क्यूट अंदाज में दिखीं हिना खान, फोटोज हुई Viral

हमेशा सुर्खियों में  रहने वाली टीवी एक्ट्रेस हिना खान हमेशा फैंस के लिए कुछ नया लेकर आती हैं फिर वो चाहे उनकी लाइफ की नई अपडेट हो या फिर उनके नये काम वो हमेशा सोशल मीडिया पर अप टू डेट रहती है जिसके चलते फैंस उनसे काफी कनेक्ट फील करते है. इसी के साथ ही हिना ने कुछ घंटे पहले ही अपनी क्यूट फोटोज इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर की जिसे कुछ ही घंटों में फैंस ने कमेट्स भर दिया. हिना इन फोटोज काफी क्यूट लग रही हैं.

फैशन दीवा है हिना खान

हिना को ऐसे ही फैशन दीवा नहीं कहा गया है. आप सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों को गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि हर समय उन्हें स्टाइलिश अंदाज में रहना पसंद है. इन फोटोज को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है कि हिना एक डौल है. हिना का औफ बन वाला अंदाज फैंस को काफी पसंद आ रहा है. हिना इन फोटोज में काफी बब्ली लग रही हैं.

 

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Imperfectly Perfect what say 😉

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Life is so much better when you are laughing… 😬😬

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Be careful with that look you give, it steals heart beats🥰 She blushingly said☺️ #NoMkup #MorningPhotography

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कैनरा फ्रेंडली है हिना

हिना को अच्छे से पता है कि कैमरे के साथ किस तरह से खेलना है. हिना ने आसमान की ओर देखते हुए भी कई फोटोज क्लिक करवाई. इन पोटोज में हिना की  हेयरस्टाइल काफी अच्छी लग रही हैं.  आपको बता दे की हिना को फोटो क्लिक करवाना काफी पसंद है और उनकी खुशी को देखकर साफ लग रहा है कि इस फोटोशूट को करवाते हुए उन्हें कितना मजा आया.

‘कसौटी जिंदगी की-2′ की “प्रेरणा” की हौट मोनोकिनी फोटोज Viral

टीवी के सबसे पसंदिदा सीरियल ‘कसौटी जिंदगी-2’ में “प्रेरणा” का रोल कर रही एक्ट्रेस एरिका फर्नांडीस ने करोंड़ों दिलों में अपनी जगह बना ली है. उनकी एक्टिंग के चलते वो सभी की पहली पसंद बन गई हैं. ‘कसौटी जिंदगी की-2’ के पहले “वो कुछ रंग प्यार के ऐसे भी” भी नजर आ चुकी है. एरिका सोशल मीडिया में भी खासा पौपुलर है, अकेले इंस्टाग्राम पर उनके 2.1 मिलियन फौलोवर्स हैं. हाल ही में जब एरिका ने अपनी मोनोकिनी फोटोज शेयर की तो फैंस के कमेंट की बहार आ गई.

काले मोनोकिनी में आई नजर

एरिका की इन फोटोज में वो काले रंग की मोनोकिनी जिसमें वो काफी हौट लग रही हैं. एरिका ने स्वीमिंग पूल में जमकर मस्ती की. काले रंग की मोनोकिनी में एरिका ने इस कहर ढाया कि हर कोई उनका दीवाना बन गया है. एरिका ने इस दौरान स्वीमिंग पूल के अंदर खुद के साथ खूब समय बिताया और ढेर सारी फोटोज भी क्लिक करवाई. एरिका ने अपनी इन फोटोज को शेयर करते हुए काफी थौटफुल कैप्शन डाला है. एरिका ने कैप्शन में लिखा है कि ‘जिंदगी के पास रिमोट नहीं है…इसे खुद से ही बदलना पड़ता है.’

 

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फैंस ने किया खासा पसंद

एरिका की फोटोज को फैंस काफी पसंद कर रहे है. कुछ ही घंटे फैंस ने कमेंट्स की बाहार लगा दी हैं. इन फोटोज पर हजारों लाइक्स भी आ चुके है.

 

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✨ #ejf #ericafernandes #instagram #fashion #instafashion #neetalulla #mussoorie #jwmarriott

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Wattababy #waterbaby #pooltime #ejf #summervibes #westin

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ब्रेकअप होने के बाद…

कुछ दिन पहले ही खबर आई थी की एरिका और पार्थ समथान का ब्रेकअप हो गया है जिसके चलते है वो काफी चर्चा में रही थी पर कुछ दिन पहले दोनों ने नच बलिए 9 में हिस्सा लिया. इस शो में दोनों की कैमिस्ट्री फैंस को काफी पसंद आ रही हैं.

मुझे नहीं जाना

लेखक रंजना शर्मा

शाम 7 बजे जब फोन की घंटी बजी तब ड्राइंगरूम में अलका, उस की मां गायत्री और पिता ज्ञानप्रकाश उपस्थित थे. फोन पर वार्तालाप अलका ने किया.

अलका की ‘हैलो’ के जवाब में दूसरी तरफ से भारी एवं कठोर स्वर में किसी पुरुष ने कहा, ‘‘मुझे अलका से बात करनी है.’’

‘‘मैं अलका ही बोल रही हूं. आप कौन?’’

‘‘मैं कौन हूं इस झंझट में न पड़ कर तुम उसे ध्यान से सुनो जो मैं तुम से कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहना चाहते हैं आप?’’

‘‘यही कि अपने पतिदेव को तुम फौरन नेक राह पर चलने की सलाह दो, नहीं तो खून कर दूंगा मैं उस का.’’

‘‘ये क्या बकवास कर रहे हो.’’

‘‘मैं बकवास न कर के तुम्हें चेतावनी दे रहा हूं. अलका मैडम,’’ बोलने वाले की आवाज क्रूर हो उठी, ‘‘अगर तुम्हारे पति राजीव ने फौरन मेरे दिल की रानी कविता पर डोरे डालने बंद नहीं किए तो जल्दी ही उस की लाश को चीलकौवे खा रहे होंगे.’’

‘‘ये कविता कौन है मैं नहीं जानती… और न ही मेरे पति का किसी से इश्क का चक्कर चल रहा है. आप को जरूर कोई गलतफहमी…’’

‘‘शंकर उस्ताद को कोई गलतफहमी कभी नहीं होती. मैं ने पूरी छानबीन कर के ही तुम्हें फोन किया है. अगर तुम अपने आप को विधवा की पोशाक में नहीं देखना चाहती हो तो उस मजनू की औलाद राजीव से कहो कि वह मेरी जान कविता के साए से भी दूर रहे.’’

अलका कुछ और बोल पाती इस से पहले ही फोन कट गया.

अपने मातापिता के पूछने पर अलका ने घबराई आवाज में वार्तालाप का ब्योरा उन्हें सुनाया.

गायत्री रोने ही लगीं. ज्ञानप्रकाश ने गुस्से से भर कर कहा, ‘‘तो राजीव इस कविता के चक्कर में उलझा हुआ है. मैं भी तो कहूं कि साल भर अभी शादी को हुआ नहीं और 2 महीने से पत्नी को मायके में छोड़ रखा है. जरूर उस ने इस कविता से गलत संबंध बना लिए हैं.’’

‘‘उस अकेले को दोष मत दो, जी,’’ गायत्री ने सुबकते हुए कहा, ‘‘दामादजी ने तो दसियों बार इस मूर्ख के सामने वापस लौट आने की विनती की होगी, लेकिन इस की जिद के आगे उन की एक न चली.’’

‘‘अलका को कुसूरवार मत कहो. हमारी बेटी ने राजीव से प्रेमविवाह किया है. उसे सुखी रखना उस का कर्तव्य है. अगर अलका अलग घर में जाने की जिद पर अड़ी हुई है तो वह मेरी समझ से कुछ गलत नहीं कर रही,’’ कह कर ज्ञानप्रकाश अलका की तरफ देखने लगे.

‘‘पापा, आप ठीक कह रहे हैं. मैं ने नौकरानी बनने के लिए शादी नहीं की थी राजीव से,’’ अलका ने अपने मन की बात फिर दोहराई.

‘‘अलका, तुम राजीव को फोन कर के इसी वक्त यहां आने के लिए कहो. ऐसी डांट पिलाऊंगा मैं उसे कि इश्क का भूत फौरन उस के सिर से उतर कर गायब हो जाएगा,’’ ज्ञानप्रकाश की आंखों में चिंता व क्रोध के मिलेजुले भाव नजर आ रहे थे.

अलका राजीव को फोन करने के लिए उठ खड़ी हुई.

करीब घंटे भर बाद राजीव अपनी ससुराल पहुंचा. उस के पिता ओंकारनाथ और मां कमलेश भी उस के साथ आए थे. उन तीनों के चेहरों पर चिंता और तनाव के भाव साफ झलक रहे थे.

कुछ औपचारिक वार्तालाप के बाद ओंकारनाथ ने परेशान लहजे में ज्ञानप्रकाश से कहा, ‘‘बहू से फोन पर मेरी भी बात हुई थी. मुझे लगा कि वह किसी बात को ले कर बहुत परेशान है. इसलिए राजीव के साथ उस की मां और मैं ने भी आना उचित समझा.’’

‘‘ये अच्छा ही हुआ कि आप दोनों साथ आए हैं राजीव के. सारी बात आप दोनों को भी मालूम होनी चाहिए. शाम को 7 बजे हमारे यहां एक फोन आया था. फोन करने वाले ने हमें राजीव के बारे में बड़ी गलत व गंदी तरह की सूचना दी है,’’ ज्ञानप्रकाश ने नाराज अंदाज में राजीव को घूरना शुरू कर दिया था.

‘‘फोन किसी शंकर नाम के आदमी का था?’’ कमलेश के इस सवाल को सुन कर अलका और उस के मातापिता बुरी तरह से चौंक उठे.

‘‘आप को कैसे मालूम पड़ा उस का नाम, बहनजी?’’ गायत्री अचंभित हो उठीं.

‘‘क्योंकि उस ने शाम 6 बजे के आसपास हमारे यहां भी फोन किया था. राजीव और उस के पिता घर पर नहीं थे, इसलिए मेरी ही उस से बातें हो पाईं.’’

‘‘क्या कहा उस ने आप से?’’

‘‘उस ने आप से क्या कहा?’’ कमलेश ने उलट कर पूछा.

गायत्री के बजाय ज्ञानप्रकाश ने गंभीर हो कर उन के प्रश्न का जवाब दिया, ‘‘बहनजी, शंकर ऐसी बात कह रहा था जिस पर विश्वास करने को हमारा दिल तैयार नहीं है, लेकिन वह बहुत क्रोध में था और राजीव को गंभीर नुकसान पहुंचाने की धमकी भी दे रहा था. इसलिए राजीव से हमें पूछताछ करनी ही पड़ेगी.’’

‘‘क्या वह किसी कविता नाम की लड़की से मेरे अवैध प्रेम संबंध होने की बात आप को बता रहा था?’’ राजीव गहरी उलझन और परेशानी का शिकार नजर आ रहा था.

अलका ने उस के चेहरे पर

पैनी नजरें गड़ा कर कहा, ‘‘हां,

कविता की ही बात कर रहा था वह. कौन है ये कविता?’’

‘‘मैं तो सिर्फ एक कविता को ही जानता हूं, जो मेरे विभाग में मेरे साथ काम करती है. तुम्हें याद है शादी के बाद हम एक रात नीलम होटल में डिनर करने गए थे. तब एक लंबी सी लड़की अपने बौयफैं्रड के साथ वहां आई थी. मैं ने तुम्हें उस से मिलाया था, अलका.’’

अलका ने अपनी सास की तरफ मुड़ कर कहा, ‘‘मम्मी, मैं ने आप से उस लड़की का जिक्र घर आ कर किया था. वह राजीव से बहुत खुली हुई थी. उसे ‘यार, यार’ कह कर बुला रही थी. वह अपने बौयफ्रैंड के साथ न होती तो राजीव से उस के गलत तरह के संबंध होने का शक मुझे उसी रात हो जाता. मेरा दिल कहता है कि राजीव जरूर उस के रूपजाल में फंस गया है और उस के पुराने प्रेमी शंकर ने क्रोधित हो कर उसे जान से मारने की धमकी दी है,’’ बोलते- बोलते अलका की आंखें डबडबा आईं, चेहरा लाल हो चला.

‘‘बेकार की बात मुंह से मत निकालो, अलका,’’ राजीव को गुस्सा आ गया, ‘‘घंटे भर से अपने मातापिता को यह बात समझाते हुए मेरा मुंह थक गया है कि कविता से मेरा कोई चक्कर नहीं चल रहा है. अब तुम भी मुझ पर शक कर रही हो. क्या तुम मुझे चरित्रहीन इनसान समझती हो?’’

‘‘अगर दाल में कुछ काला नहीं है तो ये शंकर क्यों जान से मार देने की धमकी तुम्हें दे रहा है?’’ अलका ने चुभते स्वर में पूछा.

‘‘उस का दिमाग खराब होगा. वह पागल होगा. अब मैं कैसे जानूंगा कि वह क्यों ऐसी गलतफहमी का शिकार हो गया है?’’ राजीव चिढ़ उठा.

‘‘अगर वह सही कह रहा हो तो तुम कौन सा अपने व कविता के प्रेम की बात सीधेसीधे आसानी से कुबूल कर लोगे?’’ अलका ने जवाब दिया.

‘‘तब मेरे पीछे जासूस लगवा कर मेरी इनक्वायरी करा लो, मैडम,’’ राजीव गुस्से से फट पड़ा, ‘‘मैं दोषी नहीं हूं, लेकिन मैं एक सवाल तुम से पूछना चाहता हूं. तुम 2 महीने से मुझ से दूर यहां मायके में जमी बैठी हो. ऐसी स्थिति में अगर मैं किसी दूसरी लड़की के चक्कर में पड़ भी जाता हूं तो तुम्हें परेशानी क्यों होनी चाहिए? जब तुम्हें मेरी फिक्र ही नहीं है तो मैं कुछ भी करूं, तुम्हें क्या लेनादेना उस से?’’

‘‘मेरा दिल कह रहा है कि तुम ने मुझ पर लौटने का दबाव बनाने के लिए ही शंकर वाला नाटक किया है. लेकिन तुम मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. जब तक तुम मेरे मनोभावों को समझ कर उचित कदम नहीं उठाओगे तब तक मैं तुम्हारे पास नहीं लौटूंगी,’’ अलका झटके से उठ कर अपने कमरे में चली गई.

चायनाश्ता ले कर मेहमान अपने घर लौटने लगे. चलतेचलते ओंकारनाथ ने स्नेह भरा हाथ अलका के सिर पर रख कर कहा, ‘‘बहू, मैं ने कुछ प्रापर्टी डीलरों से कह दिया है तुम दोनों के लिए किराए का मकान ढूंढ़ने के लिए. तुम दोनों का साथसाथ सुखी रहना सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. किराए का मकान मिलने तक अगर तुम घर लौट आओगी तो हम सब को बहुत खुशी होगी.’’

जवाब में अलका तो खामोश रही लेकिन गायत्री ने कहा, ‘‘ये आगामी इतवार को पहुंच जाएगी आप के यहां.’’

मेहमानों के चले जाने के बाद अलका ने कहा, ‘‘मां, एक तो मुझे इस कविता के चक्कर की तह तक पहुंचना है. दूसरे, अगर मैं राजीव के साथ रहूंगी तो उस पर मकान जल्दी ढूंढ़ने के लिए दबाव बनाए रख सकूंगी. इन बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ससुराल लौट रही हूं.’’

