Celebrity Interview: मैं सरस सलिल का फैन हूं – केके गोस्वामी

Celebrity Interview: केके गोस्वामी मूल रूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले हैं. इन्होंने भारतीय टैलीविजन सीरियलों, हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगाली, भोजपुरी फिल्मों के जरीए अपनी अदाकारी से सभी को मुरीद बना लिया है.

हाल ही में लखनऊ में हुए ‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो में बैस्ट कैरेक्टर ऐक्टर का अवार्ड लेने आए केके गोस्वामी से उन के फिल्म करियर पर बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

कई इंटरव्यू में आप ने अपने शुरुआती संघर्ष पर खुल कर बातें की हैं. क्या आप एक बार उन यादों को हम से साझा करेंगे?

मैं बिहार से ऐक्टर बनने की ख्वाहिश लिए मुंबई आया था. लेकिन मुझे स्क्रीन तक पहुंचने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. एक बार मुझे मेरी ही कदकाठी के एक शख्स ने बीयर बार में नौकरी करने की सलाह दी. जब मैं बीयर बार में गया तो वाचमैन ने मुझे डंडा मार कर भगा दिया. यही वह पल था जब मैं ने ठान लिया था कि अब हर हाल में मुझे ऐक्टर बन कर दिखाना है. स्ट्रगल के दौरान ऐसा भी समय आया जब मै हफ्ते में एक दिन खाना खाता था. पैसों की तंगी के बावजूद मैं ने हार नहीं मानी और आखिरकार मुझे कामयाबी मिली.

आप की लवस्टोरी में भी ट्विस्ट रहा है. ऐसा क्या हुआ है?

मेरी हाइट 3 फुट ही है, वहीं मेरी बीवी पीकू मुझ से दोगुनी लंबी हैं. पीकू की हाइट तकरीबन 5 फुट है. मेरी हाइट कम होने के चलते पीकू के घर वालों के मना करने के बावजूद पीकू मुझ से ही शादी करना चाहती थी. आखिरकार पीकू की जिद के आगे घर वालों को मानना पड़ा.

आप के टीवी शो भी पौपुलर रहे हैं. छोटे परदे पर किया गया कौन सा रोल आप के लिए यादगार रहा है?

टीवी सीरियल में जो भूमिकाएं मेरे दिल के बेहद करीब हैं उन में ‘शक्तिमान’ में खली और बली का दोहरा रोल, ‘जूनियर जी’ में बोनापार्ट, ‘शाका लाका बूमबूम’ में क्रिस्टल खास हैं. ‘गुटूरगुं’ में मेरे किरदार पप्पू महाराज को भी लोगों ने खूब पसंद किया है.

हिंदी सिनेमा में किया गया कौन सा रोल आप के दिल के करीब है?

मैं ने जितनी भी हिंदी फिल्मों में काम किया उन में से फिल्म ‘भूत अंकल’ में निभाए गए टिंगु के रोल को काफी सराहना मिली थी. यह रोल देश के मनमस्तिष्क में रचबस गया था.

आप टीवी और हिंदी सिनेमा में काफी हिट रहे हैं, फिर अचानक आप का झुकाव भोजपुरी फिल्मों की तरफ कैसे हो गया?

मैं बिहार की माटी में पलाबढ़ा हूं. भोजपुरी तो मेरे रगरग में बसी हुई है. मेरा शुरुआत से ही भोजपुरी फिल्मों में काम करने की तरफ झुकाव रहा है. मुझे खुशी है कि मुझे जितना प्यार टीवी और हिंदी सिनेमा से मिला, उस से कहीं ज्यादा प्यार भोजपुरी सिनेमा से मिल रहा है.

आप को सरस सलिल पत्रिका की कौन सी बात अच्छी लगती है?

सच कहूं तो एक अभिनेता के रूप में अगर देखें तो दर्शक मेरे फैन हैं और मैं एक पाठक के रूप में ‘सरस सलिल’ पत्रिका का फैन हूं. मुझे ‘सरस सलिल’ के सभी स्तंभ काफी मजेदार, ज्ञानवर्धक, जागरूकता बढ़ाने वाले और रोचक लगते हैं.

Bhojpuri Cine Awards 2025: मनोज भावुक को मिला बैस्ट राइटर अवार्ड

Bhojpuri Cine Awards 2025: इस साल ‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो में एक ऐसी नई कैटेगरी शामिल की गई थी, जो अपनेआप में खास थी. यह कैटेगरी थी साल 2024 में प्रकाशित भोजपुरी सिनेमा के अब तक के इतिहास पर आधारित बुक के लिए बैस्ट राइटर का अवार्ड.

अभी तक भोजपुरी सिनेमा को ले कर जितने भी अवार्ड शो होते रहे हैं, वे इस कैटेगरी से अछूते रहे हैं. पहली बार भोजपुरी सिनेमा के इतिहासकार को सम्मानित किया गया.

क्यों खास है यह पुस्तक अवार्ड ग्रहण करने के बाद मनोज भावुक ने कहा कि यह किताब उन के 30 वर्षों की मेहनत का फल है. उन्होंने आडियंस को पुस्तक दिखाते हुए बताया कि वे साल 1995 से ही भोजपुरी सिनेमा पर लगातार लिख रहे हैं. यह भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर भोजपुरी भाषा में पहली किताब है. इस किताब में वर्ष 1931 से ले कर अब तक के भोजपुरी सिनेमा के सफर का बहुत ही बारीकी से वर्णन किया गया है.

वर्ष 1962 में भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ आई थी. उस के पहले 1931 से 1962 तक हिंदी सिनेमा में संवाद और गीतों के जरीए भोजपुरी भाषा कैसे अपना परचम लहराती रही, इस के रोचक किस्से भी इस पुस्तक में हैं.

अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार, राकेश पांडेय, कुणाल सिंह, रवि किशन और मनोज तिवारी जैसी सिनेमा हस्तियों के साक्षात्कार शामिल हैं, भोजपुरी सिनेमा की चुनौतियों, संभावनाओं, बिजनैस और भविष्य पर खुल कर लिखा गया है. साथ ही ओटीटी, भोजपुरी वैब सीरीज, टैलीफिल्म, सीरियल पर भी प्रकाश डाला गया है.

मैथिलीभोजपुरी अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित 405 पन्नों की इस पुस्तक में अलगअलग फिल्मों की शूटिंग के अनेक रोचक प्रसंग भी शामिल हैं. इस पुस्तक में भोजपुरी सिनेमा के सफर को 3 खंडों में बांटा गया है.

पहले खंड में वर्ष 1931 से वर्ष 2000 के कालखंड में फिल्मी दुनिया में भोजपुरी के प्रवेश की कहानी, पहली फिल्म के निर्माण की कहानी, भोजपुरी सिनेमा के भीष्म पितामह नाजिर हुसैन का दुर्लभ लेख, उस दौर के प्रतिमान, गीत व कथापटकथा के साथ कुछ खास साक्षात्कार भी शामिल हैं.

दूसरे खंड में वर्ष 2001 से वर्ष 2019 तक के सफर का बारीकी से वर्णन है. इस दौर के नायकनायिका, गीतकारसंगीतकार, निर्मातानिर्देशक व क्रिएटिव टीम के परिचय व योगदान के साथ बदलते सिनेमा, भूतल से रसातल तक जाते सिनेमा, चेतावनी और चुनौती पर खुल कर विमर्श है.

तीसरा खंड विविधा का है जिस में सिनेमा के विभिन्न आयामों पर चर्चा है. लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी के भोजपुरी गीतों पर रोचक आलेख हैं. भोजपुरी सिनेमा, राजनीति और चुनाव का भी जिक्र है.

गौरतलब है कि मनोज भावुक को फिल्मफेयर व फेमिना द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है, लेकिन जिस पुस्तक के लिए उन्होंने 30 साल गहन शोध किया, जिस पुस्तक को भोजपुरी सिनेमा के महानायक कुणाल सिंह ‘भोजपुरी सिनेमा की रामायण’ कहते हैं, उस के लिए वे पहली बार सम्मानित हुए हैं.

कौन हैं मनोज भावुक

मनोज भावुक भोजपुरी के प्रख्यात साहित्यकार, संपादक, सुप्रसिद्ध कविगीतकार, टीवी पत्रकार और भोजपुरी सिनेमा के इतिहासकार हैं. लगभग एक दशक तक अफ्रीका और यूनाइटेड किंगडम में बतौर इंजीनियर सेवा देने के बाद मनोज पूरी तरह मीडिया से जुड़ गए और अनेक चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. वे सारेगामापा (रीजनल) के प्रोजैक्ट हैड रहे हैं साथ ही कई पुस्तकों के प्रणेता हैं. वे एक सफल टीवी एंकर और अंतर्राष्ट्रीय मंच संचालक भी हैं. उन्होंने कई फिल्मों और धारावाहिकों में अभिनय किया है. कई फिल्मों में गीत भी लिखे हैं.

Bhojpuri Cine Awards 2025: फिल्म सितारों से जगमग हुई एक शाम

Bhojpuri Cine Awards 2025: भोजपुरी सिनेमा के सब से प्रतिष्ठित अवार्ड्स में शुमार ‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स 2025’ का आयोजन इस साल 10 अप्रैल को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में किया गया. सभी लोगों के लिए यह एक यादगार शाम रही, जहां भोजपुरी फिल्म स्टार्स, मेकर्स और क्रू सभी ने इंडस्ट्री में अपने अद्भुत योगदान का जश्न मनाया.

इस अवार्ड्स शो के प्रति लोगों की दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शाम 6 बजे से आयोजित होने वाले समारोह में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के भोजपुरी के प्रति दीवानगी रखने वालों की भीड़ शाम के 4 बजे से ही इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के आडिटोरियम में जमा होने लगी थी और देर रात, जब तक अवार्ड सैरेमनी खत्म नहीं हुई, तब तक भीड़ इस अवार्ड को देखने के लिए जमी रही.

नौमिनेशन के आधार पर किया गया चयन

‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ के लिए बीते साल की तरह इस साल भी ‘सरस सलिल’ पत्रिका की तरफ से अवार्ड के लिए आवेदन मांगे गए थे, जिन में साल 2024 में रिलीज हुई भोजपुरी फिल्मों के आधार पर लीड ऐक्टर्स, ऐक्ट्रैसेज, सपोर्टिंग ऐक्टर्स सहित फिल्मों में काम करने वाले टैक्निशियंस से जुड़ी दर्जनों कैटेगरी में आवेदन आमंत्रित किए गए थे.

‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ के लिए आवेदन किए जाने की अंतिम तिथि 10 मार्च, 2025 रखी गई थी. आवेदन की अंतिम तिथि तक ‘सरस सलिल’ पत्रिका द्वारा आवेदन के लिए जारी आधिकारिक इमेल आईडी पर दर्जनों फिल्मों की अलगअलग कैटेगरी के लिए सैकड़ों लोगों के नामांकन प्राप्त हुए.
इन प्राप्त आवेदनों के आधार पर अवार्ड्स के लिए स्थापित जूरी द्वारा की गई स्क्रीनिंग से अलगअलग कैटेगरियों के लिए नामों को फाइनल किया गया.

अतिथि ने संबोधन में सराहा

‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स नाइट्स’ के छठे संस्करण में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश राज्य के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक भोजपुरी सितारों के बीच बेहद गदगद नजर आए और उन्होंने ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ की सराहना करते हुए दिल्ली प्रैस को धन्यवाद भी कहा.

उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वालों की आबादी बहुत ज्यादा है. ऐसे में इस आयोजन के लिए लखनऊ का चयन कर के दिल्ली प्रैस ने भोजपुरी का सम्मान बढ़ा दिया है. उन्होंने विभिन्न कैटेगरियों में अवार्ड प्राप्त करने वाले सभी स्टार्स व मेकर्स को बधाई दी.

इस के अलावा विशिष्ट अतिथि के तौर पर संदीप बंसल, अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के सदस्य, प्रभुनाथ राय, सदस्य, अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, मुकेश बहादुर सिंह, अध्यक्ष, इंडोअमेरिकन चैंबर औफ कौमर्स, लखनऊ, पवन सिंह चौहान, अध्यक्ष, एसआर ग्रुप औफ ऐजूकेशन और सदस्य, विधानसभा परिषद, राजेश राय, सदस्य, सूचना विभाग, सुरेंद्र सिंह राजपूत, राष्ट्रीय प्रवक्ता, कांग्रेस और अनीता सहगल, एंकर और अभिनेत्री ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई.

संपादक ने बताया दिल्ली प्रैस का इतिहास

दिल्ली प्रैस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ ने इस अवार्ड सैरेमनी में आए सभी अतिथियों को पुष्प गुच्छ और अंगवस्त्र दे कर स्वागत करते हुए आभार व्यक्त किया. इस मौके पर उन्होंने दिल्ली प्रैस के गौरवशाली इतिहास और संस्थान द्वारा प्रकाशित विभिन्न पत्रिकाओं के सफर पर प्रकाश डाला, जिसे एक वीडियो डौक्यूमैंट्री के जरीए अतिथियों, फिल्म स्टार्स और आडियंस के सामने प्रस्तुत भी किया गया.

उन्होंने ‘सरस सलिल’ पत्रिका द्वारा भोजपुरी सिनेमा के लिए शुरू किए गए 6 सालों के सफर पर चर्चा करते हुए फिल्म इंडस्ट्री और आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों को धन्यवाद ज्ञापित किया.

इस मौके पर परेश नाथ ने कहा, ‘‘हमें भोजपुरी सिनेमा को इतना बेहतरीन बनाने वाले लोगों को सम्मानित करने पर गर्व है. ये पुरस्कार उन की कड़ी मेहनत और प्रतिभा का प्रतिबिंब हैं. अपने पसंदीदा कलाकारों और फिल्मों का जश्न मनाने के लिए पूरे समुदाय को एकसाथ आते देखना बहुत खुशी की बात होती है.’’

दिल्ली प्रैस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने भी सभी अतिथियों और फिल्म स्टार्स का आभार व्यक्त किया.

हिट रही शुभम और माही की जोड़ी

इस अवार्ड शो के एंकर और नामी ऐक्टर शुभम तिवारी और ऐक्ट्रैस माही खान ने जब ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ के स्टेज पर ऐंट्री मारी, तो दर्शकों की तालियां थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

जहां एक तरफ ऐक्टर शुभम तिवारी ने अपने निराले और मनमोहक अंदाज में मन मोह लिया, वहीं दूसरी तरफ ऐक्ट्रैस माही खान भी अपनी हौट ड्रैस और लुक में बिजलियां गिराती नजर आईं.

शुभम और माही की जोड़ी ने देर रात चले इस अवार्ड शो में अपने नटखट अंदाज में समां ही बांध दिया. इस के अलावा ऐक्टर विमल पांडेय भी इस अवार्ड सैरेमनी में सहएंकर के रूप में गुदगुदाते नजर आए.

