कामुक तांत्रिक…

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की रहने वाली तबस्सुम बेहद खूबसूरत थी. उस की शादी शहर के ही रहने वाले नफीस अहमद से  हुई थी. नफीस का अपना कारोबार था जिस से उसे अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. नफीस से निकाह कर के तबस्सुम खुश थी. उसे नफीस अपने सपनों के राजकुमार की तरह ही मिला था. नफीस भी तबस्सुम को बहुत प्यार करता था. तबस्सुम के व्यवहार की वजह से उस के सासससुर भी उसे बहुत चाहते थे. धीरेधीरे उन्होंने भी घर की बागडोर बहू तबस्सुम को सौंप दी थी. इस तरह हंसीखुशी के साथ उस का समय बीत रहा था. हर सासससुर की तरह तबस्सुम के सासससुर भी यही चाहते थे कि उन की बहू जल्द मां बन जाए और यदि पहली बार  में ही बेटे का जन्म हो जाए तो बात ही कुछ और होगी. फिर वह अपने पोते के साथ ही लगे रहेंगे. पर शादी को डेढ़दो साल  हो गए, लेकिन वह मां नहीं बनी. धीरेधीरे 4 साल बीत गए लेकिन तबस्सुम गर्भवती नहीं हुई. इस के बाद तो सासससुर ही नहीं बल्कि खुद तबस्सुम और नफीस भी परेशान रहने लगे. नफीस पत्नी को ले कर डाक्टर के पास गया. दोनों की कई तरह की जांच कराई गईं, जो सामान्य आईं. डाक्टर भी हैरान था कि सब कुछ सामान्य होने के  बावजूद भी आखिर तबस्सुम को गर्भ क्यों नहीं ठहर रहा. फिर भी डाक्टर ने अपने हिसाब से उन दोनों का इलाज किया. इस के बावजूद भी तबस्सुम की कोख सूनी रही. इस से तबस्सुम बहुत चिंतित रहने लगी. परेशान हाल इंसान को समाज में तमाम सलाहकार फ्री में मिल जाते हैं. लोग नफीस और तबस्सुम को भी तरहतरह की सलाह देने लगे. और वह सलाह भी उदाहरण के साथ देते थे कि फलां औरत वहां गई थी या उस डाक्टर, हकीम से इलाज कराया तो वह मां बन गई. अपने मन में उम्मीद ले कर तबस्सुम भी लोगों की सलाह के अनुसार कई डाक्टरों, हकीमों के पास गई. तमाम धार्मिक स्थलों पर जा कर उस ने माथा टेका लेकिन उस की इच्छा पूरी नहीं हुई.

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इस तरह शादी के 7 साल बाद भी तबस्सुम की कोख नहीं भरी तो मोहल्ले के लोग ही नहीं, बल्कि सासससुर भी उसे बांझ समझने लगे. जो सास उसे सरआंखों पर बिठाए रहती थी वह ही उसे ताने देने लगी.
बातबात पर वह उसे बांझ कहती. अब तबस्सुम की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. हां, नफीस उसे समझाने की कोशिश करता था. केवल उस का पति ही था, जो हमेशा उस की हिम्मत बढ़ाता था.
तबस्सुम को जिस घर की जिम्मेदारी दी गई थी, सास के तानों ने उस का उसी घर में रहना दूभर कर दिया था. उस के जीवन में शांति तो जैसे कोसों दूर चली गई थी, इसलिए उस घर में रहना उसे अब अच्छा नहीं लगता था. अब वह उस घर के बजाए कहीं और रहना चाहती थी. इस बारे में उस ने पति से बात की तो नफीस ने उस का साथ दिया और वह अपना घर छोड़ कर शहर की ही एडवोकेट कालोनी में किराए पर एक मकान में रहने लगा.नफीस जिस कालोनी में रहता था, वह मकान शफीउल्लाह नाम के एक तांत्रिक का था. उस ने शहर के ही चंदननगर के एक मकान में अपना औफिस बना रखा था. वह यह धंधा कर के मोटी रकम कमा रहा था.
किराए के मकान में रहने पर तबस्सुम को एक सुकून यह मिल रहा था कि उसे यहां ताने देने वाला कोई नहीं था. इस तरह वह वहां रह कर शांति महसूस कर रही थी. इस मकान में आए हुए तबस्सुम को करीब 20-22 दिन ही हुए थे कि एक दिन दोपहर के समय में जब वह कमरे में अकेली थी तभी मकान मालिक तांत्रिक शफीउल्लाह उस के कमरे में आया और उस का हालचाल पूछने लगा.

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औपचारिकतावश तबस्सुम ने उसे चाय बना कर पिलाई. इसी दौरान शफी ने उस से कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम संतान न
होने की वजह से परेशान हो. लेकिन अब चिंता मत करो. ऊपर वाले ने तुम्हारी गोद भरने के लिए ही तुम्हें मेरे यहां किराएदार बना कर भेजा है.’’तबस्सुम की कुछ समझ में नहीं आया तो शफी ने उसे बताया कि वह तंत्रमंत्र का बड़ा जानकार है. तंत्रमंत्र से संतानहीन महिला की गोद भरने में उसे महारथ हासिल है. न मालूम कितनी महिलाएं उस से यह लाभ ले चुकी हैं. जिस के चलते लोग उसे गोद स्पेशलिस्ट बाबा भी कहते हैं. तुम चिंता मत करो जल्द ही वक्त आने पर वह अपनी तांत्रिक शक्ति से उस की गोद भर देगा. साथ ही उस ने यह भी सलाह दी कि वह इस बारे में अपने पति से कोई बात नहीं करे. शफी की बात सुन कर तबस्सुम खुश हो गई. उसे लगा कि सचमुच अब उस का सपना सच हो जाएगा. उस दिन के बाद शफी उसे अकसर अपने एक कमरे में उस के पति की गैरमौजूदगी में पूजा के लिए बुलाने लगा. चूंकि पूजा के बारे में पति को कुछ भी बताने से तांत्रिक शफी ने उसे मना कर रखा था इसलिए यह सारे काम तबस्सुम अपने शौहर से छिपा कर कर रही थी.
शुरुआती दौर में तो शफी पूजा के दौरान पूरी शराफत दिखाता था लेकिन बाद में धीरेधीरे वह उसे कभीकभार छूने भी लगा. तबस्सुम को छूने का उस का लगातार क्रम बढ़ता गया. कभीकभार वह पूजा के नाम पर उस के वक्षस्थल पर भी हाथ रख देता था. तबस्सुम को यह अजीब सा लगा. उसे तांत्रिक शफी की नीयत पर शक होने लगा. इसलिए वह उस की पूजा में अरुचि दिखाने लगी. इस से शफीउल्लाह को इस बात का अंदाजा होने लगा कि यह उस से दूरी बनाने लगी है. चिडि़या कहीं पिंजरे से उड़ न जाए, यह सोच कर शफी ने भी वक्त जाया करना उचित नहीं समझा.

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19 सितंबर, 2018 को शफी को इस का मौका भी मिल गया. एक रात तबस्सुम का पति नफीस इंदौर से बाहर गया था. यह देख कर शफी ने उसे रात में पूजा करने को बुलाया. तबस्सुम का मन तो नहीं हुआ लेकिन जब शफी ने उसे पूजा को अधूरा बीच में छोड़ देने के नुकसान बता कर डराया तो वह उस रोज तांत्रिक के कहने पर आधी रात में नहाने के बाद खुले गीले बाल ले कर उस के कमरे में चली गई. पूजा करते
समय शफीउल्लाह ने उसे पीने के लिए जन्नती जल के नाम पर पीला सा पानी दिया, जिसे पी कर तबस्सुम को चक्कर सा आने लगा. इस के बाद पूजा करने के नाम पर शफी काफी देर तक उस के शरीर से छेड़छाड़ करता रहा, फिर उस ने उसे जमीन पर लिटा दिया और खुद भी उस के ऊपर लेट गया. तबस्सुम पर बेहोशी सी छाई हुई थी. उस समय वह उस का विरोध करने
की हालत में नहीं थी. शफी ने उस के साथ बलात्कार किया.
इस के बाद तबस्सुम को होश आया तो उस ने शफी को खरीखोटी सुनाई. उस के तेवर देख शफी ने कहा कि यह सब उस ने उस की भलाई के लिए ही किया है. अब पूजा पूरी हो गई है. वह अपने पति के साथ पहली बार सोते ही गर्भधारण कर लेगी. शफी ने उसे धमकाया कि इस बारे में यदि उस ने किसी को बताया तो वह अपनी व पति की जान खो देगी. तबस्सुम जान गई थी कि यह पूरा नाटक शफी ने उसे हासिल करने के लिए किया था. उसे खुद से नफरत हो रही थी, इसलिए उस ने कमरे पर पहुंचने के बाद अगले दिन गले में फंदा डाल कर आत्महत्या करने की कोशिश की. लेकिन अचानक पति के आ जाने के बाद वह ऐसा नहीं कर सकी.
पति ने उसे बचा लिया. फिर तबस्सुम ने पति को सारी कहानी बता दी. नफीस ने उसी दिन तांत्रिक का कमरा खाली कर दिया. चूंकि तांत्रिक शफीउल्लाह ने तबस्सुम को डरा दिया था इसलिए उस के पति की भी तांत्रिक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की हिम्मत नहीं हुई. इस वाकये को हुए करीब 3 सप्ताह गुजर गए. तभी तबस्सुम के दिमाग में आया कि तांत्रिक के खिलाफ पुलिस से शिकायत जरूर करनी चाहिए वरना वह किसी और को अपना शिकार बनाएगा.

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इस के बाद वह 9 अक्तूबर, 2018 को पति को साथ ले कर खजराना थाने पहुंच गई. टीआई कमलेश शर्मा को तबस्सुम ने सारी बात विस्तार से बता दी. उस की शिकायत पर पुलिस ने तांत्रिक शफीउल्लाह के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने शफीउल्लाह के घर दबिश डाली लेकिन वह घर पर नहीं मिला. वह फरार हो चुका था. तब पुलिस ने उस के पीछे मुखबिर लगा दिए.
10 अक्तूबर, 2018 को टीआई कमलेश शर्मा को मुखबिर द्वारा तांत्रिक के बारे में सूचना मिली. सूचना के बाद टीआई कमलेश शर्मा पुलिस टीम के साथ चंदननगर में स्थित एक मकान के पास पहुंचे.
उस समय रात हो चुकी थी. घर से लोभान के सुलगने की महक आ रही थी. टीआई ने उस मकान का दरवाजा खटखटाया तो कुछ देर बाद एक 26-27 साल की बेहद खूबसूरत युवती ने दरवाजा खोला. उस वक्त रात के 10 बजे थे. उस युवती के लंबे खुले बालों से टपकती पानी की बूंदों को देख कर लग रहा था कि वह अभीअभी नहा कर निकली है. इतनी रात को उस के नहाने की बात आसानी से टीआई शर्मा के गले नहीं उतर रही थी. परंतु टीआई कमलेश शर्मा का टारगेट वह युवती नहीं बल्कि शफीउल्लाह था. उन्होंने उस युवती से शफीउल्लाह के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि बाबा अभी पूजा पर बैठ चुके हैं.

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यह सुन कर टीआई ने कहा कि बाबा की पूजा हम थाने में करवा देंगे. फिर वह कमरे में घुस गए. पूजा का ढोंग कर रहे तांत्रिक शफीउल्लाह को उन्होंने गिरफ्तार कर लिया और इस की सूचना डीआईजी हरिनारायण चारी को दे दी. उन के निर्देश पर उन्होंने तांत्रिक के खिलाफ काररवाई शुरू की. टीआई कमलेश शर्मा ने थाने ले जा कर शफीउल्लाह से पूछताछ की तो पहले तो वह खुद को नेक बंदा साबित करने पर
तुला रहा. लेकिन पुलिस ने सख्ती की तो उस ने तंत्रमंत्र के नाम पर तबस्सुम को धोखे में रख कर उस के साथ बलात्कार करने की बात स्वीकार कर ली.उस ने बताया कि वह आज फिर यही काम एक दूसरी महिला के साथ करने वाला था. वह अपने मकसद में सफल हो पाता उस से पहले वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया.
तथाकथित तांत्रिक शफीउल्लाह से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने शफीउल्लाह का मैडिकल करवा कर उसे अदालत में पेश किया जहां से उसे जेल भेज दिया गया. द्य
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कथा में तबस्सुम और नफीस अहमद परिवर्तित नाम हैं.

हिस्ट्रीशीटर डौक्टर…

कन्या हो तो उसे कोख में ही मार दिया जाए. डा. इम्तियाज और उस के साथी यही सब कर रहे थे. लेकिन अब…
आमतौर पर आप ने कुख्यात अपराधियों के हिस्ट्रीशीटर होने की बात सुनी और पढ़ी
होगी. पुलिस और कानून की भाषा में हिस्ट्रीशीटर वे होते हैं, जो बारबार अपराध कर आम जनता के लिए खतरा बन जाते हैं. ऐसे अपराधी की उस के रिहायशी इलाके वाले पुलिस थाने में हिस्ट्रीशीट खोल दी जाती है. इस में उस शख्स के अपराधों का पूरा ब्यौरा होता है.  शांति व्यवस्था कायम करनी हो या चुनाव वगैरह शांति से निपटाने हों, तो सब से पहले उस इलाके की पुलिस हिस्ट्रीशीटर को पाबंद करती है. यहां तक कोई भी बड़ा अपराध होने पर सब से पहले हिस्ट्रीशीटर को ही तलब कर पूछताछ की जाती है, ताकि अपराधियों तक पहुंचा जा सके. हिस्ट्रीशीटर को संबंधित पुलिस थाने में निश्चित समयावधि में हाजिरी भी देनी होती है.
लेकिन कोई अच्छा भला डाक्टर भी हिस्ट्रीशीटर हो सकता है, यह बात कल्पना से परे है. कोई कल्पना या यकीन करे न करे पर इस कहानी का अहम किरदार डा. इम्तियाज अली रंगरेज संभवत: देश का पहला हिस्ट्रीशीटर डाक्टर है. इस डाक्टर पर आरोप है कि उस ने हजारों बेटियों को महिलाओं को कोख में ही मार डाला है.
राजस्थान के जोधपुर के रहने वाले डा. इम्तियाज ने सन 2004 में एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी. इस के बाद वह राजस्थान में सरकारी अस्पताल में नौकरी करने लगा. नौकरी करते हुए 2 साल में वह 4 बार भ्रूण परीक्षण करते हुए पकड़ा गया.

