पटरियों पर बलात्कर : भाग 1

31 अक्तूबर, 2017 की शाम भोपाल में खासी चहलपहल थी. ट्रैफिक भी रोजाना से कहीं ज्यादा था. क्योंकि अगले दिन मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस समारोह लाल परेड ग्राउंड में मनाया जाना था. सरकारी वाहन लाल परेड ग्राउंड की तरफ दौड़े जा रहे थे.

सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात मार्गों में भी बदलाव किया गया था, जिस की वजह से एमपी नगर से ले कर नागपुर जाने वाले रास्ते होशंगाबाद रोड पर ट्रैफिक कुछ ज्यादा ही था. इसी रोड पर स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन के बाहर तो बारबार जाम लगने जैसे हालात बन रहे थे.

एमपी नगर में कोचिंग सेंटर और हौस्टल्स बहुतायत से हैं, जहां तकरीबन 85 हजार छात्रछात्राएं कोचिंग कर रहे हैं. इन में लड़कियों की संख्या आधी से भी अधिक है. आसपास के जिलों के अलावा देश भर के विभिन्न राज्यों के छात्र यहां नजर आ जाते हैं.

शाम होते ही एमपी नगर इलाका छात्रों की आवाजाही से गुलजार हो उठता है. कालेज और कोचिंग आतेजाते छात्र दीनदुनिया की बातों के अलावा धीगड़मस्ती करते भी नजर आते हैं. अनामिका भी यहीं के एक कोचिंग सेंटर से पीएससी की कोचिंग कर रही थी. अनामिका ने 12वीं पास कर एक कालेज में बीएससी में दाखिला ले लिया था.

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उस का मकसद एक अच्छी सरकारी नौकरी पाना था, इसलिए उस ने कालेज की पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी थी. सर्दियां शुरू होते ही अंधेरा जल्दी होने लगा था. इसलिए 7 बजे जब कोचिंग क्लास छूटी तो अनामिका ने जल्द हबीबगंज रेलवे स्टेशन पहुंचने के लिए रेलवे की पटरियों वाला रास्ता चुना.

रेलवे लाइनें पार कर शार्टकट रास्ते से जाती थी स्टेशन

अनामिका विदिशा से रोजाना ट्रेन द्वारा अपडाउन करती थी. उस के पिता भोपाल में ही रेलवे फोर्स में एएसआई हैं और उन्हें हबीबगंज में ही स्टाफ क्वार्टर मिला हुआ है पर वह वहां जरूरत पड़ने पर ही रुकती थी. उस की मां भी पुलिस में हवलदार हैं.

कोचिंग से छूट कर अनामिका हबीबगंज स्टेशन पहुंच कर विदिशा जाने वाली किसी भी ट्रेन में बैठ जाती थी. फिर घंटे सवा घंटे में ही वह घर पहुंच जाती थी, जहां उस की मां और दोनों बड़ी बहनें उस का इंतजार कर रही होती थीं.

रोजाना की तरह 31 अक्तूबर को भी वह शार्टकट के रास्ते से हबीबगंज स्टेशन की तरफ जा रही थी. एमपी नगर से ले कर हबीबगंज तक रेल पटरी वाला रास्ता आमतौर पर सुनसान रहता है. केवल पैदल चल कर पटरी पार करने वाले लोग ही वहां नजर आते हैं. बीते कुछ सालों से रेलवे पटरियों के इर्दगिर्द कुछ झुग्गीबस्तियां भी बस गई हैं, जिन मेें मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं. यह शार्टकट अनामिका को सुविधाजनक लगता था, क्योंकि वह उधर से 10-12 मिनट में ही रेलवे स्टेशन पहुंच जाती थी.

अनामिका एक बहादुर लड़की थी. मम्मीपापा दोनों के पुलिस में होने के कारण तो वह और भी बेखौफ रहती थी. शाम के वक्त झुग्गीझोपडि़यों और झाडि़यों वाले रास्ते से किसी लड़की का यूं अकेले जाना हालांकि खतरे वाली बात थी, लेकिन अनामिका को गुंडेबदमाशों से डर नहीं लगता था.

उस वक्त उस के जेहन में यही बात चल रही थी कि विदिशा जाने के लिए कौनकौन सी ट्रेनें मिल सकती हैं. वैसे शाम 6 बजे के बाद विदिशा जाने के लिए 6 ट्रेनें हबीबगंज से मिल जाती हैं, इसलिए नियमित यात्रियों को आसानी हो जाती है. नियमित यात्रियों की भी हर मुमकिन कोशिश यही रहती है कि जल्दी प्लेटफार्म तक पहुंच जाएं. शायद देरी से चल रही कोई ट्रेन खड़ी मिल जाए और ऐसा अकसर होता भी था कि प्लेटफार्म तक पहुंचतेपहुंचते किसी ट्रेन के आने का एनाउंसमेंट सुनाई दे जाता था.

एमपी नगर से कोई एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद ही रेलवे के केबिन और दूसरी इमारतें नजर आने लगती हैं तो आनेजाने वालों को उन्हें देख कर बड़ी राहत मिलती है कि लो अब तो पहुंचने ही वाले हैं.

बदमाश ने फिल्मी स्टाइल में रोका रास्ता

यही उस दिन अनामिका के साथ हुआ. पटरियों के बीच चलते स्टेशन की लाइटें दिखने लगीं तो उसे लगा कि वक्त पर प्लेटफार्म पहुंच ही जाएगी. जब दूर से आरपीएफ थाना दिखने लगा तो अनामिका के पांव और तेजी से उठने लगे.

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लेकिन एकाएक ही वह अचकचा गई. उस ने देखा कि गुंडे से दिखने वाले एक आदमी ने फिल्मी स्टाइल में उस का रास्ता रोक लिया है. अनामिका यही सोच रही थी कि क्या करे, तभी उस बदमाश ने उस का हाथ पकड़ लिया. आसपास कोई नहीं था और थीं भी तो सिर्फ झाडि़यां, जो उस की कोई मदद नहीं कर सकती थीं. अनामिका के दिमाग में खतरे की घंटी बजी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी और उस बदमाश से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी.

प्रकृति ने स्त्री जाति को ही यह खूबी दी है कि वह पुरुष के स्पर्श मात्र से उस की मंशा भांप जाती है. अनामिका ने खतरा भांपते हुए उस बदमाश से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश तेज कर दी. अनामिका ने उस पर लात चलाई, तभी झाडि़यों से दूसरा गुंडा बाहर निकल आया. तुरंत ही अनामिका को समझ आ गया कि यह इसी का ही साथी है.

मदद के लिए चिल्लाने का कोई फायदा नहीं हुआ

अभी तक तीनों रेल की पटरियों के नजदीक थे, जहां कभी भी कोई ट्रेन आ सकती थी. बाहर आए दूसरे गुंडे ने भी अनामिका को पकड़ लिया और दोनों उसे घसीट कर नजदीक बनी पुलिया की तरफ ले जाने लगे. अनामिका ने पूरी ताकत और हिम्मत लगा कर उन से छूटने की कोशिश की पर 2 हट्टेकट्टे मर्दों के चंगुल से छूट पाना अब नाममुकिन सा था. अनामिका का विरोध उन्हें बजाए डराने के उकसा रहा था, इसलिए वे घसीटते हुए उसे पुलिया के नीचे ले गए.

उन्होंने अनामिका को लगभग 100 फुट तक घसीटा लेकिन इस दौरान भी अनामिका हाथपैर चलाती रही और मदद के लिए चिल्लाई भी लेकिन न तो उस का विरोध काम आया और न ही उस की आवाज किसी ने सुनी.

आखिरकार अनामिका हार गई. दोनों गुंडों ने उस के साथ बलात्कार किया. इस बीच वह इन दोनों के सामने रोईगिड़गिड़ाई भी. इतना ही नहीं, उस ने अपनी हाथ घड़ी, मोबाइल फोन और कान के बुंदे तक उन के हवाले कर दिए पर इन गुंडों का दिल नहीं पसीजा. ज्यादती के पहले ही खींचातानी में अनामिका के कपड़े तक फट चुके थे.

उन दोनों की बातचीत से उसे इतना जरूर पता चल गया कि इन बदमाशों में से एक का नाम अमर और दूसरे का गोलू है. जब इन दोनों ने अपनी कुत्सित मंशाएं पूरी कर लीं तो अनामिका को लगा कि वे उसे छोड़ देंगे. इस बाबत उस ने उन दरिंदों से गुहार भी लगाई थी.

राक्षसों की दयानतदारी भी कितनी भारी पड़ती है, इस का अहसास अनामिका को कुछ देर बाद हुआ. लगभग एक घंटे तक ज्यादती करने के बाद अमर और गोलू ने तय किया कि अनामिका को यूं निर्वस्त्र छोड़ा जाना ठीक नहीं, इसलिए उस के लिए कपड़ों का इंतजाम किया जाए. नशे में डूबे इन हैवानों की यह दया अनामिका पर और भारी पड़ी.

गोलू ने अमर को अनामिका की निगरानी करने के लिए कहा और खुद अनामिका के लिए कपड़े लेने गोविंदपुरा की झुग्गियों की तरफ चला गया. वहां उस के 2 दोस्त राजेश और रमेश रहते थे. गोलू ने उन से एक जोड़ी लेडीज कपड़े मांगे तो इन दोनों ने इस की वजह पूछी. इस पर गोलू ने सारा वाकया उन्हें बता दिया.

गोलू की बात सुन कर राजेश और रमेश की हैवानियत भी जाग उठी. वे दोनों कपड़े ले कर गोलू के साथ उसी पुलिया के नीचे पहुंच गए, जहां अनामिका निर्वस्त्र पड़ी थी.

अनामिका अब लाश सरीखी बन चुकी थी. उन चारों में से कोई जा कर स्टेशन के बाहर से चाय और गांजा ले आया. इन्होंने छक कर चाय गांजे की पार्टी की और बेहोशी और होश के बीच झूल रही अनामिका के साथ अमर और गोलू ने एक बार फिर ज्यादती की. फूल सी अनामिका इस ज्यादती को झेल नहीं पाई और बेहोश हो गई.

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जब वासना का भूत उतरा तो इन चारों ने अनामिका को जान से मार डालने का मशविरा किया, जिसे इन में से ही किसी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि रहने दो, लड़की किसी को कुछ नहीं बता पाएगी, क्योंकि यह तो हमें जानती तक नहीं है. बेहोश पड़ी अनामिका इन चारों की नजर में मर चुकी थी, इसलिए चारों अपने साथ लाए कपड़े उस के पास फेंक कर फरार हो गए और अनामिका से लूटे सामान का आपस में बंटवारा कर लिया.

