अजनबी: भाग 2

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भारती ने तब प्रीति की तरफ देखा था. कितनी जल्दी स्थिति से समझौता करने की बात सोच लेती है यह.

फिर आननफानन में आपरेशन के लिए 2 दिन बाद की ही तारीख तय हो गई थी.

अजय का फिर फोन आ गया था.

‘‘भारती, मुझे टूर पर निकलना है, इसलिए कोशिश तो करूंगा कि उस दिन तुम्हारे पास पहुंच जाऊं पर अगर नहीं आ पाऊं तो तुम डाक्टर से मेरी बात करा देना.’’

हुआ भी यही. आपरेशन करने से पहले डाक्टर प्रभा की फोन पर ही अजय से बात हुई, क्योंकि उन्हें अजय की अनुमति लेनी थी. सबकुछ सामान्य था पर एक अजीब सी शून्यता भारती अपने भीतर अनुभव कर रही थी. आपरेशन के बाद भी वही शून्यता बनी रही.

शरीर का एक महत्त्वपूर्ण अंग निकल जाने से जैसे शरीर तो रिक्त हो गया है, पर मन में भी एक तीव्र रिक्तता का अनुभव क्यों होने लगा है, जैसे सबकुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं है उस के पास.

‘‘दीदी, आप चुप सी क्यों हो गई हैं, आप के टांके खुलते ही डाक्टर आप को दिल्ली जाने की इजाजत दे देंगी. बड़ी गाड़ी का इंतजाम हो गया है. स्कूल के 2 बाबू भी आप के साथ जाएंगे. अजयजी से भी बात हो गई है,’’ प्रीति कहे जा रही थी.

तो क्या अजय उसे लेने भी नहीं आ रहे. भारती चाह कर भी पूछ नहीं पाई थी.

उधर प्रीति का बोलना जारी था, ‘‘दीदी, आप चिंता न करें…भरापूरा परिवार है, सब संभाल लेंगे आप को, परेशानी तो हम जैसे लोगों की है जो अकेले रह रहे हैं.’’

पर आज भारती प्रीति से कुछ नहीं कह पाई थी. लग रहा था कि जैसे उस की और प्रीति की स्थिति में अधिक फर्क नहीं रहा अब.

हालांकि अजय के औपचारिक फोन आते रहे थे, बच्चों ने भी कई बार बात की पर उस का मन अनमना सा ही बना रहा.

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अभी सीढि़यां चढ़ने की मनाही थी पर दिल्ली के फ्लैट में लिफ्ट थी तो कोई परेशानी नहीं हुई.

‘‘चलो, घर आ गईं तुम…अब आराम करो,’’ अजय की मुसकराहट भी आज भारती को ओढ़ी हुई ही लग रही थी.

बच्चे भी 2 बार आ कर कमरे में मिल गए, फिर रोहित को दोस्त के यहां जाना था और रश्मि को डांस स्कूल में. अजय तो खैर व्यस्त थे ही.

नौकरानी आ कर उस के कपड़े बदलवा गई थी. फिर वही अकेलापन था. शायद यहां और वहां की परिस्थिति में कोई खास फर्क नहीं था, वहां तो खैर फिर भी स्कूल के स्टाफ के लोग थे, जो संभाल जाते, प्रीति एक आवाज देते ही नीचे आ जाती पर यहां तो दिनभर वही रिक्तता थी.

बच्चे आते भी तो अजय को घेर कर बैठे रहते. उन के कमरे से आवाजें आती रहतीं. रश्मि के चहकने की, रोहित के हंसने की.

शायद अब न तो अजय के पास उस से बतियाने का समय है न पास बैठने का, और न ही बच्चों के पास. आखिर यह हुआ क्या है…2 ही दिन में उसे लगने लगा कि जैसे उस का दम घुटा जा रहा है. उस दिन सुबह बाथरूम में जाने के लिए उठी थी कि पास के स्टूल से ठोकर लगी और एक चीख सी निकल गई थी. दरवाजे का सहारा नहीं लिया होता तो शायद गिर ही पड़ती.

‘‘क्या हुआ, क्या हुआ?’’ अजय यह कहते हुए बालकनी से अंदर की ओर दौडे़.

‘‘कुछ नहीं…’’ वह हांफते हुए कुरसी पर बैठ गई थी.

‘‘भारती, तुम्हें अकेले उठ कर जाने की क्या जरूरत थी? इतने लोग हैं, आवाज दे लेतीं. कहीं गिर जातीं तो और मुसीबत खड़ी हो जाती,’’  अजय का स्वर उसे और भीतर तक बींध गया था.

‘‘मुसीबत, हां अब मुसीबत सी ही तो हो गई हूं मैं…परिवार, बच्चे सब के होते हुए भी कोई नहीं है मेरे पास, किसी को परवा नहीं है मेरी,’’ चीख के साथ ही अब तक का रोका हुआ रुदन भी फूट पड़ा था.

‘‘भारती, क्या हो गया है तुम्हें? कौन नहीं है तुम्हारे पास? हम सब हैं तो, लगता है कि इस बीमारी ने तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया है.’’

‘‘हां, चिड़चिड़ी हो गई हूं. अब समझ में आया कि इस घर में मेरी अहमियत क्या है… इतना बड़ा आपरेशन हो गया, कोई देखने भी नहीं आया, यहां अकेली इस कमरे में लावारिस सी पड़ी रहती हूं, किसी के पास समय नहीं है मुझ से बात करने का, पास बैठने का.’’

‘‘भारती, अनावश्यक बातों को तूल मत दो. हम सब को तुम्हारी चिंता है, तुम्हारे आराम में खलल न हो, इसलिए कमरे में नहीं आते हैं. सारा ध्यान तो रख ही रहे हैं. रही बात वहां आने की, तो तुम जानती ही हो कि सब की दिनचर्या है, फिर नौकरी करने का, वहां जाने का निर्णय भी तो तुम्हारा ही था.’’

इतना बोल कर अजय तेजी से कमरे के बाहर निकल गए थे.

सन्न रह गई भारती. इतना सफेद झूठ, उस ने तो कभी नौकरी की इच्छा नहीं की थी. ब्याह कर आई तो ससुराल की मजबूरियां थीं, तंगहाली थी. 2 छोटे देवर, ननद सब की जिम्मेदारी अजय पर थी. सास की इच्छा थी कि बहू पढ़ीलिखी है तो नौकरी कर ले. तब भी कई बार हूक सी उठती मन में. सुबह से शाम तक काम से थक कर लौटती तो घर के और काम इकट्ठे हो जाते. अपने स्वयं के बच्चों को खिलाने का, उन के साथ खेलने तक का समय नहीं होता था, उस के पास तो दुख होता कि अपने ही बच्चों का बालपन नहीं देख पाई.

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फिर यह बाहर की पोस्ंिटग, उस का तो कतई मन नहीं था घर छोड़ने का. यह तो अजय की ही जिद थी, पर कितनी चालाकी से सारा दोष उसी के माथे मढ़ कर चल दिए.

इच्छा हो रही थी कि चीखचीख कर रो पड़े, पर यहां तो सुनने वाला भी कोई नहीं था.

पता नहीं बच्चों से भी अजय ने क्या कहा था, शाम को रश्मि और रोहित उस के पास आए थे.

‘‘मम्मी, प्लीज आप पापा से मत लड़ा करो. सुबह आप इतनी जोरजोर से चिल्ला रही थीं कि अड़ोसपड़ोस तक सुन ले. कौन कहेगा कि आप एक संभ्रांत स्कूल की प्रिंसिपल हो,’’ रोहित कहे जा रहा था, ‘‘ठीक है, आप बीमार हो तो हम सब आप का ध्यान रख ही रहे हैं. यहां पापा ही तो हैं जो हम सब को संभाल रहे हैं. आप तो वैसे भी वहां आराम से रह रही हो और यहां आ कर पापा से ही लड़ रही हो…’’

विस्फारित नेत्रों से देखती भारती सोचने लगी कि अजय ने बच्चों को भी अपनी ओर कर लिया है. अकेली है वह… सिर्फ वह…

उतरन: भाग 2

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लेखिका- रेखा विनायक नाबर

‘‘मांबाबूजी, शर्मिला के पिता को कुछ नहीं मालूम. उन्हें बताना चाहिए. मैं खुद जा कर बताता हूं.’’

‘‘मैं भी आता हूं.’’

‘‘नहीं बाबूजी, मां अभी आने की स्थिति में नहीं हैं. उन्हें अकेला भी छोड़ना ठीक नहीं. मैं अकेले ही हो आता हूं. कठिन लग रहा है, लेकिन यह घड़ी मु?ो ही संभालनी होगी.’’

मैं दबेपांव भाभी के घर गया.

‘‘आओ बेटा, और प्रसाद कब आ रहे हैं?’’

‘‘नहीं, मैं किसी और काम से आप के यहां आया हूं.’’

