सरस सलिल विशेष

फिल्म: कंठों

कलाकार: शिबोप्रसाद मुखर्जी, पाउली डाम

रेटिंगः 4 स्टार

बौलीवुड ही नहीं हौलीवुड में भी जानलेवा बीमारी कैंसर पर कई फिल्में बन चुकी हैं. हर फिल्म में कैंसर की बीमारी के चलते मरीजों की होने वाली मौत का चित्रण होता है अथवा कैंसर की बीमारी का भावनात्मक रूप से फिल्म की कहानी में दोहन किया जाता है. मगर पहली बार फिल्मकार शिबोप्रसाद मुखर्जी और नंदिता रौय बंगला भाषा की फिल्म ‘‘कंठों’’ में कैंसर की बीमारी का इलाज कराकर स्वस्थ होने के बाद उस इंसान पर क्या गुजरती है? उसे किस तरह के संबल की जरुरत होती है? सहित कई बातों का अति सुंदर और संजीदा माानवीय चित्रण किया है. यह फिल्म ऐसे रेडियो जौकी की है जो कि गले के कैंसर के चलते अपनी आवाज खो देने के बाद किस तरह पुनः अपने रेडियो जौकी के प्रोफेशन@काम को अंजाम देना शुरू करता है. यह कहानी है उम्मीद, आशा, संघर्ष, दोस्ती और रिश्तों की. यह कहानी है मानवीय स्प्रिट की.

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