मौत की छाया: भाग 1

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद का एक थाना है शिकोहाबाद. इस थाना क्षेत्र में एक गांव है भूड़ा, जो हाइवे के किनारे बसा है. भोगनीपुर नहर इस गांव से हो कर गुजरती है. इसी वजह से अधिकतर लोग इस नहर को भूड़ा नहर के नाम से जानते हैं.

हर साल देश भर में ज्येष्ठ माह की 10वीं तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है, खासकर उन जगहों पर जहां गंगा या गंगनहर पास होती है. हर साल की तरह इस साल भी भूड़ा नहर पर गंगा दशहरे का भव्य मेला लगा था. इस मौके पर लोग स्नान के लिए सुबह से ही भूड़ा नहर पर आने लगे थे. मेले में धीरेधीरे भीड़ बढ़ने लगी थी.

सुबह लगभग 8 बजे शिकोहाबाद नगर के रहने वाले युवकों की एक टोली नहाने के लिए नहर पर पहुंची. नहर किनारे की पूर्वी पटरी से कुछ ही दूरी पर बालाजी मंदिर है. उन युवकों ने बालाजी मंदिर से थोड़ा पहले नहर की पटरी के किनारे एक मोटरसाइकिल खड़ी देखी.

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मोटरसाइकिल पर कपड़ों के अलावा एक मोबाइल भी रखा था. युवकों ने सोचा कि मोटरसाइकिल वाला नहर में नहाने गया होगा. उस ने अपनी मोटरसाइकिल, कपड़े और मोबाइल यहां छोड़ दिया होगा.

युवकों की टोली नहर की पटरी पर कपड़े रख कर नहाने के लिए नहर में उतर गई. नहाते समय एक युवक के पैर में कुछ उलझा तो उस ने अपने साथियों से कहा कि नहर में कुछ है, जो उस के पैरों से टकराया है.

इस पर उस के साथी वहां आ गए. पास आने पर उन के पैरों में भी कुछ टकराया. उन्हें लगा कि वहां कोई डूबा है. संभव है बाइक वाला ही हो. युवकों में से मनोज ने अपने साथियों की मदद से उसे पानी से बाहर निकाला तो सभी के बदन में पांव से सिर तक शीतलहर सी दौड़ गई.

नहर के पानी से एक युवक की लाश निकली थी, जिस के बदन पर केवल अंडरवियर था. उन लोगों ने अनुमान लगाया कि मोटरसाइकिल डूबने वाले युवक की ही है. उन्हें लगा कि वह मोटरसाइकिल से आया होगा. कपड़े उतार कर नहर में उतर गया होगा, जहां डूबने से उस की मौत हो गई.

मनोज के साथी बंटू ने डायल 100 नंबर पर पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही पुलिस की गाड़ी घटनास्थल पर पहुंच गई. तत्कालीन थानाप्रभारी शिवकुमार शर्मा ने लाश का निरीक्षण किया तो उन्हें युवक की गरदन पर चोट के निशान दिखाई दिए.

साथ ही उस की नाक से खून भी बह रहा था. मनोज ने पुलिस को नहर की पटरी किनारे खड़ी मोटरसाइकिल व उस पर कपड़े व मोबाइल रखा होने की बात बताई.

पुलिस ने युवक की शिनाख्त कराने का प्रयास किया लेकिन कोई भी मृतक को पहचान नहीं सका. यह 12 जून, 2019 की सुबह की बात है. लाश देख कर पहली नजर में ही पुलिस को समझ में आ गया था कि मामला हत्या का है.

क्योंकि मृतक की गरदन पर चोट के निशान दिख रहे थे, जिस से यह समझने में देर नहीं लगी कि हत्या को हादसे का रूप देने के लिए ही मृतक की मोटरसाइकिल नहर की पटरी के किनारे सुनसान जगह पर खड़ी की गई थी.

बाइक पर मृतक के कपड़े और मोबाइल भी इसी उद्देश्य से रखे गए थे ताकि देखने पर लगे कि युवक नहाते समय डूब गया. जाहिर है, कोई भी अपनी मोटरसाइकिल और मोबाइल इस तरह लावारिस छोड़ कर नहाने नहीं जा सकता. थानाप्रभारी शिवकुमार शर्मा ने यह सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

शिनाख्त कराने की कोशिश

मृतक कौन और कहां का रहने वाला था, यह बात वहां मौजूद लोगों से पता नहीं लग सकी. पुलिस ने अनुमान लगाया कि युवक की हत्या कर लाश को रात में नहर में फेंका गया था. जाहिर है यह काम अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता. सूचना मिलने पर सीओ अजय सिंह चौहान और एसडीएम डा. सुरेशचंद्र भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए.

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मृतक की शिनाख्त के लिए पुलिस ने मोबाइल फोन में मौजूद नंबरों पर काल करनी शुरू कर दी. इसी प्रयास में महेशचंद्र नाम के एक व्यक्ति से बात हुई. उस ने बताया कि यह नंबर उस के छोटे भाई पुष्पेंद्र कुमार का है, जो अपने दोनों बच्चों के साथ फिरोजाबाद के थाना उत्तर के कृष्णानगर में रहता है.

वह कल रात घर से मोटरसाइकिल ले कर अपनी ससुराल जाने के लिए निकला था, लेकिन अब तक वापस नहीं आया है. पुलिस ने भाई से घटनास्थल पर पहुंचने को कहा ताकि लाश की शिनाख्त हो सके.

महेशचंद्र की बातों से यह निश्चित हो गया कि लाश उस के भाई पुष्पेंद्र की ही है, साथ ही मोबाइल और बाइक भी. कुछ ही देर में महेशचंद्र ग्राम प्रधान सुनील बघेल व अन्य गांव वालों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया.

लाश देख कर महेशचंद्र ने रोतेरोते उस की शिनाख्त अपने छोटे भाई पुष्पेंद्र के रूप में कर दी. महेश ने पुलिस को बताया कि पुष्पेंद्र की पत्नी छाया का डेढ़ साल से एक युवक से अफेयर चल रहा है. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच विवाद होता रहता था.

बात बढ़ी तो मामला मारपीट तक पहुंच गया. छाया ने पुष्पेंद्र पर घरेलू हिंसा का केस कर दिया था. फिलहाल दोनों के बीच कोर्ट में मुकदमा चल रहा था. मुकदमे के बाद से छाया दोनों बच्चों को छोड़ कर फिरोजाबाद में कबीरनगर स्थित अपने मायके में रहने लगी थी. महेश ने पुष्पेंद्र की हत्या में उस की पत्नी छाया और उस के प्रेमी संतोष का हाथ होने की बात कही.

महेश ने इन दोनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की पुलिस को एक तहरीर भी दी, लेकिन पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद ही स्थिति स्पष्ट होने पर केस दर्ज करने को कहा. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने पुष्पेंद्र की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फिरोजाबाद भेज दी.

मायके में रह रही पत्नी छाया को जब पति की हत्या की जानकारी मिली तो वह सुबह ही घर आए अपने दोनों बेटों आलोक व आकाश को साथ ले कर रोतेबिलखते जिला अस्पताल पहुंच गई. दोनों बच्चे भी पिता की मौत से सदमे में थे.

पति की मौत पर छाया का रोरो कर बुरा हाल था. इस हत्या की खबर सुन कर प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडिया के पत्रकार भी पोस्टमार्टम हाउस पर पहुंच गए थे. छाया ने उन्हें बताया कि 11 जून को मेरे पिता ने बच्चों को फोन कर के कह दिया था कि कल दशहरा है, घर आ जाना.

