आनंद ओझा और काजल रघवानी की बहुप्रतीक्षित फिल्म “रण” का फर्स्टलुक हुआ आउट

भोजपुरी सिनेमा की सफल जोड़ियों में शुमार आनंद ओझा (Anand Ojha) और काजल रघवानी (Kajal Raghavani) के बहुप्रतीक्षित फिल्म “रण” (Rann) का फर्स्ट लुक जारी कर दिया गया है. इस फिल्म का दर्शकों को काफी बेसब्री से इंतजार था. इस फिल्म में अभिनेता आनंद ओझा हैरतअंगेज अवतार में नजर आयेंगे जो फिल्म के फर्स्ट लुक में भी नजर आ रहा है. पोस्टर में आनंद ओझा एक एंग्री यंग मैन (Angry Young Man) के रूप में नजर आ रहे है जो देखने मे काफी दिलचस्प लग रहा है. इस लुक नें भोजपुरी बेल्ट के दर्शकों में “रण” को लेकर उत्सुकता और भी बढ़ा दी है. इससे यह अंदाज लगाया जा रहा ही की फिल्म जब  सिनेमा घरो में दस्तक देगी तब लोगों का उत्साह किस लेवल पर होगा.

ये भी पढ़ें- यूट्यूब क्‍वीन आम्रपाली दुबे का धमाकेदार गाना ‘लगा के वैसलीन’ हुआ Viral, देखें Video

bhojpuri-film-rann

कात्यायन फिल्म्स क्रियेएशन के बैनर तले और निर्देशक “चन्द्र पंत” (Chandra Pant) के निर्देशन में बनी बड़े बजट वाली इस फिल्म के इस साल अप्रैल महीनें में रिलीज होने की पूरी उम्मीद है. इस खबर की पुष्टि खुद फिल्म के अभिनेता आनंद ओझा, निर्माता “अरूण कुमार मिश्रा” (Arun Kumar Mishra) और निर्देशक चन्द्र पंत ने की हैं. फिल्म के निर्देशक चन्द्र पंत ने बताया की फिल्म का पोस्ट प्रोड्क्सन लगभग पुरा हो चुका है और इसकी डबिंग की जा रही है. जिससे उम्मीद लगाईं जा रही है की इस फिल्म का प्रदर्शन अप्रैल महीनें किया जा सकेगा.

इस फिल्म में आनंद ओझा और अभिनेत्री काजल रघवानी के साथ सी.पी भट्ट (C.P. Bhatt), देव सिंह, (Dev Singh) अयाज खान, (Ayaaz Khan) नरेन खड़का, (Naren Khadka) मनोज सिंह टाईगर, (Manoj Singh Tiger) हर्षित श्रीवास्तव, (Harshit Shrivastav) दिनेश पांडे (Dinesh Pandey) भी मुख्य भुमिका मे नजर आयेंगे.

rann-1

ये भी पढ़ें- Hotness के मामले में बौलीवुड हिरोइन्स से कम नहीं ये भोजपुरी एक्ट्रेस, देखें Photos

फिल्म के निर्माता “अरूण कुमार मिश्रा” और सह निर्माता “ज्योति दिनेश पांडे” हैं. संगीत “धनंजय मिश्रा” और गीत “बीरेन्द्र पांडे” का है.  फिल्म के पीआरओ की जिम्मेदारी “आर्यन पांडे” के कंधे पर हैं. फिल्म के पीआरओ “आर्यन पांडे” नें बताया की  इस फिल्म को लेकर काजल राघवानी और आनंद ओझा बहुत उत्साहित है क्यों की यह फिल्म उनके और मेरे ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल है.

औरत कैब ड्राइवर

जम्मू के कठुआ इलाके की रहने वाली एक डोगरी लेखिका को दिल्ली के एक साहित्यिक कार्यक्रम में आने का न्योता दिया गया. होटल में रुकने के साथसाथ हवाईजहाज से आनेजाने की टिकट भी भेजी गई. पर उन लेखिका को अकेले दिल्ली आने में डर लग रहा था. सोचा कि दिल्ली तो हवाईजहाज से पहुंच जाएंगी, पर उस से आगे इतने बड़े शहर में अपने होटल कैसे पहुंचेंगी? उन का डर जायज था, क्योंकि दिल्ली में अकेली किसी औरत या लड़की को लूट लेने की खबरें वे रोजाना अखबारों में पढ़ लेती थीं.

लेकिन उन लेखिका ने हिम्मत नहीं हारी और इंटरनैट पर इस का समाधान ढूंढ़ना शुरू किया. थोड़ी सी मेहनत करने के बाद उन्हें पता चला कि दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल हवाईअड्डे पर एक अनूठी कैब सेवा की शुरुआत की गई है. इस का नाम ‘सखा कैब’ रखा गया है. इस कैब सेवा की खास बात यह है कि इसे केवल महिला ड्राइवर ही चलाएंगी और इस कैब सेवा का फायदा भी केवल महिलाएं या फिर परिवार के साथ सफर करने वाले लोग ही उठा पाएंगे.

ये भी पढ़ें- दाई से डिलीवरी न कराएं

इस कैब सेवा को एक निजी स्वयंसेवी संस्था आजाद फाउंडेशन की मदद से खासतौर पर अकेले सफर कर रही महिलाओं की हिफाजत को ध्यान में रख कर शुरू किया गया है, जिस के तहत महिलाओं को ड्राइविंग के साथसाथ सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग भी दी जाती है. इस के अलावा जीपीएस के जरीए कैब का संपर्क सीधा कंट्रोल रूम से रहता है, जिस से किसी भी हालत में सूचना नजदीकी पुलिस स्टेशन तक पहुंच जाएगी.

इस सेवा का नाम ‘वुमन विद ह्वील्स’ रखा गया है और इस का दिल्ली के किसी भी हिस्से में फायदा उठाया जा सकता है. इस कैब सेवा में मर्दों को बैठने की तभी इजाजत दी जाती है, जब वे किसी महिला या अपने परिवार के साथ हों.

कमजोर बैकग्राउंड की महिलाओं को पेशेवर ड्राइवर बनने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है.

ये भी पढ़ें- बेटी को दी गई खुशी बनी मुहिम

‘सखा’ के नाम ऐसी और कई उपलब्धियां हैं, जो एकदम नई हैं. जैसे, इस ने डीटीसी को पहली महिला बस ड्राइवर दी थी. साथ ही, यूनिसैफ, अमेरिकी दूतावास, लीला होटल, दिल्ली महिला आयोग, इंदौर नगरनिगम, कोलकाता के पार्क होटल और ओबरौय होटल को भी पहली महिला ड्राइवर देने का क्रेडिट ‘सखा’ को ही जाता है.

गानों के बिना होली अधूरी – अनन्या सिंह, लोक गायिका

जब लोक गायकी की बात होती है तो होली (Holi) की याद बरबस ही आ जाती है. होली ऐसा त्योहार है जो अपनी मौजमस्ती के लिए जाना जाता है. गानों के बिना होली की कल्पना अधूरी होती है. होली खेलने के दौरान गाए जाने वाले फाग की अपनी अलग अहमियत होती है.

