लेखक- हरीश जायसवाल

"क्या बात है रघुनंदन शर्माजी, बड़े परेशान नजर आ रहे हैं?" बैंक मैनेजर ओपी मेहरा ने कैशियर से पूछा.

"सर, वह हैड औफिस से जो मेल आया है, उसे देखा आप ने?" शर्माजी अपने माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए बोले.

"नहीं, मैं दूसरे अकाउंट में बिजी था. जिस तरह से आप परेशान हैं, उसे देख कर तो लगता है कि निश्चित ही कोई गंभीर बात है," मेहराजी मुसकराते हुए बोले.

"सर, उस में लिखा है कि 20 मार्च से हमारा एन्युअल आडिट चालू होगा," शर्माजी के स्वर में कुछ घबराहट सी थी.

"तो उस में कौन सी नई बात है शर्माजी? आडिट तो हर साल ही होता है न?" मेहराजी के चेहरे पर हलकी सी मुसकान अभी भी कायम थी.

"मेहराजी, या तो आप सचमुच भूल गए हैं या फिर भूलने का नाटक कर रहे हैं. याद है आप ने और मैं ने पिछले साल इन्हीं दिनों में यहीं पर बैठ कर यह योजना बनाई थी कि आप के बेटे राज और मेरे बेटे सुनीति कुमार को बेहतर भविष्य बनाने के लिए विदेश भेज देना चाहिए.

"इसी सिलसिले में हम ने कई एजेंटों से बात भी की थी. आखिरकार पिछले साल जून में हम ने एक नामी एजेंट से बात कर सबकुछ पक्का भी कर लिया था. उस ने यह शर्त रखी थी कि अगर एक हफ्ते के भीतर दोनों बच्चों के लिए 15-15 लाख रुपए जमा करवा दें तो वह तुरंत उन के एडमिशन की कार्यवाही चालू कर देगा.

"उस ने हमें यह भी बताया था कि अगर हम तुरंत पैसा दे देते हैं तो वह वीजा समेत सारे कागजात तत्काल बनवा देगा और दोनों बच्चे अक्तूबर के महीने से भाषा प्रवीणता क्लासेस जौइन कर अगले साल से नियमित कोर्स जौइन कर पाएंगे.

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