दशहरे के दिन यानी 12 जून को बच्चों के न आने पर उस ने सुबह फोन किया, लेकिन न तो पति पुष्पेंद्र ने फोन उठाया और न बच्चों ने. इस पर उस ने घर के पड़ोस में रहने वाली रिश्ते की बहन को फोन कर के पूछा कि कोई फोन नहीं उठा रहा है, आप बात करा दो. इस के बाद उस बहन ने छोटे बेटे आकाश को बुला कर बात कराई. उस ने छोटे बेटे से पूछा कि आकाश, पापा और तुम कोई भी फोन नहीं उठा रहे हो, क्या बात है?

आकाश ने कहा कि पापा रात को कहीं गए थे. कह रहे थे, सुबह आएंगे लेकिन अभी तक नहीं आए. छाया ने बताया कि उस ने आकाश से कहा कि तुम दोनों आ जाओ. पापा भी आ जाएंगे, बस इतनी ही बात हुई थी.

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सुबह उसे खबर मिली कि पति का शव शिकोहाबाद भूड़ा नहर में मिला है. छाया ने खुद को बेकसूर बताते हुए कहा कि उस का पति से इसलिए विवाद था कि वह उस के चरित्र पर शक करते थे. पारिवारिक हिंसा की वजह से वह करीब डेढ़ साल से पति से अलग रह रही थी. पहले वह दिल्ली में अपने मामा के घर चली गई थी. लेकिन पिछले 6 महीने से मायके में रह रही थी.

दोनों में हो गया था राजीनामा

पिछले 2 महीनों से मोबाइल पर पति से रात में बात होती थी. मंगलवार 11 जून को भी बात हुई थी. छाया ने बताया कि हम दोनों के बीच राजीनामा हो गया था. मंगलवार को कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई थी, लेकिन जज नहीं बैठे और अगली तारीख मिल गई.

वहां से हम दोनों शिकोहाबाद स्थित बालाजी मंदिर के दर्शन करने चले गए थे. मंगलवार की रात में भी दोनों की मोबाइल पर बातचीत हुई थी. पुष्पेंद्र ने पूछा था कि तुम डेढ़ साल बाद आ रही हो, खाने में क्या बनाओगी? जवाब में छाया ने पति से उस के मनपसंद व्यंजन बनाने की बात कही थी. छाया ने खुद को निर्दोष बताया.

घटना के 2 दिन बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट में पुष्पेंद्र की हत्या का कारण गला घोंटना बताया गया. इस पर पुलिस ने नरेश की ओर से छाया व उस के प्रेमी संतोष शास्त्री, निवासी झलकारी नगर, थाना उत्तर, फिरोजाबाद के विरुद्ध पुष्पेंद्र की हत्या की रिपोर्ट भादंवि की धारा 302, 201 के अंतर्गत दर्ज कर ली.

इसी दौरान थानाप्रभारी शिव कुमार शर्मा का स्थानांतरण हो गया. इस चक्कर में पुष्पेंद्र की हत्या हुए एक महीने का समय बीत गया, लेकिन पुलिस नामजद हत्याभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर सकी.

यह देख मृतक के भाई महेश ने अपने गांव रैमजा के प्रधान सुनील बघेल के साथ थाना शिकोहाबाद जा कर पुलिस अफसरों से बात कर के हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग की. उस ने अफसरों के औफिसों के कई चक्कर काटे. साथ ही एसएसपी सचींद्र पटेल से भी गुहार लगाई. उन्होंने अधीनस्थ अफसरों को पुष्पेंद्र की हत्या के आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार करने के आदेश दिए.

एसपी (ग्रामीण) राजेश कुमार ने भी नए थानाप्रभारी अजय किशोर द्वारा थाने का चार्ज लेने के तुरंत बाद पुष्पेंद्र हत्याकांड के आरोपियों के विरुद्ध सबूत जुटा कर उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया. साथ ही सर्विलांस टीम की मदद लेने को भी कहा. एसपी के निर्देश पर तत्काल काररवाई शुरू हो गई.

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पुलिस ने मृतक की पत्नी छाया के बयानों की सच्चाई जानने के लिए उस के मोबाइल को भी खंगाला. उस के फोन नंबर की काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर शक के दायरे में आया, जिस पर सब से ज्यादा बातें होती थीं. जब पुलिस ने उस नंबर को ट्रैस किया तो वह संतोष शास्त्री का नंबर निकला. पुष्पेंद्र के मोबाइल की आखिरी लोकेशन कबीरनगर की थी. उस के फोन पर रात में जो अंतिम काल आई थी, वह छाया की थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

आप भी तो नहीं आए थे: भाग 2

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लेखक- विजय सिंघल ‘अकेला’

‘‘कभीकभार सड़कबाजार में मिल जाता है या घूमने के दर्शनीय स्थलों पर टकरा जाता है अचानक. बस.’’

‘‘कभी तुम्हारे पास आताजाता नहीं?’’

‘‘नहीं.’’

भैया, फिर रोने लगे.

मैं लौन में जा कर टहलने लगा, कुछ देर बाद भैया मेरे पास आए और बोले, ‘‘अब कभी तन्मय तुम्हें मिले तो पूछना कि मां की मृत्यु पर क्यों नहीं आया. मां को एकदम ही क्यों भुला दिया?’’

तन्मय के इस बेगाने व रूखे व्यवहार की पीड़ा उन्हें बहुत कसक दे रही थी.

उन की इस करुण व्यथा के प्रति, उस बेकली के प्रति, मेरे मन में दया नहीं उपजी… क्रोध फुफकारने लगा, मन में क्षोभ उभरने लगा. मन में गूंजने लगा कि अपनी मां की मृत्यु पर तुम भी तो नहीं आए थे, तुम्हारे मन में भी तो मां के प्रति कोई ममता, कोई पे्रम भावना नहीं रह गई थी. यदि तुम्हारा बेटा अपनी मां की मृत्यु पर नहीं आया तो इतनी विकलता क्यों? क्या तुम्हारी मां तुम्हारे लिए मां नहीं थी, तन्मय की मां ही मां है. तन्मय की मां के पास तो धन का विपुल भंडार था, उसे तन्मय को पालतेपोसते वक्त धनार्जन हेतु खटना नहीं पड़ा था, पर तुम्हारी मां तो एक गरीब, कमजोर, बेबस विधवा थी. लोगों के कपड़े सींसीं कर, घरघर काम कर के उस ने तुम्हें पालापोसा, पढ़ाया, लिखाया था. जब तन्मय की मां अपने राजाप्रासाद में सुखातिरेक से खिल- खिलाती विचरण करती थी तब तुहारी मां दुख, निसहायता, अभाव से परेशान हो कर गलीगली पीड़ा के अतिरेक से बिलबिलाती घूमती थी. उसी विवश पर ममतामयी मां को भी तुम ने भुला दिया… भुलाया था या नहीं.

तेरहवीं बाद सब विदा होने लगे.

विदा होने के समय भैया मुझ से लिपट कर रोने लगे. बोले, ‘‘पूछोगे न भैया तन्मय से?’’

मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘यह पूछना निरर्थक है.’’

‘‘क्यों? निरर्थक क्यों है?’’

‘‘क्योंकि आप जानते हैं कि वह क्यों नहीं आया?’’

‘‘मैं जानता हूं कि वह क्यों नहीं आया,’’ यंत्रचलित से वह दोहरा उठे.

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‘‘हां, आप जानते हैं…’’ मैं किंचित कठोर हो उठा, ‘‘जरा अपने दिल को टटोलिए. जरा अपने अतीत में झांक कर देखिए…आप को जवाब मिल जाएगा. याद कीजिए, जब आप अपनी मां के बेटे थे, अपनी मां के लाडले थे तो आप को अपनी बीमार मां का, आप के वियोग की व्यथा से जरूर दुखी मां का, आंसुओं से भीगा निस्तेज चेहरा दिखलाई देगा यही शिकायत करता हुआ जो आप को अपने बेटे तन्मय से है.