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सब से पहले डा. इम्तियाज को राज्य की पीसीपीएनडीटी टीम ने 7 अक्तूबर, 2016 को जोधुपर के शंकर नगर में एक महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण का लिंग परीक्षण करते हुए गिरफ्तार किया था. उस के साथ एम्स जोधपुर का रेडियोलोजिस्ट भी पकड़ा गया था. दबिश देने के दौरान दोनों आरोपियों ने सोनोग्राफी मशीन पहली मंजिल से नीचे फेंक दी थी. बाद में यह मशीन जब्त कर ली गई. डा.
इम्तियाज के बारे में जानकारी मिलने पर पीसीपीएनडीटी टीम ने बाड़मेर की एक गर्भवती महिला को फर्जी ग्राहक बना कर डा. इम्तियाज के पास भेजा था. डा. इम्तियाज ने उस महिला से भ्रूण लिंग परीक्षण के लिए 23 हजार रुपए लिए थे.
इन में 18 हजार डा. के और 5 हजार रुपए रेडियोलौजिस्ट के थे. टीम ने यह रकम बरामद कर ली थी. जांच में सामने आया कि डा. इम्तियाज बेटी नहीं चाहने वाली महिलाओं का गर्भपात कराता था. गर्भपात बालेसर के सरकारी अस्पताल में कराया जाता था.
उस समय डा. इम्तियाज बालेसर में ब्लौक मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर कार्यरत था. यह उस की चौथी पोस्टिंग थी. इस मामले में डा. इम्तियाज को जेल भेज दिया गया था. लेकिन जल्दी ही वह जमानत पर बाहर आ गया.
इस के बाद वह 21 मई, 2017 को जोधपुर में निजी अस्पताल के संचालक हनुमान ज्याणी के घर पर भ्रूण परीक्षण करते हुए पकड़ा गया. हनुमान ज्याणी इस से पहले ही पकड़ा जा चुका था
डा. इम्तियाज तीसरी बार 5 जनवरी, 2018 को उस समय पकड़ा गया, जब उस के दलालों ने एक गर्भवती महिला को भ्रूण परीक्षण के लिए पहले झुंझुनूं, फिर सीकर इस के बाद नागौर और बाद में जोधपुर बुलाया. जोधपुर में वह चलती गाड़ी में भ्रूण परीक्षण करते हुए पकड़ा गया. उस से जबत की गई पोर्टेबल सोनोग्राफी मशीन नेपाल से खरीद कर लाई गई थी.
झुंझुनूं के कलेक्टर के सहयोग से पीसीपीएनडीटी (प्री कंसेप्शन ऐंड प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स ऐक्ट) के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रघुवीर सिंह के नेतृत्व में की गई इस काररवाई में हनुमान ज्याणी और एक दलाल भाग निकले. उस समय डा. इम्तियाज ने पूछताछ में पीसीपीएनडीटी की टीम को बताया कि विभिन्न जिलों में उस के 50 से अधिक दलाल हैं. इन दलालों के माध्यम से वह अब तक 5 हजार से ज्यादा भ्रूण परीक्षण कर चुका है.

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चौथी बार वह 9 सितंबर, 2018 को जोधपुर में ही महामंदिर स्थित एक मकान में गर्भवती महिला का भ्रूण परीक्षण करते हुए पकड़ा गया. राज्य पीसीपीएनडीटी ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शिल्पा चौधरी के निर्देशन में की गई इस काररवाई में संविदा पर कार्यरत लैब तकनीशियन फतेह किशन शर्मा को भी गिरफ्तार किया.
इस दौरान एक अवैध पोर्टेबल सोनोग्राफी मशीन भी बरामद की गई. काररवाई के दौरान डा. इम्तियाज का साथी जोधपुर के निजी हौस्पिटल का संचालक हनुमान ज्याणी फरार हो गया.
डा. इम्तियाज ने भ्रूण परीक्षण और बेटियों को कोख में मारने का गैरकानूनी काम अपने पिता डा. मोहम्मद नियाज से सीखा. डा. इम्तियाज के पिता नियाज रंगरेज भी डाक्टर हैं. उन का नागौर जिले के मकरना शहर में निजी अस्पताल है. करीब 72 साल के डा. नियाज भी सन 2012, 2014 और 2016 में लिंग परीक्षण करते हुए पकड़े जा चुके हैं.
पीसीपीएनडीटी की टीम ने अगस्त 2016 में नागौर जिले के मकराना शहर में डा. नियाज और नर्स रोजा को भ्रूण लिंग जांच करते हुए रंगेहाथ पकड़ा था. उस समय डा. नियाज ने टीम के एक सदस्य को काट भी लिया था. इस संबंध में स्थानीय पुलिस थाने में अलग से मामला दर्ज कराया गया.
भ्रूण परीक्षण के लिए नर्स रोजा के माध्यम से बोगस गर्भवती महिला ने 30 हजार रुपए में सौदा तय किया था. डा. नियाज ने महिला के गर्भ की जांच कर लड़की बताई थी. इस पर गर्भवती की सहयोगी महिला ने कहा कि हमें लड़की नहीं चाहिए, तो डा. नियाज ने 7 माह की गर्भवती महिला से इस काम के लिए 30 हजार रुपए और मांगे थे.
इस से पहले डा. नियाज को जब भ्रूण परीक्षण करते हुए पकड़ा गया था, तो उन की सोनोग्राफी मशीनें सील कर दी गई थीं. लेकिन उस ने सील मशीनों को विशेषज्ञ की मदद से जोड़ लिया था और फिर गैरकानूनी तरीके से लिंग परीक्षण का काम शुरू कर दिया था.
कहा जाता है कि डा. इम्तियाज ने सरकारी नौकरी में आने से कई साल पहले ही लिंग परीक्षण का अवैध काम शुरू कर दिया था. 2008 से वह पेशेवर के रूप में यह अवैध काम करने लगा था.
डाक्टर पिता और पुत्र भ्रूण परीक्षण कर गर्भपात करने का पैकेज लेने के लिए कुख्यात थे. ये किसी महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण का लिंग परीक्षण करने के लिए 25 से 35 हजार रुपए लेते थे. बाद में इतनी ही राशि गर्भपात के लिए वसूलते थे.

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लिंग परीक्षण करते हुए पकड़े जाने के बाद डा. इम्तियाज को जेल भी भेजा गया, लेकिन जमानत पर जेल से बाहर आ कर वह फिर इसी घिनौने धंधे में लग जाता था. सरकारी नौकरी में रहते हुए 2016 में डा. इम्तियाज गैरकानूनी रूप से भ्रूण परीक्षण के मामले में लिप्त पाया गया तो उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया था.
राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने उसे निलंबित कर दिया था. तब से वह निलंबित चल रहा है. इस के बाद भी वह 3 बार लिंग परीक्षण करते हुए पकड़ा गया, लेकिन सरकार ने उसे नौकरी से बर्खास्त नहीं किया. डा. इम्तियाज के पास अभी तक डाक्टरी का तमगा है. विशेषज्ञों का कहना है कि डाक्टरी की डिग्री छीने जाने के संबंध में स्पष्ट प्रावधान है कि अदालत से सजा होने के बाद ही मेडिकल कौंसिल औफ इंडिया की ओर से डिग्री छीनी जाती है.
सीनियर आईपीएस औफिसर डा. अमनदीप सिंह कपूर की पहल पर डा. इम्तियाज को हिस्ट्रीशीटर घोषित किया गया. डा. कपूर जोधपुर में पुलिस उपायुक्त (पूर्व) के पद पर तैनात हैं. डीसीपी अमनदीप कपूर के पास भी एमबीबीएस की डिग्री है.
अमनदीप कपूर को पता चला कि डा. इम्तियाज लिंग जांच कर के अवैध रूप से गर्भपात करवाने जैसे घिनौने काम में लगा है. वह 4 बार गिरफ्तार हो चुका है. उस के खिलाफ अदालत में कई मामले विचाराधीन हैं, फिर भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है.
डा. इम्तियाज की आपराधिक गतिविधियों पर नियंत्रण और आमजन की सुरक्षा के लिए डीसीपी डा. कपूर ने उस की हिस्ट्रीशीट खोलने के निर्देश दिए. इस के बाद दिसंबर 2018 में पुलिस ने 41 साल के डा. इम्तियाज को जोधपुर शहर के नागौरी गेट थाने का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया.
कहा जाता है कि डा. इम्तियाज के पिता डा. नियाज का मकराना में अस्पताल और जोधपुर सहित कई शहरों में जमीनें व मकान हैं. दोनों पितापुत्र की चलअचल संपत्ति करीब सौ करोड़ रुपए की बताई जाती है. यह सारी संपत्ति अवैध तरीके से एकत्र करने का अनुमान है.

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लिंग परीक्षण करने और बेटियों को कोख में मारने वाले डा. इम्तियाज के मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान ले कर राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव, राजस्थान मेडिकल काउंसिल और जोधपुर के पुलिस कमिश्नर से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है.
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश टाटिया ने चिकित्सा विभाग से पूछा है कि सरकारी सेवारत डाक्टरों के खिलाफ दर्ज प्रत्येक विभागीय काररवाई का विवरण और उस से संबंधित प्रगति रिपोर्ट आयोग के सामने पेश करें.
राजस्थान मेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार को कहा गया है कि इन डाक्टरों के विरुद्ध कोई प्रकरण शिकायत या स्वत: संज्ञान से कोई प्रकरण दर्ज किया गया या नहीं. अगर प्रकरण दर्ज किए गए हैं तो उन में की गई काररवाई की जानकारी दें और अगर प्रकरण दर्ज नहीं किए तो उस के कारण बताएं.
जस्टिस टाटिया ने जोधपुर पुलिस कमिश्नर से डा. इम्तियाज और उस के पिता डा. नियाज रंगरेज के खिलाफ दर्ज सभी फौजदारी प्रकरणों की एफआईआर की प्रतिलिपियां, हिस्ट्रीशीट खोले जाने के लिए पेश किए गए प्रार्थनापत्र और उन पर जारी आदेशों की प्रतिलिपियां मांगी हैं. इस के अलावा किनकिन प्रकरणों में जांच पूरी कर के अदालत में नतीजा पेश किया गया, उस से संबंधित जानकारी भी देने को कहा गया है.
पीसीपीएनडीटी टीम को अंतरराज्यीय लिंग जांच गिरोह के सरगना रवि सिंह को नवंबर, 2018 में पता चला था. झुंझुनू सहित कई जगह की गई काररवाई में इस घिनौने काम में उस की लिप्तता पाई गई थी. रवि सिंह ने शेखावटी अंचल के अलावा राजस्थान के करीब 20 जिलों में जगहजगह दलाल नियुक्त कर रखे थे. रवि की पत्नी सुनीता सिंह भी लिंग जांच के काम से जुड़ी है.

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झुंझुनूं के सिंघाना कस्बे का रहने वाला रवि सिंह पीसीपीएनडीटी के मामलों में 3 बार पहले भी पकड़ा जा चुका था. वह भी जमानत पर छूटने के बाद फिर से इसी काम में लग जाता था.
उस ने अपने एक दर्जन से ज्यादा सहयोगियों को अवैध पोर्टेबल सोनोग्राफी मशीन से भ्रूण लिंग जांच करने का काम भी सिखा दिया था. वह राजस्थान के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब के कुछ जिलों में निर्धारित स्थान पर जा कर भ्रूण लिंग परीक्षण भी करता था.
14 अगस्त, 2018 की देर रात झुंझनूं के सोलाना गांव में भ्रूण लिंग परीक्षण के दौरान पीसीपीएनडी टीम ने रवि के 2 सहयोगियों को पकड़ लिया था, लेकिन रवि सिंह अंधेरे का लाभ उठा कर भाग निकला था. बाद में रवि सिंह ने अपने रिश्तेदारों व सहयोगियों के माध्यम से मुखबिर से संपर्क कर उसे लालच भी दिया था, लेकिन वह इस में कामयाब नहीं हो सका था.
चौथी बार पकडे़ जाने पर रवि सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि शेखावटी इलाके में अवैध सोनाग्राफी मशीनों से लिंग जांच करने वाले अधिकतर लोग उस के शागिर्द हैं. उन्हें मशीनें भी रवि ने ही दिलवाई थीं.
उसे इस का एक फायदा यह हुआ कि उसे लिंग जांच के लिए कहीं भी मशीन ले कर नहीं जाना पड़ता था. जिस इलाके की गर्भवती महिला जांच करवाना चाहती, रवि सिंह उसी क्षेत्र के अपने शार्गिद की मशीन से जांच कर देता था.
रवि सिंह ने लिंग परीक्षण का काम दिल्ली के एक डाक्टर से सीखा था. इस के बाद उस ने खुद की मशीन ला कर अवधेश पांडे के साथ यह काम शुरू किया. अवधेश पांडे लिंग जांच के मामले में 3 बार पकड़ा जा चुका है.
बाद में रवि सिंह ने पांडे से अलग हो कर नया नेटवर्क तैयार किया. रवि के नेटवर्क में सरकारी नर्सों सहित 100 से ज्यादा लोग हैं.
पीसीपीएनडीटी टीम ने रिमांड अवधि पूरी होने पर जब उसे जेल ले कर गई तो उस ने कहा कि वह एक-डेढ़ महीने से ज्यादा यहां नहीं रुकेगा, क्योंकि जल्दी ही उस की जमानत हो जाएगी.
राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग की पीसीपीएनडीटी टीम ने दिसंबर 2018 के पहले सप्ताह में पंजाब के मलोट शहर से एक सरकारी महिला नर्स सहित 3 महिलाओं को गिरफ्तार किया. इस मामले में भ्रूण लिंग जांच के लिए श्रीगंगानगर की रहने वाली सरकारी नर्स ने 80 हजार रुपए लिए थे.
श्रीगंगानगर में एक महिला दलाल इन के साथ और जुड़ गई. नर्स व महिला दलाल उस गर्भवती को गंगानगर में घुमाने के बाद ट्रेन से पंजाब के मलोट शहर ले गईं. वहां तीसरी महिला दलाल मिली. वे गर्भवती महिला को पंजाब के फिरोजपुर जिले में ले गई, जहां सोनोग्राफी कर लड़की बताई गई.
बाद में गर्भवती के साथ महिला दलाल वापस मलोट पहुंची तो पीसीपीएनडीटी टीम ने तीनों को पकड़ लिया. राजस्थान पीसीपीएनडीटी की पंजाब में यह आठवीं डिकौय काररवाई थी.
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में 8 मार्च, 2018 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राजस्थान की पीसीपीएनडीटी टीम ने मुन्नीदेवी अल्ट्रासाउंड पर काररवाई कर एक महिला सहित 2 लोगों को गिरफ्तार किया था. इन से एक सोनोग्राफी मशीन भी जब्त की गई थी. इस दौरान सोनोलोजिस्ट भाग गया था.
पीसीपीएनडीटी टीम की काररवाई में ऐसे मामले भी सामने आए, जिन में पता चला कि लिंग जांच परीक्षण के नाम पर गर्भवती महिलाओं को फर्जी मशीनों से जांच कर बेवकूफ भी बनाया जाता है. ऐसा ही एक मामला अक्तूबर 2018 में जयपुर जिले के चौमूं में ओम डेंटल क्लीनिक का सामने आया.