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली युवा लोक गायिका अनन्या सिंह (Ananya Singh) होली के गाने गाती हैं और मशहूर स्टेज कलाकार हैं. वे कहती हैं कि होली अकेला ऐसा त्योहार है, जो गानों के बिना अधूरा होता है. होली की मस्ती तभी आती है, जब होली के गाने बज रहे हों. इस में भोजपुरी के साथसाथ अवधी और ब्रज के गानों की अपनी अलग अहमियत होती है. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

आप को होली के गानों का म्यूजिक इंडस्ट्री पर क्या असर दिखता है?

होली अब केवल त्योहार नहीं रह गया है, बल्कि यह तमाम तरह के बिजनैस को ले कर आता है. म्यूजिक इंडस्ट्री पर होली का गहरा असर है. होली आने के 6 महीने पहले से ही कलाकार होली के गाने तैयार करने लगते हैं.

ये भी पढ़ें- अपने बोल्ड फोटोशूट को लेकर फिर ट्रोल हुई दीपिका पादुकोण, यूजर्स ने किए ऐसे कमेंट्स

पहले इन के लिए कैसेट बनते थे, पर अब होली के गानों को रिकौर्ड कर के उन्हें यूट्यूब के जरीए लोगों तक पहुंचाया जाता है.

वैसे तो होली में नएपुराने तमाम तरह के गाने सुने जाते हैं, पर हर कलाकार कुछ न कुछ नया भी रिकौर्ड करता है. होली के गानों की वजह से म्यूजिक इंडस्ट्री में रौनक आ जाती है.

रिएलिटी शो में कैसे काम शुरू हुआ?

सब से पहले संस्कृति विभाग की वर्कशौप से साल 2017 में मुझे मंडल लैवल पर कामयाबी मिली. साल 2018 में महुआ प्लस सीरियल के ‘चल बलिए कुरुक्षेत्र’ के टौप 10 में चुनी गई. इस के बाद मैं स्टेज शो करने लगी, फिर गोरखपुर से नोएडा आ गई.

यहां पर मैं ने कई राजनीतिक नेताओं के लिए चुनाव प्रचार किया. इन में नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, महेश शर्मा, वीके सिंह और पंकज सिंह प्रमुख रहे हैं. मैं ने स्टेज पर शब्बीर कुमार के साथ भी काम किया है.

आप अपने अब तक के कैरियर को कैसे देखती हैं?

मैं प्लेबैक सिंगर के रूप में फिल्मों में काम करना चाहती हूं. इस के अलावा मैं फोक कल्चर का संरक्षण भी करना चाहती हूं. हम ने एक संस्था भी बनाई है, जिस के जरीए हम गरीब बच्चों को गायकी में प्लेटफार्म देना चाहते हैं. पटेल संस्कृति संस्थान इस में हमारी मदद कर रहा है.

ये भी पढ़ें- होली पर लव-कुश का पर्दाफाश करेंगे कार्तिक-नायरा, ऐसे होगा खुलासा

‘मिस बौलीवुड’ नामक प्रतियोगिता में मैं ने हिस्सा लिया और टौप 5 में अपनी जगह बनाई. मैं स्टेट लैवल की वौलीबाल खिलाड़ी रही हूं. अब मेरा फोकस सिंगिग और स्टेज शो पर ही है. इस के साथसाथ मैं टैलीविजन या फिल्मों में ऐक्टिंग भी करना चाहती हूं.

अपने बोल्ड फोटोशूट को लेकर फिर ट्रोल हुई दीपिका पादुकोण, यूजर्स ने किए ऐसे कमेंट्स

बौलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) इधर कुछ दिनों से लगातार किसी न किसी कारणों से ट्रोलर्स के निशाने पर है. बीते दिनों छपाक (Chhapaak) फिल्‍म रिलीज होने के पहले दीपिका जेएनयू (JNU) में छात्रों का सपोर्ट करने पहुंची थीं जिसके वजह से वह उसके बाद विवादों में घिर गईं और इस वजह से उन्हें ट्रोलर्स के तानों का निशाना बनना पड़ा था. यही वजह है की दीपिका को सोशल मीडिया पर छपाक फिल्‍म के बायकाट (Boycott) का सामना करना पड़ा. इस कारण से तेजाब पीडित महिलाओं पर बनी इस फिल्म को काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

ये भी पढ़ें- उर्वशी रौतेला की बिकनी फोटोज हुईं वायरल, सोशल मीडिया पर ऐसे बना मजाक

नए फोटोशूट की वजह से हुईं ट्रोल…

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Deepika Padukone (@deepikapadukone) on

अब एक बार फिर वह ट्रोलर्स के निशाने पर हैं लेकिन इस बार का कारण पिछली बार से उलट है. दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) इस बार समुद्र बीच कराये गए फोटोशूट (Photoshoot) के चलते ट्रोलर्स के निशाने पर हैं. उन्होंने अपने इन्स्टाग्राम (Instagram) और ट्विटर (Twitter) अकाउंट पर बोल्ड अंदाज में खिंचाये गए फोटो शेयर किये जिसके बाद उनके इस पोस्ट पर ट्रोलर्स नें मीम्स बना कर दीपिका का मजाक बनाना शुरू कर दिया.

ये भी पढ़ें- होली पर लव-कुश का पर्दाफाश करेंगे कार्तिक-नायरा, ऐसे होगा खुलासा

यूजर्स ने किए ऐसे कमेंट्स…

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Deepika Padukone (@deepikapadukone) on

ट्विटर पर किये गये फोटो पोस्ट के बाद तमाम यूजर नें इनके इस फोटो पर मजे लिए. कुत्ते कमीने नाम के यूजर नें मीम्स बनाते हुए लिखा है “बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना” वहीं भानु प्रताप नाम के यूजर नें लिखा है “CAA का विरोध कर रहीं है क्या?” राजेश वस्तारपरा ने लिखा है “शाहीन बाग चली जा” डा. कपिल परमार ने लिखा है “ये चीथड़े क्यों डाल रखे हैं” हिन्द नें कमेन्ट किया है “Biocatt दीपिका all films”. माना जा रहा है की शादी के बाद दीपिका का यह सबसे ज्यादा हौट फोटोशूट है.

ये भी पढ़ें- क्या शहनाज के स्वयंवर वाले शो करने से नाराज हैं सिद्धार्थ, जानें एक्टर का जवाब

दीपिका का ट्विटर पोस्ट-

कुत्ते कमीने नाम के यूजर का कमेन्ट लिंक –

राजेश वस्तारपरा का कमेन्ट लिंक –

ये भी पढ़ें- जैकलीन के बाद हिमांशी खुराना के साथ रोमांस करेंगे असीम रियाज, पोस्टर हुआ रिलीज

कपिल परमार का कमेन्ट लिंक-

हिन्द का कमेन्ट लिंक –

दाई से डिलीवरी न कराएं

फिल्म ‘दंगल’ तो आप सब को याद होगी ही. हरियाणा का एक ठेठ देहाती पहलवान जब साधनों की कमी में खुद कुश्ती में कोई बड़ा कारनामा नहीं कर पाता है, तो उसे अपनी आने वाली औलाद से उम्मीद बंध जाती है. औलाद भी लड़का ही चाहिए, क्योंकि तब समाज में लड़कियों को लड़कों की तरह लंगोट बांध कर अखाड़े में उतरने की तो सोचिए भी मत, ढंग से स्कूल में भेज दो तो गनीमत समझी जाती थी.

बेटे के चक्कर में पहलवान महावीर फोगाट बने आमिर खान के एक के बाद एक 4 बेटियां पैदा हो जाती हैं. बाद में इस फिल्म की कहानी क्या मोड़ लेती है, उस पर ज्यादा बात नहीं करेंगे, पर हां एक गंभीर मुद्दे पर जरूर सोचेंगे कि फिल्म में आमिर खान की पत्नी बनी साक्षी तंवर की जचगी कहां और कैसे होती है.

महावीर फोगाट का घर एक ऐसे किसान का घर था, जहां सुखसुविधाओं के नाम पर जरूरत का कुछ पुराना सामान, खाना बनाने के लिए चूल्हा और ईंधन की लकडि़यां ही थीं. घर की जर्जर होती दीवारों के बंद कमरे के बाहर महावीर फोगाट अपनी औलाद की पहली रुलाई सुनने के लिए बेचैन खड़ा होता है.

दरवाजा खुलता है तो एक बुढि़या दाई मायूस सा चेहरा लिए बेटी होने की खबर देती है. ऐसा एक बार नहीं, बल्कि 4 बार होता है, क्योंकि महावीर फोगाट 4 बेटियों का बाप जो बनता है. पर हर बार जचगी दाई से ही होती है.

ये भी पढ़ें- बेटी को दी गई खुशी बनी मुहिम

वहां पर गनीमत यह होती है कि उस दाई से कोई हादसा नहीं होता है. यह भी कह सकते हैं कि आज से 25-30 साल पहले तक दाई से जचगी कराने पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता था. लेकिन आज जब गांवदेहात के आसपास के कसबे या छोटे शहर में लेडी डाक्टर मिल जाती हैं, तो भी बहुत से लोग जचगी गांव में किसी दाई से ही करा लेते हैं.

यूनिसैफ द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, दुनियाभर में पेट से होने  और जचगी से जुड़ी समस्याओं के चलते तकरीबन 2,90,000 औरतों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.

अंदाजा है कि हर साल 28,00,000 गर्भवती औरतों की मौत हो जाती है, जिस के पीछे की सब से बड़ी वजह सही पोषण और उचित देखभाल का न मिल पाना होता है.

इतना ही नहीं, दुनियाभर में एकतिहाई नवजात बच्चों की मौतें अपने जन्म के दिन ही हो जाती हैं, जबकि बाकी तीनचौथाई बच्चे जन्म के एक हफ्ते के भीतर ही मर जाते हैं.

दिक्कत यह है कि आज भी भारत के बहुत से गांवों में बच्चा पैदा होने को गंभीरता से नहीं लिया जाता है, जबकि यह एक तरह से बच्चे के साथसाथ उस औरत का भी दूसरा जन्म होता है, जो मां बनती है. लिहाजा, जचगी ऐसी किसी बूढ़ी औरत से करा दी जाती है, जो दिल की थोड़ी पक्की जरूर होती है, पर उसे जचगी के समय होने वाले खतरों की उतनी जानकारी नहीं होती है, जितनी किसी माहिर डाक्टर को होती है.

इस सिलसिले में फरीदाबाद के मेवला महाराजपुर गांव की एक आंगनबाड़ी महिला हैल्पर ने बताया कि यहां की कच्ची कालोनियों में रहने वाले ज्यादातर लोग दूसरे राज्य के गरीब परिवारों के होते हैं. सरकारी अस्पताल में बच्चा जनने के लिए आधारकार्ड जैसे पहचानपत्र की जरूरत होती है और बहुत से लोगों के पास वह नहीं होता है. लिहाजा, ऐसी औरतें घर पर ही अपनी सगीसंबंधी औरतों या पड़ोस की औरतों की मदद से जचगी करा लेती हैं.

इसी गांव की रहने वाली रेखा का दूसरा बेटा गांव में ही दाई के हाथों पैदा हुआ था, जबकि पहला बेटा सरकारी अस्पताल में.

रेखा के मुताबिक, घर हो या अस्पताल, सारा काम तो जच्चा को ही करना होता है. अगर वह शरीर और मन से मजबूत है तो उस की मददगार कोई डाक्टर है या दाई, कोई फर्क नहीं पड़ता है.

पर, रेखा का यह बयान भावुकता पर ज्यादा टिका है. इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए, कोई औरत पहली बार मां बनने वाली है और वह किसी ऐसे गांव में रहती है, जहां आसपास प्रसूति केंद्र तो है, लेकिन उस की ससुराल वाले गांव की दाई से ही जचगी कराना चाहते हैं.

चूंकि वह औरत पढ़ीलिखी है और जचगी के दौरान अपने और होने वाले बच्चे के लिए कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है, तो अपनी ससुराल वालों की सलाह को दरकिनार कर के वह डाक्टर से मिलती है और समयसमय पर अपनी जांच कराती है. वहां डाक्टर द्वारा खून, पेशाब, ब्लड प्रैशर, वजन, पोषण वगैरह की जांच होते रहने से उस औरत को बहुत फायदा होता है, जो एक दाई उसे कभी नहीं बता पाएगी.

याद रखिए, मां बनने वाली जिन औरतों का ब्लड ग्रुप आरएच नैगेटिव होता है, उन के बच्चे की पीलिया या दूसरी किसी दिक्कत से मौत हो जाने का डर रहता है. लेकिन समय से पहले आरएच नैगेटिव ब्लड ग्रुप पता चल जाने पर सावधानी बरती जा सकती है और बच्चे में नया खून ‘ट्रांसफ्यूजन’ से यानी बदल कर उस की जान बचाई जा सकती है. गांवदेहात में क्या, बहुत सी शहर की औरतों को इस बारे में शायद ही जानकारी हो, दाई की तो छोड़ ही दीजिए.

ये भी पढ़ें- नक्सलियों की “हथेली” पर छत्तीसगढ़!

बहुत सी औरतें अपनी दाई से यह बात छिपा जाती हैं कि उन को पहले गर्भपात भी हो चुका है यानी उन का पेट गिर चुका है. उन की यही लापरवाही खुद उन के लिए और आने वाले बच्चे के लिए खतरनाक हो सकती है, क्योंकि अगर ऐसा हुआ है, तो दाई कुछ नहीं कर पाएगी, जबकि माहिर डाक्टर समय रहते जच्चा को बता देगी कि उसे क्याक्या सावधानियां बरतनी होंगी.

इस सिलसिले में दिल्ली के बीएल कपूर अस्पताल की गाइनोकौलोजिस्ट डाक्टर शिल्पी सचदेव ने बताया, ‘‘आमतौर पर गांवदेहात में लोग घर पर ही किसी दाई से जचगी इसलिए करा लेते हैं, क्योंकि वे प्राइवेट अस्पताल के खर्च से बचना चाहते हैं या फिर सरकारी अस्पताल में लंबी लाइनों में नहीं लगना चाहते हैं, जबकि गांव में जच्चा का कोई टैस्ट नहीं होता है. मां और बच्चे का वजन कितना है या पेट में बच्चे का सिर नीचे है या फिर उलटा है, यह भी दाई को नहीं पता होता है.

‘‘अगर मां का ब्लड ग्रुप नैगेटिव है और पिता का ब्लड ग्रुप पौजिटिव है तो जचगी में बच्चे को दिक्कत हो सकती है. इस के लिए एक इंजैक्शन लगाया जाता है. अगर पहली जचगी में यह इंजैक्शन नहीं लगता है, तो दूसरी जचगी में बच्चे को बहुत नुकसान हो सकता है.

‘‘दाई के साथ सब से बड़ी समस्या यह होती है कि बहुत बार वह साफसफाई का ध्यान नहीं रखती है. वह दस्ताने नहीं पहनती है. इस से मां और बच्चे दोनों को इंफैक्शन होने का खतरा बना रहता है. दाई के पास टांके लगाने का भी कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होता है. दूसरे अहम उपकरण भी नहीं होते हैं.

‘‘अगर जचगी के दौरान खून ज्यादा बहने लगता है, तो दाई को सही तकनीक नहीं पता होती है कि कैसे उस पर काबू पाया जाए. इस से मां की जान को खतरा हो सकता है.

‘‘कभीकभार तो जचगी के बाद गर्भनाल अंदर ही रह जाती है. यह भी एक बहुत बड़ी समस्या है. अगर बच्चा एकदम से नहीं रोया या उस को औक्सीजन नहीं मिल पा रही है, उस के फेफड़े नहीं फूल रहे हैं, तो दाई को इस से निबटने का तरीका पता ही नहीं होता है, जबकि अस्पताल में आधुनिक उपकरण होते हैं, जिन की मदद से डाक्टर ऐसी किसी समस्या का हल तुरंत निकाल लेता है.

‘‘ऐसे बहुत से केस सुनने में आते हैं कि जब किसी बच्चे में पूरी औक्सीजन नहीं पहुंचने से वे विकलांग तक हो जाते हैं या दिमागी तौर पर वे अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं. अगर किसी औरत को थायराइड की दिक्कत होती है, तो इस का बुरा असर पैदा होने वाले बच्चे पर भी पड़ सकता है.

‘‘किसी मां के पेट में पल रहे बच्चे में अगर कोई बनावट संबंधी खराबी है, तो गांव में उस का पता ही नहीं चल पाता है, जबकि डाक्टर इन सब बातों की पूरी जानकारी रखता है.

‘‘दाई गर्भनाल काटने के लिए अच्छे ब्लेड का इस्तेमाल नहीं करती है. कपड़ा भी कैसा है, इस का ज्यादा ध्यान नहीं रखती है. इस से इंफैक्शन का खतरा बढ़ जाता है.’’

ये भी पढ़ें- फैल रहा है सेक्सी कहानियों का करंट

पहले तो सुविधाएं न होने और जानकारी की कमी में लोग दाई से जचगी करा लेते थे और अगर कोई हादसा हो जाता था तो उसे ऊपर वाले का फैसला मान कर चुप्पी साध लेते थे, पर अब ऐसा करने या सोचने की कोई वजह नहीं है.

याद रखिए, अगर बच्चे सेहतमंद पैदा नहीं होंगे तो वे बड़े हो कर अपनी पूरी ताकत से देश को आगे बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे. दाई के पास  नहीं, बल्कि जचगी के लिए डाक्टर के पास जाएं, जच्चाबच्चा को सहीसलामत घर वापस लाएं.

होली पर लव-कुश का पर्दाफाश करेंगे कार्तिक-नायरा, ऐसे होगा खुलासा

स्टार प्लस (Star Plus) का पौपुलर सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehelata Hai) ने अलग ही ट्रैक पकड़ लिया है. ऐसा देखने में आ रहे है कि त्रिशा (Trisha) को न्याय और लव-कुश (Luv-Kush) का सजा दिलाने में कार्तिक (Mohsin Khan) और नायरा (Shivangi Joshi) को काफी समय से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. आए दिन कार्तिक (Kartik) और नायरा (Naira) की जिंदगी में कोई ना कोई नया तुफान आ जाता है जिससे कि उन्हें काफी दिक्कत हो रही है. बीते एपिसोड्स में आपने देखा कि कार्तिक का एक्सीडेंट हो गया है जिस वजह से डौक्टर ने उसे घर पर ही आराम करने को कहा है.

ये भी पढ़ें- सुरेखा ने कायरव पर लगाया चोरी का इल्जाम, दादी ने नायरा को किया ब्लैकमेल

होली के दौरान लव-कुश करेंगे अपने गुनाह कुबूल…

कार्तिक को लगी गंभीर चोटों की वजह से अब सारे काम और कोर्ट कचहरियों के चक्कर अकेले नायरा को ही लगाने पड़ रहे हैं. खबरों की माने तो इस शो में एक नया ट्विस्ट आने वाला है और तो और आने वाले एपिसोड्स में दर्शकों को खूब हंगामें देखने को मिलने वाले हैं. जी हां, बात करें शो के आने वाले एपिसोड की कार्तिक और नायरा कुछ ऐसा प्लैन कर रहे हैं होली के दौरान लव-कुश अपने आप ही अपनी गलती कुबूल कर लेंगे.

ये भी पढ़ें- लव-कुश की वजह से कार्तिक-नायरा ने छोड़ा घर, कायरव से भी हुए दूर

भांग के नशे में उगलेंगे सारी सच्चाई…

जहां एक तरफ होली का जश्न हो रहा होगा वहीं दूसरी तरफ कार्तिक और नायरा लव-कुश के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने में लगे होंगे और इसी दौरान वे दोनों एक प्लैन बनाएंगे जिससे कि लव-कुश खुद अपने मुंह से ही अपने गुनाह सबके सामने रख डालेंगे. होली के प्रोग्राम में लव-कुश दोनों भांग के नशे में डूबे होंगे जिसका फायदा उठा कर कार्तिक नायरा इन दोनों के मुंह से इनका सच उगलवा लेंगे. ऐसे में देखना ये होगा कि गोयनका परिवार अब लव-कुश को बचाने के लिए क्या कदम उठाएंगे.

ये भी पढ़ें- कायरव की इस हरकत से कार्तिक को होगा अपनी गलती का एहसास, देगा नायरा का साथ

नायरा और झावेरी के बीच होगी जमकर लड़ाई…

त्रिशा की अगली सुनवाई में नायरा और झावेरी के बीच जमकर बहस होने वाली है जिसके चलते नायरा झावेरी पर कार्तिक के एक्सीडेंट का भी इल्जाम लगाएगी. इतना ही नहीं बल्कि नायरा और झावेरी के बहस के चलते नायरा गुस्से में झावेरी का कौर्लर तक पकड़ती दिखाई देगी. अब देखने वाली बात ये होगी कि कार्तिक और नायरा की त्रिशा को न्याय दिलाने की लड़ाई में और कौन कौन सी मुश्किलें आ सकती हैं.

ये भी पढ़ें- शो में आया नया ट्विस्ट, एक बार फिर अलग हुईं कार्तिक-नायरा की राहें

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड : सीपी भट्ट को मिला बेस्ट कौमेडियन का अवार्ड

भोजपुरी फिल्म अभिनेता सीपी भट्ट (CP Bhatt) को सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड (Saras Salil Bhojpuri Cine Award) में ज्यूरी द्वारा बेस्ट कौमेडियन (Best Comedian) का अवार्ड दिया गया. यह अवार्ड वर्ष 2019 में प्रदर्शित फिल्म “ये इश्क बड़ा बेदर्दी” में किये गए दमदार कौमेडी रोल के लिए दिया गया सीपी भट्ट ने इस अवार्ड शो की एंकरिंग भी की और औडियंस को अपने कामेडी के जरिये हंसाया भी. उन्होंने खुद गाने भी गाये और ठुमके भी लगाये.

वैसे भोजपुरी फिल्मों में अभिनय के क्षेत्र में बादशाहत कायम करने वाले हरफनमौला अभिनेता सीपी भट्ट का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है. सीपी भट्ट भोजपुरी फिल्मों के एक मात्र अभिनेता हैं जो हर रोल में फिट बैठते हैं. इसी लिए उनके लिए एक कहावत है की सीपी फिट तो पिक्चर हिट. उन्होंने अभी तक ढाई सौ से भी अधिक फिल्मों में अभिनय किया है. उन्होंने कौमेडी, इमोशंस, निगेटिव  हर रोल में खुद के अभिनय के जरिये एक अलग छाप छोड़ी है. उनकी फिल्मों में व्यस्तता इतनी है कि उन्हें एक फिल्म से फुर्सत मिलती नहीं कि दूसरी फिल्म की शूटिंग शुरू हो जाती है. वह भोजपुरी के सबसे व्यस्त अभिनेताओं में से एक है.

ये भी पढ़ें- यूट्यूब क्‍वीन आम्रपाली दुबे का धमाकेदार गाना ‘लगा के वैसलीन’ हुआ Viral, देखें Video

उन्होंने दबंग सरकार, साजन चले ससुराल, नागिन, इच्छाधारी, लवारिश, मुकद्दर,  कुली नंबर वन, दूल्हे राजा, घरवाली बाहरवाली, सुहाग जैसी सुपरहिट फिल्मों में दमदार अभिनय किया था जिसके चलते फिल्म सुपरहिट रही थी. हाल ही में आई भोजपुरी फिल्म कुली नम्बर 1 में उनके अभिनय को काफी सराहा गया था.

cp-bhatt-2

सीपी भट्ट इस वर्ष कई फिल्में कर रहें हैं जिनमें से अधिकतर इस साल ही प्रदर्शित भी होनी है इसमें से उम्भा नरसंहार पर आधारित उनकी एक फिल्म भी आ रही है जिसमें उन्होंने निगेटिव रोल निभाया है.

ये इश्क बड़ा बेदर्दी है पूरी फिल्म का लिंक-

https://www.youtube.com/watch?v=WBsP5jUctgA

कुली नम्बर वन ट्रेलर लिंक –

गहरी पैठ

देश में अच्छे दिन आने वाले हैं या देश सताए गए लोगों (केवल हिंदू) की पनाह की जगह बनने वाला है, यह अब सपना ही रह गया है. पाकिस्तान, बंगलादेश या अफगानिस्तान से धर्म के नाम पर सताए जाने वाले भारत तो तब आएंगे न जब यहां उन्हें कुछ भविष्य दिखेगा. अगर 1947 से 2020 तक, 73 सालों से, वे वहां रह रहे हैं और जिंदा हैं तो इस का मतलब है कि अपनी रोजीरोटी तो कमा पा रहे हैं. भारत में तो भारतीयों के लिए रोजीरोटी के लाले पड़ रहे हैं. भाजपा की जबान में आने वाले 4 करोड़ हिंदुओं को हम खिलाएंगे क्या?

इंजीनियरिंग आज देश की हालत सुधारने की पहली जरूरत है. कुछ भी बनाना हो, सड़क, स्कूल, अस्पताल, जेल, डिटैंशन सैंटर, मंदिर, मूर्ति सब से पहले इंजीनियर की जरूरत होती है. अगर इंजीनियरों की जरूरत ही नहीं तो मतलब साफ है कि कुछ बन नहीं रहा. वैसे, कुछ बड़ा बनता दिख भी नहीं रहा सिवा मंदिरों के.

इंजीनियरिंग कालेजों को इजाजत देने वाली संस्था आल इंडिया काउंसिल औफ टैक्निकल ऐजूकेशन ने फैसला किया है कि अब 2 साल तक कोई नया इंजीनियरिंग कालेज नहीं खोला जाएगा. देश में 27 लाख सीटों वाले कालेज पहले से मौजूद हैं और 3-4 सालों से उन में दाखिला लेने वालों में कमी होती जा रही है. 2019 में 13 लाख ने ही इस महंगी पढ़ाई में अपनी पूंजी लगाने की इच्छा दिखाई, क्योंकि शायद उन्हें पता है कि नौकरी तो मिलनी नहीं.

ये भी पढ़ें- बेरोजगारी का आलम

यह बेहद शर्म की बात है कि जो सरकार बड़ेबड़े सपने दिखा रही हो, 5 ट्रिलियन डौलर (जो भी इस का मतलब हो) के उत्पादन वाला देश बना डालेगी का दावा कर रही हो, जगद्गुरु होने का घमंड कर रही हो, रोज भाषणों पर भाषण लाद रही हो, वहां आगे बढ़ने की पहली जरूरत इंजीनियरों को नौकरी तक नहीं दे पा रही है.

यह कमी प्लानिंग की नहीं गिरते कौंफिडैंस की है. गांवकसबों सब जगह यह बात फैल चुकी है कि इंजीनियरिंग की महंगी पढ़ाई के बाद नौकरियां तो मिलेंगी नहीं. सरकार खुद अब कुछ बनाएगी नहीं. रिजर्वेशन प्राइवेट नौकरियों में है नहीं. तो फिर कोई क्यों खेतमकान बेच कर लड़कों को इंजीनियरिंग पढ़ाने में पैसा लगाए? अगर पिछड़ों और शैड्यूल कास्टों का रिजर्वेशन रखा तो बहुत से लड़के किसी भी तरह का जुगाड़ कर के इंजीनियरिंग करते ताकि सरकारी नौकरी मिल सके.

अब जब पक्का है कि सरकारी नौकरी तो है ही नहीं और यह भी पक्का है कि प्राइवेट नौकरियां तो ऊंची जमातों के लोग खा जाएंगे, तो गांवकसबों में थोड़े पैसे वाले घरों के लड़के भी इंजीनियरिंग में 5-7 साल लगाने का रिस्क लेने को तैयार नहीं. आज की सरकार तो कह रही है अच्छी नौकरी तो गौरक्षक गैंग का मैंबर बनना है और उस के लिए डिगरी की जरूरत नहीं.

आजकल सीसीटीवी कैमरे पुलिस से ज्यादा जरूरी हो गए हैं. जरूरत है कि हर गांवकसबे में भी ये लगाए जाएं, क्योंकि जनता की देखभाल अब पुलिस के बस की नहीं रह गई है. लोगों को डर पुलिस या कानून से नहीं, बल्कि सीसीटीवी कैमरों से है.

ये भी पढ़ें- पुलिस को फटकार

दिल्ली में एक ईरिकशा ड्राइवर, उस की बीवी और 3 बच्चों की सनसनीखेज मौत का राज सीसीटीवी कैमरों से ही खुला. पता चला कि कत्ल करने वाला चचेरा भाई ही था, जिस ने 30 हजार रुपए उधार ले रखे थे. कई बार रुपए वापस मांगने पर वह इतना गुस्सा हो गया कि उस ने एकएक कर के 3 घंटों में पांचों की हत्या कर डाली और फरार हो गया. शुरू में लगा था कि यह खुदकुशी का मामला है, पर धीरेधीरे सीसीटीवी कैमरों से राज खुल गए. अभी हर घर में सीसीटीवी कैमरे चाहे न लगे हों, पर जहां लगे हैं, वहां उन कैमरों की रिकौर्डिंग चैक कर के पूरी कहानी का पता चल जाता है.

इस मामले में 7 दिनों तक किसी को कुछ पता न चला. जब घर से लाशों के सड़ने की बदबू आने लगी तो पता चला कि मामला क्या है.

पैसे की तंगी और चौपट होते धंधों की वजह से खुदकुशी अब सिर्फ किसान ही नहीं कर रहे, शहरों में व्यापारी, ड्राइवर, मजदूर भी कर रहे हैं और ऐसे माहौल में किसी को दिए 30 हजार रुपए बहुत हो जाते हैं. उधार देने वाला जब रुपए वापस मांगता है तो उधार लेने वाले के लिए आफत सी हो जाती है और नतीजतन उधार देने वालों की हत्या तक कर दी जाती है. जब तक लोगों को भरोसा था कि आज नहीं तो कल पैसा आ ही जाएगा, मामला चल रहा था और लोग गरीबी में भी गुजारा कर लेते थे, पर अब कल का भी भरोसा नहीं है, क्योंकि माहौल बहुत खराब हो गया है और बुरे से बुरा हो रहा है.

धर्म का ढिंढोरा पीट कर पिछले 6 सालों में वैसे भी लोगों को बहुत मारपीट के लिए तैयार किया गया है. देशभर में दलितों और मुसलिमों को मारनेपीटने को पुलिस अनदेखा कर देती है. उत्तर प्रदेश में ही नहीं और कई राज्यों, जिन में दिल्ली शामिल है, में पुलिस ने खुद तोड़फोड़ की है, बेहरमी से पिटाई की है, जो सीसीटीवी कैमरों में रिकौर्ड हो गई है. जामिया और जेएनयू में पुलिस की मौजूदगी में गोलियां चलीं, होस्टल में घुस कर पिटाई की गई.

बिहार में कन्हैया कुमार के काफिले पर 7 बार हमले हुए. उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बिहार के महान मुखिया थाने से भाषण बघारते रहे. दिल्ली में पुलिस अमित शाह के कंट्रोल में है और दिल्ली के चुनावों में एक बार भी उन्होंने उन लोगों के लिए हमदर्दी का एक बोल न बोला, जिन की पिटाई हुई.

ये भी पढ़ें- फेल हुए मोदी

ऐसे माहौल में 30 हजार रुपए के लिए 5 हत्याएं हो जाएं, तो क्या बड़ी बात है. पुलिस तो जब आएगी, तब आएगी, पहला बचाव और सुबूत तो भई सीसीटीवी कैमरे ही हैं. यह धंधा आज जम कर पनप रहा है. पता नहीं सरकार की कितनी पत्ती है इस में.

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 : आप का दम बाकी बेदम

सियासत में जो सत्ता पर काबिज होता है, वही सिकंदर कहलाता है. इन चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने इसे दोबारा सच साबित कर दिया. उन्हें दिल्ली की जनता ने अपना दिल ही नहीं दिया, बल्कि ‘झाड़ू’ को वोट भी भरभर कर दिए, 70 में से 62 सीटें.

किसी सत्तारूढ़ दल के लिए इस तरह से अपना तख्त बचाए रख पाना ढोलनगाड़े बजाने की इजाजत तो देता ही है, वह भी तब जब दिल्ली को किसी भी तरीके से जीतने के ख्वाब देखने वाली भारतीय जनता पार्टी के तमाम दिग्गज नेता यह साबित में करने लगे थे कि यह चुनाव राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोही सोच के बीच जंग है, यह चुनाव भारत और पाकिस्तान के हमदर्दों के बीच पहचान करने की लड़ाई है, यह चुनाव टुकड़ेटुकड़े गैंग को नेस्तनाबूद करने की आखिरी यलगार है.

ये भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ मे छापे: भूपेश की चाह और राह!

पर, दिल्ली की जनता ने पाकिस्तान की सरहदों को वहीं तक समेटे रखने में ही अपनी भलाई समझी और बिजली, पानी, सेहत और पढ़ाईलिखाई को तरजीह देते हुए 8 फरवरी, 2020 को आम आदमी पार्टी के चुनावी निशान ‘झाड़ू’ पर इतना प्यार लुटाया कि 11 फरवरी, 2020 को जब नतीजे आए, तो भाजपाई ‘कमल’ 8 पंखुडि़यों में सिमट कर मुरझा सा गया. कांग्रेस के ‘हाथ’ पर तो जो 0 पिछली बार चस्पां हुआ था, उस का रंग और भी गहरा हो गया.

केजरीवाल के माने

साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से तकरीबन 2 साल पहले जब देश की राजधानी के जंतरमंतर पर एक बूढ़े, लेकिन हिम्मती समाजसेवी अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल, 2011 को देश की तमाम सरकारों को भ्रष्टाचार के मुद्दे और लोकपाल की नियुक्ति पर घेरा था, तब अरविंद केजरीवाल और उन के कुछ जुझारू दोस्तों ने दिल्ली की तब की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को पानी पीपी कर कोसा था और दिल्ली की जनता को सपना दिखाया था कि अगर उसी के बीच से कोई ईमानदार आम आदमी सत्ता पर अपनी पकड़ बनाता है तो यकीनन वह उन को बेहतर सरकार दे सकता है. तब दिल्ली के तकरीबन हर बाशिंदे को ‘मैं आम आदमी’ कहने में गर्व महसूस हुआ था.

