Mirzapur 2 : गालियों और गोलियों से भरपूर वेब सीरीज, रिलीज हुआ दूसरा सीजन

16 नवंबर 2018 में आई पौपुलर वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ (Mirzapur) ने लोगों के दिलों में अपनी ऐसी जगह बनाई हुई है कि लोग इस वेब सीरीज के एक एक डायलॉग के फैन हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं कि करीब 2 साल बाद यानी कि 23 अक्टूबर 2020 को मिर्जापुर का दूसरा सीजन (Mirzapur Season 2) रिलीज हो चुका है. आपको बता दें कि वेब सीरीज मिर्जापुर के अपने सीजन का इंतजार फैंस बड़ी ही बेसब्री से कर रहे थे.

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वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ (Mirzapur) ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘अमेजोन प्राइम वीडियो’ (Amazon Prime Video) पर रिलीज हुई है. आपको बता दें कि इस सीजन के कुल 10 एपिसोड्स हैं और पूरे सीजन में ‘गुड्डू भैय्या’ से लेकर हर कोई ‘मिर्जापुर’ की गद्दी ‘कालीन भैय्या’ से छीनने में लगा हुआ है. अब देखने वाली बात ये होगी कि क्या कोई मिर्जापुर की गद्दी से कालीन भैय्या को उठा पाता है.

जैसा कि हम सब जानते हैं कि ‘मिर्जापुर’ (Mirzapur) के पहले सीजन में खूब गाली गलौज और खून खराबा देखने को मिला था तो ऐसे में मिर्जापुर का दूसरा सीजन भी गालियां और गोलियों से भरा हुआ है. यह वेब सीरीज एक फुल एक्शन पैकेज है जो कि सस्पेंस से भरपूर है. सीजन के शुरूआती एपिसोड की बात करें तो पहले सीजन के आखिरी एपिसोड में घायल हुए गुड्डू पंडित (अली फजल), गोलू गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) और डिंपी पंडित (हर्षिता गौर) मिर्जापुर से कहीं दूर अपना इलाज करवा रहे होते हैं.

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maqbool, aaj hum din mein aaram karenge, raat bhar munna ke saath mirzapur dekhne ka plan kiye hai

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ऐसे में तीनों का उद्देश्य बस एक ही होता कि किसी भी प्रकार मिर्जापुर की गद्दी हासिल करनी है और कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) और मुन्ना भैया (दिव्येंदु शर्मा) से बदला लेना है. अब तो आप समझ ही गए होंगे इस सीजन में कितना रोमांच देखने को मिलने वाला है.

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जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं वैसे वैसे ही टीवी के सबसे पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस के सीजन 14 (Bigg Boss 14) में एंटरटेनमेंट भी बढ़ता जा रहा है. बिग बॉस 14 किसी ना किसी बात को लेकर सुर्खियों में आने लगा है और तो और तूफानी सीनियर्स यानी कि सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla), हिना खान (Hina Khan) और गौहर खान (Gauhar Khan) अपनी गेम से इस सीजन को और भी ज्यादा इंटरस्टिंग बनाने में लगे हुए हैं.

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आपको बता दें कि बिग बॉस सीजन 14 (Bigg Boss 14) के घर में पहला कैप्टेंसी टास्क होने जा रहा है और इस कैप्टेंसी टास्क में दर्शकों के खूब हंगामा देखने को मिलेगा. इस दौरान कंटेस्टेंट निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) जमकर मेहनत करेंगी की वे घर की पहली कैप्टन बने क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि वे बाकी कंटेस्टेंट्स से पीछे नहीं रहना चाहतीं.

ऐसे में कंटेस्टेंट निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) अपने दोस्तों की मदद ना करते हुए खुब अपने लिए खेलेंगी और निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) को ऐसे खेलता देख उनके दोस्त जान कुमार सानू (Jaan Kumar Sanu) और निशांत मलखानी (Nishant Malkani) को काफी बुरा लगेगा. इस टास्क में बिग बॉस ने कंटेस्टेंट पवित्रा पुनिया (Pavitra Punia) और एजाज खान (Eijaz Khan) को संचालक बनाया तो ऐसे में वे दोनों ही आपस में भिड़ते दिखाई दिए.

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बिग बॉस 14 (Bigg Boss 14) का आने वाला एपिसोड काफी धमाकेदार होने वाला है क्योंकि जहां एक तरफ निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) और जान कुमार सानू (Jaan Kumar Sanu) घर के पहले कैप्टन बनने का सपना देख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ निशांत मलकानी (Nishant Malkani) अपनी गेम से घर के पहले कैप्टन बन जाएंगे.

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ऐक्टिंग और डांस मेरा पहला प्यार – पूनम दुबे

भोजपुरी सिनेमा की टौप हीरोइनों में गिनी जाने वाली पूनम दुबे किसी भी मुद्दे पर खुल कर अपने विचार रखती हैं. उन्होंने भोजपुरी सिनेमा में बतौर हीरोइन साल 2014 में अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत की थी. अब तक उन्होंने ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘जानम’, ‘इंतकाम’, ‘रंगदारी टैक्स’, ‘चना जोर गरम’ जैसी कई कामयाब फिल्में दी हैं.

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पूनम दुबे ने ‘मिस इलाहाबाद’ का खिताब भी जीता. एयर होस्टैस बनने का सपना पाले वे अचानक भोजपुरी फिल्मों में आईं और आज भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में उन का बड़ा नाम है. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

अपने पारिवार और फिल्मों में आने तक के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं मिडिल क्लास फैमिली से हूं और मेरी मम्मी सिंगल मदर हैं. मम्मी ने मेरी और मेरे भाई की परवरिश में कोई कमी नहीं की. शुरू में मैं एयर होस्टैस बनना चाहती थी और इस के लिए मैं ने एयर होस्टैस के कोर्स में दाखिला भी लिया था, लेकिन मेरे परिवार वाले इस के खिलाफ थे.

इस बात से मैं बहुत दुखी थी. मुझे खुश करने के लिए मेरे मामाजी ने ‘मिस इलाहाबाद’ का फार्म भरवाया और मेरे लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा था, क्योंकि मैं ‘मिस इलाहाबाद’ बन भी गई. इस के बाद ‘मिस यूपी’ प्रतियोगिता में टौप फाइव में रही.

ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैं मुंबई आ गई, तब से फिल्मों में काम करने का सिलसिला सा चल निकला.

भोजपुरी फिल्मों में किया गया आप का कौन सा किरदार आप से मेल खाता है?

फिल्म ‘रंगदारी टैक्स’ में मेरा किरदार प्रिया मेरी नेचर से काफी मेल खाता है.

भोजपुरी बैल्ट में आप की पहचान एक हौट ऐक्ट्रैस की है. अगर आप को एक दबंग लड़की का किरदार करना हो, तो क्या लोग उस रोल में आप को स्वीकार कर पाएंगे?

मैं ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में आइटम गीत से अपने काम की शुरुआत की थी और साल 2014 से मैं ने बतौर हीरोइन लीड रोल में काम करना शुरू किया था.

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दर्शकों ने फिल्मों में मेरे हौट लुक को काफी पसंद किया. बाद में मैं ने फिल्म ‘रंगदारी टैक्स’ में एक दबंग लड़की का किरदार निभाया, वहीं फिल्म ‘दुश्मन सरहद पार’ में एक दबंग आईपीएस का किरदार निभाया. दर्शकों ने मेरे दबंग रोल को भी उतना ही प्यार दिया.

