकप्रिय हुआ और प्रकाशक इस विषय की और किताबों के लिए मेरे पीछे पड़ गए और इस तरह मैं सफल लेखक बन गया. अब तो पढ़ाना भी छोड़ दिया है. बस, लिखता हूं.’’

‘‘लिखने भर से घर का खर्च चल जाता है?’’

‘‘बड़े आराम से. अकेले आदमी का ज्यादा खर्च भी नहीं होता.’’

‘‘यानी तुम ने मातापिता की खुशी की खातिर शादी नहीं की?’’

‘‘शादी करने से मना भी नहीं किया,’’ सूरज हंसा, ‘‘जो लोग मुझे अपना दामाद बनाने के लिए हाथ बांधे पापा के आगेपीछे घूमते थे, वे तो मेरी नौकरी छोड़ते ही बरसात की धूप की तरह गायब हो गए, जो लोग प्रवक्ता को लड़की देने के लिए तैयार थे वे मांपापा की कसौटी पर खरे नहीं उतरे. उन की तलाश अभी भी जारी है लेकिन सुदूर केरल में बसे लेखक को कौन दिल्ली वाला लड़की देगा? और तुम बताओ यह एकांतवास किसलिए? संन्यासवन्यास लेने का इरादा है?’’

शिखा हंस पड़ी, ‘‘असलियत तो इस के विपरीत है, सूरज,’’ और उस ने ऋचा के सुझाव के बारे में विस्तार से बताया.

‘‘दूसरे शब्दों में कहें तो मांपापा की तलाश खत्म हो गई,’’ सूरज हंसा, ‘‘वैसे तो मैं यहां से वापस जाने वाला नहीं था लेकिन तुम्हारे साथ कहीं भी चल सकता हूं.’’

‘‘मैं भी यहां आ सकती हूं, सूरज, लेकिन क्या गुजरे कल को आज बनाना संभव होगा?’’

‘‘अगर तुम मुझे जिलाना और खुद जिंदा होना चाहो तो…’’

शिखा के मोबाइल की घंटी बजी. यश का फोन था.

‘‘दीदी, गुरमेल सिंह जब परसों दोपहर तक गाड़ी ले कर नहीं आया तो मैं ने उस के मोबाइल पर उसे आने के लिए फोन किया, लेकिन उस ने कहा कि वह मेहरा साहब की ड्यूटी में है और उन के कहने पर ही हमारे यहां आ सकता है, सो मैं ने उन से बात करनी चाही. परसों तो मेहरा साहब से बात नहीं हो सकी, वे मीटिंग में थे. कल बड़ी मुश्किल से शाम को मिले तो बोले कि वे इस विषय में कुछ नहीं कह सकते. बेहतर है कि मैं माधवी से बात करूं. माधवी कहती है कि छुट्टी पर गए किसी भी अधिकारी को गाड़ी उस के कार्यभार संभालने वाले अधिकारी को दी जाती है और परिवार के लिए गाड़ी भेजने का नियम तो नहीं है लेकिन शिखा मैडम कहेंगी तो भिजवा देंगे. आप तुरंत माधवी को फोन कीजिए गाड़ी भिजवाने को.’’

‘‘जब परिवार के लिए गाड़ी भेजने का नियम नहीं है तो मैं उस का उल्लंघन करने को कैसे कह सकती हूं?’’ शिखा ने रुखाई से कहा.

‘‘चाहे गाड़ी के बगैर परिवार को कितनी भी परेशानी हो रही हो?’’

‘‘इतनी ही परेशानी है तो खुद ही गाड़ी का इंतजाम कर ले न भाई मेरे…’’

‘‘यह आप को हो क्या गया है दीदी? आप मां से बात कीजिए…’’

मां एकदम बरस पड़ीं, ‘‘यह क्या लापरवाही है, शिखा? हमारे लिए बगैर गाड़ीड्राइवर का इंतजाम किए, टूर का बहाना बना कर तुम छुट्टी मनाने निकल गई हो, शर्म नहीं आती?’’

शिखा तड़प उठी.

‘‘मैं ने कब कहा था मां कि मैं टूर पर जा रही हूं और काम की थकान उतारने को छुट्टी मनाने में शर्म कैसी? अगर गाड़ी के बगैर आप को दिक्कत हो रही है तो यश से कहिए, इंतजाम करे, परिवार के प्रति उस का भी तो कुछ दायित्व है.’’