‘‘वह पूछ रही होगी, ‘बेटा, तू मुझे बीमारी में भी देखने कभी नहीं आया. तू ने बाहर जा कर धीरेधीरे मेरे पास आना ही छोड़ दिया, वह मैं ने सह लिया…मैं ने सोच लिया तू अपने परिवार के साथ खुश है. मेरे पास नहीं आता, मुझे याद नहीं करता, न सही. पर मैं लंबे समय तक रोग शैया पर लेटी बीमारी की यंत्रणा झेलती रही, तब भी तुझे मेरे पास आने की, बीमारी में मुझे सांत्वना देने की इच्छा नहीं हुई. तू इतना निर्दयी, इतना भावनाशून्य, क्योंकर हो गया बेटा, तू अपनी जन्मदात्री को, अपनी पालनपोषणकर्ता मां को ही भुला बैठा, तू मेरी मृत्यु पर मुझे कंधा देने भी नहीं आया, मैं ने ऐसा क्या कर दिया तेरे साथ जो तू ने मुझे एकदम ही त्याग दिया.

‘‘ ‘ऐसा क्यों किया बेटा तू ने? क्या मैं ने तुझे प्यार नहीं किया? अपना स्नेह तुझे नहीं दिया. मैं तुझे हर समय हर क्षण याद करती रही, मां को ऐसे छोड़ देता है कोई. बतला मेरे बेटे, मेरे लाल. मेरे किस कसूर की ऐसी निर्मम सजा तू ने मुझे दी. तुझे एक बार देखने की, एक बार कलेजे से लगाने की इच्छा लिए मैं चली गई. मुझे तेरा धन नहीं तेरा मन चाहिए था बेटा, तेरा प्यार चाहिए था.’ ’’

कह कर मैं थोड़ा रुका, मेरा गला भर आया था.

मैं आगे फिर कहने लगा, ‘‘आप अपने परिवार, अपनी पत्नी और संतान में इतने रम गए कि आप की मां, आप की जन्मदात्री, आप के अपने भाईबहन, सब आप की स्मृति से निकल गए, सब विस्मृति की वीरान वादियों में गुम हो गए. सब को नेपथ्य में भेज दिया आप ने. उन्हीं विस्मृति की वीरान वादियों में…उसी नेपथ्य में आप के बेटे तन्मय ने आप सब को भेज दिया, जो आप ने किया वही उस ने किया. सिर्फ इतिहास की पुनरावृत्ति ही तो हुई है, फिर शिकवाशिकायत क्यों? रोनाबिसूरना क्यों? वह भी अपने प्रेममय एकल परिवार में लिप्त है और आप लोगों से निर्लिप्त है, आप लोगों को याद नहीं करता. बस, आप को अपने बच्चोंं की मां दिखलाई दी पर अपनी मां कभी नजर नहीं आईं, उस को भी अपनी मां नजर नहीं आ रहीं.’’

कह कर मैं फिर थोड़ा रुका, ठीक से बोल नहीं पा रहा था. गला अवरुद्ध सा हुआ जा रहा था. कुछ क्षण के विराम के बाद फिर बोला, ‘‘लगता यह है कि जब धन का अंबार लगने लगता है, जीवन में सुखसुकून का, तृप्ति का, आनंद का, पारावार ठाठें मारने लगता है, तो व्यक्ति केवल निज से ही संपृक्त हो कर रह जाता है. बाकी सब से असंपृक्त हो जाता है. उस के मनमस्तिष्क से अपने मातापिता, भाईबहन वाला परिवार बिसरने लगता है, भूलने लगता है और अपनी संतान वाला परिवार ही मन की गलियों, कोनों में पसरने लगता है. सुखतृप्ति का यह संसार शायद ऐसा सम्मोहन डाल देता है कि व्यक्ति को अपना निजी परिवार ही यथार्थ लगने लगता है और अपने मातापिता वाला परिवार कल्पना लगने लगता है और यथार्थ तो यथार्थ होता है और कल्पना मात्र कल्पना.

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‘‘आप को अपनी पत्नी की अपने पुत्र को देखने की ललक दिखलाई पड़ी. अपनी मां की अपने पुत्र को देखने की तड़प दिखलाई नहीं पड़ी. अपनी बीमार पत्नी की बेटे के प्रति चाह भरी आहेंकराहें सुनाई पड़ीं पर अपनी बीमार मां की, आप को देखने की दुख भरी रुलाई नहीं सुनाई पड़ी.

‘‘क्यों सुनाई पड़ती? क्योंकि आप भूल गए थे कि कोई आप की भी मां है, जैसे आप की पत्नी ने रुग्ण अवस्था में दुख भोगा था आप की मां ने भी भोगा था. जैसे आप की पत्नी ने अपने पुत्र के आगमन की रोरो कर प्रतीक्षा की थी वैसे ही दुख भरी प्रतीक्षा आप की मां ने आप की भी की थी. पर आप न आए. न आप पलपल मृत्यु की ओर अग्रसर होती मां को देखने आए और न ही उस के अंतिम संस्कार में शामिल हुए.

‘‘वही अब आप के पुत्र ने भी किया. यह निरासक्ति की, बेगानेपन की फसल, आप ने ही तो बोई थी. तो आप ही काटिए.’’

भैया कुछ न बोले…बस,

आप भी तो नहीं आए थे: भाग 1

लेखक- विजय सिंघल ‘अकेला’

सुबह 6 बजे का समय था. मैं अभी बिस्तर से उठा ही था कि फोन घनघना उठा. सीतापुर से बड़े भैया का फोन था जो वहां के मुख्य चिकित्सा अधिकारी थे.

वह बोले, ‘‘भाई श्रीकांत, तुम्हारी भाभी का आज सुबह 5 बजे इंतकाल हो गया,’’ और इतना बतातेबताते वह बिलख पड़े. मैं ने अपने बड़े भाई को ढाढ़स बंधाया और फोन रख दिया.

पत्नी शीला उठ कर किचन में चाय बना रही थी. उसे मैं ने भाभी के मरने का बताया तो वह बोली, ‘‘आप जाएंगे?’’

‘‘अवश्य.’’

‘‘पर बड़े भैया तो आप के किसी भी कार्य व आयोजन में कभी शामिल नहीं होते. कई बार लखनऊ आते हैं पर कभी भी यहां नहीं आते. इतने लंबे समय तक मांजी बीमार रहीं, कभी उन्हें देखने नहीं आए, उन की मृत्यु पर भी नहीं आए, न आप के विवाह में आए,’’ शीला के स्वर में विरोध की खनक थी.

‘‘पर मैं तो जाऊंगा, शीला, क्योंकि मां ऐसा ही चाहती थीं.’’

‘‘ठीक है, जाइए.’’

‘‘तुम नहीं चलोगी?’’

‘‘चलती हूं मैं भी.’’

हम तैयार हो कर 8 बजे की बस से चल पड़े और साढ़े 10 तक सीतापुर पहुंच गए. बाहर से आने वालों में हम ही सब से पहले पहुंचे थे, निकटस्थ थे, अतएव जल्दी पहुंच गए.

भैया की बेटी वसुधा भी वहीं थी, मां की बीमारी बिगड़ने की खबर सुन कर आ गई थी. वह शीला से चिपट कर रो उठी.

‘‘चाची, मां चली गईं.’’

शीला वसुधा को सांत्वना देने लगी, ‘‘रो मत बेटी, दीदी का वक्त पूरा हो गया था, चली गईं. कुदरत का यही विधान है, जो आया है उसे एक दिन जाना है,’’ वह अपनी चाची से लगी सुबकती रही.

इन का रोना सुन कर भैया भी बाहर निकल आए. उन के साथ उन के एक घनिष्ठ मित्र गोपाल बाबू भी थे और 2-3 दूसरे लोग भी. भैया मुझ से लिपट कर रोने लगे.

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‘‘चली गई, बहुत इलाज कराया पर बचा न सका, कैंसर ने नहीं छोड़ा उसे.’’

