सारा की कामयाबी से खुश हूं- सैफ अली खान

लेखक- आरती सक्सेना

इस के अलावा सैफ अली खान आजकल अपनी बेटी सारा अली खान को ले कर भी चर्चा में हैं जिन्होंने अपनी पहली ही फिल्म ‘केदारनाथ’ से तहलका मचा दिया है. सारा अली खान की कामयाबी को ले कर सैफ क्या कहते हैं? ‘तानाजी : द अनसंग वारियर’ के अलावा वे और कौनकौन सी फिल्मों में काम कर रहे हैं? ऐसे ही कई सवालों के जवाब उन्होंने एक बातचीत में दिए. पेश हैं, उस के खास अंश:

आप की वैब सीरीज ‘स्कैरेड गेम्स’ ने काफी तहलका मचाया था. इस बारे में आप क्या कहेंगे?

जब मुझे इस वैब सीरीज की कहानी के बारे में पता चला था तो मुझे यह बहुत रोचक लगी थी. सो, मैं ने इस वैब सीरीज में काम करना मंजूर कर लिया. आज जब लोग इस में मेरी ऐक्टिंग की तारीफ कर रहे हैं तो मुझे लगा कि मेरा फैसला सही था.

आप ने अपने ऐक्टिंग कैरियर में न तो कभी कोई जल्दबाजी की और न ही फिल्मों के चुनाव को ले कर कभी ढीले पड़े. इस बारे में आप क्या कहेंगे?

मैं फिल्मों के चुनाव को ले कर कोई जल्दबाजी नहीं करता हूं, क्योंकि फिल्मों में काम करना मेरा जुनून है. मैं अपने काम को ऐंजौय करना चाहता हूं. मुझे नहीं लगता कि मैं जल्दबाजी में कोई फिल्म साइन करूं और फिर उसे करते वक्त पछताऊं.

आप की पिछली फिल्म ‘बाजार’ को दर्शकों द्वारा सराहा गया, लेकिन इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर कुछ खास धमाल नहीं किया. क्यों?

मुझे लगता है कि सिर्फ बौक्स औफिस पर फिल्म कामयाब होना ही असल कामयाबी नहीं है, बल्कि मेरी नजर में वह फिल्म कामयाब है जिस की चर्चा दर्शकों के बीच हो, जो दर्शकों द्वारा सराही जाए.

फिल्म ‘बाजार’ का विषय भी ऐसा ही कुछ था जिस में सट्टे के कारोबार को हाईलाइट किया गया. शेयर मार्केट में लोग कैसे बनते हैं और कैसे डूबते हैं, यह इस फिल्म का मुख्य मुद्दा था, जो दर्शकों द्वारा सराहा गया.

क्या आप शेयर मार्केट में पैसा लगाना पसंद करते हैं?

नहीं, मैं तो सेफ गेम खेलना पसंद करता हूं. मुझे दूसरी जगह इनवैस्मैंट करना ज्यादा पसंद है बजाय शेयर बाजार में पैसा लगाने के.

आप काफी सालों बाद अजय देवगन के साथ ऐतिहासिक फिल्म ‘तानाजी : द अनसंग वारियर’ करने जा रहे हैं. इस से पहले आप ने उन के साथ फिल्म ‘ओमकारा’ की थी. इस बारे में आप क्या कहेंगे?

हां, मेरा अजय देवगन के साथ काम करने का अनुभव काफी अच्छा रहा है. उन्हें फिल्मों से और फिल्म मेकिंग से प्यार है. इस फिल्म को उन्होंने बहुत दिल से बनाया है. इस में मेरा किरदार एंटी हीरो का है.

यह एक ऐतिहासिक फिल्म है जो ‘बाहुबली’ की तरह बड़े पैमाने पर बन रही है. खासतौर पर बच्चे इस फिल्म को देख कर जरूर ऐंजौय करेंगे.

आप अजय देवगन के अलावा आर. माधवन के साथ भी काफी अरसे बाद फिल्म ‘हंटर’ में नजर आएंगे. सुना है कि इस फिल्म का नाम अब बदल कर कुछ और रखा जाने वाला है. आप ने आर. माधवन के साथ साल 2001 में आई फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ काम किया था. आप को कैसा महसूस हो रहा है?

पता ही नहीं लगता कि समय कैसे तेजी से भाग रहा है. ऐसा लगता है, जैसे कल की ही बात हो. आर. माधवन और मेरी फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ काफी हिट रही थी. हमारा साथ काम करने का अनुभव भी काफी अच्छा था. आज इतने सालों के बाद जब उन से इस फिल्म के लिए मिला तो लगा ही नहीं कि हम काफी अरसे बाद दोबारा साथ काम कर रहे हैं.

फिल्म ‘हंटर’ भी एक ऐतिहासिक फिल्म है. इस फिल्म में मैं नागा साधु का किरदार निभा रहा हूं. डायरैक्टर नवदीप सिंह ने इस फिल्म को बहुत ही सलीके से बनाया है. जब आप यह फिल्म देखेंगे तो आप को इस बात का एहसास होगा.

इस फिल्म में मैं ने काफी मुश्किल स्टंट किए हैं. मैं ने तलवारबाजी की है, घुड़सवारी की है वगैरह.

नितिन कक्कड़ के डायरैक्शन में बनी फिल्म ‘जवानी जानेमन’ को आप प्रोड्यूस कर रहे हैं और उस में ऐक्टिंग भी कर रहे हैं. इस फिल्म में खास क्या है?

यह हलकीफुलकी घरेलू किस्म की रोमांटिक फिल्म है.

इन सब के अलावा आप और कौनकौन सी फिल्में कर रहे हैं?

एक फिल्म ‘गो गोवा गोन’ का सीक्वैल कर रहा हूं जिस में कुणाल खेमू और वीर दास हैं.

इस के अलावा अनुराग बसु की एक फिल्म कर रहा हूं जिस में मेरे साथ सोनाक्षी सिन्हा हीरोइन हैं. यह एक ड्रामा फिल्म है. इस फिल्म का नाम अभी नहीं रखा गया है.

अब आप ऐक्टर होने के साथसाथ प्रोड्यूसर भी हैं. ऐसे में जब आप किसी फिल्म में ऐक्टिंग करते हैं तो उस फिल्म में डायरैक्टर की दखलअंदाजी आप को पसंद आती है या आप असहज महसूस करते हैं?

नहीं, बिलकुल नहीं. मुझे कभी बुरा नहीं लगता. अगर डायरैक्टर मुझे किसी भी तरह गाइड करता है तो… बल्कि कई बार तो मुझे लगता है कि कुछ सही नहीं है तो भी मैं डायरैक्टर के काम में दखलअंदाजी नहीं करता, क्योंकि मेरा मानना है कि फिल्म बनाने में सब से मुश्किल काम डायरैक्टर का होता है. उस के दिमाग में उस वक्त क्या चल रहा है, वह हम कलाकारों को पता नहीं होता है, इसलिए जैसा डायरैक्टर साहब बोलते हैं, मैं वैसा ही काम करता हूं.

आप की बेटी सारा अली खान ने अपनी पहली ही फिल्म ‘केदारनाथ’ से दर्शकों के दिलों में जगह बना ली है. उस के बाद उन की फिल्म ‘सिंबा’ भी अच्छी चली थी. हर कोई उन की ऐक्टिंग की तारीफ कर रहा है. ऐसे में आप कितना खुश हैं?

मैं सारा का डैडी हूं तो जाहिर है कि मुझे उस की कामयाबी से खुशी होगी. सारा पहले से ही बहुत समझदार है. लिहाजा, मुझे थोड़ाबहुत तो अंदाजा था कि वह ऐक्टिंग में अपनी अलग जगह बनाने में कामयाब रहेगी.

क्या आप यह चाहते थे कि सारा पहले पढ़ाई पूरी करे और उस के बाद ही फिल्मों में आए?

हां, यह सच है. मैं चाहता था कि सारा पहले अपनी पढ़ाई पूरी करे, उस के बाद ही फिल्मों में आए, क्योंकि एक बार फिल्मों से जुड़ने के बाद पढ़ाई पूरी करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

एक हीरोइन का पिता कहलाना बतौर ऐक्टर आप के लिए कितना फायदेमंद और नुकसानदायक है?

हर मांबाप को अपने बच्चों की तरक्की पसंद होती है. सारा ने पहली ही बार में बाजी मार ली तो मुझ से ज्यादा खुशी किसी और को नहीं हो सकती.

जहां तक बतौर ऐक्टर एक हीरोइन का पिता होने का सवाल है तो अब इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है. अनिल कपूर के भी बेटाबेटी ऐक्टर बन चुके हैं, पर आज भी वे ऐवरग्रीन स्टार हैं.

अमितजी, जैकी श्रौफ सब के बच्चे भी इंडस्ट्री में हैं लेकिन पिताओं के कैरियर पर कोई फर्क नहीं पड़ा. आज सब इतने फिट हैं कि उम्र आड़े नहीं आती.

अमीरों की सरकार

अमीरों की सरकार  यह देश धीरेधीरे अमीर और गरीब की खाई में बंटता जा रहा है. 1947 के बाद बहुत से सरकारी काम गरीबों को सहूलियतें देने के लिए शुरू किए गए थे. इन में से कुछ में दिखावा था, कुछ में घटिया काम था पर फिर भी जो गरीब इन का फायदा उठा पाते थे, उन्हें कुछ राहत थी. अब सरकार खुल्लमखुल्ला अमीरों को जन्म से ऊंची जाति के होने की वजह से हर तरह की सहूलियत देने वाली नीतियां बना रही है और इस का नतीजा यह होगा कि निचली जाति में पैदा होने वाले गरीब अब और ज्यादा बेहाल होंगे.

इतना जरूर है कि अब सरकार के पास हाथ फैलाने वाले गरीबों की गिनती बढ़ती जा रही है. पहले वे अपने खोल में बंद रहते थे. अब बीसियों चुनाव देखने के बाद उन में हिम्मत आ गई है और अगर उन का हक बनता है तो वे मांगने लगे हैं. सरकार इतने गरीबों के लिए कुछ कर नहीं सकती इसलिए अब उस ने ऐसी नीतियां बनानी शुरू कर दी हैं कि अमीर अपने पैसे के बल पर अच्छी जिंदगी जी सकें और गरीब अपने पिछले जन्मों के पापों का फल भोगते हुए बस बाबाओं के चरणों में लोट कर शुद्ध हो सकें. बिहार के अस्पतालों में सैकड़ों बच्चे पिछले माह मरे थे, वे गरीबों के थे. इंसेफलाइटिस अगर अमीरों के बच्चों को हुआ भी होगा तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंगहोमों में जगह मिल गई थी जहां दवाएं एयरकंडीशनिंग, सफाई सब था. हजारों गरीबों को कौन मुफ्त में अस्पताल दे.

