गाल बजाने में किसी का भी भला नहीं

वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री चाहे जितना बोस्ट कर लें कि भारत दुनिया में सब से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है, जमीनी हकीकत यह है कि न देश में नौकरियां हैं और न देश के बाहर. देश में भुखमरी की हालत नहीं है, क्योंकि कुछ लोग बहुत कमा रहे हैं और कुछ पहले से देश से बाहर रह कर कमा कर सरकार के विदेशी मुद्रा के खजाने को भर रहे हैं.

अब देश के पिंक आर्थिक समाचारपत्रों में नई कंपनियों और नए उत्पादों के बनने के विज्ञापन व समाचार कम हो रहे हैं. अब रिटेल व्यवसाय में शाइन जरूर है और किराने की दुकान की जगह मेगा स्टोर और औनलाइन स्टोर खुल रहे हैं जिन की चमक तो है पर बारिश के नाम पर बूंदाबांदी में स्टोर चीजों को सस्ता कर के उन की मांग थोड़ी बढ़ा रहे हैं, पर इस का मतलब यह भी है कि पहले का ट्रैडिशनल व्यापार मंदा हो रहा है.

युवाओं के लिए औनलाइन और ब्रिक फंड मौर्टार स्टोर नौकरियों के स्रोत हैं पर कोई विशेष नहीं. इन की मांग सीजनल होती है और व्यापार में अस्थिरता है. औनलाइन कंपनियां सैकड़ोंकरोड़ों के घाटे में चल रही हैं.

नए स्टार्टअपों का हल्ला है पर वे भी कागजी शेर नजर आते हैं. 100-200 में 3-4 चल पाते हैं बाकी निवेशकों का पैसा खा कर शांत हो जाते हैं. नया कैरियर बनाने की चाहत अगर स्टार्टअप शुरू कराए तो ऐसा है मानो रेगिस्तान में अधिक पानी चाहने वाली गन्ने की फसल बोना.

एक बड़ी उम्मीद पढ़ेलिखे युवाओं को विदेशी नौकरियों से थी पर अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोप अब दरवाजे बंद कर रहे हैं. सब जगह ‘भारतीयो भारत जाओ’ के नारे लगने लगे हैं. यूरोप पश्चिम एशिया से आए मुसलिम शरणार्थियों को बसाने में लगा है और अमेरिका दक्षिण अमेरिका के घुसपैठियों को रोकने के चक्कर में भारतीयों को भी बोरियाबिस्तर बांधने को कह रहा है. गिरते पैट्रोल के दामों ने तेल निर्यातक देशों में भारतीयों की खपत कम कर दी है.

भगवान भला करेगा बस, थोड़ा जपतप करो, सब्र करो, वोट दान लगातार करते रहो, यह सरकार सुखसमृद्धि ला कर ही छोड़ेगी. इस तरह के लुभावने शब्दों को अब तो सुन कर भी अजीब लगता है पर कोई और चारा नहीं तो इसी सरकार के गुणगान करना भी अनिवार्य सा है.

युवाओं को नई चेतना, नए कामों की लकीर के फकीर से हमले की कोई चेष्टा तक नहीं हो रही. सिर्फ गाल बजाने से युवाओं का भला नहीं होगा.

शहाबुद्दीन को तिहाड़, लालू का मुसलिम वोट उजाड़

सिवान के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब कहती हैं कि साल 2005 में जब नीतीश कुमार की 7 दिनों की सरकार बनी थी, तब मोहम्मद शहाबुद्दीन ने राष्ट्रीय जनता दल का साथ दिया था. उसी बात से बौखलाए नीतीश कुमार ने अगली बार सरकार बनते ही शहाबुद्दीन की जमानत रद्द कर दी थी और उन्हें जेल में ठूंस दिया था. लालू प्रसाद यादव ने भी कुछ नहीं कहा. पिछले साल जमानत पर छूटने के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव को अपना नेता बताया था और नीतीश कुमार के बारे में कहा था कि वे हालात की वजह से मुख्यमंत्री बन गए.

अब मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थक नीतीश कुमार के साथसाथ लालू प्रसाद यादव से भी नाराज हैं. उन का आरोप है कि लालू प्रसाद यादव ने उन के नेता का इस्तेमाल कर उसे दरकिनार कर दिया है.

मोहम्मद शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब और उन के समर्थकों को इस बात का भी मलाल है कि साजिश के तहत उन्हें सिवान से भागलपुर जेल और उस के बाद तिहाड़ जेल भेज दिया गया है. उन की ताकत और राजनीति को मटियामेट करने की साजिश रची गई है.

हिना शहाब और मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थक इस बात से भी नाराज हैं कि लालू प्रसाद यादव इस मसले पर चुप क्यों हैं? यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि शहाबुद्दीन के कंधे पर बंदूक रख कर ही लालू प्रसाद यादव पिछले 20 सालों से राज्य के मुसलिम वोटरों को साधने में कामयाब होते रहे हैं.

राष्ट्रीय जनता दल के सूत्रों की मानें, तो लालू प्रसाद यादव भाजपा को रोकने के लिए मोहम्मद शहाबुद्दीन का जम कर इस्तेमाल करते रहे हैं. अल्पसंख्यक वोटरों के मन में यह बात गहराई तक बैठ चुकी थी कि शहाबुद्दीन ही भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. सिवान ही नहीं, बल्कि छपरा, गोपालगंज, किशनगंज, कटिहार वगैरह मुसलिम बहुल इलाकों में मोहम्मद शहाबुद्दीन मुसलिम वोटरों को राजद के पक्ष में गोलबंद करते थे. इन जिलों की 38 विधानसभा सीटों पर मुसलिम वोट किसी का भी पलड़ा भारी करने की कूवत रखते हैं.

साल 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद की करारी हार की बड़ी वजहों में से एक मोहम्मद शहाबुद्दीन का जेल में बंद रहना भी माना जाता है.

