पुलिस वालों की दबंगई

हिंदी फिल्म ‘दबंग’ में हीरो सलमान खान को इतना बेखौफ दिखाया गया है कि वह हर बुरा काम करने वाले के लिए शामत बन कर उस के होश ठिकाने लगा देता है. इस सब के बावजूद उस में रत्तीभर भी घमंड नहीं होता है और न ही वह अपनी खाकी वरदी का गलत इस्तेमाल करता है.

पर क्या असली जिंदगी में भी ऐसा होता है? शायद नहीं, तभी तो मीडिया में तमाम ऐसी खबरें आती रहती हैं, जिन में पुलिस वाले ही आम जनता का खून चूसने वाले बन जाते हैं. कभीकभार तो इतने जालिम हो जाते हैं कि वे खूनखराबे पर उतर आते हैं.

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देश का दिल दिल्ली को ही ले लीजिए. यहां के अलीपुर इलाके में रविवार, 27 सितंबर ?की शाम को दिल्ली पुलिस के एक सबइंस्पैक्टर संदीप दहिया ने अपनी एक महिला दोस्त को गोली मार दी.

यह कांड सबइंस्पैक्टर संदीप दहिया की सर्विस रिवाल्वर से चलती कार में हुआ. उस महिला को 3 गोलियां मारी गईं. इस वारदात को अंजाम देने के बाद संदीप दहिया अपनी कार से फरार हो गया, जबकि बाद में गंभीर रूप से घायल उस महिला को लोकल लोगों ने अस्पताल पहुंचाया.

इस के बाद भी सबइंस्पैक्टर संदीप दहिया का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. रविवार, 27 सितंबर को उस ने दिल्लीहरियाणा बौर्डर पर एक राह चलते आदमी सतबीर के पैर में गोली मार दी और फिर सोमवार, 28 सितंबर की सुबह रोहतक जिले के गांव बैंसी में अपने ससुर रणबीर सिंह के माथे पर गोली मार कर उन की जान ले ली. संदीप दहिया का काफी समय से अपनी पत्नी से विवाद चल रहा है.

एक और मामले में दिल्ली पुलिस के एक इंस्पैक्टर के खिलाफ देश के प्रधानमंत्री से गुहार लगाई गई. हुआ यों कि भलस्वा डेरी थाने के एसएचओ रहे इंस्पैक्टर के खिलाफ करोड़ों रुपए की जमीन कब्जाने का मुकदमा इसी थाने में दर्ज हुआ.

उस इंस्पैक्टर पर आरोप लगाया गया कि उस ने जबरन उगाही और करोड़ों रुपए के प्लाट और दूसरी जमीन पर कब्जा कर के अपने रिश्तेदारों के नाम करा ली. जिस पीडि़त सुजीत कुमार की एफआईआर पर यह मामला उछला, उस का आरोप है कि वह इंस्पैक्टर पीडि़त का 100 गज का प्लाट कब्जाने की कोशिश कर रहा है.

पीडि़त सुजीत कुमार ने पुलिस महकमे के ऊंचे अफसरों तक यह मामला पहुंचाया, पर कोई सुनवाई नहीं हुई. बाद में थकहार कर सुजीत कुमार ने प्रधानमंत्री को संबंधित दस्तावेज के साथ अपनी लिखित शिकायत भेजी, जिस में लिखा था, ‘मैं शिकायतें देदे कर थक चुका हूं और मजबूरन मुझे आप के पास शिकायत करनी पड़ रही है. आप के दफ्तर पर मुझे भरोसा है कि इंसाफ मिलेगा और आरोपी को कानून के शिकंजे में ले कर सख्त कार्यवाही की जाएगी, जिस से बाकी भ्रष्ट अफसरों को सबक मिल सके.’

उस पुलिस इंस्पैक्टर पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उस ने दिल्ली के स्वरूप नगर में 300 गज का डेढ़ करोड़ रुपए का एक गोदाम बना लिया है और गलीप्लाट वगैरह पर कब्जा करने की कोशिश करते हुए तकरीबन 1,500 गज जमीन में बिना पार्किंग के एक मैरिज होम बना लिया है, जिस की बाजार कीमत तकरीबन 10 करोड़ रुपए है.

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पीडि़त का यह भी आरोप है कि मुकुंदर में उस इंस्पैक्टर के रिश्तेदारों के नाम 40 बीघा जमीन में कई बड़े प्लाट हैं. इतना ही नहीं, बुराड़ी थाने के सामने 100 फुटा रोड पर ग्राम सभा की जमीन पर 350 गज और उसी से लगती हुई जमीन पर 300 गज जगह भी कब्जा ली है. इन की कीमत भी 12 करोड़ रुपए के आसपास बताई जा रही है.

मुंबई में ड्रग्स और फिल्मी सितारों के रिश्तों को ले कर हड़कंप मचा हुआ है, पर दिल्ली के जहांगीरपुरी पुलिस स्टेशन के 4 पुलिस वालों के खिलाफ पकड़े गए गांजे को खुद ही बेच देने का आरोप लगा. उन के खिलाफ भ्रष्टाचार के तहत मामला दर्ज करने के साथ एसएचओ को निलंबित कर दिया गया.

दरअसल, कुछ दिनों पहले जहांगीरपुरी थाना पुलिस ने 160 किलो गांजा बरामद किया था, लेकिन सरकारी रिकौर्ड में पुलिस ने गांजे की बड़ी खेप की एक किलो से भी कम 920 ग्राम की बरामदगी दिखाई और बाकी खेप खुद ही ब्लैक में बेच दी.

जब इस गोलमाल की जानकारी पुलिस के बड़े अफसरों तक पहुंची, तो शुरुआती जांच में 2 सबइंस्पैक्टर और 2 हैडकांस्टेबल पर गाज गिरी थी, पर इस के बाद एसएचओ को भी निलंबित कर दिया गया.

ड्रग पैडलर अनिल को छोड़ने के बाद आरोपी पुलिस वालों ने गांजा बेचने से आई रकम आपस में बांट ली थी.

ये तो चंद किस्से हैं पुलिस की करतूतों के, फेहरिस्त तो बहुत लंबी है. पर ऐसा होता क्यों है? क्यों जनता की हिफाजत करने वाले उसी को सताने लग जाते हैं, अपराध कर के खाकी वरदी को दागदार करते हैं?

यह सब इसलिए होता है, क्योंकि पुलिस के पास बहुत ज्यादा ताकत होती है. वह कानून के बारे में जानती है तो उस से खिलवाड़ करने के दांवपेंच भी बखूबी समझती है. आम आदमी तभी तो थाने में दाखिल होने से डरता है, क्योंकि उसे पता होता है कि वहां किसी न किसी बहाने से उस की खाल उतारी जाएगी.

