फिल्म रिव्यू-‘‘चेजः नो मर्सी टू क्राइम” क्यों है खास

फिल्म समीक्षाः

रेटिंगः तीन स्टार

निर्माताःमीना सेठी मंडोल

निर्देशकः सुवेंदु राज

संगीतकारः पिनाकी बोस,रोहन डी पाठक व बाॅब एस एन

कलाकारःअमित सेठी,दिपांजन बसाक, मुश्ताक खान, समीक्षा गौड़, सुदीप मुखर्जी,गुलषन पाडे व अन्य.

अवधिःएक घंटा 51 मिनट

कहानीः

फिल्म की कहानी शुरू होती है कलकोता से दिल्ली जा रही ट्रेन में एक बैंक के नब्बे करोड़ रूपए की डकैती से. इस डकैती से पूरे बंगाल राज्य में हड़कंप मंच जाता है. तुरंत बंगाल के मंत्री (मुश्ताक खान) पुलिस विभाग में सर्वोच्च पद पर आसीन अविनाश चक्रवर्ती (सुदीप मुखर्जी) को बुलाते हैं तथा उन्हे अपने तरीके काम करते हुए अपराधियों को सजा देने के साथ ही बैंक को उसके नब्बे करोड़ रूपए वापस दिलाने के लिए कहते हैं. अविनाश पुलिस विभाग के बेहतरीन इंस्पेक्टर इमरान (दिपांजन बसाक) को यह केस सौपते हैं. इमरान जांच करते करते पता लगा लेता है कि – झारखंड में बप्पा नाम से मशहूर शैलेंद्र व उनके बेटे सत्येंद्र उर्फ सत्तू (अमित सेठी) ने मिलकर यह बैंक डकैती करवायी है. वास्तव में सत्तू को इस बार चुनाव लड़ना है. पार्टी हाईकमान ने चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट देने के लिए सौ करोड़ रूपए मांगे हैं. इसीलिए ट्रेन डकैती की गयी, जिसमें से अस्सी करोड़ रूपए तो पार्टी हाईकमान को भेज दिए जाते हैं. अब बीस करोड़ रूपए इकट्ठे करने के लिए शैलेंद्र व उनके बेटे सत्तू जुगाड़ में लगे हुए हैं. उधर अविनाश के इशारे पर पुलिस इंस्पेक्टर इमरान अपने एक साथी के साथ -झारखंड पहुंचकर शैलेंद्र व उनके बेटे सत्तू के खिलाफ सबूत व जानकारियां इकट्ठे करने लगता है. उधर पैसे का जुगाड़ करते हुए बप्पा एक सुनार को बीस करोड़ रूपए देने के लिए धमकाते हैं.

सत्तू का दाहिना हाथ लल्लन उसी शहर के शास्त्री की बेटी गुड्डी(समीक्षा गौड़) से शादी करना चाहता है पर गुड्डी को उससे नफरत है. क्योंकि उसे पता है कि उसके पिता ने जब अपनी जमीन सत्तू के पिता के नाम पर लिखने से मना किया, तो किस तरह सत्तू के पिता ने उसके भाई को मरवा दिया था. अब सुनार, शैलेंद्र उर्फ बप्पा को सलाह देता है कि यदि वह मोबाइल टावर लगाने वाली कंपनी को शास्त्री की जमीन दिला दें, तो उन्हे उस कंपनी से दस करोड़ रूपए मिल जाएंगे,पर सत्तू कंपनी की प्रतिनिधि दीप्ति से मिलकर पंद्रह करोड़ में बात तय करता है. पता चलता है कि यह योजना इमरान ही अविनाश से सलाह लेकर बना रहा है. दीप्ति भी कलकत्ता पुलिस से ही जुड़ी हुई है. दीप्ति कह देती है कि शैलेंद्र व सत्तू नेपाल पहुंचे, वहीं कंपनी के आफिस में कागजात पर हस्ताक्षर होने के बाद पंद्रह करोड़ रूपए मिल जाएंगे. इमरान, दीप्ति और अविनाश भी नेपाल पहुंचते हैं. वहां उनकी मदद पवन पांडे (गुलशन पांडे) करता है. शैलेंद्र की गिरफ्तारी हो जाती है, पर सत्तू भागकर अपने चाचा (रमेश ) के पास बैंकाक पहुंच जाता है. फिर अविनाश, इमरान,पवन पांडे और दीप्ति साथ बैंकाक पहुंचते हैं, जहां शैलेंद्र के साथ उसके चाचा धर्मेंद्र की भी गिरफ्तारी हो जाती है.

निर्देशनः

‘‘भोय’’,‘‘चेतना’’,शून्यता’’जैसी सफल और पुरस्कृत बंगला फिल्मों के  निर्देशक सुवेंदु निर्देशित ‘‘चेजःनो मर्सी नो क्राइम’’ पहली हिंदी यानी कि बौलीवुड फिल्म है पर पूरी फिल्म देखकर वह मंजे हुए निर्देशक के तौर पर अपनी छाप छोड़ते हैं. फिल्मकार ने फिल्म के लिए लोकेशन भी बहुत बेहतरीन चुनी है, फिर चाहे वह कोलकता हो या झारखंड या नेपाल या बैंकाक. दृश्यों का संयोजन भी काबिले तारीफ है.

फिल्म की शुरूआत बहुत बेहतरीन होती है और लगता है कि यह किसी अति अनुभवी निर्देशक की फिल्म है. फिल्म में घट रहे घटनाक्रमों को दर्शक टकटकी लगाए देखता रहता है, मगर अचानक आइटम सांग के आ जाने से दर्शक दिग्भ्रमित हो जाता है.जी हां! इंटरवल से कुछ समय पहले फिल्म उस वक्त धीली पड़ जाती है, जब अचानक एक आइटम सौंग आ जाता है. शायद बौलीवुड फिल्म के रूप में अपनी फिल्म को पेश करने के मोह के चलते निर्देशक सुवेंदु ने इसमें बेवजह एक आइटम नंबर और इमरान के परिवार (इमरान की पत्नी व बेटा) को जोड़ा है, जो कि सहजता के साथ आगे ब-सजय़ रही कहानी की रोचकता पर विराम लगाते हैं. फिल्म का गाना तो फिल्म को नुकसान पहुंचाता है. जबकि इमरान व उसकी पत्नी से जुड़े दृष्य मखमल में तात का पैबंद लगता है.गाने और इमरान के पारिवारिक दृश्यों के चलते फिल्म की लंबाई ब-सजय़ी है. अगर यह आइटम नंबर/गाना और इमरान के पारिवारिक दृश्य हटा दिए जाते,तो यह फिल्म एक क्लासिक कृति बन सकती थी. फिल्म के कैमरामैन भी बधाई के पात्र हैं.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो क्राइम ब्रांच पुलिस इंस्पेक्टर इमरान के किरदार में दीपांजन बसक ने बहुत ही सजीव अभिनय किया है.सत्येंद्र उर्फ सत्तू के किरदार में अमित सेठी ने ठीकठाक अभिनय किया है. अभी उन्हे अपने अभिनय को निखारने के लिए मेहनत करने की जरुरत है.अन्य कलाकार अपनी अपनी जगह ठीक हैं.

असंभव के पार झाकने की भूल

लेखक- शैलेंद्र सिंह

निस्संदेह ऐसे प्यार का अंजाम ठीक नहीं होता. यतीश और नेहा के साथ भी…24जून, 2019 की बात है. लखनऊ के शेरपुर लवल गांव में सुबह 6 बजे रोज की तरह प्रभातफेरी निकल रही थी. प्रभातफेरी जब गांव में ही रहने वाले शिवप्रसाद के घर से 100 मीटर दूर पहुंची तो सड़क किनारे पीपल के पेड़ के नीचे एक लड़के का नंगा शव पड़ा दिखाई दिया. शव को देखने से लग रहा था कि किसी ने धारदार हथियार से उस की हत्या की है. प्रभातफेरी में जगदीश भी शामिल था. जगदीश जैसे ही लाश के पास गया, तो चिल्लाने लगा कि यह तो मेरा भतीजा यतीश है. इस का यह हाल किस ने कर दिया. लाश की शिनाख्त जगदीश ने अपने भतीजे यतीश के रूप में की.

उस ने इस बात की सूचना अपने भाई शिवप्रसाद और परिवार के अन्य लोगों को दे दी. घटना का पता चलते ही पूरे गांव में कोहराम मच गया. गांव के लोग घटनास्थल की तरफ भागे. यतीश का शव देख कर सभी लोग सन्न रह गए. 24 वर्षीय यतीश की मां सरला उस के शव से लिपट कर रोने लगी. गांव की महिलाएं और दूसरे लोग उसे ढांढस बंधा रहे थे. वह बारबार दहाड़ें मार कर रोतेरोते बेहोश हो रही थी. घटना की जानकारी लखनऊ जनपद के निगोहा थाने को दी गई. शेरपुर लवल गांव इसी थाने के तहत आता था. निगोहा लखनऊ जिले का अंतिम थाना है. इस के बाद रायबरेली जिला शुरू हो जाता है. पुलिस ने यतीश की नंगी लाश देखने और गांव वालों से बात करने के बाद अनुमान लगाया कि उस की हत्या की वजह अवैध संबंध हो सकते हैं

इंसपेक्टर निगोहां जगदीश पांडेय ने लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी को घटना के बारे में बताया. एसएसपी कलानिधि नैथानी ने एसपी (क्राइम) सर्वेश कुमार मिश्रा और सीओ (मोहनलालगंज) राजकुमार शुक्ला को मौके पर जा कर घटना की तहकीकात और खुलासा करने को कहा.पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, तो पता चला कि मृतक यतीश पर किसी धारदार हथियार से वार किए गए थे. मौके पर काफी मात्रा में खून फैला हुआ था. लाश के मुआयने में लगा कि हत्यारे एक से अधिक रहे होंगे.

वहां मौजूद मृतक की मां सरला ने पुलिस को बताया कि यतीश कल रात अपने दोस्तों के साथ गांव के बाहर मोबाइल फोन पर गेम खेलने की बात कह कर आया था. मैं ने इसे मना भी किया पर यह नहीं माना. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को यह पता लगाना था कि यतीश किन दोस्तों के साथ आया था. पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

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जांच में सामने आया नेहा का नाम

एसएसपी ने इस केस को सुलझाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई.  इसी दौरान पुलिस टीम को मुखबिर से पता चला कि मृतक के गांव की ही नेहा से प्रेम संबंध थे. इस सूचना में पुलिस को दम नजर आया, क्योंकि जिस तरह से यतीश की नंगी लाश मिली थी, उस से हत्या की यही वजह नजर आ रही थी.

टीम ने यतीश के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में एक नंबर ऐसा मिल गया, जिस पर यतीश काफी देर तक बातें करता था. वह फोन नंबर नेहा का ही निकला. इस के बाद पुलिस को यकीन हो गया कि यतीश की हत्या के तार जरूर नेहा से जुड़े हैं. इसलिए पुलिस टीम नेहा के घर पहुंच गई. पुलिस नेहा और उस के भाई को पूछताछ के लिए थाने ले आई. पूछताछ करने पर नेहा ने यह तो कबूल कर लिया कि यतीश के साथ उस के प्रेम संबंध थे लेकिन उस के अनुसार, हत्या के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी. सख्ती से पूछताछ करने पर नेहा के भाई शिवशंकर ने स्वीकार कर लिया कि यतीश ने उस के घर वालों का जीना हराम कर दिया था. इसीलिए उसे ठिकाने लगाने के पर मजबूर होना पड़ा. शिवशंकर ने यतीश की हत्या की जो कहानी बताई वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर एक गांव है शेरपुर लवल. यहां की आबादी मिलीजुली है. ज्यादातर परिवार खेतीकिसानी पर निर्भर हैं. इन्हीं लोगों में शिवप्रसाद तिवारी का भी परिवार था.

यतीश तिवारी शिवप्रसाद का ही बेटा था. यतीश 2 भाई थे. मनीष बड़ा था और यतीश छोटा. मनीष होमगार्ड की नौकरी करता है. उस की ड्यूटी लखनऊ सचिवालय में लगी थी. मनीष अपने परिवार के साथ लखनऊ के पास ही तेलीबाग में रहता था. यतीश की एक बहन है प्रीति, जिस की शादी हो चुकी है. यतीश अकेला अपने मातापिता के साथ रहता था. मां सरला देवी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है.

