उन्नाव की उलझन

चूंकि अपराधी भारतीय जनता पार्टी का नेता है, उसे हर तरह की मनमानी करने का पैदाइशी हक है और उस के रास्ते में जो आएगा उस की मौत भी होगी तो बड़ी बात नहीं. इस लड़की के पिता को पकड़ कर जेल में ठूंस दिया गया कि उस ने अपनी बेटी को शिकायत करने से क्यों नहीं रोका. वहां उसे मार डाला गया.

उस लड़की ने खुद को जलाने की कोशिश की तो उस पर तोहमत लगा दी गई. लड़की के चाचा को गिरफ्तार कर लिया गया और अदालत से सजा दिला दी गई. अब जब लड़की, उस की चाची और चाची की बहन जेल में बंद चाचा वकील के साथ लौट कर गाड़ी से आ रहे थे तो एक बड़े ट्रक ने उसे टक्कर मार कर चकनाचूर कर दिया जिस में चाची और चाची की बहन मारी गईं. लड़की बच गई जो न अस्पताल में सुरक्षित है, न घर में रहेगी. मां को हर हाल में समझौता करना पड़ेगा. वह कब तक सरकार से लड़ेगी?

यह कहानी आज की नहीं सदियों की है. देश में बलात्कार की शिकार ही जिम्मेदार है, बलात्कारी नहीं. बलात्कारी का तो हक है खासतौर पर अगर वह शिकार से ऊंची जाति का हो. पहले लड़कियों के पास कुएं या नदी में कूदने या फांसी लगाने के अलावा कोई और रास्ता न था, आज पुलिस में शिकायत का हक है पर तभी अगर दूसरी तरफ का कुछ कमजोर हो, पैसे और रसूख वाला न हो. जिस पर बलात्कार का आरोप है और जो जेल में बंद है, उसे शुक्रिया कहने 4 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जेल में पहुंचे थे और उन्होंने कहा था, ‘‘हमारे यहां के यशस्वी और लोकप्रिय विधायक कुलदीप सेंगर जो काफी दिनों से यहां हैं. चुनाव के बाद उन्हें धन्यवाद देना उचित समझा तो मिलने आ गया.’’

यह लड़की भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर के घर नौकरी मांगने के लिए 2017 में गई थी. उस का कहना है कि उस के साथ गलत काम किया गया था. शिकायत करने के बाद उस के घर वालों को धमकियां मिल रही थीं और अब अमलीजामा पहना दिया गया है.

इस मामले में बहुतकुछ नहीं होगा. सबकुछ रफादफा हो जाएगा, क्योंकि गलत तो लड़की ही थी, क्योंकि ऐसे मामले में गलती लड़की की ही होती है. ‘रामायण’ तक में अहल्या और सीता गलत थीं. सजाएं उन्हें ही मिली थीं. ऐसे समय जब पौराणिक युग को वापस लाया जा रहा हो, जब पिछले जन्मों के कर्मों के फल का पाठ पढ़ाने वाली किताबों को ही अकेला ज्ञान माना जा रहा हो, यह तो होना ही था.

यह संदेश है बलात्कार की शिकार हर लड़की को कि बलात्कार के बाद घर जाए, नहाए, क्रोसिन की 4 गोलियां ले कर सो जाए और हादसे को भूल कर अगली बार इसे दोहराने को तैयार रहे. यह तो होगा ही अगर वह जरा भी जवान है. बच्चियों और प्रौढ़ों को भी नहीं छोड़ा जाता और उन के लिए भी संदेश है कि हम 2019 में नहीं 919 में रह रहे हैं, जब इस देश में पूरी तरह धर्म राज था. सुनहरे दिन लौट रहे हैं.

सोशल मीडिया की दहशत

पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों पर बढ़ते मारपीट के मामलों के पीछे ह्वाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक बहुत हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि ये अफवाहों, अश्लीलता, गंदीभद्दी गालियों, जातिसूचक बकवास को दूरदूर तक ले जाते हैं. पहले जो बात गांव की चौपाल के पास के पेड़ के नीचे तक, शहर में महल्ले की चाय की दुकान या कालेज की कैंटीन तक रहती थी अब मीलों, सैकड़ों मीलों, चली जाती है.

यह मानना पड़ेगा कि ऊंची जातियों के पढ़ेलिखों में ऐसे बहुत से सोशल मीडिया लड़ाकू हैं जो तुर्कीबतुर्की जवाब देने में माहिर हैं. वे सैकड़ों में सही साफ बात कहने वाले की खाल उतार देते हैं. उन के पास सच नहीं होता तो वे झूठ पर उतर आते हैं, उन के पास जवाब नहीं होता तो गाली पर उतर आते हैं. वे बारबार पाकिस्तान भेजने की धमकी दे सकते हैं.

इन सोशल मीडिया बहादुरों ने चाहे कभी मजदूरी न की हो, कोई सामान न ढोया हो, किसी सीमा पर पहरेदारी न की हो, कुछ देश के लिए बनाया न हो, पर ये देशभक्त ऐसे बने रहते हैं मानो भारत इन की वजह से एक है और सैनिक, व्यापारी, किसान, मजदूर, बेरोजगार से ये ज्यादा देश के लिए मर रहे हैं.

इन के पास पढ़ेलिखों का मुंह बंद करने की ताकत आ गई है क्योंकि ये शोर मचा कर सही बात को कुचल सकते हैं. इन के पास समय ही समय है इसलिए ये हर तरह की टेढ़ीमेढ़ी बात गढ़ सकते हैं. ये दलितों के अत्याचारों की कहानियां बना सकते हैं. ये मुसलमानों द्वारा की गई हत्याओं की झूठी कहानियों को ऐसे फैला सकते हैं मानो ये वहीं खड़े थे. दलितों की पिटाई पर ये शिकायत करने वाले की खाल खींच सकते हैं.

ये आदतें इन्हें पीढि़यों से मिली हुई हैं. पीढि़यों से उलटीसुलटी कहानियां कहकह कर ही देशभर में झूठ के मंदिर फैले हुए हैं और वहां से इन लोगों को अच्छी आमदनी होती है. वास्तु, भविष्य, टोनेटोटके, कुंडली, हवनपूजन के नाम पर इन की आमदनी पक्की है. चूंकि पढ़ाई में अच्छे होते हैं, किताबें इन के हिसाब से बनती हैं, इन्हीं के साथी परीक्षा लेते हैं, नौकरियां इन को ही मिलती हैं. जो आरक्षण पा कर कुछ ले रहे हैं वे डरेसहमे रहते हैं, चुप रहते हैं, उन के मुंह से बस ‘जी हुजूर’, ‘जय भीम’, ‘जय अंबेडकर’ निकलता है.

वैसे भी पिछड़ों और दलितों के तो मन में गहरे बैठा है कि वे तो पिछले जन्मों के पापों का फल भोग ही रहे हैं, अगर उन्होंने इन लोगों को जवाब दिया तो उन का हाल शंबूक और एकलव्य जैसा होगा, उन्हें मरने के लिए घटोत्कच की तरह आगे कर दिया जाएगा. वे तो आज भी गंदे सीवर में डूब कर उसे साफ करने भर लायक हैं. वे ट्विटर, फेसबुक, ह्वाट्सएप की तो छोडि़ए एक पोस्टर भी नहीं पढ़ने की हिम्मत रखते. वे क्या मुंहतोड़ जवाब देंगे. और जवाब नहीं दोगे तो बोलने वाले की हिम्मत बढ़ेगी ही, वह मुंह भी चलाएगा और हाथपैर भी चलाएगा ही.

ब्रेकअप के बाद बदला सलमाल खान की इस एक्ट्रेस का लुक

फिल्म “लकी” से अपने बौलवुड कैरियर की शुरुआत करने वाली एक्ट्रेस स्नेहा उलाल काफी समय से बौलीवुड से गायब है पर सोशल मीडिया के जरीए वो अपने फैंस से कनेक्ट हैं. बौलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान ने ही स्नेहा उलाल को बौलीवुड में एंट्री कराई थी इसके बाद वो कुछ और फिल्मों में आई पर ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर पाई. हाल ही में स्नेहा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कुछ फोटोज शेयर की जिसके बाद लोगों ने काफी कमेंट करना शुरु कर दिया. इन फोटो की खास बात ये की ब्रेकअप के बाद ये स्नेहा की पहली फोटोज हैं. स्नेहा का अपने बौयफ्रेंड अवि मित्तल के साथ ब्रेकअप हुआ हैं. इसके बाद उनका बोल्ड लुक सबके सामने आया है. इस लुक को फैंस खासा पसंद कर रहे हैं.

कुछ को ओवरकम कर किया कमबैक

All India Mixed Martial Arts Association (AIMMAA)के चेयरमैन अवि मित्तल के साथ स्नेहा उलाल पिछले काफी समय से रिलेशनशिप में थी. स्नेहा ने अवि मित्तल के साथ ‘वैलेंटाइन्स डे’ भी सेलिब्रेट किया था लेकिन इसके बाद मार्च में दोनों अलग हो गए थे. इस बात से स्नेहा काफी डिप्रेस थी यही कारण है की फैंस ने उनको जमकर मोटिवेट किया और उनकी खूबसूरती की तारीफें करते नहीं थकें.

 

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Its getting hot in here

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ऐश्वर्या राय की लुकअलाइक होने के कारण मिली थी पहचान

स्नेहा उलाल के चेहरा बौलीवुड एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन से थोड़ा-बहुत मिलता-जुलता है. इसी कारण सलमान खान ने उनको अपनी फिल्म में लिया था. स्नेहा उलाल ने साल 2005 में बॉलीवुड में डेब्यू किया था. इसके बाद वो सोहेल खान के साथ ‘आर्यन’ फिल्म में दिखाई दी थी.