वरदी की यही गरमी और जनता का डर पुलिस को तानाशाह बना देता है, तभी तो कोई पुलिस वाला अपनी महिला साथी से नाराज होने पर उसे सरेआम गोलियों से भून कर फरार हो जाता है या फिर कोई दूसरा पुलिस वाला अपने इलाके में इतना आतंक मचा देता है कि गैरकानूनी तौर पर जमीन हथियाने लगता है. रहीसही कसर पुलिस की वे धांधलियां पूरी कर देती हैं, जहां वह नशीली चीजों की बरामदगी में ही घपला कर देती है.

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इस तरह की घटनाओं से एक बात और उभरती है, इस से पुलिस और जनता के बीच दूरियां बढ़ जाती हैं. कोई भी शरीफ आदमी पुलिस और थाने से बचने लगता है. यह सभ्य समाज के लिए बेहद खतरनाक है.

दुख तो इस बात से होता है कि ऐसे अपराधी पुलिस वालों के खिलाफ उन के ही बड़े अफसर भी कोई कार्यवाही नहीं करते हैं. अगर ऐसा होता तो पीडि़त सुजीत कुमार को प्रधानमंत्री के पास जा कर गुहार नहीं लगानी पड़ती.

अंतरराष्ट्रीय ठग: कानून के हाथों से दूर भी पास भी !

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की पुलिस ने एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन ठग गिरोह का भंडाफोड़ कर उन्हें जेल की सीखचों में डाल दिया है. न्याय धानी बिलासपुर जिले के पुलिस  अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल बताते हैं कि एक अभियान चलाकर अंतरराष्ट्रीय ठग गिरोह का पर्दाफाश करने में सफलता हासिल की है.

दरअसल,पाकिस्तानी सरगना बड़े मामू (असगर) छोटे मामू (असरफ) और सलीम मिलकर डिजिटल करेंसी की हेराफेरी कर ठगी के कारोबार को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में और अन्य दूसरे देशों में भी अंजाम देते  थे. ठगी के इस मामले के तार पाकिस्तान के अलावा सऊदी अरब और मलेशिया से भी जुड़े  हैं. सनसनीखेज तथ्य है कि इस नेटवर्क के अनेक गुर्गे देश के अनेक राज्यों में मौजूद हैं और “ऑनलाइन ठगी” से जुटाए रूपए उन्हें भेजा करते थे.

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जैसा कि आज डिजिटल ठगी का दौर चल रहा है लोगों के फोन पर लगातार कॉल आ रहे हैं और उन्हें ठगा जा रहा है ऐसे में छत्तीसगढ़ की बिलासपुर पुलिस का यह प्रयास अपने आप में महत्वपूर्ण है.इसका सीधा संदेश यह है कि पुलिस और सरकार अगर चाहे तो ठगों को दूसरे देशों के होने के बाद भी उन पर अंकुश लगा सकती है.

ठगी नाक का सवाल बनी!

बिलासपुर पुलिस के लिए यह अंतरराष्ट्रीय ठग नाक के बाल की तरह एक चैलेंज बन गए थे. दरअसल, हुआ यह कि बिलासपुर जिले में पदस्थ जनक राम पटेल नामक एक नगर सैनिक को 65 लाखों रुपए, इस गिरोह ने लालच देकर ठग लिए. जब नगर सैनिक ने मामले की रिपोर्ट बिलासपुर सिविल थाने में दर्ज कराई तो पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल के लिए यह एक चैलेंज थी. उन्होंने एक टीम बनाई और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय गिरोह तक पुलिस पहुंच गई और अंततः पांच लोगों को गिरफ्तार करके बिलासपुर लाया गया.

उल्लेखनीय है कि बिलासपुर पुलिस ने मुंबई, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में अभियान चलाकर  ठगों को गिरफ्तार किया है. ठगों के पास से लैपटॉप, मोबाइल और 15 लाख रूपए नगद, अनेक एटीएम कार्ड तथा बैंक की पास बुक बरामद किए गए हैं. इसके अतिरिक्त विभिन्न बैंको में ठगों के खाते में 27 लाख रूपए जमा होने की जानकारी पुलिस के पास है.

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पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल ने  संवाददाता को बताया कि बिलासपुर जिले के सीपत थाना क्षेत्र के अंतर्गत हरदाडीह निवासी जनक राम पटेल 35  साल को इस वर्ष जनवरी माह के अंतिम सप्ताह और फरवरी माह के प्रथम सप्ताह के मध्य पाकिस्तानी मोबाइल नंबर, व्हाट्सएप कॉल और चैटिंग के माध्यम से ठगों से बातचीत हुई थी. पटेल को झांसा दिया गया कि वह जियो से मालिक मुकेश अम्बानी बोल रहे हैं और जियो के लकी ड्रा के नाम पर उनकी 25 लाख रूपये की लाटरी निकल आई है. अगर वह सोनी टीवी पर चलने वाले आगामी सितंबर 2020 में अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में भाग्यशाली विजेता बनकर दो करोड़ रूपए की अतिरिक्त राशि जीतना चाहता है तो कुछ रकम उसे विभिन्न खातों में जमा करनी होगी. नगर सैनिक उनके झांसे में आ गया और उसने इस वर्ष एक फरवरी से आठ सितम्बर तक कुल 65 लाख रूपए ठगों के अलग-अलग खातों में जमा कर दिए. कुछ समय बाद उसे एहसास हुआ कि उसे ठग लिया गया है तो नगर सैनिक ने अपने उच्च अधिकारियों से गुहार लगाई.

पुलिस वाले भी हो रहे ठगी के शिकार

नगर सैनिक की शिकायत पर पुलिस ने मामले की छानबीन शुरू की तब जानकारी मिली कि जनक राम पटेल से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के लगभग 12 विभिन्न खातों में पैसे जमा कराए गए हैं. यह तथ्य भी सामने आया कि इस दौरान सबसे बड़ी रकम करीब 50 लाख रूपए मध्यप्रदेश के रीवा जिले के विराट सिंह के विभिन्न बैंकों के खातों में जमा की गई थी. विराट सिंह यह रकम फोन पे और पेटीएम के माध्यम से वर्ली मुंबई निवासी राजेश जायसवाल के खातों और डिजिटल पेमेंट सोल्यूशन उड़ीसा आदि में ऑनलाइन स्थानांतरित करता था.

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आखिरकार  पुलिस दल ने रीवा से विराट सिंह को पकड़ लिया. विराट सिंह ने बताया कि वह पाकिस्तान के छोटे मामू उर्फ़ असरफ और बड़े मामू उर्फ़ असगर तथा सलीम के सरपरस्ती में  काम करता है. विराट सिंह ने  बताया कि वह अपना कमीशन लेकर कर बाकी  रकम बताए गए खातों में भेज देता है. विराट इस रकम को देश भर के अलग-अलग प्रान्तों, हैदराबाद, कर्नाटक, बेंगलोर, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, असम और दिल्ली के खातों में ट्रांसफर करता था.

