कसूर किस का था : आखिरी भाग

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था:
मेहुल की शराब पीने की लत के चलते राधिका राजन के नजदीक आ गई. वह अपने पति का घर छोड़ कर उस के साथ रहने लगी. थोड़े दिन तक तो सब ठीक रहा, पर बाद में राजन का असली रूप सामने आया. वह उसे अपने काम के लिए दूसरों को परोसना चाहता था. इस तरह वह धीरेधीरे कालगर्ल बन गई. एक दिन राधिका किसी से मिलने होटल गई. वहां उस के सामने उस का बेटा आ गया. वह घबरा कर वापस हो ली.
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कसूर किस का था? (पहला भाग)

कसूर किस का था? (दूसरा भाग)

कसूर किस का था? (तीसरा भाग)

कसूर किस का था? (चौथा भाग)

‘‘ठीक है, उन्हें चाय वगैरह सर्व करो. मैडम अभी तैयार हो कर आ रही हैं,’’ कह कर राजन कमरे से बाहर आ गया.

राधिका ने जैसे ही ड्राइंगरूम में कदम रखा, सामने नजर पड़ते ही ऐसे तड़प उठी, जैसे भूल से जले तवे पर हाथ रख दिया हो.

वह घबरा कर वापस जाने लगी, तभी उस के कानों में अमृत घोलती

एक आवाज गूंजी, ‘‘मम्मी, मैं आप का बंटी… आप को कहांकहां नहीं ढूंढ़ा हम ने? आखिरकार आप मिल ही गईं,’’ इतना कह कर वह राधिका से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगा.

बंटी रोतेरोते ही कहने लगा, ‘‘मम्मी, आप के बगैर पापा ने भी अपनी कैसी हालत बना ली है, कितने साल बीत गए… आप के बगैर जीते हुए. अब मैं एक पल भी आप के बगैर नहीं रह सकता. प्लीज मम्मी, घर लौट चलो. आप को लिए बगैर मैं यहां से नहीं जाऊंगा.’’

जब होटल में राधिका ने बंटी को देखा, जो बिलकुल मेहुल की शक्ल पाए हुए था. उसे लगा कि उस ने ममता के रिश्ते में भी तेजाब घोल दिया. अगर उस की शक्ल हूबहू न होती, तो वह तो… उस के आगे वह नहीं सोच पाई.

उधर राधिका जब मेहुल को छोड़ कर चली गई थी, तब वह एकदम टूट सा गया था. वह उसे बहुत प्यार करता था. निराशा व हताशा से बेहाल मेहुल ने सारा कारोबार समेटा और बेंगलुरु की किसी अनाम जगह पर चला गया. अब वह अपने बेटे बंटी के लिए जी रहा था. सुबह उसे तैयार कर के स्कूल भेजता, फिर अपने दफ्तर जाता, जल्दी काम निबटा कर वह फिर घर लौटता.

धीरेधीरे सारे काम घर में मोबाइल फोन से ही करने लगा. बंटी को भी पापा का ढेर सारा प्यार पा कर लगा कि जैसे अपनी मम्मी को भूलने लगा है, पर वह भूला नहीं था.

कभीकभी बंटी पूछ ही बैठता, ‘पापा, मम्मी कहां गई हैं?’

तब मेहुल की बेबसी से आंखें भर आतीं, फिर मासूम बंटी को सीने से लगा कर रो पड़ता. उस ने सोचा कि ढूंढ़ा तो उसे जाता है, जो खो जाता है. जो खुद ही छिप गया हो, उसे ढूंढ़ कर क्यों परेशान करूं?

जैसे ही बंटी बड़ा हुआ, उस का भी एमबीए का कोर्स अभीअभी पूरा हुआ था. वह अपनी मम्मी की तलाश में लगा. वह पापा मेहुल को सैमिनार है बोल कर कोलकाता गया, जहां पहले मम्मीपापा के साथ रहता था बचपन में. वहीं से पता चला कि मम्मी मुंबई में हैं. शायद तभी से वह मुंबई में आ कर तलाश करने लगा.

एक दिन एक होटल में उस ने राजन के साथ राधिका को देखा. वहां से सारी जानकारी हासिल की. फिर अपनी मम्मी से मिलने का प्लान बनाया. और कुछ तो समझ में नहीं आया कि कैसे मिले?

वह राधिका को शर्मिंदा नहीं करना चाहता था. और कोई चारा भी तो नहीं था उस के पास, लेकिन अफसोस, मेहुल का हमशक्ल होने से बाजी पलट गई. उस की सूरत देखते ही राधिका लौट गई. वह तुरंत पहचान जो गई थी.

‘‘मम्मी, मेरी सूरत देख कर आप मुझे तुरंत पहचान गईं और आप लौट गईं. मम्मी, मेरा इरादा आप को परेशान करने का नहीं था. पापा भी आप के जाने के बाद एकदम टूट से गए हैं. वे तिलतिल कर मर रहे हैं.

‘‘मैं उन्हें ऐसे घुटतेतड़पते नहीं देख सकता था. उन्हें भी अपनी गलतियों का एहसास हो गया है. वैसे, वे मुझ पर जताते नहीं हैं कि वे दुखी हैं, मैं जानता हूं कि पापा आप को बहुत प्यार करते हैं और आप के बगैर अकेले जी रहे हैं. वे भी मेरे साथ आए हैं, बाहर खड़े हैं.’’

एक ही जगह मूर्ति सी खड़ी राधिका किस मुंह से मेहुल के सामने जाती? उस से नजरें मिलाती? उस ने बेजान, थके हाथों से बंटी को अपने से अलग किया. उस की आंखें पथरा सी गई थीं. लग रहा था कि उन आंखों में भावनाएं नहीं हैं.

इतने में मेहुल भी भीतर आ गया. कितना बीमार, थकाथका, लाचार सा लग रहा था. राधिका के दिल में कुछ टूटने, पिघलने लगा. मन दर्द से भर उठा. मेहुल का क्या कुसूर? पर वह इस कलंकित देह के साथ कैसे आगे बढ़ती?

राजन तो मेहुल को देख कर शर्म से पानीपानी हुए जा रहा था. दोस्त हो कर पीठ में छुरा घोंपने का अपराध जो किया था, इसलिए नजरें न मिला कर एक ओर सिर झुकाए खड़ा रहा.

मेहुल थके कदमों से राधिका के करीब आया और अपने दोनों हाथ जोड़ लिए. मेहुल ने कहा, ‘‘सच राधिका, इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं है. मेरी ही नादानी की वजह से हमारा बच्चा हम दोनों की परवरिश नहीं पा सका, लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है.

‘‘हम दोनों मिल कर अब भी अपने बेटे बंटी को अच्छे संस्कार देंगे. उसे कारोबार में फलतफूलता देखेंगे. अभी तो उस की शादी करनी है. उन के प्यारेप्यारे बच्चों को गोद में खिलाना है.’’

‘‘नहीं मेहुल, यह अब कभी नहीं हो सकता… मैं चाह कर भी इस दलदल से बाहर नहीं आ सकती. मैं इस लायक ही नहीं रह गई हूं कि तुम्हारे साथ जा सकूं.’’

अपने भर आए गले को खंखारते हुए राधिका फिर बोली, ‘‘मेहुल, जब बदन का कोई अंग सड़ जाता है, तो उस को काट कर अलग कर दिया जाता है, नहीं तो पूरे जिस्म में जहर फैल जाता है. मैं अब वह दाग हूं, जिसे सिर्फ छिपाया और मिटाया जा सकता है, पर दिखाया नहीं जाता. प्लीज, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो,’’ कहतेकहते वह बुरी तरह कांपने व रोने लगी थी.

तब मेहुल ने राधिका का हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘‘राधिका, मैं ने कहा था कि मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं. मेरे ही रूखे बरताव के चलते तुम्हें घर छोड़ने जैसा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा. इस के लिए तुम अपनेआप को अकेले दोष मत दो. मुझे तुम मिल गईं, अब कोई मलाल नहीं.

‘‘मुझे समाज, रिश्तेदार किसी की कोई परवाह नहीं. देखो, तुम्हारे बेटे बंटी को, जिसे तुम ने 8 साल का नन्हे बंटी के रूप में देखा था, आज वह पूरा गबरू नौजवान बन गया है. एमबीए की डिगरी भी हासिल कर ली है.

‘‘मैं ने इस का तुम्हारी गैरहाजिरी में ठीक से तो लालनपालन किया है कि नहीं? कोई शिकायत हो तो बोलो?’’

मेहुल का गला भर आया था. आंखें गीली हो गई थीं.

कितना बड़ा कलेजा था मेहुल का. राधिका, जो शर्म, अपराध के बोझ तले दबी जा रही थी, वह भी सारी लाज भूल कर मेहुल की बांहों में समा गई. कभी सोचा भी नहीं था कि मेहुल से नफरत की जगह माफी मिलेगी. उस के चेहरे पर एक दृढ़ विश्वास की चमक थी.

राजन लुटापिटा सा एक ओर खड़ा ताकता ही रह गया.

कसूर किस का था : चौथा भाग

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कसूर किस का था? (पहला भाग)

कसूर किस का था? (दूसरा भाग)

कसूर किस का था? (तीसरा भाग)

 

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था:

मेहुल से शादी होने के बाद राधिका अमीर घराने की बहू तो बन गई, पर पति के शराब पीने की आदत से वह परेशान थी. मेहुल बेटे को भी बिगाड़ रहा था. इस तरह वह राजन के करीब आ गई और उस के साथ दूसरे शहर में रहने लगी. राजन ने उस को रानी बना कर रखा. एक दिन वह मुसीबत में फंस गया.

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‘‘मैं ने 10 करोड़ के प्रोजैक्ट के लिए बैंक से 5 करोड़ का लोन पास करवाया था, लेकिन पिछला टैंडर पास नहीं होने से बैंक का मैनेजर लोन पास नहीं कर रहा है. कोटेशन वगैरह सब भर दिए गए हैं… समझ में नहीं आता कि क्या करूं…?