गोपालगंज जिले में मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थकों ने ‘शहाबुद्दीन मुक्ति आंदोलन फ्रंट’ बना लिया है. उन का मानना है कि नीतीश कुमार ने पहले मोहम्मद शहाबुद्दीन को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया और अब लालू प्रसाद यादव ने उन्हें बिहार से बाहर तिहाड़ जेल भेज दिया है. अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को इस का खमियाजा भुगतना पड़ेगा. सिवान की राजद इकाई ने तो अपने पार्टी आलाकमान के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया है.

गौरतलब है कि पिछले 20 सालों से मोहम्मद शहाबुद्दीन ही सिवान के सियासत की धुरी रहे हैं. सिवान की कुल आबादी 27 लाख, 14 हजार, 349 है, जिस में से 4 लाख, 94 हजार, 176 मुसलिम आबादी है.

सिवान जिले में 8 विधानसभा सीटें आती हैं और सभी उम्मीदवारों के नाम वही तय करते रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में तो उन्होंने भाजपा के टिकट पर रघुनाथपुर सीट से अपने शूटर मनोज कुमार को मैदान में उतरवा दिया था.

सिवान जिले के तहत जीरादेई, दरौली, रघुनाथपुर, दरौंदा, बड़हडि़या, महराजगंज, गोरियाकोठी और सिवान विधानसभा क्षेत्र पड़ते हैं. साल 2004 में मोहम्मद शहाबुद्दीन को जेल में ठूंस दिया गया था, पर जेल से ही वे अपना राजपाट चलाते रहे. साल 2009 में उन्हें चुनाव लड़ने के लिए नाकाबिल ठहरा दिया था. उस के बाद से ही उन के पतन की कहानी शुरू हो गई. उन्होंने अपनी बीवी हिना शहाब को लोकसभा के चुनाव में उतारा, पर उन्हें भी जितवा न सके.

एक आम स्टूडैंट से बाहुबली और उस के बाद नेता बनने तक मोहम्मद शहाबुद्दीन की जिंदगी भी काफी उतारचढ़ाव से भरी रही है. 10 मई, 1967 को सिवान जिले के हुसैनगंज ब्लौक के प्रतापपुर गांव में जनमे शहाबुद्दीन ने कालेज में पढ़ाई के दौरान ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था.

साल 1986 में हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन पर पहला केस दर्ज हुआ था. सिवान की राजनीति पिछले 25 सालों से उन के ही इर्दगिर्द घूमती रही है. लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, नगरपालिका चुनाव से ले कर पंचायत चुनाव में उन की ही तूती बोलती थी.

साल 1990 में सिवान के डीएवी कालेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन राजनीति में उतरे और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माले) से टक्कर लेते रहे.

साल 1990 में जीरादेई विधानसभा सीट से पहली बार निर्दलीय विधायक बनने के बाद वे लालू प्रसाद यादव की पार्टी में शामिल हो गए. साल 1995 में दोबारा जीरादेई सीट से विधानसभा का चुनाव जीता.

साल 1996 में जनता दल की टिकट पर सिवान लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर संसद पहुंच गए. उस के बाद 1998, 1999 और 2004 में भी वे सिवान

सीट से सांसद बने. सिवान की विधानसभा सीटों, विधानपरिषद की सीट, नगरपरिषद से ले कर जिला परिषद तक के चुनावों में भी मोहम्मद शहाबुद्दीन का ही दबदबा रहता था.

पिछले तकरीबन 20 सालों से वे सिवान में समानांतर सरकार चला रहे थे. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर अकसर यह आरोप लगता रहा है कि वे मोहम्मद शहाबुद्दीन को समर्थन और संरक्षण देते रहे हैं. सिवान में उन की अदालत लगती थी. चाहे जमीन का झगड़ा हो या पारिवारिक मामला, सभी मामलों का निबटारा शहाबुद्दीन की अदालत में ही होता था. इतना ही नहीं, सिवान के डाक्टरों की फीस भी वही तय किया करते थे.

15 मार्च, 2001 में राजद के पूर्व जिला अध्यक्ष मनोज कुमार को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम दूसरे दिन जब दारोगा राय कालेज पहुंची, तो मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पुलिस अफसर संजीव कुमार को थप्पड़ जड़ दिया था और उन के गुरगों ने पुलिस वालों की भी जम कर पिटाई कर डाली थी.

उस के बाद शहाबुद्दीन को पकड़ने के लिए जब उस समय सिवान के एसपी रहे बच्चू सिंह मीणा की अगुआई में पुलिस ने उन के प्रतापपुर गांव वाले घर पर छापा मारा, तो पुलिस और शहाबुद्दीन के समर्थकों के बीच तकरीबन 4 घंटे तक गोलीबारी हुई, जिस में 8 बेकुसूर गांव वाले मारे गए और पुलिस को खाली हाथ ही लौटना पड़ा.

सियासी हलकों में उस समय यह चर्चा गरम थी कि लालू प्रसाद यादव ने शहाबुद्दीन को औकात बताने के लिए छापा मरवाया. शहाबुद्दीन उस समय तो पुलिस को झांसा दे कर भाग निकले, पर उन्होंने एसपी बच्चू सिंह मीणा को धमकी दी थी कि उन्हें राजस्थान तक खदेड़ के मारेंगे.

साल 2003 में जब डीपी ओझा बिहार के डीजीपी बने, तो उन्होंने मोहम्मद शहाबुद्दीन पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू किया था. उन्होंने शहाबुद्दीन के पुराने मामलों को दोबारा खोल कर उन के खिलाफ सुबूत जुटाए.

माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या के मामले में उन के खिलाफ वारंट जारी हुआ और अदालत में शहाबुद्दीन को आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस से समूचे राज्य में सियासी बवाल मच गया और राजद को अपने मुसलिम वोटों के खिसकने का खतरा महसूस होने लगा.