‘‘हांहां, बोलो, कुछ प्रौब्लम है क्या?’’

‘‘हां…हां, बहुत कठिन समस्या है. भैया अमेरिका चले गए.’’

‘‘क्या? लेकिन कल रात ही शमु का फोन आया था, उस ने तो कुछ नहीं कहा. यों अचानक कैसे तय किया?’’

‘‘नहीं, वे अकेले ही चले गए.’’

‘‘और शमु?’’

फिर मैं ने उन्हें सारी हकीकत बयान की. वे क्रोध से लाल हो गए. क्रोध से उन का शरीर कांप रहा था. उन्हें भी मैं ने गहनों के बारे में कुछ नहीं बताया.

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‘‘हरामखोर, मेरी इकलौती बेटी की जिंदगी बरबाद कर दी. सामने होता तो गोली से उड़ा देता. मैं छोड़ं ूगा नहीं उसे.’’

उन को संभालने के लिए शर्मिला की मां आगे आईं, ‘‘आप शांत हो जाइए. यह लीजिए पानी पीजिए. संकट की घड़ी है. हमें पहले शमु को संभालना चाहिए. यह कैसा पहाड़ टूट पड़ा मेरी बेटी पर. है कहां है वह?’’

‘‘वे बेंगलुरु में होटल में हैं, मैं उन्हें लेने जा रहा हूं.’’

‘‘नहीं, हम दोनों उसे ले कर आते हैं. शमु से एक बार बात कर लेते हैं.’’

मैं ने शर्मिला के मोबाइल पर फोन लगाया.

‘‘मैं प्रकाश बोल रहा हूं, आप के घर से. आप कैसी हो? लो, बात करो उन से.’’

‘‘शमु, रो मत, धीरज रख. देख मैं उस के साथ ऐसा खेल खेलूंगा कि उसे फूटफूट कर रोना पड़ेगा. हम दोनों आ रहे हैं तु?ो लेने. आखिरी फ्लाइट से निकलते हैं. तब तक खुद का ध्यान रख,’’ शर्मिला के पिताजी बोले.

क्रोध की जगह करुणा ने ले ली. शर्मिला की आंखों से आंसू छलक रहे थे. शर्मिला की मां भी व्याकुल थीं, लेकिन ?ाठमूठ का धीरज दे रही थीं. मेरी मां ने तो बिस्तर पकड़ लिया था. उन के आंसू थम नहीं रहे थे. सब को इतने बड़े दुख में धकेलने वाले निर्दयी भैया से मु?ो घृणा आने लगी. शर्मिला के अपने घर आने पर हम वहां पहुंचे.

‘‘शर्मिला, यह क्या हुआ बेटा,’’ यह बोल कर मां बेहोश हो गईं. बाबूजी शर्मिंदा हो कर उस के सामने हाथ जोड़ रहे थे.

‘‘हम आप के कुसूरवार हैं. ऐसा कुलक्षणी बेटा जना, मु?ो शर्म आती है.’’

शर्मिला के पापा अब तक शांत हो गए थे.

शर्मिला की मां और शर्मिला मेरी मां को सम?ा रहे थे.

‘‘हम सब को यह दुख भोगना था शायद, लेकिन आप खुद को कुसूरवार न सम?ों. मैं उसे पाताल से भी ढूंढ़ कर लाऊंगा और सजा दूंगा. प्रकाश उसे अमेरिका में संपर्क करने का कोई रास्ता है क्या?’’ ‘‘हां पापा, प्रसाद का औफिस का नंबर तो नहीं है पर जहां रहता है वहां का नंबर ट्रेर्स करता हूं.’’

‘‘फोन लगाया था तो पता चला भैया 3 महीने पहले ही अपार्टमैंट छोड़ चुके थे.’’

‘‘हरामखोर, पहले से ही प्लान कर चुका था. उस ने मेरी बेटी की जिंदगी बरबाद कर दी. नया बिजनैस शुरू करने के बहाने मेरे पास से 5 लाख रुपए ले गया था.’’

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‘‘हां, मु?ो भी यही कारण बता कर पैसे मांगे, मैं ने पीएफ से 2 लाख रुपए निकाल कर दिए, शर्मिला के गहने भी गायब हुए हैं.’’ मैं ने बताया.

‘‘नीच अमानुष. अब मैं यह हकीकत अखबार में छपवाने वाला हूं. अमेरिका में मेरे कुछ रिश्तेदार हैं, उन को भी खबर दूंगा. सब जगह उस की बदनामी करूंगा.’’

अब बदनामी होगी, इस कारण बाबूजी डर गए.

‘‘देखिए, हमारे बेटे से अक्षम्य अपराध हुआ है. लेकिन जरा धीरज से काम लीजिए. ऐसी घड़ी में सोचविचार कर के निर्णय लीजिए, आप देख ही रहे हो हालात कितने नाजुक हैं और शर्मिला के भविष्य की दृष्टि से भी सोचना चाहिए. बस, एक हफ्ते का समय दीजिए हमें. देखते हैं कुछ हल निकलता है क्या. नहीं तो मानहानि सहने के सिवा और कोई चारा नहीं.’’

वे एक हफ्ता रुकने को राजी हो गए. बड़ी कृपा हुई थी हम पर. गए हफ्ते खुशी की तरंगों पर तैरने वाले हम, आज दुख के सागर में डूब चुके थे. केवल भैया की इस घिनौनी हरकत की वजह से फूल जैसी शर्मिला मुर?ा कर सांवली पड़ गईर् थी. उस ने जैसे न बोलने का प्रण लिया था. हम दोनों सहारा बने, इसलिए मां थोड़ी संभल गईं, वरना उन के लिए सदमा असहनीय था.

‘‘कलमुंहा, बच्ची की जिंदगी की होली कर डाली.’’

‘‘सही कहती हो आप. हम उस के अपराधी हैं. कभी न भरने वाला जख्म है यह.’’ शर्मिला मां से मिल कर गई. आश्चर्य यह था कि दोनों संयम से काम ले रही थीं. एक दिन मैं औफिस से आया तो मांबाबूजी अभीअभी शर्मिला के घर से लौटे थे.

‘‘बाबूजी, उन्होंने बुलाया था क्या?’’

‘‘नहीं, ऐसे ही मिल कर आए, काफी दिन हुए, मिले नहीं थे. शर्मिला को भी देखने को दिल कर रहा था.’’

‘‘सब कुछ ठीक है न?’’

‘‘हां, ठीक ही कहना चाहिए, लेकिन भविष्य के बारे में सोचना जरूरी है.’’

‘‘प्रकाश अभीअभी आए हो न? हाथपांव धो आओ. मैं चाय बनाती हूं. कुछ खा भी लो.’’ मु?ो मां का यह बरताव अजीब लगा.

चायनाश्ता हो गया. हम तीनों वहीं बैठे बातें कर रहे थे. मां मु?ा से कुछ कहना चाहती हैं, ऐसा मैं महसूस कर रहा था. वे बहुत टैंशन में लग रही थीं.

‘‘मां, क्या हुआ, कुछ कहना है क्या, टैंशन में लग रही हो. बताओ अभी, क्यों टैंशन बढ़ा रही हो?’’

‘‘प्रकाश, देखो…हमें ऐसा लगता है, इसलिए सुझाव दे रही हूं. लेकिन सोच कर ही बताना.’’

‘‘क्या सोचना है? क्या सुझाव  दे रही हो? और ऐसे हकला कर क्यों बोल रही हो?’’

आखिरकार बाबूजी ने बड़ी हिम्मत कर बोल ही दिया, ‘‘प्रकाश, हमें लगता है कि तुम शर्मिला को पत्नी के रूप में स्वीकार करो.’’

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ऐसे लग रहा था मानो सारे बदन में बिजली दौड़ रही है. मैं जोर से चिल्लाया. ‘‘यह कैसे हो सकता है? भाभी और पत्नी? नहीं, मैं सोच भी नहीं सकता. आप मुझे  ऐसा सुझाव कैसे दे सकते हो?’’

‘‘प्रकाश बेटे, यह कहते हुए हमें भी अच्छा नहीं लग रहा. हम जानते हैं कि तुम्हारे भी अपने वैवाहिक जीवन के कुछ सपने होंगे. तुम अच्छे पढ़ेलिखे हो, अच्छी तनख्वाह मिलती है तुम्हें. तुम्हें अच्छी लड़की मिल सकती है. लेकिन, हमें शर्मिला के बारे में भी तो सोचना चाहिए. उस की कोई गलती न होते हुए भी उस की जिंदगी यों बरबाद हो गई, और हमें यह देखना पड़ रहा है. अनजाने में हम ही इस के जिम्मेदार हैं न?’’

मां फिर से सिसकसिसक कर रोने लगीं.

‘‘मां, मु?ो सोचने के लिए वक्त चाहिए. यही बोलने के लिए आप उन के यहां हो आए? क्या कहा उन्होंने?’’

