#coronavirus: कोरोना से लड़ने वाले लोगों को सपना ने ऐसे किया सैल्यूट, भर आई आंखे

जैसा कि हम सब जानते हैं कि कोरोना वायरस (Corona Virus) के चलते पूरे विश्व के हालात खराब हैं. ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने सभी भारत वासियों से ये अपील की थी कि 22 मार्च यानि की रविवार के दिन कोई भी व्यक्ति अपने घर से नहीं निकलेगा और जो कोरोना वायरस की लड़ाई लड़ने में दिन रात लगे हुए हैं जैसे कि डौक्टर्स, मीडिया कर्मी, पुलिस आदि, उनके लिए शाम 5 बजे सभी अपने घरों की बालकनी या फिर छतों से तालियां या फिर थालियां बजा कर धन्यवाद करेंगे.

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ईमोश्नल होती दिखाई दीं सपना चौधरी…

इस मौके पर हरियाणा कि डांसिंग क्वीन और दर्शकों की फेवरेट सपना चौधरी (Sapna Choudhary) ने अपनी एक वीडियो फैंस के साथ शेयर की जिसमें वे रोती हुईं और ईमोश्नल होती दिखाई दीं. इस वीडियो को उन्होनें अपने औफिशिल इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है जिसके कैप्शन में लिखा है कि, “बूरे समय में भी कुछ अच्छाई होती है, गर्व है हमें एकता और अखंडता पर #emotionalmoments #indian #proudtobeindian #besafe #strongertogether #gocarona”.

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जनता कर्फयू के बाद भारत लौकडाउन…

इसी वीडियो में सपना चौधरी तालियां बजाते हुए रोती हुईं नजर आईं जिससे पता चलता है कि उन्हें अपने देश से कितना प्यार है. हालांकि वे एक ऐसा दृश्य था कि हर हिंदुस्तानी कि आंखें जरूर नम हुई होंगी. आज जो लड़ाई भारत कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ रहा है वे वाकई काबिल-ए-तारीफ है. रविवार के जनता कर्फयू के बाद सरकार ने भारत लौकडाउन का भी ऐलान कर दिया जिससे कि कोई भी व्यक्ति अपने घर से नहीं निकल सकता और इस समय किसी के भी संपर्क में आना खतरे से खाली नही है.

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इस शख्स से की थी सपना ने सगाई…

कुछ समय पहले सपना चौधरी को लेकर ऐसी खबरे आ रही थीं कि उन्होनें सगाई कर ली है. खबरो की माने तो सपना ने हरियाणा के मशहूर सिंगर और एक्टर वीर साहू (Veer Sahu) के साथ सगाई रचाई थी. हालांकि दोनों में से किसी ने भी इस खबर को लेकर औफिशियल अनाउंसमेंट नहीं की है. वीर साहू को कई लोग हरियाणा के बब्बू मान के नाम से भी जानते हैं.

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#coronavirus: देश के कई शहर लौकडाउन, क्या है लौकडाउन?

देश के कई शहर लौकडाउन(Lockdown) हो चुके हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लौकडाउन का मतलब होता है क्या है? इसका मतलब ये है कि आप कहीं बाहर नहीं जाएंगे, कहीं भी आ -जा नहीं सकते हैं, पब्लिक ट्रांसर्पोट नहीं चलेंगे सारी दुकानें, मौल्स, छोटी-बड़ी सारी शौप बंद रहेगी केवल वही दुकानें खुलती हैं जो जरूरी हैं, जिससे की लोगों की रोजमर्रा की जो चीजें हैं वो ले सकें आम आदमी. इसे आप ऐसे समझें

क्या खुला रहेगा?   

अस्पताल, मेडिकल स्टोर, मेडिकल लैब, सब्जी, राशन की दुकान, कुछ राज्यों में पेट्रोल-पंप, दूध सेंटर, डेयरी ये सब खुले रहेंगे.

अब क्याक्या बंद रहेगा?

पैसेंजर ट्रेन, मेट्रो सेवा, मौल, बाजार, सरकारी और निजी दफ्तर, गो एयर फ्लाइट्स इन सब पर होता है प्रतिबंध.

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अब जानिए की लौकडाउन में कौन बाहर निकल सकता है?

डौक्टर, पुलिस, फायर सर्विस, बिजलीकर्मी, मीडिया कर्मी, पानी वाले ये सभी व्यक्ति बाहर निकल सकते हैं क्योंकि इनका निकलना जरूरी होता है लेकिन इसके अलावा किसी को भी बाहर निकलने की मनाही होती है.

अब वो सेवाएं जो जारी रहेंगी, तो जल विभाग, दमकल विभाग, बिजली विभाग, पुलिस प्रशासन, राशन की दुकानें, गैस सिलेंडर सर्विस, पेट्रोल-सीनजी पंप, मेडिकल से जुड़ी सेवाएं, अस्पताल ये सारी सेवाएं नहीं बंद होती हैं

अब जानिए की आम नागरिक कब बाहर निकल सकता है?

मरीजों को अस्पताल जाने के लिए और दूध, सब्जी राशन, जरूरत की चीजें लाने के लिए लेकिन इसमें भी जरूरी कागजात अपने साथ रखें क्योंकि पुलिस कभी भी मांग सकती है.

अब आप समज गए होंगे कि लौकडाउन क्या होता है और ये इसलिए भी जरूरी होता ताकि जो संकट देश पर आया है उससे निपटा जा सके और सब कुछ सामान्य हो सके और इस वक्त कोरोना वायरस (Corona Virus) भयंकर खतरा बना हुआ है देश पर. इसके बावजूद भी लोगों ने लौक डाउन का मजाक बनाकर रख दिया है, खुले आम लौकडाउन का उल्लंघन कर रहे हैं. लोग अपने घरों से निकल रहे हैं, घर पर रहेंगे तो इस महामारी से बच पाएंगे ये बात तो जैसे उन्हें समझ ही नहीं आ रही है.

बिहार से तो बेहद ही हैरान कर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं, लोग बसों में भर-भर कर एक जगह से दूसरी जगह जा रहा हैं. तो वहीं दिल्ली नोएडा बौर्डर बंद होने के चलते लोग पैदल ही अपने घरों की तरफ निकल रहे हैं, कह रहे हैं की मजबूरी है हमारी, हालांकि कुछ हर जगह पर ऐसा नहीं हो रहा है क्योंकि लोग नियम का पालन कर रहे हैं. लौकडाउन को लेकर केंद्र सरकार ने राज्यों को कड़े निर्देश दिए हैं राज्य सरकारों को कहा गया है कि नियमों का पालन नहीं करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद लोगों को सख्त नसीहत दी है.  पीएम ने लोगों से लौकडाउन के दौरान घरों में रहने की अपील की है लेकिन अभी भी लौकडाउन को कई लोग गंभीरता से नहीं ले रहे हैं जिसके चलते लौकडाउन पर पीएम ने दोबारा से ट्वीट कर दुख जताया है और ट्वीट में कहा है कि “लौकडाउन को अभी भी कई लोग गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. कृपया करके अपने आप को बचाएं, अपने परिवार को बचाएं, निर्देशों का गंभीरता से पालन करें. राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि वो नियमों और कानूनों का पालन करवाएं.” इससे प्रधानमंत्री की नाराजगी का साफ पता चल रहा है.

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देश में कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़कर 396 हो गई है, जिसके बाद देशभर के करीब 22 राज्यों में कोरोना वायरस के खौफ के बीच लौकडाउन कर दिया गया है, झारखंड, दिल्ली, हरियाणा,  आंध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, चंडीगढ़, समेत कई राज्यों को लौकडाउन कर दिया गया है. दरअसल, देश के कई हिस्सों में लोग लौकडाउन को हल्के में ले रहे हैं जो की कहीं से भी सही नहीं है. दिल्ली नोएडा एक्सप्रेस वे को भी लौकडाउन कर दिया गया है. यूपी के 16 जिले लौकडाउन कर दिए हैं. कोरोना वायरस के बढ़ते कहर को देखते हुए दिल्ली को 31 मार्च तक लौकडाउन कर दिया गया है.

आज लौकडाउन के पहले दिन दिल्ली के कई इलाकों में दूध की दुकानों पर लंबी कतारे देखने को मिलीं तो कहीं सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा, दिल्ली की सभी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बंद करने का फैसला लिया गया है, मेट्रो, टैक्सी, ई-रिक्शा, सब कुछ बंद है इसके अलावा, दूसरे राज्यों से सटी दिल्ली की सभी सीमाएं भी पूरी तरह से सील हो गई हैं. महाराष्ट्र और जम्मू भी लौकडाउन है. अब इसका असर कितना होगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इससे काफी हद तक कोरोना मरीजों की संख्या कम हो सकती है.