मोहम्मद शहाबुद्दीन की मुसलिम वोटरों पर खासी पकड़ थी. तब की राबड़ी सरकार ने डीजीपी डीपी ओझा को आननफानन हटा दिया, तो गुस्साए ओझा ने वीआरएस ले ली.

साल 2005 में राष्ट्रपति शासन के दौरान सिवान के एसपी संजय रत्न ने 24 अप्रैल, 2005 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर में छापा मारा और भारी तादाद में हथियार, गोलाबारूद, चोरी की गाडि़यां और विदेशी पैसे बरामद किए.

लंबे समय तक फरार रहने के बाद 6 नवंबर, 2005 को पुलिस ने शहाबुद्दीन को दिल्ली में उन के घर पर दबोच लिया. उस के बाद से आज तक वे न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं.

सिवान जिले में ‘साहेब’ के नाम से मशहूर बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन पिछले 13 सालों से जेल में बंद हैं और उन के सिर पर दर्जनों आपराधिक मामले दर्ज हैं.

पटना हाईकोर्ट ने पिछले साल उन्हें 2004 के सिवान तेजाब कांड का मुजरिम करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है. कोर्ट ने माना है कि शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर आ कर हत्याकांड की साजिश रची थी.

गौरतलब है कि 13 साल पहले सिवान के यादव मार्केट में रहने वाले कारोबारी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के 2 बेटों का अपहरण कर लिया गया था और 2 लाख रुपए की फिरौती की मांग की. फिरौती नहीं देने पर दोनों की तेजाब से नहला कर हत्या कर दी गई थी.

16 अगस्त, 2004 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर उन के गुरगों ने दोनों भाइयों की हत्या की थी. गिरीश राज उर्फ निक्कू (24 साल) और सतीश राज उर्फ सोनू (18 साल) को अलगअलग जगहों से अगवा कर लिया गया और फिरौती नहीं मिलने पर हुसैनगंज थाने के प्रतापपुर गांव में मोहम्मद शहाबुद्दीन और उन के गुरगे ने तेजाब से नहला कर दोनों भाइयों को मार डाला था.

इस मामले में मृतकों की मां कलावती देवी के बयान पर आईपीसी की धारा 341, 323, 380, 435, 364/34, के तहत मुफस्सिल थाने में कांड संख्या 131/2004 दर्ज कराया गया था, जिस में राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू मियां उर्फ सोनू उर्फ आरिफ हुसैन को नामजद किया गया था.

मामले की जांच के दौरान तब के राजद सांसद रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन  पर हत्या की साजिश रचने का खुलासा हुआ था. इस मुकदमे में स्पैशल कोर्ट ने 4 जून, 2010 को आईपीसी की धारा 120 (बी), 364 (ए) के तहत साजिश रचने और अपहरण का आरोप लगाया. बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर 1 मई, 2014 को आईपीसी की धारा 302, 201, 120 (बी) के तहत आरोप तय किया गया. न्यायिक प्रक्रिया के बीच में ही दोनों मृतकों के भाई और घटना के चश्मदीद गवाह राजीव रोशन की भी 16 जून, 2014 में हत्या हो गई. इस मामले में शहाबुद्दीन और उस के बेटे ओसामा को भी आरोपी बनाया गया है. ओसामा फिलहाल फरार है.

इस समूचे मामले की शुरुआत सिवान के गोशाला रोड में चंदा बाबू के मकान के बाहरी हिस्से को ले कर झगड़े से हुई थी. उन की जमीन पर अराजक लोगों की नजरें गड़ी हुई थीं और वे उसे हड़पने की कोशिशों में लगे हुए थे.

16 अगस्त, 2004 की सुबह जमीन को ले कर पंचायत हो रही थी, उसी समय कुछ लोग आ धमके और जमीन पर कब्जा करने लगे. मारपीट की नौबत आ गई. कुछ बदमाशों ने गालीगलौज करते हुए मारपीट शुरू कर दी, तो चंदा बाबू और उन के घर वालों ने घर में रखे तेजाब को बदमाशों पर फेंक कर उन्हें भागने के लिए मजबूर कर दिया.

तेजाब से कई लोग जख्मी हो गए थे. इस के कुछ देर बाद ही चंदा बाबू के बड़हडि़या रोड पर बनी दुकान से उन के बड़े बेटे गिरीश राज का अपहरण कर लिया गया. उस के कुछ देर बाद ही चिउड़ा हट्टा बाजार से छोटे बेटे सतीश राज को भी उठा लिया गया.

इस घटना के 7 सालों के बाद तेजाब हत्याकांड के चश्मदीद गवाह के रूप में गिरीश और सतीश का बड़ा भाई राजीव रोशन सामने आया. उस ने 6 जून, 2011 को अपना बयान दर्ज कराया. उस ने अपने बयान में कहा कि उस के दोनों भाइयों के साथ उस का भी अपहरण किया गया था.

तीनों भाइयों को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले जाया गया, जहां उस की आंखों के सामने शहाबुद्दीन के कहने पर गिरीश और सतीश को तेजाब से नहला कर मार डाला गया. उसी बीच राजीव वहां से भागने में कामयाब रहा.

राजीव की गवाही पर कई सवाल खड़े हुए थे और तब के सिवान कोर्ट के स्पैशल सैशन जज एके पांडे की अदालत ने सुनवाई के दौरान मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ मामला चलाने से इनकार कर दिया था. उस के बाद पटना हाईकोर्ट के आदेश पर शहाबुद्दीन के खिलाफ सुनवाई शुरू हो सकी थी.

राजीव रोशन ने कोर्ट को बताया था कि 2 भाइयों की हत्या के बाद वह जान बचाने के लिए गोरखपुर भाग गया था और वहीं छिप कर रहने लगा था. शहाबुद्दीन के जेल जाने और बिहार में सरकार बदलने के बाद वह वापस लौटा और गवाही देने की हिम्मत जुटाई.

