सौरभ के अंतर को कैक्टस के कांटों ने बींध दिया था, तभी उस ने नींद की गोलियां खाने जैसा दुस्साहसी कदम उठाया, लेकिन ममता के पश्चात्ताप से वे कांटे फिर से फूल बन कर उन को सहलाने लगे थे.

तीसरी मंजिल पर चढ़ते हुए नए जूते के कसाव से पैर की उंगलियों में दर्द होने लगा था किंतु ममता का सुगठित सौंदर्य सौरभ को चुंबक के समान ऊपर की ओर खींच रहा था.

रास्ते में बस खराब हो गई थी, इस कारण आने में देर हो गई. सौरभ ने एक बार पुन: कलाई घड़ी देखी, रात के साढ़े 8 बज चुके हैं, मीनीचीनी सो गई होंगी. कमरे का सूना सन्नाटा हाथ उचकाउचका कर आमंत्रित कर रहा था. उंगली की टीस ने याद दिलाया कि जब वे इस भवन में मकान देखने आए थे तो नीचे वाला हिस्सा भी खाली था किंतु ममता ने कहा था कि अकेली स्त्री का बच्चों के साथ नीचे रहना सुरक्षित नहीं, इसी कारण वह तिमंजिले पर आ टंगी थी.

बंद दरवाजे के पीछे से आने वाले पुरुष ठहाके ने सौरभ को चौंका दिया. वह गलत द्वार पर तो नहीं आ खड़ा हुआ? अपने अगलबगल के परिवेश को दोबारा हृदयंगम कर के उस ने अपने को आश्वस्त किया और दरवाजे पर धक्का दिया. हलके धक्के से ही द्वार पूरा खुल गया. भीतर से चिटकनी नहीं लगी थी. ट्यूब- लाइट के धवल प्रकाश में सोफे पर बैठे अपरिचित युवक के कंधों पर झूलती मीनीचीनी और सामने बैठी ममता के प्रफुल्लित चेहरे को देख कर वह तिलमिला गया. वह तो वहां पत्नी और बच्चों की याद में बिसूरता रहता है और यहां मसखरी चल रही है.

उसे आया देख कर ममता अचकचा कर उठ खड़ी हुई, ‘‘अरे, तुम.’’

बच्चियां भी ‘पिताजीपिताजी’ कह कर उस के पैरों से लिपट गईं. पल भर को उस के घायल मन पर शीतल लेप लग गया. अपरिचित युवक उठ खड़ा हुआ था, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’

‘‘वाह, मैं आया और आप चल दिए,’’ सौरभ की वाणी में व्यंग्य था.

‘‘ये कपिलजी हैं, मेरे स्कूल में अध्यापक हैं,’’ ममता ने परिचय कराया.

‘‘आज ममताजी स्कूल नहीं गई थीं, वहां पता चला कि मीनी की तबीयत खराब है, उसी को देखने आया था,’’ कपिल ने बिना पूछे अपनी सफाई दी.

‘‘क्या हो गया है मीनी को?’’ सौरभ चिंतित हो गया था.

‘‘कुछ विशेष नहीं, सर्दीखांसी कई दिनों से है. सोचा, आज छुट्टी ले लूं तो उसे भी आराम मिलेगा और मुझे भी.’’

सौरभ का मन बुझता जा रहा था. वह चाहता है कि ममता अपनी छुट्टी का एकएक दिन उस के लिए बचा कर रखे, यह बात ममता से छिपी नहीं है. न जाने कितनी बार कितनी तरह से वह उसे बता चुका है फिर भी…और बीमार तो कोई नहीं है. अनमनेपन से कुरसी पर बैठ कर वह जूते का फीता खोलने लगा, उंगलियां कुछ अधिक ही टीसने लगी थीं.

‘‘चाय बनाऊं या भोजन ही करोगे,’’ ममता के प्रश्न से उस ने कमरे में चारों ओर देखा, कपिल जा चुका था.

‘‘जिस में तुम्हें सुविधा मिले.’’

पति की नाराजगी स्पष्ट थी किंतु ममता विशेष चिंतित नहीं थी. अपने प्रति उन की आसक्ति को वह भलीभांति जानती है, अधिक देर तक वह रूठे रह ही नहीं सकते.

बरतनों की खटपट से सौरभ की नींद खुली. अभी पूरी तरह उजाला नहीं हुआ था, ‘‘ममता, इतने सवेरे से क्या कर रही हो?’’