‘‘हम ने बात की उन से. कुछ कहा नहीं उन्होंने. उन्हें भी वक्त चाहिए. फोन करेंगे वे. तुम्हारा कहना क्या है, यह पूछने को कहा है.’’

मेरे पांवतले जमीन खिसक रही थी. जेहन ने काम करना बंद कर दिया था.

‘‘मैं जरा घूम कर आता हूं.’’

‘‘इस वक्त?’’

‘‘हां.’’

दूर बगीचे तक घूम कर आया. तब कहीं थोड़ा सुकून महसूस हुआ. मेरे लौटने तक मांबाबूजी चिंता कर रहे थे. खाना गले के नीचे नहीं उतर रहा था. उठ कर बिस्तर पर लेटा. नींद आने का सवाल ही नहीं था. मेरी वैवाहिक जिंदगी शुरू होते ही खत्म होने वाली थी. भैया के पुराने कपड़े, किताबें इस्तेमाल करने वाला मैं अब उन की त्यागी पत्नी… नहीं, यह नहीं हो सकता. इस प्रस्ताव को नकारना चाहिए. मैं बहुत बेचैन था. लेकिन आंखों के सामने आंसू निगलती मां, शर्मिंदा बाबूजी, क्रोधित शर्मिला के पिता, उन को संभालने की कोशिश करती हुई शर्मिला की मां और जिंदगी के वीरान रेगिस्तान की बालू की तरह शुष्क शर्मिला दिखने लगी. इन सब की नजरें बड़ी आशा से मुझे  देख रही हैं, ऐसा लगने लगा. फिर से एक बार मेरे नसीब में उतरन ही आईर् थी. इस कल्पना से दिल जख्मी हो रहा था. ऐसी स्थिति में मुझे बचपन की एक घटना याद आई.

भैया की ड्राइंग अच्छी थी, वे बहुत अच्छे चित्र बनाते थे, और पूरे होने के बाद दोस्तों को दिखाने जाते थे. सारा सामान वैसे ही रखते थे. घर साफ होना चाहिए, इस पर बाबूजी का ध्यान रहता था. फिर मां मु?ो मनाती थीं, ‘प्रकाश, ये सामान जरा उठा कर रख बेटे. वो देखेंगे तो बिगड़ेंगे. मैं ने लड्डू बनाए हैं. मैं लाती हूं तेरे लिए.’

‘मां भैया अपना सामान क्यों खुद नहीं रखते? लड्डू का लालच दे कर आप मुझे  से काम करवाती हो. भैया बिगाड़ेंगे और मैं संवारूंगा, यह अलिखित नियम बनाया है क्या आप ने.’

मां का यह अलिखित नियम मेरे पीछे हाथ धो कर पड़ा था. जिंदगी के इस मोड़ पर उस के किए अक्षम्य अपराध को मुझे ही सही करना था, मुझे ही अब शर्मिला से शादी करनी थी.

क्यों, क्योंकि वह सिर्फ मेरा बड़ा भाई है, इसलिए.

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एक दु:खी आत्मा से मुलाकात

अगर मेयर बन जाते, विधायक बन जाते या फिर सांसद बन जाते तो सारे दु:ख मिट जाते.जीवन तर जाता.मगर किस्मत में शायद दु:खी रहना ही बदा है.

सुबह सवेरे सामना हो गया. चेहरे पर दुख के बादल उमड़ घुमड़ रहे थे. हमें देखा तो चेहरा और भी सुकुड़ गया बोले, भैया, रोहरानंद! मेरा देश गर्त में जा रहा है ?

रोहरानंद को सहानुभूति उमड़ी-” क्यों भैय्या! क्या हो गया, सब कुछ तो ठीक-ठाक नजर आता है।आखिर क्या हो गया ?”

दु:खी आत्मा मानो तड़फ उठी-” क्या हो गया ? क्या तुम्हें कुछ भी गलत  दृष्टिगोचर नहीं हो रहा ??”

रोहरानंद ने कहा -” ऐसा तो चलता रहता है और ऐसा ही चलता रहेगा .हम जैसे आम आदमी को भला क्या विशिष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा.”

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दु:खी आत्मा ने दु:खी स्वर में कहा- “अगरचे, हम महापौर होते, सांसद होते तो, यह सब कतई नहीं होता जो शहर में इन दिनों हो रहा है.”

रोहरानंद – “क्या अनर्थकारी हुआ है जरा हम भी सुने.”

दु:खी आत्मा- “अगरचे हम महापौर बनते तो शहर का कायाकल्प हो गया होता. विधायक बनते, विधानसभा क्षेत्र का चेहरा बदल देते और अगर सांसद बनते तो संसदीय क्षेत्र का कायाकल्प हो जाता.”

रोहरानंद –  “आप दूसरों को भी  समय  दीजिए, अभी समय ही कितना व्यतीत हुआ है.”

दुखी आत्मा -” एक एक दिन बहुत होता है ,इतना समय क्या कम है.हमें तो एक बार बना दीजिए 4 दिन मे सब ठीक कर कर देंगे.”

रोहरानंद -” अच्छा, 4 दिन क्या 100 दिन  में क्या कुछ चमत्कार कर दिखाते .”

दुखी आत्मा – “देखो!सच तो यह है कि सबसे पहले मैं स्वयं अपना दु:ख दूर करता. चुनाव में एक करोड़ रुपए बहा डाला, उसकी रिकवरी करता.”

रोहरानंद – “अर्थात स्वयं लाल होते, फिर जनता को लाल करते…

दु:खी आत्मा -” भैय्या! क्या बताएं तुम अपने आदमी हो  तुमसे क्या छिपाना. इन दो वर्षों में ही मैं स्वयं सुखी हो ही जाता अपने खासुल खास समर्थकों को भी सुखी कर डालता.तुम्हें भी मालामाल कर डालता.”

रोहरानंद- ( हंसते हुए )” तो फिर आपको महापौर पर विधायक पर बाण छोड़ने का क्या अधिकार है. शहर की किस्मत अच्छी है जो तुम न महापौर हुए. ना विधायक बने.”

दु:खी आत्मा – “नहीं, नहीं ,यह नगर का दुर्भाग्य है भाई . मैं ना दु:खी रहता, न किसी को दु:खी रहने देता.मैं स्वयं तो दोनों हाथों से रुपए समेटता, अपने समर्थकों को भी निहाल कर देता.”

रोहरानंद- “मुझे तो आपकी बात पर राई भर भी एतबार नहीं है, हां अगर जीत जाते तो खुद मालामाल अवश्य हो जाते.”

दु:खी आत्मा -” नहीं, नहीं , मुझ पर विश्वास करो. मैं भ्रष्टाचार करता और जी भर कर करता और सभी नगरवासियों को अपना पिछलग्गू बनाकर दिखा देता.”

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रोहरानंद -” भैय्या! जनता समर्थक यूं ही नहीं बनती, उसके लिए नगर का विकास करना पड़ता है. काम करना पड़ता है. महापौर का दायित्व है नगर की साफ-सफाई,सड़कों की मरम्मत सौन्दरीकरण,जल पानी इत्यादि का ध्यान रखें. जनता तब पिछलग्गू होती है.”

दुखी आत्मा -” जनता यह सब नहीं देखती, जनता सिर्फ मुस्कुराता चेहरा देखती है.तब मैं सदा मुस्कुराता रहता. जनता मुस्कुराता देख स्वयं  मुस्कुराती…”

रोहरानंद – “मगर, तुम्हें देखकर तो कोई भी नहीं कह सकता कि तुमने जिंदगी में कभी मुस्कुराया भी होगा. जब  देखो तुम्हारा मुंह लटका रहता है.

दुखी आत्मा -” ( आर्त स्वर में ) मैं पहले ऐसा नहीं था.”

रोहरानंद – “तुम्हें देख कर लगता है तुम जन्मजात दुखी हो.

दुखी आत्मा -” नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है . पहले मैं भी एक मस्तमौला और खुशगवार मौसम की भांति खुशनुमा इसां था .”

रोहरानंद -” अच्छा, तो यह पराजित होने के पश्चात के हालात हैं…”

दुखी आत्मा- “( गहरी नि:श्वास छोड़कर ) हां, मैं मेयर चुनाव हारने के बाद से ऐसा हो गया हूं.”

रोहरानंद- “भैय्या! अब मुझे तुमसे बड़ी सहानुभूति है.”

दुखी आत्मा – “ऐसा है तो मेरा साथ दो…”

रोहरानंद -“मैं आम आदमी हूं. मैं भला क्या साथ दूं.”

दुखी आत्मा -“मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस एक चीज… सिर्फ एक चीज…

रोहरानंद – “अच्छा चलो, बताओ.”