‘‘यह तुझे क्या हो गया है, शिखा? यश कह रहा है, तू एकदम बदल गई है…’’

‘‘यश ठीक कह रहा है, मां,’’ शिखा ने बात काटी, ‘‘मेरा पुनर्जन्म हो रहा है, उस में आप को कुछ तकलीफ तो झेलनी ही पड़ेगी.’’

और वह सूरज की फैली बांहों में सिमट गई.

आमिर खान की बेटी ने शेयर की बोल्ड तस्वीरें, जरा आप भी देखें

अभी कुछ दिनों पहले ही आमिर खान की बेटी इरा खान ने अपने बचपन की फोटो शेयर की थी, जिसने काफी ज्यादा लोगों का अटेंशन मिला. इरा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव होती हैं और अक्सर कोई ना कोई फोटो शेयर करती रहती हैं. हाल ही में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मस्ती करते हुए उन्होंने बहुत सी तस्वीरें शेयर की हैं. इन तस्वीरों में वो बिकिनी में दिख रही हैं. आइए देखें उनकी हौट तस्वीरें.
ये है इरा के बचपन की तस्वीर, जिसे उन्होंने खुद कुछ दिनों पहले शेयर की थी.

 

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I was cutest when I was 5 😊 . . . #babypictures #cuterasakid #camerasmile #missthatbed

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Does it look like I’m falling over? I was. 📸@smriteep

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🍹 📸@aakarshchandan

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आपको बता दें कि सोशल मीडिया पर इरा की फैन फौलोविंग काफी बड़ी है. वो लाइम लाइट से दूर रहना चाहती हैं पर सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों की वजह से काफी चर्चा में रहती हैं.

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hot pics of ira khan

इरा कभी फिल्मों से नहीं जुड़ना चाहती. आपको बता दें कि इरा आमिर की पहली पत्नी की बेटी हैं. वो 22 साल की हैं. उन्हें घूमना फिरना काफी पसंद है. इसके अलावा उन्हें म्यूजिक का काफी शौक है.

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Love Huji❤

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Hi Danu❤ Thanks for being amazing. You’re the kind of bestfriend you only see people have in movies.

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डाक्टर नहीं जल्लाद

साल 1981 में राजतिलक द्वारा निर्देशत एक फिल्म आई थी ‘चेहरे पे चेहरा’. यह एक थ्रिलर और हौरर फिल्म थी. फिल्म के केंद्रीय पात्र संजीव कुमार थे, जिन्होंने एक वैज्ञानिक और डा. विल्सन का किरदार निभाया था. विल्सन एक ऐसा कैमिकल ईजाद कर लेता है, जो आदमी की बुराइयों को खत्म कर सकता है. इस कैमिकल का प्रयोग वह सब से पहले खुद पर करता है, लेकिन इस का असर उलटा हो जाता है. विल्सन के भीतर की बुराइयों का प्रतिनिधित्व करता एक और किरदार ब्लैक स्टोन उस की अच्छाइयों पर हावी होने लगता है.

सी ग्रेड की यह फिल्म हालांकि दर्शकों ने ज्यादा पसंद नहीं की थी, लेकिन फिल्म यह संदेश देने में सफल रही थी कि आदमी के अंदर अच्छाइयां और बुराइयां दोनों मौजूद रहती हैं. इन में से जिसे अनुकूलताएं मिल जाती हैं, वह बढ़ जाती हैं.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के एक डाक्टर सुनील मंत्री की कहानी या किरदार काफी हद तक विल्सन के दूसरे चेहरे ब्लैक स्टोन से मिलताजुलता है, जिस के भीतर का हैवान या पिशाच बगैर कोई कैमिकल दिए ही जाग गया था.

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होशंगाबाद के आनंदनगर में रहने वाले इस हड्डी रोग विशेषज्ञ की पोस्टिंग नजदीक के कस्बे इटारसी के सरकारी अस्पताल में थी. सुनील मंत्री पोस्टमार्टम भी करता था, लिहाजा लाशों को चीरफाड़ कर मौत की वजह निकालना उस का काम था. अकसर होशंगाबाद-इटारसी अपडाउन करने वाले इस डाक्टर की जिंदगी की कहानी भी हिंदी फिल्मों सरीखी ही है.

अब से कोई सवा साल पहले तक सुनील मंत्री की जिंदगी में कोई कमी नहीं थी. उस के पास वह सब कुछ था, जिस की तमन्ना हर कोई करता है. इज्जतदार पेशा, खुद का मकान व कारें और सुंदर पत्नी सुषमा के अलावा बेटा श्रीकांत और बेटी जो नागपुर के एक नामी कालेज में पढ़ रही है. बेटा श्रीकांत भी मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है.