यतीश भारतीय सेना में शामिल हो कर देश की सेवा करना चाहता था. इस के लिए वह अपनी तैयारी भी कर रहा था. वह रोजाना गांव के बाहर दौड़ लगाता था और एक्सरसाइज भी करता था. शारीरिक रूप से फिट 24 साल के यतीश ने कई प्रतियोगी परीक्षाएं पास की थीं. लेकिन फिजिकल टेस्ट में वह रह जाता था.

यतीश अपनी मां से कहता था कि अगर मैं आर्मी में नहीं जा पाया तो दूसरी फोर्स या पुलिस में तो मेरा चयन हो ही जाएगा. मां को भी बेटे की बात पर यकीन था. मां ही नहीं गांव और घर के दूसरे लोग भी यही मान रहे थे. यही वजह थी कि बिना नौकरी किए भी यतीश के रिश्ते आने लगे थे.

लेकिन यतीश अभी शादी नहीं करना चाहता था. उस ने मां से कहा, ‘‘मां शादी की अभी क्या जल्दी है, नौकरी लगने दो फिर शादी कर लूंगा.’’

‘‘शादी के लायक उम्र हो गई है. तू ही बता, अभी नहीं तो कब होगी तेरी शादी? तुझे पता नहीं है गांव के लोग तमाम तरह की बातें करते हैं. ऐसे में उन को भी कहने का मौका नहीं मिलेगा.

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‘‘जिस जगह से रिश्ता आया है वहां लड़की और घरपरिवार सभी अच्छा है. कई बार लड़की की किस्मत अच्छी होती है तो पति की नौकरी जल्दी लग जाती है.’’ मां ने यतीश को समझाया तो वह भी मां की बात टाल नहीं सका. इस के बाद मांबाप ने यतीश की शादी तय कर दी.

उस की शादी हैदरगढ़ के रहने वाले एक परिवार में तय हो गई. शादी और तिलक की तारीख भी तय हो गई थीं. इसी साल यानी 2019 में ही 22 नवंबर को तिलक और 28 नवंबर को उस की बारात जानी थी.

दूसरी ओर यतीश का चक्कर गांव की ही नेहा से चल रहा था. वह नेहा के साथ शादी करना चाहता था. नेहा के पिता मिस्त्री का काम करते थे. नेहा और यतीश अलगअलग बिरादरी के थे. इसलिए दोनों परिवारों के बीच शादी विवाह की बात किसी भी हालत में संभव नहीं था. यतीश और नेहा के बीच लंबे समय से संबंध थे. यह बात नेहा के घर वालों को भी पता चल गई थी.

उन्होंने नेहा को समझाया लेकिन वह प्रेमी को किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहती थी. नेहा के मातापिता और परिवार के लोग इस बात का विरोध कर रहे थे. इस के बाद भी यतीश और नेहा मानने को तैयार नहीं थे.

जब नेहा और यतीश का मिलनाजुलना बंद नहीं हुआ तो नेहा के पिता शिवप्रसाद ने अपने परिवार को गांव से दूर पीजीआई अस्पताल के पास वेदावन कालोनी में किराए का घर ले कर दे दिया. पूरा परिवार किराए के उसी मकान में रहने लगा. लेकिन वहां जाने के बाद भी यतीश ने नेहा से मिलना नहीं छोड़ा.

शिवप्रसाद को यह बात पता चल गई थी कि नेहा और यतीश अब भी छिपछिप कर मिलते हैं. लिहाजा उस ने अपने बेटे शिवशंकर से कहा कि यतीश की हरकतें बढ़ती जा रही हैं. गांव छोड़ने के बाद भी वह नेहा का पीछा नहीं छोड़ रहा है. अब उसे सबक सिखाना ही पड़ेगा.

‘‘हम तो पहले ही कह रहे थे कि गांव छोड़ने से कुछ नहीं होगा. लेकिन आप ही नहीं माने. अब जो भी करना है, जल्दी करो. कहीं ऐसा न हो कि वह कोई दूसरा कदम उठा ले.’’ बेटे शिवशंकर ने कहा.

इस के बाद दोनों ने तय कर लिया कि यतीश को रास्ते से हटाना है. शिवप्रसाद और उस के बेटे शिवशंकर ने मिल कर यतीश की हत्या की योजना बना ली. शिवशंकर ने इस के लिए गांव में रहने वाले अपने दोस्त हनुमान को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया.

हनुमान ने सतीश पर नजर रखनी शुरू कर दी  ताकि काम आसानी से हो सके. यतीश की दिनचर्या से पता चला कि रात को वह गांव के बाहर पीपल के पेड़ के पास चबूतरे पर बैठ कर मोबाइल फोन पर पबजी गेम खेलता है. यह पूरी जानकारी हनुमान ने शिवशंकर को दे दी. इस के बाद शिवशंकर, शिवप्रसाद और नुमान ने अपनी योजना को अंजाम देने की तैयारी कर ली.

23 जून को गांव में किसी की तेरहवीं का भोज था. शिवप्रसाद और शिवशंकर भोज में शामिल होने के लिए घर से निकले. वहां जाने से पहले दोनों ने हनुमान के साथ शराब पी, फिर खाना खाया. रात करीब एक बजे तीनों गांव के बाहर उस चबूतरे के पास पहुंच गए जहां पर यतीश मोबाइल के स्क्रीन पर नजरें जमाए बड़े ध्यान से गेम खेल रहा था.

शिवप्रसाद और हनुमान ने यतीश को पीछे से दबोच लिया. उस का मुंह दबा कर वे लोग उसे वहीं स्थित पुलिया के नीचे ले गए. इस के बाद शिवशंकर ने साथ लाए चापड़ से उस के गले और सिर पर कई वार किए. कुछ ही देर में वह मर गया. उस की हत्या करने के बाद इन लोगों ने उस के कपड़े उतार कर सड़क के किनारे फेंक दिया. यतीश के कपड़ों में तो खून लगा ही था. पुलिया के दोनों किनारों पर भी खून के छींटे गिर गए थे. शिवशंकर से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के दोस्त हनुमान को भी गिरफ्तार कर लिया, जबकि नेहा को छोड़ दिया गया.

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शिवशंकर की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से हत्या में प्रयुक्त चापड़ और यतीश के खून सने कपड़े बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों आरोपियों शिवशंकर और हनुमान को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. कहानी लिखे जाने तक शिवप्रसाद की तलाश जारी थी. साफ जाहिर है कि अपराध छिपाने की कितनी भी कोशिश की जाए, अपराध छिपता नहीं है.      द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में नेहा परिवर्तित नाम है.

हकीकत: सरकारी नौकरी में मोटी कमाई

लेखक-शशि पुरवार

एक समय था जब लोगों का मोटी तनख्वाह के चलते प्राइवेट कंपनियों की तरफ रुझान था, पर आज पैंशन व सरकारी सुविधा के चलते सरकारी नौकरी सब से बड़ी जरूरत बन गई है. लेकिन सरकारी नौकरी में सीमित कमाई के चलते कुछ लोगों ने घूसखोरी को अपनी जिंदगी का अंग बना लिया है या यह कहें कि लालच के दानव ने अपना विकराल रूप धर लिया है.

इस से देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया है. बिना कुछ लिएदिए कोई काम नहीं होता है. हर छोटाबड़ा मुलाजिम मुंह खोल कर पैसे मांगने लगा है.

कमोबेश हर सरकारी दफ्तर का यही हाल है. सरकारी नौकरी में हर कोई मोटा कमा सकता है. सरकारी कामों में कानूनी दांवपेंच, धीमी रफ्तार व कानूनी पेचीदगी के चलते घूसखोरी बढ़ी है. कामों के पूरा होने की जल्दबाजी में भ्रष्टाचार का दानव हमें जबरन पालना पड़ता है.

हमारे एक जानकार लोक निर्माण विभाग में अफसर हैं. उन के पास सरकारी आवासों, दफ्तरों के निर्माण कार्य के लिए ठेकेदारों की लाइन लगी रहती है. वे जनाब 2 फीसदी घूस खा कर ही ठेका दिलाते हैं, फिर निर्माण कार्य में लगने वाला सामान हलका हुआ तो उसे भी पास करा देते हैं.

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हाल ही में सरकारी दफ्तरों व आवासों में मरम्मत का कार्य शुरू हुआ. 3 साल से खस्ताहाल रंगरोगन व दरवाजे की दुरुस्ती का काम अटका हुआ था. वे जनाब हर बार कहते कि टैंडर पास नहीं हुआ है, फिर भी उन के आवास में नियमित काम होते रहते हैं. वह सरकारी आवास कम निजी बंगला ज्यादा नजर आता है. उन की पत्नी कहती हैं कि जब तक नौकरी में हैं तब तक ऐश कर लें.

कोई भी सरकारी विभाग हो, वहां काम टैंडर द्वारा ही पास किए जाते हैं. लेकिन जहां कांट्रैक्टर किसी का सगासंबंधी हुआ या कमीशन बंधा हो तो झट से टैंडर पास हो जाते हैं.

हाल ही में सरकारी आवासों का जायजा लिया गया. छत टपक रही थी. थोड़ी मरम्मत की जरूरत थी. छोटी सी छत में 4 किलो सीमेंट व चूना लगवाने में सरकारी बिल की रकम थी 2-3 लाख रुपए. इस पर भी 2-3 लाख की रकम में दूसरे काम शुरू होने के इंतजार में टैंडर ही खत्म हो गया.

लंबे समय बाद फिर टैंडर पास हुआ. मरम्मत के लिए आया हुआ सामान हलकी लागत का था. दीवारों के रंग सूखने से पहले ही पपड़ाने लगे. आवास का टूटा हुआ दरवाजा हलके फाइबर के दरवाजे से बदला गया, जिसे कोई धीरे से भी धक्का मार दे तो वह टूट जाए. ऐसे में यह चोरों के लिए खुला न्योता था और आवासों में रहने वालों के लिए सिक्योरिटी का सवाल अलग.

इस बात की शिकायत दर्ज की गई, तो जवाब मिला कि लकड़ी का दरवाजा पानी से खराब हो जाता है इसीलिए फाइबर का दरवाजा लगाया जो सड़ेगा भी नहीं. आजकल बड़ेबड़े बंगलों में भी यही दरवाजे लगते हैं.

अफसर की पत्नी ने कहा कि सामान की क्वालिटी घटिया है. इस ने स्टैंडर्ड खराब कर दिया है. यह ए क्लास अफसर का आवास है, तो टैंडर पास करने वाले ने जवाब दिया, ‘‘अच्छी क्वालिटी का काम कराना है तो आप खुद पैसे दे कर काम करा लें.’’

जब ज्यादा जोर दिया गया तो जवाब मिला, ‘‘आप को 2-3 साल ही रहना है. आप क्यों नाराज हो रहे हैं? आप अपने घर में जैसा चाहे काम करवाना.’’

ठेकेदार से जब बात हुई तो वह बोला कि पैसा ही नहीं देते हैं. एक साल से उस का पैसा अटका पड़ा है. खराब काम करेंगे तभी अगला टैंडर जल्दी मिलेगा. मसलन, काम किया भी और नहीं भी किया. चोरचोर मौसेरे भाई ही होते हैं.

बात की ज्यादा कब्र खोदने पर पता चला कि जो लोग ज्यादा शोर मचा रहे थे उन का थोड़ा अच्छा काम करा दिया, बाकी लोगों को हमेशा की तरह लाल झंडी दिखा दी. ऐसे लोग 3 साल कैसे भी काट कर चले जाते हैं. सरकारी भ्रष्टतंत्र का शिकार खुद सरकारी मुलाजिम भी होते हैं.

एक बार दफ्तरों के लिए लैपटौप और प्रिंटर खरीदने का टैंडर पास हुआ. लाखों का होने वाला खर्च है, तो जायज है कि अच्छा सामान ही और्डर करना चाहिए. लेकिन आज की टैक्नोलौजी को छोड़ कर, नाम के लिए पुरानी बेकार होती टैक्नोलौजी को ही पास करा दिया गया. पास करने वाले लोग टैक्नोलौजी से अनजान थे, तो जायज है कि अच्छा काम कैसे होगा. अलगअलग टेबल पर ऐसे भी लोग थे जिन्होंने कह दिया कि हमें तो कभी इतनी सुविधा नहीं दी गई है. आजकल के बच्चों को हर सुविधा दे रहे हैं. जलेभुने मन से रिटायरमैंट पर बैठे अफसर बेमन से काम को धक्का लगा रहे थे.