शुक्रवार की दोपहर में एक अजीब सा हादसा घटा. अलका अपने कमरे में आराम कर रही थी कि खिड़की का कांच टूट कर फर्श पर गिर पड़ा. वह भाग कर ड्राइंगरूम में पहुंची. तभी उस के पिता ने घबराई हालत में बाहर से बैठक में प्रवेश किया और अलका को देख कर कांपती आवाज में उस से बोले, ‘‘शंकर दादा के 2 गुंडों ने पत्थर मार कर शीशा तोड़ा है. पत्थर पर कागज लिपटा है…उसे ढूंढ़. उस में हमारे लिए संदेश लिख कर भेजा है शंकर दादा ने.’’

पत्थर पर लिपटे कागज में टाइप किए गए अक्षरों में लिखा था :

‘अलका मैडम,

अपने पति राजीव की करतूतों का फल भुगतने को तैयार हो जाओ. आज शीशा तोड़ा गया है, कल उस का सिर फूटेगा. कविता सिर्फ मेरी है. उस पर गंदी नजर डालने वाले के पूरे खानदान को तबाह कर दूंगा मैं, शंकर दादा.’

पत्र पढ़ने के बाद गायत्री, ज्ञानप्रकाश व अलका के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पूरी घटना की खबर दोपहर में ही ओंकारनाथ के परिवार तक भी पहुंच गई. खबर सुन कर सभी मानसिक तनाव व चिंता का शिकार हो गए. सब से ज्यादा मुसीबत का सामना राजीव को करना पड़ा. हर आदमी उसे कविता से अवैध प्रेम संबंध रखने का दोषी मान रहा था. वह सब से बारबार कहता कि कविता से उस का कोई गलत संबंध नहीं है, पर कोई उस की बात पर विश्वास करने को राजी न था.

रविवार की सुबह अलका अपने पिता के साथ ससुराल पहुंच गई.

रात को शयनकक्ष में पहुंच कर उन दोनों के बीच बड़ी गरमागरमी हुई. राजीव अपने को दोषी नहीं मान रहा था और अलका का कहना था कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है जो शंकर उस्ताद यों गुस्से से फटा जा रहा है.

आखिरकार राजीव ने अलका को मना ही लिया. तभी उस ने अपनेआप को राजीव की बांहों के घेरे में कैद होने

दिया था.

पूरा एक सप्ताह शांति से गुजरा और फिर शंकर दादा की एक और हरकत ने उन की शांति भंग कर डाली. किसी ने रात में उस की मोटरसाइकिल की सीट को फाड़ डाला था. हैंडिल पर लगे शीशे फोड़ दिए थे. ऊपर से उस पर कूड़ा बिखेरा गया था.

उस के हैंडिल पर एक चिट लगी हुई थी जिस पर छपा था, ‘अब भी अपनी जलील हरकतों से बाज आ जा, नहीं तो इसी तरह तेरा पेट फाड़ डालूंगा.’

राजीव चिट उखाड़ कर उसे गायब कर पाता उस से पहले ही ओंकारनाथ वहां पहुंच गए. उन के शोर मचाने पर पूरा घर फिर वहां इकट्ठा हो गया. जो भी राजीव की तरफ देखता, उस की ही नजरों में शिकायत व गुस्से के भाव होते.

शंकर दादा का खौफ सभी के दिल पर छा गया. दिनरात इसी विषय पर बातें होतीं. राजीव को उस के घर व ससुराल का हर छोटाबड़ा सदस्य चौकन्ना रहने की सलाह देता.

शंकर दादा का अगला कदम न जाने क्या होगा, इस विषय पर सोचविचार करते हुए सभी के दिलों की धड़कनें बढ़ जातीं.

लगभग 10 दिन बिना किसी हादसे के गुजर गए. लेकिन ये खामोशी तूफान के आने से पहले की खामोशी सिद्ध हुई.

एक रात राजीव और अलका 10 बजे के आसपास घर लौटे. एक मारुति वैन उन के घर के गेट के पास खड़ी थी, इस पर उन दोनों ने ध्यान नहीं दिया.

राजीव की मोटरसाइकिल के रुकते ही उस वैन में से 3 युवक निकल कर बड़ी तेज गति से उन के पास आए और दोनों को लगभग घेर कर खड़े हो गए.

‘‘क…कौन हैं आप लोग? क्या चाहते हैं?’’ राजीव की आवाज डर के मारे कांप उठी.

‘‘अपना परिचय ही देने आए हैं हम तुझे, मच्छर,’’ बड़ीबड़ी मूंछों वाले ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘और साथ ही साथ सबक भी सिखा कर जाएंगे.’’

फिर बड़ी तेजी व अप्रत्याशित ढंग से एक अन्य युवक ने अलका के पीछे जा कर एक हाथ से उस का मुंह यों दबोच लिया कि एक शब्द भी उस के मुंह से निकलना संभव न था. बड़ीबड़ी मूंछों वाले ने राजीव का कालर पकड़ कर एक झटके में कमीज को सामने से फाड़ डाला. दूसरे युवक ने उस के बाल अपनी मुट्ठी में कस कर पकड़ लिए.

‘‘हमारे शंकर दादा की चेतावनी को नजरअंदाज करने की जुर्रत कैसे हुई तेरी, खटमल,’’ मूंछों वाले ने आननफानन में 5-7 थप्पड़ राजीव के चेहरे पर जड़ दिए, ‘‘बेवकूफ इनसान, ऐसा लगता है कि न तुझे अपनी जान प्यारी है, न अपने घर वालों की. कविता भाभी पर डोरे डालने की सजा के तौर पर क्या हम तेरी पत्नी का अपहरण कर के ले जाएं?’’

‘‘मैं सौगंध खा कर कहता हूं कि कविता से मेरा कोई प्रेम का चक्कर नहीं चल रहा है. आप मेरी बात का विश्वास कीजिए, प्लीज,’’ राजीव उस के सामने गिड़गिड़ा उठा.

2 थप्पड़ और मार कर मूंछों वाले ने क्रूर लहजे में कहा, ‘‘बच्चे, आज हम आखिरी चेतावनी तुझे दे रहे हैं. कविता भाभी से अपने सारे संबंध खत्म कर ले. अगर तू ने ऐसा नहीं किया तो तेरी इस खूबसूरत बीवी को उठा ले जाएंगे हम शंकर दादा के पास. बाद में जो इस के साथ होगा, उस की जिम्मेदारी सिर्फ तेरी होगी, मजनू की औलाद.’’ फिर उस ने अपने साथियों को आदेश दिया, ‘‘चलो.’’

एक मिनट के अंदरअंदर वैन राजीव व अलका की नजरों से ओझल हो गई. वैन का नंबर नोट करने का सवाल ही नहीं उठा क्योंकि नंबर प्लेट पर मिट्टी की परत चिपकी हुई थी.

पूरे घटनाक्रम की जानकारी पा कर ज्ञानप्रकाश व ओंकारनाथ के परिवारों में चिंता और तनाव का माहौल बन गया. 3 दिन बाद अलका के मातापिता ने सब को रविवार के दिन अपने घर लंच पर आमंत्रित किया.

कुछ मीठा ले आने के लिए ज्ञानप्रकाश और ओंकारनाथ बाजार की तरफ चल दिए. रास्ते में ज्ञानप्रकाश ने तनाव भरे लहजे में अपने समधी से पूछा, ‘‘अलका कैसी चल रही है?’’

ओंकारनाथ ने मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. कल मैं ने राजीव से कहा कि जा कर वह मकान देख आओ जिस का पता प्रापर्टी डीलर ने बताया है. अलका ने मेरी बात सुन कर फौरन कहा कि वह किसी किराए के मकान में जाने की इच्छुक नहीं है. उस का ऐसा ‘मुझे नहीं जाना’ वाला कथन सुन कर मुझे अपनी मुसकान को छिपाना बहुत मुश्किल हो गया था दोस्त. हमारी योजना सफल रही है.’’

‘‘यानी कि अलका की अकेले रहने की जिद समाप्त हुई?’’ ज्ञानप्रकाश एकाएक प्रसन्न नजर आने लगे थे.

‘‘बिलकुल खत्म हुई. सुनो, हमारा कितना नुकसान हुआ है कुल मिला कर?’’ ओंकारनाथ ने जानना चाहा.

‘‘छोड़ो यार,’’ ज्ञानप्रकाश ने कहा, ‘‘मेरी बेटी अलका का जो खून सूख रहा होगा आजकल उस की कीमत क्या रुपयों में आंकी जा सकती है समधी साहब.’’

‘‘ज्ञानप्रकाश, हमतुम अच्छे दोस्त न होते तो अलका की अलग रहने की जिद से पैदा हुई समस्या का समाधान इतनी आसानी से नहीं हो पाता. अब बहू सब के बीच रह कर घरगृहस्थी चलाने के तरीके बेहतर ढंग से सीख जाएगी और चार पैसे भी जुड़ जाएंगे उन के पास,’’ ओंकारनाथ ने अपने समधी के कंधे पर हाथ रख कर अपना मत व्यक्त किया.

‘‘आप का लाखलाख धन्यवाद कि उस के सिर से अलग होने का भूत उतर गया,’’ ज्ञानप्रकाश ने राहत की गहरी सांस ली.

‘‘मुझे धन्यवाद देने के साथसाथ अपने दोस्त के बेटे को भी धन्यवाद दो,  जिस ने शंकर उस्ताद की भूमिका में ऐसी जान डाल दी कि उस की आवाज व हावभाव को याद कर के अलका के अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.’’

‘‘नाटकों में भाग लेने का उस का अनुभव हमारे खूब काम आया.’’

‘‘उस को हिदायत दे देना कि जो उस ने किया है हमारे कहने पर, उस की चर्चा किसी से न करे.’’

‘‘मेरे बेटे व बहू को अगर कभी पता लग गया कि उन की रातों की नींद उड़ाने वाला नाटक हमारे इशारे पर खेला गया था तो मेरा तो बुढ़ापा बिगड़ जाएगा. मैं कभी एक शब्द नहीं मुंह से निकालूंगा,’’ ओंकारनाथ ने संकल्प किया.

‘‘हम ने जो किया है, सब के भले को ध्यान में रख कर किया है, समधीजी. कांटे से कांटा निकल गया है. अब शंकर दादा गायब हो जाएंगे तो धीरेधीरे राजीव व अलका सामान्य होते चले जाएंगे. नतीजा अगर अच्छा निकले तो कुछ गलत कार्यशैली को उचित मानना समझदारी है,’’ ज्ञानप्रकाश की बात का सिर हिला कर ओंकारनाथ ने अनुमोदन किया और दोनों अपने को एकदूसरे के बेहद करीब महसूस करते हुए बाजार पहुंच गए.  द्य

मारिया

लेखक- पंकज धवन

दिल्ली का इंदिरागांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा. जहाज से बाहर निकल कर इस धरती पर पांव रखते ही सारे बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई. लगा यहां कुछ तो ऐसा है जो अपना है और बरबस अपनी तरफ खींच रहा है. यहां की माटी की सौंधीसौंधी खुशबू के लिए तो पूरे 2 साल तक तरसता रहा है.

ट्राली पर सामान लादे एअरपोर्ट से बाहर निकला. दर्शक दीर्घा में मेरी नजर चारों तरफ घूमने लगी. लंबी कतारों में खड़ी भीड़ में मैं अपनों को तलाश रहा था. मेरे पांव ट्राली के साथसाथ धीरेधीरे आगे बढ़ रहे थे कि पास से ही चाचू की आवाज आई.

मेरी नजर आवाज की ओर घूम गई.

‘‘अरे, नेहा तू?’’ मैं ने हैरानी से उस की ओर देखा.

‘‘हां, चाचू, इधर से आ जाइए. सभी लोग आए हुए हैं,’’ नेहा बोली.

‘‘सब लोग?’’ मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी. अपनों से मिलने के लिए मन एकदम बेचैन हो उठा. सामने दीदी, मांबाबूजी को देखा तो मन एकदम भावुक हो गया. मेरी आंखें छलछला आईं. मां ने कस कर मुझे अपने सीने में भींच लिया. भाभी के हाथ में आरती की थाली थी.

‘‘मारिया कहां है,’’ भाभी ने इधरउधर झांकते हुए पूछा.

‘‘भाभी, अचानक उस की तबीयत खराब हो गई इसलिए वह नहीं आ सकी. वैसे आखिरी समय तक वह एकदम आने को तैयार थी.’’

मेरा इतना कहना था कि भाभी का चेहरा उतर गया जिसे मैं ने बड़े करीब से महसूस किया.

‘‘हम लोग तो यह सोच कर यहां आए थे कि बहू को सबकुछ अटपटा न लगे. पर चलो…’’ कहतेकहते मां चुप हो गईं.

‘‘चलो, मारिया न सही तुम ही तिलक करा लो,’’ भाभी ने कहा तो मैं झेंप गया.

‘‘नहीं भाभी, मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता. सब लोग क्या सोचेंगे.’’

‘‘यही सोचेंगे न कि कितने प्यार से भाभी देवर का स्वागत कर रही है. आखिर हमारा भरापूरा परिवार है. भारतीय परंपराएं हैं…’’ बाबूजी बोले.

सच, ऐसे घर को तो मैं तरस गया था. सभी घर आ गए.

‘‘मारिया नहीं आई कोई बात नहीं, तू तो आ गया न,’’ मां ने कहा.

‘‘राहुल क्यों नहीं आता? आखिर अपना खून है, फिर बहन की शादी है. तब तक तो मारिया भी आ जाएगी क्यों बाबू…’’ भाभी ने चुहल की.

‘‘हां भाभी,’’ मैं ने यों ही टालने के लिए कह दिया. बातों का सिलसिला मारिया से आगे बढ़ ही नहीं रहा था फिर उठ कर अनमने मन से सोफे पर लेट गया और सोने का प्रयास करने लगा. तब तक भाभी चाय बना कर ले आईं.

मुझे ऐसे लेटा देख कर बोलीं, ‘‘भैया, आप बहुत थक गए होंगे. भीतर कमरे में चल कर लेट जाइए. बातें तो सुबह भी हो जाएंगी.’’

मेरी आंखों में नींद कहां. परिवारजनों का इतना स्नेह उस विदेशी लड़की के लिए जिस को मैं ने चुना था. मांबाबूजी कितने दिन मुझ से नाराज रहे थे. महीनों तक फोन भी नहीं किया था. आखिर मां ने ही चुप्पी तोड़ी और बेमन से ही सही सबकुछ स्वीकार कर लिया था. स्नेह को बटोरने के लिए वह नहीं थी जिस के लिए यह सबकुछ हुआ था. मुझे रहरह कर बीते दिन याद आने लगे.

मेरी कंपनी ने मुझे अनुभव और योग्यता के आधार पर यूनान भेजने का निर्णय लिया था. मैं भरसक प्रयास करता रहा कि मुझे वहां न जाना पड़े क्योंकि एक तो मुझे विदेशी भाषा नहीं आती थी दूसरे वहां भारतीय मूल के लोगों की संख्या नहीं के बराबर थी. अत: शाकाहारी भोजन मिलने की कोई संभावना न थी. मेरे स्थान पर कोई  और व्यक्ति न मिल पाने के कारण वहां जाना मेरी मजबूरी बन गई थी.

मुझे एथेंस आए 15 दिन हो चुके थे. खाने के नाम पर उबले हुए चावल, ग्रीक सलाद, फ्राई किए टमाटर और गोल सख्त डबलरोटी थी जिन को 15 दिनों से लगातार खा कर मैं पूरी तरह से ऊब चुका था.

भारतीय रेस्तरां मेरे आफिस से 20 किलोमीटर दूर एअरपोर्ट के पास था जहां हर रोज खाने के लिए जाना आसान नहीं था. मेरे आफिस वाले भी इस मामले में मेरी कोई ज्यादा मदद नहीं कर पाए क्योंकि मैं उन्हें ठीक से यह समझा नहीं पाया कि मैं शाकाहारी क्यों हूं.