वक्त काटने और कुछ और पैसा कमाने की गरज से सुषमा ने साल 2010 में एक बुटीक खोला था. इसी दौरान उन के संपर्क में रानी पचौरी नाम की महिला आई, तो उन्होंने उसे भी अपने बुटीक में काम पर लगा लिया.रानी मेहनती और ईमानदार थी, इसलिए देखते ही देखते सुषमा की विश्वासपात्र बन गई. सुषमा भी उसे घर के सदस्य की तरह मानने लगी थी.

सुनील मंत्री की दिलचस्पी बुटीक में कोई खास नहीं थी लेकिन जब से उस ने रानी को देखा था, तब से उस के होश उड़ गए थे. रानी का पति वीरेंद्र उर्फ वीरू पचौरी एक तरह से निकम्मा और बेरोजगार था, जो कभीकभार छोटेमोटे काम कर लिया करता था. नहीं तो वह पत्नी की कमाई पर ही आश्रित था. वीरू जैसे पतियों की समाज में कमी नहीं है. ऐसे लोगों के लिए एक कहावत है, ‘काम के न काज के, दुश्मन अनाज के.’

रानी जैसी पत्नियों की भी यह मजबूरी हो जाती है कि वे ऐसे पति को ढोती रहें, जो कहने भर का पति होता है. उस से उन्हें कुछ नहीं मिलता सिवाय एक सामाजिक सुरक्षा के, इसलिए वह वीरू को ढो ही रही थी.

पत्नी की मौत के बाद डाक्टर ने रानी में ढूंढा मन का सुकून

यह कोई हैरानी या हर्ज की बात नहीं थी, पर ऐसे मामलों में जैसा कि अकसर होता है, इस में भी हुआ यानी कि डा. सुनील मंत्री और रानी के बीच भी सैक्स की खिचड़ी पकने लगी. चूंकि रानी के घर आनेजाने की कोई रोकटोक नहीं थी, इसलिए दोनों को साथ वक्त गुजारने में कोई दिक्कत नहीं आती थी.

उस दौरान डा. सुनील मंत्री का वक्त कैसे गुजरता था, यह तो कोई नहीं जानता लेकिन 7 अप्रैल, 2017 को डाक्टर की पत्नी सुषमा की भोपाल के बंसल हौस्पिटल में मौत हो गई. पत्नी के देहांत के बाद तनहा रह गए डा. सुनील मंत्री का अधिकांश वक्त रानी के साथ ही गुजरने लगा.

सुषमा के बाद दिखावे के लिए बुटीक का काम रानी ने संभाल लिया था, लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि रानी ने और कई चीजों की डोर अपने हाथ में ले ली थी. जब तक सुषमा थी तब तक रानी का पति वीरू रानी को उस के यहां आनेजाने पर कोई ऐतराज नहीं जताता था लेकिन बाद में रानी पहले से कहीं ज्यादा वक्त बुटीक में बिताने लगी तो उस का माथा ठनका, जो स्वाभाविक बात थी. क्योंकि सुनील मंत्री अब अकसर अकेला रहता था.

रानी जब अपने घर में होती थी तब भी डा. सुनील मंत्री से फोन पर लंबीलंबी और अंतरंग बातें करती रहती थी. वीरू को शक तो था कि डाक्टर साहब और रानी के बीच प्यार की खिचड़ी पक रही है लेकिन उस का शक तब यकीन में बदल गया जब उस ने खुद अपने कानों से डाक्टर और रानी के बीच हुई अंतरंग बातचीत को सुन लिया.

दरअसल हुआ यह था कि मोबाइल फोन खराब हो जाने के कारण रानी ने अपना सिम कार्ड कुछ दिनों के लिए वीरू के फोन में डाल लिया था. न जाने कैसे बातचीत की रिकौर्डिंग वीरू के फोन में रह गई. वही रिकौर्डिंग वीरू ने सुन ली तो उस का खून खौल उठा.

पहले तो उस के जी में आया कि बेवफा बीवी और उस के आशिक डाक्टर का टेंटुआ दबा दे, पर जब उस ने धैर्य से विचार किया तो बस इतना सोचा कि क्यों न डा. सुनील मंत्री को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना कर रोज एक अंडा हासिल किया जाए. क्योंकि वह अगर डा. सुनील मंत्री को मारता या हल्ला मचाता तो उस के हाथ कुछ नहीं लगना था, उलटे लोग यही कहते कि गलती डाक्टर के साथसाथ रानी की भी थी.