रेल मंत्रालय अब पटरियों पर प्राइवेट ट्रेनें चलाने की इजाजत देगा. इन पर बेहद महंगी पर बेहद सुविधाजनक, साफसुथरी, टाइम से ट्रेनें चलेंगी. सरकार ने कहना शुरू कर दिया है कि गरीबों के लिए सस्ते टिकटों का जमाना अब लद गया है. पढ़ाई में तो काफी सालों से यह नीति चल रही है. निजी स्कूल गांवगांव में खुल गए हैं जहां महंगी पढ़ाई दी जा रही है. सरकारी स्कूलों में दिखावा है और मोटे वेतन वाले टीचर बच्चों को पेपर बता कर 10वीं व 12वीं में पास करा कर रिजल्ट तो ठीक कर लेते हैं, पर वैसे कुछ करतेकराते नहीं हैं. इसीलिए 10वीं व 12वीं पास बेरोजगारों की बड़ी भीड़ पैदा हो गई है. सड़कों पर अब ऊबर, ओला चलने लगी हैं और सरकारी बसें न के बराबर रह गई हैं क्योंकि उतना सस्ता किराया ऊंचे लोगों को खलता है.

वैसे भी उन में हर जाति के लोग साथसाथ बैठने को मजबूर होते हैं. अरविंद केजरीवाल की औरतों को मुफ्त मैट्रो में सफर करने वाली स्कीम फेल कर दी जाएगी यह पक्का है क्योंकि फिर तो गरीबअमीर साथ बैठ सकेंगी. गरीब अपनी खाल में रहें. यह संदेश वे समझ लें. अब जन्म से तय होगा कि आप क्या पाने के हकदार हैं.

जातिवादी सोच का नतीजा है सपा बसपा की हार

लेखक- बापू राऊत

लगता था कि यह गठबंधन भारतीय जनता पार्टी को हरा देगा. इस के पीछे की कहानी भी सटीक और गणनात्मक थी. वह थी गोरखपुर और फूलपुर में हुए लोकसभा के उपचुनावों में इस गठबंधन के उम्मीदवारों की जीत.

ये दोनों जगहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के गढ़ के तौर पर जानी जाती थीं. गठबंधन के जमीनी, सामाजिक और जातीय आंकड़ों का पलड़ा भाजपा से कहीं ज्यादा भारी था लेकिन लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपाबसपा गठबंधन के जीतने की समाजशास्त्रियों व चुनावी पंडितों की सोच जमीन पर ही रह गई.

आंकड़ों की जांचपड़ताल से पता चलता है कि कांग्रेस से गठबंधन न होने से सपाबसपा को 10 सीटों पर नुकसान हुआ. भाजपा का वोट फीसदी साल 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 42.3 फीसदी से बढ़ कर 50.7 फीसदी हुआ और उसे 62 सीटों पर जीत हासिल हुई, जबकि सपाबसपा का सामूहिक प्रदर्शन खराब रहा.

साल 2019 में सपाबसपा ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उन में सपा का वोट शेयर 38.4 फीसदी और बसपा का 40.8 फीसदी था जो कुल वोट शेयर 39.6 फीसदी है.

10 सीटों के साथ बसपा का स्ट्राइक रेट 26.3 फीसदी है, जबकि 5 सीटों के साथ सपा का स्ट्राइक रेट 13.5 फीसदी है. इस से साफ होता है कि समाजवादी पार्टी के वोटरों ने गठबंधन का साथ नहीं निभाया.

चुनाव से पहले जैसे ही सपाबसपा का गठबंधन घोषित हुआ था, वैसे ही भाजपा ने छोटी जातियों पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे. उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग में 79 उपजातियां हैं. भाजपा ने यादव जातियों को छोड़ कर कुर्मी (4.5 फीसदी), लोध (2.1 फीसदी), निषाद (2.4 फीसदी), गुर्जर (2 फीसदी), तेली (2 फीसदी), कुम्हार (2 फीसदी), नाई

(1.5 फीसदी), सैनी (1.5 फीसदी), कहार (1.5 फीसदी), काछी (1.5 फीसदी) को सत्ता में भागीदारी के सपने दिखाए. नतीजतन, इन पिछड़ों के भाजपा को 26 से 27 फीसदी वोट मिले. उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों का वोट शेयर 22 से 23 फीसदी है. अनुसूचित जातियों में 65 उपजातियां हैं. यहां पर भी भाजपा ने जाटव को छोड़ कर गैरजाटव पासी (3.2 फीसदी), खटीक (1 फीसदी), धोबी (1.4 फीसदी), कोरी (1.3 फीसदी), बाल्मीकि (1 फीसदी) समुदाय को साथ लिया.

इन जातियों के 9 से 10 फीसदी वोट भाजपा को गए. इस तरह अनुसूचित जाति और पिछड़ों के कुल 37 फीसदी वोट भाजपा को मिले.

ऐसा क्या हुआ कि सपा केवल 5 सीटों और बसपा महज 10 सीटों तक ही सिमट कर रह गईं? 78 फीसदी वाला यह गठबंधन आखिर क्यों हारा? बहुजनवाद की सोच क्यों नहीं चली?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कह दिया, कि अंकगणित की जगह कैमिस्ट्री ने काम किया. सच में, क्या मोदीजी की जीत कैमिस्ट्री से हुई है या गठबंधन की हार जातिवादी सोच से?

इस कैमिस्ट्री की वजह कुछ इस तरह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह मंजे हुए रणनीतिकार हैं. साम, दाम, दंड, भेद, लालच और भावुकता में वे माहिर हैं.

नरेंद्र मोदी की नीति को विरोधी पार्टियां समझ नहीं सकीं. वे अपने गणितीय आंकड़ों में ही मशगूल रहीं. मोदीशाह की जोड़ी ने चुनावी प्रचार में धर्म, हिंदुत्व और मंदिर की राजनीति की. अनुसूचित जाति का हिस्सा रहे वाराणसी के संत रैदासजी के मंदिर में लंगर के लिए नरेंद्र मोदी बैठ गए थे. उन्होंने ‘समरसता भोज’ नाम से अनुसूचित जाति व पिछड़ों के घर भोज के लिए अपने नेताओं को कहा था.

मोदी भले ही दोषियों पर कार्यवाही न करें, लेकिन दलितों की हत्या पर भावुक हो कर रो देते हैं. वे मुसलिमों की लिंचिंग पर चुप रहते हैं. यह हिंदुओं के लिए एक सीधा मैसेज होता?है. वे खुद को गरीब बताते हैं. उन्होंने कुंभ मेले में सफाई मुलाजिमों के पैर धो कर बाल्मीकि समाज को अपनेपन का मैसेज दे दिया.

अमित शाह ने बहराइच में राजभर जाति के राजा सोहेलदेव की मूर्ति का अनावरण किया. उन्होंने सोहेलदेव को हिंदू रक्षक कह कर सोमनाथ मंदिर तोड़ने आए मुसलिम शासकों को हराने का दावा किया. यह कह कर अमित शाह ने पिछड़ों के वोट बैंक को गोलबंद करने का काम किया.

भाजपा ने गैरयादव समुदाय को समाजवादी पार्टी से और गैरजाटव समुदाय को बहुजन समाज पार्टी से तोड़ने की रणनीति बनाई.

भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य द्वारा अनुसूचित जाति और पिछड़ों के 150 सम्मेलन कराए. चुनाव के समय लंदन में नीरव मोदी को अरैस्ट किया गया. भाजपा ने इस का भी फायदा उठाया. बालाकोट में हुई सैनिकी कार्यवाही को हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ा. इन सारे मुद्दों ने नरेंद्र मोदी को जीत दिलाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी.

भाजपा की जीत में हमेशा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण संघ और दुर्गा वाहिनी जैसे संगठनों का हाथ रहा है. इन संगठनों के कार्यकर्ता कैडर बेस होते हैं और जिस का कैडर मजबूत होता है, उस पार्टी को चुनावों में हराना मुश्किल है. यह भविष्य में भाजपा विरोधियों के लिए बड़ी चुनौती है.

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में कोई कैडर बेस कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन नहीं है. समय आने पर गांधी परिवार को छोड़ सभी कांग्रेसी नेता भाजपा में शामिल हो सकते हैं क्योंकि कांग्रेसी नेताओं के लिए विचारधारा नहीं, बल्कि सत्ता अहम होती है.

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विभिन्न सामाजिक संस्थानों का कैडर बनाया था. वे फकीर के तौर पर थे, इसीलिए बहुजन समाज उन की छाया बन गया था, लेकिन मायावती द्वारा बसपा को संभालते ही कैडर को खत्म किया गया. राज्यों में जनाधार वाले नेताओं को पदों से हटा दिया गया.

मायावती पर पिछड़ी जाति के नेताओं की अनदेखी करने और ऊंची जाति को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है. केवल रिजर्व सीटों पर दलितों को टिकट दिया जाता है. बसपा में भाईभतीजावाद का आरोप अकसर लगता रहा है. इन सब का असर चुनावी नतीजों पर होना मुमकिन क्यों नहीं है?

मायावती द्वारा खुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदार घोषित करना भी इस गठबंधन की हार की वजह बन गया.

भारत की जातिवादी सोच इतनी मजबूत है कि वह आसानी से किसी भी दलित को प्रधानमंत्री बनने नहीं देगी. मायावती प्रधानमंत्री न बनें, इसीलिए यादवों और गैरयादवों ने भाजपा को वोट दिया. इस के साफ संकेत मिलते हैं. संघीय संस्थाओं ने इस का प्रचार भी किया. मायावती के प्रधानमंत्री बनने के डर से यादवों ने समाजवादी पार्टी को भी वोट नहीं दिए.

यही फर्क है अमेरिका और भारत की जनता में. वहां भी जनता बराक ओबामा को अपना राष्ट्रपति बना सकती?है, लेकिन भारत की जनता आज भी ऊंचनीच के दलदल में धंसी हुई

है. भारत की पुरानी जातिवादी सामाजिक संरचना आज भी टस से मस नहीं हुई  है. आने वाले समय में वह और ज्यादा मजबूत बनेगी.

