रोहित शेखर हत्याकांड न मिला प्यार न मिली दौलत

साल 2017 में दोनों के बीच इश्क का फुतूर क्या चढ़ा, उन का एक पल के लिए एकदूसरे से जुदा होना मुश्किल हो गया. एक के पास सियासत और दौलत का रुतबा था, तो दूसरे के पास बेपनाह हुस्न. वैसे, रोहित शेखर कोई मामूली शख्स भी नहीं था.

वह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 4 बार मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी का बेटा था. हालांकि खुद को बेटा साबित कराने के लिए रोहित शेखर ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी. लंबे समय तक साथ रहने के बाद अपूर्वा और रोहित शेखर तिवारी की सगाई हुई और फिर 11 मई, 2018 को दिल्ली के 5, अशोका रोड पर बने आनंद भवन में दोनों की शानदार शादी हुई. हालांकि जिस वक्त उन दोनों की शादी हो रही थी, तब नारायण दत्त तिवारी अस्पताल में भरती थे. एनडी तिवारी के ‘गुंजनू’ एनडी तिवारी रोहित को प्यार से ‘गुंजनू’ बुलाते थे. कानूनी विवाद खत्म होने के बाद मार्च, 2014 से रोहित शेखर अपने पिता एनडी तिवारी के साथ ही रहने लगा था. इस से पहले साल 2008 में रोहित शेखर ने जब अदालत में मामला दायर कर खुद को एनडी तिवारी का बेटा बताया था, तो देश में सनसनी फैल गई थी. शुरुआत में एनडी तिवारी ने रोहित शेखर को अपना बेटा मानने से इनकार किया था, पर बाद में जब डीएनए रिपोर्ट से यह साबित हो गया था कि रोहित एनडी तिवारी का ही बेटा है, तो एनडी तिवारी ने साल 2014 में रोहित शेखर की मां उज्ज्वला से लखनऊ में शादी कर ली थी.

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घूरती निगाहों से परेशान था जानकारों का मानना है कि उज्ज्वला और रोहित शेखर का एनडी तिवारी के घर पर बेरोकटोक आनाजाना होता था. वे अकसर वहां रहते भी थे. पत्नी उज्ज्वला एनडी तिवारी के रुतबे के आगे बोलने से ज्यादा खामोश रहना ही बेहतर समझती थीं. पर बड़े होते बेटे रोहित को समझना उतना आसान नहीं था. रोहित को नाजायज बेटा कहलाना और मां उज्ज्वला को नाजायज रिश्ता नागवार गुजरता था. जब लोगों खासकर करीबियों की घूरती निगाहें रोहित को परेशान करने लगीं तो उस ने अदालत में खुद को एनडी तिवारी का बेटा साबित करने की अर्जी डाल दी. कानूनी लड़ाई, लोगों के सवालात, घूरती निगाहों ने तब रोहित को परेशान किया होगा, इस में शक नहीं. पर इन परेशानियों में खुद को मजबूत करने के बजाय वह नशा करने लग गया था. बातबात पर गुस्सा करना और दबंगई पर उतरना उस की आदतों में शुमार हो चुका था. क्यों शक करती थी अपूर्वा रोहित शेखर की पत्नी अपूर्वा उस पर अलग मकान लेने का दबाव बनाती थी. हालांकि जिस घर में अपूर्वा, रोहित और उज्ज्वला रह रहे थे, वह कोई मामूली जगह भी नहीं है. डिफैंस कालोनी दिल्ली की पौश कालोनियों में शुमार है और यहां मकान होना किसी सपने से कम नहीं है. इन सब से अलग अपूर्वा को रोहित का शादी के बाद भी घुमंतू बने रहना और दोस्तों में समय बिताना पसंद नहीं था.

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वह रोहित पर शक करने लगी थी और जब वह बाहर होता था तो बारबार फोन करती रहती थी. कई बार तो वह वीडियो काल भी करती और रोहित को वीडियो काल पर यह दिखाने को कहती कि वह कहां है और उस के साथ और कौनकौन हैं? झगड़े की वजह पुलिस तफतीश में भी जो बातें सामने आ रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के मुताबिक, ‘‘एनडी तिवारी के ओएसडी रहे राजीव की पत्नी के साथ रोहित शेखर की बढ़ती नजदीकियों से अपूर्वा परेशान थी. उस की यह परेशानी तब और बढ़ गई, जब उसे पता चला कि राजीव के बेटे को प्रोपर्टी में हिस्सेदार बनाने की बात चल रही है. इन सब वजहों से वह डिप्रैशन में आ गई थी.’’ मीडिया में रोहित शेखर की मां उज्ज्वला का बयान और पुलिस तफतीश में कही गई बातों में समानता भी इस बात की तसदीक कर रही थीं. कुछ दिन पहले रोहित की मां उज्ज्वला ने कहा भी था, ‘‘हां, अपूर्वा की नजर प्रोपर्टी पर थी और इस में हिस्सेदारी को ले कर वह रोहित से आएदिन झगड़ती रहती थी.’’ दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के ऐडिशनल सीपी राजीव रंजन ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘‘मां ने 60 और 40 फीसदी की हिस्सेदारी में अपने बेटों के नाम प्रोपर्टी कर दी थी. वसीयत में यह साफ कर दिया गया था कि अगर एक लड़के की मौत होती है तो उस की जगह दूसरे को हिस्सेदारी मिल जाएगी. इस में अपूर्वा का कहीं नाम नहीं था. न ही उस की कहीं हिस्सेदारी थी. इस बात को ले कर वह परेशान थी. ‘‘रोहित के भाई, जिस के हिस्से में 40 फीसदी हिस्सेदारी थी, वह कुंआरा है और उस ने यह कह रखा है कि वह अपना हिस्सा उस महिला रिश्तेदार के बेटे के नाम कर देगा. अपूर्वा को इस पर भी एतराज था.’’ यह रही मौत की वजह दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की तफतीश के बाद जारी बयान की बात करें तो रोहित शेखर तिवारी की मौत उस रात अपूर्वा द्वारा की गई वीडियो काल की वजह से भी बनी. दरअसल, जब रोहित शेखर कार से उत्तराखंड से वापस लौट रहा था तो उसी शाम आदतन अपूर्वा ने वीडियो काल की. वीडियो काल में उसे एक औरत भी दिखाई दी जो रोहित शेखर के बगल में बैठी थी. रोहित उस समय चलती कार में ही शराब पी रहा था. रोहित के बगल में बैठी वह औरत रोहित की भाभी कुमकुम थी, जिस को ले कर अपूर्वा शक करती रहती थी. उसे रोहित के साथ देख कर अपूर्वा अपना आपा खो बैठी और वही वीडियो काल रोहित की मौत की वजह भी बनी. क्या हुआ था उस रात रात को जब रोहित घर आया तो साथ में कुमकुम भी थी. सब ने घर में साथ बैठ कर खाना खाया. बाद में वह औरत, उस का पति और दूसरे लोग उज्ज्वला के साथ तिलक लेन वाले घर पर चले गए तो रोहित पहली मंजिल पर अपने कमरे में जा कर सो गया. वह बेहद नशे में था. अपूर्वा के पूछने पर रोहित ने बताया कि वह औरत भी उस के साथ एक ही गिलास में शराब पी रही थी तो अपूर्वा आगबबूला हो उठी और उस ने रोहित का मुंह और नाक तकिए से दबा दिया.

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चूंकि रोहित नशे में तकरीबन बेहोशी की हालत में था इसलिए वह खिलाफत नहीं कर पाया और दम घुटने से उस की मौत हो गई. यह बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आने के बाद भी साबित हो चुकी है. शुरुआत में सभी लोग रोहित की मौत की वजह कुदरती ही मानते रहे, पर जब पुलिसिया तफतीश और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो परत दर परत सब खुलने लगा. पहली गिरफ्तारी पत्नी अपूर्वा की हुई. पुलिस की मानें तो अपूर्वा चूंकि पेशे से वकील थी, इसलिए कानूनी दांवपेंच में भी वह माहिर थी. वह पुलिस को बरगलाने के लिए मौत की वजह ओवरडोज नशे को बताती रही. वह बारबार बयान भी बदल रही थी. इस से पुलिस का शक और गहरा गया. पुलिस की सख्ती पर अपूर्वा टूट गई और अपना जुर्म कबूल कर लिया. कह सकते हैं कि इस मौत से जहां अभी तक कई अनसुलझे सवाल रह गए हैं, तो वहीं आजकल की महानगरीय संस्कृति में रिश्तों के दरकने और दांपत्य का कमजोर होना भी कई सवाल खड़े करता है. रोहित अगर शराबी हो गया था तो उसे अपूर्वा सही रास्ते पर ला सकती थी.

झगड़े की वजह अगर प्रोपर्टी थी तो रोहित शेखर के नाम हुई प्रोपर्टी पर कानूनन अपूर्वा भी हकदार थी, जिसे नाहक अपने नाम प्रोपर्टी कराने की जिद थी. अपूर्वा रोहित पर शक करती थी. मुमकिन है कि इसी अनदेखी और झगड़े ने रोहित को और बिगड़ैल बना दिया हो. जिस प्यार की खातिर एनडी तिवारी बदनाम हुए थे, उसे सूझबूझ दिखा कर उन्होंने तो अपना लिया, मगर बेटा रोहित अपने प्यार को सहेजने में नाकाम रहा और आखिरकार एक नामी परिवार का हश्र भी किसी मर्डर मिस्ट्री फिल्मों की तरह ही हुआ, जहां न किसी को प्यार मिला और न ही दौलत. सबकुछ एक ही झटके में खत्म…

उंगली पर नीली स्याही से नहीं बदलेगी जिंदगी

लेखक- सुनील शर्मा

अभी हाल ही में किसी ने सोशल मीडिया के एक मजबूत खंभे फेसबुक पर एक मैसेज अपलोड किया था कि आप सभी अपने घरों से निकल कर वोट देने जरूर जाएं. हर वोट कीमती है. ऐसा ही मैसेज किसी और ने भी लिखा था कि वोट देना हमारा हक ही नहीं फर्ज भी है, क्योंकि हर वोट जरूरी है. एक आम नागरिक के लिए वोट की अहमियत इतनी ज्यादा बता दी गई है कि 26 जनवरी यानी ‘गणतंत्र दिवस’ से एक दिन पहले 25 जनवरी को भारत में ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ मनाया जाता है. इस दिन को मनाने की वजह यह बताई गई है कि भारत जैसे दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र में वोट डालने को ले कर लोगों का रुझान कम होता जा रहा है.

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सवाल उठता है कि वोट देना क्यों जरूरी है और जिन लोगों को हम चुन कर लोकसभा या विधानसभा में भेजते हैं, क्या वे हमारी समस्याओं को हल करने में कामयाब रहते हैं? अगर पिछले 5 साल की बात करें तो देश में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पूरे बहुमत वाली तथाकथित दमदार सरकार रही. नरेंद्र मोदी के रूप में एक कद्दावर प्रधानमंत्री देश को मिला. लेकिन क्या वे देश की समस्याओं को हल कर सके? नहीं. और कभी कर भी नहीं पाएंगे. सच तो यह है कि कोई भी नहीं कर सकता है. इस की एक बहुत बड़ी वजह है और वह यह है कि जनता नेताओं से तो सवाल करती है कि उन्होंने देश की तरक्की के लिए क्या किया, लेकिन कभी वह खुद से भी सवाल करती है कि उस ने देश को आगे बढ़ाने में अपना क्या योगदान दिया है? गांव हों या शहर, कहीं भी नजर दौड़ा कर देख लीजिए, गंदगी के ढेर मिल जाएंगे, सड़कें और गलियां टूटीफूटी मिलेंगी, नालियों में बजबजाता गंदा पानी ओवरफ्लो हो रहा होगा, काम होगा भी तो भी हर जगह निठल्लों की फौज दिखाई देगी, सरकारी हों या प्राइवेट औफिस के लोग टाइमपास करते मिलेंगे, किसी तरह अपनी 8 घंटे की नौकरी हो जाए, बाकी दुनिया जाए फिर भाड़ में. बहुत से लोग दलील देते हैं कि हम ने तो टैक्स भर दिया, अब सारी जिम्मेदारी सरकार की है.