दु:खी आत्मा -” सिर्फ इतना करो भैय्या! तूम भी मेरी तरह दु:खी हो जाओ .चेहरा लटका लो. चेहरे पर पीड़ा उभार लो .कोई भी देखें तो समझ जाए कि तुम भी दुखी आत्मा हो.”

रोरहरानंद – “( आश्चर्य से ) मगर इससे क्या होगा ?”

दु:खी आत्मा – “मेरी आत्मा को सुकून मिलेगा. मैं एक-एक करके शहर को अपने साथ ऐसे ही दु:खी कर अपना बहुमत बनाऊंगा .और एक दिन मेरे साथ इतने लोग हो जाएंगे की महापौर की कुर्सी हिलने लगेगी.”

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रोहरानंद – “वाह! क्या तरकीब निकाली है. मगर मैं तो धर्म संकट में फंस गया.”

दु:खी आत्मा – “देखो! तुम अपनी जुबां से फिर नहीं सकते, तुमने मेरा साथ देने का वादा किया है.”

रोहरानंद – “मगर, यह तो षड्यंत्र कर रहे हो, मैं भला क्यों साथ दूं. मैं तो आम आदमी हूं. मेरा तुमसे लेना दो न देना एक. अर्थात मुझे क्या लाभ ?”

दु:खी आत्मा – “जिस दिन में बहुमत में आऊंगा, यानी महापौर बनूंगा तुम्हें खुश कर दूंगा.”

रोहरानंद – “मगर, मैं तो आज भी खुश हूं और कल भी था. और मैं जानता हूं तुम कल भी दुखी थे, आज भी हो,और कल भी रहोगे.”

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ठगी के रंग हजार

ठगी एक ऐसा शब्द है जो हमारे जेहन में हैं मगर इसके  बावजूद हम और हमारे आसपास के लोग अक्सर ठगी का शिकार हो जाते हैं ठगी की दुनिया में एक पहलू मोबाइल टावर लगाने का भी है विगत एक दशक में जाने कितनी बार यह समाचार सुर्खियों में आता रहा है मगर टावर के नाम पर लोग निरंतर ठगे जा रहे हैं इसके गिरोह निरंतर मजबूत होते जा रहे हैं इसी की बानगी छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिल रही है और पुलिस ने इस पर नकेल लगाने  में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है.

 

छत्तीसगढ़ की दुर्ग जिला पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है जो दिल्ली में बैठकर छतीसगढ़ के विभिन्न नगर कस्बों  में मोबाइल टावर लगाने के नाम पर लोगों को ठगी का शिकार बना चुका हैं. एक सनसनीखेज मामले में एक महिला से आरोपी  62 लाख रूपए ऐंठ चुके थे. पुलिस ने गिरोह के सात सदस्यों को गिरफ्तार किया है, जबकि अभी भी आठ आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. जिनकी तलाश पुलिस द्वारा सरगर्मी से की जा रही है.

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ठगी की अनंत कथाएं

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला के  खुर्सीपार की एक बुजुर्ग महिला से इस गिरोह ने लाखों की ठगी की है. पिछले तीन साल में अलग-अलग कहानी व किस्से गढ़ते हुए बुजुर्ग महिला से इस गिरोह ने 62 लाख 2500 रुपए मोबाइल टावर लगाने के नाम पर  भारी रकम ठग ली .सन 2015 से शुरू हुआ यह प्रकरण दिसंबर  2019 तक चला . कभी बीमा पॉलिसी के रुपए निकालने, तो कभी चालान बनाने तो कभी रुपए जारी कराने के नाम पर बुजुर्ग महिला से ठगी होती रही.

इस मामले में पीड़िता महिला  पुलिस अधीक्षक दुर्ग के समक्ष जुलाई माह में शिकायत की. शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस काफी सजगता के साथ अलग-अलग शहरों से सात आरोपियों को गिरफ्तार  करके छत्तीसगढ़ लाई है. वहीं 8 आरोपी अब भी फरार हैं जिनकी तलाश पुलिस द्वारा सरगर्मी से की जा रही है. इस तरह छत्तीसगढ़ में भी मोबाइल टावर के नाम पर ठगी की घटनाएं घटित हो चुकी हैं जिनमें हाल ही में घटित हुई हैं वह यह है-

पहला प्रकरण- आदिवासी जिला कोरबा के पसान थाना अंतर्गत लैगा में मोबाइल टावर लगाने के नाम पर डेढ़ लाख रुपए ठग लिए गए मामला अंततः थाना पहुंचा.

दूसरा प्रकरण -छत्तीसगढ़ के मुंगेली  मोबाइल ठगी के नाम पर अलग-अलग तीन जगहों पर 3 के मामले सामने आए.

तीसरा  प्रकरण- जगदलपुर के थाना क्षेत्रों में चार मामले मोबाइल टावर ठगी के दर्ज हुए कुछ गिरफ्तारियां भी हुई. छत्तीसगढ़ के विभिन्न जगहों पर मोबाइल टावर के नाम पर लोगों को ठगा गया है इसके बावजूद जागृति की कमी की वजह से लोग आज भी निरंतर ठगे जा रहे हैं.

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हाईटेक चुके हैं ठग!

पुलिस अधिकारी ने अजय यादव ने हमारे संवाददाता को बताया कि दिल्ली के यह  ठग दरअसल मानो  पूरी कंपनी चला रहे थे. आरोपियों के पास से बड़ी संख्या में लैंड लाइन फोन, मोबाइल फोन, बीमा प्लान, एटीएम कार्ड, आईकार्ड, मोबाइल डेटा व लेखाजोखा जब्त किया गया. आरोपियों ने बुजुर्ग महिला मनोरमा जैन के अलावा 500 लोगों को अलग-अलग मोबाइल नंबरों से कॉल किया और इनसे भी लाखों रुपए  की रकम ठगी की है.

आरोपियों को पकड़ने के लिए साइबर सेल की टीम लगातार काम कर रही थी. बेहद समझदारी के साथ पीड़िता को आरोपियों के संपर्क में रखा  और उनके द्वारा किए जा रहे कॉल को ट्रेस करती रही. जिसके बाद अंततः पुलिस की टीम आरोपियों तक पहुंची. पुलिस ने आरोपियों को गिफ्ट में लेकर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया है.

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मेरे देश के नौजवान

लेखक- शिव शंकर गोयल

इस का ‘आईक्यू’ या ‘ईक्यू’ ही नहीं, बल्कि सब तरह के क्यू ऊंचे होंगे. मसलन:

एक जगह पर किसी समाज का परिचय सम्मेलन हो रहा था. वहां एक छोटा बच्चा खो गया. नहींनहीं, मैं आप को गलत बता गया. बच्चा तो आयोजकों के पास मंच पर था, लेकिन उस के मम्मीपापा कहीं खो गए थे. बच्चा भीड़ देख कर रो रहा था.

एक कार्यकर्ता ने उस बच्चे के मांबाप को ढूंढ़ने की खातिर उस से पूछा, ‘‘बताओ बेटा, तुम्हारा नाम क्या?है?’’

‘‘पप्पू…’’ वह बोला.

‘‘तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है?’’ दूसरे कार्यकर्ता ने पूछा.

‘‘पापा…’’ बच्चे ने बताया.

‘‘वे क्या काम करते हैं?’’ पहले कार्यकर्ता ने पूछा.

‘‘जो मम्मी कहती हैं…’’ लड़के ने रोतेरोते बताया.

‘‘तुम कहां रहते हो?’’ दूसरे कार्यकर्ता ने पूछा.

‘‘मम्मी के पास…’’ उस बच्चे ने जवाब दिया.

देखा आप ने… कहते हैं न कि पूत के पांव पालने में दिखाई देते हैं. अब आप ही बताइए कि ऐसे बच्चे बड़े हो कर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बनने लायक हैं कि नहीं? कोई भी पत्रकार इन से कुछ नहीं उगलवा सकता है.

इतना ही नहीं, समय से पहले होशियारी आ जाने का उदाहरण भी देखते हैं.

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बचपन में हम सभी ने प्यासे कौए की कहानी पढ़ी है. अब भी वही कहानी पढ़ाई जाती है, जो इस तरह है:

एक प्यासा कौआ था. पानी ढूंढ़तेढूंढ़ते उसे एक घड़े में कुछ पानी दिखाई दिया, लेकिन पानी इतना कम था कि उस की चोंच वहां तक नहीं पहुंच सकती थी, इसलिए उस ने घड़े में एकएक कर के कई कंकड़पत्थर ला कर डाले, जिस से घड़े में पानी ऊपर आ गया. तब कौए ने अपनी प्यास बुझाई और फिर वह उड़ गया.

अपने बच्चे को यह कहानी पढ़ते देखा, तो मैं ने उस से पूछा, ‘‘अच्छा बेटा बताओ, इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?’’

‘‘सीख यही कि खाओपीओ और वहां से खिसक लो,’’ वह बोला.

