मिलन

साधना श्रीवास्तव ‘योगेश’

प्रांजल और हिमालय दोनों बचपन से ही दोस्त रहे. नौकरी व विवाह के बाद भी उन की निकटता बनी रही. प्रांजल की पत्नी भावना को हिमालय की पत्नी रचना का साथ भी अच्छा लगता. दोनों मित्रों की पत्नियां जबतब बतियाती रहतीं. प्रांजल की दोनों बेटियां मीता व गीता अपनी पढ़ाई लगभग पूरी कर चुकी थीं और बेटा उज्ज्वल अभी डाक्टरी के तीसरे वर्ष में पढ़ रहा था.

मीता की शादी में हिमालय अपने बेटे सौरभ व बेटी ऋचा के साथ मुंबई यथासमय पहुंच गए थे. दोनों परिवार के बच्चे जब एकदूसरे के साथ रहे तो संबंध और भी पक्के हो गए.

एक दिन अचानक प्रांजल को हिमालय से अत्यंत दुखद समाचार मिला. उस की पत्नी रचना रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सीढि़यों से फिसल कर गिर जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गई है. प्रांजल और भावना के मुंबई पहुंचने से पहले ही रचना की मृत्यु हो गई.

बचपन के मित्र के कष्ट को समझते हुए भी प्रांजल और भावना संवेदना के दो शब्द के अलावा कुछ भी समझा नहीं पाए. हिमालय दुखी व नितांत अकेले रह गए थे. उन की बेटी ऋचा ससुराल में थी और सौरभ की भी नौकरी दूसरे शहर में थी. लौटते हुए हिमालय से वे कह कर आए थे, ‘जब भी मन करे हमारे पास आ जाया करना…मन कुछ बदल जाएगा.’

प्रांजल के बेटे उज्ज्वल के विवाह पर हिमालय मित्र के आग्रह पर कुछ पहले आए थे. मीता और गीता के विवाह में वह पत्नी रचना के साथ आए थे…वे दिन आंखों के सामने बारबार आ जाते. प्रांजल और भावना उन के दुख को समझ रहे थे अत: उन्हें हर तरह से व्यस्त रखने का प्रयास करते ताकि मित्र अपनी पीड़ा को कुछ सीमा तक भुला सके.

बाद में हिमालय का मन अपने अकेलेपन से बहुत उचाट होता तो वह प्रांजल के पास ही आ जाते.

मुश्किल से 2 साल गुजरे होंगे कि प्रांजल भी गंभीर रूप से बीमार हो गए और केवल एक माह की बीमारी के बाद भावना अकेली रह गई.

बेटियां और उज्ज्वल भावना को बारीबारी से अपने साथ ले भी गए पर वह 3-4 महीने में घूमफिर कर दोबारा अपने घरौंदे में वापस आ गई…पति के साथ सुखदुख की यादों के बीच.

उसे घर में हर तरफ प्रांजल ही दिखाई पड़ते…कभी ऐसा आभास होता कि प्रांजल किचन में उस के पीछे आ कर खड़े हैं और दूसरे ही क्षण उसे लगता…जैसे प्रांजल उसे समझा रहे हैं कि मैं तुम से दूर नहीं हूं भावना बल्कि तुम्हारे बिलकुल पास हूं…और भावना चौंक पड़ती.

भावना का अपने बच्चों के पास मन नहीं लगा. जब हिमालय ने यह सुना तो हिम्मत कर के कुछ दिन का अवकाश ले कर भावना के पास आए. उन्हें देख कर भावना बिफर पड़ी…प्रांजल की यादें जो ताजा हो गईं…जब रचना नहीं रही…और हिमालय आते तो प्रांजल बारबार भावना से कहते, ‘मैं चाहता हूं जो चीजें नाश्ते व भोजन में हिमालय को पसंद हैं…वही बनें. जब तक वह हमारे साथ है हम उस की ही पसंद का खाना व नाश्ता करेंगे.’

भावना प्रांजल की बात इसलिए नहीं रखती कि हिमालय उस के पति के दोस्त हैं…बल्कि इस का दूसरा कारण भी था कि रचना की मृत्यु से हिमालय के प्रति उसे गहरी सहानुभूति हो गई थी. लेकिन अब? अब सबकुछ परिवर्तित रूप में था…अब भावना किचन में घुसती ही नहीं. हिमालय ही जो कुछ बना सकते थे, बना लेते पर खाते दोनों साथसाथ.

भावना ने काफी समय तक बातें भी न के बराबर कीं. हिमालय कहते तो वह तटस्थ सी सुनती. जवाब नपेतुले शब्दों में देती.

हिमालय स्वयं चोट खाए हुए थे इसलिए भावना की पीड़ा को समझते थे. वह उसे समझाने का प्रयास जरूर करते, ‘‘जीवन मृत्यु में किसी का दखल नहीं चलता. इनसान खुद परिस्थितियों के अनुसार जीवन व्यतीत करने को मजबूर है. घाव कुछ हलका होने पर इनसान स्वयं अपने आसपास छोटीमोटी खुशियां खोजने का प्रयास करे. हमें इस तथ्य को अपना कर ही चलना होगा, भावनाजी.’’

भावना की आंखों से बस, आंसू टपकते रहते…वह बोलती कुछ नहीं. हिमालय जाने लगे तो भावना से यह वादा जरूर लिया कि वह अपने खानेपीने का पूरा ध्यान रखेगी. मन ठीक नहीं है तो क्या तन को स्वस्थ रखना जरूरी है.

समय के मरहम से भावना का घाव भरा तो हिमालय का जबतब आना उसे अच्छा लगने लगा…बातें भी करनी शुरू कर दीं. नाश्ताभोजन भी उन के पसंद का बनाने लगी. हिमालय को भी भावना के यहां आना अच्छा लगता.

मीता, गीता व उज्ज्वल भावना से मिलने आए हुए थे. तभी हिमालय भी आ गए थे. बेटियां चाह रही थीं कि मां उन के साथ या भाई के साथ चलें लेकिन भावना तैयार नहीं हुईं. उन का कहना था कि उन्हें अपने इसी घर में अच्छा लगता है.

बच्चे मां को समझ रहे थे…जहां उन्हें अच्छा लगे वहीं रहें. हां, उन्हें इस बात का अंदाजा जरूर लग गया था कि हिमालय अंकल के यहां रहने से मां के मन को कुछ ठीक लगता है. अंकल बरसों से उन के पारिवारिक मित्र रहे हैं और काफी समय उन लोगों ने साथसाथ गुजारा भी है. मीता और उज्ज्वल सोच रहे थे कि हिमालय अंकल जितना भी मां के साथ रह लेते हैं, कम से कम उतने समय तो वे लोग मां की तरफ से निश्चिंत से रहते हैं.

वैसे बच्चे चाहते कि उन में से कोई एक मां के पास अवश्य रहे लेकिन जब यह संभव नहीं था तो वे हिमालय अंकल पर ही निर्भर होने लगे और साग्रह उन से कहते भी, ‘‘अंकल, हम मां पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालना चाहते पर आप से आग्रह करते हैं कि उन का हालचाल पूछते रहेंगे. हम लोग भी यथासंभव शीघ्र आने का प्रयास करते रहेंगे.’’

एक दिन हिमालय ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘भावना, मैं समझता हूं कि तुम्हारा कष्ट ऐसा है जिस का भागीदार कोई नहीं हो सकता. फिर भी हिम्मत कर के कह रहा हूं…यदि आप अपने जीवन में किसी हैसियत से मुझे शामिल करना चाहो तो मैं आप की शर्तों के साथ आप को स्वीकार करने को सहर्ष तैयार हूं. इस से न केवल एक को बल्कि दोनों को सहारा और बल मिलेगा.’’

थोड़ा विराम दे कर हिमालय ने पुन: कहा, ‘‘आप के हर निर्णय का मैं सम्मान करूंगा. आप इस बात से भी निश्चिंत रहिए कि हमारी दोस्ती के रिश्ते पर कोई आंच नहीं आएगी.’’

भावना ने पलक उठा कर हिमालय की तरफ देखा. वह मन से यही चाहती थी, हिमालय की बात अपनी जगह सही है. अब वह भी खुद को प्रांजल के अभाव में अकेली और बेसहारा अनुभव करती है. वह कोई गलत अथवा अनुचित कदम उठाना नहीं चाहती…उस के समक्ष उस का परिवार है, बच्चे हैं और सब से बड़ा समाज है. हिमालय की बात का कुछ जवाब दिए बिना वह किचन की तरफ बढ़ गई. हिमालय ने भी फिर कुछ कहा नहीं.

हिमालय के बेटे सौरभ व बेटी ऋचा को यह पता था कि जब से मां मरी हैं पिताजी बहुत दुखी, उदास व नितांत अकेले हैं. यह बात दोनों बच्चे अच्छी तरह जानते थे कि पापा को प्रांजल अंकल और भावना आंटी के यहां जाना हमेशा ही अच्छा लगता रहा, और आज जब आंटी नितांत अकेली व दुखी हो गई हैं, तब भी.

सौरभ ने ही ऋचा से कहा, ‘‘क्यों न हम भावना आंटी के मन का अंदाजा लगाने की कोशिश करें. यदि उन के मन में पापा के लिए कोई जगह होगी तो हम उन से जरूर कुछ कहना चाहेंगे. आंटी का साथ पा कर पापा के दिन भी अच्छे से गुजर सकेंगे.’’

सौरभ और ऋचा ने भावना के पास जाने का निश्चय किया. हिमालय, भावना के यहां ही थे. अचानक सौरभ को फोन से पता चला कि भावना आंटी को सीरियस बीमारी है फिर तो दोनों बहनभाई तुरंत ही वहां के लिए निकल पड़े. मीता, गीता तथा उज्ज्वल का परिवार सब पहुंच चुके थे.

दरअसल, कई दिनों से भावना का मन ठीक नहीं था. उलझन और अनिश्चय से भरा अंतर्मन समुद्र मंथन सा मथ रहा था…कभी हिमालय की बात और अपनत्वपूर्ण व्यवहार उसे अपनी तरफ खींचता तो कभी पति के साथ बिताए दिन यादों को झकझोर देते…तो कभी जीवन में आया अकेलापन भी अपना कोई साथी ढूंढ़ता…सब तरफ से घिरे मन को भावना ने अच्छी तरह से टटोला, परखा तो यही लगा कि पति के अभाव में वह कुछ सीमा तक अकेली और दुखी जरूर है पर उसे किसी और बात का अभाव नहीं है.

दूसरी बात, वह हर कदम अपने बच्चों और परिवार को साथ ले कर ही चलना चाहेगी…सोचती हुई भावना ने अपने मन में निश्चय किया कि हिमालय जैसे अब तक प्रांजल के दोस्त रहे बस, वही दोस्ती का रिश्ता अब भी बना रहेगा.

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अपने फैसले से संतुष्ट भावना ने तय किया कि कल सुबह वह हिमालय को उन की उस दिन कही बात के बारे में अपना फैसला जरूर सुना देगी.

लेकिन मन में तनाव के चलते रात को भावना का रक्तचाप काफी बढ़ जाने से उसे जबरदस्त हार्ट अटैक पड़ गया. हिमालय ने फौरन उसे अस्पताल में भरती कराया. डाक्टरों ने 72 घंटे उसे आईसीयू में रखा था. एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद ही भावना घर आ सकी.

15 दिनों तक मां के साथ रहने के बाद आफिस व बच्चों के स्कूल के चलते मीता, गीता और उज्ज्वल वापस जाने की तैयारी में लग गए थे. हिमालय के दोनों बच्चे सौरभ व ऋचा तो 2 दिन बाद ही चले गए थे. उज्ज्वल ने मां को ले जाना चाहा लेकिन भावना अभी इस स्थिति में नहीं थी कि सफर कर सके. बच्चे जानते थे कि मां की सेवा में हिमालय अंकल का अहम स्थान रहा, वह अभी भी भावना को अकेली छोड़ कर जाने के लिए तैयार नहीं थे.

हिमालय का भावना के प्रति आत्मीयभाव व सहृदयता से की गई सेवा ने सिर्फ भावना के ही नहीं बल्कि दोनों के बच्चों के अंतर्मन को गहराइयों से छू लिया था. और अपनी मां व पिता के प्रति एक सुखद फैसला लेने को प्रेरित किया. जाने से पहले मीता और उज्ज्वल ने सौरभ और ऋचा से फोन पर लंबी बातचीत की. इसी के साथ उन्होंने अपने सोचे फैसले के प्रति मन को पक्का भी कर लिया.

एक दिन भावना ने देखा कि अचानक उस के बच्चों के साथ हिमालय के भी दोनों बच्चे आए हैं. उस ने सब से बेहद अनुनय के साथ कहा, ‘‘तुम सब ने तथा हिमालय अंकल ने मेरी बहुत सेवा की. शायद उन के यहां होने से ही मुझे दूसरा जीवन मिला है. यदि उस दिन हिमालय अंकल यहां न होते तो…’’

मीता ने मां के होंठों पर हाथ रख कर आगे बोलने से रोक दिया. अचानक उसे याद आया जब 11 दिसंबर को उस की शादी में हिमालय अंकल सपरिवार आए थे तो पापा ने उन से मुसकरा कर कहा था, ‘जानते हो हिमालय, मैं ने मीता की शादी के लिए यह दिन चुन कर क्यों रखा? यह बड़ा शुभ दिन है…हमारी भावना का जन्मदिन जो है.’