मैं उन की पीठ सहलाता रहा.

थोड़ा सामान्य हुए तो बोले, ‘‘तन्मय (उन का बड़ा बेटा) को फोन कर दिया है. फोन उसी ने उठाया था पर मां की मृत्यु का समाचार सुन कर दुखी हुआ हो ऐसा नहीं लगा. कुछ भी तो न बोला, केवल ‘ओह’ कह कर चुप हो गया. एकदम निर्वाक्.

‘‘मैं ने ही फिर कहा, ‘तन्मय, तू सुन रहा है न बेटा.’

‘‘ ‘जी.’ फिर मौन.

‘‘कुछ देर उस के बोलने की प्रतीक्षा कर के मैं ने फोन रख दिया. पता नहीं आएगा या नहीं,’’ कह कर भैया शून्य में ताकने लगे.

बेटी वसुधा बोल उठी, ‘‘आएंगे… आएंगे…आखिर मां मरी है भैया की. मां…सगी मां, मां की मृत्यु पर भी नहीं आएंगे.’’

वह बोल तो गई पर स्वर की अनुगूंज उसे खोखली ही लगी, वह उदासी से भर गई.

इतने में चाय आ गई. सब चाय पीने लगे.

भैया के मित्र गोपाल बाबू बोल उठे, ‘‘कैंसर की एक से एक अच्छी दवाएं ईजाद हो गई हैं. तमाम डाक्टर दावा करते हैं कि अब कैंसर लाइलाज नहीं रहा…पर बचता तो शायद ही कोई मरीज है.’’

भैया बोल उठे, ‘‘आखिरी 15 दिनों में तो उस ने बहुत कष्ट भोगा. बहुत कठिनाई से प्राण निकले. वह तन्मय से बहुत प्यार करती थी उस की प्रतीक्षा में आंखें दरवाजे की ओर ही टिकाए रखती थी. ‘तन्मय को पता है न मेरी बीमारी के बारे में,’ बारबार यही पूछती रहती थी. मैं कहता था, ‘हां है, मैं जबतब फोन कर के उसे बतलाता रहता हूं.’ ‘तब भी वह मुझे देखने…मेरा दुख बांटने क्यों नहीं आता? बोलिए.’ मैं क्या कहता. पूरे 5 साल बीमार रही वह पर तन्मय एक बार भी देखने नहीं आया. देखने आना तो दूर कभी फोन पर भी मां का हाल न पूछा, मां से कोई बात ही न की, ऐसी निरासक्ति.’’

कहतेकहते भैया सिसक पड़े.

‘भैया, ठीक यही तो आप ने किया था अपनी मां के साथ. वह भी रोग शैया पर लेटी दरवाजे पर टकटकी लगाए आप के आने की राह देखा करती थीं, पर आप न आए. न फोन से ही कभी उन का हाल पूछा. वह भी आप को, अपने बड़े बेटे को बहुत प्यार करती थीं. आप को देखने की चाह मन में लिए ही मां चली गईं, बेचारी, आप भी तो निरासक्त बन गए थे,’ मैं मन ही मन बुदबुदा उठा.

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भैया का दूसरा बेटा कनाडा में साइंटिस्ट है. उस का नाम चिन्मय है.

मैं ने पूछा, ‘‘चिन्मय को सूचना दे दी?’’

‘‘हां… उसे भी फोन कर दिया है,’’ भैया बोले, ‘‘जानते हो क्या बोला?

‘‘ ‘ओह, वैरी सैड…मौम चली गईं, खैर, बीमार तो थीं ही, उम्र भी हो चली थी. एक दिन जाना तो था ही, कुछ बाद में चली जातीं तो आप को थोड़ा और साथ मिल जाता उन का. पर अभी चली गईं. डैड, एक दिन जाना तो सब को ही है. धैर्य रखिए, हिम्मत रखिए. आप तो पढ़ेलिखे हैं, बहुत बड़े डाक्टर हैं. मृत्यु से जबतब दोचार होते ही रहते हैं. टेक इट ईजी.’

‘‘मैं सिसक पड़ा तो बोला, ‘ओह नो, रोइए मत, डैड.’

‘‘मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘जल्दी आ जाओ बेटा.’

‘‘ ‘ओह नो, डैड. मेरे लिए यह संभव नहीं है. मैं आ तो नहीं सकूंगा, जाने वाली तो चली गईं. मेरे आने से जीवित तो हो नहीं जाएंगी.’

‘‘ ‘कम से कम आ कर अंतिम बार मां का चेहरा तो देख लो.’

‘‘ ‘यह एक मूर्खता भरी भावुकता है. मैं मन की आंखों से उन की डेड बाडी देख रहा हूं. आनेजाने में मेरा बहुत पैसा व्यर्थ में खर्च हो जाएगा. अंतिम संस्कार के लिए आप लोग तो हैं ही, कहें तो कुछ रुपए भेज दूं. हालांकि उस की कोई कमी तो आप को होगी नहीं, यू आर अरनिंग ए वैरी हैंडसम अमाउंट.’

‘‘यह कह कर वह धीरे से हंसा.

‘‘मैं ने फोन रख दिया.’’

भैया फिर रोने लगे. बोले, ‘‘चिन्मय जब छोटा था हर समय मां से चिपका रहता था. पहली बार जब स्कूल जाने को हुआ तो खूब रोया. बोला, ‘मैं मां को छोड़ कर स्कूल नहीं जाऊंगा, मां तुम भी चलो?’ कितना पुचकार कर, दुलार कर स्कूल भेजा था उसे. जब बड़ा हुआ, पढ़ने के लिए विदेश जाने लगा तो भी यह कह कर रोया था कि मां, मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा. अब बाहर गया है तो बाहर का ही हो कर रह गया. मां के साथ सदा चिपके  रहने वाले ने एकदम ही मां का साथ छोड़ दिया. मां को एकदम से मन से बाहर कर दिया. मां गुजर गई तो अंतिम संस्कार में भी आने को तैयार नहीं. वाह रे, लड़के.’’

‘ऐसे ही लड़के तो आप भी हैं,’ मैं फिर बुदबुदा उठा.

धीरेधीरे समय सरकता गया. इंतजार हो रहा था कि शायद तन्मय आ जाए. वह आ जाए तो शवयात्रा शुरू की जाए, पर वह न आया.

जब 1 बज गया तो गोपाल बाबू बोल उठे, ‘‘भाई सुकांत, अब बेटे की व्यर्थ प्रतीक्षा छोड़ो और घाट चलने की तैयारी करो. उस को आना होता तो अब तक आ चुका होता. जब श्रीकांत 10 बजे तक आ गए तो वह भी 10-11 तक आ सकता था. लखनऊ यहां से है ही कितनी दूर. फिर उस के पास तो कार है. उस से तो और भी जल्दी आया जा सकता है.’’

प्रतीक्षा छोड़ कर शवयात्रा की तैयारी शुरू कर दी गई और 2 बजे के लगभग शवयात्रा शुरू हो गई. शवदाह से जुड़ी क्रियाएं निबटा कर लौटतेलौटते शाम के 6 बज गए.

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तब तक कुछ अन्य रिश्तेदार भी आ चुके थे. सब यही कह रहे थे कि तन्मय क्यों नहीं आया? चिन्मय तो खैर विदेश में है, उस का न आना क्षम्य है, लेकिन तन्मय तो लखनऊ में ही है, उस को तो आना ही चाहिए था, उस की मां मरी है. उस की जन्मदात्री, कितनी गलत बात है.

किसी तरह रात कटी, भोर होते ही सब उठ बैठे.