Best of Manohar Kahaniya: हवस की खातिर मिटा दिया सिंदूर

ढेलाणा गांव के बहुचर्चित संतोष हत्याकांड की अदालत में करीब 2 साल तक चली सुनवाई के बाद  माननीय न्यायाधीश ने 10 जुलाई, 2017 को फैसला सुनाने का दिन मुकर्रर कर दिया. लिहाजा उस दिन जोधपुर के अपर सेशन न्यायाधीश नरेंद्र सिंह मालावत की अदालत दर्शकों से खचाखच भरी हुई थी.

जज साहब के अदालत में बैठने के बाद लोग आपस में कानाफूसी करने लगे. जज साहब ने अपने सामने रखे फैसले के नोट्स व्यवस्थित किए तो फुसफुसाहटें थम गईं और अदालत में एक पैना सन्नाटा छा गया. सभी के दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था कि पता नहीं रामेश्वरी और उस के प्रेमी भोम सिंह को क्या सजा मिलेगी.

इन दोनों ने जिस तरह का अपराध किया था, उसे देखते हुए लोग चाह रहे थे कि उन्हें फांसी होनी चाहिए. आखिर रामेश्वरी और भोम सिंह ने ऐसा कौन सा अपराध किया था, जिस की सजा को जानने के लिए तमाम लोग अदालत में समय से पहले ही पहुंच गए थे. यह जानने के लिए हमें घटना की पृष्ठभूमि में जाना होगा.

राजस्थान के जिला जोधपुर के लोहावट थाने में 12 फरवरी, 2015 को कुनकुनी दोपहरी में अच्छीखासी गहमागहमी थी. एडिशनल एसपी सत्येंद्रपाल सिंह एसडीएम राकेश कुमार के साथ थाने के दौरे पर थे. उस समय दोनों अधिकारी थाने में एक जरूरी मीटिंग ले रहे थे. मीटिंग इलाके में बढ़ती आपराधिक वारदातों को ले कर बुलाई गई थी.

मीटिंग में सीओ सायर सिंह तथा लोहावट के थानाप्रभारी निरंजन प्रताप सिंह भी मौजूद थे. मीटिंग के दौरान ही थाने के बाहर हो रहे शोर की ओर अचानक अधिकारियों का ध्यान गया. शोर थमने के बजाय तेज होता जा रहा था. एडिशनल एसपी ने थानाप्रभारी को शोर के बारे में पता लगाने का इशारा किया. थानाप्रभारी तुरंत यह कहते हुए बाहर की तरफ लपके, ‘‘सर, मैं पता करता हूं.’’

कुछ ही मिनटों में थानाप्रभारी बड़ी अफरातफरी में लौट आए. उन्होंने बताया, ‘‘सर, बाहर सुतारों की बस्ती के कुछ लोग हैं, जो किसी के कत्ल की रिपोर्ट लिखाने आए हैं. जब उन्हें कुछ देर इंतजार करने को कहा तो वे बुरी तरह उखड़ गए. वे मीटिंग से पहले रिपोर्ट लिखाने की मांग कर रहे हैं.’’

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थानाप्रभारी की बात सुनने के बाद एडिशनल एसपी के चेहरे पर उत्सुकता जाग उठी. सहमति जानने के लिए उन्होंने एसडीएम राकेश कुमार की ओर देखा और फिर थानाप्रभारी से बोले, ‘‘ठीक है, उन में से 1-2 खास लोगों को बुला लाओ.’’

थानाप्रभारी भीड़ में से एक आदमी को बुला लाए. एएसपी ने उस अधेड़ शख्स को कुरसी पर बैठने का इशारा किया. उस के बैठने के बाद उन्होंने पूछा, ‘‘बताओ, क्या मामला है?’’

उस आदमी ने अपना नाम कैलाश बता कर बोला कि वह ढेलाणा गांव की सुतार बस्ती में रहता है. उस के घर के पास ही उस के चाचा संतोष का मकान है, जहां वह अपनी पत्नी रामेश्वरी और 3 बेटियों व एक बेटे के साथ रहते थे. चाची रामेश्वरी उर्फ बीबा के नाजायज संबंध गांव के ही भोम सिंह के साथ हो गए थे. इस की जानकारी संतोष को भी थी.

6 फरवरी से चाचा संतोष रहस्यमय तरीके से गायब हैं. चाचा के खून से सने अधजले कपड़े ग्रेवल रोड के पास पड़े हैं. इस से मुझे लगता है कि चाची ने भोम सिंह के साथ मिल कर चाचा की हत्या कर लाश को कहीं ठिकाने लगा दिया है.

एएसपी सत्येंद्रपाल सिंह कुछ देर तक फरियादी को इस तरह देखते रहे, जैसे उस की बातों की सच्चाई जानने का प्रयास कर रहे हों. इस के बाद एसडीएम राकेश कुमार से निगाहें मिला कर अपने मातहतों की तरफ देखते हुए बोले, ‘‘चलो, ग्रेवल रोड की ओर चल कर देखते हैं.’’

लगभग आधे घंटे में ही एएसपी पूरे अमले के साथ कैलाश द्वारा बताई गई जगह पर पहुंच गए. कैलाश ने हाथ का इशारा करते हुए कहा, ‘‘साहब, वो देखिए, वहां पड़े हैं कपड़े.’’

एएसपी समेत पुलिस अधिकारियों ने आगे बढ़ कर नजदीक से देखा तो उन्हें यकीन आ गया कि कैलाश ने गलत नहीं कहा था. वास्तव में ग्रेवल रोड की ढलान पर खून सने अधजले कपड़े पड़े थे. खून आलूदा कपड़ों से जाहिर था कि मामला हत्या का न भी था तो जहमत वाला जरूर था.

पुलिस को देख कर वहां गांव वालों की भीड़ लगनी शुरू हो गई. एएसपी ने थानाप्रभारी से कपड़ों को सील करने के आदेश दिए. इस के बाद कैलाश को करीब बुला कर तसल्ली करनी चाही, ‘‘तुम पूरे यकीन के साथ कैसे कह सकते हो कि ये कपड़े तुम्हारे चाचा संतोष के ही हैं?’’

‘‘साहब, आप एक बार रामेश्वरी और भोम सिंह से सख्ती से पूछताछ करेंगे तो हकीकत सामने आ जाएगी. दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’ कैलाश ने हाथ जोड़ कर विनती के स्वर में कहा, ‘‘आप रामेश्वरी की बेटियों से पूछताछ करेंगे तो इस मामले में और ज्यादा जानकारी मिल सकती है.’’

थाने पहुंच कर एएसपी ने रामेश्वरी और उस की बेटियों मनीषा, भावना और अंकिता को थाने बुलवा लिया. पुलिस ने रामेश्वरी को अलग बिठा कर उस की बेटियों से पूछताछ की तो उन्होंने अपने पिता की नृशंस हत्या किए जाने का आंखों देखा हाल बयां कर दिया. उन्होंने बताया कि पापा की हत्या मम्मी और भोम सिंह ने की थी. तीनों बहनों की बात सुन कर सभी अधिकारी सन्न रह गए.

रामेश्वरी थाने में ही बैठी थी. एएसपी के आदेश पर थानाप्रभारी भोम सिंह के घर पहुंच गए. वह घर पर ही मिल गया. वह उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आए. थाने में रामेश्वरी और उस के बच्चों को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया. वह समझ गया कि इन लोगों ने पुलिस को सब कुछ बता दिया होगा, इसलिए उस ने पुलिस पूछताछ में सारी कहानी बयां कर दी. उस ने बताया कि उसी ने तलवार से काट कर संतोष की हत्या की थी. भोम सिंह से पूछताछ के बाद हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

संतोष कुमार लकड़ी के इमारती काम का हुनरमंद कारीगर था. इस छोटी सी ढाणी में या आसपास उसे उस के हुनर के अनुरूप मजदूरी नहीं मिल पाती थी, इसलिए 2 साल पहले वह एक जानकार के बुलाने पर मुंबई चला गया था, जहां उसे अच्छाखासा काम मिल गया था.

संतोष के परिवार में पत्नी रामेश्वरी के अलावा 3 बेटियां और एक बेटा था. बेटा सब से छोटा था, जबकि बड़ी बेटी मनीषा 13 साल की है, भावना 10 साल की और अंकिता 8 साल की. संतोष काम के सिलसिले में ज्यादातर घर से बाहर ही रहता था.

इसी दौरान गांव के ही 28 साल के भोम सिंह के साथ 50 साल की रामेश्वरी का चक्कर चल गया. उस का रामेश्वरी के यहां आनाजाना बढ़ गया. भोम सिंह एक आवारा युवक था, इसलिए रामेश्वरी के ससुराल वालों ने उस के बारबार घर आने पर आपत्ति जताई. मोहल्ले के लोग भी तरहतरह की बातें करने लगे.

डर की वजह से कोई भी सीधे भोम सिंह से कहने की हिम्मत नहीं कर पाता था. संतोष कुमार जब मुंबई से लौटा, तब उसे लोगों के द्वारा पत्नी के कदम बहक जाने की जानकारी मिली. नतीजा यह हुआ कि संतोष ने रामेश्वरी की जम कर खबर ली.