‘तो यह बात तुम ने आज तक मुझ से छिपा कर क्यों रखी? और साथ में यह भी भूल गए कि 11 दिसंबर को मेरा भी जन्मदिन होता है.’ हिमालय अंकल के इतना कहने के बाद प्रांजल ने खुश हो कर उन को बांहों में भर लिया था. फिर तो हिमालय अंकल और मां को बधाई देने वालों का घर में तांता सा लग गया था.

मीता ने कहा, ‘‘मां, जब से मेरी शादी हुई है मैं अपने विवाह की वर्षगांठ पर कभी आप के पास नहीं रही. इस बार मेरी दिली इच्छा है कि इस शुभ दिन का जश्न मैं और यश आप के साथ मनाएं. और मैं ने तो अपनी शादी की इस सालगिरह के लिए होटल भी बुक करा लिया है. कुछ खासखास मेहमानों के साथ हिमालय अंकल, सौरभ भैया तथा ऋचा भी रहेगी. मां, उस दिन आप का भी तो जन्मदिन होता है…हम दोनों यह दिन सुंदरता से एकसाथ मनाया करेंगे.’’

भावना को बेटी की बात सुन कर अच्छा लगा, इसी बहाने घर में कुछ दिन तो रौनक रहेगी. उसे याद था कि इस दिन हिमालय का भी जन्मदिन होता है, लेकिन उस ने मीता से इस का कोई जिक्र नहीं किया.

निश्चित दिन से एक दिन पहले ही ज्यादातर लोग आ गए, इसीलिए अगले दिन सुबह से ही घर में चहलपहल का माहौल बना हुआ था. जहां मीता और यश को सब बधाई दे रहे थे वहीं भावना और हिमालय भी अपनेअपने जन्मदिन की बधाई स्वीकार कर रहे थे.

संध्या समय घर के सभी लोग होटल पहुंच गए. होटल में आकर्षक सजावट की गई थी. एक तरफ शहनाई वादन की व्यवस्था की गई थी. विवाह की वर्षगांठ के मौके पर मीता और यश की जयमाल होने के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी. तभी मुसकराती मीता हिमालय के पास आ कर आग्रह पूर्वक बोली, ‘‘प्लीज अंकल, एक मिनट के लिए उधर मंच पर चलिए.’’

हिमालय भी बिना कुछ सोचेसमझे उस के साथ हो लिए. दूसरी तरफ ऋचा भावना को साथ ले कर मंच पर आई.

मीता और ऋचा ने आमनेसामने खड़े भावना और हिमालय के हाथों में बड़ा सा फूलों का हार पकड़ाते हुए हंस कर कहा, ‘‘जानते हैं अंकल और आंटी, आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘हां, तुम को और यशजी को शादी की वर्षगांठ की खुशी में पहनाना है,’’ हिमालय ने मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं, आज मम्मी का जन्मदिन है. इस उपलक्ष्य में यह हार आप उन को पहनाएंगे,’’ मीता ने हंस कर कहा.

‘‘और आंटी, आज मेरे पापा का भी जन्मदिन है,’’ मीता के कहने के तुरंत बाद ऋचा ने कहा, ‘‘इस खुशी में आप को हार पापा को पहनाना है.’’

अपनेअपने हाथों में हार पकड़े हिमालय और भावना आश्चर्य से भर कर बच्चों की तरफ देखने लगे. अपने लिए बच्चों की इस खूबसूरत कोशिश पर दोनों का दिल भर आया और उन्होंने बच्चों का मन रखने के लिए एकदूसरे को जयमाला पहना कर रस्म अदा कर दी.

मीता और ऋचा ने तालियां बजाते हुए सब के सामने कहा, ‘‘अब आप दोनों दोस्त से आगे एकदूसरे को स्वीकार कर के एक दूसरे के हो कर रहेंगे. हमारा यह प्रयास बस, आप लोगों को अपनी स्थायी पीड़ा और अकेलेपन से कुछ सीमा तक निजात दिलाने के लिए किया गया है.’’

बच्चों के साहस और प्रयास की सब ने मुक्त कंठ से सराहना की. तालियों की गड़गड़ाहट से होटल का हाल गूंज उठा. हिमालय ने अनुग्रहीत नजरों से बच्चों की तरफ देखा…जिन्होंने अत्यंत खूबसूरती से सब को साक्षी बना कर उन के मिलन को स्वीकार किया था.

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कृष्णिमा

स्निग्धा श्रीवास्तव

‘‘आखिर इस में बुराई क्या है बाबूजी?’’ केदार ने विनीत भाव से बात को आगे बढ़ाया.

‘‘पूछते हो बुराई क्या है? अरे, तुम्हारा तो यह फैसला ही बेहूदा है. अस्पतालों के दरवाजे क्या बंद हो गए हैं जो तुम ने अनाथालय का रुख कर लिया? और मैं तो कहता हूं कि यदि इलाज करने से डाक्टर हार जाएं तब भी अनाथालय से बच्चा गोद लेना किसी भी नजरिए से जायज नहीं है. न जाने किसकिस के पापों के नतीजे पलते हैं वहां पर जिन की न जाति का पता न कुल का…’’

‘‘बाबूजी, यह आप कह रहे हैं. आप ने तो हमेशा मुझे दया का पाठ पढ़ाया, परोपकार की सीख दी और फिर बच्चे किसी के पाप में भागीदार भी तो नहीं होते…इस संसार में जन्म लेना किसी जीव के हाथों में है? आप ही तो कहते हैं कि जीवनमरण सब विधि के हाथों होता है, यह इनसान के वश की बात नहीं तो फिर वह मासूम किस दशा में पापी हुए? इस संसार में आना तो उन का दोष नहीं?’’

‘‘अब नीति की बातें तुम मुझे सिखाओगे?’’ सोमेश्वर ने माथे पर बल डाल कर प्रश्न किया, ‘‘माना वे बच्चे निष्पाप हैं पर उन के वंश और कुल के बारे में तुम क्या जानते हो? जवानी में जब बच्चे के खून का रंग सिर चढ़ कर बोलेगा तब क्या करोगे? रक्त में बसे गुणसूत्र क्या अपना असर नहीं दिखाएंगे? बच्चे का अनाथालय में पहुंचना ही उन के मांबाप की अनैतिक करतूतों का सुबूत है. ऐसी संतान से तुम किस भविष्य की कामना कर रहे हो?’’

‘‘बाबूजी, आप का भय व संदेह जायज है पर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में केवल खून के गुण ही नहीं बल्कि पारिवारिक संस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं,’’ केदार बाबूजी को समझाने का भरसक प्रयास कर रहा था और बगल में खामोश बैठी केतकी निराशा के गर्त में डूबती जा रही थी.

केतकी को संतान होने के बारे में डाक्टरों को उम्मीद थी कि वह आधुनिक तकनीक से बच्चा प्राप्त कर सकती है और केदार काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि लाखों रुपए क्या केवल इसलिए खर्च किए जाएं कि हम अपने जने बच्चे के मांबाप कहला सकें. यह तो केवल आत्मसंतुष्टि तक सोचने वाली बात होगी. इस से बेहतर है कि किसी अनाथ बच्चे को अपना कर यह पैसा उस के भविष्य पर लगा दें. इस से मांबाप बनने का गौरव भी प्राप्त होगा व रुपए का सार्थक प्रयोग भी होगा.

‘केतकी, बस जरूरत केवल बच्चे को पूरे मन से अपनाने की है. फर्क वास्तव में खून का नहीं बल्कि अपनी नजरों का होता है,’ केदार ने जिस दिन यह कह कर केतकी को अपने मन के भावों से परिचित कराया था वह बेहद खुश हुई थी और खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू बह निकले थे पर अगले ही क्षण मां और बाबूजी का खयाल आते ही वह चुप हो गई थी.

केदार का अनाथालय से बच्चा गोद लेने का फैसला उसे बारबार आशंकित कर रहा था क्योंकि मांबाबूजी की सहमति की उसे उम्मीद नहीं थी और उन्हें नाराज कर के वह कोई कार्य करना नहीं चाहती थी. केतकी ने केदार से कहा था, ‘बाबूजी से पहले सलाह कर लो उस के बाद ही हम इस कार्य को करेंगे.’

लेकिन केदार नहीं माना और कहने लगा, ‘अभी तो अनाथालय की कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, अभी से बात क्यों छेड़ी जाए. उचित समय आने पर मांबाबूजी को बता देंगे.’

केदार और केतकी ने आखिर अनाथालय जा कर बच्चे के लिए आवेदनपत्र भर दिया था.

लगभग 2 माह के बाद आज केदार ने शाम को आफिस से लौट कर केतकी को यह खुशखबरी दी कि अनाथालय से बच्चे के मिलने की पूर्ण सहमति प्राप्त हो चुकी है. अब कभी भी जा कर हम अपना बच्चा अपने साथ घर ला सकते हैं.

भावविभोर केतकी की आंखें मारे खुशी के बारबार डबडबाती और वह आंचल से उन्हें पोंछ लेती. उसे लगा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद उस के ममत्व की धारा में एक नन्ही जान की नौका प्रवाहित हुई है जिसे तूफान के हर थपेडे़ से बचा कर पार लगाएगी. उस नन्ही जान को अपने स्नेह और वात्सल्य की छांव में सहेजेगी….संवारेगी.

केदार की धड़कनें भी तो यही कह रही हैं कि इस सुकोमल कोंपल को फूलनेफलने में वह तनिक भी कमी नहीं आने देगा. आने वाली सुखद घड़ी की कल्पना में खोए केतकी व केदार ने सुनहरे सपनों के अनेक तानेबाने बुन लिए थे.

आज बाबूजी के हाथ से एक तार खिंचते ही सपनों का वह तानाबाना कितना उलझ गया.

केतकी अनिश्चितता के भंवर में उलझी यही सोच रही थी कि मांजी को मुझ से कितना स्नेह है. क्या वह नहीं समझ सकतीं मेरे हृदय की पीड़ा? आज बाबूजी की बातों पर मां का इस तरह से चुप्पी साधे रहना केतकी के दिल को तीर की तरह बेध रहा था.

केदार लगातार बाबूजी से जिरह कर रहा था, ‘‘बाबूजी, क्या आप भूल गए, जब मैं बचपन में निमोनिया होने से बहुत बीमार पड़ा था और मेरी जान पर बन आई थी, डाक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाने के लिए कहा था पर मेरा खून न आप के खून से मेल खा रहा था न मां से, ऐसे में मुझे बचाने के लिए आप को ब्लड बैंक से खून लेना पड़ा था. यह सब आप ने ही तो मुझे बताया था. यदि आप तब भी अपनी इस जातिवंश की जिद पर अड़ जाते तो मुझे खो देते न?

‘‘शायद मेरे प्रति आप के पुत्रवत प्रेम ने आप को तब तर्कवितर्क का मौका ही नहीं दिया होगा. तभी तो आप ने हर शर्त पर मुझे बचा लिया.’’

‘‘केदार, जिरह करना और बात है और हकीकत की कठोर धरा पर कदम जमा कर चलना और बात. ज्यादा दूर की बात नहीं, केवल 4 मकान पार की ही बात है जिसे तुम भी जानते हो. त्रिवेदी साहब का क्या हश्र हुआ? बेटा लिया था न गोद. पालापोसा, बड़ा किया और 20 साल बाद बेटे को अपने असली मांबाप पर प्यार उमड़ आया तो चला गया न. बेचारा, त्रिवेदी. वह तो कहीं का नहीं रहा.’’

केदार बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘बाबूजी, हम सब यही तो गलती करते हैं, गोद ही लेना है तो उन्हें क्यों न लिया जाए जिन के सिर पर मांबाप का साया नहीं है कुलवंश, जातबिरादरी के चक्कर में हम इतने संकुचित हो जाते हैं कि अपने सीमित दायरे में ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. संसार में ऐसे बहुत कम त्यागी हैं जो कुछ दे कर भूल जाएं. अकसर लोग कुछ देने पर कुछ प्रतिदान पा लेने की अपेक्षाएं भी मन में पाल लेते हैं फिर चाहे उपहार की बात हो या दान की और फिर बच्चा तो बहुत बड़ी बात होती है. कोई किसी को अपना जाया बच्चा देदे और भूल जाए, ऐसा संभव ही नहीं है.

‘‘माना अनाथालय में पल रहे बच्चों के कुल व जात का हमें पता नहीं पर सब से पहले तो हम इनसान हैं न बाबूजी. यह बात तो आप ही ने हमें बचपन में सिखाई थी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. अब आप जैसी सोच के लोग ही अपनी बात भुला बैठेंगे तब इस समाज का क्या होगा?

‘‘आज मैं अमेरिका की आकर्षक नौकरी और वहां की लकदक करती जिंदगी छोड़ कर यहां आप के पास रहना चाहता हूं और आप दोनों की सेवा करना चाहता हूं तो यह क्या केवल मेरे रक्त के गुण हैं? नहीं बाबूजी, यह तो आप की सीख और संस्कार हैं. मैं ने बचपन में आप को व मांजी को जो करते देखा है वही आत्मसात किया है. आप ने दादादादी की अंतिम क्षणों तक सेवा की है. आप के सेवाभाव स्वत: मेरे अंदर रचबस गए, इस में रक्त की कोई भूमिका नहीं है और ऐसे उदाहरणों की क्या कमी है जहां अटूट रक्त संबंधों में पनपी कड़वाहट आखिर में इतनी विषाक्त हो गई कि भाई भाई की जान के दुश्मन बन गए.’’