आप की आने वाली फिल्में कौनकौन सी हैं?

मेरी आने वाली फिल्मों में ‘प्रेम युद्ध’, ‘मैं तेरा आशिक’, ‘छुपा रुस्तम’, ‘गुमराह’, ‘पारो : एक सच्ची प्रेमकथा’ शामिल हैं.

यह देखा गया है कि लड़कियों में काकरोच, छिपकली जैसे घरेलू जीवजंतुओं को ले कर डर बना रहता है. क्या आप के साथ भी कुछ ऐसा है?

मैं इस तरह के मामलों में बहुत ही हट कर हूं. मैं काकरोच, कुत्तेबिल्ली, छिपकली से बिलकुल नहीं डरती हूं. पहले मैं सांप से बहुत डरती थी, लेकिन फिल्म ‘चना जोर गरम’ में मैं ने असली सांप के साथ शूट किया था, तो इस के बाद मैं ने सांप से भी डरना छोड़ दिया.

अगर आप को किसी फिल्म में हास्य कलाकार या खलनायिका में से कोई रोल निभाने को कहा जाए, तो कौन सा रोल करना चाहेंगी?

अगर मेरे लिए ऐसे किसी रोल का औफर आया तो सब से पहले मैं खलनायिका बनना पसंद करूंगी, क्योंकि कौमेडी करना सब के बस की बात नहीं होती है. मेरे खयाल से जो कौमेडियन होता है, वह सब से बड़ा ऐक्टर होता है.

आप कौन सी ड्रैस पहन कर खुद को सैक्सी महसूस करती हैं?

मैं साड़ी पहन कर सब से सैक्सी महसूस करती हूं, क्योंकि साड़ी से भले ही सबकुछ ढका होता है, लेकिन यह सब से ज्यादा स्वीट और ग्लैमरस होता है.

अगर आप को टैलीविजन शो ‘बिग बौस’ से औफर आता है, तो क्या हामी भरेंगी?

‘बिग बौस’ के लिए मैं कभी हामी ही नहीं भरूंगी, क्योंकि मैं किसी भी विवादित शो का हिस्सा नहीं बनना चाहती हूं और न ही इस के लिए अपने आप को सहज महसूस करती हूं. मुझे लड़ाईझगड़ा, शोरशराबा बिलकुल भी पसंद नहीं है.

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अदाकारी के अलावा कोई और शौक?

अदाकारी के अलावा मैं बहुत अच्छी कुक हूं. मुझे घर पर खाना बनाना बहुत अच्छा लगता है. डांस करना मेरा शौक है या कह लिया जाए कि डांस मेरी हौबी है. इस के अलावा मैं सोशल वर्क भी कर लेती हूं.

भोजपुरी सिनेमा में आप का सब से बड़ा दुश्मन कौन है?

भोजपुरी सिनेमा में मेरा कोई दुश्मन नहीं है. इंडस्ट्री के सभी लोग मेरे अच्छे दोस्त हैं, लेकिन तब जरूर बुरा लगता है जब कोई पर्सनल दुश्मनी के चलते किसी टैलेंटेड हीरोहीरोइन की टांग खींचता है.

आप स्क्रीन पर क्या नहीं करना चाहेंगी?

मैं स्क्रीन पर ऐक्स्ट्रा ग्लैमर नहीं परोस सकती हूं. मैं बिकिनी शूट नहीं कर सकतीं हूं. मैं ऐसी फिल्में करना चाहती हूं, जिन्हें अपने परिवार के साथ देख सकूं, इसीलिए मैं ने वैब सीरीज के कई औफर ठुकरा दिए.

कमीशन : भाग 3

आकाशवाणी पहुंची तो सब से पहले उन महोदय से मिली जिन से अंकल ने मुलाकात करवाई थी. उन्होंने खुद चल कर मेरी वार्ता की रिकार्डिंग करवाई और मेरे अच्छा बोलने पर मुझे बहुत सराहा भी. मुझे तो वे बड़े अच्छे लगे. उम्र यही कोई 40 के आसपास होगी. रिकार्डिंग के बाद वे मुझे अपने केबिन में ले गए. मेरे लिए चाय भी मंगवाई, शायद इसलिए कि अंकल को जानते थे. अंकल ने मेरे सामने ही उन से कहा था कि मेरी बेटी जैसी ही है. इस का ध्यान रखना.

चाय आ गई थी और उस के साथ बिस्कुट भी. उन्होंने मुझे बड़े अदब से चाय पेश की और मुझ से बातें भी करते रहे. बोले, ‘‘चेक ले कर ही जाइएगा दीयाजी. हो सकता है कि थोड़ी देर लग जाए. बहुत खुशी होती है न कुछ करने का पारिश्रमिक पा कर.’’

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और तब मैं सोच रही थी कि शायद अब यह मतलब की बात करें कि बदले में मुझे उन्हें कितना कमीशन देना है. मैं तो बिलकुल ही तैयार बैठी थी उन्हें कमीशन देने को. मगर मुझ से उन्होंने उस का कुछ जिक्र ही नहीं किया. मैं ने ही कहा, ‘‘सर, मैं तो आकाशवाणी पर बस प्रोग्राम करना चाहती हूं. बाकी पारिश्रमिक या पैसे में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है. मेरी रचनात्मक प्रवृत्ति का होना ही कुदरत की तरफ से दिया हुआ मुझे सब से बड़ा तोहफा है जो हर किसी को नहीं मिलता है. सर, यह यहां मेरा पहला प्रोग्राम है. आप ही की वजह से यह मुझे मिला है. यह मेरा पहला पारिश्रमिक मेरी तरफ से आप को छोटा सा तोहफा है क्योंकि जो मौका आप ने मुझे दिया वह मेरे लिए अनमोल है.’’

कहने को तो मैं कह गई, लेकिन डर रही थी कि कहीं वे मेरे कहे का बुरा न मान जाएं. सब तरह के लोग होते हैं. पता नहीं यह क्या सोचते हैं इस बारे में. कहीं जल्दबाजी तो नहीं कर दी मैं ने अपनी बात कहने में. मेरे दिलोदिमाग में विचारों का मंथन चल ही रहा था कि वे कह उठे, ‘‘दीयाजी, आप सही कह रही हैं, यह लेखन और यह बोलने की कला में माहिर होना हर किसी के वश की बात नहीं. इस फील्ड से वही लोग जुड़े होने चाहिए जो दिल से कलाकार हों. मैं समझता हूं कि सही माने में एक कलाकार को पैसे आदि का लोभ संवरण नहीं कर पाता. आप की ही तरह मैं भी अपने को एक ऐसा ही कलाकार मानता हूं. मैं भी अच्छे घर- परिवार से ताल्लुक रखता हूं, जहां पैसे की कोई कमी नहीं. मैं भी यहां सिर्फ अपनी रचनात्मक क्षुधा को तृप्त करने आया हूं. आप अपने पारिश्रमिक चेक को अपने घर पर सब को दिखाएंगी तो आप को बहुत अच्छा लगेगा. यह बहुत छोटा सा तोहफा जरूर है, लेकिन यकीन जानिए कि यह आप को जिंदगी की सब से बड़ी खुशी दे जाएगा.’’

