आवारा जानवरों का बढ़ता कहर

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

उत्तर प्रदेश में सरकार ने पूरी तरह से पशु हत्या पर बैन लगाया हुआ है, जिस के चलते गैरजरूरी पशुओं की तादाद बहुत बढ़ रही है. अपने राजनीतिक फायदे और पंडों को लुभाने के लिए सरकार सरकारी खजाने से बड़ीबड़ी और भव्य गौशालाएं भी बनवाती है और गायों की रखवाली के लिए एक अच्छीखासी तनख्वाह पर स्टाफ भी रखा जाता है.

आवारा पशु, जिन में आमतौर पर बूढ़ी, बीमार गाएं और सांड़ होते हैं और जिन से न तो दूध मिल पाता है और न ही वे बोझ ढोने लायक होते हैं, पर ये जानवर तथाकथित गौरक्षकों के लिए तुरुप का पत्ता जरूर साबित होते हैं.

धर्म से जुड़े ये जानवर जब हमारी फसलों को खाने लगें और हमारे बच्चों को चोट पहुंचाने लगें तब तो हमें इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत होती है, क्योंकि किसी भी जानवर की जान से ज्यादा कीमती इनसान की जान होती है.

सरकार ने बूचड़खाने पर रोक लगा रखी है. इस वजह से भी आवारा पशुओं की तादाद बढ़ती जा रही है, शहरों में कांजीहाउस होते भी हैं, तो उन की व्यवस्था बदतर ही होती है.

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उदाहरण के तौर पर जनपद लखीमपुर खीरी को ही लें. यह एक तराई का इलाका है, यहां की मुख्य फसल वैसे तो गन्ना है, पर बहुत से किसान ऐसे भी हैं, जो केले और दूसरी सब्जियां भी उगाते हैं.

इन सारे किसानों की फसलों को इन आवारा जानवरों से खतरा होता है. रात के समय जानवरों का झुंड पूरी फसल ही बरबाद कर जाता है. जो बड़े और पैसे वाले किसान हैं, वे तो अपनी फसलों की पूरी तरह से तारबंदी करा लेते हैं, पर जो छोटे किसान हैं, उन के पास अमूमन तारबंदी कराने के भी पैसे नहीं होते. ऐसे में ये आवारा जानवर ऐसे किसानों के लिए बहुत बड़ी समस्या ले कर आते हैं.

खीरी जिले के एक गांव मालपुर के रहने वाले फागुलाल बताते हैं, ‘‘पहले तो हमारी फसलों को नीलगायों से खतरा था, पर अब तो ये आवारा पशु इतना बढ़ गए हैं कि रात में भी हमें अपनी फसल बचाने के लिए खेत में ही मचान बना कर सोना पड़ता है.’’

चौकी के श्रीराम का कहना है, ‘‘हमारी हालत तो तब खुदकुशी करने जैसी हो जाती है, जब खूनपसीना बहा कर हम फसल बोते हैं और ये आवारा जानवर आ कर उस फसल को खराब कर देते हैं.’’

आवारा पशु सड़क पर होने वाले हादसों के लिए सब से ज्यादा जिम्मेदार होते हैं. ये आवारा पशु सड़कों के बीचोंबीच खड़े हो जाते हैं और गाडि़यों व बच्चों के आने पर बेतहाशा इधरउधर भागते हैं. नतीजतन, वे खुद भी चोटिल होते हैं और हादसों को भी अंजाम देते हैं.

खीरी जिले में ही गोला नामक कसबा है, जो धार्मिक लोगों के लिए आस्था का केंद्र बन गया है. भक्त लोग इसे ‘शिवजी की नगरी’ और ‘छोटी काशी’ के नाम से भी जानते हैं.

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यहां पर गाय और सांड़ों की भरमार है. ये सांड़ कभी भी आतंकित हो कर इधरउधर भागते हैं और लोगों को घायल कर देते हैं.

गोला बाजार इलाके में एक औरत खरीदारी कर रही थी, तभी वहां पर एक सांड़ आया और उस औरत पर हमला करने लगा. वह औरत सहम कर अपना सामान वहीं छोड़ कर भागी, तो सांड़ ने उस की साड़ी को ही नुकीले सींगों में फंसा लिया और उसे खींचता ही चला गया, जिस से उस औरत की साड़ी उतर गई और वह शर्म से गड़ गई.

अपनी इज्जत छिपाने के लिए उस औरत ने पास के घर में शरण ली. इस के बावजूद उस सांड़ को किसी ने नहीं मारा. आखिरकार ‘शंकरजी की नगरी है’ तो भला सांड़ को मारे भी कौन?

भारत में गौरक्षा के नाम पर जितनी राजनीति हुई, उतनी किसी और मुद्दे पर नहीं हुई. पलिया कलां के सब्जी बाजार में भी आवारा पशु सब्जी की तलाश में आ जाते हैं और दुकानदारों का अच्छाखासा नुकसान कर देते हैं.

एक गाय ने जब किसी मुसलिम दुकानदार की सब्जी में मुंह मारा, तो उस दुकानदार ने गाय को मारने के लिए डंडा उठाया, पर उस के एक हिंदू पड़ोसी दुकानदार ने उसे टोक दिया और कहा, ‘अरे, गौमाता ने तेरी सब्जी खा ली है. अब तेरे धंधे में बरकत ही बरकत आएगी,’ उस का इतना कहना ही था कि तब तक उसी गाय ने हिंदू दुकानदार की सब्जी में मुंह मार दिया. तब क्या था, उस हिंदू दुकानदार ने गाय पर डंडों की बारिश कर दी. अब यह दोहरा मापदंड किसलिए?

नुकसान हर हाल में नुकसान ही है. उस में भी धर्म की दीवार बना देने से कोई फायदा होता नहीं दिखता, पर फिलहाल योगी आदित्यनाथ की सरकार में सभी डरे हुए हैं. डरे इसलिए भी हैं कि सड़क पर हमारी गाड़ी से कोई और भले ही टकरा जाए, पर कोई गाय न टकराए, क्योंकि अगर गाय टकरा गई तो समझो, गौरक्षा दल वालों को अपनी राजनीति चमकाने के लिए आप ने कुछ दिनों के लिए एक मुद्दा दे दिया.

उत्तर प्रदेश के कई शहरों में तो इन पशुओं ने इतना आतंक मचाया है कि यहां के लोग इन पशुओं को पकड़ कर सरकारी स्कूलों में बंद करने पर मजबूर हो गए.

आवारा पशुओं की तादाद बढ़ाने में पंडितपुरोहितों का भी बहुत योगदान है. पंडितों के मुताबिक, जब घर का कोई बुजुर्ग मर जाता है, तो उस के नाम पर गाय दान कर देने से मरने वाले की आत्मा को शांति मिलती है और उस की आत्मा को स्वर्ग मिलता है.

चूंकि गाय 50-60 हजार रुपए की आएगी, इसलिए लोग एक छोटी सी गाय या बछिया का दान करते हैं, जो उन को बहुत कम पैसे की मिलती है. अब इस बछिया को ले कर पंडित क्या करेगा, उस के लिए तो बछिया का पेट भरना भी मुश्किल होता है, इसलिए वह बछिया को आवारा छोड़ देता है. कुछ और आस्थावान लोग मन्नत पूरी होने पर सांड़ को छोड़ देते हैं.

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ये गाय और सांड़ देश में भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिस की गिनती कोई कर नहीं रहा. यह नुकसान खेत मालिकों को हो रहा है, दुकानदारों को हो रहा है, बाजारों को हो रहा है, सड़क परिवहन को हो रहा है. फायदा सिर्फ गाय की राजनीति करने वालों और गाय दान में लेने वालों को हो रहा है.