‘‘अगर मेरा यह करोड़ों का प्रोजैक्ट इस बार क्लियर नहीं हुआ, तो हम सड़क पर आ जाएंगे. हमारा दफ्तर, घर, मिल सबकुछ चला जाएगा. प्लीज राधिका, कुछ सोचो… कुछ करो…’’

अब बेचारी राधिका क्या करे… वह तो सिर्फ दिलासा व हौसला ही देती रही, ‘‘सब ठीक हो जाएगा राजन, तुम जा कर एक बार मैनेजर से फिर मिल लो.’’

‘‘नहीं राधिका, अब मिलने से कुछ नहीं होगा. हां, अब ठीक केवल एक शर्त पर हो सकता है… सुना है कि वह मैनेजर राहुल थोड़ा शराब और शबाब का रसिया है. अगर एक चांस ले लें तो शायद.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अगर तुम राहुल को शीशे में उतार सको, तो…’’ राजन कहतेकहते नजरें नहीं मिला पा रहा था.

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो राजन? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? तुम अपनी राधिका को सिर्फ एक लोन पास करने के लिए किसी पराए मर्द के बिस्तर में परोस रहे हो?’’ तकरीबन चिल्लाते हुए राधिका गुस्से से बोली,  ‘‘मुंबई में तो सैकड़ों कार्लगर्ल्स हैं. किसी को भी वहां भेज दो.’’

‘‘राधिका, मुझे माफ कर दो,’’ कह कर राजन ने राधिका की ओर प्यार से हाथ बढ़ाया, तो उस ने हिकारत भरी नजरों से घूर कर हाथ को छिटक दिया.

राजन अपनी सफाई में कह रहा था, ‘‘राधिका, मुझे यह कहना तो नहीं चाहिए था, पर मैं किसी कार्लगर्ल पर एकदम से भरोसा नहीं कर सकता. कब किस के सामने किस का राज फाश कर दे, कुछ कहा नहीं जा सकता.

‘‘मुझे यह सब कहते हुए बहुत शर्म महसूस हो रही है कि मैं अपनी जिंदगी को किसी और के बिस्तर पर सोने को मजबूर कर रहा हूं. हो सके, तो मुझे माफ कर देना…

‘‘मेरे पास अब खुदकुशी के सिवा कोई चारा नहीं है. मैं दिवालिया हो कर नहीं जी सकता.’’

अब राधिका के सामने इधर कुआं उधर खाई वाली हालत हो गई. जिस्म का सौदा कर राजन के कारोबार को बचाए या फिर जिस्म को बचा कर उस को मरता देखे? फिर इतने बड़े मुंबई शहर में अकेली, कैसे और कहां रहेगी? सब गिद्धों की तरह नोच डालेंगे… मेहुल के पास वापस मैं लौट नहीं सकती. आखिरकार उस ने अपने जमीर को मार कर ही यह कदम उठाया.

बैंक मैनेजर राहुल तो राधिका का इतना मुरीद हुआ कि उस ने यहां तक कह दिया, ‘‘राजन, आज से आप मेरे फैमिली फ्रैंड हुए. अब आप को कभी भी कोई दिक्कत हो, तो बेहिचक मुझे कह दीजिएगा.’’

बस वहीं से राधिका का कालगर्ल बनने का सफर शुरू हो गया. हर रात लिपपुत कर किसकिस के गुलिस्तां को महकाती फिरती, अब उसे याद नहीं है. राजन तरक्की की सीढि़यों को पार करता रहा…

राधिका कभी नफरत से पूछती, ‘‘राजन, तुम ने ऐसा क्यों किया? किस जन्म का बैर निकाला है तुम ने?’’

राजन बड़ी बेशर्मी से हंसने लगता. राधिका कभी जाने को मना करती, तो वह हाथ भी उठा देता था. ऐसी दहशतभरी जिंदगी जीतेजीते… यों ही  15 साल बीत गए.

राधिका ने यह बात अब अच्छी तरह से समझ ली थी कि औरत केवल खिलौना है. कभी उसे पैरों तले रौंदा जाता है, तो कभी उसे हाथों द्वारा मसलाकुचला जाता रहा है. उस ने राजन की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर अपना बसाबसाया घर उजाड़ दिया. कभी तनहाई में अपने बच्चे और मेहुल का अक्स उभरता, तो वह सिसक पड़ती.

राधिका अपनी यादों के दायरे से बाहर निकल आई. आज भी बाहर से कोई डैलिगेशन ग्रुप आया है, जिस में से एक को ‘ताज’ होटल में ठहराया गया है, जहां राधिका को अभी पहुंचना है.

ड्राइवर ने होटल ताज के सामने कार रोक दी. इठलाती, लहराती राधिका मैनेजर से रूम नंबर पूछ कर चल पड़ी. उस ने 205 नंबर रूम खटखटाया. अंदर से आवाज आई, ‘कम इन.’

दरवाजा बंद नहीं था, केवल ढलका हुआ था. हाथ लगते ही खुल गया. सामने फोन पर झुका कोई नौजवान रिसैप्शन में बात कर रहा था और एक 40-45 का रसिया किस्म का आदमी साथ खड़ा उसे समझा रहा था. हाथ के इशारे से सामने पड़े सोफे पर राधिका को बैठने को कहा और बोला, ‘‘आप जरा बैठिए… बंटी, रिसैप्शन में कुछ और्डर देना मेरे व मैडम के लिए. तुम तो कोल्ड ड्रिंक लेते हो, पर मैं और मैडम पनीरपकौड़ा और वैज कबाब लेंगे और व्हिस्की लेंगे. थैंक्स…’’

तभी वह नौजवान राधिका की तरफ मुड़ा. उसे देख कर राधिका कांप उठी. वह वहां एक पल भी रुक नहीं पाई, उलटे पैरों लौट गई… और वह आदमी ‘हैलो… हैलो, मैडम…’ कहता ही रह गया. वह नौजवान भी हैरान खड़ा रह गया.

राधिका अपनी नजरों में तो गिर ही चुकी थी, आज वह सरेबाजार नंगी भी हो गई. उस के झूठे सपनों का महल तहसनहस हो गया. उस की ऐसी भयानक तसवीर देख राधिका ने अपने दोनों कानों पर हथेलियां रखीं.

राधिका बहुत जोर से चीखी, ‘‘नहीं…’’ उस की हिचकियां बंधने लगीं. घर पर आवाज सुन कर सभी नौकरनौकरानियां मैडम राधिका के कमरे में आ गए. देखा कि मैडम ने गुस्से में मेकअप का सारा सामान जमीन पर फेंक दिया है. ड्रैसिंग का आईना तोड़ दिया है. वे सब डर कर कमरे से बाहर चले गए.

राजन से उसे जितना प्यार था, आज… उस से भी ज्यादा नफरत हो रही थी.

उस के मासूम और खूबसूरत मुखड़े पर परेशानी की लकीरें खिंच गईं. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली.

कभी सोचा न था कि उस का अतीत ऐसे शर्मनाक रूप से वर्तमान में सामने आएगा. उस ने अपना सिर बैड के किनारे पर जोर से दे मारा. वह 2 मर्दों द्वारा छली गई. एक ने उस के वजूद को पैरों तले रौंदा, तो दूसरे ने उस के जिस्म को इस्तेमाल करने का जरीया बनाया. पहले अपने लिए, फिर पैसों के लिए खुद ने भी नोचाखसोटा और दूसरो से भी नुचवा ही रहा है.

आज राधिका शौवर में घंटों खड़े हो कर अपने को भिगोती रही. बरसों से मन पर पड़े मैल की परतों को साबुन से रगड़रगड़ कर साफ करती रही… उसे आईने में अपनेआप को देखने में भी डर लग रहा था.

राधिका ने उस रात अपनेआप को बैडरूम में कैद कर लिया. कितनी बार दरवाजे पर दस्तक हुई. राजन की आवाज आ रही थी, ‘‘जानू, दरवाजा खोलो… मैं तुम्हारा राजन… नींद आ गई होगी… शायद थकी हुई हो.’’

पर कोई आवाज न पा कर राजन ने सोचा, ‘लगता है, वह सो गई है. जब वह सुबह उठेगी, तब बात करूंगा.’

दरवाजे को जोरजोर से खटखटाने से राधिका की नींद टूटी. कब वह सोई, उसे उस का एहसास ही नहीं हुआ. हड़बड़ा कर वह उठी और दरवाजा खोला.

‘‘अरे, रात में कैसे बेसुध सो गई थीं तुम? तुम्हें मेरा भी खयाल नहीं आया? और तुम ने खाना भी नहीं खाया? डिनर के लिए कितना दरवाजा खटखटाया, पर तुम ने दरवाजा खोला ही नहीं…. क्या हुआ मेरी जान?’’

राजन ने राधिका को बांहों में लेने की कोशिश की, तो वह पीछे हट गई. नफरत भरी निगाहों से उसे घूरा, तो हंसते हुए राजन का चेहरा अचानक सफेद सा पड़ गया. उस के हिकारत भरे चेहरे को राजन बखूबी समझ रहा था, इसलिए शर्मिंदा व बौखलाया हुआ सा बगलें झांकने लगा.

तभी सिक्योरिटी गार्ड ने आ कर कहा, ‘‘कोई साहब आए हैं. मैडम को पूछ रहे हैं.’’

(क्रमश:)

 राधिका से मिलने कौन आया था? होटल में किसे देख कर राधिका डर कर भाग आई थी? पढ़िए अगले अंक में…

कोरोना वायरस: बीमारी को शोषण और उत्पीड़न का जरिया बनाने पर आमादा सरकार

देश मे आर्थिक इमरजेंसी लगाने की बाते करना भाजपा सरकार की जरूरत हो सकती है, लेकिन देश की जरूरत कतई नही है. सरकार कोरोना वायरस को शोषण का जरिया बनाने पर आमादा है.