उन की बात सुन कर मैं तो सचमुच अभिभूत सी हो गई. मैं तो जाने क्याक्या सोच कर आई थी और यह क्या हो रहा था मेरे साथ. सचमुच कुछ कह नहीं सकते किसी के भी बारे में, कहीं के भी बारे में. हर जगह हर तरह के लोग होते हैं. एक को देख कर दूसरे का मूल्यांकन करना निरी मूर्खता है. जब हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं तो…यह तो मेरा वास्ता कुछ ऐसे शख्स से पड़ा, कहीं वह मेरी इसी बात का बुरा मान जाता तो. सब शौक रखा रह जाता आकाशवाणी जाने का.

घर आ कर अंकल को यह सब बताया तो उन्हें भी मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ. मम्मीपापा तो यूरोप भ्रमण पर चले गए थे. उन से बात नहीं हो पा रही थी जबकि मैं कितनी बेचैन हो रही थी मम्मी को सबकुछ बताने को.

अब तो कई बार वहां कार्यक्रम देने जा चुकी हूं. कभी कहानी प्रसारित होती है तो कभी वार्ता. बहुत अच्छा लगता है वहां जा कर. मुझे एकाएक लगने लगा है कि जैसे मैं भी कितनी बड़ी कलाकार हो गई हूं. शान से रिकार्डिंग करने जाती हूं और अपने शौक को यों पूरा होते देख खुशी से फूली नहीं समाती. अपने दोस्तों के दायरे में रिश्तेदारों में, अगलबगल मेरी एक अलग ही पहचान बनने लगी है और इन सब के लिए मैं दिल से अंकल की कृतज्ञ थी, जिन्होंने अपने अतीत के इतने कड़वे अनुभव के बावजूद मेरी इतनी मदद की.

इस बीच मम्मीपापा भी यूरोप घूम कर वापस आ गए थे. कुछ सोच कर एक दिन मैं ने मम्मी और पापा को डिनर पर अपने यहां बुला लिया. जब से हम ने यह घर खरीदा था, बस, कभी कुछ, कभी कुछ लगा रहा और मम्मीपापा यहां आ ही नहीं पाए थे. अंकल से धीरेधीरे, बातें कर के मेरा शक यकीन में बदल गया था कि मम्मी और अंकल अतीत की एक कड़वी घटना के तहत एक ही सूत्र से बंधे थे.

मम्मी को थोड़ा हिंट मैं ने फोन पर ही दे दिया था, ताकि अचानक अंकल को अपने सामने देख कर वे फिर कोई बखेड़ा खड़ा न कर दें. कुछ इधर अंकल तो बिलकुल अपने से हो ही गए थे, सो उन्हें भी कुछ इशारा कर दिया. एक न एक दिन तो उन लोगों को मिलना ही था न, वह तो बायचांस यह मुलाकात अब तक नहीं हो पाई थी.

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और मेरा उन लोगों को सचेत करना ठीक ही रहा. मम्मी अंकल को देखते ही पहचान गईं पर कुछ कहा नहीं, लेकिन अपना मुंह दूसरी तरफ जरूर फेर लिया. डिनर के दौरान अंकल ने ही हाथ जोड़ कर मम्मी से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘आप से माफी मांगने का मौका इस तरह से मिलेगा, कभी सोचा भी नहीं था. अपने किए की सजा अपने लिए मैं खुद ही तय कर चुका हूं. मुझे सचमुच अफसोस था कि मैं ने अपने अधिकार, अपनी पोजीशन का गलत फायदा उठाया. अब आप मुझे माफ करेंगी, तभी समझ पाऊंगा कि मेरा प्रायश्चित पूरा हो गया. यह एक दिल पर बहुत बड़ा बोझ है.’’

मम्मी ने पहले पापा को देखा, फिर मुझे. हम दोनों ने ही मूक प्रार्थना की उन से कि अब उन्हें माफ कर ही दें वे. मम्मी भी थोड़ा नरम पड़ीं, बोलीं, ‘‘शायद मैं भी गलत थी अपनी जगह. समय के साथ चल नहीं पाई. जरा सी बात का इतना बवंडर मचा दिया मैं ने भी. हम से ज्यादा समझदार तो हमारे बच्चे हैं, जिन की सोच इतनी सुलझी हुई और व्यावहारिक है,’’ मम्मी ने मेरी तरफ प्रशंसा से देखते हुए कहा. फिर बोलीं, ‘‘अब सही में मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है. मेरी बेटी की इतनी मदद कर के आप ने मेरा गुस्सा पहले ही खत्म कर दिया था. अब माफी मांग कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए. दीया की तरह मेरा भी प्रोग्राम वहां करवा सकते हैं क्या आप? मैं आप से वादा करती हूं कि अब कुछ गड़बड़ नहीं करूंगी.’’

मम्मी ने माहौल को थोड़ा सा हल्काफुल्का बनाने के लिए जिस लहजे में कहा, उसे सुन हम सभी जोर से हंस पडे़.

कमीशन : भाग 2

घर वाकई बहुत खूबसूरत मिल गया था. मकान मालिक की पत्नी का देहांत कुछ समय पहले हो गया था. उन के एक बेटा था, जो अमेरिका में ही शादी कर के बस गया था. उन्हें अब इतने बड़े घर की जरूरत ही नहीं थी सो इसे हमें सेल कर दिया. अपने लिए सिर्फ एक कमरा रखा, जिस में अटैच्ड बाथरूम वगैरह था. इस से ज्यादा उन्हें चाहिए ही नहीं था. थोड़े ही दिनों में वे हम से खुल गए थे. हम भी उन्हें घर के एक बुजुर्ग सा ही मान देने लगे थे. हीरामणि का दाखिला भी अच्छे स्कूल में हो गया था. अभिमन्यु सब तरह से संतुष्ट हो कर अपनी ड्यूटी पर चले गए. उन के जाने के बाद तो अंकल और अपने लगने लगे थे. वे मुझे और हीरामणि को अपना बच्चा ही समझते थे. हीरामणि तो उन्हें दादाजी भी कहने लगी थी. बच्चे तो वैसे भी कोमल मन और कोमल भावनाओं वाले होते हैं, जहां प्यार और स्नेह देखा, बस वहीं के हो कर रह गए.

पहले अंकल ने टिफिन भेजने वाली लेडी से कांट्रेक्ट कर रखा था. दोनों समय का खानापीना वह ही पैक कर के भेज देती थी. नाश्ते में अंकल सिर्फ फल और टोस्ट लेते थे. उन की बेरंग सी जिंदगी देख कर कभीकभी बुढ़ापे से डर लगने लगता था. कितना भयानक होता है न बुढ़ापे का यह अकेलापन.

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थोड़े दिनों में जब दिल से दिल जुड़े और अपनत्व की एक डोर बंधी तो मैं ने उन का बाहर से वह टिफिन बंद करवा कर अपने साथ ही उन का भी खाना बनाने लगी. अब हम एकदूसरे के पूरक से हो गए थे. बिना अभिमन्यु के हमें भी उन से एक बड़े के साथ होने की फीलिंग होती थी और उन्हें भी हम से एक परिवार का बोध होता.