भैया मेरे पास आ कर बैठे तो बहुत दुखी, उदास, टूटेटूटे और निराश लग रहे थे. वह बोले, ‘‘एकदो दिन में सब चले जाएंगे. फिर मैं रह जाऊंगा और मकान में फैला मरघट सा सन्नाटा. प्रेम से बसाया नीड़ उजड़ गया. सब फुर्र हो गए. अब कैसे कटेगी मेरी तनहा जिंदगी…’’ और इतना कहतेकहते वह फफक पड़े.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

वो जलता है मुझ से: भाग 1

‘‘सुपीरियरिटी कांप्लेक्स जैसी कोई भी भावना नहीं होती. वास्तव में जो इनसान इनफीरियरिटी कांप्लेक्स से पीडि़त है उसी को सुपीरियरिटी कांप्लेक्स भी होता है. अंदर से वह हीनभावना को ही दबा रहा होता है और यही दिखाने के लिए कि उसे हीनभावना तंग नहीं कर रही, वह सब के सामने बड़ा होने का नाटक करता है.

‘‘उच्च और हीन ये दोनों मनोगं्रथियां अलगअलग हैं. उच्च मनोग्रंथि वाला इनसान इसी खुशफहमी में जीता है कि सारी दुनिया उसी की जूती के नीचे है. वही सब से श्रेष्ठ है, वही देता है तो सामने वाले का पेट भरता है. वह सोचता है कि यह आकाश उसी के सिर का सहारा ले कर टिका है और वह सहारा छीन ले तो शायद धरती ही रसातल में चली जाए. किसी को अपने बराबर खड़ा देख उसे आग लग जाती है. इसे कहते हैं उच्च मनोगं्रथि यानी सुपीरियरिटी कांप्लेक्स.

‘‘इस में भला हीन मनोगं्रथि कहां है. जैसे 2 शब्द हैं न, खुशफहमी और गलतफहमी. दोनों का मतलब एक हो कर भी एक नहीं है. खुशफहमी का अर्थ होता है बेकार ही किसी भावना में खुश रहना, मिथ्या भ्रम पालना और उसी को सच मान कर उसी में मगन रहना जबकि गलतफहमी में इनसान खुश भी रह सकता है और दुखी भी.’’

‘‘तुम्हारी बातें बड़ी विचित्र होती हैं जो मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती हैं. सच पूछो तो आज तक मैं समझ ही नहीं पाया कि तुम कहना क्या चाहते हो.’’

‘‘कुछ भी खास नहीं. तुम अपने मित्र के बारे में बता रहे थे न. 20 साल पहले तुम पड़ोसी थे. साथसाथ कालिज जाते थे सो अच्छा प्यार था तुम दोनों में. पढ़ाई के बाद तुम पिता के साथ उन के व्यवसाय से जुड़ गए और अच्छेखासे अमीर आदमी बन गए. पिता की जमा पूंजी से जमीन खरीदी और बैंक से खूब सारा लोन ले कर यह आलीशान कोठी बना ली.

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‘‘उधर 20 साल में तुम्हारे मित्र ने अपनी नौकरी में ही अच्छी इज्जत पा ली, उच्च पद तक पहुंच गया और संयोग से इसी शहर में स्थानांतरित हो कर आ गया. अपने आफिस के ही दिए गए छोटे से घर में रहता है. तुम से बहुत प्यार भी करता है और इन 20 सालों में वह जब भी इस शहर में आता रहा तुम से मिलता रहा. तुम्हारे हर सुखदुख में उस ने तुम से संपर्क रखा. हां, यह अलग बात है कि तुम कभी ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि आज की ही तरह तुम सदा व्यस्त रहे. अब जब वह इस शहर में पुन: आ गया है, तुम से मिलनेजुलने लगा है तो सहसा तुम्हें लगने लगा है कि उस का स्तर तुम्हारे स्तर से नीचा है, वह तुम्हारे बराबर नहीं है.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है.’’

‘‘ऐसा ही है. अगर ऐसा न होता तो उस के बारबार बुलाने पर भी क्या तुम उस के घर नहीं जाते? ऐसा तो नहीं कि तुम कहीं आतेजाते ही नहीं हो. 4-5 तो किटी पार्टीज हैं जिन में तुम जाते हो. लेकिन वह जब भी बुलाता है तुम काम का बहाना बना देते हो.

‘‘साल भर हो गया है उसे इस शहर में आए. क्या एक दिन भी तुम उस के घर पर पहले जितनी तड़प और ललक लिए गए हो जितनी तड़प और ललक लिए वह तुम्हारे घर आता रहता था और अभी तक आता रहा? तुम्हारा मन किया दोस्तों से मिलने का तो तुम ने एक पार्टी का आयोजन कर लिया. सब को बुला लिया, उसे भी बुला लिया. वह भी हर बार आता रहा. जबजब तुम ने चाहा और जिस दिन उस ने कहा आओ, थोड़ी देर बैठ कर पुरानी यादें ताजा करें तो तुम ने बड़ी ठसक से मना कर दिया. धीरेधीरे उस ने तुम से पल्ला झाड़ लिया. तुम्हारी समस्या जब यह है कि तुम ने अपने बेटे के जन्मदिन पर उसे बुलाया और पहली बार उस ने कह दिया कि बच्चों के जन्मदिन पर भला उस का क्या काम?’’

‘‘मुझे बहुत तकलीफ हो रही है राघव…वह मेरा बड़ा प्यारा मित्र था और उसी ने साफसाफ इनकार कर दिया. वह तो ऐसा नहीं था.’’

‘‘तो क्या अब तुम वही रह गए हो? तुम भी तो यही सोच रहे हो न कि वह तुम्हारी सुखसुविधा से जलता है तभी तुम्हारे घर पर आने से कतरा गया. सच तो यह है कि तुम उसे अपने घर अपनी अमीरी दिखाने को बुलाते रहे हो, अचेतन में तुम्हारा अहम संतुष्ट होता है उसे अपने घर पर बुला कर. तुम उस के सामने यह प्रमाणित करना चाहते हो कि देखो, आज तुम कहां हो और मैं कहां हूं जबकि हम दोनों साथसाथ चले थे.’’

‘‘नहीं तो…ऐसा तो नहीं सोचता मैं.’’

‘‘कम से कम मेरे सामने तो सच बोलो. मैं तुम्हारे इस दोस्त से तुम्हारे ही घर पर मिल चुका हूं. जब वह पहली बार तुम से मिलने आया था. तुम ने घूमघूम कर अपना महल उसे दिखाया था और उस के चेहरे पर भी तुम्हारा घर देखते हुए बड़ा संतोष झलक रहा था और तुम कहते हो वह जलता है तुम्हारा वैभव देख कर. तुम्हारे चेहरे पर भी तब कोई ऐसा ही दंभ था…मैं बराबर देख रहा था. उस ने कहा था, ‘भई वाह, मेरा घर तो बहुत सुंदर और आलीशान है. दिल चाह रहा है यहीं क्यों न आ जाऊं…क्या जरूरत है आफिस के घर में रहने की.’

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‘‘तब उस ने यह सब जलन में नहीं कहा था, अपना घर कहा था तुम्हारे घर को. तुम्हारे बच्चों के जन्मदिन पर भागा चला आता था और आज उसी ने मना कर दिया. उस ने भी पल्ला खींचना शुरू कर दिया, आखिर क्यों. हीन ग्रंथि क्या उस में है? अरे, तुम व्यस्त रहते हो इसलिए उस के घर तक नहीं जाते और वह क्या बेकार है जो अपने आफिस में से समय निकाल कर भी चला आता है. प्यार करता था तभी तो आता था. क्या एक कप चाय और समोसा खाने चला आता था?

‘‘जिस नौकरी में तुम्हारा वह दोस्त है न वहां लाखों कमा कर तुम से भी बड़ा महल बना सकता था लेकिन वह ईमानदार है तभी अभी तक अपना घर नहीं बना पाया. तुम्हारी अमीरी उस के लिए कोई माने नहीं रखती, क्योंकि उस ने कभी धनसंपदा को रिश्तों से अधिक महत्त्व नहीं दिया. दोस्ती और प्यार का मारा आता था. तुम्हारा व्यवहार उसे चुभ गया होगा इसलिए उस ने भी हाथ खींच लिया.’’

‘‘तुम्हें क्या लगता है…मुझ में उच्च गं्रथि का विकास होने लगा है या हीन ग्रंथि हावी हो रही है?’’

‘‘दोनों हैं. एक तरफ तुम सोचने लगे हो कि तुम इतने अमीर हो गए हो कि किसी को भी खड़ेखडे़ खरीद सकते हो. तुम उंगली भर हिला दोगे तो कोई भी भागा चला आएगा. यह मित्र भी आता रहा, तो तुम और ज्यादा इतराने लगे. दोस्तों के सामने इस सत्य का दंभ भी भरने लगे कि फलां कुरसी पर जो अधिकारी बैठा है न, वह हमारा लंगोटिया यार है.

‘‘दूसरी तरफ तुम में यह ग्रंथि भी काम करने लगी है कि साथसाथ चले थे पर वह मेज के उस पार चला गया, कहां का कहां पहुंच गया और तुम सिर्फ 4 से 8 और 8 से 16 ही बनाते रह गए. अफसोस होता है तुम्हें और अपनी हार से मुक्ति पाने का सरल उपाय था तुम्हारे पास उसे बुला कर अपना प्रभाव डालना. अपने को छोटा महसूस करते हो उस के सामने तुम. यानी हीन ग्रंथि.

‘‘सत्य तो यह है कि तुम उसे कम वैभव में भी खुश देख कर जलते हो. वह तुम जितना अमीर नहीं फिर भी संतोष हर पल उस के चेहरे पर झलकता है…इसी बात पर तुम्हें तकलीफ होती है. तुम चाहते हो वह दुम हिलाता तुम्हारे घर आए…तुम उस पर अपना मनचाहा प्रभाव जमा कर अपना अहम संतुष्ट करो. तुम्हें क्या लगता है कि वह कुछ समझ नहीं पाता होगा? जिस कुरसी पर वह बैठा है तुम जैसे हजारों से वह निबटता होगा हर रोज. नजर पहचानना और बदल गया व्यवहार भांप लेना क्या उसे नहीं आता होगा. क्या उसे पता नहीं चलता होगा कि अब तुम वह नहीं रहे जो पहले थे. प्रेम और स्नेह का पात्र अब रीत गया है, क्या उस की समझ में नहीं आता होगा?

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‘‘तुम कहते हो एक दिन उस ने तुम्हारी गाड़ी में बैठने से मना कर दिया. उस का घर तुम्हारे घर से ज्यादा दूर नहीं है इसलिए वह पैदल ही सैर करते हुए वापस जाना चाहता था. तुम्हें यह भी बुरा लग गया. क्यों भई? क्या वह तुम्हारी इच्छा का गुलाम है? क्या सैर करता हुआ वापस नहीं जा सकता था. उस की जराजरा सी बात को तुम अपनी ही मरजी से घुमा रहे हो और दुखी हो रहे हो. क्या सदा दुखी ही रहने के बहाने ढूंढ़ते रहते हो?’’ आंखें भर आईं विजय की.

‘‘प्यार करते हो अपने दोस्त से तो उस के स्वाभिमान की भी इज्जत करो. बचपन था तब क्या आपस में मिट्टी और लकड़ी के खिलौने बांटते नहीं थे. बारिश में तुम रुके पानी में धमाचौकड़ी मचाना चाहते थे और वह तुम्हें समझाता था कि पानी की रुकावट खोल दो नहीं तो सारा पानी कमरों में भर जाएगा.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

लौकडाउन स्पेशल : पेट की चर्बी करनी हो दूर, तो करें ये काम

मोटापा एक ऐसी समस्या है जिसे लेकर सभी परेशान है. डाइट पर कंट्रोर ना होना, बीजी रूटीन, और आस पास का वातावरण इसकी असल वजह है. हमारे शरीर में पेट की चर्बी घटाता सबसे मुश्किल होता है. बेली फैट बहुत जिद्दी होता है और इसे कम करने में काफी वक्त लगता है. इसे आंत के फैट के रूप में भी जाना जाता है, जो पेट, आंत, लिवर जैसे कुछ महत्वपूर्ण अंगों के पास मौजूद होता है. आपकी बौडी के फैट का करीब 10 फीसदी हिस्सा वास्तव में आंतों का फैट होता है. यह फैट विश्लेषकों या एमआरआई स्कैन जरीए मांपा जाता है और इसका इवोल्यूशन 1 से 59 के पैमाने पर किया जाता है. इंसुलिन प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने से लेकर ब्लड प्रेशर में वृद्धि और कोलोरेक्टल कैंसर के कारण पेट की चर्बी आपके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचा सकती है, अगर हम कहे की नींद लेना आपकी चर्बी कम कर सकता है तो क्या आम मानेंगे?

क्यों बढ़ती है पेट की चर्बी

पेट की बढ़ने के पीछे कई कारण हैं, जिसमें बहुत अधिक शुगर वाले खाद्य पदार्थ, ट्रांस फैट और शराब का सेवन शामिल हैं. इनका सेवन आपके पेट की चर्बी को बढ़ाता है. इतनी ही नहीं खराब जीवनशैली, कम प्रोटीन वाले आहार और रजोनिवृत्ति (Menopause) भी शामिल है.

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बेली फैट घटाने के तरीके…

नींद लें और स्वस्थ रहें

नींद हमारे संपूर्ण विकास के लिए बेहद जरूरी है. व्यक्ति को दिन में कम से कम सात घंटे की नींद बेहद जरूरी होती है. पर्याप्त नींद नहीं लेने से नींद में सांस लेने की समस्या जैसी स्वास्थ्य दिक्कत होने लगती है, जिसके कारण आपके पेट के आस-पास चर्बी जमा होने लगती है. इसलिए नींद लेना बेहद जरुरी है.

शराब से दूर रहकर करें चर्बी दूर

एक रिसर्च के मुताबिक ज्यादा शराब पीने से आपकी कमर के आस-पास चर्बी में बेतहाशा वृद्धि होती है. इसका मतलब है कि अगर आपको अपना बेली फैट घटाना है तो शराब में कटौती कर आप अपने बेली फैट को कम कर सकते हैं.

टेंशन से रहे दूर

टेंशन किसी भी समस्या का हल नहीं होता पर टेंशन आपको जरुर बहुत सारी बिमारियां दे देता है. लेकिन आप जीवनशैली में कुछ बदलाव कर इसे काफी हद तक कम जरूर कर सकते हैं. ऐसा करने से आप न केवल शांत रहेंगे बल्कि दिन में मिलने वाला तनाव से भी दूर रहेंगे.

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शुगर से रहें दूर

शुगर फ्रुक्टोज से भरपूर होती है, जो पेट की चर्बी में वृद्धि के साथ जुड़ी हई है. आप सोच रहे होंगे कि रिफाइनड शुगर खाने से यह समस्या हो सकती है, लेकिन आप गलत हैं. वास्तव में, अधिक मात्रा में हेल्दी शुगर लेने से पेट की चर्बी बढ़ सकती है.

एक बार फिर छाया अंगूरी भाभी का जादू, सोशल मीडिया पर वायरल हुईं Shilpa की ये फोटोज

टेलिवीजन इंडस्ट्री के सबसे बड़े रिएलिटी शो बिग बौस सीजन 11 (Bigg Boss 11) की विनर और जानी मानी एक्ट्रेस शिल्पा शिंदे (Shilpa Shinde) एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई हैं. पौपुलर सीरियल भाभीजी घर पर हैं (Bhabhi Ji Ghar Par Hai) में शिल्पा शिंदे ने अंगूरी भाभी का किरदार निभाया था जो कि लोगों ने काफी पसंद किया था. सीरियल भाभीजी घर पर हैं में अंगूरी भाभी ने अपने भोलेपन से लाखों लोगों के दिल जीते थे तो वहीं उनके किरदार ने फैंस की काफी वाहवाई लूटी थी.