एथेंस यूरोप का प्रसिद्घ टूरिस्ट स्थान होने के कारण लोग यहां अकसर छुट्टियां मनाने आते हैं. यही वजह है कि यहां के हर चौराहे पर, सड़क के किनारे रेस्तरां तथा फास्टफूड का काफी प्रचलन है. घंटों बैठ कर ठंडी ग्रीक कौफी पीना तथा भीड़ को आतेजाते देखना भी यहां का एक फैशन और लोगों का शौक है.

उस दिन मैं यहां के मशहूर फास्टफूड चेन ‘एवरेस्ट’ के बाहर बिछी कुरसियों पर बैठा वेटर के आने का इंतजार कर ही रहा था कि लालसफेद ड्रेस में लिपटी एक महिला वेटर ने आ कर मुझे मीनू कार्ड पकड़ाना चाहा.

मैं ने उसे देखते ही कहा, ‘मुझे यह कार्र्ड नहीं, बस, एक वेज पिज्जा और कोक चाहिए.’

‘आप कुछ नया खाना नहीं खाना चाहेंगे. कल भी आप ने खाने के लिए यही मंगाया था. यहां का चिकन सूप, क्लब सैंडविच…’

उस महिला वेटर की बात को काटते हुए मैं ने कहा, ‘माफ कीजिए, मैं सिर्फ शाकाहारी हूं.’

‘तो शाकाहारी में वेजचीज सैंडविच, नूडल्स, मैश पोटेटो, फ्रेंच फाइज क्यों नहीं खाने की कोशिश करते?’ वह मुसकरा कर बोलती रही और मैं उस का मुंह देखता रहा कि कब वह चुप हो और मैं ‘नो थैंक्स’ कह कर उस को धन्यवाद दूं्.

मेरे चेहरे को देख कर शायद उस ने मेरे दिल की बात जान ली थी. इसलिए और भीतर आर्डर दे कर मेरे पास आ कर खड़ी हो गई.

‘आप कहां से आए हैं?’

‘इंडिया से,’ मैं ने छोटा सा उत्तर दिया.

‘पर्यटक हैं? ग्रीस घूमने अकेले

ही आए हैं.’

‘नहीं, मैं यहां वास निकोलस में काम करता हूं और कुछ दिन पहले ही यहां आया हूं…और आप?’

‘मैं पढ़ती हूं. यहां पार्र्ट टाइम वेटर  का काम करती हूं, शाम को 4 से 10 तक.’

तब तक भीतर के बोर्ड पर मेरे आर्डर का नंबर उभरा और वह बातों का सिलसिला बीच में ही छोड़ कर चली गई. मैं ने महसूस किया कि यूरोप के बाकी देशों से यूनान के लोग ज्यादा सुंदर, हंसमुख और मिलनसार होते हैं. खाने के साथ यहां भी भारत की तरह पीने को पानी मिल जाता है जिस की कोई कीमत नहीं ली जाती.

उस ने बड़ी तरतीब से मेरी मेज पर कांटे, छुरियों और पेपर नेपकिन के साथ पिज्जा सजा दिया, जिसे देखते ही मेरा मन फिर से कसैला सा हो गया. न जाने क्यों मैं यहां की चीज की गंध को बरदाश्त नहीं कर पा रहा था.

‘क्या हुआ, ठीक नहीं है क्या?’ मेरे चेहरे के भावों को पढ़ते हुए वह बोली.

‘नहीं यह बात नहीं है. 5 दिन से लगातार जंक फूड खातेखाते मैं बोर हो गया हूं. यहां आसपास कोई भारतीय रेस्तरां नहीं है क्या?’

‘नहीं, पर एक और शाकाहारी भोजनालय है, हरे रामा हरे कृष्णा वालों का, एकदम शुद्घ शाकाहारी. अंडा और चाय भी नहीं मिलती वहां.’

‘वह कहां है?’ मैं ने बड़ी उत्कंठा से पूछा.

‘मुझे उस का पता तो नहीं पर जगह मालूम है. आज मेरी ड्यूटी के बाद तक रुको तो मैं तुम को ले चलूंगी या फिर कल 4 बजे से पहले आना.’

‘मैं कल आऊंगा. क्या नाम है तुम्हारा?’ मैं ने पूछा.

‘मारिया.’

‘और मेरा राहुल.’

इस तरह हमारे मिलने का सिलसिला शुरू हुआ. अब हर शनिवार को हम साथ घूमते और खाते. वह सालोनीकी की रहने वाली थी जो एथेंस से 500 किलोमीटर दूर था. उस के पिता का वहां सिलेसिलाए वस्त्रों का स्टोर था. वह वहां पर अपनी एक सहेली के साथ किराए पर कमरा ले कर रहती थी जिस का खर्च दोनों ही मिलजुल कर वहन करती थीं.

एक दिन बातोंबातों में मारिया ने बताया कि उस के पिता भी मूलत: भारतीय हैं जो बरसों पहले यहां आ कर बस गए थे. परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई क्रिस्टोस भी है जो उन के पास ही रहता है. अपने पिता से उस ने भारत के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था. उस की मां उस के पिता की भरपूर प्रशंसा करती हैं और कहा करती हैं कि भारतीय व्यक्ति से विवाह कर के मैं ने कोई भूल नहीं की. परिवार के प्रति संजीदा, व्यवहारकुशल, बेहद केयरिंग पति कम से कम यूनानी लोगों में तो कम ही होते हैं.

इस बार एकसाथ 4 छुट्टियां मिलीं तो मारिया बेहद खुश हुई और कहने लगी, ‘चलो, तुम को सैंतारीनी द्वीप ले चलती हूं. यहां के सब से खूबसूरत द्वीपों में से एक

है. वहां का सनसेट और

सन राईज देखने दुनिया भर से लोग आते हैं.’

मेरे तो मन में लाखों घंटियां एकसाथ बजने लगीं कि अब कई दिन एकसाथ रहने और घूमनेफिरने को मिलेगा. चूंकि साथ रहतेरहते वह अब मेरे बारे में बहुत कुछ जान चुकी थी इसलिए रेस्तरां में खुद ही आर्र्डर कर के सामान बनवाती और मुझे उस व्यंजन के बारे में विस्तार से समझाती. मेरी तो जैसे दुनिया ही बदल गई थी. हर चीज इतनी आसान हो गई थी कि मुझे अब एथेंस में रहना अच्छा लगने लगा था.

मारिया के साथ गुजारी गई उन छुट्टियों को मैं कभी नहीं भूल सकता. मैं ने यह भी महसूस किया कि उस को भी मेरा साथ अच्छा लगने लगा था. होटल में हम ने अलगअलग कमरे लिए थे पर उस शाम मारिया मेरे कमरे में आ कर मुझ से बुरी तरह लिपट गई और चुंबनों की बौछार कर दी. मैं भी उसे चाहने लगा था इसलिए सारा संकोच त्याग कर उसे कस कर पकड़ लिया और वह सबकुछ हो गया जो नहीं होना चाहिए था. हम एकदूसरे के और करीब आ गए.

दिन बीतते गए. एक दिन मारिया ने बताया कि उस की रूमपार्टनर वापस अपने शहर जा रही है. मारिया अकेली उस फ्लैट का किराया नहीं दे सकती थी और मुझे भी एक रूम की तलाश थी सो मैं होटल से सामान ले कर उस के साथ रहने लगा.

एक दिन मारिया ने कहा कि वह मुझ से शादी करना चाहती है. नैतिक तौर पर यह मेरी जिम्मेदारी थी क्योंकि मैं भी उसे अब उतना ही चाहने लगा था जितना कि वह. पर तुरंत मैं कोई फैसला नहीं कर सका.

मैं ने कहा, ‘मारिया, मैं तुम्हें चाहता हूं फिर भी एक बार अपने घर वालों से इजाजत ले लूं तो…’

‘इजाजत,’ वह थोड़ा माथे पर त्योरियां चढ़ाते हुए बोली, ‘तुम सब काम उन की इजाजत ले कर करते हो. मेरे साथ घूमने और रहने के लिए भी इजाजत ली थी क्या? खाना खाने, रहने, सोने के लिए भी उन की इजाजत लेते हो क्या?’

‘ऐसी बात नहीं है मारिया, मैं भारतीय हूं. इजाजत न भी सही पर उन को बताना और आशीर्वाद लेना मेरा कर्तव्य है.’ मैं ने उसे समझाने की कोशिश की, ‘यह हमारी परंपराएं हैं.’

‘ये परंपराएं तुम्ही निभाओ,’ मारिया बोली, ‘मेरी बात का सीधा उत्तर दो क्योंकि मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनना चाहती हूं.’

एकदम सीधासीधा वाक्य उस ने मेरे ऊपर थोप दिया. मुझे उस से इस तरह के उत्तर की अपेक्षा नहीं थी.

‘मैं ने मम्मीपापा को यह सब बताया तो वे नाराज हो गए और मैं कितने ही दिन तक उन के रूठनेमनाने में लगा रहा. फिर जब मैं ने बताया कि लड़की के पिता भारतीय मूल के हैं तो उन्होंने बड़े अनमने मन से इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया.

कुछ ही दिनों बाद पता चला कि मेरी छोटी बहन की शादी तय हो गई है. मेरा मन भारत जाने के लिए एकदम विचलित हो गया. इसी बहाने मुझे छुट्टी भी मिल गई और भारत जाने को टिकट भी.

मैं ने यह सब मारिया को बताया तो वह भी साथ चलने की तैयारी करने लगी लेकिन जाने से ठीक एक दिन पहले मारिया को न जाने क्या सूझा कि उस ने मेरे साथ जाने से मना कर दिया. मैं ने नाराज हो कर मारिया को कहा कि ऐसे कैसे तुम मना कर रही हो.

‘राहुल मैं अब भारत नहीं जाना चाहती, बस…’

‘परंतु मारिया, मैं ने वहां सब को बता दिया है कि तुम मेरे साथ आ रही हो. सब लोग तुम से मिलने की राह देख रहे हैं. सच तुम भी वहां चल कर बहुत खुश होगी.’

‘मुझे नहीं जाना तो जबरदस्ती क्यों कर रहे हो,’ वह उत्तेजित हो कर बोली.

मैं मायूस हो कर रह गया. मैं यह बात अच्छी तरह जानता था कि मारिया अब मेरे साथ नहीं जाएगी क्योंकि जिस बात को वह एक बार मन में बैठा ले उस पर फिर से विचार करना उस ने सीखा नहीं था.

सुबह काम करने वालों के शोर के साथ ही मेरी निद्रा टूटी. बहन की शादी की घर पर चहलपहल तो थी ही.

बहन को विदा करने के साथसाथ मैं भी पूरा थक चुका था. जब से यहां आया ठीक से मांबाबूजी के पास बैठ भी नहीं सका. मां का पुराना कमर दर्द फिर से उभर कर सामने आ गया और मां बिस्तर पर पड़ गईं.

जैसेजैसे मेरे जाने के दिन करीब आते गए मांबाबूजी की उदासी बढ़ती गई. मेरा भी मन भारी हो आया और मैं ने छुट्टी बढ़वा ली. सभी लोग मेरे इस कुछ दिन और रहने से बहुत खुश हो गए परंतु मारिया नाराज हो गई.

‘‘राहुल तुम वापस आ जाओ. मेरा मन अकेले नहीं लग रहा है.’’

‘‘मारिया, अभी तो सब से मैं ठीक से मिला भी नहीं हूं. शादी की भागदौड़ में इतना व्यस्त रहा कि…फिर अचानक मां की तबीयत खराब हो गई. मैं ने छुट्टी 15 दिन के लिए बढ़वा ली है फिर न जाने कब यहां आना हो सके…’’ यह कह कर मैं ने फोन काट दिया.

कुछ दिनों बाद मारिया का फिर फोन आया. वह थोड़ा गुस्से में थी.

‘‘अब क्या हुआ?’’ मैं ने थोड़ा खीज कर पूछा.

‘‘पापा ने रविवार को मेरे और तुम्हारे लिए एक पार्टी रखी है और उस में तुम को आना ही पड़ेगा,’’ वह निर्णायक से स्वर में बोली.

‘‘मारिया, तुम समझती क्यों नहीं हो,’’ मैं ने थोड़ा गुस्से से कहा, ‘‘यह सब हठ छोड़ दो. मैं जल्दी ही वहां पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘नहीं राहुल, जब पापा को पता चलेगा कि तुम नहीं आ रहे हो तो उन्हें कितना बुरा लगेगा. मैं ने ही जिद की थी कि आप पार्टी रख लो, राहुल तब तक आ जाएगा. उन के मन में तुम्हारे प्रति कितनी इज्जत है…’’

‘‘यही बात जब मैं ने तुम से कही थी कि मेरे घर वाले…’’

‘‘वह बात और थी डार्ल्ंिग…’’ मारिया बात को टालने की कोशिश करती रही.’’

‘‘नहीं, वह भी यही बात थी. सिर्फ सोच का फर्क है. हमारी परंपराएं इसीलिए तुम से अलग हैं. संयुक्त परिवारों की परंपराएं और एकदूसरे की भावनाओं का आदर करना ही हमारी सब से बड़ी धरोहर है.’’

‘‘देखो राहुल, तुम जानते हो कि यह सब मुझे बरदाश्त नहीं है. एक बार फिर सोच लो कि रविवार तक यहां आ रहे हो या नहीं.’’

‘‘मैं नहीं आ रहा हूं,’’ मैं ने स्पष्ट कहा.

‘‘फिर इस ढंग से तो यह रिश्ता नहीं निभ सकता. मुझे अब तुम्हारी जरूरत नहीं है,’’ मारिया तेज स्वर में बोली.

‘‘मैं भी यही सोच रहा हूं मारिया कि जो लड़की परिवार में घुलमिल नहीं सकती, मुझे भी उस की जरूरत नहीं है. मैं उन में से नहीं हूं कि विदेशी नागरिकता लेने के लिए अपनी आजादी खो दूं. अच्छा है मेरी तुम से शादी नहीं हुई.’’

मुझे आज लग रहा है कि उस से अलग हो कर मैं ने कोई गलती नहीं की है. मांबाबूजी की आंखों में मैं ने अजीब सी चमक देखी है. अपनी कंपनी से मैं ने अपने देश में ही ट्रांसफर करा

लिया है.

मरीचिका

लेखक- मधुप चौधरी

अंतिम भाग

पूर्व कथा

इस बीच विवेक की पुरानी फाइल में सीमा को एक लड़की की तस्वीर और कुछ चिट्ठियां हाथ लगती हैं जिन में ‘मेरे प्यारे पतिदेव’ के संबोधन के साथ उस लड़की ने विवेक को प्रेम संबंधी बातें लिखी थीं. मौका देखते ही इस बात को ले कर सीमा विवेक से झगड़ती है. और गुस्से में हाथ की नस भी काट लेती है. फिलहाल इलाज करवा कर ससुराल वाले घबरा कर उसे मायके भेज देते हैं.

मायके आ कर सीमा ननिहाल जा कर राहुल से मिलती है. लेकिन राहुल उसे यही एहसास दिलाता है कि अब वह एक

विवाहिता है.

सीमा ससुराल वापस आ जाती है लेकिन उसे अब भी विवेक पर भरोसा नहीं होता.  विवेक सीमा को समझाता है कि प्रतिमा से वह प्यार जरूर करता था लेकिन उस के साथ विवाह नहीं हुआ था क्योंकि पता चल गया था कि वह पहले से शादीशुदा है. अब आगे…

गतांक से आगे

विवेक ने फिर ठहर कर कहा, ‘‘मैं जानता था इस बारे में तुम्हें किसी भी सूत्र से जानकारी मिलेगी तो तुम्हें आघात पहुंचेगा और मुझे गलत समझने लगोगी. अच्छा हुआ, आज तुम ने मुझे बताने का मौका दे दिया. वह मेरा अतीत था सीमा, जिस से अब मेरा कोई वास्ता नहीं. मेरा वर्तमान तुम हो. मां, पापा, घर के सभी लोग तुम से प्यार करते हैं, यही चाहते हैं कि तुम भी इस घर को अपना घर समझो. यह तुम्हारा घर है.’’