थोड़ी देर बाद अनामिका को होश आया तो वह कुछ देर इन के होने न होने की टोह लेती रही. उसे जब इस बात की तसल्ली हो गई कि बदमाश वहां नहीं हैं तो उस ने जैसेतैसे उन के लाए कपडे़ पहने और बड़ी मुश्किल से महज 100 फीट दूर स्थित जीआरपी थाने पहुंची.

पुलिस ने नहीं किया सहयोग

थाने का स्टाफ उसे पहचानता था. मौजूदा पुलिसकर्मियों से उस ने कहा कि पापा से बात करा दो तो एक ने उस के पिता को नंबर लगा कर फोन उसे दे दिया. फोन पर सारी बात तो उस ने पिता को नहीं बताई, सिर्फ इतना कहा कि आप तुरंत यहां थाने आ जाइए.

बेटी की आवाज से ही पिता समझ गए कि कुछ गड़बड़ है इसलिए 15 मिनट में ही वे थाने पहुंच गए. पिता को देख कर अनामिका कुछ देर पहले की घटना और तकलीफ भूल उन से ऐसे चिपट गई मानो अब कोई उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

बेटी की नाजुक हालत देख पिता उसे घर ले आए और फोन पर पत्नी को भी तुरंत भोपाल पहुंचने को कहा तो वह भी भोपाल के लिए रवाना हो गईं. देर रात मां वहां पहुंची तो कुछकुछ सामान्य हो चली अनामिका ने उन्हें अपने साथ हुई ज्यादती की बात बताई. जाहिर है, सुन कर मांबाप का कलेजा दहल उठा.

बेटी की एकएक बात से उन्हें लग रहा था कि जैसे कोई धारदार चाकू से उन के कलेजे को टुकड़ेटुकडे़ कर निकाल रहा है. चूंकि रात बहुत हो गई थी और भोपाल में मध्य प्रदेश स्थापना दिवस की तैयारियां चल रही थीं, इसलिए उन्होंने तय किया कि सुबह होते ही सब से पहला काम पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का करेंगे, जिस से अपराधी पकड़े जाएं.

इधर से उधर टरकाती रही पुलिस

अनामिका के मातापिता अगली सुबह ही कोई साढ़े 10 बजे एमपी नगर थाने पहुंचे. खुद को बेइज्जत महसूस कर रही अनामिका को उम्मीद थी कि थाने पहुंच कर फटाफट आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी. एमपी नगर थाने में इन तीनों ने मौजूद सबइंसपेक्टर आर.एन. टेकाम को आपबीती सुनाई.

तकरीबन आधे घंटे तक इस सबइंसपेक्टर ने अनामिका से उस के साथ हुई ज्यादती के बारे में पूछताछ की लेकिन रिपोर्ट लिखने के बजाय वह इन तीनों को घटनास्थल पर ले गया. घटनास्थल का मुआयना करने के बाद टेकाम ने उन पर यह कहते हुए गाज गिरा दी कि यह जगह तो हबीबगंज थाने में आती है, इसलिए आप वहां जा कर रिपोर्ट लिखाइए.

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यह दरअसल में एक मानसिक और प्रशासनिक बलात्कार की शुरुआत थी. लेकिन दिलचस्प इत्तफाक की बात यह थी कि ये तीनों जब एमपी नगर से हबीबगंज थाने की तरफ जा रहे थे, तब हबीबगंज रेलवे स्टेशन के बाहर सामने की तरफ से गुजरते अनामिका की नजर गोलू पर पड़ गई. रोमांचित हो कर अनामिका ने पिता को बताया कि जिन 4 लोगों ने बीती रात उस के साथ दुष्कर्म किया था, उन में से एक यह सामने खड़ा है. इतना सुनते ही उस के मातापिता ने वक्त न गंवाते हुए गोलू को धर दबोचा.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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पटरियों पर बलात्कर : भाग 2

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गोलू का इतनी आसानी और बगैर स्थानीय पुलिस की मदद से पकड़ा जाना एक अप्रत्याशित बात थी. अब उन्हें उम्मीद हो गई कि अब तो बाकी इस के तीनों साथी भी जल्द पकडे़ जाएंगे. गोलू को दबोच कर ये तीनों हबीबगंज थाने पहुंचे. हबीबगंज थाने के टीआई रवींद्र यादव को एक बार फिर अनामिका को पूरा हादसा बताना पड़ा.

रवींद्र यादव ने गोलू से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपने साथियों के नामपते भी बता दिए. उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए आला अफसरों को भी वारदात के बारे में बता दिया. टीआई उन तीनों को ले कर फिर घटनास्थल पहुंचे. हबीबगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई पर अच्छी बात यह थी कि मुजरिमों के बारे में काफी कुछ पता चल गया था. आला अफसरों के सामने भी अनामिका को दुखद आपबीती बारबार दोहरानी पड़ी.

रवींद्र यादव ने हबीबगंज जीआरपी को भी फोन किया था, लेकिन वहां से कोई पुलिस वाला नहीं आया. सूरज सिर पर था लेकिन अनामिका और उस के मातापिता की उम्मीदों का सूरज पुलिस की काररवाई देख ढलने लगा था. बारबार फोन करने पर जीआरपी का एक एएसआई घटनास्थल पर पहुंचा लेकिन उस का आना भी एक रस्मअदाई साबित हुआ. जैसे वह आया था, सब कुछ सुन कर वैसे ही वापस भी लौट गया.

इस के कुछ देर बाद हबीबगंज जीआरपी के टीआई मोहित सक्सेना घटनास्थल पर पहुंचे. उन के और रवींद्र यादव के बीच घंटे भर बहस इसी बात पर होती रही कि घटनास्थल किस थाना क्षेत्र में आता है. इस दौरान अनामिका और उस के मांबाप भूखेप्यासे उन की बहस को सुनते रहे कि थाना क्षेत्र तय हो तो एफआईआर दर्ज हो और काररवाई आगे बढ़े. आखिरी फैसला यह हुआ कि अनामिका गैंगरेप का मामला हबीबगंज जीआरपी थाने में दर्ज होगा.

अब तक रात के 8 बज चुके थे. अनामिका के पिता को बेटी की चिंता सताए जा रही थी, जो थकान के चलते सामान्य ढंग से बातचीत भी नहीं कर पा रही थी. तमाम पुलिस वालों के सामने अनामिका को अपने साथ घटी घटना दोहरानी पड़ी. यह सब बताबता कर वह इस तरह अपमानित हो रही थी, जैसे उस ने अपराध खुद किया हो.

मीडिया में बात आने के बाद पुलिस हुई सक्रिय

24 घंटे थाने दर थाने भटकने के बाद तीनों का भरोसा पुलिस और इंसाफ से उठने लगा था. मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस बगैर किसी अड़चन के मन चुका था, जिस में पुलिस का भारीभरकम अमला तैनात था.

2 नवंबर, 2017 को जब अनामिका के साथ हुए अत्याचारों की भनक मीडिया को लगी तो अगले दिन के अखबार इस जघन्य, वीभत्स और शर्मनाक बलात्कार कांड से रंगे हुए थे, जिन में पुलिस की लापरवाही, मनमानी और हीलाहवाली पर खूब कीचड़ उछाली गई थी.

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लोग अब बलात्कारियों से ज्यादा पुलिस को कोसने लगे थे. जब आम लोगों का गुस्सा बढ़ने लगा तो स्थापना दिवस की खुमारी उतार चुके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आला पुलिस अफसरों की बैठक ली.

मीटिंग में सक्रियता और संवेदनशीलता दिखाते मुख्यमंत्री ने डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला और डीआईजी संतोष कुमार सिंह की जम कर खिंचाई की और टीआई जीआरपी हबीबगंज मोहित सक्सेना, एमपी नगर थाने के टीआई संजय सिंह बैंस और हबीबगंज थाने के टीआई रवींद्र यादव के अलावा जीआरपी के एक सबइंसपेक्टर भवानी प्रसाद उइके को तत्काल सस्पेंड कर दिया.

कानूनी प्रावधान तो यह है कि छेड़खानी और दुष्कर्म के मामलों में पुलिस को एफआईआर लिखना अनिवार्य है. आईपीसी की धारा 166 (क) साफसाफ कहती है कि धारा 376, 354, 326 और 509 के तहत हुए अपराधों की एफआईआर दर्ज न करने पर दोषी पुलिस वालों को 6 महीने से ले कर 2 साल तक की सजा दी जा सकती है. किसी भी सूरत में कोई भी पुलिस वाला इन धाराओं के अपराध की एफआईआर लिखने से मना नहीं कर सकता. चाहे घटनास्थल उस की सीमा में आता है या नहीं.

गोलू की निशानदेही पर पुलिस ने 3 नवंबर को अमर और राजेश उर्फ चेतराम को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन चौथा अपराधी रमेश मेहरा पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका. बाद में पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस गिरफ्तारी पर भी पुलिस की हड़बड़ी और गैरजिम्मेदाराना बरताव उजागर हुआ.

छानबीन में यह बात सामने आई कि गिरफ्तार किए गए अभियुक्त बेहद शातिर और नशेड़ी हैं. वे हबीबगंज इलाके के आसपास की झुग्गियों में ही रहते थे. ये लोग पन्नियां बीनने का काम करते थे. लेकिन असल में इन का काम रेलवे का सामान लोहा आदि चोरी कर कबाडि़यों को बेचने का था.

जांच में पता चला कि आरोपियों में सब से खतरनाक गोलू उर्फ बिहारी है. गोलू ने अपनी नाबालिगी में ही हत्या की एक वारदात को अंजाम दिया था. उस ने एक पुलिसकर्मी के बेटे की हत्या की थी.

इतना ही नहीं एक औरत से उस के नाजायज संबंध हो गए थे, जिस से उस के एक बच्चा भी हुआ था. गोलू  कितना बेरहम है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी माशूका से हुए बेटे को वह उस के पैदा होने के 4 दिन बाद ही रेल की पटरी पर रख आया था, जिस से ट्रेन से कट कर उस की मौत हो गई थी.