जिनकी मदद करनी थी, उनसे ही मदद मांग रहे है, किसानों से,छात्रों से, कर्मचारियो से अर्धसैनिक बलों से मदद मांग रहे है.

जो पीड़ित है, और बीमारों का इलाज करने में लगे हुए है, उनका वेलफेयर फ़ंड मांग रहे है. बेशर्मी के तमाम रिकॉर्ड ही तोड़ दिए है.

कर्मचारियो का डी ए जुलाई 2021 तक फ्रीज कर दिया है, 4 %  जो जनवरी ड्यू था वह नही दिया और आगे को तीन बार का डीए नही मिलेगा यानि कुल मिलाकर वेतन का 15 % के आस पास डीए कट जाएगा. इनकमटैक्स कट ही चुका है. अब भी कट ही रहा है.

टीए न देने का आदेश कर ही चुके है, एक दिन का वेतन एक वर्ष तक काटकर पीएम केयर फ़ंड में देने के आदेश कर दिये है.

निजी कंपनियों को तो उपदेश दिए जाते हैं कि किसी का वेतन न रोकें पर उनके बकाए भुगतान को भी रोका जा रहा है और खुद कर्मचारियों के वेतन काटे जा रहे हैं.

कर्मचारी संगठनों ने इस कटौती का विरोध किया है पर जब तक पंडे पूजारी और उनके इशारे पर चलने वाले टीवी हैं, सरकार को डर नहीं. फिर भाजपा का आईटी सैल भी रात-दिन एक कर मोदी के गुणगान में लगा है ताकि धर्म और उससे चल रहे जातीय भेदभाव बना रहे.

रिटायर्ड फौजी सुप्रीम कोर्ट चले गए है. रिटायर्ड फौजियों का डीए काटना घोर अनर्थ है. उन्होंने कोर्ट में चुनौती दी है. इन्हीं फौजियों का नाम लेकर चुनाव जीते जाते हैं पर अब हाल में चुनाव नहीं हो रहे तो उन्हें कुर्बान कर दिया गया है.

कर्मचारी संगठन, किसान संगठन, मजदूर संगठन और छोटे दुकानदारों के संगठन मिलकर अडानी अम्बानी की सेवक सरकार का खुलकर विरोध कभी नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनके नेता ऊंची जातियों के ही हैं.

छोटी जात की लड़की: भाग 1

‘पजामा पार्टी के नाम पर घर को होस्टल बना कर रख दिया इन लड़कियों ने. रिया भी पता नहीं कब समझदार बनेगी. जब देखो तब ले आती है इन लड़कियों को. जरा भी नहीं सोचती कि मेरा सारा शेड्यूल गड़बड़ा जाता है. अपने कमरे को कूड़ाघर बना दिया. खुद तो सब चली गईं मूवी देखने और मां यहां इन के फैलाए कचरे को साफ करती रहे.’ बेटी रिया के बेतरतीब कमरे को देखते ही उषा की त्योरियां चढ़ आईं.

एक बारगी तो मन किया कि कमरे को जैसा है वैसा ही छोड़ दें, रिया से ही साफ करवाएं. तभी उसे एहसास होगा कि सफाई करना कितना मुश्किल काम है. मगर फिर बेटी पर स्वाभाविक ममता उमड़ आई, ‘पता नहीं और कितने दिन की मेहमान है. क्या पता कब ससुराल चली जाए. फिर वहां यह मौजमस्ती करने को मिले न मिले. काम तो जिंदगीभर करने ही हैं.’ यह सोचते हुए उषा ने दुपट्टा उतार कर कमरे के दरवाजे पर टांग दिया और फैले कमरे को व्यवस्थित करने में जुट गई.

2 दिन पहले ही रिया के फाइनल एग्जाम खत्म हुए हैं. कल रात से ही बेला, मान्यता और शालू ने रिया के कमरे में डेरा डाल रखा है. रातभर पता नहीं क्या करती रहीं ये लड़कियां कि सुबह 10 बजे तक बेसुध सो रही थीं. अब उठते ही तैयार हो कर सलमान खान की नई लगी मूवी देखने चल दीं. खानापीना सब बाहर ही होगा. पता नहीं क्या सैलिब्रेट करने में लगी हैं.

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अरे, एग्जाम ही तो खत्म हुए हैं, कोई लौटरी तो नहीं लगी. उषा बड़बड़ाती हुई एकएक सामान को सही तरीके से सैट कर के रखती जा रही थी कि अचानक शालू के बैग में से एक फोल्ड किया हुआ कागज का टुकड़ा नीचे गिरा. उषा उसे वापस शालू के बैग में रखने ही जा रही थी कि जिज्ञासावश खोल कर देख लिया. कागज के खुलते ही जैसे उसे बिच्छू ने काट लिया. उस फोल्ड किए हुए कागज के टुकड़े में इस्तेमाल किया हुआ कंडोम था. देख कर उषा के तो होश ही उड़ गए. उस में अब वहां खड़े रहने का भी साहस नहीं बचा था.

‘क्या हो गया आज की पीढ़ी को. शादी से पहले ही यह सब. इन के लिए संस्कारों का कोई मोल ही नहीं. कहीं मेरी रिया भी इस रास्ते पर तो नहीं चल रही. नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है. वह शालू की तरह चरित्रहीन नहीं हो सकती.’ हक्कीबक्की सी उषा किसी तरह अपनेआप को घसीट कर अपने कमरे तक लाई और धम्म से बिस्तर पर ढेर हो गई.

शाम को चारों लड़कियां चहकती हुई घर में घुसीं तो उन की हंसी से घर एक बार फिर गुलजार हो उठा. मगर थोड़ी ही देर में चुप्पी सी छा गई. उषा ने सोचा शायद लड़कियां चली गईं. उस ने अपनेआप पर काबू रखते हुए रिया को आवाज लगाई.

‘‘गईं क्या सब?’’ उषा ने पूछा.

‘‘बाकी दोनों तो चली गईं, शालू अभी यहीं है. वह आज रात और यहां रुकेगी,’’ रिया ने मां के पास बैठते हुए कहा.

‘‘रिया, तू शालू का साथ छोड़ दे, वह लड़की चरित्रहीन है. मैं नहीं चाहती कि उस के साथ रहने से लोग तेरे बारे में भी गलत धारणा बनाएं,’’ उषा ने रिया को समझाते हुए कहा.

‘‘यह आप कैसी बातें कर रही हो मां. आप उसे जानती ही कितना हो? और बिना किसी पुख्ता सुबूत के यों किसी पर आरोप लगाना आप को शोभा नहीं देता.’’

मां के मुंह से अचानक यह बातें सुन कर रिया कुछ समझी नहीं. मगर अपनी जिगरी दोस्त पर यह बेहूदा इलजाम सुन कर उसे अच्छा नहीं लगा.

‘‘यह रहा सुबूत. आज तुम्हारे रूम की सफाई करते समय मुझे शालू के बैग से मिला था,’’ कहते हुए उषा ने वह कागज का टुकड़ा रिया के सामने खोल कर रख दिया. एकबारगी तो रिया से कुछ भी बोलते नहीं बना, बस, इतना भर कहा, ‘‘मां, किसी के व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू उस के चरित्र को नापने का पैमाना नहीं हो सकता. शालू के बैग से इस का मिलना यह कहां साबित करता है कि इस का इस्तेमाल भी शालू ने ही किया है. यह भी तो हो सकता है कि किसी ने उस के साथ जानबूझ कर यह शरारत की हो.’’

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‘‘शरारत, सिर्फ उसी के साथ क्यों? तुम्हारे या किसी और के साथ क्यों नहीं? तुम तो अपनी सहेली का पक्ष लोगी ही. मगर सुनो रिया, यह लड़की मेरी नजरों से उतर चुकी है. यह तुम्हारे आसपास रहे, यह मुझे पसंद नहीं,’’ उषा ने अपना दोटूक फैसला रिया को सुना दिया.

‘‘मां, शालू एक सुलझी हुई और समझदार लड़की है. वह अच्छी तरह जानती है कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए. देखना, आप को एक दिन उस के बारे में अपनी राय बदलनी पड़ेगी.’’

‘‘हां, वह तो उस के लक्षणों से पता चल ही रहा है कि वह क्या चाहती है. पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं. अरे, ये छोटी जात की लड़कियां होती ही ऐसी हैं. ऊंचा उठने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकती हैं,’’ कहते हुए उषा ने मुंह बिचका दिया. रिया भी उठ कर चल दी.

कालेज तो खत्म हो चुके थे. अब कैरियर बनाने का वक्त था. रिया के पापा चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी को चुने. मगर रिया किसी अच्छी मल्टीनैशनल कंपनी में जाना चाहती थी. जब तक कोई ढंग का औफर नहीं मिलता तब तक रिया ने अपने पापा का मन रखने के लिए एक कोचिंग में ऐडमिशन ले लिया ताकि पढ़ाई से जुड़ाव बना रहे.

उषा को बहुत बुरा लगा जब उसे पता चला कि शालू भी उसी कोचिंग में जा रही है. रिया को समझाने का कोई मतलब नहीं था, वह अपनी सहेली के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. उषा की नाराजगी से बेखबर शालू का उस के घर आनाजाना बदस्तूर जारी था. हां, उषा के व्यवहार का रूखापन वह साफसाफ महसूस कर रही थी. वह देख रही थी कि पहले की तरह अब आंटी उस से हंसहंस कर बात नहीं करतीं बल्कि उसे देखते ही अपने कमरे में घुस जाती हैं.

कभी आमनासामना हो भी जाए तो बातबेबात उसे टारगेट कर के ताने सुनाने लगती हैं. उस के लिए तो चायपानी भी रिया खुद ही बनाती है. शालू ने कई बार पूछना भी चाहा मगर रिया ने हमेशा यह कह कर टाल दिया, ‘छोड़ न, मां थक जाती होंगी. वैसे भी हमें अब अपने काम खुद करने की आदत डाल लेनी चाहिए.’ और दोनों मुसकरा कर चाय बनाने में जुट जाती थीं.