पटना हाईकोर्ट ने 1 मई, 2014 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया और 16 जून, 2014 को राजीव की सिवान के डीएवी मोड़ के पास गोली मार कर हत्या कर दी गई. तेजाब कांड के चश्मदीद गवाह को भी रास्ते से हटा दिया गया था. छोटी सी जमीन के टुकड़े के विवाद ने चंदा बाबू के तीनों बेटों की बलि ले ली.

चंदा बाबू की बीवी कलावती कहती हैं कि मोहम्मद शहाबुद्दीन को सजा सुनाए जाने के बाद उन के लिए खतरा और ज्यादा बढ़ गया है. वे रोते हुए कहती हैं कि उन के तीनों बेटों की हत्या कर दी गई है और अब उन की और उन के पति की भी हत्या हो सकती है. चंदा बाबू ने बेटों के हत्यारे को सजा दिलाने की ठानी थी, वह पूरा हुआ है.

मोहम्मद शहाबुद्दीन को कई मामलों में सजा सुनाए जाने और 18 फरवरी, 2017 को दिल्ली के तिहाड़ जेल भेजने पर उन की बीवी हिना शहाब बारबार यही रट लगा रही हैं कि उन के शौहर को साजिश के तहत फंसाया गया है. उन के समर्थक अब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को अगले चुनाव में औकात बताने की हुंकार भर रहे हैं.

फैन्स शिकायत करते हैं कि मैं फोटो में न्यूड नहीं हूं : पूनम पांडे

पूनम पांडे हमेशा ही सोशल मीडिया पर अपनी बोल्ड और हॉट तस्वीरें शेयर करती रहती हैं. पर इन्होंने तो अपनी इन तस्वीरों को दिखाने के लिए ऐप ही लॉन्च कर दिया.

अगर आपने अब तक पूनम का ये ऐप डाउनलोड नहीं किया है तो कर लें. दरअसल 1 महीने पहले मॉडल पूनम पांडे ने अपना एक एंड्रायड ऐप शुरु किया है, जो काफी चर्चा में है और पूनम फिर अपनी बोल्ड और सेक्सी तस्वारों से सुर्खियों में आ गई है.

इस ऐप पर आप पूनम पांडे का बेहद बोल्ड लुक देख सकते हैं. खास बात यह है कि आप अपनी उम्र की जानकारी दिए बिना यहां आ सकते हैं. यहां पूनम अपनी कुछ बेहद बोल्ड तस्वीरें पोस्ट करती हैं, जिन्हें देखकर आप चौंक जाएंगे.

हालांकि अभिनेत्री का ऐप का कंटेन्ट इतना बोल्ड था कि उनके इस ऐप को गूगल ने बैन कर दिया गया. पर आपको निराश होने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि एंड्रायड यूजर्स इसे उनकी वेबसाइट से सीधे डाउनलोड कर सकते हैं.”

पूनम इस ऐप के बारे में कहती हैं कि, “यह दिलचस्प है कि एक तरफ गूगल प्ले स्टोर मेरे एप को समाप्त कर रहा है और दूसरी ओर कुछ फैन्स ‘शिकायत’ करते हैं कि मैं फोटो में न्यूड नहीं हूं.”

यहां हम आपको पबता देना चाहते हैं कि पूनम आखिरी बार इसी साल यानि कि 2017 में आई गोविंदा अभिनीत फिल्म ‘आ गया हीरो’ में विशेष अतिथि भूमिका में दिखाई दी थीं.

अयोध्या को कर्मभूमि बनायेंगे योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से लोकसभा सदस्य हैं. अब उनको लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देकर विधानसभा का चुनाव लड़ना है. योगी आदित्यनाथ के लिये गोरखपुर से सुरक्षित कोई दूसरी जगह नहीं है. गोरखपुर के कुछ विधायक अपनी सीट से इस्तीफा देकर योगी के लिये विधानसभा उपचुनाव लड़ने के लिये सीट खाली करने का मन भी बना चुके हैं. इसके बाद भी योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर के बजाये अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की संभावना दिख रही है. योगी के अयोध्या दौरे के बाद अयोध्या की विकास योजनाओं पर जिस तरह से सरकार अपना फोकस बढ़ा रही है, उससे यह साफ होने लगा है. भाजपा योगी को हिन्दुत्व और अयोध्या से जोड़कर देखना चाहती है, जिससे 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को बढ़त हासिल हो सके.

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गंगा की सफाई को लेकर धार्मिक मुद्दा चुनाव में उठाया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा गाय और गौ वंश को लेकर धार्मिक वोटबंदी करने की योजना में है. दक्षिण भारत, गोवा और देश के कुछ पहाड़ी इलाकों में गाय और गौ वंश के मीट को लेकर नया विरोध और समर्थन शुरू हो गया है. भाजपा से जुडे साधूसंत भी इस मुद्दे को हवा देने में जुट गये हैं. गंगा सफाई के वादे को 3 साल बीत गये हैं. गंगा में पानी जस का तस ही है. ऐसे में अब भाजपा नये धार्मिक मुद्दे तलाशने में लग गई है.

