दगाबाज दोस्त, बेवफा पत्नी: भाग 2

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लेखक- रघुनाथ सिंह लोधी

मिक्की कैसे बना दबंग

रूपिंदर सिंह उर्फ मिक्की बख्शी नागपुर शहर का काफी चर्चित व्यक्ति था. करीब 2 दशक पहले शहर में प्रौपर्टी के कारोबार में उस का सिक्का चलता था. विवादित जमीनों से कब्जा खाली कराने के लिए उस के पास अच्छेबुरे हर किस्म के लोग आतेजाते थे.

शुरुआत में मिक्की ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में कांस्टेबल की नौकरी की थी. उस की तैनाती नक्सल प्रभावित क्षेत्र गढ़चिरौली के भामरागढ़ में थी. उसी दौरान निर्माण ठेकेदारों और सरकार के लोगों की फिक्सिंग का विरोध करते हुए उस ने नौकरी छोड़ दी थी. बाद में नागपुर में उस ने बीयरिंग बेचने का व्यवसाय किया.

मिक्की दबंग स्वभाव का तो था ही, जल्द ही उस के पास दबंग युवाओं की टीम तैयार हो गई. शहर ही नहीं, शहर के आसपास भी उस का नाम चर्चाओं में आ गया. वह कारोबारियों का मददगार होने का दावा करता था, लेकिन उस की पहचान वसूलीबाज अपराधी की भी बनने लगी थी.

बाद में मिक्की ने यूथ फोर्स नाम का संगठन तैयार किया. यूथ फोर्स के माध्यम से उस ने युवाओं की टीम का विस्तार किया गया. उस के संगठन में बाउंसर युवाओं की संख्या बढ़ने लगी. यही नहीं यूथ फोर्स के नाम पर मिक्की ने युवाओं के लिए प्रशिक्षण केंद्र भी शुरू कर दिया. बाद में उस ने यूथ फोर्स नाम की सिक्युरिटी एजेंसी खोल ली.

शहर में सब से महंगी व अच्छी सिक्युरिटी एजेंसी के तौर पर यूथ फोर्स की अलग पहचान बन गई. इस एजेंसी में अब भी करीब 3000 सिक्युरिटी गार्ड हैं. 2 दशक पहले शहर में ट्रक व्यवसाय को ले कर बड़ा विवाद हुआ था. कई ट्रक कारोबारी बातबात पर पुलिस व आरटीओ से उलझ पड़ते थे.

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आरोप था कि ट्रक कारोबारियों को जानबूझ कर परेशान किया जा रहा है. उन से अंधाधुंध वसूली हो रही है. उस स्थिति में मिक्की ने उत्तर नागपुर के महेंद्रनगर में यूथ फोर्स संगठन का कार्यालय खोला. उस के कार्यालय में ट्रक कारोबारी फरियाद ले कर जाते थे. मिक्की ने अपने स्तर से कई मामले सुलझा दिए. दरअसल, पुलिस विभाग में मिक्की के कई दुश्मन थे तो कई दोस्त भी थे.

नाम चला तो पैसा भी आने लगा. मिक्की कारों के काफिले में घूमने लगा. 20-25 युवक उस की निजी सुरक्षा में रहते थे. सार्वजनिक जीवन में अपना नाम बढ़ाने का प्रयास करते हुए मिक्की ने एक साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी किया.

राजनीति के क्षेत्र में भी उस ने पैर जमाने की कोशिश की. लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के बड़े नेताओं से उस के करीबी संबंध बन गए थे. उन पर वह खुले हाथों से पैसे खर्च करता था. मिक्की ने भाजपा के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के समर्थक के तौर पर पहचान बना रखी थी. वह गडकरी के जन्मदिन पर एक भंडारे का आयोजन करता था.

दोस्त ने ही जोड़ा था रिश्ता

सन 2002 की बात है. तब तक मिक्की की पहचान सेटलमेंट कराने के एवज में बड़ी वसूली करने वाले अपराधी के तौर पर हो गई थी. एक मामले में तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एस.पी.एस. यादव ने मिक्की को गिरफ्तार करा कर सड़क पर घुमाया था. उस की आपराधिक छवि के कारण उस की शादी भी नहीं हो पा रही थी. शादी की उम्र निकलने लगी थी. उस के दोस्तों ने उस के लिए इधरउधर रिश्ते की बात छेड़ी. उस के दोस्तों में ऋषि खोसला व सुनील भाटिया प्रमुख थे.

तीनों ने शहर के हिस्लाप कालेज में साथसाथ पढ़ाई की थी. ऋषि खोसला मिक्की का दोस्त ही नहीं, बतौर कार्यकर्ता भी काम करता था. कई मामलों में वह मिक्की के लिए प्लानर की भूमिका निभाता था. हरदम साए की तरह उस के साथ लगा रहता था.

ऋषि को अभिनय का भी शौक था. उस ने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया. हिंदी फिल्म ‘आशा: द होप’ में उस ने मुख्य विलेन का किरदार निभाया था. उस फिल्म में अभिनेता शक्ति कपूर थे. शक्ति कपूर से ऋषि खोसला के पारिवारिक संबंध भी बन गए थे.

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सुनील भाटिया मिक्की व ऋषि के साथ ज्यादा नहीं रहता था, लेकिन कम समय में उस ने सट्टा कारोबार में बड़ी पहचान बना ली थी. यह वही सुनील भाटिया था जो आईपीएल मैच स्पौट फिक्सिंग के मामले में दिल्ली में पकड़ा गया था. तब सुनील के गिरफ्तार होने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के कुछ क्रिकेटर भी जांच की चपेट में आए थे.

बताते हैं कि सुनील भाटिया ने क्रिकेट सट्टा की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों की दौलत एकत्र की थी. वह आए दिन विदेश में रहता था. पिछले कुछ समय से वह स्वयं को साईंबाबा के भक्त के तौर पर स्थापित कर रहा था. उस ने नागपुर में कड़बी चौक परिसर में  साईं मंदिर भी बनवाया था. वहां हर गुरुवार को वह बड़ा भंडारा कराता था.

शिरडी साईंबाबा के दर्शन के लिए उस ने नागपुर से वातानुकूलित बस की नि:शुल्क सेवा उपलब्ध करा रखी थी. क्रिकेट और राजनीति के अलावा भाटिया के आपराधिक क्षेत्र में भी देशदुनिया के कई बड़े लोगों से सीधे संबंध थे.

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मिक्की के लिए रिश्ते की बात चल रही थी. लेकिन सामान्य संभ्रांत परिवार से कोई रिश्ता नहीं आ रहा था. अपराधी के हाथ में कोई अपनी बेटी का हाथ देने को तैयार नहीं था. ऐसे में ऋषि खोसला को न जाने क्या सूझी, एक दिन उस ने दोस्तों की पार्टी में कह दिया कि मिक्की भाई के लिए चिंता करने की जरूरत नहीं है.

कहीं बात नहीं बन रही है तो हम कब काम आएंगे. शादी के लिए सुनील भाई की बहन मधु भी तो है. सुनील भाटिया की बहन मधु ने एमबीए कर रखा था. कहा गया कि वह मिक्की ही नहीं, उस के कारोबार को भी अच्छे से संभाल लेगी. बात व प्रस्ताव पर विचार हुआ.

उस समय सुनील भाटिया हत्या के एक मामले में जेल में था. मधु मिक्की से उम्र में 10 साल छोटी थी. इस के बावजूद वह मिक्की से शादी के लिए राजी हो गई. लिहाजा बड़ी धूमधाम से दोनों की शादी हुई. कई जानीमानी हस्तियां शादी समारोह में शरीक हुई थीं. मधु का मिजाज भी दबंग किस्म का था. शादी के कुछ दिनों बाद ही उस ने मिक्की के संगठन यूथ फोर्स के कारोबार में दखल देना शुरू कर दिया. वह सुरक्षा प्रशिक्षण अकादमी की संचालक बन गई.

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मिक्की कारोबार की जिम्मेदारी से मुक्त हो कर अपनी नई दुनिया को संवारने लगा. राजनीति में भी उस का दबदबा कायम होने लगा. सन 2007 व 2012 के महानगर पालिका के चुनाव में मिक्की ने यूथ फोर्स का पैनल लड़ाया.

पैनल के उम्मीदवार तो नहीं जीते लेकिन मिक्की की पहचान उभरते नेता के तौर पर बनने लगी थी.

हत्याकांड ने बदल दी जिंदगी

इस बीच एक ऐसा कांड हुआ, जिस ने मिक्की की जिंदगी के सुनहरे रंगों को ही छीन लिया. सन 2012 की बात है. कोराड़ी रोड पर जमीन विवाद के एक मामले में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता गणेश मते का अपहरण कर लिया गया. बाद में उन की हत्या कर लाश कलमना में रेलवे लाइन पर डाल दी गई. इस हत्या का सूत्रधार मिक्की ही था. मामला 2 करोड़ की वसूली का था. तब राज्य में कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार थी. गृहमंत्री राष्ट्रवादी कांग्रेस के ही थे.

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दगाबाज दोस्त, बेवफा पत्नी: भाग 1

लेखक- रघुनाथ सिंह लोधी

दौलत व शोहरत की दौड़ में दबंगता के साथ आगे बढ़ते रहे मिक्की बख्शी को अपने अतीत पर ज्यादा रंज नहीं था. यह जरूर था कि वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिस से उसे फिर से जेल जाना पड़े. अपराध के क्षेत्र के जानेमाने चेहरे अब भी उस के नाम से खौफ खाते थे.