इसी बीच बातोंबातों में एक दिन पता चला कि अंकल कभी आकाशवाणी केंद्र में एक अच्छे ओहदे पर हुआ करते थे. पता नहीं क्यों उन्होंने समय से पहले ही वहां से रिटायरमेंट ले लिया था. शायद उन्हें नौकरी करने की कोई जरूरत नहीं थी या फिर वहां के काम से बोर हो गए थे. खैर, जो भी हो, मैं तो बस तब से ही उन के पीछे पड़ गई थी कि मेरा भी कभीकभी कुछ आकाशवाणी में प्रोग्राम वगैरह करवा दें. उन की तो काफी लोगों से जानपहचान होगी. तब उन्होंने बताया कि वह यू.पी. के एक छोटे से आकाशवाणी केंद्र में थे. अब तो छोड़े हुए भी उन्हें काफी समय हो गया, कोई जानपहचान वाला मिलेगा भी या नहीं, लेकिन मैं थी कि बस लगी ही रही उन के पीछे.

उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि इन जगहों पर असली टैलेंट की कोई कद्र नहीं होती. बस, सब अपनेअपने सगेसंबंधियों और जानपहचान वालों को मौका देते रहते हैं और कमीशन के नाम पर उन्हें भी नहीं बख्शते. वे अपनी कहते रहे तो मैं भी बस उन से यही कहती रही, ‘‘अंकल, आज के समय में यह कोई बड़ी बात थोड़े ही है और कमीशन बताइए अंकल कि कहां नहीं है. मकान खरीदो तो प्रोपर्टी डीलर कमीशन लेता है, सरकारी आफिस में कोई टेंडर निकलवाना हो तो अफसरों को कमीशन देना पड़ता है, यहां तक कि पोस्टआफिस में भी किसी एजेंट के द्वारा कोई पालिसी खरीदो तो जहां उसे सरकार कमीशन देती है, तो उस से कुछ कमीशन पालिसीधारक को भी मिलता है. और भी क्याक्या गिनाऊं, हर जगह यही हाल है अंकल, जिस को जहां जरा सा भी मौका मिलता है वह उसे हर हाल में कैश करता ही है, तो अगर यहां भी यही हाल है तो उस में बुरा ही क्या है.

‘‘ठीक है, वह आप को, आप के टैलेंट को, आप के हुनर को बाहर निकलने का मौका दे कर बदले में अगर कुछ ले रहे हैं तो ठीक है न, फिर इस में इतना हाईपर होने की क्या बात है. उन का हक बनता है भई. गिव एंड टेक का जमाना है सीधा- सीधा. इस हाथ दो तो उस हाथ लो. इन सब से बड़ी बात तो यह है अंकल कि आप की आवाज इतने लोग सुन रहे हैं, इस से बड़ी बात और क्या हो सकती है.’’

मेरी बात सुन कर अंकल हैरत से मुझे देखते हुए बोले, ‘‘काफी प्रैक्टिकल और सुलझी हुई हो बेटी तुम. काश, उस वक्त भी तुम्हारे जैसी सोच वाले लोग होते…’’ इतना कह कर अंकल उदास हो गए तो मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘अंकल, बुरा न मानें तो मुझे बताइए कि आप ने आकाशवाणी की इतनी मजेदार नौकरी क्यों छोड़ दी?’’

कुछ पल वे यों ही सोचते रहे, फिर खोएखोए से बोले, ‘‘बस, बेटी, इसी लेनदेन को ले कर एक स्कैंडल खड़ा हो गया था, फिर मन ही नहीं लगा पाया वहां. आ गया सब छोड़ कर.’’

इस से ज्यादा न उन्होंने कुछ बताया और न ही मैं ने पूछा. पता नहीं क्यों दिल में ऐसा आभास हो रहा था कि कहीं मम्मी और अंकल एक ही इश्यू से जुड़े तो नहीं हैं.

मम्मी भी न…बस, अरे, उस डायरेक्टर के मुंह पर चेक फेंकने का क्या फायदा हुआ आखिर. उन का ही तो नुकसान हुआ न. इस घटना के बाद उन की रचनात्मक प्रवृत्तियां खत्म सी हो गई थीं. उन का मन ही नहीं करता था कुछ. उन की अपनी एक खास पहचान बन गई थी. सब खत्म कर दिया अपनी ऐंठ और नासमझी में. मैं तो इसे नासमझी ही कहूंगी.

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कांट्रेक्ट लेटर हाथ में आते ही कल जब उन्हें फोन पर बताया तो सब से पहले वे बिगड़ने लगीं कि दीया, तुम ने मेरी बात नहीं मानी आखिर. कहा था न कि इन सब झंझटों से दूर रहना, मगर…खैर, अब जा ही रही हो तो ध्यान रखना, कोई तुम्हें जरा सा भी बेवकूफ बनाने की कोशिश करे तुम उलटे पैर लौट आना. मैं ने तो सुना था कि मुझे परेशान करने वाले उस डायरेक्टर ने तो नौकरी ही छोड़ दी थी.’’

अब मुझे बिलकुल भी शक नहीं था कि अंकल ही वह शख्स थे जिन्होंने मम्मी की वजह से नौकरी छोड़ दी थी.

खैर, अब उन से भी क्या कहती. मम्मी थीं वह मेरी. यही कहा बस, ‘‘मम्मी, मैं आप की बात का ध्यान रखूंगी. आप परेशान मत होइए.’’

मगर मन ही मन मैं ने सोच लिया था कि किसी की भी नहीं सुनूंगी. समय की जो डिमांड होगी वही करूंगी और फिर मैं कोई पैसा कमाने या कोई इश्यू खड़ा करने नहीं जा रही हूं वहां. पैसा तो अभिमन्यु ही मर्चेंट नेवी में खूब कमा लेते हैं. मुझे तो उन के पीछे बस अपना थोड़ा सा समय रचनात्मक कार्यों में लगाना है. हीरामणि के साथ मैं कहीं नौकरी कर नहीं सकती, अभिमन्यु के पीछे वह मेरी जिम्मेदारी है. बस, कभीकभी आकाश- वाणी पर कार्यक्रम मिलते रहें, लेखन चलता रहे…और इस से ज्यादा चाहिए भी क्या. समय इधरउधर क्लब, किट्टी पार्टी में गंवाने से क्या हासिल.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

कमीशन : भाग 1

आकाशवाणी में कार्यक्रमों को देने के एवज में मिले पारिश्रमिक में वहां के अधिकारियों द्वारा मांगे जाने वाले हिस्से को ले कर दीया की मां ऐसी नाराज हुईं कि उन्होंने कार्यक्रम देने से तौबा कर ली लेकिन जब उन्हें पता चला कि दीया ने भी आकाशवाणी पर कार्यक्रम देना शुरू कर दिया है तो उन का गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुंच गया.

अंकल की कोशिशों से आखिर मुझे आकाशवाणी के कार्यक्रमों में जगह मिल ही गई. एक वार्ता के लिए कांट्रेक्ट लेटर मिलते ही सब से पहले अंकल के पास दौड़ीदौड़ी पहुंची तो मुझे बधाई देने के बाद पुन: अपनी बात दोहराते हुए उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘बेटी, तुम्हारे इतना जिद करने पर मैं ने तुम्हारे लिए जुगाड़ तो कर दिया है, लेकिन जरा संभल कर रहना. किसी की भी बातों में मत आना, अपनी रिकार्डिंग के बाद अपना पारिश्रमिक ले कर सीधे घर आ जाना.’’