अयोध्या और गाय दोनों ही ऐसे सबसे बडे मुद्दे हैं जिनपर देश वोटबंदी का शिकार हो सकता है. राममंदिर आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश से अधिक देश के बाकी हिस्से पर हो रहा है. जिस तरह से अदालत ने अयोध्या विवाद में तेजी दिखाई है उससे साफ लगता है कि आने वाले कुछ साल तक देश की राजनीति अयोध्या मुद्दे के आसपास ही रहेगी. योगी आदित्यनाथ खुद को राजनीति के केन्द्र में रखने के लिये अयोध्या का सहारा ले सकते हैं.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री रहते उनकी हिन्दू युवा वाहिनी का संगठन भी गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकल कर पूरे प्रदेश में विस्तार लेने लगा है. अब यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक विस्तार लेने लगा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर जिले, कस्बे में हिन्दू युवा वाहिनी के बैनर और पोस्टर दिखने लगे हैं. इसके साथ ही साथ हिन्दू महासभा जैसे पुराने संगठन भी फिर से आकार लेने लगे हैं. योगी आदित्यनाथ को अब खुद को उत्तर प्रदेश की राजनीति के केन्द्र में रखकर आने वाला चुनाव लड़ना है. ऐसे में योगी के लिये अयोध्या सबसे मुफीद है.

चुनौतियों के सामने हार न मानें युवा

देश की बड़ीबड़ी आईटी कंपनियां आजकल ऐक्सपैंशन प्लान नहीं बना रही हैं, वे आजकल वीडिंग आउट प्लान बना रही हैं. उम्मीद है कि इन्फोसिस, विप्रो, कोगनीजैंट जैसी कंपनियां 50 हजार से 1 लाख कर्मचारियों की तो छंटनी कर देंगी. एक तो पश्चिमी देशों में भी प्रगति की रफ्तार कम हो गई है और दूसरी तरफ अमेरिका के खप्ती राष्ट्रपति डौनल्ड ट्रंप अमेरिका फौर अमेरिकंस का राग अलाप रहे हैं. उन की देखादेखी दूसरे देश भी डिफैंसिव मोड में आ गए हैं और बाहरी युवाओं का रास्ता रोक रहे हैं और अपने देश का आईटी बिजनैस बाहर जाने पर पाबंदियां लगा रहे हैं.

भारतीय युवाओं के लिए यह बुरी खबर है क्योंकि सरकारी नौकरियों का तो वैसे ही अकाल है. निजी क्षेत्र में व्यापार व उद्योग बढ़ रहे हैं पर कम. ज्यादा तकलीफ यह है कि छोटे निजी हों या बड़े सरकारी रोजगार देने वाले, वे ट्रेनिंग देने के इच्छुक नहीं हैं और सीखेसिखाए लोगों को ही रखना चाहते हैं.

भारतीय युवा वैसे भी कम उत्साही हैं. हमारे यहां हरेक में भारी जंग लगा है. जातिगत अहंकार के कारण जो ज्यादा पढ़ेलिखे हैं वे हाथ का काम नहीं करना चाहते और जो मजबूरी में हाथ का काम करने को तैयार हैं वे नया जानने को उत्सुक नहीं हैं. ऐसे में पुरानी नौकरियां कम हो जाएं और नई नौकरियां न निकलें तो स्थिति गंभीर हो जाएगी.

यह दुनिया के कई देशों में हो रहा है जहां मौजमस्ती, ड्रग्स, नाचगाने, भक्ति, सैक्स का बोलबाला है. वहां लोग सोचते हैं कि काम अपनेआप टपकेगा. कोई नौकरी देगा, चाहे सरकार दे या देवीदेवता. वे खाने को, हल्ले को तैयार हैं, काम करने को नहीं.

देश के आईटी सैक्टर ने लाखों घर रोशन किए हैं. विदेश जाने के सपने ने बहुतों को कठिन मेहनत करने के लिए उत्साहित किया है. देश में भारी भरतियों ने कल के प्रति उत्साह जगाया. जगहजगह जो कोचिंग क्लासें खुलीं इस का सुबूत है कि देश का युवा कम से कम पढ़ने को तो उत्सुक हुआ था, पर अब जिस तरह की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, देश का युवा निराशाजनक हालत में हैं.

उम्मीद करनी चाहिए कि यह पासिंग फेज है. दुनिया की सोच बदलेगी. जैसे फ्रांस में इमैनुअल मैक्रौन ने नई सोच दी है वैसी ही दूसरे देश देंगे और ट्रंप व थेरेसा मे (इंगलैंड की प्रधानमंत्री) जैसे संकीर्ण नेताओं को कल को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाएगा. युवा भारत को हार मानने की जरूरत नहीं. हमारी जर्नी तो अभी शुरू हुई है.

इस एक्ट्रेस ने खुद को बताया सेक्स क्रांतिकारी

आज के समय में अभिनेत्री शर्लिन चोपड़ा को कौन नहीं जानता. और हो भी क्यों न, वे खुद अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकती. वे तो खुद ही अपनी तारीफ किए जा रही हैं.

बॉलावुड की वॉलपेपर क्वीन कही जाने वाली शर्लिन के अनुसार ‘प्लेबॉय’ जैसी लोकप्रिय मैगजीन के लिए ‘न्यूड फोटोशूट’ करवा कर उन्होंने बहुत बहादुरी का काम किया है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मुझे इस काम के लिए खुद पर गर्व है. मैंने इतिहास रचा है.

पर शर्लिन यही नहीं रूकती, उनके मुताबिक पहले सेक्स पर बात करने से लोग डरते थे, लेकिन अब उनके कारण वे सेक्स पर बिना रूके बात करते हैं. इसका श्रेय भी वे खुद को देती हैं और ऐसा करते हुए, वे अपने आपको एक सेक्स क्रांतिकारी बताती हैं. शर्लिन ने फिल्म ‘कामसूत्र 3-डी’ में अभिनय किया है और कहा जा रहा है कि इस फिल्म में बोल्ड सीन की भरमार है.

पिछले लगभग तीन सालों से फिल्म अधर में है, पर अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि साल 2017 के बीच में ये फिल्म रिलीज की जाएगी. सूत्रों के अनुसार कामसूत्र 3डी को लेकर शर्लिन चोपड़ा बेहद उत्साहित थीं और जब वे इस फिल्म के ट्रेलर लांचिंग कार्यक्रम में नहीं दिखाई दी तो उपस्थित लोगों को बेहद आश्चर्य हुआ. उनकी अनुपस्थिति का सबसे ज्यादा असर फिल्म के निर्देशक रुपेश पॉल के चेहरे पर नजर आ रहा था. शर्लिन की अनुपस्थिति पर जब मीडिया द्वारा सवाल रुपेश से पूछे गए तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिए.