दिल्ली में शराब : जनता से ज्यादा रैवन्यू से प्यार

तुम दे कर मधु का प्याला मेरा मन बहला देती हो, उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा…

मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां आज के संदर्भ में बिलकुल सटीक बैठती हैं. कवि ने अपनी कविता में कहा है कि तुम मधु यानी शराब का प्याला दे कर मेरा मन जरूर बहला देती हो पर यह प्याला मेरे जीवन को कोई उपचार शायद ही दे सके.

अब यह विडंबना ही है कि दिल्ली के बुराङी स्थित नत्थूपुरा मोङ पर नशा मुक्ति केंद्र के ठीक आगे शराब की दुकान है. 1-2 साल पहले ही शराब की यह दुकान खुली थी तो खासकर स्थानीय महिलाओं ने कङा विरोध जताया था. इस मामले पर जम कर राजनीति भी हुई थी. तब क्षेत्र के आम आदमी पार्टी विधायक संजीव झा ने पहले तो इस ठेके को बंद करवा दिया पर बाद में ठेका क्यों और किस के आदेश पर खुला, यह बताने को कोई तैयार नहीं.

अब जबकि दिल्ली सहित देश के अन्य राज्यों में करोना वायरस के कहर के बीच शराब की दुकानें खुल गई हैं तो लोग लौकडाउन की धज्जियां उड़ाते हुए सुबह से ही लंबी लाइनों में लग गए.

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समाजिक दूरी का बना मजाक

शराब के ठेके खुलने के आदेश के बाद राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में भी बेवङों की भीङ देखी गई.

बुराङी के संतनगर और नत्थूपुरा में सुबह से ही लोग लाइनों में लग गए तो वहीं लक्ष्मी नगर, करोलबाग, रोहिणी आदि जगहों पर लगभग आधा किलोमीटर तक लगी लोगों की लंबी लाइन पहले दिन से ही डराने लगा है.

दिल्ली के लक्ष्मी नगर स्थित शराब की दुकान में हालात इतने बेकाबू हो गए कि खबर है कि पुलिस को लाठी चार्ज तक करनी पड़ी.

यहां एकएक लोग कार्टून भरभर कर बियर की बोतलें ले जाते दिखे.

संतनगर में एक 72 साल का व्यक्ति भी लाइन में लगा था.

इतने सुबहसुबह क्यों आए यहां? क्या कोरोना वायरस से डर नहीं लगता? उस ने छूटते ही बताया,”काहे का डर? एक न एक दिन तो मरना ही है फिर कोरोनाकोरोना क्या करें? लौकडाउन से पहले रोज ही शराब पीता रहा हूं मैं. देखो इतनी उम्र में भी जिंदा हूं. जिस दिन मरना होगा मर जाऊंगा.”

वहां एक 18-19 साल का लङका भी लाइन में खङा था. खुद की पहचान छिपाने के लिए गमछा से अच्छी तरह मुंह ढंके हुए था. कोरोना वायरस की वजह से मुंह में मास्क लगाना जरूरी तो है पर उस ने अपनेआप को छिपाने के लिए कस कर गमछा बांधे था.

शराब अपने लिए खरीद रहे हो? पूछने पर वह भङक गया. बोला,”हम अपने पैसे से शराब खरीद रहे हैं, आप क्यों पूछ रहे हो?”

मुद्दे पर राजनीति हो गई शुरू

अब दिल्ली में शराब के ठेके को ले कर राजनीति भी गरम हो गई है. भाजपा ने इसे केजरीवाल सरकार की विफलता और शराब माफियाओं के आगे झुकना बता रही है.

दिल्ली भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राहुल त्रिवेदी कहते हैं,”एक तरफ पूरी दिल्ली रैड जोन में है, वहीं दूसरी तरफ केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में शराब के ठेके खोलने का जो निर्णय लिया है वह पूरी तरह सरकार का गलत निर्णय है. बिना कोई इंतजाम, बिना कोई पूर्व तैयारियों के यह आदेश दिल्ली सरकार को नहीं देनी चाहिए थी. उस दिल्ली में जहां रोज सैकड़ों मामले कोविड-19 के आ रहे हैं, वहां शराब के ठेके खुलने से स्थिति नियंत्रण के बाहर आ जाएगी.”

यह पूछने पर कि दिल्ली सरकार ने तो केंद्र की मंजूरी के बाद ही ठेके खोलने के आदेश जारी किए हैं, तो राहुल त्रिवेदी कहते हैं,”देखिए, यह सही है कि शराब से राजस्व की प्राप्ति होगी पर दिल्ली रैड जोन में है. केंद्र ने ग्रीन और औरेंज जोन में ठेके सशर्त खोलने की अनुमति दी है. रैड जोन में ठेके खोलने के लिए राज्य सरकारों को अपने विवेक पर निर्णय लेने को कहा है. ऐसे में जब पूरी दिल्ली में रैड जोन है तो शराब के ठेके खोलना जनता को महामारी में धकेलने जैसा है.

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“पूरी दिल्ली से यह खबरें आ रही हैं कि शराब के ठेकों पर लंबीलंबी लाइनें लगी हैं. कहींकहीं तो पुलिस बल का प्रयोग तक करना पङ रहा है. यह केजरीवाल सरकार का गलत निर्णय है.”

शराब दुकानों पर भीड़ डरा रही है

दिल्ली महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष, शर्मिष्ठा मुखर्जी कहती हैं,”एक महिला होने के नाते केजरीवाल सरकार की इस निर्णय की निंदा करती हूं. एक तरफ दिल्ली की महिलाएं जरूरी राशन जुटाने के लिए सुबह लाइनों में लगती हैं, वहीं दिल्ली के ठेकों पर पुरूषों की भीङ देख कर हैरान हूं. आज पूरी दिल्ली रैड जोन में है. शराब दुकानों पर भीङ काफी डरावनी है.

“मुख्यमंत्री केजरीवाल ने यह कहा था कि दुकानों में मार्शल तैनात होंगे पर न तो कहीं मार्शल दिखे और न ही सुरक्षा के कोई खास इंतजाम. सोशल डिस्टैंसिंग का माखौल उङ रहा है सो अलग.”

एक नई मुसीबत

औल इंडिया संगठित कामगार, उत्तर भारत की प्रभारी व पूर्व दिल्ली प्रदेश महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष, साईं अनामिका कहती हैं,”केजरीवाल सरकार के इस निर्णय से हैरान भी हूं और हताश भी. एक तरफ लोग कोरोना वायरस के कहर से परेशान हैं, तो वहीं दूसरी ओर यह नई मुसीबत. ठीक है, इस से सरकार को आबकारी राजस्व की प्राप्ति होगी पर लोगों की जान की कीमत से बढ़ कर कतई नहीं.”

बोलने से बचते रहे

उधर चौतरफा आलोचनाओं में घिरी केजरीवाल सरकार के मंत्री, विधायक इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचते दिखे.

दिल्ली के तीमारपुर से विधायक और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता दीलिप पांडेय ने पहले तो यह पूछा कि किस विषय पर बात करनी है और जब यह बताया कि दिल्ली सरकार ने शराब के ठेके खोलने की अनुमति क्यों दी जबकि पूरी दिल्ली रैड जोन में है, तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

इस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करने वाले मुख्यमंत्री केजरीवाल की तारीफ मुफ्त बिजली, पानी और डीटीसी में महिलाओं को मुफ्त यात्रा कराने पर काफी हुई थी. मगर शराब के ठेके खोलने को ले कर दिल्ली सरकार बैकफुट पर है और विरोध करने वाले खूब तंज कस रहे हैं.