3 साल बाद हौट अंदाज में लौटी वाणी कपूर, देखें फोटोज

बौलीवुड एक्ट्रेस वाणी कपूर हमेशा अपनी हौट फोटोज के लिए सुर्खियों में रहती हैं. इस बार भी इंस्टाग्राम पर जैसे ही उन्होंने अपनी बिकिनी फोटो शेयर की फैंस ने जमकर कमेंट करना शुरू कर दिया. इन फोटोज में वाणी की अदाएं देखते ही बन रही है और ये फोटोज सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रही है. वाणी अपनी आने वाली फिल्म “वौर” में हुस्न के जलवे गिराती हुई नजर आएंगी. हाल ही में रिलीज हुए इस फिल्म के टीजर में वाणी नियौन रंग की बिकिनी में नजर आई थी. जिसके बाद से ही वो इंटरनेट पर काफी सर्च हो रही हैं. वाणी सोशल मीडिया पर काफी रहती है और फैंस के लिए टाईम टाईम पर फोटोज के जरीय अपडेट करते रहती हैं.

ऋतिक के साथ आएंगी नजर

यशराज फिल्म्स की War  में वाणी कपूर ऋतिक रोशन के साथ रोमांस करती हुई नजर आएंगी. इस तस्वीर को देखकर साफ पता चल रहा है कि दोनों की जोड़ी बौक्स औफिस पर तहलका मचाने के लिए पूरी तरह से तैयार है. फिल्म “वौर” के टीजर में वाणी बिकिनी के ऊपर अपने श्रग को उतार फेंकती है. अनुमान लगाया जा रहा है कि ये सीक्वेंस ही फिल्म में वाणी का एंट्री सीन होगा. जबसे फिल्म वौर का टीजर सामने आया है फैंस वाणी की फिल्म का इंतजार करने लगें.

 

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Walking into the golden hour ☀️

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Stormy mind and a tranquil ♥️

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3 साल बाद लौटी पर्दे पर

बता दे की वौर  के टीजर के बाद से ही फैंस इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार कर रहे है, वजह हैं की वाणी 3 साल बाद बौलीवुड में कमबैक कर रही हैं. इससे पहले  वो साल 2016 में बेफिक्रे मूवी में नजर आई थी.

फिटनेस में भी आगे है वाणी

वाणी अपनी फिटनेस पर काफी ध्यान देती है. कभी अपनी जिम की फोटोज तो काफी स्वूमिंग करती वाणी की फिटनेस देखते ही बनती हैं. वाणी के फैंस उनकी फिटनेस के दिवाने हैं. “शुद्ध देसी रोमांस” से कैरियर की शुरुआत करने वाली वाणी ने फिल्में बेशक कम कि है पर उनकी जितने भी फिल्में आई है लोगों ने उनके काम को काफी सराहा हैं.

स्माइल करती वाणी

सोशल मीडिया पर वाणी की स्माइलिंग फोटो काफी पसंद की जाती हैं. लड़के हो या लड़कियां वाणी की स्माइल पर सभी अपना दिल वारते हैं.

हमकदम

अधिक खुशी से रहरह कर अनन्या की आंखें भीग जाती थीं. अब उस ने एक मुकाम पा लिया था. संभावनाओं का विशाल गगन उस की प्रतीक्षा कर रहा था. पत्रकारों के जाने के बाद अनन्या उठ कर अपने कमरे में आ गई. शरीर थकावट से चूर था पर उस की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. एक पत्रकार के प्रश्न पर पति द्वारा कहे गए शब्द कि इन की जीत का सारा श्रेय इन की मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति को जाता है, रहरह कर उस के जेहन में कौंध जाते.

कितनी आसानी से चंद्रशेखर ने अपनी जीत का सेहरा उस के सिर बांध दिया. अगर कदमकदम पर उसे उन का साथ और सहयोग नहीं मिला होता तो वह आज विधायक नहीं गांव के एक दकियानूसी जमींदार परिवार की दबीसहमी बहू ही होती.

इस मंजिल तक पहुंचने में दोनों पतिपत्नी ने कितनी मुश्किलों का सामना किया है यह वे ही जानते हैं. जीवन की कठिनाइयों से जूझ कर ही इनसान कुछ पाता है. अपने वजूद के लिए घोर संघर्ष करने वाली अनन्या सिंह इस महत्त्वपूर्ण बात की साक्षी थी.

उस का मन रहरह कर विगत की ओर जा रहा था. तकिए पर टेक लगा कर अधलेटी अनन्या मन को अतीत की उन गलियों में जाने से रोक नहीं पाई जहां कदमकदम पर मुश्किलों के कांटे बिछे पड़े थे.

बचपन से ही अनन्या का स्वभाव भावुक और संवेदनशील था. वह सब के आकर्षण का केंद्र बन कर रहना चाहती थी. दफ्तर से घर आने पर पिता अगर एक गिलास पानी के लिए कहीं उस के छोटे भाई या बहन को आवाज दे देते तो वह मुंह फुला कर बैठ जाती. पूछो तो होंठों पर बस, एक ही जुमला होता, ‘पापा मुझ से प्यार नहीं करते.’

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बातबात पर उसे सब के प्यार का प्रमाण चाहिए था. कभीकभी मां बेटी की हठ देख कर चिंतित हो उठतीं. एक बार उन्होंने अनन्या के पिता से कहा भी था, ‘अनु का स्वभाव जरा अलग ढंग का है. अगर इसे आप इतना सिर पर चढ़ाएंगे तो कल ससुराल में कैसे निबाहेगी? न जाने कैसा घरपरिवार मिलेगा इसे.’

‘तुम चिंता क्यों करती हो, समय सबकुछ सिखा देता है. हम से जिद नहीं करेगी तो किस से करेगी?’ अनु के पिता ने पत्नी को समझाते हुए कहा था.

एक दिन अनन्या के मामा ने उस के लिए चंद्रशेखर का रिश्ता सुझाया तो उस के पिता सोच में पड़ गए.

‘अभी उस की उम्र ही क्या हुई है शिव बाबू, इंटर की परीक्षा ही तो दी है. इस साल आगे पढ़ने का उसे कितना चाव है.’

‘देखिए जीजाजी, इतना अच्छा रिश्ता हाथ से मत निकलने दीजिए, पुराना जमींदार घराना है. उन का वैभव देख कर भानजी के सुख की कामना से ही मैं यह रिश्ता लाया हूं. अनन्या के लिए इस से अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा,’ शिवप्रकाशजी ने समझाया तो अनन्या के पिता राजी हो गए.

पहली मुलाकात में ही चंद्रशेखर और उस का परिवार उन्हें अच्छा लगा था. उन्होंने बेटी को समझाते हुए कहा था, ‘चंद्रशेखर एक नेक लड़का है, तुम्हारी इच्छाओं का वह जरूर आदर करेगा.’

शादी के बाद अनन्या दुलहन बन कर ससुराल चली आई. गांव में बड़ा सा हवेलीनुमा घर, चौड़ा आंगन, लंबेलंबे बरामदे, भरापूरा परिवार, कुल मिला कर उस के मायके से ससुराल का परिवेश बिलकुल अलग था. मायके में कोई रोकटोक नहीं थी पर ससुराल में हर घड़ी लंबा घूंघट निकाले रहना पड़ता था. आएदिन बूढ़ी सास टोक दिया करतीं, ‘बहू, घड़ीघड़ी तुम्हारे सिर से आंचल क्यों सरक जाता है? ढंग से सिर ढंकना सीखो.’

चंद्रशेखर अंतर्मुखी प्रवृत्ति का इनसान था. प्रेम के एकांत पलों में भी वह मादक शब्दों के माध्यम से अपने दिल की बात कह नहीं पाता था और बचपन से ही बातबात पर प्रमाण चाहने वाली अनन्या उसे अपनी अवहेलना समझने लगी थी.

पुराना जमींदार घराना होने के कारण उस की ससुराल वाले बातबात पर खानदान की दुहाई दिया करते थे और उन के गर्व की चक्की में पिस जाती साधारण परिवार से आई अनन्या. सुनसुन कर उस के कान पक गए थे.

एक दिन अनन्या ने दुखी हो कर पति से कहा, ‘आप के जाने के बाद मैं अकेली पड़ी बोर हो जाती हूं. गांव में कहीं आनेजाने और किसी के साथ खुल कर बातें करने का तो सवाल ही नहीं उठता. मैं समय का सदुपयोग करना चाहती हूं. आप तो जानते ही हैं कि मैं ने प्रथम श्रेणी में इंटर पास किया है. मैं और आगे पढ़ना चाहती हूं, पर मुझे नहीं लगता यह संभव हो पाएगा. बातबात पर खानदान की दुहाई देने वाली मांजी, दादी मां, बाबूजी क्या मुझे आगे पढ़ने देंगे?’

चंद्रशेखर ने पत्नी की ओर गहरी नजर से देखा. पत्नी के चेहरे पर आगे पढ़ने की तीव्र लालसा को महसूस कर उस ने मन ही मन परिवार वालों से इस बारे में सलाह लेने की सोच ली.

उधर पति को चुपचाप देख कर अनन्या सोच में पड़ गई. उस के अंतर्मन की मिट्टी से पहली बार शंका की कोंपल फूटी कि यह मुझ से प्यार नहीं करते तभी तो चुप रह गए. आखिर खानदान की इज्जत का सवाल है न.

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अनन्या 2-3 दिनों तक मुंह फुलाए रही. चंद्रशेखर ने भी कुछ नहीं कहा. एक दिन आवश्यक काम से चंद्रशेखर को पटना जाना पड़ा. लौटा तो चेहरे पर एक अनजानी खुशी थी.

रात का खाना खाने के बाद चंद्रशेखर भी अपने बाबूजी के साथ टहलने चला गया. थोड़ी देर में बाबूजी का तेज स्वर गूंजा, ‘शेखर की मां, देखो, तुम्हारा लाड़ला क्या कह रहा है.’

‘क्या हुआ, क्यों आसमान सिर पर उठा रखा है?’ चंद्रशेखर की मां रसोई से बाहर आती हुई बोलीं.

‘यह कहता है कि बहू आगे पढ़ने कालिज जाएगी. विश्वविद्यालय जा कर एडमिशन फार्म ले भी आया है. कमाता है न, इसलिए मुझ से पूछने की जरूरत भी क्या है?’ ससुरजी फिर भड़क उठे थे.