आर्यन बाबू के गाने पर झूमे डिप्टी सीएम

इस अवार्ड सैरेमनी की शुरुआत ‘लिटिल स्टार’ के नाम से मशहूर बाल कलाकार आर्यन बाबू के गाने से
हुई, जिसे सुन कर दर्शक खड़े हो कर झूमने लगे.

आर्यन बाबू ने अपने गाने के बीच में ही मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश राज्य के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक को मंच पर आमंत्रित किया. इस मौके पर डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने आर्यन बाबू की पीठ भी थपथपाई.

रंगारंग प्रस्तुतियों से बंध गया समां

एंकर शुभम तिवारी और माही खान ने जैसे ही ‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो में पहली पेशकश के लिए कोरियोग्राफर सागर शान और विद्या रावत की टीम को मंच पर आने के लिए पुकारा, तो उस के बाद इस टीम ने मंच पर धमाकेदार अंदाज में फिल्मी गानों पर प्रस्तुति दे कर समां बांध दिया.

इस के बाद कार्यक्रम को होस्ट कर रहीं माही खान और आशीष यादव की जोड़ी ने जब भोजपुरी गानों पर डांस करना शुरू किया, तो दर्शक भी अपनी सीटें छोड़ कर नाचने लगे.

भोजपुरी फिल्मों और म्यूजिक अलबम में कई हिट गाने दे चुकीं अनामिका ने भी अपने चिरपरिचित अंदाज में हिट गानों की प्रस्तुति दी. अनामिका गाना गाते हुए स्टेज से नीचे उतर आईं और उन्होंने अपने गाने पर सुपरस्टार अरविंद अकेला ‘कल्लू’ को खूब नचाया.

आर्यन बाबू और माही खान ने एक बार फिर से मंच पर धमाकेदार डांस कर सब को चौंका दिया, वहीं राधा सिंह के डांस ने आडियंस के दिलों की धड़कनों को बढ़ा दिया.

दिवाकर द्विवेदी ने लूटी वाहवाही

अवधी बोली के चर्चित गायक दिवाकर द्विवेदी ने अपने अवधी गीतों को प्रस्तुत कर समां बांध दिया. उन्होंने ‘सरस सलिल अवार्ड’ पर बनाए गए एक अवधी गीत को भी प्रस्तुत किया. इस दौरान उन्हें दिल्ली प्रैस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ के हाथों ‘बैस्ट अवधी सिंगर’ के अवार्ड से भी नवाजा गया.

दिवाकर द्विवेदी ने ‘सरस सलिल’ पत्रिका को ले कर अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि वे अकसर पत्रिका के ‘छम्मक छल्लो’ कौलम को खूब पढ़ा करते थे. ‘सरस सलिल’ में उन के बारे में कई बार छाप कर उन की कला को प्रोत्साहित भी किया है.

दिल की धड़कनें बढ़ा गईं संजना सिल्क

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में आइटम नंबर के लिए पिछले 5 सालों से बैस्ट आइटम डांसर का अवार्ड पाने वाली संजना सिल्क ने बेहद हौट कपड़ों में जब आइटम डांस पेश किया, तो नौजवानों के साथ बड़ेबूढ़ों की भी दिल की धड़कनें तेज हो गईं.

संजना सिल्क ने अपने लटकेझटकों से जब समां बांधा, तो एक बार को लगा कि आडियंस बैरिकेटिंग तोड़ कर स्टेज पर चढ़ जाएगी.

‘ढेला बाबा’ ने खूब हंसाया

यह अवार्ड सैरेमनी उस समय और ज्यादा हास्यमय हो गई, जब भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के फेमस कौमेडियन सीपी भट्ट ने देशी पहनावे और देशी अंदाज में जबरदस्त ऐंट्री मारी.

कौमेडियन संजय वर्मा और फिल्म डायरैक्टर देव पांडेय ने मस्ती भरे मूड में सीपी भट्ट का साथ दिया. इस दौरान इन ऐक्टरों ने अपनी कौमेडी से आडियंस का खूब मनोरंजन किया.

नन्ही स्वास्तिका को कैमरों ने किया कैद

भोजपुरी फिल्मों की बाल कलाकार स्वास्तिका राय ने जब काली साड़ी पहन कर स्टेज पर डांस करने के लिए ऐंट्री मारी, तो दर्शक अपनी सीट से उछल ही पड़े, क्योंकि स्वास्तिका काली साड़ी में बहुत ही क्यूट लग रही थीं.

बाल कलाकार स्वास्तिका राय के डांस के लटके?ाटके ऐसे थे कि हाल में बैठी आडियंस के साथ अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अंजना सिंह और रिचा दीक्षित जैसे फेमस स्टार भी इस डांस को अपने मोबाइल के कैमरे में कैद करना नहीं भूले.

‘कल्लू’ के गाने पर मचा धमाल

अरविंद अकेला ‘कल्लू’ जब स्टेज पर चढ़े, तो आडियंस से केवल एक ही आवाज आ रही थी ‘कल्लूकल्लू’. इस दौरान जब वहां मौजूद आडियंस ने ‘कल्लू’ के वायरल गाने ‘नाच रे पतरकी नागिन जइसन’ की डिमांड की, तो उन का साथ देने के लिए ऐक्टर देव सिंह, अंजना सिंह, रिचा दीक्षित, आर्यन बाबू और राधा सिंह के साथ एंकर माही खान ने जम कर डांस किया. इस दौरान आडियंस के बीच से खूब सीटियां बजती रहीं.

सभी का रखा गया खास खयाल

इस साल के पुरस्कारों में 50 से ज्यादा श्रेणियां शामिल थीं, जिन में ऐक्टिंग, डायरैक्शन, राइटिंग, म्यूजिक, प्रोडक्शन डिजाइन, एडिटिंग और कई अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को सम्मानित किया गया.

मुख्य पुरस्कारों के अलावा विशेष सम्मान भी प्रदान किए गए, जिस में लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड विजय खरे को दिया गया, जिन का भोजपुरी सिनेमा पर दशकों तक प्रभाव रहा है.

इस पुरस्कार को ग्रहण करने के लिए उन के बेटे आशुतोष खरे मौजूद रहे और पुरस्कार को ग्रहण करने के दौरान भोजपुरी सिनेमा में अपने पिता को याद कर बेहद भावुक नजर आए.

भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो की बात जो सब से अलग थी, वह थी काम पर ध्यान केंद्रित करना, खासकर बैकस्टेज का काम, जिस पर अकसर किसी का ध्यान नहीं जाता. एडिटर्स, सैट डिजाइनर्स, लाइटिंग कू्र, लेखकों और बैकग्राउंड कलाकारों को भी मंच पर वास्तविक सराहना मिली.

‘कल्लू’ और अंजना रहे सब से अव्वल

किसी भी फिल्म अवार्ड शो में ओवरआल बैस्ट कैटेगरी में बैस्ट ऐक्टर और ऐक्ट्रैस का अवार्ड किसे जा रहा है, यह बेहद दिलचस्पी का विषय होता है. इस बार का बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड अरविंद अकेला ‘कल्लू’ को उन की फिल्म ‘कसमेवादे’ के लिए मिला और फिल्म ‘बड़की दीदी’ के लिए अंजना सिंह को बैस्ट ऐक्ट्रैस का खिताब मिला.

फिल्म ‘सूर्यवंशम’ के लिए निशांत उज्ज्वल को बैस्ट फिल्म का अवार्ड दिया गया. देव पांडेय, रजनीश मिश्र और प्रमोद शास्त्री को बैस्ट डायरैक्टर का पुरस्कार मिला. इन पुरस्कारों का स्वागत जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस साल की फिल्मों के पीछे की कहानियों और प्रतिभा की सच्ची सराहना के साथ किया गया.

अरविंद अकेला ‘कल्लू’ को बैस्ट ऐक्टर के अलावा बैस्ट प्लेबैक सिंगर का अवार्ड फिल्म ‘शादी बाई चांस’ में गाए गीत ‘दिल इश्क में तोहरे झामे’ के लिए दिया गया, वहीं अंजना सिंह को बैस्ट ऐक्ट्रैस के अवार्ड के अलावा फिल्म ‘मेरी बेटी मेरा अभिमान’ के लिए बैस्ट ऐक्ट्रैस (सोशल क्रिटिक) का अवार्ड भी प्रदान किया गया.

देव सिंह को मिला इस कैटेगरी में अवार्ड

बतौर विलेन भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में खास पहचान बनाने वाले देव सिंह ने अपने नैगेटिव रोल से खूब सुर्खियां बटोरी हैं. लेकिन कुछ सालों से देव सिंह नैगेटिव रोल से हट कर बतौर हीरो लीड रोल में अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों के दिल में खास जगह बनाने में कामयाब रहे हैं.

इस साल उन की भोजपुरी फिल्म ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ में निभाए गए दमदार लीड रोल के लिए बैस्ट ऐक्टर ‘फैमिली वैल्यूज कैटेगरी’ का अवार्ड उन्हें प्रदान किया गया.

विवेक पांडेय का संयोजन

पिछले 5 सालों से ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो’ के संयोजक की भूमिका में गायक और कलाकार विवेक पांडेय ने आयोजन को सफल बनाने के लिए दिनरात एक कर दिया. उन्होंने न केवल फिल्म हस्तियों से समन्वय स्थापित किया, बल्कि उन्हें अवार्ड शो में आमंत्रित करने में भी उन की अहम भूमिका रही.

उन्होंने इस शो में आमंत्रित सभी लोगों कीहर छोटीबड़ी सहूलियतों का खयाल रखा. ऐक्टरों का कहना था कि सरस सलिल टीम और विवेक पांडेय के चलते किसी को भी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा.

उन्होंने इस आयोजन से 3 महीने पहले से ही सभी तैयारियों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई.

ये कंपनियां रहीं कार्यक्रम की प्रायोजक

इस साल ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो में सहप्रायोजक के रूप में गोल्डी मसाले रहा. गोल्डी ग्रुप अपने उपभोक्ताओं को मसालों, हींग, अचार, केचप और वनवन नूडल्स की एक बड़ी रेंज प्रदान कर रहा है.

यह कंपनी अपनी स्थापना के बाद से ही मसालों के क्षेत्र के साथसाथ अन्य खाद्य उत्पादों में 5 पीढि़यों से काम करने की विरासत को ऐंजौय कर रही है. इस ब्रांड में कुछ ऐसा है, जो नैतिक मूल्यों को दर्शाता है.

हाल ही में गोल्डी ग्रुप ने मसाला पैकेजिंग में ‘फ्रैशलौक’ नामक तकनीक को लौंच किया है. इस तकनीक के लौक मसालों को नमी से बचाते हैं और पैकेट को खोलने के बाद उन की सुगंध और स्वाद को खोने से बचाते हैं.

इस अवार्ड्स शो का औफिशियल ईवी पार्टनर एम्पीयर रहा, जो इलैक्ट्रिक स्कूटर निर्माण के मामले में भारत के सब से भरोसेमंद ईवी ब्रांड में से एक है, जो पिछले 16 सालों से ईवी बना रहा है. ये ग्रीव्स की 165 साल की विरासत का हिस्सा हैं. 59,900 रुपए से ले कर हाईस्पीड प्रीमियम तक की कीमतों के स्कूटरों वाला एम्पीयर एकमात्र ईवी ब्रांड है, जो ‘हर गली इलैक्ट्रिक’ बनाने के लिए यहां है. एम्पीयर नैक्सस और एम्पीयर मैग्नस नियो के पास कश्मीर से कन्याकुमारी तक का सफर तय करने का राष्ट्रीय रिकौर्ड है. सभी एम्पीयर इलैक्ट्रिक स्कूटर सब से सुरक्षित एलएफपी बैटरी तकनीक के साथ आते हैं और पूरे उत्तर प्रदेश में उपलब्ध हैं.

एसोसिएट पार्टनर गाइड डिटर्जेंट रहा, जिस ने पिछले 50 सालों से लखनऊ की गलियों से ले कर पूरे उत्तर भारत के घरों तक, गाइड डिटर्जेंट ने सफाई के मायनों को एक नई परिभाषा दी है.

एक समय जब घरेलू सफाई में विश्वसनीयता और किफायती समाधान की जरूरत थी, तब गाइड बना हर घर का साथी. एक ऐसा नाम, जिस पर पीढि़यां भरोसा करती आई हैं.

स्थानीय अनुभव, वैज्ञानिक फार्मूला और उपभोक्ता की जरूरतों को समझते हुए गाइड ने हमेशा गुणवत्ता और सादगी का मेल प्रस्तुत किया है. चाहे बात हो कपड़ों की गहराई से सफाई की या फिर ?ाग से भरे संतोष की, गाइड हर बार ही खरा उतरा है.

नैशनल मीडिया में खूब चली अवार्ड की खबरें

इस बार ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो को नैशनल लैवल पर मीडिया में खूब जगह मिली. इस शो की तैयारियों से ले कर और पोस्ट अवार्ड शो के बाद टीवी चैनल्स, वैब पोर्टल्स और प्रिंट मीडिया में खूब छापा और दिखाया गया. साथ ही, अवार्ड शो से जुड़े वीडियो भी चलाए गए.

कुछ प्रमुख मीडिया संस्थाओं की अगर बात करें, तो न्यूज 18, एनडीटीवी, जी न्यूज, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा सहित सैकडों मीडिया संस्थानों ने इस शो को जगह दी.

‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो में इस बार जिन लोगों को अवार्ड मिले, उन्हें यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि पर खूब बधाई मिली. अवार्ड सैरेमनी से जुड़े फोटो और न्यूज क्लिप्स शेयर की गईं.

Crime Story: प्रेमजाल – क्या रमन ने नमिता का रेप किया था?

Crime Story: “पर तुम मुझे आज प्यार करने से क्यों रोक रही हो? आज तो हमारी सुहागरात है…” 45 साल के रमन ने अपनी नईनवेली बीवी तान्या से कहा.

तान्या सिर झुकाए बैठी रही तो एक बार फिर रमन ने अपने होंठों को उस की ओर बढ़ाया, तो वह पीछे हटते हुए बोली, “नहीं, यह सब अभी नहीं… मैं आप का साथ नहीं दे सकती.”

“पर क्यों?” रमन ने हैरान हो कर पूछा.

“दरअसल, मुझे अभी पीर बाबा की दरगाह पर चादर चढ़ानी है. उस से पहले मैं आप के साथ संबंध नहीं बना सकती.”

“अच्छा तो ठीक है… पर कम से कम गले तो लगा लो,” रमन ने अपनी बांहें फैलाते हुए कहा.

