लेखक- बापू राऊत

लगता था कि यह गठबंधन भारतीय जनता पार्टी को हरा देगा. इस के पीछे की कहानी भी सटीक और गणनात्मक थी. वह थी गोरखपुर और फूलपुर में हुए लोकसभा के उपचुनावों में इस गठबंधन के उम्मीदवारों की जीत.

ये दोनों जगहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के गढ़ के तौर पर जानी जाती थीं. गठबंधन के जमीनी, सामाजिक और जातीय आंकड़ों का पलड़ा भाजपा से कहीं ज्यादा भारी था लेकिन लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपाबसपा गठबंधन के जीतने की समाजशास्त्रियों व चुनावी पंडितों की सोच जमीन पर ही रह गई.

आंकड़ों की जांचपड़ताल से पता चलता है कि कांग्रेस से गठबंधन न होने से सपाबसपा को 10 सीटों पर नुकसान हुआ. भाजपा का वोट फीसदी साल 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 42.3 फीसदी से बढ़ कर 50.7 फीसदी हुआ और उसे 62 सीटों पर जीत हासिल हुई, जबकि सपाबसपा का सामूहिक प्रदर्शन खराब रहा.

साल 2019 में सपाबसपा ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उन में सपा का वोट शेयर 38.4 फीसदी और बसपा का 40.8 फीसदी था जो कुल वोट शेयर 39.6 फीसदी है.

10 सीटों के साथ बसपा का स्ट्राइक रेट 26.3 फीसदी है, जबकि 5 सीटों के साथ सपा का स्ट्राइक रेट 13.5 फीसदी है. इस से साफ होता है कि समाजवादी पार्टी के वोटरों ने गठबंधन का साथ नहीं निभाया.

चुनाव से पहले जैसे ही सपाबसपा का गठबंधन घोषित हुआ था, वैसे ही भाजपा ने छोटी जातियों पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे. उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग में 79 उपजातियां हैं. भाजपा ने यादव जातियों को छोड़ कर कुर्मी (4.5 फीसदी), लोध (2.1 फीसदी), निषाद (2.4 फीसदी), गुर्जर (2 फीसदी), तेली (2 फीसदी), कुम्हार (2 फीसदी), नाई

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD10
 
सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 महीना)
USD2
 
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...