वह रसूखदार लोगों की महफिलों में शिरकत करने लगा था. उस ने साफसुथरी जिंदगी का नया सफर शुरू करने का संकल्प ले लिया था. अब वह पढ़ीलिखी बीवी व एकलौते बेटे को कामयाबी के शिखर पर देखना चाहता था.

उस ने बीवी के नाम न केवल घर कारोबार कर दिया था, बल्कि नई चमचमाती कार की चाबी भी सौंप दी थी. जिस बीवी के लिए उस ने इतना सब कुछ किया, वही उस के जिगरी दोस्त ऋषि खोसला के साथ मिल कर उस के सीने में छुरा घोंपेगी, उस ने कभी सोचा भी नहीं था.

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नागपुर ही नहीं मध्यभारत में कूलर कारोबार में खोसला कूलर्स एक बड़ा नाम है. जानेमाने कूलर ब्रांड के संचालक ऋषि खोसला का भी अपना अलग ठाठ रहा है. हैंडसम, स्टाइलिश पर्सनैलिटी के तौर पर वह यारदोस्तों की महफिलों की शान हुआ करता था. कई छोटीमोटी फिल्मों में भी वह दांव आजमा चुका था. इन दिनों जमीन कारोबार में मंदी का दौर सा चल रहा है, लेकिन ऋषि मंदी के दौर में भी जमीन कारोबार में अच्छा कमा रहा था. लोग उसे बातों का धनी भी कहते थे. वह अपना कारोबार बढ़ाने की कला अच्छी तरह जानता था.

47 वर्षीय ऋषि नागपुर के जिस बैरामजी टाऊन परिसर में रहता था, उसे करोड़पतियों की बस्ती भी कहा जाता है. उस बस्ती में लग्जीरियस लाइफ स्टाइल के शख्स रहते थे. ऋषि का छोटा सा परिवार था. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा व एक बेटी थे. 18 वर्षीय बेटा विदेश में रह कर पढ़ाई कर रहा था, जो छुट्टी मनाने घर आया हुआ था.

20 अगस्त, 2019 की रात करीब 9 बजे की बात है. ऋषि का भाई मनीष और बेटा शिरडी में साईं बाबा के दर्शन कर घर लौट रहे थे. ऋषि अपने कारोबार के जरूरी काम निपटा कर समय से पहले ही घर पहुंच गया था. घर पर उस ने बेटे व भाई से मुलाकात की. भूख लगी थी सो पत्नी को खाना लगाने को कहा. इसी बीच ऋषि खोसला के पास मधु का फोन आया.

मधु उस की खास महिला मित्र थी. वह उस के अजीज दोस्त विक्की बख्शी की पत्नी थी. कारोबार में भी मधु ऋषि की मदद लिया करती थी. मधु ने उस से कहा कि कड़बी चौक के नजदीक उस की गाड़ी पंक्चर हो गई है. आप तुरंत आ जाइए.

‘‘तुम वहीं रहो, मैं 5 मिनट में पहुंचता हूं.’’ कह कर ऋषि बिना खाना खाए ही घर से निकल गया. मधु का घर कड़बी चौक के पास कश्मीरी गली में था. कश्मीरी गली को नागपुर की सब से प्रमुख पंजाबियों की बस्ती भी कहा जाता है. यहां बड़े कारोबारियों के बंगले हैं. कुछ देर में ऋषि मधु के पास पहुंच गया और मधु को घर पहुंचा आया. मधु को घर छोड़ने के बाद ऋषि अपनी कार नंबर पीबी08ए एक्स0909 से घर लौटने लगा.

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ऋषि खोसला ने चुकाई भारी कीमत

रात के करीब 11 बजे होंगे. ऋषि किसी काम से कड़बी चौक पर खड़ा था, तभी वहां खड़ी उस की कार में एक आटोरिक्शा चालक ने टक्कर मार दी. ऋषि ने आटो चालक को फटकार लगाई तो आटो से उतर कर आए 3 युवक ऋषि से झगड़ा करने लगे. चौक पर वाहनों का आनाजाना चल रहा था. झगड़ा होता देख वहां लोग जमा होने लगे.

ऋषि की नजर आटोरिक्शा में बैठे एक शख्स पर गई. उसे देख कर ऋषि को यह समझने में देर नहीं लगी कि आटो में आए लोग संदिग्ध हैं और वे उस के साथ कुछ भी कर सकते हैं.

कई दिनों से उसे हमला होने का अंदेशा था. ऋषि ने चतुराई से काम लिया. वह उन लोगों से झगड़ने के बजाए कार ले कर सीधे घर की ओर चल पड़ा. वह काफी घबराया हुआ था. बैरामजी टाउन में ऋषि के घर से कुछ देरी पर गोंडवाना चौक है. ऋषि ने अचानक कार रोकी. उसे लग रहा था कि आटो वाले लोग उसे खोजते हुए उस के घर भी पहुंच सकते हैं.

वह अपने बचाव के लिए कहीं भाग जाना चाहता था. ऋषि कार से उतरा. भागने की फिराक में उस ने मोबाइल निकाल कर अपनी दोस्त मधु को जानकारी देने के लिए फोन किया. उस ने मधु को बताया कि उस के घर से लौटते समय कड़बी चौक में उस पर हमला होने वाला था.

वह इस के आगे कुछ कहता, इस से पहले ही आटो और बाइक पर आए लोगों ने ऋषि पर हमला कर दिया. फरसे के पहले ही वार में ऋषि की चीख निकल गई. मोबाइल उस के हाथ से छूट कर 10 फीट दूर जा कर गिरा.

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इस के बाद भी उन लोगों ने ऋषि पर कई वार किए. अपना काम कर के हमलावर आटोरिक्शा से फरार हो गए. एक हमलावर वहां से ऋषि की कार ले गया ताकि कोई कार से उसे इलाज के लिए अस्पताल न ले जा सके. उस ने ऋषि की कार सदर क्षेत्र के एलबी होटल के पास ले जा कर खड़ी कर दी. हथियार भी उन्होंने वहीं आसपास डाल दिए थे.

ऋषि की फोन पर मधु से बात चल रही थी लेकिन जब अचानक बातचीत बंद हो गई तो वह घबरा गई. वह उसी समय गोंडवाना चौक पहुंच गई. उस समय वहां काफी लोग जमा थे. वहां पड़ी ऋषि की लाश को देख कर वह चीख पड़ी. इसी बीच किसी ने फोन से पुलिस को सूचना दे दी थी.

सूचना पा कर सदर पुलिस थाने की पुलिस वहां पहुंच गई. पुलिस उपायुक्त विनीता साहू भी वहां पहुंच गईं. मधु ने पुलिस को बताया कि ऋषि उस का प्रेमी था और उस की हत्या उस के पति मिक्की बख्शी व भाई सुनील भाटिया ने की है.

ऋषि को मेयो अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इधर पुलिस लोगों से पूछताछ कर ही रही थी कि तभी मधु आत्महत्या के लिए निकल पड़ी.

वह फुटाला तालाब की ओर जा रही थी. पुलिस उपायुक्त विनीता साहू समझ गईं कि वह कोई आत्मघाती कदम उठाने जा रही है, इसलिए उन्होंने उसे रोक कर समझाया. विनीता ने मधु को आश्वस्त किया कि मिक्की व सुनील को जल्द ही पकड़ लिया जाएगा.

तब तक पुलिस आयुक्त डा. भूषण कुमार उपाध्याय भी वहां पहुंच गए थे. डीसीपी विनीता साहू ने उन्हें पूरी जानकारी से अवगत कराया. पुलिस कमिश्नर डा. उपाध्याय मिक्की की प्रवृत्ति से भलीभांति अवगत थे. क्योंकि वह आपराधिक प्रवृत्ति का था. उन्होंने उसी समय थाना सदर के प्रभारी को आदेश दिया कि मिक्की को इसी समय उठवा लो.

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मिक्की बख्शी राजनगर में रहता था. थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम मिक्की के घर भेज दी. घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद थाना सदर पुलिस मधु को ले कर थाने लौट आई. मधु से कुछ जरूरी पूछताछ के बाद उसे घर भेज दिया.

उधर पुलिस टीम मिक्की बख्शी के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. उसे हिरासत में ले कर पुलिस थाने ले आई. पुलिस ने मिक्की से ऋषि खोसला की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह कहता रहा कि ऋषि तो उस का दोस्त था, भला वह अपने दोस्त को क्यों मारेगा. उस की बात पर पुलिस को यकीन नहीं हो रहा था.

पुलिस जानती थी कि वह ढीठ किस्म का अपराधी है, इसलिए पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सच उगल दिया. उस ने स्वीकार किया कि ऋषि खोसला की हत्या उस ने अपने जानकार लोगों से कराई थी. उस की हत्या कराने की उस ने जो कहानी बताई, वह काफी दिलचस्प थी-

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मुसहर : व्यवस्था का दंश झेलता एक समुदाय

42 साल की कबूतरी की आंखें धंसी हुई हैं. इतनी कम उम्र की शहरी महिलाएं जहां लकदक कपङों में फिटफाट दिखती हैं, वहीं कबूतरी की बदन की हड्डियां दिख रही हैं. वह रात में अच्छी तरह देख नहीं पाती. अभी हाल ही में सरकारी अस्पताल गई थी तो हाथगोङ पकङने पर डाक्टर देखने को राजी हुए थे. डाक्टर साहब ने बताया था कि उसे मोतियाबिंद है और औपरेशन करना होगा.