“जी नहीं, अभी कुछ भी नहीं,” कहते हुए तान्या हलके से शरमा गई.

रमन की पहली बीवी केतकी की मौत एक सड़क हादसे में हो गई थी और उस की 7 साल की बेटी रिंकी के सिर में काफी चोट आई थी. बेटी की जान तो बच गई, पर सिर पर चोट लगने से उस की आवाज जाती रही.

वैसे तो रमन अपनी बीवी की मौत के बाद इतना ज्यादा गमजदा हो गया था कि उसे कुछ भी होश नहीं था, पर आसपड़ोस और रिश्तेदारों ने उसे समझाया कि जो होना था हो चुका है, अब अपनेआप को संभालो. तुम्हें भले ही एक बीवी की जरूरत न हो, पर तुम्हारी बेटी को अभी भी एक मां की जरूरत है, इसलिए तुम्हें जल्द से जल्द शादी कर लेनी चाहिए.

बेटी को एक मां जरूरत है… यह बात रमन को अच्छी तरह समझ में आ गई थी, इसलिए उस ने मैट्रीमोनियल साइटों पर अपने लिए बीवी की खोज शुरू कर दी और जल्द ही उस की खोज पूरी भी हो गई जब उसे तान्या का फोन नंबर और दूसरी जानकारी एक मैट्रीमोनियल साइट पर मिली.

रमन ने तान्या से बात की और अपने बारे में बिना कुछ छिपाए सबकुछ बता दिया. तान्या ने भी रमन को अपने बारे में जो बताया वह यह था कि उस के मांबाप बचपन में ही गुजर गए थे. मामामामी ने ही उसे पालापोसा है और इस दुनिया में वह और उस का भाई मयूर ही हैं.

रमन ने तान्या के मामामामी से मिल कर रिश्ता पक्का करने की बात कही तो तान्या ने उसे बताया कि वे दोनों उस के छोटे भाई के साथ मलयेशिया घूमने गए हैं. हां, तान्या ने अपने भाई मयूर की बात रमन से वीडियो काल पर जरूर करा दी थी और तान्या की दास्तान सुन कर रमन को काफी अपनापन सा लगने लगा था.

कुछ दिनों के बाद तान्या ने भी शादी के लिए हां कर दी थी. रमन तान्या जैसी मौडर्न और खूबसूरत लड़की पा कर खुश था, क्योंकि तान्या रमन के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने वाली लड़की साबित हुई. उस ने जल्द ही रमन के बिजनैस में भी दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था और समयसमय पर बेबाकी से रमन को अपनी राय दिया करती, जिस पर रमन अमल भी करता था.

तान्या ने रमन की मदद करने के नाम पर उस के बैंक की डिटेल और खातों के बारे में जानकारी भी ले ली थी.

एक दिन तान्या ने रमन को बताया कि उस का भाई मयूर आने वाला है, इसलिए उसे मयूर को रिसीव करने बसस्टैंड जाना होगा.

तकरीबन 2 घंटे के बाद मयूर, तान्या और रमन एकसाथ बैठ कर चाय पी रहे थे. इस दौरान रमन की आंखें यह देख कर बारबार भर आ रही थीं कि अपने भाई मयूर के आने की खुशी और उस की खिदमत करने के बीच में भी तान्या उस की बेटी रिंकी का बराबर ध्यान रख रही थी.

रमन ने यह भी महसूस किया था कि तान्या और मयूर दोनों एकदूसरे की भावनाओं की काफी कद्र करते हैं और उन के मन में प्रेम और आदर का भाव भी है.

पहली पत्नी की मौत के बाद रमन ने औरत के शरीर का सुख नहीं जाना था और तान्या ने अब भी मन्नत के नाम पर रमन से शारीरिक दूरी बना रखी थी. अब यह दूरी मयूर के आ जाने से और भी ज्यादा बढ़ गई थी.

एक दिन जब रमन शाम को मयूर से मिलने उस के कमरे में गया तो रमन ने देखा कि मयूर मोबाइल फोन पर किसी लड़की से वीडियो काल कर रहा था. रमन को यह समझते देर नहीं लगी कि यह लड़की मयूर की गर्लफ्रैंड है.

रमन ने वहां से हट जाना ही उचित समझा, पर मयूर ने उसे हाथ पकड़ कर बिठा लिया.इतना ही नहीं, मयूर ने अपनी गर्लफ्रैंड से अपने जीजाजी की बात भी कराई.

वीडियो काल खत्म करने के बाद मयूर रमन से मुखातिब हुआ और पूछा, “जीजाजी, लड़की कैसी लगी?”

“बहुत सुंदर है,” रमन ने कहा.

“दरअसल, एक बात मैं दीदी से कहने में हिचक रहा हूं… मेरी गर्लफ्रैंड नमिता अभी नईनई दिल्ली में आई है और उस के पास रहने के लिए कोई अच्छी और महफूज जगह नहीं है… आप कहें तो मैं उसे यहीं ले आऊं…”

“अरे… हांहां… क्यों नहीं…” मयूर ने यह बात कुछ इस अंदाज में कही थी कि रमन उसे मना नहीं कर पाया और उस ने नमिता को घर लाने की इजाजत दे दी.

मयूर नमिता को घर ले आया था. 3 कमरों का यह मकान जहां कुछ दिनों पहले तक एक खामोशी छाई रहती थी वहां आज कितनी चहलपहल थी, यह देख कर रमन बहुत खुश था और यही खुशी उसे अपनी बेटी रिंकी के चेहरे पर भी दिखाई देती थी, जब वह नमिता के साथ खेलती थी.

नमिता, रिंकी और तान्या एक कमरे में सोते थे, जबकि मयूर और रमन दूसरे कमरे में.

घर के कामों में तो नमिता का जवाब नहीं था. वह तान्या से भी कुशल थी. चाहे रमन को शेविंग किट देनी हो या फिर गाड़ी की चाबी, हर समय नमिता ही तैयार रहती. रमन ने तान्या से कहा भी कि तुम से पहले मेरी आवाज तो नमिता सुन ही लेती है, इस पर तान्या सिर्फ मुसकरा कर रह गई.

रमन और नमिता के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं, ऐसा ही कुछ अहसास होने लगा था तान्या को.

“क्या बात है… आजकल नमिता तुम्हारे आसपास ही घूमती रहती है… कहीं कुछ दाल में काला तो नहीं है?” तान्या ने शरारती लहजे में पूछा.

“हां भई… क्यों नहीं… नमिता जैसी खूबसूरत जैसी लड़की से कौन नहीं इश्क करना चाहेगा,” बदले में रमन ने भी चुटकी ली और दोनों हंसने लगे.

एक दिन रमन औफिस में काम कर रहा था कि तान्या का फोन आया, ‘रिंकी की तबीयत अचानक खराब हो गई है, जल्दी से घर आ जाओ.’

रमन सारा कामकाज छोड़ कर जल्दी से घर पहुंचा तो उस ने देखा कि रिंकी तो आराम से नमिता के साथ बैठी खेल रही थी.

“पर मुझे तो तान्या ने फोन किया था कि रिंकी की तबीयत खराब है…” रमन ने नमिता से कहा.

“जी… और इसीलिए हम लोग रिंकी को ले कर डाक्टर को दिखा भी ले आए… एक इंजैक्शन लगा है… और तब से रिंकी को आराम भी हो गया है. दीदी और मयूर पास वाले मैडिकल स्टोर से दवा लाने गए हैं,” नमिता ने रमन को बताया, “आप थकेथके से लगते हैं… बैठिए, मैं आप के लिए चाय बना कर लाती हूं,” यह कह कर नमिता चाय बनाने चली गई और रमन अपनी बेटी को खेलता देख कर खुश होता हुआ सोफे पर पसर गया.

नमिता चाय ले आई थी. चाय पीते ही रमन को नींद सी आने लगी और वह सोफे पर हो ढेर हो गया. वह कितनी देर सोया होगा, उसे कुछ होश नहीं था, पर जब उस की आंख खुली तो उस के शरीर के सभी कपड़े गायब थे और नमिता भी तकरीबन बिना कपड़ों के बैठी हुई रो रही थी. दूसरी तरफ मयूर बैठा हुआ था.

“यह सब क्या है नमिता?” पूछता हुआ परेशान था रमन.

“मेरी इज्जत लूटने के बाद यह सवाल करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती…” नमिता की आंखों में शोले उबल रहे थे.

“क्या मतलब है तुम्हारा?” रमन चीखा.

“मतलब साफ है जीजाजी, आप ने नमिता को अकेला पा कर उस की इज्जत लूट ली है और यह रहा इस का सुबूत,” यह कह कर मयूर ने अपना मोबाइल फोन रमन की आंखों के सामने घुमाया तो उसे देख कर रमन की आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

मोबाइल फोन की तसवीरो में रमन नंगी हालत में नमिता पर छाया हुआ नजर आ रहा था. कुछ इसी तरह की और तसवीरें भी थीं, जिन से साफ हो रहा था कि नमिता का रेप रमन ने किया है.

“अब हम क्या करेंगे… किस को मुंह दिखाएंगे… मैं दीदी और रिंकी को बुला कर लाता हूं और ये तसवीरें सोशल मीडिया पर डाल देता हूं, ताकि आप की सचाई सब को पता चल सके,” गुस्से में भरा मयूर बाहर की ओर लपका, तो रमन ने मयूर को पकड़ लिया, “नहींनहीं, बाहर किसी को यह सब मत बताओ…”

पर मयूर तो गुस्से से उबाल रहा था. वह नमिता को इंसाफ दिलाने की बात करने लगा. रमन को अपनी बदनामी का डर सताने लगा था.

रमन का मन तो एक पिता का था, पर दिमाग एक बिजनैसमैन का था, इसलिए उस ने जल्दी ही मयूर से विनती की कि वह यह बात तान्या और रिंकी से न कहे और न ही तसवीरें सोशल मीडिया पर डाले.

मयूर तो इसी ताक में था. उस ने कहा कि नमिता को इस घटना से बहुत सदमा लगा है. उस का इलाज कराने के नाम पर उस ने फौरन ही 30 लाख रुपए की मांग कर दी.

“पर ये तो बहुत ज्यादा हैं?” रमन बोला.

“आप की इज्जत से ज्यादा तो नहीं…” मयूर ने कहा.

“पर वादा करो कि तसवीरें तुम तान्या को नहीं दिखाओगे…” रमन ने कहा.

“आप के सामने ही डिलीट कर देंगे और हम यहां से चले भी जाएंगे, पर पैसा मिलने के बाद,” मयूर बोला.

रमन तुरंत ही पैसों का इंतजाम करने में जुट गया और मयूर के खाते में पैसे ट्रांसफर करते ही उस से तसवीरों को डिलीट करने को कहा. मयूर ने भी उन तसवीरों को उसी के सामने डिलीट कर दिया.

हालांकि रमन के काफी पैसे इस डील में चले गए थे, फिर भी उसे चैन की सांस मिली कि कम से कम उस की बीवी और बेटी को इस कांड की भनक नहीं लगी थी.

मयूर और नमिता रमन के घर से जा चुके थे और घर की रौनक फिर से लौट आई थी. तान्या अब भी रिंकी का ध्यान रख रही थी, यह देख कर रमन को सुकून मिला था.

खाना खा कर रमन जल्दी ही सो गया था, पर रात में प्यास लगने के चलते अचानक उस की आंख खुली. रसोईघर में जाते समय उस के कानों में आवाज पड़ी. यह तान्या के हंसने की आवाज थी.

तान्या फोन पर बोल रही थी, “तुम चिंता मत करो नमिता, अभी तो सिर्फ तुम ने ही 30 लाख झटके हैं इस रमन नाम के बेवकूफ आदमी से, अभी देखो मैं भी ड्रामा फैला कर इसे और ठगती हूं. और फिर तेरे बदन की गरमी भी तो मुझे बहुत दिन से नहीं मिली है… जब तुझ से मिलूंगी तो सारी कसर निकाल लूंगी…”

ये बातें सुन कर रमन सन्न रह गया था. उसे समझते देर नहीं लगी कि वह भयंकर ठगी का शिकार हो गया है.

पर रमन के पास इन सब बातों के लिए कोई सुबूत नहीं था और अगर वह तान्या से कुछ कहता तो मामला बिगड़ सकता था, इसलिए वह मन ही मन उस से निबटने का प्लान बनाने लगा.

अगले दिन जब तान्या बाथरूम में नहाने के लिए घुसी, उसी समय रमन ने तान्या का लैपटौप खोला और उस की छानबीन करने लगा. लैपटौप को खंगालना आसान नहीं था, पर फिर भी रमन को काफी जानकारी मिल गई, जिस से यह पता चल गया कि तान्या, नमिता और मयूर का एक गैंग है, जो विधुर, बड़ी उम्र के पैसे वालों और कुंआरे लड़कों को मैट्रीमोनियल साइट पर खोज कर उन से मेलजोल बढ़ाते हैं और फिर मयूर, नमिता और तान्या ठीक उसी तरह से लोगों को भी ठगते हैं, जिस तरह से उन्होंने रमन को ठगा था.

लैपटौप पर नमिता और तान्या के कुछ ऐसे वीडियो थे, जिन से यह पता चलता था कि वे दोनों समलैंगिक हैं.

“तो इसीलिए तान्या को मेरे साथ सैक्स करने से परहेज था,” कहते हुए रमन का माथा ठनक गया था.

रमन ने इन सारी चीजों की जानकारी पुलिस को दे दी, जिस पर पुलिस ने अपनी तफतीश भी शुरू कर दी थी.

फिर अचानक एक दिन जैसे ज्वालामुखी फटने का नाटक शुरू कर दिया तान्या ने… उस ने मोबाइल फोन पर रमन और नमिता की वही तसवीरें रमन को दिखाईं और बोली, “आप जैसे मर्द, जो दूसरी लड़कियों को देख कर लार गिराते हैं, को मैं अच्छी तरह जानती हूं… रेप कर दिया आप ने इस बेचारी का, तभी तो मयूर और नमिता रातोंरात मुझ से बिना मिले ही चले गए.”

“क्या होगा अगर रिंकी को यह सब पता चल जाए तो? मुझे आज ही तुम से तलाक चाहिए,” तान्या की आवाज ऊंची होती जा रही थी.

“रिंकी को कुछ मत बताना, नहीं तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगी… मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा,” रमन ने गिड़गिड़ाने की ऐक्टिंग की.

“ठीक है. मैं अपने वकील से तुम्हारी बात कराती हूं. वह तुम्हें तलाक का सारा खर्चा बता देगा,” यह कह कर तान्या ने अपने वकील का नंबर डायल किया.

वकील ने रमन को समझाया कि अपनी बीवी को तलाक देने में उस का बहुत पैसा खर्च हो जाएगा, क्योंकि सारे सुबूत रमन के खिलाफ हैं और फिर गुजारा भत्ता भी देना होगा, इसलिए बेहतर है कि वह कोर्ट के बाहर ही तान्या से समझौता कर ले.