आज भारत का भविष्य अंधेरों से टकरा रहा है. पता नहीं, उजालों के जलते दीए कब बंद कर दिए जाएंगे.

चालक भी आधी आबादी और सवारी भी

लेखक- शंकर जालान

देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के अलावा प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री व राज्यमंत्रियों के अलावा औरतें जज की, पायलट की, डाक्टर की, बस चालक की सीट पर तो पहले से ही बैठ चुकी हैं, अब देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले शहर कोलकाता में औरतें आटोरिकशा व टैक्सी की चालक सीट पर बैठी नजर आ रही हैं.

हालांकि फिलहाल महानगर के एक ही रूट पर ऐसे आटोरिकशा को शुरू किया गया है, लेकिन टैक्सियां कई जगहों पर चल रही हैं. इन की चालक सीट पर औरतें रहेंगी और उन में सफर करने वाली सवारियां भी औरतें ही रहेंगी.

पिंक यानी गुलाबी आटोरिकशा चलाने वाली औरतों को ट्रेनिंग देने वाले और आटोरिकशा यूनियन के नेता गोपाल सूतर ने बताया कि उन्हें इस बात की खुशी है कि उन की इस पहल पर अब राज्य सरकार का ध्यान गया है.

वे कहते हैं कि आज की औरतें किसी भी रूप में मर्दों से कम नहीं हैं. इस बात को इन औरतों ने अपनी मेहनत और लगन से साबित किया है.

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद ये औरतें अलगअलग रूटों पर आटोरिकशा चलाती नजर आएंगी, जिन में सिर्फ औरतें ही सफर करेंगी. इस सेवा को ‘पिंक सेवा’ नाम दिया गया है.

मौसमी कोलकाता की ऐसी पहली आटोरिकशा चालक बन गई हैं. भले ही उन्हें इस के लिए कई सालों तक कड़ी मेहनत करनी पड़ी हो, पर उन की मेहनत रंग लाई और आखिरकार बीते दिनों मौसमी का सपना पूरा हुआ.

मौसमी ने बताया कि उन्हें खुद पर इतना भरोसा था कि भले ही किसी काम को पूरा करने में देरी होगी, लेकिन वे लक्ष्य तक जरूर पहुंचेंगी.

मौसमी के साथसाथ दूसरी एक दर्जन औरतों को भी आटोरिकशा चलाने के लिए लाइसैंस मिल गया है, जिस के बाद वे कोलकाता की सड़कों पर आटोरिकशा चला सकेंगी.

मौसमी ने बताया कि जब वे 9 साल की थीं, तभी उन के पिता घर छोड़ कर चले गए थे. घर में मां के साथ 2 छोटी बहनों का क्या होगा, इस बात की चिंता उन्हें रहरह कर सताती थी. जिस उम्र में हाथ में किताबें और खिलौने होने चाहिए थे, उस उम्र में उन के हाथ में हथौड़ी, चाबी जैसे उपकरण थमा दिए गए.

घर का खर्चा सिर्फ गैराज में काम कर के नहीं चलता था, इसलिए गैराज में काम करने के बाद वे मौल के बाहर भीख मांगने को मजबूर थीं, ताकि अपनी मां के साथसाथ 2 छोटी बहनों का भी पेट पाल सकें.

मौसमी के मुताबिक, आटोगैराज में काम करतेकरते उन में औटोरिकशा चलाने की चाह जागी और उन्होंने उसी को अपना कैरियर बनाने की ठान ली.

अपनी लगन से मौसमी ने जो चाहा, वह कर के दिखाया. गैराज में काम करतेकरते वे आटोरिकशा के करीब होती गईं. सारा काम खत्म करने के बाद वे 2 घंटे निकालती थीं और आटोरिकशा चलाना सीखती थीं.

मौसमी कहती हैं, ‘‘कोई भी काम तब तक नहीं होता, जब तक आप में हिम्मत न हो. मेरी ललक और मेहनत को देख कर मेरे पति ने मेरा साथ दिया और हिम्मत बढ़ाई. अब लाइसैंस मिलने के बाद वे मुझ पर गर्व करते हैं.’’

गोपाल सूतर ने बताया कि पत्नी की मौत के बाद 2 बेटियों की जिम्मेदारी ने उन्हें सिखाया कि हर औरत को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए. इस के बाद उन्होंने औरतों को आटोरिकशा चलाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया.

पश्चिम बंगाल सरकार में परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा, ‘‘हम ‘गतिधारा’ योजना के तहत इस पहल को बढ़ावा देंगे. हम ने कुछ औरतों को रूट परमिट जारी कर दिए हैं. हमारे लिए यह अच्छी बात है कि अब हमारे शहर में भी औरतें आटोरिकशा ड्राइवर होंगी.’’

दक्षिण कोलकाता के टौलीगंज की चंद्रा रोजाना तड़के सुबह उठती हैं. लोगों के घरों तक अखबार पहुंचाती हैं. इस के बाद वे 2-4 ट्यूशन भी पढ़ाती हैं. बीच के समय में वे आटोरिकशा भी चलाती हैं. साल 2016 में उन्होंने आटोरिकशा चलाना सीखा था. जोगेश चंद्र चौधरी कालेज से उन्होंने बंगला औनर्स में पढ़ाई शुरू की थी. हालांकि दूसरा साल पूरा करने बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. चंद्रा की तरह ही महानगर के विभिन्न रूटों पर मौसमी, मुमताज बेगम, सावनी सूतारा, कृष्णा समेत तकरीबन 60 औरतें और बालिग लड़कियों ने आटोरिकशा की कमान अपने हाथों में ले ली है.        द्य

सेल्फी बनी दुश्मन !

‘सेल्फी’ की मकबुलियत बढ़ती जा रही है. और सच कहा जाए तो यह अपने चरमोत्कर्ष पर है. आज मोबाइल कैमरे के माध्यम से नन्हे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सेल्फी ले रहे  हैं. यह जीवन की खुशियों को बढ़ा रही है. याद कीजिए जब दस वर्ष पूर्व मोबाइल आ चुके थे मगर  उसमें सिर्फ एक ही कैमरा हुआ करता था. सेल्फी की सुविधा नहीं थी. जब नए सेल्फी मोड कैमरे आने लगे, मोबाइल कंपनियों ने सेल्फी की सुविधा देनी शुरू की तो मानो आम आदमी की दुनिया ही बदल गई.

एक वह वक्त भी था, जब अपना फोटो लेने के लिए हम दूसरे के मोहताज हुआ करते थे. मगर सेल्फी ने आकर हमारी दुनिया ही रंगों से भर  दी है.मगर यह भी सच है कि सेल्फी के कारण आज ऐसा कोई दिन नहीं होता जब कोई बंदा हलाक न हो जाता हो. सेल्फी लेने की धुन में अभी तक जाने कितनी जाने चली गई है इसका कोई सही आंकड़ा नहीं है आवश्यकता है जरूरत है संभलकर चलने की, सेल्फी के इस्तेमाल को समझदारी से करने की.

युवा वर्ग चपेट में….

सेल्फी लेने की धुन में युवा वर्ग ऐसा मद मस्त हो जाता है कि सब कुछ भूल जाता है और ऐसे में दबे पांव मौत आती है. सेल्फी के कारण जाने कितनी मौतें हो चुकी हैं जिसकी कोई गणना सरकार के पास नहीं है. मगर अक्सर अखबारों में सेल्फी के कारण हुई मौत पर खबरें बनती है यह खबर सुर्खियों में आती है और लोग भूल जाते हैं.

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मनोवैज्ञानिक डॉक्टर जी .आर. पंजवानी बताते हैं सेल्फी दरअसल जब जुनून बन जाती है तो दुर्घटना में तब्दील हो जाती है.  आवश्यकता है  होश में रहने और संभलकर सेल्फी लेने की . डॉक्टर पंजवानी बताते हैं सेल्फी से अधिकतम युवा वर्ग ही चपेटे में आता है इसका भी कारण है दरअसल युवा सेल्फी लेने वक्त खुशी से सारोबार हो जाता है और अपनी सुधबुध को भुला बैठता है, और तभी दुर्घटना कारित हो जाती है.

आवश्यकता समझाइस की….

रिटायर्ड पुलिस अधिकारी चंद्रमा सिंह राजपूत ने हमारे सवांददाता को सेल्फी प्रकरण में चर्चा करने पर विस्तार से बताया उन्होंने कुछ ऐसे प्रकरण हैंडल किए हैं जांच की है. उन्होंने बताया जब वे रायगढ़ जिला में पदस्थ थे तब वहां के मशहूर जल प्रताप में दो युवकों की सेल्फी लेते वक्त असामयिक मृत्यु हो गई थी . जांच में यह तथ्य सामने आए की वह उनकी चूक थी. उन्होंने बताया दरअसल युवा वर्ग जब कहीं पिकनिक स्पौट या किसी नए नई जगह या शहर जाता है तो खुशी से सरोबार होता है और आगे पीछे नहीं देखता तभी दुर्घटना हो जाती है. इसलिए परिजनों अभिभावकों को समझाइश देते रहना होगा. ऐसे मौके पर बच्चों पर निगाह रखनी चाहिए.

खतरनाक जगहों पर सावधानी

इंटरनेट, यूट्यूब पर जाने कितने समाचार सेल्फी दुर्घटनाओं से भरे पड़े हैं. जिन्हें देखकर यह आभास होता है कि क्या युवा पीढ़ी इनसे सबक नहीं लेगी ? बस्तर के चित्रकूट जलप्रपात, मध्य प्रदेश के भेड़ाघाट में सेल्फी लेते वक्त दुर्घटना हुई है .अब आने वाले वक्त में ऐसी दुर्घटनाजनक जगहों पर नोटिस बोर्ड, सुरक्षा गार्ड के इंतजाम की महती आवश्यकता है .

सेल्फी दरअसल एक जुनून है जिस पर चलकर युवा एक खुशी और रोमांच का अनुभव करता है .ट्रैनो में लटक कर सेल्फी लेना भी प्रचलन में है जो खतरनाक स्टंट है और सरकार द्वारा प्रतिबंधित है.