सोशल मीडिया पर भी लोग केजरीवाल सरकार की खूब आलोचना कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा,”हमें पीने का शौक नहीं, पीते हैं राजस्व जुटाने के लिए…”

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मगर यह बात सिर्फ दिल्ली की ही नहीं है. राजस्व जुटाने के नाम पर लोग केंद्र सरकार पर भी जम कर भड़ास निकाल रहे हैं. यूजर्स कह रहे हैं कि अभी स्थिति गंभीर थी तो यह निर्णय लेना कतई उचित नहीं था, वह भी तब जब बिहार में शराबबंदी है और राज्य ने इस बड़े राजस्व प्राप्ति के रास्ते बंद कर भी विकास के काम किए हैं.

तो क्या हर मोरचे पर तारीफ बटोरने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री को पूरी दिल्ली में भी शराबखोरी पर रोक लगा कर शराबबंदी लागू नहीं करनी चाहिए?

केजरीवाल बनाम मोदी, मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुरसी पर काबिज अरविंद केजरीवाल की आवाज अब भारतीय जनता पार्टी के सुप्रीमो व देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में नहीं, बल्कि सहानुभूति में उठने लगी है. वे मोदी की तारीफ करते नहीं अघाते.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पीएम बैठक के बाद एक ट्वीट में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लौकडाउन बढ़ा कर सही फैसला किया है. आज भारत कई विकसित देशों से बेहतर हालत में है, क्योंकि हम ने शुरुआत में ही लौकडाउन कर दिया था. अगर हम इसे अभी हटाते हैं तो इस से अब तक हुए फायदे बेकार चले जाएंगे.

उन्होंने यह भी कहा कि लौकडाउन से कोई भी जिला कोरोनामुक्त नहीं होने वाला है. जब तक दवाई नहीं आएगी, कोई जिला या राज्य या फिर पूरी दुनिया कोरोनामुक्त नहीं होगी. जब दवाई आएगी तब देखा जाएगा. अभी तो हमें कोरोना के साथ जीने के लिए 2 चीजें करनी है- पहली – इस के फैलाव को रोकना है और दूसरी – मौत पर कंटोल करना है.

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मोदी सरकार की तारीफ करते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि 2 महीने के लौकडाउन के बाद अब अर्थव्यवस्था को खोल कर बहुत अच्छा काम किया गया.

कोरोना संकट और लौकडाउन को ले कर मोदी सरकार की ओर से उठाए गए कदमों से दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल काफी खुश हैं. उन्होंने इस बात को माना कि केंद्र की ओर से अधिकतर गाइडलाइन अच्छी हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन काफी फायदेमंद रहीं. हेल्थ सैंटर, कोरोना सैंटर, कोविड 19 अस्पताल, फिर होम क्वारंटीन की गाइडलाइन जारी करने सम्बंधी सभी चीजें बातचीत कर के चल रही हैं. हम ने उन्हें आइडिया दिया था.

भले ही अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर लें, पर एक समय वह भी था जब उन को मोदी की हर बात गलत लगती थी, चाहे वह सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा हो या सीएए का मुद्दा. फिर अब… उन का इस तरह तारीफ करना शायद वे मोदी से फिलहाल भिड़ने से बच रहे हैं.

पर सच तो यह है कि आने वाले दिनों में यह उन के लिए आत्मघाती साबित होगा क्योंकि जनता से किए वादे दरकिनार जो हो गए हैं, जिस के दम पर वे मुख्यमंत्री की कुरसी पर काबिज हुए थे.

मोदी सरकार की तारीफ करने के साथ ही उन्होंने कहा कि लौकडाउन बढ़ाना कोरोना का इलाज नहीं है, बस यह इस को फैलने से रोकता है.

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अगर यह सोचें कि किसी एरिया या राज्य में पूरी तरह से लौकडाउन कर दिया और वहां केस जीरो हो जाएंगे, मुश्किल है. ऐसा तो पूरी दुनिया में हो रहा है. अमेरिका, स्पेन, इटली और यूके भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं. इसे ले कर लोगों के अंदर एक डर बैठ गया है. जिस दिन मौत का डर निकल जाएगा, उस दिन लोगों के मन से कोरोना का डर भी खत्म हो जाएगा.

उन्होंने आगे कहा, “अगर हम दिल्ली को लौकडाउन कर के छोड़ दें तो केस खत्म नहीं होने वाले. लौकडाउन कोरोना को कम करता जरूर है, पर खत्म नहीं. इसलिए अर्थव्यवस्था को खोलने का समय आ गया है. इस के लिए दिल्ली तैयार है.”

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहते हैं कि अगर लौकडाउन के बाद भी पौजिटिव केस बढ़ते हैं तो हम लोगों को इस के लिए तैयार रहना होगा. केंद्र सरकार को चाहिए कि पूरी तैयारी के साथ धीरेधीरे राज्यों से लौकडाउन खोले. जो रेड जोन हैं, केवल उन इलाकों को बंद रखना चाहिए.

दिल्ली ने कोरोना महामारी के दौरान बड़ी मुश्किल लड़ाई लड़ी. वे कहते हैं कि कोरोना से बचाव ही बेहतर इलाज है. पर हमें जीने की आदत बदलनी होगी.

उन्होंने कहा कि कोरोना ने सिखा दिया है कि हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत रखो. इसलिए हमें भी अपने यहां मैडिकल रिसर्च को और मजबूत बनाना होगा.

ऐसा नहीं है कि चिंता की लकीरें सिर्फ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर ही दिख रही हैं, ऐसी चिंताओं से हर राज्य के मुख्यमंत्री जूझ रहे हैं.

एक ओर जहां पूरे देश की अर्थव्यवस्था चौपट है, वहीं आम लोगों के जीवन में भी उथलपुथल मची हुई है कि हमारा जीने का ढर्रा किस तरह का होगा. जिन लोगों की रोजीरोटी चली गई, उन्हें नए सिरे से पहल करनी होगी. गांवों की तरफ पलायन कर चुके अप्रवासी मजदूरों को वापस लाना होगा, तभी रोजगार का पहिया पुराने ढर्रे पर चल सकेगा.

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अर्थव्यवस्था को ले कर सरकार का परेशान होना लाजिम है, वहीं कारोबार को पटरी पर लाना भी किसी चुनौती से कम नहीं.

उन्होंने मोदी के साथ सुर मिलाने में ही अभी तो अपनी भलाई समझी है, पर यदि जनता मोदी सरकार से नाराज़ हो गई तो उसका खामियाजा केजरीवाल को भी भुगतना पड़ सकता है. आमतौर पर जरूरत से ज्यादा शक्तिशाली नेताओं के आगे जूनियर नेता सरेंडर कर ही देते हैं. अतः आने वाले दिनों में उन का इस तरह सुर मिलाना आत्मघाती साबित होगा.

“मदिरालय” हुए गुलजार, कोरोना को आमंत्रण!

अगर हम यह कहें कि छत्तीसगढ़ मे कांग्रेस की भूपेश सरकार ने प्रदेश की चरमरा चुकी आर्थिक व्यवस्था के मद्देनजर मदिरा दुकानों से लाॅक डाउन हटा लिया है इस तरह छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने एक तरह से “आ बैल मुझे मार” की कहावत चरितार्थ कर दी है.

दरअसल, भारत सरकार  ने तीसरे लाॅक डाउन में ग्रीन जिलों सहित आरेंज जिलों में बहुतेरी सुविधाओं के साथ शराब यानी मदिरा के जाम छलकाने की आजादी दे कर सिरे से गलत  निर्णय लिया  है.