वकील की आवाज सुन कर रमन यह जान गया था कि फोन पर कोई वकील नहीं, बल्कि अपनी आवाज को बदल कर मयूर ही बोल रहा था.

रमन ने तान्या से कोर्ट के बाहर समझौता करने की बात कही तो तान्या ने पूरे 5 लाख रुपए ले कर मामला रफादफा करने की बात कर दी.

“ठीक है. तुम मुझे आजाद कर दो, मैं तुम्हें 5 लाख रुपए दे दूंगा… पर रिंकी को कुछ मत बताना,” रमन ने कहा.

रमन कमरे में आ कर सोने का नाटक करने लगा, पर नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. वह किसी भी तरह से इस गैंग का परदाफाश करना चाहता था, पर इस शातिर गैंग से कैसे पार पाना है, इसी के तानेबाने में रमन रातभर डूबा रहा.

अगली सुबह रमन ने तान्या को अपने साथ बाहर चलने को कहा और सीधा आर्य समाज मंदिर ले आया, जहां पर नमिता एक लड़के के साथ शादी रचाने जा रही थी. रमन ने तान्या का हाथ मजबूती से पकड़ा हुआ था, ताकि वह वहां से भाग न सके.

“अरे दोस्त, इस दुलहन से तुम किसी मैट्रोमोनियल साइट पर मिले होगे?” रमन ने दूल्हे से सीधा सवाल किया.

“पर आप कौन हैं और ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?” उस लड़के ने पूछा.

“मैं कौन हूं, यह खास बात नहीं है, बल्कि इस समय तुम्हारा यह जानना जरूरी है कि तुम इस समय एक ठग दुलहन के गैंग के शिकंजे में फंसने वाले हो…” कहते हुए रमन ने आपबीती सुनानी शुरू कर दी, “ये लड़कियां, जो असल में लैस्बियन हैं, इस मयूर नाम के लड़के के साथ मिल कर मैट्रीमोनियल साइट पर मौजूद मर्दों से शादी कर के उन्हें अपना शिकार बनाती हैं, पति पर रेप करने का आरोप लगाती हैं, उसे बेहोश कर के उस का फर्जी वीडियो बना कर ब्लैकमेल करती हैं…” रमन बोले जा रहा था, जबकि अपनी पोल खुलते देख कर मयूर, तान्या और नमिता ने वहां से भागने की कोशिश की.

रमन द्वारा बुलाए जाने के चलते वहां पहले से ही मौजूद पुलिस ने उन तीनों को गिरफ्तार कर लिया और कड़ाई से पूछताछ में उन्होंने अपना गुनाह भी कुबूल कर लिया.

इस घटना से रमन को इतना तगड़ा झटका लगा कि उस ने फिर से शादी न करने की कसम खाई और अपनी बेटी रिंकी का खुद ही ध्यान रखने का फैसला किया.

रमन ने अपने साथ हुई ठगी को सोशल मीडिया और लोकल अखबारों में भी छपवाया, ताकि लोग ठगी और ब्लैकमेलिंग के इस तरह के फर्जी प्रेमजाल से बच सकें.

Romantic Story: बेनाम रिश्ता – क्या किशन के दिल में अमृता के लिए प्यार था?

Romantic Story: अपने विवाह के बाद किसी रिश्तेदार के विवाह समारोह में मेरा जाना हुआ. वहां जा कर मैं ने देखा कि तमाम रिश्तेदारों के साथसाथ मेरी चचेरी भाभी भी आई हुई थीं. उन से मेरा 40 वर्षों बाद मिलना हुआ था. रात को भोजन के बाद मैं भाभी के पास बैठी उन से बातें कर रही थी.

उन्होंने बताया कि चाचा की मृत्यु के तुरंत बाद ही वे ससुराल छोड़ कर अपने इकलौते बेटे व बहू के साथ अपने मायके लखनऊ जा कर बस गईर् थीं.

मैं बहुत ध्यान से उन की बातें सुन रही थी और साथ ही साथ विस्तार से जानने की जिज्ञासा भी प्रकट कर रही थी.

उन्होंने आगे बताया कि उन का भाई किशन भी लखनऊ में अपने पैतृक मकान में परिवार सहित रह कर पुश्तैनी व्यवसाय संभाल रहा था.

इतना सुनने के बाद मेरे लिए आगे कुछ और जानने की जिज्ञासा का कोई औचित्य नहीं था, क्योंकि वे मेरे और किशन के रिश्ते से अनभिज्ञ नहीं थीं. मेरी आंखों के सामने एक धुंधला सा चेहरा तैर गया, जो वक्त के बहाव में धूमिल होतेहोते मिट सा गया था. मैं नहीं चाहती थी कि मेरे मन में जो चल रहा है, उस को मेरे चेहरे के भाव से भाभी पढ़ लें, इसलिए मैं आंखें बंद कर के सोने का उपक्रम करने लगी और उन से विदा ले कर अपने कमरे में चली आई. दिनभर की भागदौड़ से थकी होने के कारण तुरंत ही मैं सो गई.

तमाम मेहमानों के साथ भाभी ने भी विदा ली. जातेजाते वे अपना मोबाइल नंबर देना और मेरा लेना नहीं भूलीं. इस मुलाकात ने हमारी आत्मीयता को पुनर्जीवित कर दिया था. मैं दिल्ली

लौट आई और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई.

मुझे आए हुए 20 दिन बीते कि एक दिन मेरा मन भाभी से बात करने को हुआ, लेकिन यह सोच कर टाल दिया कि कहीं किशन भी आसपास न बैठा हो. मैं बुझी हुई आग को दोबारा सुलगाना नहीं चाहती थी. लेकिन फिर भी परोक्षरूप से उस से संपर्क करने की इच्छा का ही तो परिणाम था कि मैं उन से बात करना चाह रही थी.

अभी 3 दिन ही बीते कि अचानक अपने मोबाइल में एक मैसेज और उस को भेजने वाले का नाम पढ़ कर मैं बुरी तरह चौक गई. जो मैं नहीं चाहती थी, वही हुआ. भाभी के भाई किशन का मैसेज था, ‘‘कैसी हो अमृता,’’ मैसेज पढ़ते हुए मैं ने अपने चारों और ऐसे देखा, जैसे मैं कोई चोरी कर रही हूं.

मेरे मन में अजीब सी हलचल होने लगी. पलक झपकते ही मैं समझ गई कि किशन ने भाभी से ही मेरा मोबाइल नंबर लिया होगा. मेरे मन में भाभी से मिलने के बाद उस का खयाल आना और उस का मैसेज आना, टैलीपैथी ही तो थी, सच ही कहा गया है किसी से मिलने के पीछे भी कोई न कोई कारण होता है. तो क्या भाभी से मिलने का कारण भी मेरा किशन से दोबारा संपर्क होना था, मैं सोच रही थी.

मेरा मन अशांत हो चला था. मैं अपने मस्तिष्क को 40 वर्ष पहले अतीत में घटित घटना की यादों में धकेलने के लिए मजबूर हो गई थी, जो मेरे मानस पटल से समय के बहाव में धुलपुंछ गए थे और जिन का मेरे जीवन में अब कोई अस्तित्व ही नहीं था. अतीत के पन्ने एकएक कर के मेरी आंखों के सामने खुलने लगे.

मेरी भाभी अपनी मां और भाई के साथ मथुरा में हमारे घर आई थीं. तब मेरी उम्र 21-22 वर्ष की रही होगी. भाभी के आग्रह पर जहांजहां वे घूमने गए, मैं भी उन के साथ गई. साथसाथ घूमते हुए भाभी के भाई की गहरी निगाहों की कब मैं शिकार हो गई, मुझे पता ही नहीं चला. उस की मंदमंद मुसकान और बोलती हुई बड़ीबड़ी भूरी आंखों ने मुझे मूक प्रेमनिमंत्रण देने में जरा भी संकोच नहीं किया. जिस को स्वीकार करने से मैं अपनेआप को रोक नहीं पाई.

वह बहुत कम बोलता था, लेकिन उस की आंखों की भाषा से कुछ भी अनकहा नहीं रहता था. किसी ने ठीक ही कहा है खामोशियों की भी जबां होती है. परिवार वालों से हट कर जब भी मौका मिलता था, वह मेरा हाथ पकड़ लेता था और मैं ने भी कभी हाथ छुड़ाने का प्रयास नहीं किया था. हम दोनों मंत्रमुग्ध से एकदूसरे का साथ पाने के लिए आतुर रहते थे. और वह होली का दिन, कैसे भूल सकती हूं… वह सब. यंत्रचालित हम एकदूसरे के पीछे भागते रहते थे.

20 दिनों के साथ के बाद अंत में बिछुड़ने का दिन आ गया. भाभी मुझ से खिंचीखिंची ही रहीं. इस से मुझे आभास हो गया था कि उन से कुछ भी छिपा नहीं है, मौका पा कर किशन ने मेरे हाथ में एक छोटी सी पर्ची थमा दी, जिस में उस का पता लिखा था. कुछ भी कहनेसुनने का हम दोनों को कभी मौका नहीं मिला. आज के विपरीत वह जमाना ही ऐसा था, जब अपने हावभाव से ही प्रेम की अभिव्यक्ति होती थी, उसे शब्दों का जामा पहनाने में इतना विलंब हो जाता था कि समय के बहाव में परिस्थितियां ही बदल जाती थीं.

मुझे याद है, उस के जाने के बाद अगले दिन अपनी सहेली से लिपट कर मैं कितना रोई थी. किशन से लगभग 3 महीने तक पत्रव्यवहार हुआ. फिर अचानक उस का पत्र आना बंद हो गया. मैं ने पत्र लिख कर कारण पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया.

समय बीतता गया और किशन के साथ बिताए गए दिनों की यादें समय की परतों के नीचे दबती चली गईं. और आज अचानक इतने वर्षों बाद उस का यह अप्रत्याशित मैसेज. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं?

अपने पति की मृत्यु के बाद से जीवन अकेलेपन और खालीपन के एहसास के नीचे दब कर दम तोड़ रहा था और एक बोझ सा बन गया था, लेकिन जीना तो था न. बच्चे बहुत व्यस्त रहते थे, मैं हमेशा उन के सामने मुसकराहट का मुखौटा ओढ़े रहती थी, लेकिन रात में अकेले, साथी की कमी को बहुत शिद्दत से महसूस करती थी और कई बार तो रातभर नींद नहीं आती थी, यह सोच कर कि  पहाड़ सा जीवन कैसे काटूंगी.

वर्तमान परिस्थितियां देखते हुए मेरा मन किशन से बात करने के लिए व्याकुल हो गया. कुछ देर के आत्ममंथन के बाद हमारे जमाने के विपरीत जब पति के अतिरिक्त किसी भी पुरुष से आत्मीयता का संबंध रखना पाप समझा जाता था, इस जमाने की बदली हुई सोच, नई टैक्नोलौजी द्वारा उपलब्ध संपर्क साधन के कारण और पहले प्यार की अनुभूति की पुनरावृत्ति की मिठास को पाने के लोभ ने आग में घी डालने का कार्य किया और मेरा मन, मन की सीमारेखा को तोड़ने के लिए मजबूर हो गया.

मैं ने अपने मन को यह कह कर समझाया, ‘देखिए आगेआगे होता है क्या.’ और मैं ने जवाब दिया, ‘‘ठीक हूं, तुम बताओ?’’ वह जैसे मेरे जवाब का इंतजार ही कर रहा था. प्रत्युत्तर में उस ने औपचारिकतापूर्ण मेरे परिवार के बारे में विस्तार से पूछा और अपने परिवार के बारे में बताया कि उस के परिवार में उस की पत्नी और 2 बेटियां हैं, दोनों बेटियों का विवाह हो चुका है.

वर्षों बाद उस की आवाज सुन कर मैं बहुत रोमांचित हुई, ऐसा लगा कि जैसे हमारे अतीत के मूकप्रेम को वाणी मिल गई. वार्त्तालाप में साथसाथ बिताए गए वे दिन, जो धरातल में कही समा गए थे, पुनर्जीवित हो गए. बहुत सारी घटनाएं किशन ने याद दिलाईं, जो मैं भूल चुकी थी.

मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें तो सब याद है.’’

वह बोला, ‘‘मैं भूला ही कब था?’’

‘‘तो फिर तुम ने पत्र लिखना क्यों बंद कर दिया?’’

क्या करता दीदी ने सबकुछ पिताजी को बता दिया. और उन के आदेश पर मुझे ऐसा करना पड़ा. वह जमाना ही ऐसा था, जब बड़ों का वर्चस्व ही सर्वोपरि होता था.’’

‘‘काश, उस समय मोबाइल होता.’’ मेरी इस आवाज का मर्म उसे अंदर तक आहत कर गया.

‘‘चलो, अब तो मोबाइल है. अब तो बात कर सकते हैं,’’ उस ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा.

उस से बात कर के मुझे अपने पर नाज हो आया कि आज इतने सालों बाद भी मैं किसी की यादों में बसी हूं. विवाह एक सामाजिक बंधन है, जो शरीर को तो कैद कर सकता है, लेकिन मन तो आजाद पंछी की तरह अरमानों के गगन में जब चाहे उड़ सकता है. बहुत बार विवाह के समय हवन की अग्नि भी प्यार की तपिश को अक्षुण्ण नहीं कर पाती. उस की बातों से स्पष्ट हो गया था कि वह भी अपने परिवार के प्रति समर्पित है, लेकिन मेरी तरह उस के भी दिल का एक कोना खाली ही रहा. प्रसिद्ध शायर फराज ने ठीक ही कहा है, ‘‘कुछ जख्म सदियों के बाद भी ताजा रहते हैं फराज, वक्त के पास भी हर मर्ज की दवा नहीं होती.’’

मुझे किशन की बातें बहुत रोमांचित करती थीं. लेकिन कभीकभी मेरा मन नैतिकता और अनैतिकता के झूले में झूलता हुआ रिश्ते के स्थायित्व के बारे में सोच कर उद्विग्न हो जाता था. लेकिन धीरेधीरे उस से बातें कर के मुझे एहसास हो चला था कि हमारा प्रेम परिपक्व उम्र की अंतरंग मित्रता में परिवर्तित हो गया है. इस नए रिश्ते को बनाने में किशन का बहुत सहयोग था.

पहले उस की जो बातें मुझे रोमांचित करती थीं, अब अजीब सा सुकून देने लगी थीं. अब हम दोनों की बातचीत में किसी कारण लंबा अंतराल भी आ जाता था, तो मुझे उस के दोबारा खो जाने की बात सोच कर बेचैनी नहीं होती थी. हम दोनों ही वार्त्तालाप के दौरान एक बार मिलने की इच्छा व्यक्त करते थे.