‘‘अभी आई.’’

कुछ देर बाद ही 2 प्याले चाय ले कर वह उपस्थित हो गई, ‘‘तुम्हारी पसंद का नाश्ता बना रही हूं, कल रात तो कुछ विशेष बना नहीं पाई थी.’’

‘‘अरे भई, नाश्ता 9 बजे होगा, अभी 6 भी नहीं बजे हैं.’’

‘‘स्कूल भी तो जाना है.’’

‘‘क्यों, आज छुट्टी ले लो.’’

‘‘कल छुट्टी ले ली थी न. आज भी नहीं जाऊंगी तो प्रिंसिपल का पारा चढ़ जाएगा, परीक्षाएं समीप हैं.’’

‘‘तुम्हें मालूम रहता है कि मैं बीचबीच में आता हूं फिर उसी समय छुट्टी लेनी चाहिए ताकि हम सब पूरा दिन साथसाथ बिताएं, कल की छुट्टी लेने की क्या तुक थी, मीनी तो ठीक ही है,’’?सौरभ ने विक्षुब्ध हो कर कहा.

‘‘कल मैं बहुत थकी थी और फिर आज शनिवार है. कल का इतवार तो हम सब साथ ही बिताएंगे.’’

सौरभ चुप हो गया. ममता को वह जानता है, जो ठान लिया तो ठान लिया. उस ने एक बार सामने खड़ी ममता पर भरपूर दृष्टि डाली.

10 वर्ष विवाह को हो गए, 2 बच्चियां हो गईं परंतु वह अभी भी फूलों से भरी चमेली की लता के समान मनमोहिनी है. उस के इस रूप के गुरुत्वाकर्षण से खिंच उस की इच्छाओं के इर्दगिर्द चक्कर काटता रहता है सौरभ. उस की रूपलिप्सा तृप्त ही नहीं होती. इंजीनियरिंग पास करने के बाद विद्युत बोर्ड में सहायक अभियंता के रूप में उस की नियुक्ति हुई थी तो उस के घर विवाह योग्य कन्याओं के संपन्न अभिभावकों का तांता लग गया था. लंबेचौड़े दहेज का प्रलोभन किंतु उस की जिद थी कन्या लक्ष्मी हो न हो, मेनका अवश्य हो.

जब भी छुट्टियों में वह घर जाता उस के आगे चित्रों के ढेर लग जाते और वह उन सब को नकार देता.

उस बार भी ऐसा ही हुआ था.

खिसियाई हुई मां ने अंतिम चित्र उस के हाथ में थमा कर कहा था, ‘‘एक फोटो यह भी है किंतु लड़की नौकरी करती है और तुम नौकरी करने वाली लड़की से विवाह करना नहीं चाहते.’’

बेमन से सौरभ ने फोटो को देखा था और जब देखा तो दृष्टि वहीं चिपक कर रह गई, लगा उस की कल्पना प्रत्यक्ष हो आई है.

ममता पटना में केंद्रीय विद्यालय में अध्यापिका थी और सौरभ भी उन दिनों वहीं कार्यरत था. छुट्टियों के बाद पटना जा कर पहला काम जो उस ने किया वह था ममता से मुलाकात. स्कूल के अहाते में अमलतास के पीले गुच्छों वाले फूलों की पृष्ठभूमि में ममता का सौंदर्य और भी दीप्त हो आया था. वह तो ठगा सा रह गया किंतु तब भी ममता ने यथार्थ की खुरदरी बातें ही की थीं, ‘‘वह विवाह के बाद भी नौकरी करना चाहती है क्योंकि इतनी अच्छी स्थायी नौकरी छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है.’’

सौरभ तो उस समय भावनाओं के ज्वार में बह रहा था. ममता जो भी शर्त रखती वह उसे मान लेता फिर इस में तो कोई अड़चन नहीं थी. दोनों को पटना में ही रहना था. अड़चन आई 6 वर्ष बाद जब सौरभ का स्थानांतरण बिहार शरीफ के लिए हो गया. उस की हार्दिक इच्छा थी कि ममता नौकरी छोड़ दे और उस के साथ चले. 5 वर्ष की मीनी का उसी वर्ष ममता के स्कूल में पहली कक्षा में प्रवेश हुआ था. चीनी साढ़े 3 वर्ष की थी. वैसे सौरभ नौकरी छोड़ने को न कहता यदि ममता का तबादला हो सकता. वह केंद्रीय विद्यालय में थी और प्रत्येक शहर में तो केंद्रीय विद्यालय होते नहीं. परंतु ममता इस के लिए किसी प्रकार सहमत नहीं थी. उस के तर्क में पर्याप्त बल था. सौरभ के कई सहकर्मियों ने बच्चों की शिक्षा के लिए अपने परिवार को पटना में रख छोड़ा था. उन लोगों की बदली छोटेबड़े शहरों में होती रहती है. सब जगह बढि़या स्कूल तो होते नहीं. फिर आज मीनीचीनी छोटी हैं कल को बड़ी होंगी.