‘लेकिन बाबूजी, इस में गलत क्या है?’ चंद्रशेखर ने पूछा तो मां बिदक कर बोलीं, ‘तेरा दिमाग चल गया है क्या? हमारे खानदान की बहू पढ़ने कालिज जाएगी. ऐसी कौन सी कमी है महारानी को इस घर में, जो पढ़लिख कर कमाने की सोच रही है?’

‘मां, तुम क्यों बात का बतंगड़ बना रही हो? यह तुम से किस ने कहा कि यह पढ़लिख कर नौकरी करना चाहती है? इसे आगे पढ़ने का चाव है तो क्यों न हम इसे बी.ए. में दाखिला दिलवा दें,’ चंद्रशेखर ने कहा तो अपने कमरे में परदे के पीछे सहमी सी खड़ी अनन्या को जैसे एक सहारा मिल गया.

पास ही खड़ी बड़ी भाभी मुंह बना कर बोलीं, ‘देवरजी, हम भी तो रहते हैं इस घर में, बी.ए. करो या एम.ए., आखिरकार चूल्हाचौका ही संभालना है.’

‘छोड़ो बहू, यह नहीं मानने वाला, रोज कमानेखाने वाले परिवार की बेटी ब्याह कर लाया है. छोटे लोग, छोटी सोच,’ अनन्या की सास ने कहा और भीतर चली गईं.

दरवाजे के पास खड़ी अनन्या सन्न रह गई, छोटे लोग छोटी सोच? यह क्या कह गईं मांजी? क्या अपने भविष्य के बारे में चिंतन करना छोटी सोच है? बातबात पर खानदान की दुहाई देने वाली मांजी यह क्यों भूल जाती हैं कि अच्छे खानदान की जड़ में अच्छे संस्कार होते हैं और शिक्षित इनसान ही अच्छे संस्कारों को हमेशा जीवित रखने का प्रयास करते हैं.

रात बहुत बीत चुकी थी. अनन्या की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. चंद्रशेखर भी करवटें बदल रहे थे. थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा, ‘अनन्या, तुम कल सुबह फार्म भर कर मुझे दे देना. मैं ने सोच लिया है कि तुम आगे जरूर पढ़ोगी.’

अनन्या को आश्चर्यमिश्रित खुशी हुई, ‘सच?’

‘हां, मैं परसों पटना जा रहा हूं, तुम्हारा फार्म भी विश्वविद्यालय में जमा करता आऊंगा.’

एक दिन चंद्रेशेखर बैंक से लौटा तो बेहद खुश था. उस ने अनन्या से कहा, ‘आज पटना से मेरे दोस्त रमेश का फोन आया था. बता रहा था कि तुम्हारा नाम प्रवेश पाने वालों की सूची में है. प्रवेश लेने की अंतिम तिथि 25 है. तुम कल से ही सामान बांधना शुरू कर दो. हमें परसों जाना है क्योंकि जल्दी पहुंच कर तुम्हारे लिए होस्टल में रहने की भी व्यवस्था करनी होगी.’

‘मैं होस्टल में रहूंगी?’ अनन्या ने पूछा, ‘घर से दूर…अकेली…क्या यहां कालिज नहीं है?’ उस ने अपने मन की बात कह ही डाली.

‘देखो, विश्वविद्यालय की बात ही अलग होती है. तुम ज्यादा सोचो मत. चलने की तैयारी करो. मैं बाबूजी को बता कर आता हूं,’ कहते हुए चंद्रशेखर बाबूजी के कमरे की ओर चला गया.

पटना आते समय अनन्या ने सासससुर के चरणस्पर्श किए तो सास ने उसे झिड़क कर कहा था, ‘जाओ बहू, बेहद कष्ट में थीं न तुम यहां…अब बाहर की दुनिया देखो और मौज करो.’

चंद्रशेखर के प्रयास से अनन्या को महिला छात्रावास में कमरा मिल गया. उसे वहां छोड़ कर आते वक्त उस ने कहा था, ‘तुम्हारे भीतर की लगन को महसूस कर के ही मैं ने अपने परिवार वालों की इच्छा के खिलाफ यह कदम उठाया है. मैं जानता हूं कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी. किसी चीज की जरूरत हो तो फोन कर देना.’

अनन्या ने धीरे से सिर हिला दिया था. होस्टल के गेट पर खड़ी हो कर वह तब तक पति को देखती रही जब तक वह नजरों से ओझल नहीं हो गए.

उस का मन यह सोच कर दुख से भर उठा था कि उन्होंने एक बार भी पलट कर नहीं देखा. कितनी निष्ठुरता से छोड़ गए मुझे. इतना तो कह ही सकते थे न कि अनु, मुझे तुम्हारी कमी खलेगी, पर नहीं, सच में मुझ से प्यार हो तब न…

आंसू पोंछ कर वह अपने कमरे में चली आई. कुछ दिनों तक उस का मन खिन्न रहा पर धीरेधीरे सबकुछ भूल कर वह पढ़ाई में रम गई. तेज दिमाग अनन्या ने बी.ए. फाइनल की परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए.

एम.ए. में प्रवेश लेने के बाद वह कुछ दिन की छुट्टी में घर आई थी. एक दिन चंद्रशेखर ने उस से कहा, ‘एम.ए. में तुम्हें विश्वविद्यालय में पोजीशन लानी है. उस के लिए बहुत मेहनत की जरूरत है तुम्हें.’

अनु ने सोचा, छुट्टियों में घर आई हूं तब भी वही पढ़ाई की बातें, प्रेम की मीठीमीठी बातों का मधुरिम एहसास और वह दीवानापन न जाने क्यों चंद्रशेखर के मन में है ही नहीं. जब देखो पढ़ो, कैरियर बनाओ…उन्हें मुझ से जरा भी प्यार नहीं.

‘अनु, कहां खो गईं?’ चंद्रशेखर ने कहा, ‘देखो, मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूं.’

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चंद्रशेखर कहता जा रहा था और अनु जैसे जड़ हो गई थी. मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘क्या यही प्यार है? न रस पगे दो मीठे बोल, न मनुहार…ज्यादा खुश हुए तो गए और हिंदी साहित्य की किताब उठा कर ले आए. स्वार्थी कहीं के…’

‘अनु, मैं तुम्हें कुछ दिखा रहा हूं,’ चंद्रशेखर ने फिर कहा तो अनन्या बनावटी हंसी हंस कर बोली, ‘हां, अच्छी किताब है.’

अनन्या ने मन ही मन एक ग्रंथि पाल ली थी कि चंद्रशेखर मुझ से प्यार नहीं करते. तभी तो अपने से दूर मुझे होस्टल भेज कर भी खुश हैं. क्या प्रणय की वह स्वाभाविक आंच जो मुझे हर समय जलाती रहती है, उन्हें तनिक भी नहीं जलाती होगी? शायद नहीं, उन्हें मुझ से प्यार हो तब न…

इन्हीं दिनों अनन्या को पता चला कि वह मां बनने वाली है. पूरा परिवार खुश था. एक दिन चंद्रशेखर ने उस को समझाते हुए कहा, ‘तुम्हें बच्चे के जन्म के बाद परीक्षा देने जरूर जाना चाहिए. साल बरबाद मत करना, बीता समय फिर लौट कर नहीं आता.’

अनन्या पति के साथ कुछ दिनों के लिए मायके आई थी. एक शाम घूमने के क्रम में वह गोलगप्पे वाले खोमचे के सामने ठिठक गई तो चंद्रशेखर ने पूछ लिया, ‘क्या हुआ?’

‘मुझे गोलगप्पे खाने हैं.’

‘तुम्हारा दिमाग तो नहीं चल गया. अपना नहीं तो कम से कम बच्चे का तो खयाल करो,’ चंद्रशेखर ने गुस्से से कहा तो अनन्या पैर पटकती हुई घर चली आई.

‘आप ने एक छोटी सी बात पर मुझे इतनी बुरी तरह क्यों डांटा? एक छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते? अरमान ही रह गया कि आप कभी कोई उपहार देंगे या फिर कहीं घुमाने ले जाएंगे. मेरी खुशी से आप को क्या लेनादेना…मुझ से प्यार हो तब न. जब देखो, पढ़ो…कैरियर बनाओ, जैसे दुनिया में और कुछ है ही नहीं,’ रात में अनन्या मन की भड़ास निकालते हुए बोली.

चंद्रशेखर कुछ पलों तक अपलक पत्नी को निहारता रहा फिर संजीदा हो कर बोला, ‘तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम से प्यार नहीं करता, पतिपत्नी का रिश्ता तो प्रेम और समर्पण की डोरी से बंधा होता है.’

‘अपनी सारी फिलासफी अपने तक ही रखिए. मैं अच्छी तरह जानती हूं कि आप मुझ से…’ ‘हांहां, मैं तुम से प्यार नहीं करता, मुझे प्रमाण देने की जरूरत नहीं है,’ चंद्रशेखर बीच में ही अनन्या की बात काट कर बोला.

एक दिन अनन्या गुडि़या जैसी बेटी की मां बन गई. जब बच्ची 3 महीने की हो गई तब चंद्रशेखर ने पत्नी से कहा कि उसे अब एम.ए. की परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए.

‘क्या मैं 6 महीने में परीक्षा की तैयारी कर पाऊंगी? सोचती हूं इस साल ड्राप कर दूं. अभी गुडि़या छोटी है.’

पत्नी की बातों को सुन कर उसे समझाते हुए चंद्रशेखर बोला, ‘देखो, अनन्या, पढ़ाईर् एक बार सिलसिला टूट जाने के बाद फिर ढंग से नहीं हो पाती. मैं गुडि़या के बारे में मां से बात करूंगा.’

अनन्या को लगा जैसे कोई मुट्ठी में ले कर उस का दिल भींच रहा हो. इतना बड़ा फैसला ऐसे सहज ढंग से सुना दिया जैसे छोटी सी बात हो. मेरी नन्ही सी बच्ची मेरे बिना कैसे रहेगी?

अनन्या की सास ने पोती को पास रखने से साफ मना कर दिया, ‘मुझे

तो माफ ही करो तुम लोग. कैसी मां है यह जो बेटी को छोड़ कर पढ़ने जाना चाहती है.’