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‘‘अंकल, आप बिलकुल चिंता मत कीजिए. कोई भी मुझे बेवकूफ नहीं बना सकता. मजाल है, जो प्रोग्राम देने के बदले किसी को जरा सा भी कोई कमीशन दूं. मम्मी ही थीं, जो उन लोगों के हाथों बेवकूफ बन कर हर कार्य- क्रम में जाने का कमीशन देती रहीं और फिर एक दिन बुरा मान कर पूरा का पूरा पारिश्रमिक का चेक उस डायरेक्टर के मुंह पर मार आईं. शुरू में ही मना कर देतीं तो इतनी हिम्मत न होती किसी की कि कोई उन से कुछ उलटासीधा कहता.’’

मेरे द्वारा मम्मी का जिक्र करते ही अंकल के चेहरे पर टेंशन साफ झलकने लगा था लेकिन अपने कांट्रेक्ट लेटर को ले कर मैं इतनी उत्साहित थी कि बस उन्हें तसल्ली सी दे कर अपने कमरे में आ कर रिकार्डिंग के लिए तैयारी करने लगी. उस में अभी पूरे 8 दिन बाकी थे, सो ऐसी चिंता की कोई बात नहीं थी. हां, कुछ अंकल की बातों से और कुछ मम्मी के अनुभव से मैं डरी हुई जरूर थी.

दरअसल, मेरी मम्मी भी अपने समय में आकाशवाणी पर प्रोग्राम देती रहती थीं. उस समय वहां का कुछ यह चलन सा बन गया था कि कलाकार प्रोग्राम के बदले अपने पारिश्रमिक का कुछ हिस्सा उस स्टेशन डायरेक्टर के हाथों पर रखे. मम्मी को यह कभी अच्छा नहीं लगा था. उन का कहना था कि अपने टैलेंट के बलबूते हम वहां जाते हैं, किसी भी कार्यक्रम की इतनी तैयारी करते हैं फिर यह सब ‘हिस्सा’ या ‘कमीशन’ आदि क्यों दें भला. इस से तो एक कलाकार की कला का अपमान होता है न. ऐसा लगता है कि जैसे कमीशन दे कर उस के बदले में हमें अपनी कला के प्रदर्शन का मौका मिला है. मम्मी उस चलन को ज्यादा दिन झेल नहीं पाईं.

उन दिनों उन्हें एक कार्यक्रम के 250 रुपए मिलते थे, जिस में से 70 रुपए उन्हें अपना पारिश्रमिक पाने के बदले देने पड़ जाते थे. बात पैसे देने की नहीं थी, लेकिन इस तरह रिश्वत दे कर प्रोग्राम लेना मम्मी को अच्छा नहीं लगता था जबकि वहां पर इस तरह कार्यक्रम में आने वाले सभी को अपनी इच्छा या अनिच्छा से यह सब करना ही पड़ता था.

मम्मी की कितने ही ऐसे लोगों से बात होती थी, जो उस डायरेक्टर की इच्छा के भुक्तभोगी थे. बस, अपनीअपनी सोच है. उन में से कुछ ऐसा भी सोचते थे कि आकाशवाणी जैसी जगह पर उन की आवाज और उन के हुनर को पहचान मिल रही है, फिर इन छोटीछोटी बातों पर क्या सोचना, इस छोटे से अमाउंट को पाने या न पाने से कुछ फर्क थोड़े ही पड़ जाएगा. प्रोग्राम मिल जाए और क्या चाहिए.

पता नहीं मुझे कि उस समय उस डायरेक्टर ने ही यह गंदगी फैला रखी थी या हर कोई ही ऐसा करता था. कहते हैं न कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है. मम्मी तो बस फिर वहां जाने के नाम से ही चिढ़ गईं. आखिरी बार जब वे अपने कार्यक्रम की रिकार्डिंग से लौटीं तो पारिश्रमिक के लिए उन्हें डायरेक्टर के केबिन में जाना था. चेक देते हुए डायरेक्टर ने उन से कहा, ‘अब अमाउंट कुछ और बढ़ाना होगा मैडम. इधर अब आप लोगों के भी 250 से 350 रुपए हो गए हैं, तो हमारा कमीशन भी तो बढ़ना चाहिए न.’

मम्मी को उस की बात पर इतना गुस्सा आया और खुद को इतना अपमानित महसूस किया कि बस चेक उस के मुंह पर मारती, यह कहते हुए गुस्से में बाहर आ गईं कि लो, यह लो अपना पैसा, न मुझे यह चेक चाहिए और न ही तुम्हारा कार्यक्रम. मैं तो अपनी कहानियां, लेख पत्रपत्रिकाओं में ही भेज कर खुश हूं. सेलेक्ट हो जाते हैं तो घरबैठे ही समय पर पारिश्रमिक आ जाता है.

उस के बाद मम्मी फिर किसी आकाशवाणी या दूरदर्शन केंद्र पर नहीं गईं. मैं उन दिनों यही कोई 10-11 साल की थी. उस वक्त तो ज्यादा कुछ समझ नहीं पाई थी लेकिन जैसेजैसे बड़ी होती गई, बात समझ में आती गई. मम्मी के लिए मेरे मन में बहुत दुख था. मम्मी कितनी अच्छी वक्ता थीं कि बता नहीं सकती. एक तो कुछ उन की जल्दबाजी और दूसरे वहां के ऐसे माहौल के कारण एक प्रतिभा अंदर ही अंदर दब कर रह गई.

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कहते हैं न कि एक कलाकार की कला को यदि बाहर निकलने का मौका न मिले तो वह दिल ही दिल में जिस तरह दम तोड़ती है, उस का अवसाद, उस की कुंठा कलाकार को कहीं का नहीं छोड़ती. मम्मी ने भी उस घटना को दिल से लगा लिया था. कुछ दिन तो वह काफी बीमार रहीं फिर पापा के अपनत्व और स्नेह से किसी तरह जिंदगी में लौट पाईं और पुन: लेखन में लग गईं. मम्मी के ये गुण मुझ में भी आ गए थे. मेरा भी लेखन वगैरह के प्रति झुकाव समय के साथ बढ़ता ही चला गया. साथ ही एक अच्छे वक्ता के गुणों से भी स्कूल के दिनों से ही मालामाल थी. वादविवाद प्रतियोगिता हो, गु्रप डिस्कशंस हों या कुछ और, सदा जीत कर ही आती थी. मगर इस से पहले कि मैं इस फील्ड में अपना कैरियर तलाशती, गे्रजुएशन के साथ ही पापा के ही एक खास मित्र के लड़के, जोकि मर्चेंट नेवी में था, ने एक पार्टी में मुझे पसंद कर लिया और बस चट मंगनी, पट ब्याह हो कर बात दिल की दिल में ही रह गई.

इस के बाद अभिमन्यु के साथ 4-5 साल मैं शिप पर ही रहती रही. वहीं मेरी बेटी हीरामणि का भी जन्म हुआ. यों तो डिलीवरी के लिए मैं मम्मीपापा के पास मुंबई आ गई थी, मगर हीरामणि के कुछ बड़ा होने के बाद पुन: अभिमन्यु के पास शिप पर ही चली गई थी.