एक बच्चे से उस के रिश्तेदार ने पूछा, ‘‘बेटे, बड़े हो कर क्या बनोगे?’’

‘‘दांतों का डाक्टर बनूंगा अंकल,’’ बच्चा बोला.

‘‘क्यों? ऐसी क्या बात है, जो तुम दांतों के डाक्टर बनोगे?’’

‘‘अंकल, आंख, कान वगैरह तो 2-2 ही होते हैं, जबकि दांत 32 होते हैं, उस में ज्यादा स्कोप है,’’ लड़का बोला.

इतिहास की क्लास थी. मुगलकाल की पूरी पढ़ाई हो जाने के बाद मास्टरजी ने एक लड़के से पूछा, ‘‘बताओ, अकबर कौन था और वह कब मरा?’’

‘‘अकबर अपने बाप का बेटा था और जब उस की मौत आ गई, तब वह मरा,’’ एक छात्र ने जवाब दिया.

क्या सटीक टैलीग्राफिक जवाब था. ऐसे लोग ही आगे चल कर क्रिकेट के कमेंटेटर बन कर बोलेंगे कि गेंदबाज ने गेंद फेंकी, बल्लेबाज ने शौट लगाया और फील्डर ने गेंद रोकी.

गणित के टीचर ने एक छात्र से पूछा कि एक को एक से कैसे जोड़ें कि 3 हो जाए?

‘‘दोनों की शादी करा दीजिए सर,’’ एक छात्र ने जवाब दिया. अब बताइए कि इस पीढ़ी को आप और क्या पढ़ाना चाहते हैं?

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कैमिस्ट्री के एक मास्टरजी ने क्लासरूम में आ कर छात्रों से कहा, ‘‘तुम में से एक छात्र जा कर लैबोरेटरी से बोतल में तेजाब भर लाए.’’

एक छात्र गया और बोतल में तेजाब भर लाया. मास्टरजी ने अपनी जेब से एक सिक्का निकाल कर बोतल में डाल दिया और सारी क्लास से पूछा, ‘‘अब बताओ कि यह सिक्का तेजाब में घुलेगा या नहीं?’’

सभी छात्रों ने एक आवाज में जवाब दिया, ‘नहीं घुलेगा.’

मास्टरजी सभी छात्रों के जवाब से बहुत खुश हुए और बच्चों से पूछा, ‘‘क्यों नहीं घुलेगा?’’

एक छात्र ने खड़े हो कर बताया, ‘‘मास्टरजी, अगर यह सिक्का तेजाब में घुल जाता, तो आप हमारा सिक्का लेते. आप ने इस में अपना सिक्का डाला, इस का मतलब यह है कि यह तेजाब में नहीं घुल सकता…’’ यह सुन कर मास्टरजी बगलें झांकने लगे.

ऐसी ही उम्र के बच्चे जब कभी अपनी मम्मी या पापा के साथ किसी ‘जिम’ में चले जाते हैं, तो वहां का नजारा देख कर अनायास ही उन के मुंह से निकल पड़ता है, ‘‘अरे, सबकुछ दिखता है.’’

कई साल पहले राज कपूर ने फिल्म ‘जागते रहो’ बनाई थी, जिस में दिखाया गया था कि सफेदपोश लोग रात के अंधेरे में क्याक्या गुल खिलाते रहते हैं. राज कपूर ने सबकुछ दिखा दिया, पर समाज में से कोई कुछ बोला क्या? उलटे, वह फिल्म बौक्स औफिस पर पिट गई. भला कौन अपनी पोल खुलवाना चाहता है?

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शिव सेना का बड़ा कदम

हिंदुत्व को देश पर एक बार फिर से थोप कर पंडेपुजारियों को राजपाट देने की जो छिपी नीति अपनाई गई थी उस में शिव सेना एक बहुत बड़ी पैदल सेना थी जिस के कट जाने का भाजपा को बहुत नुकसान होगा और हो सकता है कि महाराष्ट्र को बहुत फायदा हो.

कोई भी देश या समाज तब बनता है जब कामगार हाथों को फैसले करने का भी मौका मिले. पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान, कोरिया की सफलता का राज यही रहा है कि वहां गैराज से काम शुरू करने वाले एकड़ों में फैले कारखानों के मालिक बने थे. महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई देश के पैसे वालों की राजधानी है पर जो बदहाली वहां के कामगारों की है कि वे आज भी चालों, धारावी जैसी झोपड़पट्टियों में, पटरियों पर रहने को मजबूर हैं.

महाराष्ट्र और मुंबई का सारा पैसा कैसे कुछ हाथों में सिमट जाता है, यह चालाकी समझना आसान नहीं, पर इतना कहा जा सकता है कि शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन इस के लिए वर्षों से जिम्मेदार है, चाहे सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की. यह बात पार्टी के बिल्ले की नहीं पार्टियों की सोच की है.

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शिव सेना से उम्मीद की जाती है कि वह अब ऐसे फैसले लेगी जो आम कामगारों की मेहनत को झपटने वाले नहीं होंगे. जमीन से निकल कर आए, छोटी सी चाल में जिन्होंने जिंदगी काटी, सीधेसादे लोगों के बीच जो रहे, वे समझ सकते हैं कि उन पर कैसे ऊंचे लोग शासन करते हैं और कैसे चाहेअनचाहे वे उन्हीं के प्यादे बने रहने को मजबूर हो जाते हैं.

पिछड़ों की सरकारें उत्तर प्रदेश व बिहार में भी बनी थीं, पर उस का फायदा नहीं मिला, क्योंकि तब पिछड़ों की कम पढ़ीलिखी पीढ़ी को सत्ता मिली थी. अब उद्धव ठाकरे, उन के बेटे आदित्य ठाकरे, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले जैसों को उन बाहरी सहायकों की जरूरत नहीं जो जनमानस की तकलीफों को पिछले जन्मों के कर्मों का फल कह कर अनदेखा कर देते हैं. वे रगरग पहचानते होंगे, कम से कम उम्मीद तो यही है.

मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल आदि में भगवाई लहर मंदी हो गई है और महाराष्ट्र का झटका अब फिर मेहनती, गरीबों को पहला मुद्दा बनाएगा. ऐसा नहीं हुआ तो समझ लें कि देश को कभी भूख और बदहाली से आजादी नहीं मिलेगी.

शौचालय का सच

भारत सरकार ने बड़े जोरशोर से शौचालयों को ले कर मुहिम शुरू की थी, पर 5 साल हुए भी नहीं कि शौचालयों की जगह मंदिरों ने ले ली है. अब सरकार को मंदिरों की पड़ी है. कहीं राम मंदिर बन रहा है, कहीं सबरीमाला की इज्जत बचाई जा रही है. कहीं चारधाम को दोबारा बनाया जा रहा है, कहीं करतारपुर कौरिडोर का उद्घाटन हो रहा है.

भाजपा सरकार के आने से पहले 19 नवंबर को 2013 से संयुक्त राष्ट्र संघ ‘वर्ल्ड टौयलेट डे’ मनाने लगा है, जब नरेंद्र मोदी का अतापता भी न था. दुनियाभर में खुले में पाखाना फिरा जाता है, पर भारत इस में उसी तरह सब से आगे है जैसे मंदिरों, मठों में सब से आगे है. भारत की 60-70 करोड़ से ज्यादा आबादी खुले में पाखाना फिरने जाती है और कहने को लाखों शौचालय बन गए हैं, पर पानी की कमी की वजह से अब तो वे जानवरों को बांधने या भूसा भरने के काम में आ रहे हैं.

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शहरों के आसपास कहींकहीं चमकदार शौचालय बन गए हैं, पर अभी पिछले सप्ताह से दिल्ली के ही अमीर बाजारों कनाट प्लेस और अजमल खां रोड पर दीवारों पर पेशाब के ताजे निशान दिख रहे थे. ये दोनों इलाके भाजपा समर्थकों से भरे हैं. हर दुकानदार ने अपनी दुकान में एक छोटा मंदिर बना रखा है, हर सुबह बाकायदा एक पंडा पूजा करने आता है. हर थोड़े दिन के बाद लंगर भी लगता है. पर वर्ल्ड टौयलेट और्गेनाइजेशन बनी थी सिंगापुर में जहां के एक व्यापारी ने ही 2001 में इसे शुरू किया था. सिंगापुर दुनिया का सब से ज्यादा साफ शहर माना जाता है. वहां हर जने की आय दिल्ली के व्यापारियों की आय से भी 30 गुना ज्यादा है. वहां मंदिर न के बराबर हैं. हिंदू तमिलों के मंदिर जरूर दिखते हैं और उन के सामने बिखरी चप्पलें भी और जमीन पर तेल की चिक्कट भी.

सड़क पर पड़ा पाखाना कितना खतरनाक है, इस का अंदाजा इस बात से लगाइए कि 1 ग्राम पाखाने में 10 लाख कीटाणु होते हैं और जहां पाखाना खुले में फिरा जाता है, वहां बच्चे ज्यादा मरते हैं.