‘‘देखो, मुझे तुम्हारे तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ सोमेश्वर बोले, ‘‘मैं ने एक बार जो कह दिया सो कह दिया, बेवजह बहस से क्या लाभ? और हां, एक बात और कान खोल कर सुन लो, यदि तुम्हें अपनी अमेरिका की नौकरी पर लात मारने का अफसोस है तो आज भी तुम जा सकते हो. मैं ने तुम्हें न तब रोका था न अब रोक रहा हूं, समझे? पर अपने इस त्याग के एहसान को भुनाने की फिराक में हो तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो.’’

इतना कह कर सोमेश्वर अपनी धोती संभालते हुए तेज कदमों से अपने कमरे में चले गए. मांजी भी चुपचाप आदर्श भारतीय पत्नी की तरह मुंह पर ताला लगाए बाबूजी के पीछेपीछे कमरे में चली गईं.

थकेहारे केदार व केतकी अपने कमरे में बिस्तर पर निढाल पड़ गए.

‘‘अब क्या होगा?’’ केतकी ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘होगा क्या, जो तय है वही होगा. सुबह हमें अपने बच्चे को लेने जाना है, और मैं नहीं चाहता कि इस तरह दुखी और उदास मन से हम उसे लेने जाएं,’’ अपने निश्चय पर अटल केदार ने कहा.

‘‘पर मांबाबूजी की इच्छा के खिलाफ हम बच्चे को घर लाएंगे तो क्या उन की उपेक्षा बच्चे को प्रभावित नहीं करेगी? कल को जब वह बड़ा व समझदार होगा तब क्या घर का माहौल सामान्य रह पाएगा?’’

अपने मन में उठ रही इन आशंकाओं को केतकी ने केदार के सामने रखा तो वह बोला, ‘‘सुनो, हमें जो कल करना है फिलहाल तुम केवल उस के बारे में ही सोचो.’’

सुबह केतकी की आंख जल्दी खुल गई और चाय बनाने के बाद ट्रे में रख कर मांबाबूजी को देने के लिए बाहर लौन में गई, मगर दोनों ही वहां रोज की तरह बैठे नहीं मिले. खाली कुरसियां देख केतकी ने सोचा शायद कल रात की बहसबाजी के बाद मां और बाबूजी आज सैर पर न गए हों लेकिन उन का कमरा भी खाली था. हो सकता है आज लंबी सैर पर निकल गए हों तभी देर हो गई. मन में यह सोचते हुए केतकी नहाने चली गई.

घंटे भर में दोनों तैयार हो गए पर अब तक मांबाबूजी का पता नहीं था. केदार और केतकी दोनों चिंतित थे कि आखिर वे बिना बताए गए तो कहां गए?

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सहसा केतकी को मांजी की बात याद आई. पिछले ही महीने महल्ले में एक बच्चे के जन्मदिन के समय अपनी हमउम्र महिलाओं के बीच मांजी ने हंसी में ही सही पर कहा जरूर था कि जिस दिन हमारा इस सांसारिक जीवन से जी उचट जाएगा तो उसी दिन हम दोनों ही किसी छोटे शहर में चले जाएंगे और वहीं बुढ़ापा काट देंगे.

सशंकित केतकी ने केदार को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘नहीं, नहीं, केतकी, बाबूजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे मुझ पर क्रोधित हो सकते हैं पर इतने गैरजिम्मेदार कभी नहीं हो सकते कि बिना बताए कहीं चले जाएं. हो सकता है सैर पर कोई परिचित मिल गया हो तो बैठ गए होंगे कहीं. थोड़ी देर में आ जाएंगे. चलो, हम चलते हैं.’’

दोनों कार में बैठ कर नन्हे मेहमान को लेने चल दिए. रास्ते भर केतकी का मन बच्चा और मांबाबूजी के बीच में उलझा रहा. लेकिन केदार के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. उमंग और उत्साह से भरपूर केदार के होंठों पर सीटी की गुनगुनाहट ही बता रही थी कि उसे अपने निर्णय पर जरा भी दुविधा नहीं है.

केतकी का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह बोला, ‘‘यार, क्या मुंह लटकाए बैठी हो? चलो, मुसकराओ, तुम हंसोगी तभी तो तुम्हें देख कर हमारा नन्हा मेहमान भी हंसना सीखेगा.’’

नन्ही जान को आंचल में छिपाए केतकी व केदार दोनों ही कार से उतरे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था पर बाहर ताला न देख वे समझ गए कि मां और बाबूजी घर के अंदर हैं. केदार ने ही दरवाजे की घंटी बजाई तो इसी के साथ केतकी की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. नन्ही जान को सीने से चिपटाए वह केदार को ढाल बना कर उस के पीछे हो गई.

दरवाजा खुला तो सामने मांजी और बाबूजी खडे़ थे. पूरा घर रंगबिरंगी पताकों, गुब्बारों तथा फूलों से सजा हुआ था. यह सबकुछ देख कर केदार और केतकी दोनों विस्मित रह गए.

‘‘आओ बहू, अंदर आओ, रुक क्यों गईं?’’ कहते हुए मांजी ने बडे़ प्रेम से नन्हे मेहमान को तिलक लगाया. बाबूजी ने आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में लिया.

‘‘अब तो दादादादी का बुढ़ापा इस नन्हे सांवलेसलौने बालकृष्ण की बाल लीलाओं को देखदेख कर सुकून से कटेगा, क्यों सौदामिनी?’’ कहते हुए बाबूजी ने बच्चे के माथे पर वात्सल्य चिह्न अंकित कर दिया.

बाबूजी के मुख से ‘बालकृष्ण’ शब्द सुनते ही केदार और केतकी ने एक दूसरे को प्रश्न भरी नजरों से देखा और अगले ही पल केतकी ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन बाबूजी, यह बेटा नहीं बेटी है.’’

‘‘तो क्या हुआ? कृष्ण न सही कृष्णिमा ही सही. बच्चे तो प्रसाद की तरह हैं फिर प्रसाद चाहे लड्डू के रूप में मिले चाहे पेडे़ के, होगा तो मीठा ही न,’’ और इसी के साथ एक जोरदार ठहाका सोमेश्वर ने लगाया.

केदार अब भी आश्चर्यचकित सा बाबूजी के इस बदलाव के बारे में सोच रहा था कि तभी वह बोले, ‘‘क्यों बेटा, क्या सोच रहे हो? यही न कि कल राह का रोड़ा बने बाबूजी आज अचानक गाड़ी का पेट्रोल कैसे बन गए?’’

‘‘हां बाबूजी, सोच तो मैं यही रहा हूं,’’ केदार ने हंसते हुए कहा.

‘‘बेटा, सच कहूं तो आज मैं ने बहुत बड़ी जीत हासिल की है. मुझे तुझ पर गर्व है. यदि आज तुम अपने निश्चय से हिल जाते तो मैं टूट जाता. मैं तुम्हारे फैसले की दृढ़ता को परखना चाहता था और ठोकपीट कर उस की अटलता को निश्चित करना चाहता था क्योंकि ऐसे फैसले लेने वालों को सामाजिक जीवन में कई अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ती हैं.’’

‘‘समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं न. यदि 4 लोग तुम्हारे कार्य को सराहेंगे तो 8 टांग खींचने वाले भी मिलेंगे. तुम्हारे फैसले की तनिक भी कमजोरी भविष्य में तुम्हें पछतावे के दलदल में पटक सकती थी और तुम्हारे कदमों का डगमगाना केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि आने वाली नन्ही जान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता था. बस, केवल इसीलिए मैं तुम्हें जांच रहा था.’’

‘‘देखा केतकी, मैं ने कहा था न तुम से कि बाबूजी ऐसे तो नहीं हैं. मेरा विश्वास गलत नहीं था,’’ केदार ने कहा.

‘‘बेटा, तुम लोगों की खुशी में ही तो हमारी खुशी है. वह तो मैं तुम्हारे बाबूजी के कहने पर चुप्पी साधे बैठी रही, इन्हें परीक्षा जो लेनी थी तुम्हारी. मैं समझ सकती हूं कि कल रात तुम लोगों ने किस तरह काटी होगी,’’ इतना कह कर सौदामिनी ने पास बैठी केतकी को अपनी बांहों में भर लिया.

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‘‘वह तो ठीक है मांजी, पर यह तो बताइए कि सुबह आप लोग कहां चले गए थे. मैं तो डर रही थी कि कहीं आप हरिद्वार….’’

‘‘अरे, पगली, हम दोनों तो कृष्णिमा के स्वागत की तैयारी करने गए थे,’’ केतकी की बातों को बीच में काटते हुए सौदामिनी बोली, ‘‘और अब तो हमारे चारों धाम यहीं हैं कृष्णिमा के आसपास.’’

सचमुच कृष्णिमा की किलकारियों में चारों धाम सिमट आए थे, जिस की धुन में पूरा परिवार मगन हो गया था.

45 की उम्र में भी इतने स्टाइलिश हैं Hrithik Roshan

बौलीवुड के मशहूर एक्टर ऋतिक रोशन अपनी एक्टिंग के साथ साथ अपने लुक्स के लिए भी काफी पौपुलर हैं. रितिक के फैंस उनके हर लुक को बेशुमार प्यार देते हैं. रितिक ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत अपने पिता राकेश रोशन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कहो ना… प्यार है’ से की थी, और उसके बाद उन्होनें एक के बाद एक हिट फिल्मों की लाइन लगा दी थी. रितिक ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘मुझसे दोस्ती करोगे’, ‘कोई मिल गया’, ‘क्रिश’ जैसी कई सुपर-हिट फिल्मों में लीड रोल निभा सबके फेवरेट बने हुए हैं. ना केवल लड़कियां बल्कि लड़के भी उनके लुक्स और फीसीक् के दीवाने हैं तो अगर आप भी ऋतिक रोशन जैसे लुक्स अपनाना चाहते हैं तो ट्राय करें उनके ये लुक्स.

1. ऋतिक रोशन का पार्टी लुक…

 

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ऋतिक रोशन ने अपने इस पार्टी लुक में व्हाइट कलर के इंडो-वेस्टर्न कोट के साथ व्हाइट कलर की ही चूड़ीदार पहन रखी है. रितिक ने इस आउट-फिट के साथ ब्लू कलर का बेस कोट पहना हुआ है जो की ऋतिक के इस लुक में चार चांद लगा रहा है. आप भी अपने फैमिली फंक्शन्स में लोगों को इम्प्रेस करने के लिए ऋतिक का ये पार्टी लुक ट्राय कर सकते हैं.

2. ट्राय करें का ऋतिक रोशन का ये कैसुअल लुक…

ऋतिक रोशन अपने इस कैजुअल लुक में काफी हैंडसम लग रहे हैं. ऋतिक ने इस लुक में डार्क ग्रे कलर की राउंड नैक टी-शर्ट के साथ ब्लू कलर की जींस पहनी हुई है. ऋतिक इस लुक में टी-शर्ट के ऊपर ब्लैक लैदर जैकेट पहने दिख रहे हैं. आप भी ये लुक अपने कौलेज या इंस्टीट्यूट में ट्राय कर सकते हैं.

3. ऋतिक रोशन का कैजुअल पार्टी लुक…

 

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GQ nights.

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ऋतिक रोशन ने इस लुक में बलैक कलर की शर्ट और ब्लैक कलर का ही ट्राउज़र पहना हुआ है. ऋतिक ने शर्ट के ऊपर व्हाइट कलर का ब्लेज़र भी पहना हुआ है. इस लुक में ऋतिक काफी स्मार्ट लग रहे हैं, तो अगर आप भी अपनी कैसुअल पार्टीज या कौलेज पार्टीज में कीसी को अपने लुक्स से इम्प्रेस करना चाहते है तो ज़रूर ट्राय करें ऋतिक का ये लुक.

बता दें, ऋतिक रोशन की फिल्म ‘सुपर 30’ 12 जुलाई को रिलीज़ हो चुकी है. इस फिल्म में रितिक रोशन के साथ लीड रोल में मृणल ठाकुर नज़र आएंगी. इस फिल्म का निर्देशक विकास बहल द्वारा हुआ है.

हमारे मुन्ना भाई एमबीबीएस

झूठ नहीं हकीकत में हमारे भी एक मुन्ना भाई हैं और वह भी एमबीबीएस हैं, यानी महा बोर, बदतमीज, सडि़यल. यह नाम तो लाड़- प्यार में मांबाप ने दिया होगा, उपाधि उन की हरकतों से चिढ़ कर रिश्तेदारों ने दी है. इसे मुन्ना भाई की मिलनसारी कहें या आवारापन, बंजारापन, वह दूरदराज के रिश्ते की भी हर शादी के दूल्हा और हर जनाजे का मुर्दा कहलाते हैं.

कहने का मतलब यह है कि वह हरेक शादी और गमी में शिरकत करते हैं और उस अवसर की खास हस्ती यानी जिस की बरात या अर्थी निकलनी हो उस से ज्यादा अहमियत लेना चाहते हैं, चाहे बरात निकलने या जनाजा उठने में भले ही देर हो जाए मुन्ना भाई को उन का गिलास (समयानुसार चाय या सुरा से भरा) मिलना ही चाहिए और मिलता भी है उन के महा बड़बोला होने की वजह से.

खुशी के मौके पर मुन्ना भाई को नाराज कर के कौन उलटीसीधी बातें सुनना या माहौल खराब करना चाहेगा, सो बेहतर यही है कि मुन्ना भाई को कहीं और उलझा दिया जाए या दूसरे शब्दों में कहें तो कहीं का चौधरी बना दिया जाए. ऐसे मौके पर खाने की व्यवस्था तो बडे़ पैमाने पर होती ही है और उस की जिम्मेवारी उठाने के लिए अपने मुन्ना भाई से बेहतर और कौन होगा?