दूसरा आरोपी अमर उस का साढ़ू है. अमर भी शातिर अपराधी है कुछ दिन पहले ही वह अरेरा कालोनी में रहने वाले एक रिटायर्ड पुलिस अफसर के यहां चोरी करने के आरोप में पकड़ा गया था. पूछताछ में आरोपियों ने अपने नशे में होने की बात स्वीकारी और यह भी बताया कि अनामिका आती दिखी तो उन्होंने लूटपाट के इरादे से पकड़ा था लेकिन फिर उन की नीयत बदल गई.

मुख्यमंत्री के निर्देश पर एसआईटी को दिया केस

अनामिका बलात्कार मामले का शोर देश भर में मचा. इस से पुलिस प्रशासन की जम कर थूथू हुई. शहर में लगभग 50 जगहों पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनैतिक दलों ने धरनेप्रदर्शन किए. विरोध बढ़ता देख मुख्यमंत्री ने जांच के लिए एसआईटी टीम गठित करने के निर्देश दे डाले. कांग्रेसी सांसदों ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ ने भी सरकार और लचर कानूनव्यवस्था की जम कर खिंचाई की. बचाव की मुद्रा में आए राज्य के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने एक बचकाना बयान यह दे डाला कि क्या कांग्रेस शासित प्रदेशों में ऐसा नहीं होता.

भोपाल में जो हुआ, वह वाकई मानव कल्पना से परे था. जनाक्रोश और दबाव में पुलिस ने एक और भारी चूक यह कर डाली कि जल्दबाजी में नाम की गफलत में एक ड्राइवर राजेश राजपूत को गिरफ्तार कर डाला. बेगुनाह राजेश से जुर्म कबूलवाने के लिए उसे थाने में अमानवीय यातनाएं दी गईं.

बकौल राजेश, ‘मुझे गिरफ्तार कर गुनाह स्वीकारने के लिए जम कर लगातार मारा गया. प्लास्टिक के डंडों से बेहोश होने तक मारा जाता रहा. इस दौरान एक महिला पुलिस अधिकारी ने उस से कहा था कि तू गुनाह कबूल कर जेल चला जा और वहां बेफिक्री से कुछ दिन काट ले क्योंकि रिपोर्ट दर्ज कराने वाली मांबेटी फरजी हैं.’

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राजेश के मुताबिक उस का मोबाइल फोन पुलिस ने छीन लिया. उसे पत्नी से बात भी नहीं करने दी गई थी. हकीकत में राजेश राजपूत हादसे के वक्त और उस दिन भोपाल में था ही नहीं. वह शिवसेना के एक नेता के साथ इंदौर गया था.

उस की पत्नी दुर्गा को जब किसी से पता चला कि उस के पति को पुलिस ने गैंगरेप मामले में गिरफ्तार कर रखा है तो वह घबरा गई. दुर्गा जब थाने पहुंची तो पति की एक झलक दिखा कर उसे दुत्कार कर भगा दिया गया. इस के बाद वह अपने पति की बेगुनाही के सबूत ले कर वह यहांवहां भटकती रही, तब कहीं जा कर उसे 3 नवंबर को छोड़ा गया.

थाने से छूटे राजेश ने बताया कि वह हबीबगंज स्टेशन के बाहर भाजपा कार्यालय के पीछे की बस्ती में रहता है. जिनजिन पुलिस अधिकारियों ने उस के साथ ज्यादती की है, वह उन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराएगा.

अनामिका की हालत पुलिसिया पूछताछ और मैडिकल जांच में बेहद खराब हो चली थी लेकिन अच्छी बात यह थी कि इस बहादुर लड़की ने हिम्मत नहीं हारी. मीडिया के सपोर्ट और संगठनों के धरनेप्रदर्शनों ने उस के जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया. अब वह आईपीएस अधिकारी बन कर सिस्टम को सुधारना चाहती है. उस के मातापिता भी उसे हिम्मत बंधाते रहे और हरदम उस के साथ रहे, जिस से भावनात्मक रूप से वह टूटने व बिखरने से बच गई.

बवाल शांत करने के उद्देश्य से सरकार ने भोपाल के आईजी योगेश चौधरी और रेलवे पुलिस की डीएसपी अनीता मालवीय को भी पुलिस हैडक्वार्टर भेज दिया. अनीता मालवीय इस बलात्कार कांड पर ठहाके लगाती नजर आई थीं, जिस पर उन की खूब हंसी उड़ी थी.

डाक्टरों ने डाक्टरी जांच में की बहुत बड़ी गलती

हर कोई जानता है कि ऐसी सजाओं से लापरवाह और दोषी पुलिस कर्मचारियों का कुछ नहीं बिगड़ता. आज नहीं तो कल वे फिर मैदानी ड्यूटी पर होंगे और अपने खिलाफ लिए गए एक्शन का बदला और भी बेरहमी से अपराधियों के अलावा आम लोगों से लेंगे.

सरकारी अमले किस मुस्तैदी से काम करते हैं, इस की एक बानगी फिर सामने आई. अनामिका की मैडिकल जांच सुलतानिया जनाना अस्पताल में हुई थी. प्रारंभिक रिपोर्ट में एक जूनियर डाक्टर ने लिखा था कि संबंध ‘विद कंसर्न’ यानी सहमति से बने थे. इस रिपोर्ट में एक हास्यास्पद बात एक्यूज्ड की जगह विक्टिम शब्द का प्रयोग किया था. इस पर भी काफी छीछालेदर हुई. तब सीनियर डाक्टर्स ने गलती स्वीकारते हुए इसे लिपिकीय त्रुटि बताया, मानो कुछ हुआ ही न हो.

रेलवे की नई एसपी रुचिवर्धन मिश्रा ने इसे मानवीय त्रुटि बताया तो भोपाल के कमिश्नर अजातशत्रु श्रीवास्तव ने लापरवाही बरतने वाली डाक्टरों खुशबू गजभिए और संयोगिता को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. ये दोनों डाक्टर इस के पहले ही अपनी गलती स्वीकार चुकी थीं. उन की यह कोई महानता नहीं थी बल्कि मजबूरी हो गई थी. बाद में रिपोर्ट सुधार ली गई.

अगर वक्त रहते इस गलती की तरफ ध्यान नहीं जाता तो इस का फायदा केस के आरोपियों को मिलता. वजह बलात्कार के मामलों में मैडिकल रिपोर्ट काफी अहम होती है. तरस और हैरानी की बात यह है कि जिस लड़की के साथ 6 दफा बलात्कार हुआ,उस की रिपोर्ट में सहमति से संबंध बनाना लिख दिया गया.

शायद इस की आदत डाक्टरों को पड़ गई है या फिर इस की कोई और वजह हो सकती है, जिस की जांच किया जाना जरूरी है. अनामिका बलात्कार कांड में एक भाजपा नेता का नाम भी संदिग्ध रूप से आया था, जो बारबार पुलिस थाने में आरोपियों के बचाव के लिए फोन कर रहा था.

पुलिस ने चारों दुर्दांत वहशी दरिंदों गोलू चिढार उर्फ बिहारी, अमर, राजेश उर्फ चेतराम और रमेश मेहरा से पूछताछ कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

अनामिका चाहती है कि इन दरिंदों को चौराहे पर फांसी दी जाए पर बदकिस्मती से देश का कानून ऐसा है, यहां पीडि़ता की भावनाओं की कोई कीमत नहीं होती. भोपाल बार एसोसिएशन ने यह एक अच्छा संकल्प लिया है कि कोई भी वकील इन अभियुक्तों की पैरवी नहीं करेगा.

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गुस्साए आम लोग भी कानून में बदलाव चाहते हैं. उन का यह कहना है कि सुनवाई में देर होने से अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं और ऐसे अपराधों को शह मिलती है.

हालांकि खुद को आहत बता रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शीघ्र नया विधेयक ला कर कानून बनाने की बात कर चुके हैं और मामले की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में कराने की बात कर चुके हैं, पर सच यह है कि अब कोई उन पर भरोसा नहीं करता. खासतौर से इस मामले में पुलिस की भूमिका को ले कर तो वे खुद कटघरे में हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अनामिका परिवर्तित नाम है.

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

अंधविश्वास ने ली पिता पुत्र की जान

अंधविश्वास हमारे समाज में अमरवेल की तरह फल फूल रहा है.और इसको खाद पानी देने का काम धर्म के ठेकेदार पंडो , पुजारियों के द्वारा बखूबी किया जा रहा है. समाज में फैले तरह-तरह के अंधविश्वास लोगों की जेब से  रुपए पैसे तो ऐंठते  ही हैं, साथ ही जरा सी असावधानी की वजह से जान माल का नुक़सान भी कर रहे हैं.अंधविश्वास के शिकार दलित, पिछड़ों के साथ पढ़े लिखे  नौकरी पेशा लोग भी हो रहे हैं.

एक यैसा ही ताजा मामला मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में देखने को मिला है. लोगों को न्याय देने जज की कुर्सी पर बैठने वाले एक अंधविश्वासी शख्स की नासमझी ने अपने साथ अपने पुत्र की जान भी गंवा दी.

बताया जा रहा है कि  जज के एक महिला मित्र से संबंधों की बजह से परिवार में कलह चल रही थी, जिससे छुटकारा पाने जज साहब तंत्र मंत्र के चक्कर में पड़ गये.

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बैतूल  जिला न्यायालय में पदस्थ अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी  और इसके दो बेटे अभियान राज त्रिपाठी, और  छोटा बेटा आशीष राज त्रिपाठी ने  20 जुलाई 2020 को रात्रि 10.30 बजे के लगभग एक साथ बैठकर डायनिंग टेबल पर  खाना खाया. कुछ समय बाद अचानक वे तीनों उल्टीयां करने लगे . जिस भोजन में परोसी ग‌ई रोटियों की बजह  से तीनों की तबीयत खराब हुई ,वह  जज साहब की पत्नी श्रीमती भाग्य त्रिपाठी ने तैयार की थी. जज साहब की पत्नी ने दोपहर की बची  रोटियां खाई थी, इस कारण उन्हें कुछ नहीं हुआ.  21  एवं 22 जुलाई  तक जज साहब और इनके बेटो का इलाज न्यायाधीश आवास परिसर बैतूल में ही  चलता रहा. 23 जुलाई को जिला चिकित्सालय के चिकित्सक डॉ. आनद मालवीय की सलाह पर  जज साहब व इनके दोनो बेटों को पाढर अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया.

छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी की तबीयत में सुधार होने के कारण वह घर पर ही रहे .25 जुलाई को शाम के समय जज साहब एवं इनके बड़े बेटे अभियान राज त्रिपाठी की तबीयत अचानक ज्यादा खराब होने से  इन्हे नागपुर के प्रतिष्ठित एलेक्सिसी  अस्पताल ले जाया गया . जहां अस्पताल के चिकित्सको ने अभियान राज त्रिपाठी को मृत घोषित किया. और जज श्री महेन्द्र त्रिपाठी जी का ईलाज चलता रह . 26 जुलाई को प्रातः 04.30 बजे के लगभग जज महेन्द्र त्रिपाठी  की भी मौत हो गई.

दोनो पिता पुत्र की मृत्यु के बाद नागपुर के  मानकापुर पुलिस थाने में  एफआईआर  जज के छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी ने दर्ज कराते हुए पुलिस को बताया कि नागपुर आते समय उसके पिता महेन्द्र त्रिपाठी ने रास्ते में उसे बताया था कि उनकी किसी परिचित एक महिला संध्या सिह ने उन्हें  किसी पंडित से पूजा पाठ करवा कर  गेहूं का आटा दिया था और कहा था कि आटा घर के आटे में मिलाकर खाना बनाना . उसी आटे से तैयार रोटी खाने के बाद फुड पाईजनिग से उसके पापा और भाई की मौत हो गई.

न्यायिक क्षेत्र का मामला होने से पुलिस अधीक्षक द्वारा सम्पूर्ण जांच पड़ताल हेतु विशेष कार्य दल का गठन किया गया . इसी संदर्भ में जज महेन्द्र कुमार त्रिपाठी के घर से 20 जुलाई को प्रयुक्त शेष आटे के पैकेट को जप्त कर जांज के लिए लैब भेजा गया. लैब से आई रिपोर्ट में आटे में जहर मिले होने की पुष्टि हुई.पुलिस की जांच में जो कहानी सामने आई वह चौकाने वाली थी.

मूलतः रीवा निवासी श्रीमति संध्या सिंह    विगत कई वर्षों से छिन्दवाडा में रहकर एन.जी.ओ चलाती है . महिलाओं को कानूनी सलाह देने जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की वजह से जज महेन्द्र त्रिपाठी से नजदीकियां हो गई थी . चूंकि जज बैतूल में अकेले रहते थे,तो अक्सर दोनों की मेल मुलाकात होती रहती थी.संध्या जज साहब से रूपए पैसों की मांग भी करने लगी थी.

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लाक डाउन की बजह से जज साहब की पत्नी व वेटों के बैतूल आ जाने के कारण से संध्या विगत चार माह से जज  से नहीं मिल पा रही थी. परेशान होकर  उसने छिन्दवाड़ा में अपने  ड्रायवर संजू  , संजू के फूफा देवीलाल  चन्द्रवशी  और बाबा रामदयाल के साथ मिलकर एक योजना बनाई.   योजना के अनुसार श्रीमति संध्या सिंह ने बैतूल आकर  जज साहब से उनके घर से आटा बुलवाया और वही आटा पन्नी में भरकर बाबा उर्फ रामदयाल को दिया गया . दो दिन  बाद बाबा उर्फ रामदयाल ने आटे में जहर मिला कर संध्या को दे दिया. 20 जुलाई को  सर्किट हाउस बैतूल में संध्या और जज ने एकांत में मुलाकात की.  संध्या सिंह ने बाबा की पूजा वाला जहरीला आटा जज साहब को देते हुए कहा-

“बाबा ने इस‌ आटे को तंत्र मंत्र से सिद्ध किया है, इसकी रोटी खाने से सारी परेशानियां दूर हो जायेगी और हमारा मिलना जुलना आसान हो जाएगा.”

घर आकर  इसी तंत्र मंत्र वाले आटे को जज साहब ने घर में रखे आटे के डिब्बे में मिला दिया.  इसी आटे की रोटी खाने के बाद जज साहब और इनके दोनो बेटो की तबीयत खराब हुई और अंत में जज  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी और इनके बड़े बेटे श्री अभियान राज त्रिपाठी की मौत हो गई .

एक पढ़ें लिखे उच्च पद पर काम करने वाले जज की यह कहानी बताती है कि हम किस तरह आंख मूंदकर तंत्र मंत्र और चमत्कारों पर विश्वास करने लगते हैं. अपनी गर्लफ्रेंड के प्यार में अंधे कानूनी पढाई वाले जज ने कैसे विश्वास कर लिया कि बाबा द्वारा दिए गए इस आटे के टोटके से  घर की परेशानियां दूर हो जायेगी.

आज भी विज्ञान के युग में भले ही हम आधुनिक तकनीक का उपयोग कर अपने आपको माडर्न समझने लगे हैं, परन्तु हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं हुई है. जब हमारे देश के वैज्ञानिक चंद्रयान की सफलता के लिए पूजा पाठ और हवन करते हो, देश के रक्षा मंत्री राफेल विमान की नारियल और नींबू से पूजा करते हों,तो फिर समाज के दूसरे वर्ग से क्या उम्मीद की जा सकती हैं.

अंधविश्वास का आलम ये है रोज सोशल मीडिया पर देवी देवताओं की पोस्ट वाले मेसैज 5 ग्रुप में फारवर्ड करने की अपील पर हम बिना सोचे समझे भेड़ चाल चलने लगते हैं. ज्ञान विज्ञान और समाज को जागरूक करने  वाली पत्रिकाओं को पढ़ने की रूचि लोगों की खत्म होती जा रही है.यैसे में दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं सरिता,सरस सलिल,मुक्ता, गृहशोभा समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वास के प्रति समाज को जागरूक करने का काम कर रही हैं. इसी तरह सत्यकथा और मनोहर कहानियां जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित अपराध कथाओं में यह सीख प्रमुखता से दी जाती है कि अपराध का अंजाम सुखद नहीं होता. नशा, अंधविश्वास, धार्मिक आडंबर और अपराध पैसे से तंगहाली लाकर हमें  बर्बाद की ओर ले जाते हैं.

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एससी तबके पर जोरजुल्म : बाढ़ की तरह बढ़े हैं मामले

मेरा गांव हरियाणा के जींद जिले में है और नाम है रत्ता खेड़ा. वहां से जुड़ा बचपन का एक किस्सा आज भी मेरे जेहन में घूमता रहता है. चूंकि गांव है और वहां आज भी खेतीबारी व पशुपालन से रोजीरोटी चलती है, तो ज्यादातर किसान घर के पास ही अपनी खाली पड़ी जमीन पर पशुओं के चारे तूड़ी को सालभर जमा कर के रखने के लिए सरकंडे और दूसरी लचीली लकड़ियों से गुंबदनुमा कमरा बना लेते हैं. उस कमरे में एक सुराखनुमा छोटे दरवाजे से तूड़ी निकाली जाती है तो उसे कूप कह दिया जाता है.

उस समय हमारा कूप बन रहा था और उस के लिए बड़ी मेहनत और ताकत लगनी थी, लिहाजा दादाजी ने गांव के ही बहुत से लोगों को बुला लिया था. उन में एक गोराचिट्टा लड़का भी था. कुछ ज्यादा ही गोरा. भूरे बाल. कूप बनवाने में उस ने सब से ज्यादा मेहनत की थी.

कूप बनने के बाद वहां जमा हुए सब लोगों को मीठा खिलाया गया, उस लड़के को छोड़ कर. उसे दादाजी ने मंडी (सफीदों मंडी) चलने को कहा था. इस के बाद वह लड़का अपनी साइकिल पर, मैं और दादाजी दूसरी साइकिल पर चल दिए मंडी की तरफ.

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मंडी में हम हलवाई की एक दुकान पर गए और दादाजी ने उस लड़के के लिए मिठाई मंगवाई. उस ने मना नहीं किया, बल्कि खूब छक कर पेठे की मिठाई का लुत्फ उठाया.

बाद में मुझे पता चला कि वह गोराचिट्टा लड़का एससी तबके से था और दादाजी ने उसे पेठे की मिठाई इसलिए खिलाई थी, क्योंकि उस ने सब से ज्यादा मेहनत की थी और उसी का नतीजा यह पेठा पार्टी थी.

पर भारतीय समाज में ऐसे किस्से बहुत कम ही सुनने में आते हैं कि किसी एससी को उस की मेहनत का इतना मीठा इनाम मिला हो, वरना जातिवाद के जाल में जकड़े लोगों ने इन्हें हमेशा दोयम दर्जे का समझा है. ये लोग आज भी अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं. जब ये अपने हकों की बात करते हुए जरा सा गुस्सा दिखाते हैं, तो अगड़े समाज की त्योरियां ऐसे चढ़ जाती हैं कि ‘तुम्हारी इतनी मजाल जो हमारे सामने गुस्सा दिखाते हो’.

एक उदाहरण से इसे समझते हैं. आप को याद ही होगा कि कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने 1989 के अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के गलत इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए इस से जुड़े मामलों के आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी की जगह शुरुआती जांच की बात कही थी. इस टिप्पणी से एससी तबके के कई संगठनों को लगा था कि यह उन के हकों पर कुठाराघात है और वे बहुत नाराज हो गए थे. इस के विरोध में उन्होंने ‘भारत बंद’ का आह्वान किया था. तब भी ऊंची जाति वालों को यह सब नौटंकी लगा था और वे उन के गुस्से को समझ नहीं पाए थे.

2 अप्रैल, 2018 के उस महाबंद के दौरान कई राज्यों में वहां की सरकारों और एससीएसटी संगठनों में टकराव और हिंसा हुई तो ज्यादातर आंदोलनकारियों को ही यह हिंसा भड़काने का कुसूरवार माना गया था.

चलो, यह तो भारत बंद था और इस से देश को नुकसान हुआ था, पर उन एससी नौजवानों की क्या गलती होती है जो सिर्फ मूंछ पर ताव देते या गांव में मोटरसाइकिल चलाते पकड़े जाने पर अगड़ों द्वारा पीट दिए जाते हैं और उन्हें रोने भी नहीं दिया जाता?

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो देश की 130 करोड़ जनता को एक परिवार मानने का दावा करते नहीं थकते हैं, के गृह राज्य गुजरात में अगड़े लोग एससी तबके को आज भी बेवजह अपने गुस्से और नफरत का शिकार बनाते हैं. दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ कर न जाने देने, दलित सरपंच को स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा न फहराने देने और मिड डे मील के दौरान एससी छात्रों को अलग बिठाए जाने जैसी घिनौनी वारदातें हो जाती हैं और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती.