2,000 पीस के और्डर दिए गए और कंपनी से मोलभाव कर के ऐसा सामान तय हुआ कि उस की ज्यादा से ज्यादा 5 साल तक ही लाइफ हो, फिर अगर सरकार बदलेगी तो माल भी बदलेगा यानी पैसे की खुलेआम बरबादी. ज्यादा कहो तो जवाब मिलेगा कि सरकारी माल है. बेचने वाले भी जानते हैं कि सरकारी टैंडर बड़े होते हैं, टिकाऊ सामान दिया तो जेब गरम नहीं होगी. सरकारी दफ्तर है तो क्या फिक्र है.

एक के बाद एक टेबल से गुजरते हुए फाइल अपनी मंजिल तक पहुंची. साथ ही उन लोगों की जेबें भी गरम होती चली गईं जो सीधे जनता से डीलिंग कर रहे थे.

ऐसे में उस अफसर की सोच पर गुस्सा आ रहा था जिस ने लमसम अमाउंट का बिल पास किया. ज्यादा जांच न हो ऐसा आदेश कमेटी को दिया गया. ऊपर की कुरसी पर बैठने वाले साहब कड़क थे. जब सभी बातों के प्रूफ मांगे गए तो झट से फाइल का तबादला करा दिया कि साहब तकलीफ दे रहे हैं.

उन्हें कुछ न बता कर डीलिंग करने वाले मातहत ने अपना कमीशन तय किया और सस्ता माल ले कर तगड़ा बिल पास करा लिया और उस की पांचों उंगलियां घी में थीं.

बारिश का मौसम आते ही हर शहर की सड़कों की खस्ताहाली से सब परिचित हैं. गड्डे एक तरफ जहां लोगों की नाक में दम करते हैं वहीं दूसरी तरफ हादसों की वजह बनते हैं.

कई सड़कें हर साल बरसात में अपनी बदहाली की दास्तान बयां करती हैं. पर आखिर ऐसा काम क्यों नहीं होता जो टिकाऊ हो? ऐसे काम कुछ दिनों में ही अपना बदरंग चेहरा दिखा देते हैं.

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कोर्ट में काम करने वाले वकील, चपरासी, बाबू का सीधा संबंध लोगों से होता है. कहीं कोई फाइल आगे बढ़ानी है या किसी को दबाना है, किस तरह पैसे खाने हैं, ये लोग शिकायत करने वाले से सांठगांठ कर लेते हैं.

एक केस आंखों देखा है. वकील ने एक आरोपी से कहा, ‘‘काम हो जाएगा, लेकिन पैसे लगेंगे.’’

पैसे ले कर वकील अंदर चला गया. आरोपी खुश था कि काम हो जाएगा, पर जज साहब इस बात से अनजान थे, लिहाजा आरोपी को सजा हुई और बाद में वकील मुकर गया.

अगर सरकार में कोई ईमानदार है तो उसे इस का खमियाजा भी भुगतना पड़ता है. एक दिन एक ईमानदार साहब ने अपने चपरासी को सर्दियों में बाहर हाथ सेंकते देख लिया. खूब डांट लगाई

तो स्टाफ का रंग ही बदल गया. बिना

स्टाफ के कोई भी अफसर काम नहीं कर सकता है. ऊपर बैठे आमखास को काम चाहिए, पर नीचे बैठा तबका उन के हाथ भी काटता है.

ईमानदार अफसर चतुर्थ श्रेणी के लोगों की पैतरेबाजी का शिकार हो कर मानसिक पीड़ा भोगते हैं. चतुर्थ श्रेणी व निचला तबका जानता है कि उसे अपने हकों का कैसे इस्तेमाल कैसे करना?है.

एक अफसर ने कड़क रुख अपनाया तो सभी अपनी यूनियन के साथ धरने पर बैठ गए. किसी ने उन का काम नहीं किया. गुंडाराज खुलेआम कायम है.

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आज के समय में इस सब के सही आकलन की जरूरत है. नियमों और योजनाओं का निजी फायदा उठाने वालों के प्रति कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए. इस में बेचारा ईमानदार इनसान मारा जाता है. क्या ऐसे लोगों की तरफ सरकार का या मीडिया का ध्यान जाएगा?

कपल्स के लिए परफेक्ट है करन कुन्द्रा और अनुषा दांडेकर के ये लुक्स

मानसून का सीजन आते ही प्यार के पंछियों को रोमांस जाग ही जाता हैं. पार्टी, लौंग ड्राइव, कैंडल लाइट डिनर या फिर कोई वेकेशन इस मौसम में सभी खुशनुमा पल को एंजौय करना चाहते हैं. इन सब में सबसे ज्यादा जरुरू है की आप कैसे अपने पार्टनर के साथ ड्रेसअप हो. इस लिए आज हम लेकर आए है करन कुंद्रा और अनुषा दांडेकर के कुछ खास कपल्स लुक जिसे ट्राय कर आप और अपके पार्टनर एक दूसरें को कोम्पलिमेंट दे सकें. आपको बता दे करन और अनुषा काफी समय से एक दूसरें को डेट कर रहें हैं. इन दोनों की कैमिस्ट्री को देख कर आप भी दंग रह जाएंगे. अगर आप भी अपने पार्टनर के साथ कुछ अच्छा ट्राय करेंगे तो ये आपके रिलेशनशप को और भी स्ट्रोंग करेंगा.

करन और अनुषा का वेकेशन लुक

अगर इस मानसून आप भी अपने पार्टनर के साथ किसी वेकेशन का प्यान कर रहे है तो आप करन और अनुषा के इस लुक को ट्राय कर सकते है. इस लुक में अनुषा ने यूलो मिनि स्कर्ट के साथ ब्लू पहना है साथ में उनकी हेयर स्टाइल इस पुरें लुक को कंम्प्लिट कर रहा हैं. वही करन ने कोकोनट ट्री प्रिंट वाली शर्ट पहनी है जो इस लुक को कपल के लिए बेस्ट आउटफिट वेकेशन बनाता हैं.


वाइट है कपल के लिए बेस्ट

अगर आप अपने पार्टनर के साथ इस मानसून किसी लौंग ड्राइव का प्लान कर रहें हैं तो ये लुक परफेकट इस वाइट कलर शांति की प्रतीक होता है और इसमें सभी का मूड भी काफी लाइट रहता हैं. लम्बे रास्ते के लिए कपडें कंफौर्टेबल होने चाहिए उन हिसाब से ये लुक आपके लोंग ड्राइव को और भी अच्छा कर देगा. एक रिसर्च के अनुसार वाइट कपड़ों में ज्यादा रोमांटिक होते हैं.

 

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Hey you… ❤️ credit: @vjanusha

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पार्टी के लिए ट्राय करें ये लुक

अगर आप किसी पार्टी की प्लानिंग कर रहे हैं और अपने पार्टनर को सरप्राइज देना चाहते है तो ये लुक परफेक्ट है. इस में इंडियन और वेस्टर्न का जो कोकटेल है वो परफेक्ट हैं.

 

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The secret to wooing your girl is to wear a Manish Malhotra 😉 #nickyanka @manishmalhotra05

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तो अगर आप भी अपने पार्टनर के साथ प्रजेन्टेबल दिखना चाहते है तो इन लुक्स को जरुर ट्राय करें.

स्वस्थ दृष्टिकोण

लेखक- सुधा गुप्ता

मैं इस चेहरे के बारे में. कुछ ऐसा जो इस चेहरे से बहुत जुड़ा हुआ सा, कुछ इस के अतीत से, कुछ इस के बीते हुए कल से, कौन है आखिर वह? कार्यालय में भी मैं फुरसत में उसी चेहरे के बारे में सोचता रहा, कौन था आखिर वह?

वापसी में भी मैं भीड़ में नजर दौड़ाता रहा, शायद वह चेहरा नजर आ जाए.

ऐसा होता है न अकसर, हम बिना वजह परेशान हो उठते हैं. अचेतन में कुछ ऐसा इतना सक्रिय हो उठता है कि बीता हुआ कुछ धुंधली सी सूरत में मानस पटल पर आनेजाने लगता है. न साफ नजर आता है न पूरी तरह छिपता ही है.

‘‘क्या बात है, आज आप कुछ परेशान से नजर आ रहे हैं. कुछ सोच रहे हैं?’’ पत्नी ने आखिर पूछ ही लिया. उस ने भी पहचान लिया था मेरा भाव. हैरान हूं मैं, कैसे मेरी पत्नी झट से जान जाती है कि मैं किसी सोच में हूं. 28 साल से साथ हैं हम. हजार बार ऐसा हुआ होगा जब मैं ने चाहा होगा कि पत्नी से कुछ छिपा जाऊं मगर आज तक मेरा हर प्रयास असफल रहा.

‘‘आज मुझे एक चेहरा जानापहचाना लगा और ऐसा लगा कि उसे मैं बहुत करीब से जानता हूं और इतना भी आभास है कि जो भी उस चेहरे से जुड़ा है सुखद कदापि नहीं है. यहां तक कि मैं अपनी जानपहचान में भी दूर तक नजर दौड़ा आया हूं वह कहीं भी नजर नहीं आया.’’

‘‘होगा कोई. एक दिन अपनेआप याद आ जाएगा. आप आराम से खाना खाइए,’’ झुंझला कर उत्तर दिया पत्नी ने.

मेरी यह आदत उसे अच्छी नहीं लगती थी सो बड़बड़ाने लगी थी वह, ‘सारे जहां का दर्द मेरे दिल में है.’

‘‘तो क्या तुम्हारे दिल में नहीं है? पड़ोस में कोई गलत काम करता है तो यहां तुम्हारा खून उबलने लगता है. तब मुझे सुनासुना कर मेरा दिमाग खराब करती हो. अब जब मैं सुना रहा…’’

‘‘आप तो हवाई तीर चला रहे हो. जिस की चिंता है उसे जानते भी तो नहीं हो न. कम से कम मैं जिस की बात करती हूं उसे जानती तो हूं.’’

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‘‘मैं उसे जानता हूं, नंदा, यही तो परेशानी है कि याद नहीं आ रहा.’’

मैं बुदबुदा रहा था, ‘आखिर कौन था वह?’

दूसरे दिन, तीसरे दिन और उस के बाद कई दिन मैं उस के बारे में सोचता रहा. लोकल ट्रेन से आतेजाते निरंतर नजर भी दौड़ाता रहा, पर वह चेहरा नजर नहीं आया. धीरेधीरे मैं उसे भूल गया.

सच है न, समय से बड़ा कोई मरहम नहीं है. समय से बड़ा कोई आवरण भी नहीं. समय सब ढक लेता है. समय सब छिपा जाता है. चाहे सदा के लिए छिपा पाए तो भी कुछ समय का भुलावा तो होता ही है.

एक शाम पता चला, पड़ोस में कोई रहने आया है. पत्नी बहुत खुश थी. हमारी दोनों बेटियों के ससुराल चले जाने के बाद उसे अकेलापन बहुत खलता था न. पड़ोस में कोई बस जाएगा ऐसा सोच कर मुझे भी सुरक्षा का सा भाव प्रतीत होने लगा. कभी देरसवेर हो जाए तो मुझे चिंता होती थी. अब बगल के आंगन में होने वाली खटरपटर बड़ी सुखद लगने लगी थी. अभी जानपहचान नहीं थी फिर भी उन का एहसास ही बड़ी गहराई से हमें पुलकित करने लगा था.

‘‘चलो, उन से मिलने चला जाए या फिर उन्हें ही अपने घर पर बुला लें,’’ मैं ने पत्नी से कहा.

‘‘लगता है

वे किसी से

भी मिलना नहीं चाहते. आज

वह लड़की

सब्जी लेने बाहर निकली थी, मैं ने बात करनी चाही थी मगर वह बिना कुछ सुने ही चली गई.’’

‘‘क्यों?’’