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पीसीपीएनडीटी की टीम ने सूचना पर कथित दंत चिकित्सक मोहनलाल जाट से बात की, तो उस ने लिंग परीक्षण के 30 हजार रुपए मांगे. उस ने गर्भवती को एक जगह बुलाया. कार से मोहनलाल जाट एक दलाल के साथ पहुंचा और गर्भवती को चौमूं में ओम डेंटल क्लीनिक पर ले गया.
वहां मोहनलाल ने गर्भवती को डेंटल चेयर पर लिटा कर मसाला सुखाने वाली मशीन से लिंग परीक्षण का नाटक किया और भ्रूण की जानकारी दे दी. बाद में मोहनलाल और दलाल ओमप्रकाश को गिरफ्तार कर रकम जब्त कर ली गई.
जनवरी 2018 में राजस्थान की पीसीपीएनडीटी टीम ने उत्तर प्रदेश के आगरा में काररवाई कर मैक्स डायग्नोस्टिक एंड पैथोलौजी सेंटर पर फर्जी तरीके से भ्रूण लिंग परीक्षण करने के मामले में सेंटर संचालक अजय उपाध्याय और उस की सहयोगी महिला प्रीति कुलश्रेष्ठ को गिरफ्तार किया.
इन से 2 फीटल डौपलर व एक कंप्यूटर मौनिटर सहित 20 हजार रुपए की रकम बरामद की गई. इस सेंटर पर बच्चों की हृदय की धड़कन की जांच में काम आने वाले फीटल डौपलर से फर्जी तरीके से गर्भवती महिला की जांच की गई और भ्रूण के लिंग की झूठी जानकारी दी गई.
मोबाइल फोन में एक तार लगातार फर्जी तरीके से लिंग परीक्षण करने के मामले में नवंबर 2018 में हरियाणा के महेंद्रगढ़ शहर से एक महिला सहित 2 लोग पकड़े गए.
यह काररवाई राजस्थान की पीसीपीएनडीटी टीम ने की. जिस गर्भवती की फर्जी तरीके से सोनोग्राफी की गई, वह अलवर शहर से गई थी. दलाल सतपाल यादव ने उसे अलवर जिले में बहरोड़ के जखराना गांव बुलाया.
वहां दलाल ने महिला से 40 हजार रुपए लिए और उसे महेंद्रगढ़ ले गया. वहां दलाल भाग गया, बाकी 2 लोग पकड़े गए. दलाल सतपाल यादव 2017 में लिंग परीक्षण के मामले में हरियाणा में पकड़ा जा चुका है.
अप्रैल 2018 में जयपुर जिले के चौमूं शहर के पास मोरीजा गांव में लिंग परीक्षण करते पकड़े गए आरोपियों के पास उपकरण देख कर पीसीपीएनडीटी की टीम भी हैरान रह गई. ये लोग वाशिंग मशीन के पाइप से एलईडी बल्ब जोड़ते और गर्भवती के पेट पर टच कर सामने लगी एलसीडी स्क्रीन पर गर्भ में भ्रूण का वीडियो दिखाते.
इस के बाद वे महिला को गर्भ में लड़की होने की बात बताते और गर्भपात कराने की बात कहते. ये लोग गर्भपात करने के लिए भी तैयार हो जाते थे. यहां से 3 लोग गिरफ्तार किए गए. इन में 10वीं पास सुरेंद्र डाक्टर बन कर गर्भवती की फर्जी जांच करता था. जयपुर के अचरोल में अगस्त 2018 में 2 लोगों को थंब इंप्रेशन मशीन से फर्जी लिंग परीक्षण के नाम पर ठगी करते पकड़ा गया था.
दरअसल, समाज में अभी भी पुरुष प्रधान मानसिकता हावी है. बेटे को वंश बढ़ाने वाला और बेटी को बोझ समझा जाता है. यही कारण है कि लिंग परीक्षण पर सरकारी प्रतिबंध होने के बावजूद लोग बेटे की चाहत में गर्भवती का भ्रूण परीक्षण कराने के रास्ते तलाशते हैं.
इस धंधे में लगे लोग आमजन की इसी सोच का फायदा उठाते हुए अवैध तरीके से लिंग परीक्षण में जुटे हैं. समाज की मानसिकता का फायदा उठा कर कुछ लोगों ने इसे ठगी का धंधा भी बना लिया है. वे फर्जी तरीके से लिंग परीक्षण कर लोगों से ठगी कर रहे हैं.
गर्भ में भ्रूण जांच और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए 1996 में देश में पीसीपीएनडीटी एक्ट लागू किया गया था. कोख में कत्ल करने की दिशा में काररवाई करते हुए पीसीपीएनडीटी सेल ने जयपुर में देश का पहला थाना खोला था. राजस्थान के इस मौडल को बाद में कई अन्य राज्यों में भी अपनाया है.
जून 2018 तक के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में कन्या भ्रूण हत्या से जुड़े मामलों में 449 लोगों को सजा हुई. इन में सब से ज्यादा 149 लोगों को राजस्थान में सजा हुई.

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फरवरी 2016 से 19 दिसंबर, 2018 तक नेशनल हेल्थ मिशन के मिशन डायरेक्टर के पद पर कार्यरत रहे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नवीन जैन के निर्देशन में पीसीपीएनडीटी सेल ने 3 साल के दौरन 100 से ज्यादा डिकौय आपरेशन किए. इन मामलों में करीब 50 डाक्टर भी पकडे़ गए.
इस दौरान पीसीपीएनडीटी सेल की टीम ने राजस्थान के अलावा हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में जा कर भी डिकौय औपरेशन किए. आईएएस नवीन जैन का तबादला अब श्रम एवं रोजगार आयुक्त के पद पर हो गया है. अब सीनियर आईएएस डा. समित शर्मा एनएचएम के मिशन डायरेक्टर का कार्यभार संभाल रहे हैं.
राजस्थान सरकार ने बेटियों को बचाने के लिए भ्रूण लिंग परीक्षण पर अंकुश लगाने के लिए मुखबिर योजना भी चलाई है. इस के तहत सफल डिकौय औपरेशन करवाने पर ढाई लाख रुपए तक प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है.
राजस्थान में 2011 की जनगणना के अनुसार 1000 लड़कों पर 888 लड़कियां थीं. पीसीपीएनडीटी सेल की ओर से लगातार की गई काररवाई से लिंग परीक्षण की रोकथाम में मदद मिली है और बेटियों को कोख में मारने का सिलसिला कम हुआ है. इस का परिणाम है कि 2017-18 में सैक्स रेशो बढ़ कर 938 पहुंच गया है.

प्रमाण दो – अंतिम भाग

लेखक- सत्यव्रत सत्यार्थी

पूर्व कथा

गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में दंगे होने के कारण नर्स यामिनी किसी तरह अस्पताल पहुंचती है. वहां पहुंचने पर सीनियर सिस्टर मिसेज डेविडसन यामिनी को बेड नं. 11 के मरीज जीशान को देखने को कहती है. यामिनी मिसेज डेविडसन को मां की तरह मानती है और मिसेज डेविडसन भी यामिनी को बेटी की तरह. शहर में होने वाले दंगों को देखते हुए मिसेज डेविडसन यामिनी को बारबार  समझाती है कि मरीजों के साथ ज्यादा घुलनेमिलने की जरूरत नहीं है.शहर में हुए दंगों से परेशान यामिनी के सामने अतीत की यादें ताजा होने लगती हैं कि किस तरह हिंदूमुसलिम दंगों के दौरान दंगाइयों ने उस का घर जला दिया था और वह अपनी सहेली के घर जाने के कारण बच गई थी. यही सोचतेसोचते उसे जीशान का ध्यान आता है.25 वर्षीय जीशान के घर में भी दंगाइयों ने आग लगा दी थी. बड़ी मुश्किल से जान बचा कर घायल अवस्था में वह अस्पताल पहुंचा था.

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यामिनी जीशान की सेवा करती है ताकि वह जल्दी ठीक हो जाए. यामिनी और जीशान दोनों ही एकदूसरे के प्रति लगाव महसूस करते हैं. यामिनी से अलग होते समय जीशान उदास हो जाता है और कहता है कि मैं आप से कैसे मिलूंगा? मैं मुसलमान हूं और आप हिंदू, तो वह समझाती है कि हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं है और वह अलविदा कह कर चला जाता है. यामिनी अपनी सहयोगी नर्स के साथ शहर में हुए दंगों पर चर्चा कर रही होती है कि तभी कालबेल बजती है. अब आगे…

हिंदूमुसलिम दंगों के दौरान मिले यामिनी और जीशान के बीच भाईबहन का रिश्ता कायम हो चुका था लेकिन दुनिया वाले इस रिश्ते को कहां पाक मानने वाले थे. क्या जीशान और यामिनी दुनिया के सामने अपने इस मुंहबोले रिश्ते को साबित कर पाए?गतांक से आगे…

ट्रेनी नर्स ने दरवाजा खोला. सामने खडे़ युवक ने उस को बताया, ‘‘सिस्टर, मैं जीशान का पड़ोसी हूं. क्या यामिनी मैडम यहीं रहती हैं?’’

‘‘हां, रहती तो यहीं हैं, मगर तुम्हें उन से क्या काम है?’’

‘‘उन्हें खबर कर दीजिए कि जीशान को पिछले 2 दिन से बहुत तेज बुखार है. उस ने मैडम को बुलाया है.’’

कमरे के अंदर बैठी यामिनी नर्स और आगंतुक की बातचीत ध्यान से सुन रही थी. जीशान के अतिशय बीमार होने की खबर सुन कर उस का दिल धक् से रह गया. यामिनी को लगा, मानो उस का कोई अपना कातर स्वर में उसे पुकार रहा हो. उस ने अपना मिनी फर्स्ट एड बौक्स उठाया और उस युवक के साथ निकल पड़ी.कमरे में बिस्तर पर बेसुध पड़ा जीशान कराह रहा था. यामिनी ने उस के माथे को छू कर देखा तो वह भट्ठी की तरह तप रहा था. यामिनी ने उसे जरूरी दवाएं दीं और एक इंजेक्शन भी लगा दिया. कुछ देर बाद जीशान की स्थिति कुछ संभली तो यामिनी ने पूछा, ‘‘जीशान, तुम अपने प्रति इतने लापरवाह क्यों हो? अपना ध्यान क्यों नहीं रखते?’’

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‘‘ध्यान तो रखता हूं, पर बुखार का क्या करूं? खुद ब खुद आ गया.’’

जीशान के इस भोलेपन पर यामिनी ने वात्सल्य भाव से कहा, ‘‘जब तक तुम स्वस्थ नहीं हो जाते, मैं रोजाना आया करूंगी और तुम्हारे लिए चाय, सूप जो भी होगा बनाऊंगी और अपने सामने दवाएं खिलाऊंगी.’’

‘‘ऐसा तो सिर्फ 2 ही लोग कर सकते हैं, मां अथवा बहन.’’

यामिनी कुछ बोलना चाहती थी कि जीशान कांपते स्वर में पूछ बैठा, ‘‘क्या मैं आप को दीदी कहूं? अस्पताल में जब पहली बार होश आया था और आप को तीमारदारी करते हुए पाया था तभी से मैं ने मन ही मन आप को बड़ी बहन मान लिया था. इस से ज्यादा खूबसूरत और पाक रिश्ता दूसरा नहीं हो सकता, क्योंकि यही रिश्ता इतनी खिदमत कर सकता है.’’

‘‘यह तो ठीक है, मगर….’’

‘‘दीदी, अब मुझे मत ठुकराओ, वरना मैं कभी दवा नहीं खाऊंगा. वैसे भी तो यह दोबारा की जिंदगी आप की ही बदौलत है. आप खूब जानती हैं कि मैं आप को देखे बगैर एक पल भी नहीं रह पाता.’’

यामिनी निरुत्तर थी. रिश्ता कायम हो चुका था. सारे देश में खूनखराबे का कारण बने 2 विरोधी धर्मों के युवकयुवती के बीच भाईबहन का अटूट रिश्ता पनप चुका था.

यामिनी जब जीशान के कमरे से निकली तो अगल- बगल और सामने के मकानों के दरवाजों से झांकती अनेक आंखों के पीछे के मनोभावों को ताड़ कर वह बेचैन हो उठी. दुकानों के बाहर झुंड बना कर खडे़ लोगों ने भी उसे विचित्र सी निगाहों से देखना शुरू कर दिया. लेकिन किसी की ओर देखे बिना वह सिर झुका कर चुपचाप चलती चली गई.

जीशान जब तक पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो गया तब तक यह क्रम अनवरत चलता रहा. मिसेज डेविडसन को यामिनी का एक मरीज के प्रति इतना लगाव कतई पसंद नहीं था. एक दिन उन्होंने कह ही दिया, ‘‘जीशान के घर इस तरह हर रोज जाना ठीक नहीं है, यामिनी.’’

‘‘क्यों?’’ प्रश्नसूचक मुद्रा में यामिनी ने पूछा.

उन्होंने समझाते हुए कहा, ‘‘तुम कोई दूधपीती बच्ची नहीं हो, जिसे कुछ पता ही न हो. भले तुम उसे भाई समझती हो, किंतु कम से कम आज के माहौल में दुनिया वाले इस मुंहबोले रिश्ते को सहन करेेंगे क्या?’’

‘‘जब यह रिश्ता नहीं बना था तब दुनिया वालों ने मुझे या जीशान को बख्शा था क्या जो मैं इन की परवा करूं.’’

‘‘दुनिया में रह कर दुनिया वालों की परवा तो करनी ही पडे़गी.’’

‘‘मैं स्वयं भी इस बंजर जीवन से तंग आ गई हूं. नहीं रहना इस दुनिया में…तो किसी से डरना कैसा,’’ यामिनी ने कठोर मुद्रा में अपना पक्ष रखा.