अनन्या ने चीख कर कहना चाहा कि यह आप के बेटे की इच्छा है, मेरी नहीं पर कह नहीं पाई. एक दिन उस के पिता का फोन आया तो उस ने सारी बातें उन्हें बताते हुए पूछा, ‘अब आप ही बताइए, पापा, मैं क्या करूं?’

‘तुम गुडि़या को हमारे पास छोड़ कर होस्टल जा सकती हो बेटी, समय सब से बड़ी पूंजी है. इसे गंवाना नहीं चाहिए. मेरे खयाल से चंद्रशेखर बाबू ठीक कहते हैं,’ उस के पिता ने कहा.

अनन्या के सिर से एक बोझ सा हट गया. दूसरे ही दिन वह होस्टल जाने की तैयारी करने लगी. नन्ही सी बेटी को मायके छोड़ कर जाते समय अनन्या का दिल रोनेरोने को हो आया था पर मन को मजबूत कर वह रिकशे पर बैठ गई.

धीरेधीरे 6 माह बीत गए. अनन्या जब भी अपनी बेटी के बारे में सोचती उस का मन पढ़ाई से उचट जाता. वह इतनी भावुक हो जाती कि आंसुओं पर उस का बस नहीं रह जाता.

कभीकभी वह खुद को समझाती हुई सोचती कि जिंदगी में कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है. इस तरह के सकारात्मक सोच उस के मन में नवीन उत्साह भर जाते. आखिरकार उत्साह की परिणति लगन में और लगन की परिणति कठोर परिश्रम में हो गई. नतीजा सुखदायक रहा. अनन्या ने विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में दूसरा स्थान पाया.

चंद्रशेखर ने भी खुश हो कर कहा था, ‘मुझे तुम से यही उम्मीद थी अनु.’

अनन्या ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से ‘नेट’ करने के बाद उस ने हिंदी साहित्य में पीएच.डी. की उपाधि भी हासिल की.

उच्च शिक्षा ने अनन्या की सोच को बहुत बदल डाला. सहीगलत की पहचान उसे होने लगी थी. कभीकभी वह सोचती कि आज उस के पास सबकुछ है. प्यारी सी बिटिया, स्नेही पति, उच्च शिक्षा, आगे की संभावनाएं. क्या यह बिना चंद्रशेखर के सहयोग के संभव था? उस की राह की सारी मुश्किलों को चंद्रशेखर ने अपने मजबूत कंधों पर उठा रखा था. वह जान गई थी कि प्रेम शब्दों का गुलाम नहीं होता. प्रेम तो एक अनुभूति है जिसे महसूस किया जा सकता है.

अनन्या को लेक्चरर पद के लिए इंटरव्यू देने जाना था. वह तैयार हो कर बैठक में आई तो एक सुखद एहसास से भीग उठी, जब उस ने यह देखा कि चंद्रशेखर उस की मार्कशीट और प्रमाणपत्रों को फाइल में सिलसिलेवार लगा रहे थे. उसे देखते ही चंद्रशेखर ने कहा, ‘जल्दी करो, अनु, नहीं तो बस छूट जाएगी.’

असीम स्नेह से पति को निहारती हुई अनन्या ने धीरे से कहा, ‘मुझे आप से कुछ कहना है.’

‘बातें बाद में होंगी, अभी चलो.’.

‘नहीं, आप को आज मेरी बात सुननी ही होगी.’

‘तुम क्या कहोगी, मुझे पता है, वही रटारटाया वाक्य कि आप मुझ से प्यार नहीं करते,’ चंद्रशेखर व्यंग्य से हंस कर बोला तो अनन्या झेंप गई.

‘ठीक है, चलिए,’ उस ने कहा और तेजी से बाहर निकल गई. आज वह अपने पति से कहना चाहती थी कि वह अपने प्रति उन के प्यार को अब महसूस करने लगी है. पर मन की बात मन में ही रह गई.

साक्षात्कार दे कर आई अनन्या को नौकरी पाने का पूरा भरोसा था. पर उस समय वह जैसे आकाश से गिरी जब उस ने चयनित व्याख्याताओं की सूची में अपना नाम नहीं पाया. हृदय इस चोट को सहने के लिए तैयार नहीं था अत: वह फूटफूट कर रोने लगी.

पत्नी को रोता देख कर चंद्रशेखर भी संज्ञाशून्य सा खड़ा रह गया. जानता था, असफलता का आघात मौत के समान कष्ट से कम नहीं होता.

‘देखो, अनु,’ पत्नी को दिलासा देते हुए चंद्रशेखर बोला, ‘यह भ्रष्टाचार का युग है. पैरवी और पैसे के आगे आज के परिवेश में डिगरियों का कोई महत्त्व नहीं रहा. तुम दिल छोटा मत करो. एक न एक दिन तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी.’

एक दिन चंद्रशेखर ने अनन्या को समझाते हुए कहा था, ‘शिक्षा का अर्थ केवल धनोपार्जन नहीं है. हमारे समाज में आज भी शिक्षित महिलाओं की कमी है, तुम इस की अपवाद हो, यही कम है क्या?’

‘आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं केवल पैसों के लिए व्याख्याता बनने की इच्छुक नहीं थी. अपनी अस्मिता की तलाश…समाज में एक ऊंचा मुकाम पाने की अभिलाषा है मुझे. मैं आम नहीं खास बनना चाहती हूं. अपने वजूद को पूरे समाज की आंखों में पाना चाहती हूं मैं.’

चंद्रशेखर पत्नी की बदलती मनोदशा से अनजान नहीं था. समझता था, अनन्या अवसाद के उन घोर दुखदायी पलों से गुजर रही है जो इनसान को तोड़ कर रख देते हैं.

एक दिन चंद्रशेखर के दोस्त रमेश ने बातों ही बातों में उसे बताया कि 4-5 महीने में ग्राम पंचायत के चुनाव होने वाले हैं और उस की पत्नी निशा जिला परिषद की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने वाली है.

चंद्रशेखर ने कहा, ‘आज के माहौल में तो कदमकदम पर राजनीति के दांवपेच मिलते हैं. कई लोग चुनाव मैदान में उतर जाएंगे. कुछ गुंडे होंगे, कुछ जमेजमाए तथाकथित नेता. ऐसे में एक महिला का मैदान में उतरना क्या उचित है?’

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‘ऐसी बात नहीं है. पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है. अगर सीट महिला के लिए आरक्षित हो तो प्रयास करने में क्या हर्ज है? देखना, कई पढ़ीलिखी महिलाएं इस क्षेत्र में आगे आएंगी,’ रमेश ने समझाते हुए कहा.

चंद्रशेखर के मन में एक विचार कौंधा, अगर अनन्या भी कोशिश करे तो? उस ने इस बारे में पूरी जानकारी हासिल की तो पता चला कि उस के इलाके की जिला परिषद सीट भी महिला आरक्षित है. चंद्रशेखर के मन में एक नई सोच ने अंगड़ाई ले ली थी.

‘मैं चुनाव लडूं? क्या आप नहीं जानते कि आज की राजनीति कितनी दूषित हो गई है?’ अनन्या बोली.

‘इस में हर्ज ही क्या है. वैसे भी अच्छे विचार के लोग यदि राजनीति में आएंगे तो राजनीति दूषित नहीं रहेगी. तुम अपनेआप को चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लो.’

अनन्या के मन में 2-3 दिन तक तर्कवितर्क चलता रहा. आखिरकार उस ने हामी भर दी.

यह बात जब अनन्या के ससुर ने सुनी तो वह बुरी तरह बिगड़ उठे, ‘लगता है दोनों का दिमाग खराब हो गया है. जमींदार खानदान की बहू गांवगांव, घरघर वोट के लिए घूमती फिरे, यह क्या शोभा देता है? पुरखों की इज्जत क्यों मिट्टी में मिलाने पर तुले हो तुम लोग?’

‘ऐसा कुछ नहीं होगा, बाबूजी, इसे एक कोशिश कर लेने दीजिए. जरा यह तो सोचिए कि अगर यह जीत जाती है तो क्या खानदान का नाम रोशन नहीं होगा?’ चंद्रशेखर ने भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहा था.

चंद्रशेखर ने निश्चित तिथि के भीतर ही अनन्या का नामांकनपत्र दाखिल कर दिया. फिर शुरू हुई एक नई जंग.

अनन्या ने आम उम्मीदवारों से अलग हट कर अपना प्रचार अभियान शुरू किया. वह गांव की भोलीभाली अनपढ़ जनता को जिला परिषद और उस से जुड़ी जन कल्याण की तमाम बातों को विस्तार से समझाती थी. धीरेधीरे लोग उस से प्रभावित होने लगे. उन्हें महसूस होने लगा कि जमींदार की बहू में सामंतवादी विचारधारा लेशमात्र भी नहीं है. वह जितने स्नेह से एक उच्च जाति के व्यक्ति से मिलती है उतने ही स्नेह से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों से भी मिलती है. और उस का व्यवहार भी आम नेताओं जैसा नहीं है.

धीरेधीरे उस की मेहनत रंग लाने लगी. 50 हजार की आबादी वाले पूरे इलाके में अनन्या की चर्चा जोरों पर थी.

मतगणना के दिन ब्लाक कार्यालय के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी. आखिरकार 2 हजार वोटों से अनन्या की जीत हुई. उस की जीत ने पूरे समाज को दिखा दिया था कि आज भी जनता ऊंचनीच, जातिपांति, धर्म- समुदाय और अमीरीगरीबी से ऊपर उठ कर योग्य उम्मीदवार का चयन करती है. बड़ी जाति के लोगों की संख्या इलाके में कम होने पर भी हर जाति और धर्म के लोगों से मिले अपार समर्थन ने अनन्या को जीत का सेहरा पहना दिया था.

घर लौट कर अनन्या ने ससुर के चरणस्पर्श किए तो पहली बार उन्होंने कहा, ‘खुश रहो, बहू.’

अनन्या आंतरिक खुशी से अभिभूत हो उठी. उसे लगा, वास्तव में उस की जीत तो इसी पल दर्ज हुई है.