मन के भीतर महीनों से छिपे गुबार को निकाल कर विवेक को बड़ा हलका महसूस हुआ. उसे लगा, सीमा के सामने अपना दिल खोल कर उस ने बहुत अच्छा किया. सीमा निर्णय और अनिर्णय के दोराहे पर खड़ी थी. इसी उधेड़बुन और अनिर्णय की स्थिति में ढाई साल का वक्त गुजर गया. इस बीच एक पुत्र को जन्म दे कर सीमा ने मातृत्व का सुख भी प्राप्त कर लिया.

विवेक के घरवालों ने सोचा, ‘मां बनने के बाद सीमा अब सहज हो जाएगी और बारबार मायके पहुंचा देने की जिद छोड़ कर इस घर को अपना समझने लगेगी.’

पर मां बनने के बावजूद सीमा अपनी सोच और स्थितियों में ठीक तालमेल नहीं बैठा पा रही थी. तभी एक घटना घट गई. उस वक्त विवेक की मां घर पर नहीं थी, किसी पड़ोसिन के घर गई थी. समर नारायण और विवेक दोनों अपने काम पर निकले हुए थे. समीर भी घर पर नहीं था. छोटी बहन रजनी की शादी हो चुकी थी और वह अपने ससुराल में रहने लगी थी. सीमा का बच्चा भी 6 महीने का हो चुका था. अब वह स्थिर नहीं रहता था. पलटनियां मारने लगा था. सीमा उसे पलंग पर सुला कर किसी काम से बाहर निकली तभी पलटनियां मारते हुए वह पलंग से नीचे गिर पड़ा. उस का सिर फट गया. चीख सुन कर पड़ोस से सास और बाहर से सीमा दौड़ी. बच्चा खून से लथपथ बेहोश हो गया था. देख कर सासबहू दोनों के होश उड़ गए. उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. टांके पड़े. बच्चा बाद में होश में आ गया. घर लौटने पर विवेक को जब सारी बात का पता चला तो वह होश खो बैठा.

पहली बार सीमा पर वह

क्रुद्ध शेर की

तरह दहाड़ा, ‘‘तुम्हें बारबार कहा है, कहीं जाओ तो उस के तीनों तरफ तकिया लगा दो. आज उसे कुछ हो जाता तो…’’

‘‘आप को क्या, मेरा बच्चा है, मैं समझती,’’ सीमा ने पलट कर जवाब दिया. ‘‘तुम्हारा बच्चा, तुम क्या अपने बाप के यहां से ले कर आई हो इसे?’’

‘‘आप बारबार मेरे बाप का नाम मत लिया कीजिए…’’

बच्चे की हालत पर विवेक का दिमाग गरम था. सीमा के जबान लड़ाने से उस का पारा और भी चढ़ गया. क्रोध में अनजाने ही हाथ उठ गया और उस ने  सीमा के गाल पर कस कर तमाचा जड़ दिया.

सीमा हतप्रभ रह गई. विवेक ऐसी हिम्मत कर सकता है, यह उम्मीद नहीं थी उसे. वह कु्रद्ध नागिन सी फुंकारती विवेक से उलझ गई. उस ने विवेक की शर्ट फाड़ डाली. बनियान नोच डाली. शरीर पर कई जगह खरोंचें डालीं. विवेक अपना बचाव करता रहा. उसे पश्चात्ताप हो रहा था कि उस ने नाहक सीमा पर हाथ उठाया. बच्चे की दशा देख क्रोध में आपा खो बैठा. सीमा के शांत होने पर उस ने माफी मांग लेने की सोची. मां और छोटे भाई समीर ने बीचबचाव कर विवेक को वहां से हट जाने के लिए कहा.

दूसरे दिन विवेक और समर नारायण अपनेअपने काम पर चले गए. समीर भी दोस्तों के साथ निकल गया.

सीमा को अटैची में कपड़े रखते देख विवेक की मां ने सशंकित स्वर में पूछा, ‘‘क्या कर रही हो बहू?’’

सीमा ने जलती आंखों से सास को देखा. कोई जवाब नहीं दिया. अपना काम करती रही.

इस के बाद बच्चे को गोद में ले कर अटैची उठा कर चलने लगी तो सास ने टोका, ‘‘कहां जा रही हो, बहू?’’

‘‘कहीं भी जाऊं, आप को क्या?’’

‘‘बहुएं इस तरह घर से नहीं जाया करतीं, बेटी,’’ विवेक की मां ने दीनता से कहा, ‘‘कल विवेक ने गुस्से में तुम पर हाथ उठा दिया, पर इस का दुख उसे भी है. बच्चे की हालत देख वह आपे से बाहर हो गया था.’’

‘‘आप का बेटा मर्द है न, औरत को गुलाम और पांव की जूती समझने वाला. आप अपने जमाने में यह सब सहती और बरदाश्त करती होंगी, मैं नहीं सहने वाली.’’

विवेक की मां असहाय हो गिड़गिड़ाती रही. कोई आसपास था भी नहीं जिसे वह सीमा को रोकने के लिए कहती. सीमा उसे धकिया कर, गोद में बच्चा और हाथ में अटैची लिए निकली और बाहर जाते हुए एक रिक्शे पर बैठ कर चली गई. विवेक की मां धम्म से जमीन पर बैठ गई.

राहुल सुबह की दौड़ लगा कर अभी लौटा ही था. अपने घर के बंद दरवाजे के सामने गोद में बच्चा और हाथ में अटैची लिए सीमा को खड़े देखा तो अवाक् रह गया.

‘‘क्या बात है, सीमा, इतनी सुबहसुबह, ससुराल से आ रही हो?’’ उस ने पूछा.

‘‘हां, मैं वह घर हमेशा के लिए छोड़ कर तुम्हारे पास रहने के लिए आ गई हूं, राहुल.’’

राहुल संभल कर बोला, ‘‘तुम अभी अपनी नानी के घर जाओ, समय निकाल कर बातें करते हैं. चलो, मैं तुम्हें छोड़ आऊं,’’ सीमा को राहुल का जवाब कुछ अच्छा नहीं लगा. उसे ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी.

अटैची उठाते हुए वह बोली, ‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी.’’

दोपहर बाद लगभग 3 बजे सीमा राहुल से मिली, मंदिर के पास वाले बगीचे में. उस की नजर राहुल के चेहरे पर टिकी हुई थी कि वह कुछ बोलेगा, जिस से उस की आगे की दिशा तय होगी. पर राहुल किसी सोच में डूबा हुआ था. नजरें झुकी हुई थीं. चेहरे पर उत्साह के बजाय गहरी चिंता की रेखाएं थीं.

सीमा ने ही टोका, ‘‘तुम ने कुछ बताया नहीं, राहुल, क्या तय किया?’’

‘‘कैसे बताऊं सीमा, जिंदगी के गंभीर निर्णय क्या इतनी आसानी से लिए जा सकते हैं, जिस तरह तुम लेती हो,’’ राहुल के स्वर में झुंझलाहट थी, ‘‘कुंआरेपन की बात अलग थी. अब तुम शादीशुदा हो, किसी की पत्नी हो, किसी परिवार की बहू हो, और अब एक बच्चे की मां भी हो. अगर मैं तुम्हें अपनाऊं तो दुनिया क्या कहेगी? मेरे मातापिता कभी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगे. समाज हम पर थूकेगा.’’

राहुल की बातें सुन कर सीमा सन्न रह गई. उस ने अविश्वास से राहुल के चेहरे की ओर देखा.

‘‘भावना और यथार्थ में फर्क होता है. किसी की भागी हुई पत्नी के साथ शादी कर लूं्. मेरी आत्मा इस की गवाही नहीं देती. आखिर मेरे मांबाप हैं, समाज है. हमारा समाज अभी इतना उन्नत नहीं हुआ कि हम अमेरिका की नकल करने लगें. तुम्हें सुनने में बुरा लगेगा, सीमा, पर मैं मन की बात कह ही दूं.’’ राहुल ने बगैर रुके कहना जारी रखा, ‘‘जब अग्नि के 7 फेरे ले कर 7 वचन निभाने की कसमें खाने के बावजूद तुम ने अपने मातापिता, समाज, पति और उस के परिवार के विश्वास के साथ घात किया तो तुम पर कैसे यकीन किया जा सकता है कि तुम मेरे साथ भी वैसा ही विश्वासघात नहीं करोगी?’’

‘‘राहुल,’’ सीमा तिलमिला उठी, ‘‘क्यों झूठ बोल रहे हो. मैं तुम्हारे प्यार की खातिर…’’

सीमा की बात राहुल ने बीच में ही काट दी, ‘‘झूठ मैं नहीं तुम बोल रही हो, सीमा. मेरे प्यार की खातिर नहीं, अपनी जिद, अहंकार और बदमिजाजी के कारण तुम वह घर छोड़ कर आई हो. मेरे प्यार का तुम्हें इतना ही खयाल होता तो लग्न मंडप में विवेक के गले में वरमाला नहीं डालतीं, मुझ से शादी की आवाज उठातीं. तुम समझती हो मैं तुम्हारी शादी में नहीं गया था. मैं गया था और तुम्हें विवेक को वरण करते देख लौट आया था.’’

सीमा टूट गई. पहली बार उस ने स्वयं को इतना असहाय महसूस किया. प्रयत्न कर के भी वह अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी.

‘‘मैं चलता हूं,’’ कह कर राहुल उठ खड़ा हुआ और सीमा को सुबकता छोड़ चला गया.

थोड़ी देर में सीमा की आंखों के आंसू सूख गए. आंचल से चेहरे को पोंछती हुई वह उठी, फिर थकेहारे मन और निष्प्राण से शरीर से पांव जिधर उठे, चल पड़ी.

सीमा अपने नाना के घर के सामने पहुंची तो शाम होने को थी. दिन भर की तीखी धूप वाले सूर्य का ताप ठंडा पड़ चुका था. क्षितिज पर गोधूलि की लालिमा फैलने से वातावरण सुहावना लगने लगा था.

नानी ने उसे देखते ही कहा, ‘‘कहां चली गई थी तू. हमें कितनी चिंता हुई. बच्चा कब से भूख से रो रहा है.’’

अचानक सीमा की प्राणशक्ति जैसे लौट आई. वह घर के भीतर दौड़ी. देख कर अवाक् रह गई. विवेक आया हुआ था. बच्चा उसी की गोद में था. शायद भूख के मारे रोतेरोते थक कर सो गया था. विवेक को देख कर सीमा के पैर ठिठक गए.

‘‘मैं तुम्हें लेने आया हूं, सीमा. मां और पापा ने तुम्हें साथ ही लेते आने को कहा है,’’ सीमा को देखते ही विवेक ने कहा.

सीमा से कुछ कहते नहीं बन पड़ा, वह चुप रही.

विवेक ने कहा, ‘‘मेरी गलती थी, जो मैं ने तुम पर हाथ उठाया.’’

‘‘घर से पैर बाहर निकाल कर मैं ने भी गलती की,’’ सीमा बुदबुदाई.

‘‘जो हो गया उसे भूल जाओ, सीमा,’’ विवेक बोला, ‘‘गलती आदमी से ही होती है और गलतियों पर पश्चात्ताप कर के आदमी ऊपर उठता है, महान बनता है.’’

‘‘मुझे मालूम है, अभी तुम कहां से आ रही हो,’’ सीमा की आंखों में बेचैनी को भांप कर विवेक ने फिर कहा, ‘‘घबराओ मत, राहुल के बारे में हमें शादी के पहले से पता है. मां और पापा को भी. पर राहुल तुम्हारा अतीत है, जैसे प्रतिमा मेरा. अतीत की यादें तो ठीक हैं पर उन की चाहत की मरीचिका में जिया नहीं जा सकता.’’

तभी बच्चे ने सूसू कर दिया. वह गीलेपन के कारण रोने लगा. सीमा दौड़ कर विवेक के पास पहुंची. बच्चे को उस के हाथ से ले कर उस की गीली पैंट उतारी. फिर गोद में ले कर उसे दूध पिलाने लगी.      द्य

गलत राह का राहीं

लीना नहीं मानी तो उस ने संगीता को पटाया और उसे पुलिस की वरदी पहना कर लीना के नाम पर लोगों से पैसा बटोरना शुरू कर दिया. लेकिन…

जितेंद्र एक दिन अपनी पत्नी लीना के साथ एक दोस्त के परिवार में आयोजित शादी समारोह में शामिल होने आया था. समारोह में वह पत्नी के साथ औपचारिकता भर निभा रहा था, क्योंकि उस की पत्नी से बनती नहीं थी. उसी दौरान जितेंद्र की नजर समारोह में मौजूद एक युवती पर पड़ी तो वह उसे देखता रह गया, मानो किसी दूसरी दुनिया में खो गया हो. जितेंद्र उस की खूबसूरती पर ऐसा फिदा हुआ कि कुलांचें भरता मन बस उसी के इर्दगिर्द घूम रहा था. जितेंद्र ने उसे पहले कभी नहीं देखा था. वह उस युवती से बात करने के लिए उतावला हुए जा रहा था.

पत्नी लीना को सहेलियों के बीच छोड़, वह आत्ममुग्ध हो कर उस युवती की ओर बढ़ चला. जब तक वह उस के पास पहुंचा, तब तक युवती उस के दोस्त राजेश के साथ खड़ी बातें करने लगी. जितेंद्र इस मौके को खोना नहीं चाहता था. वह राजेश के पास पहुंच गया. बातें करतेकरते उस ने युवती की तरफ इशारा करते हुए राजेश से पूछा, ‘‘यह कौन है भाई?’’  ‘‘अरे यार यह मेरी मुंह बोली बहन संगीता है.’’ कहते हुए राजेश ने जितेंद्र का परिचय संगीता से करवाया. जितेंद्र यही चाहता भी था. जितेंद्र ने संगीता से बातचीत करनी शुरू कर दी. संगीता ने उस से पूछा, ‘‘आप क्या करते हैं?’’

यह सुन कर जितेंद्र मुसकराया और कंधे उचकाते हुए बोला, ‘‘मैं पुलिस का दामाद हूं.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर संगीता हंस पड़ी.

राजेश ने बताया, ‘‘जितेंद्र की पत्नी लीना मध्य प्रदेश पुलिस में है. जब बीवी पुलिस में है तो इस का तो कहना ही क्या, इस की तो मौज ही मौज है, हरफरनमौला आदमी है यह.’’

संगीता कुछ समझी, कुछ नहीं समझी. मगर जितेंद्र के व्यक्तित्व और पुलिसिया दामाद होने की बातें सुन कर वह उस से प्रभावित हो गई. दोनों बातें करने लगे. इसी बीच राजेश

वहां से हटा तो जितेंद्र ने संगीता को इंप्रेस करने की हर कोशिश करनी शुरू कर दी. लच्छेदार बातें कर उसे वह मानो एक ही पल में अपने आगोश में लेने को आतुर हो उठा. वह बोला, ‘‘संगीताजी, मैं आप से एक बात कहूं.’’

‘‘जरूर कहिए, आप बड़े दिलचस्प व्यक्ति हैं, ऐसा लगता है कि आप से आज अभी की नहीं, वर्षों पहले की मुलाकात हो.’’ संगीता ने कहा.

जितेंद्र के सामने सुनहरा मौका था, उस ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि चाहे जो भी हो, संगीता के लिए उसे सारे संसार से लड़ना भी पड़ा तो लड़ेगा. उस ने थोड़ा झिझकने का नाटक करते हुए कहा, ‘‘आप से एक बात कहनी है, बुरा तो नहीं मानेंगी?’’

संगीता उस की बातों और नजरों से कुछकुछ भांप चुकी थी कि वह क्या कहना चाहता है. उस ने सहजता से कहा, ‘‘आप कहिए, मैं बुरा नही मानूंगी.’’