लोगों की इस तरह की सोच के चलते ही मुन्ना भाई ने अब तक इतनी शादियों में शिरकत की है कि उन का नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में आना चाहिए. सच मानिए, उन के जितना तजुरबा तो शहर के नामचीन केटरर को भी नहीं हो सकता.

बस, मुन्ना भाई की ड्यूटी लग जाती है हलवाई की भट्ठी और भंडारे के बीच, कचौरियों और लड्डुओं का हिसाब रखने को. उन सब के साथसाथ मुन्ना भाई घर के बिगडै़ल बच्चों और चटोरी औरतों की हरकतों का अवलोकन भी करते रहते हैं कि किस का बच्चा कैसे आंख बचा कर कितने लड्डू मार गया, कौन बराबर ताक लगाए बैठा रहा और कौन सी भाभी किस बहाने से कितनी खस्ता कचौरी ले गईं, कौन सी मौसी  ने फरमाइशें करकर के उन का और पकाने वाले का कलेजा पका दिया, किस चाची ने मटर निकाले कम और फांके ज्यादा, कौन से मामा उन्हें कंपनी देने के बहाने वहां औरतें देखने बैठे हुए थे.

छोटे बच्चे तो मक्खियों की तरह हलवाई की भट्ठी के इर्दगिर्द मंडराएंगे ही और उन्हें ढूंढ़ती उन की मांएं भी वहां आएंगी ही. उन्हें देख कर मामाजी की बुढ़ाती हड्डियों में भी सनसनाहट हो जाती है.

भंडारे की डय्टी खत्म होते ही मुन्ना भाई को अपनी खुराक की चिंता सताने लगती है. वह बड़बोलेपन के अंदाज में बोलते हैं, ‘‘भाई साहब, दिन भर तो भट्ठी पर तपाया है…अब कुछ थकान उतारने के लिए गला तो तर कराओ.’’

अगर आदर्शवादी भाई साहब ने कह दिया कि यह सब उन के यहां नहीं चलता तो हो गई बेचारों की छुट्टी.

‘‘औकात नहीं है खातिर करने की तो बुलाते क्यों हो? बहुत गमी और खुशी के मौके देखे हैं लेकिन ऐसा तो पहली बार देखा कि हलवाई को चुल्लू भर घी दे कर टोकरा भर मिठाई बनाने को कहा जाए और मेहमानों को सिर्फ पानी से प्यास बुझाने को,’’ और इसी के साथ मुन्ना भाई का परनिंदा पुराण खुल जाता है कि कबकब किसकिस ने उन के साथ क्याक्या किया जबकि उन्होंने तो हमेशा सब का भला ही किया है.

मुन्ना भाई के मुंह से उन के उपकार की बातें सुन कर लगता है कि भारत सरकार न सही, अपनी बिरादरी की किसी संस्था को तो उन को ‘परमार्थी जीव’ की उपाधि देनी ही चाहिए. यदि यह भी न हो तो कम से कम सगेसंबंधियों को तो उन्हें सम्मानित करना ही चाहिए. लेकिन सम्मानित करना तो दूर मुन्ना भाई के शब्दों में, ‘अब सब उन से कन्नी काटने लगे हैं जबकि सब के लिए उन्होंने हमेशा बहुत कुछ किया है.’

कन्नी काटने की वजह जानने से पहले ‘बहुत कुछ’ की व्याख्या कर ली जाए.

बहुत कुछ में ज्यादातर तो वही शादी या गमी में कचौरियों व लड्डुओं का हिसाब है या फिर उस की लड़की की शादी उस के लड़के से करवा दी, किसी खुशहाल रिश्तेदार से बदहाल रिश्तेदार की मदद करवा दी, रुतबे वाले रिश्तेदार से कह कर किसी के बेटे, दामाद की बदली या तरक्की करवा दी, किसी के बिगडै़ल बच्चे को सुधारने के बहाने अपने पास रख कर घर के छोटेमोटे काम फोकट में करवा लिए, बस. इस से ज्यादा और कुछ नहीं.

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अब यह सब ऐसी मेहरबानियां तो हैं नहीं कि हर कोई उन्हें सदाबहार गजल की तरह गुनगुनाता रहे या गुरुमंत्र की तरह जपता रहे. इस से अपने मुन्ना भाई के अहं को ठेस पहुंचती है और वह गाहेबगाहे किसी बच्चे को बता देते हैं, ‘तेरी मम्मी की शादी तो तेरी दादी की खुशामद कर के मैं ने ही करवाई थी,’ या ‘तेरी दादी तो तेरी मां को तेरे बाप के पास भेजने को भी तैयार नहीं थीं, मैं बीच में न पड़ता तो तू तो पैदा ही न हुआ होता.’ बात भले ही सही हो लेकिन बच्चे की मां को चुभ जाती है और वह बेचारे मुन्ना भाई का पत्ता काटने लगती है.

मुन्ना भाई मिजाज के भी मुन्ना ही हैं. जराजरा सी बात पर चिढ़ जाते हैं. जैसे किसी गमी के मौके पर अफसोस करने आए किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से उन का परिचय न करवाया जाए, कमरे में औरतों को सुला कर उन्हें बरामदे में सोने को कहा जाए, खाने में उन की पसंद की दालसब्जी न हो, निमंत्रणपत्र पर पहले पत्नी और फिर उन का नाम लिखा जाए, किसी को यह बताने पर कि वह उन के पड़ोस के शहर से आ रहे हैं, यह सुनने को न मिले कि फिर तो हमारे पास भी आइए.

अपनी जवानी और नौकरी के जमाने में मुन्ना भाई ने खूब जलवे दिखाए. यानी हर शादी और गमी में अपनी मौजूदगी का जीभर कर एहसास करवाया लेकिन चढ़ता सूरज भी ढलता ही है न, अपने मुन्ना भाई भी रिटायर हो गए. सोचा तो था कि अब निश्ंिचत हो कर रिश्तेनाते निबाहेंगे, छुट्टी का झंझट तो रहा नहीं, आराम से भांजेभतीजों के घर रहा करेंगे, लेकिन भांजेभतीजे भी कम उस्ताद नहीं हैं, वे तो एकदूसरे से गाहेबगाहे ही संपर्क रखते हैं.

मुन्ना भाई आने की सोच रहे हैं यह भनक लगते ही एकदूसरे को आगाह कर देते हैं और फिर सब के सब एक ही राग अलापने लगते हैं, ‘आजकल यहां बिजलीपानी की बहुत किल्लत है. आधी बालटी पानी भी नहाने को मिल जाए तो बहुत है, फ्लश कैसे चलता है ये तो भूल ही गए हैं. इस उम्र में बालटी उठा कर डालनी पडे़गी, यह सोच कर ही मां को तो कब्ज हो जाता है.

‘टीवी तो शोपीस बन कर रह गया है, बिजली होने पर भी देखने का मजा नहीं आता क्योंकि धारावाहिक में पहले क्या हुआ था, न देख पाने से लिंक टूट जाता है. सुन तो रहे हैं कि बरसात के बाद हालात सुधरेंगे फिर आप को खबर करेंगे, आप अवश्य आइएगा.’

बहाना और उस के साथ का आश्वासन भारत के हर प्रांत पर सटीक बैठता है, बगैर शिकायत के लिए कोई गुंजाइश छोड़े. बरसात तो हर साल ही आती है और जाती है लेकिन हालात न बदलते हैं न बदलेंगे और न मुन्ना भाई को बुलावा आएगा.

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वह कहते हैं कि शेर कितना भी बूढ़ा हो जाए घास तो खाने से रहा, खाएगा तो गोश्त ही. यानी मुन्ना भाई भी अपना टाइम अखबार पढ़ कर या टीवी देख कर तो पास करने से रहे, गपशप किए बगैर उन का खाना हजम नहीं होता. उन्होंने इस की तरकीब भी ढूंढ़ ली और अपने पोते को स्कूल लाने ले जाने, उस का होमवर्क करवाने का काम भी संभाल लिया.

बहू ने राहत की सांस ली. बच्चे को स्कूल छोड़ना, लाना और फिर होमवर्क करवाना अच्छाखासा जी का जंजाल था, उस से भी उसे छुट््टी मिली और मुन्ना भाई के हरदम सिर पर सवार रहने से भी. मुन्ना भाई अकेले तो हैं नहीं जो बच्चे को स्कूल छोड़ने जाते हों, उन के जैसे कई दादीदादा और बच्चों की मांएं भी आती हैं. छोड़ने के समय तो खैर सभी जल्दी में होते हैं लेकिन लेने तो समय से कुछ पहले ही आना पड़ता है.

सयाने मुन्ना भाई ने इसी समय का सदुपयोग किया, पहले मुसकरा कर परिचय का आदानप्रदान किया और उस के बाद तो मीठीमीठी बातें कर के, सब के दिलों में घर कर के या यह कहें रूमाल से धोती बना लेने वाले जादूगर की तरह मुन्ना भाई धीरेधीरे सब की दुखतकलीफें और घर की अंदरूनी बातें भी जान गए पर केवल मुन्ना भाई, बच्चों को लेने आने वाले सब लोग नहीं. अगर सभी की आपस में दोस्ती हो जाती तो हमारे मुन्ना भाई की अहमियत क्या रह जाती?

शीघ्र ही मुन्ना भाई का पुराना परमार्थ का नेटवर्क चालू हो गया. पहले ससुराल के भतीजेभतीजियों का अपने भांजेभांजियों से रिश्ता करवाते थे, रिश्तेदारों से सुलहसफाई करवाते थे, अब यह सब नए बनाए दोस्तों में करवाने लगे हैं. विवाह योग्य बच्चेबच्चियां किस के घर में नहीं होतीं, मुन्ना भाई ने सदा उन का सदुपयोग किया था, अब भी कर रहे हैं. फिलहाल तो वह बच्चों के होमवर्क संबंधी परेशानियों को दूर करने वाले विशेषज्ञ माने जा रहे हैं मगर शीघ्र ही यहां भी हर मातम में मुखिया और हर खुशी के हीरो तो बनेंगे ही लेकिन अगर लगे हाथों उन्हें महल्ले के ‘माननीय बड़े बुजुर्ग सदस्य’ की उपाधि भी मिल जाए तो वह वाकई में मुन्ना भाई एमबीबीएस हो कर बस, वहीं के हो जाएं और रिश्तेदारों को बिजलीपानी की किल्लत का सहारा न लेना पड़े. लगे रहो मुन्ना भाई.

एक बहानेबाज संस्कृति

बच्चों की छुट्टी हो और अपनी नहीं, तो मुसीबत रहती है. जरा निश्ंिचतता का अनुभव कर के देर से उठी थी, पर यह देख कर मूड बिगड़ गया कि फूलमती ने फिर गोल मारा था. सब काम हड़बड़ी में हुआ. सुबहसुबह रसोईघर से उस के द्वारा बरतनों की उठापटक की मधुर ध्वनि से जरा चैन पड़ता था और उसी ध्वनि के इंतजार में आज देर तक रजाई में पड़ी रही. अब जैसेतैसे तैयार हो कर निकलने को ही थी कि छोटे साहब, जो अब तक बड़े के साथ दूसरे कमरे में हंगामा करने में व्यस्त थे, हाजिर हुए.

‘‘मां, आज तो मेरी परियोजना जरूर तैयार करनी है.’’

‘‘क्यों जी, देखते नहीं, कितनी व्यस्त हूं. ऊपर से फूलमती भी नहीं आई है. कल रविवार है न, कल देखूंगी. अरे, नहींनहीं, कल तो हमारे यहां ही किट्टी पार्टी है. ऐसा करो, परसों शाम को याद दिलाना.’’

‘‘ओफ्फोह, मां, आप ने परसों भी यही कहा था कि दूसरे शनिवार को याद दिलाना. अब सोमवार को अध्यापिका डांटेंगी,’’ अमित का पारा चढ़ता जा रहा था. वैसे वह भी ठीक था अपनी जगह. कब से तो पीछे पड़ा था. मुझे फुरसत नहीं मिल पा रही थी. मोहित को पढ़ाई से ही समय नहीं मिल पाता था. स्कूल वाले भी खूब हैं. जानते भी हैं कि 7-8 साल का बच्चा अकेले पर्वत का माडल नहीं बना सकता. डाल देते हैं मुसीबत मांबाप के सिर पर. स्कूल में ही क्यों नहीं बनवाते यह सब?

‘‘देखो अमित, तुम सोमवार को अध्यापिका से कह देना कि मां की तबीयत खराब थी और पिताजी दौरे पर गए हुए थे. बाजार से सामान कौन लाता? ठीक है? अब जाने दो मुझे.’’

मैं आंख बचाती पर्स संभालने लगी. अमित नाराजगी के अंतिम चरण पर था, ‘‘पिछली बार भी यही बहाना बनाया था कि मां बीमार है. यह भी कोई तरीका है भला.’’

‘‘अच्छा, अच्छा, बस, इस बार और सही…’’ पर्स में से 4 टाफियां निकाल कर उसे थमाती हुई मैं आगे बढ़ी ही थी कि पति महोदय अखबार के पीछे मुंह निकालते हुए बोले, ‘‘अरे, जा रही हो कालिज. भई, वह संजीव अपनी गाड़ी मांग रहा था एक दिन के लिए, भाई की शादी है, क्या कहूं?’’