इत्तफाक से भोम सिंह एक दिन ऐसे वक्त में रामेश्वरी से मिलने उस के घर आ टपका, जब घर में संतोष मौजूद था. संतोष तो पहले ही उस से खार खाए बैठा था. उस ने भोम सिंह को बुरी तरह आड़े हाथों लिया और उसे चेतावनी दे दी कि आइंदा वह इस घर की ओर रुख करेगा तो अच्छा नहीं होगा.

अच्छीखासी लानतमलामत होने के बावजूद भी भोम सिंह ने उस के घर आना न छोड़ा और न ही रामेश्वरी ने उसे घर आने से मना किया. संतोष की मजबूरी थी कि वह ज्यादा दिन छुट्टी नहीं ले सकता था और मुंबई में रिहायशी दिक्कत के कारण परिवार को साथ नहीं ले जा सकता था. लिहाजा उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे.

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एक बार संतोष ने पत्नी और भोम सिंह को फिर रंगेहाथों पकड़ लिया. लेकिन भोम सिंह फुरती से वहां से भाग गया. जातेजाते वह कह गया कि वह इस बेइज्जती का बदला ले कर रहेगा.

फरवरी, 2015 में संतोष मुंबई से घर लौटा. उस के आने के बाद रामेश्वरी की इश्क की उड़ान में व्यवधान पैदा हो गया. रास्ते में रोड़ा बने पति से छुटकारा पाने के बारे में उस ने प्रेमी से बात की. फिर दोनों ने संतोष को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. उन्होंने तय कर लिया कि इस बार वे संतोष को ठिकाने लगा कर ही रहेंगे.

योजना के अनुसार 6 फरवरी, 2015 की आधी रात को भोम सिंह छिपतेछिपाते संतोष के घर पहुंच गया. उस समय संतोष गहरी नींद में सो रहा था, जबकि रामेश्वरी प्रेमी के आने के इंतजार में जाग रही थी. उसी समय भोम सिंह ने सोते संतोष के ऊपर तलवार से वार कर दिया.

संतोष की मर्मांतक चीख सुन कर तीनों बेटियां हड़बड़ा कर उठ बैठीं. वे भाग की भीतरी चौक में पहुंचीं और जो भयानक नजारा देखा तो उन्हें जैसे काठ मार गया. भोम सिंह उन के पिता पर तलवार से वार कर रहा था और वह गिरतेपड़ते छोड़ देने की मिन्नतें कर रहे थे. लेकिन उस शैतान का दिल नहीं पसीजा.

रामेश्वरी पास में खड़ी सब कुछ देख रही थी. मनीषा ने पिता को बचाने की कोशिश की तो भोम सिंह ने धमका कर उसे परे धकेल दिया और कहा कि अगर किसी को भी बताया तो तीनों को तलवार से काट देगा.

संतोष की हत्या के बाद भोम सिंह ने उस के कपड़े उतार दिए और लाश एक पौलीथिन में लपेट कर बोरी में भर दी. बाद में उस बोरी को एक ड्रम में डाल कर कमरे में रख दी.

इस के बाद भोम सिंह चला गया. अगले दिन रात को वह बैलगाड़ी ले कर आया, तब रामेश्वरी और भोम सिंह ने मिल कर ड्रम को गाड़ी में डाला. वे लाश को शिवपुरी रोड पर घने जंगल में दफन कर आए. रामेश्वरी ने घर लौटने के बाद रात को पति के खून सने कपड़े चूल्हे में डाल कर जलाने की कोशिश की, लेकिन कपड़े खून से गीले होने के कारण पूरी तरह से जल नहीं पाए. फिर 11 फरवरी की रात को रामेश्वरी अधजले कपड़ों को ग्रेवल रोड पर फेंक आई.

बाद में वह शोर मचाने लगी कि मेरे भरतार (पति) के खून सने कपड़े ग्रेवल रोड पर पड़े हैं, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चल रहा है. उस की चीखपुकार सुन कर अड़ोसीपड़ोसी भी आ गए. उसी दौरान संतोष का भतीजा कैलाश भी आ गया. उस ने ग्रेवल रोड पर चाचा के खून सने अधजले कपड़े देखे तो उसे शक हो गया.

इस से पहले कैलाश व अन्य पड़ोसियों को संतोष कई दिनों तक दिखाई नहीं दिया तो पड़ोसियों ने भी रामेश्वरी से पूछा. पर रामेश्वरी ने यह कह कर टाल दिया कि यहीं कहीं होंगे. पर उस के जवाब से कोई संतुष्ट नहीं था. बच्चों ने बताया कि डर की वजह से उन्होंने भी मुंह नहीं खोला.

भोम सिंह और रामेश्वरी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर संतोष की लाश और तलवार बरामद कर ली. पुलिस ने सारे सबूत जुटा कर दोनों अभियुक्तों के खिलाफ भादंवि की धारा 450, 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया.

पुलिस ने फोरैंसिक एक्सपर्ट की रिपोर्ट व अन्य साक्ष्यों के अलावा निर्धारित समय में आरोपपत्र तैयार कर कोर्ट में पेश कर दिया. करीब 2 सालों तक अदालत में केस की सुनवाई चली. तमाम साक्ष्य पेश करने के साथ गवाह भी पेश हुए. 10 जुलाई, 2017 को न्यायाधीश नरेंद्र सिंह मालावत ने केस का फैसला सुनाने का दिन निश्चित किया.

सजा सुनाने के पहले माननीय न्यायाधीश नरेंद्र सिंह ने कहा कि अभियोजन पक्ष प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यों, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों एवं बरामदगियों से इस घटना की कड़ी से कड़ी जोड़ने में सफल रहा है. इसी प्रकार घटना से ताल्लुक रखती फोरैंसिक रिपोर्ट में मकतूल की पत्नी अभियुक्ता रामेश्वरी के कपड़ों पर पाए गए खून के छींटे भी मकतूल संतोष कुमार के खून से मिलते पाए गए.

ऐसी स्थिति में अभियुक्तों का बचाव संभव नहीं है. एक पल रुकते हुए विद्वान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मौकाएवारदात पर मौजूद मकतूल की तीनों बेटियां अंकिता, भावना और मनीषा प्रत्यक्षदर्शी थीं.

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‘‘अंकिता और भावना ने अभियोजन पक्ष की कहानी की पूरी तस्दीक की है, इसलिए बचाव पक्ष की इस दलील पर घटना को झूठा नहीं माना जा सकता कि अभियोजन पक्ष ने मनीषा को पेश नहीं किया. लड़कियां मुलजिम भोम सिंह की इस धमकी से बुरी तरह डरी हुई थीं. उन्होंने पुलिस के आने के बाद ही मुंह खोला.’’

विद्वान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कोर्ट इस सच्चाई से वाकिफ है कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में मकतूल की मौत की वजह सिर तथा शरीर के अन्य हिस्सों पर घातक चोटें आना बताया गया है. वारदात में इस्तेमाल की गई तलवार की बरामदगी भी मुलजिम के कब्जे से होना उस के आपराधिक षडयंत्र को पुख्ता करती है.

‘‘हालांकि यह मामला विरल से विरलतम की श्रेणी में नहीं आता, किंतु ऐसे गंभीर अपराध की दोषसिद्धि में अपराधियों को कोई रियायत देना उचित नहीं है. इसलिए तमाम सबूतों और गवाहों के बयान के आधार पर अदालत मृतक की पत्नी रामेश्वरी और उस के प्रेमी भोम सिंह को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाती है.’’

सजा सुनाए जाने के बाद पुलिस ने दोनों मुजरिमों को अपनी कस्टडी में ले लिया. अदालत में मौजूद लोगों और मृतक की बेटियों ने इस सजा पर तसल्ली व्यक्त की.

#coronavirus: कोरोना: मै धृतराष्ट्र हूं 

आजकल जाने क्यों महाभारत का एक पात्र, धृतराष्ट्र मेरे सपने में आता है . धृतराष्ट्र दुर्योधन का पिता- श्री सौ कौरवों का जन्माध पिता . मुनि वेदव्यास रचित दुनिया के एक महानतम धार्मिक ग्रंथ का अजब गजब पात्र . कभी-कभी ऐसा लगता है धृतराष्ट्र का व्यवहार हम स्वयं भी करते हैं. मगर धृतराष्ट्र को घृणा ही मिली .

मैं जैसे  ही सोता हूं, थोड़ी देर बाद धृतराष्ट्र दिखने लगता है . हीरे, स्वर्ण जड़ित मुकुट, वस्त्रआभूषण, राज सिंहासन पर बैठा,मेरी ओर उन्मुख. मै डर जाता हूं भागता हूं और नींद टूटने से पहले उनकी आवाज कर्ण  विवृत्त में गर्म शीशे की तरह प्रविष्ट होती है- देश की संसद स्थगित हो गई क्या, राज्य की विधानसभा स्थगित है क्या…नींद टूटते ही मैं मस्तिक पर आए पसीने को पोछता हूं . उठ कर बैठ जाता हूं और सपने का निहितार्थ मन ही मन ढूंढता हूं . सोचता हूं, आजाद हिंदुस्तान के 73 वर्ष व्यतीत हो गए हैं और मैं अपने मन की चैन की नींद भी नहीं सो पा रहा हूं . इस आजादी का क्या अभिप्राय है ? गांधी जी ने कहा था-  स्वराज्य में हर आंख से आंसू पोछा जाएगा. मगर आंसू पोछने तो क्या कोई आता, गाल पर सूखकर पपड़ी में तब्दील  हो गए हैं . इधर उधर की सोचता  और मन को बहला कर फिर निंद्रा देवी की गोद में जाने बिस्तर पर लेट जाता हूं. यह सोचकर कि अब धृतराष्ट्र किसी और भारतीय के स्वपन में चला गया होगा और मर्माहत  उसी से अपनी जिज्ञासा शांत कर रहा होगा . मैं तो मधुर नींद की झपकियों का आनंद ले लूंगा .

मैं सो गया . स्वपन में क्या देखता हूं, धृतराष्ट्र पुनः  सामने खड़े हैं . मैं घबराया . पीछे मुड़ा और भागने का प्रयत्न करने लगा . मगर धृतराष्ट्र कोई छोटी मोटी हस्ती तो थी नहीं . महाराज ! के इशारों पर सैनिकों ने भालों की नोक पर मुझे पकड़ महाराज के समक्ष पेश किया .मेरे चेहरे से हवाइयां उड़ रही थी- महाराज ! क्षमा . मैं क्षमा चाहता हूं, एक बार गलती मुआफ करें .

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‘मूर्ख ! उनका शेर की मानिंद स्वर गूंजा- ‘तू बार-बार धोखा देकर भाग जाता था . लोग हमारे बुलावे का इंतजार करते हैं, महाराज धृतराष्ट्र बुलाएं ! और तुम भाग जाते हो, क्यों ? क्या हम हस्तिनापुर के महाराज !  इतने गए गुजरे हैं….

‘ मैं अज्ञानी हूं महाराज ! सोचा कहीं आप से सामना हुआ और मैं प्रोटोकॉल के मुताबिक सम्मान ना दे सका . कुछ बहकी बहकी कह गया तो आपके एक ही इशारे पर मेरा सर कही धड़… कहीं- सो मैं भयभीत हो गया .

‘ देखो चतुराई पूर्ण बातें सुनने के हम आदी नहीं हैं . हमें साफ-साफ जो पूछे दुनिया का हाल बताओ . बस यही हमारा आदेश है . धृतराष्ट्र ने राजदंड को हाथों में घुमाते हुए कहा .

अब तो मैं फंस गया था . सोचता, क्या यह स्वपन है या सच ! अगर सब सच है तो फंस गया! मैंने हाथ जोड़कर परिस्थिति के अनुरूप कहा- ‘महाराज ! दुनिया का हालो हवाल भला मैं अज्ञानी क्या बताऊंगा .

‘ हमे संसद का हाल सुनाओ.. कोरोना  का सच्चा हाल बताओ . बताओ कोरोना के भय का क्या होगा ? कोरोना से विधानसभा  मे क्या  कठिनाइयां आ रही हैं ? प्रदेश के नेता  इतना घबराये हुए  काहे है ? ऐसे ही छोटे-छोटे प्रश्न हैं बस…. धृतराष्ट्र ने मिठास भरे स्वर में पूछा .

‘ महाराज मैंने हाथ जोड़कर कहा –  ‘ महाराज ! आप यह सब कुछ संजय से क्यों नहीं पूछते ? महाभारत में तो युद्ध के समय उन्होंने एक-एक पल की खबर आपको दी थी . उनको क्या हो गया है ?

‘ मूर्ख ! हमारा एक एक मिनट कीमती है . उनके चेहरे पर क्रोध था और स्वर में खींझ- तू क्या अपने को क्या समझता है… संजय होता तो क्या मैं तुझे परेशान करता . इतने बड़े महा युद्ध के समय उसने मुझे एक-एक क्षण की जानकारी दी थी तो क्या आज खबरें नहीं देता . तो महाराज ! एक अदद टीवी ऑन कर बैठ जाइए न राष्ट्रीय हो या लोकल टीवी पर तो सब कुछ दिखाया जा रहा है … सब कुछ दिखाया जा रहा है महाराज ! आप को बड़ी सुविधा रहेगी . मैं ने गिड़गिड़ा कर कहा- लेकिन हम तुम्हारे मुख से पल-पल की जानकारी सुनना चाहते हैं लोकल टीवी या नेशनल टीवी सब हमारे लिए बेकार हैं . जब हम देख ही नहीं सकते तो टेलीविजन के समक्ष क्यों बैठे .

मैं हक्का-बक्का धृतराष्ट्र की ओर आंखें फाड़ कर देख रहा था . उनके प्रश्न की काट नहीं थी मेरे पास मगर हठ पूर्वक कहा- टीवी नही तो समाचार पत्र मंगा कर पढ़ लीजिए .

धृतराष्ट्र ने आत्मभिमान के साथ घूर कर देखा .

‘ फिर बकवास ! तुम्हें पता नहीं हम जन्माध हैं . कैसे समाचार पत्र पढेंगे .

‘ महाराज ! मैं तो…जो आपको सत्य जानकारी टीवी और समाचार पत्रों से मिलेगी वह मैं कहां दे पाऊंगा . मैं ने गिड़गिड़ा कर चेहरे पर मासूमियत का भाव चिपका कर कहा .

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‘ तुम आखिर यह क्या नौकरी कर रहे हो . हमारा… हमारा आदेश मानने से इनकार ? इतना साहस ? क्या हमारे क्रोध से नावाकिफ हो या हमारे अत्याचार के संदर्भ में तुम्हें खबर नहीं है .

‘ महाराज ! शायद आपको पता नहीं, हमारे भारतवर्ष में आजकल क्या हो रहा है ?

‘ क्या हो रहा है मूर्ख . उन्होंने दहाड़ कर पूछा .

‘ महाराज मै, हमारा राष्ट्र आपको आदर्श मानकर धृतराष्ट्र बना हुआ है महाराज ! जुबान तालू से चिपक गई है . इसलिए मैं कुछ देखता हूं ना सुनता हूं . मैं स्वयं धृतराष्ट्र बन गया हूं .

‘ तो यह मेरी बढ़ाई है या बुराई वत्स ! धृतराष्ट्र ने चिंतित स्वर में अपने राज सिंहासन पर बैठते हुए कहा .

‘ महाराज ! यह तो समय तय करेगा मगर मैं इतना बता सकता हूं संसद, विधानसभा, मीडिया, अफसर, सरकार सभी आप को आदर्श मानते हैं . ‘तभी मोबाइल की कर्कश ध्वनि ने निंद्रा तोड़ी में स्वप्न से बाहर आ गया . सोचने लगा धृतराष्ट्र की मूर्ति चौराहे पर लगनी चाहिए .

#coronavirus: एक्सपर्ट से जानिए कोरोना का सेक्स कनेकशन

कोरोना की दहशत और लौक डाउन , शट डाउन के चलते यह वह दौर है जब अधिकतर लोग घरों में कैद हैं. हमारे देश में एक दिन के जनता कर्फ़्यू के बाद से ही लोगों को वक्त काटना मुहाल हो रहा है ऐसे में जाहिर है आनंद लेने का एक बड़ा जरिया सेक्स भी है जिस पर यह शेर एकदम फिट बैठता है कि मौसम भी है… मौका भी है… और दस्तूर भी है…

जानकर हैरानी होती है कि आपदा के इस वक्त में भी दुनिया भर के लोग तबीयत से पौर्न साइट सर्च कर रहे हैं जो उन्हें निराश नहीं कर रहीं है बल्कि यह तक सिखा रहीं हैं कि मास्क पहनकर और कुछ एहतियात बरतकर वे कैसे कैसे सेक्स का लुत्फ उठा सकते हैं . इनमें से एक वीडियो चीन के वुहान , जहां से कोरोना की उत्पत्ति हुई बताई जा रही है का भी है कि वहां के लोग अब कैसे सेक्स कर रहे हैं .

बात कम दिलचस्प नहीं कि आहार , भय और निद्रा की तरह मैथुन भी लोगों की प्राथमिकता में शिद्दत से है जिसकी तादाद इन दिनों बढ़ रही है लेकिन लोग कोरोना को लेकर सहमे हुये भी हैं कि कहीं सेक्स करने से तो इस जानलेवा वायरस का प्रकोप उन पर नहीं होगा . भोपाल जैसे बी श्रेणी के शहर में जहां लौक डाउन है वहां भी लोग स्पेशलिस्ट डाक्टरों से भी सलाह ले रहे हैं कि सेक्स करें या न करें और करें तो कैसे करें जिससे महफूज रहें .

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इस बारे में इस प्रतिनिधि ने भोपाल के सबसे बड़े और नामी बंसल अस्पताल के जाने माने कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट और सेक्सपर्ट डा. सत्यकान्त त्रिवेदी से बात की तो उन्होने बताया कि कोरोना के चलते सेक्स बेहिचक किया जा सकता है क्योंकि यह सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारी नहीं है लेकिन जरूरी यह है कि आप या आपका पार्टनर संक्रमित न हो इसलिए सेक्स के पहले खुद का और पार्टनर का संक्रमित न होना सुनिश्चित किया जाना जरूरी है .

डा. सत्यकान्त के पास रोज कई लोग ऐसे आ रहे हैं या फिर फोन पर सलाह ले रहे हैं जिन्हें वे ये टिप्स दे रहे हैं –

  • इस वक्त में कोई नया सेक्स पार्टनर न बनाएं यानी नए व्यक्ति से सेक्स करने से बचें.
  • अगर विदेश से आए हैं या विदेश से आए किसी व्यक्ति के संपर्क में आए हैं तो सेक्स से यथासंभव परहेज करें.
  • सर्दी जुकाम खांसी हो तो भी सेक्स से बचें लेकिन यह डरने की बात नहीं बल्कि एक तरह की सावधानी है , सर्दी जुकाम भी नजदीक आने से फैलते हैं.
  • संक्रमण की स्थिति में नो टच पालिसी पर चलें.
  • सेक्स के दूसरे माध्यमों का प्रयोग कर सकते हैं जैसे आडियो वीडियो चेट वगैरह.

यानि बात डरने की नहीं बल्कि सावधानिया बरतने की है क्योंकि कोरोना वायरस सहवास से नहीं फैलता और न ही इसका प्राइवेट पार्ट्स से कुछ लेना देना है .  यह श्वसन तंत्र से फैलने बाली बीमारी है इसलिए चुंबन और मुंह से की जाने बाली दूसरी सेक्स क्रियाएँ नहीं की जानी चाहिए .

यह दबाब मुक्त एकांत सेक्स के लिए तो वरदान सा ही है क्योंकि अधिकांश कपल्स आजकल कामकाजी हैं और क्षमता से ज्यादा काम उन्हें करना पड़ता है जिसका दुष्प्रभाव उनकी सेक्स लाइफ पर भी पड़ता है इसलिए खुलकर सेक्स का लुत्फ उठाएँ लेकिन ऊपर बताई गई सावधानियों के साथ .

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बेल्जियम में प्रतिबंध –    कोरोना का सेक्स कनेकशन बड़े दिलचस्प तरीके से बेल्जियम में देखने में आया है जहां की स्वास्थ मंत्री ने ग्रुप सेक्स पर प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि सेक्स पार्टियों के लिए बदनाम बेल्जियम के लोग बियर भी इफ़रात से पीने के लिए जाने जाते हैं हमारे देश के चुनिन्दा बड़े शहरों में इस तरह की पार्टियां होती हैं जहां समूहिक सेक्स का चलन बड़े पैमाने पर पसर चुका है . कोरोना इन लोगों के लिए चेतावनी है नहीं तो इस मजे की कीमत बहुत महंगी भी पड़ सकती है .

#Coronavirus: एक सबक है जनता कर्फ्यू

जनता कर्फ्यू के सफलता के चलते 22 मार्च रविवार का दिन भारतीय इतिहास दर्ज हो चुका है. कारण है चीन से निकला  और दुनियाँ भर के लिए संकट बन चुका कोरोना वायरस (COVID-19). विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह दुनियां 170 देशों में अपना पैर पसार चुका है.  इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश चीन और इटली है इटली में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या में हर रोज इजाफा हो रहा है. जिससे रोज होने वाली मौतों का आकड़ा भी बढ़ता जा रहा है. शनिवार को इटली में अकेले 793 लोगों की मौत हो हुई. इसी के साथ  इटली में COVID-19 से मरने वालों की संख्या 4825  हो चुकी है और दुनियां भर में COVID-19 से मरने वालों संख्या 13 हजार के आंकडे को पार कर चुकी है. इससे पीड़ितों की संख्या भी 2 लाख को पार कर चुकी है. भारत में भी कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. और इसके पीड़ितों की संख्या 324 तक पहुँच चुकी है. कोरोना के संक्रमण से भारत में अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है.

इसके प्रभाव में आये देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है. लोगों को घर से काम करने की हिदायत दी जा चुकी है. स्कूल कालेजों को बंद कर एक जगह इकठ्ठा होने पर रोक लगाने के उद्देश्य से कई जिलों में धारा 144 लगा दी गई है. कोरोना COVID-19 के संक्रमण के फैलाव का कारण इससे पीड़ितों के संपर्क में आना रहा है. इसको देखते हुए भारत सरकार नें सभी तरह के अन्तराष्ट्रीय उड़ानों पर रोक लगा दी है. और बचाव के सभी यहतियात और प्रभावी कदम उठाये जा रहें हैं.

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कोरोना को रोकने के लिए प्रधानमन्त्री ने जनता कर्फ्यू के लिए किया अपील

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी नें इसकी भयावहता को देखते हुए COVID-19 के प्रसारपर रोक लगाने के उद्देश्य से 19 मार्च की शाम को देश से सीधा संवाद किया. उन्होंने कहा कि ये मत सोचिए कि सबकुछ ठीक है. वैश्विक महामारी से निश्चिंत होने की ये सोच ठीक नहीं है. मैं आज 130  करोड़ देशवासियों से एक और समर्थन मांग रहा हूँ  यह है जनता कर्फ्यू, जो जनता द्वारा जनता के लिए खुद पर लगाये जाने वाला कर्फ्यू होगा उन्होंने कहा की 22 मार्च को रविवार को सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक जनता कर्फ्यू का पालन करना है जनता कर्फ्यू के दरमियान कोई भी नागरिक घरों से बाहर न निकले ना सडक पर जाएँ न मोहल्ले में बल्कि अपने घरों में रहें.प्रधानमन्त्री के इस अपील के बाद राज्य सरकारों ने जनता कर्फ्यू का पालन कराने के लिए तत्काल प्रभाव से माल, रेस्टोरेंट,शैलून, जैसे व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को बंद करने का आदेश दे दिया.

देश के आजादी के बाद सबसे बड़ा जनता कर्फ्यू

भारत में यह पहली बार है जब आजादी के बाद पूरे देश के लोग घरों से बाहर नहीं निकले. प्रधानमन्त्री के इस अपील का जनता पर कितना असर हुआ यह तो नहीं कहा जा सकता है. लेकिन कोरोना COVID-19 का भय जनता में जरुर दिख रहा है. यही कारण है की बेहद कम समय में और बिना किसी प्रसार-प्रचार के जनता कर्फ्यू का असर शहरों से लेकर गाँवों तक देखा गया. जनता कर्फ्यू के चलते पूरा देश सन्नाटे में है. सड़कें सूनी हैं, मार्केट और दूकानों पर ताले लटक रहें हैं. जनता कर्फ्यू को सफल बनाने के लिए किसान, मजदूरों और व्यवसायियों पूरी तरह से काम ठप रखा. पेट्रोल पम्प, होटल, दुकानें आदि पूरी तरह बंद रहें हैं. यह पहली दफा  है की देश की जनता नें बिना किसी दबाव के जनता कर्फ्यू को सफल बनाने में अपना योगदान दिया. लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकले और लोगों से दुरी बनाने में अपनी भागीदारी निभाई.

साफ़-सफाई की आदतों में हुआ इजाफा

कोरोना वायरस के खौफ का असर यह रहा की पढ़े लिखे से लेकर अनपढ़ तक अपनी साफ़ सफाई के प्रति बेहद गंभीर दिख रहें है. लोग इस वायरस से बचने के लिए हाथ को बिना अच्छी तरह से धुले कोई भी काम नहीं कर रहें हैं. साथ ही वायरस का प्रवेश शरीर में न हो इसके लिए मास्क, गमछे से नाक को ढक रहें हैं. अपने घरों के आस-पास साफ़ सफाई का बेहद ख्याल रख रहें हैं. इस लिए यह सीधे तौर पर कहा जा सकता है जो काम सरकारें अरबों खरब रुपया खर्च कर नहीं कर सकती हैं उसे इस खतरनाक वायरस के भय ने कर दिखलाया.