उस ने फिर कभी मुड़ कर पीछे नहीं देखा. हमकदम के रूप में चंद्रशेखर जो हर पल उस के साथ थे. 3 साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी वह भारी बहुमत से विजयी हुई. उस का रोमरोम पति के सहयोग का आभारी था. अगर वह हर मोड़ पर उस का साथ न देते तो आज भी वह अवसाद के घने अंधेरे में डूबी जिंदगी को एक बोझ की तरह जी रही होती.

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‘‘खट…’’ तभी कमरे का दरवाजा खुला और अनन्या की सोच पर विराम लग गया. चंद्रशेखर ने भीतर आते हुए पूछा, ‘‘तुम अभी तक सोई नहीं?’’

‘‘आप कहां रह गए थे?’’

‘‘कुछ लोग बाहर बैठे थे. उन्हीं से बातें कर रहा था. तुम से मिलना चाहते थे तो मैं ने कह दिया कि मैडम कल मिलेंगी,’’ चंद्रशेखर ने ‘मैडम’ शब्द पर जोर डाल कर हंसते हुए कहा.

भावुक हो कर अनन्या ने पूछा, ‘‘अगर आप का साथ नहीं मिलता तो क्या आज मैं इस मुकाम पर होती? फिर क्यों आप ने सारा श्रेय मेरी लगन और मेहनत को दे दिया?’’

‘‘तो मैं ने गलत क्या कहा? अगर हर इनसान में तुम्हारी तरह सच्ची लगन हो तो रास्ते खुद ही मंजिल बन जाते हैं. हां, एक बात और कि तुम इसे अपना मुकाम मत समझो. तुम्हारी मंजिल अभी दूर है. जिस दिन तुम सांसद बन कर संसद में जाओगी और इस घर के दरवाजे पर एक बड़ी सी नेमप्लेट लगेगी…डा. अनन्या सिंह, सांसद लोकसभा…उस दिन मेरा सपना सार्थक होगा,’’ चंद्रशेखर ने कहा तो अनन्या की आंखें खुशी से छलक पड़ीं.

‘‘हर औरत को आप की तरह प्यार करने वाला पति मिले.’’

‘‘अच्छा, इस का मतलब तो यह हुआ कि तुम अब मुझ पर यह आरोप नहीं लगाओगी कि मैं तुम से प्यार नहीं करता.’’

‘‘नहीं, कभी नहीं,’’ अनन्या पति के कंधे पर सिर टिका कर असीम स्नेह से बोली.

‘‘तो तुम अब यह पूरी तरह मान चुकी हो कि मैं तुम से सच्चा प्यार करता हूं,’’ चंद्रशेखर ने मुसकरा कर कहा तो अनन्या भी हंस कर बोल पड़ी, ‘‘हां, मैं समझ चुकी हूं, प्यार की परिभाषा बहुत गूढ़ है. कई रूप होते हैं प्रेम के,

कई रंग होते हैं प्यार करने वालों के, पर सच्चे प्रेमी तो वही होते हैं जो जीवन साथी की तरक्की के रास्ते में अपने अहं का पत्थर नहीं आने देते, ठीक आप

की तरह.’’

एक स्वर्णिम भोर की प्रतीक्षा में रात ढलने को बेताब थी. कुछ क्षणों में पूर्व दिशा में सूर्य की किरणें अपना प्रकाश फैलाने को उदित हो उठीं.             द्य

भाजपा में चुनावी सरगर्मी

नई दिल्ली. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पानी पीपी कर कोसने वाली भारतीय जनता पार्टी अब लगता है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हीं के पैतरे आजमाना चाहती है तभी तो उस ने ऐलान किया है कि अगले विधानसभा चुनावों में वह अपना घोषणापत्र जनता की राय ले कर बनाएगी.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने बताया कि सोमवार, 8 जुलाई को हुई एक बैठक में फैसला लिया गया था कि ‘दिल्ली के मन की बात, बीजेपी के साथ’ अभियान चलाया जाएगा. सदस्यता अभियान के साथ इस कवायद की शुरुआत हो चुकी है.

पार्टी नेता अलगअलग इलाकों में जा कर लोगों से बात कर के उन की राय जानेंगे और पार्टी अपना चुनावी घोषणापत्र तैयार करेगी. पार्टी जनता से जुड़े तमाम मुद्दों पर कानूनी राय भी लेगी, ताकि आगे चल कर कानूनी अड़चनों का सामना न करना पड़े.

लौट आए अखिलेश यादव

लखनऊ. पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती के साथ महागठबंधन बना कर भाजपा से लोहा लेने का फार्मूला फुस होने के बाद समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा अखिलेश यादव राजनीति से थोड़ा कट से गए थे, पर जुलाई महीने के दूसरे हफ्ते में वे पूरे जोश के साथ वापस अपने कार्यालय में आ गए.

उत्तर प्रदेश की 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं. उम्मीद जताई जा रही है कि समाजवादी पार्टी इन चुनावों के लिए अपनी तैयारियां शुरू करेगी. वैसे, पार्टी कार्यकर्ताओं को बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के रुख पर अखिलेश यादव के कुछ कहने का अब भी इंतजार है.

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राहुल आए रंग में

अहमदाबाद. राहुल गांधी भाजपा पर हमला करने से नहीं चूक रहे हैं और प्रधानमंत्री के गढ़ में जा कर जनता के सामने अपनी बात रख रहे हैं.

राहुल गांधी ने शुक्रवार, 12 जुलाई को आरोप लगाया कि भाजपा सरकारें गिराने के लिए ‘धनबल’ और ‘डरानेधमकाने’ का सहारा ले रही हैं.

याद रहे कि कर्नाटक में 13 महीने पुरानी कांग्रेस और जद (एस) की गठबंधन सरकार से 2 निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया है और कांग्रेस के 13 विधायकों समेत कुल 16 विधायक इस्तीफा दे चुके हैं.

राहुल गांधी मानहानि के एक मामले में मैट्रोपोलिटन अदालत के सामने पेशी के लिए अहमदाबाद आए हुए थे. मानहानि का यह मामला अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक की तरफ से दायर किया गया है जिस में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह एक निदेशक हैं. राहुल गांधी ने खुद को बेकुसूर बताया और उन्हें इस मामले में जमानत मिल गई.

मानहानि के कानून का आजकल अखबारों और राजनीतिबाजों को अदालतों में घसीटने के लिए जम कर इस्तेमाल किया जा रहा है.

ममता हुईं ममतामयी

कोलकाता. ममता बनर्जी ने साबित कर दिया है कि राजनीति उन के खून में बसी है. हाल के लोकसभा चुनाव में भाजपा के बढ़ते दबदबे के बाद उन्होंने खूब कड़े तेवर दिखाए थे और पूरे दमखम के साथ लोहा लिया था. पर जब बात नहीं बनी और उन्हें लगा कि इस से पार्टी को आने वाले विधानसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है तो वे मोम की तरह पिघल गईं और गुरुवार, 11 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस के सभी विधायकों से कहा कि वे और विनम्र हो कर जनता से मिलें और अपनी पिछली गलतियों के लिए उन से माफी मांगें.

लगता है कि लोकसभा चुनाव में मिले करारे झटके के बाद से ममता बनर्जी बहुतकुछ नया सीख गई हैं और अभी से ही विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जीजान से जुट गई?हैं.

‘दिग्गी राजा’ का दांव

पुणे. अपने चहेतों में ‘दिग्गी राजा’ के नाम से मशहूर कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने शुक्रवार, 12 जुलाई को कर्नाटक और गोवा के हालात पर दावा किया कि नोटबंदी के दौरान भाजपा ने खूब पैसा बनाया और अब उसी पैसे का इस्तेमाल कर पार्टी विधायकों को खरीद रही है. विधायकों को ऐसे खरीदा जा रहा है जैसे बाजार से सामान खरीदा जाता है.

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हालांकि, दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार पूरी तरह सुरक्षित है. मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास 121 विधायकों का समर्थन है.

पत्नियों की सरकार से गुहार

श्रीनगर. जम्मूकश्मीर पर अपना नियंत्रण बनाने के मनसूबे पालने वाली भाजपा के सामने एक नई चुनौती आ गई है. बात यह है कि भारतपाकिस्तान नियंत्रण रेखा के उस पार से एक पुनर्वास योजना के तहत वापस आए पूर्व कश्मीरी आतंकवादियों की पाकिस्तानी पत्नियों ने शुक्रवार, 12 जुलाई को केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की थी कि उन्हें या तो भारतीय नागरिकता दी जाए या फिर वापस भेज दिया जाए.

ऐसी महिलाओं में शामिल ऐबटाबाद की रहने वाली तैयबा ने कहा, ‘‘हम कुल 350 महिलाएं हैं. हमें यहां का नागरिक बनाया जाए, जैसा किसी भी देश में पुरुषों के साथ विवाह करने वाली महिलाओं के साथ होता है. हम भारत सरकार और राज्य सरकार से अपील करती हैं कि या तो हमें पासपोर्ट प्रदान किए जाएं या वापस जाने के लिए यात्रा दस्तावेज प्रदान किए जाएं.’’

हिमाचल के नए राज्यपाल

शिमला. भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता कलराज मिश्र को हिमाचल प्रदेश का नया राज्यपाल बनाया गया है. याद रहे कि कभी उत्तर प्रदेश और भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता रहे कलराज मिश्र को नरेंद्र मोदी सरकार के 2014 से 2019 के पहले कार्यकाल में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया था, हालांकि उन्होंने साल 2017 में ही मंत्री पद छोड़ दिया था. इस के बाद कलराज मिश्र ने साल 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था.

कलराज मिश्र को आचार्य देवव्रत की जगह हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है

जबकि आचार्य देवव्रत को गुजरात का राज्यपाल बनाया गया है.

विज के फिर बिगड़े बोल

अंबाला. हरियाणा के बड़े भाजपाई नेता और राज्य सरकार में मंत्री अनिल विज ने बड़ी ओछी बात कह दी. हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दिए गए इस्तीफे पर अंबाला में 6 जुलाई को अनिल विज ने कहा, ‘‘यह तो उन का फैमिली ड्रामा है. राजीव गांधी ने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है, लेकिन उन के बेटे राहुल ने इस्तीफा दिया तो एक कुत्ता भी नहीं भूंका.’’