कबूतरी औपरेशन का मतलब समझती है, भले ही वह पढीलिखी नहीं है. वह घबरा गई.

वह बोलने लगी,”न न… बाबू, बरबेशन नै करवैभों. मरिये जैबे हो…” ( न न… साहब, औपरेशन नहीं कराऊंगी. मर ही जाऊंगी)

वह किसी के लाख समझाने पर नहीं मानती, क्योंकि हाल ही में उस के टोला में एक महिला सोनबरसी की मौत डिलीवरी के दौरान हो गई थी. इस से वह डरी हुई थी. सोनबरसी की डिलीवरी कराने बगल के एक गांव की दाई और एक झोला छाप डाक्टर आए थे. पैसा बनाने के लिए शरीर में फुजूल का पानी चढ़ा दिया था. इस से शरीर अचानक से फूला और फिर सोनबरसी की मौत हो गई.

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कबूतरी के घर के पास ही उस के 3 बच्चे नंगधङंग खेल रहे थे. वे मिट्टी में लकङी के कोन से लकीर खिंचते  और फिर उन्हें मिटाते रहते. पति बनवारी काम पर गया था. वह दिहाङी मजदूर है. एक दिन की दिहाङी ₹300 से घर के 5-6 लोगों का पेट चलना मुश्किल होता है, वह भी तब जब काम रोजाना मिलता नहीं. जब काम नहीं मिलता कई दिनों तक तो मन को तो समझा लिया जाता है पर पेट को कैसे समझाएं, वह तो भरी दोपहरी के बाद ही अकुलाने लगता है.

ऐसे में बनवारी और उस के टोले के 4-5 लोग चूहा पकङने खेतों की ओर निकल पकङते हैं. जिस के हिस्से में जितने चूहे आते हैं उस दिन इन की मौज रहती है. पुआल और फूस से बने घर के आगे चूल्हे में चूहा पकाया जाता है और बच्चे इंतजार कर रहे होते हैं. फिर सब नमक डाल कर पके चूहे खाते हैं. अभी बरसात का समय है और इन दिनों मुसहर समाज के लोग चूहे से अधिक जिंदा घोंघा खाते हैं.

गांवों में आमतौर पर आम, पपीते, अमरूद के पेङ लगे होते हैं पर क्या मजाल कि कोई तोङ ले. खेत का मालिक इन्हें देख कर दूर से ही हङकाने लग जाते हैं. मगर खेतों से चूहे पकङने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं होता, क्योंकि चूहे खेत में लगी फसल को कुतरकुतर कर उखाङ देते हैं और फसल खराब हो जाती है.

गांव के दबंग खेतिहर आज भी इन्हें गिद्ध समझते हैं, जो ले तो कुछ नहीं पाता अलबत्ता देते जरूर हैं. शादीब्याह या अन्य अवसरों पर इन से कमरतोङ काम लिया जाता है, लोग मालपुए उङा रहे होते हैं और ये दूर से बस निहारते रहते हैं. हां, खापी कर फेंके गए कचरे से ये खाने का कुछ ढूंढ़ते हैं और वही खा कर संतोष कर जाते हैं.

इन की ‘किस्मत’ ही यही है. शायद तभी ऊंची जाति के लोग यही कहते हैं कि इन्हें उन के भगवान ने सेवादार बना कर भेजा है. ये दलित कहलाते हैं, ऊपर से सरकार ने इन्हें महादलित का दरजा दे दिया है. लोग इन्हें मुसहर कहते हैं.

*नाम पर जाति दर्ज*

हम बात कर रहे हैं मुसहर जाति का जो भारत की आजादी के दशकों बीत जाने के बाद आज भी चूहे और घोंघे मार कर खा रहे हैं.

आज भी चाहे वह मोची की दुकान हो, कारखाने हों, खेतों में काम करते मजदूर हों, 21वीं सदी के भारत का एक सच यह भी है कि इंसान चूहे खा रहा है और सामाजिक व्यवस्था ने उसे नाम दिया मुसहर.

यह जाति खेतों में, जंगलों में, पहाड़ों में आज भी चूहे ढूंढ़ती मिल जाएगी. यह नए भारत की तसवीर नहीं, दशकों से व्यवस्था का दंश झेलता वह समुदाय है, जिस ने कभी मजबूरी में इसे आहार बनाया होगा मगर आज भी सरकारी दस्तावेजों में उसी के नाम पर उस की जाति दर्ज है, मुसहर यानी जो मूस (चूहे) को खाता है.

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बिहार से ले कर झारखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और नेपाल की तराई में पाई जाने वाली यह एक ऐसी जाति है जिस का आज भी कोई अस्तित्व नहीं. बिहार में विभिन्न जगहों पर यह अलगअलग नामों से जाने जाते हैं. उत्तर बिहार में लोग इन्हें मांझी कहते हैं. मगध क्षेत्र में मांझी को भुइंया बोलते हैं.

*एक था दशरथ मांझी*

मगर हासिए पर रही इस जाति की पङताल कुछ लोगों ने तब शुरू की जब साल 2015 में दशरथ मांझी की जीवनी पर आधारित फिल्म ‘मांझी : द माउंटेन मैन’ प्रदर्शित हुई थी.

यह फिल्म बिहार के गया जनपद के एक गांव में जन्मे दशरथ मांझी की एक सच्ची कहानी पर आधारित थी.

मांझी एक गरीब परिवार का आदमी था. गरीबी में रहते हुए उस ने ईमानदारी नहीं छोङी थी और सब से रोचक बात यह कि वह अपनी बीवी से बेपनाह मुहब्बत करता था.

जब उस की बीवी पेट से हुई तो गांव से शहर जाना दूर इसलिए था कि बीच में एक पहाङ पङता था. मांझी समय पर अपनी बीवी को अस्पताल नहीं ले जा सका और रास्ते में ही उस की बीवी ने दम तोड़ दिया.

इस से दशरथ मांझी को इतना गुस्सा आया कि उस ने केवल एक हथौड़ा और छेनी ले कर 360 फुट लंबी, 30 फुट चौङी और 25 फुट ऊंचे पहाङ को काट कर सङक बना डाली.

इस काम में दशरथ को पूरे 22 साल लगे थे और इस के बाद गांव से शहर की दूरी को 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिया था.

जब लोग उसे पहाङ तोङते देखते तो उसे पागल कहते, हंसते और मजाक उङाते. पर दशरथ जीवट था. सिर्फ दशरथ ही नहीं मुसहर होते ही हैं बेहद जीवट और मेहनती.

मुसहर आमतौर पर दक्षिण बिहार और झारखंड के इलाके में अधिक पाए जाते हैं. देश की आजादी के दशकों बीत जाने के बाद यह आज भी समाज का भूमिहीन मजदूर वर्ग है. इन के पास संपत्ति के नाम कुछ नहीं होता. घर के सभी लोग मजदूरी कर के जीवनयापन करते हैं.

*आज भी हासिए पर*

आज भी मुसहरों में शिक्षा का घोर अभाव है. यों मुसहर जाति बिहार की 23 दलित जातियों में तीसरे स्थान पर है. बिहार में दलितों की कुल जनसंख्या में मुसहरों का प्रतिशत लगभग 14% है. 1871 में जनगणना के बाद पहली बार इस जाति को जनजाति का दरजा दिया गया था. अभी बिहार में इसे महादलित का दरजा दिया गया है.

इतना ही नहीं, आजादी के बाद से अब तक इस समूह का कोई संगठित राजनीतिक स्वरूप भी नहीं रहा है न ही इन का कोई एक सर्वमान्य नेता पैदा हुआ. हां, छिटपुट रूप से कुछ लोग राजनीति में थोड़ी देर के लिए जरूर चमके लेकिन अपनी पहचान नहीं बना पाए या फिर कहें कि राजनीति के खिलाड़ियों ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया.

*मुसहर और राजनीति*

अलबत्ता 1952 की लोकसभा चुनाव में ही पहला और अकेला मुसहर सांसद कांग्रेस के टिकट पर सांसद बना था, नाम था किराई मुसहर. लेकिन इस के बाद कोई मुसहर राजनीति में स्थापित नहीं हो पाया.

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हालांकि उस के बाद इस जाति से कई बड़े नेता सामने आए. सीपीआी के नेता रहे भोलाराम मांझी 1957 में बिहार के जमुई विधानसभा सीट से विधायक बने थे. इस के बाद 1971 में वे लोकसभा के सांसद भी बने.

मुसहरों के एक और बड़े नेता 70-80 के दशक में हुए मिश्री सदा. 1972 में वे राज्य सरकार में मंत्री बने थे.

लेकिन हाल के सालों में सब से अधिक चर्चा हुई जीतन राम मांझी की. वे पहली बार 1985 में बिहार सरकार में राज्यमंत्री बने थे.