पलक झप- काना ही भूल गया मैं. भला ऐसा क्यों? क्या इतने बूढ़े हैं हम जो एक जवान जोड़ा हम से बातें करना भी नहीं चाहता.

‘‘हम इतने बुरे लगते हैं क्या?’’

‘‘पता नहीं,’’ कह कर मुसकरा पड़ी थी नंदा.

नंदा सब्जी उठा कर रसोई में चली गई. अखबार पढ़ने में मन नहीं लगा मेरा सो उठ कर घर के बाहर निकल आया. गली में चक्कर लगाने लगा पर आतेजाते नजर पड़ोसी के बंद दरवाजे पर ही थी.

बहुत ही सुहानी हवा चल रही थी मगर उस के घर के दरवाजेखिड़कियां सब बंद थे. मैं सोचने लगा, क्या वे ठंडी हवा लेना नहीं चाहते? क्या दम नहीं घुटता उन का बंद घर में?

सुबह जब मैं कार्यालय जाने को निकला तो सहसा चौंक गया. पड़ोस के द्वार पर वही खड़ा था. वही सूरत जिसे मैं ने स्टेशन पर भीड़ में उस रोज देखा था. उसे देखते ही मैं पलक झपकाना भूल गया और दिमाग पर जोर डालने लगा, कौन है यह लड़का? कहां देखा है इसे?

मुझ से उस की नजरें मिलीं और वह झट से मुंह फेर कर निकल गया. तब मुझे ऐसा लगा, वह परिवार वास्तव में किसी से मिलना नहीं चाहता. यह लड़का कौन है? मैं कुछ जानता हूं इस के बारे में. अरे, मुझे सहसा सब याद आ गया, यह तो भाईसाहब का दामाद था, था क्या अभी भी है. इतना ध्यान आते ही काटो तो खून नहीं रहा मुझ में.

यह मेरी भतीजी का पति है जिस से उस का रिश्ता निभ नहीं पाया था और वह शादी के 4-5 महीने बाद ही वापस लौट आई थी.

भाई साहब तो यही बताते थे कि लड़के वाले दहेज के लालची थे. काफी लंबीचौड़ी कहानी बन गई थी. बाद में पुलिस काररवाई और दामाद की  जेलयात्रा, कितना दुखद था न सब.

मुझे तो यही पता था कि अभी भतीजी का तलाक नहीं हुआ है. भला बिना तलाक वह लड़का दूसरी शादी कैसे कर सकता है? मन में आया वापस घर आ कर पत्नी को सब बता दूं.

बेचैन हो उठा था मैं. यह समस्या तो मेरे ही घर की थी न, हमारी ही बेटी का जीवन अधर में लटका कर यह लालची पुरुष चैन से जी रहा था.

वापस चला आया मैं. जब नंदा को बताया तो हक्कीबक्की रह गई वह. सोचने लगी, तो क्या यह मानसी का पति है? जेठजी तो घुलघुल कर आधे रह गए हैं बेटी के दुख में और लड़का दूसरा घर बसा कर चैन से जी रहा है.

एक बार तो जी चाहा झट से साथ वाले घर पर जाएं और…मगर फिर सोचा, आखिर उस लड़की का क्या दोष है? कौन जाने उसे कुछ पता भी है या नहीं. पता नहीं यहां इस लड़के ने क्या रंग घोल रखा है. हम भी बेटियों वाले हैं, कैसे किसी की बेटी का घर ताश के पत्ते सा गिरा दें? पहले भाई साहब से ही क्यों न बात कर लें?

उसी शाम भाई साहब से फोन पर बात हुई और पता चला, मानसी का तलाक हो गया है. चलो, एक बात तो साफ हो गई. चैन की सांस ली मैं ने

परंतु वह प्रश्न तो वहीं रहा न, अगर यह लड़का लालची था तो इस लड़की के साथ तो ऐसा नहीं लगता कि बहुत अमीरी में रह रहा हो. उन का सामान तो

हमारे सामने ही छोटे से ट्रक से उतरा था. नईनई गृहस्थी जमाने को बस,

ठीकठाक सामान ही था. क्या पता इस लड़की के पिता से नकद दहेज ले

लिया हो?

पत्नी ने बताया कि लड़की भी बड़ी मासूम, सीधीसादी, प्यारी सी है. तब वह क्या था जब मानसी के साथ दुखद घटा था? सीधासादा सा सामान्य परिवार ही तो है इस लड़के का. हम जैसा सामान्य वर्ग, तो फिर उस कार की मांग का क्या हुआ? भाई साहब तो बता रहे थे कि लड़का कार की मांग कर रहा है. मानसी के बाद अब यहां मुझे तो कोई कार दिखाई नहीं दी.

उथलपुथल मच गई थी मेरे अंतर्मन में. हजारों सवाल नागफनी से मुझे डसने लगे थे. क्यों मानसी का घर उजड़ गया और यह लड़का यहां अपना घर बसा कर जी रहा है? एक जलन का सा भाव पनप रहा था मन में, हमारी बच्ची को सता कर वह सुखी क्यों है?

ऐसे ही 2-3 दिन बीत गए. हम समझ नहीं पा रहे थे कि सचाई कैसे जानें.

दरवाजे की घंटी बजी और हम पतिपत्नी हक्के- बक्के रह गए. सामने वही लड़की खड़ी थी. हमारी नन्ही पड़ोसिन जो अब मानसी के तलाकशुदा पति की पत्नी है.

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कुछ पल को तो हम समझ ही नहीं पाए कि हम क्या कहें और क्या नहीं. स्वर निकला ही नहीं. वह भी चुपचाप हमारे सामने इस तरह खड़ी थी जैसे कोई अपराध कर के आई हो और अब दया चाहती हो.

‘‘आओ…, आओ बेटी, आओ न…’’ मैं बोला.

पता नहीं क्यों स्नेह सा उमड़ आया उस के प्रति. कई बार होता है न, कोई इनसान बड़ा प्यारा लगता है, निर्दोष लगता है.

‘‘आओ बच्ची, आ जाओ न,’’ कहते हुए मैं ने पत्नी को इशारा किया कि वह उसे हाथ पकड़ कर अंदर बुला ले.

इस से पहले कि मेरी पत्नी उसे पुकारती, वह स्वयं ही अंदर चली आई.

‘‘आप…आप से मुझे कुछ बात करनी है,’’ वह डरीडरी सी बोली.

बहुत कुछ था उस के इतने से वाक्य में. बिना कहे ही वह बहुत कुछ कह गई थी. समझ गया था मैं कि वह अवश्य अपने पति के ही विषय में कुछ साफ करना चाहती होगी.

पत्नी चुपचाप उसे देखती रही. हमारे पास भला क्या शब्द होते बात शुरू करने के लिए.

‘‘आप लोग…आप लोगों की वजह से चंदन बहुत परेशान हैं. बहुत मेहनत से मैं ने उन्हें ठीक किया था. मगर जब से उन्होंने आप को देखा है वह फिर से वही हो गए हैं, पहले जैसे बीमार और परेशान.’’

‘‘लेकिन हम ने उस से क्या कहा है? बात भी नहीं हुई हमारी तो. वह मुझे पहचान गया होगा. बेटी, अब जब तुम ने बात शुरू कर ही दी है तो जाहिर है सब जानती होगी. हमारी बच्ची का क्या दोष था जरा समझाओ हमें? चंदन ने उसे दरबदर कर दिया, आखिर क्यों?’’

‘‘दरबदर सिर्फ मानसी ही तो नहीं हुई न, चंदन भी तो 4 साल से दरबदर हो रहे हैं. यह तो संयोग था न जिस ने मानसी और चंदन दोनों को दरबदर…’’

‘‘क्या कार का लालच संयोग ने किया था? हर रोज नई मांग क्या संयोग करता था?’’

‘‘यह तो कहानी है जो मानसी के मातापिता ने सब को सुनाई थी. चंदन के घर पर तो सबकुछ था. उन्हें कार का क्या करना था? आज भी वह सब छोड़छाड़ कर अपने घर से इतनी दूर यहां राजस्थान में चले आए हैं सिर्फ इसलिए कि उन्हें मात्र चैन चाहिए. यहां भी आप मिल गए. आप मानसी के चाचा हैं न, जब से आप को देखा है उन का खानापीना छूट गया है. सब याद करकर के वह फिर से पहले जैसे हो गए हैं,’’ कहती हुई रोने लगी वह लड़की, ‘‘एक टूटे हुए इनसान पर मैं ने बहुत मेहनत की थी कि वह जीवन की ओर लौट आए. मेरा जीवन अब चंदन के साथ जुड़ा है. वह आप से मिल कर सारी सचाई बताना चाहते हैं. आखिर, कोई तो समझे उन्हें. कोई तो कहे कि वह निर्दोष हैं.

‘‘कार की मांग भला वह क्या करते जो अपने जीवन से ही निराश हो चुके थे. आजकल दहेज मांगने का आरोप लगा देना तो फैशन बन गया है. पतिपत्नी में जरा अलगाव हो जाए, समाज के रखवाले झट से दहेज विरोधी नारे लगाने लगते हैं. ऐसा कुछ नहीं था जिस का इतना प्रचार किया गया था.’’

‘‘तुम्हारा मतलब…मानसी झूठ बोलती है? उस ने चंदन के साथ जानबूझ कर निभाना नहीं चाहा? इतने महीने वह तो इसी आस पर साथ रही थी न कि शायद एक दिन चंदन सुधर जाएगा,’’ नंदा ने चीख कर कहा. तब उस बच्ची का रोना जरा सा थम गया.

‘‘वह बिगड़े ही कब थे जो सुधर जाते? मैं आप से कह रही हूं न, सचाई वह नहीं है जो आप समझते हैं. दहेज का लालच वहां था ही नहीं, वहां तो कुछ और ही समस्या थी.’’

‘‘क्या समस्या थी? तुम्हीं बताओ.’’

‘‘आप चंदन से मिल लीजिए, अपनी समस्या वह स्वयं ही समझाएंगे आप को.’’

‘‘मैं क्यों जाऊं उस के पास?’’

‘‘तो क्या मैं उन्हें भेज दूं आप के पास? देखिए, आज की तारीख में आप अगर उन की बात सुन लेंगे तो उस से मानसी का तो कुछ नहीं बदलेगा लेकिन मेरा जीवन अवश्य बच जाएगा. मैं आप की बेटी जैसी हूं. आप एक बार उन के मुंह से सच जान लें तो उन का भी मन हलका हो जाएगा.’’

‘‘वह सच तुम्हीं क्यों नहीं बता देतीं?’’

‘‘मैं…मैं आप से कैसे कह दूं वह सब. मेरी और आप की गरिमा ऐसी अनुमति नहीं देती,’’ धीरे से होंठ खोले उस ने. आंखें झुका ली थीं.

नंदा कभी मुझे देखती और कभी उसे. मेरे सोच का प्रवाह एकाएक रुक गया कि आखिर ऐसा क्या है जिस से गरिमा का हनन होने वाला है? मेरी बेटी की उम्र की बच्ची है यह, इस का चेहरा परेशानी से ओतप्रोत है. आज की तारीख में जब मानसी का तलाक हो चुका है, उस का कुछ भी बननेबिगड़ने वाला नहीं है, मैं क्यों किसी पचड़े में पड़ूं? क्यों राख टटोलूं जब जानता हूं कि सब स्वाहा हो चुका है.

अपने मन को मना नहीं पा रहा था मैं. इस चंदन की वजह से मेरे भाई

का बुढ़ापा दुखदायी हो गया, जवान बेटी न विधवा हुई न सधवा रही. वक्त की मार तो कोई भी रोतेहंसते सह ले लेकिन मानसी ने तो एक मनुष्य की मार

सही थी.

‘‘कृपया आप ही बताइए मैं क्या करूं? मैं सारे संसार के आगे गुहार नहीं लगा रही, सिर्फ आप के सामने विनती कर रही हूं क्योंकि मानसी आप की भतीजी है. इत्तिफाकन जो घट गया वह आप से भी जुड़ा है.’’

‘‘तुम जाओ, मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता.’’

‘‘चंदन कुछ कर बैठे तो मेरा तो घर ही उजड़ जाएगा.’’

‘‘जब हमारी ही बच्ची का घर उजड़ गया तो चंदन के घर से मुझे क्या लेनादेना?’’