इस से पहले फरवरी, 2019 में अनिल विज ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुलना ‘रामायण’ की एक किरदार ताड़का से की थी. तब उन्होंने कहा था, ‘‘छोटे होते थे जब रामलीला देखने जाया करते थे तो उस में एक सीन आया करता था कि ऋषिमुनि जब यज्ञ किया करते थे तो ताड़का आ कर उस में रुकावट डाल दिया करती थी. ठीक उसी तरह की भूमिका ममता बनर्जी कर रही हैं.’’

लगेगी चुनावी पाठशाला

रायपुर. छत्तीसगढ़ में वोटरों में जागरूकता लाने के लिए चुनाव पाठशाला की शुरुआत की जाने वाली है. इन पाठशालाओं में रोचक खेल और मनोरंजक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाएगा. वैसे, राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वोटिंग के प्रति जागरूक करने के लिए चुनावी पाठशालाएं लगाई गई थीं जिन में चुनावी साक्षरता क्लबों का भी सहारा लिया गया था.

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संयुक्त मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी समीर विश्नोई का इस मसले पर कहना है कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान चुनावी साक्षरता

क्लब के जरीए बेहतर काम किया गया था. इस से छत्तीसगढ़ में वोटरों में जागरूकता बढ़ी है.        द्य

भविष्य की नीव में दफन 2 लाशें

लेखक- दिनेश बैजल ‘राज’

उस ने यह बात प्रिंसिपल विजय कुमार को बताई तो उन्होंने 7 स्कूलों के संचालक सुरेंद्र लवानिया से सिफारिश कर के उसे 3 हजार रुपए महीना किराए पर स्कूल दिला दिया. लेकिन धीरज के मन में लालच आ गया और उस ने…

आगरा जनपद के थाना सिकंदरा की ओम विहार कालोनी निवासी सुरेंद्र लवानिया के सैनिक भारती इंटर  कालेज समेत 7 स्कूल हैं. इस के अलावा वह एक एफएम चैनल 90.8 के भी निदेशक हैं. उन का एक स्कूल थाना ताजगंज क्षेत्र के कौलक्खा में है. डा. बी.आर. अंबेडकर नाम के इस जूनियर हाईस्कूल को उन्होंने सेमरी निवासी धीरज को किराए पर दे रखा था.

धीरज ही इस स्कूल को चला रहा था. लेकिन पिछले 2 सालों से धीरज ने स्कूल के मालिक सुरेंद्र लवानिया को किराया नहीं दिया था. जब भी वह किराया मांगते तो धीरज कोई न कोई बहाना बना देता था.

28 जून, 2019 शुक्रवार की सुबह लगभग साढ़े 10 बजे इस स्कूल के संचालक धीरज ने सुरेंद्र कुमार लवानिया को फोन कर के कहा, ‘‘कहीं से मेरे पास पैसे आ गए हैं, आप स्कूल आ कर सारा किराया ले जाएं. आप अपने साथ प्रिंसिपल विजय कुमार को भी बुला लाएं गुरुजी के सामने पैसे दिए जाएंगे तो ठीक रहेगा.’’

धीरज विजय कुमार को गुरुजी कहता था. वह सुरेंद्र कुमार लवानिया के ही सैनिक भारती इंटर कालेज, उर्खरा में प्रिंसिपल थे और आगरा की इंदिरापुरम कालोनी में सपरिवार रहते थे. धीरज से किराए के पैसे मिलने की बात सुन कर सुरेंद्र लवानिया खुश हुए.

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उन्होंने उसी समय अपने एक कालेज के प्रिंसिपल विजय कुमार को फोन कर के कहा कि मैं धीरज के पास कौलक्खा पहुंच रहा हूं. तुम भी घर से सीधे धीरज के पास पहुंच जाओ. इस के बाद वह अपनी वरना कार से धीरज के पास जाने के लिए निकल गए.

पिं्रसिपल विजय कुमार उस समय सैनिक भारती इंटर कालेज में चौकीदार से सफाई कार्य करा रहे थे, क्योंकि पहली जुलाई को स्कूल खुलना था.

मूलरूप से दरभंगा, बिहार निवासी प्रिंसिपल विजय कुमार झा 25 साल पहले आगरा आए थे. सुरेंद्र लवानिया से उन का परिचय हुआ तो उन्होंने झा को सैनिक भारती इंटर कालेज का प्रिंसिपल बना दिया था. ईमानदार व मिलनसार स्वभाव के चलते बाद में विजय ही लवानिया के सभी स्कूलों की देखरेख की जिम्मेदारी संभालने लगे.

उन का बेटा मानवेंद्र उर्फ दीपक सीए की तैयारी कर रहा था. बेटी की वह शादी कर चुके थे. उन्होंने अपने बेटे से बता दिया था कि वे लवानिया साहब के साथ धीरज के पास जा रहे हैं. फिर वह बाइक ले कर निकल गए.

स्कूल मालिक और प्रिंसिपल  की रहस्यमय गुमशुदगी

शाम हो गई लेकिन न तो लवानिया साहब अपने घर लौटे और न ही विजय कुमार. सुरेंद्र लवानिया के घर वालों ने कई बार उन्हें फोन मिलाया लेकिन फोन स्विच्ड औफ था. उधर विजय कुमार का बेटा भी कई बार पिता का नंबर मिला चुका था पर उन का फोन स्विच्ड औफ होने की वजह से नहीं मिला. देर शाम सुरेंद्र लवानिया की पत्नी सुशीला ने प्रिंसिपल विजय के घर फोन किया.

विजय की पत्नी शीला ने उन्हें बताया कि उन के पति भी सुबह बाइक ले कर धीरज से मिलने की बात कह कर निकले थे, लेकिन उन का मोबाइल भी स्विच्ड औफ है. उन से संपर्क भी नहीं हो पा रहा है. शीला ने यह भी बताया कि धीरज को फोन किया था, घंटी जाने के बाद भी उस ने काल रिसीव नहीं की.

दोनों के घर वालों को चिंता हुई. उन्होंने अपने परिचितों को भी फोन कर के उन के बारे में पूछा. फिर उन्हें संभावित जगहों पर तलाश करने लगे. लेकिन दोनों का कोई सुराग नहीं लगा. तलाश में भटक रहे परिजन दूसरे दिन शनिवार 29 जून को ताजगंज थाने पहुंचे.

स्कूल मालिक सुरेंद्र लवानिया व प्रधानाचार्य विजय कुमार के परिजनों ने सुरेंद्र लवानिया के गायब होने की बात सुन कर थानाप्रभारी भी हैरान रह गए, क्योंकि शिक्षा जगत में सुरेंद्र लवानिया बड़ा नाम था. जिले में उन के 7 स्कूल और कालेज थे. 5 साल पहले उन्होंने खंदारी में एक एफएम चैनल भी शुरू किया था.

वह सपरिवार आगरा के सिकंदरा क्षेत्र की ओमविहार कालोनी में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सुशीला के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. बड़ी बेटी की वह शादी कर चुके थे. सुरेंद्र लवानिया उत्तर प्रदेश शिक्षण संस्थान प्रबंधक परिषद के सदस्य भी थे. वे संगठन की प्रत्येक गतिविधि में हिस्सा लेते थे.

स्कूल स्वामी सुरेंद्र लवानिया व प्रधानाचार्य विजय कुमार के परिजनों ने थानाप्रभारी को घटना से अवगत कराया. मामला गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने सुरेंद्र और विजय की गुमशुदगी दर्ज कर के इस घटना की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. दोनों के लापता होने की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में खलबली मच गई. हालात को देख कर अपहरण की आशंका थी. एसएसपी जोगेंद्र कुमार ने इस मामले की कमान खुद संभाल ली. इस के तुरंत बाद पुलिस दोनों की खोज में लग गई.

वैसे सुरेंद्र लवानिया मूलरूप से मंसा की मढैया, धिमिश्री, शमसाबाद के रहने वाले थे. उन का 400 वर्ग गज में बना डा. बी.आर. अंबेडकर जूनियर हाईस्कूल, कौलक्खा, थाना ताजगंज में था. 2 साल पहले यह स्कूल ताजगंज के गांव सेमरी निवासी धीरज जाटव ने 3 हजार रुपए मासिक किराए पर लिया था.

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धीरज को यह स्कूल विजय कुमार झा ने ही सुरेंद्र लवानिया से सिफारिश कर के किराए पर दिलवाया था. धीरज ने 2 साल से स्कूल का किराया नहीं दिया था. सुरेंद्र लवानिया जब भी उस से किराया मांगते तो वह टालमटोल कर देता था. 28 जून, 2019 को धीरज ने लवानिया साहब को फोन कर के किराया ले जाने के लिए बुलाया था.

29 जून, 2019 की सुबह जब शीला ने धीरज को फोन किया तो धीरज ने फोन उठा लिया. विजय के बारे में पूछने पर धीरज ने शीला को बताया कि प्रिंसिपल साहब और  लवानियाजी उस के पास आए ही नहीं थे.

इस के कुछ देर बाद धीरज शीला के घर  पहुंच गया. वहां उस ने चाय भी पी. शीला ने धीरज से कहा, ‘‘बेटा, यदि तुम से कोई गलती हो गई है तो कोई बात नहीं है. हम तुम्हें बचा लेंगे. उन के साथ कुछ करना मत.’’ शीला ने यह बात कहते हुए मन ही मन सोचा था कि यदि धीरज ने किसी वजह से दोनों का अपहरण कर लिया होगा तो वह समझाने पर मान जाएगा.

इस पर धीरज ने कहा, ‘‘आप कैसी बात कर रही हैं? वह मेरे गुरु हैं, मेरे अन्नदाता हैं. मैं कभी उन के साथ गलत नहीं कर सकता.’’

इस बीच धीरज पर शक होने पर शीला ने पुलिस को सूचना दे दी. कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंच गई. शीला के घर से निकलते ही पुलिस ने धीरज को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से सुरेंद्र लवानिया और विजय कुमार के बारे में पूछताछ की गई.

धीरज ने पुलिस से कहा, ‘‘उन दोनों के लापता होने के पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है. हो सकता है कि उन का अपहरण हो गया हो, आप उन के मोबाइल को सर्विलांस पर लगवा दें, शायद उन की लोकेशन का पता चल जाए.’’