जितनी धीमी गति से मुसहरों में राजनीतिक जागरूकता आई उतना ही धीमा उन का शैक्षिणिक व साममाजिक विकास भी रहा. मुसहर समाज में आज भी अंधविश्वासों का बोलबाला है. डायन बता कर मुसहर महिलाओं को प्रताड़ित करने की घटनाएं भी देखनेसुनने को मिलती रही हैं. शायद तभी आज भी मुसहरों में चूहा मारने और घोंघा खाने का प्रचलन बना हुआ है.

आबादी के लिहाज से बिहार के गया, रोहताश, अररिया, सीतामढ़ी मुसहरों की घनी आबादी वाले जिले हैं. इस के अलावा समस्तीपुर, बेगूसराय और खगड़िया के कुछ हिस्सों में भी मुसहर बहुत बड़ी संख्या में हैं.

2010 के बिहार विधानसभा में कुल 9 मुसहर विधायक थे. लेकिन सब से अधिक चर्चा में रहे जीतनराम मांझी. वे 2014 में बिहार के 23वें मुख्यमंत्री बने पर लगभग साल भर तक के लिए ही.

*सिर्फ कठपुतली बने रहे जीतनराम*

जीतनराम ने कई अवसरों पर बताया था कि नीतीश कुमार ने उन का सिर्फ इस्तेमाल किया था. जीतनराम मांझी का मुख्यमंत्री बनना उन लोगों को भी रास नहीं आ रहा होगा जो एक मुसहर को अपना मुख्यमंत्री और नेता मानने से इनकार करते रहे होंगे,

खासकर बिहार जैसे प्रदेश में जहां समाज से ले कर राजनीति तक में जातिवाद का जहर फैला हो और जहां विकास के नाम पर नहीं, जातिगत आधार पर वोट डाले जाते रहे हों.

शिक्षा में कमी की वजह से इस समुदाय में अंधविश्वास का बोलबाला है. अभी हाल ही में गया से सटे मुसहर बस्ती में बच्चों में चेचक महामारी की तरह फैल गया था पर बस्ती के लोग इलाज कराने से अधिक जादूटोने और भगती में यकीन रखते थे. पिछले साल बिहार में फैले चमकी बुखार से भी इस समुदाय के सैकङों बच्चों की जानें गई थीं.

ऐसे में उस बिहार में जहां जातिवाद चरम पर हो और यहां तक कि वोट भी विकास पर नहीं जातिगत आधार पर डाले जाते हों, मुसहरों के दिन फिरेंगे ऐसा दूरदूर तक नजर नहीं आता.

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घोर उपेक्षा के शिकार इस समुदाय पर न तो सरकार का ध्यान गया और न ही समाज के ठेकेदारों का, जो धर्म और जाति के नाम पर मुसहरों से मजदूरी तो कराता है पर उसे घर के अंदर आने की अनुमति आज भी नहीं है.

जल्द ही दुल्हन बनने जा रही हैं मिहीका बजाज, राणा दग्गूबाती के साथ शेयर की Photos

साउथ फिल्मों के जाने माने एक्टर राणा दग्गूबाती (Rana Daggubati) इन दिनों काफी चर्चा में बने हुए हैं और उनके इस चर्चा में बने रहने का कारण कुछ और नहीं बल्कि उनकी शादी ही है. पिछले कुछ दिनों से राणा दग्गूबाती (Rana Daggubati) और उनकी मंगेतर मिहीका बजाज (Miheeka Bajaj) की फोटोज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं. इन दिनों वे अपनी शादी की रस्में निभाते नजर आ रहे हैं.

 

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My happy place! 🥰🥰 @ranadaggubati

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हाल ही में मिहीका बजाज (Miheeka Bajaj) मेहंदी की रस्में पूरी करती दिखाई दीं और उनकी ये फोटोज फैंस द्वारा बहुत ही ज्यादा पसंद की जा रही हैं. मिहीका अपने इस अंदाज में इतनी सुंदर दिख रही हैं कि कोई भी उन्हें देख उनसे प्यार करने लगे. इन फोटोज में राणा दग्गूबाती (Rana Daggubati) और मिहीका बजाज (Miheeka Bajaj) दोनों साथ में बैठे मस्ती करते दिखाई दे रहे हैं जो कि फैंस का दिल जीत रही हैं.

 

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To the beginning of forever 💕 @ranadaggubati

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राणा दग्गुबाती (Rana Daggubati) और मिहीका बजाज (Miheeka Bajaj) की इन फोटोज पर फैंस के खूब सारे रिएक्शंस देखने को मिल रहे हैं. फैंस राणा और मिहीका की इन फोटोज पर जमकर प्यार बरसा रहे हैं और कमेंट्स कर उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे. शादी की रस्मों के दौरान राणा दग्गुबाती की खुशियों में शामिल होने के लिए साउथ अदाकारा सामन्था अक्कीनेनी (Samantha Akkineni) भी पहुंची और खूब मस्ती की.

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And life moves fwd in smiles 🙂 Thank you ❤️

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Ready!! 💥💥💥

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एकता कपूर ने शेयर किया सुशांत सिंह राजपूत के इस सीरियल का पहला सीन, कैप्शन में लिखी ये बात

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की आत्महत्या को करीब 2 महीने होने वाले हैं लेकिन अभी तक उनके सुसाइड करने की वजह सामने नहीं आई है. लेकिन हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के फैंस और परिवार वालों की एक मांग पूरी हो चुकी है और वो मांग ये थी कि सुशांत का केस सीबीआई (CBI) को ट्रांस्फर हो जाए और बीते दिनों ही सीबीआई (CBI) ने सुशांत का केस अपने हाथों में ले लिया है.

 

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Receive without pride, let go without attachment. #Meditations

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सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) का अचानक से हमारे बीच से जाना किसी सदमे से कम नहीं था क्योंकि उनके करीबी लोगों का ये कहना है कि वे इतना जिंदा दिल इंसान थे कि वे आत्महत्या कर ही नहीं सकते. इतने हंसमुख और इतने टेलेंटिड एक्टर का इस दुनिया से जाना सच में इंडस्ट्री और देश के लिए किसी बड़े नुकसान से नही है.

सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की आत्महत्या के बाद से आम लोगों के साथ साथ कई सेलेब्रिटीज भी उनके जाने का दुख जताते हुए अपने-अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर उनके बारे में कुछ ना कुछ शेयर करते रहते हैं. इसी कड़ी में टेलिवीजन इंडस्ट्री की पौपुलर प्रोड्यूसर एकता कपूर (Ekta Kapoor) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) पर सुशांत सिंह राजपूत का टेलिवीजन का पहला सीन शेयर किया है जो कि उनके सीरियल “जिस देश में है मेरा दिल” (Jis Desh Mein Hai Meraa Dil) का है.

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Rest In Peace sushi!!!! We will smile and make a wish when we see a shooting star and know it’s u!!!! Love u forever!!

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) ने अपने एक्टिंग करियर की शुरूआत टेलिवीजन से की थी और उनका पहला सीरियल भी “जिस देश में है मेरा दिल” (Jis Desh Mein Hai Meraa Dil) था तो इसी के चलते एकता कपूर (Ekta Kapoor) ने सुशांत का सबसे पहला सीन शेयर किया जो कि उन्होनें शूट किया था. इस वीडियो के कैप्शन में एकता कपूर ने लिखा कि,- “बहुत सारे लोग सुशांत सिंह राजपूत के पहले सीन को देखना चाह रहे थे तो ये है सुशांत का पहला सीन जो कि हमने साथ में शूट किया था. सुशांत इस शो में दूसरे नंबर के लीड एक्टर थे और तभी से हम सबको ये अंदाजा हो गया था कि सुशांत बड़ी चीज़ें करने के लिए बने हैं.”

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इसके बाद एकता कपूर (Ekta Kapoor) ने सुशांत को याद कर बहुत सारा प्यार और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए लिखा,- “Lots of love, peace and prayers for this beautiful, beautiful piece of light and shining soul.”

रिश्ता : भाग 2- कैसे बिखर गई श्रावणी

अनुभवी अम्मां ने मुझ से कुछ निजी प्रश्न पूछे फिर हंस दीं, ‘ये उलटियां बदहजमी की वजह से नहीं हैं. मुझे तो लगता है खुशखबरी है.’

सुन कर आकाश के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह मुझे डा. मेहरा के क्लिनिक पर ले गए. जांच के बाद डाक्टर ने जैसे ही मुझे गर्भवती घोषित किया, आकाश के चेहरे का रंग उड़ गया. वह इस खबर को सुन कर खुश नहीं हुए थे. तुरंत डा. मेहरा के सामने अपने मन की बात जाहिर कर दी थी, ‘डाक्टर, हमें यह बच्चा नहीं चाहिए.’

‘क्यों?’

‘परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं कि हम बच्चे के दायित्व को उठाने के लिए सक्षम नहीं हैं.’

आकाश के चेहरे पर बेचारगी के भाव देख कर मैं हैरान रह गई थी. वह सृजनकर्ता मैं धरती? बीज को पुष्पितपल्लवित होने से पहले ही उसे समूल उखाड़ कर फेंक देने को तत्पर… काश, मेरे पति ने मुझ से तो पूछा होता कि मैं क्या चाहती हूं.

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मेरे कुछ कहने से पहले ही डाक्टर मेहरा ने उन की बात को अनसुनी करते हुए जवाब दिया, ‘आकाशजी, आप के घर 2 बरस बाद उम्मीद की किरण फूटी है. अपने इस अंश को सहेज, संभाल कर रखिए. आने दीजिए उसे इस संसार में.’