भारत सरकार ने खुले में शौच पर जीत पा लेने का ढोल पीट दिया है पर लंदन से निकलने वाली पत्रिका ‘इकौनोमिस्ट’ ने इस दावे को खोखला बताया है. अभी 2 माह पहले ही तो मध्य प्रदेश में 2 बच्चों की पिटाई घर के सामने पाखाना फिरने पर हुई है, वह भी भरी बस्ती में जहां पिछड़ी और दलित जातियों के लोग रहते हैं. मारने वाले का कहना था कि दलितों की हिम्मत कैसे हुई कि उन से ऊंचे पिछड़ों के घरों के सामने फिरने जाए. पिछड़ों की हालत भी ज्यादा बेहतर नहीं हुई है, क्योंकि लाखों बने शौचालयों में पानी ही नहीं है.

यह ढोल जो 2 अक्तूबर को पीटा गया था, यह तो 5,99,000 गांवों के खुद की घोषणा पर टिका था. अब जब शौचालय के मिले पैसे सरपंच ने डकार लिए हों तो वह कैसे कहेगा कि खुले में पाखाना हो रहा है.

जब तक गांवों में घरघर पानी नहीं पहुंचेगा, जब तक सीवर नहीं बनेंगे, खुले में पाखाना होगा ही. दिल्ली की ही 745 बस्तियों में अभी भी सीवर कनैक्शन नहीं है तो 5,99,000 गांवों में से कितनों में सीवर होगा?

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खजाने के चक्कर में खोदे जा रहे किले

लेखक- रामकिशोर पंवार

गोंड राजाओं, मुगलों और मराठों के राज के इन किलों में सब से ज्यादा मशहूर खेड़ला राजवंश का किला है, जिस के बारे में पारस पत्थर से जुड़ी हुई कई कहानियां भी सुनाई जाती हैं.

मध्य प्रदेश के बनने से पहले बैतूल सीपी ऐंड बरार स्टेट का हिस्सा था. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा की निशानदेही करती सतपुड़ा की हरीभरी वादियों व महाराष्ट्र के मेलघाट क्षेत्र से लगा सतपुड़ामेलघाट टाइगर का रिजर्व्ड कौरिडोर इस में शामिल है. धारूल की अंबा देवी की पहाडि़यों में मौजूद गुफाओं के राज की खोजबीन व उन को बचाए रखने की आ पड़ी जरूरत ने सब को चौंका दिया है.

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आदिमानव की कला

धारूल की इन पहाडि़यों में अनेक राज दबे होने के बारे में कहा जाता है कि अंबा देवी क्षेत्र में अजंता, एलोरा, भीमबेठिका की तरह पाषाणकालीन आदिमानव द्वारा बनाए गए शैलचित्र, भित्तिचित्र और अजीबोगरीब आकृतियां देखने को मिलती हैं. इस पूरी पहाड़ी में साल 2007 से 2012 में 100 से ज्यादा प्राचीन गुफाओं की खोज की गई. अब तक की खोज में पाया गया है कि 35 गुफाओं में पेड़पौधों के रंगों से अनेक तरह की आकृति बनाई गई हैं.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर बनी इन गुफाओं पर बाकायदा लघु फिल्में बनी हैं और कई किताबें भी लिखी जा चुकी हैं. बैतूल जिले में इस समय 5 किले होने के सुबूत मिलते हैं. 4 किले पहाड़ी पर बने हैं, जिन में सब से प्राचीन खेड़ला राजवंश का खेड़ला किला है. उस के बाद असीरगढ़, भंवरगढ़, सांवलीगढ़ के किले हैं, जो गवासेन के पास एक पहाड़ी पर मौजूद हैं. खेड़ला किले में 35 परगना शामिल थे.

खेड़ला राज्य की राजधानी वर्तमान महाराष्ट्र का शहर अचलपुर है, जो उस समय राजा ईल-एल के नाम पर एलिजपुर के रूप में पहचाना जाता था. इस राजा के बारे में यहां पर यह किस्सा मशहूर है कि राजा के पास सोने का इतना भंडार था कि वह खेड़ला से एलिजपुर तक सोने की सड़क बनवा सकता था.

खेड़ला राज्य का सोने का भंडार और राजा के पास पारस पत्थर का होना ही खेड़ला राजवंश के खत्म होने की वजह बना. मुगल शासक ने अपने सेनापति रहमान शाह दुल्हा को उसी पारस पत्थर को हासिल करने के लिए हजारों सैनिकों के साथ इस किले पर हमला करने के लिए भेजा था. उस के बाद यह किला मुगलों के कब्जे में आ गया और खेड़ला महमूदाबाद के रूप में अपनी पहचान को सामने लाया. मराठों ने इस किले को मुगलों से छीन कर एक बार फिर यहां पर राजा जैतपाल को राजा बना कर भेजा.

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खेड़ला के राज खजाने की खोज में खेड़ला से एलिजपुर तक बनी सुरंगों को अनेक बार खोदा जा चुका है. पूरा किला बेइंतिहा खुदाई के चलते खंडहर बन चुका है. पारस पत्थर को किले से रावण बाड़ी के तालाब में फेंके जाने की कहानी के बाद हाथियों के पैरों में लोहे की चेन बांध कर उन्हें तालाब के चारों ओर घुमाया गया. आज भी पारस पत्थर की तलाश में तालाब के पानी के सूखते ही उस की खुदाई शुरू हो जाती है.

मुलताई नगर से 8 किलोमीटर दूर गांव शेरगढ़ के पास वर्धा नदी के तट पर शेरगढ़ किला बना हुआ है. यह बैतूल जिले का एकमात्र मैदानी किला है, जिस का वजूद पूरी तरह खत्म होने की कगार पर आ गया है. समय के साथ इस किले की दीवारें ढहने लगी हैं. पूरे किले में झाडि़यां उग आई हैं. यहां पर भी खजाने की खोज में सोने के सिक्कों की अफवाह के चलते चोरों द्वारा की गई जगहजगह खुदाई से किले की बुनियाद को नुकसान हो रहा है.

बेरहम वक्त की मार ने भले ही इस किले को आज खंडहर में बदल दिया हो, पर किले का भीमकाय दरवाजा आज भी आसमान को चुनौतियां देता लगता है. बहुत ही सुंदर क्षेत्र में बने इस किले का मेन दरवाजा व परकोटा पत्थरों को काट कर बनाया गया है.

किले के भीतर पानी की एक बावड़ी भी बनी हुई है, जो ठीकठाक हालात में दिखाई देती है. इस के साथ ही इस की लंबी सुरंग का मुहाना भी दिखाई देता है. माना जाता है कि इस सुरंग का इस्तेमाल बाहर निकलने के लिए भी किया जाता था.

खस्ताहाल होने के बावजूद भी इस किले की बनावट और कुदरती छटा मन को मोह लेती है. एक ही पत्थर को काट कर मेहराब की शक्ल में बनाए गए दरवाजे कारीगरी के बेहतरीन नमूने से रूबरू कराते हैं. हालांकि दीवारें टूटने के बाद ये पत्थरों की बनी चौखट जैसे ही दिखाई देते हैं, पर फिर भी इस की खूबसूरती देखते ही बनती है.

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‘नायरा-कार्तिक’ की संगीत सेरेमनी बर्बाद करने के लिए नई चाल चलेगी ‘वेदिका’, पढ़ें खबर

स्टार प्लस के सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में इन दिनों ‘कार्तिक-नायरा’ की सगाई के बाद संगीत सेरेमनी की तैयारियां चल रही हैं. दूसरी तरफ ‘वेदिका’ भी अपनी चालें चलने से बाज नही आ रही है. वहीं अब संगीत सेरेमनी में ‘वेदिका’ ने ‘नायरा और कार्तिक’ की खुशियों पर ग्रहण लगाने के लिए एक और प्लान बना लिए हैं. आइए आपको बताते हैं संगीत सेरेमनी में क्या करेगी ‘वेदिका’…

‘कार्तिक’ के लिए चली ये चाल

हाल ही में हमने आपको बताया था कि अपकमिंग एपिसोड में ‘वेदिका’ को प्रपोज करेगा. पर दरअसल ‘कार्तिक’ ‘नायरा’ को प्रपोज करने वाला होता है और ‘वेदिका’ अंधेरा का फायदा उठा कर ‘नायरा’ की जगह खड़ी हो जाएगी.

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‘नायरा’ को करेगी संगीत सेरेमनी से दूर

अपकमिंग आप देखेंगे कि ‘वेदिका’ ‘नायरा’ से कहेगी कि लैंडलाइन पर कोई फोन आया था और उस फोन पर किसी ने कहा है कि डांसिंग एकाडमी में कुछ गलत हुआ है. ‘वेदिका’ की बातें सुनकर ‘नायरा’ परेशान हो जाएगी और वह जल्द से जल्द डांसिंग एकाडमी जाने की बात करेगी.