मिसेज डेविडसन चुप हो गईं. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेर और यह कहते हुए उसे अपने साथ होस्टल लिवा ले गईं कि आज का खाना और सोना सब उन्हीं के साथ होना है.

यामिनी को बर्थ डे जैसे अनावश्यक चोंचले बिलकुल नहीं भाते थे. फिर भी मिसेज डेविडसन ने आज सुबह ही उस को याद दिलाया था कि आज रात का भोजन वह उसी के साथ उस के कमरे पर लेंगी और वह भी ‘स्पेशल.’ यामिनी ने हामी भर ली थी, क्योंकि प्रस्ताव केवल भोजन का था, बर्थ डे मनाने का नहीं.

घर आ कर फ्रेश होने के बाद वह और उस की साथी टे्रनी नर्स अच्छी मेहमाननवाजी की तैयारियों में जुट गईं कि अचानक यामिनी का मोबाइल बज उठा. दूसरी तरफ से जीशान बोल रहा था, ‘दीदी, आज 7 बजे तक आप जरूर आ जाइएगा. बहुत जरूरी काम है. 8 बजे तक हरहाल में मैं आप को आप के रूम पर वापस छोड़ दूंगा.’

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‘किंतु मेरे भाई, यह अचानक ऐसी कौन सी आफत आ गई है?’

‘मेरे भाई’ शब्द सुनते ही जीशान का रोमरोम पुलकित हो उठा. कितनी मिठास, कितनी ऊर्जा थी इस पुकार में. वह समझ नहीं पा रहा था कि अपनी बात कैसे कहे. इन कुछ पलों की चुप्पी का अर्थ यामिनी समझ नहीं पा रही थी. उस ने कहा, ‘जीशान, आज मैं नहीं आ सकती. तुम हर बात पर जिद क्यों करते हो?’

‘दीदी, यह मेरी आखिरी जिद है. मान जाओ, फिर कभी भी ऐसी गुस्ताखी नहीं करूंगा,’ इतना कह कर जीशान ने फोन काट दिया था.

यामिनी अजीब संकट में पड़ गई. एक तरफ जीशान का ‘बुलावा’ था तो दूसरी तरफ मिसेज डेविडसन को दी गई उस की ‘सहमति’ थी. आखिर दिल ने जीशान के पक्ष में फैसला दे दिया.

यामिनी को कहीं जाने की तैयारी करते देख उस की साथी नर्स समझ गई कि मुंहबोले इस भाई के बुलावे ने यामिनी को विवश कर दिया है. फिर भी उस ने पूछा, ‘‘मैम, मिसेज डेविडसन का क्या होगा?’’

‘‘होगा क्या? थोड़ा सा गुस्सा, थोड़ा बड़बड़ाना और फिर मेरी सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थना, हर मां ऐसी ही होती है,’’ कहते हुए यामिनी निकल पड़ी.

जीशान के कमरे पर यामिनी पहुंची तो देखा दरवाजा खुला था. कमरे में जो दृश्य देखा तो वह अवाक् रह गई. मेज पर सजा ‘केक’ और उस पर जलती एक कैंडिल, एक खूबसूरत नया ‘चाकू’ और नया ‘ज्वेलरी केस’ सबकुछ बड़ा विचित्र लग रहा था. इन सब चीजों को विस्मय से देखती हुई यामिनी की आंखें जीशान को ढूंढ़ रही थीं. उस के मन में संशय उठा कि कहीं उस के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई. उस ने जैसे ही जीशान को आवाज लगाई, ठीक उसी समय दरवाजे पर आहट हुई और जीशान हंसते हुए कमरे में प्रवेश कर रहा था. उस के एक हाथ में रक्षासूत्र और एक हाथ में ताजे फूल थे.

जीशान को सामने पा कर यामिनी आश्वस्त हो गई. उस ने अपने को संयत करते हुए पूछा, ‘‘इस तरह कहां चले गए थे? और वह भी कमरा खुला छोड़ कर, तुम्हें अक्ल क्यों नहीं आती? और यह सब क्या है?’’

‘‘एक गरीब भाई की तरफ से अपनी दीदी के बर्थ डे पर एक छोटा सा जलसा.’’

अपनत्व की इतनी सच्ची, इतनी निश्छल प्रतिक्रिया यामिनी ने अपने अब तक के जीवन में नहीं देखी थी. भावातिरेक में उस के नेत्र सजल हो उठे. उस ने रुंधे गले से कहा, ‘‘मेरे भाई, अब तक तुम क्यों नहीं मिले? कहां छिपे थे तुम अब तक? मिले भी तो तब जब हम दोनों के रिश्ते दुनिया के लिए कांटे सरीखे हैं.’’

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जीशान ने अपना हाथ यामिनी के मुंह पर रखते हुए कहा, ‘‘अब और नहीं, दीदी, आज आप का जन्मदिन है. अब चलिए, केक काटिए और यह जलती हुई मोमबत्ती बुझाइए.’’

यामिनी ने जीशान की खुशी के लिए सब किया. केक काटा और मोमबत्ती बुझाई. किसी बच्चे के समान ताली बजा कर जीशान जोर से बोल उठा, ‘‘हैप्पी बर्थडे-टू यू माई डियर सिस्टर,’’ फिर केक का एक टुकड़ा उठा कर यामिनी के मुंह में डाला और आधा तोड़ कर स्वयं खा लिया.

यामिनी ने घड़ी पर निगाह डाली. 8 बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे. उस ने जीशान को याद दिलाते हुए जाने का उपक्रम किया. जीशान ने यामिनी से सिर्फ 2 मिनट का समय और मांगा. उस ने यामिनी से आंखें मूंद कर सामने घूम जाने का अनुरोध किया. यंत्रचालित सी यामिनी ने वैसा ही किया. जीशान ने एक फूल यामिनी के पैरों पर स्पर्श कर अपने माथे से लगाया.

तभी जीशान ने अपनी दाईं कलाई और बाएं हाथ का रक्षासूत्र यामिनी की ओर बढ़ा दिया. यामिनी उस का मकसद समझ गई. उस ने मेज पर पड़े फूल उस पर निछावर किए और राखी बांध दी.

वह आदर भाव से अपनी दीदी के पैर छूने को झुका ही था कि दरवाजा भड़ाक से खुला और 10-12 खूंखार चेहरे तलवार, डंडा, हाकी आदि ले कर दनदनाते हुए कमरे में घुस गए और उन्हें घेर लिया.

एक बोला, ‘‘क्या गुल खिलाए जा रहे हैं यहां?’’

दूसरा बोला, ‘‘यह शरीफों का महल्ला है. इस तरह की बेहयायी करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी?’’

तीसरा बोला, ‘‘यह बदचलन औरत है. मैं ने अकसर इसे यहां आते देखा है.’’

भद्दी सी गाली देते हुए चौथा बोला, ‘‘रास रचाने को तुम्हें यह ंमुसलमान ही मिला था, सारे हिंदू मर गए थे क्या?’’

भीड़ में से कोई ललकराते हुए बोला, ‘‘देखते क्या हो? इस विधर्मी को काट डालो और उठा कर ले चलो इस मेनका को.’’

यामिनी ने अपना कलेजा कड़ा किया और दृढ़ता से जीशान के आगे खड़ी हो कर बोली, ‘‘इसे नहीं, दोष मेरा है, मेरे टुकड़ेटुकड़े कर डालो क्योंकि मैं हिंदू हूं. आप लोगों की प्रतिष्ठा मेरे नाते धूमिल हुई है.’’

यह सब देख कर जीशान में भी साहस का संचार हुआ. वह यामिनी के आगे आ गया और अपनी दाहिनी कलाई उन के सामने उठाते हुए बोला, ‘‘आप लोग खुद देख लीजिए, हमारा रिश्ता क्या है? राखी तो सिर्फ बहन ही अपने भाई को बांधती है.’’

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उस का हाथ झटकते हुए एक बोला, ‘‘अबे, तू क्या जाने बहनभाई के रिश्ते को. तुझ जैसों को तो सिर्फ मौका चाहिए किसी हिंदू लड़की को भ्रष्ट करने का. वैसे भी आज रक्षाबंधन है क्या?’’

तभी यामिनी को एक अवसर मिल गया. उस ने तर्क भरे लहजे में कहा, ‘‘रानी कर्णावती ने जब हुमायूं को राखी भेजी थी तब भी तो रक्षाबंधन नहीं था. किंतु आप लोग यह सारी लुभावनी मानवतापूर्ण बातें तो केवल मंच से ही बोलते हैं, व्यवहार में तो वही करते हैं जैसा अभी यहां कर रहे हैं.’’

यह तर्क सुन कर भीड़ के ज्यादातर युवक बगलें झांकने लगे. किंतु एक ने उस के तर्क को काटते हुए कहा, ‘‘हुमायूं ने तो राखी के धर्म का निर्वाह किया था. भाई के समान उस ने रानी कर्णावती के लिए खून बहाया था. तुम्हारा यह भाई क्या ऐसा प्रमाण दे सकता है?’’

यामिनी यह सुन कर अचकचा गई. उसे कोई तर्क नहीं सूझ रहा था. तभी अचानक जीशान ने मेज पर पड़ा चाकू उठाया और राखी वाली कलाई की नस काट डाली. खून की धार बह चली. खूंखार चेहरे एकएक कर अदृश्य होते गए. काफी देर तक यामिनी मूर्तिवत् खड़ी रह गई. उस की चेतनशून्यता तब टूटी जब गरम रक्त का आभास उस के पांवों को हुआ. उस का ध्यान जीशान की ओर गया, जो मूर्छित हो कर जमीन पर पड़ा था.

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यामिनी को कुछ भी नहीं सूझ रहा था. उस ने अपने आंचल का किनारा फाड़ा और कस कर जीशान की कलाई पर बांध दिया. उसी समय दरवाजे पर मिसेज डेविडसन और यामिनी की रूमपार्टनर खड़ी दिखाई दीं. उन दोनों ने फोन कर के एंबुलेंस मंगा ली थी.

जीशान एक बार फिर उसी अस्पताल की ओर जा रहा था जहां से उसे जीवनदान और यह रिश्ता मिला था. उस का सिर यामिनी की गोद में था. यामिनी के हाथ प्यार से उस का माथा सहला रहे थे.

‘कंठों’ फिल्म रिव्यू

फिल्म: कंठों

कलाकार: शिबोप्रसाद मुखर्जी, पाउली डाम

रेटिंगः 4 स्टार

बौलीवुड ही नहीं हौलीवुड में भी जानलेवा बीमारी कैंसर पर कई फिल्में बन चुकी हैं. हर फिल्म में कैंसर की बीमारी के चलते मरीजों की होने वाली मौत का चित्रण होता है अथवा कैंसर की बीमारी का भावनात्मक रूप से फिल्म की कहानी में दोहन किया जाता है. मगर पहली बार फिल्मकार शिबोप्रसाद मुखर्जी और नंदिता रौय बंगला भाषा की फिल्म ‘‘कंठों’’ में कैंसर की बीमारी का इलाज कराकर स्वस्थ होने के बाद उस इंसान पर क्या गुजरती है? उसे किस तरह के संबल की जरुरत होती है? सहित कई बातों का अति सुंदर और संजीदा माानवीय चित्रण किया है. यह फिल्म ऐसे रेडियो जौकी की है जो कि गले के कैंसर के चलते अपनी आवाज खो देने के बाद किस तरह पुनः अपने रेडियो जौकी के प्रोफेशन@काम को अंजाम देना शुरू करता है. यह कहानी है उम्मीद, आशा, संघर्ष, दोस्ती और रिश्तों की. यह कहानी है मानवीय स्प्रिट की.

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फिल्म की कहानी कलकत्ता के एक अति मशहूर रेडियो जौकी अर्जुन मलिक (शिबोप्रसाद मुखर्जी) के इर्द गिर्द घूमती है.जिसकी पत्नी प्रिथा मलिक (पाउली डाम)भी रेडियो स्टेशन में काम करती है. उनका आठ साल का बेटा है. अर्जुन मलिक को सुनने वाले श्रोता तुरंत उनसे जुड़ जाते हैं. अर्जुन मलिक की आवाज में संगीत का जादू है. एक दिन एक लड़की अंजली अपने मकान की इमारत की छत पर बैठकर आत्महत्या करने से पहले अर्जुन मलिक को फोन करती है. उसका मकसद पूरे संसार को बताना है कि उसके माता पिता उसे प्यार नही करते. उसकी मां डौक्टर राधिका चौधरी है. और पिता बिजनेसमैन. अर्जुन मलिक, अंजली से बातें करते करते उसकी मां का नंबर मांग लेता है, फिर अंजली को अपने एक गीत को सुनने के लिए कहकर अंजली की मां से बात कर सच बयां कर देते हैं. फिर अंजली व उसकी मां की फोन पर बात कराकर सारे गिले शिकवे दूर करवा देते हैं. कहानी आगे बढ़ती है. अर्जुन मलिक को सर्वश्रेष्ठ रेडियो जौकी का अवार्ड मिलता है, अवार्ड मिलने के बाद जब वह कुछ कहना चाहता है, तो पता चलता है कि उसकी आवाज जा चुकी है. डौक्टर कहते हैं उसे गले का कैंसर है. औपरेशन से वह ठीक हो जाएंगे, पर आवाज वापस नही आएगी. औपरेशन के बाद डौक्टर अर्जुन मलिक को एक स्लेट व चौक दे देते हैं कि अब वह लोगों से लिखकर अपनी बात कहा करेंगे. घर पर अर्जुन मलिक का बेबस चेहरा उसके बेटे व पत्नी प्रिथा से देखा नहीं जाता. प्रिथा एक डौक्टर से बात करती है. डौक्टर उन्हें फिजियोथेरेपिस्ट डौक्टर राधिका चौधरी से मिलने के लिए कहता है. वह हर मरीज को निजी स्तर पर ट्रेनिंग देती हैं. अर्जुन मलिक अपने बेटे के साथ डौ. राधिका चौधरी (कनिका बंदोपाध्याय) के पास जाता है. डौ राधिका चौधरी उन्हें यह कह कर मना कर देती हैं कि वह कलकत्ता छोड़कर हमेशा के लिए ढाका जा रही हैं. अर्जुन अपना विजिटिंग कार्ड देकर वापस घर आ जाता है और खुद को एक कमरे में बंद कर लेता है. अब अर्जुन यह सोचकर डिप्रेशन का शिकार होने लगते हैं कि वह कभी भी रेडियो जौकी के तौर पर काम नही कर पाएंगे. उधर जब अंजली घर पहुंचती है, तो अर्जुन मलिक का विजिटिंग कार्ड देखकर अपनी मां से अर्जुन मलिक के बारे में सवाल करती है और उन्हें बताती है कि यह वही रेडियो जौकी अर्जुन मलिक है, जिनकी वजह से मां बेटी एक साथ हैं. तब डौ राधिका कुछ दिन के लिए ढाका जाने का कार्यक्रम रद्द कर अर्जुन को ट्रेनिंग देती है और वह पहले ही दिन अर्जुन मलिक से कह देती है कि एक दिन उनकी जरुर आवाज वापस आएगी.

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डौ. राधिका हर दिन अर्जुन को अपने तरीके से बोलना सिखाती रहती है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. प्रिथा को बहुत कुछ सहना पड़ता है. अंततः उसी रेडियो स्टेशन पर अर्जुन मलिक पुनः अपना एक नया कार्यक्रम देने के लिए तैयार है. इस बीच नारी स्वभाव के चलते प्रिथा को लगता है कि डॉ.राधिका का अर्जुन के साथ कोई रिश्ता बनता जा रहा है. प्रिथा, डौ. राधिका के घर जाकर उन्हें उनकी पूरी फीस के पैसे देते हुए कहती है कि वह अर्जन के कार्यक्रम के दौरान रेडियो स्टेशन न आए. डौ. राधिका मुस्कुराकर उन्हें पैसे वापस लौटाते हुए कुछ किताबें देते हुए कहती है कि वह चाहती है कि भविष्य में वह लोग इन किताबों के माध्यम से दूसरे मरीजों को ट्रेनिंग व प्रेरणा देने का काम करे. इधर रेडियो स्टेशन पर अर्जुन का नया कार्यक्रम प्रसारित होता है, उधर डां.राधिका व उनकी बेटी अंजली ढाका के लिए हवाई जहाज पकड़ते हैं. पता चलता है कि डा.राधिका ने तो अर्जुन मलिक को अपना बड़ा भाई माना था.

लेखन व निर्देशनः

फिल्म के लेखक और निर्देशकद्वय शुबोप्रसाद और नंदिता रौय की अपनी कुशलता व रचनात्मक सोच के चलते फिल्म ‘‘कंठों’’ पहले दृश्य के साथ ही हर इंसान को भावनात्मक रूप से इस कदर बांध लेती है कि दर्शक कहानी के बहाव व किरदारों के जीवन के उतार चढ़ाव के साथ खुद बहता रहता है. अमूमन फिल्मकार अपनी फिल्म के माध्यम से संदेश देते समय कहानी व भावनाओं से भटक कर मनोरंजन तत्व को भी भुला बैठते हैं. मगर ‘कंठों’ एक बेहतरीन मकसदपूर्ण फिल्म है, जो कि मनोरंजन के साथ-साथ अपने मकसद व सीख को भी लोगों तक पहुंचाने में सफल रहती है. फिल्म में तमाम दृश्य ऐसे हैं, जिन्हें दर्शको को रूलाने के मकसद से निर्देशक अति मेलोड्रमैटिक बना सकते थे, पर शिबोप्रसाद मुखर्जी व नंदिता रौय ने ऐसा करने की बजाय दृश्यों का यथार्थपरक चित्रण किया है.इसके बावजूद दर्शकों की आंखे नम हो जाती हैं.

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यूं तो बंगला फिल्मों में यह निर्देशकीय जोड़ी किसी परिचय की मोहताज नहीं है. अब तक यह जोड़ी ‘‘मुक्तधरा’’, ‘‘अलिक सुख’’, ‘‘राम धानू’’,‘‘बेला सेशे’’,‘‘हामी’’,‘‘प्रकटन’’ और ‘‘पास्टो’’ जैसी सफल फिल्में दे चुकी है. मगर ‘कंठों’’इन दोनों के निदेशकीय प्रतिभा को और उचां उठाती है. फिल्म ‘‘कंठों’’ सिर्फ कैंसर के मरीजों के लिए ही नही, बल्कि किसी भी तरह की बीमारी के शिकार मरीज,उनके पारिवारिक सदस्यों के साथ साथ डाक्टरी पेशे से जुडे़ हर इंसान को बिना किसी उपदेशात्मक भाषण के बहुत कुछ सिखा जाती है. यह फिल्म इंसानी रिश्तों को बरकरार रखने की भी बात करती है. यह फिल्म मानवीय जीवन की मानवीय कहानी है. फिल्म ‘‘कंठों’’ बंगला भाषा में है और अंग्रेजी के सब टाइटल के साथ प्रदर्शित की गयी है.पर यह ऐसी फिल्म है,जिसे हर दर्शक को एक बार अवश्य देखनी चाहिए. काश!. हिंदी भाषी फिल्मकार भी इसी तरह की बेहतरीन फिल्म बनाने पर विचार करते.

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अभिनयः

फिल्म के सह निर्देशक शिबोप्र्रसाद मुखर्जी ने ही फिल्म में अर्जुन मलिक की मुख्य भूमिका निभायी है. उन्होंने अपने शानदार अभिनय से अर्जुन मलिक को जीवंतता प्रदान की है. कैंसर की बीमारी का पता चलने, आवाज चले जाने, डां राधिका के इंकार करने के बाद जिस तरह गम के साथ बेबसी के भाव उनके चेहरे पर आते हैं, वह उन्हें एक उत्कृष्ट कलाकार की श्रेणी में ला देते हैं. अर्जुन की पत्नी प्रिथा के किरदार में पाउली डाम तथा डौ. राधिका के किरदार में कनिका बंदोपाध्याय ने भी उत्कृष्ट अभिनय किया है. अन्य कलाकार भी ठीक-ठाक ही रहे.

Edited by- Rosy

भोजपुरी एक्ट्रेस संभावना सेठ ने ऐसे गिराई बिजलियां…

भोजपुरी एक्ट्रेस और बिग बौस की एक्स कौनटेस्टेंट संभावना सेठ इन दिनों अपनी सेक्सी फोटोज इंस्टाग्राम अकाउन्ट पर शेयर कर रही हैं, जिसको उनके फैंस खासा पसंद कर रहे हैं. आइए आपको दिखाते हैं उनके बौल्ड लुक की कुछ फोटोज…

 

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Wish you a Very Happy Birthday @dineshlalyadav Lots of love and luck to you..keep shining 😘😘😘

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बौलीवुड से की कैरियर की शुरुआत

संभावना सेठ का नाम जब भी जुबां पर आता है तो एक तेज तर्रार और बोल्ड अंदाज वाली शख्सियत आ ही जाती है. आज भोजपुरी फिल्मों में अपने डांस से लोगों का दिल जीतने वाली संभावना का कैरियर बौलीवुड से शुरु हुआ था. उनकी पहली फिल्म “पागलपंती” बौक्स औफिस पर फैल हो गई थी. इसके बाद  वो “36 चाइना टाउन” और “अंडरट्राइल” ने उनको काफी पौपुलैरिटी दिलाई.

भोजपुरी फिल्मों की डांसिग क्वीन

संभावना सैठ ने भोजपुरी और बौलीवुड में अब तक 50 से भी ज्यादा आइटम सौन्ग किए हैं, जिसकी बदौलत उन्होंने अपने फैंस का दिल जीता है.

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बिग बौस में थीं कन्टेस्टेट…

संभावना “बिगबौस सिजन-2” में कन्टेस्टेट थीं, वो ये शो जीत तो नहीं पाई लेकिन औडियन्स ने उनको बेहद पसंद किया जिसके चलते उनको “बिग बौस सीजन-8” में चैलेंजर के रुप में शामिल किया.

बता दें की संभावना ने 13 फरवरी 2016 को अविनाश द्विवेदी के साथ सगाई की थी, दोनों 14 जुलाई 2016 को शादी के बंधन में बंधे थे.

सोशल मीडिया पर वायरल हुई ऐश्वर्या की लुकअलाइक

सोशल मीडिया पर बौलीवुड स्टार्स के हमशक्लों की तस्वीरें वायरल होना आम बात हो गई है. कुछ समय पहले ही दीपिका पादुकोण, अनुष्का शर्मा और रणबीर कपूर के हमशक्लों ने खूब पौपुलरिटी बटोरी थी. अब इस लिस्ट में एक्स मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या राय का नाम भी शामिल हो चुका है. जी हां, सोशल मीडिया पर एक मौडल की तस्वीरें काफी वायरल हो रही हैं, जिसकी शक्ल हूबहू ऐश्वर्या से मिल रही है. यकीन न हो तो देखिये ये फोटोज.

 

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Designer : @eman_alajlan

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ऐश्वर्या राय की तरह दिखती हैं ये ईरानी मौडल….

तस्वीर में नजर आ रही इस लड़की का नाम महलाघा जबेरी है, ये ईरानी मौडल हैं. ईरान में पैदा हुईं महलाघा जबेरी अमेरिका की एक मशहूर मौडल हैं. महलाघा का चेहरा काफी हद तक ऐश्वर्या राय से मिलता जुलता है. इन दोनों की ग्रे आंखों से लेकर उनके लिप्स तक सब कुछ एक जैसा दिखता है.

 

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Designer @stello 🖤 #maximhot100

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सोशल मीडिया का  बड़ा नाम है महलाघा…

महलाघा सोशल मीडिया का एक पौपुलर नाम हैं. आप उनकी पौपुलैरिटी का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि, उनके इंस्टाग्राम पर 2.7 मिलियन फौलोवर्स हैं. आपको जान कर हैरानी होगी कि, महलाघा दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला का खिताब अपने नाम कर चुकी हैं. महलाघा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. आए दिन वो अपनी हौट तस्वीरें फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं.

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जूनियर बच्चन भी खा जाएंगे धोखा…

बात अगर जूनियर बच्चन यानि अभिषेक बच्चन की करें तो ऐश्वर्या राय और महलाघा को अगर एक साथ खड़ा कर दिया जाए तो अभिषेक भी उनको पहचानने में धोखा खा जाएंगे.

मैग्जीन के लिए फोटोशूट…

महलाघा कई मैगजीन्स के कवर पर अपनी हौटनेस के जलवे बिखेर चुकी हैं. इस बात का सबूत उनके इंस्टाग्राम पर तस्वीरों से मिल जाता है जिनमें महलाघा कमाल लग रही हैं.

 

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Dress @michael5inco . Thank you @stylepr . Dubai see you soon 🙈 🇦🇪

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बता दे कि ऐश्वर्या की पहले भी एक हमशक्ल सुर्खियों में थी. महलाघा की ही तरह स्नेहा उलाल की शक्ल भी ऐश्वर्या से काफी मिलती जुलती है. यही वजह थी कि सलमान ने स्नेहा को अपनी फिल्म “लकी” में काम करने का मौका दिया था.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia 

अकेले होने का दर्द

लेखक- डा. पंकज धवन

वातावरण में औपचारिक रुदन का स्वर गहरा रहा था. पापा सफेद कुरतेपजामे और शाल में खड़े थे. सफेद रंग शांति का प्रतीक माना जाता है पर मेरे मन में सदा से ही इस रंग से चिढ़ सी थी. उस औरत ने समाज का क्या बिगाड़ा है जिस के पति के न होने पर उसे सारी उम्र सफेद वस्त्रों में लिपटी रहने के लिए बाध्य किया जाता है. मेरे और पापा के साथ हमारे कई और रिश्तेदार कतारबद्ध खड़े थे. धीरेधीरे सभी लोग सिर झुकाए हमारे सामने से चले गए और पंडाल मरघट जैसे सन्नाटे में तबदील हो गया. हमारे दूरपास के रिश्तेनाते वाले भी वहां से चले गए. सभी के सहानुभूति भरे शब्द उन के साथ ही चले गए.

कुछ अतिनिकट परिचितों के साथ हम अपने घर आ गए. पापा मूक एवं निरीह प्राणी की तरह आए और अपने कमरे में चले गए. बाकी बचे परिजनों के साथ मैं ड्राइंगरूम में बैठ गई. कुछ औपचारिक बातों के बाद मैं किचन से चाय बनवा कर ले आई. एक गिलास में चाय डाल कर मैं पापा के पास गई. वह बिस्तर पर लेटे हुए सामने दीवार पर टंगी मम्मी की तसवीर को देखे जा रहे थे. उन की आंखों में आंसू थे. ‘‘पापा, चाय,’’ मैं ने कहा. पापा ने मेरी तरफ देखा और पलकें झपका कर आंसू पोंछते हुए बोले, ‘‘थोड़ी देर के लिए मुझे अकेला छोड़ दो, मानसी.’’ उन की ऐसी हालत देख कर मेरे गले में रुकी हुई सिसकियां तेज हो गईं. मैं भी पापा को अपने मन की बात बता कर उन से अपना दुख बांटना चाहती थी, पर लगा था वह अपने ही दुख से उबर नहीं पा रहे हैं. किसे मालूम था कि मम्मी, पापा को यों अकेला छोड़ कर इस संसार से प्र्रस्थान कर जाएंगी. इस हादसे के बाद तो पापा एकदम संज्ञाशून्य हो कर रह गए. मैं ने अपनी छोटी बहन दीप्ति को अमेरिका में तत्काल समाचार दे दिया. पर समयाभाव के कारण मां के पार्थिव शरीर को वह कहां देख पाई थी. पापा इस दुख से उबरते भी कैसे. जिस के साथ उन्होंने जिंदगी के 40 वर्ष बिता दिए, मां का इस तरह बिना किसी बीमारी के मरना पापा कैसे भूल सकते थे. कई दिनों तक रोतेरोते क्रमश: रुदन तो समाप्त हो गया पर शोक शांत न हो सका. पापा की ऐसी हालत देख कर मैं ने धीरे से उन का दरवाजा बंद किया और वापस ड्राइंग- रूम में आ गई, जहां मेरे पति राहुल बैठे थे.