आरोपी विराट सिंह की निशानदेही पर खाता धारक शिवम् ठाकुर और संजू चौहान को मध्यप्रदेश के देवास से गिरफ्तार किया गया. वहीं पुलिस ने मुंबई जाकर राजेश जायसवाल को भी गिरफ्तार कर लिया जो रकम को डिजिटल करेंसी बिट क्वाइन में तब्दील कर भेजता था.

पुलिस  ने उड़ीसा में डिजिटल पेमेंट सोल्यूशन के संचालक सीता राम गौड़ा को भी हिरासत में लिया है जिसने अपने खाते में लगभग 15 लाख रूपये की रकम को जमा किया था. पुलिस ने इस रकम को सीज किया है.

यही नहीं 24 परगना पश्चिम बंगाल, गोपालगंज, बिहार, पश्चिम बंगाल के बाखर हाट और कृष नगर, पश्चिम गाजियाबाद, हुगली, सूरत, उत्तराखंड आदि स्थानों के कई आरोपियों की पहचान की जा चुकी है. अब इस ठगी के कुछ आरोपियों  के हाथ आने के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस के समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती है  की किस तरह इस अंतरराष्ट्रीय ठगों के मुख्य सरगनाओं व गिरोह के सदस्यों को पकड़ती है. मामला संवेदनशील है क्योंकि मामला पाकिस्तान आदि देशों से जुड़ा हुआ है.

‘कॉमेडी कपल’ : लिव इन रिलेशनशिप पर बनी फिल्म

रेटिंग : डेढ़ स्टार

निर्माता : यूडली फिल्मस

निर्देषक : नचिकेत सामंत

कलाकार : साकिब सलीम, श्वेता बसु प्रसाद, राजेश तैलंग, पूजा बेदी, आदर मलिक, सुभा राजपूत, जसमीत सिंह भाटिया, मधु सचदेवा और प्रणय मनचंदा व अन्य.

अवधिः  एक घंटा 57 मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म : जी

महानगरों में आधुनिकता की बयार के चलते ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का चलन बढ़ता जा रहा है, मगर लिव इन रिलेशनशिप में रहे वालों को किराए पर मकान मिलना बहुत मुश्किल है. इसी मूल मुद्दे पर काॅमेडी कपल के तौर पर स्टैंडअप काॅमेडी करने वाले दीप व जोया के इर्द गिर्द घूूमने वाली रोमांटिक काॅमेडी फिल्म ‘‘काॅमेडी कपल’’ लेकर आए हैं फिल्मकार नचिकेत सामंत. इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘जी 5’’ पर 21 अक्टूबर से देखा जा सकता है. मगर इसे बच्चों के साथ देखना है या नहीं, यह सवाल भी अहम है.

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कहानी:

फिल्म की कहानी लिव-इन रिलेशनशिप में एक शहरी जोड़े की आधुनिक प्रेम कहानी है, जो भारत की पहली और सर्वश्रेष्ठ हास्य जोड़ी बनने की ख्वाहिश रखती है. कहानी गुड़गांव से शुरू होती है, जहां पर दीप शर्मा (साकिब सलीम) और जोया बत्रा (श्वेता बसु प्रसाद) लिव इन रिलेशनशिप में रहते हुए एक साथ स्टैंडअप काॅमेडी करते हैं. वह देश के पहले काॅमेडी कपल हैं. इनका मैनेजर सिद्धू (प्रणय मनचंदा)  है. दीप व जोया की जिंदगी की कहानी काफी अलग है. दीप शर्मा छोटी जगह बिलारी का रहने वाला है. उसके पिता मुकेश (राजेश तैलंग) और मां (मधु सचदेवा) ने किसी तरह उसे पढ़ाकर इंजीनियर बनाया.

दीप शर्मा गुडगांव में इंजीनियरिंग की नौकरी कर रहे थे. पर अचानक नौकरी छोड़कर जोया संग जोड़ी बनाकर स्टैंडअप काॅमेडी करने लगे. उधर जोया बत्रा की मां जोहरा (पूजा बेदी) पेरिस में रहती हैं. आत्मनिर्भर हैं और नग्न तस्वीरें बनाया करती हैं. जब जोया बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता ने उन्हे छोड़ दिया था. जोया ने अपनी मां को दीप के बारे में सब कुछ बता रखा है. जोया की मां उसे समझाती रहती हैं कि दीप पर यकीन मत करना. सभी मर्द कमीने होते हैं. इधर दीप ने अपने माता पिता से सब कुछ छिपा रखा है.

दीप व जोया के ‘लिव इन रिलेषनशिप’ और उनका खुलेआम एक दूसरे को किस करना, सेक्स की बातें करना आदि हरकतों के चलते भी किराए के मकान नहीं मिलते. एक बार झूठ बोलकर खुद को भाई बहन बताकर किराए का मकान पा गए. पर सोसायटी वालों ने दोनो को लिफ्ट में एक दूसरे को ‘किस’ करते हुए एक दूसरे में आकंठ डूबे देखकर निकाल बाहर कर दिया. नया किराए का मकान मिलने तक दीप अपने दोस्त रोहण (आदार मलिक) के यहां और जोया अपनी सहेली अदिति (सुभा राजपूत) के यहां रहती है.

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हर बार एक नया झूठ बोलकर वह किराए का मकान पाते रहते हैं. तो वहीं स्टैंडअप काॅमेडिन के तौर पर ‘गौ मूत्र’ को लेकर किए गए जोक्स के चलते पुलिस व गौशाला वाले पीछे पड़ जाते हैं. दीप को माफी मांगनी पड़ती है. उनका सच दीप के माता पिता के सामने आ जाता है. दीप के माता पिता नाराज होकर बिलारी लौट जाते हैं. इधर गुस्से में दीप हर बात के लिए जोया को दोषी ठहरा देता है. दोनों अलग हो जाते हैं पर फिर एक हो जाते हैं.

लेखन व निर्देशनः

नचिकेत सामंत का निर्देशन आम रोमांटिक मसाला फिल्मों का ही अनुसरण करता है. कथानक का उपचार, दिशा व संपादन सब कुछ बेकार है. यह रोमांटिक काॅमेडी फिल्म है, मगर कमजोर पटकथा के चलते दर्शक को हंसी आती ही नही है. रोमांस के नाम पर ‘सेक्स’की बातें और ‘किस’/चुम्मा चाटी के अलावा कुछ नही है. सारे जोक्स अति साधारण हैं. पूरी फिल्म अधपकी खिचड़ी की तरह है. फिल्म ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की वजह से समस्यायों को भी ठीक से चित्रित नही कर पायी. क्योंकि लेखक व निर्देशक ने कोई शोधकार्य किए बगैर हवा में तीर चलाने का प्रयास किया है. दीप और जोया के बीच का संघर्ष सरल और सामान्य होने के बजाय यदि रचनात्मक और अलग होता, तो फिल्म कुछ ठीक हो सकती थी. इंटरवल के बाद बीस पच्चीस मिनट अवश्य कुछ सकून देते हैं अन्यथा तकलीफ देह है. फिल्म का क्लायमेक्स बहुत ही साधारण व सतही है.