एक दिन उस ने मुझे यह कह कर चौंका दिया कि वह एक बार मिलने के लिए बहुत बेचैन है और वह जल्दी ही किसी बहाने से मुझ से मिलने दिल्ली आएगा. यह सुन कर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ. उस से मिलने की कल्पना ही मुझे बहुत रोमांचित कर रही थी. सोच में पड़ गई. 40 वर्षों में उस में जाने कितना परिवर्तन आ गया होगा, पता नहीं, मैं उस के साथ सहज हो पाऊंगी या नहीं.

वह दिन भी आ गया जब उसे दिल्ली आना था. किशन से इतने सालों बाद मिलना, मेरे लिए, सपने का वास्तविकता में बदलने से कम नहीं था. समय और परिस्थितियां बहुत बदल गई थीं. इसलिए उस से मिलने के लिए अपनी मनोस्थिति को तैयार करने में मुझे बहुत समय लगा.

उस से मिलने पर मुझे लगा कि हम दोनों के सिर्फ बाहरी आवरण पर ही उम्र ने छाप छोड़ी थी, लेकिन अंदर के एहसास में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं आया था. इतने सालों बाद मिलने पर समझ ही नहीं आ रहा था कि बातों का सिलसिला कहां से आरंभ किया जाए, अभी भी बिना कुछ कहे ही जैसे हम ने आपस में सबकुछ कह दिया था.

किशन ने मेरे हाथों को अपने हाथों में लेते हुए बात आरंभ की, ‘‘अमृता, जरूरी नहीं कि हम जिस से प्यार करें, उस से शादी भी हो जाए और जिस से शादी हो उस से प्यार हो जाए, क्योंकि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है, इसलिए इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है.

‘‘हमारी आपस में शादी नहीं हुई, लेकिन आपस के प्यार के एहसास के रिश्ते को अच्छे दोस्त बन कर तो जिंदा रख सकते हैं. वैसे भी, उम्र के इस पड़ाव में इस से अधिक चाहिए ही क्या? मेरे जीवन में तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता.’’

मुझे ऐसा लग रहा था. जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया में विचरण कर रही हूं. हमारे पुरुषप्रधान समाज में तो ऐसी सोच वाला पुरुष मिलना असंभव नहीं, तो कठिन जरूर है, जिस ने मेरे प्यार को दीये की लौ की तरह अभी तक अपने दिल में छिपा रखा था. मैं अपने को धन्य समझ कर, भावातिरेक में उस से लिपट गई और मेरी आंखों से आंसू बह निकले.

उस ने मुझे अपने बाहुपाश में थोड़ी देर के लिए जकड़े रखा. किशन के पहली बार के इस स्पर्श ने मुझे अलौकिक सुकून दिया. मुझे लगा कि मेरे एकाकी जीवन में किसी साथी ने दस्तक दे दी थी और मुझे जीने का सबब मिल गया था.

पति और पत्नी का रिश्ता कानूनी है, लेकिन यह बेनाम रिश्ता, क्योंकि इस ने समाज की स्वीकृति की मुहर प्राप्त नहीं की है, अवैध माना जाता है. समाज को अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है, क्योंकि यह बेनाम रिश्ता इतना खूबसूरत होता है कि जीवन के लिए संजीवनी से कम नहीं होता और ताउम्र खुशी देता है.

शायर गुलजार ने इस बेनाम रिश्ते को अपनी कलम से बहुत खूबसूरत तरीके से उकेरा है, ‘हाथ से छू के इस रिश्ते को इलजाम न दो.’

उस ने मुझ से कहा कि हमारा मिलना आसान नहीं है, लेकिन फोन पर एकदूसरे के संपर्क में रह कर हमेशा एकदूसरे से जुड़े रहेंगे. किशन ने एक ऐसा एहसास दे कर, जिस के कारण हजारों मील की दूरियां भी बेमानी हो गई थीं, मुझ से विदा ली. इन दोनों के बीच की दूरी अब कोई माने नहीं रखती थी. दिल से दिल जुड़ गए थे. यह रिश्ता दिल का था. समाज की मुहर की जरूरत भी नहीं थी इसे.

Family Story: अंश – प्रताप के प्रतिबिंब के पीछे क्या कहानी थी?

Family Story: कालेज प्राचार्य डाक्टर वशिष्ठ आज राउंड पर थे. वैसे उन को समय ही नहीं मिल पाता था. कभी अध्यापकों की समस्या, कभी छात्रों की समस्या, और कुछ नहीं तो पब्लिक की कोई न कोई समस्या. आज समय मिला तब वे राउंड पर निकल पड़े.

उन के औफिस से निकलते ही सब से पहले थर्ड ईयर की कक्षा थी. बीए थर्ड ईयर की क्लास में डाक्टर प्रताप थे. हमेशा की तरह उन की क्लास शांतिपूर्वक चल रही थी. अगली क्लास मैडम सुनीता की थी. वे हंसीमजाक करती हुई अपनी क्लास में बच्चों को पढ़ाती थीं.

अब वे अगली कक्षा की ओर बढ़े. बीए प्रथम वर्ष की कक्षा थी, जिस में चिल्लपों ज्यादा रहती. इस बात को सब समझते थे कि यह स्कूल से कालेज में आए विद्यार्थियों की क्लास थी. ये विद्यार्थी अपनेआप को स्कूल के सख्त अनुशासन से आजाद मानते हैं. स्कूल में आने और जाने में कोई ढील नहीं मिलती थी लेकिन यहां कभी भी आने और जाने की आजादी थी. लेकिन आज क्लास शांत थी. केवल अध्यापक की आवाज गूंज रही थी. आवाज सुन कर प्राचार्यजी चौंके, क्योंकि आवाज डाक्टर प्रताप की थी. बस, अंतर यही था थर्ड ईयर की कक्षा में जहां राजनीति पर चर्चा चल रही थी तो प्रथम वर्ष की कक्षा में इतिहास पढ़ाया जा रहा था.

प्राचार्यजी ने सोचा- एक ही व्यक्ति 2 जगह कैसे हो सकता है? प्राचार्य वापस थर्ड ईयर की क्लास की ओर गए तो देखा कि प्रताप वहां पढ़ा रहे थे. वे वापस आए और देखा कि क्लास का ही एक विद्यार्थी अध्यापक बना हुआ था और पूरी क्लास शांतिपूर्वक पढ़ रही थी. अध्यापक बना हुआ विद्यार्थी राहुल था.

प्राचार्य थोड़ी देर तक चुपचाप देखते रहे और फिर डाक्टर प्रताप को बुला लाए. दोनों राहुल की कक्षा का निरीक्षण करते रहे और जब क्लास खत्म हुई तब ताली बजाते हुए क्लास में प्रवेश कर गए. उन को देख कर सभी खड़े हो गए और राहुल प्राचार्य के पास पहुंच कर बोला, ‘‘सौरी सर.’’

प्राचार्य और प्रताप सर ने उस के सिर पर हाथ फेरा. प्राचार्य ने कहा, ‘‘बेटा, इस में माफी मांगने वाली बात कहां से आ गई. तुम तो अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हो. हमारे लिए तो गर्व की बात है कि हमारे कालेज में इतना होनहार विद्यार्थी है. इस साल के ऐनुअल फंक्शन में तुम्हारा शो रखेंगे.’’ प्राचार्य की बात सुन कर ललिता उठी और बोली, ‘‘सर, यह सभी सरों की मिमिक्री करता है. प्रताप सर की मिमिक्री तो इतनी अच्छी करता है कि जैसे यह प्रताप सर का ही अंश हो.’’

बात छोटी सी थी लेकिन उन का इंपैक्ट इतना बड़ा होगा? यह बाद में पता चलेगा.

राहुल की ममेरी बहन है सुषमा. वह घर गई और स्कूल में घटी घटना को अपनी मम्मी कविता को बता दिया. ललिता ने जो कहा उसे भी अपनी मम्मी को बताया और बोली, ‘‘मम्मी,

अपने राहुल में प्रताप सर की छवि दिखती है.’’

सुषमा की बात सुन कर कविता बोली, ‘‘तू ने पहले तो यह नहीं बताया, जबकि तुम दोनों को 3 महीने हो गए कालेज गए हुए.’’

सुषमा ने कहा, ‘‘पहले मैं ने इस बात पर गौर नहीं किया था लेकिन क्लास में यह चर्चा होती रही है.’’

रात को कविता ने अपने पति अनिल को बताया और संभावना व्यक्त की कि कहीं डाक्टर प्रताप ही राहुल के जैविक पिता तो नहीं?’’

अनिल ने कहा, ‘‘हो सकता है. मैं प्रताप सर से बात करूंगा.’’ इस से पहले मैं इनफर्टिलिटी सैंटर से बात करूंगा, जहां राहुल का जन्म हुआ. अगर वे सच में राहुल के पापा हुए तो मेरे लिए यह सब से अच्छा दिन होगा. अपनी छोटी बहन को विधवा के रूप में देखा नहीं जाता.’’

राहुल की मम्मी सुनीता जब 11 वर्ष की रही होंगी, उस के भाई की शादी हुई थी. उस के एक साल बाद एक सड़क दुघर्टना में उन के मम्मीपापा का देहांत हो गया. अनिल और कविता ने उस का अपनी बेटी जैसा खयाल रखा. सुनीता को एहसास भी नहीं होने दिया कि उस के मम्मीपापा नहीं हैं. इस दौरान सुनीता के भाई के घर में बेटे का जन्म हुआ. बूआ व भतीजा दोनों में पटरी अच्छी बैठ गई.

सुनीता को पढ़ाया और उस की शादी की. 20-21 साल की उम्र में ही सुनीता की शादी कर दी गई. लड़का अच्छा मिल गया, इसलिए सुनीता की शादी जल्दी कर दी. राजेश एक अच्छा पति साबित हुआ. उस ने सुनीता को हर खुशी देने की कोशिश की लेकिन सब से बड़ी

खुशी वह नहीं दे पाए. सुनीता मां नहीं बन सकी.

दोनों ने लगभग 10 वर्ष बिना संतान के बिता दिए और अपनी नियति मान कर चुपचाप बैठ गए. जब शहर में इनफर्टिलिटी सैंटर खुला तो दोनों सैंटर गए. जांच में कमी राजेश में पाई गई.

चूंकि राजेश इलाज से भी पिता बनने के काबिल नहीं थे, इसलिए शुक्राणुओं की व्यवस्था शुक्राणु बैंक से हो गई. राहुल का जन्म हुआ. इस के साथसाथ कविता ने एक बच्ची को जन्म दिया. यही सुषमा है. राजेश ने राहुल और सुनीता दोनों को भरपूर प्यार दिया. जीवन अच्छा चल रहा था.

परंतु राजेश की अचानक मौत ने सुनीता को तोड़ दिया. सुनीता से ज्यादा अनिल को तोड़ दिया. जिस बहन को उन्होंने अपनी बच्ची की तरह पाला, उस को विधवा के रूप में देख कर वे अपनेआप को संभाल नहीं पा रहे थे. बहरहाल, धीरेधीरे सब सामान्य होने लगा. राहुल और सुषमा दोनों कालेज पहुंच गए.

इधर प्रताप भी परेशान थे. आज जो हुआ, उस से भी परेशान थे. उस ने उन के मन में संदेह पैदा कर दिया था. अब तक वे लोगोें की चर्चाओं को भाव नहीं दे रहे थे. लोग इसलिए भी चुप रहते क्योंकि लोगों को प्रताप सर का व्यवहार से ऐसा नहीं लगता था कि वे किसी लड़की को प्रभावित कर सकें. उन के मन में भी यही था कि कहीं वे वही तो नहीं? प्राचार्य वशिष्ठ ने प्रताप सर को बुलाया क्योंकि उन्होंने भी प्रताप सर के व्यवहार को भांप लिया था.

प्रताप सर के आने पर बात प्राचार्यजी ने ही बात शुरू की. ‘‘आप तभी से परेशान हैं जब से राहुल ने आप की नकल की?’’

‘‘नहीं सर, ऐसी बात नहीं. मैं कालेज में चल रही चर्चाओं से परेशान हूं और आज की घटना ने और क्लास की एक छात्रा के कमैंट ने चर्चा को और सशक्त बनाया है. मेरे सामने यह बात भी आई है कि राहुल मेरी अवैध संतान है जबकि ऐसा नहीं है. हां, राहुल मेरा बेटा हो सकता है,’’ डाक्टर प्रताप बोले.

यह सुन कर प्राचार्य चौंके और बोले, ‘‘राहुल आप का बेटा कैसे हो सकता है?’’

‘‘मेरा कोई अफेयर नहीं है. पता नहीं कैसे तब मैं ने अपने शुक्राणु दान कर दिए? मैं ने शुक्राणु बैंक को अपने शुक्राणु दान किए थे. तब मुझे यह पता नहीं कि

यह सब इस रूप में मेरे सामने आएगा.’’

‘‘तब तो आप का और राहुल का डीएनए टैस्ट करा लेते है,’’ प्राचार्य बोले.

‘‘लेकिन राहुल को इस के लिए कैसे राजी करें?’’

वह मुझ पर छोड़ दो, प्राचार्य बोले. लेकिन उन को कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि राहुल के मामा ने आ कर सारी समस्या हल कर दी.

उस घटना को एक सप्ताह से अधिक हो गया था. राहुल कालेज से वापस लौटा तब उस की मम्मी ने उसे टोका, ‘‘क्यों रे, तू अपने टीचरों की नकल करता है?’’

‘‘नकल नहीं मम्मी, मिमिक्री करता हूं. आप को किस ने बताया? जरूर यह सुषमा ही होगी. वह तो यह भी कह रही होगी कि मुझ में प्रताप सर की छवि दिखाई देती है.’’

‘‘हां,’’ सुनीता बोली, ‘‘पर बेटा, तू अपने अध्यापकों की कमियों को नहीं बल्कि उन की विशेषताओं को उजागर कर. वे तेरे गुरुजी हैं और उन का सम्मान करो.’’

राहुल कुछ बोलता, तभी उस की भाभी आ गई और राहुल से बोली, ‘‘तू जा, अपनी पढ़ाई कर. मुझे तेरी मम्मी से कुछ बातें करनी हैं. कविता अब सुनीता से बोली, ‘‘डाक्टर प्रताप डीएनए जांच के लिए राजी हो गए हैं.’’

‘‘लेकिन भाभी, मैं राजेश को नहीं भुला पाऊंगी,’’ सुनीता बोली, ‘‘और खुद उन का भी परिवार होगा?’’

‘‘नहीं. उन का कोई परिवार नहीं है,’’ कविता बोली, ‘‘प्रताप सैल्फमेड व्यक्ति हैं. वे अनाथाश्रम में पले हैं. वे कौन सी जाति के हैं, कौन से धर्म के हैं, कौन जानता है.