जितेंद्र को हिम्मत मिली तो उस ने पहली मुलाकात में ही इश्क का इजहार कर दिया. उस की बात सुन कर संगीता की आंखें फटी रह गईं. मगर वह नाराज नहीं हुई. तभी जितेंद्र ने कहा, ‘‘संगीता जी, मैं आप की खातिर सारे संसार को छोड़ने को तैयार हूं.’’ संगीता आ गई जितेंद्र की बातों में संगीता को यह पता चल चुका था कि जितेंद्र शादीशुदा है. वह खुद भी किसी की अमानत थी. उस वक्त उस की मांग में सिंदूर, और गले में मंगलसूत्र था. संगीता ने जितेंद्र की बातें सुन आत्मीय स्वर में कहा, ‘‘आप तो शादीशुदा हैं न?’’

‘‘हां, मगर मैं ने आप को देखते ही अलग तरह का आकर्षण महसूस किया. रही बात मेरी पत्नी लीना की, तो उस के साथ मैं कैदी जैसी जिंदगी जी रहा हूं.’’ जितेंद्र बोला. उस की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे थे.

संगीता भी कम नहीं थी. उस से बिना मौका छोड़े तत्काल कहा, ‘‘अभी तो खुद को सरकारी दामाद बता कर खुश भी थे और गर्व भी महसूस कर रहे थे. इतनी सी देर में क्या हो गया?’’

‘‘दिल का दर्द हर किसी के सामने नहीं छलकता. पता नहीं दिल ने आप में ऐसा क्या देखा कि…’’

जितेंद्र की बात सुन और उस की आंखों में आंसू देख संगीता को महसूस हआ कि वह मन का सच्चा आदमी है. संगीता भी अपने पति राकेश से कहां खुश थी. उस ने सुन रखा था कि दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो वैवाहिक जीवन में खुश नहीं होते. शायद जितेंद्र भी उन्हीं में हो. राकेश का गुस्सैल चेहरा संगीता की आंखों के आगे घूमने लगा. बातबात में प्रताड़ना, मारपीट, गालीगलौज उस के लिए आम बात थी. वह राकेश से भीतर ही भीतर नफरत करती थी, फिर भी पत्नी धर्म का निर्वहन कर रही थी.

उस ने जितेंद्र की ओर आत्मीय दृष्टि डालते हुए कहा, ‘‘आप जल्दबाजी मत कीजिए. अभी मेरी तरफ से हां भी है और ना भी, मुझे सोचने का कुछ वक्त दीजिए.’’ जितेंद्र संगीता की बातें सुन मन ही मन खुश हुआ, उस ने कहा, ‘‘बिलकुल, लेकिन हम जल्दी ही मिलेंगे न?’’

सुन कर संगीता मुसकराई. दोनों ने अपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे दिए. जितेंद्र राय और संगीता सुसनेर की यह पहली मुलाकात लगभग 5 साल पहले सन 2014 में हुई थी.

दोनों के बीच फोन पर बातें होने लगीं. दोनों को अपने जीवनसाथियों से परेशानियां थीं, इसलिए अपनाअपना दुखड़ा सुनातेसुनाते एकदूसरे के करीब आ गए.  जल्दी ही दोनों का इंदौर के मोती गार्डन में मिलना तय हुआ. जितेंद्र समय से पहले पहुंच गया. समय बीत रहा था और संगीता का कहीं अतापता नहीं था. वह बेचैन हो उठा. तभी संगीता सामने आ कर खड़ी हो गई. दोनों एकदूसरे को देख कर खुश थे. एक बेंच पर बैठ कर दोनों ने बातचीत शुरू की. जितेंद्र ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘संगीता, मैं तो घबरा गया था. अगर तुम नहीं आती तो…’’

संगीता ने मुसकरा कर उस पर तिरछी नजर डाली फिर कहा, ‘‘ओह, फिर तो मुझ से बड़ी भूल हो गई.’’

चाहत का कर दिया इजहार

इस के बाद दोनों खिलखिला कर हंस पडे़. कुछ देर तक इधरउधर की बातें होती रहीं. दोनों के बीच मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ तो दोनों एकदूसरे से मिलने लगे.

एक दिन जितेंद्र ने उस से कहा, ‘‘मैं ने आज एक निर्णय लिया है, मुझे बस तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘हांहां, कहो.’’ संगीता ने कहा.

‘‘मैं लीना को छोड़ रहा हूं, मैं आज ही उस से संबंध खत्म कर दूंगा.’’

‘‘क्यों?’’ संगीता ने मासूमियत से पूछा.

‘‘मैं तुम्हें चाहता हूं. आखिर हम कब तक अलग रहेंगे. तुम्हारे लिए मैं दुनिया से भी टकरा जाऊंगा.’’ जितेंद्र ने संगीता की आंखों में आंखें डाल कर कहा.  यह सुन कर संगीता मन ही मन खुश थी कि कोई तो है संसार में जो उसे इतना चाहता है. उस ने बचपन से ही दुख झेले थे. पति के घर आई तो वहां भी लड़ाईझगड़ा और अवसाद भरी जिंदगी. उस ने जितेंद्र के हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारे साथ हूं जितेंद्र. मैं भी तुम्हें चाहने लगी हूं. तुम्हारी खातिर सब कुछ छोड़ दूंगी.’’

संगीता का समर्थन मिला तो जितेंद्र की बांछें खिल गईं, वह बोला, ‘‘लेकिन तुम्हें एक काम करना होगा, मेरे पास हमारे सुनहरे दिनों की प्लानिंग है.’’

‘‘वह क्या?’’ संगीता ने सहजता से पूछा.

‘‘आज शाम को मैं एक चीज ले कर आऊंगा, उसे तुम्हें पहननना होगा.’’ जितेंद्र ने रहस्यमय स्वर में कहा.

‘‘क्या, मंगलसूत्र?’’ संगीता ने भोलेपन से पूछा.

जितेंद्र हंस पड़ा, ‘‘नहीं, वह तो मैं पहनाऊंगा ही, लेकिन एक चीज और है.’’

‘‘क्या, बताओ भी न.’’ संगीता इठलाई.

‘‘तुम्हें लीना की वरदी पहननी है?’’ जितेंद्र ने दिल की बात बता दी.

‘‘क्यों, इस से क्या होगा?’’ संगीता ने आश्चर्य पूछा.

‘‘मैं तुम्हें ऐसी दुनिया दिखाऊंगा कि तुम सोच में पड़ जाओगी. जानती हो, एक पुलिसवाली जब डंडा ले कर निकलती है तो तमाम लोग उसे सलाम ठोकते हैं.’’

‘‘तुम यह सब मेरे लिए क्यों कर रहे हो और फिर मैं लीना की वरदी कैसे पहन सकती हूं?’’

‘‘सब ठीक हो जाएगा, तुम वरदी पहनना, मैं फोटो ले लूंगा तुम्हारा आईडी कार्ड भी बन जाएगा.’’ जितेंद्र ने कहा.

‘‘अच्छा ठीक है, अगर तुम कह रहे हो तो… पर मुझे कुछ अटपटा लग रहा है.’’

जितेंद्र ने संगीता पर फेंका जाल

उस शाम जब जितेंद्र राय संगीता से मिलने आया तो उस के बैग में लीना की पुलिस की वरदी थी. उस ने वरदी निकाल कर संगीता के सामने रख दी और आत्मविश्वास से लबरेज स्वर में बोला, ‘‘संगीता इसे पहन कर दिखाओ, देखूं तो कैसी दिखती हो.’’

संगीता ने उस के सामने ही लीना राय की लाई पुलिस वरदी पहन ली. जितेंद्र ने प्रसन्न भाव से कहा, ‘‘तुम बहुत सुंदर लग रही हो, मानो इस वरदी के लिए ही बनी हो.’’

संगीता वरदी पहन कर इठला रही थी. जितेंद्र ने उस के कुछ फोटो लिए और बताया, ‘‘जल्द ही तुम्हारा आईडी कार्ड बन जाएगा, फिर हमारी तकदीर खुल जाएगी.’’

संगीता विस्मय से जितेंद्र की ओर देखने लगी, उसे अच्छा भी लग रहा था और बुरा भी.

जितेंद्र के प्यार में पड़ कर संगीता ने किसी और की पुलिस वरदी पहन तो ली लेकिन आगे चल कर वह एक ऐसे भंवर जाल में फंसती चली गई जो उस की जिंदगी को तबाह करने के लिए काफी था.

जितेंद्र राय और लीना राय का विवाह हुए 8 साल हो चुके थे. जितेंद्र एक ट्रैवल कंपनी में ट्रैवल एजेंट था उस की पत्नी लीना राय मध्य प्रदेश पुलिस में प्रधान आरक्षक थी. फिलहाल उस की ड्यूटी पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में थी. लेकिन दोनों के विचार नहीं मिलते थे, जिस की वजह से उन के बीच खटास बनी रहती थी.

जितेंद्र के बड़ेबड़े ख्वाब थे जिन्हें वह साकार करना चाहता था. आननफानन में लखपति बनने के बारे में वह पत्नी को बताता रहता था. वह लीना को पुलिस वरदी की महत्ता बताता और कहता, इस वरदी में बड़ी ताकत है. अगर इस वरदी का सही इस्तेमाल किया जाए तो उन की मुफलिसी दूर हो जाएगी.

मगर लीना राय वरदी की मर्यादा समझती थी. इसलिए वह नहीं चाहती थी कि पैसों के लिए वह किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल हो. इसलिए वह प्यार से पति को समझाती कि वह ऐसी बातें न तो सोचे, और न ही उसे करने के लिए कहे.

जितेंद्र तरहतरह के तर्क देता कुछ पुलिस वालों के उदाहरण भी बताता, लेकिन लीना ने उस की बात नहीं मानी.

जितेंद्र का मन लीना से उचट गया तो वह संगीता के प्यार की नैय्या में बैठ कर आगे की योजना बनाने लगा.

जितेंद्र ने अपना घर छोड़ा और संगीता ने अपने पति का घर छोड़ा. दोनों इंदौर महानगर के मूसाखेड़ी कस्बे में किराए के एक मकान में रहने लगे. जितेंद्र ने टै्रवल एजेंट का काम छोड़ दिया और अपनी वर्षों की कल्पना को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए. उस ने निश्चय कर लिया कि संगीता को फरजी पुलिसवाली बना कर आगे की जिंदगी खुशहाली से व्यतीत करेगा.

जितेंद्र ने पत्नी लीना के आईडी कार्ड पर संगीता का फोटो लगा कर फरजी आईडी कार्ड भी बनवा दिया.  जितेंद्र ने लीना को नजदीक से देखा था, उस के हर गुणधर्म को वह जज्ब कर चुका था. उस ने संगीता को एकएक बात प्रेम से समझानी शुरू की. उसे बताया कि लीना कैसे चलती है कैसे बातें करती है. जितेंद्र ने संगीता को कुछ फिल्में भी दिखाईं ताकि पुलिस का रौब पैदा करना आ जाए. पुलिस वाली बन कर वह लोगों को डराधमका कर उन से मोटी रकम ऐंठ सके.

जितेंद्र जब पत्नी लीना को छोड़ कर संगीता के साथ रहने लगा तो लीना मन मसोस कर रह गई. उस ने एक दिन जितेंद्र से बात की और कहा, ‘‘तुम जो कर रहे हो, क्या यह ठीक है. जानते हो, लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा और मेरा क्या होगा?’’

ठगी के लिए छोड़ा पत्नी को

लीना की बातें सुन जितेंद्र कुछ क्षण मौन रहा फिर कहा, ‘‘लीना, कितना अच्छा होता तुम मेरी जिंदगी में नहीं आती. अब मुझे भूल जाओ.’’

लीना तड़प कर बोली, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो, क्या शादीविवाह गुड्डेगुडि़यों का खेल है, जो भूलने की बात कह रहे हो.’’

‘‘जब हमारे आचारविचार नहीं मिलते तो हम एक साथ क्यों रहें. तुम्हारे साथ रहने पर मुझे घुटन होती है.’’ जितेंद्र ने कहा.

जितेंद्र को लीना ने समझाने का पूरा प्रयास किया, घर परिवार की दुहाई दी मगर उस ने उस की एक नहीं सुनी. वह संगीता के साथ मूसाखेड़ी में रहने लगा. लीना एकाकी जीवन  यापन करने लगी. जबकि जितेंद्र संगीता के साथ खुश था क्योंकि संगीता लीना से ज्यादा सुंदर थी. इतना ही नहीं वह उस की एकएक बात मानती थी. साथ ही उस की अवैध और गैरकानूनी गतिविधियों में उस की सहभागी भी बन गई थी.

दोनों ने महानगर इंदौर के लोगों को ठगना शुरू कर दिया. संगीता पुलिस की वरदी पहन कर जितेंद्र के साथ कहीं भी पहुंच जाती और धौंस दे कर लोगों से रुपए वसूल करती. इस तरह दोनों मोटी कमाई कर के ऐश की जिंदगी जीने लगे.

दोनों ने थोड़े समय में ही पुलिस की वरदी की आड़ में लाखों रुपए की कमाई कर ली. जितेंद्र अवैध काम करने वालों पर पैनी निगाह रखता, उस ने कुछ ऐसे लोग से मित्रता कर रखी थी जो उसे अवैध काम करने वालों के ठिकाने बताते थे. इस के बदले में वह उन्हें अवैध वसूली में से कमीशन देता था.

नकली घी बनाने वाले एक व्यापारी से संगीता ने पुलिसिया रौब झाड़ कर 2 लाख रुपए की रकम वसूल की थी. कई जगह से अवैध वसूली के बाद संगीता की हिम्मत बढ़ गई थी. अब वह और भी निर्भीक हो कर अवैध काम करने वालों को धमकाती थी.

जितेंद्र को एक दिन पता चला कि शहर के एक इलाके में नामी कंपनी के नाम का नकली कोल्ड ड्रिंक बनाने की फैक्ट्री चल रही है. संगीता वरदी पहन कर जितेंद्र के साथ उस जगह पहुंच गई. फैक्ट्री संचालक को हड़का कर दोनों ने उस से 2 लाख रुपए ऐंठ लिए.

जितेंद्र और संगीता की गतिविधियां बढ़ती जा रही थीं. यह सब करतेकरते संगीता यह तक भूल गई कि वह फरजी पुलिस वाली है. लेकिन वरदी और आईडी कार्ड होने की वजह से वह खुद को असली पुलिसकर्मी ही समझती थी.

वह समझती थी कि इंदौर इतना बड़ा महानगर है कि वह जितेंद्र के साथ इसी तरह लोगों को ब्लैकमेल कर के आनंदपूर्वक जीवन यापन करती रहेगी. एक दिन लीना राय अपने औफिस में थी कि एक शख्स उसे बारबार देखता और चला जाता, 2-3 बार जब उस ने ऐसा ही किया तो लीना ने उसे पास बुला कर पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम बारबार मुझे इतने गौर से क्यों देख रहे हो?’’

उस ने डरते हुए पूछा, ‘‘मैडम क्या आप ही लीना राय हैं?’’

लीना ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘हां, कहो क्या बात है?’’

‘मैडम, मैं ने एकांत नगर में लीना राय नाम की जो महिला देखी थी, वह तो कोई दूसरी थी.’’ उस ने बताया.  ‘‘क्या मतलब?’’ लीना ने पूछा. उस व्यक्ति ने बताया कि उस का नाम रमन गुप्ता है और वह गल्ले किराने का थोक व्यापारी है. रमन गुप्ता ने लीना को जो कुछ बताया, उसे सुन कर लीना राय चौंकी. उस ने बताया कि पिछले महीने  लीना  राय नाम की एक महिला पुलिस वरदी में उस के पास आई थी और उस से एक लाख रुपए ले गई थी. उस पुलिस वाली ने उसे बताया था कि वह पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में बैठती है. कोई भी काम हो तो वहां आ जाना. इसलिए उन्हें ढूंढता हुआ यहां चला आया.