‘‘मेरी मारुति? उसे दोगे. कतई नहीं. खुद तो महाकंजूस है वह. याद नहीं, पिछली बार मेरी 10 किताबें ले गया था और 10 बार याद दिलाने पर 2 फटी हुई जिल्दें वापस करता कैसा रिरिया रहा था, ‘बहनजी, मेरा साला दिल्ली ले गया था. गाड़ी में कहीं छूट गईं.’ अब भी उस का साला आ गया तो? हरगिज नहीं देनी कार हमें.’’

‘‘तो कह दूं कि…क्या कह दूं? साफ मना करते तो बनेगा नहीं. अफसर का भतीजा है, भई. भुगतना तो हमें पड़ता है न.’’

‘‘अरे, कुछ भी कह दो. कह देना कि सर्विर्सिंग के लिए गई है, ब्रेक ठीक नहीं थे या कुछ भी. ठीक है?’’

फिर एक कदम बढ़ाया कि फोन घनघना उठा. उठाया, ‘‘हैलो, कौन…ओह सरलाजी, कहिए कैसे याद किया? अरे, अपना शनिवार कहां भई. मास्टर लोग ठहरे हम तो. हां, फूलमती को तो मैं भी याद कर रही हूं, सुबह से ही. पहले लोग भगवान का नाम ले कर उठते थे, अब हम उस की बंदी को पुकारते उठते हैं. क्या? नहीं आएगी 3 दिन तक. अरे बाबा, मर जाऊंगी मैं तो. बीमार होगी शायद? क्या, आप को संदेशा भेजा है कि बीमार हूं. और खुद मकान बनाने के काम में लगी है परिवार सहित. अच्छा, धोबी ने बताया है. देखा, ये नीच लोग ऐसे ही बहानों से तो हमें लूटते हैं. ये सब दोहरी कमाई करने के बहाने हैं. इस बार उस के पैसे जरूर काटूंगी. सच बता देती तो क्या पता मैं खुद ही छुट्टी दे देती. गुस्सा भी न आता इतना. अच्छा चलूं, देर हो रही है.’’

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मन ही मन कुढ़ती हुई मैं बाहर निकल आई. सच, ईमानदारी व शराफत का तो नाम ही नहीं रहा जैसे आजकल.

10 नंबर बस स्टाप के पास कुछ भीड़ थी. नई लाडली कार थी और नौसिखिया मैं. सो, जरा धीमेधीमे चलाने लगी. एकदम लतिका पर नजर पड़ी. 1-2 और लड़कियां साथ थीं उस के. ‘ग्रांड साड़ी सेल’ के बैनर वाले एक तंबू में सपाटे से घुसी जा रही थीं सब. खीज उठी मैं. उसे तो कल समझाबुझा कर आज के सेमिनार का काम सौंपा था और यह तो यहां साडि़यां खरीदने में लगी है. देख लूंगी उसे भी.

मैं ने ही उसे दया कर के किसी तरह अपने विभाग में एक लंबी अवकाश रिक्ति पर लगवाया था. यह सोच कर कि गरीब घर की लड़की है. वरना यहां तो किसी रिक्ति की सूचना पर लंबी लाइन लग जाती है. अब मेहनत से अपनी जगह बनाने के बजाय सदा काम से कतराती है. मुंह पर तो कुछ नहीं कहती. कह भी कैसे सकती है? पर प्राय: कुछ भी काम या उत्तरदायित्व की बात से किसी न किसी तरह बच निकलती है.

कालिज पहुंचते ही जल्दी से मैं भूगोल विभाग में पहुंची तो सामने मेज पर लतिका का प्रार्थनापत्र पड़ा मुंह चिढ़ा रहा था, ‘‘…अकस्मात अस्वस्थ हो जाने से महाविद्यालय आने में असमर्थ हूं. कृपया एक दिन का आकस्मिक अवकाश दें.’’

गुस्से में मेरे मुंह से कुछ अपशब्द निकलतेनिकलते रह गए. अस्वस्थ है बहानेबाज. वहां सेल पर साडि़यां खरीदी जा रही हैं. कल ही साफसाफ मना कर देती तो आज यह फजीहत तो न होती मेरी. आज रुकना पड़ता, दौड़धूप होती…बस, भाग ली चुपचाप.

खैर, सेमिनार तो होना ही था. विश्वविद्यालय से 2 भूगोलशास्त्री पधारे थे. उन के आवास व भोजन का प्रबंध भी करना था, जो लतिका को सौंपा था. किसी तरह दूसरे विभाग से नए प्राध्यापकों को पकड़ा, सो उचित व्यवस्था हो गई. प्राचार्य ने भी उदार मुसकराहट का आदानप्रदान किया, पर मन खिन्न हो गया था.

कार निकालने लगी तो माखन सामने आ गया, ‘‘मेमसाहब, गाड़ी चमक रही है न?’’

‘‘हां भई, चमक तो खूब रही है. तुम्हारा काम लगता है, धन्यवाद.’’

‘‘मेमसाहब, घरवाली को बोल रखा है, बाई की गाड़ी रोज चमचमाती होनी चाहिए. बस, मेमसाहब, वो साहब को बोल देना, मैं ने दूसरा आवेदनपत्र रोजगार दफ्तर में भिजवा दिया है. वहां के बाबू को भी खुश कर रखा है. अब जैसे ही कारखाने से मांग जाएगी, वह मेरा नाम भेज देगा. अब आगे साहब को देखना है.’’

माखन ने इसी महाविद्यालय से 4-5 साल पहले बी.ए. किया था. जब कहीं नौकरी नहीं मिली तो किसी तरह रसायन विभाग में चपरासी व सहायक के पद पर रखवा दिया था उसे. अब पीछे पड़ा था कि कारखाने में कोई जगह मिल जाए. इसे क्या पता कि साहब ही तो सर्वेसर्वा नहीं थे.

‘‘देखो माखन, मैं ने पहले भी कहा था कि वहां बड़ी लंबी लाइन लगी रहती है. सबकुछ कायदे से होता है. फिर अनुभव भी तो चाहिए.’’

‘‘अरे, मेमसाहब, मालूम है. मैं ने सब मामला तय कर रखा है. पिछड़ी जाति का प्रमाणपत्र बनवा लिया है अपने विधानसभा सदस्य से. पिछले चुनाव में हमीं ने तो जिताया था उन्हें. अब तो है न उम्मीद? सच्ची, बहुत घूम लिए, मेमसाहब.’’

मैं सकपका गई. असली ब्राह्मण परिवार का था वह. उस के चाचा अब भी तीजत्योहारों पर कालोनी में कथा बांचते थे.

‘‘भई, तुम पत्र तो आने दो दफ्तर से, फिर साहब से ही बात करना. मुझे इन बातों का ठीक से कुछ मालूम नहीं.’’

कार चलाई, तो दिमाग भी कहीं घूमने लगा. जा किधर रहे हैं सब लोग? कहां होगी सीमा? क्या सचमुच आज झूठ के बिना गुजारा नहीं है? बाबा कहा करते थे कि जब सब रास्ते बंद हो जाएं तो भगवान को पुकारना चाहिए. पर लगता है, आज की वास्तविकता यह है कि जब कोई उपाय न दिखाई दे तो झूठ, बहानों व हेराफेरी का सहारा लेना चाहिए. शायद जनता जान गई है कि पुकारने से भगवान किस्सेकहानियों में ही प्रकट होते थे. आज उन के नाम से काम नहीं निकलता है.

हां, झूठ व बेईमानी से अकसर काम चल जाता है. उदाहरण सामने रहते ही हैं, कहीं ‘झूठे का मुंह काला’ नहीं दिखता और ‘सच्चे का बोलबाला’ भी सुनीसुनाई बात लगती है. फिर बाद की सोचने की फिक्र किसे है? अभी फिलहाल, इसी पल की मुसीबत किसी न किसी तरह टल जाए. कल किस ने देखा है? पकड़े भी गए तो कौन हरिश्चंद्र का जमाना है. कह देंगे, सब करते हैं, हमीं कौन अलग हैं. ‘सब चलता है’ का मुहावरा कितना चल पड़ा है आजकल.

विचारों में डूबी चली जा रही थी कि अचानक घर की याद आई. याद आया कि फूलमती नहीं आई और पतिदेव भी घर पर हैं. यानी खाना ढंग से बनाना पड़ेगा. सोचा, पनीर व अंडे वगैरह लेती चलूं. गाड़ी टी.टी. नगर की ओर मोड़ी. सुपर बाजार के सामने पार्क करने की जगह ढूंढ़ ही रही थी कि चौंक पड़ी. स्कूल यूनीफार्म पहने 5-6 लड़कों में यह अपना मोहित ही तो है न. हां, हां, वही था. उस के हाथ घुमा कर बोलने के अंदाज से पहले ही पहचान लिया था, अब तो और स्पष्ट दिखने लगा था.

अरे, ये सब तो रंगमहल से निकल रहे हैं. 3 बज चुके थे, शो खत्म हुआ होगा. कई दिन से जिद कर रहा था फिल्म देखने की. अभी परसों ही तो अपने पिता से करारी डांट खाई थी कि ये फिल्मों का चस्का छोड़ो, बोर्ड का इम्तिहान है, मेहनत करो. और यह जनाब स्कूल से खिसक, यहां शोभा बढ़ा रहे हैं. हम से कह रहा था कि 11 बजे से अतिरिक्त कक्षाएं हैं, गणित और विज्ञान की. मेरे देखतेदेखते सब लड़के हंसते खिलखिलाते टैंपो में सवार हो कर ओझल हो गए.

पहले से उदास मन और व्यथित हो उठा. बिना कार रोके मैं सीधे घर पहुंची. अमित बाहर अपने टामी के साथ गेंद उछालने में लगा था.

‘‘अमित, तुम्हारे पिताजी कहां हैं, बेटे?’’

‘‘मां, हरीश चाचा आए हैं, उन के साथ सोने के कमरे में टेलीविजन पर मैच देख रहे हैं. क्या आप को पता है कि आस्ट्रेलिया ने 100 रन बना लिए हैं और उन का एक भी विकेट नहीं गिरा. गए हम लोग तो. मैं होता तो मालूम है, क्या करता, एक…’’

‘‘अच्छा, अच्छा, जरा चुप कर अब. मेरा सिर दर्द कर रहा है,’’ मैं खीज कर बोली.

‘‘मां, एक मजेदार बात तो सुनती जाओ. खूब हंसोगी. हरीश चाचा कह रहे थे कि चाची उन्हें घर पर टेलीविजन नहीं देखने दे रही थीं, भंडार की सफाई को कह रही थीं, इसलिए चाचा बहाना बना कर आए हैं कि पिताजी की तबीयत खराब है, देखने जाना है. अब दोनों ब्रिज खेल रहे हैं व टेलीविजन भी देख रहे हैं. चाचा ने चाची को क्या बुद्धू बनाया. मजा आ गया.’’

‘‘सुनो, अमित, अपनी परियोजना का सारा सामान अपने कमरे में रखो चल कर मेज पर. मैं अभी कौफी पी कर जुटती हूं तुम्हारे साथ. और सुनो, ठहरो, पहले जरा पिताजी को बुला लाओ इधर.’’

अमित खुशीखुशी उछलता हुआ अंदर भागा. मैं साड़ी बदल मुंहहाथ धोने लगी.

‘‘क्यों भई, बड़ी देर कर दी आज. बहुत भूख लगी है. सब परांठे वगैरह खत्म कर दिए हैं, कुछ करो जल्दी से,’’ पत्ते हाथ में पकड़े साहब ने फरमान जारी किया.

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‘‘सुनिए तो, संजीवजी से साफसाफ कह दो कि आशा कार नहीं दे सकती. ज्यादा जरूरत है तो किराए पर लेने का प्रबंध कर देते हैं. और हां, अपने इन मित्र महोदय से भी कह दो कि घर पर फोन कर के बता दें कि आप की तबीयत बिलकुल ठीक है व आप दोनों बैठे ताश खेल रहे हैं.

‘‘सुनो जी, हां, आज से यह बहानेबाजी व गोलमाल बंद. कम से कम इस घर में. और मोहित आए तो कह दीजिए कि बाहर जाना हो या फिल्म देखनी हो, तो हमें बता कर जाए, आगे मैं देखूंगी. आप कृपया इतना ही सहयोग दें तो बहुत है.’’

अचकचाए से ये कुछ कहने को हुए, पर मेरी मुखमुद्रा देख चुपचाप अंदर चले गए. मैं सोचने लगी कि खाना बनाऊं या अमित का हिमालय पर्वत. दोनों कार्य कुछ विशेष कठिन तो नहीं हैं.

जस्टिस फौर ट्विंकल

  लेखक:   निखिल अग्रवाल

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले का नाम मजबूत तालों के लिए देश में ही नहीं, विदेशों में भी मशहूर है. इसी अलीगढ़ जिले में एक कस्बा है-टप्पल. दिल्ली से करीब 90 किलोमीटर दूर मिलीजुली आबादी वाले इस कस्बे में ढाई

साल की मासूम ट्विंकल से हुई हैवानियत ने लोगों को झकझोर कर रख दिया था. जून के पहले पखवाड़े में घटी वारदात के बाद अलीगढ़ का यह कस्बा पूरे देश में अचानक ही सुर्खियों में छा गया.

इसी 2 जून की बात है. सुबह के 9-10 बजे होंगे. टप्पल कस्बे में सफाई कर्मचारी सड़कों पर सफाई कर कूड़ाकचरा उठा रहे थे. उन्होंने एक जगह कूड़े के ढेर में कई कुत्तों को मुंह मारते हुए देखा. कुत्तों का गंदगी में मुंह मारना कोई नई बात नहीं थी. लेकिन कुत्ते वहां कचरे में कपड़े में लिपटी जिस चीज को खींच रहे थे, उस से दुर्गंध भी आ रही थी.