‘‘परिवार क्या होता है? वे नहीं जानते. उन का परिवार अनाथाश्रम के लोग ही हैं. पढ़ने के जनून ने उन को यहां तक पहुंचाया है. हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए. कुछ बनने के जनून में खुद की शादी और परिवार के बारे में नहीं सोचा. हां, इतना जरूर किया कि शुक्राणु बैंक में अपने शुक्राणु दान कर दिए. और उन्हीं का तू ने उपयोग किया और फिर राहुल का जन्म हुआ.’’

सुनीता सुन रही थी परंतु कुछ बोल नहीं रही थी. कविता आगे बोली, ‘‘तू कुछ बोल नहीं रही है. प्रताप और राहुल के डीएनए अगर मैच कर गए तो हम सब के लिए खुशी की बात होगी. वे तेरे बेटे के जैविक पिता तो हैं ही, कोई गैर नहीं. समय को भी शायद यही मंजूर होगा, तभी तो उस ने ये हालात पैदा किए हैं.’’

‘‘लेकिन भाभी, कभीकभी मैं प्रताप की और राजेश की तुलना करने लगी और उन को बुरा लगा तो?’’

‘‘तू राहुल की सोच. अपनी और प्रताप की नहीं. उसे अपने जैविक पिता को पिता कहने का मौका तो दे. हम सब चाहते हैं कि तुम सब एक सुखद जीवन जियो. और हां, राजेश होता तो भी उसे गम क्यों होता, वह जानता तो था कि राहुल उन की संतान नहीं. राजेश की आदतें तो

तू जानती ही है. उस का आशीर्वाद

भी मिलेगा.’’

सुनीता बोली, ‘‘पर भाभी, इस उम्र में शादी क्या शोभा देगी?’’

‘‘पागल, तू अभी 50 की हुई और इस उम्र में शादी तन की नहीं, मन की जरूरत होती है. इस उम्र में ही पतिपत्नी दोनों को एकदूसरे की ज्यादा जरूरत होती है. बच्चे अपने परिवार के साथ व्यस्त रहेंगे. उन को उन के परिवार के साथ जीवन जीने दे. और जहां तक राहुल की बात है, तो तेरे भाई ने उस से बातचीत कर उस की सोच की थाह ले ली है. वह तो खुश है और डीएनए जांच के लिए भी राजी है. तू प्रताप के बारे में भी सोच, उस ने कभी कोई सुख नहीं देखा. जन्म के तुरंत बाद मांबाप मर गए. वह अनाथाश्रम में आ गया. अनाथाश्रम में पलने वाला बच्चा इस मुकाम तक पहुंचा है तो उस में काबिलीयत तो होगी. उसे तू ही खुशी दे सकती है. अगर तू ने मना कर दिया तो वह कहीं टूट न जाए.’’

सुनीता राजी हो गई. इधर प्रताप और राहुल के डीएनए मैच कर गए. और साथ ही, राहुल व सुनीता बंधन में बंध गए.

Family Story: तू रुक, तेरी तो – रुचि ने बच्चों के साथ क्या किया

Family Story: ‘‘च टाक…’’

समर्थ ने आव देखा न ताव, रुचि के गालों पर  झन्नाटेदार तमाचा आज फिर रसीद कर दिया. तमाचा इतनी जोर का था कि वह बिलबिला उठी. आंखों से गंगायमुना बह निकली. वह गाल पकड़े जमीन पर जा बैठी. समर्थ रुका नहीं, ‘‘तू रुक तेरी तो बैंड बजाता हूं अभी,’’ कहते हुए खाने की थाली जमीन पर दे मारी, फिर इधरउधर से लातें ही लातें जमा कर अपना पूरा सामर्थ्य दिखा गया. 5 साल का बेटा पुन्नू डर कर मां की गोद में जा छिपा.

‘‘चल छोड़ उसे, बाहर चल,’’ समर्थ उसे घसीटे जा रहा था, ‘‘चल, नहीं तो तू भी खाएगा…’’ वह गुस्से से बावला हो रहा था.

‘‘नई…नई… जाना आप के साथ, आप गंदे हो,’’ पुनीत चीखते हुए रो रहा था.

‘‘ठीक है तो मर इस के साथ,’’ समर्थ ने  झटके से उसे छोड़ा तो वह गिरतेगिरते बचा. अपने आंसू पोंछता हुआ भाग कर वह मां के आंसू पोंछने लगा. रुचि का होंठ कोने से फट गया था, खून रिस रहा था.

‘‘मम्मा, खून… आप को तो बहुत चोट आई है. गंदे हैं पापा. आप को आज फिर मारा. मैं उन से बात भी नहीं करूंगा. आप पापा से बात क्यों करते हो, आप कभी बात मत करना,’’ वह आंसुओं के साथ उस का खून भी बाजुओं से साफ करने लगा, ‘‘मैं डब्बे से दवाई ले आता हूं,’’ कह कर वह दवा लेने भाग गया.

रुचि मासूम बच्चे की बात पर सोच रही थी, ‘कैसे बात न करूं समर्थ से. घर है, तमाम बातें करनी जरूरी हो जाती हैं, वरना चाहती मैं भी कहां हूं ऐसे जंगली से बात करना. 2 घरों से हैं, 2 विचार तो हो ही सकते हैं, वाजिब तर्क दिया जा सकता है कोई है तो, पर इस में हिंसा कहां से आ जाती है बीच में. समर्थ को बता कर ही तो सब साफ कर के खाना तैयार कर दिया था समय पर. अम्माजी को आने में देर हो रही थी. फोन भी नहीं उठा रही थीं. खाना तैयार नहीं होता, तो भी सब चिल्लाते.’

‘‘अपने को गलत साबित होते देख नहीं पाते ये मर्द. बस, यही बात है,’’ अपनी सूजी आंखों के साथ जब अपने ये विचार अंजलि को बताए तो वह हंस पड़ी.

‘‘यार देख, मन तो अपना भी यही करता है. कोई अपनी बात नहीं मानता तो उसे अच्छे से पीटने का ही दिल करता है. पर हम औरतों के शरीर में मर्दों जैसी ताकत नहीं होती, वरना हम भी न चूकतीं, जब मरजी, धुन कर रख देतीं, अपनी बात हर कोई ऊपर रखना चाहता है.’’

‘‘तू तो हर बात को हंसी में उड़ा देना चाहती है. पर बता, कोई बात सहीगलत भी तो होती है.’’

‘‘हां, होती तो जरूर है पर अपनेअपने नजरिए से.’’

‘‘फिर वही बात. ऐसे तो गोडसे और लादेन भी अपने नजरिए से सही थे. पर क्या वे वाकई में सही कहे जा सकते हैं?’’

अंजली को सम झ नहीं आ रहा था, वह रुचि का ध्यान कैसे हटाए. आएदिन मासूम सी रुचि के साथ समर्थ की मारपीट की घटनाएं उसे कहीं अंदर तक  िझ्ां झोड़ रही थीं, बेचारे नन्हे पुन्नू के दिलोदिमाग पर क्या असर होता होगा. सारी बातें सुनी उस ने, किचन से सटे पूजाघर में सुबह से बह रहे दूध, बताशे, गुड़, खीर, मिष्ठान के चढ़ावे की सुगंध आकर्षित लग रही थी. मक्खियों, चीटियों की बरात से परेशान हो कर रुचि ने लाईजोल डालडाल कर किचन के साथसाथ पूजाघर को भी अच्छी तरह चमका डाला था.

किचन के चारों कोनों में पंडित मुखानंद के बताए 5-5 बताशे रख कर दूध चढ़ाने के टोटके का आज भी पालन कर के अपने भाई के घर गई. सास को लौटने में देर हो रही थी. चींटियों, मक्खियों के बीच रात का खाना बनाना मुश्किल हो रहा था. रुचि ने तंग आ कर सफाई का कदम उठाया था, क्या गलत किया उस ने. रुचि की कोई गलती आज भी उसे नहीं लगी. और फिर, गलती हो भी तो क्या कोई जानवरों की तरह सुलूक करता है भला? रोजरोज ऐसे बेसिरपैर के टोटके, पूजा, पाखंड उन का चलता ही रहता. हैरानी तो यह कि बहुत मौडर्न बनने वाला समर्थ भी ये सब मानता है. पहले ही मना किया था रुचि से कि समर्थ कुछ ज्यादा ही जता रहा है अपने को, अच्छे से एक बार और सोच ले, फिर शादी कर. पर मानी नहीं. पापा के सिर का बो झ जल्द से जल्द उतार कर उन्हें खुश देखना चाहती थी वह तो?

‘‘तू भी न, गौ बनी हुई है, गौ के भी 2 सींगें, 4 लातें और लंबी दुम होती है, वक्त आने पर इस्तेमाल भी करती है. पर तू तो बिलकुल सुशील, संस्कारी अबला नारी बनी हुई है, बड़ेबड़े मैडल मिलेंगे तु झे क्या? इतनी ज्यादती सहती क्यों है? डिपैंडैंट है इसलिए…’’ इतनी पढ़ीलिखी है, बोला था जौब कर ले. पर नहीं, पतिपरमेश्वर नहीं मानते. अरे, मानेंगे कैसे भला, फुलटाइम की दासी जो छिन जाएगी,’’ उस ने चिढ़ते हुए उस की ही बात कही.

अंजलि का घर रुचि से कुछ ही दूर था. बचपन से कालेज तक साथ पढ़ी अंजलि अपनी शादी के 2 महीने बाद ही पति के हादसे में हुई मौत के बाद वापस आ कर उसी स्कूल में पढ़ाने लगी थी. पड़ोस के ब्लौक में ही रुचि की शादी हुई थी तो अकसर अंजलि लौटते समय रुचि से मिलने आ जाया करती. खूबसूरत रुचि को स्मार्ट समर्थ ने अपने को खुलेदिमाग का जता, उस के पिता हरिभजन के आगे अपने को चरित्रवान बताया, महात्मा गांधी, विवेकानंद आदि पर अपना पुस्तक संग्रह दिखा कर अच्छे होने का प्रमाण देदे कर, उस से शादी तो कर ली पर शादी के बाद ही उस की 18वीं सदी की मानसिकता सामने आ गई.

खुलेदिमाग की हर तरह की सफाईपसंद रुचि जाहिलों में फंस कर रह गई. पिता के संस्कार थे, ‘बड़ों  की आज्ञा का पालन करना है सदैव, अवज्ञा कभी नहीं,’ सो, किए जा रही थी. मां तो थी नहीं. पर नेकी, ईमानदरी, सत्य पर चलने वाले पिता ने अच्छे संस्कार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पर यहां उन बातों की न इज्जत है न जरूरत. अब रुचि को कौन सम झाए, उस ने तो पिता की बातें गांठ बांध अंतस में बिठा ली हैं. बात वही है, ‘सबकुछ सीखा हम ने, न सीखी होशियारी.’ क्या करूं इस लड़की का? रोज ही मार खाए जा रही है. पर पिता से बताती भी नहीं कि वे आघात सह नहीं पाएंगे. लेदे के वही तो हैं उस के परिवार में.

पुन्नू घर पर होता तो वे रोतेरोते अपनी मासूम जबां से मम्मा के साथ घटी पूरी हिंसा का ब्योरा अंजलि मौसी को देने की कोशिश करता. ‘कैसे दादी, बूआ, चाचू सभी पापा की साइड लेते हैं. कोई मम्मा को बचाने नहीं आता. कहते हैं, और मारो और मारो.’ अंजलि सोचती, वे बचाने क्या आएंगे, सभी एक थाली के चट्टेबट्टे हैं.

जंगली गंवई हूश. छोटे से बच्चे में दिनबदिन कितना आक्रोश भरता जा रहा है, अंजलि देख रही थी. इतनी नफरत, इतना गुस्सा उस अबोध के व्यक्तित्व को बरबाद किए जा रहा है. पर करती भी क्या? रुचि तो हठ किए बैठी थी कि उस की मूक सेवा कभी तो रंग लाएगी, एक दिन प्रकृति सब ठीक करेगी.

अब तो पुन्नू भी पापा, चाचू के जैसे चीजें तोड़नेफेंकने लगा है. गुस्सा होता तो घरवालों की तरह चीखता है. खाना उठा कर जमीन पर दे मारता, तो रुचि थप्पड़ रसीद करती. तो रुचि को ही डांट पड़ने लगती. उसे तुरंत साफ करने के लिए आदेश हो जाता. घर के लोग शह भी देते उसे. कितनी बार देखासुना है उन्हें कहते हुए, ‘लड़का है, लड़की थोड़ी ही है. मर्द है वह क्यों करेगा भला. बहू, चल साफ कर जल्दी से, मुखानंद महाराज आते ही होंगे, इस की कुंडली का वार्षिक फल विचार कर के. आजा मेरे लाल, तू तो हमारे घर का वारिस है. तेरा कोई कुछ भी नहीं बिगड़ेगा. तु झे तो, मिनिस्टर बनना है. आज वे तेरे और तेरे पापा समर्थ के लिए असरदार टोटका बताने वाले हैं. नई तावीज भी लाएंगे तेरे लिए.’

उस दिन अंजलि स्कूल से लौटी तो रुचि के घर के आगे ऐंबुलैंस खड़ी देख कर माथा ठनका, किस को क्या हो गया? उस ने पांव तेजी से बढ़ाए, पास पहुंची तो देखा लोग रुचि को स्ट्रैचर पर डाले ऐंबुलैंस से निकाल कर घर में ले जा रहे हैं. रुचि बेसुध थी. खून से लथपथ सिर फट गया था, खून बह कर माथेचेहरेगरदन, कपड़ों पर जम चुका था. कुछ अभी भी सिर से बहे जा रहा था. पड़ोसियों ने बताया, ‘घर मैं काफी देर तक आएदिन की तरह चीखपुकार होती रही थी. 2 घंटे से रुचि यों ही पड़ी रही. तब जा कर ऐंबुलैंस ले आने का इन्हें होश आया. तब तक देर हो चुकी थी. रुचि ने ऐंबुलैंस में जाते ही दम तोड़ दिया.’

रुचि के पिता हरिभजन को किसी भले मानस ने खबर दे दी थी. वह ही उन्हें थाम कर रुचि के अंतिम दर्शन करवाने ले आया था. वे रुचि के खून सने सिर पर हाथ रख कर बिलख उठे. पुन्नू को लिपटा कर फूटफूट कर रो पड़े थे.