उधर पुलिस को दोनों के ही घर वालों ने बताया था कि सुरेंद्र लवानिया धीरज के बुलावे पर ही घर से अपनी वरना कार से धीरज से किराया लेने निकले थे, दूसरी ओर विजय कुमार झा अपनी बाइक से गए थे. दोनों के अपहरण के कयास पर पुलिस दोनों के वाहनों की सरगर्मी से तलाश में जुट गई.

गांव वालों से मिली संदेहास्पद जानकारी

पुलिस अधिकारियों को लग रहा था कि या तो दोनों का अपहरण हुआ है या फिर उन के साथ कोई अनहोनी हो गई है. एसएसपी जोगेंद्र कुमार ने सीओ (सदर) विकास जायसवाल के नेतृत्व में 3 टीमें बनाईं. एक टीम का नेतृत्व इंसपेक्टर (ताजगंज) अनुज कुमार को करना था, दूसरी टीम को इंसपेक्टर (सदर) कमलेश सिंह के साथ करना था, इन के साथ एक टीम क्राइम ब्रांच की भी थी. एसपी (सिटी) प्रशांत वर्मा को तीनों टीमों की मौनिटरिंग करनी थी.

इस बीच पुलिस ने विजय और सुरेंद्र के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था पता चला कि दोनों फोन नंबर घटना वाले दिन दोपहर 2 बजे से बंद हैं. यह बात भी सामने आई कि दोपहर 2 बजे मृतकों व धीरज के मोबाइलों की लोकेशन कौलक्खा स्थित स्कूल में ही थी.

पुलिस ने गांव वालों से पूछताछ की तो कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने सफेद रंग की एक कार स्कूल तक आती देखी थी. पुलिस को यह भी पता चला कि धीरज स्वयं को डा. बी.आर. अंबेडकर जूनियर हाईस्कूल का मालिक बताता था.

इन सब बातों से पुलिस को शक हुआ कि धीरज जरूर ही कुछ छिपा रहा है. पुलिस धीरज से प्यार से पूछताछ कर चुकी थी पर उस ने कुछ नहीं बताया था. लिहाजा उस के साथ सख्ती जरूरी थी. पुलिस की सख्ती के आगे धीरज टूट गया और उस ने सब उगल दिया.

उस ने बताया कि उस ने उन दोनों की गला घोंट कर हत्या करने के बाद उन के शवों को स्कूल परिसर में ही गड्ढा खोद कर दफन कर दिया है.

दोहरे हत्याकांड की बात सुन कर पुलिस अधिकारी सन्न रह गए. पुलिस ने दोनों के घर वालों को केस खुलने की सूचना दे दी. हत्या की जानकारी होते ही दोनों के परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने धीरज के साथ हत्या में शामिल 3 अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया. आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस स्कूल पहुंच गई और रात में ही खुदाई का काम शुरू कर दिया.

खुदाई कर पुलिस ने निकाली लाशें

आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने 3 घंटे की खुदाई के बाद स्कूल के कमरे के बाहर गड्ढे से दोनों शव बरामद कर लिए. मौके की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने सुरेंद्र लवानिया और विजय कुमार के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. एसपी (सिटी) प्रशांत वर्मा ने अभियुक्तों से पूछताछ की तो सुरेंद्र लवानिया और विजय कुमार की हत्या की जो कहानी सामने आई, कुछ इस तरह थी—

करीब 2 साल पहले प्रिंसिपल विजय कुमार झा की सिफारिश पर सुरेंद्र कुमार लवानिया ने 3 हजार रुपए प्रतिमाह किराए पर अपना एक स्कूल धीरज को दे दिया था. धीरज बीएससी करने के बाद बीएड कर रहा था. वह महत्वकांक्षा था. 2 माह पैसा देने के बाद उस ने किराया देना बंद कर दिया था.

किराया मांगने पर वह टालमटोल कर देता था. स्कूल के मालिक सुरेंद्र कुमार लवानिया उस पर किराया देने का दबाव बना रहे थे. उन्होंने कह दिया था कि किराया दो नहीं तो इस साल जुलाई से हम स्कूल वापस ले लेंगे.

लेकिन धीरज की नीयत खराब हो चुकी थी. वह स्कूल को कब्जाने के साथ ही किराया भी नहीं देना चाहता था. इस के लिए उस ने अपने भाइयों संदीप, नीरज और गांव के ही दोस्त विजय के साथ मिल कर एक खतरनाक योजना बना ली थी.

योजना के अनुसार उस ने स्कूल के मालिक लवानिया साहब को फोन पर किराया देने की बात कही. उस ने उन से कहा कि आप अपने साथ प्रिंसिपल विजय को भी ले आए ताकि उन के सामने रुपए दिए जाएंगे तो ठीक रहेगा. इस के साथ ही धीरज अपने भाइयों संदीप, धीरज और नीरज के साथ स्कूल पहुंच गया. पूर्वाह्न 11 बजे से पहले प्रधानाचार्य विजय कुमार झा अपनी बाइक से स्कूल पहुंच गए. उन्होंने स्कूल के औफिस में बैठ कर में धीरज से किराए के रुपए मांगे. इसी बीच धीरज और प्रिंसिपल विजय में कहासुनी हो गई. जिस के चलते दोनों में हाथापाई होने लगी. तभी धीरज ने अपने भाइयों और दोस्त की मदद से विजय को दबोच लिया और गला घोंट कर हत्या कर दी.

कुछ ही देर में स्कूल मालिक सुरेंद्र लवानिया भी धीरज के पास पहुंच गए. तब तक आरोपियों ने विजय की लाश कमरे में ही परदे के पीछे छिपा दी थी.

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सुरेंद्र ने धीरज से पूछा कि विजय कुमार झा अभी नहीं आए. तब धीरज ने मना कर दिया कि अभी नहीं आए. इस बीच हत्यारों ने विजय की बाइक भी छिपा दी थी.

बारीबारी से मार डाला दोनों को

सुरेंद्र लवानिया ने धीरज से किराए के रुपए मांगे तो धीरज फिर टालमटोल करने लगा. इस पर लवानिया भड़क गए. उन्होंने कहा कि तुम ने फोन पर रुपए देने की बात कही थी. यदि तुम रुपए नहीं दोगे तो स्कूल नहीं चला पाओगे. इस पर धीरज उन से भिड़ गया और हाथापाई करने लगा.

सुरेंद्र लवानिया अकेले थे और आरोपी 4 थे. इस बीच सुरेंद्र फर्श पर गिर गए. गिरने के दौरान उन्हें परदे के पीछे छिपी विजय की लाश दिखाई दी तो उन के मुंह से चीख निकल गई.

इस के बाद धीरज और उस के भाइयों के सिर पर खून सवार हो गया. भेद खुलने के डर से उन लोगों ने सुरेंद्र को पकड़ लिया और धीरज ने एक कपड़े से उन का गला घोंट दिया.

घटना के बारे में धीरज के पिता पप्पूराम को जानकारी हुई तो वह भी स्कूल आ गया. सुरेंद्र की कार हुंडई वरना को धीरज और उस का पिता पप्पूराम ले गए. कार को ये लोग सैंया में लादूखेड़ा के पास राजस्थान बार्डर पर खड़ी कर आए.

बाइक को संदीप का दोस्त विजय अपने साथ ले गया. इस के बाद 9 बजे धीरज और उस के भाई फिर स्कूल पहुंचे और 4 फीट लंबा और 4 फीट गहरा गड्ढा खोद कर दोनों शवों को उस में दफन कर दिया.

29 जून की सुबह एक टै्रैक्टर ट्रौली मिट्टी मंगवा कर स्कूल के कमरों के सामने डाल दी. जिस से किसी को शक न हो. मोबाइल, पर्स व अन्य कागजात भी आरोपियों ने जला कर शवों के साथ गडढे में दबा दिए थे. पुलिस ने जले मोबाइल फोन, कार, बाइक, गला घोंटने वाला कपड़ा, फावड़ा आदि भी बरामद कर लिए.

इस दोहरे हत्याकांड का परदाफाश करने वाली टीम में क्राइम ब्रांच प्रभारी अरुण बालियान, एसआई अशोक कुमार, रमित कुमार, प्रदीप कौशिक, अरुण, कांस्टेबल हृदेश, आदेश त्रिपाठी, अजीत, करणवीर, विवेक, प्रशांत कुमार, पंकज, दीपू शामिल थे. गुमशुदगी की रिपोर्ट को हत्या की रिपेर्ट  में तरमीम कर पुलिस ने चारों हत्यारोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.   द्य

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

(कहानी सौजन्य मनोहर कहानी)

फ्रेंडशिप डे: दोस्ती के नाम पर ब्लैकमेलिंग से बचें

वैसा ऐसा करने में कोई बुराई नहीं है पर कुछ मनचले आशिक ऐसे मौके का फायदा उठाते हैं और अपनी गर्लफ्रेंड के जिस्म से खेलने के लिए पहले तो उन्हें किसी तरह मनाते हैं और फिर मतलब निकल जाने के बाद उन्हें ब्लैकमेल करते हैं.

सोशल मीडिया पर तो ऐसे मतलबी दोस्तों की बाढ़ सी आ गई है जो ब्लाइंड डेट के नाम पर अपना उल्लू सीधा करते हैं. दीक्षा के साथ ऐसा ही हुआ था. मनोज ने उसे फ्रेंडशिप डे मनाने के लिए राजी कर लिया और घर वालों से झूठ बोल कर उसे एक रात के लिए दोस्त के खाली फ्लैट पर ले गया. वहां उन दोनों ने जिस्मानी रिश्ता बनाया और शादी करने के सपने देखे.

दीक्षा खुश थी कि मनोज इस रिश्ते को शादी तक ले जाना चाहता है पर उस का ऐसा सोचना गलत था क्योंकि मनोज के तो कुछ और ही इरादे थे. दरअसल, उस ने एक छुपे कैमरे से उन नाजुक पलों का वीडियो बना लिया था जो उन्होंने फ्लैट में बिताए थे.