और जैसा कि होना था संपूर्ण देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में भी मदिरालय के सामने मदिरा प्रेमियों का मद चढ़ता हुआ दिख रहा हैं. सारी सोशल डिस्टेंसिंग,नियम कायदे कोरोना महामारी का भय, ध्वस्त होता हुआ दिखाई दे रहा  है .छतीसगढ में  जो ठोले (पुलिस) पहले घर से निकलने पर लाठियां भांजते  थे, वहीं पुलिस शराब भट्ठियों  में लाठी लेकर व्यवस्था संभालते हुए दिखी. सरकार की इस गैर जिम्मेदारी पूर्ण नीति के कारण देश और प्रदेश में जैसा  कोरोना महामारी संक्रमण काल का माहौल था लोगों में एक अच्छी  जागरूकता का संचार हो चुका था. वह लोगों के  इस मदिरालय पहुंचने और मेला लगाने के कारण  ध्वस्त हो गया. वहीं सरकार की नीति और नियत भी उजागर हो गई की चंद पैसों की खातिर सरकार अपनी आवाम को शराब जैसी बीमारी बेचने को  तैयार है.

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शर्मनाक! शराब की होम डिलीवरी

आपको आश्चर्य होगा कि जो काम कभी नहीं हुआ अर्थात शराब की होम डिलीवरी, कोरोना महामारी के इस भयंकर समय में छत्तीसगढ़ सरकार ने यह काम भी करने का निर्णय लिया है. यह आश्चर्य है कि गरीब जनता की हमदर्द कहलाने वाली संवेदनशील

छत्तीसगढ़ सरकार अब शराब की होम डिलीवरी करेगी. सरकार ने तैयारी की है मोबाइल फोन और व्हाट्स एप से यह आर्डर लिया जाएगा और डिलीवरी बाॅय के जरिए लोगों तक पहुंचाई जाएगी. सरकार ने अपनी दलील में कहा है कि कोरोना वायरस संक्रमण का फैलाव रोकने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किए जाने के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है. और जैसा कि होना चाहिए  विपक्ष भाजपा ने शराब की होम डिलीवरी पर  आपत्ति दर्ज करते हुए आरोप लगाया है कि शराबबंदी की वकालत करने वाली सरकार डिलीवरी बाॅय के रूप में लाइसेंसधारी कोचिए की नियुक्ति कर रही है. सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. यहां पाठकों को यह बताना उचित होगा कि कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनाव के पूर्व प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी की वकालत करते हुए जनता से वोट मांगा था.

हो गई है मोटी चमड़ी!

दरअसल, सत्ता सुंदरी का सुख भोगने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित कांग्रेस के के दूसरे चेहरे टी एस सिंह देव जो “बाबा” के रूप में प्रसिद्ध हैं अपने वादे भूल चुके हैं.और सत्ता के मद में आकर शराबबंदी की बात करना नहीं  चाहते  हैं. गाहे  बगाहे  अगर कोई पूछता है तो कहते हैं हमने कमेटी बना दी है अर्थात कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ में सत्ता  पर काबिज होने के बाद अपना वादा भूल चुकी है. यहां बताना लाजमी होगा कि कोरोना संकट की वजह से देशभर में लागू लाॅकडाउन के बीच राज्य सरकार ने शराब दुकानों को बंद तो कर दिया .मगर  बीते डेढ़ महीने से राज्य में शराब दुकानों के संचालन पर पूरी तरह से रोक लगी होने के बाद भी प्रदेश भर में शराब दो नंबर पर बिकती रही. इधर  जब लाॅकडाउन की मियाद 14 मई तक बढ़ाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने नए सिरे से एडवायजरी जारी कर रेड, आरेंज और ग्रीन जोन के दायरे में आने वाले जिलों में कई तरह की आर्थिक गतिविधियों के संचालन की अनुमति तो नई एडवायजरी के आने के बाद देश के कई राज्यों की भांति गांधी की अनुशासित पार्टी कांग्रेस द्वारा  छत्तीसगढ़ में भी शराब दुकानों को  खोलने की अनुमति दी गई है.

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आबकारी विभाग की ओर से जारी आदेश में दुकान खोलने-बंद करने के लिए तय मियाद के साथ-साथ शराब बिक्री की लिमिट भी तय की गई है. इसी आदेश के बिंदु चार में विभाग ने डिलीवरी बाॅय के जरिए शराब की सप्लाई किए जाने का आदेश दिया है. डिलीवरी बाॅय की नियुक्ति प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए होगी. शराब की डिलीवरी की दर के निर्धारण का जिम्मा मैनपावर एजेंसी से प्राप्त न्यूनतम दरों पर किया जाना तय किया गया है. अब छत्तीसगढ़ के घर घर घर बैठे ही शराब पहुंचेगी तथा आर्थिक स्थिति संभालने के नाम पर भूपेश बघेल सरकार ने शराब के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है.

मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं गलत

संपूर्ण देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में शराब की दुकानों को प्रारंभ करने कि जहां चारों तरफ आलोचना हो रही है वही इसकी खिलाफत में भी आवाज उठ रही है साथ ही यह तर्क भी दिया जा रहा है कि एक लोकतांत्रिक जनहितकारी सरकार को शराब जैसी बुराई को खत्म करने की पहल करने का कोना काल में यह एक बेहतरीन मौका है दूसरी तरफ मनोवैज्ञानिक भी शराब को खासतौर पर इस संक्रमण कारी बीमारी के समय बेचे जाने को गलत ठहरा रहे हैं चिकित्सक का कहना है कि शराब संघ संग बैठकर पीने का एक शगल है ऐसे में कोरोना फैलने का भय और भी बढ़ जाता है वही जिस तरह शराब दुकानों  में लोगों की खूब भीड़ जुट रही है जिसके कारण महामारी को सरकार स्वयं आमंत्रण  दे रही है.

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Lockdown के बीच Sunny Leone ने किया प्रैंक तो बदहवास दिखे पति Daniel

बौलीवुड की हौट अदाकारा सनी लियोन (Sunny Leone) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. आये दिन उनके वीडियो और फोटोज सोशल मीडिया पर वायरल होते रहतें हैं. इसी कड़ी में सनी लियोन नें अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर एक वीडियो अपलोड किया है जिसमें वह किचन में खड़ी दर्द से चिल्लाती हुई नजर आ रहीं हैं उनके इस चिल्लाने का कारण उनकी कटी हुई उंगली है.

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किचन से सनी लियोन (Sunny Leone) के चिल्लाने की आवाज सुन कर उनके पति डैनियल दौड़े हुए किचन में आते हैं. तो उन्होंने देखा की सनी लियोन की उंगली कट कर अलग पड़ी हुई है और पूरा हाथ खून से लथपथ है. इसके बाद डैनियल का रिएक्शन देखनें लायक है क्यों की वह किचन में बदहवास से आगे पीछे भाग रहें हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा है की क्या करें तभी सनी लियोन (Sunny Leone) के हंसने की आवाज आती है और वह पति डैनियल को कैमरे की तरफ इशारा करती हैं. पति डैनियल को सनी लियोन (Sunny Leone) के उंगली कटनें का सारा मजाक समझ में आ जाता है और वह अपना सिर पीट लेते हैं. क्यों की सनी नें अपने पति के साथ उंगली कटनें का प्रैंक किया था.

इस प्रैंक के लिए सनी लियोन (Sunny Leone) नें पूरी तैयारी की थी. इससे जुड़े उन्होंने दो वीडियो अपनें सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर किये हैं. एक वीडियो में वह कच्चे केले को छिल कर उसे ऊँगली का आकार देती हुई नजर आती हैं और उसके बाद वह उस उंगली के बनावटी शेप पर टोमैटो कैचेप डाल कर उंगली कटनें बाद होने वाले दर्द और चेहरे पर आने वाले एक्सप्रेशन को लेकर पूरी तैयारी की. फिर जब सनी लियोन (Sunny Leone) पूरी तरह से निश्चिंत हो गई तो वह अपनें पति डैनियल (Daniel) को जोर जोर से चिल्लाती हुई पुकारती हैं.