भुनभुनाते हुए आकाश घर पहुंचे. जूते की नोक से दरवाजे को धक्का दिया तो वह चरमरा कर खुल गया. उस पल अम्मां और अन्नू उन के इस रूप को देख कर सहम गए थे. आकाश से पूछताछ की तो? आंखें तरेर कर बोले, ‘श्रावणी प्रेगनेंट है.’

खुशी के अतिरेक में अन्नू ने मुझे गले से लगा लिया था. अम्मां ने उठ कर बेटे का मस्तक चूम लिया था और  बधाई देते हुए बोलीं, ‘यह तो बहुत खुशी की बात है बेटा. इस खुशखबरी को सुनने के लिए कब से कान तरस रहे थे.’

आननफानन में अम्मां ने न जाने कितनी योजनाएं बना डालीं. उधर आकाश कुछ और ही सोच रहे थे. अम्मां की बात सुन कर उन्होंने अपना आखिरी अस्त्र फेंका, ‘बराबरी तो हर समय करती हो तुम औरतें लेकिन अक्ल पासंग भर नहीं है. श्रावणी तो कमअक्ल है लेकिन आप तो समझ सकती हैं. कितने खर्चे हैं, कितनी जिम्मेदारियां हैं सिर पर? अभी तो अन्नू का ब्याह भी करवाना है. मकान की मरम्मत करवानी है. अगर श्रावणी की तबीयत यों ही गिरीगिरी रही तो इस की नौकरी भी जाती रहेगी. जो थोड़ाबहुत कमाती है वह भी निकल जाएगा हाथ से.’

अम्मां ने भाग्य और तकदीर का हवाला दिया तो आकाश बोले, ‘वह बीते जमाने की बात थी. अब ऐसा नहीं होता.’

अम्मां की हिदायतों, मेरी गुजारिशों और अन्नू की सिफारिशों के बावजूद वह चोरीछिपे डाक्टरों से मशविरा कर के, मेरा गर्भपात करवाने के लिए प्रयास करते रहे. खेल भी खुद खेलते थे, पांसा भी खुद ही फेंकते थे. सही कहा है किसी ने कि मानवता का स्वरूप पुरुष है और पुरुष स्त्री को, स्त्री के लिए ही परिभाषित करता है. वह स्त्री को स्वतंत्र व्यक्ति नहीं मानता. स्त्री अपने बारे में वही सोच सकती है और बन सकती है जैसा पुरुष उस को आदेश देगा.

बिट्टू को मेरी ही कोख से जन्म लेना था, इसीलिए शायद डाक्टरों ने एकमत हो कर आकाश को मेरा गर्भपात न करवाने की सलाह दी थी. उस पल आकाश के व्यवहार ने मेरे विश्वास की निधि को खो कर मेरे अंदर अविश्वास का पहाड़ जमा कर दिया था.

अन्नू के ब्याह की तारीख नजदीक आ रही थी. हालांकि अन्नू की ससुराल पक्ष से दहेज की कोई मांग नहीं रखी गई थी, लेकिन मानसम्मान और बारातियों की आवभगत की अभिलाषा सभी को होती है. मेरा और अम्मां का रिश्ता सासबहू का नहीं मां और बेटी का था, इसीलिए हम दोनों एकदूसरे की दुखतकलीफ बिना कुछ कहे ही पहचान लेते थे.

इस समय भी अम्मां की मजबूरी मैं समझ रही थी. पैसा पास न हो तो मन छोटा होता ही है. आकाश इस पूरे मामले में जरा भी दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. सुबह मेरे साथ निकलते, शाम को मुझे घर छोड़ कर दोबारा निकल जाते. कहां जाते यह कई बार पूछने पर भी उन्होंने कभी नहीं बताया. अन्नू क्या कहती? बेचारी, नौकरी कर के जितनी रकम जमा की थी वह आकाश के अकाउंट में थी.

मैं ने पीहर से लाए जड़ाऊ कंगन, हीरों के कर्णफूल और सोने के 2 सैट अम्मां की गोद में रख दिए. कुछ साडि़यां भी ऐसी थीं जिन की तह भी नहीं खुली थी, क्योंकि आकाश को मेरा ज्यादा घूमनाफिरना, सजनासंवरना पसंद नहीं था, वे भी अम्मां को दे दीं. शौपिंग, हलवाइयों, कैटरर से बातचीत, कार्ड छपवाने और बांटने तक का पूरा काम मेरे जिम्मे था. आकाश की तटस्थता विचित्र थी. वह तो ऐसा बरताव कर रहे थे जैसे ब्याह उन की बहन का नहीं, किसी दूसरे की बहन का था.

अम्मां के आग्रह पर अब सुबहशाम पापा आ जाते थे. पापा के साथ उन की कार में बैठ कर मैं बाहर के काम निबटा लिया करती थी. मां घर और चौके की देखभाल कर लिया करती थीं. बहू के अति विनम्र स्वभाव को देख कर अम्मां आशीर्वादों की झड़ी लगा कर मुक्तकंठ से मेरी मां से सराहना करतीं, ‘बहनजी, जितना सुंदर श्रावणी का तन है, उतना ही सुंदर मन भी है. श्रावणी जैसी बहू तो सब को नसीब हो.’

अन्नू का ब्याह हो गया. मां और पापा घर लौट रहे थे. अम्मां ने एक बार फिर मेरी प्रशंसा मां से की तो मां के जाते ही आकाश के अंत:स्थल में दबा विद्रोह का लावा फूट पड़ा था :

‘वाहवाही बटोरने का बहुत शौक है न तुम्हें? अपने जेवरात क्यों दे दिए तुम ने अन्नू को?’

मैं ने आकाश के साथ उस के परिवार को भी अपनाया था. फिर इस परिवार में मां और बहन के अलावा था भी कौन? दोनों से दुराव की वजह भी क्या थी? मैं ने सफाई देते हुए कहा, ‘जेवर किसी पराए को नहीं अपनी ननद को दिए हैं. अन्नू तुम्हारी बहन है, आकाश. जेवरों का क्या, दोबारा बन जाएंगे.’

‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते, श्रावणी, मेहनत करनी पड़ती है.’

मैं अब भी उन के मन में उठते उद्गारों से अनजान थी. चेहरे पर मायूसी के भाव तिर आए थे. रुंधे गले से बोले, ‘इन लोगों ने मुझे कब अपना समझा. हमेशा गैर ही तो समझा…जैसे मैं कोई पैसा कमाने की मशीन हूं. उन दिनों 7 बजे दुकानें खुलती थीं. सुबह जा कर मामा की आढ़त की दुकान पर बैठता. वहां से सीधे दोपहर को स्कूल जाता. तब तक घर का कामकाज निबटा कर मां दुकान संभालती थीं. शाम को स्कूल से लौट कर पुन: दुकान पर बैठता, क्योंकि मामा शाम को किसी दूसरी दुकान पर लेखागीरी का काम संभालते थे. इन लोगों ने मेरा बचपन छीना है. खेल के मैदान में बच्चों को क्रिकेट खेलते देखता तो मां की गोद में सिर रख कर कई बार रोया था मैं, लेकिन मां हर समय चुप्पी ही साधे रहती थीं.’

मनुष्य कभी आत्मविश्लेषण नहीं करता और अगर करता भी है तो हमेशा दूसरे को ही दोषी समझता है. आकाश इन सब बातों का रोना मुझ से कई बार रो चुके थे. अपनी सकारात्मक सोच और आत्मबल की वजह से मैं, अलग होने में नहीं, हालात से सामंजस्य बनाने की नीति में विश्वास करती थी. हमेशा की तरह मैं ने उन्हें एक बार फिर समझाया :

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‘अम्मां की विवशता परिस्थितिजन्य थी, आकाश. असमय वैधव्य के बोझ तले दबी अम्मां को समझौतावादी दृष्टिकोण, मजबूरी से अपनाना पड़ा होगा. जिस के सिर पर छत नहीं, पांव तले जमीन नहीं थी, देवर, जेठ, ननदों…सभी ने संबंध विच्छेद कर लिया था तो भाई से क्या उम्मीद करतीं? अम्मां को सहारा दे कर, उन के बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी कीं, उन्हें आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया. ऐसे में यदि अम्मां ने बेटे से थोड़े योगदान की उम्मीद की तो गलत क्या किया?

‘आखिर मामा का अपना भी तो परिवार था और फिर अम्मां भी तो हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठी थीं. यही क्या कम बात है कि अपने सीमित साधनों और विषम परिस्थितियों के बावजूद, अम्मां ने तुम्हें और अन्नू को पढ़ालिखा कर इस योग्य बनाया कि आज तुम दोनों समाज में मानसम्मान के साथ जीवन जी रहे हो.’

सुनते ही आकाश आपे से बाहर हो गए, ‘गलती की, जो तुम से अपने मन की बात कह दी…और एक बात ध्यान से सुन लो. मुझे मां ने नहीं पढ़ाया. जो कुछ बना हूं, अपने बलबूते और मेहनत से बना हूं.’

उस दिन आकाश की बातों से उबकाई सी आने लगी थी मुझे. पानी के बहाव को देख कर  बात करने वाले आकाश में आत्मबल तो था ही नहीं, सोच भी नकारात्मक थी. इसीलिए आत्महीनता का केंचुल ओढ़, दूसरों में मीनमेख निकालना, चिड़चिड़ाना उन्हें अच्छा लगता था. खुद मित्रता करते नहीं थे, दूसरों को हंसतेबोलते देखते तो उन्हें कुढ़न होती थी.