उस ने अपनी नौकरी के संबंध में कुछ नहीं कहा था परंतु सौरभ नादान तो नहीं था. मन मार कर ममता और बच्चों के रहने की समुचित व्यवस्था कर के उसे अकेले आना पड़ा. गरमी की छुट्टियों में पत्नी और बच्चे उस के पास आ जाते, छोटीछोटी छुट्टियों में कभी दौरा बना कर, कभी ऐसे ही सौरभ आ जाता.

गत 4 वर्षों से गृहस्थी की गाड़ी इसी प्रकार धकियाई जा रही थी. अकेले रहते और नौकर के हाथ का खाना खाते उस का स्वास्थ्य गड़बड़ रहने लगा था. 2 जगह गृहस्थी बसाने से खर्च भी बहुत बढ़ गया था. परंतु ममता की एक मुसकान भरी चितवन, एक रूठी हुई भंगिमा उस की सारी झुंझलाहट को धराशायी कर देती थी और वह उस रूपपुंज के इर्दगिर्द घूमने वाला एक सामान्य सा उपग्रह बन कर रह जाता.

9 बजे ममता और बच्चियों के जाने के बाद सौरभ ने स्नान किया, तैयार हो कर सोचा कि सचिवालय का एक चक्कर लगा आए. पटना स्थानांतरण के लिए किए गए प्रयासों में एक प्रयास और जोड़ ले. दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी सामने वाले मकान में देने के लिए घंटी बजाई. गृहस्वामिनी निशि गीले हाथों को तौलिए से पोंछती हुई बाहर निकलीं, ‘‘अरे भाईसाहब, आप कब आए?’’

‘‘कल रात,’’ सौरभ ने उन्हें चाबी थमाने का उपक्रम किया. निशि ने चाबी लेने में कोई शीघ्रता नहीं दिखाई, ‘‘अब तो भाईसाहब, आप यहां बदली करवा ही लीजिए. अकेली स्त्री के लिए बच्चों के साथ घर चलाना बहुत कठिन होता है. बच्चे हैं तो हारीबीमारी चलती ही रहती है, यह तो कहिए आप के संबंधी कपिलजी हैं जो आप की अनुपस्थिति में पूरी देखरेख करते हैं, आजकल इतना दूसरों के लिए कौन करता है?’’

सौरभ अचकचा गया, वह तो कपिल को जानता तक नहीं. ममता ने झूठ का आश्रय क्यों लिया? उस ने निशि की ओर देखा, होंठों के कोनों और आंखों से व्यंग्य भरी मुसकान लुकाछिपी कर रही थी.

‘‘हां, बदली का प्रयास कर तो रहा हूं,’’ सौरभ सीढि़यों से नीचे उतर आया. नए जूते के कारण उंगलियों में पड़े छाले उसे कष्ट नहीं दे रहे थे क्योंकि देह में कैक्टस का जंगल उग आया था.

सचिवालय के गलियारे में इधरउधर निरुद्देश्य भटक कर वह सांझ गए लौटा. मीनीचीनी की मीठी बातें, ममता की मधुर मुसकान उस पर पहले जैसा जादू नहीं डाल सकीं. 10 वर्षों की मोहनिद्रा टूट चुकी थी.

ममता ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? तबादले की फाइल आगे बढ़ी?’’

‘‘कुछ होनाहवाना नहीं है, सभी तो यहीं आना चाहते हैं. मैं तो सोचता हूं कि अब हम सब को इकट्ठे रहना चाहिए.’’

‘‘यह कैसे संभव होगा?’’ ममता के माथे पर बल पड़ गए थे.

‘‘संभव क्यों नहीं है? यहां का खर्च तुम्हारे वेतन से तो पूरा पड़ता नहीं. दोनों जनों की कमाई से क्या लाभ जब बचत न हो.’’