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सनी नें अपने इस वीडियो में कहा की उनका उद्देश्य इसके जरिये पति डैनियल बेवर को प्रैंक करना और अपने फैन्स का मनोरंजन करना हैं.वीडियो में सनी लियोन (Sunny Leone) नें पति डैनियल वेबर (Daniel Weber) के साथ किये गए प्रैंक को लेकर जब अपनें पति का विचार जानना चाहा तो डैनियल ने कहा की मैं लाइफ में काफी सीरियस व्यक्ति हूं, यही मेरी पर्सनैलिटी है, मुझे प्रैंक्स पसंद नहीं है. दूसरे लोगों पर भी मुझे यह पसंद नहीं आता तो अगर आप चाहती हैं कि मैं आपके प्रैंक को रेट करूं तो मैं उसे जीरो दूंगा, क्योंकि यह मेरे ऊपर किया गया है.

 

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This ain’t no cooking video!!!! Haha @dirrty99 got pranked and served!!

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सनी लियोन (Sunny Leone) नें अपनें सोशल मीडिया एकाउंट पर लौकडाउन के बीच अपने Hot और Sexy फोटोज की जगह वीडियोज ज्यादा शेयर किये हैं. जिसे उनके फैन्स काफी पसंद कर रहें हैं.

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Bhojpuri क्वीन रानी चटर्जी ने इस वेब सीरीज में निभाया बोल्ड किरदार, देखें Hot Photos

जैसा कि हम सब जानते हैं कि कोरोना वायरस (Corona Virus) के चलते पूरे भारत में लौकडाउन (Lockdown) चल रहा है और हर कोई अपने-अपने घरों में कैद है. ऐसे में हर कोई अपने एंटरटेन्मेंट (Entertainment) के लिए अलग अलग तरीके ढूंढ रहा है. इसी के चलते नई नई वेब सीरीज (Web Series) और मूवीज (Movies) भी ओ.टी.टी प्लेटफोर्मस (OTT Platforms) जैसे कि नेट्फ्लिक्स (Netflix), अमेजन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video), एम एक्स प्लेयर (MX Player) आदी. पर रिलीज की जा रही हैं जो कि दर्शकों के एंटरटेन्मेंट का पूरा पूरा खयाल रख रही हैं.

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ऐसे में एम एक्स प्लेयर (MX Player) पर 30 अप्रैल को रिलीज हुई वेब सीरीज ‘मस्तराम’ (Mastram) सोशल मीडिया पर तहल्का मचा रही है. इस वेब सीरीज में एडल्ट कहानियां है जो कि दर्शकों को खूब एंटरटेन कर रही है. इस वेब सीरीज का इतना चर्चा में रहने का कारण एक ये भी है कि इसमें भोजपुरी सिनेमा की जानी मानी एक्ट्रेस रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) ने जमकर अपना बोल्ड किरदार दिखाया है.

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आपको बता दें कि रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) भोजपुरी इंडस्ट्री की पौपुलर एक्ट्रेसेस में से एक है और रानी ने अब तक काफी सारी भोजपुरी फिल्में कर अपनी कमाल की फैल फौलोविंग (Fan Following) हासिल की है. ऐसे में रानी चटर्जी के फैंस को वेब सीरीज मस्तराम जरूर देखनी चाहिए क्योंकि ना सिर्फ इसमें रानी ने अपनी बहतरीन अदाकारी दिखाई है बल्कि उन्होनें इस वेब सीरीज में दर्शकों के एंटरटेन्मेंट के लिए खूब सारे बोल्ड सीन्स भी दिए हैं.

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इस वेब सीरीज में रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) के हौट अंदाज को देख उनके फैंस तो जैसे दीवाने से हो गए हैं. वैसे तो रानी इससे पहले भी भोजपुरी फिल्मों में अपनी हौट अदाएं दिखा कर लोगों को मदहोश कर चुकी हैं लेकिन इस वेब सीरीज (Web Series) को देख ऐसा लग रहा है कि इस बार तो उनके चाहने वालों के पसीने छूटने वाले हैं.

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रानी चटर्जी ने इस वेब सीरीज में कितना बोल्ड और हौट रिरदार निभाया है इसका अंदाजा तो आप सब इन फोटोज को देख लगा ही सकते हैं. रानी के फैंस के लिए एक और बड़ी खुशखबरी है कि वे सब इस वेब सीरीज को एम एक्स प्लेयर (MX Player) पर बिना किसी शुल्क के यानी कि बिल्कुल फ्री में देख सकते हैं.

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गांव पहुंचे लोग हो रहे भेदभाव का शिकार

बड़े शहरों से लौट कर अपने गांवघर पहुंचने वाले लोगों के सामने आग से निकले कड़ाही में गिरे वाले हालात बन गए हैं. गांव तक पहुंचने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, ट्रक, बस या दूसरी सवारी गाडि़यों में जानवरों की तरह ठूंसठूंस कर सफर करना पड़ा.

भूखेप्यासे रह कर जब ये लोग गांव पहुंचे तो इन के और परिवार के लोगों के बीच प्रशासन और गांव के दूसरे जागरूक लोग खड़े हो गए.

कुछ लोग इन की कोरोना वायरस से जांच की मांग करने लगे तो कुछ लोग इन को अस्पताल में रखने की मांग कर रहे थे. वहीं कुछ लोग चाहते थे कि ये 14 दिनों तक अपने घर में ही अलगथलग रहें. शहरों को छोड़ अपने गांव पहुंचे इन लोगों को लग रहा था कि ये अछूत हो गए हैं.

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कोरोना वायरस के खिलाफ जागरूकता अभियान एक डर की तरह पूरे समाज के दिलों में बैठ गया है. उसे बाहर से आने वाला हर कोई कोरोना का मरीज लगता है और उस से अपनी जान का खतरा महसूस करता है.

अजनबियों सा बरताव

उत्तर प्रदेश में मोहनलालगंज के टिकरा गांव का रहने वाला आलोक रावत उत्तराखंड में नौकरी करने गया था. लौकडाउन होने के बाद वह तमाम मुश्किलों का सामना करता हुआ

30 मार्च को अपने गांव पहुंचा. गांव में घुसने के पहले ही वहां के कुछ जागरूक लोगों ने उस को रोक लिया.

इस के बाद पुलिस को डायल

112 पर फोन कर के खबर कर दी कि एक आदमी बाहर से आया है. अब आलोक को घर जाने की जगह गांव के बाहर स्कूल में ही रहना पड़ा. बाद में पुलिस और डाक्टर आए तो लगा कि उस को कोई दिक्कत नहीं है. इस के बाद भी आलोक को हिदायत दी गई कि 14 दिन वह अपने घर के अलग कमरे में रहे, किसी से न मिलेजुले.

मोहनलालगंज तहसील के गनियार गांव का शुभम ओडिशा में रहता था. वह 29 मार्च को अपने गांव आया. गांव वालों ने इस की सूचना पुलिस को दी.

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पुलिस समय पर नहीं पहुंची तो पूरा दिन और एक रात शुभम को अपने गांव आने के बाद भी घर जाने की जगह गांव के बाहर ही स्कूल में किसी अछूत की तरह रहना पड़ा. उस के घर के लोग चाहते थे कि वह वहां न रहे, पर पुलिस के डर से वे लोग भी कुछ नहीं कर सके.

सुलतानपुर जिले के भवानीपुर का रहने वाला दीपक पंजाब में मजदूरी करता था. दिल्ली के रास्ते किसी तरह 3 दिन में अपने गांव पहुंच गया. रात में उसे किसी ने देखा नहीं. सुबह वह अपने खेत पर काम करने गया. उसी समय गांव वालों ने उस को देख लिया और इस की सूचना पुलिस को दे दी.

पुलिस उस को पहले थाने ले गई. उस के घर वालों को बुराभला भी बोला. 3 घंटे थाने में बैठने के बाद डाक्टर आए तो उस को ठीक पाया गया. इस के बाद भी उस को 14 दिन घर से बाहर नहीं निकलने को कहा गया.

पुलिस का डर

असल में कोविड 19 से बचाव के लिए प्रशासन के स्तर पर हर गांव वालों को कहा गया है कि कोई भी जब बाहर से आए तो उस की सघन तलाशी ली जाए. उस का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाए. अगर उस को सर्दीखांसी, बुखार की परेशानी नहीं भी है तो उस को

14 दिन के लिए अलग रहने को कहा जाए. अगर कोई इस बात को नहीं मानता है तो उस के खिलाफ संक्रमण अधिनियम का उल्लंघन करने का मुकदमा लिखा जाए.

जेल के कैदियों सी मुहर

कई जगहों पर बाहर से आने वाले लोगों के हाथ पर एक मुहर लगा दी जाती है जिस को देखने के बाद पता चलता है कि यह आदमी किस दिन बाहर से अपने गांव आया है.

झारखंड और दूसरे प्रदेशों में यह हालत सब से अधिक गंभीर है. जिन लोगों के हाथ में यह मुहर लगी होती है उन को किसी से मिलनाजुलना नहीं होता और उन को अपने घर में भी कैदियों की तरह अलग रहना पड़ता है.

पत्नी-बच्चे तक दूर

प्रतापगढ़ के रहने वाले रमेश कुमार अपने घर वापस आए तो उन को पत्नी और बच्चों से दूर कर दिया गया.

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रमेश की पत्नी को कुछ दिन पहले ही बेटा हुआ था. बेटा होने की खुशी में वह अपने घर आया तो वहां उस पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि वह 14 दिन सब से दूर रहेगा. रमेश को घर के बाहर उस कमरे में रहना पड़ा जहां जानवरों के लिए चारा रखा जाता था.

लोगों को कोरोना वायरस से अधिक डर पुलिस और प्रशासन का है. वे मुकदमा कायम करने की धमकी दे कर डराते हैं. इस के अलावा गांव के बहुत से लोग जागरूकता की आड़ में बाहर से आए लोगों की सूचना पुलिस को दे कर अपनी दुश्मनी भी निकाल रहे हैं.

वो जलता है मुझ से: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- वो जलता है मुझ से: भाग 1

‘‘संसार का सस्तामहंगा कचरा इकट्ठा कर तुम उस में डूब गए हो और उस ने अपना हाथ खींच लिया है. वह जानता है रुकावट निकालना अब उस के बस में नहीं है. समझनेसमझाने की भी एक उम्र होती है मेरे भाई. 45 के आसपास हो तुम दोनों, अपनेअपने रास्तों पर बहुत दूर निकल चुके हो. न तुम उसे बदल सकते हो और न ही वह तुम्हें बदलना चाहता होगा क्योंकि बदलने की भी एक उम्र होती है. इस उम्र में पीछे देख कर बचपन में झांक कर बस, खुश ही हुआ जा सकता है. जो उस ने भी चाहा और तुम ने भी चाहा पर तुम्हारा आज तुम दोनों के मध्य चला आया है.

‘‘बचपन में खिलौने बांटा करते थे… आज तुम अपनी चकाचौंध दिखा कर अपना प्रभाव डालना चाहते हो. वह सिर्फ चाय का एक कप या शरबत का एक गिलास तुम्हारे साथ बांटना चाहता है क्योंकि वह यह भी जानता है, दोस्ती बराबर वालों में ही निभ सकती है. तुम उस के परिवार में बैठते हो तो वह बातें करते हो जो उन्हें पराई सी लगती हैं. तुम करोड़ों, लाखों से नीचे की बात नहीं करते और वह हजारों में ही मस्त रहता है. वह दोस्ती निभाएगा भी तो किस बूते पर. वह जानता है तुम्हारा उस का स्तर एक नहीं है.

‘‘तुम्हें खुशी मिलती है अपना वैभव देखदेख कर और उसे सुख मिलता है अपनी ईमानदारी के यश में. खुशी नापने का सब का फीता अलगअलग होता है. वह तुम से जलता नहीं है, उस ने सिर्फ तुम से अपना पल्ला झाड़ लिया है. वह समझ गया है कि अब तुम बहुत दूर चले गए हो और वह तुम्हें पकड़ना भी नहीं चाहता. तुम दोनों के रास्ते बदल गए हैं और उन्हें बदलने का पूरापूरा श्रेय भी मैं तुम्हीं को दूंगा क्योंकि वह तो आज भी वहीं खड़ा है जहां 20 साल पहले खड़ा था. हाथ उस ने नहीं तुम ने खींचा है. जलता वह नहीं है तुम से, कहीं न कहीं तुम जलते हो उस से. तुम्हें अफसोस हो रहा है कि अब तुम उसे अपना वैभव दिखादिखा कर संतुष्ट नहीं हो पाओगे… और अगर मैं गलत कह रहा हूं तो जाओ न आज उस के घर पर. खाना खाओ, देर तक हंसीमजाक करो…बचपन की यादें ताजा करो, किस ने रोका है तुम्हें.’’

चुपचाप सुनता रहा विजय. जानता हूं उस के छोटे से घर में जा कर विजय का दम घुटेगा और कहीं भीतर ही भीतर वह वहां जाने से डरता भी है. सच तो यही है, विजय का दम अपने घर में भी घुटता है. करोड़ों का कर्ज है सिर पर, सारी धनसंपदा बैंकों के पास गिरवी है. एकएक सांस पर लाखों का कर्ज है. दिखावे में जीने वाला इनसान खुश कैसे रह सकता है और जब कोई और उसे थोड़े में भी खुश रह कर दिखाता है तो उसे समझ में ही नहीं आता कि वह क्या करे. अपनी हालत को सही दिखाने के बहाने बनाता है और उसी में जरा सा सुख ढूंढ़ना चाहता है जो उसे यहां भी नसीब नहीं हुआ.

‘‘मैं डरने लगा हूं अब उस से. उस का व्यवहार अब बहुत पराया सा हो गया है. पिछले दिनों उस ने यहां एक फ्लैट खरीदा है पर उस ने मुझे बताया तक नहीं. सादा सा समारोह किया और गृहप्रवेश भी कर लिया पर मुझे नहीं बुलाया.’’

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‘‘अगर बुलाता तो क्या तुम जाते? तुम तो उस के उस छोटे से फ्लैट में भी दस नुक्स निकाल आते. उस की भी खुशी में सेंध लगाते…अच्छा किया उस ने जो तुम्हें नहीं बुलाया. जिस तरह तुम उसे अपना महल दिखा कर खुश हो रहे थे उसी तरह शायद वह भी तुम्हें अपना घर दिखा कर ही खुश होता पर वह समझ गया होगा कि उस की खुशी अब तुम्हारी खुशी हो ही नहीं सकती. तुम्हारी खुशी का मापदंड कुछ और है और उस की खुशी का कुछ और.’’

‘‘मन बेचैन क्यों रहता है यह जानने के लिए कल मैं पंडितजी के पास भी गया था. उन्होंने कुछ उपाय बताया है,’’ विजय बोला.