अन्नू अकसर घर आती थी. कभी अकेले, कभी प्रमोदजी के साथ. नहीं आती तो मैं बुलवा भेजती थी. उस के आते ही चारों ओर प्रसन्नता पसर जाती थी. अम्मां का झुर्रीदार बेरौनक चेहरा खिल उठता. लेकिन बहन के आते ही भाई के चेहरे पर सलवटें और माथे पर बल उभर आते थे. जब तक वह घर रहती, आकाश यों ही तनावग्रस्त रहते थे.

अन्नू के ब्याह के कुछ समय बाद ही अम्मां ने बिस्तर पकड़ लिया था. मेरा प्रसवकाल भी निकट आता जा रहा था. अम्मां को बिस्तर से उठाना, बिठाना काफी मुश्किल लगता था. मैं ने आकाश से अम्मां के लिए एक नर्स नियुक्त करने के लिए कहा तो उबल पडे़, ‘जानती हो कितना खर्चा होगा? अगले महीने तुम्हारी डिलीवरी होगी. मेरे पास तो पैसे नहीं हैं. तुम जो चाहो, कर लो.’

घरखर्च मेरी पगार से चलता था. मैं ने कभी भी खुद को इस घर से अलग नहीं समझा, न ही कभी आकाश से हिसाब मांगा. अन्नू के ब्याह पर भी अपने प्राविडेंट फंड में से पैसा निकाला था. फिर इस संकीर्ण मानसिकता की वजह क्या थी? किसी से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं पड़ी. मां के इलाज के लिए पैसेपैसे को रोने वाले बेटे को चमचमाती हुई कार दरवाजे के बाहर पार्क करते देख कर कोई पूछ भी क्या सकता था? डा. प्रमोद ही अम्मां की देखभाल करते रहे थे.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

रिश्ता : कैसे बिखर गई श्रावणी

रिश्ता : भाग 3- कैसे बिखर गई श्रावणी

कुछ ही दिनों बाद अम्मां ने दम तोड़ दिया. मैं फूटफूट कर रो रही थी. एकमात्र संबल, जिस के कंधे पर सिर रख कर मैं अपना सुखदुख बांट सकती थी, वह भी छिन गया था. मां ढाढ़स बंधा रही थीं. पापा, अन्नू और प्रमोदजी मित्रोंपरिजनों की सहानुभूतियां बटोर रहे थे. दुनिया ने चाहे कितनी भी तरक्की कर ली हो पर जातियों में बंटा हमारा समाज आज भी 18वीं सदी में जी रहा है. ब्याहशादियों में कोई आए न आए, मृत्यु के अवसर पर जरूर पहुंचते हैं.

धीरेधीरे यहां भी लोगों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई. मांपापा, अन्नू, प्रमोद, यहीं हमारे घर पर ठहरे हुए थे. आकाश घर में रह कर भी घर पर नहीं थे. एक बार वही तटस्थता उन पर फिर हावी हो चुकी थी. जब मौका मिलता, घर से बाहर निकल जाते और जब वापस लौटते तो उन की सांसों से आती शराब की दुर्गंध, पूरे वातावरण को दूषित कर देती. प्रबंध से ले कर पूरी सामाजिकता प्रमोदजी ही निभा रहे थे और यह सब मुझे अच्छा नहीं लग रहा था. यह सोच कर कि अम्मां बेटे की मां थीं. आकाश को उन्होंने जन्म दिया था, पालपोस कर बड़ा किया था तो अम्मां के प्रति उन की जिम्मेदारी बनती है.

एक दिन पंडितों के लिए वस्त्र, खाद्यान्न, हवन के लिए नैवेद्य आदि लाते हुए प्रमोदजी को देखा तो बरसों का उबाल, हांडी में बंद दूध की तरह उबाल खाने लगा, ‘ये सब काम आप को करने चाहिए आकाश. प्रमोदजी इस घर के दामाद हैं. फिर भी कितनी शांति से दौड़भाग में लगे हुए हैं.’

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‘मैं शुरू से ही जानता था. तुम्हें ऐसे ही लोग पसंद हैं जो औरतों के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हैं और खासकर के तुम्हारी जीहुजूरी करते हैं,’ फिर मां और पापा को संबोधित कर के बोले, ‘प्रमोद जैसा लड़का ढूंढ़ दीजिए अपनी बेटी को,’ और धड़धड़ाते हुए वह कमरे से बाहर निकल गए.

आकाश का ऐसा व्यवहार मैं कई बार देख चुकी थी. बरदाश्त भी कर चुकी थी. कई बार दिल में अलग होने का खयाल भी आया था लेकिन कर्तव्य व प्रेम के दो पाटों में पिस कर वह चूरचूर हो गया. आकाश के झूठ, दंभ और पशुता को मैं इसीलिए अपनी पीठ पर लादे रही कि समाज में मेरी इमेज, एक सुखी पत्नी की बनी रहे. लेकिन आकाश ने इन बातों को कभी नहीं समझा. वहां आए रिश्तेदारों के सामने, मां की मृत्यु के मौके पर वह मुझे इस तरह जलील करेंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी मुझे.

तेरहवीं के दिन, शाम के समय मां और पापा ने मुझे साथ चलने के लिए कहा तो, सभ्य रहने की दीवार जो मैं ने आज तक खींच रखी थी, धीरे से ढह गई. पूरी तरह प्रतिक्रियाविहीन हो कर, जड़ संबंधों को कोई कब तक ढो सकता था? चुपचाप चली आई थी मां के साथ.

इसे औरत की मजबूरी कहें या मोह- जाल में फंसने की आदत. बरसों तक त्रासदी और अवहेलना के दौर से गुजरने के बाद भी, उसी चिरपरिचित चेहरे को देखने का खयाल बारबार आता था. क्रोध से पागल हुआ आकाश, नफरत भरी दृष्टि से मुझे देखता आकाश, अम्मां को खरीखोटी सुनाता आकाश, अन्नू को दुत्कारता, प्रमोदजी का अनादर करता आकाश.

मां और पापा, सुबहशाम की सैर को निकल जाते तो मुझे तिनकेतिनके जोड़ कर बनाया अपना घरौंदा याद आता, एकांत और अकेलापन जब असहनीय हो उठता तो दौड़ कर अन्नू को फोन मिला देती. अन्नू एक ही उत्तर देती कि सागर में से मोती ढूंढ़ने की कोशिश मत करो श्रावणी. आकाश भैया अपनी एक सहकर्मी मालती के साथ रह कर, मुक्ति- पर्व मना रहे हैं. हर रात शराब  के गिलास खनकते हैं और वह दिल खोल कर तुम्हें बदनाम करते हैं.

बिट्टू के जन्म के समय भी आकाश की प्रतीक्षा करती रही थी. पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर मेरी आंखों में चमक लौट आती. लेकिन आकाश नहीं आए. अन्नू प्रमोदजी के साथ आई थी. मेरी पसीने से भीगी हथेली को अपनी मजबूत हथेली के शिकंजे से, धीरेधीरे खिसकते देख बोली, ‘मृगतृष्णा में जी रही हो तुम श्रावणी. आकाश भैया नहीं आएंगे. न ही किसी प्रकार का संपर्क ही स्थापित करेंगे तुम से. जब तक तुम थीं तब तक कालिज तो जाते थे. परिवार के दायित्व चाहे न निभाए, अपनी देखभाल तो करते ही थे. आजकल तो नशे की लत लग गई है उन्हें.’

अन्नू चली गई. मां मेरी देखभाल करती रहीं. लोग मुबारक देते, साथ ही आकाश के बारे में प्रश्न करते तो मैं बुझ जाती. मां के कंधे पर सिर रख कर रोती, ‘बिट्टू के सिर से उस के पिता का साया छीन कर मैं ने बहुत बड़ा अपराध किया है, मां.’

‘जिस के पास संतुलित आचरण का अपार संग्रह न हो, जो झूठ और सच, न्यायअन्याय में अंतर न कर सके, वह समाज में रह कर भी समाज का अंग नहीं बन सकता, न ही किसी दृष्टि में सम्मानित बन सकता है,’ पापा की चिढ़, उन के शब्दों में मुखर हो उठती थी.

मां, पुराने विचारों की थीं, मुझे समझातीं, ‘बेटी, यह बात तो नहीं कि तू ने प्रयास नहीं किए, लेकिन जब इतने प्रयासों के बाद भी तुझे तेरे पति से मंजूरी नहीं मिली तो क्या करती? साए की ओट में दम घुटने लगे तो ऐसे साए को छोड़ खुली हवा में सांस लेने में ही समझदारी है.’

‘लेकिन जगहजगह उसे पिता के नाम की जरूरत पड़ेगी तब?’

‘अब वह जमाना नहीं रहा, जब जन्म देने वाली मां का नाम सिर्फ अस्पताल के रजिस्टर तक सीमित रहता था और स्कूल, नौकरी, विवाह के समय बच्चे की पहचान पिता के नाम से होती थी. आज कानूनन इन सभी जगहों पर मां का नाम ही पर्याप्त है.’