‘‘चंदन समाप्त हो जाएंगे तो उन का नहीं मेरा जीवन बरबाद…’’

‘‘तुम उस की इतनी वकालत कर रही हो, कहीं मानसी की बरबादी

का कारण तुम्हीं तो नहीं हो? इस जानवर का साथ देने का भला क्या

मतलब है?’’

‘‘चंदन जानवर नहीं हैं, चाचाजी. आप सच नहीं जानते इसीलिए कुछ समझना नहीं चाहते.’’

‘‘अब सच जान कर हमारा कुछ भी बदलने वाला नहीं है.’’

‘‘वह तो मैं पहले ही विनती कर चुकी हूं न. जो बीत गया वह बदल नहीं सकता. लेकिन मेरा घर तो बच जाएगा न. बचाखुचा कुछ अगर मेरी झोली में प्रकृति ने डाल ही दिया है तो क्या इंसानियत के नाते…’’

‘‘हम आएंगे तुम्हारे घर पर,’’ नंदा बीच में ही बोल पड़ी.

मुझे ऐसी ही उम्मीद थी नंदा से. कहीं कुछ अनचाहा घट रहा हो और नंदा चुप रह जाए, भला कैसे मुमकिन था. जहां बस न चले वहां अपना दिल जलाती है और जहां पूरी तरह अपना वश हो वहां भला पीछे कैसे रह जाती.

‘‘तुम जाओ, नाम क्या है तुम्हारा?’’

‘‘संयोगिता,’’ नाम बताते हुए हर्षातिरेक में वह बच्ची पुन: रो पड़ी थी.

‘‘मैं तुम्हारे घर आऊंगी. तुम्हारे चाचा भी आएंगे. तुम जाओ, चंदन को संभालो,’’ पत्नी ने उसे यकीन दिलाया.

उसे भेज कर चुपचाप बैठ गई नंदा. मैं अनमना सा था. सच है, जब मानसी का रिश्ता हुआ भैया बहुत तारीफ करते थे. चंदन बहुत पसंद आया था उन्हें. सगाई होने के 4-5 महीने बाद ही शादी हुई थी. इस दौरान मानसी और चंदन मिलते भी थे. फोन भी करते थे. सब ठीक था, पर शादी के बाद ही ऐसा क्या हो गया? अच्छे इनसान 2-4 दिन में ही जानवर कैसे बन गए?

भाभी भी पहले तारीफ ही करती रही थीं फिर अचानक कहने लगीं कि चंदन तो शादी वाले दिन से ही उन्हें पसंद नहीं आया था. जो इतने दिन सही था वह अचानक गलत कैसे हो गया. हम भी हैरान थे.

तब मेरी दोनों बेटियां अविवाहित थीं. मानसी की दुखद अवस्था से हम पतिपत्नी परेशान हो गए थे कि कैसे हम अपनी बच्चियों की शादी करेंगे? इनसान की पहचान करना कितना मुश्किल है, कैसे अच्छा रिश्ता ढूंढ़ पाएंगे उन के लिए? ठीक चलतेचलते कब कोई क्यों गलत हो जाता है पता ही नहीं चलता.

‘मैं ने तो मानसी से शादी के हफ्ते बाद ही कह दिया था, वापस आ जा, लड़कों की कमी नहीं है. तेरी यहां नहीं निभने वाली…’ एक बार भाभी ने सारी बात सुनातेसुनाते कहा था, ‘फोन तक तो करने नहीं देते थे, ससुराल वाले. बड़ी वाली हमें घंटाघंटा फोन करती रहती है, यह तो बस 5 मिनट बाद ही कहने लगती थी, बस, मम्मी, अब रखती हूं. फोन पर ज्यादा बातें करना ससुरजी को पसंद नहीं है.’

मानसी शिला सी बैठी रहती थी. एक दिन मैं ने स्नेह से उस के सिर पर हाथ रखा तो मेरे गले से लिपट कर रो पड़ी थी, ‘पता नहीं क्यों सब बिखरता ही चला गया, चाचाजी. मैं ने निभाने की बहुत कोशिश की थी.’

‘तो फिर चूक कहां हो गई, मानसी?’

‘उन्हें मेरा कुछ भी पसंद नहीं आया. अनपढ़ गंवार बना दिया मुझे. सब से कहते थे. मैं पागल हूं. लड़की वाले तो दहेज में 10-10 लाख देते हैं, तुम्हारे घर वालों ने तो बस 2-4 लाख ही लगा कर तुम्हारा निबटारा कर दिया.’

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हैरानपरेशान था मैं तब. मैं भी तब अपनी बच्चियों के लिए रिश्तों की तलाश में था. सोचता था, मैं तो शायद इतना भी न लगा पाऊं. क्या मेरी बेटियां भी इसी तरह वापस लौट आएंगी? क्या होगा उन का?

‘देखो भैया, उन लोगों ने इस की नस काट कर इसे मार डालने की कोशिश की है. यह देखो भैया,’ भाभी ने मानसी की कलाई मेरे सामने फैला कर कहा था. यह देखसुन कर काटो तो खून नहीं रहा था मुझ में. जिस मानसी को भैयाभाभी ने इतने लाड़प्यार से पाला था उसी की हत्या का प्रयास किया गया था, और भाभी आगे बोलती गई थीं, ‘उन्होंने तो इसे शादी के महीने भर बाद ही अलग कर दिया था.

‘जब से हम ने महिला संघ में उन की शिकायत की थी तभी से वे लोग इसे अलग रखते थे. चंदन तो इस के पास भी नहीं आता था. वहीं अपनी मां के पास रहता था. राशनपानी, रुपयापैसा सब मैं ही पहुंचा कर आती थी. इस के बाद तो मुझे फोन करने के लिए पास में 10 रुपए भी नहीं होते थे.’

सारी की सारी कहानी का अंत यह हुआ कि चंदन काफी समय जेल में रहा था, उस की नौकरी छूट गई थी सो अलग. वे लोग तलाक ही नहीं देते थे. न जीते थे न जीने ही देते थे.

‘‘आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं, मुझे तब भी दाल में कुछ काला लगता था जब मानसी वापस आ गई थी. इस चंदन को अगर मानसी की हत्या करनी होती तो वह उस की गरदन काटता न कि जरा सी नस काट कर छोड़ देता ताकि वह जिंदा रह कर सब को बताए कि सच क्या है. बेटी का मसला था न, मैं क्या कहती, मगर यह सत्य है कि लड़की वालों को सदा सहानुभूति मिलती है और लड़का इसी बात का अपराधी बन जाता है कि उस ने सात फेरे ले लिए थे, बस,’’ नंदा बोली तो बस, बोलती ही चली गई, ‘‘बड़ी वाली बेटी घंटाघंटा अपनी ससुराल से हर रोज फोन करती थी तो क्या जरूरी था कि मानसी भी हर रोेज घंटाघंटा मां से बातें करती? हमारी भी तो बेटियां हैं न, हम क्या रोज उन से बातें करते हैं?’’

‘‘फोन मात्र सुविधा के लिए होते हैं ताकि समय पर जरूरी बात की जाए, गपशप लगाएंगे तो क्या फोन का बिल नहीं आएगा? हमारी ही बहू अगर हर रोज अपनी मां से फोन पर गपशप करेगी तो क्या हजारों रुपए बिल देते हुए हम चीखेंगे नहीं? आखिर इतनी क्या बातें होती हैं जो मानसी मां से करना चाहती थी?’’

‘‘ससुराल भेज दिया है बेटी को तो उसे वहां बसने का मौका भी देना चाहिए. ससुराल में घटने वाली जराजरा सी बातें अगर मायके में बताई जाएं तो वे मिठास कम खटास ज्यादा पैदा करती हैं. मुझे तब भी लगता था कि कहीं कुछ गलत हुआ है. अब तो संयोगिता ने भी कुछ बताना चाहा है न, सच कुछ और होगा, आप देख लेना.’’

‘‘घर की बहू शादी के एक महीने बाद ही सहायता के लिए महिला संघ में पहुंच जाए तो क्या ससुराल वाले डर कर उसे अलग नहीं कर देंगे. बेटा क्या पत्नी को स्नेह दे पाएगा जब उस के सिर पर हर पल पुलिस और महिला संघ की तलवार लटकती रहेगी? कोई भी रिश्ता डर से नहीं प्यार से पनपता है. चंदन और मानसी में प्यार कब पनपा होगा जो उन की निभ पाती?’’

मैं चुपचाप सुनता रहा. यह सच है कि हमारी बेटियां अपनेअपने घर में खुश हैं. 15-20 दिन बाद वह हमें फोन कर के हमारा हालचाल पूछ लेती हैं, जराजरा सी बात न वह हमें फोन पर बताती हैं और न ही हम. अनुशासन तो जीवन में हर कदम पर होना चाहिए न. सीमित आय वाला हजारों रुपए का बिल कैसे चुका पाएगा. व्यर्थ क्लेश तो होगा ही न.

जल्दी ही हम दोनों चंदन से मिलने जा पहुंचे. दूल्हा बने कभी मानसी की बगल में बैठे देखा था उसे और अब ऐसा लग रहा था जैसे पूरे जीवन का संत्रास एकसाथ ही सह कर थकाहारा एक इनसान हमारे सामने खड़ा है.

चंदन ने हमारे पैर छू कर प्रणाम किया. मैं सोचने लगा, क्या अब भी हमारा कोई ऐसा अधिकार बचा है?

‘‘जीते रहो,’’ स्वत: निकल गया मेरे होंठों से.

कुछ पल हम आमनेसामने बैठे रहे. बात कैसे शुरू की जाए. मैं ने ही चंदन को पास बुला लिया, ‘‘यहां आ कर मेरे पास बैठो, चंदन. आओ बेटा.’’

एक पुरुष बच्चों की तरह कैसे रो पड़ता है मैं ने पहली बार देखा था. मेरे घुटनों पर सिर रख कर वह ऐसी दर्द भरी चीखों से रोया कि नंदा भी घबरा उठी. संयोगिता ने ही लपक कर उसे संभाला, ‘‘आप चाचाजी से सब कह दीजिए, चंदन. रोइए मत, आप इसी तरह रोते रहेंगे तो बात कैसे कर पाएंगे? मैं चाची को ले कर दूसरे कमरे में चली जाती हूं. आप चाचाजी से बात कीजिए. रोइए मत, चंदन.’’

तब सहसा मैं ने ही चंदन को संभाला और इशारे से नंदा को संयोगिता के साथ जाने का इशारा किया. तब एक संतोष भाव उभर आया था संयोगिता के चेहरे पर मानो मेरे इशारे से एक डूबते को तिनके का सहारा मिला हो. संयोगिता भरी आंखों से मेरा आभार जताती हुई नंदा के साथ चली गई.

हम दोनों अकेले रह गए. कुछ समय लग गया चंदन को सामान्य होने में. फिर धीरे से चंदन ने ही कहा, ‘‘मेरा जीवन इस कदर बरबाद हो जाएगा मैं ने कभी सोचा भी न था.’’

‘‘यह सब क्यों और कैसे हो गया, मुझे सचसच बताओ, चंदन. किस का कितना दोष था, समझाओ मुझे. क्या मानसी निभा नहीं पाई या…?’’

‘‘सब से बड़ा दोष तो मेरा ही था, चाचाजी. मुझे तो पता नहीं था कि मेरे शरीर में कोई कमी है. मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे पाएगा मैं नहीं जानता था.’’

यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया. चंदन कुछ देर चुप रहा फिर बोला, ‘‘यह सचाई मुझे स्वीकार करनी चाहिए थी न. जो मेरे बस में नहीं था मुझे उसे अपनी कमी मान कर मानसी को आजाद कर देना चाहिए था. मैं अपनी कमजोरी स्वीकार ही नहीं कर पाया.

‘‘हर बीमारी का इलाज है. ठंडे दिमाग से हल निकालता तो हो सकता था सब ठीक हो जाता. मानसी को सचाई से अवगत कराता तो हो सकता था वह मेरा साथ देती, मेरा मानसम्मान संभाल कर रखती. मगर मैं तो अपनी कुंठा, अपनी हताशा मानसी पर उतारता रहा. उस ने निभाने की कोशिश की थी मगर मैं ने ही कोई रास्ता नहीं छोड़ा था.