‘‘पंडित क्या उपाय करेगा? खुशी तो मन के अंदर का सुख है जिसे तुम बाहर खोज रहे हो. उपाय पंडित को नहीं तुम्हें करना है. इतने बडे़ महल में तुम चैन की एक रात भी नहीं काट पाए क्योंकि इस की एकएक ईंट कर्ज से लदी है. 100 रुपए कमाते हो जिस में 80 रुपए तो कारों और घर की किस्तों में चला जाता है. 20 रुपए में तुम इस महल को संवारते हो. हाथ फिर से खाली. डरते भी हो कि अगर आज तुम्हें कुछ हो जाए तो परिवार सड़क पर न आ जाए.

‘‘तुम्हारे परिवार के शौक भी बड़े निराले हैं. 4 सदस्य हो 8 गाडि़यां हैं तुम्हारे पास. क्या गाडि़यां पेट्रोल की जगह पानी पीती हैं? शाही खर्च हैं. कुछ बचेगा क्या, तुम पर तो ढेरों कर्ज है. खुश कैसे रह सकते हो तुम. लाख मंत्रजाप करवा लो, कुछ नहीं होने वाला.

‘‘अपने उस मित्र पर आरोप लगाते हो कि वह तुम से जलता है. अरे, पागल आदमी…तुम्हारे पास है ही क्या जिस से वह जलेगा. उस के पास छोटा सा ही सही अपना घर है. किसी का कर्ज नहीं है उस पर. थोड़े में ही संतुष्ट है वह क्योंकि उसे दिखावा करना ही नहीं आता. सच पूछो तो दिखावे का यह भूत तकलीफ भी तो तुम्हें ही दे रहा है न. तुम्हारी पत्नी लाखों के हीरे पहन कर आराम से सोती है, जागते तो तुम हो न. क्यों परिवार से भी सचाई छिपाते हो तुम. अपना तौरतरीका बदलो, विजय. खर्च कम करो. अंकुश लगाओ इस शानशौकत पर. हवा में मत उड़ो, जमीन पर आ जाओ. इस ऊंचाई से अगर गिरे तो तकलीफ बहुत होगी.

‘‘मैं शहर का सब से अच्छा काउंसलर हूं. मैं अच्छी सुलह देता हूं इस में कोई शक नहीं. तुम्हें कड़वी बातें सुना रहा हूं सिर्फ इसलिए कि यही सच है. खुशी बस, जरा सी दूर है. आज ही वही पुराने विजय बन जाओ. मित्र के छोटे से प्यार भरे घर में जाओ. साथसाथ बैठो, बातें करो, सुखदुख बांटो. कुछ उस की सुनो कुछ अपनी सुनाओ. देखना कितना हलकाहलका लगेगा तुम्हें. वास्तव में तुम चाहते भी यही हो. तुम्हारा मर्ज भी वही है और तुम्हारी दवा भी.’’

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चला गया विजय. जबजब परेशान होता है आ जाता है. अति संवेदनशील है, प्यार पाना तो चाहता है लेकिन प्यार करना भूल गया है. संसार के मैल से मन का शीशा मैला सा हो गया है. उस मैल के साथ भी जिआ नहीं जा रहा और उस मैल के बिना भी गुजारा नहीं. मैल को ही जीवन मान बैठा है. प्यार और मैल के बीच एक संतुलन नहीं बना पा रहा इसीलिए एक प्यारा सा रिश्ता हाथ से छूटता जा रहा है. क्या हर दूसरे इनसान का आज यही हाल नहीं है? खुश रहना तो चाहता है लेकिन खुश रहना ही भूल गया है. किसी पर अपनी खीज निकालता है तो अकसर यही कहता है, ‘‘फलांफलां जलता है मुझ से…’’ क्या सच में यही सच है? क्या यह सच है कि हर संतोषी इनसान किसी के वैभव को देख कर सिर्फ जलता है?

मौत की छाया: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- मौत की छाया: भाग 1

छाया से की गई पूछताछ में पुलिस वालों को कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी. सिवाय इस के कि पुष्पेंद्र पत्नी के चरित्र पर शक करता था. फिर भी पुलिस यह समझ गई थी कि एक अकेली औरत पुष्पेंद्र जैसे तगड़े मर्द का न तो अकेले गला घोंट सकती थी और न अकेले घर से 20 किलोमीटर दूर ले जा कर शिकोहाबाद की भूड़ा नहर में फेंक सकती थी. पुलिस चाहती थी कि कत्ल की इस वारदात का पूरा सच सामने आए.

मृतक पुष्पेंद्र के दोनों बेटे आलोक व आकाश अपने पिता के साथ रहते थे. उन दोनों ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि जब पापा घर नहीं लौटे तो उन्होंने समझा कि वह मम्मी के पास कबीरनगर गए होंगे. 12 जून की सुबह 7 बजे मम्मी का फोन आया, जिस में उस ने कहा कि त्यौहार का दिन है, मेरे पास आ जाओ.

हम लोग मम्मी के पास कबीरनगर पहुंच गए. वहां पापा को न देख हम ने मम्मी से पूछा कि पापा कहां हैं, इस पर उस ने बताया कि वे रात में आए थे और कुछ देर रुक कर वापस चले गए थे. इस के थोड़ी देर बाद ही उन्हें पता चला कि पापा की मौत हो गई है.

मृतक के भाई महेश ने पुलिस को पूछताछ में बताया कि 11 जून को रात लगभग 11 बजे पुष्पेंद्र पत्नी के पास जा रहा था. रास्ते में पुष्पेंद्र का रिश्ते का साढ़ू मिल गया. उस ने पुष्पेंद्र को इतनी रात में छाया के पास जाने से मना भी किया, लेकिन पुष्पेंद्र नहीं माना. ससुराल में ही उस की हत्या कर लाश मोटरसाइकिल से ले जा कर नहर में फेंक दी गई.

पुलिस को मिला सुराग

इस बीच जांच के दौरान पुलिस को एक अहम सुराग हाथ लगा. किसी ने इंसपेक्टर को बताया कि छाया चोरीछिपे अब भी अपने प्रेमी संतोष से मिलती है. दोनों के नाजायज संबंध का जो शक किया जा रहा था, वह सच निकला. जाहिर था, हत्या अगर छाया ने की थी तो कोई न कोई उस का संगीसाथी जरूर रहा होगा. इस बीच पुलिस की बढ़ती गतिविधियों की भनक लगते ही छाया और उस का प्रेमी संतोष फरार हो गए.

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दोनों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया. मुखबिर की सूचना पर घटना के 2 महीने बाद 12 अगस्त को सीओ अजय सिंह चौहान और थानाप्रभारी अजय किशोर ने छाया व उस के प्रेमी संतोष शास्त्री को शिकोहाबाद स्टेशन रोड से हिरासत में ले लिया. दोनों फरार होने के लिए किसी वाहन का इंतजार कर रहे थे.

थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई. छाया पुलिस को दिए अपने बयानों में गड़बड़ा रही थी. जब पुलिस ने सख्ती दिखाई तो उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने कहा कि पति ने उस का जीना हराम कर दिया था. वह उस के चालचलन पर शक करता और मारतापीटता था.

इस के साथ ही दोनों बच्चों को भी उस से छीन लिया था. ऐसे में उस के सामने यह कदम उठाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उस ने पति की हत्या की जो कहानी बताई, इस तरह थी—

पुष्पेंद्र 3 भाइयों महेश और नरेश के बाद तीसरे नंबर का था. ये लोग गांव रैमजा, थाना नारखी, जिला फिरोजाबाद के मूल निवासी थे. लगभग 14 साल पहले पुष्पेंद्र की शादी फिरोजाबाद के थाना उत्तर के कबीरनगर खेड़ा निवासी इश्लोकी राठौर की पुत्री छाया से हुई थी. इश्लोकी की 2 बेटियां और 2 बेटे थे. इन में छाया सब से बड़ी थी. उस के बाद वर्षा और 2 भाई सोनू व मोनू थे.