फिल्मकार ने टीवी के समाचार चैनलों  और दक्षिणपंथी राजनीतिक संगठनों द्वारा कॉमिक्स के सेंसर को लेकर भी बहुत ही सतही ढंग से कटाक्ष करने का प्रयास किया है. फिल्म में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे पर बात करने का लेखक व निर्देशक ने असफल प्रयास किया है. लेखक व निर्देशक दोनों को ही काफी मेहनत करने की जरुरत थी.

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अभिनयः

जोया बत्रा के किरदार में श्वेता बसु प्रसाद का अभिनय कमाल का है. श्वेता बसु प्रसाद ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह अपने समकालीन अभिनेत्रियों के मुकाबले एक पायदान ऊपर हैं. साकिब ने भी दीप के किरदार के साथ पूरा न्याय किया है. इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि साकिब सलीम और श्वेता बसु प्रसाद की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री जबरदस्त है. मगर दोनों ही कलाकारों को पटकथा व संवादों का सहारा नहीं मिला. दीप के पिता मुकेश के किरदार में राजेश तैलंग का अभिनय भी शानदार है. तैलंग ने दीप के सख्त, पारंपरिक पिता की भूमिका निभाई है, जो सोचते हैं कि विज्ञान सबसे अच्छा विषय है और एक इंजीनियर बनना एक पेशेवर कैरियर का चरम है. जबकि पूजा बेदी ने उदार, मुक्त उत्साही कलाकार माँ के छोटे किरदार में भी जान डाली है. अन्य कलाकारों का अभिनय ठीक ही है.

शादी की खबरों के बीच नेहा कक्कड़ और रोहनप्रीत सिंह का ये गाना हुआ रिलीज, दिखी जबरदस्त कैमिस्ट्री

पिछले कुछ दिनों से पौपुलर पंजाबी म्यूजिक आर्टिस्ट नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और रोहनप्रीत सिंह (Rohanpreet Singh) काफी चर्चाओं में हैं. दरअसल नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और रोहनप्रीत सिंह (Rohanpreet Singh) और किसी बात को लेकर नहीं बल्कि अपनी शादी को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. हाल ही में ‘देसी म्यूजिक फैक्ट्री’ (Desi Music Factory) के औफिशियल यू-ट्यूब चैनल से एक गाना रिलीज हुआ है जिसका नाम है ‘नेहू दा व्याह’ (Nehu Da Vyah).

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The day He proposed to Me!! 🥰🙊😇 @rohanpreetsingh Life is more beautiful with You ♥️🙌🏼 #NehuPreet #NehuDaVyah

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इन गानें में नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और रोहनप्रीत सिंह (Rohanpreet Singh) बतौर लीड रोल दिखाई दे रहे हैं और तो और इस गाने में नेहा और रोहनप्रीत की कैमिस्ट्री इतनी जबरदस्त दिख रही हैं कि फैंस तो उनके दिवाने ही हो गए हैं. एक ही दिन में इस गाने को लगभग 2.8 मिलियल से भी ज्यादा व्यूज मिल गए हैं. इस गानें को फैंस का इतना प्यार दे रहे हैं कि 1 ही दिन में इस वीडियो पर लगभग 3 लाख लाइक्स भी आ चुके हैं.

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इस गाने को खुद नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और रोहनप्रीत सिंह (Rohanpreet Singh) ने गाया है और इस गाने के लिरिक्स भी नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) ने लिखे हैं. इस वीडियो के प्रोड्यूसर अंशुल गर्ग (Anshul Garg) हैं जो इससे पहले भी कई सारी म्यूजिक वीडियोज प्रोड्यूस कर चुके हैं. हाल ही में नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और रोहनप्रीत सिंह (Rohanpreet Singh) की शादी का कार्ड भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.

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अब देखने वाली बात ये होगी कि नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और रोहनप्रीत सिंह (Rohanpreet Singh) का सरप्राइज फैंस को कैसा लगता है.

Bigg Boss 14 कंटेस्टेंट निशांत मलकानी और कनिका मान का बोल्ड फोटोशूट हुआ वायरल, देखें Photos

बॉलीवुड मेगा स्टार सलमान खान (Salman Khan) के सबसे बड़े टीवी रिएलिटी शो बिग बॉस सीजन 14 इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहा है. आपको बता दें कि इस शो के कंटेस्टेंट निशांत मलकानी (Nishant Malkani) की कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही हैं जिसमें वे अपनी को-स्टार और सबसे अच्छी दोस्त कनिका मान (Kanika Mann) के साथ बोल्ड अवतार में दिखाई दे रहे हैं.

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कनिका मान (Kanika Mann) ने ‘जी टीवी’ (Zee TV) के पौपुलर सीरियल ‘गुड्डन तुमसे ना हो पाएगा’ (Guddan Tumse Na Ho Payega) में अपनी बेहतरीन अदाकारी से घर घर में लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई है तो वहीं दूसरी तरफ एक्टर निशांत मलकानी (Nishant Malkani) ने भी इस शो में बतौर लीड रोल काम किया है. हाल ही में कनिका मान (Kanika Mann) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से अपनी और निशांत का एक बोल्ड फोटोशूट शेयर किया है जिसमें दोनों के लुक्स देख फैंस के होश उड़ गए हैं.

इन फोटोज में कनिका मान (Kanika Mann) का बोल्ड अवतार फैंस को खूब पसंद आ रहा है और वे लगातार कमेंट्स कर उनकी और निशांत की तारीफ कर रहे हैं. इन फोटोज में कनिका मान (Kanika Mann) व्हाइट कलर का ट्रांसपेरेंट गाउन पहनी नजर आ रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ निशांत मलकानी की अपने कातिलाना लुक्स से फैंस को दीवाना कर रहे हैं.

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We really tried to look hot !! 😌 Styled by @anusoru 📸 @flamingo.productions

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इससे पहले भी कई बार कनिका मान (Kanika Mann) और निशांत मलकानी (Nishant Malkani) ने अपने फोटोशूट्स सोशल मीडिया पर शेयर किए हैं जो कि काफी वायरल भी हुए हैं. फैंस को इन दोनों की जोड़ी बेहद पसंद आती है. बात करें इन फोटोज की तो इन फोटोज में कनिका मान (Kanika Mann) ब्लैक कलर का वन पीस पहनी नजर आ रही हैं तो वहीं निशांत मलकानी (Nishant Malkani) ने शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहनी हुई है. इन फोटोज में दोनों काफी अच्छे लग रहे हैं.