अब तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अब बेटी के स्कूल आदि शुरू होने को थे, सो शिप पर इधरउधर रहना मुमकिन नहीं था. इस बार यह घर अभिमन्यु ने हमारे लिए खरीद दिया था ताकि मम्मीपापा का भी साथ मिलता रहे. वे लोग भी यहीं मुंबई में थे. हीरामणि की पढ़ाई बेरोकटोक चलती रहे, ऐसा प्रयास था. अब अभिमन्यु तो सिर्फ छुट्टियों में ही घर आ सकते थे न. अब की जब 9 महीने का शिपिंग कंपनी का अपना कांट्रेक्ट पूरा कर के हम लोग आए तो 3 महीने की पूरी छुट्टियां घर तलाशने और उसे सेट करने में ही निकल गई थीं.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

कमीशन : मिली आवाज के हुनर को पहचान

गहरी पैठ

कोरोना को तमाशा मानने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कोविड 19 के शिकार हो गए और अक्तूबर में उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा, जब राष्ट्रपति पद का चुनाव महज 30 दिन दूर रह गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू से ही उसे साधारण फ्लू कहा और चाहा कि अमेरिका काम पर चले चाहे लोगों को बीमारी हो. उन्होंने तब भारत आने का न्योता लिया जब चीन का वुहान शहर बिलकुल बंद था और बाकी शहरों में लौकडाउन था. लाखों की भीड़ को देख कर ट्रंप खूब खुश हुए थे.

अमेरिका में चुनावों में ट्रंप वही कर रहे थे जो उन्होंने मार्च में गुजरात में किया था. हजारों के सामने बिना मास्क के भाषण देना, खुले में घूमना, कोरोना पर जीत की डींग मारना. शायद नरेंद्र मोदी ने उन से सीखा था, जब 24 मार्च को कहा था कि 21 दिनों में कोरोना की लड़ाई जीत ली जाएगी. आज अमेरिका में सब से ज्यादा बीमार हैं, सब से ज्यादा मौतें हुई?हैं और फिर भी भारत के महान नेताओं की तरह वे यही कहते थे कि इस फ्लू को तो किसी भी कीटनाशक दवा से मारा जा सकता है.

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गोरों की वोटों पर जीत कर आए ट्रंप असल में ठस दिमाग के कट्टर नेता हैं. अमेरिका में बसे ऊंची जातियों के भारतीय भी उन्हें और नरेंद्र मोदी को बराबर सा चाहते हैं. अमेरिका में दलितोंपिछड़ों की तरह कालों और लैटिनों से बुरी तरह व्यवहार किया जाता है. उन्हें जो थोड़ाबहुत मिल जाए वह भी गोरों को सहन नहीं होता. वहां तो गोरे 40-45 फीसदी हैं, पर वे जानते हैं कि भारत की तरह 10 फीसदी खास लोग चतुराई से राज कर सकते हैं. भला हो कोरोना का, जो न जाति देखता है, न धर्म, न रंग, न पैसा और पद. अमित शाह भी बीमार पड़े, दिल्ली के सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया भी और अब डोनाल्ड ट्रंप व उन की बीवी.

आम लोगों में यह बीमारी कितनी फैली है यह सिर्फ नंबरों से पता चलता है, पर यह पक्का है कि मेहनतकश इस बीमारी को आसानी से सह लेते हैं क्योंकि उन्हें पहले से तरहतरह के रोगों से लड़ने की आदत होती है. भारत और अमेरिका दोनों के समाजों में यह महामारी आग की तरह नहीं फैली जैसे पहले हैजा या प्लेग फैलता था. इस वायरस को तो असल में हवाईजहाजों में चलने की आदत है. चीन से यह इटली, ईरान, स्पेन, भारत, अमेरिका हवाईजहाजों से गया जब कोरोना बीमार इधर से उधर जा रहे थे.

डोनाल्ड ट्रंप को भी होप हिक्स से लगा जो उन के साथ हवाई यात्राओं में चुनावी सभाओं में जाने के लिए घूम रही थी. होप कहां से लाई पता नहीं. ट्रंप की पत्नी ने भारतीय नेताओं की तरह विदेशी नागरिकों को देश की मुसीबतों की जड़ बताया था. ट्रंप ने लाखों बच्चों को अपने मातापिता से अलग कर रखा है क्योंकि बच्चे अमेरिकी नागरिक हैं और माईग्रैट यानी घुसपैठिए अवैध हैं. हमारे नेताओं ने तबलीगी जमात वालों को कोरोना का दोषी ठहराया था जबकि बाद में सारी अदालतों ने माना कि कोरोना फैलाने में उन का कोई खास योग नहीं है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी और भाजपा एकजैसी नीतियों वाली हैं. देखें अब क्या कोरोना रिपब्लिकनों से सत्ता छीनता है. 10 नवंबर तक पता चल जाएगा.

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हाथरस में एक दलित लड़की का रेप और फिर बुरी तरह जख्मी कर मार देना दलितों को सबक सिखाने के लिए जरूरी है. उन की हिम्मत क्यों हुई कि वे ऊंची जाति वालों के खिलाफ मुकदमे करें, एससी ऐक्ट का इस्तेमाल करें. सदियों से सनातन धर्म कह रहा है कि दलित और औरतें, सवर्ण औरतें भी, पाप योनि की देन हैं और उन्हें सजा चाहे भगवान दें या भगवान के बैठाए दूत दें, एक ही बात है.

जिन लोगों ने दलित लड़की का रेप किया वे सामाजिक कानून लागू कर रहे थे. वे मोदी और योगी की तरह के कानून के रखवाले हैं. गलत कानून अगर संविधान ने दिए हैं तो उन्हें ठीक करना तो जरूरी है. यदि दिखावे के लिए कानून को सही नहीं किया जा सकता तो सही कानून के खुद भरती किए सिपाही इस काम को करेंगे.

देश के गांवगांव, गलीगली में यह बात रातदिन फैलाई जा रही है कि हर जने को अपनी ‘औकात’ में रहना चाहिए जो जन्म से तय है, संविधान कुछ भी कहता रहे. कुछ उदारवादी कहते हैं कि सब एक हैं, पर असल यही है कि हिंदू व्यवस्था साफ कहती है कि सब अलग हैं. पिछले जन्मों के कर्मों से बंधे हैं. जब तक पापों के भागियों को अपनी जगह पर नहीं रखा जाएगा देश चल नहीं सकता.

इस बात के हामी सिर्फ ऊंची जाति के लोग ही नहीं हैं. मायावती, उदित राज, रामदास अठावले जैसे सैकड़ों दलित नेता हैं जो पहले दलितों के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर उबलते थे पर अब उन्हें ज्ञान हो गया है कि दलित तो भगवान के बनाए हुए हैं और जिन थोड़े से दलितों ने अपने जपतप से भगवानों के दूतों को खुश कर दिया है, उन का काम है कि विभीषणी करते हुए अपने ही लोगों की मौत, रेप, पिटाई, बेगारी होते देखें और समाज के गुन गाएं. तभी तो योगी सरकार की पुलिस को यह बल मिला. 19 साल की लड़की की मौत को तमाशा बनने से रोकने के लिए आधी रात को उस का दाह संस्कार कर दिया गया. अब उस की राख के बदले कुछ रुपए उस के घर वालों के मुंह पर मारे जाएंगे और बात खत्म.