खबर पहुंच गई लीना तक

रमन गुप्ता की बात सुन कर लीना समझ गई कि जरूर यह काम उस के पति जितेंद्र के साथ रहने वाली संगीता का होगा, क्योंकि उसे और भी कई लोगों ने बताया था कि संगीता पुलिस वरदी पहन कर जितेंद्र के साथ घूमती है. रमन गुप्ता के जाने के बाद लीना ने तय कर लिया कि कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा. नहीं तो जितेंद्र की गतिविधियां उस के गले की फांस बन सकती है. लीना उसी शाम जितेंद्र को ढूंढती हुई मूसाखेड़ी पहुंच गई. मगर घर में ताला लगा था. उस ने उस के मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की तो भी बातचीत नहीं हो सकी. उस दिन वह घर लौट आई. लेकिन एक दिन फिर से उस के यहां गई तो जितेंद्र घर पर मिल गया.

जितेंद्र ने अपनी ब्याहता लीना को देखा तो चौंका, ‘‘अरे लीना तुम.’’

लीना मुसकराई, ‘‘जितेंद्र तुम मुझे भूल सकते हो मगर मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं.’’ लीना ने प्रेम भरे अल्फाजों में कहा तो जितेंद्र की सांस में सांस आई.

कुछ बातचीत करने के बाद लीना ने घर में इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो संगीता नहीं दिखी. उस ने जितेंद्र से पूछा, ‘‘वह कहां है?’’

‘‘कौन, संगीता!’’ जितेंद्र ने कहा, ‘‘संगीता बाजार गई है सब्जी लाने.’’

‘‘यह तो बड़ा अच्छा हुआ. हम आराम से बैठ कर बातें कर सकते हैं.’’ लीना ने प्यार जताते हुए जितेंद्र से कहा, ‘‘क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगे.’’ लीना जानती थी कि जितेंद्र रसोई के काम भलीभांति कर लेता है और वह उसे अकसर चाय बना कर पिलाया करता था.

जितेंद्र मुसकरा कर उठा और चाय बनाने चला गया. जितेंद्र का मोबाइल वहीं रखा था. लीना ने झट से मोबाइल उठा लिया और फोन की गैलरी देखने लगी. गैलरी में संगीता के कुछ फोटो मिले, जिस में वह पुलिस की वरदी पहने हुई थी.

लीना ने उन फोटो को तुरंत अपने वाट्सएप में सेंड कर लिया. इस तरह उसे एक बड़ा सबूत मिल गया. वह समझ गई संगीता पुलिस वाली बन कर क्या कर रही है. इस का मतलब रमन गुप्ता सही कह रहा था. जितेंद्र के कमरे में रखे सामान देख कर वह समझ गई कि फरजी पुलिस वाली बन कर संगीता मोटा पैसा कमा रही है.

जितेंद्र चाय ले कर आया तो लीना वहां से जा चुकी थी. लीना सीधे एएसपी अमरेंद्र सिंह के पास पहुंची और उस ने संगीता द्वारा फरजी पुलिस बन कर लोगों से पैसे ऐंठने वाली बात उन्हें बता दी.

एएसपी अमरेंद्र सिंह ने आजाद नगर के टीआई संजय शर्मा को मामले की जांच कर सख्त काररवाई करने के आदेश दिए. टीआई संजय शर्मा ने 13 जुलाई, 2019 को जितेंद्र राय और संगीता के घर दबिश डाल कर दोनों को ही गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर दोनों से विस्तार से पूछताछ की गई तो उन्होंने तमाम लोगों से मोटी रकम ऐंठने की बात स्वीकार कर ली. उन्होंने संगीता सुसनेर और जितेंद्र राय के खिलाफ भादंवि की धारा 419, 420, 467, 468, 469, 471, 380, 120बी के तहत केस दर्ज कर के दोनों को गिरफ्तार कर लिया.

उन की निशानदेही पर पुलिस ने पुलिस की वरदी, कैप, आईडी कार्ड बरामद कर लिया. 14 जुलाई, 2019 को दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.द

(कहानी सौजन्य मनोहर कहानी) 

उन्नाव की उलझन

चूंकि अपराधी भारतीय जनता पार्टी का नेता है, उसे हर तरह की मनमानी करने का पैदाइशी हक है और उस के रास्ते में जो आएगा उस की मौत भी होगी तो बड़ी बात नहीं. इस लड़की के पिता को पकड़ कर जेल में ठूंस दिया गया कि उस ने अपनी बेटी को शिकायत करने से क्यों नहीं रोका. वहां उसे मार डाला गया.

उस लड़की ने खुद को जलाने की कोशिश की तो उस पर तोहमत लगा दी गई. लड़की के चाचा को गिरफ्तार कर लिया गया और अदालत से सजा दिला दी गई. अब जब लड़की, उस की चाची और चाची की बहन जेल में बंद चाचा वकील के साथ लौट कर गाड़ी से आ रहे थे तो एक बड़े ट्रक ने उसे टक्कर मार कर चकनाचूर कर दिया जिस में चाची और चाची की बहन मारी गईं. लड़की बच गई जो न अस्पताल में सुरक्षित है, न घर में रहेगी. मां को हर हाल में समझौता करना पड़ेगा. वह कब तक सरकार से लड़ेगी?

यह कहानी आज की नहीं सदियों की है. देश में बलात्कार की शिकार ही जिम्मेदार है, बलात्कारी नहीं. बलात्कारी का तो हक है खासतौर पर अगर वह शिकार से ऊंची जाति का हो. पहले लड़कियों के पास कुएं या नदी में कूदने या फांसी लगाने के अलावा कोई और रास्ता न था, आज पुलिस में शिकायत का हक है पर तभी अगर दूसरी तरफ का कुछ कमजोर हो, पैसे और रसूख वाला न हो. जिस पर बलात्कार का आरोप है और जो जेल में बंद है, उसे शुक्रिया कहने 4 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जेल में पहुंचे थे और उन्होंने कहा था, ‘‘हमारे यहां के यशस्वी और लोकप्रिय विधायक कुलदीप सेंगर जो काफी दिनों से यहां हैं. चुनाव के बाद उन्हें धन्यवाद देना उचित समझा तो मिलने आ गया.’’

यह लड़की भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर के घर नौकरी मांगने के लिए 2017 में गई थी. उस का कहना है कि उस के साथ गलत काम किया गया था. शिकायत करने के बाद उस के घर वालों को धमकियां मिल रही थीं और अब अमलीजामा पहना दिया गया है.

इस मामले में बहुतकुछ नहीं होगा. सबकुछ रफादफा हो जाएगा, क्योंकि गलत तो लड़की ही थी, क्योंकि ऐसे मामले में गलती लड़की की ही होती है. ‘रामायण’ तक में अहल्या और सीता गलत थीं. सजाएं उन्हें ही मिली थीं. ऐसे समय जब पौराणिक युग को वापस लाया जा रहा हो, जब पिछले जन्मों के कर्मों के फल का पाठ पढ़ाने वाली किताबों को ही अकेला ज्ञान माना जा रहा हो, यह तो होना ही था.

यह संदेश है बलात्कार की शिकार हर लड़की को कि बलात्कार के बाद घर जाए, नहाए, क्रोसिन की 4 गोलियां ले कर सो जाए और हादसे को भूल कर अगली बार इसे दोहराने को तैयार रहे. यह तो होगा ही अगर वह जरा भी जवान है. बच्चियों और प्रौढ़ों को भी नहीं छोड़ा जाता और उन के लिए भी संदेश है कि हम 2019 में नहीं 919 में रह रहे हैं, जब इस देश में पूरी तरह धर्म राज था. सुनहरे दिन लौट रहे हैं.

सोशल मीडिया की दहशत

पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों पर बढ़ते मारपीट के मामलों के पीछे ह्वाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक बहुत हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि ये अफवाहों, अश्लीलता, गंदीभद्दी गालियों, जातिसूचक बकवास को दूरदूर तक ले जाते हैं. पहले जो बात गांव की चौपाल के पास के पेड़ के नीचे तक, शहर में महल्ले की चाय की दुकान या कालेज की कैंटीन तक रहती थी अब मीलों, सैकड़ों मीलों, चली जाती है.

यह मानना पड़ेगा कि ऊंची जातियों के पढ़ेलिखों में ऐसे बहुत से सोशल मीडिया लड़ाकू हैं जो तुर्कीबतुर्की जवाब देने में माहिर हैं. वे सैकड़ों में सही साफ बात कहने वाले की खाल उतार देते हैं. उन के पास सच नहीं होता तो वे झूठ पर उतर आते हैं, उन के पास जवाब नहीं होता तो गाली पर उतर आते हैं. वे बारबार पाकिस्तान भेजने की धमकी दे सकते हैं.

इन सोशल मीडिया बहादुरों ने चाहे कभी मजदूरी न की हो, कोई सामान न ढोया हो, किसी सीमा पर पहरेदारी न की हो, कुछ देश के लिए बनाया न हो, पर ये देशभक्त ऐसे बने रहते हैं मानो भारत इन की वजह से एक है और सैनिक, व्यापारी, किसान, मजदूर, बेरोजगार से ये ज्यादा देश के लिए मर रहे हैं.

इन के पास पढ़ेलिखों का मुंह बंद करने की ताकत आ गई है क्योंकि ये शोर मचा कर सही बात को कुचल सकते हैं. इन के पास समय ही समय है इसलिए ये हर तरह की टेढ़ीमेढ़ी बात गढ़ सकते हैं. ये दलितों के अत्याचारों की कहानियां बना सकते हैं. ये मुसलमानों द्वारा की गई हत्याओं की झूठी कहानियों को ऐसे फैला सकते हैं मानो ये वहीं खड़े थे. दलितों की पिटाई पर ये शिकायत करने वाले की खाल खींच सकते हैं.

ये आदतें इन्हें पीढि़यों से मिली हुई हैं. पीढि़यों से उलटीसुलटी कहानियां कहकह कर ही देशभर में झूठ के मंदिर फैले हुए हैं और वहां से इन लोगों को अच्छी आमदनी होती है. वास्तु, भविष्य, टोनेटोटके, कुंडली, हवनपूजन के नाम पर इन की आमदनी पक्की है. चूंकि पढ़ाई में अच्छे होते हैं, किताबें इन के हिसाब से बनती हैं, इन्हीं के साथी परीक्षा लेते हैं, नौकरियां इन को ही मिलती हैं. जो आरक्षण पा कर कुछ ले रहे हैं वे डरेसहमे रहते हैं, चुप रहते हैं, उन के मुंह से बस ‘जी हुजूर’, ‘जय भीम’, ‘जय अंबेडकर’ निकलता है.

वैसे भी पिछड़ों और दलितों के तो मन में गहरे बैठा है कि वे तो पिछले जन्मों के पापों का फल भोग ही रहे हैं, अगर उन्होंने इन लोगों को जवाब दिया तो उन का हाल शंबूक और एकलव्य जैसा होगा, उन्हें मरने के लिए घटोत्कच की तरह आगे कर दिया जाएगा. वे तो आज भी गंदे सीवर में डूब कर उसे साफ करने भर लायक हैं. वे ट्विटर, फेसबुक, ह्वाट्सएप की तो छोडि़ए एक पोस्टर भी नहीं पढ़ने की हिम्मत रखते. वे क्या मुंहतोड़ जवाब देंगे. और जवाब नहीं दोगे तो बोलने वाले की हिम्मत बढ़ेगी ही, वह मुंह भी चलाएगा और हाथपैर भी चलाएगा ही.

ब्रेकअप के बाद बदला सलमाल खान की इस एक्ट्रेस का लुक

फिल्म “लकी” से अपने बौलवुड कैरियर की शुरुआत करने वाली एक्ट्रेस स्नेहा उलाल काफी समय से बौलीवुड से गायब है पर सोशल मीडिया के जरीए वो अपने फैंस से कनेक्ट हैं. बौलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान ने ही स्नेहा उलाल को बौलीवुड में एंट्री कराई थी इसके बाद वो कुछ और फिल्मों में आई पर ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर पाई. हाल ही में स्नेहा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कुछ फोटोज शेयर की जिसके बाद लोगों ने काफी कमेंट करना शुरु कर दिया. इन फोटो की खास बात ये की ब्रेकअप के बाद ये स्नेहा की पहली फोटोज हैं. स्नेहा का अपने बौयफ्रेंड अवि मित्तल के साथ ब्रेकअप हुआ हैं. इसके बाद उनका बोल्ड लुक सबके सामने आया है. इस लुक को फैंस खासा पसंद कर रहे हैं.

कुछ को ओवरकम कर किया कमबैक

All India Mixed Martial Arts Association (AIMMAA)के चेयरमैन अवि मित्तल के साथ स्नेहा उलाल पिछले काफी समय से रिलेशनशिप में थी. स्नेहा ने अवि मित्तल के साथ ‘वैलेंटाइन्स डे’ भी सेलिब्रेट किया था लेकिन इसके बाद मार्च में दोनों अलग हो गए थे. इस बात से स्नेहा काफी डिप्रेस थी यही कारण है की फैंस ने उनको जमकर मोटिवेट किया और उनकी खूबसूरती की तारीफें करते नहीं थकें.

 

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Its getting hot in here

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ऐश्वर्या राय की लुकअलाइक होने के कारण मिली थी पहचान

स्नेहा उलाल के चेहरा बौलीवुड एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन से थोड़ा-बहुत मिलता-जुलता है. इसी कारण सलमान खान ने उनको अपनी फिल्म में लिया था. स्नेहा उलाल ने साल 2005 में बॉलीवुड में डेब्यू किया था. इसके बाद वो सोहेल खान के साथ ‘आर्यन’ फिल्म में दिखाई दी थी.

3 साल बाद हौट अंदाज में लौटी वाणी कपूर, देखें फोटोज

बौलीवुड एक्ट्रेस वाणी कपूर हमेशा अपनी हौट फोटोज के लिए सुर्खियों में रहती हैं. इस बार भी इंस्टाग्राम पर जैसे ही उन्होंने अपनी बिकिनी फोटो शेयर की फैंस ने जमकर कमेंट करना शुरू कर दिया. इन फोटोज में वाणी की अदाएं देखते ही बन रही है और ये फोटोज सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रही है. वाणी अपनी आने वाली फिल्म “वौर” में हुस्न के जलवे गिराती हुई नजर आएंगी. हाल ही में रिलीज हुए इस फिल्म के टीजर में वाणी नियौन रंग की बिकिनी में नजर आई थी. जिसके बाद से ही वो इंटरनेट पर काफी सर्च हो रही हैं. वाणी सोशल मीडिया पर काफी रहती है और फैंस के लिए टाईम टाईम पर फोटोज के जरीय अपडेट करते रहती हैं.

ऋतिक के साथ आएंगी नजर

यशराज फिल्म्स की War  में वाणी कपूर ऋतिक रोशन के साथ रोमांस करती हुई नजर आएंगी. इस तस्वीर को देखकर साफ पता चल रहा है कि दोनों की जोड़ी बौक्स औफिस पर तहलका मचाने के लिए पूरी तरह से तैयार है. फिल्म “वौर” के टीजर में वाणी बिकिनी के ऊपर अपने श्रग को उतार फेंकती है. अनुमान लगाया जा रहा है कि ये सीक्वेंस ही फिल्म में वाणी का एंट्री सीन होगा. जबसे फिल्म वौर का टीजर सामने आया है फैंस वाणी की फिल्म का इंतजार करने लगें.

 

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Walking into the golden hour ☀️

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Stormy mind and a tranquil ♥️

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3 साल बाद लौटी पर्दे पर

बता दे की वौर  के टीजर के बाद से ही फैंस इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार कर रहे है, वजह हैं की वाणी 3 साल बाद बौलीवुड में कमबैक कर रही हैं. इससे पहले  वो साल 2016 में बेफिक्रे मूवी में नजर आई थी.