हमारा काम खत्म. लेकिन क्या इस सोच से देश हर मामले में अव्वल हो सकता है? कभी नहीं. वैसे भी अगर किसी देश ने तरक्की की है तो वह उस की जनता की बदौलत ही हुई है. सरकारें तो बस व्यवस्था को बनाए रखने में मददगार साबित हो सकती हैं. जनता अपना काम ईमानदारी से करे तो फिर किसी सरकार, पुलिस, सेना वगैरह की जरूरत ही नहीं होगी. इस बात को उदाहरण से समझते हैं. हमारा मानना है कि किसी गांव या शहर में जनता का असली साथी वहां की ग्राम पंचायत या नगरनिगम होता है. हमारे देश में ऐसे बहुत से गांव हैं जो अपने दम पर कुदरत के साथ खिलवाड़ किए बिना इतनी ज्यादा तरक्की कर चुके हैं कि दुनिया उन्हें देखने आती है. महाराष्ट्र का एक गांव है हिवरे बाजार. वहां के लोग साल 1989 तक बहुत पिछड़े हुए थे. जब कहीं से भी किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिली तो गांव के ही 25-30 नौजवानों ने फैसला लिया कि किसी भी तरह गांव के हालात को बदला जाए. इस के लिए उन्होंने गांव के ही एक जागरूक नौजवान पोपटराव पवार को एक साल के लिए वहां का सरपंच बनवा दिया. पोपटराव पवार ने उन नौजवानों के साथ मिल कर बाकी गांव वालों को अपने साथ जोड़ने का काम शुरू किया. ग्राम पंचायत का कोई भी फैसला तमाम गांव वालों के सामने लिया जाने लगा. बस, फिर क्या था. स्कूल के लिए जमीन चाहिए थी तो कुछ परिवारों ने अपनी जमीन दे दी. स्कूल के लिए कमरा बनवाना था तो सरपंच समेत पूरे गांव के लोगों ने श्रमदान किया. कुछ नौजवानों ने स्कूल में टीचरों की कमी भी पूरी कर दी. जिस के पास जितना समय था, वह स्कूल में पढ़ाने के लिए देने लगा.

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इन कोशिशों से गांव वालों की समझ में आ गया कि उन के गांव का भविष्य अब ठीक हो सकता है. लेकिन अभी दिल्ली दूर थी. सूखा पड़ता था इसलिए गांव में पानी की बहुत ज्यादा कमी थी. सरपंच पोपटराव पवार की सलाह पर गांव वालों ने चैकडैम बनाए. पानी का लैवल थोड़ा बढ़ा तो फैसला लिया गया कि किसान गन्ना, केला जैसी फसलें नहीं उगाएंगे क्योंकि ये फसलें ज्यादा पानी सोखती हैं. गांव में लोगों के बकरी पालने पर बैन लगाया गया, क्योंकि बकरियां जंगल में पौधे चर जाती थीं. एक और बड़ी समस्या थी कि गांव के कुछ लोगों ने ग्राम सभा की जमीन पर कब्जा कर लिया था. उन से जमीन छुड़वाना आसान काम नहीं था लेकिन ग्राम सभाओं में इस मुद्दे को बिना किसी मुकदमे के सुलझा लिया गया और पूरी जमीन से गैरकानूनी कब्जा हटवा कर उस में से कुछ जमीन गांव के गरीब परिवारों को दे दी गई. इस में सरकार का क्या योगदान रहा? न के बराबर. गांव के लोग और उन का जागरूक सरपंच ही यह बदलाव ले आए. इन्हीं देशी लोगों की मेहनत का ही नतीजा है कि आज यह गांव करोड़पति लोगों का गांव कहा जाता है. इस गांव को कई अवार्ड मिल चुके हैं.

दूसरे गांवों के सरपंच इसे देखने आते हैं कि वे भी सीख ले कर अपने गांव को सुधार सकें. हमारे देश में केवल हिवरे बाजार ही एकलौता गांव नहीं है जहां के सरपंच ने उसे तरक्की की राह दिखाई है. कुछ इसी तरह से उत्तर प्रदेश में नेपाल देश से सटे सिद्धार्थनगर जिले का एक गांव हसुडी औसानपुर आज डिजिटल गांव बन चुका है. वहां के सरपंच दिलीप त्रिपाठी ने अपने खर्चे पर इस पिछड़े गांव को अपनी मेहनत से दुनिया के नक्शे पर ला दिया है. सरपंच दिलीप त्रिपाठी ने बताया, ‘‘गांव वालों को अपने सरपंच पर यकीन करना पड़ेगा और साथ ही सरपंच को भी अपने काम में पारदर्शिता बरतनी होगी. अगर गांव वाले जागरूक होंगे तो वे गांव संबंधी छोटेमोटे काम तो खुद ही निबटा लेंगे. आपसी चंदा इस में बहुत बड़ा योगदान दे सकता है. ‘‘आजकल गांवों में एक बहुत बड़ी समस्या है कि लोग बेहतर जिंदगी की खातिर वहां से शहरों की तरफ भाग रहे हैं. इस से गांवों की तरक्की पर बुरा असर पड़ता है. इस का हल यही है कि वहां के बाशिंदे आपसी तालमेल से गांव को ही बेहतर बनाएं, ताकि उन्हें अपना गांव न छोड़ना पड़े.’’ दिलीप त्रिपाठी और गांव वालों की मेहनत का ही नतीजा है कि आज इस गांव में निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. इस के अलावा गांव में वाईफाई की भी सुविधा है. गांव का जीआईएस मैपिंग का काम भी पूरा हो चुका है. गांव का हर घर गुलाबी रंग में रंग दिया गया है जो वहां की औरतों की बढ़ती ताकत को दिखाता है. सरकारी स्कूल के तो कहने ही क्या. वहां की दीवारों पर छात्रों को जागरूक करने वाले चित्रों और बातों को देख कर पता चलता है कि सरपंच की सोच किस हद तक मौडर्न है. इसी तरह राजस्थान का पिपलांत्री, गुजरात का पुंसारी, बिहार का धनरई, कर्नाटक का बेक्किनाकेरी, हरियाणा का छप्पर ऐसे आदर्श गांव हैं जहां सरपंच और वहां के लोगों की जुगलबंदी ने गांव की काया ही पलट दी है. यह सब होने में औरतों की भागीदारी को भी नहीं नकारा जा सकता है. मध्य प्रदेश के हरदा जिले की धनवाड़ा ग्राम पंचायत की महिला सरपंच लक्ष्मीबाई जाट ने स्वच्छता मिशन के तहत गांव में न केवल शौचालय बनवाए हैं, बल्कि गांव वालों को उन्हें इस्तेमाल करने के लिए जागरूक भी किया है. इतना ही नहीं, लक्ष्मीबाई जाट ने गांव की दीवारों को सजा कर उन पर पेंटिंग बनवाई हैं.

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इस के अलावा गांव की सभी सड़कों के किनारे नालियां बनवाई गई हैं और कोई भी सड़क पर कचरा नहीं फेंक सकता है. लक्ष्मीबाई जाट की इस लगन और मेहनत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 फरवरी, 2019 को उन्हें ‘स्वच्छ शक्ति अवार्ड’ से सम्मानित किया था. गांवदेहात में जो काम पंचायत का होता है वही काम शहरों में नगरनिगम करता है. किसी शहर को साफसुथरा रखने में उसी का सब से बड़ा योगदान होता है और नगरनिगम के कर्मठ कर्मचारी अपने शहर के लोगों की मदद ले कर या उन्हें जागरूक कर के यह सब कर पाते हैं. नगरनिगम लोगों के लिए अस्पताल, पानी की सप्लाई, सीवर की सफाई करने, बाजार के लिए जगह, फायर ब्रिगेड, सड़क, पुल, सड़कों पर बिजली का इंतजाम, पार्क, शिक्षा और क्षेत्र में जन्म लेने और मरने वाले लोगों का ब्योरा रखने जैसे काम करता है. ये सब ऐसे काम हैं जिन में अगर जनता का सहयोग मिलता रहे तो नगरनिगम की राह आसान हो जाती है. ऐसे में मुंबई की ही मिसाल लें तो वहां की लोकल जनता अपने शहर को साफसुथरा बनाए रखने की पूरी कोशिश करती है. वैसे भी मुंबई नगरनिगम देश के सब से धनी नगरनिगमों में से एक है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में दिल्ली की तुलना में सेहत पर 3 गुना ज्यादा और शिक्षा पर 2 गुना ज्यादा खर्च पर ध्यान दिया जाता है जबकि मुंबई नगरनिगम के अंदर आने वाली आबादी दिल्ली से कहीं कम है. शहरों में नगरनिगम से भी एक छोटी इकाई होती है जिसे रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन कहते हैं.

इस में किसी खास महल्ले के लोग आपस में एक समिति बना कर महीनेवार पैसे जमा कर के अपने इलाके की देखभाल करने का बीड़ा उठाते हैं. अगर ईमानदारी बरती जाए तो यह आपसी सहयोग और काम करने की बड़ी मिसाल होती है. ऐसे बहुत से संगठन बिना किसी सरकारी मदद के अपने इलाके को चमका कर रखते हैं. पर जब ऐसी संस्थाओं पर धार्मिक आडंबर हावी होने लगता है तो महल्ले की भलाई में काम आने वाला पैसा जागरणोंकीर्तनों की भेंट चढ़ने लगता है. जो पैसा सफाई वाले की जेब में जाना चाहिए, वह पुजारी को चढ़ाया जाने लगता है. जब ऐसा होता है तो ऐसे संगठन टूट कर बिखर जाते हैं. कहने का मतलब यह है कि 5 साल में एक बार किसी सियासी दल को अपना वोट दे कर हम यह न समझें कि अब हमारा काम खत्म हो गया है. अब तो सरकार ही हमारे मुंह में निवाला डालेगी. पर ऐसा हकीकत में होता नहीं है. एक उदाहरण से इसे समझते हैं. मान लीजिए, आप शहर में किसी महल्ले में रहते हैं, एक दिन वहां का सफाई वाला नहीं आता है तो क्या आप के साथसाथ यह उस महल्ले के दूसरे लोगों का फर्ज नहीं बनता है कि वे जिस तरह अपने घर की सफाई करते हैं उसी तरह अपने घर के आसपास की 20 फुट की जगह को भी बुहार दें?

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मुश्किल से 10 मिनट में यह काम हो जाएगा और सभी एकसाथ करेंगे तो चुटकियों में पूरा महल्ला साफ दिखेगा. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? हमारी इसी काहिली का फायदा तमाम सियासी दल उठाते हैं. वे जानते हैं कि ये सब तो दास मलूका के अजगर हैं, इन का चाकरी से क्या लेनादेना. इन्हें तो वोट के खेल में उलझाए रखो बस, क्योंकि अगर ये खुद सारे काम करने लगेंगे तो सरकार ही बेरोजगार हो जाएगी. और जब सब लोग मिलजुल कर काम करेंगे तो उन में बंधुत्व की भावना बढ़ेगी जिस से समाज में अपराध कम होंगे, तो फिर पुलिस और सेना भी किसी काम की नहीं रहेगी, इसलिए उन्हें हमारा काम करना ही सब से ज्यादा अखरता है जबकि हमारा काम ही देश की सच्ची तरक्की है. लिहाजा, चुनाव के समय नीली स्याही का इस्तेमाल तो करो, पर सियासी दलों की काली करतूतों से भी सावधान रहो. हरियाणा में एक कहावत है कि ‘खाल्ली बाणिया के करै, नून की ईंट नून धरै’. इस कहावत का मतलब है कि बनिया आप को कभी भी खाली नहीं मिलेगा. वह अपनेआप को मसरूफ रखता है. और आप को यह बताने की जरूरत नहीं है कि इस देश में जब अमीरों और पढ़ेलिखों की बात आती है तो उन में बनियों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.