इधर उषा ने रिया पर कुछ ज्यादा ही कड़ाई से नजर रखनी शुरू कर दी. वह जबतब रिया का मोबाइल ले कर उस के मैसेज, व्हाट्सऐप, फेसबुक अकांउट, आदि चैक करने लगी. कभीकभी छिप कर उस की बातें भी सुनने की कोशिश करती.

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यह सब रिया को बहुत बुरा लगता था, मगर वह मां के मन की उथलपुथल को समझ रही थी. ऐसे में उस का कुछ भी बोलना उन्हें आहत कर सकता था. उन्हें डिप्रैशन में ले जा सकता था या फिर हो सकता था कि गुस्से में आ कर मां उस के बाहर आनेजाने पर ही रोक लगा दें. यही सोच कर रिया चुपचाप मां की हर बात सहन कर रही थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

मासूम नैंसी का कातिल कौन : भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- मासूम नैंसी का कातिल कौन : भाग 1

यह संभव नहीं था कि एक व्यक्ति एक समय पर 2 अलगअलग जगह उपस्थित हो. सीसीटीवी कैमरे की फुटेज ने जांच की दिशा ही बदल दी और शक के दायरे में खुद राघवेंद्र आ गया.

सीसीटीवी फुटेज से नैंसी हत्याकांड की गुत्थी बुरी तरह उलझ गई. जांच अधिकारी एएसपी निधि रानी उलझी हुई कडि़यों को सुलझाने में जुट गईं. एक मुखबिर ने उन्हें ऐसी सूचना दी कि वह चौंक गईं. सूचना में उन्हें बताया गया कि जिस दिन बबीता की बारात आई थी, उस दिन राघवेंद्र घर पर ही था. वह न तो घर से बाहर निकला था और न ही बारात में शामिल हुआ था. जबकि उस की सगी बहन की शादी हो रही थी.

इस के साथ ही मुखबिर ने एक और चौंकाने वाली बात यह बताई कि नैंसी की हत्या घर की एक महिला के अवैध संबंध को छिपाने के लिए की गई थी. नैंसी इस बात को जानती थी. उस महिला को अपने अनैतिक रिश्ते का राज खुलने का डर सताने लगा था, इसलिए उस ने सोचीसमझी साजिश के तहत उसे रास्ते से हटवा दिया था. इस शक के दायरे में बबीता भी आ रही थी.

अब मामला काफी पेचीदा और गंभीर हो गया था. निधि रानी ने यह बात पुलिस अधीक्षक दीपक बरनवाल को बताई तो वह हैरान हुए. यह बात सोचने वाली थी कि जिस की बहन की बारात आई हो, वह घर में रहते हुए भी उस में शामिल न हो. एसपी दीपक बरनवाल ने निधि रानी को निर्देश दिया कि राघवेंद्र को हिरासत में ले कर पूछताछ करें.

नैंसी की हत्या में 2 चाचा आए संदेह के घेरे में

शक के आधार पर 5 जून, 2017 को एएसपी निधि रानी ने राघवेंद्र और पंकज झा सहित 6 लोगों को हिरासत में ले लिया. पुलिस उन्हें थाना अंधरामढ़ ले आई. उन लोगों से अलगअलग सख्ती के साथ पूछताछ की गई.

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पूछताछ में राघवेंद्र और पंकज बारबार अपना बयान बदलते हुए पुलिस को इधरउधर घुमाने की कोशिश करते रहे. इस से दोनों एएसपी निधि रानी के शक के दायरे में आ गए.

पूछताछ के बाद उन दोनों को छोड़ कर शेष 4 लोगों को जाने को कह दिया गया. शतरंज जैसे इस खेल में निधि रानी ने आखिरी दांव में पूरी बाजी ही पलट दी. नैंसी जिन 3 बच्चों के साथ खेल रही थी, उन तीनों ने निधि के सामने इस मामले की कलई खोल दी थी. बच्चों का बयान दोनों को बताया गया. इस के बाद राघवेंद्र और पंकज के सामने सच बोलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. अंतत: दोनों ने कानून के सामने घुटने टेक दिए और भतीजी की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.

चचेरी भतीजी नैंसी की हत्या में दोनों आरोपी चाचाओं के इकबालिया बयान के बाद एएसपी निधि रानी और एसपी दीपक बरनवाल ने संयुक्त प्रैसवार्ता आयोजित की. एक पखवाड़े से सुर्खियों में रहे नैंसी हत्याकांड का खुलासा करते हुए एसपी दीपक बरनवाल ने संवाददाता को बताया, ‘‘नैंसी हत्याकांड का मास्टरमाइंड उस का चचेरा चाचा राघवेंद्र झा है. राघवेंद्र और पंकज के खिलाफ पुख्ता सबूत मिले हैं. दोनों के बयानों में समानता भी नहीं है. साथ ही जो साक्ष्य मिले हैं, वे संकेत दे रहे हैं कि यह परिवार झूठ बोल रहा है.

‘‘जिन 2 लोगों को आरोपी बना कर एफआईआर में नैंसी के अपहरण का जो समय दर्ज कराया गया था, उस समय उन में से एक लल्लू झा पैट्रोल पंप पर काम करता पाया गया. नैंसी का अपहरण नहीं बल्कि हत्या हुई थी.’’

बरनवाल ने आगे बताया कि जिस समय नैंसी के गायब होने की बात बताई गई, जांच के दौरान पता चला कि गायब होने के समय राघवेंद्र व पंकज ही मौके पर थे. पूछताछ के दौरान इस बात की जानकारी नैंसी के साथ खेलने वाले बच्चों ने दी है.

उन्होंने यह भी बताया था कि जांच के दौरान एसआईटी ने घटना के दिन का दोबारा सीन क्रिएट किया. उस के साथ रहने वाले 3 बच्चों हिमांशु, साक्षी व भारती से विस्तृत पूछताछ की गई, तो तीनों बच्चों ने बताया कि जिस समय नैंसी गायब हुई, उस समय दरवाजे के बाहर राघवेंद्र बैठा था और बाहर वाले रास्ते पर पंकज मौजूद था. ऐसे में किसी बाहरी व्यक्ति का घर में आने का सवाल ही नहीं था. राघवेंद्र और पंकज ने अपने जुर्म कबूल लिए हैं.

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प्रैस कौंफ्रेंस के बाद पुलिस ने उसी दिन दोनों आरोपियों राघवेंद्र झा व पंकज झा को झंझारपुर कोर्ट में एसीजेएम द्वितीय शिव प्रसाद शुक्ल के न्यायालय में पेश किया. अदालत ने दोनों आरोपियों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. पुलिस को दिए आरोपियों के बयानों के बाद कहानी कुछ इस तरह सामने आई –

रविंद्र के पिता देवानंद झा के चचेरे भाई हैं सत्येंद्र झा. दोनों भाइयों के अपनेअपने परिवार हैं. 5 साल पहले साल 2012 की बात है. रविंद्र के मांबाप उत्तराखंड घूमने गए थे. 25 मई, 2012 की शाम 6 बजे के करीब दोनों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. आज तक दोनों की मौत पर रहस्य की चादर लिपटी हुई है.

मांबाप की मौत के दुख से रविंद्र और उन का परिवार अभी तक नहीं उबर नहीं पाया था. रविंद्र की 2 बेटियों में नैंसी बड़ी थी और काफी समझदार व चुलबुली थी. नैंसी अपने चचेरे बडे़ दादा सत्येंद्र झा के साथ काफी घुलीमिली थी. सत्येंद्र भी उस से बहुत प्यार करते थे.

क्या बबीता के संबंधों की वजह से हुई नैंसी की हत्या?

सत्येंद्र झा के 4 बच्चों में 2 के नाम थे राघवेंद्र और बबीता. राघवेंद्र बचपन से ही उग्र स्वभाव का था. बबीता काफी खूबसूरत और चंचल स्वभाव की युवती थी. सन 2012 की बात है, एक दिन बबीता किसी काम से कहीं जा रही थी, तभी उसी गांव के रहने वाले लल्लू झा ने बबीता के साथ छेड़छाड़ कर दी. कहीं से राघवेंद्र और उस के भाइयों को इस की भनक लग गई. झा भाइयों ने लल्लू के घर में घुस कर लातघूंसों से उस की पिटाई की. उस के बाद लल्लू बबीता को जब भी देखता था, अपना रास्ता बदल देता था.

बात आई गई हो गई. धीरेधीरे 5 साल बीत गए. इस बीच बबीता का गांव के ही एक लड़के से तथाकथित प्रेम संबंध बन गया. इस बात की जानकारी परिवार वालों को भी मिल गई थी. झा परिवार एक रसूखदार परिवार था. जिले भर में उन का नाम था. उन की छोटी सी बात भी सुर्खियों में आ जाती थी. इसलिए परिवार वालों ने इज्जत की बात समझ कर इसे दबा कर रखा.

कहीं से मासूम नैंसी को इस की भनक लग गई. वह बुआ के प्रेमिल रिश्ते की हकीकत जान गई थी. बबीता को इस बात का डर सताने लगा था कि कहीं नैंसी यह राज किसी के सामने न खोल दे.

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इधर 26 मई, 2017 को बबीता की शादी पक्की हो गई थी. सूत्रों के मुताबिक, परिवार वालों को कहीं से यह भनक लग गई थी कि 5 साल पुरानी छेड़छाड़ वाली घटना में पिटे दोनों भाइयों लल्लू और पवन झा ने शादी में बाधा डालने की योजना बना रखी है. राघवेंद्र और पंकज चाहते थे कि बहन की शादी में किसी तरह की कोई बाधा न आए. इस के लिए वह हर बाधा से निपटने के लिए तैयार थे.