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‘‘मानसी जराजरा सी बात अपने मायके में बताती. मैं चिढ़ कर फोन ही काट देता. मैं ने मानसी की हत्या करने की कोशिश नहीं की थी. मानसी ने खुद ही तंग आ कर अपनी नसें काट ली थीं.

‘‘यह भी सच है कि मानसी अपनी बड़ी बहन की अमीर ससुराल से हमारी तुलना करती थी कि दीदी दिन में 2-2 बार मम्मी को फोन करती हैं इसलिए वह भी करेगी. पहली बार में ही जब लंबाचौड़ा बिल आ गया तो पिताजी ने साफसाफ मना कर दिया, जिस पर मानसी ने काफी बावेला मचाया.

‘‘हमारे घर में अनुशासन था जिस में बंधना मानसी को गंवारा नहीं था. हमारी नपीतुली आमदनी पर जब मानसी ने ताना कसा तो मैं ने भी कह दिया था कि लोग तो दामाद को 10-10 लाख देते हैं, इतना ही खुला हाथ है तो अपनी मां से मांग लो.

‘‘बस, इसी बात को मुद्दा बना कर मानसी के परिवार ने महिला संघ में शिकायत कर दी कि मैं दहेज की मांग कर रहा हूं. मैं ने घबरा कर मानसी को उस के पूरे दानदहेज के साथ अलग कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि मेरे मातापिता पर कोई आंच आए.

‘‘हालात बिगड़ते ही चले गए, चाचाजी. सब मेरे हाथ से निकलता चला गया. मेरा दोष था, मैं मानता हूं. मैं ने सब का हित सोचा, अपने मांबाप का हित सोचा, अपनी कमजोरी छिपा कर सोचा कि अपना हित कर रहा हूं लेकिन बेचारी मानसी का हित नहीं सोचा. उसे कुछ नहीं दिया. मेरे जीवन से वह रोतीबिलखती ही चली गई.

‘‘मैं अपनी भूल मानता हूं लेकिन यह सच नहीं है कि मैं ने मानसी की हत्या का प्रयास किया था. मैं ने दहेज की मांग कभी नहीं की थी, चाचाजी. मैं ने मानसी को अपनी समस्या नहीं बताई, यह सच है लेकिन यह सच नहीं है कि मैं मानसी को पागल प्रमाणित करना चाहता था.

‘‘अखबारों में मुझ पर जोजो आरोप छपे वे सच नहीं हैं. सच तो सामने आया ही नहीं. जो अन्याय मैं ने कभी किया ही नहीं उस की सजा मैं ने क्यों पाई? इतना अपमान और इतनी बदनामी होगी मैं ने नहीं सोचा था.

‘‘मानसी के साथ एक सुखी गृहस्थी का सपना था मेरा. नहीं सोचा था, 2 दिन बाद ही मेरा घर जंग का मैदान बन जाएगा. मानसी का सहज सामीप्य ही असहनीय हो जाएगा.

‘‘मैं मानसी से दूर रहने के बहाने ढूंढ़ने लगा था. अपनी नपुंसकता को मानसी से अवगत कराता तो शायद वह मुझे सहारा देती. अपने मांबाप को भी कुछ बता पाता तो हो सकता था वही मुझे कोई रास्ता दिखाते. अपने ही खोल में घुटघुट कर मैं ने अपने साथसाथ मानसी का भी जीना हराम कर दिया था. मेरी वजह

से मानसी का जीवन बरबाद हो गया. मुझे अपनी कमी का एहसास होता तो मैं कभी शादी नहीं करता. सच का सामना करता तो शायद कोई आसान रास्ता निकल आता.

‘‘मेरी हताशा हर रोज कोई नई समस्या खड़ी करती और मानसी का मुझ से झगड़ा हो जाता. असहाय मानसी करती भी तो क्या?

‘‘चाचाजी, 4 साल बीत गए उस घटना को, मेरी सांस घुटती  है वह सब याद कर के. हम ने मानसी का जीवन तबाह किया है.’’

मैं भारी मन से सबकुछ सुनता रहा. आखिर कहता भी क्या.

‘‘मैं आज भी मानसी को भुला नहीं पाया हूं, चाचाजी,’’ चंदन ने आगे कहना जारी रखा, ‘‘मैं मानसी के लिए परेशान हूं््. मैं उस से सिर्फ एक बार मिलना चाहता हूं.

‘‘आज इतना सब भोगने के बाद सच का सामना करने की हिम्मत है मुझ में. चाचाजी, आप मुझे सिर्फ एक बार मानसी से मिला दें.

‘‘संयोगिता से जब शादी की तब क्या उसे पूरी सचाई बताई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, संयोगिता मेरे एक दोस्त की बहन है. मेरी सचाई जान गई थी. दोस्त की पत्नी ने सब बताया था इसे. मेरा दोस्त ही मुझे डाक्टर के पास ले गया था. मैं मानता हूं, मुझ से ही गलती हुई थी. जो कदम मैं ने इतनी बड़ी सजा भोगने के बाद उठाया वह तभी उठा लेता तो इतनी बड़ी घटना न होती.’’

‘‘अब मानसी से मिल कर दबी राख क्यों कुरेदना चाहते हो? जो हो गया उसे सपना समझ कर भूलने का प्रयास करो. क्या संयोगिता का दिल भी दुखाना चाहते हो, जिस ने जीवन का सब से बड़ा जुआ खेला तुम्हारा हाथ पकड़ कर? तुम्हारा मन हलका हो जाए, मैं इसीलिए चला आया हूं, मगर अब अगर संयोगिता का मन दुखाओगे तो एक और भूल करोगे,’’ कहते हुए मेरी नजर बाहर की बंद खिड़कियों पर पड़ी. मैं ने उठ कर सारे पट खोल दिए. ताजा हवा अंदर चली आई. मैं फिर बोला, ‘‘घुटघुट कर मत जिओ, चंदन, खुल कर जिओ और अपना जीवन सरल बनाना सीखो. संयोगिता, जो तुम्हें संयोग ने दी है, अब उसी को सहेजो. जो नहीं रहा उस का दुख मत करो, समझेन.’’

शांत हो चुका था चंदन. उस का कंधा थपक कर मैं बाहर चला आया.

बाहर नंदा मेरा ही इंतजार कर रही थी.

घर आ कर मैं देर तक सामान्य नहीं हो पाया. सोचने लगा, क्या दोष था चंदन का? अपनी सामयिक नपुंसकता को सहज स्वीकार नहीं कर पाया, क्या यही दोष था इस का? हम में से कितने ऐसे पुरुष हैं जो अपनी नपुंसकता को सहज स्वीकार कर कोई स्वस्थ दृष्टिकोण अपना पाते हैं? लड़की वाले अकसर अपनी हालत यह प्रमाणित कर के ज्यादा दयनीय बना लेते हैं कि उन्हीं के साथ ज्यादा अन्याय हुआ है. मानसी भी तो सचाई अपनी मां को बता सकती थी. वह चंदन पर हत्या करने का आरोप लगा कर इतना बड़ा बखेड़ा तो खड़ा न करती. यह सच है कि चंदन से प्यार मिलता तो मानसी सब सह जाती लेकिन चंदन से मिली थी मात्र हताशा, मानसिक यातना, जिस का प्रतिकार मानसी ने भी इस तरह किया. दोनों में से किसी का भी तो भला नहीं हुआ न.

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‘‘क्या सोच रहे हैं आप?’’ नंदा ने पूछा.

‘‘बस, इतना ही कि हमारा भी कोई बेटा होता तो…’’

‘‘एकाएक बेटा क्यों सूझा आप को?’’

‘‘बेटा नहीं सूझा, एक जरूरत सूझी है. क्या बेटे की शादी से पहले उस का पूरा मेडिकल चेकअप जरूरी नहीं है? जन्मपत्री की जगह रक्त मिलाना चाहिए. तुम क्या सोचती हो. मेरा बेटा होता तो उस की पूरी जांच कराए बिना कभी शादी न कराता.

‘‘यह संकोच की बात नहीं एक जरूरत होनी चाहिए. मानसी का जीवन अधर में न लटकता अगर चंदन के मांबाप ने यह स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाया होता.’’

चुप थी नंदा. इस का मतलब वह मेरे शब्दों से सहमत थी. संयोगिता ने इसे शायद सारा सच बताया होगा न.

ठंडी सांस ली नंदा ने. मेरी तरफ देखा. उस की आंखों में भी पीड़ा थी. बस, यही सोच कर कि जो हो गया उसे समय पर संभाल लिया जाता तो जो सब हो गया वह कभी न होता.                                                    द्य

स्वामी श्री आडंबरानंद की आत्मकथा

लेखक-दामोदर अग्रवाल

सफलता की चरम सीमा पर पहुंच जाने के बाद आज मुझे अपनी आत्मकथा लिखते हुए चरम आनंद का अनुभव हो रहा है. मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक गांव में हुआ था. मेरे पिता एक कर्मकांडी ब्राह्मण थे. घर में संस्कृत की कुछ पुरानी पोथियां थीं. उन्हें मैं बारबार पढ़ता और आगे चल कर एक महान उपदेशक और महात्मा बनने की कल्पना किया करता था. उसी के फलस्वरूप आज मैं जेटयुग का महान योगी माना जाता हूं.

मेरे प्रवचनों के वीडियो और आडियो कैसेटों की मांग रहती है. टेली-विजन के धार्मिक चैनलों पर भी मेरे प्रवचन होते हैं. पैसे को मैं हाथ का मैल समझता हूं अत: उन से जो आमदनी होती है उसे मैं अपने आश्रम को दान में दे देता हूं.

भारत में मेरे आश्रम की एक शाखा अहमदाबाद में है. वहां जेटयुग के अन्य ऋषिमुनियों का भी जमघट रहता है. धर्म के धंधे की दृष्टि से यह एक अद्भुत नगरी है. दूसरी शाखा जयपुर में है. वहां का नगरसेठ मेरा परम शिष्य है. अपने अथाह धन के सदुपयोग से उस ने मेरे लिए एक और आश्रम धार्मिक नगरी बंगलौर में  बनवाया है.

इन आश्रमों की देखरेख के लिए कर्मचारियों की एक सेना भी है. नियमानु- सार वे सफेद लकदक कपड़ों में आश्रम में विचरण करते, तिलक लगाते और कंठीमाला धारण करते हैं. हाथ में एक पुस्तिका ले कर पाठ भी करते रहते हैं. भोग और प्रसाद ग्रहण करने के कुछ घंटे पहले से ही उन के उदर में गुड़गुड़ाहट होने लगती है जो इस बात का प्रतीक है कि प्रसाद पाने के लिए वे परम प्रतीक्षारत हैं.

आश्रम के भंडारे में दूध, घी और शक्कर की नदी बहती है. सेवार्थ नगर की उच्च कुलों की महिलाएं आती हैं और इलायची, बादाम आदि छील कर भोग तैयार करने में अपना योगदान करती हैं. उन के चेहरों पर एक दिव्य आभा सी उतर आती है. वे मेरे लिखे भजन गाती हैं और मेरा आवाहन करती हैं. तब जो गुलाबी रंग उन के कोमल कपोलों पर उभर कर आता है, वह कितना अलौकिक एवं नैसर्गिक होता है, यह मुझ से अधिक कौन बता सकता है.

आश्रम का वीडियो फोटोग्राफर उन की फिल्म उतारता, फिर मुझे दिखाने के लिए उन्हें ले कर मेरे वातानुकूलित कक्ष में आता और धन्य हो जाता है. मेरे चरण स्पर्श की बलवती इच्छा से पे्ररित हो कर

2-4  श्रद्धालु सेविकाएं भी उस के साथ आ जाती हैं. मैं उन्हें प्रेम से बैठने को कहता हूं लेकिन

वे खड़ीखड़ी मुझे निहारती रहती हैं और मैं उन को निहारता हूं. मैं तब उन्हें बताता हूं कि यह जो शरीर है वह इतना आकर्षक इसलिए है कि उस में दिव्यात्मा का वास है.

अब मैं आप को अपने जीवन के एक रहस्य से परिचित कराता हूं. 13 साल की आयु में ही मेरा एक लड़की से प्रेम हो गया था. 11 वर्षीया वह सुंदर एवं कमनीय कन्या मेरे अपने ही स्कूल के हेडमास्टर की बेटी थी. फलस्वरूप मुझे पीटा गया और मैं गांव से भाग गया.