नोएडा में सख्ती से कानून का परिपालन जारी

सेल्फी सेल्फी के दरमियान दुर्घटना के पश्चात होने वाले नौटंकी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के भी दिशा निर्देश जारी हो चुके हैं. इस संबंध हमारे देश  में सबसे पहले नोएडा पुलिस ने एक्शन लिया है और सख्ती बरतनी प्रारंभ कर दी है .यह जानना जरूरी होगा कि सुप्रीम कोर्ट का दिशा निर्देश है कि दुर्घटना के दरम्यान अगर कोई सेल्फी लेता है,वीडियो बनाता है तो वो गलत है.

इसके मद्देनजर नोएडा पुलिस ने 10 जून से सुप्रीम कोर्ट के परिपालन मे दुर्घटना स्थल पर सेल्फी वीडियो बनाने पर जुर्माना लगाना प्रारंभ कर दिया है .यह लोग गिरफ्तार भी किए जा सकते हैं यह तमाशाबीनों पर लगाम लगाने की कवायद है जो अब देश भर में लागू होनी चाहिए. यही नहीं ऐसे वीडियो शेयर करने वालों पर 5000 का जुर्माना का भी प्रावधान  बन चुका है.

भारत बना सेल्फी डेथ कंट्री!

सेल्फी का क्रेज जानलेवा एडवेंचर में बदल चुका है . रायपुर में बाइक चलाते युवक की सेल्फी लेने के दरम्यान दुर्घटना में मौत सेल्फी की भयावहता दर्शाती है .हमारा देश अब सेल्फी डेथ कंट्रीज मैं शामिल हो चुका है. खतरनाक ढंग से सेल्फी लेने के दरम्यान दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है वहीं खतरनाक स्पाट पर सेल्फी लेना भी मृत्यु का कारण है.

एक सर्वे के मुताबिक दुनिया भर में सेल्फी के दरमियान जितनी मृत्यु हुई है उसमे आधी हमारे भारत देश में घटित हुई है जो चिंताजनक है.

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साइक्रेटिक इसे सेल्फीमेनिया का नाम दे रहे हैं जो एक तरह की बीमारी में बदल चुकी है. सेल्फी के दरम्यान रिस्क लेना और मौत को बुलाना बीमारी नहीं तो और क्या है ? यह इंटरनेट, फेसबुक पर लाइक के लिए भी युवा वर्ग कर रहा है. जिससे युवा वर्ग को बचना चाहिए.

हाल ही में एक व्यक्ति की सेल्फी एक शेर के साथ वायरल हुई, कोई सांप के साथ, तो कोई खतरनाक वन्य प्राणी के साथ सेल्फी ले रहा है और इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप पर मात्र लाइक के लिए अपलोड कर रहा है. वन्य प्राणियों के मध्य वर्षों से काम करने वाले वन अधिकारी मेहतर राम साहू( रेंजर)का कहना है ऐसा प्रयास जानलेवा साबित हो सकता है अतः इस प्रकार की सेल्फी से युवा वर्ग को बचना चाहिए .

नदी, तालाब, समुंद्र मैं सेल्फी लेते वक्त दुर्घटना हो सकती है, इसलिए सतर्कता आवश्यक है . गाड़ी चलाते वक्त गाड़ी से सर बाहर निकालकर सेल्फी लेना दुर्घटना को आमंत्रण देना ही है. पानी में मस्ती और सेल्फी या वीडियो बनाने की कितनी ही दुर्घटनाएं सुर्खियों में है. मगर इसके बावजूद हम इस मसले पर गंभीर नहीं है और भारत में सेल्फी के दरमियान मौते बदस्तूर जारी है  आवश्यकता समझदारी और बुद्धिमत्ता की है क्या आपकी जान से ज्यादा एक सेल्फी हो सकती है ?

अपना कातिल ढूंढने वाली महिला

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का डा. राममनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय देश भर में प्रसिद्ध है. थाना कृष्णानगर क्षेत्र में आने वाले इस विश्वविद्यालय की पार्किंग बाउंड्री वाल के बाहर है. 23 मार्च, 2019 को जब मौर्निंग वाक पर निकले कुछ लोग उधर से गुजरे तो उन की निगाह फुटपाथ पर पड़े एक बड़े से बैग पर चली गई.

सामान्य रूप से लोगों ने समझा कि या तो कोई अपना बैग वहां रख कर भूल गया है या मौर्निंग वाक पर आए किसी व्यक्ति ने उसे वहां रख दिया है, जो वापस लौटते वक्त ले लेगा. हालांकि बैग का बड़ा साइज इन संभावनाओं को नकार रहा था.

लेकिन लोगों की यह सोच तब बदल गई, जब लौटते समय भी उन्होंने बैग को वहीं पड़े देखा. बैग में विस्फोटक रखे होने की आशंका के चलते किसी ने भी उसे हाथ लगाने की हिम्मत नहीं की. इस से बेहतर यही था कि पुलिस को बुला लिया जाए. ऐसा ही किया भी गया.

सूचना मिलते ही थाना कृष्णानगर के थानाप्रभारी दिनेश मिश्रा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने बैग खोला तो उस के होश उड़ गए. बैग में 30-40 साल की किसी महिला का सिर, दोनों पैर और दोनों हाथ थे. बैग में 521 प्रीमियम राइस की 25 किलो की बोरी और बेबी क्लब का बैग निकले. चावल की बोरी में महिला के पैर और सिर था, जबकि बेबी क्लब के बैग में दोनों हाथ रखे हुए थे. मृतका ने सोने की अंगूठी पहन रखी थी और एक हाथ पर टैटू गुदा हुआ था.

हालफिलहाल पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि उस महिला के धड़ को कहां और कैसे खोजा जाए. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीमों ने धड़ को खोजने की कोशिश की. इस के लिए डौग स्क्वायड की भी मदद ली गई. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

एसएसपी कलानिधि नैथानी और सीओ लालप्रताप सिंह भी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने भी लाश के टुकड़ों और उस जगह को अपने नजरिए से देखा समझा. प्रथम संभावना में उस महिला को घरेलू हिंसा की शिकार माना गया.

अंतत: यह तय हुआ कि बरामद अंगों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया जाए और जितनी भी संभावनाएं हों, सभी की सिलसिलेवार जांच की जाए. पुलिस ने केस दर्ज कर के आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली. साथ ही जो भी तरीके हो सकते थे, पुलिस ने उन तरीकों से भी महिला की पहचान कराने की कोशिश की. साथ ही धड़ की खोजबीन भी जारी रखी.

जिस जगह पर बैग रखा मिला था, उस के आसपास की छानबीन में पुलिस को लाल स्याही से हाथ से लिखे एक पत्र के दरजनों टुकड़े मिले, जिन्हें समेट कर सावधानी से रख लिया गया. एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि अलसुबह 4 बजे जब वह मौर्निंग वाक पर जा रहा था तो उस ने एक व्यक्ति को पीठ पर बोरा लाद कर ले जाते देखा था. इतना ही नहीं, उस ने फुटपाथ पर बोरा भी उस के सामने ही रखा था.

पुलिस द्वारा सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गईं तो उन में से एक फुटेज में एक व्यक्ति को पीठ पर बैग लाद कर ले जाते हुए देखा गया. लेकिन बैग ले जा रहे व्यक्ति का चेहरा साफ नहीं था, इसलिए उसे पहचानना संभव नहीं था.

महिला की पहचान के लिए कोई रास्ता न निकलता देख पुलिस ने महिला के हाथ में पहनी अंगूठी, हाथ पर बने टैटू, लाश वाला बैग, उस के अंदर मिली चावल की बोरी और बेबी क्लब का बैग वगैरह चीजों का कोलाज बना कर जारी किया. साथ ही घोषणा की कि उस महिला की पहचान करने या उस के बारे में सूचना देने वाले को 25 हजार रुपए का नकद ईनाम दिया जाएगा.

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25 मार्च रविवार की सुबह बीबीखेड़ा निवासी महिला कीर्ति सिंह जब दूध ले कर लौट रही थी तो उस ने न्यू कांशीराम कालोनी के पास स्थित हैमिल्टन स्कूल के पीछे से गुजरते समय तेज बदबू महसूस की. उस ने देखा तो पौलीथिन में कुछ लिपटा नजर आया. कीर्ति ने घर जा कर यह बात अपने पति अमरेंद्र सिंह को बताई. अमरेंद्र ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के सूचना दे दी.

पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना पारा को दी. पुलिस ने वहां पहुंच कर देखा तो पौलीथिन में लिपटा उसी महिला का धड़ मिला, जिस का सिर और हाथपांव डा. राममनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के बाहर पार्किंग में पड़े थैले में रखे मिले थे. हत्यारे ने महिला के धड़ को लाल काले रंग की दरी में लपेट कर प्लास्टिक की बोरी में डाला था ताकि खून न बहे.

एसपी (पूर्व) सुरेशचंद रावत सहित क्राइम ब्रांच, फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड भी मौके पर पहुंचे. थाना पारा और थाना कृष्णानगर की पुलिस तो वहां थी ही. कृष्णानगर थानाक्षेत्र जहां महिला का सिर और पैर मिले थे, वहां से थाना पारा का वह इलाका जहां धड़ मिला था, के बीच 6 किलोमीटर की दूरी थी.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे ने कृष्णानगर या पारा के आसपास किसी घर में महिला की हत्या की होगी और लाश के टुकड़ों को 2 जगहों पर इसलिए फेंका होगा कि पुलिस असमंजस में पड़ जाए कि हत्या कृष्णानगर क्षेत्र में हुई या पारा क्षेत्र में. यह सब उस ने पुलिस से बचने के लिए किया होगा. पुलिस का यह भी अनुमान था कि हत्यारा कोई एक ही व्यक्ति रहा होगा.

प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने धड़ को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. धड़ और अन्य अंग एक ही महिला के हैं, इस का पता लगाने के लिए डीएनए कराने को लिखा गया. घटना का खुलासा जल्दी हो, इस के लिए एसएसपी कलानिधि नैथानी ने एसपी (पूर्वी) सुरेशचंद्र रावत के नेतृत्व में सीओ क्राइम, सीओ कृष्णानगर और डीसीआरबी प्रभारी को खुलासे की जिम्मेदारी सौंपते हुए 3 पुलिस टीमें बनाईं.