क्या संगीत सेरेमनी में पहुंच पाएगी ‘नायरा’


‘वेदिका’ ‘नायरा’ साथ जाएगी और डांसिंग एकाडमी तक जाने के लिए लम्बा रस्ता चुनेगी, जिसके साथ वह ‘नायरा’ के रास्ते में काफी मुश्किलें खड़ी करेगी. जिससे ‘नायरा’ ना तो समय पर डांसिंग एकाडमी पहुंच पाए और ना ही वह अपनी संगीत सेरेमनी पर टाइम पर.

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‘कार्तिक’ होगा परेशान

‘नायरा’ के संगीत सेरेमनी में न पहुंचने से ‘कार्तिक’ के साथ-साथ सभी घरवाले परेशान होंगे और ‘कार्तिक’ ‘नायरा’ को ढूंढने लग जाएगा.

अब देखना ये है कि क्या ‘नायरा’ इन बातों से ‘वेदिका’ की असलियत जान पाएगी और ‘कार्तिक’ की हो पाएगी.

समर्पण: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- समर्पण: भाग 1

‘‘चाहे इस की वजह से हम जैसों को सदा लोगों के ताने ही क्यों न सुनने पड़ें… हमारी सारी सामाजिक समरसता ही क्यों न चौपट होने लगे…और फिर आप किन दलितों और पिछड़ों की बात कर रहे हैं? क्या वास्तव में उन्हें आरक्षण का लाभ मिल पाता है? मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि असली मलाई तो हम या आप जैसे लोग ही जीम जाते हैं. क्या यह सच नहीं है कि साधनसंपन्न होते हुए भी आप के बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला आरक्षित कोटे से ही मिला था?’’

‘‘आखिर इस में बुराई क्या है?’’

‘‘बुराई है, जब आप आरक्षण पा कर आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो गए हैं तो क्या अब भी आरक्षण के प्रावधान को अपनाकर आप किसी जरूरतमंद का हक नहीं छीन रहे हैं?’’

‘‘बहुत बकरबकर किए जा रहे हो, तुम जैसा नीच इनसान मैं ने पहले नहीं देखा. जिस थाली में अब तक खाते रहे हो उसी में छेद करने की सोचने लगे. अब तुम चले जाओ. वरना…’’ मंत्रीजी अपना आपा खो बैठे और अपना रौद्र रूप दिखाते हुए क्रोध से भभक उठे.

डा. सीताराम ने भी उन से ज्यादा उलझना ठीक नहीं समझा और चुपचाप चले गए.

आलोक यह सब देख कर स्तब्ध था. डा. सीताराम के पिता मंत्रीजी के अच्छे मित्रों में हुआ करते थे, उन के गर्दिश के दिनों में उन्होंने उन्हें बहुत सहारा दिया था और मंत्रीजी के कंधे से कंधा मिला कर उन की हर लड़ाई में वह साथ खड़े दिखते थे. यह बात और है कि जैसेजैसे मंत्रीजी का कद बढ़ता गया, डा. सीताराम के पिता पीछे छूटते गए या कहें मंत्रीजी ने ही यह सोच कर कि कहीं वह उन की जगह न ले लें, उन से पीछा छुड़ा लिया.

आलोक मंत्रीजी के साथ तब से था जब वह अपने राजनीतिक कैरियर के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस समय वह बेकार था. पता नहीं उस समय उस ने मंत्रीजी में क्या देखा कि उन के साथ लग गया. उन्हें भी उस जैसे एक नौजवान खून की जरूरत थी जो समयानुसार उन की स्पीच तैयार कर सके, उन के लिए भीड़ जुटा सके और उन के आफिस को संभाल सके. उस ने ये सब काम बखूबी किए. उस की लिखी स्पीच का ही कमाल था कि लोग उन को सुनने के लिए आने लगे. धीरेधीरे उन की जनता में पैठ मजबूत होने लगी और वह दिन भी आ गया जब वह पहली बार विधायक बने. उन के विधायक बनते ही आलोक के दिन भी फिर गए पर आज डा. सीताराम के साथ ऐसा व्यवहार…वह सिहर उठा.

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अपने पिता की उसी दोस्ती की खातिर डा. सीताराम अकसर मंत्रीजी के घर आया करते थे तथा एक पुत्र की भांति जबतब उन की सहायता करने के लिए भी तत्पर रहते थे पर आज तो हद ही हो गई…उन की इतनी बड़ी इंसल्ट…जबकि उन का नाम शहर के अच्छे डाक्टरों में गिना जाता है. क्या इनसान कुरसी पाते ही इस हद तक बदल जाता है?

वास्तव में मंत्रीजी जैसे लोगों की जब तक कोई जीहजूरी करता है तब तक तो वह भी उन से ठीक से पेश आते हैं पर जो उन्हें आईना दिखाने की कोशिश करता है उन से वे ऐसे ही बेरहमी से पेश आते हैं…अगर बात ज्यादा बिगड़ गई तो उस को बरबाद करने से भी नहीं चूकते.

आलोक अब तक सुनता रहा था पर आज वह वास्तविकता से भी परिचित हुआ…सारे मंत्री तथा वरिष्ठ आफिसर कुछ भी होने पर विदेश इसीलिए भागते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उन्होंने डाक्टरों की एक ऐसी जमात पैदा की है जो ज्ञान के नाम पर शून्य है फिर वह क्यों रिस्क लें? जनता जाए भाड़ में, चाहे जीए या मरे…उन्हें तो बस, वोट चाहिए.

आज यहां हड़ताल, कल वहां बंद, कहीं रैली तो कहीं धरना…अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए तोड़फोड़ करवाने से भी नेता नहीं चूकते. ऐसा करते वक्त ये लोग भूल जाते हैं कि वे किसी और की नहीं, अपने ही देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं. आम जनजीवन अलग अस्तव्यस्त हो जाता है, अगर इस सब में किसी की जान चली गई तो वह परिवार तो सदा के लिए बेसहारा हो जाता है पर इस की किसे परवा है. आखिर ऐसे दंगों में जान तो गरीब की ही जाती है. सामाजिक समरसता की परवा आज किसे है जब इन जैसों ने पूरे देश को ही विभिन्न जाति, प्रजातियों में बांट दिया है.

आलोक का मन कर रहा था कि वह मंत्रीजी का साथ छोड़ कर चला जाए. जहां आदमी की इज्जत नहीं वहां उस का क्या काम, आज उन्होंने डा. सीताराम के साथ ऐसा व्यवहार किया है कल उस के साथ भी कर सकते हैं.

मन ने सवाल किया, ‘तुम जाओगे कहां? जीवन के 30 साल जिस के साथ गुजारे, अब उसे छोड़ कर कहां जाओगे?’

‘कहीं भी पर अब यहां नहीं.’

‘बेकार मन पर बोझ ले कर बैठ गए… सचसच बताओ, जो बातें आज तुम्हें परेशान कर रही हैं, क्या आज से पहले तुम्हें पता नहीं थीं?’

‘थीं…’ कहते हुए आलोक हकला गया था.

‘फिर आज परेशान क्यों हो… अगर तुम छोड़ कर चल दिए, तो क्या मंत्रीजी तुम्हें चैन से जीने देंगे… क्या होगा तुम्हारी बीमार मां का, तुम्हारी 2 जवान बेटियों का जिन के हाथ तुम्हें पीले करने हैं?’

तभी सैलफोन की आवाज ने उस के अंतर्मन में चल रहे सवालजवाबों के बीच व्यवधान पैदा कर दिया. उस की पत्नी रीता का फोन था :

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‘‘मांजी की हालत ठीक नहीं है… लगता है उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ेगा. वहीं शुभदा को देखने के लिए भी बरेली से फोन आया है, वे लोग कल आना चाहते हैं… उन्हें क्या जवाब दूं, समझ में नहीं आ रहा है.’’

‘‘बस, मैं आ रहा हूं… बरेली वालों का जो प्रोग्राम है उसे वैसा ही रहने दो. इस बीच मां की देखभाल के लिए जीजी से रिक्वेस्ट कर लेंगे,’’ संयत स्वर में आलोक ने कहा. जबकि कुछ देर पहले उस के मन में कुछ और ही चल रहा था.

‘‘आलोक, कहां हो तुम…गाड़ी निकलवाओ…हम 5 मिनट में आ रहे हैं,’’ मंत्रीजी की कड़कती आवाज में रीता के शब्द कहीं खो गए. याद रहा तो केवल उन का निर्देश…साथ ही याद आया कि आज 1 बजे उन्हें एक पुल के शिलान्यास के लिए जाना है.