यह न समझें कि दलितों पर अत्याचार की छूट का असर नहीं पड़ता. देश की 2000 साल की गुलामी के पीछे यही भेदभाव है. करोड़ों लोग अगर मुसलमान बने तो इसलिए कि उन को हिंदू समाज में सांस लेना दूभर हो रहा था. आज दलितों को खरीदना आसान हो रहा है इसलिए उन की बोलती बंद है पर यह खरीदफरोख्त अब ऊंचों के साथ भी हो रही है. सारे देश में आपाधापी मची हुई है. नोटबंदी और जीएसटी उसी का एक रूप हैं. गिरती अर्थव्यवस्था इसी कानून के प्रति अविश्वास की निशानी है.

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अब गांवों, कसबों, शहरों में समाज और ज्यादा टुकड़ेटुकड़े होगा. हिंदूमुसलिम भेदभाव तो था ही, दलितठाकुर, ठाकुरजाट, जाटकुर्मी न जाने कितने टुकड़े एकदूसरे के खून के प्यासे बनते जाएंगे, कितनों के घरों में सामाजिक विवाद की सजा मासूम बेटियों को मिलेगी. हां, धर्म की जय होगी. मसजिद ढहाने पर भी जयजय. दलित हत्या पर भी जयजय.

विधानसभा चुनाव : गूंजेगा हाथरस गैंगरेप

प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 15 सालों के सत्ता विरोधी मतों का ही सामना नहीं करना होगा, बल्कि उत्तर प्रदेश के हाथरस में एससी तबके की लड़की के साथ हुए गैंगरेप का भी असर वहां पड़ेगा.

इस बात का अंदेशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लग चुका था. जनता दल (यूनाइटेड) के नेता केसी त्यागी गैंगरेप और लड़की की लाश को आननफानन जलाने में तीखी प्रतिक्रिया देने वाले नेताओं में सब से आगे थे.

केसी त्यागी ने कहा था, ‘अगर बलात्कार और हत्या के मामले में कार्यवाही करने के लिए किसी प्रधानमंत्री को अपने मुख्यमंत्री को फोन करना पड़े तो इस से शर्मनाक कोई दूसरी बात नहीं हो सकती.’

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हाथरस की घटना को देखने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद भी इस बात का अंदाजा लग चुका था कि यह घटना बिहार चुनाव पर असर डाल सकती है. इस वजह से उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फोन कर के पूरे मामले को खुद के लैवल पर देखने को कहा.

इस की सब से बड़ी वजह यह भी थी कि भाजपा बिहार चुनाव मोदी के चेहरे पर ही लड़ रही है. दलित लड़की से गैंगरेप और उस की लाश को जबरन जलाने के सवालों से मोदी को जोड़ा न जा सके, इस के चलते प्रधानमंत्री द्वारा हस्तक्षेप किया गया.

उत्तर प्रदेश और बिहार के हालात एकजैसे ही हैं. एससी तबके को सताने की घटनाएं वहां भी होती रहती हैं. 2007 से 2017 के बीच अपराध के आंकड़े बताते हैं कि बिहार इस तरह के मामलों में देश में तीसरे नंबर पर रहा. बिहार में भाजपा व जद (यू) के साझेदारी की सरकार है. बिहार में 2016 में अनुसूचित जाति के लोगों पर जोरजुल्म के 5,701 मामले दर्ज हुए.

बिहार में वोट डालने का सब से बड़ा आधार जाति होती है. भाजपा ने रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह राजपूत मामले में बिहार को उलझाने का काम किया, पर कुछ ही समय में यह मुद्दा दरकिनार हो गया. अब वहां 15 साल के सुशासन पर वोट पड़ने हैं. इन सालों के विकास का हिसाब देना जद (यू) और भाजपा को भारी पड़ेगा. एससी तबका सवर्ण और बीसी तबके के साथ खड़ा नहीं होना चाहता.

दरार से और बिगड़े हालात

बिहार में तकरीबन 16 फीसदी एससी हैं. इस में से 5 फीसदी सब से ज्यादा पासवान और 4 फीसदी वाल्मीकि वोट हैं. हाथरस में गैंगरेप की पीडि़ता लड़की इसी जाति की थी. उस के साथ इंसाफ को ले कर उत्तर प्रदेश के अलगअलग जिलों में वाल्मीकि समाज ने धरना और विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया था.

जैसेजैसे बिहार में चुनाव प्रचार होगा, वैसेवैसे विपक्षी दल हाथरस कांड को मुद्दा बनाएंगे. यह बात समझ आने के बाद ही बिहार में राजग के सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी ने अपना रास्ता बिहार में अलग कर दिया. लोजपा बिहार में राजग के गठबंधन के साथ चुनाव नहीं लड़ रही है.

लोजपा नेता चिराग पासवान ने खुल कर कह दिया है कि वे केंद्र सरकार में भाजपा और राजग के साथ हैं, पर बिहार चुनाव में जद (यू) के चलते राजग गठबंधन में नहीं हैं.

बिहार भाजपा और जद (यू) दोनों का मत है कि चिराग पासवान के दोहरे फैसले का फायदा विरोधी दल उठाएंगे. इस आपसी लड़ाई में राजग को नुकसान हो जाएगा, इसलिए वे बारबार कह रहे हैं कि जो नीतीश के साथ नहीं वह राजग के साथ नहीं.

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तमाम दबाव के बाद भी चिराग पासवान नीतीश कुमार के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं. यही नहीं, चिराग का झुकाव राजद यानी राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव की तरफ होने से राजग को दलित वोटों की ज्यादा फिक्र होने लगी है.

एससी बनेंगे मुद्दा

बिहार के विधानसभा चुनाव में इस बार लालू प्रसाद यादव सामने नहीं हैं. इस के बाद भी उन के सामाजिक न्याय की लड़ाई मुख्य मुद्दा है. लालू प्रसाद यादव को ‘शोषितों की असली आवाज’ और ‘सामाजिक न्याय के प्रतीक’ के रूप में देखा जाता है. वे भले ही पिछड़ी यादव जाति से हैं, पर बिहार में दलितों की गैरपासवान बिरादरी उन के साथ खड़ी होती रही है.

नीतीश कुमार ने महादलित आयोग का गठन कर के एससी तबके को रिझाने का काम भले ही किया हो, पर यह तबका कभी उन के साथ नहीं रहा है. नीतीश कुमार के लिए दलित ही नहीं, मुसलिम वोट बैंक भी परेशानी खड़ी करने वाला है. कश्मीर में धारा 370 के मुद्दे, राम मंदिर और नागरिकता कानून के चलते वह राजग के साथ खड़ा नहीं होगा. ऐसे में राजग के मुकाबले कांग्रेसराजद गठबंधन ज्यादा असरदार दिख रहा है.

बिहार में कोरोना के समय पलायन कर के आने वाला मजदूर तबका तकरीबन 40 लाख है, जिसे बिहार में कोई रोजीरोजगार नहीं मिला. उसे वापस बड़े शहरों की तरफ लौटना पड़ा. इन में बड़ी तादाद दलितों की है. उन को लग रहा है कि बीते 15 सालों में दलितों के हालात जस के तस ही हैं. हाथरस गैंगरेप मामले ने इस पर मुहर भी लगा दी है. जो बातें एससी तबका भूलने वाला था, वे उसे फिर से याद आ रही हैं.