लाल बालों में नजर आईं बिग बौस फेम जसलीन, फोटोज हुईं वायरल

‘बिग बॉस 12’ की एक्स कंटेस्टेंट जसलीन मथारु एक बार फिर सुर्खियों में है. इस बार वजह बने हैं उनके बाल, लाल रंग के बालों से मेकओवर करके जसलीन दोबारा अपनी तरफ सभी का ध्यान खींच रही हैं. इससे पहले जसलीन अनुप जलोटा के साथ बिग बौस में जोड़ीदार बनके सुर्खियों में आई थीं.

 लाल बाल में फोटो की शेयर

ज्यादातर लोग जसलीन मथारु के इस लुक की तारीफ कर रहे है.पर कुछ फैंस ऐसे भी हैं जो जसलीन को ट्रोल करने में पीछे नहीं हैं.

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 ग्लैमरस लुक में आई थीं नजर

बिग बौस में रेड बिकनी पहनकर धमाका करने वाली जसलीन मथारु बेहद ग्लैमरस हैं.

 

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Jalpari❤ #bigboss12

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हेटर्स को दिया जवाब

जसलीन ने ट्रोल करने वालों को बिंदास अंदाज में जवाब दिया है. हाल ही में जसलीन ने एक वीडियो के जरिए खुद को ट्रोल करने वाले हेटर्स को नसीहत दी की “कुछ प्रोडक्टिव काम करे”

अनूप जलोटा के साथ जोड़ी बनी पौपुलर

जिस वक्त जसलीन बिग बौस 12 में हिस्सा लेने आई थी उस दौरान उन्होंने अपने ही गुरू और 65 वर्षीया मशहूर ‘भजन सम्राट’ अनूप जलोटा के साथ इश्क का ऐलान कर पूरे देश को सकते में डाल दिया था. बाद में अनूप जलोटा ने इस चीज को स्वीकार किया की ये सब उन्होंने बिग बॉस में आने के लिए किया था.

 

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Had a lovely music session today.. @jalotaanup ❤❤😘

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सिंगींग का रखती हैं शौक

जसलीन एक अच्छी गायिका भी हैं. उन्होंने अनूप जलोटा से ही संगीत की शिक्षा ली है. लेकिन बिग बॉस में उनका ये गुण केवल इक्का-दुक्का बार ही सुनाई दिया था.

Edited by – Neelesh Singh Sisodia 

नये अंदाज में नजर आई टीवी की “तपस्या”, देखें वीडियो

टीवी शोज और भोजपुरी फिल्मों की जान कही जाने वाली रश्मि देसाई इन दिनों सोशल मीडिया में काफी एक्टिव हैं. होट और बौल्ड अंदाज में नजर आने वाली रश्मि के फैंस को उनके सभी लुक्स बेहद पसंद आते हैं. हाल ही में उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउन्ट पर एक वीडियों शेयर किया है जिसमें वो फोटोशूट कराती दिख रही हैं.

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टीवी से भोजपुरी फिल्मों तक…

“उतरन” की “तपस्या” हो या नागिन का अवतार रश्मि ने सभी का दिल जीता.  शायद यही कारण है की आज तपस्या यानी रश्मि देसाई घर-घर में जानी जाती हैं. रश्मि “झलक दिकला जा”, “कौमेडी सर्कस” और “जरा नचके दिखा” जैसे कई टीवी रियालिटी शो में भी नजर आ चुकी हैं. बात उनके भोजपुरी फिल्मीं कैरियर की बात  करे तो उन्होंने “बलम बड़ा नादान” से शुरुआत की थी “बंबई की लैला छपरा का चैला”, “बदन टूटे ना” और  “दुल्हा बाबू” में भी नजर आईं.

 

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#be you change the world 💓💎💃 #itsallmagical💫🌟

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सोशल मीडिया में मचाया धमाल…

बात उनके सोशल मीडिया फैंस की करे तो अकेले इंस्टाग्राम अकाउन्ट पर उनके 1.9 मिलीयन फौलोवर्स है. फेसबुक पर भी उनके फैंस कम नहीं हैं.

 

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Hello 💛 #EntertainmentKiRaat @colorstv Outfit @srstore09 Jewellery @shubhashini.ornamentals Styled by @saachivj

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सुर्खियों में रही पर्सनल लाइफ…

रश्मि की पर्सनल लाइफ हमेशा चर्चायों में रही. को- एक्टर के साथ शादी और फिर तलाक के बाद भी उनकी फैनफौलोविंग में कभी कमी नहीं आयी. बता दे की रश्मि ने साल 2012 में नंदिश सन्धु के साथ शादी की, पर ये शादी ज्यादा टिक नहीं पाई और साल 2015 में वो अलग हो गये.

 

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बेटे ने मम्मी की बना दि ममी…

भोपाल के बागसेवनिया थाने के अंतर्गत आने वाले विद्यासागर के सेक्टर-सी स्थित फ्लैट रामवीर
सिंह ने 6 लाख रुपए में खरीदा था. रामवीर सिंह शहर के ही नेहरू नगर में निधि नाम का एक रेस्टोरेंट चलाते थे. उन के रेस्टोरेंट को इस इलाके में हर कोई जानता है. वजह यह भी है कि उन का रेस्टोरेंट अच्छाखासा चलता था. मूलत: ग्वालियर के रहने वाले रामवीर सिंह सालों पहले रोजगार की तलाश में भोपाल आए थे और फिर यहीं के हो कर रह गए थे.
रेस्टोरेंट चल निकला और कुछ पैसा भी इकट्ठा हो गया तो उन्होंने उस पैसे को कहीं लगा देने की बात सोची. रामवीर के रेस्टोरेंट पर कभीकभार आने वाला एक ग्राहक अमित श्रीवास्तव भी था. अमित पर उन का ध्यान इसलिए भी गया था कि वह आमतौर पर शांत और गुमसुम सा रहता था.
उस की बोलचाल में रामवीर को ग्वालियर, चंबल का लहजा लगा तो उन के मन में उस के बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुई. दोनों में बातचीत होने लगी तो रामवीर को पता चला कि अमित ग्वालियर का ही रहने वाला है और विद्यानगर में अपनी बूढ़ी मां विमला देवी के साथ रहता है.
एक दिन यूं ही उन के बीच हुई बातों में रामवीर को पता चला कि अमित अपना फ्लैट बेचना चाहता है. यह बात रामवीर को इसलिए अच्छी लगी क्योंकि अपने रेस्टोरेंट की वजह से वह उसी इलाके में रहने के लिए फ्लैट खरीदना चाहते थे.

दोनों के बीच बात चली तो सौदा भी पट गया. 6 लाख रुपए में एक बड़े रूम, किचन और बालकनी वाला फ्लैट रामवीर को घाटे का सौदा नहीं लगा. लिहाजा उन्होंने अमित से बात पक्की कर ली.
जून 2018 में रामवीर ने फ्लैट देख कर उस की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली. इसी दौरान उन्हें अहसास हुआ कि इस संभ्रांत कायस्थ परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. फ्लैट विमला के नाम पर था, जिसे बेचने की सहमति उन्होंने रामवीर को दे दी थी. अमित पहले कहीं नौकरी करता था जो छूट गई थी. उस के घर में उस की बूढ़ी लकवाग्रस्त मां विमला श्रीवास्तव ही थीं, जिन की देखरेख की जिम्मेदारी अमित पर थी.
रजिस्ट्री के वक्त रामवीर ने अमित को ढाई लाख रुपए दिए थे और बाकी रकम भोपाल विकास प्राधिकरण यानी बीडीए में जमा कर दी थी, क्योंकि फ्लैट बीडीए का था. इस तरह अमित का हिसाबकिताब बीडीए से चुकता हो गया तो कागजों में फ्लैट पर उन का मालिकाना हक हो गया.

जैसा सोचा था, अमित वैसा नहीं निकला

रजिस्ट्री के पहले ही अमित ने उन से कहा था कि वे मकान खाली करवाने की बाबत जल्दबाजी न करें, कहीं और इंतजाम होते ही वह उस में शिफ्ट हो जाएगा और फ्लैट की चाबी उन्हें सौंप देगा.
चूंकि अमित देखने में उन्हें ठीकठाक और शरीफ लगा था, इसलिए उस की बूढ़ी मां का लिहाज कर के इंसानियत के नाते उन्होंने अमित को कुछ मोहलत दे दी. वैसे आजकल खरीदार रजिस्ट्री तभी करवाता है, जब उसे मकान, दुकान या फ्लैट खाली मिलता है.
उस वक्त रामवीर को जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह मानवता उन्हें कितनी महंगी पड़ने वाली है. या कहें उन्होंने फ्लैट नहीं बल्कि एक आफत मोल ले ली है.
दरअसल, अमित उतना सीधासादा या भोला नहीं था, जितना कि वह देखने में लगता था. चूंकि सौदा बिना किसी अड़चन और दलाल के हो गया था, इसलिए उन्होंने किसी बात पर गौर नहीं किया, सिवाय इस के कि अब रजिस्ट्री तो उन के नाम हो ही चुकी है. जब अमित अपना कोई इंतजाम कर चाबी उन्हें सौंप देगा तो मकान की साफसफाई और रंगाईपुताई करा कर वे उस में रहने लगेंगे.
रजिस्ट्री के बाद भी अकसर अमित उन के रेस्टोरेंट पर आता रहता था और उन्हें आश्वस्त करता रहा था कि वह मकान ढूंढ रहा है और ढंग का मकान मिलते ही फ्लैट छोड़ देगा. जब वह कुछ दिन नहीं आता तो रामवीर उस से मोबाइल फोन पर बात कर लेते थे.

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जून से ले कर अगस्त, 2018 तक तो अमित उन के संपर्क में रहा, लेकिन फिर उस का फोन एकाएक बंद जाने लगा. इस से रामवीर थोड़ा घबराए, क्योंकि अमित ने उन्हें फ्लैट खाली करने की सूचना नहीं दी थी. जब उस का फोन लगातार बंद जाने लगा तो वे फ्लैट पर पहुंचे, लेकिन वहां हर बार उन का स्वागत लटकते ताले से होता.
अड़ोसपड़ोस में पूछताछ करने पर भी कुछ हासिल नहीं हुआ. कोई भी यह नहीं बता पाया कि अमित और विमला कहां गए. अलबत्ता रामवीर को यह अंदाजा जरूर लग गया था कि अमित ने वादे के मुताबिक फ्लैट खाली नहीं किया है और उस का सामान भी वहीं रखा है.
कानूनन फ्लैट अब उन का हो चुका था, लेकिन ताला तोड़ कर उस में घुसना उन्हें ठीक नहीं लगा, इसलिए वे इंतजार करते रहे कि आज नहीं तो कल अमित उन से संपर्क करेगा. आखिर कोई इतना सामान तो छोड़ कर जाता नहीं. जब भी वह सामान लेने आएगा तब वे चाबी उस से ले लेंगे. यह सोचसोच कर वे खुद को तसल्ली देते रहे.
जब इंतजार और बेचैनी सब्र की हदें तोड़ने लगे और जनवरी तक अमित का कोई पता नहीं चला तो दिल कड़ा कर रामवीर ने फ्लैट का ताला तोड़ कर उस पर अपना हक लेने का फैसला कर लिया. आखिर उन की खूनपसीने की गाड़ी कमाई का 6 लाख रुपया उस में लगा था.