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भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा चक्का जाम –

देश में यह पहली बार होगा की ट्रैक पर ट्रेनों का पहिया थम रहा है. भारत सरकार नें कोरोना वायरस संक्रमण पर रोक लगाने के लिए भारतीय रेल की सभी पैसेंजर ट्रेनों को 31 मार्च, 2020 तक के लिए रद्द कर दिया है.साथ ही रोडवेज की अधिकांश बसों को भी डिपो में खड़ा कर दिया गया है  इसके चलते सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हाईवे से ट्रकों की आवाजाही बंद रही. यूपी ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने भी जनता कर्फ्यू में सहयोग दिया है। अस्पतालों में इमरजेंसी को छोड़ दूसरी सेवाएं बंद हैं.

रोजमर्रा की जरूरतों को छोड़ कर अधिकांश राज्यों में लौक डाउन की स्थिति-

देश के तमाम राज्यों नें कोरोना की रोकथाम के लिए रोजमर्रा की जरूरतों को छोड़ कर बाकी के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साथ ही भीड़ इकठ्ठा करने वाले संस्थाओं और धार्मिक स्थलों के प्रवेश पर रोक लगा दिया है. अनुमान लगाया जा रहा है की अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो यह आदेश और भी बढ़ाया जा सकता है.

जनता रही सजग रोजमर्रा की जरूरतों का बनाया स्टाक

लॉक डाउन को लेकर जनता बेहद सजग है इस लिए खाने-पीने की दुकानों पर जनता कर्फ्यू के एक दिन पहले तक भारी भीड़ देखी गई. लोगों ने नमक, तेल, दाल, चावल, सोयाबीन बड़ी, आलू, माचिस जैसी आवश्यक चीजों की जम कर खरीददारी की और और एक सप्ताह से लेकर एक महीने तक स्टाक बनाया है ज्यादातर परिवारों ने दूध पाउडर और ब्रेड जैसी वस्तुओं का  भी स्टाक बना रखा है.

जातिधर्म और पार्टी का मुद्दा रहा गायब – कोरोना जैसी महामारी से निबटने के लिए सभी लोग एक जुट नजर आयें ऐसे में सभी पार्टियों और जाति धर्म के लोगों ने मिल कर जनता कर्फ्यू का समर्थन किया.

महानगरों से गाँवों तक में रहा सन्नाटा

देश में इस तरह की स्थिति पहली बार आई है जब महानगरों से लेकर गावों तक में सन्नाटा दिखा. इससे एक बात तो तय है की देश में जनता अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग है. यह सजगता कोरोना जैसी समस्या से निबटने के बाद भी दिखे तो देश के बेहतर बदलाव की उम्मीद की जा सकती है.

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अगर सरकार और जनता इसी तरह से सजग रही तो निश्चित ही कोरोना जैसी महामारी से देश को छुटकारा मिल सकता है. बस इस ऊर्जा को लोगों को बचाए रखना होगा. अगर सरकार और जनता इसमें फेल होती है तो देश के स्वास्थ्य सेवायें इस स्थिति में नहीं हैं की इससे निबट पायें. इस लिए कोरोना से निबटने का देश के सामने सावधानी और बचाव ही एक उपाय है.

#Coronavirus: झुंड में लोगों नें बजाई तालियां और थालियां तो इन एक्टर्स को आया गुस्सा

सोशल डिस्टेंस (Social Distance) के जरिये कोरोना के प्रभाव को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) ने अपील की है. जहां देश भर में जनता कर्फ्यू (Janta Curfew) का असर देखने को मिला और लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकले. तो वहीं सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठान व आवागमन के साधन भी बंद रहें. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों से यह अपील किया था की जो लोग कोरोना को हराने की जंग में शामिल हैं उनके हौसले को बढाने के लिए लोग अपने घरों की खिडकियों, दरवाजों और बालकनी से थाली ताली बजा कर समर्थन दर्ज करें. लेकिन इस दौरान सुबह 7 बजे से रात के 9 बजे तक घरों से बाहर न आने की अपील भी की थी. लेकिन कई लोगों ने इसे हल्के में लिया और शाम के समय झुण्ड में अपने घरों से बाहर आकर तालियां, शंख, और थालियां बजाने लगे. इससे जुडी तस्वीरें जब सोसल मीडिया पर शेयर हुई तो कई लोगों ने इस तरह के कृत्य की जम कर निंदा की और लिखा की सोशल मीडिया पर फोटो शेयर करने की सनक कोरोना को हराने की जंग में बाधा बन सकता है.

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झुण्ड में तालियां बजाते हुए लोगों की तस्वीरें सामने आने के बाद बौलीवुड से जुड़े कई एक्टर्स और डायरेक्टर्स ने ऐसे लोगों को अपने सोशल मीडिया के जरिये खरी खोटी सुनाई. एक्टर रोनित राय (Ronit Bose Roy) ने अपने ट्विटर एकाउंट पर इससे जुडी तस्वीरें शेयर की. चिंता व्यक्त करते हुए लिखा की मेरा मतलब है गंभीरता से ????????? (I mean seriously?????????). यह चिंता उन्होंने एक वीडियो पर व्यक्त किया है जिसमें सैकड़ों लोग थालियां बजाते हुए सड़क से गुजर रहे हैं. इसके बाद कई लोगों ने उनके इस ट्विट पर रिप्लाई देते हुए इस तरह के तमाम फोटोज भेज कर चिंता व्यक्त किया.

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बौलीवुड एक्टर  एक्टर शारिब हाशमी (Sharib Hashmi)  ने भी झुण्ड में थालियां बजाने निकले लोगों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक वीडियो शेयर किया और लिखा मैं न तो क्रोधित हूं और न ही दुखी हूं. मुझे डर लग रहा है! चेहरा ‘मैन ऐसा तो नहीं कहा था! “(I’m neither angry nor sad. I’m scared! ‘Maine aisa toh nahin kaha tha!”).

इस तरह से थालियां और तालियां बजाने के मामले में बौलीवुड डायरेक्टर ओनिर (Onir)  नें भी रोष व्यक्त किया और अपने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा जब यह मूर्खों की बात आती है तो हम बहुत सारे हैं देश में. रविवार की पोस्ट 5 Pm, माइंड यू कर्फ्यू 7 am से तक है. # JantaCurfewMarch22. (When it comes to Fools we are a land of plenty.Yesterday post 5Pm . Mind you curfew was supposed to be 7am to 9pm . #JantaCurfewMarch22).

उन्होंने एक और वीडियो शेयर करते हुए लिखा कहीं भारत में कुछ और इडियट्स शाम 5 बजे मना रहे थे। दोस्तों आप सभी बस हमारे #SocialDistancing और #JantaCurfew के PMs विज़न को देखें. अभी भी कर्फ्यू जारी है.( Somewhere In INDIA some more Idiots were celebrating at 5pm. Guys you all just let down our PMs vision of #SocialDistancing and #JantaCurfew . The curfew is still on )

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पंजाबी एक्टर गिप्पी ग्रेवाल (Gippy Grewal) ने भी झुण्ड में इकट्ठा होने पर चिंता व्यक्त किया और एक वीडियो शेयर कर लिखा “सच में??? इन्हीं कुछ कारणों के लिए किसी ने कहा है कि भारत के बारे में सच्चे बादशाह वाहेगुरू ही जानें. कृप्या अपने घर रहे हैं.” (Seriously…??? Aa kuch Karan layi kis ne kiha si ? Ki Banu India da ,Sache patsha WaheGuru jane .Plzzzz Stay home)

रिचा चड्ढा ने भी एक वीडियो शेयर कर अपना गुस्सा जाहिर किया और लिखा बेवकूफी की अधिकतम सीमा. यह #jantacurfew के विपरीत है. (Stupid level max. This is the opposite of a #jantacurfew).

लोगों द्वारा झुण्ड में घरों से बाहर निकल कर रैली के शक्ल में थालियाँ बजाना, हो हल्ला मचाना, और नाचना सचमुच कोरोना पर जीत पाने में एक बाधा है. इस ऐसे में सेलिब्रिटीज का गुस्सा भी जायज है. अगर हमें कोरोना को हराना है तो सोशल डिस्टेंस बनायें रखना होगा.

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#coronavirus: भोजपुरी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह ने बताए हाथ धोने के तरीके, देखें Video

कोरोना वायरस (Corona Virus) से विश्‍व भर में फैली महामारी के बीच जहां एक ओर कल पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने 22 मार्च यानी रविवार के दिन देश के लोगों से ‘जनता कर्फ्यू की अपील की थी, वहीं भोजपुरी (Bhojpuri) सेंशेसन अक्षरा सिंह (Akshara Singh) ने इससे बचाव के लिए WHO द्वारा इनिसिएट सेफ हैंडस चाइलेंज (Safe Hands Challenge) को एक्‍सेप्‍ट कर एक वीडियो बनाया है. यह वीडियो उन्‍होंने अपने इंस्‍टाग्राम (Instagram) अकाउंट पर पोस्‍ट किया है, जो अब खूब वायरल हो रहा है.