इन टीमों ने उसी दिन यानी 24 मार्च की शाम तक 20 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं. इस के साथ ही पुलिस अधिकारियों ने लखनऊ जोन के सभी जिलों के थानों में दर्ज महिलाओं की गुमशुदगी व अपहरण के मुकदमों की जानकारी मांगी. गहन छानबीन के मद्देनजर बीट के 100 सिपाहियों को घूमघूम कर महिला की पहचान कराने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में भेजा गया. महिला से संबंधित जानकारी पुलिस को देने के लिए जगहजगह पोस्टर भी लगवाए गए.

पारा क्षेत्र में रहने वाले बाबूलाल कनौजिया ने 25 मार्च को थाना पारा में गुमशुदगी दर्ज कराई कि उस का भाई सुनील कनौजिया 2 हफ्ते से लापता है. बाबूलाल ने यह भी बताया कि सुनील पिछले 4-5 महीने से अपनी पत्नी भारती पांडेय के साथ हंसखेड़ा, न्यू कांशीराम कालोनी में किराए के मकान में रह रहा था.

सुनील की कोई जानकारी न मिलने पर उस के भाई बाबूलाल ने थाना चौकी के चक्कर लगाने शुरू कर दिए थे. इस मामले की जांच कर रहे सबइंसपेक्टर ने सुनील के फोटो लगा पोस्टर छपवा कर विभिन्न जगहों पर लगवाने को कहा.

लेकिन बाबूलाल के पास सुनील का कोई फोटो नहीं था. अंतत: सुनील के गुम होने के 11वें दिन यानी 4 अप्रैल को फोटो की तलाश में जांच अधिकारी बाबूलाल के साथ सुनील के कमरे पर पहुंचे. ताला तोड़ने के अलावा उन के पास कोई विकल्प नहीं था.

ताला तोड़ कर कमरे के अंदर छानबीन की गई तो यह रहस्य सामने आया कि सुनील की पत्नी भारती पांडेय भी लापता थी. पुलिस ने कमरे से मिले सुनील और भारती पांडेय के सामूहिक फोटो और कृष्णानगर क्षेत्र में मिली लाश के अंगों के फोटो आसपड़ोस के लोगों को दिखाए तो कई लोगों ने सोने की अंगूठी, टैटू और चेहरा पहचान लिया. ये चीजें भारती पांडेय की ही थीं.

पुलिस ने कमरे को खंगाला तो टंकी के पाइप में रखे युवक के गीले कपड़ों पर खून के धब्बे नजर आए. इस के साथ ही यह बात भी साफ हो गई कि जिस महिला का धड़, सिर और अन्य अंग मिले थे, उस की हत्या इसी कमरे में की गई थी यानी वह भारती पांडेय ही थी.

छानबीन में भारती के बारे में कई जानकारियां मिलीं. पुलिस ने मकान मालिक दिलीप कुमार को बुला कर इस मामले में पूछताछ की. उस ने बताया कि भारती पांडेय नाम की महिला ने 5 महीने पहले 18 सौ रुपए महीने पर उन के मकान का कमरा किराए पर लिया था. उस ने आईडी की प्रति देते हुए बताया था कि वह नाका क्षेत्र की एक कंपनी में काम करती है. आईडी में भारती के पति का नाम रामगोपाल पांडेय और नाका के होलीग्राम स्कूल आर्यनगर का पता दर्ज था. इसपर पुलिस ने नाका क्षेत्र में रामगोपाल की तलाश शुरू की. जांच के दौरान खुलासा हुआ कि पश्चिम बंगाल के कोलकाता की मूल निवासी भारती पांडेय 12 साल पहले अपने बेटे राजकुमार के साथ लखनऊ आई थी. उस ने रामगोपाल पांडेय से दूसरी शादी की थी. बाद में उस ने रामगोपाल को छोड़ कर सुनील से शादी कर ली थी. सुनील से भारती को कोई बच्चा नहीं था.

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भारती ने पहली शादी कोलकाता में और दूसरी गोंडा के कर्नलगंज निवासी रामगोपाल पांडेय जो होलीग्राम स्कूल का रिक्शाचालक था, से की थी. रामगोपाल पांडेय ने भारती के बेटे राजकुमार को अपना लिया था. तीनों लोग नेवाजखेड़ा में रहने लगे थे. भारती इलाके की एक चाऊमीन फैक्ट्री में काम कर के घर के खर्च में हाथ बंटाने लगी थी. इस बीच उस ने 2 बेटियों चांदनी व लक्ष्मी को जन्म दिया था.

शव की शिनाख्त के लिए पुलिस की एक टीम भारती पांडेय के दूसरे पति रामगोपाल पांडेय की तलाश में गोंडा भेजी गई. पुलिस रामगोपाल व उस की एक बेटी को लखनऊ ले आई. रामगोपाल ने बैग में मिले शरीर के टुकड़ों की पहचान अपनी पूर्वपत्नी भारती पांडेय के रूप में कर दी.

रामगोपाल ने पुलिस को जानकारी दी कि भारती के पहले पति का बेटा राजकुमार पश्चिम बंगाल में अपनी ननिहाल में रहता है. कोलकाता से आई भारती 8 साल रामगोपाल की पत्नी बन कर उस के साथ रही. इस के बाद उस के संबंध सुनील कनौजिया से हो गए. भारती का हाथ थामने से पहले सुनील ने अपनी पहली पत्नी से नाता तोड़ लिया था.

बाबूलाल व अन्य लोगों से पूछताछ में खुलासा हुआ कि सुनील की पहली पत्नी इंदिरानगर इलाके में रहती है. भारती पांडेय की हत्या के बाद सुनील के पहली पत्नी के पास लौटने की संभावना को देखते हुए पुलिस ने जांच की, लेकिन सुनील वहां नहीं मिला.

छानबीन में पता चला कि चाऊमीन फैक्ट्री में काम करने के दौरान दिलफेंक भारती की आंखें फ्रेमिंग का काम करने वाले सुनील कनौजिया से लड़ गई थीं. सुनील एल्युमीनियम के फ्रेम तैयार करने वाली जिस दुकान में काम करता था, वह चाऊमीन फैक्ट्री के सामने थी. जब भी भारती फैक्ट्री से निकलती, उस की नजर दुकान पर काम करते सुनील पर ही टिकी होतीं. जब कभी नजरें मिल जातीं तो दोनों मुसकरा देते थे. यह सिलसिला काफी दिनों तक चला. इस बीच दोनों की बातचीत होने लगी और फिर दोस्ती हो गई.

कोलकाता से साथ लाए बेटे और रामगोपाल से पैदा अपनी दोनों बेटियों को छोड़ कर भारती ने साढ़े 3 साल पहले सुनील का हाथ थाम लिया था.

रामगोपाल ने दोनों बच्चियों की देखरेख के लिए भारती को काफी समझाया. लेकिन उस के सिर पर चढ़े इश्क के भूत के आगे उसे हार माननी पड़ी. भारती को समझाने का कोई नतीजा न निकलने पर वह तीनों बच्चों को ले कर गोंडा स्थित अपने घर चला गया.

भारती करीब ढाई साल सुनील के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रही. पिछले साल दोनों ने राजाजीपुरम की महिला शक्ति कल्याण समिति द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम में शादी कर ली थी.

पुलिस ने भारती व सुनील की शादी कराने वाली संस्था की अध्यक्ष रजनी यादव व कालोनी में रहने वाले भारती के पड़ोसियों से पूछताछ की. पता चला कि भारती का फिर किसी से अफेयर हो गया था और वह अकसर फोन पर बातचीत करती रहती थी, जिसे ले कर उस का पति सुनील उस पर शक करता था. वह उसे फोन पर बात करने से मना करता था, लेकिन भारती पर इस का कोई असर नहीं होता था.

भारती के आचरण पर शक

इसी बात को ले कर दोनों में आए दिन झगड़ा होने लगा था. इस पर भारती ने पति को छोड़ कर दिलीप कुमार के मकान में किराए का अलग कमरा ले लिया था. कई दिन तक भारती के न मिलने पर सुनील उस की तलाश करता रहा और आखिरकार किसी तरह उस के कमरे तक पहुंच ही गया.

सुनील ने उस से पूछा कि वह उसे अकेला छोड़ कर बिना बताए क्यों चली आई? इस बात को ले कर उस ने भारती को डांटाफटकारा, जिस ले कर दोनों में झगड़ा हो गया. हालांकि बाद में वह भारती के पास ही रहने लगा था. हालांकि कमरा लेते वक्त भारती ने मकान मालिक को बताया था कि उस का पति बाहर काम करता है और वह यहां अकेली रहेगी.

पुलिस ने भारती पांडेय के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगालने के बाद सुनील के भाई बाबूलाल से गहराई से पूछताछ की. सुनील अपने भाई बाबूलाल की दुकान पर ही काम करता था. पुलिस ने उसी दुकान के शीशा कटिंग व फ्रेमिंग के कारीगर प्रेमप्रकाश व नरेंद्र को हिरासत में ले कर पूछताछ की, ये दोनों भारती से परिचित थे.

पड़ताल में जुटे पुलिस अफसरों का मानना था कि तीसरा पति सुनील कनौजिया भारती की अन्य लोगों से नजदीकी से नाराज था, इसीलिए उस ने उस की हत्या की थी. हत्या में अन्य लोगों के शामिल होने की भी पुलिस गहनता से जांच में लग गई. पुलिस ने आशंका व्यक्त की कि फ्रेमिंग के लिए एल्युमीनियम काटने वाली आरी से भारती के शव के टुकड़े किए गए थे.

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पुलिस का मानना था कि फोन पर बातचीत को ले कर हुए विवाद के बाद 23 मार्च की रात में सुनील ने भारती की गला दबा कर हत्या की होगी और उस के बाद आरी से उस के टुकड़े किए होंगे. बाद में वह उन टुकड़ों को 2 अलगअलग जगहों पर फेंक कर फरार हो गया होगा. जांच के दौरान यह भी पता चला कि भारती का मोबाइल 22 मार्च को बंद हो गया था.

सुनील के बड़े भाई बाबूलाल ने पुलिस को बताया कि सुनील 24 मार्च की रात में उस के घर आया था. इस दौरान उस ने खाना भी खाया था. भतीजी ने जब सुनील से पूछा, ‘‘चाचा, चाची को साथ क्यों नहीं लाए?’’ तो सुनील ने कहा, ‘‘तुम्हारी चाची भारती अपने मायके गई हुई है.’’

सुनील ने 25 मार्च को अपना फोन स्विच्ड औफ कर लिया था. जिस के बाद से उस का कोई सुराग नहीं लग पा रहा था.