दीवान में निकली लाश

रविवार 3 फरवरी को रामवीर ने डुप्लीकेट चाबी से फ्लैट का ताला खोला और साफसफाई की जिम्मेदारी अपने बेटे धर्मेंद्र और 2 मजदूरों को दे दी. इन लोगों ने जब फ्लैट में पांव रखा तो उस में चारों तरफ से बदबू आ रही थी. चूंकि 8-9 महीने से मकान बंद पड़ा था, इसलिए बदबू आना स्वाभाविक बात थी. बदबू से ध्यान हटा कर उन्होंने सफाई शुरू कर दी. चारों तरफ कचरा फैला था और सामान भी अस्तव्यस्त पड़ा था.
मजदूरों ने कमरे में रखे एक दीवान को बाहर निकालने की कोशिश की तो भारी होने की वजह से वह हिला तक नहीं. इस पर धर्मेंद्र ने मजदूरों से कहा कि पहले प्लाई हटा लो फिर दीवान बाहर रख देना. जब मजदूरों ने दीवान की प्लाई हटाई तो तेज बदबू का ऐसा झोंका आया कि वे लोग बेहोश होतेहोते बचे. उन्हें लगा कि शायद कोई चूहा दीवान के अंदर सड़ रहा है, इसलिए इतनी बदबू आ रही है.
चूहा ढूंढने के लिए मजदूरों ने दीवान में ठुंसे कपड़े हटाने शुरू किए तो कुछ साडि़यां कंबल और एकएक कर 11 रजाइयां निकलीं. आखिरी कपड़ा हटाते ही तीनों की चीख निकल गई. दीवान के अंदर चूहे की नहीं बल्कि किसी इंसान की लाश थी.
खुद को जैसेतैसे संभाल कर मजदूर आए और पुलिस को खबर दी. उस वक्त दोपहर के 2 बज चुके थे. बागसेवनिया थाने के पुलिसकर्मियों के अलावा मिसरोद थाने के एसडीपीओ दिशेष अग्रवाल भी सूचना मिलने पर घटनास्थल पर पहुंच गए.
पुलिस ने मौके पर पहुंच कर जांच शुरू की तो कई रहस्यमय और चौंका देने वाली बातें सामने आईं. फ्लैट विमला श्रीवास्तव के नाम था जो कुछ साल पहले तक मध्य प्रदेश राज्य परिवहन निगम में नौकरी करती थीं. पति ब्रजमोहन श्रीवास्तव की मौत के बाद उन्हें उन के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति मिल गई थी. परिवहन निगम घाटे की वजह से बंद हो गया था. सभी कर्मचारियों की तरह विमला को भी अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी.

विमला इस फ्लैट में साल 2003 से अपने 32 वर्षीय बेटे अमित के साथ रह रही थीं. 60 वर्षीय विमला धार्मिक प्रवृत्ति की थीं. अपार्टमेंट में हर कोई उन्हें जानता था. वे अकसर शाम को 4 बजे के लगभग कैंपस में बने मंदिर में पूजापाठ करने जाती थीं और रास्ते में जो भी मिलता था, उसे राधेराधे कहना नहीं भूलती थीं. मंदिर में बैठ कर वह सुरीली आवाज में भजन गाती थीं तो अपार्टमेंट के लोग मंत्रमुग्ध हो उठते थे.

अमित हो गया मनोरोगी

कभीकभी भगवान की मूर्ति के सामने बैठेबैठे वे रोने भी लगती थीं. विमला भगवान से अकसर अपने बेटे अमित के लिए सद्बुद्धि मांगा करती थीं और कभीकभी उन के मन की बात होंठों तक इस तरह आ जाती थी कि आसपास के लोग भी उसे सुन लेते थे. लेकिन भगवान कहीं होता तो उन की सुनता और अमित को रास्ते पर लाता.
श्रीवास्तव परिवार का मिलनाजुलना किसी से इतना नहीं था कि उसे पारिवारिक संबंधों के दायरे में कहा जा सके. विमला तो फिर भी कभीकभार अड़ोसीपड़ोसी से बतिया लेती थीं, लेकिन अमित किसी से कोई वास्ता नहीं रखता था. कुछ दिन पहले तक वह कहीं नौकरी पर जाता था, लेकिन कुछ दिनों से नौकरी पर नहीं जा रहा था. घर पर भी वह कम ही रहता था.

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पड़ोसियों की मानें तो अमित विक्षिप्त यानी साइको था. उस की हरकतें अजीबोगरीब और असामान्य थीं. वह एक खास तरह की पिनक और सनक में रहता और जीता था, जो पिछले कुछ दिनों से कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. विमला को कुछ महीनों पहले लकवा मार गया था, जिस से वह चलनेफिरने से भी मोहताज हो गई थीं. उन्हें किडनी की शिकायत भी रहने लगी थी. अब वह पहले की तरह न मंदिर जाती थीं और न ही किसी को उन के भजन सुनने को मिलते थे. चूंकि अमित किसी से संबंध नहीं रखना चाहता था, इसलिए अपार्टमेंट के लोग भी फटे में टांग अड़ाने से हिचकिचाते थे.
पर यह बात हर किसी को अखरती थी कि कई बार वह अपनी मां को मारनेपीटने लगता था. ये आवाजें अब उन के फ्लैट से बाहर आती थीं तो लोग कलयुग है कह कर कान ढंकने की नाकाम कोशिश करने लगते थे. कान ढंकने पर एक मर्तबा आवाज न भी आए, लेकिन आंखें लोग बंद नहीं कर पाते थे. जब अमित विमला को मारतापीटता गैलरी में ला पटकता था तो यह देख कर लोगों का कलेजा फटने लगता था.

राक्षसी प्रवृत्ति का हो गया अमित

पूत कपूत बन चला था, लेकिन कोई कुछ बोल नहीं पाता था तो यह उन की किसी के मामले में दखल देने की आदत कम बल्कि बुजदिली ज्यादा थी. जवान हट्टाकट्टा बेटा उन के सामने ही बूढ़ी अपाहिज मां से मारपीट करता था और लोग तमाशा देखने के अलावा कुछ नहीं करते थे. निस्संदेह ये लोग सभ्य समाज का हिस्सा नहीं थे. हैवानियत और राक्षसी प्रवृत्ति वास्तव में क्या होती है, यह अमित की हरकतों से समझा जा सकता था.
पड़ोसी तो छोडि़ए, अमित ने नातेरिश्तेदारों से भी सबंध नहीं रखे थे. लाश मिलने के बाद यह बात तो एक कागज के जरिए पता चली कि विमला के ससुराल पक्ष के रिश्तेदार ग्वालियर में रहते हैं. बहरहाल, कई दिनों तक जब विमला नहीं दिखीं तो उन की कुछ सहेलियों ने उन की खोजखबर लेने की कोशिश की.
अपार्टमेंट की कुछ बुजुर्ग महिलाएं मई के महीने में उन से मिलने पहुंचीं तो अमित ने उन्हें बेइज्जत किया और दुत्कार कर भगा दिया था. उस दौरान वह अपनी सोती हुई मां का चेहरा कपड़े से ढक कर कह रहा था सो जा मां सो जा…
पुलिस ने जब फ्लैट की तलाशी ली तो उस के हाथ कई अहम सुराग लगे. लेकिन पहली चुनौती लाश की शिनाख्त की थी. लाश बिलकुल सड़ीगली नहीं थी, क्योंकि उसे रजाइयों, कंबल और साडि़यों से ढक कर रखा गया था, जिस से उस का संपर्क हवा से नहीं हो पाया था.

ममी के रूप में मिली लाश

ममी जैसी हालत वाली यह लाश विमला की ही है, इस के लिए पोस्टमार्टम जरूरी था जो एम्स भोपाल में ही कराया गया. पुलिस वालों का शुरुआती अंदाजा यही था कि लाश किसी महिला की ही होनी चाहिए, लेकिन वे दावे से यह बात नहीं कर पा रहे थे.
लाश निकालते वक्त नजारा बहुत वीभत्स था. लाश के पैर दीमक ने कुतर दिए थे और अस्थिपंजर पर मांस बिलकुल भी नहीं था. हड्डियों के ढांचे और ऊपरी परत को देख कर यह नहीं लग रहा था कि उस पर किसी धारदार हथियार का इस्तेमाल किया गया होगा. किसी तरह के चोट के निशान भी लाश पर नहीं थे.
पुलिस ने फ्लैट की तलाशी ली तो उसे विमला और अमित के आधार कार्ड के अलावा बैंक पासबुक, वोटर आईडी, गैस कनेक्शन के कागजात और बिजली के बिल के अलावा अमित की बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी भोपाल की एक मार्कशीट भी मिली जोकि कटीफटी थी.
सब से हैरान कर देने वाली चीज भांग की गोलियों के रैपर थे, जिन से लगता था कि अमित भांग के नशे का आदी था. अमित की शुरुआती पढ़ाई भोपाल के ही सेंट जेवियर स्कूल में हुई थी.
विमला की एक सहेली जया एंटनी की मानें तो अमित निहायत ही वाहियात लड़का था, जो मैलेकुचैले कपड़े पहने रहता था और कई दिनों तक नहाता भी नहीं था. खुद जया ने जब कई दिनों तक विमला को नहीं देखा था तो उन्होंने घटना के कोई 3 महीने पहले पुलिस को खबर की थी. उन्हें शक था कि कहीं विमला किसी अनहोनी का शिकार न हो गई हो. लेकिन पुलिस ने उन की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया. जया ने यह शिकायत कब और किस से की थी, इस का विवरण वे नहीं दे पाईं.

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जैसे ही ममी मिलने की खबर भोपाल से होती हुई देश भर में फैली तो सुनने वाले हैरान रह गए. हर किसी ने यही अंदाजा लगाया कि अमित ने ही अपनी मां विमला की हत्या की होगी. इस के पीछे लोगों की अपनी दलीलें भी थीं. कइयों को भोपाल का उदयन भी याद हो आया, जिस ने रायपुर में अपने मांबाप की हत्या कर उन की कब्र बना कर दफना दिया था. उदयन अब पश्चिम बंगाल की एक जेल में सजा काट रहा है.
विमला की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से उजागर हुआ कि लाश महिला की ही है और उस की हत्या करीब 3 महीने पहले की गई थी. एम्स के 3 डाक्टरों की टीम ने मृतका की उम्र 50 साल के लगभग आंकी. पोस्टमार्टम के बाद लाश को विमला की ही मान कर उसे मोर्चरी में रखवा दिया गया. पुलिस की एक टीम अब तक ग्वलियर भी रवाना हो चुकी थी, जिस से विमला के परिजन अगर कोई मिलें तो उन्हें खबर कर दें ताकि वे अंतिम संस्कार कर दें. साथ ही अमित का सुराग ढूंढना भी जरूरी था.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लाश के किसी अंग की हड्डी टूटी नहीं पाई गई. चूंकि लाश काफी पुरानी हो चुकी थी, इसलिए डाक्टर मौत की स्पष्ट वजह नहीं बता पाए.

अमित का नहीं लगा सुराग

पुलिस ने तेजी से अमित की खोजबीन शुरू कर दी, जिस से हत्या या मौत पर से परदा हट सके. लेकिन वह ऐसा गायब हुआ था जैसे गधे के सिर से सींग. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अमित का कोई अतापता नहीं चला था. पुलिस ने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स भी निकलवाई, पर उस से भी कुछ खास हाथ नहीं लगा.
5 फरवरी को विमला के जेठ व भतीजा सुरेंद्र श्रीवास्तव ग्वालियर से भोपाल आए लेकिन वे भी कोई ठोस जानकारी नहीं दे पाए. सुरेंद्र का कहना था कि पिछले 25 सालों से विमला या अमित ने उन से कोई संपर्क नहीं रखा है.
उन का मायका भिंड जिले के मडगांव में है लेकिन अमित अपने मामा पक्ष से भी संबंध या संपर्क नहीं रखता था. विमला की 2 बेटियां भी थीं, जिन की काफी पहले मौत हो चुकी थी. सुरेंद्र ने भोपाल के सुभाष नगर विश्राम घाट पर विमला का अंतिम संस्कार किया.

मां की हत्या की हैरान कर देने वाली गुत्थी अब तभी सुलझेगी जब अमित का कुछ पता चलेगा. यह अंदाजा या शक हालांकि बेहद पुख्ता है कि उसी ने ही विमला की हत्या की होगी. लगता ऐसा है कि नशे का आदी हो गया अमित अपनी बीमार और अपाहिज मां के प्रति अवसाद के चलते क्रूर हो गया होगा और उन से छुटकारा पाने की गरज से उस ने इसी सनक में हत्या कर दी होगी.
चूंकि भरेपूरे घने इलाके से लाश ले जा कर कहीं ठिकाने लगाना आसान काम नहीं था, इसलिए अपना जुर्म छिपाने के लिए उस ने लाश को कपड़ों से ढक दिया और घर से भाग गया. लेकिन कहां गया और जिंदा है भी या नहीं, यह किसी को नहीं मालूम.