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अक्षरा ने इस वीडियो में हाथ धोने के अलग – अलग तरीके को बताया और कहा है कि हमें हर दिन किस तरीके से हाथ धोना चाहिए और कोरोना वायरस (Corona Virus) से बचे, इसलिए हमनें यह वीडियो बनाया है. हम चाहते हैं कि आप भी इस वीडियो को अधिक से अधिक शेयर करें और अवयेरनस बढ़ा सकें. हम चाहते हैं कि लोग इस चाइलेंज को एक्‍सेप्‍ट करें. ताकि वे कोरोना से बच सकें. हम चाहूंगी कि इंडस्‍ट्री के भी तमाम लोग कोरोना को लेकर जगरूक रहें और लोगों को जागरूक करें.

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अक्षरा सिंह (Akshara Singh) ने कहा कि यह चाइलेंज मुझे फौलो करने वाले सभी लोग लें. और मुझे भी टैग करें. उन्‍होंने कहा कि मास्‍क जरूरी है, मगर ज्‍यादा जरूरी है कि हाथों को साफ रखें. उन्‍होंने पीएम मोदी के जनता कर्फ्यू (Janta Curfew) को भी सराहनीस बताया और लोगों से अपील की कि वे सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पालन करें. सामाजिक संपर्क को कम करें. सेल्फ क्वारंटाइन करें. वायरस फैलने से रोकथाम के लिए हमें ‘स्लो डाउन टाइम’ करने की आवश्यकता है. मेरी सबों से अपील है कि जागरूक रहें, सुरक्षित और स्वस्थ रहें.

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भाजपाई नीतीश को पटकनी देंगे पीके?

भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में और जनता दल (यू) को बिहार में अपनी चुनावी योजनाओं से जीत दिलाने वाले प्रशांत किशोर उर्फ पीके ने अपने पुराने दोनों क्लाइंट को धूल चटाने के लिए कमर कस ली है. उन्होंने बिहार की कुल 8,800 पंचायतों में पैठ बनाने की कवायद शुरू कर दी है. पंचायतों में अपनी पैठ बना कर वे बिहार विधानसभा पर नजरें टिका चुके हैं.

20 फरवरी, 2020 से ‘बात बिहार की’ नाम से नए कार्यक्रम की शुरुआत कर चुके पीके का दावा है कि 3 लाख नौजवान इस से जुड़ चुके हैं और 20 मार्च, 2020 तक 10 लाख और नौजवानों को जोड़ना है.

गौरतलब है कि इस साल के आखिर में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. सवाल यह भी है कि क्या पीके नीतीश कुमार जैसे सियासी धुरंधर और भाजपा जैसी नैशनल पार्टी को चुनौती देने की ताकत रखते हैं, क्योंकि मार्केटिंग और राजनीति दोनों अलगअलग चीजें हैं.

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जनता दल (यू) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने 18 फरवरी, 2020 को पटना में प्रैस कौंफ्रैंस कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजग के खिलाफ हल्ला बोल दिया था. उन्होंने नीतीश कुमार को अपने पिता समान बताते हुए दावा किया कि उन दोनों का रिश्ता केवल राजनीति का नहीं रहा है. उस के तुरंत बाद उन्होंने नीतीश कुमार के साथ विचारों के मतभेद का खुलासा कर डाला.

पीके ने कहा कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव के समय से ही नीतीश कुमार और उन के बीच ‘आल इज वैल’ नहीं रहा.

नीतीश कुमार हमेशा कहते हैं कि वे गांधी, लोहिया और जेपी की विचारधारा को नहीं छोड़ सकते हैं, पर गांधी के साथसाथ गोडसे के विचारों को मानने वालों के साथ वे कैसे खड़े हैं? इसी से हमारे बीच मतभेद रहा.

पीके ने नीतीश कुमार के विकास के कामों को तथाकथित विकास करार दे डाला. भाजपा के साथ होते हुए भी आज तक बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की उन की सालों पुरानी मांग क्यों नहीं पूरी हुई?

बिहार में शिक्षा की हालत बेहद खराब है. प्रति परिवार बिजली की खपत में बिहार सब से पिछड़ा है. विकास के मामले में बिहार पिछले 15 सालों से 22वें नंबर पर क्यों है? अपनी बात कहने और मनवाने के लिए हरदम नीतीश कुमार पिछलग्गू बने रहते हैं.

पीके ने नीतीश कुमार को सियासी चुनौती दे दी है, लेकिन क्या उन में कूवत है कि वे नीतीश कुमार जैसे सियासी धुरंधर और सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर के सामने टिक सकेंगे? पीके जहां मार्केटिंग और पब्लिसिटी के मास्टर हैं, वहीं नीतीश कुमार के पास तकरीबन 45 सालों का सियासी अनुभव है. वे विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री रहे हैं और भाजपा और राजद जैसे ताकतवर दलों को साधते रहे हैं.

साल 1974 के जेपी आंदोलन की उपज नीतीश कुमार साल 1985 में पहली बार विधायक बने थे. साल 1989 में वे पहली बार सांसद बने थे. उस के बाद साल 1991, साल 1996, साल 1998, साल 1999 और साल 2004 में वे लोकसभा चुनाव जीते थे. साल 1990 के अप्रैल से नवंबर महीने तक वे केंद्रीय कृषि मंत्री रहे.

19 मार्च, 1998 से ले कर 5 अगस्त, 1999 तक नीतीश कुमार केंद्रीय रेल मंत्री रहे. 13 अक्तूबर, 1999 से ले कर 22 नवंबर, 1999 तक वे भूतल परिवहन मंत्री रहे. 27 मई, 2000 से 20 मार्च, 2001 तक वे कृषि मंत्री रहे. 22 जुलाई, 2001 से ले कर साल 2004 तक वे रेल मंत्री रहे.

साल 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने न्याय के साथ विकास का नारा दिया. तब से अब तक वे लगातार बिहार के मुख्यमंत्री की कुरसी पर काबिज हैं.

साल के आखिर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कराने के लिए नीतीश कुमार ने सियासी दांवपेंच खेलना शुरू कर दिया है. नीतीश कुमार की सब से बड़ी ताकत उन की ईमानदार छवि है और फैसला लेने के मामले में वे पक्के माने जाते हैं.

पीके पर पलटवार करते हुए जद (यू) के राष्ट्रीय संगठन के महासचिव आरसीपी सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार को पिछलग्गू बनाने की औकात किसी के पास नहीं है. वे अपने काम के बूते देशभर में पहचान बन चुके हैं. हमें किसी ऐरेगैरे से सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है.

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जद (यू) के सीनियर नेता ललन सिंह ने पीके की तुलना टिटहरी से करते हुए कहा कि टिटहरी रात को पैर उठा कर सोती है, क्योंकि उसे लगता है कि उस ने अपने पैरों से आसमान को थाम रखा है. सुबह उठ कर वह इस बात का प्रचार भी करती है कि अगर वह पैर उठा कर नहीं सोती तो आसमान गिर पड़ता.

भाजपा नेता सुशील मोदी ने पीके पर तंज कसते हुए कहा कि इवैंट मैनेजमैंट करने वालों की कोई विचारधारा नहीं होती है. वे अपने क्लाइंट की विचारधारा और बोली को तुरंत अपना लेने में माहिर होते हैं.

पीके साल 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत का सेहरा अपने सिर बांधने में बड़बोले बने रहे, तब भाजपा और मोदी उन्हें गोडसेवादी नहीं लगे? पिछले ढाई साल से पीके नीतीश कुमार के साथ मिल कर अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहे और अब चुनाव आते ही नीतीश गोडसेवादी बन गए?

वहीं राजद के सीनियर नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि पीके के बयान से साफ हो गया है कि बिहार में विकास नहीं हुआ है. पीके ने साफ कहा है कि साल 2005 में जिस जगह पर बिहार खड़ा था, आज भी वहीं खड़ा है.

बिहार भाजपा के अध्यक्ष और सांसद संजय जायसवाल कहते हैं कि चुनावी साल में पीके जैसे कई लाउडस्पीकर बजेंगे. पैसे ले कर टेप बजाने वाले पीके वही बोलते हैं, जिस बात के लिए उन्हें भुगतान किया जा सकता है.

नीतीश कुमार के खिलाफ पीके की यह बयानबाजी उन की सियासत में ऐंट्री की कवायद है या जद (यू) से निकाले जाने की खुन्नस है, इसे पीके ने साफ नहीं किया. बिहार विधानसभा चुनाव में उन की भूमिका केवल रणनीतिकार की होगी या वे राज्य के धुरंधर नेताओं के साथ चुनावी अखाड़े में ताल ठोंक कर उतरेंगे, यह भी साफ नहीं किया.

पिछले विधानसभा चुनाव में पीके नीतीश कुमार के साथ बतौर रणनीतिकार जुड़े और बाद में सलाहकार भी बने. कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला और उस के बाद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए.