फिटनेस में भी आगे है वाणी

वाणी अपनी फिटनेस पर काफी ध्यान देती है. कभी अपनी जिम की फोटोज तो काफी स्वूमिंग करती वाणी की फिटनेस देखते ही बनती हैं. वाणी के फैंस उनकी फिटनेस के दिवाने हैं. “शुद्ध देसी रोमांस” से कैरियर की शुरुआत करने वाली वाणी ने फिल्में बेशक कम कि है पर उनकी जितने भी फिल्में आई है लोगों ने उनके काम को काफी सराहा हैं.

स्माइल करती वाणी

सोशल मीडिया पर वाणी की स्माइलिंग फोटो काफी पसंद की जाती हैं. लड़के हो या लड़कियां वाणी की स्माइल पर सभी अपना दिल वारते हैं.

हमकदम

अधिक खुशी से रहरह कर अनन्या की आंखें भीग जाती थीं. अब उस ने एक मुकाम पा लिया था. संभावनाओं का विशाल गगन उस की प्रतीक्षा कर रहा था. पत्रकारों के जाने के बाद अनन्या उठ कर अपने कमरे में आ गई. शरीर थकावट से चूर था पर उस की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. एक पत्रकार के प्रश्न पर पति द्वारा कहे गए शब्द कि इन की जीत का सारा श्रेय इन की मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति को जाता है, रहरह कर उस के जेहन में कौंध जाते.

कितनी आसानी से चंद्रशेखर ने अपनी जीत का सेहरा उस के सिर बांध दिया. अगर कदमकदम पर उसे उन का साथ और सहयोग नहीं मिला होता तो वह आज विधायक नहीं गांव के एक दकियानूसी जमींदार परिवार की दबीसहमी बहू ही होती.

इस मंजिल तक पहुंचने में दोनों पतिपत्नी ने कितनी मुश्किलों का सामना किया है यह वे ही जानते हैं. जीवन की कठिनाइयों से जूझ कर ही इनसान कुछ पाता है. अपने वजूद के लिए घोर संघर्ष करने वाली अनन्या सिंह इस महत्त्वपूर्ण बात की साक्षी थी.

उस का मन रहरह कर विगत की ओर जा रहा था. तकिए पर टेक लगा कर अधलेटी अनन्या मन को अतीत की उन गलियों में जाने से रोक नहीं पाई जहां कदमकदम पर मुश्किलों के कांटे बिछे पड़े थे.

बचपन से ही अनन्या का स्वभाव भावुक और संवेदनशील था. वह सब के आकर्षण का केंद्र बन कर रहना चाहती थी. दफ्तर से घर आने पर पिता अगर एक गिलास पानी के लिए कहीं उस के छोटे भाई या बहन को आवाज दे देते तो वह मुंह फुला कर बैठ जाती. पूछो तो होंठों पर बस, एक ही जुमला होता, ‘पापा मुझ से प्यार नहीं करते.’

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बातबात पर उसे सब के प्यार का प्रमाण चाहिए था. कभीकभी मां बेटी की हठ देख कर चिंतित हो उठतीं. एक बार उन्होंने अनन्या के पिता से कहा भी था, ‘अनु का स्वभाव जरा अलग ढंग का है. अगर इसे आप इतना सिर पर चढ़ाएंगे तो कल ससुराल में कैसे निबाहेगी? न जाने कैसा घरपरिवार मिलेगा इसे.’

‘तुम चिंता क्यों करती हो, समय सबकुछ सिखा देता है. हम से जिद नहीं करेगी तो किस से करेगी?’ अनु के पिता ने पत्नी को समझाते हुए कहा था.

एक दिन अनन्या के मामा ने उस के लिए चंद्रशेखर का रिश्ता सुझाया तो उस के पिता सोच में पड़ गए.

‘अभी उस की उम्र ही क्या हुई है शिव बाबू, इंटर की परीक्षा ही तो दी है. इस साल आगे पढ़ने का उसे कितना चाव है.’

‘देखिए जीजाजी, इतना अच्छा रिश्ता हाथ से मत निकलने दीजिए, पुराना जमींदार घराना है. उन का वैभव देख कर भानजी के सुख की कामना से ही मैं यह रिश्ता लाया हूं. अनन्या के लिए इस से अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा,’ शिवप्रकाशजी ने समझाया तो अनन्या के पिता राजी हो गए.

पहली मुलाकात में ही चंद्रशेखर और उस का परिवार उन्हें अच्छा लगा था. उन्होंने बेटी को समझाते हुए कहा था, ‘चंद्रशेखर एक नेक लड़का है, तुम्हारी इच्छाओं का वह जरूर आदर करेगा.’

शादी के बाद अनन्या दुलहन बन कर ससुराल चली आई. गांव में बड़ा सा हवेलीनुमा घर, चौड़ा आंगन, लंबेलंबे बरामदे, भरापूरा परिवार, कुल मिला कर उस के मायके से ससुराल का परिवेश बिलकुल अलग था. मायके में कोई रोकटोक नहीं थी पर ससुराल में हर घड़ी लंबा घूंघट निकाले रहना पड़ता था. आएदिन बूढ़ी सास टोक दिया करतीं, ‘बहू, घड़ीघड़ी तुम्हारे सिर से आंचल क्यों सरक जाता है? ढंग से सिर ढंकना सीखो.’

चंद्रशेखर अंतर्मुखी प्रवृत्ति का इनसान था. प्रेम के एकांत पलों में भी वह मादक शब्दों के माध्यम से अपने दिल की बात कह नहीं पाता था और बचपन से ही बातबात पर प्रमाण चाहने वाली अनन्या उसे अपनी अवहेलना समझने लगी थी.

पुराना जमींदार घराना होने के कारण उस की ससुराल वाले बातबात पर खानदान की दुहाई दिया करते थे और उन के गर्व की चक्की में पिस जाती साधारण परिवार से आई अनन्या. सुनसुन कर उस के कान पक गए थे.

एक दिन अनन्या ने दुखी हो कर पति से कहा, ‘आप के जाने के बाद मैं अकेली पड़ी बोर हो जाती हूं. गांव में कहीं आनेजाने और किसी के साथ खुल कर बातें करने का तो सवाल ही नहीं उठता. मैं समय का सदुपयोग करना चाहती हूं. आप तो जानते ही हैं कि मैं ने प्रथम श्रेणी में इंटर पास किया है. मैं और आगे पढ़ना चाहती हूं, पर मुझे नहीं लगता यह संभव हो पाएगा. बातबात पर खानदान की दुहाई देने वाली मांजी, दादी मां, बाबूजी क्या मुझे आगे पढ़ने देंगे?’

चंद्रशेखर ने पत्नी की ओर गहरी नजर से देखा. पत्नी के चेहरे पर आगे पढ़ने की तीव्र लालसा को महसूस कर उस ने मन ही मन परिवार वालों से इस बारे में सलाह लेने की सोच ली.

उधर पति को चुपचाप देख कर अनन्या सोच में पड़ गई. उस के अंतर्मन की मिट्टी से पहली बार शंका की कोंपल फूटी कि यह मुझ से प्यार नहीं करते तभी तो चुप रह गए. आखिर खानदान की इज्जत का सवाल है न.

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अनन्या 2-3 दिनों तक मुंह फुलाए रही. चंद्रशेखर ने भी कुछ नहीं कहा. एक दिन आवश्यक काम से चंद्रशेखर को पटना जाना पड़ा. लौटा तो चेहरे पर एक अनजानी खुशी थी.

रात का खाना खाने के बाद चंद्रशेखर भी अपने बाबूजी के साथ टहलने चला गया. थोड़ी देर में बाबूजी का तेज स्वर गूंजा, ‘शेखर की मां, देखो, तुम्हारा लाड़ला क्या कह रहा है.’

‘क्या हुआ, क्यों आसमान सिर पर उठा रखा है?’ चंद्रशेखर की मां रसोई से बाहर आती हुई बोलीं.

‘यह कहता है कि बहू आगे पढ़ने कालिज जाएगी. विश्वविद्यालय जा कर एडमिशन फार्म ले भी आया है. कमाता है न, इसलिए मुझ से पूछने की जरूरत भी क्या है?’ ससुरजी फिर भड़क उठे थे.

‘लेकिन बाबूजी, इस में गलत क्या है?’ चंद्रशेखर ने पूछा तो मां बिदक कर बोलीं, ‘तेरा दिमाग चल गया है क्या? हमारे खानदान की बहू पढ़ने कालिज जाएगी. ऐसी कौन सी कमी है महारानी को इस घर में, जो पढ़लिख कर कमाने की सोच रही है?’

‘मां, तुम क्यों बात का बतंगड़ बना रही हो? यह तुम से किस ने कहा कि यह पढ़लिख कर नौकरी करना चाहती है? इसे आगे पढ़ने का चाव है तो क्यों न हम इसे बी.ए. में दाखिला दिलवा दें,’ चंद्रशेखर ने कहा तो अपने कमरे में परदे के पीछे सहमी सी खड़ी अनन्या को जैसे एक सहारा मिल गया.

पास ही खड़ी बड़ी भाभी मुंह बना कर बोलीं, ‘देवरजी, हम भी तो रहते हैं इस घर में, बी.ए. करो या एम.ए., आखिरकार चूल्हाचौका ही संभालना है.’

‘छोड़ो बहू, यह नहीं मानने वाला, रोज कमानेखाने वाले परिवार की बेटी ब्याह कर लाया है. छोटे लोग, छोटी सोच,’ अनन्या की सास ने कहा और भीतर चली गईं.

दरवाजे के पास खड़ी अनन्या सन्न रह गई, छोटे लोग छोटी सोच? यह क्या कह गईं मांजी? क्या अपने भविष्य के बारे में चिंतन करना छोटी सोच है? बातबात पर खानदान की दुहाई देने वाली मांजी यह क्यों भूल जाती हैं कि अच्छे खानदान की जड़ में अच्छे संस्कार होते हैं और शिक्षित इनसान ही अच्छे संस्कारों को हमेशा जीवित रखने का प्रयास करते हैं.

रात बहुत बीत चुकी थी. अनन्या की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. चंद्रशेखर भी करवटें बदल रहे थे. थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा, ‘अनन्या, तुम कल सुबह फार्म भर कर मुझे दे देना. मैं ने सोच लिया है कि तुम आगे जरूर पढ़ोगी.’

अनन्या को आश्चर्यमिश्रित खुशी हुई, ‘सच?’

‘हां, मैं परसों पटना जा रहा हूं, तुम्हारा फार्म भी विश्वविद्यालय में जमा करता आऊंगा.’

एक दिन चंद्रेशेखर बैंक से लौटा तो बेहद खुश था. उस ने अनन्या से कहा, ‘आज पटना से मेरे दोस्त रमेश का फोन आया था. बता रहा था कि तुम्हारा नाम प्रवेश पाने वालों की सूची में है. प्रवेश लेने की अंतिम तिथि 25 है. तुम कल से ही सामान बांधना शुरू कर दो. हमें परसों जाना है क्योंकि जल्दी पहुंच कर तुम्हारे लिए होस्टल में रहने की भी व्यवस्था करनी होगी.’

‘मैं होस्टल में रहूंगी?’ अनन्या ने पूछा, ‘घर से दूर…अकेली…क्या यहां कालिज नहीं है?’ उस ने अपने मन की बात कह ही डाली.

‘देखो, विश्वविद्यालय की बात ही अलग होती है. तुम ज्यादा सोचो मत. चलने की तैयारी करो. मैं बाबूजी को बता कर आता हूं,’ कहते हुए चंद्रशेखर बाबूजी के कमरे की ओर चला गया.

पटना आते समय अनन्या ने सासससुर के चरणस्पर्श किए तो सास ने उसे झिड़क कर कहा था, ‘जाओ बहू, बेहद कष्ट में थीं न तुम यहां…अब बाहर की दुनिया देखो और मौज करो.’

चंद्रशेखर के प्रयास से अनन्या को महिला छात्रावास में कमरा मिल गया. उसे वहां छोड़ कर आते वक्त उस ने कहा था, ‘तुम्हारे भीतर की लगन को महसूस कर के ही मैं ने अपने परिवार वालों की इच्छा के खिलाफ यह कदम उठाया है. मैं जानता हूं कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी. किसी चीज की जरूरत हो तो फोन कर देना.’

अनन्या ने धीरे से सिर हिला दिया था. होस्टल के गेट पर खड़ी हो कर वह तब तक पति को देखती रही जब तक वह नजरों से ओझल नहीं हो गए.

उस का मन यह सोच कर दुख से भर उठा था कि उन्होंने एक बार भी पलट कर नहीं देखा. कितनी निष्ठुरता से छोड़ गए मुझे. इतना तो कह ही सकते थे न कि अनु, मुझे तुम्हारी कमी खलेगी, पर नहीं, सच में मुझ से प्यार हो तब न…

आंसू पोंछ कर वह अपने कमरे में चली आई. कुछ दिनों तक उस का मन खिन्न रहा पर धीरेधीरे सबकुछ भूल कर वह पढ़ाई में रम गई. तेज दिमाग अनन्या ने बी.ए. फाइनल की परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए.

एम.ए. में प्रवेश लेने के बाद वह कुछ दिन की छुट्टी में घर आई थी. एक दिन चंद्रशेखर ने उस से कहा, ‘एम.ए. में तुम्हें विश्वविद्यालय में पोजीशन लानी है. उस के लिए बहुत मेहनत की जरूरत है तुम्हें.’

अनु ने सोचा, छुट्टियों में घर आई हूं तब भी वही पढ़ाई की बातें, प्रेम की मीठीमीठी बातों का मधुरिम एहसास और वह दीवानापन न जाने क्यों चंद्रशेखर के मन में है ही नहीं. जब देखो पढ़ो, कैरियर बनाओ…उन्हें मुझ से जरा भी प्यार नहीं.

‘अनु, कहां खो गईं?’ चंद्रशेखर ने कहा, ‘देखो, मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूं.’

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चंद्रशेखर कहता जा रहा था और अनु जैसे जड़ हो गई थी. मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘क्या यही प्यार है? न रस पगे दो मीठे बोल, न मनुहार…ज्यादा खुश हुए तो गए और हिंदी साहित्य की किताब उठा कर ले आए. स्वार्थी कहीं के…’

‘अनु, मैं तुम्हें कुछ दिखा रहा हूं,’ चंद्रशेखर ने फिर कहा तो अनन्या बनावटी हंसी हंस कर बोली, ‘हां, अच्छी किताब है.’

अनन्या ने मन ही मन एक ग्रंथि पाल ली थी कि चंद्रशेखर मुझ से प्यार नहीं करते. तभी तो अपने से दूर मुझे होस्टल भेज कर भी खुश हैं. क्या प्रणय की वह स्वाभाविक आंच जो मुझे हर समय जलाती रहती है, उन्हें तनिक भी नहीं जलाती होगी? शायद नहीं, उन्हें मुझ से प्यार हो तब न…

इन्हीं दिनों अनन्या को पता चला कि वह मां बनने वाली है. पूरा परिवार खुश था. एक दिन चंद्रशेखर ने उस को समझाते हुए कहा, ‘तुम्हें बच्चे के जन्म के बाद परीक्षा देने जरूर जाना चाहिए. साल बरबाद मत करना, बीता समय फिर लौट कर नहीं आता.’

अनन्या पति के साथ कुछ दिनों के लिए मायके आई थी. एक शाम घूमने के क्रम में वह गोलगप्पे वाले खोमचे के सामने ठिठक गई तो चंद्रशेखर ने पूछ लिया, ‘क्या हुआ?’

‘मुझे गोलगप्पे खाने हैं.’