तेज दुर्गंध आने से सफाई कर्मचारियों को कुछ शक हुआ. कुत्तों को वहां से भगा कर वह उस जगह पर पहुंचे तो गंदे से उस फटेपुराने कपड़े से बाहर निकले हुए किसी बालक के हाथपैर देख कर सफाईकर्मियों के भी हाथपैर कांपने लगे. उन्होंने आवाज दे कर अपने अन्य साथियों को बुलाया.

2-4 सफाईकर्मी वहां और आ गए, तो उन्होंने कपड़े को खोल कर देखा. मैलेकुचैले उस कपड़े में एक बच्ची की क्षतविक्षत लाश लिपटी हुई थी. बच्ची का दाहिना हाथ कटा हुआ था, आंखें निकाली हुई थीं और पहचान छिपाने के लिए शव पर एसिड डाला गया था. शव गल चुका था. बच्ची की उम्र करीब ढाईतीन साल लग रही थी. कचरे के ढेर में किसी बच्ची का शव मिलने की खबर पूरे कस्बे में जंगल की आग की तरह फैल गई. वहां लोगों की भीड़ लग गई. तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं.

कस्बे के मोहल्ला कानूनगोयान में रहने वाले बनवारी लाल शर्मा और उन की पत्नी शिल्पा देवी को भी खबर मिली, तो वे भी मौके पर पहुंच गए. क्योंकि उन की ढाई साल की बेटी भी पिछले 3 दिनों से गायब थी. वह जगह उन के घर से केवल डेढ़ सौ मीटर दूर थी. शिल्पा ने सफाई कर्मचारियों के पास रखा कचरे में मिला शव देखा, तो वे दहाड़ मार कर रोने लगे.

वह शव शिल्पा की ढाई साल की इकलौती बेटी ट्विंकल का था. ट्विंकल 30 मई, 2019 की सुबह करीब साढ़े 8 बजे घर के बाहर खेलते समय गायब हो गई थी. ट्विंकल अपने मांबाप के साथ चाचा और दादा की भी लाडली थी. मां और पिता के साथ पूरे परिवार ने मोहल्ले भर में ट्विंकल की तलाश की थी, लेकिन उस का कोई पता नहीं चल पाया था.

दोपहर तक जब पूरा परिवार ट्विंकल को ढूंढ कर निराश हो गया, तो लोगों ने उन्हें पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. तब बनवारी लाल शर्मा पत्नी शिल्पा को ले कर उसी दिन दोपहर में टप्पल थाने गए. वहां उन्होंने थानाप्रभारी से अपनी मासूम बेटी को ढूंढने की गुहार लगाई.

बनवारी ने पड़ोस में रहने वाले जाहिद पर ट्विंकल के अपहरण का संदेह भी जताया, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज किए बिना ही बच्ची को ढूंढने का आश्वासन दे कर पीडि़त परिवार को घर भेज दिया. आरोप है कि काफी कहासुनी के बाद पुलिस ने दूसरे दिन रिपोर्ट दर्ज की. इस के बाद भी पुलिस ने बच्ची को तलाश करने का कोई प्रयास नहीं किया.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिलने पर बनवारी लाल शर्मा और उन का परिवार अपने स्तर पर मासूम ट्विंकल को तलाश करने में जुटा रहा. 30 मई का दिन यूं ही निकल गया.

ट्ंिवकल के लापता होने के बाद से बनवारी के घर की खुशियां चली गई थीं. वह मासूम ही इस घर का चांद और सितारा थी. ट्विंकल के नहीं मिलने से उस की मां शिल्पा ज्यादा बेहाल थी. बनवारी लाल उसे बारबार दिलासा देते रहे कि हमारी लाडो कहीं खो गई है, वह जल्दी ही घर आ जाएगी.

काश, ऐसा होता. 31 मई को दूसरा दिन भी निकल गया. ट्विंकल का कोई पता नहीं चला. पहली जून को तीसरे दिन भी पूरा परिवार मासूम ट्विंकल को ढूंढने में जुटा रहा लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला.

यह भी पता नहीं चला कि ट्विंकल कहां गई. उसे आसमान निगल गया या जमीन खा गई. ढाई साल की बच्ची खुद तो कहीं जा नहीं सकती थी. ऐसा भी कुछ नहीं था कि वह बच्ची किसी पानी के टैंक या नाले वगैरह में गिर गई हो.

4 दिन से लापता ट्विंकल का शव जब कूड़े के ढेर में मिला, तो पुलिस के खिलाफ आक्रोश छा गया. इस बीच, सूचना मिलने पर पुलिस भी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने शव को कब्जे में लिया. जब वह शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाने लगी, तो आक्रोशित लोगों ने पुलिस की गाड़ी को रोक लिया और बच्ची का शव अपने कब्जे में ले लिया.

गुस्साए लोगों ने टप्पल पुलिस थाने के सामने बच्ची का शव रख कर नारेबाजी करते हुए अलीगढ़पलवल मार्ग जाम कर दिया. बाद में एसएसपी, सांसद, विधायक और कई अधिकारियों ने समझाबुझा कर आक्रोशित लोगों को शांत किया. करीब 4 घंटे बाद लोगों ने रास्ता खोला.

अपहृत बच्ची का शव कूड़े के ढेर में मिलने से यह साफ  हो गया कि बच्ची की हत्या कर शव वहां फेंका गया था. पुलिस अधिकारियों ने मामला भड़कने की आशंका को देखते हुए डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को मौके पर बुलवा लिया. पुलिस ने बच्ची के शव का पोस्टमार्टम 3 डाक्टरों के पैनल से कराया. इस के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया.

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बच्ची की नृशंस हत्या की बात जिसने भी सुनी उस का खून खौल गया. पुलिस के प्रति लोगों में तनाव बढ़ता जा रहा था. बाजार बंद हो गए. बच्ची के परिजनों ने पड़ोसी युवक पर मासूम ट्विंकल का अपहरण कर हत्या करने का आरोप लगाया. एसएसपी आकाश कुलहरि ने लोगों के आक्रोश को देखते हुए टप्पल थानाप्रभारी कुशलपाल सिंह को लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया.

शव मिलने के बाद भी मासूम के हत्यारों के नहीं पकड़े जाने पर 3 जून को लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. आक्रोशित लोगों ने कस्बे के बाजार बंद कर पीडि़त परिवार के साथ थाने का घेराव किया. प्रदर्शनकारियों ने हत्या के आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर मामले का पूरी तरह खुलासा करने की मांग की.

खैर के सीओ पंकज श्रीवास्तव ने मौके पर पहुंच कर लोगों को समझाबुझा कर और पुलिस की ओर से की जा रही काररवाई के बारे में बता कर उन का आक्रोश शांत किया.

ट्विंकल हत्याकांड को ले कर कुछ संगठनों ने कस्बे में धरना देना शुरू कर दिया. कुछ संगठनों ने कैंडल मार्च निकाला. पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने के लिए संगठनों ने गांवों में जनसंपर्क शुरू कर दिया.

लोगों का गुस्सा 4 जून को भी शांत नहीं हुआ. विभिन्न संगठनों और ग्रामीणों का अनशन व धरना दूसरे दिन भी जारी रहा. आंदोलनकारियों ने पुलिस व प्रशासन के सामने 3 प्रमुख मांगें रखीं. इन में पहली यह कि मुख्यमंत्री मौके पर आ कर ग्रामीणों से बात करें. दूसरी यह कि हत्याकांड में कड़ी से कड़ी काररवाई की जाए ताकि कोई ऐसा करने की हिम्मत न करे. तीसरी यह कि पीडि़त परिवार को आर्थिक मदद दी जाए.

जनाक्रोश और लगातार चल रहे आंदोलन को देखते हुए टप्पल कस्बे में भारी पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई. शांति व्यवस्था के लिए आसपास के थानों की पुलिस के अलावा पीएसी और आरएएफ  को बुला लिया गया.

अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम व खैर विधायक अनूप प्रधान ने पीडि़त परिवार के घर पहुंच कर आर्थिक मदद के रूप में 2 लाख रुपए का चैक दिया.

पुलिस की काररवाई हुई शुरू

पुलिस ने ट्विंकल की हत्या के आरोप में दो अभियुक्तों जाहिद और असलम को 4 जून को गिरफ्तार कर लिया. दोनों आरोपी टप्पल कस्बे के ही रहने वाले थे. पुलिस ने दावा किया कि बनवारी लाल से रुपयों के लेनदेन के विवाद में मासूम बच्ची की हत्या की गई. आरोपी जाहिद का बच्ची के दादा और चाचा से विवाद हुआ था. जाहिद ने उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. जाहिद और बनवारी पड़ोस में ही रहते हैं.

जाहिद ने कुछ समय पहले बनवारी से 50 हजार रुपए उधार लिए थे. इन में से 40 हजार रुपए तो वापस लौटा दिए थे. बाकी के 10 हजार रुपयों के लिए जब तकादा किया गया, तो जाहिद ने मई के आखिरी सप्ताह में बनवारी के घर वालों को गालीगलौज करते हुए धमकी दी थी.

उधार के पैसों को ले कर जाहिद खफा था. वह बनवारी से इस का बदला लेना चाहता था. 30 मई की सुबह उसे मौका मिल गया. ढाई साल की बच्ची ट्विंकल जब अपने घर के सामने खेल रही थी, तो बिसकुट दिलाने के बहाने जाहिद उसे अपने घर ले गया.

इस के बाद उसी दिन जाहिद ने अपने दोस्त असलम के साथ मिल कर दुपट्टे से उस का गला घोंट कर उस फूल सी बच्ची की हत्या कर दी. बच्ची का शव उन्होंने भूसे के ढेर में छिपा दिया. जब शव से बदबू आने लगी, तो पहली जून को उन्होंने शव कपड़े में लपेट कर घर के पास ही कचरे के ढेर में फेंक दिया.

ट्विंकल हत्याकांड का खुलासा करते हुए पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ  अपहरण व हत्या का मामला दर्ज कर लिया. बाद में उसी दिन अदालत में पेश कर दोनों को जेल भेज दिया गया.

5 जून को भी यह मामला गरमाया रहा. टप्पल में आंदोलन होता रहा. ट्विंकल के पिता बनवारी लाल शर्मा ने पुलिस को चेतावनी दी कि अगर आरोपियों के परिजनों के खिलाफ काररवाई नहीं की गई, तो वे 6 जून को आत्मदाह कर लेंगे.

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बनवारी लाल की इस चेतावनी को देखते हुए एसएसपी आकाश कुलहरि 5 जून की रात को ही उन के घर जा कर मिले. एसएसपी ने उन्हें हरसंभव काररवाई का आश्वासन देते हुए कहा कि आरोपियों को फास्ट ट्रेक के माध्यम से जल्द सजा दिलाने का प्रयास किया जाएगा. एसएसपी के आश्वासन पर बनवारी लाल ने आत्मदाह का इरादा त्याग दिया.

पुलिस ने भले ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन यह मामला तूल पकड़ता जा रहा था. पूरे देश में आंदोलन हो रहे थे. सोशल मीडिया पर ट्विंकल हत्याकांड सुर्खियां बन गया.

पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने के लिए कई सेलिब्रिटी भी आगे आ गए. क्रिकेटर शिखर धवन, वीरेंद्र सहवाग से ले कर बौलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार, अनुपम खेर, अभिनेत्री सनी लियोनी ने ट्विटर के जरिए हत्यारों को कड़ी सजा और परिवार को जल्द न्याय दिलाने की आवाज उठाई.

एसएसपी आकाश कुलहरि ने 6 जून को मासूम ट्विंकल के मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में टप्पल के तत्कालीन थानाप्रभारी कुशलपाल सिंह सहित 3 दरोगा और एक कांस्टेबल को निलंबित कर दिया. आरोप है कि अपहरण की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी इन पुलिस कर्मियों ने बच्ची की बरामदगी का कोई प्रयास नहीं किया था. अभियुक्तों का पता लगने के बाद भी उन के खिलाफ  कोई काररवाई नहीं की गई थी.

टप्पल में ढाई साल की मासूम बच्ची से हुई बर्बरता पर पूरे देश में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. सड़कों से ले कर सोशल मीडिया तक पर गुनहगारों को फांसी की सजा दिलाए जाने की मांग उठ रही थी. सियासत भी गरमा गई थी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और बसपा प्रमुख मायावती ने इस मामले में जहां यूपी सरकार को आड़े हाथ लिया, वहीं बच्ची को न्याय दिलाने के लिए बौलीवुड व खेल जगत की हस्तियों ने मोर्चा खोल दिया.

इस बीच, 7 जून, 2019 को सोशल मीडिया पर वायरल हुई ट्विंकल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने लोगों को झकझोर दिया. ट्विंकल की हत्या क्रूरतापूर्ण तरीके से गला घोंट कर की गई थी. इस से पहले उसे बुरी तरह पीटा गया, जिस से उस की पसलियां टूट गई थीं. बाएं पैर में फैक्चर था. नाक की हड्डी भी टूटी हुई थी. सिर में चोट थी.

बच्ची की एक किडनी, पेशाब की थैली व प्राइवेट पार्ट गायब मिले. एक हाथ शरीर से अलग था. पहचान छिपाने के लिए मासूम के शव को एसिड डाल कर जलाया गया था. बच्ची से दुष्कर्म का भी शक है, लेकिन एसएसपी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से कहते हैं कि रेप की पुष्टि नहीं हुई है. दुष्कर्म की जांच के लिए कुछ स्लाइड और सैंपल आगरा की फोरैंसिक लैब भेजे गए.