पुष्पेंद्र के पास अपनी मैक्स गाड़ी थी. वह वाहनों के टायर खरीदने व बेचने का व्यवसाय करता था. 3 साल पहले उस ने फिरोजाबाद के कृष्णानगर में एक मकान खरीद लिया था और परिवार सहित गांव से आ कर उसी मकान में रहने लगा था. शादी के बाद उस के 2 बेटे हुए, इन में 13 वर्षीय आलोक 8वीं में पढ़ रहा था, जबकि 11 वर्षीय आकाश 6ठीं में था.

पुष्पेंद्र की गृहस्थी हंसीखुशी चल रही थी. करीब डेढ़ साल पहले जैसे उस के परिवार को किसी की नजर लग गई. हुआ यह कि कृष्णानगर में भागवतकथा का आयोजन हुआ. भागवतकथा में भजन गायक संतोष शास्त्री का छोटा भाई राजकुमार कृष्ण बना और छाया रुक्मिणी. भजन गायक संतोष भी छाया का हमउम्र था.

भरेपूरे बदन की छाया को देख कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह 2 बच्चों की मां है. 35 की उम्र में भी वह खासी जवान दिखती थी. संतोष के गले से निकली उस की सुरीली आवाज पर छाया रीझ गई. वहीं संतोष भी उस की सुंदरता का दीवाना हो गया.

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भागवतकथा में एक सप्ताह तक रुक्मिणी का अभिनय करने के दौरान ही छाया का संतोष शास्त्री से परिचय हुआ. दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए. फिर दोनों मोबाइल पर बातें करने लगे. संतोष हंसीठिठोली के दौरान छाया से कहता, ‘‘रुक्मिणी तो अब संतोष की है.’’

आसपास जहां भी भागवतकथा के आयोजन में संतोष आता, फोन कर के छाया को भी बुला लेता था. धीरेधीरे दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ता गया. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे. इस बीच दोनों के अवैध संबंध भी बन गए थे. अब छाया फोन पर संतोष से लंबीलंबी बातें करने लगी. वह उस के खयालों में खोईखोई सी रहती थी.

घरेलू हिंसा का केस करा दिया

पुष्पेंद्र को जब इस की जानकारी मिली तो इसे ले कर पतिपत्नी में तकरार शुरू हो गई. लेकिन छाया ने संतोष से बात करना या मिलना नहीं छोड़ा. इस से पुष्पेंद्र अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करने लगा. पतिपत्नी में आए दिन झगड़े होने लगे. गुस्से में पुष्पेंद्र छाया की पिटाई भी कर देता था. गृह क्लेश के चलते पिछले डेढ़ साल से छाया पति पुष्पेंद्र से अलग रहने लगी थी.

छाया 3 महीने दिल्ली में अपने मामा के पास रही. वहां वह फोन पर प्रेमी संतोष से बात करती रहती थी. इस बीच उस ने कोर्ट में पुष्पेंद्र पर घरेलू हिंसा का केस कर दिया था. यह मुकदमा जिला फिरोजाबाद के न्यायालय में चल रहा था.

पिछले 6 महीने से छाया अपने मायके कबीरनगर में रह रही थी. इस बीच उस के पास संतोष का आनाजाना लगा रहा. जब भी छाया का प्रेमी से मिलने का मन होता, वह उसे फोन कर देती. दोनों एकदूसरे से मिल कर संतुष्ट हो जाते थे. संतोष छाया के पति की कमी पूरी कर देता था. एक दिन छाया ने संतोष से कहा कि हम लोग इस तरह कब तक तड़पते रहेंगे, रास्ते का कांटा हटा दो.

साजिश को ऐसे दिया अंजाम

इस के बाद छाया व उस के प्रेमी संतोष ने मिल कर एक षडयंत्र रचा. मुकदमे की तारीख पर पुष्पेंद्र और छाया की बातचीत हो जाती थी. जबतब दोनों मोबाइल पर भी बात कर लेते थे. छाया ने पुष्पेंद्र को मीठीमीठी बातों के झांसे में ले लिया था.

10 जून की रात को छाया ने फोन कर पुष्पेंद्र को अपने मायके बुलाया था. लेकिन उस दिन इन लोगों की योजना सफल नहीं हो सकी. इस पर छाया ने 11 जून की शाम को पुष्पेंद्र को फोन किया और कोल्डड्रिंक की बोतल ले कर रात में आने को कहा. पुष्पेंद्र पत्नी की चाल समझ नहीं सका और 11 बजे जब दोनों बच्चे सो रहे थे, उस ने छोटे बेटे आकाश को जगा कर कहा कि तुम्हारी मम्मी ने बुलाया है, मैं कुछ देर में आ जाऊंगा.

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रात 11 बजे वह कोल्डड्रिंक ले कर छाया के पास पहुंच गया. छाया ने पुष्पेंद्र से बोतल ले ली. वह बोतल ले कर किचन में गई और 2 गिलासों में कोल्डड्रिंक ले कर आ गई. उस ने पुष्पेंद्र वाले कोल्डड्रिंक में नींद की गोलियां घोल दी थीं.

दोनों पलंग पर लेट कर प्यारमोहब्बत की बातें करने लगे. कोल्डड्रिंक पीने के बाद पुष्पेंद्र को नींद आ गई. जब वह गहरी नींद में सो गया तो छाया ने योजनानुसार अपने प्रेमी संतोष शास्त्री को फोन कर के घर बुला लिया.

संतोष छाया के फोन का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. फोन आते ही वह छाया के घर पहुंच गया. दोनों ने मिल कर सो रहे पुष्पेंद्र को दबोच लिया और उस का गला दबा कर हत्या कर दी. गला घोंटने के दौरान छाया पुष्पेंद्र के दोनों हाथ पकड़े रही.

रात में ही शव को ठिकाने लगाना था, क्योंकि दूसरे दिन गंगा दशहरा था. संतोष ने पुष्पेंद्र की मोटरसाइकिल पर लाश इस तरह बैठी स्थिति में रखी, जिस से वह जिंदा लगे. छाया उस के पीछे बैठ गई.

रात में ही संतोष और छाया उसे बाइक से शिकोहाबाद भूड़ा नहर पर लाए और बालाजी मंदिर की ओर ले गए रात में वह जगह सुनसान रहती थी. दोनों ने पुष्पेंद्र के शरीर से कपड़े उतारने के बाद उस के कपड़े और मोबाइल बाइक पर रख दिए. फिर दोनों ने शव को नहर में फेंक दिया. जल्दबाजी में उन्होंने लाश नहर के किनारे पर ही डाल दी थी, जिस से वह पानी के तेज बहाव में नहीं बह सकी.

सुबह नहर पर मेला लगा और लोग नहर में नहाने के लिए पहुंचे. युवकों की एक टोली जब नहा रही थी, तभी एक युवक के पैर के नीचे पुष्पेंद्र का शव आ गया, जिसे नहर के बाहर निकाल कर पुलिस को सूचना दी गई.

पुलिस ने पुष्पेंद्र हत्याकांड में उस की पत्नी छाया, उस के प्रेमी संतोष शास्त्री को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पुष्पेंद्र के दोनों बच्चे अपने ताऊ महेशचंद्र के पास रह रहे हैं.

छाया ने वासना में अंधी हो कर पति की हत्या कर अपनी मांग का सिंदूर उजाड़ने के साथ पतिपत्नी के पवित्र रिश्ते को कलंकित कर दिया. वहीं अपनी हंसतीखेलती गृहस्थी के साथ अबोध बच्चों से भी दूर हो गई. -कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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