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चाचाजी वहां बैठे हुए हलवाई, टैंट वाले, पंडितजी आदि का हिसाब करते जा रहे थे. मुझे देखते ही उन्होंने कहा, ‘‘आजकल छोटे से छोटे कार्य में भी इतना खर्च हो जाता है कि बस…’’ यह कहतेकहते उन्होंने राहुल को सारे बिल पकड़ा दिए. मैं ने राहुल को इशारे से सब का हिसाब चुकता करने को कहा. पापा अपने गम में इतने डूबे हुए थे कि उन से कुछ भी इस समय कहने का साहस मुझ में न था. ‘‘अच्छा, मानसी बिटिया, अब मैं चलता हूं. कोई काम हो तो बताना,’’ कहते हुए चाचाजी ने मुझे इस अंदाज से देखा कि मैं कोई दूसरा काम न कह दूं और उन के साथ ही कालोनी की 3-4 महिलाएं भी चल दीं. मुझे इस बात से बेहद दुख हुआ कि मम्मी इतने वर्षों से सदा सब के सुखदुख में हमें भी नजरअंदाज कर उन का साथ देती थीं, लेकिन आज सभी ने उन के गुजरने के साथ ही अपने कर्तव्यों से भी इतिश्री मान ली थी. शाम को खाने की मेज पर मैं ने राहुल से पूछा, ‘‘तुम्हारा क्या प्रोग्राम है अब?’’ ‘‘मैं तो रात को ही वापस जाना चाहता हूं. तुम साथ नहीं चल रही हो क्या?’’ राहुल ने पूछा. ‘‘पापा को ऐसी हालत में छोड़ कर कैसे चली जाऊं,’’ मैं ने रोंआसी हो कर कहा, ‘‘लगता है ऐसे ही समय के लिए लोग बेटे की कामना करते हैं.’’ ‘‘पापा को साथ क्यों नहीं ले चलतीं,’’ राहुल बोले, ‘‘थोड़ा उन के लिए भी चेंज हो जाएगा.’’ ‘‘नहीं बेटा,’’

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तब तक पापा अपने कमरे से आ चुके थे, ‘‘तुम लोग चले जाओ, मैं यहीं ठीक हूं.’’ ‘‘पापा, आप को तो ठीक से खाना बनाना भी नहीं आता…मां होतीं तो…’’ और इतना कहतेकहते मैं रो पड़ी. ‘‘क्यों, महरी है न. तुम चिंता क्यों करती हो?’’ ‘‘पापा, वह तो 9 बजे आती है. आप की बेड टी, अखबार, दूध, नहाने के कपड़े, दवाइयां कुछ भी तो आप को नहीं मालूम…आज तक आप ने किया हो तो पता होता.’’ ‘‘उस ने मुझे इतना अपाहिज बना दिया था…पर अब क्या करूं? करना तो पडे़गा ही न…कुछ समझ में नहीं आएगा तो तुम से पूछ लूंगा,’’ कहतेकहते पापा ने मेरी तरफ देखा. उन का स्वर जरूरत से ज्यादा करुण था. ‘‘अब क्यों रुलाते हो, पापा,’’ कहते हुए मैं खाना छोड़ कर उन से लिपट गई. मेरे सिर पर स्नेहिल स्पर्श तक सीमित होते हुए पापा ने कहा, ‘‘उसी ने अभी तक सारे परिवार को एकसूत्र में बांध कर रखा था. पंछी अपना नीड़ छोड़ कर उड़ चला और यह घोंसला भी एकदम वीराने सा हो गया…मैं क्या करूं,’’ कातरता झलक रही थी उन के स्वर में. ‘‘पापा, आप हिम्मत मत हारो, कुछ दिनों के लिए ही सही, हमारे साथ ही चलो न.’’ ‘‘नहीं बेटे, जब अकेले जी नहीं पाऊंगा तो कह दूंगा,’’ फिर एक लंबी सांस लेते हुए बोले, ‘‘अभी तो यहां बहुत काम हैं, तुम्हारी मम्मी का इंश्योरेंस, बैंक अकाउंट, उन के फिक्स्ड डिपोजिट सभी को तो देखना पड़ेगा न.’’ ‘‘जैसी आप की इच्छा, पापा,’’ कह कर राहुल अपने कमरे में चले गए. अगले दिन महरी को सबकुछ सिलसिलेवार समझा कर मैं थोड़ी आश्वस्त हो गई. 2 दिन बाद… मेरी सुबह की ट्रेन थी. जाने से एक रात पहले मैं पापा के पास जा कर बोली, ‘‘पापा, कल सुबह आप मुझे छोड़ने नहीं जाएंगे.

नहीं तो मैं जा नहीं पाऊंगी,’’ इतना कह मैं भरे कंठ से वहां से चली आई थी. सुबह जल्दीजल्दी उठी. तकिये के पास पापा के हाथ की लिखी चिट पड़ी थी, ‘जाने से पहले मुझे भी मत उठाना…मैं रह नहीं पाऊंगा. साथ ही 500 रुपए रखे हैं इन्हें स्वीकार कर लेना. वैसे भी यह सारे आडंबर तुम्हारी मां ही संभालती थी.’ मैं ही जानती हूं कि मैं ने वह घर कैसे छोड़ा था. मैं हर रोज पापा को फोन करती. उन का हाल जानती, फिर महरी को हिदायतें देती. मैं अपनी सीमाएं भी जानती थी और दायरे भी. राहुल को मेरी किसी बात का बुरा न लगे इसलिए पापा से आफिस से ही बात करती. कभीकभी वह छोटीछोटी चीजों को ले कर परेशान हो जाते थे. ऊपर से सामान्य बने रहने के बावजूद मैं भांप जाती कि वह दिल से इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. वह वहां रहने के लिए विवश थे. उन की दुनिया उन्हीं के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई थी. एक दिन सुबह मैं ने पापा को उन के जन्मदिन की बधाई देने के लिए फोन किया.

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देर तक फोन की घंटी बजती रही और उधर से कोई उत्तर नहीं मिला. फिर मैं ने कई बार फोन किया और हर बार यही हाल रहा. मेरी घबराहट स्वाभाविक थी. तरहतरह के कुविचारों ने मन में डेरा डाल लिया. पड़ोस में रहने वाली कविता आंटी को फोन किया तो उन का भी यही उत्तर था कि घर पर शायद कोई नहीं है. मेरी आंखों मेें आंसू आ गए. पापा तो कभी कहीं जाते नहीं थे. मेरी हालत देख कर राहुल बोले, ‘‘तुम घबराओ नहीं. थोड़ी देर में फिर से फोन करना. नहीं तो कुछ और सोचते हैं.’’ ‘‘मेरा दिल बैठा जा रहा है राहुल,’’ मैं ने कहा. ‘‘थोड़ा धीरज रखो, मानसी,’’ कह कर राहुल मेज पर अखबार रख कर बोले, ‘‘हम इतनी दूर हैं कि चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे और पापा यहां आना नहीं चाहते, तुम वहां जा नहीं सकतीं…’’ ‘‘तो उन को ऐसी ही हालत में छोड़ दें,’’ मैं सुबक पड़ी, ‘‘जानते हो, पापा को कुछ भी नहीं आता है. बाजार से आते ही पर्स टेबल पर छोड़ देते हैं. अलमारी में भी चाबियां लगी छोड़ देते हैं. अभी पिछले दिनों उन्होंने नई महरी रखी है…कहीं उस ने तो कुछ…आजकल अकेले रह रहे वृद्ध इन वारदातों का ही निशाना बन रहे हैं.’’ इतने में फोन की घंटी बजी. पापा की आवाज सुनी तो थोड़ी राहत महसूस हुई, मैं ने कहा, ‘‘कहां चले गए थे आप पापा, मैं बहुत घबरा गई थी.’’ ‘‘तू इतनी चिंता क्यों करती है, बेटी. मैं एकदम ठीक हूं.

तेरी मम्मी आज के दिन अनाथाश्रम के बच्चों को वस्त्र दान करती थी सो उस का वह काम पूरा करने चला गया था.’’ ‘‘पापा, आप एक मोबाइल ले लो. कम से कम चिंता तो नहीं रहेगी न,’’ मैं ने सुझाव दिया. ‘‘इस उम्र में मोबाइल,’’ कहतेकहते पापा हंस पड़े, ‘‘तू मेरी चिंता छोड़ दे बस.’’ दिन बीतते गए. उन की जिंदगी उन के सिद्धांतों और समझौतों के बीच टिक कर रह गई. मैं लगातार पापा के संपर्क में बनी रही. मुझे इस बात का एहसास हो गया कि वह लगातार सेहत के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं. अंगरेजी दवाओं के वह खिलाफ थे इसलिए जो देसी दवाओं का ज्ञान मुझे मां से विरासत में मिला था मैं उन्हें बता देती. कभी उन को आराम आ जाता तो कभी वह चुप्पी साध लेते. एक दिन सुबह कविता आंटी ने फोन पर बताया कि पापा सीढि़यों से फिसल गए हैं. अभी पापा को वह अस्पताल छोड़ कर आई हैं. एक दिन वह डाक्टरों की देखरेख में ही रहेंगे. शायद फ्रैक्चर हो. ‘‘उन के साथ कोई है?’’ मैं ने चिंतित होते हुए पूछा.

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‘‘आईसीयू में किसी की जरूरत नहीं होती. डाक्टर को वह जानते ही हैं,’’ कविता आंटी ने बेहद लापरवाह स्वर में कहा. कविता आंटी की बातें सुन कर मुझे दुख भी हुआ और बुरा भी लगा. इनसान इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है. मेरा मन पापा से मिलने के लिए तड़पने लगा. राहुल ने मेरी मनोस्थिति भांपते हुए कहा, ‘‘मानसी, तुम इस तरह न अपने घर पर ध्यान दे सकोगी और न ही उन का.’’ ‘‘उन का मेरे सिवा और कोई करने वाला भी तो नहीं है. मैं ने कहीं पढ़ा था कि एक औरत की दुनिया में 2 ही मर्द सब से ज्यादा अहमियत रखते हैं. एक उस का पति जो उस की अस्मत की रक्षा करता है, दूसरा उस का पिता जो उस के वजूद का निर्माता होता है. तुम्हें तो मैं अपने से भी ज्यादा प्यार करती हूं, पर उन्हें क्या यों ही तिलतिल मरता छोड़ दूं?’’ ‘‘तो इस बार उन्हें किसी न किसी बहाने यहां ले आओ फिर सोचेंगे,’’ राहुल ने निर्देश दिया. मैं अगले ही दिन पापा के पास रवाना हो गई. अस्पताल में मैं ने उन्हें देखा तो विश्वास ही नहीं हुआ.

पापा की दयनीय स्थिति देख कर कलेजा मुंह को आ गया. वह सफेद चादर में लिपटे हुए दूसरी तरफ मुंह किए लेटे थे. डाक्टर से पता चला कि पापा हाई ब्लडपै्रैशर के मरीज हो गए हैं और उन का वजन भी घट कर अब आधा रह गया था. मैं उन के पास जा कर बैठ गई. पापा मुझे देखते ही बोले, ‘‘मानसी, तुझे किस ने बताया?’’ ‘‘पापा, तो क्या यह बात भी आप मुझ से छिपा कर रखना चाहते थे. मैं तो समझती थी कि आप ने धीरेधीरे खुद को संभाल लिया होगा…और यहां तो…’’ मेरा गला रुंध गया. बाकी के शब्द होंठों में ही फंस कर रह गए. ‘‘मैं सब बताता रहता तो तू मेरी चिंता करती…राहुल क्या सोचेगा?’’ ‘‘ठीक है पापा, मैं भी तब तक राहुल के पास नहीं जाऊंगी जब तक आप मेरे साथ नहीं चलेंगे. मेरा घर उजड़ता है तो उजड़े. मैं आप को यों अकेला छोड़ कर नहीं जा सकती.’’ ‘‘मानसी, यह क्या कह दिया तू ने,’’ कह कर वह थोड़ा उठने को हुए. तभी नर्स ने आ कर उन्हें फिर लिटा दिया. सीढि़यों से फिसलने के बाद पापा को चोट तो बहुत आई थी पर कोई फ्रैक्चर नहीं हुआ. मैं उन्हें अस्पताल से घर ले गई और बिस्तर पर लिटा दिया.

मेरी निगाहें घर के चारों तरफ दौड़ गईं. घर की हालत देख कर लगता ही नहीं था कि यहां कोई रहता है. बड़े बेढंगे तरीके से कपड़ों को समेट कर एक तरफ रखा हुआ था. पापा के बिस्तर की बदरंग चादर, सिंक में रखे हुए गंदे और चिकने बरतन, गैस पर अधपके खाने के टुकड़े और चींटियों की कतारें, समझ में नहीं आ रहा था काम कहां से शुरू करूं. आज मेरी समझ में आ रहा था कि सुचारु रूप से चल रहे इस घर में मम्मी का कितना सार्थक श्रम और निस्वार्थ समर्पण था. इस हालत में पापा को अकेले छोड़ कर जाना ठीक नहीं था. इसलिए मैं पापा को ले कर वापस अपने घर दिल्ली आ गई. 1-2 दिन मैं पूरे समय पापा के साथ ही रही. आफिस जाते हुए मुझे संकोच हो रहा था पर पापा मन की बात जान गए और निसंकोच मुझे आफिस जाने के लिए कह दिया. राहुल और मैं एक ही समय साथसाथ आफिस जाते थे. उस दिन शाम को हम लोग खाना खा रहे थे, तभी दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने दरवाजा खोला, सामने मीरा आंटी खड़ी थीं.

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मैं ने कहा, ‘‘आइए आंटी, कहां से आ रही हैं इस समय?’’ ‘‘दिल्ली हाट तक गई थी, थोड़ी देर हो गई. सामने की दुकान से कोई पानी देने तो नहीं आया था?’’ ‘‘नहीं, अच्छा तो आप भीतर तो आइए…मेरे से एक बोतल पानी ले जाइए,’’ कहते हुए मैं वापस खाने की टेबल पर आ गई, ‘‘खाना खाएंगी न आंटी.’’ ‘‘नहीं बेटा, आज मन नहीं है.’’ मैं ने पापा को उन का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘पापा, यह मीरा आंटी हैं. सामने के फ्लैट में रहती हैं. बेहद मिलनसार और केयरिंग भी. राहुल को जब भी कुछ नया खाने का मन करता है आंटी बना देती हैं.’’ ‘‘अरे, बस बस,’’ कह कर वह सामने आ कर बैठ गईं. मैं ने उन की तरफ प्लेट सरकाते हुए कहा, ‘‘अच्छा, कुछ तो खा लीजिए. हमारा मन रखने के लिए ही सही,’’ और इसी के साथ उन की प्लेट में मैं ने थोड़े चावल और दाल डाल दी. ‘‘लगता है आप यहां अकेली रहती हैं?’’ पापा ने पूछा. ‘‘हां, पापा,’’ इन के पति आर्मी में हैं. वहां इन को साथ रहने की कोई सुविधा नहीं है,’’ राहुल ने कहा. ‘‘फिर तो आप को बड़ी मुश्किल होती होगी अकेले रहने में?’’ ‘‘नहीं, अब तो आदत सी पड़ गई है,’’ आंटी बेहद उदासीनता से बोलीं, ‘‘बेटीदामाद भी कभीकभी आते रहते हैं, फिर जब कभी मन उचाट हो जाता है मैं उन से स्वयं मिलने चली जाती हूं.’’ ‘‘पापा, इन की बेटीदामाद दोनों डाक्टर हैं और चेन्नई के अपोलो अस्पताल में काम करते हैं,’’ मैं ने कहा. बातों का सिलसिला देर तक यों ही चलता रहा. जातेजाते आंटी बोलीं, ‘‘मैं सामने ही रहती हूं…किसी वस्तु की जरूरत हो तो बिना संकोच बता दीजिएगा.’’