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पुलिस की इस थ्योरी में दम है कि अमित ने जातेजाते एक मोमबत्ती टीवी के ऊपर जला कर रख दी थी, जिस से घर ही जल जाए और लोग इसे एक हादसा समझें. लेकिन मोमबत्ती से टीवी आधा ही जल पाया और वह आग भी नहीं पकड़ पाया.
बढ़ते शहरीकरण, एकल होते परिवार, बेरोजगारी के अलावा हत्या का यह मामला एक युवा के निकम्मेपन और अहसान फरामोशी का ही जीताजागता उदाहरण है, जो इस कहावत को सच साबित करता प्रतीत होता है कि एक मां कई बच्चों को पाल सकती है लेकिन कई संतानें मिल कर एक मां की देखभाल भी नहीं कर सकतीं.

भोजपुरी एक्ट्रेस रानी के बौल्ड लुक्स ने मचाया धमाल

भोजपुरी फिल्मों की सुपर स्टार रानी चटर्जी का बौल्ड लुक इन दिनों सोशल मीडिया में खासा छाया हुआ है. इंस्टाग्राम पर फैंस उनकी फोटोज को काफी पसंद कर रहे हैं. हमेशा बौल्ड लुक में नजर आने वाली रानी चटर्जी के इंस्टाग्राम पर 341 हजार से भी ज्यादा फौलोवर्स है.

 

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#throwback #blue #loveofmylife ❤️❤️❤️❤️ #fashion #loveyourbody #fitnesslove

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आम एक्ट्रेस  से बेस्ट एक्ट्रेस तक

रानी ने अपने कैरियर की शुरुआत “ससुरा बड़ा पइसा वाला” से की, जो भोजपुरी फिल्मों की सुपर हिट फिल्मों में से एक है. 2013 भोजपुरी फिल्म अवार्ड में रानी को “बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड” मिला. इसके बाद मौरीशस में आयोजित एगो फिल्म अवार्ड में उनकों “बेस्ट पौपुलर एक्ट्रेस अवार्ड” से सम्मानित किया गया.

 

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Dress by #kavitasunita #holievent #indiangirls #interiorlovers

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भोजपुरी फिल्मों से की शुरुआत

रानी का जन्म मुंबई में हुआ, वही से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की. रानी बचपन से ही पौपुलर होना चाहती थी. इसके चलते उन्होंने बहुत मेहनत की और 2004 में भोजपुरी फिल्म में डेब्यू किया.

 

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❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ #instagram #yogainspiration #yogaposes

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कपिल के शो में रहीं मेहमान

कौमेडियन और एक्टर कपिल शर्मा के शो “कौमेडी नाइट्स विद कपिल” में रानी को बतौर मेहमान बुलाया जा चुका है.

 

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This Sunday…sham 9 30… Only on sony.. #thekapilsharmashow #bhojpuritadka #comedy

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पानी से हे खास लगाव

सोशल मीडिया में रानी अपनी स्वीमिंग करती फोटोज अक्सर अपने फैंस के लिए शेयर करती रहती है. जिससे उनके वाटर लवर होने का पता चलता है.

 

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#bridge #water #tuff

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Life #life #masti

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शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति…

शत्रुघ्न सिन्हा काफी समय से अपनी पार्टी के खिलाफ कुछ न कुछ कह रहे थे. वे लाल कृष्ण आडवाणी के खेमे के माने जाते थे, पर ऊंची जाति के हैसियत वाले थे, इसलिए उन्हें कहा तो खूब गया, लेकिन गालियां नहीं दी गईं. सोशल मीडिया में चौकीदार का खिताब लगाए गुंडई पर उतारू बड़बोले, गालियों की भाषा का जम कर इस्तेमाल करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा के मामले में मोदीभक्त होने का फर्ज अदा करते रहे. हां, उदित राज के मामले में वे एकदम मुखर हो गए. एक दलित और दलित हिमायती की इतनी हिम्मत कि पंडों की पार्टी की खिलाफत कर दे. जिस पार्टी का काम मंदिर बनवाना, पूजाएं कराना, ढोल बजाना, तीर्थ स्थानों को साफ करवाना, गंगा स्नान करना हो, उस की खिलाफत कोई दलित भला कैसे कर सकता है?

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वैसे, उदित राज ने 5 साल पहले ही भाजपा में जा कर गलती की थी. दलितों की सदियों से जो हालत है, वह इसीलिए है कि ऊंची जातियों के लोग हर निचले पिछड़े तेज जने को अपने साथ मिला लेते हैं, ताकि वह दलितों का नेता न बन सके. यह समझदारी न भारत के ईसाइयों में है, न मुसलमानों में और न ही सिखों या बौद्धों में. उन्हें अपना नेता चुनना नहीं आता, इसलिए हिंदू पंडों को नेताटाइप लोगों को थोड़ा सा चुग्गा डाल कर अपना काम निकालने की आदत रही है. 1947 से पहले आजादी की लड़ाई में यही किया गया. किसी सिख, ईसाई, बौद्ध, शूद्र, अछूत को अलग नेतागीरी करने का मौका ही नहीं दिया गया. जैसे ही कोई नया नाम उभरता, चारों ओर से पंडों की भीड़ उसे फुसलाने को पहुंच जाती. मायावती के साथ हाल के सालों में ऐसा हुआ, प्रकाश अंबेडकर के साथ हुआ, किसान नेता चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह के साथ हुआ. उदित राज मुखर दलित लेखक बन गए थे. उन्हें भाजपा का सांसद का पद दे कर चुप करा दिया गया. इस से पहले वाराणसी के सोनकर शास्त्री के साथ ऐसा किया गया था. उदित राज का इस्तेमाल कर के, उन की रीढ़ की हड्डी को तोड़ कर घी में पड़ी मरी मक्खी की तरह निकाल फेंका और किसी हंसराज हंस को टिकट दे दिया. अगर वे जीत गए तो वे भी तिलक लगाए दलितवाद का कचरा करते रहेंगे. दलितों की हालत वैसी ही रहेगी, यह बिलकुल पक्का?है. यह भी पक्का है कि जब तक देश के पिछड़ों और दलितों को सही काम नहीं मिलेगा, सही मौके नहीं मिलेंगे, देश का अमीर भी जलताभुनता रहेगा कि वह किस गंदे गरीब देश में रहता?है. अमीरों की अमीरी बनाए रखने के लिए गरीबों को भरपेट खाना, कपड़ा, मकान और सब से बड़ी बात इज्जत व बराबरी देना जरूरी है. यह बिके हुए दलित पिछड़े नेता नहीं दिला सकते हैं. जिस की लाठी उस की भैंस जमीनों के मामलों में आज भी गांवों में किसानों के बीच लाठीबंदूक की जरूरत पड़ती है, जबकि अब तो हर थोड़ी दूर पर थाना है, कुछ मील पर अदालत है. यह बात घरघर में बिठा दी गई है कि जिस के हाथ में लाठी उस की भैंस. असल में मारपीट की धमकियों से देशभर में जातिवाद चलाया जाता है. गांव के कुछ लठैतों के सहारे ऊंची जाति के ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य गांवों के दलितों और पिछड़ों को बांधे रखते हैं. अब जब लाठी और बंदूक धर्म की रक्षा के लिए दी जाएगी और उस से बेहद एकतरफा जातिवाद लादा जाएगा, तो जमीनों के मामलों में उसे इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाएगा. अब झारखंड का ही मामला लें.

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1985 में एक दोपहर को 4 लोगों ने मिल कर खेत में काम कर रहे कुछ किसानों पर हमला कर दिया था. जाहिर है, मुकदमा चलना था. सैशन कोर्ट ने उन चारों को बंद कर दिया. लंबी तारीखों के बाद 2001 में जिला अदालत ने उन्हें आजन्म कारावास की सजा सुनाई. इतने साल जेल में रहने के बाद उन चारों को अब छूटने की लगी. हाथपैर मारे जाने लगे. हाईकोर्ट में गए कि कहीं गवाह की गवाही में कोई लोच ढूंढ़ा जा सके. हाईकोर्ट ने नहीं सुनी. 2009 में उस ने फैसला दिया. अब चारों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं. क्यों भई, जब लाठीबंदूक से ही हर बात तय होनी है तो अदालतों का क्या काम? जैसे भगवा भीड़ें या खाप पंचायतें अपनी धौंस चला कर हाथोंहाथ अपने मतलब का फैसला कर लेती हैं, वैसे ही लाठीबंदूक से किए गए फैसले को क्यों नहीं मान लिया गया और क्यों रिश्तेदारों को हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट दौड़ाया गया, वह भी 34 साल तक? लाठी और बंदूक से नरेंद्र मोदी चुनाव जीत लें, पर राज नहीं कर सकते. पुलवामा में बंदूकें चलाई गईं तो क्या बालाकोट पर बदले की उड़ानों के बाद कश्मीर में आतंकवाद अंतर्ध्यान हो गया? राम ने रावण को मारा तो क्या उस के बाद दस्यु खत्म हो गए? पुराणों के हिसाब से तो हिरण्यकश्यप और बलि भी दस्यु थे, अब वे विदेशी थे या देशी ही यह तो पंडों को पता होगा, पर एक को मारने से कोई हल तो नहीं निकलता. अमेरिका 30 साल से अफगानिस्तान में बंदूकों का इस्तेमाल कर रहा है, पर कोई जीत नहीं दिख रही. बंदूकों से राज किया जाता है पर यह राज हमेशा रेत के महल का होता है. असली राज तब होता है जब आप लोगों के लिए कुछ करो.

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मुगलों ने किले, सड़कें, नहरें, बाग बनवाए. ब्रिटिशों ने रेलों, बिजली, बसों, शहरों को बनाया तो राज कर पाए, बंदूकों की चलती तो 1947 में ब्रिटिशों को छोड़ कर नहीं जाना पड़ता. जहां भी आजादी मिली है, लाठीबंदूक से नहीं, जिद से मिली है. जमीन के मामलों में ‘देख लूंगा’, ‘काट दूंगा’ जैसी बातें करना बंद करना होगा. जाति के नाम पर लाठीबंदूक काम कर रही है, पर उस के साथ भजनपूजन का लालच भी दिया जा रहा है, भगवान से बिना काम करे बहुतकुछ दिलाने का सपना दिखाया जा रहा है. झारखंड के मदन मोहन महतो व उन के 3 साथियों को इस हत्या से क्या जमीन मिली होगी और अगर मिली भी होगी तो क्या जेलों में उन्होंने उस का मजा लूटा होगा?

बालिका सेवा के नाम पर…

31जनवरी, 2019 की शाम जावरा क्षेत्र में पिपलोदा रोड स्थित कुटीर बालिका गृह के बाहर अफरातफरी
का माहौल था. बालिका गृह के गेट पर औद्योगिक क्षेत्र के टीआई बी.एल. सोलंकी, एसआई मधु राठौर और पुलिस बल के साथ खड़े थे.
भारी पुलिस बल को देख कर लोगों की भीड़ जुटने लगी थी. उसी समय पूर्व संचालिका रचना भारतीय अपने पति ओमप्रकाश भारतीय के साथ बालिका गृह से बाहर निकल आई.
रचना भारतीय अपने पति ओमप्रकाश के साथ आश्रम के प्रांगण में स्थित घर में रहती थी. रचना ने टीआई सोलंकी से आने की वजह जाननी चाही तो टीआई ने बताया कि वह जिला कलेक्टर के आदेश पर आश्रम में रहने वाली बच्चियों को वहां से हटा कर रतलाम के वन स्टाफ सेंटर में ले जाने के लिए आए हैं.
रचना और उस के पति ओमप्रकाश ने इस बात का विरोध करना चाहा लेकिन पुलिस के सामने उन की एक नहीं चली. पुलिस ने आश्रम में रह रही करीब 300 बालिकाओं को बसों में बैठाया. इतना ही नहीं टीआई बी.एल. सोलंकी ने रचना भारतीय व ओमप्रकाश को भी हिरासत में ले लिया. इस के बाद वह उन्हें ले कर थाने लौट आए. उन्होंने सभी बालिकाओं को रतलाम के वन स्टाफ सेंटर भेज दिया.
रचना और ओमप्रकाश भारतीय को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने की बात जल्द ही पूरे जावरा शहर में फैल गई. पर पुलिस की काररवाई चलती रही. टीआई सोलंकी ने अगले दिन क्षेत्र के 2 और चर्चित व्यक्तियों कुंदन वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष सुदेश जैन और सचिव दिलीप बरैया को भी गिरफ्तार कर लिया.
दरअसल इन की गिरफ्तारी की वजह यह थी कि कुटीर आश्रम से 24 जनवरी, 2019 को 5 बालिकाएं बालिका गृह का रोशनदान तोड़ कर फरार हो गई थीं.
आश्रम से बालिकाओं के भागने की सूचना मिलते ही पुलिस और बाल कल्याण समिति सक्रिय हो गई. जिस के चलते ये सभी बालिकाएं शाम को मंदसौर में मिल गईं. बालिकाओं से पूछताछ की गई तो पता चला कि रचना और उस का पति अन्य लोगों के साथ मिल कर इन लड़कियों का शारीरिक शोषण करते थे.