लिहाजा एक दिन वीरू ने सुनील मंत्री को बता दिया कि वह उस के और अपनी पत्नी रानी के अवैध संबंधों के बारे में जान गया है और इस की वाजिब कीमत चाहता है. इस पेशकश पर शुरू में सुनील मंत्री को कोई नुकसान नजर नहीं आया, उलटे फायदा यह दिखा कि वीरू का डर खत्म हो गया.

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यानी वह अपनी मरजी से ब्लैकमेल होने को तैयार हो गया. शुरू में सुनील मंत्री जिसे मुनाफे का सौदा समझ रहा था, वह धीरेधीरे बहुत घाटे का साबित होने लगा. क्योंकि वीरू अब जब चाहे तब उसे ब्लैकमेल करने लगा था. उस का मुंह सुरसा की तरह खुलता और बढ़ता जा रहा था.

डाक्टर की इस दिक्कत या कमजोरी का वीरू पूरा फायदा उठा रहा था. डाक्टर अगर पुलिस में रिपोर्ट भी करता तो बदनामी उसी की ही होती. लिहाजा वह रानी को अपने पहलू में बनाए रखने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई वीरू को सौंपने को मजबूर था.

वक्त गुजरता रहा और वीरू डा. सुनील मंत्री को अपने हिसाब से निचोड़ता रहा. इस से डाक्टर को लगने लगा कि ऐसे तो वह एक दिन कंगाल हो जाएगा और रानी भी हाथ से निकल जाएगी.

यह डा. सुनील मंत्री की 56 साला जिंदगी का बेहद बुरा वक्त था. रानी से मिल रहे देह सुख की कीमत जब उस की हैसियत पर भारी पड़ने लगी तो उस ने एक बेहद खतरनाक फैसला ले लिया. चेहरे पे चेहरा फिल्म का हैवान ब्लैक स्टोन उस के भीतर जाग उठा और उस ने वीरू की इतनी नृशंस तरीके से हत्या कर डाली कि देखनेसुनने वालों की रूह कांप उठे. हर किसी ने यही कहा कि यह डाक्टर है या जल्लाद.

डाक्टर बना जल्लाद

डा. सुनील मंत्री फंस इसलिए गया था कि उस के और रानी के नाजायज ताल्लुकातों के सबूत वीरू के पास थे, नहीं तो तय था कि वह रानी को छोड़ देता. ये सबूत जो कभी सार्वजनिक या उजागर नहीं हो सकते, अब पुलिस के पास हैं.

वीरू की ब्लैकमेलिंग से आजिज आ गए सुनील मंत्री ने उसे अपने यहां बतौर ड्राइवर की नौकरी पर रख लिया. पगार तय की 16 हजार रुपए महीना.

इस जघन्य हत्याकांड का एक विरोधाभासी पहलू यह भी चर्चा में है कि डाक्टर ने वीरू को समझाया था कि तुम मेरे ड्राइवर बन जाओ तो चौबीसों घंटे मुझे देखते रहोगे. इस से तुम्हारा शक दूर हो जाएगा.

जबकि हकीकत में डा. सुनील मंत्री वीरू की हत्या का खाका काफी पहले से ही दिमाग में बना चुका था. उसे दरकार थी तो बस एक अदद मौके की, जिस से वीरू नाम की बला से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाया जा सके. 3 फरवरी, 2019 की सुबह वीरू डा. सुनील को कार से होशंगाबाद से इटारसी ले कर गया था.

दोनों शाम कोई 4 बजे वापस लौट आए. लेकिन वीरू अपने घर नहीं पहुंचा. दूसरे दिन रानी ने फोन पर यह खबर अपने ससुर लक्ष्मीकांत पचौरी को दी.

5 फरवरी की सुबह लक्ष्मीकांत होशंगाबाद आए और बेटे की ढुंढाई शुरू की. रानी ने उन्हें इतना ही बताया था कि वीरू ने 2 दिन पहले ही डा. सुनील मंत्री के यहां ड्राइवर की नौकरी शुरू की है.

यह बात सुन कर वह सीधे डा. सुनील मंत्री की कोठी पर जा पहुंचे और बेटे वीरू की बाबत पूछताछ की तो डाक्टर ने उन्हें गोलमोल जवाब दे कर टरकाने की कोशिश की. इस पर बुजुर्ग और अनुभवी लक्ष्मीकांत का माथा ठनकना स्वाभाविक था. उन्होंने डाक्टर से उस के घर के अंदर जाने की जिद की तो डाक्टर ने अचकचा कर मना कर दिया.