उन्होंने कहा था कि वे किसी हीरोइन से आने की विनती तो नहीं कर सकते न. लेकिन एक बात वहां उपस्थित लोगों ने नोट कर ली कि बात तो कुछ और ही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि शर्लिन और रुपेश के बीच संबंध सामान्य नहीं चल रहे.

बहरहाल आप ये सब भूल जाईये और इस हॉट मॉडल का न्यूड फोटोशूट और हाल ही में आए ब्रा लैस बैडरूम फोटोशूट की तस्वीरें देख, अपने होश खो बैठने के लिए तैयार हो जाईए.

ये क्या! 80 साल की अभिनेत्री को किस कर रहे हैं राजकुमार राव

बॉलीवुड अभिनेता राजकुमार राव और श्रुति हसन की आगामी फिल्म ‘बहन होगी तेरी’ का ट्रेलर तो रिलीज हो ही चुका है और फिल्म का ट्रेलर देखकर ये पता भी चल रहा है कि ये फिल्म एक रोमांटिक कॉमेडी है. पर फिल्म रिलीज होने से पहले ही विवादों में घिर चुकी है.

दरअसल, फिल्म के एक पोस्टर को लेकर विवाद शुरू हो गया है. इस पोस्टर में राज कुमार राव भगवान शिव के लुक में एक मोटरसाइकिल पर बैठे नजर आ रहे हैं. इस पोस्टर के रिलीज होने के बाद धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में फिल्म के प्रोड्यूसर टोनी डिसूजा और डायरेक्टर अजय पन्ना लाल को हिरासत में ले लिया गया था. हालांकि कोर्ट में सुनवाई के बाद दोनों को जमानत पर छोड़ दिया गया.

अब इस फिल्म का एक नया ट्रेलर सीन इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. इस सीन में राजकुमार राव 80 साल की अभिनेत्री के साथ लिपलॉक करते नजर आ रहे हैं.

दरअसल मामला कुछ ऐसा है कि, फिल्म में एक ऐसा सीन है जिसमें राजकुमार राव 80 साल की एक महिला को लिपलॉक जैसा सीन करते नजर आ रहे हैं. इस सीन में राजकुमार उन्हें मुंह से सांस देने की कोशिश करते हैं. अब ये सीन सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है.

हम पको बता दें कि इस सीन को शूट करने में राजकुमार को 18 रीटेक देने पड़े थे. इस सीन के दौरान सेट पर लोग राजकुमार राव का मजाक उड़ा रहे थे कि वो स्मूच कर रहे हैं. फिल्म में 80 साल की महिला का किरदार अभिनेत्री कमलेश गिल निभा रही हैं.

ये फिल्म 9 जून को सिनेमा घरों में रिलीज होगी. बता दें कि इस फिल्म में राजकुमार राव के अलावा गौतम गुलाटी और श्रुति हसन लीड रोल में हैं. इस फिल्म में राजकुमार राव पहली बार श्रुति हासन के साथ काम कर रहे हैं. इससे पहले वह कंगना रनौत के साथ क्वीन फिल्म में काम कर चुके हैं.

प्रेम और ब्रेकअप आंखें और दिमाग खोल कर करें

ब्रेकअप के बाद रिवाल्वर रानी बन जाओ और बौयफ्रैंड की ऐसीतैसी कर दो. कानपुर की एक युवती ने ऐन शादी के दिन अपने बौयफ्रैंड की शादी के मंडप में रिवाल्वर हाथ में ले कर धावा बोल दिया कि उन दोनों का लंबा प्रेम व सैक्स संबंध रहा है और वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. कोई गोली तो नहीं चली पर बौयफ्रैंड की शादी होतेहोते रह गई और दुलहन के मातापिता पैसा, कपड़ेलत्ते ले कर मुंह लटका कर बुराभला कहते चले गए.

प्रेम और ब्रेकअप आंखें और दिमाग खोल कर करना चाहिए. जैसे प्रेम एकतरफा न हो, ब्रेकअप भी एकतरफा नहीं हो सकता. प्रेम करने या उस का इजहार करने से पहले युवकयुवती को 100 बातें सोच लेनी चाहिए. केवल मजे के लिए प्रेम हो रहा है और उसी प्रेम में सैक्स संबंध भी बन रहे हैं तो यह नंगे बिजली के तार से खुद को बांधने के बराबर है. अगर तारों में बिजली न हो तो ठीक पर कहीं कड़कसे बिजली आ गई तो बड़े झटके लगेंगे ही.

युवतियों को प्रेम की कीमत भी देनी पड़ती है और ब्रेकअप की भी पर युवक यों ही छूट जाएं ऐसा भी नहीं. उन्हें भी मानसिक तनाव, अकेलापन, गिल्ट कौंप्लैक्स और कई बार मारपीट का सामना करना पड़ता है. युवतियों पर तो चालू होने तक का ठप्पा लग जाता है. अगर कहीं गर्भ ठहर गया तो ऐबौर्शन की मुसीबत सहने, सैक्स के दौरान पकड़े जाने का डर भी बना रहता है.

प्रेम हो जाता है, किया नहीं जाता, यह बचकानी बात है. प्रेम करने की फुरसत है, दिल, दिमाग और शरीर मांग कर रहा है और साथी उपलब्ध है तो ही प्रेम की जडंे फूटती हैं, बिना बीज, खाद, पानी, सही जमीन के प्रेम यों ही नहीं हो जाता. इसलिए प्रेम करते हुए सोच कर चलें कि प्रेमिका रिवाल्वर रानी तो नहीं बन जाएगी, प्रेमी ब्लैकमेलर तो नहीं बन जाएगा. प्रेम के दौरान भी आंख खोल कर चलना चाहिए.