शादी के एक दिन पहले 25 मई को बबीता की मेंहदी की रस्म थी. नैंसी बुआ बबीता की शादी को ले कर काफी खुश थी. लेकिन बबीता के चेहरे पर वो खुशी नहीं थी जो शादी को ले कर लड़की के चेहरे पर होनी चाहिए. जैसे अंदर ही अंदर उसे कोई बड़ा डर खाए जा रहा हो. नैंसी मां और छोटी बहन के साथ अपने घर से मेंहदी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आई.

रविंद्र नारायण घर के दूसरे सदस्यों के साथ बारातियों के खानेपीने के सामानों की खरीदारी करने निर्मली बाजार गए थे. उन के घर से बबीता का घर थोड़ी दूरी पर था.

नैंसी अपने दोस्तों हिमांशु, साक्षी व भारती के साथ घर के बाहर खेलने लगी. बाद में खेलते खेलते बच्चे अंदर कमरे में पहुंच गए. कमरे में बबीता बैठी हुई थी. नैंसी बबीता के पास ही रखी एक चौकी पर बैठ गई. तभी अचानक बिजली चली गई. नैंसी के साथ हिमांशु भी था. बबीता ने हिमांशु को टौर्च दे कर घर के दूसरे कमरे में भेज दिया. थोड़ी देर बाद हिमांशु वापस लौटा तो नैंसी गायब थी और बबीता अकेली बैठी थी.

कैसे गायब हुई थी नैंसी सच्चाई बताई बच्चों ने

बच्चों के अनुसार, जब वे कमरे से बाहर निकले तो बरामदे में कुरसी पर राघवेंद्र को बैठे देखा, जबकि पंकज घर से बाहर जाने वाले रास्ते पर चहलकदमी कर रहा था. बच्चे वापस लौट कर फिर कमरे में आए और बबीता से नैंसी के बारे में पूछा. उस ने बच्चों को डांट कर भगा दिया. तब तक बिजली आ गई थी. बच्चों ने नैंसी को पूरे घर में तलाश किया, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

अचानक लापता हुई नैंसी को घर के बाहर और आसपास सभी जगह तलाश किया, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. बाजार गए रविंद्र को नैंसी के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना दे दी गई थी.

वह भी घर वापस लौट आए थे. तब तक रात के 9 बज गए थे. राघवेंद्र ने रविंद्र को बताया कि उस ने लल्लू को मोटरसाइकिल से नैंसी को अपहरण कर के ले जाते देखा था. जब तक वह उस के पास पहुंचता, तब वह भाग चुका था.

घर में शादी का माहौल था. नैंसी के अचानक गायब होने से खुशियों में खलल पड़ गई थी. चश्मदीद गवाह राघवेंद्र के बयान के आधार पर लल्लू और उस के भाई पवन को उसी रात हिरासत में ले लिया गया था. पूरी रात नैंसी की खोजबीन जारी रही. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

अगले दिन बबीता की शादी थी. राघवेंद्र घर में मौजूद होने के बावजूद बहन की शादी में शरीक नहीं हुआ.

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सोचीसमझी रणनीति के तहत ही राघवेंद्र ने बबीता की शादी में लल्लू और पवन द्वारा व्यवधान पैदा करने की अफवाहें फैलाई थीं. बहरहाल उस की शादी सकुशल संपन्न हो गई, कहीं कोई बाधा नहीं आई.

शादी बीत जाने के बाद तीनों बच्चों के बयान के आधार पर पुलिस ने बबीता से पूछताछ करनी चाही, लेकिन परिवार ने पूछताछ नहीं करने दी.

पुलिस की मिन्नतों और कानूनी मजबूरियां बताने के बाद बबीता से 10 मिनट ही पूछताछ की जा सकी. इस पूरी पूछताछ मे बबीता ने इतना ही कहा कि उसे कुछ नहीं मालूम, वह कुछ नहीं जानती.

रहस्यमय तरीके से गायब नैंसी की तीसरे दिन यानी 27 मई, 2017 को गांव से दूर नदी के किनारे लाश मिली. पुलिस की जांच में शक के दायरे में चचेरा चाचा राघवेंद्र और पंकज आए.

पूछताछ में दोनों आरोपियों ने नैंसी की हत्या करने की बात कबूल कर ली थी. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया, लेकिन घर वालों ने पुलिस की कार्यशैली पर ही सवाल उठा दिए.

उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने अपनी करनीकथनी छिपाने के लिए निर्दोषों को जेल भेज दिया, जबकि नैंसी के हत्यारे वे नहीं हैं, बल्कि असली मुलजिम लल्लू और पवन हैं. बबीता की शादी न हो सके, इसलिए दोनों ने नैंसी का अपहरण कर के उस की हत्या कर दी थी.

परिजनों के बयानों से पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है. जबकि नैंसी की हत्या एक राज बन कर रह गई है.

– कथा में बबीता परिवर्तित नाम है. कथा परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

मासूम नैंसी का कातिल कौन : भाग 1

12 वर्षीय नैंसी बचपन की देहरी लांघ कर किशोरावस्था में कदम रख रही थी. वह हंसती थी तो उस के  मुंह से फूल झड़ते थे और बोलती थी तो ऐसा लगता था जैसे उस के हर शब्द से चंचलता टपक रही हो. पूरी कोठी उस की शरारतों से महकतीगमकती रहती थी. जब से उसे चचेरी बुआ बबीता (परिवर्तित नाम) की शादी पक्की होने की बात पता चली थी, तब से खुशी के मारे उस के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. बबीता उस के चाचा सत्येंद्र की बेटी थी.

नैंसी कुमार रवींद्र नारायण झा की बड़ी बेटी थी. रवींद्र नारायण का परिवार बिहार के मधुबनी जिले की तहसील फुलपरास के थाना अंधरामढ़ क्षेत्र में आने वाले गांव महादेवमठ में रहता था. रवींद्र नारायण पेशे से शिक्षक हैं और मुक्तिनाथ एजुकेशन ट्रस्ट के तहत अपना खुद का मुक्तिनाथ पब्लिक स्कूल चलाते हैं. नर्सरी से 5वीं तक का यह स्कूल बिहार सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है. पिता के साथसाथ नैंसी की मां अर्चना भी सरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं. उन की नैंसी से छोटी एक और बेटी है. मधुबनी में रविंद्र नारायण की गिनती बड़े लोगों में होती है. ऐसे में सामाजिक मानप्रतिष्ठा स्वाभाविक है.

जिस बात को ले कर नैंसी उत्साहित थी, आखिरकार वह दिन आ ही गया. 26 मई, 2017 को उस की चचेरी बुआ बबीता की शादी थी. शादी से एक दिन पहले 25 मई को मेहंदी का कार्यक्रम था.

नातेरिश्तेदार आ चुके थे. घर में खुशियों का माहौल था. सत्येंद्र का घर रविंद्र के घर से थोड़ी सी दूरी पर था. मेंहदी की रस्म में रविंद्र के परिवार की महिलाएं भी शामिल हुईं.

नए कपडे़ पहन कर नैंसी खूब खुश थी. वह अपनी हमउम्र हिमांशु, साक्षी और भारती के साथ चाचा के घर के बाहर खेल रही थी. थोड़ी देर बाद नैंसी की मां अर्चना बाहर आईं तो बेटी को बच्चों के साथ न देख कर परेशान हुईं. उन के पूछने पर बच्चों ने बताया कि नैंसी यहीं कहीं होगी, थोड़ी देर पहले तक तो हमारे साथ ही खेल रही थी. बच्चे फिर से खेलने में मस्त हो गए. उधर अर्चना ने घर का कोनाकोना छान मारा, लेकिन नैंसी कहीं नजर नहीं आई.

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तभी किसी ने बताया कि उस ने नैंसी को साढ़े 6 बजे के करीब घर की ओर जाते देखा था. यह सुन कर अर्चना को थोड़ी तसल्ली हुई कि नैंसी घर चली गई है. थोड़ी देर बाद मेंहदी की रस्म पूरी कर के वह छोटी बेटी को ले कर घर पहुंची तो नैंसी वहां भी नहीं थी. यह देख कर अर्चना परेशान हो गईं. बात परेशान करने  वाली इसलिए थी क्योंकि नैंसी घर से इधरउधर कहीं नहीं जाती थी.

अर्चना की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने फोन कर के यह बात अपने पति कुमार रविंद्र नारायण को बताई. रविंद्र शादी की खरीदारी करने निर्मली बाजार गए थे. पत्नी का फोन सुन कर वह भी परेशान हो गए. खरीदारी कर के जब वह रात को 9 बजे घर पहुंचे तो उन के चचेरे भाई राघवेंद्र ने उन्हें एक चौंकाने वाली बात बताई.

उस ने बताया कि शाम साढ़े 6 बजे के करीब ग्रामीण बैंक के पास एक अज्ञात मोटर साइकिल वाला व्यक्ति नैंसी को मोटर साइकिल पर बैठा कर भाग गया. वह सांवले रंग का था और उस के चेहरे पर दाढ़ी थी. उस ने आसमानी रंग की चैक वाली शर्ट और काली पैंट पहन रखी थी. साथ ही उस के सिर पर गमछा भी बंधा था.

राघवेंद्र ने जो हुलिया बताया था वह उसी के गांव के रहने वाले पवन नाम के एक युवक से काफी मेल खाता था. इस का मतलब था कि पवन ने ही नैंसी का अपहरण किया था.  नैंसी के रहस्यमय ढंग से गायब होने को ले कर गांव भर में कोहराम मच गया. तब तक गांव के चारों तरफ नैंसी की तलाश कर ली गई थी.

जब बेटी का कहीं पता नहीं चला तो उसी रात रविंद्र गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर थाना अंधरामढ़ पहुंच गए. थानाप्रभारी राजीव उन्हें जानते थे. उन्होंने हालचाल पूछा तो रविंद्र ने उन्हें बेटी के अपहरण की बात बता दी. साथ ही गांव के ही पवन और लल्लू पर संदेह भी व्यक्त किया. थानाप्रभारी राजीव ने उन्हें लिखित तहरीर देने को कहा तो रविंद्र ने पवन और लल्लू पर संदेह व्यक्त करते हुए तहरीर लिख कर दे दी. पुलिस ने भादंवि की धारा 363, 365 के तहत पवन कुमार झा और लल्लू झा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

अफवाह के आधार पर पवन और लल्लू को ठहराया गया मुलजिम

अगले दिन 26 मई को रविंद्र नारायण की चचेरी बहन बबीता की बारात आने वाली थी. आरोपियों ने उस की शादी में विघ्न डालने के लिए नैंसी की अपहरण किया था. रविंद्र के अनुसार, आरोपियों के ऐसा करने के पीछे जो वजह थी, वह 5-6 साल पहले की एक घटना से जुड़ी हुई थी.

दरअसल, पवन और लल्लू सगे भाई थे और उन्होंने बबीता के साथ छेड़छाड़ की थी. इस पर राघवेंद्र और पंकज ने उन्हें खूब मारापीटा था. उसी का बदला लेने के लिए, उन दोनों भाइयों ने ऐसा किया था. रविंद्र ने यह बात भी पुलिस को बता दी थी.

मुकदमा दर्ज कराने के बाद घर लौटे रविंद्र को पता चला कि आरोपी पवन और लल्लू अपने घर में छिपे बैठे हैं. यह जान कर उन का खून खौल उठा. वह राघवेंद्र और कुछ रिश्तेदारों को साथ ले कर पवन के घर जा पहुंचे. पवन और लल्लू घर पर मिल गए. लोगों ने सारा गुस्सा दोनों भाइयों पर उतार दिया. फिर उन से पूछा कि उन्होंने नैंसी को अगवा कर के कहां छिपाया है.

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पवन और लल्लू ने कुछ नहीं बताया तो गांव वालों ने दोनों भाइयों को पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस उन की तलाश में पहले ही गांव आ चुकी थी. दोनों भाइयों के मुंह से शराब की बू आ रही थी. पुलिस ने दोनों को थाने ले जा कर नैंसी के बारे में पूरी रात पूछताछ की. दूसरी ओर पुलिस और घर वाले नैंसी को अलगअलग दिशाओं में तलाशते रहे.

आरोपी पवन और लल्लू खुद को निर्दोष बता रहे थे. उन का कहना था कि न तो उन्होंने नैंसी का अपहरण किया है और न ही उस के बारे में उन्हें कोई जानकारी है. सुबह से देर रात तक वे अपने ड्यूटी पर थे. चाहे तो इस बात की तसदीक करा लें. बता दें कि लल्लू शहर के एक पैट्रोल पंप पर नौकरी करता था.

26 मई को बबीता की शादी बिना किसी व्यवधान के संपन्न हो गई. लेकिन रविंद्र नारायण का मन बेटी में ही लगा था और वह उस की तलाश में जुटे थे. उन्होंने सभी जगह छान मारीं, लेकिन नैंसी का कहीं कोई पता नहीं चला. पुलिस अधीक्षक दीपक बरनवाल खुद इस मामले की मौनीटरिंग कर रहे थे.

27 मई, 2017 को शाम साढ़े 7 बजे गांव महादेवमठ से लगभग 1 किलोमीटर दूर तिलयुगा नदी के पुल के नीचे एक लाश पड़ी मिली. गांव वालों की सूचना पर अंधरामढ़ के थानेदार राजीव कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे. उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी थी.

बड़ी बेदर्दी से की गई थी नैंसी की हत्या

थोड़ी देर में डीएसपी फूलपरास, एएसपी झंझारपुर निधि रानी, एसपी दीपक बरनवाल भी वहां पहुंच गए. दीपक बरनवाल ने ऐहतियात के तौर पर जिले के कई थानेदारों को मौके पर बुलवा लिया था ताकि बात बिगड़ने पर कोई भी कानून अपने हाथ में न ले सके. सूचना पा कर रविंद्र और नैंसी के दादा सत्येंद्र सहित घर वाले भी मौके पर पहुंच गए. शव देख कर उन्होंने उस की पहचान नैंसी के रूप में कर दी.

3 दिनों से लापता नैंसी लाश बन कर सामने आई. उस की लाश मिलते ही गांव में सनसनी फैल गई. रविंद्र के घर में कोहराम मच गया. मासूम नैंसी की लाश जिस स्थिति में बरामद हुई थी, वह वाकई सभ्य समाज के लिए रोंगटे खड़े करने वाली बात थी. लाश फूल कर पूरी तरह क्षतविक्षत हो चुकी थी.

प्रथमदृष्टया उस के शरीर पर तेजाब डाल कर जलाए जाने के निशान नजर आ रहे थे. चेहरा बुरी तरह झुलसा हुआ था. उस के दोनों हाथों की नसें कटी हुई लग रही थीं. यहीं नहीं, उस मासूम के साथ बलात्कार की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता था. हत्यारों ने उस का गला भी बड़ी निर्ममता से रेता था.

नैंसी का शव मिलने के बाद पुलिस ने अपहरण के केस में भादंवि की धारा 302, 201, 120बी और जोड़ दीं. पुलिस ने प्राथमिक काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी. नैंसी के घर वालों के शक और बयान के आधार पर हिरासत में लिए गए दोनों आरोपियों लल्लू और पवन झा से पूछताछ कर के बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया.

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लोग संतुष्ट नहीं थे पुलिस की काररवाई से

नैंसी हत्याकांड चर्चाओं में आ चुका था. सोशल साइट्स कैंपेन के बाद लोगों में बढ़ते आक्रोश को देख कर शासनप्रशासन सकते में था. घटना के 2 दिनों बाद जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई तो पुलिस ने प्रैस कौन्फ्रेंस की, जिस में एसपी दीपक बरनवाल ने बताया कि पोस्टमार्टम से दुष्कर्म, नस काटने, गला रेतने या एसिड अटैक जैसी बातें प्रकाश में नहीं आई हैं.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार नैंसी की हत्या लगभग 72 घंटे पहले की गई थी. उस की मृत्यु का कारण था गला दबने से सांस रुक जाना. पोस्टमार्टम 3 डाक्टरों की टीम ने किया है, जिस में 2 महिलाएं और एक पुरुष शामिल थे.

लेकिन नैंसी के घर वालों ने यह कह कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया कि रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ की गई है, जबकि नैंसी की नस काटी गई थी और उस पर एसिड डाला गया था. पोस्टमार्टम में इस बात का कहीं जिक्र नहीं है.

नैंसी हत्याकांड ने मधुबनी ही नहीं पूरे बिहार को हिला कर रख दिया था. आम आदमी से ले कर कई दलों के नेता तक सड़क पर आ गए थे और आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रहे थे. नैंसी को इंसाफ दिलाने की मांग तेज पर तेज होती जा रही थी.

जस्टिस फौर नैंसी कैंपेन चला रही मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने दिल्ली के जंतरमंतर पर कैंडल मार्च निकाल कर विरोध प्रदर्शन किया. मिथिला स्टूडेंट यूनियन सहित कई सामाजिक, छात्र संगठनों व आम लोगों के द्वारा अररिया, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा सहित कई जिलों में जगहजगह कैंडल मार्च निकाले गए.

बहरहाल, लोगों के रोजरोज के जुलूस, धरनाप्रदर्शन और सोशल मीडिया पर गंभीर कमेंट्स पोस्ट होने से पुलिस की खूब थूथू हो रही थी. ऐसा भी नहीं था कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी थी.

नैंसी हत्याकांड मामले में जनता के बढ़ते दबाव से पुलिस के पसीने छूट रहे थे. लोगों का दबाव देख कर पुलिस अधीक्षक दीपक बरनवाल ने 3 जून, 2017 को थानेदार राजीव कुमार को निलंबित कर दिया और उन की जगह आशुतोष कुमार को थाने की जिम्मेदारी सौंप दी.

यही नहीं उन्होंने जांच का काम अंधरामढ़ थाने की जगह झंझारपुर की सहायक पुलिस अधीक्षक निधि रानी को सौंप दिया. उन के नेतृत्व में एसआईटी टीम का गठन किया गया. निधि ने जांच भी शुरू कर दी.

पता नहीं क्यों राघवेंद्र का बयान एएसपी निधि रानी के गले नहीं उतर रहा था. उन्होंने रविंद्र के बयान का विश्लेषण किया तो उस में कई झोल नजर आए. मसलन एक अकेला युवक 12 साल की किशोरी का कैसे अपहरण कर सकता था? अपहरण के समय नैंसी ने विरोध भी जरूर किया होगा, विरोध किया होगा तो वह अपने बचाव के लिए चिल्लाई भी होगी. लेकिन बताई गई जगह पर एक भी ऐसा गवाह नहीं मिला, जो राघवेंद्र के बयान को तसदीक कर पाता. इस का सीधा मतलब यह था कि वह झूठ बोल रहा था.

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एएसपी निधि रानी ने सुलझाई उलझी हुई गुत्थी

पुलिस ने इस बात को अपने तक ही सीमित रखा. इन सवालों के साथ निधि रानी ने उस पैट्रोल पंप के सीसीटीवी के फुटेज की जांच की, जहां लल्लू नौकरी करता था. फुटेज देख कर निधि हैरान रह गईं. राघवेंद्र ने जिस समय लल्लू द्वारा नैंसी के अपहरण किए जाने की बात कही थी, उस समय वह सीसीटीवी के फुटेज में पैट्रोल पंप की ड्यूटी करता हुआ नजर आ रहा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

छोटी जात की लड़की: भाग 2

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तभी बदहवास सी रिया ने घर में प्रवेश किया. उस की हालत देखते ही उषा का कलेजा कांप उठा. बिखरे हुए बाल, मिट्टी से सने हाथपांव, कंधे से फटा हुआ कुरता. ‘‘क्या हुआ? ऐक्सिडैंट हो गया था क्या? फोन तो कर देतीं,’’ उषा ने एक ही सांस में कई प्रश्न पूछ डाले.

‘‘हां, ऐक्सिडैंट ही कह सकती हो. कोचिंग के बाहर औटो का इंतजार कर रही थी कि अचानक कुछ लड़कों ने मुझे घेर लिया.’’ रिया सुबकते हुए अपने साथ हुए हादसे के बारे में बता ही रही थी कि उषा बीच में ही बोल पड़ी. ‘‘आखिर वही हुआ न जिस का मुझे डर था. अरे शालू जैसी छोटी जात की लड़की के साथ रहोगी तो यह दिन तो आना ही था. कितना समझाया था मैं ने कि उस से दूर रहो, मगर मेरी सुनता कौन है.’’

‘‘बस करो मां. आज शालू के कारण ही मैं सहीसलामत आप के सामने खड़ी हूं. उस ने वक्त पर आ कर मेरी मदद नहीं की होती तो आज मैं कहीं की न रहती. उसी छोटी जात की लड़की ने आज आप की लाडली के चरित्र पर दाग लगने से बचाया है,’’ रिया ने रोते हुए कहा और उषा को विचारों के जाल में उलझा छोड़ कर सुबकती हुई अपने कमरे में चली गई.

लगभग 6 महीने की कोचिंग में शालू और रिया ने कई प्रतियोगी परीक्षाएं दीं और आखिरकार छोटी जात के विशेष कोटे में शालू का चयन वन विभाग में सुपरवाइजर के पद पर हो गया. रिया का चयन न होने से उस के पापा काफी निराश हुए. मगर उषा बहुत खुश थी. वह सोच रही थी, ‘चलो, कैसे भी कर के आखिर उस शालू से पीछा तो छूटा.’

कुछ ही महीनों में रिया ने भी अच्छे औफर पर एक मल्टीनैशनल कंपनी जौइन कर ली. हालांकि अब दोनों सहेलियों का प्रत्यक्ष मिलना कम ही होता था मगर फिर भी फोन और सोशल मीडिया पर दोनों का साथ बराबर बना हुआ था. रोज रात को दोनों एकदूसरे से दिनभर की बातें शेयर किया करती थीं. कभीकभार शालू लंचटाइम में आ कर? उस से मिल जाया करती थी.

रिया की कंपनी अपनी शाखाओं का विस्तार गांवों और कसबों तक करना चाह रही थी. इसी सिलसिले में कंपनी के सीईओ ने उसे प्रोजैक्ट हेड बना कर एक छोटे कसबे में भेजने के आदेश दे दिए. हमेशा महानगर में रही रिया के लिए यह काम आसान नहीं था. उसे तो अपना कोई काम हाथ से करने की आदत ही नहीं थी.

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‘‘एक दिन की बात तो है नहीं, प्रोजैक्ट तो लंबा चलेगा. कसबों में रहनेखाने की कहां और कैसे व्यवस्था होगी. सोचसोच कर रिया परेशान थी. उषा ने तो सुनते ही उसे यह प्रोजैक्ट लेने से मना कर दिया और नौकरी छोड़ने तक की सलाह दे डाली, मगर रिया समझती थी कि उस का यह प्रोजैक्ट करना कितना जरूरी है क्योंकि इनकार करने का मतलब नईनई नौकरी से हाथ धोना तो है ही, साथ ही, यह उस की इमेज का भी सवाल था.

यों परेशानियों से घबरा कर अपने पांव पीछे हटाना उस के आगे के कैरियर पर भी सवाल खड़े कर सकता है. उस ने शालू से अपनी परेशानी का जिक्र किया तो शालू ने उसे हिम्मत से काम लेने को कहा. उसे समझाया कि जिंदगी में आने वाली परेशानियों से ही आगे बढ़ने के रास्ते खुलते हैं. फिर शालू ने उस कसबे में अपने विभागीय रैस्ट हाउस में रिया के रहने की व्यवस्था करवाई और साथ ही, वहां के अटेंडैंट को हिदायत दी कि रिया को किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.

रिया का नया प्रोजैक्ट मुंबई से लगभग 500 किलोमीटर की दूरी पर था. छोटा कसबा होने के कारण यातायात के साधन सीमित थे और इंटरनैट की उपलब्धता न के बराबर ही थी. हां, फोन की कनैक्टिविटी ठीकठाक होने से उस की परेशानी कुछ कम जरूर हुई थी.

अभी रिया को वहां गए महीनाभर भी नहीं हुआ था कि उषा की तबीयत अचानक खराब हो गई. उसे हौस्पिटल में भरती करवाया गया तो जांच में पता चला कि उस के गर्भाशय में बड़ी गांठ है. गांठ को निकालने की कोशिश से उषा की जान को खतरा हो सकता है, इसलिए औपरेशन कर के गर्भाशय ही निकालना पड़ेगा. खबर मिलते ही रिया तुरंत छुट्टी ले कर मुंबई आ गई. उषा का औपरेशन सफल रहा और 10 दिनों तक औब्जर्वेशन में रखने के बाद उसे हौस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया.

उषा को एक महीना बैड रैस्ट की सलाह दी गई थी. चूंकि रिया का प्रोजैक्ट और नौकरी दोनों ही नए थे, इसलिए उसे ज्यादा छुट्टी नहीं मिली और अब उस के सामने 2 ही विकल्प थे- या तो वह नौकरी छोड़े या फिर मां को अकेले छोड़ कर जाए. रिया कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही थी. शालू को जब यह बात पता चली तो उस ने तुरंत एक महीने की छुट्टी ली और अपना सामान ले कर रिया के घर पहुंच गई. पूरा एक महीना वह साए की तरह उषा के साथ बनी रही. उषा के खानेपीने से ले कर वक्त पर दवाएं देने और उस के नहानेधोने तक का शालू ने पूरा खयाल रखा.

उषा उस के इस दूसरे रूप को देख कर हैरान थी. एक छोटी जात की लड़की के बड़प्पन का यह दूसरा पहलू सचमुच उसे चौंकाने वाला था. कभी शालू को चरित्रहीन समझने वाली उषा को आज अपनी सोच पर बहुत पछतावा हो रहा था. मगर न जाने क्या था जो अब भी उसे शालू को गले लगाने और उसे अपनी देखभाल करने के लिए थैंक्यू कहने से रोक रहा था.

कल शालू की छुट्टी का आखिरी दिन था. उषा भी अब लगभग स्वस्थ हो चुकी थी. रात को खाना ले कर शालू उषा के कमरे में गई तो उस की आंखों में आंसू देख कर चौंक गई. ‘‘क्या हुआ आंटी? कुछ परेशानी है क्या?’’ शालू ने पूछा. उषा ने कोई जवाब नहीं दिया मगर दो बूंदों ने ढुलक कर उस के दिल का सारा हाल बयान कर दिया. शालू उस के पास गई. धीरे से उस का सिर अपने सीने से सटा लिया. उषा से अब अपनेआप को रोका नहीं गया और वह शालू से लिपट कर रो पड़ी.

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‘‘मुझे माफ कर देना शालू, मैं ने तुम्हारे बारे में बहुत ही गलत राय बना रखी थी. अपने बचकाना व्यवहार के लिए मैं तुम से बहुत शर्मिंदा हूं.’’

‘‘आप कैसी बातें करती हो आंटी? आप ने मेरे बारे में जैसी भी राय बनाई है, मैं ने तो हमेशा ही आप पर अपना अधिकार समझा है और इसी अधिकार के चलते मैं बेहिचक यहां आतीजाती रही हूं. सच कहूं, मुझे आप के तानों का जरा भी बुरा नहीं लगता था. कहीं न कहीं आप के दिल में मेरे लिए फिक्र ही तो थी जो आप को ऐसा करने के लिए मजबूर करती थी. इसलिए अब पिछली सारी कड़वी बातों को भूल जाइए. कल रिया आने वाली है न, हमसब मिल कर फिर से पहले की तरह मस्ती करेंगे,’’ शालू ने चहकते हुए कहा और उषा से लिपट गई.

उषा आज अपनी भूल पर बहुत पछता रही थी. वह शिद्दत से महसूस कर रही थी कि किसी व्यक्ति का सिर्फ एक ही पहलू देख कर उस के बारे में अपनी पुख्ता धारणा बना लेना कितना गलत हो सकता है. और यह भी कि यह फोर्थ जेनरेशन कितनी प्रैक्टिकल सोच रखने वाली पीढ़ी है. सचमुच वह कागज का टुकड़ा, जो उसे शालू के बैग से मिला था, उस के चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं था.

दिल्ली का जीबी रोड: नहीं आ रहे जिस्म के खरीदार

दिल्ली के अजमेरी गेट से ले कर लाहौरी गेट तक लगभग 1 किलोमीटर दूर तक फैले जीबी रोड यानी गास्ट्रिन बैस्टियन रोड की गिनती भारत के बड़े रैडलाइट एरिया में होती है. कभी मुगलों के समय यहां 5 रैडलाइट एरिया हुआ करता था लेकिन अंगरेजों ने अपने शासनकाल में इन सभी को मिला दिया और तभी से यह जीबी रोड के नाम से जाना जाने लगा. हालांकि 1965 में इस मार्ग का नाम बदल कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग जरूर कर दिया गया मगर आज भी यह जीबी रोड के नाम से ही मशहूर है.

मुजरों से गुलजार रातें

मुगलकाल में यहां रातें रंगीन हुआ करती थीं और नृत्य के बहाने मुजरा देखने और शारीरिक भूख शांत करने यहां सेठसाहुकार बङी संख्या में आते थे. घुंघरू की झनकार और तबले की थापों के बीच मदिरा यानी शराब का दौर भी चलता था. यहां आमतौर पर रईस लोग आते थे जिन्हें भोगविलास और नारी देह में डूबे रहना बेहद पसंद था. समय बदला तो इस बदलाव का असर यहां भी हुआ. अब यहां जिस्मानी सुख की तलाश में लोग आने लगे, फिर चाहे दिन हो या रात. अलबत्ता मुजरे का दौर आज भी यहां बदस्तूर जरूर चलता है पर 1-2 जगहों पर ही, लेकिन ज्यादातर वही ग्राहक आते हैं जिन्हें मुजरे से अधिक दिलचस्पी शारीरिक सुख लेना होता है.

लेकिन दिनरात चलने वाले इस धंधे में आजकल सन्नाटा पसरा है. विश्वव्यापी कोरोना वायरस महामारी के बाद देश में लागू लौकडाउन से यह पूरा इलाका आजकल वीरान है. जहां पहले यहां 3 हजार से अधिक सैक्स वर्कर थीं, वहीं फिलहाल 1 डेढ़ हजार ही बची हुई हैं.

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कोरोना ने थाम दी है जिस्म की खरीदारी

मार्च का महीना शुरू होते ही देश में कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ना शुरू हुआ तो यहां के कोठों में आने वाले ग्राहकों की संख्या नहीं के बराबर हो गई. 23 मार्च से जनता कर्फ्यू और इस के बाद समाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश आए तो जिस्म के खरीदारों ने यहां आना पूरी तरह बंद कर दिया.

जीबी रोड स्थित एक कोठे में काम करने वाले एक दलाल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,”यहां आमतौर पर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, झारखंड, असम और नेपाल आदि जगहों की सैक्स वर्कर हैं जिन के सामने इस समय भुखमरी की समस्या आ खङी हुई है.”

यहां कोठों के नीचे दुकानें भी हैं जो फिलहाल बंद हैं. कोठों की पहली और दूसरी मंजिल पर वेश्यालय चलते हैं. यही हाल अन्य कोठों की भी है.

बिस्कुट तक खरीदने को पैसे नहीं

यहां 32 साल की एक सैक्स वर्कर रीना (बदला नाम) ने बताया,”हमारे पास बिस्कुट तक खरीदने के पैसे नहीं हैं. बस जिंदा हैं तो कुछ एनजीओ और सरकारी राशन की वजह से. ये हमें कुछ न कुछ जरूरत की चीजें देते रहते हैं.”

उस दलाल ने बताया,”लौकडाउन से ज्यादा अब लोगों को कोरोना वायरस का डर है और फिलहाल तो कई महीनों तक यहां ग्राहक आने से रहे.”

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आखिर क्या है मजबूरी

स्पीड यानी सोसाइटी फौर पार्टीसिपैट्री इंटीग्रैटेड डेवलपमैंट की वाइस प्रेसिडैंट, ललिता यहां की महिलाओं और बच्चों की उत्थान के लिए पिछले 30 सालों से काम कर रही हैं. संस्था का काम यहां रह रहीं सैक्स वर्करों और उन के बच्चों को संरक्षण देने का है.

ललिता कहती हैं,”इन सैक्स वर्करों की जिंदगी शुरू से ही खराब रही है. समाज द्वारा सताई गईं, प्रेम अथवा अवैध संबंधों में धोखा खाईं, जबरन अपहरण की गईं ही अधिकतर महिलाओं को यहां लाया जाता है तो वे फिर चाह कर भी यहां से निकल नहीं पातीं क्योंकि उन्हें पता है कि न तो परिवार और न ही समाज उन्हें फिर से स्वीकारेगा. मजबूरन वे इस दलदल में फंसती हैं तो फंसती चली जाती हैं.

“हम न सिर्फ यहां की सैक्स वर्करों, बल्कि उन के बच्चों को शिक्षा आदि के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि वे अपने पैरों पर खङे हो सकें.” ललिता बताती हैं,”सैक्स वर्करों को इस धंधे में धकेलने के लिए नशे की आदत भी डलवाई जाती है ताकि वे इस बुरी लत की इस कदर शिकार हो जाएं कि जहर बांटने वाले की बात मानना मजबूरी बन जाए.”

पूरा इलाका अब बंद

दिल्ली की कुलीन कौलगर्ल्स में से ज्यादातर जहां समाजिक दूरी जैसी परिस्थितियों में निजी औडियो या वीडियो चैट लाइनों के जरीए फोन सेवाओं पर उपलब्ध रह सकती हैं, वहीं जीबी रोड की सैक्स वर्कर आमतौर पर मानव तस्करी का शिकार होती हैं और दूरदराज के इलाकों से लाई जाती हैं. पहले कम उम्र की लङकियां भी मानव तस्करी द्वारा लाई जाती थीं पर कानून की सख्ती से अब यहां एडल्ट यानी बालिग सैक्स वर्कर ही रह रही हैं. अब भी इन्हें ग्राहकों की खोज रहती है पर लौकडाउन की वजह से पूरा इलाका ही बंद है.

दुखदायी है जीवन

स्पीड के ही एक पदाधिकारी अवधेश यादव बताते हैं,”कोरोना महामारी के बाद से इन का जीवन और भी दुखदायी हो गया है. इस का असर इन के बच्चों पर भी पङा है और इस समय जबकि सारे स्कूल बंद हैं इन्हें पास के अजमेरी गेट और लाहौरी गेट स्थित सरकारी स्कूलों में रखा गया है और वहीं भोजनपानी के साथ इन की पढ़ाई की भी व्यवस्था की गई है.”

यह पूछने पर कि इन के बच्चों को स्कूलों में दाखिला कैसे मिलती है? ललिता ने बताया,”लोकतंत्र में सब को समान अवसर मिलता है. शिक्षा मौलिक अधिकार है और किसी भी स्कूल में दाखिले के लिए जरूरी नहीं कि पिता का नाम बताया जाए. ये बच्चे अपनी माता के नाम से ही दाखिला लेते हैं और पढ़ाई करते हैं. शिक्षा इन के लिए इसलिए भी जरूरी है ताकि ये पढ़लिख कर अपने पैरों पर खङे हो सकें और फिर अपनी माता को इस दलदल से निकाल सकें. कई बच्चों ने ऐसा किया भी है.”

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पढ़ना चाहती हैं यहां की बेटियां

यहां सैक्स वर्करों की कुछ बेटियां भी उन के साथ रहती हैं, जो पढ़ना चाहती हैं, आगे बढ़ना चाहती हैं. वे चाहती हैं कि आम बच्चों की तरह वे भी आगे चल कर नौकरियां करें, डाक्टर, इंजीनियर बनें. इन की मांएं नहीं चाहतीं कि जिन अंधेरी गलियों में रह कर उन्होंने कष्ट झेले हैं, शरीर को पुरूष राक्षसों से नोचवाया है, अरमानों और सपनों को कुचलवाया है, उन की बेटियां इस दलदल में पङें. इसलिए बङी संख्या में सैक्स वर्करों की बेटियां अब स्कूल जाती हैं, पढ़ती हैं. मगर लौकडाउन के बाद स्कूल जब बंद हो गए तो कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं ने इन के रहने और पढ़ाने का जिम्मा उठाया है.

ललिता बताती हैं कि संस्थाओं से ले कर दिल्ली पुलिस भी इन की मदद करती है और जरूरी राशन का इंतजाम भी कर रही है.

ये भी हमारी तरह ही इंसान हैं

दिल्ली महिला आयोग की सदस्य प्रोमिला गुप्ता कहती हैं,”हमारी तरह इन को भी अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक है. इन को भी यह मौलिक अधिकार है कि इन के बच्चे समाज की मुख्यधारा में शामिल हों, शिक्षा और तमाम जरूरी चीजें इन्हें मिलें.

दिल्ली महिला आयोग ने समयसमय पर इन सैक्स वर्करों की पुनर्वास की भी पहल की है. जबरन धंधे में धकेली गईं महिलाओं को इस दलदल से निकाला भी गया है. आयोग ने समयसमय पर दिल्ली पुलिस के साथ मिल कर अभियान भी चलाया है ताकि इस नारकीय जिंदगी से मुक्त हो कर ये बेहतर जिंदगी जी सकें.”

मगर फिलहाल तो अभी लौकडाउन है और ऐसा लगता भी नहीं कि यहां रहने वाली सैक्स वर्करों की जिंदगी पटरी पर आए.

प्रोमिला गुप्ता कहती हैं कि सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के प्रयासों से आम जनता की तरह इन का भी ध्यान रखा जा रहा है. जरूरी चीजें व राशन पहुंचाए जा रहे हैं. हां, सैक्स वर्करों को इस गंद से निकालने की जिम्मेदारी एक चुनौती जरूर है.”

पर यह बीङा उठाए कौन? एक नारी को अपने देह पर पूरा अधिकार है. मगर कानून इस की इजाजत नहीं देता कि वह शरीर को व्यवसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करे.

एडवोकेट बसंत सिंह कहते हैं,”भारतीय दंडविधान 1860 से वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक 1956 तक सभी कानून वेश्यालयों को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं. इस कानून के अनुसार सैक्स वर्कर्स कानूनी तौर पर जनता में ग्राहकों की मांग नहीं कर सकती हैं.

“आईटीपीए 1986 वेश्यावृत्ति को रोकने के लिए बनाया गया है.”
मगर यह विडंबना ही है कि सरकार इसे रोकने के लिए कानून का हवाला देती है पर देश में सैक्स वर्करों की बेहतर जिंदगी के लिए ठोस उपाय ढूंढ़ने में विफल रही है.

अब देशभर की सैक्स वर्कर्स की स्थिति नाजुक दौर में है तिस पर कोरोना वायरस की मार और फिर लौकडाउन. आम नागरिक की तरह लोकतंत्र में इन को मौलिक अधिकार मिले हैं पर उस पुरूषवादी समाज का क्या जो नारी देह को सिर्फ भोगना जानता है, नीच और तुच्छ समझता है, धर्म का भय दिखाता है? ऐसे में इन की दशा सुधरेगी इस में संदेह ही है.

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