रेत के गढ़ राजस्थान के नागौर में 16 फरवरी, 2020 को 2 एससी लड़कों की तथाकथित चोरी के आरोप में पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद 7 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. आरोप था कि पिटाई करने वालों ने उन 2 लड़कों में से एक पीड़ित को चोट पहुंचाने के इरादे से पेचकस पर पैट्रोल से भरा कपड़ा लपेट कर उस के अंग में डाला था.

दरअसल, वे दोनों पीड़ित नागौर में बाइक सर्विस कराने के लिए सर्विस सैंटर गए थे. वहीं पर एजेंसी के मुलाजिमों ने उन दोनों पर पैसे चुराने के आरोप लगाए और उन की जम कर पिटाई कर दी.

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मामला उछला तो राजनीति में उबाल सा आ गया. नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल ने कहा, “देश आजाद होने के इतने साल बाद भी दलितों (एससी) के साथ अत्याचार की घटनाएं बंद होने का नाम नहीं ले रही हैं. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद मामला सब के सामने आया और पुलिस को कार्यवाही करनी पड़ी…”

इतना ही नहीं, कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके राहुल गांधी ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘राजस्थान के नागौर में 2 दलितों के साथ क्रूरतापूर्वक अत्याचार का वीडियो दुखद और दिल दहलाने वाला है. मैं राज्य सरकार से इस घिनौने अपराध में शामिल आरोपियों को सजा दिलाने का आग्रह करता हूं.’

एससी तबके से जुड़े जोरजुल्म की वारदातें नेताओं के कानों तक तभी पहुंचती हैं जब मामला ज्यादा तूल पकड़ लेता है, वरना तो यही भरम फैलाया जाता है कि अब इस निचले समाज को सताने के मामले देश में कम हो गए हैं, जबकि नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के कहे मुताबिक साल 2017 में एससी अत्याचार के 43,200 मामले दर्ज हुए थे. साल 2016 में यही आंकड़ा 40,801 का था, जबकि साल 2015 में ऐसे 38,670 मामले दर्ज हुए थे.

इस ब्यूरो के मुताबिक, एससी तबके पर जोरजुल्म करने के मामलों में उत्तर प्रदेश नंबर वन है. साल 2017 में इस प्रदेश में सब से ज्यादा 11,000 ऐसे मामले दर्ज किए गए थे. इस के बाद बिहार है, जहां 6,700 मामले सामने आए. मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 5,800 मामलों का रहा.

आज भी यह सिलसिला रुका नहीं है. एक तरफ सत्ता पक्ष के नेता अपना वोट बैंक साधने के लिए एससी तबके के गरीबगुरबों के पैर धोते हैं, तो दूसरी तरफ ऊंची जाति वाले अपनी नाक ऊंची रखने के लिए किसी एससी पर इस बात पर हाथ साफ कर देते हैं कि उस ने हमारे सामने घोड़ी पर बैठ कर अपनी बरात कैसे निकाली.

ये खबरें हमें हैरानपरेशान नहीं करती हैं. पर क्यों हम इतने पत्थरदिल हो गए हैं? क्यों किसी हाड़मांस के जीतेजागते इनसान पर इसलिए लातघूंसे चला देते हैं कि वह एससी है और जवाब में कुछ नहीं कहेगा? क्या आजादी के इतने साल बाद हम ने विकास के नाम पर यही नफरत हासिल की है? हम ने यह कैसा समाज रच डाला है?

ऊपर से हिंदुत्व की डुगडुगी ने तो मामला और भी गंभीर कर दिया है. जातिवाद की खाई और बढ़ गई है. राजनीतिक विश्लेषक आनंद तेलतुंबड़े के मुताबिक देश के कुल दलितों (तकरीबन 20 करोड़) में 2 करोड़ दलित ईसाइयों और 10 करोड़ दलित मुसलमानों को भी जोड़ लें, तो देश में दलितों की आबादी 32 करोड़ हो जाती है, जो कुल आबादी की एकचौथाई है.

यह कोई छोटी आबादी नहीं है, पर आज भी इसे हर तरह के भेदभाव और बेइज्जती का दंश सहना पड़ता है, जबकि इस से ज्यादा कमेरी और मेहनती जाति कोई दूसरी नहीं है. ये लोग खेतों में, कारखानों में, सड़कों पर मजदूर बन कर देश की तरक्की की इमारत की बुनियाद में अपना खूनपसीना झोंक रहे हैं.

इस समाज के सब से बड़े सुधारक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने संविधान में इन के लिए पढ़ाईलिखाई और सरकारी नौकरी में रिजर्वेशन का कानून इसलिए बनाया था, ताकि ये समाज में बराबरी का दर्जा पा जाएं, पर इस समाज के जिन लोगों ने इन सुविधाओं का फायदा उठाया वे खुद को दूसरे गरीब एससी से ऊंचे दर्जे का समझने लगे और उन से दूर होते गए. उन में अपना ही ब्राह्मणवाद पनपने लगा था.

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यही वजह है कि गांवों में अनपढ़ या अधपढ़े एससी आज भी दूसरों के खेतों में मजदूर बन कर रोजीरोटी कमाने पर मजबूर हैं. अगर किसी के पास थोड़ीबहुत जमीन है, वह भी छिनती जा रही है.

इस बिरादरी के नेता सिर्फ वोट बैंक की खातिर इन का इस्तेमाल कर रहे हैं. मायावती हों या चंद्रशेखर, रामविलास पासवान हों या रामदास अठावले या फिर कोई तीसरा ही सही, सभी ने एससी तबके के लिए कोई भी ऐसा ऐतिहासिक काम नहीं किया है, जिस ने उन के घरों में घी के दीए जलाए हों.

ऐसे में यह उम्मीद करना कि कल अचानक एससी तबके का कायाकल्प हो जाएगा, फुजूल है. वे लोग अभी तक पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं. रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों को तरस रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि गांवदेहात में अब तूड़ी रखने के कूप नहीं बनते हैं या उन को पूरा करने में एससी तबके के देह से तगड़े लड़कों की मदद नहीं ली जाती है, पर इनाम में उन्हें पेठे की मिठाई की दावत देने वाले लोग न के बराबर बचे हैं. शायद इसीलिए उस गोरेचिट्टे लड़के की खाई गई पेठे की मिठाई का स्वाद आज भी मेरी जबान पर भी बरकरार है.

पंजाब जहरीली शराब कांड : ले डूबा नशे का सुरूर

पंजाब के ज़हरीली शराब कांड में 100 से ज्यादा मौत की खबर है. ऐसे कांड में मरने वाले, सस्ती शराब के आदी, समाज के निचले माली तबके के लोग होते हैं. बेशक त्रासदी बड़ी हो जाए तो मीडिया की सुर्ख़ियांं संबंधित नेताओं, बिचौलियों और अधिकारियों को वक्ती तौर पर नंगा करने वाली ज़रूर बन जाती हैं.

पंजाब इस मामले में अकेला राज्य नहीं है. इस के पीछे रेवेन्यू केंद्रित आबकारी नीति से राज्य की आय बढ़ाते जाने और उस की आड़ में अपनी जेब के लिए अधिक से अधिक पैसा बनाने की होड़ होती है. अगर पूर्ण शराबबंदी हो तो और भी पौ बारह. सीधा समीकरण है- जितना ज़्यादा शिकंजा उतनी ज़्यादा उगाही. मोदी के गुजरात में नेता-बिचौलिया-अफ़सर गठजोड़ के लिए यह 30 हज़ार करोड़ और नीतीश के बिहार में यह 10 हज़ार करोड़ सालाना का जेबी कारोबार बन चुका है.

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गुजरात और बिहार में पूर्ण शराबबंदी के चलते पंजाब और हरियाणा से व्यापक शराब तस्करी इन दोनों राज्यों में होती आई है. पंजाब में हाल में आबकारी नीति को अपनेअपने संरक्षित शराब कार्टेल के हिसाब से तय कराने के चक्कर में प्रभावशाली मंत्रियों ने अमरिंदर सिंह के वफ़ादार मुख्य सचिव की छुट्टी करा दी. कुछ माह पहले हरियाणा में भी पकड़ी गयी शराब को खुर्दबुर्द कर गुजरात भेजने वाला गिरोह उजागर हुआ लेकिन इनेलो मंत्रियों की हिस्सेदारी ने जाँच को जकड़ रखा है.

दरअसल, आएदिन होने वाली छिटपुट मौतें तो ख़बर बनती ही नहीं, जबकि पंजाब जैसी बड़ी त्रासदी पर छोटे अफसरों के निलंबन-जांंच की चादर ओढ़ा दी जाती है. फ़िलहाल पंजाब में भी यही चलन देखने को मिल रहा है, एक दर्जन से ज्यादा इंस्पेक्टर स्तर के आबकारी और पुलिसकर्मी निलंबन की लिस्ट में हैं और मंडल कमिश्नर जाँचकर्ता के रूप में.

पिछले 10 साल में देश में हुई अन्य प्रमुख  त्रासदियों पर एक नज़र डालिये जिन में सौ से अधिक मौतें हुईं, जांंच का नाटक चला और समाज के लिए आत्मघाती आबकारी नीति नेता-बिचौलिया-अधिकारी गठजोड़ के साये में बदस्तूर जारी रही. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, सरकार किसी पार्टी की हो- मोदी मॉडल या राम राज्य का दावा ही क्यों न हो.

क्या समझना मुश्किल है कि स्कूलों और अस्पतालों जैसी सामाजिक ज़रूरतों तक को निजी हाथों में सौंपने वाली सरकारें, शराब के कारोबार पर कुंडली मारे क्यों बैठी हैं?

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘अगर मैं 1 दिन के लिए तानाशाह बन जाऊं, तो बिना मुआवजा दिए शराब की दुकानों व कारखानों को बंद करा दूंगा.’’ गांधीजी ने पूरी सूझबूझ के साथ यह बात कही थी, क्योंकि बरबादी का बड़ा कारण यह शराब ही है.

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भारत में आजादी के बाद से अब तक शराबबंदी के तमाम प्रयासों का सबक यही है कि पूर्ण शराबबंदी को लागू करना प्रदेश सरकारों के लिए संभव ही नहीं रहा. जिस भी राज्य में शराबबंदी लागू की गई, वहां शराब की तस्करी बढ़ गई.

देश में गुजरात, मिजोरम व नागालैंड ऐसे प्रदेश हैं, जहां पूर्ण शराबबंदी है. गुजरात में तो आजादी के बाद से ही शराब पर पाबंदी है, पर अफसोस यह महज कहने को ही है. वहां शराब हर जगह आसानी से उपलब्ध है. अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस महकमा हर साल सवा सौ करोड़ की अवैध शराब जब्त करता है. हर साल जहरीली शराब पीने से मौतें होती हैं. 2009 में गुजरात में जहरीली शराब पीने से 148 लोग मारे गए थे.

मिजोरम राज्य में 1995 में शराबबंदी का कानून पारित किया गया था. मगर अगस्त, 2014 में शराबबंदी खत्म करने का फैसला कर नया कानून पारित कर दिया गया. सरकार का मानना था कि शराबबंदी से फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है. नागालैंड में भी करीब इसी समय से शराबबंदी लागू है.

केरल सरकार ने भी 2014 में चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी करने का फैसला किया है. गौरतलब है कि देश में सब से ज्यादा शराब की खपत केरल में ही होती है. राज्य को 22 फीसदी राजस्व शराब से ही हासिल होता है. शराबबंदी लागू होने से यहां के पर्यटन पर गलत असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

जब तक सरकारों की मौजूदा नीतियां कायम रहेंगी, तब तक शराब की लत की चपेट में आने से लोगों को नहीं बचा सकते. अगर हर गलीनुक्कड़ पर शराब की दुकानें खोल देंगे, तो लोग ज्यादा सेवन करेंगे ही. जहां शराब बंद करने का दिखावा किया जाता है, वहां अवैध बिक्री शुरू हो जाती है और खराब गुणवत्ता वाली शराब बिकने लगती है, जो जानलेवा साबित होती है. शराब के आदी लोग ज्यादा दाम पर भी घटिया शराब पीने लगते हैं, जो मौत के करीब ले जाती है.

इसलिए व्यक्ति से ज्यादा सरकार को कठोर फैसला करना चाहिए. इस मामले में भारत को सिंगापुर से सीखना चाहिए. वहां सिगरेट के सेवन से सेहत पर होने वाले नुकसान को देखते हुए सरकार ने बाकी देशों से सिगरेट की 7 गुना ज्यादा कीमत तय कर दी है. इस से लोगों ने सिगरेट खरीदना कम कर दिया है. सिगरेट के पैकेटों पर भयानक चेतावनी छापने के साथसाथ सजा भी तय कर दी गई है. इस से लोगों में डर पैदा हो गया है. उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना बंद कर दिया है. सिगरेट का पैकेट फेंकते पकड़े जाने पर भी जेल भेज दिया जाता है.

लेकिन हमारे यहां सरकारों की नीतियां सिगरेट पीने से रोकने के बजाय उन्हें सहजता से उपलब्ध कराने वाली हैं. ऐसे में समाज का माली तानाबाना टूटना लाजिम है. यदि सरकारें उपलब्धता पर नियंत्रण करें, तब ही लोगों को इन के सेवन से रोका जा सकता है.

दरअसल, शराब का असली नशा तो इस धंधे की कमाई की चाशनी में डूबने वालों पर ही ज्यादा चढ़ता है. फिर चाहे वे सरकारें हों या शराब का धंधा करने वाले. सभी चाहते हैं कि शराब से उन की तिजोरियों की सेहत हर दिन दुरुस्त होती रहे. राजस्थान में पिछली वसुंधरा राजे की सरकार अपनी शराब नीतियों को ले कर खासी बदनाम रही है, तो गहलोत सरकार ने भी शराब से कमाई का खेल बड़ी चतुराई के साथ खेला है.

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शराब से होने वाली कमाई का मोह यह सरकार भी नहीं छोड़ पाई. दरअसल, सरकार ने गलीगली में 24 घंटे खुलने वाले रैस्टोरैंट बार खोल दिए. राजस्थान सरकार का खजाना भरने के मामले में शराब का नंबर पहला है. दरअसल, मोटी कमाई के मामले में बाड़मेर में तेल से मिल रही 6 हजार करोड़ की रौयल्टी को ले कर जितना हो-हल्ला मचाया जा रहा है, उस से कहीं ज्यादा तो अब शराब उगल रही है. आर्थिक मामलों के सरकारी और गैरसरकारी माहिरों का मानना है कि तेल की रौयल्टी तो अब अगले कुछ सालों के लिए स्थायी हो गई है, लेकिन शराब का कारोबार प्रदेश सरकार के लिए राजस्व बढ़ाने के लिए एक खास जरीया बन गया है.

प्रशासन की सरपरस्ती में शराब का कानूनी व गैरकानूनी धंधा खूब फूलफल रहा है, जिस में पुलिस, सरकार सब शामिल हैं. सरकार के पास पढ़ेलिखे, अनपढ़, अमीरगरीब, हर तबके के लिए देशी से ले कर अंगरेजी शराब तक का बंदोबस्त है. शराब को घरघर पहुंचाने के लिए गांवों व शहरों में ठेका देने का काम भी बड़ी सूझबूझ के साथ किया जाता है ताकि कोई इलाका अछूता न रह जाए.

दरअसल, पैसे कमाने की सहूलियत के लिए इसे कानूनी और गैरकानूनी बता दिया गया है यानी जो सरकार बेचे, वह कानूनी है और जिस से उस का फायदा न हो, वह गैरकानूनी. जबकि शराब तो सिर्फ शराब है, जो इनसान को तिलतिल कर मारने का काम करती है. कच्ची शराब हो या शराब की लाइसैंसी दुकानें, दोनों से आम आदमी की बरबादी और सरकार व सरकारी आदमियों का मुनाफा हो रहा है. लाइसैंसी शराब से सरकारें हर साल अरबों रुपए का राजस्व हासिल करती हैं और गैरकानूनी घोषित की गई शराब में सरकारी लोगों का हिस्सा होता है.

शराब का नशा करना इनसान की कुदरती भूख नहीं है. इसलिए इस का होना या न होना कोई माने नहीं रखता. अगर इस की कुदरती भूख होती तो दुनिया के हर शख्स में नशाखोरी की लत पड़ गई होती. भारत में तो कई तथाकथित देवताओं तक को शराब पिलाई जाती है. यहां शराब पीनेपिलाने का इतिहास बहुत पुराना है. राजामहाराजाओं के जमाने से ही यहां शराब का खूब चलन रहा है. शराब की वजह से कई रियासतें, राजामहाराजा बरबाद हो गए, तो भला आम आदमी की क्या बिसात है?

सरकार एक तरह से वही काम कर रही है, जो अंगरेजों ने नवाबों के साथ किया था. उन्हें नशे में डुबोए रखा और अंदर ही अंदर उन की जड़ें खोखली कर समूचे भारत को गुलामी की बेडि़यों में जकड़ लिया.

चोरी, डकैती, हत्या, लूट, बलात्कार जैसे अपराधों को रोकना सरकार का फर्ज है, तो फिर सरकार लोगों को नैतिक बुराई शराब को पीने की दावत क्यों देती है? मसलन, भ्रूण हत्या भी तो अपराध है, फिर भी अनेक बार लड़कियों को पैदा होने से पहले ही कोख में मार दिया जाता है. ऐसे में सरकारें इस अपराध को रोकने में नाकाम हैं, तो इस का मतलब यह कतई नहीं कि वे लाइसैंस जांच केंद्र खुलवा कर इसे कानूनन सही ठहरा दें.

अगर कोई पति अपनी पत्नी को मारने से बाज नहीं आता, तो उस के खिलाफ कानूनी काररवाई करने के बजाय क्या उसे पत्नी को मारनेपीटने का कानूनी लाइसैंस दे दिया जाए? शराब के मामले में सरकारों ने ठीक ऐसा ही किया है. नशाबंदी लागू करने के बजाय उन्होंने गांवों, शहरों, कसबों में लाइसैंसी दुकानें खुलवा कर शराब पर कानूनी होने का ठप्पा लगा दिया है.

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भले ही आज भी शराब पीने के नाम पर लोग नाकभौं सिकोड़ते हों, लेकिन बाजार झूठ नहीं बोलता. जोश ए जवानी, नोटों से भरी जेबें और तेजी से बदलते माहौल के चलते शराब का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है.

भारतीय अलकोहल पेय बाजार जिस तेजी से सालाना बढ़ रहा है, वह काफी चिंताजनक है और स्पष्ट है कि देश की बड़ी आबादी शराब की गिरफ्त में है. देश में बीयर पीने वालों की भी कमी नहीं है और व्हिस्की पीने के मामले में तो भारतीयों ने व्हिस्की के सब से बड़े बाजार माने जाने वाले अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है.

एक रिसर्च के मुताबिक, भारत में शराब पीना 16 से 18 साल की उम्र से शुरू हो कर 25 से 30 साल की उम्र में चरम पर पहुंच जाता है. इस समय भारत की 35 करोड़ की आबादी 18 से 35 साल की है और अगले 5 साल में इस में 5 से 7 करोड़ का इजाफा होने का अंदाजा है. यही वजह है कि दुनिया के तमाम शराब के कारोबारी भारत की ओर रुख कर रहे हैं.

भारत समेत दुनिया भर में शराब का सेवन करने से होने वाली बीमारियों की वजह से 33 लाख लोग हर साल मौत को गले लगाते हैं. इतना ही नहीं भारत में सड़क हादसों में हर साल करीब 1,38,000 लोग मारे जाते हैं. अलकोहल ऐंड ड्रग इन्फौर्मेशन सैंटर के एक अध्ययन के मुताबिक, इन में से 40 फीसदी हादसे शराब पी कर वाहन चलाने की वजह से होते हैं.

शराबखोरी कितना भयानक रोग बनता जा रहा है, यह इस से समझा जा सकता है कि दुनिया में बीमारियों, विकलांगता व मौत की वजह के जो कारण बताए जाते हैं, उन में शराबखोरी 2015 तक छठा कारण थी, लेकिन अब तीसरे पायदान पर आ पहुंची है. इंसान में 2 सौ से ज्यादा बीमारियों का खतरा शराब के सेवन से बढ़ता है.

पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन नामक संस्था ने राजस्थान समेत 6 राज्यों के बारे में एक अध्ययन किया है और उस की रिसर्च के मुताबिक, शराब पर टैक्स व उस के दाम बढ़ने के बावजूद शराब की खपत बढ़ रही है. इस रिसर्च में राजस्थान, तमिलनाडु, ओडिशा, सिक्किम, मेघालय शामिल हैं. रिसर्च से पता चला है कि 28 फीसदी शराबी आत्महत्या करते हैं. आत्महत्या के सभी मामलों में से 50 फीसदी शराब या अन्य नशे पर निर्भरता से जुड़े होते हैं.

शराब के सेवन से आत्महत्या करने वालों में किशोरों की संख्या ज्यादा है, जो कुल आत्महत्या के मामलों में से 70 फीसदी है. शराब की लत इतनी आसानी से नहीं छूटती पर इसे छोड़ना नामुमकिन भी नहीं. आप के बेहतर स्वास्थ्य व भविष्य के लिए इस लत को छोड़ना बेहद जरूरी है.

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स्कॉटलैंड: बेटी के बलात्कारी को सजा दिलाने के लिए पिता का संघर्ष

रेटिंग :  3 स्टार

निर्माता : जैनिया इबोरेक  व मनीष वात्सल्य

निर्देशक : मनीष वात्सल्य

कलाकार : मनीष वात्सल्य, दया शंकर पांडे , चेतन पंडित, अमित गाजी, अदम सैनी, खुशबू पुरोहित, समर कत्यान व अन्य.

ओटीटी प्लेटफॉर्म : शेमारू मी बॉक्स ऑफिस

अवधि : 2 घंटे 1 मिनट

रोमांचक,  राजनीतिक रोमांचक के साथ पारिवारिक रिश्तों,  असामान्य अपराध कथाओं को रोचक तरीके से फिल्मों में पेश करने में महारत रखने वाले फिल्मकार मनीष वात्सल्य इस बार बलात्कार की सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध व रोमांचक  फिल्म “स्कॉटलैंड” लेकर आए हैं, जो कि 7 अगस्त से ओटीटी प्लेटफार्म शेमारू  बॉक्स ऑफिस पर देखी जा सकती है. मनीष वात्सल्य की यह फिल्म ऑस्कर 2020 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म की प्रतियोगिता का भी हिस्सा है. यह फिल्म 7 अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड जीत चुकी है.

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कहानी:

मुंबई शहर में रह रहे विधायक बलवीर शेलार (चेतन पंडित) अपनी मां के ऑपरेशन के लिए स्कॉटलैंड (लंदन) से न्यूरो सर्जन डॉक्टर ब्रज दीवान (आदम सैनी) को बुलाते हैं . डॉक्टर ब्रज दीवान अपनी बेटी तान्या (खुशबू पुरोहित) के साथ मुंबई पहुंच कर विधायक शेलार की मां का सफल ऑपरेशन कर देते हैं. दूसरे दिन विधायक शेलार अपने घर पूजा के मौके पर दीवान उनकी बेटी को बुलाते हैं .जहां तान्या चार युवकों रोनी शेलार, संजू शेलार (समर कात्यान), बलविंदर उर्फ बंटी और फैजल (अमीन गाजी) को आशा (कशिश राय) का बलात्कार करते देख शोर मचाती है .एमएलए शेलार अपने 30 वर्ष पुराने ड्राइवर हरिराम पांडे (दया शंकर पांडे)से पुलिस को फोन करने के लिए कहते हैं, पर आशा रोक देती है.पता चलता है कि हरीराम पांडे की बेटी है आशा, जिसे बलवीर शेलार ने मुंह बोली बेटी बना रखा है. आशा, विधायक शेलार के बेटों रोनी और संजू को राखी बांधती है.

मगर जब हरीराम पांडे कार से डॉक्टर ब्रज दीवान और उनकी बेटी तान्या को उनके घर छोड़ने जा रहा होता है, तो रास्ते में रोनी,संजू, बंटी और फैजल उनकी कार को रोककर जबरन तान्या को अपने साथ ले जाकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार करके घायल अवस्था में सड़क पर छोड़ देते हैं .इमानदार एसपी इसकी जांचकर चारों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ सारे सबूत इकट्ठा करता है. मगर अदालत में विधायक के रुतबे के चलते सारे सबूत और गवाह बदल जाते हैं. आशा और हरिराम पांडे भी अदालत में अपना बयान बदल देते हैं.अदालत चारों को बाइज्जत बरी कर देती है.विधायक शेलार तुरंत इमानदार एसपी का तबादला करा देते हैं।.अब नए एसपी दुखहरण सिंह (मनीष वात्सल्य) आ जाते हैं, जिनकी कार्यशैली बहुत अलग है. उधर आशा अपने पिता के सामने रोते हुए कबूल करती है कि शेलार के दोनों बेटों व उनके दो दोस्त पिछले 5 वर्षों से उसके साथ बलात्कार करते आए हैं ,पर अब तक वह चुप थी.अब हरीराम पांडे अपनी बेटी आशा को न्याय दिलाने के लिए, डॉक्टर ब्रज दीवान को उनकी बेटी तान्या को न्याय दिलाने के लिए हाथ मिला लेता है .फिर फैजल, बंटी, संजू की हत्याएं होती हैं. एसपी दुखहरण सिंह सच जानकर भी चुप रहते हैं.अंत में तान्या के हाथों रोनी शेलार मारा जाता है. दुखहरण सिंह, डॉक्टर ब्रज दीवान को बेटी तान्या के साथ स्कॉटलैंड वापस जाने के लिए कह देते हैं. खुद एसपी दुखहरण सिंह कहते हैं कि अपराध की जांच करते हुए पुलिस अफसर ऐसे सत्य से परिचित होता है कि उसके लिए कानून और जस्टिस के मायने बदल जाते हैं.

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लेखन व निर्देशन:

बलात्कार जैसे अपराध ,पारिवारिक व सामाजिक रिश्ताें,  राजनीति और पुलिस के गठजोड़, राजनीतिज्ञ के प्रभाव से बदलते अदालती निर्णय के साथ न्याय की लड़ाई को लेकर एक बेहतरीन पटकथा के चलते ‘स्कॉटलैंड’ अंत तक दर्शकों को बांध कर रखती है. निर्देशक मनीष वात्सल्य ने एक विधायक कितना प्रभावशाली हो सकता है, इसका सटीक व सार्थक चित्रण करते हुए इन सफेदपोश अपराधियों पर कुठाराघात करने में सफल रहे हैं.

फिल्म के अंदर विधायक शेलार का एक संवाद है, जब वह डॉक्टर ब्रज दीवान से कहते हैं -“आपको जो कुछ चाहिए बताएं ,मगर यह कुरुक्षेत्र है और इस कुरुक्षेत्र के यह चारों बच्चे सिपाही हैं. तो इन सिपाहियों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है.” यह संवाद अपने आप में देश की सामाजिक व राजनीतिक हालातों पर बहुत कुछ कह देता है.

 अभिनय:

डॉक्टर ब्रज दीवान के किरदार को निभाने वाले अभिनेता आदम सैनी की बतौर अभिनेता पहली फिल्म हैं, मगर वह एक  मंजे हुए कलाकार के रूप में उभरते हैं. वैसे वह अभिनेता बनने से पहले स्कॉटिश  पुलिस फोर्स में काम कर चुके हैं.तान्या के किरदार में खुशबू पुरोहित ने शानदार अभिनय किया है.30 वर्षों से स्वामि भक्ति और बलात्कार पीड़ित अपनी बेटी को न्याय दिलाने की जद्दोजहद और कशमकश के बीच फंसे हरीराम पांडे के किरदार में दया शंकर पांडे ने अपने अभिनय से जान फूंक दी है. मनीष वात्सल्य, कशिश रॉय, राजीव राणा ने ठीक-ठाक अभिनय किया है. चालाक,  काइयां और खुद की स्वच्छ छवि को बरकरार रखने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले राजनेता बलवीर शेलार  को चेतन पंडित ने अपने अभिनय से जीवंतता प्रदान की है.

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एक्ट्रेस शमा सिकंदर ने मनाया अपना 39वां बर्थडे, सोशल मीडिया पर शेयर की हॉट Photos

साल 1999 में आमिर खान (Aamir Khan) के साथ सुपरहिट बॉलीवुड फिल्म ‘मन’ (Mann) से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत करने वाली एक्ट्रेस शमा सिकंदर (Shama Sikander) ने हाल ही में 4 अगस्त को अपना 39वां जन्मदिन सेलिब्रेट किया. आपको बता दें कि एक्ट्रेस शमा सिकंदर इंडस्ट्री की बेहद खूबसूरत और बोल्ड एक्ट्रेसेस में से एक हैं और आए दिन वे सोशल मीडिया पर अपने फैंस के साथ अपनी फोटोज और वीडियोज शेयर करती रहती हैं.

 

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Peaceful Mind, Grateful Heart….

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जैसा कि हमने आपको बताया कि हाल ही में एक्ट्रेस शमा सिकंदर (Shama Sikander) ने अपना 39वां बर्थडे सेलिब्रेट किया तो इस दौरान उन्होनें खूब मस्ती करने के साथ साथ ढ़ेर सारी फोटोज क्लिक की और अपने फैंस के साथ सोशल मीडिया के जरिए शेयर भी की. पार्टी के दौरान उन्होनें व्हाइट कलर की ड्रैस पहनी हुई थी जिसमें वे काफी खूबसूरत दिख रही थीं.

सफेद कपडों में एक्ट्रेस शमा सिकंदर (Shama Sikander) बिल्कुल परी की तरह दिखाई दिख रही हैं. उन्होनें अपनी फोटो के कैप्शन में लिखा कि, “Wiser, sexier, stronger than ever… Here’s to life up until now and to this new year with so much learning adding to life…. #happybirthdaytome. Thank you universe for filling my life with magic, thank you for making me so aware, compassionate and loving, thank you for teaching me gratitude and filling my being with so much love for myself, for everyone around me and for life…Thank you for everything… i am breathing, i am blessed, I AM…”

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Life is Celebration… Let’s Celebrate Every Moment 😇 📸 Photography By :- @shrutitejwaniphotography

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इस कैप्शन के जरिए उन्होनें अपने सभी चाहने वालों का शुक्रिया अदा किया और अपने आप को काफी किस्मत वाला समझा. इस दौरान उन्होनें एक और फोटो शेयर की जिसमें वे एक बॉटल को खोलने की कोशिश कर रही हैं और इस फोटो के कैप्शन में उन्होनें लिखा कि, “Life is Celebration… Let’s Celebrate Every Moment” इस कैप्शन से ये साफ जाहिर होता है कि वे अपनी लाइफ का हर लम्हा खुल कर और एंजौय कर जीना पसंद करती हैं.