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बात की जाए बिग बॉस 14 (Bigg Boss 14) की तो इस शो में निशांत मलकानी (Nishant Malkani) आगे बढ़ने की खूब कोशिश कर रहे हैं लेकिन लोगों ने उन्हें निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) की कठपुतली कहना शुरू कर दिया है. वहीं एक्ट्रेस कनिका मान (Kanika Mann) भी सीरियल ‘गुड्डन तुमसे ना हो पाएगा’ के अलावा कई पंजाबी म्यूजिक वीडियोज में दिखाई दे चुकी हैं.

प्यार की सजा

मैत्री : भाग 4

मैत्री भीतर से थोड़ी असहज जरूर हुई पर बाहर से सहज दिखने का प्रयास कर रही थी. उमंग को धन्यवाद देते हुए मैत्री ने कहा कि वह अब गैस्टहाउस जा कर विश्राम करेगी और रात की ट्रेन से वापस लौट जाएगी.

उमंग ने कहा, ‘‘मैडम, आप की जैसी इच्छा हो वैसा ही करें. मेरी तो केवल इतनी अपील है कि मेरी पत्नी का आज जन्मदिन है. बच्चों ने घरेलू केक काटने का कार्यक्रम रखा है. घर के सदस्यों के अलावा कोई नहीं है. आप भी हमारी खुशी में शामिल हों. आप को समय के भीतर, जहां आप कहेंगी, छोड़ दिया जाएगा.’’ मैत्री के यह स्वीकार करने के बाद दूसरी बार चौंकने का अवसर था, क्योंकि यह विकलांग व्यक्ति अपनी कार फर्राटेदार प्रोफैशनल ड्राइवर की तरह चला रहा है, बरसों पुरानी मित्रता की तरह दुनियाजहान की बातें कर रहा है, कहीं पर भी ऐसा नहीं लग रहा है कि उमंग विकलांग है. वह तो उत्साह व उमंग से लबरेज है.

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पेड़पौधों की हरियाली से आच्छादित उमंग के घर के ड्राइंगरूम में बैठी मैत्री दीवार पर सजी विविध पेंटिंग्स को निहारती है और उन के रहनसहन से बहुत प्रभावित होती है. एक विकलांग व्यक्ति भरेपूरे परिवार के साथ पूरे आनंद से जीवन जी रहा है. बर्थडे केक टेबल पर आ गया. उमंग का बेटा व बेटी इस कार्यक्रम को कर रहे हैं. बेटाबेटी से परिचय हुआ. बेटा एमबीबीएस और बेटी एमटैक कर रही है. दोनों छुट्टियों में घर आए हुए हैं.

उमंग की पत्नी केक काटते समय ही आई. मैत्री के अभिवादन का उस ने कोई जवाब नहीं दिया. उस के मुंह पर चेचक के निशान थे. शायद वह एक आंख से भेंगी भी थी.

उस के केक काटते ही बच्चों ने उमंग के साथ तालियां बजाईं. ‘‘हैप्पी बर्थडे मम्मा.’’

उमंग ने केक खाने के लिए मुंह खोला ही था कि उन की पत्नी ने गुलाल की तरह केक उन के गालों पर मल दिया. फिर होहो कर हंसी. उमंग भी इस हंसी में शामिल हो गए.

उन की बेटी बोली, ‘आज मम्मा, आप की तबीयत ठीक नहीं है, चलिए अपने कमरे में.’

बेटी उन को लिटा कर आ गई. उमंग घटना निरपेक्ष हो कर मैत्री से बतियाते हुए पार्टी का आनंद ले रहे थे. पार्टी समाप्त होने पर वे अपनी कार से मैत्री को गैस्टहाउस छोड़ने आ रहे हैं. वे कह रहे हैं, ‘‘मैडम, माइंड न करें, मेरी पत्नी मंदबुद्धि है. मेरा विवाह भी मेरे जीवन में किसी चमत्कार से कम नहीं है. मेरा जन्म अत्यंत गरीब परिवार में हुआ. बचपन में मुझे पोलियो हो गया. मातापिता अपनी सामर्थ्य के अनुसार भटके, पर मैं ठीक नहीं हो पाया.

‘‘पढ़ने में तेज था, पर निराश हो गया. मां ने एक छोटे से स्कूल के मास्टरजी, जो बच्चों को निशुल्क पढ़ाते थे, उन के घर में पढ़ने भेजा. मास्टरजी के आगे मैं अपने पांवों की तरफ देख कर बहुत रोया. ‘गुरुजी, मैं जीवन में क्या करूंगा, मेरे तो पांव ही नहीं हैं.’

‘‘मास्टरजी ने कहा, ‘बेटा, तुम जीवन में बहुतकुछ कर सकते हो. पर पहली शर्त है कि अपने बीमार और अपाहिज पांवों के विषय में नहीं सोचोगे, तो जीवन में बहुत तेज दौड़ोगे.’ इस बात से मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया. मैं ने तय किया, मुझे किसी दया, भीख या सहानुभूति की बैसाखियों पर जीवित नहीं रहना और तब से मैं ने अपने लाचार पांवों की चिंता करना छोड़ दिया. इस गुरुमंत्र को गांठ बांध लिया. सो, आज यहां खड़ा हूं.

‘‘मैं पढ़नेलिखने में होशियार था, छात्रवृत्तियां मिलती गईं, पढ़ता गया और सरकारी अधिकारी बन गया. दफ्तर में कहीं से कोई खबर लाया कि विशाखापट्टनम में विकलांगों के इलाज का बहुत बढि़या अस्पताल है जिसे कोई ट्रस्ट चलाता है. वहां बहुत कम खर्चे में इलाज हो जाता है. दफ्तर वालों ने हौसला बढ़ाया, आर्थिक सहायता दी और मैं पोलियो का इलाज कराने के लिए लंबी छुट्टी ले कर विशाखापट्टनम पहुंच गया.

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‘‘देशविदेश के अनेक बीमारों का वहां भारी जमावड़ा था. कुछ परिवर्तन तो मुझ में भी आया. लंबा इलाज चलता है, संभावना का पता नहीं लगता है. वहां बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा है, ‘20 प्रतिशत हम ठीक करते हैं, 80 प्रतिशत आप को ठीक होना है.’ जिस का मतलब स्पष्ट है, कठिन व्यायाम लंबे समय तक करते रहो. कुल मिला कर कम उम्र के बच्चों की ठीक होने की ज्यादा संभावना रहती है. मेरे जैसे 30 वर्षीय युवक के ज्यादा ठीक होने की गुंजाइश तो नहीं थी, पर कुछ सुधार हो रहा था.