हादसे से अवाक अंजलि के रुंधे गले से शब्द ही नहीं निकल रहे थे. अंकल को क्या और कैसे ढाढ़स बंधाए. उस को देखते ही रुचि के पिता विलाप करते हुए बोल पड़े, ‘‘बेटी, इतना सब हो रहा था उस के साथ, तू ने कुछ बताया क्यों नहीं कभी. न उस ने कभी कोई भनक लगने दी. लकवे के कारण एक पैर से लाचार मु झे यह कह कर कि ‘ससुराल में यहां पूजा, पंडित, शकुन, अपशकुन बहुत मानते विचार करते हैं, घर नहीं आने देती थी मु झे. खुद ही पुन्नू को ले कर हफ्ते में एकदो बार आ जाती थी. तू तो उस की पक्की सहेली थी. तु झ से पूछता तो तू कहती बिलकुल ठीक है, आप उस की चिंता मत कीजिए. अब बता, ठीक है? चली गई मेरी रुचि. ‘वे अंजलि को, तो कभी रुचि के शव को पकड़ कर लगातार हिचकियों से रोए जा रहे थे.

उन का कं्रदन सुन अंजलि का दिल टूकटूक हुआ जा रहा था. अपनी आंखों के सैलाब को किसी तरह रोकते हुए वह बोली, ‘‘अंकल, संभालिए अपने को, आप की तबीयत पहले ही ठीक नहीं. इसी से रुचि ने कसम दे रखी थी आप से कुछ न कहूं. मैं क्या करती अंकल. यहां आप की अच्छी सीख ने उसे बांधे रखा, जिन का इन जाहिलों के यहां कोई मोल नहीं था,’’ पुन्नू अंजलि को देखते ही उस से लिपट गया.

‘‘अंजलि मौसी, इन सब ने मिल कर मेरी मम्मा को मारा. पापा ने दीवार पर मम्मा का सिर दे मारा था. वे गिर पड़ीं. मम्मा तभी से मु झ से बोली नहीं बिलकुल भी. दादी ने पापा, चाचू को भगा दिया. अब  झूठ कह रही हैं कि मम्मा सीढ़ी से गिर पड़ी,’’ वह रुचि से लिपट कर जोरजोर से रोने लगा. ‘‘उठो न मम्मा, अपने पुन्नू से बोलो न. मैं छोड़ूंगा नहीं किसी को. बड़ा हो कर बैंड बजा दूंगा इन सब की,’’ वह समर्थ से सीखे हुए शब्दों को दोहराने लगा.

रोजरोज की चीखनेचिल्लाने व मारपीट की आवाजों से तंग आ कर आज किसी पड़ोसी ने 100 नंबर डायल कर दिया था. पुलिस आ गई. नन्हे पुन्नू के बयान पर तफ्तीश हुई. 2 दिन के अंदर पुलिस ने समर्थ और उस के भाई को धरदबोचा. उन्हें जेल हो गई. नन्हा पुनीत किस के पास रहता, समस्या थी. क्योंकि पुन्नू अपनी दादी, बूआ के पास रहने को बिलकुल तैयार न था.

अंजलि उसे यह कह कर अपने साथ ले गई. ‘‘अंकल, आज के दौर में सज्जनता, सिधाई, संस्कारों का मोल सम झने वाले बहुत कम हैं. दुनिया के हिसाब से अपने को तैयार करना चाहिए और सामने आई चुनौतियों को सिधाई से नहीं, चतुराई से निबटना चाहिए. सिधाई से अकसर आज की दुनिया मूर्ख बनाती है, दबाती है, अपना उल्लू सीधा करती है. जो, रुचि  झेलती रही. कितना सम झाया था उसे. अंकल, पुन्नू चाहे कहीं भी रहे मैं उस को दूसरा समर्थ कभी नहीं बनने दूंगी. आप निश्चित रहें अंकल. शादी के 2 महीने बाद ही दुर्घटना में पति प्रशांत की मौत के बाद निरुद्देश्य बंजर से मेरे जीवन को पुनीत के रूप में एक नया लक्ष्य मिल गया है. अब आप भी मु झे अपनी रुचि ही समझिए अंकल. मैं इसे ले कर आप से मिलने उसी के जैसे आती रहूंगी.’’

रुचि के पिता हरिभजन के कांपते बूढ़े हाथ अंजलि के सिर पर जा रुके थे. उन से कुछ बोलते न बना, केवल आंसू आंखों से बहे चले जा रहे थे. अंजलि भीगे मन से उन्हें पोंछने लगी. पुन्नू ने दोनों हाथों से नाना और अंजलि मौसी को कस कर पकड़ लिया और आंखें मीचे वह गालों पर ढुलकते आंसुओं में अपनी मम्मा का एहसास ढूंढ़ रहा था.

‘‘मम्मा…’’ उस की हिचकियों के साथ निकलता बारबार वह एक शब्द सभी के हृदय को बींध रहा था.

Celebrity Interview: पंकज त्रिपाठी के साथ फिल्म बनाने का मन – प्रमोद शास्त्री

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे फिल्म डायरैक्टर हैं, जिन के साथ फिल्में करना हर भोजपुरी सुपरस्टार का सपना होता है. ऐसे ही कुछ चुनिंदा डायरैक्टरों में से एक नाम है प्रमोद शास्त्री का. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के रहने वाले है, प्रमोद शास्त्री भोजपुरी सिनेमा के ऐसे डायरैक्टर हैं, जो मुश्किल से मुश्किल कहानियों को भी बेहद आसानी से परदे पर उतार देते हैं. उन्होंने बतौर डायरैक्टर ‘रब्बा इश्क न होवे’, ‘छलिया’, ‘प्यार तो होना ही था’, ‘आन बान शान’, ‘दत्तक पुत्र’, ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’, ‘भैया हमारे राम होवे भौजी हमरी सीता’, ‘विधवा बनी सुहागन’ जैसी कई ब्लौकबस्टर फिल्में भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को दी हैं.

लखनऊ में हुए ‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स 2025’ शो में शरीक हुए प्रमोद शास्त्री से भोजपुरी सिनेमा को ले कर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

दूसरी फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों थ्रिलर और आपराधिक कहानियों का परदे पर बोलबाला है, जबकि भोजपुरी सिनेमा ‘सासबहू’ में अटका हुआ है. ऐसा क्यों?

थ्रिलर और आपराधिक कहानियों में दर्शकों को रोमांच आता है, लेकिन ऐसी फिल्मों को परदे पर उतारने के लिए भारीभरकम बजट की जरूरत होती है, अच्छे सिनेमाघरों की जरूरत होती है. अभी भोजपुरी सिनेमा के पास ये दोनों चीजें नहीं रह गई हैं.

एक डायरैक्टर के तौर पर मेरे ऊपर जितनी जिम्मेदारी फिल्म की कहानी को परदे पर जीवंत करने की होती है, उस से कहीं ज्यादा इस बात की चिंता रहती है कि किसी तरह से प्रोड्यूसर घाटे में न जाने पाए.

जिस दिन भोजपुरी में अच्छे बजट और सिनेमाघरों की उपलब्धता होगी, तो यकीनन भोजपुरी फिल्में भी फैमिली ड्रामा और सासबहू वाली कहानियों से आगे बढ़ कर 30 करोड़ भोजपुरिया दर्शकों का मनोरंजन करने को तैयार मिलेंगी.

दूसरी फिल्म इंडस्ट्री में मोटी कमाई और पौपुलैरिटी की खातिर विवादों से भरे सब्जैक्ट पर फिल्में बनाने का चलन भी बढ़ा है. आप की नजर में यह चलन कितना सही है?

मोटी कमाई और पौपुलैरिटी की खातिर देश में जिस तरीके से विवादित सब्जैक्ट पर फिल्में बनाने का चलन बढ़ रहा है, वह देश की अखंडता और संप्रभुता के लिए घातक है. मैं ऐसी कोई फिल्म नहीं बनाना चाहूंगा, जो देशहित में न हो.

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में जिस तरह से नई कहानियों का टोटा पड़ा है, आप को क्या लगता है कि भोजपुरी फिल्में ऐसी कहानियों के बलबूते फिर से सिनेमाघरों में कामयाब हो पाएंगी?

पिछले डेढ़ दशक से सिनेमाघरों में फिल्में चल रही थीं और करोड़ों की कमाई भी हो रही थी, लेकिन कोरोना महामारी के बाद भोजपुरी सिनेमा सिमट सा गया है. दर्शकों का सिनेमाघरों में जाना भी कम हो गया है. लिहाजा, फिल्में सीधे टैलीविजन पर रिलीज हो रही हैं. लेकिन दौर कभी एकजैसा नहीं रहता. समय बदलेगा, फिर से बड़े बजट की फिल्में बनेंगी और सिनेमाघरों में रिलीज होंगी.

क्या आप की कोई ऐसी तमन्ना है, जिसे आप बतौर डायरैक्टर परदे पर फिल्माना चाहते हैं?

मेरी तमन्ना है कि मैं भोजपुरी भाषा में एक ऐसी फिल्म बनाऊं, जिस की कहानी में खुफियागीरी हो, सस्पैंस हो, रिसर्च और एनालिसिस के साथ जासूसी का तड़का भी हो.

बौलीवुड के किसी कलाकार को अगर अपने डायरैक्शन में बतौर हीरो लेना हो, तो आप की पहली पसंद क्या होगी?

मुझे पंकज त्रिपाठी की ऐक्टिंग स्किल सब से अच्छी लगती है. अगर बौलीवुड की किसी फिल्म में खुद ऐक्टर का चुनाव करने के लिए बोला जाएगा, तो मेरी पहली पसंद पंकज त्रिपाठी होंगे.

आप हिंदी फिल्मों के डायरैक्शन में भी हाथ आजमा रहे हैं. क्या भविष्य में कोई हिंदी फिल्म करने वाले हैं?

मैं ने हाल ही में हिंदी की एक बड़ी फिल्म डायरैक्ट की है, जो साल 2025 में रिलीज होने को तैयार है. इस फिल्म का नाम ‘मुंतजिर’ है. इस में हर्ष बाबू, राजेश शर्मा, जाकिर हुसैन, हेमंत पांडे, राजा गुरु जैसे बौलीवुड के तमाम कलाकार नजर आएंगे.

आप ने टैलीविजन सीरियल के डायरैक्शन में भी हाथ आजमाया है. यह सफर कैसा रहा?

जी, मैं ने ‘डीडी किसान’ चैनल के लिए एक टैलीविजन सीरियल बनाया था, निर्देशन और लेखन भी किया था, जो बेहद कामयाब रहा. इस की टीआरपी भी बहुत अच्छी रही. ‘किस के रोके रुका है सवेरा’ नाम से बना यह सीरियल 130 ऐपिसोड तक चला था.

Social Issue: अतुल सुभाष की खुदकुशी के माने

Social Issue: कुछ मामले तो इतनी तेजी से वायरल होते हैं कि बिजली की रफ्तार से देशभर में छा जाते हैं और उन पर चर्चाएं होने लगती हैं. ‘निर्भया रेपकांड’ कुछ ऐसा ही मामला था, जिस ने हर भारतीय के दिमाग को मथ कर रख दिया था.

रोहित वेमुला और मुंबई के एक मैडिकल कालेज की छात्रा की खुदकुशी करने के मामले भी वायरल हुए थे, जिन पर खूब फजीहत हुई थी. किसानों की आएदिन की जाने वाली खुदकुशी की वारदातें हमें दहला देती हैं.

मजदूरों द्वारा भी अपनी बेरोजगारी और गरीबी के चलते खुदकुशी करने के मामले खूब उजागर होते हैं. कोरोना काल में तो खुदकुशी करने का जैसे ज्वार ही आ गया था.

लेकिन अभी पिछले दिनों अतुल सुभाष की खुदकुशी का जो बेहद निजी मामला था, सोशल मीडिया पर खूब वायरल होता रहा. इस की वजह यही थी कि ऐसे मामले भले ही निजी हों, पर इन के पीछे जोरजुल्म की वजहें अब देखी जाने लगी हैं, जिस में हमारा कानून और व्यवस्था भी शामिल हैं.

शुरू में तो इस के पक्षविपक्ष में आवाजें उठीं, फिर अचानक ही मामले ने यूटर्न ले लिया, जब महिला संगठनों ने भी अतुल सुभाष के खुदकुशी मामले में उस के प्रति हमदर्दी से भरी आवाज उठाई.

दरअसल, इस तरह के पारिवारिक मामलों में सिर्फ मर्द ही नहीं, बल्कि औरतें भी सताई गई होती हैं. उन्हें भी पारिवारिक, माली और सामाजिक परेशानियां चाहेअनचाहे झेलनी ही होती हैं, इसलिए यह मामला औरतों के सताने के दायरे से बाहर आ जाता है खासकर महानगरों में इस केस के दूरगामी नतीजे अब नौजवानों के बीच से आने लगे हैं.

अब तक तो यही माना जाता था कि ज्यादातर पारिवारिक मामलों में लड़कियां और औरतें ही शोषण की शिकार होती हैं, मगर इस मामले ने यह उजागर किया कि मर्द भी इस मामले में शोषण के शिकार हैं.

इस तरह के मामले अब तेजी से उजागर होते जा रहे हैं, जिन में मर्दों का कोई बड़ा कुसूर नहीं होता. मगर जब वे इस चक्रव्यूह से हो कर गुजरते हैं, तो उन को दिन में तारे नजर आने लगते हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें उन फर्जी मामलों में फंसाया गया है, जिस के बारे में वे जानते ही नहीं.

तलाक की एक वजह पैसे की कमी को माना जाता है. लेकिन यहां अतुल सुभाष एक बेहतरीन नौकरी में अच्छी तनख्वाह पर थे. उन की पत्नी निकिता सिंघानिया भी अच्छी नौकरी में थीं. फिर ऐसी कौन सी वजह रही, जिन की वजह से बात तलाक तक पहुंच गई?

अतुल सुभाष ने यह आरोप लगाया है कि उन की पत्नी ने उन पर दबाव डाला था कि वे उस के भाई के बैंगलुरु के बिजनैस के लिए 50 लाख रुपए की रकम दें, जिसे उन्होंने इनकार कर दिया था. तभी से रिश्तों में दरार पड़ने लगी थी. उस के बाद उन की पत्नी निकिता 4 साल पहले एक साल के बच्चे के साथ उन्हें छोड़ कर अपने मायके जौनपुर चली गई थीं. फिर वहां की लोकल कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी दे दी गई थी.

इस मामले ने तूल तब पकड़ा, जब अतुल सुभाष ने 24 पन्नों का सुसाइड नोट लिख कर और 90 मिनट का डिटेल्ड वीडियो बना कर कई हफ्तों की तैयारी के बाद खुदकुशी कर ली. दरअसल, वे इस बात पर हैरान थे कि पिछले 2 सालों में उन्हें 120 बार जौनपुर कोर्ट से मुकदमे की तारीख में आने को कहा गया.