मां की मृत्यु पर भी आकाश नहीं दिखाई दिए थे. अन्नू और प्रमोदजी ही आए थे. मैं समझ गई, जिस व्यक्ति ने मुझ से संबंध विच्छेद कर लिया वह मेरी मां की मृत्यु पर क्यों आने लगा. जाते समय अन्नू ने धीरे से बतला दिया था, ‘आजकल आकाश भैया सुबह से ही बोतल खोल कर बैठ जाते हैं. मैं ने सौ बार समझाया और उन्होंने न पीने का वादा भी किया, लेकिन फिर शुरू हो जाते हैं,’ फिर एक सर्द आह  भर कर बोली, ‘लिवर खराब हो गया है पूरी तरह. प्रमोदजी काफी ध्यान रखते हैं उन का लेकिन कुछ परहेज तो भैया को भी रखना चाहिए.’

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सोच के अपने बयावान में भटकती कब मैं झांसी पहुंची पता ही नहीं चला. तंद्रा तो मेरी तब टूटी जब किसी ने मुझे स्टेशन आने की सूचना दी. लोगों के साथ टे्रन से उतर कर मैं स्टेशन से सीधे अस्पताल पहुंच गई. अन्नू पहले से ही मौजूद थी. प्रमोद डाक्टरों के साथ बातचीत में उलझे थे. मैं ने आकाश के पलंग के पास पड़े स्टूल पर ही रात काट दी. सच कहूं तो नींद आंखों से कोसों दूर थी. मेरा मन सारी रात न जाने कहांकहां भटकता रहा.

सुबह अन्नू ने चाय पी कर मुझे जबर्दस्ती घर के लिए ठेल दिया. आकाश तब भी दवाओं के नशे में सोए हुए थे.

घर आ कर मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था. पराएपन की गंध हर ओर से आ रही थी. नहाधो कर आराम करने का मन बना ही रही थी, पर अकेलापन मुझे काटने को दौड़ रहा था. घर से निकल कर अस्पताल पहुंची तो आकाश, नींद से जाग चुके थे. अन्नू के साथ बैठे चाय पी रहे थे. मुझे देख कर भी कुछ नहीं बोले. मैं ने धीरे से पूछा, ‘‘तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक है,’’ उन का जवाब ठंडे लोहे की तरह लगा. किसी के बारे में कुछ पूछताछ नहीं की. यहां तक कि बिट्टू के बारे में भी कुछ नहीं पूछा. अन्नू ही कमरे में मौन तोड़ती रही. हम दोनों के बीच पुल बनाने का प्रयास करती रही. डाक्टरों की आवाजाही जारी थी. सारे दिन लोग, आकाश से मिलने आते रहे. मुझे देख कर हर आने वाला कहता, ‘अच्छा हुआ आप आ गईं,’ पर 3 दिन में, एक बार भी मेरे पति ने यह नहीं कहा, ‘अच्छा हुआ जो तुम आ गईं. तुम्हें बहुत मिस कर रहा था मैं.’

आकाश की हालत काबू में नहीं आ रही थी. प्रमोदजी ने मुझ से धीरे से कहा, ‘‘भाभीजी, आकाश भैया की हालत अच्छी नहीं लग रही है. आप जिसे चाहें खबर कर दें.’’

मैं जब तक कुछ कहती या करती, आकाश ने दम तोड़ दिया. अन्नू फूटफूट कर रो रही थी. प्रमोदजी उसे ढाढ़स बंधा रहे थे. मेरे तो जैसे आंसू ही सूख गए थे. इस पर क्या आंसू बहाऊं? जिस आदमी ने मुझे कभी अपना नहीं समझा…मेरे बेटे को अपना समझना तो दूर उस का चेहरा तक नहीं देखा, मैं कैसे उस आदमी के लिए रोऊं? यह बात मेरी समझ से बाहर थी.

जाने कितने लोग, शोक प्रकट करने आ रहे थे. हर आदमी, इतनी कम उम्र में इन के चले जाने से दुखी था, पर मैं जैसे जड़ हो गई थी. इतने लोगों को रोते देख कर भी मैं पत्थर की हो गई थी. मेरे आंसू न जाने क्यों मौन हो गए थे? सब कह रहे थे, मुझे गहरा शौक लगा है. इन दिनों आकाश की सारी बुराइयां खत्म हो गई थीं. हर व्यक्ति को उन की अच्छाइयां याद आ रही थीं. मैं खामोश थी.

पापा का फोन मेरे मोबाइल पर कई बार आ चुका था. मैं उन्हें 1-2 दिन का काम और है बता कर फोन काट देती थी.

तेरहवीं के बाद सब ने अपनाअपना सामान बांध लिया. मेरी उत्सुक निगाहें मालती को ढूंढ़ रही थीं. अन्नू से ही पूछताछ की तो बोली, ‘‘आकाश भैया का सारा पैसा अपने नाम करवा कर वह तो कभी की चली गई झांसी छोड़ कर. कहां है, कैसी है हम नहीं जानते. भला ऐसी औरतें रिश्ता निभाती हैं?’’

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झांसी से टे्रन के चलते ही मैं ने राहत की सांस ली. ऐसा लगा, जैसे मैं किसी कैद से बाहर आ गई हूं. झांसी की सीमा पार करते ही मुझे पहली बार एहसास हुआ कि झांसी से मेरा रिश्ता सचमुच टूट गया है. अब मैं यहां क्यों आऊंगी? रिश्तों के दरकने का मुझे पहली बार एहसास हुआ. मैं फूटफूट कर रो पड़ी.

रिश्ता : भाग 1- कैसे बिखर गई श्रावणी

फोन अन्नू का था, ‘‘भाभी, आकाश भैया बहुत बीमार हैं. अस्पताल में भरती हैं. मेरा जी बहुत घबरा रहा है. हो सके तो आ जाइए.’’

पापा बाहर बैठे अखबार पढ़ रहे थे. मैं नहीं चाहती थी कि आकाश का नाम और बीमारी की खबर उन के कानों तक पहुंचे. मां के बाद अब लेदे कर पापा ही तो बचे थे. अत: मैं उन्हें जरा सा भी दुख नहीं देना चाहती थी.

मां की मौत पर वह कैसे बिलख- बिलख कर रो रहे थे, ‘‘मैं ही तेरी मां की मौत का जिम्मेदार हूं. मैं ने ही सही समय पर डाक्टर को नहीं बुलाया, इसी कारण तेरी मां मर गई.’’

मैं जानती थी कि मां दवा वक्त पर न मिलने की वजह से नहीं मरीं बल्कि वह अपनी बेटी के दुख के गम में मरी थीं.

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पापा अखबार पढ़ कर उठें उस से पहले मैं ने बाई से न केवल नाश्ता तैयार करवा लिया बल्कि अपनी झांसी जाने की योजना भी तैयार कर ली थी. पड़ोस की दमयंती चाची से, 1-2 दिन पापा और बिट््टू का खयाल रखने को कह कर मैं ने पापा को सूचना दी कि मुझे कालिज के काम से लखनऊ जाना है. सोचती हूं आज ही निकल जाऊं.

पापा ने खास पूछताछ नहीं की थी क्योंकि कालिज के काम से मेरा अकसर लखनऊ आनाजाना होता ही था. एक बैग में 4 जोड़े कपड़े डाल कर मैं सीधे बैंक गई. रुपए निकाले और झांसी जाने वाली पहली टे्रन में बैठ गई.

टे्रन अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी. उस के साथ भागते पेड़, खेत, खलिहान, नदियां आदि सब पीछे छूटते जा रहे थे. सीट पर बैठेबैठे ही मैं ने आंखें मूंद लीं. खयालों में आकाश और अन्नू के चेहरे आंखों के सामने आ कर ठहर गए थे.

कालिज का वार्षिक समारोह चल रहा था. प्रिंसिपल ने संगीत सम्मेलन का आयोजन किया था. अन्नू आकाश का परिचय मुझ से करवाते हुए बोली थी, ‘इन से मिलो. मेरे आकाश भैया हैं.’

अन्नू का वाक्य पूरा होते ही मैं ने हाथ जोड़ दिए तो नमस्कार का उत्तर देते हुए आकाश बोले, ‘तो आप हैं श्रावणी. अन्नू से आप के बारे में इतना सुन चुका हूं कि आप की पूरी जन्मपत्री मेरे पास है.’

अन्नू अकसर मुझ से चुहल करती, ‘श्रावणी, ऐसा क्या है तुझ में जो लोग देखते ही तुझ पर मोहित हो जाते हैं. भैया को देख, जब से तुझ से मिल कर गए हैं, किसी न किसी बहाने तेरा जिक्र छेड़ देते हैं.’

मैं भी पूरी तरह उन के सुदर्शन और आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित हो चुकी थी. एक दिन, कौफी हाउस में मेरे मुख से निकल गया, ‘आकाश, आप दूसरों का कितना ध्यान रखते हैं.’

विजयी मुसकान चेहरे पर बिखेर कर वह बोले, ‘जो इनसान दूसरों की ‘इज्जत’ नहीं करता वह अपनी इज्जत क्या करेगा? उसे तो इज्जत की परिभाषा भी नहीं मालूम होगी. खासतौर से जिसे औरत की इज्जत नहीं करनी आती उस से मुझे घृणा होती है.’

सुनते ही मन झंकृत हो उठा था… उस कच्ची वयस में मन आंदोलित हो उठा था. आह्लाद की सीमा तक.