अरविंद केजरीवाल का तीर निशाने पर लगा था. साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में उन की पार्टी को उम्मीद से बढ़ कर 28 सीटें मिली थीं. भाजपा 32 सीटें जीत कर सब से बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि कांग्रेस महज 7 सीटों पर सिमट कर रह गई थी.

इस के बाद अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के समर्थन से 28 दिसंबर, 2013 से 14 फरवरी, 2014 तक 49 दिनों के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, पर विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा के लोकपाल बिल के विरोध में एक हो जाने पर और भ्रष्ट नेताओं पर लगाम कसने वाले इस लोकपाल बिल के गिर जाने के बाद उन्होंने नैतिक आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

ये भी पढ़ें- पौलिटिकल राउंडअप : विधानपरिषद को खत्म किया

इस के बाद साल 2014 में देश में लोकसभा चुनाव हुए और भाजपा की अगुआई वाली सरकार देश में बनी. दिल्ली की सातों सीटें भाजपा को मिलीं. इसे नरेंद्र मोदी युग की शुरुआत माना गया और तब दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनाव को ले कर भाजपाई आश्वस्त थे कि अब तो दिल्ली भी उन की हुई, पर अरविंद केजरीवाल की अगुआई में फरवरी, 2015 के चुनावों में उन की आम आदमी पार्टी ने 70 में से रिकौर्ड 67 सीटें जीत कर भारी बहुमत हासिल किया और 14 फरवरी, 2015 को वे दोबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर काबिज हुए.

आप के पिछले 5 साल

अरविंद केजरीवाल ने पिछले 5 सालों में अपने किए गए कामों पर इस बार के चुनाव में जनता से वोट मांगे. उन्होंने तो इतना तक कह दिया था कि अगर उन्होंने काम नहीं कराया है, तो जनता उन्हें वोट न दे.

अरविंद केजरीवाल की यह साफगोई और ईमानदार छवि उन के द्वारा दिल्ली को मुफ्त में बिजली, पानी, मोहल्ला क्लिनिक, साफसुथरे सरकारी स्कूल और चिकित्सा सुविधाओं को जनता तक पहुंचाने के दम पर बनी थी. उन्होंने हर मौके पर दिल्ली पुलिस को आड़े हाथ लिया था और खुद को जनता का कवच बना दिया था.

मुफ्त बिजलीपानी का फार्मूला जनता को बहुत रास आया. 200 यूनिट बिजली मुफ्त मिलना जनता को यह बात सिखा गया कि अगर वह चौकस रहे तो तय कोटे में अपना काम भी चला सकती है और बिजली बचाने में अपना योगदान भी दे सकती है. अब उसे सरकारी खंभे में कांटा लगाने की जरूरत नहीं थी. मुफ्त पानी ने तो सोने पर सुहागे जैसा काम किया. बहुत से लोग टैंकर माफिया के चंगुल से निकल गए.

अरविंद केजरीवाल के दूसरे वजीर मनीष सिसोदिया ने एक कदम आगे बढ़ कर सरकारी स्कूलों के साथसाथ सरकारी अस्पतालों में कई ऐसे सुधार किए कि दिल्ली की जनता के जेहन में यह बात बैठ गई कि सरकार का मन हो तो वह अपनी अवाम का खयाल रख सकती है. इस के साथ ही आम आदमी पार्टी ने कच्ची कालोनियों को पक्का करने की अपनी मुहिम भी चलाए रखी.

चुनाव से ठीक पहले दिल्ली की सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त में सफर करने का जो तोहफा इस सरकार ने दिया, वह गरीब जनता की जेब पर सीधा असर डाल गया. निचले तबके की औरतों और लड़कियों को इस से बहुत फायदा मिला.

भाजपा के दांव पड़े उलटे

एक के बाद एक कई राज्यों में अपनी सरकार गंवाने वाली और दिल्ली में मजबूत चेहरे और आपसी तालमेल से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी के पास अरविंद केजरीवाल को घेरने के लिए कोई खास मुद्दे थे ही नहीं.

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी अपनी ‘रिंकिया के पापा’ वाली इमेज से बाहर निकल ही नहीं पा रहे थे. दूसरे बड़े नेता भी अपने कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए हुए थे.

ये भी पढ़ें- पोस्टर वार के साथ चुनावी सरगर्मी

शायद सभी इस बात की राह देख रहे थे कि कब नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी जादुई छड़ी घुमाएंगे और दिल्ली में बिना कोई मेहनत किए सत्ता उन की झोली में आ गिरेगी.

लेकिन जब आलाकमान को ऐसा होता नहीं दिखा तो उस ने अपना वही पुराना हिंदूमुसलिम कार्ड खेला और सीएए के लागू होने पर भारत के मुसलिम समाज में छटपटाहट हुई, तो दिल्ली में धरने पर बैठे शाहीन बाग के लोगों को टुकड़ेटुकड़े गैंग से जोड़ने की तिकड़म भिड़ाई गई.

गृह मंत्री अमित शाह अपने रंग में दिखाई दिए और उन्होंने अरविंद केजरीवाल को शाहीन बाग का अगुआ बताते हुए आतंकवादी तक कह दिया, तो उन का एजेंडा सामने आ गया कि वे दिल्ली में वोटों का ध्रुवीकरण कर के सारे हिंदू वोट अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं.

इस के अलावा भाजपा के पास कोई भी ऐसा चेहरा नहीं था, जो मुख्यमंत्री पद का इतना तगड़ा दावेदार हो जो अरविंद केजरीवाल को टक्कर दे सके. यहां भी नरेंद्र मोदी का चेहरा दिखा कर राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से वोट बटोरने की सोची गई थी जिसे जनता ने नकार दिया.

भाजपा ने उस समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी, जब उस ने जनता को अरविंद केजरीवाल की खामियां तो खूब गिनाईं, पर यह नहीं बताया कि अगर वह सत्ता में आई तो दिल्ली वालों की भलाई के क्याक्या काम करेगी. उस के लोकल नेता भी जनता के सामने नरेंद्र मोदी की ही बातें करते दिखे. कश्मीर, गाय, राम मंदिर, अर्बन नक्सली की हवाहवाई चिंघाड़ लगाते रहे.