कमरे में टंकी के पाइप पर सुनील की पीली जींस व काली शर्ट पर खून के हलके धब्बों के अलावा कोई साक्ष्य नहीं मिला. इस पर एसएसपी कलानिधि नैथानी ने फोरैंसिक टीम भेज कर जांच कराई.

बेंजिडाइन टेस्ट में कमरे में रखे वाइपर, प्लास्टिक के टब, स्टील के मग और फर्श पर खून के धब्बे नजर आने लगे. फोरैंसिक जांच में सुनील की जींस और टीशर्ट पर मिले खून के धब्बों में भारती के ब्लड सेल्स मिलने की पुष्टि हुई. हालांकि सुनील ने पूरा कमरा साफ कर दिया था, लेकिन बेंजिडाइन टेस्ट की वजह से खून के धब्बे मिल ही गए.

पुलिस व क्राइम ब्रांच की टीम ने इस बीच विधि विश्वविद्यालय की तरफ जाने वाले विभिन्न मार्गों के सीसीटीवी कैमरों के 22 मार्च की शाम से 23 मार्च की सुबह तक के फुटेज खंगाले, लेकिन सुनील या अन्य कोई संदिग्ध नजर नहीं आया.

एक फुटेज में बैग लादे एक युवक दिखा भी, लेकिन उस का चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था. अपर पुलिस अधीक्षक नगर (पूर्वी) का कहना है कि मार्ग से गुजरे एक आटो को संदेह के घेरे में लिया गया है. आशंका है कि सुनील 22 मार्च की रात आटो या किसी अन्य वाहन से भारती पांडेय के हाथ, पैर व सिर से भरा बैग ले कर राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय के सामने उतरा होगा और वहां बैग को छोड़ कर चला गया होगा.

भारती का मोबाइल 22 मार्च को बंद हुआ. इस के अगले दिन कृष्णानगर इलाके में बैग में महिला के शरीर के टुकड़े और 24 मार्च को पारा इलाके में बोरी में धड़ बरामद होने की खबर विभिन्न अखबारों में छपी, टीवी चैनलों के साथ सोशल मीडिया पर भी वायरल हुई, लेकिन भारती के किसी भी दोस्त ने उस की सुध नहीं ली.

पुलिसकर्मियों ने उस के हाथ व चेहरे के फोटो ले कर कांशीराम कालोनी के लोगों से संपर्क किया, पोस्टर लगवाए, लेकिन उसे किसी ने नहीं पहचाना. न भारती के लापता होने की जानकारी पुलिस को दी. भारती का जेठ बाबूलाल भी चुप्पी साधे रहा. सुनील कनौजिया के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगालने पर पुलिस को पता चला कि उस ने 25 मार्च को अपने भाई बाबूलाल कनौजिया से बात करने के बाद फोन बंद कर लिया था.

इस पर पुलिस ने बाबूलाल से कड़ाई से पूछताछ की, तब खुलासा हुआ कि भारती की अन्य युवकों से दोस्ती के चलते सुनील बेहद नाराज था. जब सुनील 24 मार्च को भाई के घर खाना खाने आया तब उस ने पत्नी की हत्या की कोई जानकारी नहीं दी थी.

 

सुनील ने 25 मार्च को बाबूलाल को फोन किया था. उस ने बताया, ‘‘भाई, मैं ने अपनी भारती की हत्या कर दी है. उस के शव को भी ठिकाने लगा दिया है.’’

सुनील ने आगे कहा, ‘‘अब वह आत्महत्या करने जा रहा है.’’

बाबूलाल ने बताया कि वह सुनील से कुछ कहता, इस से पहले ही सुनील ने फोन काट दिया था. फिर उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. इस के बाद ही बाबूलाल ने पारा थाने में सुनील की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. भारती का मोबाइल 22 मार्च को बंद हुआ. इस के अगले ही दिन कृष्णानगर में बैग में उस की लाश मिली.

भारती की हत्या कर शव के टुकड़े करने के मामले में पुलिस आरोपित पति सुनील की लोकेशन का पता नहीं लगा पाई. हालांकि 25 मार्च के बाद से आरोपित का मोबाइल बंद है. इस मामले में पुलिस ने कई जगहों पर दबिश दी, लेकिन लापता कथित हत्यारे पति सुनील का कोई सुराग नहीं मिला.

इंसपेक्टर कृष्णानगर दिनेश मिश्रा के मुताबिक मामले की छानबीन की जा रही है. महिला के जेठ बाबूलाल से कई चरणों में पूछताछ की गई.

कपड़ों की तरह प्रेमियों को बदलने वाली स्वार्थी भारती ने अपने बच्चों की तरफ भी ध्यान नहीं दिया. उन्हें छोड़ कर उस ने अपने तीसरे प्रेमी के साथ शादी रचा ली. लेकिन जब वह चौथे प्रेमी से इश्क लड़ाने लगी तो उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. उस के तीसरे पति ने उस की हत्या कर उस की लाश को टुकड़ों में बांट दिया.  द्य

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रथयात्रा के यात्री

सुबह उठ कर बाहर आया तो देखा नेताजी बड़ी जल्दी में कहीं जा रहे हैं.

उन्हें रोकना चाहा तो कहने लगे, ‘‘अभी तो बड़ा व्यस्त हूं फिर मिलूंगा.’’

हम ने कहा, ‘‘भैया, अब ऐसी भी क्या व्यस्तता जो घड़ी दो घड़ी खड़े हो कर पान भी नहीं खा सकते? कम से कम एक पान तो खाते जाइए.’’

अब पान ठहरा नेताजी की कमजोरी, कमजोरी भी ऐसी जिस के लिए वह अपने सारे जरूरी काम किनारे कर सकते हैं. अत: कुछ सोच कर बोले, ‘‘अब आप इतना आग्रह कर रहे हैं तो आप की बात को रखते हुए पान तो मैं खा लेता हूं पर इस से ज्यादा समय मैं आप को बिलकुल नहीं दे पाऊंगा.’’

हम ने कहा, ‘‘ठीक है, पहले आप पान तो खाइए फिर बाद में देखते हैं.’’

इतना कह कर हम ने रामचरण को 2 पान लगाने का आर्डर दे कर नेताजी से पूछा, ‘‘क्या बात है, बहुत जल्दी में दिखाई दे रहे हैं?’’

वह बोले, ‘‘मत पूछिए, बहुत व्यस्त हूं. रात में 2 बजे तक जागने पर भी अभी तक काम पूरा नहीं हुआ है, आज उन का नगर आगमन होना है और अभी भी इतने सारे काम बाकी हैं, जाने क्या होगा?’’

हम ने अनजान बनते हुए पूछा, ‘‘तो क्या उन की रथयात्रा हमारे यहां से हो कर भी गुजरेगी?’’

उन्हें जोर का झटका लगा. बोले, ‘‘ भाईजी कैसी बात कर रहे हैं? यह सब स्वागत द्वार, झंडे, बैनर्स, पोस्टर्स अब उसी रथयात्रा का स्वागत करने के लिए ही तो लगाए गए हैं. यहां तो काम करकर के जान निकली जा रही है और आप पूछ रहे हैं कि यहां से भी रथयात्रा गुजरेगी?’’

हम ने सहलाने के अंदाज में कहा, ‘‘नाराज मत होइए, सबकुछ ठीकठाक हो जाएगा, निश्चिंत रहिए. आप ने चाहे राम का भला किया हो या न किया हो लेकिन राम आप का भला अवश्य करेंगे.’’

नेताजी फिर उखड़ गए, ‘‘कैसी बात कह गए आप? हमारे प्रयत्नों (रथयात्रा) से ही विवादित ढांचा ढहा और राममंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ. हम ने ही राम को मुगलकालीन दासता से मुक्ति दिला कर आजाद किया है, तो फिर आप कैसे कह सकते हैं कि हम ने राम का भला नहीं किया?’’

हम ने उन्हें शांत करते हुए बातों का रुख दूसरी ओर मोड़ा, ‘‘इन रथयात्राओं पर तो आप की पार्टी को अच्छा- खासा व्यय करना पड़ रहा होगा?’’

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हमारी बात की सहमति में सिर हिलाते हुए नेताजी ने कहा, ‘‘लेकिन हमारी भी मजबूरी है. राष्ट्र की सुरक्षा से जो खिलवाड़ केंद्र सरकार कर रही है और इस सरकार की अदूरदर्शिता भरी नीतियों से राष्ट्र की सुरक्षा को जो गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है उसी के विरोध में जनभावना जगाना, जनजागृति का विकास करना हमारी इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य है. इसलिए हम ने इस यात्रा का नाम ही ‘भारत सुरक्षा यात्रा’ रख दिया है. वैसे आप की जानकारी के लिए बता दूं कि अपने क्षेत्र में इस यात्रा का मैं ही प्रभारी हूं.’’

हम ने उन्हें बधाई दे कर अपनी तरफ से औपचारिकता की रस्म अदायगी की. हमारी बधाई को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हुए नेताजी बोले, ‘‘आश्चर्य है जिन यात्राओं के बारे में इतना कुछ लिखा, पढ़ा, सुना जा रहा है उस के बारे में मुझे आप को बताना पड़ रहा है.’’

अपनी अनभिज्ञता पर बिना किसी संकोच या शर्मिंदगी के हम ने कहा, ‘‘अब इतने सारे लोग, इतनी सारी यात्राएं निकाल रहे हैं तो व्यक्ति किसकिस को याद रखे, जब रोज ही कोई न कोई यात्रा निकल रही हो तो यह याद रखना भी तो मुश्किल हो जाता है कि किस ने किस उद्देश्य से यात्रा निकाली?’’

वह बोले, ‘‘फिर भी हमारी यात्राएं सब से अलग, सब से खास होती हैं, यही नहीं हमारी महान संस्कृति का एक अंग होती हैं.’’

‘‘सब से अलग तो आप हैं ही,’’ हमारे यह कहने पर वह बोले, ‘‘कैसे?’’

हम ने कहा, ‘‘समझते रहिए, यह पहेली. वैसे आप क्या सोचते हैं आप के यात्रा निकालने से राष्ट्र की सुरक्षा मजबूत होगी? क्या राष्ट्र सुरक्षा की भावना को बल प्रदान होगा?’’

वह बोले, ‘‘इन यात्राओं के पीछे उद्देश्य तो यही है.’’