‘‘अस्पताल में मेरे कमरे का झाड़ूपोंछा लगाने वाली वृद्ध नौकरानी का मुझ से अपनापन होने लगा. एक दिन उस ने बातों ही बातों में बताया कि इस दुनिया में एक लड़की के सिवा उस का कोई नहीं है. 25 वर्षीय लड़की मंदबुद्धि है. मेरे बाद उस का न जाने क्या होगा? एक दिन वह अपनी लड़की को साथ ले कर आई, बेबाक शब्दों में बताया कि बचपन में चेचक निकली, एक आंख भेंगी हो गई. मंदबुद्धि है, कुछ समझ पड़ता है, कुछ नहीं पड़ता है. क्या आप मेरी लड़की से विवाह करेंगे?

‘‘मैं एकदम सकते में आ गया. पर मैं भी तो विकलांग हूं. वह बोली, ‘कुछ कमी इस में है, कुछ आप में है. दोनों मिल कर एकदूसरे को पूरा नहीं कर सकते हो? आप विकलांग अवश्य हो पर पढ़ेलिखे, समझदार और सरकारी नौकरी में हो. फिर मेरी बेसहारा लड़की को अच्छा सहारा मिल जाएगा.’ मैं ने कहा, ‘तुम समझ रही हो, मैं ठीक हो रहा हूं, पर नहीं ठीक हुआ तो क्या होगा?’

‘‘कोई बात नहीं, मेरी बेटी को सहारा मिल जाए, तो मैं शांति से मर सकूंगी,’ इस प्रकार हमारी सीधीसादी शादी हो गई.

‘‘आज केक काटते हुए जो घटना घटी, वह तो सामान्य है. यह तो मेरी दिनचर्या का अंग है. वैसे भी मेरी पत्नी का सही जन्मदिनांक तो पता ही नहीं है. वह तो हम ने अपनी शादी की तारीख को ही उस का जन्मदिनांक मान लिया है.’’

‘‘मैत्रीजी, अपूर्ण पुरुष और अपूर्ण स्त्री के वैवाहिक जीवन में अनेक विसंगतियां आती हैं, जिन्हें झेलना पड़ता है. शरीर विकलांग हो सकता है, मन मंद हो सकता है पर देह की तो अपनी भूख होती है. कई बार वह ही बैसाखियों से मुझ पर प्रहार करती है.

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‘‘संतोष और आनंद है कि 2 होनहार बच्चे हैं.’’

गैस्टहाउस सामने था.

मैत्री बोली, ‘‘सरजी, मैं ने आप को कुछ गलत समझ लिया. क्षमा करना.’’

उमंग एक ठहाका लगा कर हंसे, ‘‘मैत्रीजी, आप मेरी घनिष्ठ मित्र हैं, तो ध्यान रखना, हंसोहंसो, दिल की बीमारियों में कभी न फंसो.’’

मैत्री : क्या थी खामोशी की वजह

मैत्री : भाग 3

मैत्री ने अपने बेटे की मृत्यु की दुखभरी त्रासदी फेसबुक पर पोस्ट कर दी, अपनी तकलीफ और जीवन गुजारने की यथास्थिति भी लिख दी.

उमंग ने पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी, ‘जो कुछ आप के जीवन में घटित हुआ, उस के प्रति संवेदना प्रकट करने में शब्दकोश छोटा पड़ जाएगा. जीवन कहीं नहीं रुका है, कभी नहीं रुकता है. हर मनुष्य का जीवन केवल एक बार और अंतिम बार रुकता है, केवल खुद की मौत पर.’

इसी तरह की अनेक पोस्ट लगातार आती रहतीं, मैत्री के ठहरे हुए जीवन में कुछ हलचल होने लगी.

एक बार उमंग ने हृदयरोग के एक अस्पताल की दीवारों के चित्र पोस्ट किए जहां दिल के चित्र के पास लिखा था, ‘हंसोहंसो, दिल की बीमारियों में कभी न फंसो.’

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एक दिन उमंग ने लिखा, ‘मैडम, जीवनभर सुवास की याद में आंसू बहाने से कुछ नहीं मिलेगा. अच्छा यह है कि गरीब, जरूरतमंद और अनाथ बच्चों के लिए कोई काम हाथ में लिया जाए. खुद का समय भी निकल जाएगा और संतोष भी मिलेगा.’

यह सुझाव मैत्री को बहुत अच्छा लगा. नकुल से जब उस ने इस बारे में चर्चा की तो उस ने भी उत्साह व रुचि दिखाई.

जब मैत्री का सकारात्मक संकेत मिला तो उमंग ने उसे बताया कि वे खुद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, प्रधान कार्यालय, जयपुर में बड़े अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं. वे उस की हर तरह से मदद करेंगे.

उमंग ने पालनहार योजना, मूकबधिर विद्यालय, विकलांगता विद्यालय, मंदबुद्धि छात्रगृह आदि योजनाओं का साहित्य ईमेल कर दिया. साथ ही, यह भी मार्गदर्शन कर दिया कि किस तरह एनजीओ बना कर सरकारी संस्थाओं से आर्थिक सहयोग ले कर ऐसे संस्थान का संचालन किया जा सकता है.

उमंग ने बताया कि सुवास की स्मृति को कैसे यादगार बनाया जा सकता है. एक पंफ्लेट सुवास की स्मृति में छपवा कर अपना मंतव्य स्पष्ट किया जाए कि एनजीओ का मकसद निस्वार्थ भाव से कमजोर, गरीब, लाचार बच्चों को शिक्षित करने का है.

उमंग से मैत्री को सारा मार्गदर्शन फोन और सोशल मीडिया पर मिल रहा था. वे लगातार मैत्री को उत्साहित कर रहे थे.

मैत्री ने अपनी एक टीम बनाई, एनजीओ बनाया. मैत्री की निस्वार्थ भावना को देखते हुए उसे आर्थिक सहायता भी मिलती गई. उमंग के सहयोग से सरकारी अनुदान भी जल्दी ही मिलने लगा.

शहर में खुल गया विकलांग बच्चों के लिए एक अच्छा विद्यालय. मैत्री को इस काम में बहुत संतोष महसूस होने लगा. उस की व्यस्तता भी बढ़ गई. हर निस्वार्थ सेवा में उसे खुशी मिलने लगी. किसी का सहारा बनने में कितना सुख मिलता है, मैत्री को उस का एहसास हो रहा था. मैत्री पिछले 5 वर्षों से विकलांग विद्यालय को कामयाबी के साथ चला रही थी.

उमंग के लगातार सहयोग और मार्गदर्शन से विकलांग छात्र विद्यालय दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था.

अभी तक कोई ऐसा मौका नहीं आया जब मैत्री की उमंग से आमनेसामने मुलाकात हुई हो. मैत्री मन ही मन उमंग के प्रति एहसानमंद होने का अनुभव करती थी.