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि कोरोना वायरस (Corona Virus) जैसी बिमारी के चलते देश भर में लौकडाउन (Lockdown) चल रहा है जिसकी वजह से सभी सीरियल्स और फिल्मों की शूटिंग भी रुकी हुई है. ऐसे में टेलिवीजन पर सभी सीरियल्स के पुराने एपिसोड्स ही टेलीकास्ट किए जा रहे हैं. एंड टीवी (& TV) चैनल पर सीरियल भाभीजी घर पर हैं के भी पुराने एपिसोड्स दर्शकों के दिखाए जा रहे हैं जिससे कि शिल्पा शिंदे (Shilpa Shinde) अंगूरी भाभी के किरदार में एक बार फिर लोगों की वाहवाई बटोर रही हैं.

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हाल ही में शिल्पा शिंदे (Shilpa Shinde) का एक फोटोशूट भी सामने आया है जो कि सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. हालांकि शिल्पा का ये फोटोशूट पुराना ही है लेकिन इन फोटोज में शिल्पा काफी खूबसूरत दिख रही हैं और उनके फैंस भी उनकी काफी तारीफें कर रहे हैं. वैसे तो शिल्पा ने अपने फैंस के दिलों में अपनी इतनी जगह बना ही ली है कि उनके फैंस उनकी हर फोटो पर बेहद प्यार बरसाते हैं.

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लौकडाउन के समय फैंस को शिल्पा शिंदे को अंगूरी भाभी के रूप में एक बार फिर देखना काफी पसंद आ रहा है और तो और उनके फैंस उनकी फोटोज को वायरल करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे.

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केजरीवाल की नसीहत : बदलनी होगी जीने की आदत

उन्होंने कहा कि लौकडाउन बढ़ाना कोरोना का इलाज नहीं है, बस यह इस को फैलने से रोकता है. अगर सोचें कि किसी एरिया या राज्य में पूरी तरह से लौकडाउन कर दिया और वहां केस जीरो हो जाएंगे, मुश्किल है. ऐसा तो पूरी दुनिया में हो रहा है. अमेरिका, स्पेन, इटली और यूके भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं. इसे ले कर लोगों के अंदर एक डर बैठ गया है. जिस दिन मौत का डर निकल जाएगा, उस दिन लोगों के मन से कोरोना का डर भी खत्म हो जाएगा.

उन्होंने आगे कहा, “अगर हम दिल्ली को लौकडाउन कर के छोड़ दें तो केस खत्म नहीं होने वाले. लौकडाउन कोरोना को कम करता जरूर है, पर खत्म नहीं. इसलिए अर्थव्यवस्था को खोलने का समय आ गया है. इस के लिए दिल्ली तैयार है.”

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहते हैं कि अगर लौकडाउन के बाद भी पौजिटिव केस बढ़ते हैं तो हम लोगों को इस के लिए तैयार रहना होगा. केंद्र सरकार को चाहिए कि पूरी तैयारी के साथ धीरेधीरे राज्यों से लौकडाउन खोले. जो रेड जोन हैं, केवल उन इलाकों को बंद रखना चाहिए.

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दिल्ली ने कोरोना महामारी के दौरान बड़ी मुश्किल लड़ाई लड़ी. वे कहते हैं कि कोरोना से बचाव ही बेहतर इलाज है. पर हमें जीने की आदत बदलनी होगी. इस के लिए उन्होंने कुछ सुझाव दिए, जिन में 2 खास है.

पहला तो यह कि कोरोना को फैलने से रोकना है. इस के लिए हमें खूब टैस्टिंग करनी पड़ेगी. जो भी कोरोना का मरीज मिले, उसे ठीक कर के ही घर भेजो. वहीं दूसरा यह कि मौत पर कंट्रोल करना है. किसी भी हालत में मौत नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि कोरोना ने सिखा दिया है कि हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत रखो. इसलिए हमें भी अपने यहां मैडिकल रिसर्च को और मजबूत बनाना होगा.

ऐसा नहीं है कि चिंता की लकीरें सिर्फ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर ही दिख रही हैं, ऐसी चिंताओं से हर राज्य के मुख्यमंत्री जूझ रहे हैं.

एक ओर जहां पूरे देश की अर्थव्यवस्था चौपट है, वहीं आम लोगों के जीवन में भी उथलपुथल मची हुई है कि हमारा जीने का ढर्रा किस तरह का होगा. जिन लोगों की रोजीरोटी चली गई, उन्हें नए सिरे से पहल करनी होगी. गांवों की तरफ पलायन कर चुके अप्रवासी मजदूरों को वापस लाना होगा, तभी रोजगार का पहिया पुराने ढर्रे पर चल सकेगा.

अर्थव्यवस्था को ले कर सरकार का परेशान होना लाजिम है, वहीं कारोबार को पटरी पर लाना भी किसी चुनौती से कम नहीं.

कोरोना को ले कर लोगों को खुद ही जागरूक होना होगा, उन्हें अपने जीने का सलीका बदलना होगा. ऐसे माहौल में अब ढलना सीखना होगा ताकि कोरोना से बचा जा सके. वहीं दिमागी तौर पर भी तनाव से बचने के तरीकों पर ध्यान देना होगा और धैर्य व सावधानी से काम लेना होगा.

ऐसे बदलें जीने का सलीका

लौकडाउन में आप सब घर में रहें, सुरक्षित रहें. लौकडाउन खुल भी जाए तो आपाधापी न मचाएं. जोश में आ कर होश न खोएं. अब पुराने दिन इतनी जल्दी लौट कर नहीं आने वाले.

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वैसे भी यह नहीं सोचा था कि कोरोना हमारे जीवन जीने के तरीके को ही बदल देगा. हम हाथ नहीं मिलाएंगे. मास्क लगा कर बाहर जाएंगे. भीड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे. आपस में दूरी बना कर काम करेंगे.

अगर जीवन को बचाना है तो सरकार द्वारा बताए नियमों पर चलना होगा. सरकार केवल रास्ता बताएगी. अपने काम एहतियात बरत कर पूरे करने होंगे. अनावश्यक बाहर रहने से बचना होगा. आरोग्य सेतु एप डाउनलोड करें और इस्तेमाल भी करें. इस मोबाइल एप द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन करें.

जीवन में आए इस नए बदलाव को स्वीकार करना होगा. अपनेआप को महफूज रखेंगे, तभी ऐसी बीमारी से बच सकेंगे.

सब से पहले लोग अपनी इम्यूनिटी पावर बढाएं. इस से बीमारी जल्दी घेरेगी नहीं. इस के लिए घर की बनी चीजों को खाएं, फास्ट फूड या बाहर के लजीज खाने से बचें. वहीं मिर्चमसालों का ज्यादा सेवन न करें. तली हुई चीजें कम से कम लें. हाजमा दुरुस्त करने के लिए कसरत करें.

इस के साथ ही जब भी घर से निकलें, मास्क जरूर पहनें, हाथों में दस्ताने हों, बाजार या भीड़ वाली जगह पर जाने से बचें. बहुत जरूरी होने पर जब बाहर जाना ही पड़ जाए तो आपसी दूरी बना कर रखें.

ऑफिस में आपसी दूरी बनाए रखें, एकदूसरे का खाना कदापि शेयर न करें. फोन पर भी बात करने से पहले साफ कर लें, इस के बाद हाथ जरूर धोएं या सेनेटाइजर लगाएं.

ऑफिस या घर पर आए पार्सल या कोरियर से आई किसी भी चीज को तुरत इस्तेमाल न करें, उसे भी 10-12 दिनों के लिए क्वारन्टीन करें. इस के बाद इन चीजों को इस्तेमाल करें.