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कलेक्टर ने दिए थे जांच के आदेश

यह जानकारी जब रतलाम की कलेक्टर रुचिका चौहान को मिली तो उन्होंने जावरा क्षेत्र के एसडीएम एम.एल. आर्य को संस्था में रह रही दूसरी लड़कियों से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एसडीएम ने आश्रम जा कर वहां रह रही करीब 300 लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने आपबीती एसडीएम साहब को बता दी.
एसडीएम ने अपनी रिपोर्ट कलेक्टर रुचिका चौधरी को सौंप दी. इस के बाद ही कलेक्टर रुचिका चौहान ने आदेश दिया कि कुटीर बालिका गृह में रह रही सभी बच्चियों को वहां से वन स्टाफ सेंटर रतलाम शिफ्ट कर दिया जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त काररवाई की जाए.
जिला कलेक्टर के आदेश पर ही पुलिस ने बालिका गृह की पूर्व संचालिका रचना भारतीय तथा उस के पति ओमप्रकाश भारतीय, संस्था के वर्तमान अध्यक्ष और सचिव सुदेश जैन एवं दिलीप बरैया के खिलाफ भादंवि की धारा 354, 376, 324 एवं बालकों की देखरेख संरक्षण अधिनियम की धारा 75, पोक्सो 5डी, 4, 7/8 के तहत मामला दर्ज कर लिया.
जांच में पुलिस को पता चला कि रचना भारतीय पूर्व में इस बालिका गृह की संचालिका के पद पर थी. वह अपने पति ओमप्रकाश के साथ बालिका गृह के एक हिस्से में रहती थी. बाद में अपनी राजनैतिक पकड़ के चलते उसे बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था.

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चूंकि वह एक साथ 2 पदों पर नहीं रह सकती थी, लिहाजा उस ने बालिका गृह की संचालिका का पद छोड़ना जरूरी समझा. यह पद छोड़ने के बाद रचना ने अपने विश्वसनीय सुदेश जैन और दिलीप बरैया को संस्था का अध्यक्ष और सचिव बनवा दिया था. पद छोड़ने के बाद भी रचना अपने पति के साथ इसी आश्रम में रहती थी.
सुदेश जैन और दिलीप बरैया नाम के ही पदाधिकारी थे. बालिका गृह से जुड़े सारे फैसले रचना और उस का पति ही लेते थे.
बहरहाल पुलिस ने दूसरे दिन सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया जहां से रचना भारतीय को रतलाम एवं ओमप्रकाश भारतीय, सुदेश जैन तथा दिलीप बरैया को जावरा जेल भेज दिया गया.
अदालत में पेश करने से पहले सुदेश जैन एवं दिलीप बरैया की मौजूदगी में टीआई बी.एल. सोलंकी तथा हुसैन टेकरीजहां के तहसीलदार के सामने आश्रम की सील तोड़ कर दस्तावेजों की जांच की गई.
साथ ही लापरवाही बरतने के आरोप में महिला सशक्तिकरण अधिकारी रहे एवं वर्तमान में महिला बाल विकास विभाग के सहायक संचालक रविंद्र मिश्रा को निलंबित कर दिया गया.
इस के अलावा रचना को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया. बालिका गृह में लड़कियों के साथ किए जाने वाले शोषण की पूरी कहानी इस प्रकार सामने आई—

कई साल पहले जावरा नगर पालिका के अध्यक्ष हुआ करते थे कुंदनमल भारतीय. ओमप्रकाश भारतीय कुंदनमल का ही बेटा था. जबकि रचना ओमप्रकाश भारतीय की पत्नी थी. कुंदनमल की मृत्यु के बाद सन 2015 में रचना ने कुंदन बेलफेयर सोसाइटी का गठन कर उस के अंतर्गत पिपलौदा रोड पर कुंदन कुटीर नाम से बालिका गृह का संचालन किया.

राजनैतिक पहुंच का उठाया लाभ

रचना और उस के पति की राजनीति में अच्छी पकड़ थी जिस के चलते जल्द ही इस बालिका गृह को शासन से मोटा अनुदान मिलने लगा. जानकारी के अनुसार पिछले 3 साल में ही शासन की तरफ इस बालिका गृह को करीब 38 लाख रुपए की अनुदान राशि मिली थी. सूत्रों की मानें तो इस अनुदान राशि के अलावा रचना प्रदेश भर से काफी बड़ी रकम दान के रूप में बेटोर रही थी.
जो 5 लड़कियां बालिका गृह से भागी थीं, उन्होंने बताया कि हम सभी रचना को मम्मा कहते थे और उस के पति को पापा. लेकिन उन की नीयत लड़कियों के प्रति अच्छी नहीं थी. पापा रोज शराब पीते थे और रचना मम्मा इस दौरान हम में से किसी एक लड़की को शराब के पैग तैयार करने का काम सौंप देती थी. मम्मा खुद भी शराब पीती थी और दूसरे लोग भी रोज आश्रम में आ कर उन दोनों के साथ शराब पीते थे.
रात के समय आश्रम में आने वाली एक महिला भी शराब पीए होती थी. मम्मा एक गुप्त रास्ते से लड़कियों के कमरों में आती थी. रात के खाने में हमें कुछ मिला कर खिलाया जाता था, जिस के बाद हम उठ ही नहीं पाते थे.
यह भी पता चला कि सन 2018 में लड़कियों की शिकायत पर बाल संरक्षण अधिकारी पवन कुमार सिसौदिया ने जांच कर के अपनी रिपोर्ट रतलाम में संबंधित विभाग के 2 अधिकारियों को सौंपी थी. लेकिन उन की जांच रिपोर्ट पर कोई काररवाई नहीं की गई.
शिकायत में बच्चियों ने आरोप लगाए कि रचना मम्मा का व्यवहार काफी खराब है. वह बातबात पर हम लोगों से मारपीट करती हैं. समय पर खाना भी नहीं दिया जाता. लड़कियों ने बताया कि रचना के पति हम लोगों के शरीर पर गलत नीयत से हाथ फेरते थे. मना या विरोध करने पर हमारे साथ मारपीट की जाती थी. वह कभीकभी किचन में आ कर लड़कियों के पैर में हाकी डाल कर उन्हें अपनी तरफ खींच लेते.

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बहरहाल अब शासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है बल्कि रचना के आश्रम में रहने वाली सभी बच्चियों को रतलाम और उज्जैन के आश्रमों में शिफ्ट कर दिया है, दूसरी तरफ रतलाम कलेक्टर के निर्देश पर पुलिस उन तमाम बच्चियों से संपर्क कर उन के बयान लेने की कोशिश कर रही हैं, जो कभी न कभी रचना के आश्रम में रही थीं.
कुंदन कुटीर बालिका गृह मामले में एक युवती से वीडियो बनवाने के संबंध में करीब 2 महीने से फरार चल रहे नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस से निष्कासित यूसुफ कड़पा को पुलिस ने गिरफ्तार कर भी लिया. गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने आरोपी को आननफानन में कोर्ट में पेश किया, जहां से कोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया.
इस मामले में पुलिस ने कोर्ट में आरोपी के पुलिस रिमांड की मांग भी नहीं की. पुलिस ने कोर्ट से उसे जेल भेजने का आग्रह किया, लेकिन कोर्ट ने आरोपी के आवेदन पर उसे कोर्ट से ही जमानत पर रिहा कर दिया.

नारद गए परदेश

शिवनगरी का जिला प्रशासन ऐसे ही काफी परेशान रहता है. मंदिरमसजिद तथा उन के पंडेमौलवियों की सुरक्षा में न जाने कितने नाकों चने चबाने पड़ते हैं. पुलिस, पीएसी टास्क फोर्स न जाने कितनी तरह की फोर्स हैं, फिर भी क्राइम कंट्रोल में नहीं आता. रोज ही कोई न कोई वी.आई.पी. आते रहते हैं मंदिर के दर्शन को और सरकारी दौरा बनाने के लिए 1-2 मीटिंग भी बुला लेते हैं.

पहले दर्शन कराओ फिर मीटिंग कराओ. दिन पर दिन यह समस्या गंभीर होती जा रही है. उसी में एक दिन शाम को फैक्स मिलता है कि नारदजी कल नगर में मंदिरों के दर्शनार्थ पधार रहे हैं. वह मंदिर में पूजा के बाद खासकर मार्कंडेय धाम का भ्रमण करेंगे. इस के बाद वह पत्रकार वार्त्ता भी करेंगे.

जिले की सारी प्रशासनिक मशीनरी घबरा गई कि यह नारदजी कौन हैं? कहीं प्रदेश के कोई माननीय मंत्री तो नहीं, लेकिन फैक्स के ऊपरनीचे कोई अतापता नहीं दिया गया था, न ही उन के किसी सेके्रटरी का नाम था. फैक्स करने वाले स्थान का फोन नंबर भी पत्र पर अंकित नहीं था, ताकि वापस फोन कर के पता कर लें कि यह नारदजी कौन हैं और किस विभाग के माननीय मंत्री या अध्यक्ष हैं.

आननफानन में जिला प्रशासन ने सर्किट हाउस में रिजर्वेशन कर दिया. पुलिस कप्तान को उन की सुरक्षा व्यवस्था के लिए निर्देश दे दिए गए तथा सर्किट हाउस पर पुलिस पिकेट तैनात कर दी गई.

जिले के आला सरकारी अफसर दूसरे दिन ही सुबह सर्किट हाउस पर नारदजी की अगवानी करने पहुंच गए. चूंकि उन के सड़क या वायुमार्ग से आने की कोई निश्चित सूचना नहीं थी अत: हवाई अड्डे पर एस.डी.एम. (सिटी) तथा शहर के हर मुख्य मार्ग पर एकएक ए.सी.एम. और सी.ओ. की ड्यूटी पुलिस बल के साथ लगा दी गई थी.

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अधिकारियों के बीच एक उच्च- कुलीन ब्राह्मण अधिकारी ने शंका जाहिर की, ‘‘कहीं ये टेलीविजन वाले नारदजी तो नहीं हैं जो हर धार्मिक सीरियल में दिखते हैं?’’

उन के वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया.

मुंहअंधेरे अंतरिक्ष में आकाशवाणी की तरह एक आवाज गूंजी : ‘नारायण… नारायण…’ फिर आसमान में एक छोटी सी छाया प्रकट हुई जो धीरेधीरे बड़ी होती गई और इसी के साथ ‘नारायण…नारायण’ की आवाज भी तेज होती गई. थोड़ी देर बाद वीणा लिए हुए एक कृशकाय व्यक्ति कोपीन धारण किए सर्किट हाउस के लान में सशरीर उपस्थित हुआ. सभी समझ गए कि यह टेलीविजन सीरियल वाले नारद हैं, पर लगते असली हैं.

नारदजी बोले, ‘‘वत्स, मुझे पता था कि आप लोग सर्किट हाउस में होंगे, इसलिए मैं सीधे यहीं आया. कहो, शिवनगरी में सबकुछ कुशल तो है न.’’