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‘‘इस के पहले भी तो आप के नेताओं ने कईकई उद्देश्यों से कईकई यात्राएं की हैं,’’ हम ने कहा, ‘‘कभी राम मंदिर निर्माण के लिए तो कभी भारत की एकता के लिए, कभी सांप्रदायिक सद्भावना के लिए तो कभी तिरंगे के सम्मान के लिए, इस बीच कुछ उपयात्राएं भी आप लोगों ने कर डाली हैं. हमेशा नएनए मुद्दों पर आप के नेता यात्रा करते हैं लेकिन अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के बाद वे उन्हें भूल जाते हैं, जिन के लिए उन्होंने यात्रा की थी. मजाक में अब तो कुछ लोगों ने आप की पार्टी को ‘भारतीय यात्रा पार्टी’ कहना शुरू कर दिया है. इधर कोई घटना घटी नहीं उधर आप की पार्टी के नेता तैयार हो जाते हैं उस के विरोध में यात्रा निकालने के लिए.’’

कुछ तैश में आ कर नेताजी बोले, ‘‘आप को हमारी इन यात्राओं पर इतनी आपत्ति क्यों है? एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते हमारा अधिकार है अलगअलग राष्ट्रीय समस्याओं पर अपने विचारों से जनता को अवगत कराना, अपना विरोध जाहिर करना, अपनी नीतियों का प्रचार और उसे सर्वव्यापक, सर्वस्वीकार्य बनाना.’’

हम ने कहा, ‘‘वह सब तो ठीक है लेकिन इन यात्राओं के पीछे आप का छिपा हुआ उद्देश्य भी होता है.’’

‘‘यह तो लोगों की गलतफहमी है,’’ वह आराम से बोले. ‘‘हम तो शुरू से ही ‘साफ दिशा, स्पष्ट नीति’ वाले लोग हैं, राष्ट्रवाद का प्रचार करना और लोगों में राष्ट्रीयता की भावना भरना ही हमारी यात्राओं का एकमात्र उद्देश्य होता है.’’

हम ने कहा, ‘‘यदि आप के उद्देश्य जनहित के हैं तो विरोधी आप की यात्राओं पर इतना बवाल, विरोध क्यों करते हैं?’’

पान की पीक एक ओर को थूकते हुए नेताजी बोले, ‘‘भाईजी, यह सब तो हमारे विरोधियों की टुच्ची राजनीति है, उन की क्षुद्र मानसिकता है. वे हमारे हर अच्छे काम में राजनीति देखते हैं, उन की सोच राजनीति से ऊपर उठ ही नहीं सकती. यह सब कुप्रचार वही लोग करते हैं जो हमारी यात्राओं की सफलता देख नहीं सकते, हमारी लोकप्रियता से जलते हैं वे सब.’’

फिर भी यदि लोगों को परेशानी है तो आप क्यों नहीं इन रथयात्राओं को रोक देते? क्यों व्यर्थ में एक नए विवाद को जन्म देते हैं? आखिर क्या हासिल होता है आप को इन सब से?’’

हमारे इस सवाल पर गहरी नजर से उन्होंने हमें देखा फिर बोले, ‘‘आप कौन होते हैं, हमें सलाह देने वाले. अपना भलाबुरा हम बेहतर समझते हैं और जहां तक रथयात्राओं की बात है तो हमारी एक सफलता तो आप देख ही चुके हैं कि रथयात्रा की ही बदौलत हम जमीन से सीधे आसमान पर पहुंचे थे.’’ फिर कुछ तेज आवाज में कहने लगे, ‘‘क्या हासिल नहीं हुआ हमें रथयात्राओं से? सत्ता, धन, पावर सबकुछ तो हमें इन्हीं से मिला है तो क्यों छोड़ें हम अपनी रथयात्राएं? हमारी रथयात्राएं तो जारी रहेंगी चाहे कोई कुछ कहे, कोई कैसा भी विरोध करे हमारे रथ का पहिया अपने लक्ष्य पर पहुंच कर ही थमेगा.’’

हम पूछना चाह रहे थे कि आप को तो रथयात्राओं से सबकुछ हासिल हुआ पर जनता को…लेकिन हमारा प्रश्न गले में ही अटक कर रह गया क्योंकि नेताजी रथयात्रा की शेष तैयारियां देखने निकल पड़े थे.

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मोतीलाल वोरा बनाम रणछोड़दास गांधी!

छत्तीसगढ़ के निवासी राज्यसभा सदस्य 91 वर्षीय मोतीलाल वोरा को राहुल गांधी के अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से इस्तीफे के पश्चात अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया है. इस राजनीतिक घटनाक्रम के पश्चात जहां उनके गृह राज्य छत्तीसगढ़ में मिठाइयां बटी. वहीं गृह जिला दुर्ग में समर्थकों ने मिठाई बांटी और फटाखे फोड़ कर खुशी जाहिर की . नि:संदेह छत्तीसगढ़ का सम्मान मोतीलाल वोरा ने बढ़ा दिया साथ ही यह संदेश भी की राजनीति जैसे उठापटक के क्षेत्र में निष्ठा, समर्पण भी कोई चीज होती है और कभी-कभी यह आत्मासमर्पण आपको शिखर तक पहुंचा सकता है और यही हुआ भी.

मोतीलाल वोरा कांग्रेस के लंबे समय से कोषाध्यक्ष रहे हैं. सोनिया गांधी के प्रति उनकी निष्ठा असंदिग्ध है. यही कारण है कि नेशनल हेराल्ड मामले में भी वोरा सोनिया गांधी के साथ आरोपी हैं.

17 वी लोकसभा में कांग्रेस जिस तरह बुरी तरह चारों खाने चित्त हो गई उससे कांग्रेस भीतर तक हिल गई है.अध्यक्ष के नाते स्वंयम राहुल गांधी ने यह कल्पना नहीं की थी कि आक्रमक तेवर, राफेल मुद्दा, चौकीदार चोर है के प्रभावी नारों के पश्चात, गांव से लेकर शहर तक नरेंद्र मोदी के प्रति नाराजगी के बावजूद ‘कांग्रेस’ लुढ़क जाएगी. और नरेंद्र मोदी पुनः भारी बहुमत से संसद पहुंच जाएंगे,यही कारण है कि राहुल गांधी 25 मई 2019 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उखड़ गए और कहा मैं इस्तीफा देता हूं .

चार सप्ताह, हो गए पांच !

राहुल गांधी ने 25 मई को इस्तीफा की घोषणा कर कहा था की आप अपना नया ‘अध्यक्ष’ चुन लीजिए. मजे की बात यह की फिर एक माह यानी चार सप्ताह का समय एक तरह से अल्टीमेटम अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उन्होंने दिया और कहा इस वफ्के के भीतर, आप  अपना नया अध्यक्ष ढूंढ ले. मगर कांग्रेस सोती रही . कांग्रेस यह मानने को तैयार ही नहीं कि राहुल गांधी त्यागपत्र दे चुके हैं या दे देंगे या फिर हम आगे की सुधि लें .

…मोह में फंसी कांग्रेस को राहुल और प्रियंका गांधी के अलावा कुछ नजर ही नहीं आ रहा . शायद इसलिए कहावत बनी है सावन के अंधे को सब कुछ हरा हरा ही दिखाई देता है .

चार सप्ताह तक कांग्रेस सुषुप्तावस्था में रही. इस दरम्यान राहुल सदैव की भांति अपना काम करते रहे और एंग्री यंग मैन की भांति बीच बीच में गुर्राते रहे . अशोक गहलोत से लेकर कमलनाथ तक पर तंज कसा . छत्तीसगढ़ में मोहन मरकाम को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया. मगर सभी खामोश

टकटकी लगाकर उनकी ओर विनम्रता से देखते रहे . ऐसा करते करते 5 सप्ताह बीत गए कांग्रेसी मुख्यमंत्री, नेता, कार्यकर्ता अपील करते रहे मगर राहुल गांधी को शायद नहीं पसीजना था सो नहीं पसीजे. या फिर कहें राजनीतिक अपरिपक्वता के चलते गलतियां करते चले जा रहे हैं.

बुजुर्गवार ! मोतीलाल वोरा क्या करेंगे !

सोनिया गांधी राहुल गांधी ने एक माह तक चिंतन किया . अशोक गहलोत, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट से लेकर सुशील कुमार शिंदे आदि नामों पर बारंबार चिंतन किया कि आखिर किस के कंधे पर ‘कांग्रेस’ की तोप को रखा जाए कौन है ऐसा समर्पित, निष्ठावान. सभी पर तीक्ष्ण दृष्टि डाली गई. मगर कहते हैं न दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है यहां भी यही कुछ घटित हुआ. देश को मालूम है की सोनिया गांधी ने प्रणव मुखर्जी पर बहुत भरोसा किया उन्हें बड़े बड़े पद दिए  द्वितीय नंबर पर सदैव रहे मगर सिर्फ नहीं बनाया तो प्रधानमंत्री. आज प्रणव मुखर्जी नरेंद्र मोदी की गोद में जाकर बैठ गए हैं .उनकी प्रशंसा कर रहे हैं आर एस एस के बुलावे पर दौड़े चले जाते हैं .यह घटनाक्रम सोनिया राहुल गांधी को सालता है. और सचेत भी करता है. इसलिए प्रणव मुखर्जी सृदृश्य दूसरी गलती गांधी परिवार अब नहीं करना चाहता.

यही कारण है कि ठोक बजाकर कांग्रेस पार्टी के सबसे बुजुर्गवार, समर्पित शख्स मोतीलाल वोरा को राहुल गांधी ने अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया है.अब मोतीलाल वोरा के कंधे पर रखकर राहुल गांधी बंदूक चलाएंगे यह तय है . सवाल है आगे क्या चुनाव कराया जाएगा या फिर कार्यसमिति एक मतेन किसी शख्स को ‘अध्यक्ष’ बनाएगी.

क्या राहुल “कांग्रेस” का देश का हित चाहते हैं ?

संपूर्ण घटनाक्रम का एक ही प्रति प्रश्न है क्या राहुल गांधी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 86 वे अध्यक्ष के रूप में जाते-जाते भी कांग्रेस का हित चाहते हैं या फिर कोई अदृश्य हित है जो गांधी परिवार से जुड़ा हुआ है.

लोकसभा समर मैं पूरी तरह हार के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस की आंखे खुल गई है.यह परिवार अब यह समझ और मान रहा  है कि नरेंद्र मोदी   टीम के सामने उनकी एक भी नहीं चलने वाली और कांग्रेस पार्टी दिनोंदिन और मरणासन्न होने वाली है.