जांच सौंप दी गई एसआईटी को

पूरे देश में यह मामला छा जाने पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (ला एंड और्डर) आनंद कुमार ने ट्विंकल हत्याकांड की जांच एसआईटी से कराने और दोनों हत्या आरोपियों के खिलाफ  पोक्सो एक्ट में काररवाई करने की घोषणा की. इस के लिए एसपी (क्राइम) डा. अरविंद कुमार और एसपी (देहात) मणिलाल पाटीदार के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया गया.

दिल दहला देने वाले ट्विंकल हत्याकांड में पुलिस ने 8 जून को मुख्य आरोपी जाहिद की पत्नी शाइस्ता और भाई मेहंदी हसन को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस के अनुसार, ये दोनों आरोपी ट्विंकल की हत्या के समय मौके पर मौजूद थे. बाद में ट्विंकल का शव शाइस्ता के दुपट्टे में लपेट कर फेंका गया था. पुलिस ने इन दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

अलीगढ़ बार एसोसिएशन ने बैठक कर फैसला किया कि कोई भी वकील दरिंदों की पैरवी नहीं करेगा और न ही किसी बाहरी वकील को पैरवी करने दिया जाएगा. वकीलों ने मासूम को न्याय दिलाने के लिए पीडि़त पक्ष का मुकदमा निशुल्क लड़ने की भी घोषणा की.

राज्य बाल संरक्षण आयोग की टीम ने 8 जून को टप्पल पहुंच कर पीडि़त परिवार से मुलाकात की. आयोग के अध्यक्ष डा. विशेष कुमार गुप्ता की अगुवाई में इस टीम ने पीडि़त परिवार से घटनाक्रम की जानकारी ली. पीडि़त परिवार ने कहा कि हत्याकांड में कई अन्य लोग भी शामिल हैं, जिन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए.

आयोग के दल ने इस के बाद अधिकारियों से बात की. आयोग के अध्यक्ष डा. गुप्ता ने कहा कि आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत काररवाई की सिफारिश करते हुए मुख्यमंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे. गैंगस्टर एक्ट में काररवाई होने पर ही आरोपियों पर रासुका लग सकेगी.

सोशल मीडिया पर ट्विंकल के हत्यारों को फांसी की मांग को ले कर महापंचायत के आयोजन का फैसला किया गया. इस की वजह से 9 जून, 2019 को टप्पल कस्बा छावनी बना रहा. पुलिस ने सुबह ही टप्पल की सीमाएं सील कर दीं. हरेक आनेजाने वाले की तलाशी ली गई. पीडि़त परिवार के घर जाने वाले रास्ते भी सील कर दिए गए. दूरदराज से आए लोगों को पुलिस ने वापस भेज दिया.

भाजपा नेत्री साध्वी प्राची को पुलिस ने जेवर टोल प्लाजा पर रोक लिया. पुलिस की सतर्कता से टप्पल में महापंचायत नहीं हो सकी. आक्रोशित लोगों ने इस दौरान कुछ वाहनों में तोड़फोड़़ भी की. एक बारात की कार पर भी पथराव हुआ.

अघोषित कर्फ्यू जैसे हालात के कारण पूरे कस्बे में बाजार बंद और गलियां सूनी रही. जिलाधिकारी चंद्रभूषण सिंह और एसएसपी आकाश कुलहरि दिनभर टप्पल में डेरा डाल कर हालात पर नजर रखे रहे.

ट्विंकल हत्याकांड में कई दिनों से विरोध प्रदर्शन के बीच अफवाहों पर लगाम लगाने के लिए जिला प्रशासन ने 10 जून को टप्पल और खैर तहसील इलाके में इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी. टप्पल कस्बे में आधेअधूरे बाजार खुलने से तनावपूर्ण शांति रही. आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद ने टप्पल पहुंच कर अधिकारियों के साथ बैठ कर हालात की समीक्षा की.

महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव और कांग्रेस के कई राष्ट्रीय और प्रदेश पदाधिकारियों ने टप्पल पहुंच कर पीडि़त परिवार से मुलाकात कर उन की हिम्मत बंधाई. उन्होंने कहा कि मासूम के साथ हैवानियत करने वालों को जल्द से जल्द कठोर सजा मिलनी चाहिए.

11 जून को 6 दिन बाद बाजार खुलने से टप्पल कस्बे में पलवल मार्ग पर चहलपहल नजर आई. प्रशासन ने इंटरनेट सेवा भी बहाल कर दी. तनाव को देखते हुए कई जगह पुलिस फोर्स तैनात रही. पुलिस लगातार हर गतिविधि पर नजर रखती रही.

पुलिस की थ्यौरी अभी भी स्पष्ट नहीं

12 जून को मासूम बच्ची की आत्मा की शांति के लिए पीडि़त परिवार की ओर से टप्पल में शुद्धि हवन और शोकसभा की गई. इस में सांसद सतीश गौतम, विधायक अनूप प्रधान सहित भाजपा के कई पदाधिकारी और पुलिस अधिकारी शामिल हुए. जिला प्रशासन ने ट्विंकल मामले की न्यायिक जांच शुरू कर दी. इस के तहत 11 से 19 जून तक घटना के संबंध में जानकारी रखने वाले लोगों के बयान दर्ज किए गए.

ट्विंकल की हत्या के मामले में गिरफ्तार आरोपियों का पुलिस ने जब रिकौर्ड खंगाला तो पता चला कि 43 साल के असलम पर दुष्कर्म, अपहरण और गुंडा एक्ट सहित 5 मामले दर्ज हैं. सन 2014 में असलम के खिलाफ  टप्पल थाने में अपनी ही 4 साल की भतीजी से दुष्कर्म करने का मामला दर्ज हुआ था.

इस के बाद उस की पत्नी ने घर छोड़ दिया था. इस के अलावा उस के खिलाफ 2017 में दिल्ली के गोकलपुरी थाना इलाके से एक बच्चे के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था.

असलम वहां से एक बालक का अपहरण कर टप्पल ले आया था और उस के घर वालों से फिरौती मांगी थी. टप्पल थाने में उस पर गुंडा एक्ट के भी 3 मामले दर्ज हैं. अलसम कुछ दिन पहले ही जमानत पर छूटा था. दूसरा आरोपी जाहिद जुआरी है. लोग उसे सट्टा किंग के नाम से भी जानते हैं.

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फिलहाल, अलीगढ़ और टप्पल में इस मामले को ले कर शांति है, लेकिन पीडि़त परिवार को अभी अपनी सुरक्षा की चिंता है. इस परिवार ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख कर आरोपियों को मौत की सजा दिलाने की मांग करते हुए कहा है कि अगर इन्हें फांसी नहीं हुई तो जेल से बाहर निकलने पर इन की हिम्मत और बढ़ जाएगी.

वह कहती थी मुझ से सैक्स करो…

मैं हैरान हूं खुद पर कि यह सब मेरे साथ ही क्यों हुआ? 24 साल की उम्र में यह कैसे हो सकता है, समझना मुश्किल था मेरे लिए. मेरी गर्लफ्रैंड साथ होती तो मैं सैक्स से बचने के लिए बहाने ढूंढ़ रहा होता. कभीकभी तो बाथरूम भागता और वहीं चोरीछिपे वियाग्रा की गोली खा कर खुद को सैक्स के लिए तैयार करता. यह गोली काफी महंगी थी. ब्लैक से खरीदने पर 400-500 रूपए खर्च करने पड़ते थे. मन करता कि इस से तो अच्छा है मर ही जाऊं.

मेरे लिए यह डूब मरने वाली बात थी कि मेरी सभी गर्लफ्रैंड मेरे साथ सैक्स करने के लिए तैयार रहतीं पर मैं बहाने ढूंढ़ रहा होता. एक दिन तो वियाग्रा की गोली खाते वक्त मेरी एक गर्लफ्रैंड ने पूछ ही लिया कि यह क्या है? तब बङी मुश्किल से मैं ने बात का रूख दूसरी ओर मोड़ दिया था.

सिहर उठता हूं मैं…

वह दिन मुझे आज भी याद है. मैं उस दिन को याद कर के सिहर उठता हूं जब एक झोला छाप डाक्टर इलाज के दौरान जांघों में 3-4 सूईयां लगा कर पूछ बैठा,” दर्द तो नहीं हो रहा?” हद हो गई थी तब तो. मन कर रहा था इसी तरह उस के साथ भी करूं, पर कर भी क्या सकता था. उस ने मुझे दवा की कई गोलियां शुबहशाम खाते रहने को दीं, जैल लगाने को दिए पर फायदा कुछ नहीं हुआ. मैं बुरी तरह डर गया था…

मैं अखबार में एक विज्ञापन देख कर एक औघड़ बाबाजी के पास भी गया. उस ने तब मेरी खोपड़ी पर हड्डीनुमा किसी चीज से जोर से दे मारा और 5-7 हजार रूपए भी झटक लिए. दोबारा आने को कहा पर मैं ने हाथ जोड़ लिए.

मैं निराश हो चुका था. शराब पीने लगा था और कभीकभी तो ड्रग्स भी लेने लगा था. मेरे मोबाइल और लैपटौप में सैकङों पोर्न फिल्में थीं जिन्हें मैं बारबार देखता. शायद किशोरावस्था में की गई गलती की सजा मुझे अब मिल रही थी. तब मैं दिन में कई बार हस्तमैथुन करता था. 19 साल की उम्र में एक दिन एक गर्लफ्रैंड ने सैक्स करने को कहा. पर मैं सफल नहीं हो पाया था. एक दिन फिर से उस से आमनासामना हुआ पर मैं उसे सैक्स में मजा नहीं दे पाया. उस के बाद उस ने मुझ से दोस्ती ही तोड़ ली थी.

बात को छिपाना भूल थी मेरी…

शारीरिक कमजोरी को ले कर मैं घर में किसी से कुछ नहीं बताता था. यहां तक कि शर्म के मारे दोस्तों को भी नहीं. पिता थे नहीं और माता जी 8वीं पास थीं. शायद यह भी एक मजबूरी थी मेरी. मैं आकर्षक युवक की तरह दिखता था और शायद यही वजह थी कि मेरी कई गर्लफ्रैंड थीं. ऐसा नहीं था कि सैक्स की क्षमता मेरी खत्म हो गई थी. बाथरूम में मैं जब अपने अंग पर तेल लगा कर मालिश करता तो वह पूरी साइज में आ जाता था. फिर सैक्स में मैं नाकामयाब क्यों हो रहा था, मेरी समझ से बाहर की बात थी.

एक-एक कर सभी गर्लफ्रैंड मुझ से किनारा कर चुकी थीं. मैं हताश और निराश था. लेकिन तभी मेरी जिंदगी में एक गर्लफ्रैंड आई. वह नेकदिल लगी, लालची नहीं थी, न ही मुझ पर कभी किसी चीज के लिए दबाव डालती थी. हमारा लंबा साथ रहा. हम एकदूसरे से काफी फ्रैंक होते गए तब मुझे लगा कि सैक्स को ले कर इस से अपनी बात कहनी चाहिए. इस का मौका भी एक दिन आ गया. मैं ने उसे एकएक कर सारी बात बता दी. वह हंसी नहीं, मेरी बातों को गौर से सुनती रही.

शायद यहीं से मेरी जिंदगी बदलने वाली थी…

उस ने मुझे झोला छाप डाक्टर से इलाज कराने से मना किया. उस औघड़ के पास कभी न जाने के लिए कहा और फिर मेरी सहायता करने का भरोसा दिया. वह मुझे एक दिन एक मनोवैज्ञानिक डाक्टर के पास ले कर गई. उस डाक्टर ने मुझे सिर्फ एक गोली सप्ताह में 3 दिन खाते रहने को कहा. इस दौरान मुझे रोज सुबहशाम टहलना और व्यायाम करना जरूरी था. खाने में पौष्टिक आहार, हरी सब्जियां, सलाद, दूध वगैरह लेने थे और जंक फूड से परहेज बरतना था. डाक्टर ने कहा कि इस दौरान शराब को हाथ नहीं लगाना है और भूल कर भी अंधविश्वासी बाबाओं के पास नहीं जाना है.

शराब और पोर्न से तोबा

यह सब कई महीने तक चलता रहा. मैं शराब छोड़ चुका था और ड्रग्स को हाथ तक नहीं लगाया था. लैपटौप और मोबाइल से पोर्न फिल्में डीलिट कर चुका था. मेरे हाथों में अब अच्छा साहित्य और पत्रिकाएं होतीं. मैं अब रूटीन लाइफ जीने लगा था.

तय समय के बाद उसी मनोवैज्ञानिक डाक्टर के पास गया. हालचाल पूछ कर उन्होंने मुझ से कई सवाल पूछे फिर कहा,”अब तुम ठीक हो. दवा मत खाना अब. मगर जिस तरह इतने दिनों तक रहे वैसे ही रहना. चाहो तो शादी कर के घर भी बसा लो.”

कुछ महीनों बाद मैं ने शादी कर ली. मेरी पत्नी वही गर्लफ्रैंड है जिस ने मुझे मानसिक बीमार होने से बचा लिया. पिछले साल मुझे एक बेटी भी हुई है.