प्रेम को अंतिम परवान तक चलाने के लिए सारी ऊंचनीच देख लें. एकदूसरे के प्रति समर्पण की भावना है या नहीं, दोनों परिवार एकदूसरे को चाहते हैं या नहीं, दोनों का आर्थिक स्तर विवाह का बोझ उठाने लायक है या नहीं. प्रेम टाइमपास नहीं है और अगर गंभीर नहीं है तो दोस्ती को प्रेम का बाना कभी न पहनाएं. दूसरे से लगाव, उस के प्रति खिंचाव एक के रहते पनपने न दें. प्रेम का विवाह के अनुबंध से कोई मतलब नहीं है इसलिए प्रेम को भी बंधन समझें वरना सिर्फ जानपहचान या अच्छी दोस्ती तक रखें वरना रिवाल्वरों की तैयारी कर के चलें.

‘सामाजिक न्याय की ताकतों को एक होना पड़ेगा’

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का असर बिहार की राजनीति पर दिखने लगा है. इस के अलावा 4 राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने बीच के तमाम विवादों को खत्म करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं. दोनों नेता लगातार एकदूसरे से मिल रहे हैं और साथसाथ फोटो भी खिंचवा रहे हैं. इस बहाने दोनों धुरंधर यह संदेश देने की पुरजोर कवायद कर रहे हैं कि उन के  बीच सबकुछ ठीक है और हर हाल में दोनों साथसाथ हैं.

लालू प्रसाद यादव ने तो बातचीत में ईमानदारी से यह कबूल भी किया कि अगर अब भी गैरभाजपाई दल एकजुट नहीं हुए, तो उन के खत्म होने का पूरा खतरा है.

आप धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को एक प्लेटफार्म पर कैसे लाएंगे? पिछली बार मुलायम सिंह यादव को लाने में कामयाबी नहीं मिल सकी थी?

 इस के लिए कोशिशें लगातार चल रही हैं और अब उस की स्पीड बढ़ा दी गई है. मैं और नीतीश कुमार इस के लिए सभी दलों से बात कर रहे हैं. बिहार में राजद, जद (यू) और कांगे्रस के महागठबंधन को मिली कामयाबी को अब नैशनल लैवल पर कामयाब कर के दिखाना है.

अगले साल 5 राज्यों में चुनाव होने हैं, इसलिए हम लोगों को तेजी से काम करना होगा. धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की ताकतों को उत्तर प्रदेश के चुनाव से सबक लेने की जरूरत है. वहां वोट के बंटवारे की वजह से भाजपा को फायदा मिल गया. आगे से ऐसा नहीं होने देना है.

आप को नहीं लगता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भाजपा को मजबूत किया है?

भाजपा की ताकत बढ़ी है और वोट भी बढ़े हैं, इस में कोई दोराय नहीं है. उन्हें कामयाबी अपनी ताकत की वजह से कम और समाजवाद और सामाजिक न्याय का झंडा उठाने वालों के बिखराव की वजह से ज्यादा मिली है. भाजपा ने तो दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में मिला कर ही तो जीत की राह आसान की.

आप को लगता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले सभी दल आसानी से एक मंच पर आ जाएंगे?

हम हार मानने वालों में नहीं हैं. समाजवादियों की सोच रही है कि वे आपस में लड़ते भी हैं और जब देश और समाज के हित की बात होती है, तो एकजुट भी हो जाते हैं. अब समय आ गया है कि विपक्ष एक मंच पर आ जाए, तभी भाजपा को धूल चटाई जा सकती है.

बिहार : आंसू बहाता हुआ आपरेशन स्माइल

पिछले साल 1 मई को पटना के पूर्वी इंदिरानगर महल्ले में रहने वाले बिमल कुमार के  9 साल के बेटे ऋषभ का अपहरण हुआ और बाद में अपराधियों ने उस की हत्या कर दी. पुलिस ने छानबीन की, तो पता चला कि ऋषभ का अपहरण उस के पड़ोस में रहने वाले बिट्टू नाम के नौजवान ने किया था. रातोंरात पैसा कमाने की चाह में बिट्टू ने ऋषभ का अपहरण कर लिया और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपए की मांग की. बच्चे को ज्यादा समय तक साथ रखने के खतरे को भांप कर बिट्टू ने कुएं में धकेल कर ऋषभ की हत्या कर दी. उस के बाद भी ऋषभ के पिता को फोन कर वह फिरौती की मांग करता रहा.

बिट्टू के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उसे दबोच लिया, पर मासूम ऋषभ अपने पड़ोसी की सनक का शिकार बन चुका था. पिछले कुछ समय से इस तरह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. ज्यादातर बच्चों को उन के  करीबी रिश्तेदार या पड़ोसी ही गायब करते रहे हैं.

भारतनेपाल सरहद पर मानव तस्करी की रोकथाम को ले कर काम कर रहे एक स्वयंसेवी संगठन ‘भूमिका विहार’ की डायरैक्टर शिल्पी सिंह बताती हैं कि मानव तस्करी के मामले में बिहार का सीमांचल इलाका ट्रांजिट पौइंट बनता जा रहा है.

इस संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 5 सालों में 519 बच्चे गायब हुए, जिन में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं. शादी और नौकरी का लालच दे कर लड़कियों की तस्करी की जाती है. बच्चों खासकर लड़कियों को गायब करने के बाद उन्हें कोठों में पहुंचा कर देह धंधे में झोंक दिया जाता है.

पुलिस अफसर अशोक सिन्हा कहते हैं कि अपने आसपास खेलतेकूदते, स्कूल आतेजाते और छोटीमोटी चीज खरीदने के लिए महल्ले की दुकानों पर जाने वाले बच्चों को उठाना अपराधियों के लिए काफी आसान होता है.

परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच और साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं, कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और वह किसी मासूम बच्चे को अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले. ऐसे में हर मांबाप को अपने बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत है.

पुलिस हैडक्वार्टर के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में पटना से लापता हुए 575 बच्चों में से 299 बच्चों का ही पता चल सका है. ऐंटीह्यूमन ट्रैफिकिंग सैल में दर्ज मामलों से यह खुलासा हुआ है. अगस्त, 2016 में सब से ज्यादा 73 बच्चे गायब हुए थे. उन में से 40 बच्चों को ही पुलिस बरामद कर सकी.

सैल में दर्ज मामलों से पता चला है कि सब से ज्यादा बच्चे पटना के कदमकुआं और पटना सिटी इलाके से गायब हुए हैं. गायब हुए बच्चों की उम्र 2 से 10 साल के बीच की है.

बच्चों की गुमशुदगी के बढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर साल 2014 में देशभर में ‘आपरेशन स्माइल’ शुरू किया गया. मार्च, 2017 में इस आपरेशन के तहत बिहार में 185 बच्चों को उन के घर पहुंचाया गया.

सीआईडी के एडीजी आलोक राज का दावा है कि ‘आपरेशन स्माइल’ के तहत एक महीने के अंदर 185 बच्चों को बरामद किया गया. पटना में 53, पूर्णिया में 46, किशनगंज में 28, औरंगाबाद में 21, मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी में

8-8, लखीसराय में 7, गया और अरवल में 6-6 व बक्सर और बेगुसराय में

1-1 बच्चे को बरामद किया गया.

सभी बच्चों की उम्र 10-11 साल की थी और उन में से ज्यादातर रेलवे स्टेशनों पर लावारिश जिंदगी जी रहे थे. बच्चों के गायब होने के मामलों में पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है, बल्कि सनहा दर्ज कर के छोड़ देती है. सुप्रीम कोर्ट में ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ द्वारा दायर पीआईएल पर राज्य सरकार को दिशानिर्देश जारी किया गया है कि बच्चों के गायब होने की सनहा को 24 घंटे के अंदर एफआईआर में बदल दिया जाए.

अपहरण कर बच्चों के मांबाप से फिरौती वसूलने, बच्चों के गुरदे, लिवर, आंख वगैरह अंगों को बेचने, उन्हें गुलाम की तरह घर और फार्महाउस में काम कराने, शीशा, सीमेंट, कालीन जैसे कारखानों में मजदूर के रूप में इस्तेमाल करने के लिए गायब किया जाता रहा है.

साथ ही, घर से भटके हुए बच्चों को दलाल बहलाफुसला कर मानव तस्करी करते हैं. इसी वजह से गायब हुए बच्चों का पता नहीं चल पाता है.

गायब किए गए बच्चों को मुंबई, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और जयपुर की चूड़ी फैक्टरियों में काम पर लगा दिया जाता है. इस के पीछे अपराधियों का बहुत बड़ा नैटवर्क काम करता है.

बिहार के किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जिलों के जरीए नेपाल से मानव तस्करी का धंधा फलफूल रहा है. ज्यादातर बच्चे गरीब और अनपढ़ परिवार के ही गायब होते हैं और ऐसे बच्चों के मांबाप अपने बच्चे के गायब होने की शिकायत थानों में दर्ज करने से घबराते हैं. उधर पुलिस महकमा भी मानव तस्करी को ले कर लापरवाह बना हुआ है.

पुलिस हैडक्वार्टर ने सीमांचल के सभी जिलों के एसपी को निर्देश दिया था कि मानव तस्करी के शिकार हुए बच्चों के फोटो, नाम और पता समेत पूरी जानकारी को महकमे की वैबसाइट पर अपलोड किया जाए. इस निर्देश को दिए सालभर से ज्यादा का समय बीत गया है, पर वैबसाइट को अपडेट नहीं किया जाता है. वैबसाइट पर कटिहार जिले के 18 बच्चों के गायब होने की जानकारी दर्ज है, पर 74 बच्चे गायब हुए हैं.

मगध यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं कि बच्चों के स्कूल, कालेज या कोचिंग, खेलनेकूदने, बाजार वगैरह जाने पर हर समय, हर जगह उन के मांबाप का नजर रखना मुमकिन नहीं है. अकसर ऐसा होता है कि किसी बच्चे के पिता दफ्तर में हैं, तो मां बाजार में. इस बीच उन का बच्चा स्कूल से घर आ जाता है और पड़ोस के ही अंकल या आंटी के पास मजे में रहता है. वे ही बच्चे को खाना भी खिला देते हैं. इस सब के पीछे इनसानी भरोसा ही काम करता रहा है. अब कुछ खुराफाती सोच वाले लोगों की वजह से यह भरोसा ही कठघरे में खड़ा हो चुका है.

मासूमों को बचाने के लिए उन के मांबाप को खासतौर पर सावधान रहने की जरूरत है. वे अपने बच्चों को यह बताते और समझाते रहें कि उन्हें किस के साथ कहीं जाना है या नहीं जाना है. आंखें मूंद कर किसी पर भी यकीन नहीं करना है, चाहे आप का उस से कितना भी करीबी या गहरा रिश्ता हो.

बच्चों को बताएं कि स्कूल आनेजाने के दौरान कोई आदमी अपने साथ चलने को कहे, तो न जाएं. बच्चों के दोस्तों और उन के मातापिता के मोबाइल फोन नंबर और घर के पते अपने पास जरूर रखें.

परिवार या पड़ोस के ऐसे लोगों के पास बच्चों को न जाने दें, जिन का आपराधिक रिकौर्ड रहा हो. किसी अनहोनी का डर होने पर तुरंत पुलिस को सूचना दें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें