अपने बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप की हरकतों ने उन की टैंशन में कई गुना ज्यादा इजाफा कर दिया है. बेटी मीसा भारती को राजनीति में सैटल करने लिए 2 बार लोकसभा चुनाव के अखाड़े में उतारा गया, लेकिन उन्हें दोनों बार हार का मुंह देखना पड़ा.

कुलमिला कर राबड़ी देवी हर तरफ से परेशानियों से घिरी हुई हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि लालू प्रसाद यादव की गैरमौजूदगी में वे किस तरह से पार्टी और परिवार को पटरी पर लाएं?

राबड़ी देवी पार्टी में नई जान फूंकने और परिवार को एकजुट करने की तमाम कोशिशें कर रही हैं, पर अपने पति की तरह सियासी दांवपेंच के खेल में वे माहिर नहीं हैं. साल 2020 में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में राजद को नए सिरे से खड़ा करना राबड़ी देवी के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है.

लालू प्रसाद यादव की गैरमौजूदगी में राजद ने राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव की अगुआई में पिछला लोकसभा चुनाव लड़ा था, पर वे दोनों अपनी पार्टी को एक भी सीट नहीं दिला सके. 40 में से 20 लोकसभा सीटों पर राजद ने अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी उम्मीदवार को जीत नहीं मिली. मीसा भारती भी पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से जीत नहीं सकीं.

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साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद राजद और उस के घटक दलों को मिली करारी हार की समीक्षा के लिए संयुक्त समिति बनाने की बात अभी तक हवा में है. अब तक घटक दलों की एक भी मीटिंग नहीं हो सकी है. तेजस्वी यादव तकरीबन 3 महीने तक सियासी हलचल से भी गायब रहे.

राजद में उथलपुथल से लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी चिंतित हैं. लालू प्रसाद यादव ने अपने दोनों बेटों को संदेश भिजवाया है कि पार्टी के कार्यकर्ता हताश और निराश हैं. कार्यकर्ता ही अब पार्टी पर कई तरह के सवाल उठाने लगे हैं. वे कहने लगे हैं कि पार्टी को खूनपसीने से सींच कर खड़ा करने वाले लालू प्रसाद यादव जेल में हैं और उन का परिवार सत्ता के लालच में आपस में ही सिरफुटौव्वल कर रहा है.

लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटों से साफ कह दिया है कि अगर पार्टी और परिवार में से एक को बचाने की नौबत आएगी, तो वे पार्टी को चुनेंगे.

उन की इस चेतावनी के बाद ही पटना से गायब तेजस्वी यादव वापस लौटे और पार्टी कार्यक्रम में भाग लिया.

21 अगस्त, 2019 की रात वे पटना जंक्शन के पास दूध मार्केट को तोड़ने के विरोध में धरने पर बैठे.

गौरतलब है कि दूध मार्केट को साल 1991 में लालू प्रसाद यादव ने ही बनवाया था. इस से पहले राजद की सदस्यता मुहिम की समीक्षा को ले कर 16 अगस्त, 2019 को बुलाई गई बैठक में तेजस्वी यादव नहीं पहुंचे थे. 4 घंटे तक चली बैठक में उन का इंतजार होता रहा.

18 अगस्त, 2019 को दोबारा बैठक बुलाई गई और उस में तेजस्वी यादव के मौजूद रहने का दावा राजद नेताओं ने किया. राबड़ी देवी बैठक में मौजूद थीं. उन्होंने कहा कि विरोधी कहते हैं कि राजद टूट गया है, लेकिन पार्टी पहले से ज्यादा मजबूत हो रही है.

राबड़ी देवी ने पार्टी नेताओं से कहा कि लोकसभा चुनाव की हार को भूल कर नए सिरे से पार्टी को एकजुट कर आगे बढ़ाने के काम में लग जाएं. राज्य के हर बूथ पर कम से कम 100 सदस्य बनाने पर जोर दिया. गौरतलब है कि बिहार में 72,000 बूथ हैं.

पार्टी सूत्रों की मानें तो तेजस्वी यादव पार्टी पर एकाधिकार के साथ कानूनी पचड़ों से भी नजात चाहते हैं. पार्टी चलाने के लिए वे पार्टी और परिवार दोनों तरफ से कोई दखल नहीं चाहते हैं.