नरेंद्र मोदी की नीतियां, हाव भाव, देश के समक्ष विराट स्वरूप ग्रहण कर चुका है . ऐसा मानकर राहुल गांधी परिवार के कदम ठिठक गए हैं .ऐसे में उनके पास तुरुप का पत्ता सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस पार्टी में निर्वाचन का है चुनाव का है. लोकतंत्र में लोकतांत्रिक पद्धति ही ऊर्जा का स्रोत होती है मगर कांग्रेस सिर्फ दरी उठाने वालों की पार्टी बन कर रह गई है योग्य सुयोग्य कार्यकर्ता मन मार कर दरी उठाए जा रहे हैं. अब ऐसे हालात में गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी का हित इसी में है कि चुनाव का ऐलान कर दिया जाता निष्पक्ष चुनाव से नए चेहरे स्वमेव सामने आ जाते.अभी तो अपनी ढपली अपना राग वाले हालात ही बने हुए हैं.

वोरा है या बोरा है

मोतीलाल वोरा नि:संदेह एक वरिष्ठतम कांग्रेस नेता है. 91वर्ष की उम्र में भी सक्रिय हैं. मगर सवाल यह है कि क्या 91 वर्ष के शख्स के पास नवीन ऊर्जा, दृष्टि हो सकती है क्या वह अंतरिम अध्यक्ष रहते हुए ऐसा कोई कमाल कर सकते हैं की कांग्रेस आज मरणासन्न खटिया पर पड़ी कराह रही है के शरीर में नवीन रक्त का संचार कर दे.

साफ-साफ कहा जा सकता है यह राहुल गांधी की एक और बहुत बड़ी चूक है.बुजुर्गवार वोरा जब अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री राजीव गांधी की कृपा दृष्टि से बनाए गए थे तब प्रदेश में उनके नाम चुटकुला प्रचलित था कि “आप वोरा हैं या बोरा है !”  बोरा अर्थात बारदाना जिसमें गेहूं, चावल, शक्कर डालकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जाता है.

मूलतः धौलपुर राजस्थान के निवासी मोतीलाल वोरा छत्तीसगढ़ के दुर्ग के रहवासी हैं सन 72 में पहली दफे विधायक बने अर्जुन सिंह कैबिनेट में शिक्षा मंत्री फिर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, राज्यपाल रहते हुए आप पार्टी के कोषाध्यक्ष भी रहे. कांग्रेस समय के साथ चलने में असमर्थ हो चुकी है. बारंबार गलतियां कर रही है.जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिल रहा है. यह तय है कि राहुल गांधी राजनीति का मैदान छोड़कर नहीं जा रहे हैं जब आप को राजनीति करनी है, भारत की सेवा करनी है तो यह कौन सा तरीका है भाई… पलायन का.

जस्सी गिल के ये लुक्स हैं डेट पर जाने के लिए परफेक्ट

पंजाब इंडस्ट्री के पौपुलर सिंगर और एक्टर जस्सी गिल अपने सौंग्स को लेकर हमेशा अपने फैंस के बीच चर्चा में रहते हैं. ना सिर्फ लड़कियां बल्कि लड़के भी इनके गानों और लुक्स के दीवाने हैं. जस्सी गिल ने म्यूजिक वीडियो के साथ कई हिट फिल्में भी की हैं. जस्सी अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से अक्सर अपनी इन्प्रेसिव लुक्स से फैंस का दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोडते, तो अगर आप भी अपने लुक्स से बनना चाहते हैं सबके फेवरेट तो ट्राय करें उनके कुछ चुनिंदा लुक्स.

जस्सी गिल का कैसुअल लुक…

 

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#Yellowlove

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जस्सी गिल ने अपने इस आउट-फिट में यैल्लो ब्लैक कलर की लौंग प्रिंटेड टी-शर्ट के साथ ब्लैक कलर की जींस पहनी हुई है. साथ ही में उन्होनें यैल्लो कलर के ही शूज पहने हुए हैं. इस कैजुअल लुक में जस्सी काफी स्मार्ट नजर आ रहै हैं. आप भी जस्सी गिल का ये कैजुअल लुक अपनी डेली-रूटीन में ट्राय कर सकते हैं.

कौलेज में ट्राय करें जस्सी गिल का ये लुक…

 

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Main sunea mere naam wali Tu gaani gal vch pa layi nii 🙈

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जस्सी गिल अपने इस लुक में काफी हैंडसम लग रहे हैं. जस्सी ने इस लुक में व्हाइट कलर की प्लेन टी-शर्ट के ऊपर यैल्लो कलर की शर्ट पहनी हुई है. इस लुक के साथ जस्सी ने ब्लू कलर की ‘rugged’ जींस पहनी है जो की उन पर काफी सूट कर रही है. आप भी जस्सी गिल का ये लुक ट्राय कर अपने कौलेज में सबको इम्प्रेस कर सकते हैं.

ट्राय करें जस्सी गिल का पार्टी लुक…

 

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Thanks for this amazing outfit @obsessionbymayur bai .. you are the best bro nd my fav 🤗 #SurmaKaala 12th April 😍

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इस लुक जस्सी गिल व्हाइट कलर की शर्ट के साथ थ्री-पीस सूट पहने नज़र आ रहे हैं. जस्सी ने व्हाइट कलर की शर्ट के ऊपर ब्लैक बेस कोट और फ्लावर प्रिंटेड ब्लेजर और साथ में ब्लैक कलर का ट्राउजर पहना हुआ है. आप भी अपने फैमिली फंक्शन्स या कौलेज पार्टी में जस्सी गिल का ये लुक ट्राय कर सकते हैं.

जस्सी गिल का ट्रेंडी लुक…

 

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Poster Audio Video all done 👍🏻 Be ready guys 🤗 #NextSingle

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जस्सी गिल ने अपने इस ट्रेंडी लुक में व्हाइट राउंड नैक टी-शर्ट के ऊपर औरेंड कलर की शर्ट और साथ में ब्लैक कलर की जींस पहनी हुई है. जस्सी ने इस लुक के साथ औरेंज कलर के ही शूज़ पहने हुए हैं जो कि काफी अच्छे लग रहे हैं. आप भी ये लुक अपनी गर्लफ्रेंड के साथ डेट पर ट्राय कर उन्हें इम्प्रेस कर सकते हैं.

बता दें, जस्सी गिल का पूरा नाम “जसदीप सिंह गिल” है. जस्सी ने ‘लैंसर’, ‘गीटार सिखदा’, ‘निकले करंट’ ‘दिल तों ब्लैक’ जैसे बहुत सारे सुपर हीट पंजाबी सौंग्स के साथ कई फिल्मों में भी लीड रोल निभाया है जैसे कि- ‘दिलदारियां’, ‘हाई एंड यारियां’, ‘सर्गी’ आदि.

संविधान पर खतरा 

आम लोगों को एक सरकार से बहुत उम्मीदें होती हैं चाहे हर 5 साल बाद पता चले कि सरकार उम्मीदों पर पूरी नहीं उतरी. सरकार चलाने वालों के वादे असल में पंडेपुजारियों की तरह होते हैं कि हमें दान दो, सुख मिलेगा. हमें वोट दो, पैसा बरसेगा. अब के तो जैसे हम लोगों ने पंडेपुजारियों को ही संसद में चुन कर भेजा है. यह तब पक्का हो गया जब संसद सदस्यों ने लोकसभा में शपथ ली.

भाजपा सांसद कभी गुरुओं का नाम लेते, कभी ‘भारत माता की जय’ का नारा बोलते, तो कभी ‘वंदे मातरम’ और ‘जय श्रीराम’ एकसुर में चिल्लाते रहे. यह सीन एक धीरगंभीर लोकसभा का नहीं, एक प्रवचन सुनने के लिए जमा हुई भीड़ का सा लगने लगा था. भाजपा की यह जीत धर्म के दुकानदारों, धर्म की देन जातिवाद के रखवालों, हिंदू राष्ट्र की सपनीली जिंदगी की उम्मीदें लगाए थोड़े से लोगों की अगुआई वाली पार्टी के अंधे समर्थकों को चाहे अच्छी लगे, पर यह देश में एक गहरी खाई खोद रही हो, तो पता नहीं.

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जिन्हें हिंदू धर्मग्रंथों का पता है वे तो जानते हैं कि हम किस कंकड़ भरे रास्ते पर चल रहे हैं जहां झंडा उठाने वाले और जयजयकार करने वाले तो हैं, पर काम करने वाले कम हैं. ज्यादातर धर्मग्रंथ, हर धर्म के, चमत्कारों की झूठी कहानियों से भरे हैं. ये कहानियां सुनने में अच्छी लगती हैं पर जब इन को जीवन पर थोपा जाता है तो सिर्फ भेदभाव, डर, हिंसा, लूट, बलात्कार मिलता है.

सदियों से दुनियाभर में अगर लोगों को सताया गया है तो धर्म के नाम पर बहुत ज्यादा यह राजा की अपनी तानाशाही की वजह से बहुत कम था. पिछले 65 सालों में कांग्रेस का राज भी धर्म का राज था पर ऐसा जिस में हर धर्म को छूट थी कि अपने लोगों को मूर्ख बना कर लूटो. अब यह छूट एक धर्म केवल अपने लिए रखना चाह रहा है और संसद के पहले 2 दिनों में ही यह बात साफ हो रही थी.

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दुनिया के सारे संविधानों की तरह हमारा संविधान भी धर्म का हक देता है पर सभी जगह संविधान बनाने वाले भूल गए हैं कि धर्म का दुश्मन नंबर एक जनता का ही बनाया गया संविधान है. यह तो पिछले 300 सालों की पढ़ाई व नई सोच का कमाल है कि दुनिया के लगभग हर देश में एक जनप्रतिनिधि सभा द्वारा बनाया गया संविधान धर्म के भगवान के दिए कहलाए जाने वाले सामाजिक कानून के ऊपर छा गया है. अब भारत में कम से कम यह कोशिश की जा रही है कि हजारों साल पुराना धर्म का आदेश नए संविधान के ऊपर मढ़ दिया जाए.

सांसदों का शपथ लेने का पहला काम तो यही दर्शाता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी अपने वादों को याद रखेगी जो विकास और विश्वास के हैं न कि उन नारों के जो संसद में सुनाई दिए गए.

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