‘‘क्या सबकुछ रुपयों के तराजू पर तोला जाएगा? मीनीचीनी को केंद्रीय विद्यालय में शिक्षा मिल रही है, वह क्या कुछ नहीं?’’

‘‘आजकल सब शहरों में कान्वेंट स्कूल खुल गए हैं…फिर तुम स्वयं उन्हें पढ़ाओगी. तुम नौकरी करना ही चाहोगी तो वहां भी तुम्हें मिल जाएगी.’’

सरस सलिल विशेष

‘‘और मेरी 12 वर्षों की स्थायी नौकरी? क्या इस का कुछ महत्त्व नहीं?’’ ममता का क्रोध चरम पर था.

‘‘अब सबकुछ चाहोगी तो कैसे होगा?’’ हथियार डालते हुए सौरभ सोच रहा था. मैं क्यों ममता के तर्ककुतर्कों के सामने झुक जाता हूं? अपनी दुर्बलता से उत्पन्न खीज को दबाते हुए वह मन ही मन योजना बनाने लगा कि कैसे वह अपने क्रोध को अभिव्यक्ति दे.

दूसरे दिन प्रात:काल ही वह जाने के लिए तैयार हो गया. ममता ने आश्चर्य से टोका, ‘‘आज तो छुट्टी है…सुबह से ही क्यों जा रहे हो?’’

‘‘मुझे वहां काम है,’’ उस ने रुखाई से कहा. ममता को जानना चाहिए कि वह भी नाराज हो सकता है.

वापस आने के बाद भी सौरभ को चैन नहीं था. हर समय संदेह के बादलों से विश्वास की धूप कहीं कोने में जा छिपी थी. मन में युद्ध छिड़ा हुआ था, ‘स्त्री की आत्मनिर्भरता तो गलत नहीं, कार्यरत स्त्री की पुरुषों से मैत्री भी अनुचित नहीं फिर उस का सारा अस्तित्व कैक्टस के कांटों से क्यों बिंधा जा रहा है?’

विवेक से देखने पर तो सब ठीक लगता है परंतु भावना का भी तो जीवन में कहीं न कहीं स्थान है. इच्छा होती है कि एक बार उन लोगों के सामने मन की भड़ास पूरी तरह निकाल ले. इसी धुन में 3-4 दिन बाद वह पुन: पटना पहुंचा. उस समय शाम के 7 बज रहे थे. द्वार पर ताला लगा था.

निशि ने भेदभरी मुसकान के साथ बताया, ‘‘कपिलजी के साथ वे लोग बाहर गए हैं.’’

वह उन्हीं की बैठक में बैठ गया. आधे घंटे बाद सीढि़यों पर जूतेचप्पलों के शोर से अनुमान लगा कि वे लोग आ गए हैं. सौरभ बाहर निकल आया. आगेआगे सजीसंवरी ममता, पीछे चीनी को गोद में लिए कपिल और हाथ में गुब्बारे की डोर थामे मीनी. अपने स्थान पर कपिल को देख कर आगबबूला हो उठा.

ममता भी सकपका गई थी, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘क्यों, कुछ गलत होना चाहिए?’’ अंतर की कटुता से वाणी भी कड़वी हो गई थी.

‘‘नहींनहीं, अभी 3 दिन पहले यहां से गए थे, इसी से पूछा.’’

‘‘मुझे नहीं आना चाहिए था क्या?’’ सौरभ का क्रोध निशि और कपिल की उपस्थिति भी भूल गया था.

बिना कुछ बोले ममता ने ताला खोला, कपिल की गोद से बच्ची को ले कर उसे मूक विदाई दी. सौरभ जब भीतर आ गया तो दरवाजा बंद कर के ममता उन के सम्मुख तन कर खड़ी हो गई. पल भर उस की आंखों में आंखें डाल कर उस के क्रोध को तोला फिर तीखेपन से कहा, ‘‘क्या हो गया है तुम्हें, सब के सामने इस प्रकार बोलते हुए तुम्हें जरा भी झिझक नहीं लगी?’’

‘‘और तुम जो परपुरुष के साथ हीही, ठींठीं करती फिरती हो, घूमने जाती हो, उस में कुछ भी झिझक नहीं?’’

‘‘कपिल के लिए ऐसा कहते तुम्हें लज्जा नहीं आती? सहशिक्षा के स्कूल में पढ़ाती हूं, वहां स्त्रियों से अधिक पुरुष सहकर्मी हैं, उन्हें अछूत मानने से नहीं चलता. मुझे बच्चों की यूनिफार्म लेनी थी. कपिल भी साथ चले गए तो कौन सी आफत आ गई?’’