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कुछ दिनों के बाद मनोज ने अपना असली रंग दिखा दिया और वह उस वीडियो को वायरल करने के धमकी दे कर दीक्षा को ब्लैकमेल करने लगा. पहले तो डरी सहमी दीक्षा ने उसे पैसे दिए पर बाद में समझदारी दिखाते हुए सारी बात अपने घर वालों को बता दी. उन्होंने दीक्षा का पूरा साथ दिया और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने मनोज को धर दबोचा.

पुलिस की पूछताछ में पता चला कि मनोज पहले भी कई लड़कियों को अपने प्रेमजाल में उलझा कर उन से पैसे ऐंठ चुका था.

पर वंदना ऐसी हिम्मत नहीं दिखा पाई थी. राहुल ने उस का जो वीडियो बनाया था वह उस ने अपने दोस्तों में वायरल कर दिया था. वंदना की सहेली रुचिका ने उसे खूब समझाया था कि इतनी जल्दी राहुल पर भरोसा मत कर और उस की जिद पर फ्रेंडशिप डे पर उस के साथ डेट पर मत जा. लेकिन वह नहीं मानी थी. उस डेट पर राहुल ने अपने एक रईस दोस्त के फार्महाऊस पर वंदना के साथ जबरदस्ती की थी. उस जबरदस्ती का वीडियो उस के दोस्तों ने बना लिया था जो पहले से वहीं छुपे बैठे थे. बाद में उन लड़कों ने भी वंदना का शरीर भोगा था.

वीडियो वायरल होने के बाद वंदना इतना ज्यादा डर गई कि उस ने घर पर फांसी लगा कर अपनी जान दे दी.

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आप का भी हाल वंदना जैसा न हो इसलिए सोच समझ कर अपने बॉयफ्रेंड के साथ डेट पर जाएं, नहीं तो फ्रेंडशिप डे आप के लिए डार्क डे बनने में देर नहीं लगाएगा.

खतरों के खिलाड़ी: फैशन में पीछे नहीं ये कंटेस्टेंट

सीजनल रियलिटी शो की बात जब भी तो “खतरों के खिलाड़ी” का नाम जरुर आता हैं. इस बार फिर “खतरों के खिलाड़ी” नए अंदाज में आने को तैयार हैं. जैसे ही इस शो के कंटेस्टेंड के नाम सामने आए सोशल मीडिया में जमकर वायरल होने लगे. इन्हीं में से एक है शिविन नारंग. जिन्होंने अपने एक्टिंग से तो लोगों का दिल जीता ही साथ ही लड़कियों के दिल पर राज करने लगें. “सुवरीन गुग्गल टौपर औफ द ईयर” से शुरुआत करने वाले शिविन ने काफी रोमांटिक स्टाइल से करोड़ो लड़कियों पहली पसंद बन गए. इसके बाद “वीर की अरदास वीर” अलग अंदाज में एक्टिंग करके उन्होंने सित कर दिया की वो किसी भी रोल को निभा सकते हैं. बात अगर उनकी फैशन स्टाइल की करें तो वो भी काफी पौपुलर है इसलिए आज हम उनके कुछ फैशन स्टाइल आपके लिए लेकर आए है जिसे आप किसी भी औकेजन में ट्राय कर सकते हैं.

ब्लू ब्लेजर लुक

शिविन के ये लुक को देखे तो आपको पता चलेगा की इस को कोम्प्लिमेंट उनका ये क्रोस पेंडेंट दे रहा है. ब्लू और वाइट के इस कौम्बिनेशन वाले इस सूट में वो काफी अच्छे लग रहे हैं. इस लुक को आप किसी भी आउटडोर पार्टी में ट3य कर सकते हैं.

 

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💙 . . Pic: @sachin113photographer

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डेनिम औपन शर्ट लुक

डेनिम का फैशन शायद ही कभी जाएंगा. ये किसी भी इवेंट और औकेजन के लिए परफेक्ट साबित होती हैं. स्टार्स से लेकर आम लोग सभी डेनिम को ट्राट करते हैं. शिविन के इस लुक में खास बात ये है की इस लुक मों उन्होंने इसे टी-शर्ट के साथ ट्राय किया है और डेनिम शर्ट को औपन कर रखा हैं. इस लुक में बेस्ट पार्ट है कसर कौम्बनेशन का. ग्रे टी- शर्ट के साथ ब्लू डेनिम शर्ट काफी अच्छी लग रही हैं.

ट्राय करें फंकी जैकेट

अगर आप कुछ क्रेजी ट्राय करना चाहते है तो ये औरेंज जैकेट अच्छा औप्शन है. इस लुक को आप किसी भी पब पार्टी में ट्राय कर सकते हैं.


ट्रेडिशनल कोटी

अगर आप इंडियन लुक में कुछ एक्सपेरिमेंट करना चाहते है तो इस कोटी के न्यू स्टाइल को जरुर ट्राय करें जो आपके इंडियन लुक और भी कोम्प्लिमेंट देगा. इस लुक को आप किसी भी शादी के फंक्शन पर ट्राय कर सकते हैं.

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कटरीना ने शेयर की बिकिनी फोटोज तो अर्जुन ने ऐसे उड़ाया मजाक

बौलीवुड स्टार कटरीना कैफ हाल ही में मेक्सिको से इंडिया लौटी हैं. वहां वो अपना बर्थडे बनाने पहुंची थी. जैसे ही वो इंडिया लौटी उन्होंने अपनी वेकेशन की इस फोटोज को जैसे ही शेयर की इनकी फोटोज वायरल होना शुरु हो गई. कटरीना की लेटेस्ट फोटोज में वह नीले समुंदर के बीचों-बीच खेलती हुई नजर आ रही है. इस फोटो में वो काफी हौट नजर आ रही हैं. फैंस उनकी इन फोटोज को काफी पसंद कर रहे हैं. कटरीना ने दो फोटोज शेयर की है जिसमें उनकी स्माइल काफी पसंद की जा रही हैं.

कटरीना ब्लू बिकिनी में आईं नजर

अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस वेकेशन की तस्वीरों में नीला रंग कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है। इन रंगों के आसपास कटरीना की खुशी भी देखते भी बन रही है.कटरीना ने इस वेकेशन को जमकर इन्जौय किया है. समुंदर हो…कैफे हो.होटल का रुम हो या फिर मेक्सिको की सड़क हो.हर जगह कटरीना ने जमकर पोज दिए है.कटरीना ने इस वेकेशन में ली गई इस तस्वीर को जब इंस्टाग्राम पर शेयर किया था, तो फैंस और कई सेलेब्स के बीच खलबली सी मच गई थी.

 

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यहां तक कि अर्जुन कपूर ने ये तक कह दिया था कि “कटरीना जन्मदिन मनाने नहीं बल्कि फोटोशूट करवाने गई है”.

मोनोकिनी में भी दिखी कमाल

कटरीना को समुंदर के आसपास रहना काफी पसंद है और यही वजह है कि उन्होंने इस वेकेशन को यूं ही जाया नहीं होने दिया.

अब नजर आएंगी खिलाड़ी कुमार के साथ

हाल ही में कटरीना कैफ और सलमान खान की फिल्म ‘भारत (Bharat)’ रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर काफी धमाल मचाया था. ये फिल्म सलमान खान के कैरियर की सबसे सफल फिल्मों में से एक बन गई. अब जल्द ही एक्ट्रेस कैटरीना कैफ फिल्म इंडस्ट्री के खिलाड़ी अक्षय कुमार  के साथ फिल्म ‘सूर्यवंशी’ में नजर आने वाली हैं. रोहित शेट्टी के निर्देशन में बन रही ये फिल्म 2020 में रिलीज होगी.

‘नागिन’ फेम आशका गोराडिया की बिकिनी फोटोज Viral

टीवी की “नागिन”  और “बाल वीर” में महाविनाशनी परी के नाम से जाने जाने वाली आशका गोराडिया अपनी एक्टिंग के कारण सभी की फेवरेट है. आशका के एक्टिंग के साथ साथ लोग उनके लुक्स के भी कायल है. आशका हेल्थ का पूरा ध्यान रखती है इसका पता चलता है उनकी हालिया फोटोज से. आशका ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पर कुछ बिकिनी फोटोज शेयर की है जिसमें वो बीच के  किनारे योगा करती नजर आ रही हैं. इन फोटोज में आशका काफी हौट लग रही हैं. आशका की ये फोटोज सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. तो चलिए नजर डालते है उनकी इन फोटोज पर..

आशका ने किया हेडस्टैंड

आशका गोराडिया ने हेडस्टैंड करते हुए हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. इसकी एकमात्र वजह यह है कि इस योगा पोजिशन को करते हुए आशका टौपलेस हो गई है. कुछ फोटोज में आशका तीतीभासना करती हुई नजर आ रही है. आशका खुद को योगा के जरिए फिट रखती है और अक्सर वह सोशल मीडिया पर योगा आसन करते हुए अपनी फोटोज को सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती है. आशका की खूबसूरती और फिटनेस कारण है योगा और प्रोपर डाइट. वो अपनी हेल्थ को लेकर हमेशा सचेत रहती हैं.

 

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Next to the blue waters, make me fly again. @ibrentgoble Can’t wait! Countdown begins ❤️ . . . #yogaforlife

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“नागिन” शो आई नजर

वैसे तो आशका ने अपने एक्टिंग कैरियर की शुरुआत साल 2002 में शो “अचानक 2 साल बाद” से की पर साल 2003 में आए शो कुसुम से उनकी पहचान हर घर पर हो गई. इस शो  में उन्होंने “कुमुद” का रोल किया जो उनकी लाइफ का टर्निंग पोइट साबित हुआ और साल 2004 में आए लेजेन्ड्री शो “क्यों की सास भी कभी बहू थी” में उनके काम मिली. कई सारे शोज और रियलटी शो आशका कर चुकि है. अभी वो “एंड टीवी” के शो “डायन” में नजर आ रही हैं.

पति के साथ भी करती है योगा

आशका अपने पति के साथ भी खूब योगा करती है. आशका का योगा कपल एक्टर्स और फैंस के बीच काफी मशहूर है. आशका को समुंदर का किनारा खूब पसंद आता है. समुंदर किनारे जाकर आशका काफी फ्रेश फील करती है.

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