सब से बड़ी बात तो यह कि भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल को घेरने में पूरी तरह नाकाम रही. उस के पास आम आदमी पार्टी द्वारा जनता को दी गई सुविधाओं का कोई जवाब नहीं था. न ही कोई ऐसा रोडमैप था, जो सत्ता में आने के लिए उस की राह बनता. यही वजह थी कि भाजपा के इतने तामझाम के बाद भी दिल्ली की जनता ने अपना विश्वास आम आदमी पार्टी में दिखाया और पूरे देश के लिए एक रोल मौडल पेश किया कि केंद्र सरकार की नाराजगी और सीमित सरकारी खजाने के बावजूद अगर कोई मुख्यमंत्री चाहे तो वह अपने राज्य के लोगों की भलाई के काम कर सकता है.

कांग्रेस गई गड्ढे में

लगता है, कांग्रेस यह मान कर चल रही है कि अब वह वहीं लड़ेगी जहां कम से कम नंबर 2 पर तो आ ही जाए. दिल्ली के इन चुनाव ने तो यही साबित किया है. साल 2015 के बाद अब साल 2020 में भी नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा. कभी दिल्ली और देश में अपनी धाक जमाने वाली इस पार्टी की जीरो इस बार भी नहीं टूटी, तो सवाल उठता है कि दिल्ली की जनता ने उसे पूरी तरह क्यों नकार दिया? वह क्यों एक नालायक छात्र की तरह पूरे चुनाव में इम्तिहान देने से बचती रही? क्यों नाम के लिए हिस्सा लिया और अपनी मिट्टी पलीद करा ली?

लगता है, कांग्रेस ने अपनी कमियों पर आंखें मूंदे रहने का मन बना लिया है. उस के पास कीमती 5 साल थे, जिन में वह जनता से जुड़ कर अपनी सियासी जमीन को दोबारा बंजर से उपजाऊ बना सकती थी.

याद रहे कि आम आदमी का आज का वोटर कल का कांग्रेसी प्रेमी था. ऐसे में सुभाष चोपड़ा को आगे कर देना कांग्रेस के लिए खुदकुशी कर देने जैसा था.

ये भी पढ़ें- नागौर में बर्बरता की हद पार: पेट्रोल से गीले कपड़े को प्राइवेट पार्ट में डाला

इस पर कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का यह कहना कि सब को मालूम था कि आम आदमी पार्टी फिर से सत्ता में आएगी, पार्टी के गिर चुके कंधों की तरफ इशारा करता है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी हार से ज्यादा इस बात पर खुश दिखे कि बड़ेबड़े दावे करने वाली भाजपा का ऐसा हश्र हुआ?

हो सकता है कि कांग्रेस चाहती हो कि किसी भी तरह भाजपा को दिल्ली की सत्ता से दूर रखा जाए. अगर वह चुनाव में दम दिखाती तो आम आदमी पार्टी के वोट बैंक में ही सेंध लगाती. इस से भाजपा ही मजबूत होती तो उस ने पहले से ही सोचीसमझी चाल के तहत दिल्ली की गद्दी अरविंद केजरीवाल को सौंप दी.

पर अगर ऐसा है, तो यह राहुल गांधी के सियासी सफर को और ज्यादा मुश्किल बना देगा, क्योंकि राजनीति में कब, कौन पलटी मार दे, कह नहीं सकते.

केजरीवाल की चुनौतियां

अगले 5 साल फिर केजरीवाल. इस जीत से आम आदमी पार्टी की कामयाबी का ग्राफ बहुत ज्यादा बढ़ा है, तो चुनौतियां भी कम नहीं हैं. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से जो 10 वादे किए हैं, उन्हें उन पर खरा उतरना होगा. मुफ्त की सुविधाओं और सरकारी खजाने के बीच भी तालमेल बनाना होगा. सब से बड़ी समस्या तो दिल्ली के सामने गंदगी की है.

आज जहां देखो, कचरा ही कचरा दिखाई देता है और अरविंद केजरीवाल दिल्ली को लंदन बनाने के ख्वाब देख रहे हैं. दिल्ली की कच्ची बस्तियों के हाल तो और भी बुरे हैं. नाले पर बस्ती है या बस्ती में से नाला है, इस का पता ही नहीं चलता है. बहुत से मोहल्ला क्लिनिक तक गंदगी का दूसरा नाम बन गए हैं.

आप वाले कह सकते हैं कि नगरनिगम पर भाजपा का कब्जा है, तो वह कैसे साफसफाई की मुहिम चलाए? लेकिन जनता तो आप पर ही विश्वास करती है न? सफाई मुहिम को जनता की मुहिम बना कर भी इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है और जब नगरनिगम के चुनाव हों, तो उन पर भी कब्जा जमाया जा सकता है.

इस के अलावा बेरोजगारी, माली मंदी और बढ़ती आबादी दिल्ली को बैकफुट पर ला रही है. अरविंद केजरीवाल ने जीतने के बाद दिल्ली को ‘आई लव यू’ कहा है, तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि जिस से प्यार करते हैं, उस का हर तरह से खयाल भी रखा जाता है. लिहाजा, वे दिल्ली में ही जमे रहें और पिछली बार की तरह अभी से देश की सियासत पर कब्जा जमाने के सपने न देखें, क्योंकि अभी इस लिहाज से आप के लिए भी दिल्ली दूर है.

आप की महिला उम्मीदवार भी कम नहीं

चुनाव से ऐन पहले दिल्ली की महिलाओं को डीटीसी बस में मुफ्त सफर कराने के ऐलान ने आम आदमी पार्टी को बहुत फायदा पहुंचाया. उसे दिल्ली की गद्दी पर तीसरी बार पहुंचाने में महिला वोटरों ने खूब योगदान दिया.

वैसे, इस बार के विधानसभा चुनाव में कुल 79 महिलाएं बतौर उम्मीदवार मैदान में थीं, लेकिन जलवा रहा आम आदमी पार्टी की 8 महिलाओं का. अरविंद केजरीवाल ने 9 महिला उम्मीदवारों को टिकट दी थी, जिन में से 8 ने जीत हासिल की.

कांग्रेस ने 10 महिला उम्मीदवारों पर दांव लगाया था, पर एक भी सीट नहीं हासिल हो पाई. ऐसा ही कुछकुछ भाजपा का भी हाल रहा. उस ने सब से कम 5 महिला उम्मीदवारों को टिकट दी थी, पर उन में से एक भी नहीं जीत पाई.

ये भी पढ़ें- भूपेश बघेल की अमेरिका यात्रा के कुछ यक्ष-प्रश्न

सफाई वाले का बेटा भी विधायक बना इस चुनाव में 18 ऐसे चेहरे हैं, जो पहली बार विधानसभा में पहुंचे हैं. इन में से 16 विधायक तो आम आदमी पार्टी के ही हैं और 2 विधायक भाजपा के हैं. लेकिन सब से ज्यादा सुर्खियां बटोरीं आम आदमी पार्टी के कोंडली सीट से चुन कर आए कुलदीप कुमार ने. वे एक सामान्य परिवार से आते हैं. उन के पिता नगरनिगम में सफाईकर्मी हैं. वैसे, कुलदीप कुमार साल 2007 में पार्षद भी बने थे. वे 30 साल के हैं और इस बार सब से कम उम्र के विधायक बने हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें