11 साल बाद: भाग 1

पंजाब में काले दौर के समय बहुत बड़ी तादाद में लोग अपनी जानमाल की सुरक्षा के लिए पंजाब से पलायन कर के देश के अन्य शहरों में जा कर बस गए थे, जिन में अधिकांश व्यापारी तबके के लोग शामिल थे.

सरदार मंजीत सिंह बग्गा, जिन का कपड़े का बहुत बड़ा कारोबार था, वह भी अपना कारोबार समेट कर पंजाब छोड़ बीवीबच्चों सहित उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली जा बसे थे. रायबरेली के गुरुनानक नगर में वह कोठी नंबर-13 ले कर रहने लगे और वहीं अपना कपड़े का काम शुरू कर दिया.

उन के अधिकांश ग्राहक यूपी, बिहार और महाराष्ट्र के थे, इसलिए उन के ग्राहकों को पंजाब की जगह रायबरेली आने से काफी सहूलियत हो गई थी. देखतेदेखते मंजीत सिंह बग्गा का व्यवसाय रायबरेली में पंजाब से भी अच्छा चल निकला था.

मंजीत सिंह के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे जगजीत सिंह बग्गा उर्फ सोनू और सुरजीत बग्गा थे. दोनों बेटे पढ़ाई पूरी करने के बाद पिता के कपड़े के कारोबार में शामिल हो गए थे. उन्होंने रेडीमेड गारमेंट के लिए फैक्ट्री भी लगा ली थी, जिस की देखभाल जगजीत सिंह किया करता था.

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कारोबार और परिवार जब दोनों पूरी तरह से सैटल हो गए तो मंजीत सिंह ने 14 अक्तूबर, 2001 को बड़े बेटे जगजीत सिंह की शादी साहिबगंज, फैजाबाद निवासी जसवंत सिंह की बेटी रविंदर कौर के साथ कर दी थी.

शादी के बाद कुछ सालों तक पतिपत्नी दोनों खूब खुश थे. जगजीत आम लोगों की तरह घर में बैठ कर 2-4 पैग शराब जरूर पीता था. पर शराब को ले कर उन का आपस में कभी झगड़ा नहीं हुआ था. उन के घर 2 बेटों ने जन्म लिया, जिन के नाम हरप्रीत सिंह और हरमीत सिंह रखे गए थे.

बेटों के जन्म के बाद अपने काम की व्यस्तता के कारण या किन्हीं अन्य वजह से पतिपत्नी एकदूसरे को समय नहीं दे पा रहे थे, जिस से दोनों के बीच झगड़ा रहने लगा.

शुरू में तो यह बात मामूली कहासुनी से शुरू हुई थी, जैसा कि हर घर में होता है पर कुछ ही महीनों में जगजीत सिंह और रविंदर कौर के बीच का तनाव इतना बढ़ गया कि दोनों ने एकदूसरे से बात तक करनी बंद कर दी थी.

जगजीत सिंह के पिता मंजीत सिंह ने और रविंदर कौर के पिता जसवंत सिंह ने भी दोनों को काफी समझाया पर उन के बीच का क्लेश कम होने के बजाए बढ़ता ही गया.

रोजरोज के क्लेश से दुखी हो कर अंत में मंजीत सिंह ने अपने बेटे जगजीत सिंह और बहू रविंदर कौर को घर से अलग कर दिया. इस के बाद जगजीत किराए का मकान ले कर बीवीबच्चों के साथ रहने लगा. वह पिता की फैक्ट्री में काम करता था.

जगजीत के घर का सारा खर्च उस का पिता मंजीत सिंह देता था. पतिपत्नी के बीच बातचीत अब भी बंद थी. बाद में दोनों के बीच झगड़ा इतना बढ़ा कि रविंदर कौर अपने दोनों बच्चों को ले कर मायके फैजाबाद चली गई. यह सन 2009 की बात है. बाद में जगजीत भी फैजाबाद जा कर पत्नी के साथ किराए के मकान में रहने लगा.

रविंदर कौर के अलग हो जाने पर मंजीत सिंह ने बच्चों की परवरिश के लिए खर्चा देना बंद कर दिया. तब रविंदर कौर ने न्यायालय की शरण ली और साल 2009 में जिला अयोध्या की फैमिली कोर्ट में पति जगजीत सिंह बग्गा और उस के परिवार पर खर्चे का मुकदमा दायर कर दिया.

कोर्ट ने रविंदर कौर की याचिका मंजूर कर उस पर सुनवाई शुरू कर दी. रविंदर कौर ने अपनी याचिका में लिखा था कि मेरे परिवार को मेरे ससुर मंजीत सिंह ने खर्चा देना बंद कर दिया है. मेरे छोटेछोटे 2 बच्चे हैं और मैं किराए के घर में रहती हूं. इस हालत में मैं बच्चों को पालने में असमर्थ हूं.

यह मुकदमा अभी चल ही रहा था कि अचानक एक दिन रविंदर कौर की जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया, जिस ने उस के साथ मातापिता के परिवार को भी बिखेर कर रख दिया. सुबह अपनी फैक्ट्री गया जगजीत शाम को जब वापस घर नहीं लौटा तो सब का चिंतित होना स्वाभाविक था.

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देर रात तक इंतजार करने के बाद रविंदर कौर ने यह बात फोन द्वारा अपने ससुर मंजीत सिंह को बताई. रविंदर और उस के बच्चों को तो उस की चिंता थी ही, पर सब से अधिक चिंतित उस के मातापिता थे. मंजीत सिंह अपने बेटे जगजीत से बहुत प्यार करते थे. बहरहाल जगजीत के यारदोस्तों के अलावा उन सभी ठिकानों पर उस की तलाश की गई, जहां उस के होने की संभावना थी. रिश्तेदारियों में भी पता किया गया.

जब हर जगह से जगजीत के न होने की खबर मिली तो मंजीत सिंह बग्गा ने थाना कोतवाली रायबरेली में अपने बेटे जगजीत के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. मामला एक ऐसे धनाढ्य परिवार से जुड़ा हुआ था, जिन की शहर में काफी साख थी और ऊपर तक पहुंच भी. सो पुलिस ने जगजीत का फोटो ले कर प्रदेश के सभी थानों में भिजवा दिया. उस के बाद उस के मोबाइल फोन को चैक किया गया तो पता चला कि जगजीत का फोन घर पर ही बज रहा था.

पूछने पर रविंदर कौर ने बताया कि जगजीत उस दिन अपना फोन घर पर ही छोड़ कर गए थे. इस पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि एक सफल व्यापारी अपना फोन गलती से भी घर नहीं भूल सकता. पुलिस ने इस के 2 अर्थ लगाए कि या तो जगजीत अपनी मरजी से कहीं गायब हो गया है या फिर घर की चारदीवारी में कुछ और ही खिचड़ी पकी थी, जिस की सुगंध अभी तक बाहर नहीं आई थी.

पतिपत्नी में झगड़ा रहता था, पुलिस को इस बात का पता जांच के दौरान लग गया था. बहरहाल, पुलिस ने जगजीत का फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया. उच्चाधिकारियों के दबाव के कारण थाना कोतवाली पुलिस ने जगजीत की तलाश में दिनरात एक कर दिया था.

लगने लगे आरोप

मुखबिरों की भी मदद ली गई और रविंदर कौर से भी कई बार बारीकी से पूछताछ की गई थी, लेकिन जगजीत का कहीं कोई सुराग नहीं लगा था.

जगजीत की तलाश करने में पुलिस ने अब तक कई जांच एजेंसियों का सहारा लिया था, पर नतीजा शून्य निकला. अब पुलिस को भी संदेह होने लगा था कि जगजीत के साथ घर के भीतर ही कोई हादसा हुआ था. शायद उस की हत्या कर दी गई थी.

रविंदर कौर पर पुलिस के साथसाथ उस के ससुर मंजीत सिंह बग्गा का भी दबाव बढ़ने लगा था. जबकि रविंदर कौर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन हालात का सामना कैसे करे.

उस का दिल यह बात मानने को तैयार नहीं था कि जगजीत के साथ कोई हादसा हो सकता है. आखिर अपने ससुर और पुलिस की परवाह न करते हुए रविंदर कौर ने थाना कोतवाली पुलिस से ले कर डीएसपी, एसपी, आईजी, डीजी, डीएम और राज्य के मुख्यमंत्री तक को शिकायती पत्र लिखलिख कर गुहार लगाई कि न तो उस ने या उस के परिवार ने जगजीत का अपहरण किया है और न ही उस की हत्या हुई है.

अगर वह लापता है तो अपनी मरजी से कहीं गायब हो गया है. रविंदर कौर ने यह भी आरोप लगाया कि मेरे पति जगजीत सिंह को गायब करने में मेरे ससुर मंजीत सिंह का हाथ हो सकता है.

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जगजीत को लापता हुए जब 2 साल हो गए और न तो उस का कोई सुराग मिला और न ही उस के बारे में कहीं से कोई फोन आया तो मंजीत सिंह बग्गा ने अपनी बहू रविंदर कौर पर सीधे आरोप लगाया, ‘‘तुम ने ही अपने पिता जसवंत सिंह, भाई तनप्रीत सिंह और फूफा प्रोफेसर हर्षत सिंह के साथ मिल कर मेरे बेटे जगजीत का अपहरण करवा कर उस की हत्या करवाई और लाश कहीं खुर्दबुर्द कर दी है.’’

इतना ही नहीं मंजीत सिंह बग्गा ने 6 जून, 2012 को रायबरेली की अदालत में रविंदर कौर, उस के पिता जसवंत सिंह, भाई तनप्रीत सिंह और शादी करवाने वाले बिचौलिए प्रोफेसर हर्षत सिंह के खिलाफ जगजीत सिंह बग्गा के अपहरण और मर्डर का कंप्लेंट केस दायर कर दिया.

अदालत में केस दर्ज हो जाने के बाद चारों आरोपियों को अदालत में पेश हो कर अपनी जमानतें करवानी पड़ीं. अदालत में जब इस केस का ट्रायल शुरू हुआ तो रविंदर कौर ने अपने साथ अन्य आरोपियों को निर्दोष बताते हुए अदालत को बताया कि उस का पति जगजीत सिंह जिंदा है और लापता है, जिसे पुलिस ढूंढने में नाकाम रही है.

इस मामले की सीबीआई से जांच करवाई जाए ताकि सच सब के सामने आ सके. अदालत ने रविंदर कौर की यह दरख्वास्त खारिज कर मुकदमे की सुनवाई जारी रखी.

रविंदर कौर बारबार अपने पति जगजीत सिंह के जिंदा होने का दावा ऐसे ही नहीं कर रही थी. दरअसल 2 साल से उसे अलगअलग नंबरों से गुमनाम फोन आ रहे थे. फोनकर्ता अपना नाम बताए बिना केवल परिवार के सदस्यों का हालचाल जानना चाहता था. उस ने कभी अपना नाम नहीं बताया था पर रविंदर कौर उस आवाज को अच्छी तरह पहचानती थी. वह आवाज उस के पति जगजीत सिंह की थी.

रविंदर ने यह बात कोतवाली पुलिस और उच्च अधिकारियों को भी बताई थी. इतना ही नहीं, उस ने वह फोन नंबर भी पुलिस को दिए थे, जिन से उसे फोन आते थे. पुलिस ने उन नंबरों की जांच की तो मालूम पड़ा कि वह नंबर ट्रक ड्राइवरों के थे, जो अलगअलग राज्यों बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र आदि के रहने वाले थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि जगजीत सिंह नामक किसी व्यक्ति से उन का दूरदूर तक कोई वास्ता नहीं है.

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कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

बड़ी लकीर छोटी लकीर: भाग 1

ढोलककी थाप रहरह कर मेरे कानों में चुभ रही थी. कल ही तो खबर आई थी कि मैं ने शेयर बाजार में जो पैसा लगाया है वह सारा डूब गया. कहां तो मैं एक बड़ी लकीर खींच कर एक लकीर को छोटा करना चाहता था और कहां मेरी लकीर और छोटी हो गई.

तभी शिखा मुसकराती हुई आई और मेरे हाथ में गुलाबजामुन की प्लेट पकड़ा कर बोली, ‘‘खाओ और बताओ कैसे बने हैं?’’

मैं उसे और बोलने का मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए बेमन से खा कर बोला, ‘‘बहुत अच्छे.’’

मगर उसी दिन पता चला कि किसी भी व्यंजन का स्वाद उस के स्वाद पर नहीं उसे किस नीयत से खिलाया जाता है उस पर निर्भर करता है.

शिखा बोली, ‘‘अनिल जीजा और नीतू

दीदी की मुंबई के होटल की डील फाइनल हो

गई है. उन्होंने ही सब के लिए ये गुलाबजामुन मंगाए हैं.’’

सुनते ही मुंह का स्वाद कड़वा हो गया. यह लकीरों का खेल बहुत पहले से शुरू हो गया था, शायद मेरे विवाह के समय से ही. मेरा नाम सुमित है, शादी के वक्त में 24 वर्षीय नौजवान था, जिंदगी और प्यार से भरपूर. मेरी पत्नी शिखा बहुत प्यारी सी लड़की थी. उसे अपनी जिंदगी में पा कर मैं बहुत खुश था. सच तो यह था कि मुझे यकीन ही नहीं था कि इतनी सुंदर और सुलझी हुई लड़की मेरी पत्नी बनेगी. पर विवाह के कुछ माह बाद शुरू हो गया एक खेल. पता नहीं वह खेल मैं ही खेल रहा था या दूसरी तरफ से भी हिस्सेदारी थी.

मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब मैं पहली बार ससुराल गया था. मेरी बड़ी साली के पति हैं अनिल. चारों तरफ उन का ही बोलबाला था.

‘‘अनिल अभी भी एकदम फिट है. इतना युवा लगता है कि घोड़ी पर बैठा दो,’’ यह शिखा की मौसी बोल रही थीं.

पता नहीं हरकोई क्यों बस बहू के बारे में ही कहानियां लिखता है. एक दामाद के दिल में भी धुकधुक रहती है कि कैसे वह अपने सासससुर और परिवार को यकीन दिलाए कि वह उन की राजकुमारी को खुश रखेगा और मेरे लिए तो यह और भी मुश्किल था, क्योंकि मुझे तो एक लकीर की माप में और बड़ी लकीर खींचनी थी. मेरा एक काबिल पति और दामाद बनने का मानदंड ही यह था कि मुझे अनिल से आगे नहीं तो कम से कम बराबरी पर आना है.

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आप सोच रहे होंगे, कैसी पत्नी है मेरी या कैसी ससुराल है मेरी. नहीं दोस्तो कोई मुंह से कुछ नहीं बोलता पर आप को खुद ही यह महसूस होता है, जब आप हर समय बड़े दामाद यानी अनिल के यशगीत सुनते हो.

मैं पता नहीं क्यों इतनी कोशिशों के बाद भी वजन कम नहीं कर पा रहा था. उस दिन अनिल अपनी पत्नी के साथ हमारे घर आया था. मजाक करते हुए बोला, ‘‘सुमित, तुम थोड़ा कपड़ों पर ध्यान दो. यह वजन घटाना तुम्हारे बस की बात नहीं है.’’

उस की पत्नी नीतू भी मंदमंद मुसकरा रही थी और मेरी पत्नी शिखा को अपने हीरे के मोटेमोटे कड़े दिखा रही थी. मेरे अंदर उस रोज कहीं कुछ मर गया. शर्म आ रही थी मुझे. शिखा अपनी सब बहनों में सब से सुंदर और समझदार है पर मुझ से शादी कर के क्या सुख पाया. न मैं शक्ल में अच्छा हूं और न ही अक्ल में. फिर मैं ने लोन ले कर एक घर ले लिया. मेरी सास भी आईं पर जैसे मैं ने सोचा था उन्होंने वही किया.

शिखा के हाथों में उपहार देते हुए बोलीं, ‘‘सुमित, क्या अनिल से सलाह नहीं ले सकता था? कैसी सोसाइटी है और जगह भी कोई खास नहीं है.’’

शिखा के चेहरे पर वह उदासी देख कर अच्छा नहीं लगा. खुद को बहुत बौना महसूस कर रहा था. फिर शिखा की मम्मी पूरा दिन अनिल के बंगले का गुणगान करती रहीं. मुझे ऐसा लगा कि मैं तो शायद उस दौड़ में भाग लेने के भी काबिल नहीं हूं.

दिन बीतते गए और हफ्तों और महीनों में परिवर्तित होते गए. दोस्तो आप सोच रहे होंगे, गलती मेरी ही है, क्योंकि मैं इस तुलनात्मक खेल को खेल कर अपने और अपने परिवार को दुख दे रहा था. आप शायद सही बोल रहे होंगे पर तब कुछ समझ नहीं आ रहा था.

शिखा बहुत अच्छी पत्नी थी, कभी कुछ नहीं मांगती. मेरे परिवार के साथ घुलमिल कर रहती, पर उस का कोई भी शिकायत न करना मुझे अंदर ही अंदर तोड़ देता. ऐसा लगता मैं इस काबिल भी हूं…

आज मैं जब दफ्तर से आया तो शिखा बहुत खुश लग रही थी. आते ही उस ने मेरे हाथ में एक बच्चे की तसवीर पकड़ा दी. समझ आ गया, हम 2 से 3 होने वाले हैं. अनिल का फोन आया मेरे पास बधाई देने के लिए पर फोन रखते हुए मेरा मन कसैला हो उठा था. वह तमाम चीजें बता रहा था जो मेरी औकात के परे थीं. वह वास्तव में इतना भोला था या फिर हर बार मुझे नीचा दिखाता था, नहीं मालूम, मगर मैं जितनी भी अपनी लकीर को बड़ा करने की कोशिश करता वह उतनी ही छोटी रहती.

अनिल के पास शायद कोई पारस का पत्थर था. वह जो भी करता उस में सफल ही होता और मैं चाह कर भी सफल नहीं हो पा रहा था.

जैसेजैसे शिखा का प्रसवकाल नजदीक आ रहा था मेरी भी घबराहट बढ़ती जा रही थी. मेरी मां तो हमारे साथ रहती ही थीं पर मैं ने खुद ही पहल कर के शिखा की मां को भी बुला लिया. मुझे लगा शिखा बिना झिझक के अपनी मां को सबकुछ बता सकेगी पर मुझे नहीं पता था यह उस के और मेरे रिश्ते के लिए ठीक नहीं है.

शिखा अपनी मां के आने से बहुत खुश थी. 1 हफ्ते बाद की डाक्टर ने डेट दी थी. शिखा की मां उस के साथ ही सोती थीं. पता नहीं वे रातभर मेरी शिखा से क्या बोलती रहती थीं कि सुबह शिखा का चेहरा लटका रहता. मैं गुस्से और हीनभावना का शिकार होता गया.

मुझे आज भी याद है अन्वी के जन्म से 2 रोज पहले शिखा बोली, ‘‘सुमित, हम भी एक नौकर रख लेंगे न बच्चे के लिए.’’

मैं ने हंस कर कहा, ‘‘क्यों शिखा, हमारे घर में तो इतने सारे लोग हैं.’’

शिखा मासूमियत से बोली, ‘‘अनिल जीजाजी ने भी रखा था, करिश्मा के जन्म के बाद.’’

खुद को नियंत्रित करते हुए मैं ने कहा, ‘‘शिखा वे अकेले रहते हैं पर हमारा पूरा परिवार है. तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा.’’

मगर अनिल का जिक्र मुझे बुरी तरह खल गया. शिखा कुछ और बोलती उस से पहले ही मैं बुरी तरह चिल्ला पड़ा. उस की मां दौड़ी चली आईं. शिखा की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे. मैं उसे कैसे मनाता, क्योंकि उस की मां ने उसे पूरी तरह घेर लिया था. मुझे बस यह सुनाई पड़ रहा था, ‘‘हमारे अनिल ने आज तक नीतू से ऊंची आवाज में बात नहीं करी.’’

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मैं बिना कुछ खाएपीए दफ्तर चला गया. पूरा दिन मन शिखा में ही अटका रहा. घर आ कर जब तक उस के चेहरे पर मुसकान नहीं देखी तब तक चैन नहीं आया.

10 मई को शिखा और मेरे यहां एक प्यारी सी बेटी अन्वी हुई. शिखा का इमरजैंसी में औपरेशन हुआ था, इसलिए मैं चिंतित था पर शिखा की मां ने शिखा के आगे कुछ ऐसा बोला जैसे मुझे बेटी होने का दुख हुआ हो. कौन उन्हें समझाए अन्वी तो बाद में है, पहले तो शिखा ही मेरे लिए बहुत जरूरी है.

मैं हौस्पिटल में कमरे के बाहर ही बैठा था. तभी मेरे कानों में गरम सीसा डालती हुई एक आवाज आई, ‘‘हमारे अनिल ने तो करिश्मा के होने पर पूरे हौस्पिटल में मिठाई बांटी थी.’’

मैं खिड़की से साफ देख रहा था. शिखा के चेहरे पर एक ऐसी ही हीनभावना थी जो मुझे घेरे रहती थी. शिखा घर आ गई पर अब ऐसा लगने लगा था कि वह मेरी बीवी नहीं है, बस एक बेटी है. रातदिन अनिल का बखान और गुणगान, मेरे साथसाथ मेरे घर वाले भी पक गए और उन को भी लगने लगा शायद मैं नकारा ही हूं. घर के लोन की किस्तें और घर के खर्च, मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था. फिर मैं ने कुछ ऐसा किया जहां से शुरू हुई मेरे पतन की कहानी…

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

नहले पर दहला

लेखक- रामचरन हर्षाना

बड़े शहरों में ऐसा बहुत कम होता है कि कोई आसपास रह रहे लोगों पर अपनी निगाहें जमाए रखे और कोई क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, किस से मिल रहा है, यह सब एक खुफिया जासूस की तरह अपनी पैनी नजरों से देखता रहे.

21वीं सदी की ऐसी दौड़धूप से भरी जिंदगी में भला किसे ऐसा वक्त मिलता होगा? फिर ऐसी हरकत करने से कोई फायदा भी तो नहीं है. ख्वाहमख्वाह समय की बरबादी और दिमाग को परेशान करना. बड़े शहरों के बुद्धिमान लोग ऐसा कभी नहीं करेंगे, लेकिन वहां सभी बुद्धिमान ही रहते हों, ऐसा तो कभी नहीं होगा. वहां कुछ अक्ल के कच्चे और सनकी लोग आज भी मौजूद हैं.

इस कहानी का हीरो भी कुछ ऐसी ही सनक से भरा हुआ था. उस का बिहारी दास नाम था. फिर उसे काम भी अपनी पसंद का ही मिला था. उसे एक कुरियर कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई थी, जिस वजह से उसे इधरउधर भटकने का मौका मिलता था. यह काम वह बड़े जोश से करता था. फिर रोजाना 100-150 लिफाफे 2-3 घंटे में ही उन के पते पर पहुंचा कर वह अपना काम पूरा कर डालता था. इस के बाद सारा दिन उसे कुछ नहीं करना होता था.

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तब वह भला क्या करता? बारीबारी से एक पान की दुकान और ट्रैवल एजेंसी की दुकान पर बैठ कर अपना टाइमपास करता रहता था. उस का घर दसमंजिला बिल्डिंग के एक फ्लैट में तीसरी मंजिल पर था. उस बिल्डिंग में रह रहे सभी लोगों को वह करीबकरीब जानता था. हां, यह बात अलग थी कि सभी से वह गहरी पहचान नहीं बना पाया था.

उसी बिल्डिंग में एक अधेड़ उम्र के शख्स तिवारीजी रहते थे, जो किसी बैंक में काम करते थे और अकेले रहते थे. बिहारी दास ने अपनी कुछ घंटों की मुलाकात में यह जान लिया था कि उन की पत्नी की उन से बनती नहीं थी और दोनों अलग रह रहे थे.

वैसे तो वे अकेले ही रहते थे, मगर उन के घर पर एक खूबसूरत लड़की को बिहारी दास ने कई बार आतेजाते देखा था. फिर जब उन से पूछा गया कि वह कौन है, तब उन्होंने कुछ अनमने भाव से कह दिया था कि वह उन की भतीजी है.

मगर, बिहारी दास की पैनी नजर ने उन के झूठ को पहचान लिया था. बाद में तिवारीजी ने बिहारी दास से बात करना छोड़ दिया था, लेकिन बिहारी दास ने ठान लिया था कि वह तिवारीजी का भांड़ा जरूर फोड़ कर रहेगा.

जैसा कि बड़े शहरों में होना लाजिमी है, बिहारी दास की बिल्डिंग में हलकेफुलके गैरकानूनी काम भी होते थे, जिन के बारे में उसे सब पता था. 10वीं मंजिल पर एक मसाज पार्लर चल रहा था, जहां लड़केलड़कियों की भीड़ लगी रहती थी. वहां मसाज के बहाने कुछ और ही चल रहा था.

हालांकि कुछ महीने पहले बिहारी दास ने फोन कर के वहां पुलिस भी बुला ली थी, जिस ने अचानक छापा मार कर मसाज पार्लर के मालिक सज्जन सिंह के साथ पैसों का गुपचुप लेनदेन किया और वहां से चल दी थी.

सज्जन सिंह को कतई पता नहीं चला कि आखिर पुलिस को सूचना किस ने दी थी. बिहारी दास मन ही मन खुश हो रहा था.

जैसा कि बिहारी दास का स्वभाव था, वह हमेशा ध्यान रखता कि बिल्डिंग के फ्लैट में कौन आजा रहा है, कौन सा फ्लैट खाली हुआ और किस ने खरीदा या कौन नया किराएदार आया है या आई है और किराएदार क्या करते हैं. यह सब वह अपनेआप चालाकी से जान लेता था.

अपनी इस हरकत के चलते बिहारी दास अकसर घर से बाहर रहता था और किसी अमीर कारोबारी की तरह देरी से घर लौटता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका ने उस से एतराज भी जताया था, ‘‘आखिर क्या करते रहते हो सारा दिन? रात को जल्दी क्यों नहीं लौटते?’’

‘‘शहर में अगर टिकना हो तो हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है,’’ बिहारी दास फख्र से बताता था.

बिहारी दास की पत्नी राधिका खूबसूरत थी, मगर उसे शायद इस का एहसास न था. उस की नजर हमेशा बाहर आजा रही लड़कियों पर टिकी रहती. कई बार तो सड़क के किनारे चलतेचलते अपने मोबाइल फोन पर बात कर रही किसी लड़की की बातों को वह पास से गुजरते हुए सुनने की कोशिश करता. वह प्यार से बात कर रही है या नाराज हो कर, यह पकड़ने की कोशिश करता.

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कई बार तो बिहारी दास लड़की से कुछ ही दूरी पर खड़ा रह जाता और जब तक वह बातें पूरी न कर लेती, वह वहीं खड़ा रहता. फिर अगर लड़की गुस्से में अपना मोबाइल फोन बंद कर लेती तो वह मन ही मन हंस पड़ता, ‘बेचारी… अपने यार से खफा है.’

तिवारीजी पर अब बिहारी दास अपनी पैनी आंखें गड़ाए हुए था. बिल्डिंग में जैसे ही वह उस लड़की को देखता, उस के पीछे चल देता और देखता कि वह तिवारीजी के घर ही गई है या नहीं. फिर वह बिल्डिंग के सामने पान की दुकान पर बैठ कर उस लड़की के बाहर निकलने का इंतजार करता रहता. जब वह चली जाती, तब वह तिवारीजी के घर किसी बहाने पहुंच जाता.

‘‘आप के पास क्या 2,000 रुपए के खुले हैं?’’

जब तिवारीजी उसे खुले पैसे दे देते, तो वह बातचीत शुरू कर देता था.

‘‘वह मिस जो आप के यहां आई थी, उस की स्कूटी स्टार्ट नहीं हो रही थी. तुरंत सुखबीर गैराज वाले को बुला लिया और उस ने ठीक करा दी. क्या वह बहुत दूर रहती है?’’

‘‘हां, रहती तो दूर है, मगर शहर में दूर क्या और नजदीक क्या? स्कूटी तो हर किसी के लिए जरूरी है,’’ तिवारीजी ने कुछ नाराजगी से बोला. इस पर बिहारी दास खिसिया कर रह गया.

एक दिन शाम को दीपक की पान की दुकान पर बैठे बिहारी दास ने उसी लड़की को किसी लड़के के साथ बिल्डिंग से निकलते हुए देखा.

‘‘अरे, इस के साथ यह लड़का कौन हैं…’’ बिहारी दास के मुंह से अचानक ही यह सवाल निकल पड़ा.

‘‘ये तो रोज ही साथसाथ निकलते हैं…’’ पान वाले दीपक ने उन की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं इन्हें हरदम इसी वक्त देखता हूं.’’

‘‘यह तो तिवारीजी की भतीजी है,’’ बिहारी दास ने उन्हीं दोनों पर नजर जमाए हुए शक जाहिर किया, ‘‘कहीं तिवारीजी कोई खेल तो नहीं खेल रहे?’’

बिहारी दास ने मन में ठान लिया कि वह तिवारीजी की भतीजी की सचाई का पता लगा कर ही रहेगा.

‘‘देख दीपक…’’ बिहारी दास ने गंभीरता से कहा, ‘‘आइंदा तू जब भी इन दोनों को यहां आते या निकलते देखे, तो फौरन मुझे बता देना. मेरा फोन नंबर है न तेरे पास?’’

दीपक ने सहयोग देने के लिए हामी भरी.

अगले ही दिन रात को अपने दोस्तों के साथ जब बिहारी दास एक रैस्टोरैंट में खाना खा रहा था कि तभी दीपक का फोन आ गया.

‘दासजी, जल्दी आइए. वह लड़की किसी के साथ अभीअभी बिल्डिंग के अंदर गई है.’

चूंकि बिहारी दास खाना अधूरा छोड़ कर नहीं निकल सकता था, इसलिए उसे अपने घर वापस आतेआते एकाध घंटा बीत गया. वह जल्दी ही लिफ्ट से सीधा 5वीं मंजिल पहुंच गया, जहां तिवारीजी का फ्लैट था. वह किसी बहाने तिवारीजी के फ्लैट में घुस कर उस की भतीजी और उस लड़के को रंगे हाथ पकड़ना चाहता था.

बिहारी दास जल्दीजल्दी फर्लांग भरते हुए फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचा और उस ने सीधे ही डोरबैल बजाई.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और वह लड़की, जिसे तिवारीजी अपनी भतीजी कह रहे थे, बिहारी दास के सामने खड़ी थी.

‘‘जी, आप को किस से मिलना है?’’

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बिहारी दास को देख कर वह लड़की हैरान थी.

‘‘जी, मैं… तिवारीजी का पड़ोसी हूं. उन से मिलना था,’’ बिहारी दास कुछ सहम कर बोला, फिर उस ने अंदर झांक कर देख लिया. वह लड़का सोफे पर लेटे हुए टीवी देख रहा था.

‘‘आप… आप दास बाबू तो नहीं?’’ वह लड़की घूर कर बिहारी दास के चेहरे को देख रही थी, ‘‘तिवारी अंकल आप का जिक्र करते रहते हैं. आप तीसरी मंजिल पर रहते हैं न?’’

‘‘जी, बिलकुल,’’ बिहारी दास को एक झटका सा लगा, ‘क्या तिवारी ने इसे सबकुछ बता दिया है?’ वह सोचने लगा.

‘‘आप की बीवी का नाम राधिका है न?’’ कह कर वह लड़की मुसकरा दी, ‘‘अंकल आप के यहां ही गए हैं. कहते हैं, राधिका चाय अच्छी बनाती हैं. मैं पी कर आता हूं.

‘‘मैं रोजाना शाम को उन के लिए खाना बनाने अपने मंगेतर के साथ आती हूं. वे अभी आप ही के यहां गए होंगे. आप अंदर आइए न,’’ वह लड़की बड़ी मीठी आवाज में बोल कर उसे अंदर आने की गुजारिश करने लगी.

लेकिन, बिहारी दास को बिजली सा झटका लगा, ‘तिवारीजी और मेरे घर… वह भी मेरी गैरहाजिरी में…’

एक ही पल में बिहारी दास पर मानो पहाड़ सा टूट पड़ा. वह उलटे पैर वहां से निकल कर सीधा लिफ्ट से उतर कर अपने फ्लैट की तरफ दौड़ा. उस के दिमाग को अनेकानेक शक ने घेर लिया. उसे लगा कि अपना खेल खत्म होने जा रहा है. उस का पड़ोसी तिवारी उस से कहीं गुना ज्यादा चालाक निकला.

वह हरगिज भरोसे के लायक शख्स नहीं था, फिर बिहारी दास की बीवी राधिका तो बेचारी भोली थी. कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

बिहारी दास के पैर रास्ते में ही भारीपन महसूस करने लगे. अब वह धीरेधीरे सहम कर अपने फ्लैट के दरवाजे तक पहुंचा ही था कि तुरंत दरवाजा खुला और तिवारीजी हंसते हुए बाहर निकले.

‘‘अरे, दासजी आप… आप तो हमेशा रात को देरी से लौटते हैं. आज जल्दी लौट आए,’’ फिर तीर सा पैना व्यंग्य कसते हुए तिवारीजी बोले, ‘‘राधिका भाभीजी चाय बढि़या बनाती हैं. अब तो हमें उस की आदत सी हो गई है.’’

तिवारीजी चल पड़े, मगर बिहारी दास को लगा मानो उस के पैर तले जमीन सरकने लगी थी. अपने घर में घुसते ही वह बैठक में रखे सोफे पर ढेर हो गया.

बड़ी लकीर छोटी लकीर: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- बड़ी लकीर छोटी लकीर: भाग 1

मैं ने इधरउधर से 1 लाख उधार लिए और बहुत बड़ा जश्न किया. शिखा के लिए भी एक बहुत प्यारी नारंगी रंग की रेशम के काम की साड़ी ली. उस में शिखा का गेहुआं रंग और निखर रहा था. उस की आंखों में सितारे चमक रहे थे और मुझे अपने पर गर्व हो रहा था.

फिर किसी और से उधार ले कर मैं ने पहले व्यक्ति का उधार चुकाया और फिर यह धीरेधीरे मेरी आदत में शुमार हो गया.

मेरी देनदारी कभी मेरी मां तो कभी भाई चुका देते. शिखा और अन्वी से सब प्यार करते थे, इसलिए उन तक बात नहीं पहुंचती थी.

ऐसा नहीं था कि मैं इस जाल से बाहर नहीं निकलना चाहता था पर जब सब खाक हो जाता है तब लगता है काश मैं पहले शर्म न करता या शिखा से पहले बोल पाता. मैं एक काम कर के अपनी लकीर को थोड़ा बढ़ाता पर अनिल फिर उस लकीर को बढ़ा देता.

यह खेल चलता रहा और फिर धीरेधीरे मेरे और शिखा के रिश्ते में खटास आने लगी.

शिखा को खुश करने की कोशिश में मैं कुछ भी करता पर उस के चेहरे पर हंसी न ला पाता. शिखा के मन में एक अनजाना डर बैठ गया था. उसे लगने लगा था मैं कभी कुछ भी ठीक नहीं कर सकता या मुझे ऐसा लगने लगा था कि शिखा मेरे बारे में ऐसा सोचती है.

अन्वी 2 साल की हुई और शिखा ने एक दफ्तर में नौकरी आरंभ कर दी. मुझे काफी मदद मिल गई. मैं ने नौकरी छोड़ कर व्यापार की तरफ कदम बढ़ाए. शिखा ने अपनी सारी बचत से और मेरी मां ने भी मेरी मदद करी.

2-3 माह में थोड़ाथोड़ा मुनाफा होने लगा. उस दौड़ में पहला स्थान प्राप्त करने के चक्कर में मैं शायद सहीगलत में फर्क को नजरअंदाज करने लगा. थोड़ा सा पैसा आते ही दिलखोल कर खर्च करने लगा. अचानक एक दिन साइबर सैल से पुलिस आई जांच के लिए. पता चला कि मेरी कंपनी के द्वारा कुछ ऐसे पैसे का लेनदेन हुआ है जो कानून के दायरे में नहीं आता है. एक बार फिर से मैं हाशिए पर आ खड़ा हो गया. जितना कामयाब होने की कोशिश करता उतनी ही नाकामयाबी मेरे पीछेपीछे चली आती.

शिखा ने कहा कि मैं कभी भी उस के या अन्वी के बारे में नहीं सोचता. हमेशा सपनों की दुनिया में जीता हूं.

शायद वह अपनी जगह ठीक थी पर उसे यह नहीं मालूम था कि मैं सबकुछ उसे और अन्वी को एक बेहतर जिंदगी देने के लिए करता हूं. पर क्या करूं मैं ऊपर उठने की जितनी भी कोशिश करता उतना ही नीचे चला जाता हूं. हमारे रिश्ते की खाई गहरी होती गई. हम पतिपत्नी का प्यार अब न जाने कहां खोने लगा.

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यह सोचता हुआ मैं वर्तमान में लौट आया हूं.

कल शिखा की छोटी बहन की शादी है. सभी रिश्तेदार एकत्रित हुए हैं. न जाने क्या सोच कर मैं शिखा के लिए अंगूठी खरीद ले आया. सब लोग शिखा की अंगूठी की तारीफ कर रहे थे और मैं खुशी महसूस कर रहा था. वह अलग बात है, मैं इन पैसों से पूरे महीने का खर्च चला सकता था.

तभी देखा कि नीतू सब को अपना कुंदन का सैट दिखा रही है जो उस ने खासतौर पर इस शादी में पहनने के लिए खरीदा था. मुझे अंदर से आज बहुत खालीखाली महसूस हो रहा था. मैं इन लकीरों के खेल में उलझ कर आज खुद को बौना महसूस कर रहा हूं.

बरात आ गई थी. चारों तरफ गहमागहमी का माहौल था. तभी अचानक पीछे से किसी ने आवाज लगाई. मुड़ कर देखा तो देखता ही रह गया.

मेरे सामने भावना खड़ी थी. भावना और मैं कालेज के समय बहुत अच्छे मित्र थे या यों कह सकते वह और मैं एकदूसरे के पूरक थे. प्यार जैसा कुछ था या नहीं, नहीं मालूम पर उस के विवाह के बाद बहुत खालीपन महसूस हुआ. भावना जरा भी नहीं बदली थी या यों कहूं पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. वही बिंदासपन, बातबात पर खिलखिलाना.

मुझे देखते ही बोली, ‘‘सुमि, क्या हाल बना रखा है… तुम्हारी आंखों की चमक कहां गई?’’

मैं चुपचाप मंदमंद मुसकराते हुए उसे एकटक देख रहा था. मन में अचानक यह

खयाल आया कि काश मैं और वह मिल कर

हम बन जाते.

भावना चिल्लाई, ‘‘यह क्या मैं ही बोले जा रही हूं और तुम खोए हुए हो?’’

हम गुजरे जमाने में पहुंच गए. 3 घंटे 3 मिनट की तरह बीत गए. होश तब आया जब शिखा अन्वी को ले कर आई और शिकायती लहजे में बोली, ‘‘तुम्हें सब वहां ढूंढ़ रहे हैं.’’

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मैं ने उन दोनों का परिचय कराया और फिर शिखा के साथ चला गया. पर मन वहीं भावना के पास अटका रह गया. जयमाला के बाद फिर से भावना से टकरा गया.

भावना निश्छल मन से शिखा से बोली, ‘‘शिखा, आज की रात तुम्हारे पति को चुरा रही हूं… हम दोनों बरसों बाद मिले हैं… फिर पता नहीं मिल पाएं या नहीं.’’

ये सब सुन कर मुझे पता लग गया था कि मैं अब भावना का अतीत ही हूं और शायद उस ने कभी मुझे मित्र से अधिक अहमियत नहीं दी थी. यह तो मैं ही हूं जो कोई गलतफहमी पाले बैठा था.

फिर भावना कौफी के 2 कप ले आई. मुसकराते हुए बोली, ‘‘चलो हो जाए कौफी

विद भावना.’’

मैं भी मुसकरा उठा. मैं ने औपचारिकतावश उस से उस के घरपरिवार के बारे में पूछा. उस से बातचीत कर के मुझे आभास हो गया था कि मेरी सब से प्यारी मित्र अपनी जिंदगी में बहुत खुश है पर यह क्या मुझे सच में बहुत खुशी हो रही थी?

भावना ने मुझ से पूछा, ‘‘और सुमि

तुम्हारी कैसी कट रही है? बीवी तो तुम्हारी

बहुत प्यारी है.’’

उस के आगे मैं कभी झूठ न बोल पाया था तो आज कैसे बोल पाता. अत: मैं ने उसे अपना दिल खोल कर दिखा दिया. मैं ने उस से कहा, ‘‘भावना, मैं क्या करूं… मैं हार गया यार… जितनी कोशिश करता हूं उतना ही नीचे चला जाता हूं.’’

भावना बोली, ‘‘सुमित, कभी शिखा से ऐसे बात की जैसे तुम ने आज मुझ से करी है?’’

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मैं ने न में सिर हिलाया तो वह बोली, ‘‘फिर हर समय इन लकीरों के खेल में उलझे रहना… पति न जाने क्यों अपनी पत्नियों को बेइंतहा प्यार करने के बावजूद उन्हें अपने दर्द से रूबरू नहीं करा पाते हैं. तुम पहले इंसान नहीं हो जो ऐसा कर रहे हो और न ही तुम आखिरी हो, पर सुमित तुम खुद इस के जिम्मेदार हो… इन लकीरों के खेल में तुम खुद उलझे हो… अपना सब से प्यारा दोस्त समझ कर यह बता रही हूं कि अपनी तुलना अगर दूसरों से करोगे तो खुद को कमतर ही पाओगे. सुमि, बड़ी लकीर अवश्य खींचो पर अपनी ही अतीत की छोटी लकीर के अनुपात में… तुम्हें कभी निराशा नहीं होगी. जैसे मछली जमीन पर नहीं रह सकती वैसे ही पंछी भी पानी में नहीं रह पाते. सुमि, शायद तुम एक मछली हो जो उड़ने की कोशिश कर रहे हो.

‘‘फिर बोलो गलती किस की है, तुम्हारी, शिखा या अनिल की?

‘‘दूसरे तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, इस से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने बारे में कैसा महसूस करते हैं…

‘‘शिखा की मां हो या तुम्हारी सब अपनेअपने ढंग से चीजों को देखेंगे पर यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम कैसे अपने रिश्ते निभाते हो.

‘‘जैसे एक बहू को शादी के बाद अपने नए परिवार में तालमेल बैठाना पड़ता है

वैसे ही एक पुरुष को भी शादी के बाद सब से तालमेल बैठाना पड़ता है पर इस बात को एक पति, दामाद अकसर नजरअंदाज कर देते हैं… अनिल से अपनी तुलना करने के बजाय उस से कुछ सीखो और मुझे यकीन है तुम्हारे अंदर भी ऐसे गुण होंगे जो अनिल ने तुम से सीखे होंगे. नकारात्मकता को अपने और शिखा के ऊपर हावी न होने दो. जैसे तुम खुद को देखोगे वैसे ही दूसरे लोग तुम्हें देखेंगे.

‘‘यह उम्मीद करती हूं कि अगली बार फिर कभी जीवन के किसी मोड़ पर टकरा गए तो फिर से अपने पुराने सुमि को देखना चाहूंगी,’’ कह भावना चली गई.

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मैं चुपचाप उसे सुनता रहा और फिर मनन करने लगा कि शायद भावना सही बोल रही है. लकीरों के खेल में उलझ कर मैं खुद ही हीनभावना से ग्रस्त हो गया हूं. शायद अब समय आ गया है हमेशा के लिए इस खेल को खत्म करने का पर इस बार अपनी शिखा को साथ ले कर मैं अपनी जिंदगी की एक नई लकीर बनाऊंगा बिना किसी के साथ तुलना कर के और फिर कभी भावना से टकरा गया तो अपनी जिंदगी के नए सफर की कहानी सुनाऊंगा.

छुटकारा भाग-1

पहला भाग

सावित्री आंखों की जांच कराने दीपक आई सैंटर पर पहुंचीं. वहां मरीजों की भीड़ कुछ ज्यादा ही थी. अपनी बारी का इंतजार करतेकरते 2 घंटे से भी ज्यादा हो गए. तभी एक आदमी तेजी से आया और बोला, ‘‘शहर में दंगा हो गया है, जल्दी से अपनेअपने घर पहुंच जाओ.’’

यह सुन कर वहां बैठे मरीज और दूसरे लोग बाहर की ओर निकल गए. सावित्री ने मोबाइल फोन पर बेटे राजन को सूचना देनी चाही, पर आज तो वे जल्दी में अपना मोबाइल ही घर भूल गई थीं. वे अकेली रिकशा में बैठ कर आई थीं. अब सूचना कैसे दें?

बाहर पुलिस की गाड़ी से घोषणा की जा रही थी, ‘शहर में दंगा हो जाने के चलते कर्फ्यू लग चुका है. आप लोग जल्दी अपने घर पहुंच जाएं.’

सावित्री ने 3-4 रिकशा और आटोरिकशा वालों से बात की, पर कोई गांधी नगर जाने को तैयार ही नहीं हुआ जहां उन का घर था.