16 अगस्त को राबड़ी देवी ने तेजस्वी यादव को 3 बार फोन कर के पार्टी की बैठक में आने के लिए कहा, पर तेजस्वी ने उन की बात नहीं सुनी. पार्टी के सीनियर नेता भी तेजस्वी के इस रवैए से खासा नाराज हैं.

शिवानंद तिवारी कहते हैं कि तेजस्वी यादव के मीटिंग में रहने या नहीं रहने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, वहीं रघुवंश प्रसाद सिंह मजाकिया लहजे में यहां तक कह गए कि वे हमारे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और अब सीधे शपथ लेने ही आएंगे.

भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि जनता के पैसों को गटकने और परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली पार्टी राजद की नैया को उस के मांझी ही डुबा रहे हैं, वहीं जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्य प्रवक्ता संजय सिंह कहते हैं कि राजद की अगुआई कर भाजपा और जद (यू) को चुनौती देने का दावा करने वाले तेजस्वी यादव भगोड़े बन कर रह गए हैं. वे जानते हैं कि राजद की नैया डूब चुकी है और डूबते जहाज की सवारी कोई नहीं करना चाहता है.

साल 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद से राबड़ी देवी ने धीरेधीरे सियासी गलियारों से दूरियां बढ़ा ली थीं. मीडिया से भी उन्होंने खामोश दूरी बना रखी

थी. बिहार में सब से लंबे समय तक राज करने वाली दूसरी मुख्यमंत्री रही राबड़ी देवी फिर अपनी मनपसंद जगह ‘किचेन’ की ओर लौट चुकी थीं.

राबड़ी देवी 25 जुलाई, 1997 से 11 फरवरी, 1999 तक मुख्यमंत्री रही हैं. उस के बाद 3 मार्च, 1999 से 2 मार्च, 2000 तक और फिर 11 मार्च, 2000 से 6 मार्च, 2005 तक वे मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठीं. इस मामले में उन्होंने अपने पति लालू प्रसाद यादव को भी मात दे दी. वे तकरीबन 7 साल तक मुख्यमंत्री रहे थे. राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकष्ण सिंह का नाम सब से लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकौर्ड दर्ज है. वे तकरीबन 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे थे.

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राजद की कमान नए हाथ में देने की तैयारी?

साल 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के लिए लालू प्रसाद यादव अपनी पार्टी राजद को नए सिरे से एकजुट कर सियासी अखाड़े में उतारना चाहते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद राजद अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. लालू प्रसाद यादव के बगैर राजद बिखर रहा है. इसी चिंता

को ले कर राजद के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह और विधानसभा के अध्यक्ष रहे उदय नारायण चौधरी ने रांची रिम्स में लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की थी.

इस साल के आखिर तक राजद को नए तेवर और मुखिया से लैस करने की कवायद शुरू हो चुकी है. राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे को हटा कर नए अध्यक्ष की खोज भी जारी है.

तेजस्वी यादव की अगुआई में लोकसभा चुनाव लड़ने पर राजद को कोई फायदा नहीं हुआ था. इस से तेजस्वी यादव भी हताश हैं और पार्टी के कई नेताओं में नाराजगी भी है. राजद ने 10 अक्तूबर, 2019 तक 75 लाख पार्टी सदस्य बनाने का टारगेट रखा है.

राजद का अगला प्रदेश अध्यक्ष बनने में विधानसभा के अध्यक्ष और राजद के संस्थापक सदस्य रहे उदय नारायण चौधरी का नाम सब से आगे है. हालांकि वे 10 साल तक विधानसभा के अध्यक्ष रहे हैं और जद (यू) का साथ देते रहे हैं. उन पर राजद को तोड़ने का आरोप लगाते हुए लालू प्रसाद यादव ने खुद साल 2014 में विधानसभा तक मार्च किया था.

दूसरा नाम विधानपरिषद के उपसभापति रहे सलीम परवेज का है जो पिछड़ी अंसारी बिरादरी से आते हैं. इस के अलावा दलित सिपाही शिवचंद्र राम और तनवीर हसन के नाम भी चर्चा में हैं.

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