महागठबंधन से नाता तोड़ लेने के बाद भाजपा के साथ जब नीतीश कुमार ने अपनी सरकार बनाई, तब भी पीके चुप क्यों रहे? जद (यू) में रहते हुए भी पश्चिम बंगाल और दिल्ली के चुनावों में किस विचारधारा के साथ रणनीतिकार बने रहे? अपने कारोबार और सियासत को साथसाथ चलाते रहे. गांधीवादी होते हुए भी भाजपा के रणनीतिकार बनना क्यों कबूल किया? इन सारे सवालों का जवाब पीके को आने वाले समय में देना होगा.

साल 1977 को बिहार के रोहतास जिले के कोनर गांव में जनमे प्रशांत किशोर उर्फ पीके के पिता श्रीकांत पांडे डाक्टर थे. पीके ने गांव में ही मिडिल क्लास तक की पढ़ाई की. 8 साल तक यूएनओ से जुड़े रहने के बाद साल 2014 के आम चुनाव में भाजपा के प्रचार मुहिम की रणनीति बना कर मशहूर हुए प्रशांत किशोर साल 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा से जुड़े थे.

भाजपा के लिए साल 2014 के चुनाव में ‘चाय पर चर्चा’ उन का कामयाब और मशहूर कार्यक्रम साबित हुआ था. भाजपा की सोशल मीडिया मुहिम को उन्होंने ही डिजाइन किया था. उसी समय अनेक कालेजों और कंपनियों से 200 प्रोफैशनलों को चुन कर पीके ने सीएजी (सिटीजन फौर अकाउंटेबेल गवर्नैंस) नाम की कंपनी बनाई. साल 2015 में भाजपा से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी कंपनी सीएजी का नाम बदल कर आईपीएसी यानी इंडियन पौलिटिकल ऐक्शन कमेटी कर दिया था.

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साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पीके जद (यू) के प्रचार मुहिम से जुड़े. जद (यू) और राजद के गठबंधन को भारी जीत दिलाने के इनाम में उन्हें नीतीश कुमार ने जद (यू) का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद दे दिया. पिछले साल एनआरसी के मसले पर जद (यू) की पार्टी लाइन से अलग राय रखने के बाद नीतीश कुमार के साथ उन के मतभेद शुरू हुए थे.

साल 2016 में पीके ने पंजाब में कांग्रेस की प्रचार मुहिम संभाली और कांग्रेस को भारी जीत मिली. इस से प्रशांत किशोर का रुतबा और कद दोनों बढ़ गए. साल 2017 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जीत दिलाने की चुनौती कबूल की, लेकिन उस में बुरी तरह नाकाम रहे.

साल 2019 में उन्होंने आंध्र प्रदेश में वाइएसआर कांग्रेस की प्रचार की नैया की पतवार संभाली और उस में कामयाबी मिली. साल 2020 में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ के प्रचार का दारोमदार लिया और केजरीवाल को दोबारा दिल्ली की सत्ता पर काबिज कराने में मददगार बने.

अब प्रशांत किशोर ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में द्रमुक को जिताने की कमान अपने कंधों पर ली है. लगता है कि भाजपा के लिए ‘चाय पर चर्चा’ राहुल गांधी के लिए ‘खाट पर चर्चा’ और नीतीश कुमार के लिए ‘बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो’ जैसे नारे गढ़ने वाले पीके अब खुद राजनीतिक अखाड़े में कमर कस कर उतरने की तैयारी में हैं.

नीतीश का मास्टर स्ट्रोक

चुनावी साल में बिहार विधानसभा ने एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पास कर नीतीश कुमार ने अपने विरोधियों को एक बार फिर चारों खाने चित कर दिया है. गौरतलब है कि देश में पहली बार भाजपा के सहयोग से यह प्रस्ताव पास किया गया. नीतीश कुमार ने अपने इस मास्टर स्ट्रोक से राजद समेत तमाम विरोधी दलों की बोलती बंद कर दी है, वहीं भाजपा को उस के ही दांव से बेबस कर दिया है.

विधानसभा में नीतीश कुमार ने साफ कहा है कि बिहार में एनआरसी लागू होने का सवाल ही नहीं है. एनपीआर साल 2010 के प्रावधान पर ही लागू होगा. मुझे भी नहीं पता है कि मेरी मां का जन्म कब हुआ था.

नीतीश कुमार के इस राजनीतिक पैतरे से बौखलाए राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपनी खुन्नस निकालते हुए कहा कि नीतीशजी कब किधर चले जाएं, पता नहीं. उन का ऐसा ही इतिहास रहा है.

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तेजस्वी यादव के इस बयान के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें गार्जियन की तरह समझाते हुए कहा कि कुछ बातें बोलने का अधिकार केवल आप के पिता को है, आप को सोचसमझ कर बोलना चाहिए.

पूजा ढांडा : कुश्ती की नई दबंग

1 जनवरी, 1994 को हरियाणा के हिसार जिले के एक गांव बुढ़ाना में जनमी पूजा ढांडा के पांव उन के एथलीट पिता अजमेर सिंह ने पालने में ही पहचान कर इस कहावत को गलत साबित कर दिया था कि सिर्फ पूत के पांव ही पालने में पहचाने जा सकते हैं.

बाद में इस बात को पूजा ढांडा ने भी सच साबित किया. उन्होंने पहले मिट्टी के अखाड़े में और बाद में मैट पर भी अपनी पहलवानी का ऐसा जलवा दिखाया कि दुनिया वाहवाह करने लगी. वे साल 2019 में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में हुए कुश्ती के ग्रांप्री इंटरनैशनल टूर्नामैंट में 57 किलोग्राम भारवर्ग में सिल्वर मैडल विजेता थीं. उन्होंने साल 2018 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में सिल्वर मैडल जीता था. इतना ही नहीं, उन्होंने साल 2018 में ही बुडापेस्ट में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रौंज मैडल हासिल किया था.

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अपनी इस कामयाबी का राज खोलते हुए पूजा ढांडा बताती हैं, ‘‘मुझे लड़कों के साथ कुश्ती की प्रैक्टिस करना अच्छा लगता है, क्योंकि उन में ज्यादा ताकत, दमखम और रफ्तार होती है, जिस से मुझे अपना खेल सुधारने में मदद मिलती है.’’

परिवार ने बढ़ाया हौसला

पूजा ढांडा बताती हैं, ‘‘मुझे शुरू से ही खेलों से लगाव रहा है. बचपन में मैं अपने पिता के साथ सुबह दौड़ने जाती थी. जब मैं कुश्ती खेलने लगी तो गांव में बहुत से लोगों ने मुझे ताने मारे थे. पिता को भी लगता था कि अगर मुझे ज्यादा गंभीर चोट लग गई, तो मेरी शादी करने में दिक्कतें आ सकती हैं.

‘‘सब से बड़ी समस्या तो यह है कि आज भी लड़कियों के लिए गांवदेहात में हालात ज्यादा सुधरे नहीं हैं. उन्हें अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी नहीं मिली है. उन्हें अगर परिवार का सहयोग मिल भी जाता है, तो समाज कई तरह के रोड़े अटका देता है, पर इन सब बातों से उठ कर ही कोई लड़की देशदुनिया में नाम कमा सकती है.

‘‘मुझे इस मुकाम तक लाने में मेरी मां कमलेश का बहुत बड़ा योगदान है. उन्होंने मुझे कभी अपने सपने पूरे करने से नहीं रोका. उन्होंने मेरी डाइट का खयाल रखा और दूसरी सभी चीजों का भी ध्यान रखा. खेलने के लिए जब कभी मुझे गांव या शहर से बाहर जाना होता था, तो उन्होंने कभी मना नहीं किया.’’

कोच बहुत जरूरी

पूजा ढांडा का मानना है कि किसी खिलाड़ी को बनाने में कोच का बड़ा योगदान होता है. अगर बड़े लैवल पर किसी महिला पहलवान को कोई पुरुष कोच मिल जाता है, तो इस में घबराने की बात नहीं होती है. बस, कोच के साथ तालमेल जरूर बिठाना पड़ता है.

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पूजा ढांडा बताती हैं, ‘‘सब से पहली चीज है अपने कोच पर भरोसा करना. बड़े लैवल पर महिला पहलवानों को कोचिंग देने वाले पुरुष कोच बड़े अनुभवी होते हैं. उन का फोकस हमारे खेल को सुधारने पर रहता है.’’

यही वजह है कि आज जब भी पूजा ढांडा कुश्ती के मैट पर उतरती हैं, तो फौलाद में बदल जाती हैं और सामने वाली पहलवान को धूल चटा देती हैं. वे नई पीढ़ी को खासकर लड़कियों को संदेश देते हुए कहती हैं, ‘‘कभी भी हिम्मत न हारें. लड़कियों को फिट और हिम्मती बनाने में खेलों का बड़ा अहम योगदान है. इस से आत्मविश्वास बढ़ता है और नाम भी बनता है.’’

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