अधिकारी बोले, ‘‘सर, सब आप की कृपा है, लेकिन आप का यहां अचानक आना कैसे हुआ?’’

‘‘नारायण…नारायण…देवलोक में भ्रमण करतेकरते मन ऊब गया था. एक ही तरह का क्लाइमेट और सब जगह अप्सराओं का संग, नृत्यसंगीत सुनतेसुनते बोर हो गया. न कोई थ्रिल, न कोई एडवेंचर था. देवताओं ने बताया कि चेंज के लिए कुछ दिन धरती का भ्रमण कर आएं. बस, प्रोग्राम बन गया. चूंकि यह नगरी शिव के त्रिशूल पर बसी धरती से पृथक मानी जाती है, इसलिए यहां चला आया.’’

‘‘लेकिन सर, आप जैसे टीवी पर दिखते हैं वैसे नहीं दिख रहे हैं?’’ एक अधिकारी को अंतरिक्ष के अन्य ग्रह से किसी अनजाने प्राणी के भेष बदल कर आने की शंका हुई.

‘‘नारायण…नारायण…वत्स, कम- र्शियल कारणों से मुझे भी टेलीविजन पर मेकअप कर के आना पड़ता है, अन्यथा कोई उस चैनल को देखेगा ही नहीं. पृथ्वी के वायुमंडल में बहुत प्रदूषण है, अत: सारे धूलकण मेरे शरीर में चिपक गए. वह तो अच्छा रहा कि प्रदूषण के कारण ओजोन परत में छेद हो गया है और मैं सीधा उस से निकल आया वरना मेरे आने में और विलंब होता.’’

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एक बडे़ अधिकारी ने प्रश्न किया, ‘‘सर, आप का अगला कार्यक्रम क्या है?’’

‘‘नारायण…नारायण…शिवनगरी में मैं पहले शिव का दर्शनपूजन करूंगा, फिर 4 बजे पत्रकार वार्त्ता करूंगा. कृपया, इस के अनुसार व्यवस्था करें. अभी मैं फ्रेश होना चाहूंगा. आप लोग 1 घंटे बाद आएं,’’ और नारायण… नारायण…कहते हुए नारद गवर्नर सूट में चले गए.

घंटे भर बाद नारद बाहर आए तो नेताओं के जामे में थे. यह देख कर अधिकारीगण चकरा गए. नारद के नाम से कोई बहुरूपिया तो नहीं आ पहुंचा? वे नारद को पहचान नहीं पाए, ‘‘सर, आप राजनेता की ड्रेस में? ये सब आया कहां से?’’

नारद ने कहा, ‘‘नारायण…नारायण… वत्स, मेरा सामान देवलोक से सीधे रिमोट से गवर्नर सूट में ट्रांस्मिट हो गया. आप लोग पार्थिव प्राणी हैं, आप की समझ से बाहर है. नेता की ड्रेस तो मौके के अनुसार है.’’

बाहर आ कर नारद ने पुलिस गारद से नेताओं की तरह सलामी ली. वह फिर लालबत्ती लगी कार में बैठ गए. शहर के ट्रैफिक ने उन्हें बहुत परेशान किया. वह काफी देर तक जाम में फंसे रहे. उन्होंने मन ही मन सोचा कि पार्थिव रूप में सड़क मार्ग से जाने से तो अच्छा था कि वह सीधे मंदिर ट्रांस्मिट हो गए होते.

महादेव मंदिर पहुंचते ही नारद घबरा गए, वहां तरहतरह के पुलिस वाले तैनात थे, केंद्रीय पुलिस, पीएसी, राज्य पुलिस, लोहे की बैरिकेटिंग, महिला पुलिस आदि, यहां तक कि आसपास के मकानों की छतों पर भी जवान आधुनिक राइफल व राकेट लांचर ले कर मुस्तैद थे.

देवलोक में नारद ने ऐसा कभी नहीं देखा था. खैर, सलामी लेते नारद मंदिर के अंदर पहुंचे. भक्तों की लंबी लाइन लगी थी. नारद ने महादेव से विनीत स्वर में कहा, ‘‘हे देवाधिदेव, आप की यह हालत. जगत के नियंता व संहारक, आप की सुरक्षा इतनी तगड़ी कि परिंदा भी पर न मार सके. हे प्रभो, यह क्या हो रहा है? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं. मुझे देवलोक से यहां आने में किसी सुरक्षा की जरूरत नहीं महसूस हुई पर सर्किट हाउस से यहां आने के लिए जबरदस्त सुरक्षा की व्यवस्था की गई है. आप अंतर्यामी हैं, आप ही बताएं.’’

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फौरन नारद के कान में महादेव का मोबाइल बजा, ‘‘नारद, सावधान रहना, जिस नगर का तुम भ्रमण कर रहे हो वहां रोज 2-3 अपहरण, खुलेआम रेप यानी बलात्कार, हत्याएं दिन दहाड़े हो रही हैं. इतनी सुरक्षा जिला प्रशासन ने तुम्हें बेवजह नहीं उपलब्ध कराई है. यह सुरक्षा तो मात्र दिखावा है. गोली चलने या बम फटने के पहले ही ये भाग जाएंगे. तुम ने बड़ी समझदारी का काम किया जो नेता की वर्दी पहन ली. आजकल अपराधी व आतंकवादी भी इसी ड्रेस में चलते हैं, अत: जब तक पृथ्वी पर हो तब तक इसी ड्रेस में रहना वरना तुम्हारा अपहरण हो सकता है.’’

‘‘अपहरण यानी किडनैपिंग? प्रभो, मैं ने देवलोक में प्रकाश झा की फिल्म ‘अपहरण’ के कुछ वीडियो क्लिप देखे थे. यह तो बहुत खतरनाक चीज है. किडनैपिंग के बाद तो बड़ी तकलीफ होती है. वे तरहतरह की यातना देते हैं. इस के बाद फिरौती यानी रैंसम भी देना पड़ता है, वह भी लाखोंकरोड़ों में, नहीं तो मर्डर कर देते हैं. मेरा तो पृथ्वी पर कोई सगा भी नहीं है, न ही मेरे पास फूटी कौड़ी है. आप की नगरी में तो आ कर मैं फंस गया प्रभो, आप ही मेरी रक्षा करें.’’

महादेव ने कहा, ‘‘नारद, डरो नहीं, सुनने में आया है कि अपहरण को उद्योग का दर्जा मिलने जा रहा है, जिस से सरकार को अतिरिक्त स्रोत से ज्यादा टैक्स मिल सके. आयकर टैक्स व ट्रेड टैक्स ने कैबिनेट के लिए एक नोट बना कर भेजा है, जिसे स्वीकृति मिलने की आशा है.’’

‘‘नारायण…नारायण…तब तो और खतरा है. इस उद्योग को सरकार से भी सहायता मिल जाएगी,’’ नारद परेशान हो उठे.

‘‘अरे, तुम जानते नहीं. यह उद्योग पहले से ही पुलिस व नेताओं के सहयोग से चल रहा है. अब इसे कानूनी जामा पहनाने की बात हो रही है,’’ महादेवजी बोले.

नारद भले ही नेता की ड्रेस में थे पर थे तो ऋषि ही, वह बहुत घबरा गए. जल्दीजल्दी मंदिर में दर्शन कर वापस जाने लगे.

पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘साहब, यह मंदिरों की नगरी और घाटों का शहर है. पता नहीं आप फिर कब आएं. थोड़ा समय लगेगा पूरा दर्शनभ्रमण कर लें.’’

‘‘आप की सुरक्षा व्यवस्था फूलप्रूफ है न? नहीं तो मैं कहीं नहीं जाऊंगा. यहां तो छोटेछोटे बच्चों को किडनैप कर लेते हैं. मैं किडनैप हो गया तो आप मुझे बचा नहीं पाएंगे और मेरे पास फिरौती देने को पैसा भी नहीं है,’’ नारद बोले.

‘‘साहब, शर्मिंदा न करें. यहां इतनी तगड़ी सिक्योरिटी है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता. अभीअभी राजधानी से आप की सुरक्षा के लिए ब्लैककैट कमांडो आ गए हैं,’’ पुलिस अफसर ने विनती की.

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‘‘साहब, यह ब्लैककैट कमांडो बडे़ तेज और खतरनाक होते हैं. ये सी.एम., पी.एम. और बडे़ जेड श्रेणी के नेताओं को मिलते हैं. ये कमांडो उन्हें हमेशा घेरे रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगा कर उन की सुरक्षा करते हैं. चूंकि पी.एम. और सी.एम. राजधानी में ही रहते हैं, अत: ये लोग भी वहीं रहते हैं. आप देवलोक के माननीय अतिथि हैं अत: आप के लिए विशेष रूप से ब्लैककैट कमांडो भेजे गए हैं,’’ पुलिस अफसर बोला.

‘‘तो पुलिस क्या करती है? सुरक्षा उपलब्ध कराना क्या उस का काम नहीं…नारायण…’’ नारद नाराज हो गए.

नारद के काफिले के साथ एक पत्रकार भी था, बोला, ‘‘सुरक्षा, क्या मजाक करते हैं मुनिवर. कोई शरीफ आदमी कभी थाने नहीं जाना चाहता. थाने में बलात्कार, प्रताड़ना, कभीकभी जबरिया मौत क्या नहीं होता. आधे पुलिस वाले क्रिमिनल के साथ रहतेरहते खुद क्रिमिनल हो गए हैं.’’

‘‘नारायण…नारायण…तो पुलिस का क्या काम है?’’ नारद ने पूछा.

‘‘साधो, पुलिस का काम क्राइम रेट हाई रखना है ताकि उन की मौज रहे. जहां क्राइम रेट हाई करना हो वहां बस, थाने खुलवा दीजिए. पहाड़ों में पहले शांति थी पर थाने खुलते ही वहां क्रिमिनल्स की बाढ़ आ गई. अब तो पहाड़ों की पब्लिक थाने खुलने की बात सुन कर ही हिंसा पर उतारू हो जाती है,’’ पत्रकार ने नारद को बताया.

‘‘ऐसा क्या?’’ नारद की आंखें फैल गईं.

पुलिस अफसर चिल्ला कर बोला, ‘‘शटअप, बहुत अंटशंट बोलता है. अभी तेरे को बंद करवाता हूं.’’

किसी तरह से नारद नगर के दूसरे मंदिरों को देखने जाने को तैयार हुए. गंगा के किनारे पहुंचते ही नगर अधिकारी ने बताना शुरू किया, ‘‘सर, यह जगह बहुत ब्यूटीफुल है. पर्यटकों की सुविधा के लिए हम लोगों ने घाटों का सुंदरीकरण किया है. यह रेड सैंड स्टोन मेरे कार्यकाल में लगाया गया. विश्राम के लिए हम ने फैंसी छतरियां पर्यटकों के लिए घाट की सीढि़यों पर लगाईं. बोटिंग के लिए फाइबर ग्लास नाव व मोटर बोट सरकार ने विशेष रूप से मंगाई हैं.’’

‘‘वेरी नाइस, बट, गंगा में सीवर व जानवरों के अंश किस ने मंगाए,’’ नारद ने व्यंग्य छोड़ा.

‘‘सर, ऐसा है कि बजट की कमी के चलते आजकल सीवर पंप खराब चल रहे हैं. पिछले शहर के लोग बहुत गंदे हैं. वे मरे जानवरों को गंगा में बहा देते हैं. यहां पर 2 श्मशानघाट भी हैं. दाहसंस्कार के बाद लकड़ी की कमी के कारण भी आदमी के कुछ अवशेष बचे रहते हैं. उन को भी लोग नदी में बहा देते हैं. इस में नगर प्रशासन का कोई दोष नहीं है. आबादी भी इतनी बढ़ गई है कि…’’

नारद ने बीच में टोका, ‘‘आबादी क्यों बढ़ रही है? क्या आबादी कम करने वाले की कमी हो गई है?’’