आकाश और मैं रोज मिलने लगे थे. इस दोस्ती ने कब प्रेम का रूप ले लिया और हम ने विवाह करने का निर्णय ले लिया पता ही नहीं चला. जिस दिन मैं ने मां और पापा को अपना निर्णय सुनाया, पापा को अच्छा नहीं लगा था. मुझे समझाने के विचार से बोले थे, ‘श्रावणी, जिंदगी औपचारिकताओं से नहीं जी जाती है. जीने के लिए साफसुथरी स्फटिक सी शिला पैरों के नीचे होनी चाहिए, वरना आदमी फिसलन से औंधेमुंह गिरता है.’

‘पापा, आकाश ऐसा नहीं है.’

‘कितना जानती हो उसे? मात्र 1-2 माह की दोस्ती किसी व्यक्ति को समझने के लिए काफी नहीं होती.’

तब तो नहीं माना था मैं ने, लेकिन जैसेजैसे परिचय की गांठें खुलने लगीं वैसेवैसे ताज्जुब होने लगा कि मैं अपनी आंखों पर कैसा सम्मोहन का परदा डाले हुए थी.

सुहाग सेज पर ही यह सम्मोहन परदे को चीरता हुआ बिखर गया था, जब आकाश ने उद्वेग से भरे मेरे शरीर को मरोड़ते, मसलते, मेरे यौवन का आनंद उठाते हुए प्रश्न किया था, ‘वह लड़का कौन था, जिस ने तुम्हारे रूप की प्रशंसा में कोरस गाया था?’

मैं ने कई बार सफाई दी लेकिन मेरा हर शब्द आकाश के अनर्गल संभाषण में डूबता चला गया.

सुबह जब आकाश कमरे से बाहर निकले तो रिश्ते की ननदों, देवरानियों ने उन्हें घेर लिया था. मैं ने उस सुबह खुद को बाथरूम में कैद कर लिया था. रोने के लिए यही जगह सब से सुरक्षित थी, न कोई रोकने वाला न ही टोकने वाला.

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2-3 दिन रिश्तेदारों की आवभगत और ब्याह के रीतिरिवाज संपन्न करने में ही बीते. आकाश के पिता नहीं थे. मां अकसर बीमार रहती थीं. अन्नू ही प्रधान बनी हुई थी. चौके से ले कर रिश्तेदारों की हर छोटीबड़ी फरमाइश को संपूर्ण करती अन्नू के चेहरे पर न शिकन थी न ही थकान. मैं उस का हाथ बंटा रही थी. कुल मिला कर अच्छा माहौल था. दोपहर के समय, अखबार के पन्ने पलटते हुए, आकाश ने पूछा, ‘पिक्चर देखने चलोगी, श्रावणी?’

‘हांहां, क्यों नहीं. रीगल पर पारिवारिक फिल्म ‘संबंध’ चल रही है. वहां देखेंगे.’

सिनेमा हाल के बाहर भीड़ जमा थी. औरतों की छोटी लाइन देख कर मैं ने सुझाव दिया कि लेडीज लाइन में खड़े हो कर मैं टिकट ले लेती हूं.

आकाश मेरे इर्दगिर्द ही मंडराते रहे. अचानक, टिकट पकड़ाते समय, विके्रता का हाथ मेरे हाथ को छू गया. यह देखते ही आकाश भड़क उठे और ऐसा हंगामा खड़ा किया कि लोगों की भीड़ जमा हो गई. मैं ने आकाश को शांत होने के लिए कहा कि वह मात्र संयोग था लेकिन उन्होंने तो जैसे कुछ भी न सुनने की कसम खाई थी. पिक्चर हाल में भी उन का बड़बड़ाना जारी था. मैं ने पूरी पिक्चर रोते हुए ही देखी.

घर लौटे तो पिक्चर हाल में घटी घटना का पूरा विवरण अम्मां को सुना दिया. अम्मां इशारे से उन्हें रिश्तेदारों की मौजूदगी का एहसास कराते हुए विषय बदलने की कोशिश करती रहीं. लेकिन वह बारबार उसी घटना को दोहरा कर मुझे बेवकूफ सिद्ध करने पर तुले रहे.

छोटी सी बात थी. इस तरह भड़कने और भड़क कर ढिंढोरा पीटने की क्या जरूरत थी? लोगों का क्या, सभी मुझे अपमानित होते देख मजे लूट रहे थे. कुछ देर बाद शांति स्थापित हो गई, लेकिन मेरा मन उद्विग्न था. रात को, अंतरंग क्षणों में आकाश मुझे बांहों में भर कर रोने लगे, ‘मुझे माफ कर दो, श्रावणी. तुम्हें कोई देखता है या तुम किसी की प्रशंसा करती हो तो मुझे न जाने क्या हो जाता है.’

हलकीहलकी आवाज में उन का बोलना यों लग रहा था जैसे सूखी धरती पर बारिश की पहली बूंदें पड़ती हैं और ऊपरी सतह के भीगते ही माटी महकने लगती है. प्रेम एक अद्भुत उपहार है. मिले तो इसे तुरंत लपक लेना चाहिए और जिस प्रेम की जड़ें, अंतस्तल में कहीं गहरे तक पैठी हों, उन्हें उखाड़ फेंकना इतना सरल भी तो नहीं होता. मैं धीरेधीरे चुपचाप इन की बांहों में सिमटती चली गई थी.

मां अकसर बुलावा भेजतीं लेकिन मैं टाल देती थी. आकाश के स्वभाव को ले कर मन में डर समाया हुआ था, कहीं मां और पापा के सामने लड़ाईझगड़ा, डांटडपट शुरू कर दी तो? बातबेबात तू- तड़ाक पर उतर आते थे. उस दिन भी यही हुआ था. आकाश घर के बाहर स्कूटर पार्क कर रहे थे, तभी एक कार चालक उन पर कीचड़ उछालता हुआ आगे निकल गया. आकाश अपने असली रूप पर उतर आए थे.

बेटी और दामाद के सत्कार के लिए दरवाजे पर खड़ी मां और पापा ‘क्या हुआ क्या हुआ’ कहते हुए घर से बाहर निकल आए और भीड़ को तितरबितर कर दामाद को घर के भीतर ले गए थे.

अलमारी में से सिल्क का कुरता- पाजामा निकालती मां के पीछे खड़े पापा के धीमे स्वर में कहे गए शब्द मेरी चेतना झकझोरते चले गए थे कि कितने गलत इनसान से ब्याह किया है श्रावणी ने? मुझे तो लगता है आकाश मानसिक रोगी है.

अपने पति का किसी दूसरे व्यक्ति के मुख से, चाहे वह मातापिता ही क्यों न हों, अपमान होते देख कोई भी पत्नी बरदाश्त नहीं कर सकती. एक हफ्ते रहने का कार्यक्रम एक दिन में ही समाप्त कर मैं घर लौट आई थी. पहुंचते ही अम्मां ने बताया कि पिं्रसिपल का फोन आया था. पूछ रहे थे, श्रावणी कब ज्वाइन कर रही है?

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दिनरात की नोंकझोंक से विक्षुब्ध हो उठा था मन. कागज और रजिस्टर, तैयार कर के मैं ने आकाश को ड्यूटी पर जाने की सूचना दी तो उन के चेहरे पर आड़ीतिरछी रेखाएं उभर आईं. बोले, ‘श्रावणी, तुम घर से निकलोगी तो अच्छा नहीं लगेगा मुझे. लोग न जाने कैसीकैसी निगाहों से घूरेंगे तुम्हें.’

मैं ने आकाश को याद दिलाया कि 1 माह का अवकाश समाप्त हो चुका है. इस से ज्यादा मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी.

‘ठीक है, दफ्तर जाते समय मैं तुम्हें छोड़ता हुआ निकल जाऊंगा. लौटते समय तुम्हें लिवाता चला आऊंगा.’

‘और अन्नू?’ मैं अच्छी तरह जानती थी कि विवाह से पहले आकाश और अन्नू एकसाथ आयाजाया करते थे, ‘हम दोनों पतिपत्नी एकसाथ घर से निकलें और वह अकेली जाए, क्या यह अच्छा लगेगा?’

‘उस की चिंता मत करो. वह आत्मनिर्भर है. अपनेआप कोई न कोई रास्ता ढूंढ़ निकालेगी.’

पति का स्वभाव शक, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध से सराबोर है, यह मैं अच्छी तरह जानती थी और मन ही मन संकल्प भी ले चुकी थी कि उन के इन दुर्गुणों को निकाल पाई तो खुद को धन्य समझूंगी. एक बार विश्वास की जड़ें जम जाएंगी तो जीवन सहज रूप से जीया जा सकता है. यही सोच कर, पति की दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ बनने की धुन में उन के मुख से निकली हर बात को संपूर्ण करती चली गई थी.

समय चक्र बदला. अन्नू का विवाह तय हो गया. प्रमोद डाक्टर थे. अच्छाखासा खातापीता, समृद्ध घराना था. उन्हीं कुछ दिनों में मैं ने अपने शरीर में कुछ परिवर्तन भी महसूस किए थे. तबीयत गिरीगिरी सी रहती थी, जी मिचलाता रहता. वजन भी घटता जा रहा था. एक दिन मुझे उलटियां करते देखा तो आकाश झल्लाने लगे :

‘इतना क्यों खाती हो जो हजम नहीं होता.’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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