कुछ दिनों से उमंग से उस की बात हो रही थी. संदर्भ था विद्यालय का 5वां स्थापना दिवस समारोहपूर्वक मनाने का. मैत्री चाहती थी उक्त आयोजन में सामाजिक न्याय विभाग के निदेशक, विभाग के मंत्री तथा जयपुर के प्रख्यात समाजसेवी मुख्य अतिथियों के रूप में मौजूद रहें. इस काम के लिए भी उमंग के सहयोग की मौखिक स्वीकृति मिल गई थी. औपचारिक रूप से संस्था प्रधान के रूप में मैत्री को निमंत्रण देने हेतु खुद को जयपुर जाना पड़ रहा है. कल सवेरे ही उमंग ने मैत्री से कहा था, ‘जयपुर आ जाइए, सारी व्यवस्था हो जाएगी.’

5 वर्षों से जिस व्यक्ति से फेसबुक पर संपर्क है, वह किसी सरकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी के रूप में कार्य कर रहा है. और पगपग पर उस का सहयोग कर रहा है, उस का शिष्टाचारवश भी अतिथि को ठहराने का दायित्व तो बनता ही है.

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इसी बात पर आज सवेरे नकुल भड़क गया था. कहा था कि फेसबुकिया मित्र के यहां कहां ठहरोगी. मैत्री इतना तो समझती है कि सामान्य शिष्टाचार और आग्रह में अंतर होता है. सो, उस ने यही कहा था कि यह एक मित्र का आत्मीय आग्रह भी हो सकता है.

मैत्री खुद समझदार है, इतना तो जानती है कि महानगर कल्चर में किसी के घर रुक कर उस को परेशानी में डालना ठीक नहीं होता.

मैत्री का मन नकुल की छोटी सोच तथा स्त्रियों के प्रति जो धारणा उस ने प्रकट की, उस को ले कर खट्टा हुआ था. अपने ठहरने के विषय में तो विनम्रतापूर्वक उमंग को मना कर ही चुकी थी. बिना पूरी बात सुने नकुल का भड़कना तथा उमंग के लिए गलत धारणा बना लेना उसे सही नहीं लगता था.

रेलगाड़ी आखिरकार गंतव्य स्टेशन पर पहुंच कर रुक गई और मैत्री की विचारशृंखला टूटी. वह टैक्सी कर स्टेशन से सीधे पति नकुल के बताए गैस्टहाउस में जा ठहरी.

पोलो विक्ट्री के नजदीकी गैस्टहाउस में नहाधो कर, तैयार हो कर मैत्री अब उमंग के कार्यालय में पहुंच गई. आगे के निमंत्रण इत्यादि उमंग खुद साथ रह कर मंत्रीजी तथा निदेशक महोदय आदि को दिलवाएंगे.

प्रधान कार्यालय के एक कक्ष के बाहर तख्ती लगी थी, उपनिदेशक, उमंग कुमार. कक्ष के भीतर प्रवेश करते ही हतप्रभ होने की बारी मैत्री की थी. यू के खुद दोनों पांवों से विकलांग हैं तथा दोनों बैसाखियां उन की घूमती हुई कुरसी के पास पड़ी हैं.

उमंग ने उत्साहपूर्वक अभिवादन करते हुए मैत्री को कुरसी पर बैठने को कहा.

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मैत्री को क्षणभर के लिए लगा कि उस का मस्तिष्क भी रिवौल्ंिवग कुरसी की तरह घूम रहा है. 5 वर्ष की फेसबुकिया मित्रता में उमंग ने कभी यह नहीं बताया कि वे विकलांग हैं. उन की फोटो प्रोफाइल में एक भी चित्र ऐसा नहीं है जिस से उन के विकलांग होने का पता चले. क्षणभर के लिए मैत्री को लगा कि फेसबुकिया मित्रों पर नकुल की टिप्पणी सही हो रही है. मैत्री की तन्मयता भंग हुई. उमंग प्रसन्नतापूर्वक बातें करते हुए उसे सभी वीआईपी के पास ले गए. कमोबेश सारी औपचारिकताएं पूरी हो गईं. सभी ने मैत्री के निस्वार्थ कार्य की प्रशंसा की तथा उस के वार्षिक कार्यक्रम में शतप्रतिशत उपस्थित रहने का आश्वासन भी दिया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

मैत्री : भाग 2

माता-पिता दोनों सुवास के साथ गए. कोटा में सप्ताहभर रुक कर अच्छे कोचिंग सैंटर की फीस भर कर बेटे को दाखिला दिलवाया. अच्छे होस्टल में उस के रहने-खाने की व्यवस्था की गई. पतिपत्नी ने बेटे को कोई तकलीफ न हो, सो, एक बैंक खाते का एटीएम कार्ड भी उसे दे दिया.

बेटे सुवास को छोड़ कर जब वे वापस लौट रहे थे तो दोनों का मन भारी था. मैत्री की आंखें भी भर आईं. जब सुवास साथ था, तो उस के कितने बड़ेबड़े सपने थे. जितने बड़े सपने उतनी बड़ी बातें. पूरी यात्रा उस की बातों में कितनी सहज हो गई थी.

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नकुल और मैत्री का दर्द तो एक ही था, बेटे से बिछुड़ने का दर्द, जिस के लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. फिर भी नकुल ने सामान्य होने का अभिनय करते हुए मैत्री को समझाया था, ‘देखो मैत्री, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. बच्चों को योग्य बनाना हो तो मांबाप को यह दर्द सहना ही पड़ता है. इस दर्द को सहने के लिए हमें पक्षियों का जीवन समझना पड़ेगा.

‘जिस दिन पक्षियों के बच्चे उड़ना सीख जाते हैं, बिना किसी देर के उड़ जाते हैं. फिर लौट कर नहीं आते. मनुष्यों में कम से कम यह तो संतोष की बात है कि उड़ना सीख कर भी बच्चे मांबाप के पास आते हैं, आ सकते हैं.’

मैत्री ने भी अपने मन को समझाया. कुछ खो कर कुछ पाना है. आखिर सुवास को जीवन में कुछ बन कर दिखाना है तो उसे कुछ दर्द तो बरदाश्त करना ही पड़ेगा.

कमोबेश मातापिता हर शाम फोन पर सुवास की खबर ले लिया करते थे. सुवास के खाने को ले कर दोनों चिंतित रहते. मैस और होटल का खाना कितना भी अच्छा क्यों न हो, घर के खाने की बराबरी तो नहीं कर सकता और वह संतुष्टि भी नहीं मिलती.