एक दिन परिवार सहित उसी मनोवैज्ञानिक के पास जाना हुआ. मैं मिठाई का डब्बा साथ ले कर गया था. उन्होंने मुझ से कहा कि तुम तो कभी बीमार थे ही नहीं. तुम्हें मानसिक रोग था, इस से तुम अवसाद में थे. डरे हुए थे. पर समय रहते इसे तुम ने ही हराया. मजाकमजाक में उन्होंने हाथ मिलाते हुए कहा,”और हां, एक बात तो बताना भूल ही गया. जो दवा की गोली तुम खा रहे थे वह कोई गंभीर दवा नहीं कैल्सियम की गोली थी.” हम सभी जोर से हंस पड़े…

एटीएम तोड़ो, मालामाल हो जाओ…!

आमतौर पर आदमी हाड़ तोड़ मेहनत करता है, तब जाकर दो वक्त की रोटी मिल पाती है. मगर ख्वाब में जीने वाले लोग कब अपराध की दुनिया में पैर रखते हैं उन्हें पता ही नहीं चलता. जबसे एटीएम शहर-शहर लगने लगे हैं, लोगों को अपने ख्वाब पूरे करने का मानो एक जरिया मिल गया है. वे लोग, जिनमें अक्सर युवा होते हैं एटीएम को तोड़कर पैसे निकाल, रातों-रात लखपति, करोड़पति बनने के प्रयास करने लगते हैं. मगर होता यह है कि एटीएम तोड़ने के जुर्म में लंबी जेल यात्रा पर जाना पड़ जाता है. इस रिपोर्ट में हम एटीएम तोड़ने और अपराध की दुनिया में गुम हो जाने वाले चेहरों के संदर्भ में आपको बताना चाहेंगे. ताकि हो सके तो यह लेख पढ़कर या आपका मार्गदर्शन मिलने पर, कोई तो एटीएम तोड़ने का और लखपति बनने का ख्वाब देख कर अपनी जिंदगी को जुर्म के दलदल में धकेलने से बच जाए.

एटीएम तोड़ने के चंद सच्चे किस्से

पहला किस्सा-
छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिला के ग्राम देवरी के रहने वाले दुबे चंद नामक एक किसान ने पैसों के खातिर एक रात शहर के एक एटीएम में प्रवेश कर उसे तोड़ने का प्रयास किया. मजे की बात यह है कि उसने एटीएम तोड़ने का एक वीडियो यूट्यूब पर देखा था.और इसके बाद वह लखपति बनने निकल पड़ा. मगर सीसीटीवी में कैद हो जाने के बाद और एटीएम तोड़ नहीं पाने मे असफल होकर अंततः वह पकड़ा गया.

दूसरा किस्सा-

जिला कोरबा के दीपका क्षेत्र में एक कोयला खदान कर्मचारी के बिगड़ैल पुत्र ने एक रात एटीएम पर धावा बोला और एटीएम को तोड़ने की भरपूर कोशिश की. बाद में जब पुलिस की पकड़ में आया तो उसने बताया शराब और नशाखोरी की लत के कारण वह एटीएम तोड़ने पहुंच गया था.

तीसरा किस्सा-

छत्तीसगढ़ के जिला भाटापारा के ग्राम तरेंगा के रहने वाले तीन मित्रों ने पैसे कमाने का यह आसान रास्ता चुना. एक दिन प्लान बना रात को एटीएम में धावा बोल दिया. जब एटीएम नहीं टूटा तो उसमें आग लगा दी. मगर अंततः भाटापारा पुलिस ने इन युवकों को अपनी गिरफ्त में ले लिया. इन लोगों ने बताया कि वे रातो रात लखपति बनना चाहते थे और ज़िंदगी में कुछ नहीं कर पाए तो यह रास्ता अपना लिया था.

यह चंद सच्चे किस्से, एक बानगी मात्र हैं .सच्चाई यह है कि ऐसे जाने कितने प्रकरण आए दिन सुर्खियों में रहते हैं. टेलीविजन पर दिखाई देते हैं. मगर सच यह है कि इन समाचारों से युवा वर्ग सकारात्मक भाव को ग्रहण नहीं कर जुर्म के रास्ते पर चल पड़ता है और अपना जीवन बर्बाद कर रहा है.

एक आंखों देखा प्रकरण यह भी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के तेलघानी नाका में एटीएम में चोरी का प्रयास विगत दिवस किया गया. पुलिस अधिकारी ने हमारे संवाददाता को बताया तेलघानी नाका में स्थित पंजाब नेशनल बैंक के एटीएम में रात एक अज्ञात चोर घुस आया.युवक अपने साथ औजार लेकर आया था. वह इस औजार से एटीएम के ऊपरी हिस्से को खोलने का प्रयास करता रहा. लेकिन वह इसमें पूरी तरह से विफल हो गया. यह पूरी घटना एटीएम में स्थित सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. जब वह युवा एटीएम तोड़ने में सफल नहीं हो पाया तो भाग खड़ा हुआ. अब इस पूरे मामले में इस अज्ञात आरोपी की तलाश गंज पुलिस कर रही है.
बता दे कि राजधानी में जैसा कि आम है थोड़ी थोड़ी दूरी पर ही कई बैंकों के एटीएम स्थित है. लेकिन अधिकतर एटीएम ऐसे है जहाँ पर गार्डों की सुविधा नही है. ऐसे में बैंक प्रबंधन जहां गार्डों की नियुक्ति नहीं कर रहे वही पुलिस पर भी सवाल उठता है. पुलिस एटीएम को रात्रि के समय चेक क्यों नहीं करती है.या फिर जब कभी चेकिंग के दौरान एटीएम में गार्ड नही होते है तो पुलिस द्वारा कड़ी कार्यवाही क्यों नही की जाती है. इस तरह की घटना बढ़ती जा रही है. बैंक प्रबंधन और पुलिस केवल तमाशा देख रहे है. सब सीसी टीवी कैमरे पर छोड़ दिया गया है.

आवश्यकता अवयेरनेस की है

छत्तीसगढ़ में अपने लेखन से जागरूकता फैलाने का कार्य कर रहे दुर्ग जिला में एडीजी श्री रतनलाल डांगी (आईपीएस )ने हमारे संवाददाता को बताया कि एटीएम तोड़ने का कार्य युवा वर्ग से जोश खरोश में हो जाता है.यह ऐसी उम्र होती है जब सोचने समझने की आइक्यू बहुत कमजोर होती है. और यही भंवर जाल में फंस कर लोग अपराध कार्य करते हैं और अपना भविष्य अंधकार मय कर लेते हैं.

पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा राजधानी के पुलिस हेड क्वार्टर में पदस्थ हैं इस मसले पर उनकी राय है कि एटीएम तोड़ने वाले दरअसल रातो रात लखपति बनने का ख्वाब देखते हैं यह नहीं देखते कि एटीएम की सुरक्षा के भी प्रबंध हैं. एटीएम को नुकसान पहुंचाना आसान नहीं होता और अगर किसी तरह तोड़ भी लिया तो सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं आप बच नहीं सकते और यही सच भी है फिल्मों में टीवी में ऐसे ख्वाब दिखाए जाते हैं जो सच्चाई से दूर होते हैं इन्हीं को देख देख कर के युवा वर्ग पैसे कमाने के लिए गलत राह
पर चल पड़ता है उसी में से एक रास्ता आजकल लोकप्रिय हो चला है. एटीएम तोड़ो, लखपति बन जाओ. मगर होता इसके ठीक उलट है, हाथों में हथकड़ियां लग जाती हैं और जीवन भर का दाग जो कभी छुपाए नहीं छूटता.

श्रम से भागकर अपराध करते हैं

दरअसल एटीएम तोड़ने का काम वही लोग करते हैं जो फिल्में ज्यादा देखते हैं. सेल्यूलाइटड पर फिल्म देखकर फिल्मों के हीरो हीरोइन की शान भरी जिंदगी देखकर यह लोग सोचने लगते हैं कि काश हम भी ऐसी जिंदगी जी सकें. आगे जब पैसे की बात आती है तो सबसे आसान तरीका उन्हें शहर के किसी कोने में लगा एटीएम दिखाई देता है और सोचने लगते हैं कि इसे तोड़ना कौन सी बड़ी बात है और औजार लेकर एटीएम तोड़ने पहुंच जाते हैं. दरअसल यह युवा वर्ग ऐसा होता है जो या तो अशिक्षित होता है अथवा कल्पना लोक में जीता रहता है. उसे मालूम होना चाहिए कि श्रम का जीवन में महत्व है और पैसे मेहनत करके टैलेंट से ही कमाए जा सकते हैं, गलत गैरकानूनी रास्ता उन्हें बर्बादी की ओर ले जाता है. एटीएम के कुछ प्रकरणों की जांच करने वाले इंद्र भूषण सिंह पुलिस अधिकारी ने हमारे संवाददाता को एटीएम तोड़ने का मनोविज्ञान बताया कि एटीएम तोड़ने का प्रयास सीधे-सीधे शासन को क्षति पहुंचाना है.यह एक गंभीर अपराध है और सीधे इसके लिए 3 वर्ष की सजा है. लोग अक्सर पैसा कमाने के लिए एटीएम तोड़ते हैं और जीवन में एक बड़ी गलती कर बैठते हैं.

एटीएम नहीं तोड़ा जा सकता

यहां यहां यह बताना भी आवश्यक है कि एटीएम मशीन एक विशेष धातु से बनाई जाती है. एक बैंक अधिकारी ने बताया कि यह एक विशेष एलाए से निर्मित होती है जिसे काटा नहीं जा सकता,इसलिए कुछ लोग एटीएम में आग लगा देते हैं , तो यह जलती नहीं, हाँ हाई तापमान मे गल जाती है. इस तरह कुल मिलाकर एटीएम को क्षति नहीं पहुंचाई जा सकती. वहीं दूसरी तरफ लोग इतने चतुर हो गए हैं की सबसे पहले आकर सीसीटीवी को तोड़ देते हैं .आंखों में चश्मा, नकाब लगा लेते हैं.और फिर एटीएम तोड़ने का प्रयास करते हैं. मगर फिर भी सफल नहीं हो पाते, कहीं सफल हो भी गए तो उनका पकड़ा जाना निश्चित रहता है. एटीएम तोड़कर रातों-रात अपने ख्वाबों को पूरा करने का सपना देखने वाले चाहे वह मजदूर हो या युवा, किसान शिक्षित, अशिक्षित. यह काम करने निकल तो जाते हैं मगर जब वास्तविकता से पाला पड़ता है तो उनकी हाथों से तोते उड़ चुके होते हैं.

33 साल की हुई एवलीन शर्मा, 10 साल बाद जर्मनी में मनाया जन्मदिन

‘‘मैं तेरा हीरो’’, ‘‘यारियां’’, ‘ये जवानी है दीवानी’ सहित कई फिल्मों में अभिनय कर चुकी और इन दिनों प्रभास व श्रृद्धा कपूर के साथ फिल्म ‘‘साहो’’ में अभिनय कर रही इंडो जर्मन अभिनेत्री एवलीन शर्मा ने पूरे दस साल बाद आज, 12 जुलाई को अपना जन्मदिन अपने परिवार के साथ जर्मनी में मना रही हैं.

वह जब से भारत आयी हैं, तब से वह शूटिंग करते हुए मुंबई में ही अपना जन्मदिन मनाती रही हैं. जबकि हर साल जर्मनी में रह रहा उनका परिवार उनके जन्मदिन पर उनका इंतजार करता रह जाता था. वास्तव में एवलीन शर्मा को जन्मदिन मनाने की छुट्टी लेने की बजाय काम करते हुए जन्मदिन मनाना पसंद है.

 

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पिछले नौ साल से एवलीन मुंबई में अपने जन्मदिन पर शूटिंग करती रही हैं. तो क्या इस बार एवलीन शर्मा ने जन्मदिन मनाने के लिए छुट्टियां ली हैं?

ऐसा भी नहीं है. हकीकत में इस साल एवलीन ने पहले से ही योजना बनाकर काम किया. फिल्म ‘‘साहो’’ की शूटिंग खत्म होने के बाद वह जर्मनी के अंग्रेजी व जर्मन भाषा के ‘‘यूरोमैक्स’’ शो की शूटिंग के लिए जर्मनी में रूक गयी. वह इस शो की होस्ट हैं और आज,12 जुलाई को शूटिंग करते हुए अपना जन्मदिन अपने परिवार के साथ मना रही है.

 

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मूलतः पंजाबी एवलीन शर्मा दस साल पहले अपनी पंजाबी की जड़ों की तलाश में भारत आयी थीं. फिर आश्चर्य जनक तरीके से वह बौलीवुड का हिस्सा बन गयीं.

मेरे पति का रोमांस बिलकुल खत्म हो गया है, मैं क्या करुं?

सवाल 

हमारी शादी को अभी 3 महीने ही हुए हैं, लेकिन मेरे पति का रोमांस बिलकुल खत्म हो गया है. जिसे ले कर मैं काफी चिंतित हूं.

जवाब

शादी के शुरुआती दिनों में तो रोमांस बढ़ता है. पार्टनर के करीब जाने को, उसे चूमने को दिल करता है. ऐसे में आप के पति के ऊबने का कारण समझ नहीं आ रहा है. आप उन से प्यार से इस बारे में जानने की कोशिश करें. और खुद को भी टिपटौप रखें. मौडर्न कपड़े पहनें, कौन्फिडैंट रहें, कुछ इनोवेटिव करें ताकि आप का पार्टनर आप से भागे नहीं बल्कि करीब आए. इन सब के बावजूद अगर हालात नहीं सुधरें तो खुल कर इस विषय में बात करें ताकि आप के सामने पूरी स्थिति साफ हो सके.

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