‘‘आंटी, पापा को सुबह इंजेक्शन लगवाना है. किसी को जानती हैं आप, जो यहीं आ कर लगा सके.’’ ‘‘अरे, इंजेक्शन तो मैं ही लगा दूंगी…बेटी ने इतना तो सिखा ही दिया है.’’ ‘‘ठीक है आंटी, मैं सुबह इंजेक्शन भी ले आऊंगी और पट्टी भी,’’ कहते- कहते मैं भी उठ गई. ‘‘हां, बेटा, यह तो मेरा सौभाग्य होगा,’’ कह कर आंटी चली गईं. शाम को मैं आफिस से आई और पापा का हालचाल पूछा. आज वह थोड़ा स्वस्थ लग रहे थे. कहने लगे, ‘‘सुबह इंजेक्शन और डे्रसिंग के बाद थोड़ा रिलैक्स अनुभव कर रहा हूं. फिर शाम को सामने पार्क में भी घूमने गया था.’’ मैं चाहती थी पापा कुछ दिन और यहां रहें. हर रोज कोई न कोई बहाना बना कर वह जतला देते थे कि वह वापस जाना चाहते हैं. यहां रहना उन के सिद्धांतों के खिलाफ है. मेरी शंका जितनी गहरी थी पर समाधान उतना ही कठिन. मैं ने और राहुल ने भरसक प्रयत्न किया कि उन्हें यहीं पास में कोई और मकान ले देते हैं पर वह किसी भी तरह नहीं माने. फिर हम ने उन्हें इस बात के लिए मना लिया कि 1 महीने के बाद दीवाली आ रही है तब तक वह यहीं रहें.

हमारी आशाओं के अनुकूल उन्होंने यह स्वीकार कर लिया था. मुझे थोड़ी सी तसल्ली हो गई. उस दिन मैं और राहुल प्रगति मैदान जाने का मन बना रहे थे, जहां गृहसज्जा के सामान की प्रदर्शनी लगी हुई थी. मैं ने पापा को भी साथ चलने के लिए कहा. उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि मैं वहां जा कर क्या करूंगा. ‘‘पापा, आप साथ चलेंगे तो हमें अच्छा लगेगा. मानसी कई दिनों से माइक्रोवेव लेने का मन बना रही थी. आप रहेंगे तो राय बनी रहेगी,’’ राहुल ने विनती करते हुए कहा. ‘‘तुम्हारा मुझे इतना मान देने के लिए शुक्रिया बेटा…पर जा नहीं पाऊंगा, क्योंकि पार्क में आज इस कालोनी के बुजुर्गों की एक बैठक है.’’ हम दोनों ही वहां चले गए. प्रगति मैदान से आने के बाद जैसे ही हम ने कार पार्क की कि मीरा आंटी के घर से डाक्टर अवस्थी को निकलते देखा. मैं एकदम घबरा गई और तेजी से जा कर पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, क्या हुआ मीरा आंटी को? सब ठीक तो है न.’’ ‘‘हां, अब सब ठीक है. उन के घर में किसी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी.’’ इस से पहले कि मैं कुछ सोच पाती, मीरा आंटी सामने से आती हुई बोलीं, ‘‘तुम्हारे पापा इधर हैं, तुम लोग अंदर आ जाओ.’’ ‘‘क्यों, क्या हुआ उन को?’’ ‘‘दरअसल, तुम्हारे जाने के बाद उन्होंने मेरी घंटी बजा कर कहा था कि उन्हें बहुत घबराहट हो रही है. मैं थोड़ा घबरा गई थी.

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मैं उन्हें सहारा दे कर अपने यहां ले आई और डाक्टर को फोन कर दिया. उन का ब्लडप्रैशर बहुत बढ़ा हुआ था. शायद गैस हो रही होगी. अभी उन्हें सोने का इंजेक्शन और कुछ दवाइयां दी हैं,’’ कहते हुए उन्होंने मुझे वह परचा पकड़ा दिया. ‘‘आंटी, बुढ़ापा नहीं, पापा अकेलेपन का शिकार हैं,’’ कहतेकहते मैं पापा के पास ही बैठ गई, ‘‘62 साल की उम्र भी कोई बुढ़ापे की होती है.’’ राहुल जब तक अपने फ्लैट से फ्रेश हो कर आए आंटी ने चाय बना दी. मैं पुन: पापा की इस हालत से चिंतित थी और परेशान भी. वह पूरी रात हम ने उन के पास बैठ कर बिताई. कुछ दिन और बीत गए. पापा अब फिर सामान्य हो गए थे. आंटी का हमारे घर निरंतर आनाजाना बना रहता था. हम पापा में फिर से उत्साह पैदा करने की कोशिश करते रहे. एक पल वह खुश हो जाते और दूसरे ही पल उदास और गंभीर. रविवार को हम सवेरे बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. बातोंबातों में राहुल ने आंटी का उदाहरण देते हुए कहा कि वह कितने मजे से जिंदगी काट रही हैं.

‘‘सचमुच वह बहुत ही भद्र और मिलनसार महिला हैं. इस उम्र में तो उन के पति को भी रिटायरमेंट ले लेना चाहिए. कब से वह अकेली जिंदगी जी रही हैं और आजकल के हालात देखते हुए एक अकेली औरत…’’ पापा बोले. ‘‘पापा, आप को एक बात बताऊं,’’ राहुल ने सारा संकोच त्याग कर कहा, ‘‘मैं ने पहले दिन आप से झूठ बोला था कि आंटी के पति आर्मी में हैं. दरअसल, उन के पति की मृत्यु 8 साल पहले हो चुकी है. तब उन की बेटी मेडिकल कालिज में पढ़ती थी. बड़ी मुश्किलों से आंटी ने उसे पढ़ाया है. पिछले ही साल उस की शादी की है.’’ ‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. उन्होंने कभी बताया भी नहीं.’’ ‘‘सभी लोगों को उन्होंने यही बता रखा है जो मैं ने आप को बताया था. एक अकेली औरत का सचमुच अकेला रहना कितना कठिन होता है, यह उन से पूछिए. इसलिए मैं जब भी आंटी को देखती हूं मुझे आप की चिंता होने लगती है. औरत होने के नाते वह तो अपना घर संभाल सकती हैं पर पुरुष नहीं.

उन्हें सचमुच एक सहारे की जरूरत होती है. पापा, आप को लगता है कि आप यों अकेले जीवन बिता पाएंगे…मैं बेटी हूं आप की…मम्मी के बाद आप का ध्यान रखना मेरा फर्ज है…मेरा अधिकार भी है और कर्तव्य भी…मैं जो कह रही हूं आप समझ रहे हैं न पापा…मैं मीरा आंटी की बात कर रही हूं.’’ मैं अपनी बात कह चुकी थी. और अब पापा के चेहरे पर घिर आए भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगी. ‘‘मानसी ठीक कह रही है, पापा,’’ राहुल बोले, ‘‘बहुत दिनों तक सोचने के बाद ही डरतेडरते हम ने आप से कहने की हिम्मत जुटाई है. बात अच्छी न लगे तो हमें माफ कर दीजिए.’’ ‘‘बेटे, इस उम्र में शादी. मैं कैसे भूल पाऊंगा तुम्हारी मम्मी को, और फिर लोग क्या सोचेंगे,’’ पापा का स्वर किसी गहरे दुख में डूब गया. ‘‘पापा, लोग बुढ़ापे के लिए तो एकदूसरे का सहारा ढूंढ़ते हैं. इस उम्र में आप को कई बीमारियों ने आ घेरा है, उपेक्षित से हो कर रह गए हैं आप. अब जो हो गया उस पर हमारा जोर तो नहीं है. फिर लोगों से हमें क्या लेनादेना. आप दोनों तैयार हों तो हमें दुनिया से क्या लेना.’’

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‘‘मीरा से भी तुम ने बात की है?’’ उन्होंने बेहद संजीदगी से पूछा. ‘‘हां, पापा, हम ने उन्हें भी मुश्किल से मनाया है. यदि आप तैयार हों तो…आप हमारा हमेशा ही भला चाहते रहे हैं. क्या आप चाहते हैं कि हम सदा आप के लिए चिंतित रहें. बहुत सी बातें आप छिपा भी जाते हैं. मैं पहले भी आप से इस बारे में बात करना चाहती थी मगर हर बार संकोच की दीवार सामने आ जाती थी.’’ वह कुछ असहज भी थे और असामान्य भी, किंतु जिस लाड़ भरी निगाहों से उन्होंने मुझे देखा, मुझे लगा मेरी यह हरकत उन्हें अच्छी लगी है. ‘‘पापा, प्लीज,’’ कह कर मैं उन के पास आ कर बैठ गई, ‘‘आप को सुखी देख कर हम लोग कितनी राहत महसूस करेंगे. यह मैं कैसे बताऊं . आप की ऐसी हालत देख कर मेरा जी भर आता है. मैं आप को बहुत प्यार करती हूं पापा,’’ कहतेकहते मैं रो पड़ी. पापा धीरे से मुसकराए. शिष्टाचार के सभी बंधन तोड़ कर मैं उन से लिपट गई. महीनों से खोई हुई उन की हंसी वापस उन के चेहरे पर थी. उन का ठंडा मीठा स्पर्श आज अर्से बाद मुझे मिला था. ‘‘थैंक्स, पापा,’’ कहतेकहते मेरी आवाज आंसुओं के चलते भर्रा गई.

ऐसे भोजपुरी फिल्मों की स्टार बनीं ये टीवी एक्ट्रेस…

आम्रपाली दुबे उन भोजपुरी एक्ट्रैसेस में से एक हैं. जिन्होंने छोटे परदे से बड़े परदे की ओर रुख किया और सफलता की बुलंदियों को हासिल किया. एक्टिंग हो या डांस आम्रपाली दोनो में ही माहिर है और उन्होंने लोगो का दिल भी जीता है.

 

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Aap sabhi logon ko Hanuman Jayanti ki dher saari shubhkamnayein 🙏 #sankatmochan #naamtihaaro #jaihanuman 🙏😍

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फैन फौलोविंग

बात अगर उनके फैन फौलोविंग की करे तो इनस्टाग्राम पर उनके 1,46,000 फौलोवर्स हैं, फैंस उनके फोटोज और वीडियोज को काफी पसंद करते हैं. आम्रपाली अपने फैंस के लिए समय- समय पर रेगुलर अपडेट देती रहती हैं, जिसके चलते उनके फैंस की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

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टीवी से की थी शुरुआत

आम्रपाली ने अपने कैरियर की शुरुआत “रहना है तेरी पलकों की छांव में” से की थी. जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई फिर वो जी टीवी पर “सातवें”,“मायका” और “मेरा नाम करेगी रोशन” जैसे शोज में भी नजर आईं.

 

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When you are looking forward to a party 😂😍 happiness on my face 👻

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भोजपुरी फिल्मों से मिली पहचान

आम्रपाली दुबे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली हैं. उन्होंने मुंबई के भावन कौलेज से पढ़ाई की है. 2014 में उन्होंने भोजपुरी सिनेमा में दिनेश लाल यादव (निरहुआ) के साथ “निरहुआ रिक्शावाला से अपने कैरियर की शुरुआत की थी.

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 यूं रचा इतिहास..

2017 में भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री के इतिहास में पहली बार किसी गाने को साढ़े 10 करोड़ से ज्यादा यूट्यूब व्यूज मिले हैं. यह गाना ‘राते दीया बुताके’ पवन सिंह की फिल्म ‘सत्या’ का प्रमोशनल सौन्ग है, जिसे आम्रपाली दुबे और पवन सिंह पर फिल्माया गया था. बता दें  आम्रपाली दुबे एक भोजपुरी फिल्म के लिए करीब 7-9 लाख रुपए लेती हैं.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia 

सपना चौधरी ने पहना स्कर्ट, हो गई ट्रोल…

बिगबौस की एक्स कंटेस्टेंट और हरियाणवी डांसर सपना चौधरी अपने बौल्ड अंदाज और डांस के कारण चर्चाओं में रहती हैं. इनस्टाग्राम पर वो अपनी फोटोज शेयर करती रहती है जिसको उनके फैंस खासा पसंद भी करते हैं. लेकिन इन दिनों वो अपने एक खास पोस्ट के कारण सुर्खियों में हैं.

नए लुक के कारण सपना हुईं ट्रोल…

दरअसल, सपना चौधरी ने हाल ही में एक फोटो शेयर की थी जिसमें वो स्कर्ट पहने हुए ग्लैमरस लुक में नजर आईं. सपना के इस लुक की कुछ फैंस तारीफ कर रहे है तो वहीं कुछ लोग उनका मजाक बनाकर उनको ट्रोल कर रहे हैं.

 

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Ready for the show kyo ki # ThaknaManaHai #show #wedding #delhi #dance #passion #masti #work @pawanchawla2010 #thankgod

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फैंस के कमेंट्स की बात करें तो कुछ उनको समझाइश दे रहे हैं कि, “मैम आप सलवार कमीज ही पहनिए, आप उसी में अच्छी लगती है” तो वहीं कुछ फैंस ने उनकी इस फोटो पर अपनी नराजगी जाहिर की है.

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क्या है फोटो में…

सपना इस फोटो में औलिव  ग्रीन कलर का टोप और वाइट शोट स्कर्ट पहने नजर आ रही हैं. और ऐसा लग रहा है की वो किसी वेकेशन का लूफ्त उठा रही हैं.

 

 

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❤️❤️😊😊 @pawanchawla2010

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सपना का देसी अंदाज

बता दें की सपना अक्सर सलवार कमीज वाले देसी अंदाज में ही नजर आती हैं, ऐसे में उनका ये बौल्ड अवतार कुछ लोगों को पसंद ना आना लाजमी है. बहरहाल जो भी हो सपना अपने इस नये लुक में लग तो कमाल रही है.