कई सालों तक काशी, मथुरा और हरिद्वार के साधुसंतों की संगत में रहा. मैट्रिक पास कर के कोई सरकारी नौकरी करने की मेरी तमन्ना धरी रह गई लेकिन इस दौरान एक उत्तम उपदेशक बनने के गुण और कलाएं मैं ने सीख लीं. देखने में मैं कोमल और चित्ताकर्षक तो था ही इसलिए महात्माओं ने मुझे हाथोंहाथ लिया. मेरा नाम भी रामखेलावन से बदल कर आडंबरानंद हो गया. नाम के बावजूद मैं आडंबर से रहित और ईश्वर भक्ति के आनंद में रमित रहता हूं.

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एक उच्चकोटि के स्वामी और उपदेशक के रूप में मुझे अब सारा देश जानता है. मेरे व्याख्यानों का अंगरेजी अनुवाद कैलिफोर्निया तक जाता है. वहां मेरी न जाने कितनी भक्तिनें हैं. मेरे एक इशारे पर वे भागी चली आती हैं और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त कर चली जाती हैं. बदले में जो हजारों डालर का दान दे जाती हैं उन से मेरे आश्रमों का खर्च चलता है. सारा पैसा आश्रम के ट्रस्ट में चला जाता है. पैसे को मैं स्वयं कभी नहीं छूता क्योंकि मेरा मानना है कि पैसा हाथ का मैल है. आश्रम में मेरा जो एक हेलिकाप्टर खड़ा रहता है,  वह भी एक भक्त द्वारा दान में ही मिला है.

एक रहस्य और बताऊं कि मैं किशोरावस्था के अपने उस प्रथम प्रेम को आज भी भूल नहीं पाया हूं.  मेरी विदेशी भक्तिनें जो मेरा चरण स्पर्श  करती हैं और जिन की उंगलियों को मैं अपने पैर के अंगूठे से चुपके से दबा कर उन्हें कृतार्थ कर देता हूं, वे भी उस कमनीय कन्या की तुलना में तुच्छ लगती हैं. लेकिन उस की याद को ईश्वर के स्मरण में बदल देने की अपनी असीम क्षमता के कारण मैं गांव लौट जाने की बलवती इच्छा से बचा रहता हूं. वैसे भी उस लड़की को अब तक कई पुत्रपुत्रियां हो चुकी होंगी और वह मेरे जैसे स्वामी को अपना निजी स्वामी बनाने के योग्य ही कहां रह गई होगी.

मेरे आश्रमों का जो संयुक्त आफिस है उसी के ऊपरी कमरे में मेरा मनन और अध्ययन केंद्र है. वहां तक पहुंचने की अनुमति मेरे शिष्यशिष्या विशेषों को ही है. वहीं मेरा एक धार्मिक पुस्तकालय भी है. मेरा अपना एक सैटेलाइट और वेबसाइट भी है. मेरा अपना एक केबल एंटीना और टीवी भी है. एक बड़ा पलंग, रेडियो और म्यूजिक सिस्टम, फोन और मोबाइल सबकुछ है. सीसी टीवी पर देखता रहता हूं कि आश्रम में कहां क्या हो रहा है.

अपने कृपापात्रों से मिलने और उन की समस्याओं को सुलझाने का मुझे वरदान प्राप्त है. स्त्री हो या पुरुष सब परमात्मा के ही अंश हैं. अत: समभाव से मैं उन्हें एकांत कक्ष में ले जाता हूं और अपने दिव्य स्पर्श से उन्हें तनावमुक्त कर देता हूं. इस उदाहरण के लिए आप मुझे क्षमा करें, लेकिन जैसे फिल्म ‘मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.’ में संजय दत्त लोगों को अपने आलिंगन में ले कर मोह लेता था वैसे मैं भी करता हूं. कहना न होगा कि सांसारिक समस्याओं को सुलझाने का इस से अधिक आलौकिक कोई दूसरा तरीका नहीं है. भक्त की सब से कमजोर कड़ी कौन सी है इस को समझना है.

दूसरों को प्रभावित करने के लिए मुझे अपने शरीर के आडंबर को बनाए रखना पड़ता है. आध्यात्मिक आकर्षण भी तभी होता है जब शरीर आकर्षित करे. इसलिए मैं कोई भी ऐसा वस्त्र धारण नहीं करता जिस में बटन या किसी धातु का इस्तेमाल हुआ हो. बारीक मलमल का धवल वस्त्र ही अधिक रास आता है. इन्हें जरूरत पर उतारना भी आसान होता है. शास्त्रों में केसरिया कपड़ों का भी उल्लेख मिलता है. उस से शरीर की आभा और निखर आती है. भीतर तन का रंग भी दीप्त हो जाता है. दाढ़ी और सिर के केशों को भी स्वच्छ और सुगंधमय रखता हूं. वाणी में भी ओज रखता हूं. इस के लिए मैं अपने आश्रम के अपने शयनकक्ष में दर्पण के सामने अभ्यास करता हूं.

भक्तों के समूह में मुझे जो सुंदरियां दिखती हैं उन्हें देख कर मेरा मन डोलने लगता है. तब मैं आंख बंद कर ईश्वर का ध्यान करता हूं. इस से मेरे चंचल मन को शांति मिलती है और मेरा ब्रह्मचर्य बना रहता है. अब तो चरण छूने के लिए लालायित सुंदरियों के स्पर्श से भी मन पुलकित नहीं होता. धर्म का धंधा चलता रहे इसलिए यह नाटक करना जरूरी है.

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मेरे आश्रम में मेरा प्रवचन सुनने बड़ेबड़े नेता और अफसर भी आते हैं जो मेरे एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. मैं जिसे चाहूं अपने लिए समर्पित कर सकता हूं लेकिन धर्म के धंधे  में मैं वासना को नहीं आने देता. इसी का मैं उपदेश जो देता हूं तो स्वयं उस का पालन क्यों न करूं?

सांसारिक सुख की प्राप्ति के लिए मेरा कैलिफोर्निया वाला आश्रम ही काफी है. इधर भारत में कुछ बच के चलना पड़ता है.

बात इंदौर की है. एक विख्यात स्वामी के भक्तों को पता चला कि कहीं गांव में बाबा की एक बीवी और 3 बच्चे भी हैं, जिन्हें वह छोड़ आए हैं तो बात अखबारों में छप गई और आश्रम डूबतेडूबते बचा. एक कहानी पूना अर्थात पुणे की भी है. बाबा प्रवचन कर रहे थे कि एक औरत हल्ला मचाने लगी कि मेरे पेट में जो बच्चा है वह इन्हीं का है. यद्यपि पुलिस ने उसे पकड़ कर बाहर कर दिया पर बाबा की दुकानदारी तो प्रभावित हुई न. सच कहूं तो इसीलिए मैं इस क्षणिक सुख का भोग लगाना नहीं चाहता. द्य

बुझते दिए की लौ: भाग 1

अपने वीरान से फ्लैट से निकल कर मैं समय काटने के लिए सामने पार्क में चला गया. जिंदगी जीने और काटने में बड़ा अंतर होता है. पार्क के 2 चक्कर लगाने के बाद मैं दूर एकांत में पड़ी बैंच पर बैठ गया. यह मेरा लगभग रोज का कार्यक्रम होता है और अंधेरा होने तक यहीं पड़ा रहता हूं.

बाग के पास कुछ नया बन रहा था. वहां की पहली सीढ़ी अभी ताजा थी इसलिए उस को लांघ कर सीधे दूसरी सीढ़ी पर पहुंचने में लोगों को बहुत परेशानी हो रही थी. मैं लोगों की असुविधा को देखते हुए हाथ बढ़ा कर उन्हें ऊपर खींचता रहा. बडे़बूढ़ों का पांव कांपता देख मैं पूरी ताकत से उन्हें ऊपर खींच रहा था पर बेहद आहिस्ता से.

‘हाथ दीजिए,’ कह कर मैं लगातार उस औरत को आगे आने को कहता और वह हर बार हिचकिचा कर सीढि़यों की बगल में खड़ी हो जाती. हलके भूरे रंग के सूट के ऊपर सफेद चुन्नी से उस ने अपना सिर ढांप रखा था. मैं ने फिर से आग्रह किया, ‘‘हाथ दीजिए, अब तो अधेरा भी शुरू होने वाला है.’’

उस ने धीरे से मुझे अपना हाथ पकड़ाया. मैं ने जैसे ही उस के हाथ को स्पर्श किया उस के कोमल स्पर्श ने मुझे भीतर तक हिला दिया. इसी प्रक्रिया में उसे सहारा देते समय उस की चुन्नी सिर से ढलक कर कंधे पर आ गई. उस ने मुझे देखते ही कहा, ‘‘तब तुम कहां थे जब मैं ने इन हाथों का सहारा मांगा था?’’

‘‘तुम नूपुर हो न,’’ मैं ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘शुक्र है, तुम्हारे होंठों पर मेरा नाम तो है,’’ कहतेकहते उस की आंखों में पानी आ गया और वह सीढि़यों से हट कर एक कोने में चली गई. मैं भी उस के पीछेपीछे वहां आ गया. वह बोली, ‘‘मैं ने परसों तुम को पार्क में देखा तो इन आंखों को सहज विश्वास ही नहीं हुआ कि वह तुम हो…कैसे हो?’’

‘‘ठीक ही हूं,’’ मैं ने बुझे मन से कहा और उस का पता जानने के लिए अधीर हो कर पूछा, ‘‘यहां कहां रहती हो?’’

‘‘सेक्टर 18 में. मेरे बडे़ भाई वहीं रहते हैं. जब मन बहुत उदास हो जाता है तो यहां आ जाती हूं.’’

मैं उस के चेहरे को देखता रहा. उस के बाल समय से पहले सफेदी पर थे. पर उस की सफेद चुन्नी और सूनी मांग देख कर मैं सहम सा गया. कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका. दोनों के बीच में एक गहरा सा सन्नाटा पसर गया था. भाव व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव लगने लगा. वर्षों की चुप्पी के बाद भी शब्दों को तलाशने में बहुत समय लग गया. खामोशी को तोड़ते हुए मैं ने ही कहा, ‘‘चलो, दूर पार्क में चल कर बैठते हैं.’’

एक आज्ञाकारी बालक की तरह वह मेरे साथ चल दी थी. हमारे बीच का गहरा सन्नाटा मौन था. उस के बारे में सबकुछ जानने के लिए मैं बेहद उतावला हो रहा था पर बातें शुरू करने का सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था.

मरकरी लाइट के पोल के पास नीचे हरी घास में हम दोनों ही एकदूसरे की मूक सहमति से बैठ गए. ठीक वैसे ही जैसे बचपन में बैठा करते थे. उस के  शरीर से छू कर आने वाली ठंडी हवा मुझे भीतर तक सुखद एहसास दे रही थी.

‘‘और कौनकौन है यहां तुम्हारे साथ?’’ मैं ने डूबते हुए दिल से पूछा.

‘‘कोई नहीं. बस मैं, भैयाभाभी और उन की एक 8 साल की बेटी. और तुम्हारे साथ कौन है?’’

‘‘बस, मैं ही हूं,’’ मेरा स्वर उदास हो गया.

बातोंबातों में उस ने बताया कि शादी के 10 साल बाद ही उस के पति एक सड़क दुर्घटना में चल बसे थे. एक बेटी है जो वनस्थली में पढ़ती है और वहीं होस्टल में रहती है. संयुक्त परिवार होने के नाते सबकुछ वैसा चला जो नहीं चलना चाहिए था. उस घर में रहना और ताने सहना उस की मजबूरी बन चुकी थी. पति के गुजर जाने के बाद कुछ दिन तो सहानुभूति में कट गए, बस उस के बाद सब ने अपनेअपने कर्तव्यों से इतिश्री मान ली.