‘‘नहीं सर, हमारे ग्रंथों में एक मान्यता है कि यहां मरने पर मोक्ष प्राप्त होता है. अत: दूसरे शहरों व प्रांतों से बूढे़ लोग यहां मरने के लिए आ जाते हैं. उन के साथ रहने के लिए 1-2 रिश्तेदार भी आते हैं. मरने की प्रतीक्षा करने वालों के कारण शहर की आबादी बढ़ती जा रही है. वे जल्दी मरते नहीं, क्या करें, हम भी संविधान के प्रावधानों के कारण मजबूर हैं,’’ अधिकारी ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा.

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पुलिस अधिकारी की ओर देख कर नारद बोले, ‘‘आप के शहर में क्राइम रेट बहुत हाई है. क्या इस का उपयोग शहर की आबादी नियंत्रण करने में नहीं किया जा सकता?’’

पुलिस अफसर सहित दूसरे आला अधिकारी भी अचकचा गए, ‘‘नहीं, सर, कार्ययोजना क्राइम कंट्रोल करने के लिए है, न कि आबादी कंट्रोल करने के लिए,’’ पुलिस अफसर ने कहा.

‘‘तो क्या कार्य योजना है आप की?’’

‘‘साहब, क्राइम कंट्रोल के लिए हम रातदिन एक किए रहते हैं. कोई क्राइम होने के बाद हम लोग क्राइम स्पौट पर तुरंत पहुंचते हैं. यदि मर्डर हो गया हो तो मर्डर के बाद तुरंत मौके का मुआयना करते हैं. बौडी का फोटोग्राफ व फिंगर पिं्रट लेते हैं. डेड बौडी को पोस्टमार्टम के लिए भेजते हैं. कहीं बम ब्लास्ट हुआ तो तुरंत फोर्स तैनात कर दी. किसी को घुसने से मना कर दिया. मजिस्ट्रेट से धारा 144 लगवा दी. सर, हम क्या नहीं करते. उसी समय बडे़ अफसरों को पुलिस लाइन में बुला कर क्राइम कंट्रोल रिव्यू किया जाता है, ताकि क्राइम कंट्रोल हो सके,’’ पुलिस अफसर उत्तेजित हो गए.

‘‘तो दबंग अपराधी भी यहां क्राइम कंट्रोल करते हैं? अच्छा, आप लोग क्राइम के पहले क्यों नहीं पहुंचते?’’ नारद ने सवाल किया.

‘‘सर, हम आप के जैसे अंतर्यामी तो हैं नहीं. यदि क्राइम का पहले पता लग जाए तो कोई भी कंट्रोल कर ले, हमारी जरूरत ही न रहे,’’ पुलिस अफसर ने विवशता जाहिर की.

‘‘मुझे पता है कि आप के यहां इंटेलिजेंस ब्यूरो, एल.आई.यू., रा सब है, तब क्या बात है कि क्राइम का पहले पता नहीं चलता?’’ नारद ने शंका व्यक्त की.

पुलिस अफसर तेजी से बोला, ‘‘सर, ये इंटेलीजेंस वाले अपने को बहुत इंटेलीजेंट समझते हैं. उन की खबर सच निकलने पर आउट आफ टर्न प्रोमोशन उन्हें मिल जाता है. हम मेहनत करते हैं और टापते रह जाते हैं. इसलिए हम उन की खबर पर कोई काररवाई नहीं करते. हम अपने मन से काररवाई करते हैं. अपना क्राइम कंट्रोल का रिकार्ड ठीक करवाने के लिए हम किसी छुटभैए की जेब में तमंचा रख कर उस का इनकाउंटर दिखा देते हैं. आउट आफ टर्न प्रोमोशन पक्का. अफीम की पुडि़या रख कर बंद करा देते हैं. बड़ा दिमाग लगाना पड़ता है हमें.’’

पुलिस अफसर हांफने लगा.

पत्रकार फिर नारद के पास आ कर बोला, ‘‘ऋषिवर, ये लोग ठीक कहते हैं. बड़ा दिमाग लगाते हैं ये. एक क्रिमिनल को दूसरे के विरुद्ध तैयार करते हैं. बंदूक, गोली सब सप्लाई कराते हैं. फिर जब 2 क्रिमिनल गुट आपस में भिड़ते हैं तो एक का सफाया हो ही जाता है. पुलिस को खरोंच भी नहीं लगती. ये अपनी पीठ भी खुद ठोक लेते हैं.’’

‘‘साहब, किसी बडे़ डकैत का हम तब तक सफाया नहीं करते जब तक उस के हेड पर 4-5 लाख का इनाम घोषित नहीं हो जाता. अन्यथा ददुआ या उस जैसे डकैत बीहड़ों में जिंदा नहीं रहते.’’

‘‘मैं ठीक ही कह रहा था,’’ पत्रकार बोला.

‘‘नो, नो सर, ये मीडिया वाले तिल का ताड़ बना देते हैं,’’ पुलिस अफसर ने कहा.

पत्रकार फिर बीच में टपक पड़ा, ‘‘सर, जनसंख्या पर कंट्रोल तो मेडिकल विभाग करता है न. हास्पिटल में आने वाले आधे मरीज तो डाक्टरों की कृपा से देवलोक चले जाते हैं और आधे नकली दवा खा कर. लेकिन ये लोग फर्जी नसबंदी कर के पापुलेशन का बैलेंस बनाए रखते हैं.’’

सी.एम.ओ. साहब छुट्टी पर थे. एक कंपाउंडर काफिले के साथ था. वह शर्माते हुए बोला, ‘‘सर, मैं नाचीज एक मेडिकल असिस्टेंट. क्षमा करें, नसबंदी से ले कर मरहमपट्टी तक मैं ही करता हूं पर 200 रुपए में मुझे 5 रुपए मिलते हैं, बाकी ऊपर वाले जानें. मेरा स्वर्ग का रास्ता मत खराब करना प्रभु.’’

‘‘नारायण…नारायण…यह क्या गड़बड़घोटाला है. 200 रुपए में 5 रुपए मिलते हैं. यह मैं समझ नहीं पाया. थोड़ा और स्पष्ट करें,’’ नारद ने जिज्ञासा जाहिर की.

पत्रकार ने आगे जा कर उन की जिज्ञासा शांत की, ‘‘सर, सरकार हरेक नसबंदी पर प्रोत्साहनस्वरूप 200 रुपए देती है. उस में से आधा तो फर्जी नसबंदी की जाती है. उसी रुपए के बंदरबांट की बात कर रहे हैं कंपाउंडर साहब, बड़ा करप्शन है.’’

‘‘यह करप्शन क्या होता है?’’ नारद उत्सुक हो कर बोले.

पत्रकार ने स्पष्ट किया, ‘‘सर, जैसे मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाया जाता है वैसे ही अधिकारियों को भी चढ़ावा चढ़ाए जाने का यहां चलन है. इसे करप्शन कहा जाता है. करप्शन का मतलब कर औप्शन यानी जिस धन पर कर, यानी टैक्स देना औप्शनल हो, यानी मनमर्जी, इसे देशी भाषा में रिश्वत या घूस भी कहते हैं.’’

‘‘नारायण…नारायण,’’ नारद बोले, ‘‘मंदिर दर्शन का मूड खराब कर दिया. मेरा बीपी हाई हो रहा है. चलिए, अब वापस चलते हैं.’’

अधिकारीगण सन्न रह गए. सब के चेहरे लटक गए. नारद झटके से कार में बैठ गए. नारद ने कार में ही मोबाइल पर महादेव से बात की, ‘‘हे महादेव…आप की नगरी की यह दुर्दशा. आबादी इतनी कि चलनाफिरना मुश्किल. आप मोक्ष प्राप्त करने की चाहत रखने वालों को ऊपर बुलाते भी नहीं. शहर इतना गंदा कि सीवर व मरे जानवरों की दुर्गंध अभी भी नाक में बसी है. क्राइम रेट बहुत हाई है. पुलिस ने दबंग अपराधियों से सेटिंग कर रखी है. हमेशा क्राइम होने के बाद स्पौट पर पहुंचती है. मेडिकल विभाग भी 200 पर 5 रुपए के चक्कर में है, यहां तक कि मंदिर में भी करप्शन है. आखिर इस नगरी का कैसे कल्याण हो. मेरा तो बीपी हाई हो गया है.’’

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महादेव का मोबाइल पर जवाब आया, ‘‘वैरी सैड, नारद, अभी मैं कैलाश पर्वत पर हूं. मैं कल उन विभागों के देवताओं की मीटिंग बुला रहा हूं. तुम अभी वापस आ जाओ, फिर कभी जाना, अन्यथा हार्ट अटैक हो जाएगा… ओवर.’’

नारद वी.आई.पी. कार से ही तुरंत देवलोक को ट्रांस्मिट हो गए. जब कार सर्किट हाउस पहुंची तो कार में नारद को न पा कर अधिकारियों में हड़कंप मच गया. जिले में तुरंत रेड एलर्ट जारी कर दिया गया.

तारा ने की बौलीवुड में धमाकेदार एंट्री…

तारा सुतारिया ने बौलीवुड में धमाकेदार एंट्री मार ही है. तारा फिल्म में कमाल लग रही हैं, वैसे असल जिंदगी में भी तारा काफी बोल्ड हैं. उनकी फोटोज इस बात का सबूत है कि  वो हॉटनेस के मामले में किसी बॉलीवुड हसीना से कम नहीं हैं. देखें तस्वीरें-

 

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❤️

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करण की स्टूडेंट हैं तारा

तारा सुतारिया करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ से बौलीवुड में धमाकेदार एंट्री मार चुकी हैं. उनकी एक्टिक देखकर सभी उनके कायल हो चुके है. तारा उन बौलीवुड एक्ट्रेसस में शामिल है जिनका कोई बौलीवुड फैमिली बैग्राउंड नहीं है.

मिडल क्लास फैमिली से बौलीवुड का सफर

तारा सुतारिया 19 नवंबर 1995 को मुंबई में एक मिडल क्लास फैमिली में जन्मी, उनके पिता हिमांशु सुतारिया कंप्यूवटर हॉर्डवेयर प्रोफेशनल हैं वही उनकी मां टीना सुतारिया एक हाउसवाइफ हैं.

 

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With the best @farrokhchothia

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छोटे परदे से शुरु किया एक्टिक का  सफर

23 साल की तारा डिज्नी गर्ल रह चुकी हैं, उन्होंने ‘द स्वीट लाइफ विद करण एंड कबीर’, ‘ओए जस्सी’ और ‘शेक इट अप’ जैसे शो में काम किया है.

 

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The twin ( and dance goddess, apparently ) in her element

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तारा को पसंद है डांस

तारा रॉयल एकेडमी ऑफ डांस और इंपीरियल सोसाइटी फॉर टीचर्स ऑफ डांसिंग से क्लागसिकल, बैले और मॉडर्न डांस, लंदन के स्कूफल ऑफ क्लासिकल बैले एंड वेस्टसर्न डांस सीख चुकी हैं. फिल्म में उनके डांस से ये बात साफ भी हो जाती है, उनके हर मूव को फैंस ने खूब पसंद किया.

सिंगिग में भी माहिर है तारा

बचपन से ही गाना का शौक  रखने वाली तारा ने “तारे जमीन पर”, “गुजारिश” और “डेविड” जैसी फिल्मों के लिए गाना गा चुकी हैं. रियलिटी शो “एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा” में तारा फराह खान और अनु मलिक के सामने अपना हुनर दिखा चुकी हैं.

 

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At International Jazz Day, thank you BLUE FROG and our beloved Uncle Louiz!

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तारा के खिताब

तारा एक बेहतरीन ओपरा सिंगर भी हैं। यही वजह है कि तारा को भारतीय माइली साइरस कहा जाता है.

 

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The product of a spontaneous shoot with the amazing @farrokhchothia #NoMakeUp

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खास दोस्त है तारा और सिद्धार्थ मल्होत्रा

तारा और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने एक साथ स्कूलिंग की है. यही वजह है कि ये दोनों बहुत अच्छे दोस्त है. आए दिन इन दोनों को साथ देखा जाता है.

तो ये कहना गलत नहीं होगा की तारा ने बौलीवुड धमाकेदार एंट्री कर ली है अब देखना होगा की वो आगे कितना कमाल दिखाती है.

 

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