‘‘कपिल ही क्यों? दूसरा कोई क्यों नहीं?’’

‘‘कुछ तो शर्म करो, अपनी पत्नी पर लांछन लगाने से पहले सोचनासमझना चाहिए. मुझ से कम से कम 8 वर्ष छोटे हैं. अपने परिवार से पहली बार अलग हो कर यहां आए हैं, मीनीचीनी को बहुत मानते हैं. इसी से कभीकभी आ जाते हैं, इस में बुरा क्या है?’’

सौरभ को लगा कि वह पुन: पत्नी के सम्मुख हतप्रभ होता जा रहा है. उस ने अंतिम अस्त्र फेंका, ‘‘मेरे समझने न समझने से क्या होगा, दुनिया स्त्रीपुरुष की मित्रता का अर्थ बस एक ही लेती है.’’

‘‘दुनिया के न समझने से मुझे कुछ अंतर नहीं पड़ता, बस, तुम्हें समझना चाहिए.’’

सौरभ बुझ गया था. रात भर करवटें बदलता रहा. बगल में सोई ममता दहकती ज्वाला के समान उसे जला रही थी.

तीसरे दिन स्कूल में दोपहर की छुट्टी में ममता ने मीनीचीनी के साथ परांठे का पहला कौर तोड़ा ही था कि चपरासी ने आ कर कहा, ‘‘प्रिंसिपल साहब ने आप को अभी बुलाया है, बहुत जरूरी काम है.’’

हाथ का कौर चीनी के मुंह में दे कर, वह उठ खड़ी हुई. पिछले कुछ दिनों से वह उलझन में थी, विचारों के सूत्र टूटे और पुराने ऊन के टुकड़ों के समान बदरंग हो गए थे. सबकुछ ठीक चल रहा था. उस दिन सौरभ और कपिल का सामना न होता तो सब ठीक ही रहता. सौरभ को वह दोष नहीं दे पाती. उस की प्रतिक्रिया पुरुषोचित थी.

सौरभ इंजीनियर के अच्छे पद पर है, पैसा और रुतबा पूरा है फिर उस का नौकरी करना कोई माने नहीं रखता किंतु वह क्या करे? अपनी निजता को कैसे तज दे?

जब से होश संभाला, पढ़ना और पढ़ाना जीवन के अविभाज्य अंग बने हुए हैं. अब सब छोड़ कर घर की सीमाओं में आबद्ध रह कर क्या वह संतुष्ट और प्रसन्न रह सकेगी?

कपिल…हां, रूपसी होने के कारण पुरुषों की चाह भरी निगाहों का प्रशंसनीय, उस ने अपना अधिकार समझ कर गौरव के साथ स्वीकारा है. कपिल भी उसी माला की एक कड़ी है. हां, अधिक है तो उस की एकाग्र भक्ति.

वह जानती है कि केवल उस के सान्निध्य के लिए वह बच्चियों के कितने उपद्रव झेल लेता है. अपने प्रति उस के सीमातीत लगाव से कहीं ममता का अहम परितृप्त हो जाता है, इस से अधिक तो कुछ भी नहीं. खिन्न अंतस पर औपचारिक मुसकान ओढ़ कर उस ने प्रिंसिपल के कक्ष में प्रवेश किया.

‘‘ममताजी,’’ पिं्रसिपल का स्वर चिंतायुक्त था, ‘‘अभी बिहारशरीफ से ट्रंककाल आया है, आप के पति अस्पताल में भर्ती हैं.’’

ममता के पैरों तले धरती खिसक गई. किंकर्तव्यविमूढ़ सी उस ने कुरसी को थाम लिया. उसी अर्द्धचेतनावस्था में कपिल के फुसफुसाते हुए शब्द स्वयं उस के कानों में पड़ रहे थे, ‘‘ममताजी, मैं टैक्सी ले कर आता हूं.’’

एक अंतहीन यात्रा की कामना. क्योंकि यात्रा के अंत पर अदृष्ट की क्रूर मुसकान को झेल न सकने की असमर्थता, कपिल की निरंतर सांत्वना तेल से चिकनी धरती पर स्थिर न रहने वाले जल कणों के समान निष्फल हो रही थी. ममता के समूचे अस्तित्व को जैसे लकवा मार गया था.

अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पीले, निस्तेज सौरभ को सफेद पट्टियों से रहित देख कर पल भर को उसे ढाढ़स मिला, दोबारा देखने पर नाक में नली लगी देख उसे मूर्च्छना सी आ गई, वह वहीं धरती पर बैठ गई.

‘‘ममताजी, धैर्य रखिए, इंजीनियर साहब खतरे से बाहर हैं,’’ ममता की हालत देख कर कपिल व्याकुल हो कर उसे धैर्य बंधाने में अपनी शक्ति लगाए दे रहा था. ममता का सारा शरीर थरथर कांप रहा था, काफी देर बाद अपने को संभाल पाई वह. नहीं दुर्घटना तो नहीं हुई है, जिस की कल्पना कर के वह अधमरी हो गई थी, फिर इन्हें क्या हो गया है? अभी 3 दिन पहले तक तो अच्छेभले थे.

बड़े डाक्टर को एक तरफ पा कर उस ने पूछा, ‘‘इन्हें क्या हुआ है, डाक्टर साहब?’’

‘‘आप इन की पत्नी हैं न. इन्होंने पिछली रात नींद की गोलियां खा ली थीं.’’

डाक्टर का स्वर आरोप भरा था, ‘‘सुखी सद्गृहस्थ आत्महत्या क्यों करेगा?’’ ममता को पुन: चक्कर आ गया, उसे लगा समूचा विश्व उस पर हत्या का आरोप लगा रहा है. यहां तक कि उस की अंतरात्मा भी उसे ही अभियुक्त समझ रही है. उस की सारी दृढ़ता चूरचूर हो कर बिखर गई थी.

कालरात्रि के समान वह रात बीती, भोर की प्रथम किरण के साथ सौरभ ने आंखें खोलीं. ममता और उस के पास खड़े कपिल को देख कर उस ने पुन: आंखें मूंद लीं. कपिल के शब्द बहुत दूर से आते लग रहे थे, ‘‘ममताजी, चाय पी लीजिए, कल से आप ने कुछ खाया नहीं है. इस तरह अपने को क्यों कष्ट दे रही हैं, सब ठीक हो जाएगा.’’

क्षीण देह की भीषण पीड़ा मन को संवेदनशीलता के सामान्य धरातल से ऊंचा उठा देती है, नितांत आत्मीय भी अपरिचितों की भीड़ में ऐसे मिल जाते हैं कि रागद्वेष निस्सार लगते हैं. सत्य की अनुभूति है केवल एक विराट शून्य में तैरती हुई देह और भावनाएं, बाहरी दुनिया के कोलाहल से परे स्थितप्रज्ञ की स्थिति आंखें खुलतीं तो ममता के सूखे मुख पर पल भर को चमक आ जाती.

लगभग एक सप्ताह के उपरांत सौरभ पूरी तरह चैतन्य हुआ. जीवन के अंत को इतने समीप से देख लेने के बाद अपना आवेग, अपनी प्रतिक्रिया सभी कुछ निरर्थक लग रहे थे. मृत्यु के मुख से लौट आने की लज्जा ने उस की वाणी को संकुचित कर दिया था.

अस्पताल से घर आने के बाद ममता से कुछ कहने के लिए पहली बार साहस बटोरा, ‘‘तुम अब पटना चली जाओ, काफी छुट्टी ले चुकी हो.’’

‘‘मैं अब कहीं नहीं जाऊंगी, कपिल से मैं ने इस्तीफा भिजवा दिया है.’’

‘‘इस्तीफा वापस भी लिया जा सकता है, इतने दिनों की तुम्हारी स्थायी नौकरी है…उसे छोड़ना बेवकूफी है,’’ बिना विचलित हुए ठंडेपन से सौरभ ने कहा.

ममता को लगा सौरभ उस के पुराने वाक्य को दोहरा रहा है.

‘‘उन सब बातों को भूल नहीं सकोगे. तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं था तभी तो…और अब मुझे तुम्हारे ऊपर भरोसा नहीं रहा, मैं तुम्हें पल भर को भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने दूंगी…’’

रूपगर्विता के दर्प के हिमखंड वेदना की आंच से पिघल कर आंखों में छलक आए थे और उन जल कणों से सिंचित हो कर सौरभ के अंतस में उगे कैक्टस में फूल खिलने लगे थे.

 इंदिरा राय

Tags:
COMMENT