उस के पास मंत्रीजी का आदेश मानने के सिवा कोई चारा नहीं था…घर के हालात उसे विद्रोह की इजाजत नहीं देते. शायद उसे ऐसे माहौल में ही जीवन भर रहना होगा, घुटघुट कर जीना होगा. अपनी मजबूरी पर वह विचलित हो उठा पर अंगारों पर पैर रख कर वह अपने और अपने परिवार के लिए कोई मुसीबत मोल लेना नहीं चाहता था. और तो और, अब वह जब तक शिलान्यास नहीं हो जाता, घर भी नहीं जा पाएगा.

सैलफोन पर ‘हैलो…क्या हुआ…’ सुन कर उसे याद आया कि वह रीता से बात कर रहा था…न आ पाने की असमर्थता जताते हुए मां को तुरंत अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह दी. वह जानता था, रीता उस की बात सुन कर थोड़ा भुनभुनाएगी पर उस की मजबूरी समझते हुए सब मैनेज कर लेगी. आखिर ऐसे क्षणों को जबतब उस ने बखूबी संभाला भी है.

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Bollywood का नया स्टार: साल 2019 आयुष्मान खुराना के नाम

न कोई खान और न ही कोई कपूर. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का साल 2019 उस हीरो के नाम रहा, जिस ने कभी हिंदी के बड़े लेखक धर्मवीर भारती के नाटक ‘अंधा युग’ में अश्वत्थामा का किरदार निभाने के लिए बैस्ट हीरो का अवार्ड जीता था. चंडीगढ़ में जन्मे और पले-बढ़े इस कलाकार का नाम है आयुष्मान खुराना, जिनकी इस साल आई इस की 3 फिल्मों ‘आर्टिकल 15’, ‘ड्रीम गर्ल’ और ‘बाला’ ने कामयाबी के नए झंडे गाड़ दिए.

रेडियो जौकी से लेकर बौलीवुड हीरो तक का सफर…

आयुष्मान खुराना से मेरी पहली मुलाकात साल 2010 में तब हुई थी, जब मैं आईपीएल 2010 के दिल्ली में हुए मैचों को बतौर खेल संवाददाता कवर कर रहा था. वहां आयुष्मान खुराना ‘एक्स्ट्रा इनिंग्स टी 20’ की एंकरिंग टीम का हिस्सा थे. तब मैं ने उन की अपने काम के प्रति लगन देखी थी कि किस तरह वे इंटरवल के दौरान अपनी स्क्रिप्ट याद करते थे. वहां डिनर टेबल पर ‘मुक्ता’ पत्रिका के लिए हम दोनों में उन के वीडियो जौकी के कैरियर पर लंबी बातचीत हुई थी.

उस समय आयुष्मान खुराना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे. उन की मेहनत साल 2012 में तब रंग लाई, जब उन्हें फिल्म ‘विकी डोनर’ मिली थी, जो बड़ी हिट भी साबित हुई.

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इस के बाद आयुष्मान खुराना के आने वाले 2 साल बतौर हीरो ज्यादा अच्छे नहीं थे, पर साल 2015 में आई फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ से उन्हें एक नई हिट मिली. इस के बाद अगर साल 2017 में आई फिल्म ‘मेरी प्यारी बिंदु’ को अलग कर दिया जाए तो बाकी सभी फिल्मों ने खूब कमाई की और देखते ही देखते आयुष्मान खुराना बड़े और कामयाब कलाकार बन गए.

‘आर्टिकल 15’ ने की तिगुनी कमाई…

साल 2019 की बात करें तो आयुष्मान खुराना की पहली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ आई थी. 28 जून को बड़े परदे पर आई यह एक ऐसे गंभीर मुद्दे पर बनी फिल्म थी जिस में आयुष्मान खुराना को देखना अपने आप में रोचक था, क्योंकि इस से पहले उन्होंने कभी किसी पुलिस वाले का ऐसा संजीदा किरदार नहीं निभाया था.

इस फिल्म ने भारतीय समाज में गहरे तक फैली जातिवाद की बुराई पर करारी चोट की थी. इस की कहानी में राजनीति और पुलिस को भी लपेटा गया था. बताया गया था कि ऊंची जाति और नीची जाति के फर्क पर कई राजनीतिक पार्टियां रोटी सेंक रही हैं और चाहती हैं कि यह फर्क बना रहे, तो दूसरी ओर ‘ब्राह्मण दलित एक हैं’ जैसे नारे भी राजनीतिक पार्टियां देती हैं. फिल्म में दलित नेताओं को भी नहीं छोड़ा गया था.

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आयुष्मान खुराना ने अपना किरदार इतने दमदार तरीके से निभाया था कि कहीं लगा ही नहीं कि वे ऐक्टिंग कर रहे थे. 29 करोड़ रुपए में बनी इस फिल्म ने 93 करोड़ रुपए की बढि़या कमाई की थी.

‘ड्रीम गर्ल’ ने तोड़े सक्सेस के रिकौर्ड…

फिर आई फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’. कौमेडी का भरपूर तड़का. इस जोनर में आयुष्मान खुराना खुद को सहज पाते हैं. इस फिल्म में उन्होंने एक छोटे से शहर में रहने वाले लड़के कर्मवीर का किरदार निभाया था, जो बचपन से ही लड़की की आवाज निकालने में माहिर है. धीरे-धीरे ऐसे हालात बनते हैं कि उसे एक काल सैंटर में ऐसी नौकरी मिलती है, जहां पर वह लड़की पूजा की आवाज में दुनियाभर से बातें करता है.

बाद में इसी पूजा के प्यार में पूरा शहर पड़ जाता है, लेकिन मामला वहां गड़बड़ा जाता है, जहां पर उस के आसपास के लोग भी पूजा से प्यार करने लगते हैं.

13 सितंबर को रिलीज हुई यह फिल्म भी दर्शकों के दिल में उतर गई थी. 30 करोड़ रुपए में बनी इस छोटे बजट की फिल्म ने बौक्स औफिस पर तहलका मचाते हुए 200 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की कमाई की थी.

‘बाला’ ने जीता बौलीवुड का दिल…

साल के आखिर में आई फिल्म ‘बाला’. एक ऐसे लड़के बाला की कहानी, जो अपनी घनी जुल्फों का दीवाना है और खुद को शाहरुख खान से कम नहीं समझता है. लेकिन जवानी की दहलीज पार करते ही वह अपने सिर के बाल खोने लगता है और धीरेधीरे गंजा हो जाता है. बाला की तो मानो दुनिया ही उजड़ जाती है.

यह फिल्म भी कमाई के मामले में आयुष्मान खुराना के लिए मलाई साबित हुई. 7 नवंबर को रिलीज हुई और 25 करोड़ से 30 करोड़ रुपए में बनी इस फिल्म ने भी नवंबर महीने के आखिरी हफ्ते तक 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई कर ली थी.

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आने वाले साल में भी आयुष्मान खुराना कुछ ऐसी रोचक फिल्मों से जुड़े हैं जो उन्हें और ज्यादा कामयाब हीरो बना सकती हैं. इस की एक वजह यह भी है कि अब आयुष्मान खुराना आम आदमी से जुड़ी ऐसी कहानियों को ज्यादा चुनने लगे हैं, जो छोटे शहरों, कस्बों और गांव की होती हैं. इन की फिल्मों में कहानी किरदारों से बड़ी होती है. संवाद रोचक और कस्बाई पहचान लिए होते हैं. हीरो किसी सुपर पावर से लैस नहीं होता है, बल्कि एक ऐसा अदना इनसान होता है, जिस में अपनी कमियों पर रोने की हिम्मत होती है. वह सलमान खान जैसे किसी सुपर स्टार की तरह पूरी फिल्म को अपने कंधों पर नहीं ढोता है, बल्कि दूसरे किरदारों के चमकने के लिए आसमान धरती की ओर खींच लाता है.

‘गुलाबो सिताबो’ और  ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ से मचाएंगे धमाल…

साल 2020 में आयुष्मान खुराना फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ में अमिताभ बच्चन के साथ दिखाई देंगे. इस के अलावा वे फिल्म ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में काम कर रहे हैं, जिस में वे एक समलैंगिक आदमी का किरदार निभा सकते हैं.

अपने नाम से ये दोनों फिल्में रोचक लग रही हैं. अमिताभ बच्चन उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, वहां वे बहुत सोचसमझ कर कोई फिल्म साइन करते हैं. फिर इस फिल्म में तो शूजित सिरकार भी बतौर डायरैक्टर शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म ‘विकी डोनर’ बनाई थी.

फिल्म ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में आयुष्मान खुराना के साथ जितेंद्र कुमार भी स्क्रीन शेयर करेंगे. यह फिल्म साल 2017 में आई हिट फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ का सीक्वल बताई जा रही है.

कुलमिलाकर आने वाला समय भी आयुष्मान खुराना के फिल्म कैरियर को नई ऊंचाइयां दे सकता है, जो उन के चाहने वालों के लिए अच्छी खबर है.

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