इस पर दोनों में झगड़ा शुरू हो गया. बेटे की चिंता में हलकान हुए जा रहे लक्ष्मीकांत डाक्टर पर वीरू को गायब करने का आरोप लगा रहे थे और डाक्टर उन के इस आरोप को खारिज कर रहा था.

झगड़ा होते देख वहां भीड़ जमा हो गई. इन में कुछ डा. सुनील मंत्री के पड़ोसी भी थे, जिन की नजरों में सुनील मंत्री पिछले 2 दिन से संदिग्ध हरकतें कर रहा था.

इत्तफाक से इसी दौरान पुलिस की एक गश्ती गाड़ी वहां से गुजर रही थी, जिस के पहिए यह झगड़ा देख रुक गए.

आखिर माजरा क्या है, यह जानने के लिए पुलिस वाले गाड़ी से नीचे उतरे और बात को समझने की कोशिश करने लगे. लक्ष्मीकांत ने फिर आरोप दोहराते हुए कहा कि डाक्टर ने उन के बेटे को गायब कर दिया है और अब कोठी के अंदर भी नहीं देखने दे रहा.

इस पर पुलिस वालों को हैरानी हुई कि अगर डाक्टर ने कुछ नहीं किया है तो उसे किसी के अंदर जाने पर इतना सख्त ऐतराज या जिद नहीं करनी चाहिए. लिहाजा खुद पुलिस वालों ने अंदर जाने का फैसला ले लिया.

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कीमे के रूप में मिली लाश

अंदर जाने के बाद सख्त दिल पुलिस वाले भी दहल उठे, क्योंकि ड्राइंगरूम में जगहजगह खून बिखरा पड़ा था. इतना ही नहीं, मांस के छोटेछोटे टुकड़े भी यहांवहां बिखरे पड़े थे मानो यह आलीशान कोठी कोई गलीकूचे की मटन शौप हो. पुलिस वालों के साथ अंदर गए लक्ष्मीकांत पहले से ही किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त थे. उन्होंने खोजबीन की तो एक ड्रम में उन्हें एक कटा हुआ सिर दिखा, जिसे देख वे दहाड़ मार कर रोने लगे. वह सिर उन के जवान बेटे वीरू का था.

जब पुलिस वालों ने घर का और मुआयना किया तो उन्हें टौयलेट में 4 आरियां मिलीं. इन में से 2 आरियों के बीच वीरू के एक पैर के दरजन भर टुकड़े फंसे हुए थे. जब ड्रम को गौर से देखा गया तो एसिड में वीरू के कटे सिर के साथसाथ हाथपैर भी पडे़ दिखे. डाक्टरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दस्ताने भी खून से सने हुए थे. इस हैवान डाक्टर ने वीरू के शरीर के 4-6 नहीं बल्कि करीब 500 टुकड़े कर डाले थे.

अब बारी सुनील मंत्री की थी, जिस ने शराफत से अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि वह वीरू की ब्लैकमेलिंग से आजिज आ गया था, इसलिए उस ने उस की हत्या कर डाली.

दरअसल, 3 फरवरी को वीरू के दांत में दर्द था. यह बात उस ने डा. सुनील मंत्री को बताई तो उस ने इटारसी जाते वक्त एक गोली दी. लेकिन होशंगाबाद वापस आने के बाद वीरू ने फिर दांत दर्द की बात कही तो डा. सुनील के अंदर बैठे ब्लैक स्टोन ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इसी बेहोशी में उस ने वीरू का गला रेता और फिर उस की लाश के टुकड़े करने शुरू कर दिए.

एक दिन में लाश को काट कर टुकड़ेटुकड़े कर डालना मुश्किल काम था, इसलिए दूसरे दिन भी वह यही करता रहा और इटारसी अस्पताल भी गया था. लेकिन जल्द ही वापस आ गया था. जाते समय उस ने वीरू के खून से सने कपड़े बाबई के पास फेंक दिए थे. दोनों दिन उस ने घर की लाइटें नहीं जलाई थीं ताकि कोई मरीज न आ जाए. दूसरे दिन लाश के टुकड़े वह दूसरी मंजिल पर ले गया था.