‘तुम्हारा दिमाग तो नहीं चल गया. अपना नहीं तो कम से कम बच्चे का तो खयाल करो,’ चंद्रशेखर ने गुस्से से कहा तो अनन्या पैर पटकती हुई घर चली आई.

‘आप ने एक छोटी सी बात पर मुझे इतनी बुरी तरह क्यों डांटा? एक छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते? अरमान ही रह गया कि आप कभी कोई उपहार देंगे या फिर कहीं घुमाने ले जाएंगे. मेरी खुशी से आप को क्या लेनादेना…मुझ से प्यार हो तब न. जब देखो, पढ़ो…कैरियर बनाओ, जैसे दुनिया में और कुछ है ही नहीं,’ रात में अनन्या मन की भड़ास निकालते हुए बोली.

चंद्रशेखर कुछ पलों तक अपलक पत्नी को निहारता रहा फिर संजीदा हो कर बोला, ‘तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम से प्यार नहीं करता, पतिपत्नी का रिश्ता तो प्रेम और समर्पण की डोरी से बंधा होता है.’

‘अपनी सारी फिलासफी अपने तक ही रखिए. मैं अच्छी तरह जानती हूं कि आप मुझ से…’ ‘हांहां, मैं तुम से प्यार नहीं करता, मुझे प्रमाण देने की जरूरत नहीं है,’ चंद्रशेखर बीच में ही अनन्या की बात काट कर बोला.

एक दिन अनन्या गुडि़या जैसी बेटी की मां बन गई. जब बच्ची 3 महीने की हो गई तब चंद्रशेखर ने पत्नी से कहा कि उसे अब एम.ए. की परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए.

‘क्या मैं 6 महीने में परीक्षा की तैयारी कर पाऊंगी? सोचती हूं इस साल ड्राप कर दूं. अभी गुडि़या छोटी है.’

पत्नी की बातों को सुन कर उसे समझाते हुए चंद्रशेखर बोला, ‘देखो, अनन्या, पढ़ाईर् एक बार सिलसिला टूट जाने के बाद फिर ढंग से नहीं हो पाती. मैं गुडि़या के बारे में मां से बात करूंगा.’

अनन्या को लगा जैसे कोई मुट्ठी में ले कर उस का दिल भींच रहा हो. इतना बड़ा फैसला ऐसे सहज ढंग से सुना दिया जैसे छोटी सी बात हो. मेरी नन्ही सी बच्ची मेरे बिना कैसे रहेगी?

अनन्या की सास ने पोती को पास रखने से साफ मना कर दिया, ‘मुझे

तो माफ ही करो तुम लोग. कैसी मां है यह जो बेटी को छोड़ कर पढ़ने जाना चाहती है.’

अनन्या ने चीख कर कहना चाहा कि यह आप के बेटे की इच्छा है, मेरी नहीं पर कह नहीं पाई. एक दिन उस के पिता का फोन आया तो उस ने सारी बातें उन्हें बताते हुए पूछा, ‘अब आप ही बताइए, पापा, मैं क्या करूं?’

‘तुम गुडि़या को हमारे पास छोड़ कर होस्टल जा सकती हो बेटी, समय सब से बड़ी पूंजी है. इसे गंवाना नहीं चाहिए. मेरे खयाल से चंद्रशेखर बाबू ठीक कहते हैं,’ उस के पिता ने कहा.

अनन्या के सिर से एक बोझ सा हट गया. दूसरे ही दिन वह होस्टल जाने की तैयारी करने लगी. नन्ही सी बेटी को मायके छोड़ कर जाते समय अनन्या का दिल रोनेरोने को हो आया था पर मन को मजबूत कर वह रिकशे पर बैठ गई.

धीरेधीरे 6 माह बीत गए. अनन्या जब भी अपनी बेटी के बारे में सोचती उस का मन पढ़ाई से उचट जाता. वह इतनी भावुक हो जाती कि आंसुओं पर उस का बस नहीं रह जाता.

कभीकभी वह खुद को समझाती हुई सोचती कि जिंदगी में कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है. इस तरह के सकारात्मक सोच उस के मन में नवीन उत्साह भर जाते. आखिरकार उत्साह की परिणति लगन में और लगन की परिणति कठोर परिश्रम में हो गई. नतीजा सुखदायक रहा. अनन्या ने विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में दूसरा स्थान पाया.

चंद्रशेखर ने भी खुश हो कर कहा था, ‘मुझे तुम से यही उम्मीद थी अनु.’

अनन्या ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से ‘नेट’ करने के बाद उस ने हिंदी साहित्य में पीएच.डी. की उपाधि भी हासिल की.

उच्च शिक्षा ने अनन्या की सोच को बहुत बदल डाला. सहीगलत की पहचान उसे होने लगी थी. कभीकभी वह सोचती कि आज उस के पास सबकुछ है. प्यारी सी बिटिया, स्नेही पति, उच्च शिक्षा, आगे की संभावनाएं. क्या यह बिना चंद्रशेखर के सहयोग के संभव था? उस की राह की सारी मुश्किलों को चंद्रशेखर ने अपने मजबूत कंधों पर उठा रखा था. वह जान गई थी कि प्रेम शब्दों का गुलाम नहीं होता. प्रेम तो एक अनुभूति है जिसे महसूस किया जा सकता है.

अनन्या को लेक्चरर पद के लिए इंटरव्यू देने जाना था. वह तैयार हो कर बैठक में आई तो एक सुखद एहसास से भीग उठी, जब उस ने यह देखा कि चंद्रशेखर उस की मार्कशीट और प्रमाणपत्रों को फाइल में सिलसिलेवार लगा रहे थे. उसे देखते ही चंद्रशेखर ने कहा, ‘जल्दी करो, अनु, नहीं तो बस छूट जाएगी.’

असीम स्नेह से पति को निहारती हुई अनन्या ने धीरे से कहा, ‘मुझे आप से कुछ कहना है.’

‘बातें बाद में होंगी, अभी चलो.’.

‘नहीं, आप को आज मेरी बात सुननी ही होगी.’

‘तुम क्या कहोगी, मुझे पता है, वही रटारटाया वाक्य कि आप मुझ से प्यार नहीं करते,’ चंद्रशेखर व्यंग्य से हंस कर बोला तो अनन्या झेंप गई.

‘ठीक है, चलिए,’ उस ने कहा और तेजी से बाहर निकल गई. आज वह अपने पति से कहना चाहती थी कि वह अपने प्रति उन के प्यार को अब महसूस करने लगी है. पर मन की बात मन में ही रह गई.

साक्षात्कार दे कर आई अनन्या को नौकरी पाने का पूरा भरोसा था. पर उस समय वह जैसे आकाश से गिरी जब उस ने चयनित व्याख्याताओं की सूची में अपना नाम नहीं पाया. हृदय इस चोट को सहने के लिए तैयार नहीं था अत: वह फूटफूट कर रोने लगी.

पत्नी को रोता देख कर चंद्रशेखर भी संज्ञाशून्य सा खड़ा रह गया. जानता था, असफलता का आघात मौत के समान कष्ट से कम नहीं होता.

‘देखो, अनु,’ पत्नी को दिलासा देते हुए चंद्रशेखर बोला, ‘यह भ्रष्टाचार का युग है. पैरवी और पैसे के आगे आज के परिवेश में डिगरियों का कोई महत्त्व नहीं रहा. तुम दिल छोटा मत करो. एक न एक दिन तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी.’

एक दिन चंद्रशेखर ने अनन्या को समझाते हुए कहा था, ‘शिक्षा का अर्थ केवल धनोपार्जन नहीं है. हमारे समाज में आज भी शिक्षित महिलाओं की कमी है, तुम इस की अपवाद हो, यही कम है क्या?’

‘आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं केवल पैसों के लिए व्याख्याता बनने की इच्छुक नहीं थी. अपनी अस्मिता की तलाश…समाज में एक ऊंचा मुकाम पाने की अभिलाषा है मुझे. मैं आम नहीं खास बनना चाहती हूं. अपने वजूद को पूरे समाज की आंखों में पाना चाहती हूं मैं.’

चंद्रशेखर पत्नी की बदलती मनोदशा से अनजान नहीं था. समझता था, अनन्या अवसाद के उन घोर दुखदायी पलों से गुजर रही है जो इनसान को तोड़ कर रख देते हैं.

एक दिन चंद्रशेखर के दोस्त रमेश ने बातों ही बातों में उसे बताया कि 4-5 महीने में ग्राम पंचायत के चुनाव होने वाले हैं और उस की पत्नी निशा जिला परिषद की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने वाली है.

चंद्रशेखर ने कहा, ‘आज के माहौल में तो कदमकदम पर राजनीति के दांवपेच मिलते हैं. कई लोग चुनाव मैदान में उतर जाएंगे. कुछ गुंडे होंगे, कुछ जमेजमाए तथाकथित नेता. ऐसे में एक महिला का मैदान में उतरना क्या उचित है?’

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‘ऐसी बात नहीं है. पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है. अगर सीट महिला के लिए आरक्षित हो तो प्रयास करने में क्या हर्ज है? देखना, कई पढ़ीलिखी महिलाएं इस क्षेत्र में आगे आएंगी,’ रमेश ने समझाते हुए कहा.

चंद्रशेखर के मन में एक विचार कौंधा, अगर अनन्या भी कोशिश करे तो? उस ने इस बारे में पूरी जानकारी हासिल की तो पता चला कि उस के इलाके की जिला परिषद सीट भी महिला आरक्षित है. चंद्रशेखर के मन में एक नई सोच ने अंगड़ाई ले ली थी.

‘मैं चुनाव लडूं? क्या आप नहीं जानते कि आज की राजनीति कितनी दूषित हो गई है?’ अनन्या बोली.

‘इस में हर्ज ही क्या है. वैसे भी अच्छे विचार के लोग यदि राजनीति में आएंगे तो राजनीति दूषित नहीं रहेगी. तुम अपनेआप को चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लो.’

अनन्या के मन में 2-3 दिन तक तर्कवितर्क चलता रहा. आखिरकार उस ने हामी भर दी.

यह बात जब अनन्या के ससुर ने सुनी तो वह बुरी तरह बिगड़ उठे, ‘लगता है दोनों का दिमाग खराब हो गया है. जमींदार खानदान की बहू गांवगांव, घरघर वोट के लिए घूमती फिरे, यह क्या शोभा देता है? पुरखों की इज्जत क्यों मिट्टी में मिलाने पर तुले हो तुम लोग?’

‘ऐसा कुछ नहीं होगा, बाबूजी, इसे एक कोशिश कर लेने दीजिए. जरा यह तो सोचिए कि अगर यह जीत जाती है तो क्या खानदान का नाम रोशन नहीं होगा?’ चंद्रशेखर ने भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहा था.

चंद्रशेखर ने निश्चित तिथि के भीतर ही अनन्या का नामांकनपत्र दाखिल कर दिया. फिर शुरू हुई एक नई जंग.

अनन्या ने आम उम्मीदवारों से अलग हट कर अपना प्रचार अभियान शुरू किया. वह गांव की भोलीभाली अनपढ़ जनता को जिला परिषद और उस से जुड़ी जन कल्याण की तमाम बातों को विस्तार से समझाती थी. धीरेधीरे लोग उस से प्रभावित होने लगे. उन्हें महसूस होने लगा कि जमींदार की बहू में सामंतवादी विचारधारा लेशमात्र भी नहीं है. वह जितने स्नेह से एक उच्च जाति के व्यक्ति से मिलती है उतने ही स्नेह से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों से भी मिलती है. और उस का व्यवहार भी आम नेताओं जैसा नहीं है.

धीरेधीरे उस की मेहनत रंग लाने लगी. 50 हजार की आबादी वाले पूरे इलाके में अनन्या की चर्चा जोरों पर थी.

मतगणना के दिन ब्लाक कार्यालय के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी. आखिरकार 2 हजार वोटों से अनन्या की जीत हुई. उस की जीत ने पूरे समाज को दिखा दिया था कि आज भी जनता ऊंचनीच, जातिपांति, धर्म- समुदाय और अमीरीगरीबी से ऊपर उठ कर योग्य उम्मीदवार का चयन करती है. बड़ी जाति के लोगों की संख्या इलाके में कम होने पर भी हर जाति और धर्म के लोगों से मिले अपार समर्थन ने अनन्या को जीत का सेहरा पहना दिया था.

घर लौट कर अनन्या ने ससुर के चरणस्पर्श किए तो पहली बार उन्होंने कहा, ‘खुश रहो, बहू.’

अनन्या आंतरिक खुशी से अभिभूत हो उठी. उसे लगा, वास्तव में उस की जीत तो इसी पल दर्ज हुई है.

उस ने फिर कभी मुड़ कर पीछे नहीं देखा. हमकदम के रूप में चंद्रशेखर जो हर पल उस के साथ थे. 3 साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी वह भारी बहुमत से विजयी हुई. उस का रोमरोम पति के सहयोग का आभारी था. अगर वह हर मोड़ पर उस का साथ न देते तो आज भी वह अवसाद के घने अंधेरे में डूबी जिंदगी को एक बोझ की तरह जी रही होती.

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‘‘खट…’’ तभी कमरे का दरवाजा खुला और अनन्या की सोच पर विराम लग गया. चंद्रशेखर ने भीतर आते हुए पूछा, ‘‘तुम अभी तक सोई नहीं?’’

‘‘आप कहां रह गए थे?’’

‘‘कुछ लोग बाहर बैठे थे. उन्हीं से बातें कर रहा था. तुम से मिलना चाहते थे तो मैं ने कह दिया कि मैडम कल मिलेंगी,’’ चंद्रशेखर ने ‘मैडम’ शब्द पर जोर डाल कर हंसते हुए कहा.

भावुक हो कर अनन्या ने पूछा, ‘‘अगर आप का साथ नहीं मिलता तो क्या आज मैं इस मुकाम पर होती? फिर क्यों आप ने सारा श्रेय मेरी लगन और मेहनत को दे दिया?’’

‘‘तो मैं ने गलत क्या कहा? अगर हर इनसान में तुम्हारी तरह सच्ची लगन हो तो रास्ते खुद ही मंजिल बन जाते हैं. हां, एक बात और कि तुम इसे अपना मुकाम मत समझो. तुम्हारी मंजिल अभी दूर है. जिस दिन तुम सांसद बन कर संसद में जाओगी और इस घर के दरवाजे पर एक बड़ी सी नेमप्लेट लगेगी…डा. अनन्या सिंह, सांसद लोकसभा…उस दिन मेरा सपना सार्थक होगा,’’ चंद्रशेखर ने कहा तो अनन्या की आंखें खुशी से छलक पड़ीं.

‘‘हर औरत को आप की तरह प्यार करने वाला पति मिले.’’

‘‘अच्छा, इस का मतलब तो यह हुआ कि तुम अब मुझ पर यह आरोप नहीं लगाओगी कि मैं तुम से प्यार नहीं करता.’’

‘‘नहीं, कभी नहीं,’’ अनन्या पति के कंधे पर सिर टिका कर असीम स्नेह से बोली.

‘‘तो तुम अब यह पूरी तरह मान चुकी हो कि मैं तुम से सच्चा प्यार करता हूं,’’ चंद्रशेखर ने मुसकरा कर कहा तो अनन्या भी हंस कर बोल पड़ी, ‘‘हां, मैं समझ चुकी हूं, प्यार की परिभाषा बहुत गूढ़ है. कई रूप होते हैं प्रेम के,

कई रंग होते हैं प्यार करने वालों के, पर सच्चे प्रेमी तो वही होते हैं जो जीवन साथी की तरक्की के रास्ते में अपने अहं का पत्थर नहीं आने देते, ठीक आप

की तरह.’’

एक स्वर्णिम भोर की प्रतीक्षा में रात ढलने को बेताब थी. कुछ क्षणों में पूर्व दिशा में सूर्य की किरणें अपना प्रकाश फैलाने को उदित हो उठीं.             द्य

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