हालांकि, वे कुल 41 बार हाजिर हुए थे. वर्तमान की नौकरियों, वह भी प्राइवेट नौकरी में छुट्टी की कैसी किल्लत रहती है, किसी से छिपी नहीं है. ऐसे में 2 सालों में 41 बार बैंगलुरु से जौनपुर आनाजाना कितनी परेशानी व तनाव से भरा और खर्चीला होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है. बाकी 79 बार न आने के लिए उन्हें कोर्ट से कितनी नसीहत और जिल्लत झेलनी पड़ी होगी, इस का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. उन्होंने वीडियो कौंफ्रैंस के जरीए पेश होने की अर्जी लगाई थी, जो अब तक पैंडिंग थी.

अतुल सुभाष अपनी खुदकुशी वाली 24 पन्नों की चिट्ठी में कोर्ट की एक बहस का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि कोर्ट में उन्होंने जज साहिबा से कहा कि नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के डाटा के मुताबिक, ‘फर्जी दहेज के मुकदमों की वजह से हर साल इतने आदमी खुदकुशी कर लेते हैं,’ तो उन की पत्नी निकिता ने कहा कि ‘तुम भी क्यों नहीं कर लेते.’

यहां देखा जाए, तो अतुल सुभाष ने अपनी खुदकुशी करने के आरोप कोर्ट पर भी लगाए हैं, जिसे कोर्ट ने खुद संज्ञान में लिया है.

पटना हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील रबींद्र प्रसाद के मुताबिक, ‘हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत विवाह समझता नहीं, संस्कार है, जिसे आजीवन चलना है. इसलिए कोर्ट अंत तक यही प्रयास करता है कि तलाक के मामले को समझौते में बदल दिया जाए. इस के लिए वह सालभर इंतजार करता है.’

साल 1986 में एक फिल्म आई थी, ‘प्यार झुकता नहीं’. ऐसे ही एक तलाक के मुकदमे में कोर्ट ने एक जोड़े को सलाह दी थी कि वे दोनों एकसाथ इस फिल्म को देखें. अगर फिर भी वे दोनों तलाक के लिए जिद पर अड़े रहे, तो तलाक दे दिया जाएगा.

इस फिल्म का उस जोड़े पर अच्छा असर पड़ा था और उन्होंने अपने तलाक का केस वापस ले लिया था. मगर अब वर्तमान आधुनिक जीवन की जद्दोजेहद के बीच ऐसे कितने रिश्ते हैं, जो निभ ही नहीं पाते. ऐसे में तलाक के मामलों में ढील देनी ही चाहिए.

वकील रबींद्र प्रसाद अपने चैंबर में रखी फाइलों के एक बड़े अंबार को दिखाते हुए कहते हैं, ‘अतुल ने कोई बढि़या वकील नहीं किया, जिस से उसे परेशानी उठानी पड़ी. आमतौर पर लोअर कोर्ट में चल रहे मुकदमों को हाईकोर्ट के निर्देशानुसार वादी के नजदीकी कोर्ट में ट्रांसफर करने का प्रावधान है. अतुल के मामले में यह अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है कि वह इस अंतर्राज्यीय मुकदमे को प्रतिवादी के नजदीकी कोर्ट में ट्रांसफर करे, जो उस ने नहीं किया.

‘नियमों में यह भी प्रावधान है कि कोर्ट गुजारा भत्ता के रूप में तनख्वाह के 25 फीसदी भुगतान का निर्देश करे. यह उस आधार पर भी है कि पहले पत्नी, जिस तौरतरीके से पति के साथ जीवनयापन करती थी, वह बनी रहे. बच्चे की पढ़ाई का खर्च उस में अलग से शामिल है. इस तरह यह गुजारा भत्ता कितना हो, यह हमेशा विवाद का सबब बना रहता है.’

अतुल अपनी चिट्ठी में आगे लिखते हैं, ‘अपने ही शत्रुओं को खुद से हर महीने पैसे देना यह जानते हुए भी कि वह पैसा मेरे ही खिलाफ वे कानूनी लड़ाई को फ्यूल करने में यूज करेंगे… मुझ से अब और नहीं हो सकता…’

और इस तरह अतुल अपनी खुदकुशी की तैयारी करते हैं. इस के पहले अपनी चिट्ठी की प्रति अनेक नेताओं, रसूखदारों को भी मेल करते हैं, ताकि सनद रहे. लेकिन उन की खुदकुशी के साथ ही अनेक सवाल समाज के सामने मंडराने लगे हैं. इस के कानूनी मुद्दों और कोर्ट पर भी सवाल है खासकर यह आरोप कि आईपीसी की धारा 498(ए) का लगातार गलत इस्तेमाल हो रहा है, जो अतुल पर लगाई गई थी.

पिछले दिनों झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत ने घरेलू हिंसा से संबंधित एक मामले में सुनवाई करते हुए आईपीसी की धारा 498(ए) के गलत इस्तेमाल पर अहम टिप्पणी की थी कि औरतें परिवार वालों से मामूली विवाद पर गुस्से में आ कर ऐसे मामले दाखिल कर रही हैं.

यहां आईपीसी की धारा 498(ए) के प्रावधानों को देखना चाहिए. इस के मुताबिक, अगर किसी महिला का पति या उस के पति का कोई रिश्तेदार उस महिला के साथ क्रूरता (मारपीट, परेशान करना) करता है या मानसिक रूप से या फिर किसी दूसरी तरह से परेशान करता है, तो उस शख्स पर इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाती है.

इस धारा का मकसद होता है किसी ऐसी औरत की हिफाजत करना, जिस को उस के पति और उस के रिश्तेदारों द्वारा किसी भी तरह से सताया जाता है. शुरुआत में यह कानून भले ही अच्छा रहा हो, पर इस के गलत होने पर इस पर सवाल उठने लगे और अब इसे बदलने की मांग होने लगी है, क्योंकि मामले की तह पर जाते ही इस की विश्वसनीयता शक के दायरे में खिंची चली आती है.

फिर भी खुदकुशी करना गलत है, बुजदिली तो है ही. पहले तो यह दंडनीय अपराध था, मगर जब से यह अपराध की श्रेणी से बाहर आया है, खुदकुशी करने के मामले कुछ ज्यादा ही उजागर होने लगे हैं. अपने पीछे कितने ही सवालों के साथ उन लोगों को भी बेसहारा छोड़ जाना कहां तक सही है, जिन में खुदकुशी करने वाले की औलाद से ले कर मातापिता, भाईबहन तक शामिल हैं?

Editorial: वक्फ कानून पर राजनीति – असली मुद्दों से ध्यान हटाने की चाल?

Editorial: वक्फ कानून बनवा कर भारतीय जनता पार्टी एक अच्छा काम कर रही है. लोगों को लगातार लड़वा कर तमाशा दिखवा रही है. जब नौकरियां न हों, बिजली न हो, सड़कें न हों, अस्पताल में डाक्टर व दवाएं न हों, स्कूलों में टीचर न हों, हवा में सुगंध न हो, पीने को पानी न हो तो सब से अच्छा है कि किन्हीं 2 गुटों में लड़ाई करा दो ताकि लोग या तो लड़ कर या फिर तमाशा देख कर अपने दुखों को भूल जाएं.

वक्फ बिल का मकसद यही है कि हिंदूमुसलिम झगड़ा चालू रहे, हिंदू मंदिरों में जाते रहें. मुसलिम मसजिदों में जाते रहें और बाहर आ कर रोजीरोटी की चिंता न कर के एकदूसरे की बोटी नोंचने लगें.

वक्फ कानून मुसलमानों पर लागू होता है तो इस के सुधार की मांग मुसलमानों की ओर से आनी चाहिए न कि हिंदू धर्म की ठेकेदारी कर रही भारतीय जनता पार्टी की तरफ से. 85 फीसदी हिंदुओं के मुकाबले 15 फीसदी मुसलमानों को हिंदू सरकार का बनाया कानून तो मानना होगा क्योंकि यह हमेशा होता आया है कि राज्य का हुक्म हर जने को मानना होता था चाहे बसेबसाए घर को उजाड़ने का हुक्म हो या अपने बच्चों को राजा की सेना में सौंप देने का.

वक्फ मुसलमानों की दान या मरने के बाद बची जमीनजायदाद का सारे समाज के लिए संभालने के लिए बने थे. यह इसलाम को घरघर तक पहुंचाने की एक तरकीब भी थी कि लोग अपनी खुद की जायदाद न बनाएं और यह कुछ इसलाम के पहरेदारों के हाथों में चली जाए. इस में जबरन जमीनजायदाद कितनी ले ली जाती थी मरजी से दी गई कितनी होती थी, इस का सही अंदाजा नहीं लग सकता पर इस में घोटाले जम कर होते रहे हैं, यह पक्का है.

हिंदू नेताओं की इस जायदाद पर नजर बहुत सालों से है क्योंकि अब वे सोचते हैं कि सरकार उन की तो जमीनजायदाद भी उन की ही होनी चाहिए. सही है जिस के हाथ में लाठी उसी की भैंस होगी. डैमोक्रेसी में
कानून ने कुछ हाथ बांधने की कोशिश की थी. भाजपा लगातार कानूनों को बदल रही है कि संसद जिस की कानून उस का.

वक्फ कानून से जो फर्क पड़ेगा, पड़ेगा पर हिंदूमुसलिम दीवार और ऊंची ही जाएगी. मुसलमानों को यह पक्का होने लगेगा कि इस देश में उन की संपत्ति पर भी नजर है और कब कौन सा कानून बन जाए जो उन के हक छीन ले, पता नहीं. भाजपा तो हिंदुओं के हक भी नहीं छोड़ रही. किसान कानून इसीलिए बनाए गए थे. यह तो किसानों की हिम्मत थी कि उन्होंने सालभर तक लड़ कर वापस करा लिए.

मुसलमानों में तो यह हिम्मत भी नहीं बची क्योंकि उन्होंने जरा सा मुंह खोला नहीं कि उन पर देशद्रोही का चार्ज लगा कर जेल में बंद कर दिया जाएगा और बरसों तक अदालतें मामला सुनेंगी भी नहीं.

वक्फ कानून सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को डराने के लिए बनाया गया है. इस से देश को कोई फायदा नहीं होगा. इस से देश की इनकम नहीं बढ़ेगी. इस से शांति नहीं होगी. हां, इस से भाजपा के वोटों की गिनती बढ़ जाएगी कि देखो जिन्होंने हम पर 1,000 साल राज किया उन की संतानों का हक हम कम कर रहे हैं, इसलिए वोट हमें ही देना.

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गरीबों के बच्चे अपने मैलेकुचैले कमरों में भी सेफ नहीं हैं. जैसेजैसे अमीरों के यहां बच्चे कम होते जा रहे हैं, गरीबों की झुग्गियों से नए पैदा बच्चे उठा कर ले जाने और बेचने का धंधा चमकना शुरू हो चुका है. बिना औलाद वाले लाखों दे कर छोटा बच्चा खरीद रहे हैं और फिर शायद नकली बर्थ सर्टिफिकेट बनवा कर अपना जायज बच्चा बना कर पाल रहे हैं.

अब चूंकि गरीबों के बच्चे भी कम ही हो रहे हैं, हर खोए या चुराए बच्चे पर खासा हल्ला मचता है और पुलिस का मामला बनता है. पहले खोए बच्चे को खोया पालतू जानवर मान कर भुला दिया जाता था. पुलिस कुछ मामलों में तो उठाने वालों को पकड़ ही लेती है.

अब यह धंधा शहरों, राज्यों के बीच चलने लगा है. धंधा करने वाले असली खरीदार की इच्छा के हिसाब से गोरा, काला, लड़का, लड़की उठाते हैं और लाखों में बेचते हैं. जहां मांग होती है, पैसा होता है वहां सप्लाई तो हो ही जाती है और हो सकता है कि यह धंधा इतना जोर पकड़ने लगे कि लोगों को गरीबी के बावजूद अपने बच्चे को सेफ रखने के बीसियों तरीके अपनाने पड़ें.

अमीर घरों में लड़कियों को पहले अपने कैरियर की पड़ी रहती है और जब तक एहसास होता है कि वे अकेले पड़ रहे हैं, बच्चे पैदा करने की नई टैक्नोलौजी आने के बावजूद, बच्चा नहीं होता. अनाथालयों में अब बच्चे कम आते हैं और वहां से बच्चा पाना मुश्किल काम होता है और फिर जीवनभर उस बच्चे पर गोद लिए होने का ठप्पा लगा रहता है.

चुराए गए बच्चे को अपना बना कर उस को पालना अब आसान है. डौक्यूमैंट्स नकली बनवाना आसान है क्योंकि इन की जरूरत सिर्फ स्कूल के एडमिशन के समय पड़ती है. कुछ लोग किसी छोटे शहरगांव में भी रजिस्टर करा कर बच्चे को अपना घोषित कर सकते हैं. कभीकभार ही डीएनए टैस्ट की जरूरत होती है और हर मामले में डीएनए टैस्ट सही साबित हो यह जरूरी नहीं. जो चालाक होंगे वे डीएनए टैस्ट भी नकली बनवा कर रख लेंगे.

इस मांग को पूरी करने के लिए अब पूरी तरह से गैंग बन चुके हैं और पूरे देश में काम कर रहे हैं. बिना पेट में रखे बच्चा मिल जाए तो कहना क्या? अमीर लोग तो कुत्तों को अपना लेते हैं और उन से अपने बच्चों की तरह बात करते हैं, वे गरीब के चुराए बच्चे को न सिर्फ अपना लेंगे उसे प्यार भी देंगे और पैसा भी देंगे.

गरीबों का बच्चा खोया था, उस का मलाल उन्हें कभी न होगा क्योंकि उन के मन में तो होगा कि उन्होंने बच्चे की पूरी कीमत दी है, उसे फिर गलत क्यों समझा जाए.

अगर चोरी से लाए गए बच्चों पर कोई समय से कानून बना तो जरूर मुश्किल होगी पर उस में भी दिक्कत होगी कि चोरी के 5-7 साल बाद अगर बच्चे को पालने वालों से अलग करने की कोशिश की गई तो यह उस की सेहत पर बुरा असर डालेगा. बच्चे को तो कभी भी समझ नहीं थी कि उस के साथ क्या हो रहा है. वह तो उसे मां मानेगा जो उस को खाना खिलाती है, उसे पिता मानेगा, जो उस के साथ खेलेगा.

गरीबों को बच्चे पैदा करने वाली मशीन मान लेना अमीरों की आदत बन सकती है जैसे उन्होंने मेड्स को बच्चों को पालने वाली मशीनें बना दी हैं. आज सैकड़ों नहीं लाखों बच्चों को असल में उन को जन्म देने वाली मांएं नहीं मेड्स पाल रही हैं. किराए की कोख यानी सरोगेट मदर्स का धंधा भी चमक रहा है. इसी तरह चुराए बच्चों का धंधा भी चमकेगा यह पक्का है.

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