पिछले साल बेटी के होस्टल जाने के बाद थोड़ी राहत सी महसूस की पर मन बहुत ही उदास और अकेला हो गया. जिंदगी की लड़ाइयां कितनी भयंकर होती हैं, मन बहुत उदास होता है तो कुछ दिनों के लिए यहां चली आती हूं. सच, बहुत कुछ सहा है मैं ने.’’ इतना कह कर वह बिलखती रही और मैं पाषण बना चुपचाप उस का रुदन सुनता रहा. मेरे मन में इस इच्छा ने बारबार जन्म लिया कि किसी न किसी बहाने उसे स्पर्श करूं, उस को सीने से लगाऊं, उस के लंबे केशों को सहला कर उसे चुप करा दूं पर शुरू से ही संकोची स्वभाव का होने के कारण कुछ भी न कर पाया.

मेरी आंखें भर आईं. मैं मुंह दूसरी तरफ कर के सुबकने लगा. एक लंबी ठंडी सांस ले कर मैं ने कहा, ‘‘पता नहीं यह संयोग है कि तुम्हें एक बार फिर से  देखने की हसरत पूरी हो गई.’’

बातों का क्रम बदलते हुए उस ने अपनी आंखों को पोंछा और बोली, ‘‘तुम ने अपने बारे में तो कुछ बताया ही नहीं.’’

‘‘मेरे पास तुम्हारे जैसा बताने लायक तो कुछ नहीं है,’’ मैं ने कहा तो गहरे उद्वेग के साथ कही गई मेरी बातों में छिपी वेदना को उस ने महसूस किया और मेरा हाथ जोर से दबा कर सबकुछ कह कर मन हलका करने का संकेत दिया.

‘‘अपने से कहीं ऊंचे स्तर के परिवार में मेरा विवाह हो गया. पत्नी के स्वछंद एवं स्वतंत्र होने की जिद ने मुझे डंस लिया. अत्यधिक धनसंपदा ने भी इस को मुझ से दूर ही रखा. बातबात पर झगड़ कर मायके जाना और मायके वालों का मेरी पत्नी पर वरदहस्त, कुल मिला कर हमारी बीच की दूरियां बढ़ाता ही रहा. वह चाहती थी कि मैं घरजमाई बन कर हर ऐशोआराम की वस्तु का उपभोग करूं मगर मेरे जमीर को यह मंजूर नहीं था. 1-2 बार मेरे मातापिता उसे मनानेसमझाने भी गए पर उन्हें तुच्छ एवं असभ्य कह कर उस ने बेइज्जत किया. फिर मैं वहां नहीं गया.

 

सपना चौधरी के इस गाने से क्यों है नाराजगी?

सपना चौधरी हरियाणवी डांसर हैं साथ ही बिग बौस में भी नजर आ चुकी हैं. एक वक्त ऐसा था जब सपना को एक स्टेज शो के लिए मात्र तीन हजार रुपये ही मिलते थे और एक वक्त आज का है जब सपना को मुह मांगी कीमत मिलती है..शायद ये उनका अंदाज और उनकी मुस्कान का ही कमाल है जिसने सपना चौधरी को बहुत ही कम समय में उंचाइयों तक पहुंचा दिया,नेम और फेम हांसिल किया है. चर्चे तो तब भी हुए थे जब सपना चौधरी बीजेपी में शामिल हुई थीं.कहा जाता रहा है कि सपना चलीं नेता बनने लेकिन सपना एक कलाकार हैं और वो क्या पहनेंगी,क्या करेंगी और कैसे भक्ति करेंगी इस बात का फैसला भला ये साधु-संत कैसे कर सकते हैं?

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उनकी अपनी भक्ति है वो चाहे जैसे अपनी भक्ति कर सकते हैं लेकिन किसी कलाकार की कला को गलत कहना या उस पर टिप्पणी करना कहीं से भी सही नहीं लगता है. आप ही बताइए भला कौन सा सपना कम कपड़ों में नाचती हैं? आपको बता दूं कि “भोला नाचे जिग-जैक” सांन्ग में सपना के वेस्टर्न कपड़ों पर सवाल उठाने के साथ-साथ इस गाने की लिरिक्स पर भी सवाल उठाया है साधु-संतों ने जबकि वेस्टर्न कपड़े होने के बावजूद भी कहीं से भी वल्गर्नेस नहीं झलकती है. सपना पर अक्सर ही कोई न कोई कंट्रोवर्सी होती रहती है. कभी उनके स्टेज शो को लेकर…कभी उनके गानों को लेकर,बिग बॉस में भी काफी हंगामें  हुए हैं साथ ही नेता गिरी करने निकली सपना तब भी ट्रोल हो गईं,जब उन्होंने बीजेपी पार्टी को ज्वाइन किया. सपना के आज कल बहुत से नए गाने आए हैं.

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जिनमें ये सपना का नया अवतार है और ये अवतार अब साधु-संतों को नागवार गुजरा है और इसके चलते ही साधुओं ने सपना का करैक्टर सर्टिफिकेट सेट कर दिया. आज सपना के पास नेम-फेम के साथ इज्जत भी है…वो कई इंटरव्यू दे चुकी हैं और अपनी लाइफ को अपने ही अंदाज में जीने वाली महिला हैं. लेकिन शायद कुछ लोगों को उनकी निजी जिंदगी में कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट है. हालांकि सपना के इस नए गाने से भले ही साधु-संत नाराज हों लेकिन न्यू जेनरेशन को सपना का ये गाना और अंदाज दोनों ही भा रहा है.इस गाने को यूट्यूब पर काफी बार देखा जा चुका है और उतने ही लाइक और पॉजिटिव कमेंट भी मिल रहे हैं,लेकिन सपना की ये कंट्रोवर्सी आगे कहां तक जाएगी ये कहना थोड़ा मुश्किल है.

32 साल की हुई Taapsee Pannu, देखें उनकी हौट फोटोज

तापसी पन्नू अपने एक्टिंग से आज बौलीवुड के शिखर पर हैं. साउथ फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली तापसी की मेहनत और जज्बे के कारण ही वो बहुत ही कम समय में सभी की पहली पसंद बन गई हैं. इस बौलीवुड क्वीन का आज 32वां BIRTHDAY हैं. पूरा बौलीवुड आज तापसी को विश कर रहा हैं. आपको जानकर हैरानी होगी की तापसी पन्नू फिल्मों में आने से पहले सौफ्टवेयर प्रोफेशनल थी. जी हां तापसी पन्नू सौफ्टवेयर इंजीनियर भी हैं. आज तापसी के BIRTHDAY पर हमारी इस खास रिपोर्ट में आप उनके बारे में कुछ अलग जानेंगे.

पिंक फिल्म से मिली पहचान

तापसी ने वैसे तो अपने बौलीवुड कैरियर की शुरुआत फिल्म “चश्में बद्दूर” से की थी पर उनको असल पहचान  फिल्म “पिंक” से मिली. इस फिल्म में तापसी की एक्टिंग स्किल की जमकर तारीफ हुई. उनकी इंटेन्स एक्टिंग के चलते लोग उनके फैन हो गए. इसके बाद तापसी बौलीवुड में अपनी अलग एक्टिंग स्टाइल से आगे बढ़ती चली गई.  “नाम शबाना”, “मुल्क”, “सूरमा” और जल्द ही सिनेमा घरों में आने वाली फिल्म “ मिशन मंगल” कुछ ऐसी ही फिल्में हैं.

 

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Bawwwws! #GameOver #Promotions

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Brand new day with the same old smile on my face…. life is good 😊

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अलग अलग भाषाओं में कर चुकी हैं काम

तापसी पन्नू सिर्फ हिन्दी सिनेमा ही नहीं बल्कि वो कई भाषाओं में फिल्म कर चुकी हैं. तापसी ने तेलुगु, तमिल, मलयालम और हिन्दी फिल्मों में काम किया है. तापसी ने एक्टर धनुष के साथ तमिल फिल्म “आडूकलाम” से डेब्यू किया था.

इंजीनियरिंग से बौलीवुड तक का सफर

तापसी पढ़ाई में काफी होशियर थी. अपने शुरुआती दिनों में तापसी की पढ़ाई “जय माता कौर पब्लिक स्कूल अशोक विहार” से हुई. जहां एक और स्टूडेंट मैथ जैसे सब्जेक्ट से भागते है वही तापसी को मैथ से काफी लगाव था. वो मैथ को काफी पसंद करती थीं. उसके बाद उन्होंने “गुरु तेग बहादुर इंस्टिट्यूट औफ टेक्नोलौजी” से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया. तापसी का मौडलिंग में बहुत मन लगता था जिसके कारण उन्होंने अपना काम बीच में ही छोड़ दिया और फिल्मी दुनिया में आने के लिए तैयारी शुरु कर दी.

 

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Bedazzled ! #HTStyleAwards2019

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क्लासिकल डांस में ट्रेन्ड हैं तापसी

बौलीवुड फिल्मों में तो तापसी के डांस मूव्स के सभी दिवाने पर क्या आप जानते की तापसी को बचपन से ही डांसिंग का भूत सवार था. तापसी जब 4th क्लास में थी तब से ही कत्थक और भरतनाट्यम सीखने लगी और जिसे सीखने में करीब आठ साल लग गए थे.

 

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Be A Girl With A Mind, A Woman With Attitude, And A Lady With Class. #HappyWomensDay ❤️ 📷: @toranjkayvon

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एक्टिंग से पहले तापसी करती थी मौडलिंग  

तापसी ने बहुत ही छोटी उम्र में एक मौडल के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था. कौलेज के दिनों में ही तापसी कई बड़े ब्रैंड जैसे रिलायंस, पीवीआर और पैंटालून के लिए मौडलिंग कर चुकी हैं. इसके लिए तापसी ने 2008 में “पैंटालून फेमिना मिस फ्रेश फेस” और “साफी फेमिना मिस ब्यूटीफुल स्किन” के रूप में  कई खिताब जीते हैं.

हमारी ओर से तापसी पन्नू को HAPPY BIRTHDAY ….

बौयफ्रेंड के साथ छट्टियां बिता रही है फरहान अख्तर की “साली”

टीवी के सबसे चर्चित चहरे में से एक करन कुंद्रा इन दिनों सोशल मीडिया में काफी एक्टिव नजर आ रहे हैं. अपने कपल गौल को फैंस के साथ शेयर करने वाले करन ने अपनी गर्लफ्रेंड अनुषा दांडेकर के साथ कुछ फोटोज शेयर कि है जिसे अनुषा ने भी अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट की हैं. बता दे की अनुषा, शिबानी दांडेकर की बहन है. शिबानी बौलीवुड स्टार फरहान अख्तर को डेट कर रही है. हाल ही में दोनों की फोटोज भी सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही थी. अनुषा दांडेकर और करन कुंद्रा एक दूसरे को लम्बे समय से डेट कर रहे है. शेयर की फोटोज में दोनों की कैमिस्ट्री काफी अच्छी दिख रही हैं.

वेकेशन पर है ये क्यूट कपल

अनुषा और करन अपने हेक्टिक शेड्यूल से समय निकालकर एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताने के लिए वेकेशन पर गए थे. दोनों एक दूसरे का साथ पाने के लिए कोई ना कोई बहाना ढूढ ही लेते है. अनुषा अपने वेकेशन के दौरान करन की बांहों में आराम फरमाती हुई नजर आई. दोनों को इस समय काफी रोमांटिक अंदाज में देखा गया.

 

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I’m just going to leave this right here… ❤️

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समुंदर से है खास लगाव

अनुषा के साथ-साथ करन को समुंदर किनारे टाइम स्पेंड करना काफी पसंद है. रेत पर बैठकर समुंदर की धीमी-धीमी लहरों के शोर को मगन होकर सुन रहे है. बता दे इन दिनों करन और अनुषा एमटीवी के मशहूर रिएलिटी शो लव स्कूल में बतौर जज नजर आते है. इस शो में अनुषा और करन कंटेस्टेंट्स को खूब टिप्स देते हुए दिखाई देते है.

 

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Don’t miss tonight’s episode of #Loveschool S4 at 7pm only on @mtvindia @vjanusha aur kabhi bhi @voot par @endemolshineind

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फैंन फौलोविंग में कोई जवाब नहीं

करन और अनुषा की तस्वीरों को वायरल होने में बिल्कुल भी समय नहीं लगता है क्योंकि यहां पर उनके लाखों-करोड़ों फैंस है. यहां तक की दोनों के नाम पर फैंस ने कई फैन क्लब भी बना दिए है. अकेले इंस्टाग्राम पर करन के 2.1 मिलियन वही अनुषा के 1.2 मिलियन फौलोवर्स हैं.

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