Edited by- Neelesh Singh Sisodia

फरेबी चाहत…

लेखक- विजय सोनी

घटना 31 दिसंबर, 2018 की है. 31 दिसंबर होने के कारण इंदौर के शाजापुर क्षेत्र में आधी रात
के समय लोग शराब के नशे में डूब कर नए साल का स्वागत करने में जुटे थे. काशीनगर क्षेत्र के एक मकान से पतिपत्नी के झगड़े की तेज आवाज आ रही थी. वह आवाज सुन कर पड़ोसी डिस्टर्ब होने लगे तो एक पड़ोसी श्याम वर्मा ने कोतवाली में फोन कर झगड़े की सूचना दे दी.

जिस घर से झगड़े की तेज आवाज आ रही थी, वह मकान बलाई महासभा युवा ब्रिगेड के जिला अध्यक्ष और प्रौपर्टी डीलर रहे रमेशचंद्र उर्फ मोनू का था. उस की पत्नी मंजू भी भाजपा की सक्रिय कार्यकत्री थी.
नए साल में लड़ाईझगड़े की संभावना को देखते हुए पुलिस भी अलर्ट थी, इसलिए झगड़े की खबर सुनते ही कुछ ही देर में शाजापुर कोतवाली की मोबाइल वैन मौके पर पहुंच गई. लेकिन यह मामला पतिपत्नी के पारिवारिक झगडे़ का था तथा पतिपत्नी दोनों ही सम्मानित व जानेमाने लोग थे. इसलिए पुलिस दोनों को समझाबुझा कर थाने लौट गई.

करोड़ोें की खूबसूरती..

पुलिस के जाने के बाद पतिपत्नी ने दरवाजा बंद कर लिया, जिस के बाद मकान से झगड़े की आवाज आनी बंद हो गई. फिर पड़ोसी भी अपनेअपने घरों में चले गए. लेकिन 45 मिनट बाद मोनू लहूलुहान अपने घर से निकला और पड़ोस में रहने वाले एक परिचित को ले कर शाजापुर के जिला अस्पताल पहुंचा.
मोनू के पेट से खून बह रहा था. पूछने पर मोनू ने डाक्टर को बताया कि ज्यादा नशे में होने की वजह से वह गिर गया और चोट लग गई. डाक्टर ने रमेश उर्फ मोनू को अस्पताल में भरती कर लिया. परंतु सुबह रमेश उर्फ मोनू की हालत और बिगड़ जाने के कारण उसे इंदौर के एमवाईएच अस्पताल रेफर कर दिया. उस समय मोनू के पास इतना पैसा भी नहीं था कि उसे इलाज के लिए इंदौर ले जाया जा सके, इसलिए मोनू के दोस्तों ने आपस में चंदा जमा कर कुछ रकम जुटाई और वह मोनू को इंदौर ले गए.

कानून के टप्पेबाजी…

बलाई महासभा के युवा ब्रिगेड के बड़े नेता के घायल हो जाने की बात सुन कर समाज के लोग बड़ी संख्या में अस्पताल पहुंचने लगे. रमेश के परिवार वाले भी उस के जल्द ठीक होने की कामना करने लगे. परंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था. 6 जनवरी की सुबह मोनू की मौत हो गई. रमेश की मौत से मामला एकदम बदल गया.
5 दिन से अस्पताल में मौजूद उस के पिता गंगाराम बेटे की मौत की खबर सुन कर टूट गए. वह रोते हुए बेटे की मौत का आरोप अपनी बहू मंजू पर लगाने लगे. उन का यह आरोप सुन कर अस्पताल के एमएस ने संयोगितागंज थाने में खबर कर दी. सूचना पा कर थाना पुलिस अस्पताल पहुंच गई. पुलिस ने जरूरी काररवाई पूरी कर के रमेश का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

रेव पार्टी: डांस, ड्रग्स और सैक्स का तड़का

प्रारंभिक पूछताछ में रमेश के पिता गंगाराम व बुआ गीता बलाई ने पुलिस को बताया कि रमेश ने खुद उन्हें बताया था कि उसे उस की पत्नी मंजू ने चाकू मारा है. लेकिन समाज में बदनामी के डर से वह गिर कर चोट लगने की बात कहता रहा.
पुलिस ने उन से मंजू के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मंजू तो घटना के बाद से एक बार भी अपने पति को देखने अस्पताल नहीं आई. वह पति को देखने अस्पताल क्यों नहीं आई, यह बात पुलिस की समझ में नहीं आ रही थी. इस से पुलिस का मंजू पर शक गहरा गया.

मुन्ना बजरंगी हत्याकांड : जेल में सब हो सकता है

संयोगितागंज थाना पुलिस ने अपने यहां जीरो एफआईआर दर्ज कर के डायरी शाजापुर कोतवाली भेज दी. यहां रमेश की हत्या किए जाने की बात सामने आने पर बलाई समाज के लोगों में भारी आक्रोश फैल गया.
समाज के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हो कर एसपी शैलेंद्र चौहान से मिले और रमेश की पत्नी मंजू को गिरफ्तार करने की मांग करने लगे. जिस पर एसपी ने बलाई समाज के लोगों को आश्वासन दिया कि जल्द ही आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. तब कहीं जा कर रमेश का अंतिम संस्कार किया गया.
रमेश की चिता की आग शांत होने के बाद आरोपी की गिरफ्तारी को ले कर लोगों में गुस्से की आग फिर भड़क उठी. चूंकि मंजू भी भाजपा नेत्री थी, इसलिए पुलिस भी जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती थी, जिस से मामला उलटा पड़ जाए.
कोतवाली इंसपेक्टर के.एल. दांगी बड़ी ही सावधानी से एकएक कदम बढ़ा रहे थे. वरिष्ठ अधिकारियों से मशविरा करने के बाद उन्होंने मृतक रमेश की पत्नी मंजू को हिरासत में ले लिया. जब उस से रमेश की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो उस ने रमेश चंद्र की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

शाजापुर के मध्यमवर्गीय बलाई परिवार में जन्मे रमेशचंद्र उर्फ मोनू की मां का देहांत उस समय हो गया था, जब रमेश बाल्यावस्था में था. मां के बिना रमेश गलत संगत में पड़ गया, जिस से मिली पिता की डांट से नाराज हो कर वह सन 1995 में घर से भाग कर गुजरात के भावनगर चला गया और वहां के एक होटल में नौकरी करने लगा.

गैंगस्टरों का खूनी खेल

वहां उस की मुलाकात मुंबई के एक जैन व्यापारी से हुई. होटल का काम छोड़ कर वह जैन व्यापारी के साथ चला गया. उसी दौरान उस ने ड्राइविंग सीख ली और जैन व्यापारी की कार चलाने लगा. जैन व्यापारी उन दिनों श्वेतांबर जैन संत सुरेशजी महाराज के भक्त थे और अकसर उन की सेवा करने जाया करते थे. इस दौरान रमेश भी अपने सेठ के साथ रहता था.
संयोग से एक रोज सुरेशजी महाराज ने सेठ से उन के ड्राइवर रमेश को कुछ दिन अपने साथ रखने को ले लिया. सेठजी भला अपने गुरुजी की बात कैसे टाल सकते थे. लिहाजा उन्होंने रमेश को महाराज के हवाले कर दिया. सुरेशजी महाराज के संपर्क में आ कर रमेश ने जैन धर्म को नजदीक से जाना.

राजेश साहनी की खुदकुशी : एटीएस कैंपस में दफन है 

धर्म में उस की रुचि देख कर सुरेशजी महाराज ने उसे दीक्षा दी और उस का नाम तरुणजी महाराज रख दिया. इस तरह रमेश की योग्यता और संयम देख कर उसे स्थानक वासी की पदवी दी गई. जिस के बाद वह देश भर में घूमघूम कर धार्मिक प्रवचन देने लगा.
उस के पिता को जब पता चला कि बेटा संत हो गया है तो वह बहुत खुश हुए. धर्म के मामले में असाधारण योग्यता के चलते रमेश ने समाज में काफी सम्मानित स्थान हासिल कर लिया था.
लेकिन उस की लाइफ काफी एक्सीडेंटल निकली. अचानक ही मालूम नहीं उस के मन को क्या आया कि वह त्याग का मार्ग छोड़ कर वापस सांसारिक दुनिया में आ गया. वह अपने घर लौट आया. बेटे के वापस घर लौटने पर पिता खुश थे.

प्रेमिका और पत्नी के बीच मौत का खेल

शाजापुर आ कर रमेश ने प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया. वह ज्ञानी और धार्मिक प्रवृत्ति का था और सत्य के मार्ग पर चलने वाला भी, इसलिए लोग उस पर आसानी से भरोसा कर लेते थे. देखते ही देखते रमेश का बिजनैस चल निकला, जिस से कुछ ही समय में उस की गिनती समाज और शहर के संपन्न लोगों में होने लगी.
उसी दौरान शहर के एक थाने में पदस्थ सजातीय पुलिसकर्मी की नजर रमेश पर पड़ी. वह रमेश के साथ अपनी बेटी मंजू की शादी करना चाहता था. उस पुलिसकर्मी ने इस बारे में रमेश के पिता से बात की. लड़की सुंदर थी जो रमेश को भी पसंद थी. लिहाजा दोनों तरफ से बातचीत हो जाने के बाद रमेशचंद्र और मंजू की शादी हो गई.

दिल का मामला या कोई बड़ी साजिश

मंजू खूबसूरत तो थी ही, साथ ही पढ़ीलिखी और समझदार भी थी. उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चलती रही. इसी बीच मंजू 2 बेटों की मां बन गई. जब रमेश ने बलाई समाज की राजनीति में दखल देना शुरू किया तो अपने दोनों बेटों के बड़े हो जाने के बाद मंजू भी भाजपा से जुड़ कर उभरती नेत्री के रूप में पहचानी जाने लगी.
लेकिन रमेश की जिंदगी ने फिर एक बार करवट ली. समाज की राजनीति में ज्यादा समय देने के कारण उस का अपना बिजनैस एक तरह से ठप हो गया, जिस पर उस ने पहले तो ध्यान नहीं दिया और जब ध्यान दिया तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

धीरेधीरे स्थिति बिगड़ती गई, जिस के चलते कभी समाज को शराब जैसी बुराई से दूर रहने का उपदेश देने वाला जैन स्थानक वासी रमेश खुद शराब की गिरफ्त में आ गया. जिस के चलते रमेश की पहचान एक शराबी के रूप में बन गई.
मंजू को यह कतई उम्मीद नहीं थी कि उस का पति शराबी भी हो सकता है. लेकिन अब तो यह बात सड़कों पर भी जाहिर हो चुकी थी. इसलिए खुद की सामाजिक पहचान कायम कर चुकी मंजू के लिए यह बात असहनीय थी. उस ने पति के शराब पीने का विरोध किया तो दोनों में आए दिन झगड़ा होने लगा, जिस की आवाज धीरेधीरे उन के घर के बाहर भी गूंजने लगी.
फिर एक बार यह आवाज बाहर आई तो यह रोज का क्रम बन गया. ऐसे में एक तरफ जहां मंजू का परिवार टूट रहा था तो वहीं दूसरी ओर पार्टी में उस की पकड़ मजबूत होती जा रही थी.
दोनों के अहं टकराने लगे, जिस से रमेश और भी ज्यादा शराब पीने लगा. राजनीति में सक्रिय होने के कारण मंजू देर रात तक घर से बाहर रहती थी. ऐसे में जब कभी रमेश शराब पी कर पत्नी के घर वापस आने से पहले लौट आता तो पत्नी के देर से वापस आने पर उस पर उलटेसीधे आरोप लगाकर उस से झगड़ना शुरू कर देता.

प्रेमिका से शादी के लिए मां बाप से खूनी दुश्मनी

अब मंजू को अपना राजनैतिक भविष्य स्वर्णिम दिखाई देने लगा था. उसे दूर तक जाने का रास्ता साफ दिख रहा था, इसलिए उस का वापस लौटना भी संभव नहीं था. पति के विरोध को दरकिनार कर वह राजनीति में और ज्यादा सक्रिय हो गई. हाल ही में संपन्न हुए प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मंजू ने पार्टी के हित में दिनरात मेहनत की.
जाहिर है राजनीति में शामिल कई महिलाओं के अच्छेबुरे किस्से अकसर चर्चा में बने रहते हैं, इसलिए रमेश भी पत्नी पर इसी तरह के आरोप लगाने लगा. वह उस के राजनीति में सक्रिय रहने पर ऐतराज करता था.
इस से दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि वे एक ही छत के नीचे अलगअलग कमरों में रहने लगे. इस से दिन में तो शांति रहती लेकिन रात को रमेश के शराब पी कर आने पर सारी शांति कलह में बदल जाती थी. दोनों में रोजरोज रात में अकसर विवाद होने लगा.

11 दूल्हों को लूटने वाली दुल्हन

31 दिसंबर, 2018 को रात 11 बजे के करीब रमेश ने शराब के नशे में आ कर घर का दरवाजा खटखटाया तो मंजू ने काफी देर बाद दरवाजा खोला. इस से रमेश को शक हो गया कि मंजू तो यह सोच कर बैठी होगी कि आज साल का आखिरी जश्न होने के कारण मैं रात भर घर वापस नहीं लौटूंगा, इसलिए उस ने किसी और के साथ पार्टी करने की योजना बना ली होगी. मंजू के देर से दरवाजा खोलने पर रमेश को शक हो गया कि मंजू के साथ घर में कोई और है.
दरवाजा खोलते ही वह पत्नी पर उलटेसीधे आरोप लगा कर मारपीट करने लगा. इस से विवाद इतना बढ़ गया कि उस का शोर पड़ोसियों के कानों तक पहुंच गया. उसी समय पड़ोसी श्याम वर्मा ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस ने आ कर दोनों का मामला सुलझा दिया और वापस लौट गई.
लेकिन पुलिस के जाने के बाद एक बार फिर दोनों में विवाद गहरा गया और इस दौरान मंजू ने मोनू की जेब में हमेशा रखा रहने वाला खटके वाला चाकू निकाल कर उस के पेट में घोंप दिया. चाकू काफी गहरा जा घुसा जिस से वह गंभीर रूप से घायल हो गया. लेकिन शराब के नशे में उसे घाव की गंभीरता का अहसास नहीं हुआ इसलिए वह अपने कमरे में जा कर लेट गया.

अल्लाह के नाम पर बेटी की कुर्बानी

कुछ देर बाद रमेश के पेट में दर्द बढ़ा तो पड़ोस में रहने वाले अपने परिचित के साथ वह अस्पताल गया, जहां से सुबह उसे इंदौर भेज दिया गया. लेकिन वहां भी इलाज के दौरान 6 जनवरी को उस की मौत हो गई.
थानाप्रभारी के.एल. दांगी ने मंजू से पूछताछ के बाद हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद कर लिया. इस के बाद उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. द्य
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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