नीतीश कुमार ने किया शर्मिंदा

जनता दल (यूनाइटेड) ने जिन 115 उम्मीदवारों  के नामों का ऐलान किया है, उन में से एक नाम कुख्यात मंजू वर्मा का भी है. मंजू वर्मा को नीतीश कुमार ने  चेरिया बरियारपुर विधानसभा सीट से टिकट दिया है. ये वही मंजू वर्मा हैं, जो नीतीश सरकार में समाज कल्याण विभाग की मंत्री थीं  और जिन के कार्यकाल में पिछले साल मुजफ्फरपुर बालिका गृह बलात्कार कांड हुआ था. इस कांड ने बिहार में सरकारी संरक्षण में बच्चियों के साथ यौन हिंसा  और दरिंदगी का एक ऐसा भयावह सच उजागर किया था, जिसे जान कर समूचा देश हैरान रह  गया था.

इस कांड के उजागर होने के बाद मंत्री मंजू वर्मा पर इस्तीफे का दबाव बना था और आखिरकार उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इस पूरे मामले में कथित रूप से मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा के भी शामिल होने की बात सामने आई थी.

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जांच के दौरान पुलिस ने मंजू वर्मा के घर पर छापेमारी की थी, जहां से गैरकानूनी हथियार और कारतूस भी बरामद हुए थे. इस पूरे मामले में मंजू वर्मा और उन के पति को गिरफ्तार किया गया था और जेल जाना पड़ा था. हालांकि कुछ दिनों बाद कोर्ट से दोनों को जमानत मिल गई थी.

मंजू वर्मा को जद (यू) से एक बार फिर से टिकट दे कर नीतीश कुमार ने यह संकेत दे दिया है कि अगर वे फिर से मुख्यमंत्री बनते हैं, तो मंजू वर्मा की अगुआई और संरक्षण में बिहार में बच्चियों के साथ रेप और जोरजुल्म बदस्तूर जारी रहेगा.

अंधविश्वास का अंधेरा : एक “बैगा” की हत्या

छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास का अंधेरा फैलता चला जा रहा है. इसके लिए शासन-प्रशासन सबसे अधिक दोषी है. क्योंकि आजादी के इतने साल बाद भी यहां शिक्षा की, जागरूकता की इतनी ज्यादा कमी है कि अभी भी गांव-गांव में “बैगा गुनिया” लोगों का इलाज करते हैं. लोगों की इन पर आस्था और विश्वास है. ऐसे में जब कभी विश्वास की नाव डगमगाती है तो बैगा गुनिया ही मारे जाते हैं. मजे की बात यह है कि वह बैगा गुनिया जो गांव का सबसे गुनी व्यक्ति माना जाता है जिसके हाथों में गांव की डोर होती है जब किसी  बात को लेकर अंधविश्वास के घेरे में आकर लोगों के हाथों मारा जाता है, तब भी गांव वाले यह नहीं सोचते कि जो व्यक्ति अपनी जान नहीं बचा सका, वह गांव के लोगों को भला कैसे भूत प्रेत आदि से बचा सकता है. दरअसल, पूरा मामला अंधविश्वास के मायाजाल का है. जिसका लाभ बैगा गुनिया उठाते हैं. कुल मिलाकर एक धंधा बन चुका है जिसे गांव गांव में मान्यता है . बहरहाल यह नाकामी नि: संदेह छत्तीसगढ़ सरकार की है.

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आइए! आज आपको हम ले चलते हैं छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल जहां नारायणपुर जिले के बेनूर थाना क्षेत्र में एक बैगा को घर से ले जाकर अंधविश्वास के फेर में हत्या कर दी गई. लंबे समय तक पुलिस आरोपियों को ढूंढती रही नगर मामला सुलझ नहीं पा रहा था, अंततः पुलिस को अंधे कत्ल की गुत्थी सुलझाने में बड़ी सफलता मिली तो कई राज खुलकर सामने आ गए.

बैगा के हत्या की अंधी गुत्थी

11 जून 2020 को सोमनाथ मंडावी उम्र 25 वर्ष निवासी स्कूलपारा चियानार द्वारा थाना बेनूर में रिपोर्ट दर्ज कराई गई  कि 10 जून 2020 की रात्रि करीबन 2 बजे अज्ञात व्यक्ति घर आकर उसके पिता रामजी मंडावी को उठाए वे एक बैगा थे लोगों का इलाज करते थे इस बिनाह पर उन्हें ले जाया गया और रामजी मंडावी (उम्र 50)  घर नहीं लौटे तब अगली सुबह जब पतासाजी की गई तो उनका शव भाटपाल जाने वाले मार्ग पर पुलिया के नीचे पड़ा मिला.

अपराध की सूचना पर मामले में लगातार पतासाजी कर अंधे कल्ल के मामले को सुलझाने का अथक प्रयास करने के बावजूद भी पुलिस को कोई सुराग हाथ नहीं लग पा रहा था.प्रकरण में कुछ संदिग्ध मोबाईल नम्बरों का टावर इंप ऐनालिशिस के आधार पर संदेह होने पर मानु करंगा एवं कानसाय नेताम से कड़ाई से पूछताछ की गई. उन्होंने अपराध घटित करना स्वीकार किया और इस तरह घटना का खुलासा चार माह पश्चात अक्टूबर 2020  हुआ.

हत्या की वजह अंधविश्वास

गिरफ्तारी के पश्चात मानूराम करंगा ने बताया कि वर्ष 2019 में मेरा  छोटा सा बच्चा जो एक सप्ताह का था एवं मेरे सबसे छोटे भाई मानसिंग की पत्नी जो पेट से थी दोनों के “बच्चों की मौत” एक ही दिन हो गई. एवं वर्ष  बाद 2020 में होली त्यौहार के कुछ दिन बाद अचानक मेरे भाई मानसिंग की भी मौत हो गयी थी.

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जिस कारण अपने पड़ोस में रहने वाले सिरहा ( बैगा) रामजी मंडावी के पर “जादू-टोना” करने (पांगने) का शक हुआ था. मानू करंगा और उसका छोटा भाई मानसाय करंगा दोनों ने मिलकर सिरहा रामजी मंडावी को मारने की योजना बनाई और मानसाय ने अपने रिश्तेदार कानसाय नेताम को भी साथ मिलाकर 10 जून 2020 को कानसाय अपने साथी मनीराम गावड़े, रजमेन राम मरकाम, जसलाल कुलदीप के साथ रात में सिरहा रामजी मंडावी के घर पहुंचकर रामजी मण्डावी को घर से  ले गये और अपने पास रखे  बदूंक से मारने का प्रयास किया, अचानक बदूंक नहीं चलने पर आरोपियों द्वारा बदूंक के कुंदा से मारकर हत्या कर दी गई और शव को भाट्याल पुलिया के नीचे फेक दिया.बेनूर पुलिस द्वारा आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त मोबाईल, सिम,  बदूंक व मृतक से छीना हुआ टार्च एवं स्कूटी नीले रंग की जप्त की है.

घटना के सभी छः आरोपियों को न्यायालय के आदेश पर जेल भेज दिया गया है.

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