पतिपत्नी दोनों ही माह में एक बार कोटा शहर चले जाते थे. कोटा की हर गली में कुकुरमुत्तों की तरह होस्टल, मैस, ढाबे और कोचिंग सैंटरों की भरमार है. हर रास्ते पर किशोर उम्र के लड़के और लड़कियां सपनों को अरमान की तरह पीठ पर किताबों के नोट्स का बोझ उठाए घूमतेफिरते, चहचहाते, बतियाते दिख जाते.

जगहजगह कामयाब छात्रों के बड़ेबड़े होर्डिंग कोचिंग सैंटर का प्रचार करते दिखाई पड़ते. उन बच्चों का हिसाब किसी के पास नहीं था जो संख्या में 95 प्रतिशत थे और कामयाब नहीं हो पाए थे.

टैलीफोन पर बात करते हुए मैत्री अपने बेटे सुवास से हर छोटीछोटी बात पूछती रहती. दिनमहीने गुजरते गए. सावन का महीना आ गया. चारों तरफ बरसात की झमाझम और हरियाली का सुहावना दृश्य धरती पर छा गया.

ऐसे मौसम में सुवास मां से पकौड़े बनवाया करता. मैत्री का बहुत

मन हो रहा था अपने बेटे को पकौड़े खिलाने का. शाम को उस के पति नकुल ने भी जब पकौड़े बनाने की मांग की तो मैत्री ने कह दिया, ‘बच्चा तो यहां है नहीं. उस के बगैर उस की पसंद की चीज खाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.’ तब नकुल ने भी उस की बात मान ली थी.

मैत्री की स्मृतिशृंखला का तारतम्य टूटा, क्योंकि रेलगाड़ी को शायद सिगनल नहीं मिला था और वह स्टेशन से बहुत दूर कहीं अंधेरे में खड़ी हो गई थी.

ऐसा ही कोई दिन उगा था जब बरसात रातभर अपना कहर बरपा कर खामोश हुई थी. नदीनाले उफान पर थे. अचानक घबराया हुआ रोंआसा नकुल घर आया. साथ में दफ्तर के कई फ्रैंड्स और अड़ोसीपड़ोसी भी इकट्ठा होने लगे.

मैत्री कुछ समझ नहीं पा रही थी. चारों तरफ उदास चेहरों पर खामोशी पसरी थी. घर से दूर बाहर कहीं कोई बतिया रहा था. उस के शब्द मैत्री के कानों में पड़े तो वह दहाड़ मार कर चीखी और बेहोश हो गई.

कोई बता रहा था, कोटा में सुवास अपने मित्रों के साथ किसी जलप्रपात पर पिकनिक मनाने गया था. वहां तेज बहाव में पांव फिसल गया और पानी में डूबने से उस की मृत्यु हो गई है.

हंसतेखेलते किशोर उम्र के एकलौते बेटे की लाश जब घर आई, मातापिता दोनों का बुरा हाल था. मैत्री को लगा, उस की आंखों के आगे घनघोर अंधेरा छा रहा है, जैसे किसी ने ऊंचे पर्वत की चोटी पर से उसे धक्का दे दिया हो और वह गहरी खाई में जा गिरी हो.

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मैत्री की फुलवारी उजड़ गई. बगिया थी पर सुवास चली गई. यह सदमा इतना गहरा था कि वह कौमा में चली गई. लगभग 15 दिनों तक बेहोशी की हालत में अस्पताल में भरती रही.

रिश्तेदारों की अपनी समयसीमा थी. कहते हैं कंधा देने वाला श्मशान तक कंधा देता है, शव के साथ वह जलने से रहा.

सुवास की मौत को लगभग 3 माह हो गए पर अभी तक मैत्री सामान्य नहीं हो पाई. घर के भीतर मातमी सन्नाटा छाया था. नकुल का समय तो दफ्तर में कट जाता. यों तो वह भी कम दुखी नहीं था पर उसे लगता था जो चीज जानी थी वह जा चुकी है. कितना भी करो, सुवास वापस कभी लौट कर नहीं आएगा. अब तो किसी भी तरह मैत्री के जीवन को पटरी पर लाना उस की प्राथमिकता है.

इसी क्रम में उस को सूझा कि अकेले आदमी के लिए मोबाइल बिजी रहने व समय गुजारने का बहुत बड़ा साधन हो सकता है. एक दिन नकुल ने एक अच्छा मोबाइल ला कर मैत्री को दे दिया.

पहले मैत्री ने कोई रुचि नहीं दिखाई, लेकिन नकुल को यकीन था कि यह एक ऐसा यंत्र है जिस की एक बार सनक चढ़ने पर आदमी इस को छोड़ता नहीं है. उस ने बड़ी मानमनुहार कर उस को समझाया. इस में दोस्तों का एक बहुत बड़ा संसार है जहां आदमी कभी अकेला महसूस नहीं करता बल्कि अपनी रुचि के लोगों से जुड़ने पर खुशी मिलती है.

नकुल के बारबार अपील करने? और यह कहने पर कि फौरीतौर पर देख लो, अच्छा न लगे, तो एकतरफ पटक देना, मैत्री ने गरदन हिला दी. तब नकुल ने सारे फंक्शंस फेसबुक, व्हाट्सऐप, हाइक व गूगल सर्च का शुरुआती परिचय उसे दे दिया.

कुछ दिनों तक तो मोबाइल वैसे ही पड़ा रहा. धीरेधीरे मैत्री को लगने लगा कि नकुल बड़ा मन कर के लाया है, उस का मान रखने के लिए ही इस का इस्तेमाल किया जाए.

एक बार मैत्री ने मोबाइल को इस्तेमाल में क्या लिया कि वह इतनी ऐक्सपर्ट होती चली गई कि उस की उंगलियां अब मोबाइल पर हर समय थिरकती रहतीं.

फेसबुक के मित्रता संसार में एक दिन उस का परिचय उमंग कुमार यानी मिस्टर यू के से होता है.

अकसर मैत्री अपने दिवंगत बेटे सुवास को ले कर कुछ न कुछ पोस्ट करती रहती थी. फीलिंग सैड, फीलिंग अनहैप्पी, बिगैस्ट मिजरी औफ माय लाइफ आदिआदि.

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निराशा के इस अंधकार में आशा की किरण की तरह उमंग के पोस्ट, लेख, टिप्पणियां, सकारात्मक, सारगर्भित, आशावादी दृष्टिकोण से ओतप्रोत हुआ करते थे. नकुल को लगा मैत्री का यह मोबाइलफ्रैंडली उसे सामान्य होने में सहयोग दे रहा है. उस का सोचना सही भी था.

फेसबुक पर उमंग के साथ उस की मित्रता गहरी होती चली गई. मैत्री को एहसास हुआ कि यह एक अजीब संसार है जहां आप से हजारों मील दूर अनजान व्यक्ति भी किस तरह आप के दुख में भागीदार बनता है. इतना ही नहीं, वह कैसे आप का सहायक बन कर समस्याओं का समाधान सुझाता है.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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