बाहर से जब भी आएं, तुरत घर में न घुसें. घर में घुसने से पहले हाथमुंह धोएं, उस के बाद तुरंत नहाने के बाद कपड़े बदलें.

बाजार से दूध व सब्जियों को घर में लाने के बाद पहले अच्छी तरह धोएं, फिर इस्तेमाल करें या फ्रिज वगैरह में रखें वगैरह.

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इसी तरह से अपने जीने की आदत बनानी होगी, तभी इस बीमारी से बचा जा सकता है.

तो आज से ही बदलें अपने जीने का नजरिया. बना लीजिए न अपनी ऐसी आदत…

क्रिकेट : बिना मैच खेले कैसे गंवाया भारत ने नंबर-1 का ताज

कोरोना वायरस महामारी की मार खेलों पर भी पड़ा है और चाहे क्रिकेट हो या फुटबौल, हौकी हो या बेसबौल या फिर कोई अन्य खेल, पूरी तरह बंद हैं. इस बीच खबर है कि आईसीसी क्रिकेट रैंकिंग के एक ताजा सर्वे में भारत बिना मैच खेले ही शीर्ष स्थान गंवा चुका है. यह ताज आस्ट्रेलिया ने भारत से छिन लिया है और वह शीर्ष स्थान पर पहुंच चुका है. भारत तीसरे स्थान पर खिसक गया है जबकि न्यूजीलैंड को दूसरा स्थान मिला है.

भारत 1 मई को आईसीसी टेस्ट क्रिकेट रैंकिंग में आस्ट्रेलिया से शीर्ष स्थान गंवा चुका है और अब तीसरे स्थान पर आ गया है. रैंकिंग में गिरावट इसलिए आई है क्योंकि 12 टेस्ट मैचों में भारत की जीत और 2016-2017 में सिर्फ 1 हार वार्षिक अद्यतन से समाप्त हो गई थी.

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नवीनतम अपडेट ने मई 2019 के बाद से खेले गए मैचों को 100% और पिछले 2 वर्षों के मैचों को 50% पर रेट किया है.

आईसीसी ने एक बयान जारी कर कहा,”भारत मोटे तौर पर सीढ़ी में गिरा क्योंकि 12 टेस्ट जीत और 2016-17 में सिर्फ 1 टेस्ट हार का रिकौर्ड हटा दिया गया था.”

कहां है विराट की टीम

कप्तान विराट कोहली की टीम उस अवधि के दौरान आस्ट्रेलिया और इंगलैंड के खिलाफ सभी 5 श्रृंखलाएं जीती थीं. दूसरी ओर आस्ट्रेलिया उसी अवधि में भारत के साथसाथ दक्षिण अफ्रीका से हार गया था.

नवीनतम अपडेट मई 2019 के बाद से खेले गए सभी मैचों को 100% और पिछले 2 सालों के 50% पर रेट करते हैं.

ऑस्ट्रेलिया न केवल टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंच गया, बल्कि पहली बार टी- 20 आईसीसी सूची में नंबर- 1 पर कब्जा कर लिया, जबकि इंगलैंड ने वार्षिक अद्यतन के बाद पुरुषों की वनडे रैंकिंग का नेतृत्व करना जारी रखा, जो 2016-17 के परिणामों को समाप्त करता है.

आस्ट्रेलिया के अब 116 अंक हैं और उस के बाद न्यूजीलैंड (115) और भारत (114) हैं.

केवल 2 अंकों के साथ उन्हें अलग करने के बाद यह शीर्ष 3 टीमों में से दूसरा निकटतम है, क्योंकि 2003 में टेस्ट रैंकिंग शुरू की गई थी.

दक्षिण अफ्रीका को 8 अंकों की सब से बड़ी रेटिंग में गिरावट का सामना करना पड़ा है, जो उन्हें श्रीलंका से छठे स्थान पर गिराता है.

उन्होंने इस अवधि में 3 सीरीज़ जीतीं, जबकि फरवरी 2019 के बाद श्रीलंका, भारत और इंगलैंड के खिलाफ खेलते हुए 9 में से 8 टेस्ट हारे.

वनडे टीम रैंकिंग में विश्व चैंपियन इंगलैंड (127) ने भारत पर अपनी बढ़त 6 से 8 अंक तक बढ़ा दी है.

भारत से 3 अंक पीछे न्यूजीलैंड तीसरे स्थान पर है. शीर्ष 10 रैंकिंग अपरिवर्तित बनी हुई हैं.

इस के विपरीत अद्यतन T20 टीम रैंकिंग में बहुत सारे बदलाव देखने को मिलते हैं. रैंकिंग पेश किए जाने के बाद पहली बार ऑस्ट्रेलिया (278) अंक के साथ शीर्ष पर है.

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पाकिस्तान जोकि जनवरी 2018 में शीर्ष स्थान पर पहुंचने के लिए न्यूजीलैंड से आगे निकल गया था और फिर वहां 27 महीने बिताए थे, अब 260 अंकों के साथ चौथे स्थान पर है.

इंगलैंड 268 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर आ गया है, जबकि भारत 1 तीसरे स्थान पर है यानी सिर्फ 2 अंक पीछे.

अफगानिस्तान 7वें से 10वें स्थान पर है.

यह भी जानिए

  • आस्ट्रेलिया ने टेस्ट रैंकिंग में एक शीर्ष स्थान हासिल किया और साथ ही पहली बार टी 20 सूची में नंबर 1 स्थान हासिल किया.
  • इंगलैंड ने वार्षिक अद्यतन के बाद पुरुषों की एकदिवसीय रैंकिंग में अपनी बढ़त जारी रखी जो 2016-2017 के परिणामों को समाप्त कर दिया.
  • टेस्ट रैंकिंग में आस्ट्रेलिया 116 अंकों के साथ न्यूजीलैंड 115 अंकों के साथ भारत और 114 अंकों के साथ शीर्ष पर है.
  • केवल 2 अंकों के अंतर के साथ यह दूसरा निकटतम है कि शीर्ष टीमों को 2003 में टेस्ट रैंकिंग जारी की गई थी.
  • शीर्ष 3 टीमें जनवरी 2016 में निकटतम थीं जब भारत आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका से 1 अंक से आगे चल रहा था
  • टेस्ट रैंकिंग में दक्षिण अफ्रीका को 8 अंकों की सब से बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा है और श्रीलंका के नीचे 6ठे स्थान पर छोड़ने का नेतृत्व किया.
  • दक्षिण अफ्रीका ने चयनित अवधि में 3 सीरीज़ जीती हैं और फरवरी 2019 के बाद से भारत, श्रीलंका और इंगलैंड के खिलाफ खेलते हुए 9 में से 8 टेस्ट हारे हैं.

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वनडे टीम रैंकिंग

  • वनडे टीम रैंकिंग में शीर्ष 10 रैंकिंग अपरिवर्तित रहे.
  • इंगलैंड ने वनडे टीम रैंकिंग में भारत पर अपनी बढ़त 6 से 8 अंक तक बढ़ा दी है.
  • न्यूजीलैंड अभी भी तीसरे स्थान पर है और भारत से 3 अंक पीछे है.

T20 टीम रैंकिंग

  • 278 अंक के साथ आस्ट्रेलिया पहली बार सूची में शीर्ष पर है.
  • पाकिस्तान जो जनवरी 2018 में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया था और न्यूजीलैंड से आगे निकल गया था, अब 260 अंकों के साथ चौथे स्थान पर आ गया है.
  • 268 अंकों के साथ इंगलैंड दूसरे स्थान पर आ गया है जबकि भारत 1 स्थान ऊपर तीसरे स्थान पर है, जो सिर्फ 2 अंक पीछे है.
  • अफगानिस्तान 7 वीं से 10वीं रैंकिंग में गिर गया है.

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