सुनील मंत्री अपनी योजना के मुताबिक काफी दिनों से एसिड इकट्ठा कर रहा था. चूंकि वह डाक्टर था, इसलिए दुकानदार उस पर शक नहीं कर रहे थे और वह भी पहले से ही बता देता था कि वह स्वच्छ भारत अभियान के तहत एसिड खरीद रहा है. डाक्टर होने के नाते सुनील बेहतर जानता था कि लाश के टुकड़े गल कर नष्ट हो जाएंगे और किसी को हवा भी नहीं लगेगी.

लेकिन जब हवा होशंगाबाद, इटारसी से भोपाल होते हुए देश भर में फैली तो सुनने वालों का कलेजा मुंह को आ गया कि डाक्टर ऐसा भी होता है.

ऐसा हो चुका था और डा. सुनील मंत्री खुद पुलिस वालों को बता भी रहा था कि ऐसा कैसे और क्यों हुआ.

इस खुलासे पर सनसनी मची तो होशंगाबाद के तमाम आला पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों के आते ही डाक्टर की हालत खस्ता हो गई और वह ऊटपटांग हरकतें करने लगा. कभी वह गुमसुम बैठ जाता था तो कभी रोने लगता था. कहीं वह कुछ उलटासीधा न कर बैठे, इस के लिए उस के इर्दगिर्द दरजन भर पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए और उस का पैर जंजीर से बांध दिया गया.

यह बात सच है कि डा. सुनील अपना दिमागी संतुलन अस्थाई रूप से खो बैठा था. उस की शुगर और ब्लडप्रेशर दोनों बढ़ गए थे और वह सोडियम पोटैशियम इम्बैलेंस का भी शिकार हो गया था, जिस में मरीज कुछ भी बकने लगता है और ऊटपटांग हरकतें करनी शुरू कर देता है.

इन बीमारियों पर काबू पाया गया तो एक के बाद एक वीरू की हत्या से ताल्लुकात रखते राज खुलते गए कि इस की आखिर वजह क्या थी.

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फंस ही गया डाक्टर चक्रव्यूह में

छानबीन और जांच में पुलिस वालों की जानकारी में जब डाक्टर की पत्नी सुषमा मंत्री की मौत संदिग्ध होनी पाई गई तो एक टीम भोपाल के नामी बंसल हौस्पिटल भी पहुंची. दरअसल, सुषमा की मौत भी सुनील के लगाए गए इंजेक्शन के रिएक्शन से हुई थी. इंजेक्शन लगाने के बाद सुषमा के शरीर में संक्रमण फैलने लगा तो सुनील उसे भोपाल ले कर आया था. इस संदिग्ध मौत के बाद भी सुषमा का पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया था, इस बात की जांच पुलिस कथा लिखे जाने तक कर रही थी.

रानी के बयान और किरदार दोनों अहम हो चले थे, लेकिन पूछताछ में वह अनभिज्ञता जाहिर करती रही. पुलिस ने जब सुनील मंत्री से उस के संबंधों के बारे में पूछा तो वह खामोश रही. इस से पुलिस को रानी की भूमिका ज्यादा संदिग्ध नजर आई, जिस की जांच पुलिस कथा लिखने तक कर रही थी. सुनील मंत्री से उस की फोन पर हुई बात की रिकौर्डिंग भी पुलिस ने हासिल कर ली.

पुलिस ने मामला दर्ज कर के वीरू की टुकड़ेटुकड़े बनी लाश पोस्टमार्टम के बाद उस के परिजनों को सौंप दी, जिस का दाह संस्कार भी हो गया. कुछ सामान्य होने के बाद सुनील कहने लगा कि हां, उस ने वीरू की हत्या की थी लेकिन अब अदालत में उस का वकील बोलेगा.

रिमांड पर लिए जाने के बाद वह अदालत में असामान्य दिखा, जिस से उस की हिरासत की अवधि लगातार बढ़ाई जा रही है. हालांकि सच यह है कि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पुलिस तभी पहुंचेगी, जब रानी मुंह खोलेगी. पुलिस सुषमा की मौत को भी संदिग्ध मान कर काररवाई कर रही है कि कहीं वह भी हत्या तो नहीं थी.

सब कुछ मुमकिन है लेकिन जिस तरह वीरू की हत्या डा. सुनील मंत्री ने की वह जरूर हैरत वाली बात है कि कोई डाक्टर जो जिंदगियां बचाता है, वह इतने वीभत्स, हिंसक और जघन्य तरीके से किसी की जिंदगी भी छीन सकता है.

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