 

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Cute sa face mera, killer mera style, waqt b tham jata hai, jab karti hu me smile😃 Kyun☺️😝?

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Bigg Boss 13 फेम असीम रियाज पर किया गुंडों ने हमला, इंस्टाग्राम पर स्टोरी शेयर कर कही ये बात

बिग बॉस सीजन 13 (Bigg Boss 13) के सबसे पौपुलर और सबसे पसंदीदा कंटेस्टेंट्स में से एक असीम रियाज (Asim Riaz) एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं कि असीम रियाज (Asim Riaz) बिग बॉस सीजन 13 के पहले रनर-अप रह चुके हैं. भले ही असीम इस शो के विजेता नहीं रहे हों लेकिन असीम फैंस का भरपूर प्यार और इज्जत कमा कर बाहर निकले थे.

 

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✨✨❤️EID MUBARAK TO ALL..!!!

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बिग बॉस (Bigg Boss) के घर से निकलने के बाद असीम कई म्यूजिक वीडियोज में नजर आ चुके हैं और तो और असीम और हिमांशी खुराना (Himanshi Khurana) की जोड़ी को जितना प्यार बिग बॉस के घर में मिलता था उतना ही दोनों की म्यूजिक वीडियोज को भी मिला है. हाल ही में मिली जानकारी के अनुसार असीम रियाज (Asim Riaz) ईद के मौके पर अपने घरवालों के पास गए हुए थे जिस दौरान एक बेहद ही बुरी खबर सामने आई है.

 

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि असीम रियाज (Asim Riaz) अपनी फिटनेस को लेकर काफी सतर्क रहते हैं और कसरत करने का एक भी मौका नहीं छोड़ते तो इस दौरान जब वे अपने होमटाउन में साइकिल चला रहे थे तो पिछे से मोटरसाइकिल पर कुछ गुंडो ने आकर उनपर हमला कर दिया और उन्हें काफी चोट पहुंचाई.

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“DISTANCE” ✨✨Track is out now guys show some love and support to @iamhimanshikhurana @tseries.official

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असीम रियाज (Asim Riaz) ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर ये बात अपने फैंस को बताई है और यहां तक की उस वीडियो में असीम ने उन गुंडो को कायर भी बोला है क्योंकि उन गुंडो ने असीम पर पीछे से आकर हमला किया है ना कि आगे से. इस दौरान उन्होनें अपने शरीर पर लगे चोट के निशान भी दिखाए हैं जो कि उनके कंधों पर, घुटनों पर और पीठ पर हैं.

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इस दौरान फैंस ने उनके जल्दी ठीक होने की मनोकामना की है और सोशल मीडिया पर लगातार उनका सपोर्ट कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस भाजपा के मध्य “राम दंगल”!

सप्ताह भर से अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन की हवा बह रही है. कांग्रेस भय भीत है, मान रही है यहां प्रोपेगेंडा बन कर यह छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल कांग्रेस की सरकार को उखाड़ डालेगी. शायद इसी वजह से कांग्रेस यहां भाजपा के चरणों में नतमस्तक हो गई है. यहां कांग्रेस की सरकार है जिस की रीति नीति गांधी और नेहरू ने बनाई थी और धर्मनिरपेक्षता को सर्वोपरि बताया था. मगर भाजपा ने जिस तरीके से राम को अपने एजेंडे में लाकर राजनीति के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई है कांग्रेस पार्टी दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ तक मानो कांप गई है. शायद यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने भाजपा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. और सत्ता और संगठन राम राम जप रहे हैं. आज 5 अगस्त को छत्तीसगढ़ के कोने कोने में मानो भाजपा और कांग्रेस में एक द्वंद्व, कुश्ती चल रहा है एक तरफ भाजपा ताल ठोक रही है कह रही है राम हमारे हैं! देखो कैसे अयोध्या में हम राम मंदिर शिलान्यास का विराट स्वप्न साकार करने का काम कर रहे हैं… मोदी जी चल पड़े हैं भूमि पूजन करने. तो दूसरी तरफ कांग्रेस बौखलाई हुई घूम घूम कर यह कह रही है की छत्तीसगढ़ तो राम का ननिहाल है आओ! राम की पूजा करें. दीप दान करें आरती उतारें, घर-घर में दिए जलाएं. कुल मिलाकर वही सब जो भाजपा कह रही है.

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कुल मिलाकर के वोटों की जो गंदी राजनीति है उसे काग्रेस ने हवा दे दी है. कांग्रेस यह समझ कर चल रही है कि अयोध्या में राम मंदिर बनने के साथ कांग्रेस का अस्तित्व खत्म हो जाएगा. उसके सारे वोट भाजपा में चले जाएंगे वह तो खत्म हो जाएगी. इस भयभीत मनोविज्ञान के कारण कांग्रेस थर थर कांप रही है. इसलिए शुतुरमुर्ग बन कर अपना अस्तित्व बचाने के लिए राम नाम जप रही है. शायद कांग्रेस यह महसूस नहीं कर रही है कि वह वही कर रही है जो भाजपा की राजनीति है. जो भाजपा कर रही है भाजपा ने जो गंदी राजनीति का रायता बिखेरा है उसमें कांग्रेस खुद नृत्य कर रही है. अगर कांग्रेस में थोड़ी भी दिवालियेपन की कमी होती समझदारी होती तो वह ऐसी हरकत कभी नहीं करती. क्योंकि देश का आम आदमी हो या प्रबुद्ध वर्ग यह जानता है कि भाजपा का राम मंदिर निर्माण का ढकोसला किस तरह अपनी कमियों को छुपाने के लिए हथियार बन चुका है.

भूपेश बघेल का आत्मसमर्पण

यह सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार अच्छे खासे बहुमत में है.विगत चुनाव में भाजपा की जो बुरी गत बनी थी उसे भाजपा कभी भूल नहीं सकती. और कांग्रेस को जो विशाल बहुमत मिला था वैसा जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता. इस सब के बावजूद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस भाजपा से इस तरह भयभीत है मानो भाजपा बिल्ली है, तो कांग्रेस चूहा बन गई है. इसका कारण हो सकता है केंद्रीय नेतृत्व का आदेश हो कि भाजपा को रोकना है तो राम राम जपो. इसलिए छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी संगठन और सत्ता दोनों मिलकर अयोध्या में चली राम की आंधी तूफान से त्रस्त होकर राम राम जप रहे हैं. मगर इसका संदेश तो यही जाता है कि कांग्रेस पार्टी के पास न तो कुछ सोच विचार है, न ही समझदारी का पैमाना. कांग्रेस को इतनी भी समझ नहीं है कि भाजपा एक हिंदुत्ववादी पार्टी रही है जिसका शुरू से ऐजेंडा राम रहा है. ऐसे में उसका तो काम ही राम राम जपना है. मगर इस राम नाम के पीछे उसकी राजनीति को जनता जानती है एक राजनीतिक पार्टी होने के कारण कांग्रेस का कर्तव्य है कि उस सच को लोगों तक बताएं और पहुंचाएं. इस विचारधारा को आगे बढ़ाए. मगर यह क्या बात हुई कि आप खुद ही राम-राम जपने लगे. कांग्रेस   का अपनी पूरी ताकत के साथ देश की जनता को यह बताना परम कर्तव्य था कि भाजपा का राम किस तरह उग्र हिंदुत्ववाद का प्रतीक है. जबकि कांग्रेस गांधी के राम की अनुयाई है.

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ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा ने जो जाल फेंका था उसमें कांग्रेसी अपने आप फंसती चली गई है. एक तरह से भाजपा को संपूर्ण देश का कर्ता-धर्ता मान लिया है नेतृत्व सौंप दिया है. कांग्रेस को यह मानना और समझना होगा कि बिना रीढ़ के आप खड़े नहीं हो सकते. आपको अपनी विचारधारा और सोच के साथ जनता के बीच वोट मांगने जाना है कांग्रेस पार्टी की रीति नीति इस घटना से जगजाहिर हो जाती है कि उसका एक विधायक संसदीय सचिव राजधानी रायपुर में अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन के पुर्व 4 अगस्त को  एक लाख दीये निशुल्क बांटता है और भाजपा को लक्ष्य करके भगवान राम  के गुण गाता  है.

रामवन मार्ग का सौंदर्य!

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार को डेढ़ वर्ष हो गए सत्ता में आए. भाजपा को बुरी तरह धूल चटाने के बाद कांग्रेस सत्ता में आई है 15 वर्ष पश्चात. मगर कांग्रेस की समझ और सोच देखिए!  करोड़ो रुपए का एक प्लान  राम वन गमन के सौंदर्यीकरण व विकास को समर्पित कर दिया गया है. सरकार ने 75 जगह ऐसी चिन्हित की हैं जहां राम आए थे. इन जगहों को कांग्रेस सरकार विकसित करके यह बताना चाहती है कि भैया! हम ही राम के असल भक्त हैं.

सबसे विचित्र बात यह है कि जब अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी राम के भव्य मंदिर का भूमि पूजन कर रहे हैं तो छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल सरकार राम राम जप रही है. और गली-गली में उसके नेता कार्यकर्ता पदाधिकारी घूम घूम कर या प्रचारित कर रहे हैं जय श्रीराम जय श्रीराम! कोई दिया बांट रहा है कोई राम जी की फोटो के आगे आरती उतार रहा है और विज्ञप्ति वितरण कर के सारे मीडिया के माध्यम से यह प्रचारित किया जा रहा है कि देखो! हम भी कम नहीं हैं. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल यह कहते नहीं अघा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ तो भगवान राम का ननिहाल है हम यहां कौशल्या माता के मंदिर का विकास करने जा रहे हैं हम यह करने जा रहे हैं वह करने जा रहे हैं! अब यह भाजपा और कांग्रेस का “राम दंगल” कहां किस मोड़ तक पहुंचेगा इससे लोगों को क्या लाभ होगा यह तो आने वाला समय  बताएगा.

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मगर विकास की जो गति एक नई सरकार के आने के बाद दिखाई देनी चाहिए वह छत्तीसगढ़ में नदारद है. और ऐसा प्रतीत होता है कोरोना वायरस महामारी अपने चरम की ओर बढ़ रही है. जनता आने वाले समय में त्राहि-त्राहि करने वाली है.

श्यामली की करतूत

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