निराश और परेशान सावित्री समझ नहीं पा रही थीं कि घर कैसे पहुंचें? शाम के 7 बज चुके थे.

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तभी एक स्कूटर उन के बराबर में आ कर रुक गया. स्कूटर चलाने वाले आदमी ने कहा, ‘‘भाभीजी नमस्ते, आप यहां अकेली हैं या कोई साथ है?’’

‘‘भाई साहब नमस्ते, मैं यहां अकेली आई थी, आंखों की जांच कराने. दंगा हो गया है. घर की तरफ कोई रिकशा नहीं जा रहा है.’’

‘‘इधर कोई नहीं जाएगा भाभीजी, क्योंकि दंगा पुराने शहर में हुआ है. आप चिंता न करो और मेरे साथ घर चलो.

इस तरफ नई कालोनी है, कोई डर नहीं है. आप आराम से रहना. वहां कमला

भी है.’’

‘‘लेकिन…?’’ सावित्री के मुंह से निकला.

‘‘भाभीजी, आप जरा भी चिंता न करें. घर पहुंच कर मैं राजन को फोन

कर दूंगा.’’

‘‘यह दंगा क्यों हो गया?’’ सावित्री ने स्कूटर पर बैठते हुए पूछा.

‘‘अभी सही पता नहीं चला है. मैं एक कार्यक्रम में गया था. वहां दंगा और कर्फ्यू का पता चला तो कार्यक्रम बीच में ही बंद हो गया. मैं घर की ओर लौट रहा था तो यहां मैं ने आप को सड़क पर खड़े हुए देखा.’’

सावित्री स्कूटर वाले शख्स सूरज प्रकाश को अच्छी तरह जानती थीं. सूरज प्रकाश जय भारत इंटर कालेज के प्रिंसिपल रह चुके थे. वे 5 साल पहले ही रिटायर हुए थे. परिवार के नाम पर वे और उन की पत्नी कमला थीं. जब उन के यहां 10 साल तक भी कोई औलाद नहीं हुई, तो उन्होंने अनाथ आश्रम से एक साल की लड़की गोद ले ली थी. जिस का नाम सुरेखा रखा गया था.

देखते ही देखते सुरेखा बड़ी होने लगी थी. वह पढ़नेलिखने में होशियार थी. सूरज प्रकाश सुरेखा को सरकारी अफसर बनाना चाहते थे.

जब सुरेखा 10वीं जमात में पढ़ रही थी, तब एक दिन उसे साइकिल पर स्कूल जाते हुए एक ट्रक ने बुरी तरह कुचल दिया था और उस की मौके पर ही मौत हो गई थी.

सूरज प्रकाश व उन की पत्नी कमला को दुख तो बहुत हुआ था, पर वे कर ही क्या सकते थे? उन्होंने सुरेखा को ले कर जो सपने देखे थे, वे सब टूट गए थे.

सूरज प्रकाश को समाजसेवा में भी बहुत दिलचस्पी थी और वे एक संस्था ‘संकल्प’ के अध्यक्ष थे.

सूरज प्रकाश पहले सावित्री के ही महल्ले गांधी नगर में रहते थे. दोनों परिवार एकदूसरे के घर आतेजाते थे. सूरज प्रकाश और सावित्री के पति सोमनाथ में बहुत गहरी दोस्ती थी.

घर के बाहर स्कूटर रोकते ही सूरज प्रकाश ने कहा, ‘‘आइए भाभीजी.’’

स्कूटर से उतर कर सावित्री सूरज प्रकाश के साथ घर में घुसीं. सावित्री को देखते ही कमला ने खुश हो कर कहा, ‘‘अरे दीदी आप? आइएआइए, बैठिए.’’

सावित्री सोफे पर बैठ गईं. सूरज प्रकाश ने बता दिया कि वे सावित्री को कर्फ्यू लगने के चलते यहां ले आए हैं.

‘‘दीदी, आप जरा भी चिंता न करें. यहां आप को जरा भी परेशानी नहीं होगी. पता नहीं, क्यों लोग जराजरा सी बात पर लड़नेमरने को तैयार रहते हैं. लोगों में प्यार नहीं नफरत भरी जा रही है. लोगों की नसों में जातिवाद का जहर भरा जा रहा है.

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‘‘वैसे, हमारी कालोनी में दंगे का असर कम ही होता है, पुराने शहर में ज्यादा असर होता

है. उधर मिलीजुली आबादी जो हैं.

सूरज प्रकाश ने राजन के मोबाइल का नंबर मिलाया. उधर से राजन की आवाज सुनाई दी, ‘हैलो, नमस्ते अंकल.’

‘‘नमस्ते बेटे… तुम्हारी मम्मी डाक्टर दीपक के यहां आंखों की जांच कराने गई थीं न…’’

‘हांहां, गई थीं. क्या हुआ मम्मी को? दंगे में कहीं…’

‘‘नहींनहीं बेटे, वे बिलकुल ठीक हैं. तुम्हारी मम्मी को मैं अपने साथ घर ले आया हूं. तुम जरा भी चिंता न करना. वे बिलकुल ठीक हैं.’’

‘चलो, यह बहुत अच्छा किया जो आप मम्मी को अपने साथ ले आए. हमें तो चिंता हो रही थी, क्योंकि वे अपना मोबाइल फोन यहीं भूल गई थीं.’

सूरज प्रकाश ने सावित्री को मोबाइल देते हुए कहा, ‘‘लो भाभी, राजन से बात कर लो.’’

सावित्री ने मोबाइल ले कर कहा, ‘‘हां राजन, मैं बिलकुल ठीक हूं. कर्फ्यू खुलेगा तो तू आ जाना.’’

‘ठीक है मम्मी,’ राजन ने कहा.

तभी कमला एक ट्रे में चाय व खाने का कुछ सामान ले आईं.

रात को खाना खा कर वे तीनों काफी देर तक बातें करते रहे.

11 बज गए तो कमला व सूरज प्रकाश उठ कर दूसरे कमरे में चले गए.

सावित्री के पति सोमनाथ एक सरकारी महकमे में बाबू थे. बेटे राजन की शादी हो चुकी थी.

सोमनाथ के रिटायर होने के बाद वे दोनों ऐतिहासिक नगरों में घूमनेफिरने जाने लगे थे. जिंदगी की गाड़ी बहुत अच्छी चल रही थी कि एक दिन… सावित्री और सोमनाथ आगरा से ट्रेन से लौट रहे थे. रात का समय था. सभी मुसाफिर सो चुके थे. अचानक ट्रेन का ऐक्सीडैंट हो गया. सावित्री अपनी बर्थ से गिर कर बेहोश हो गई थीं. अस्पताल में जब उन्हें होश आया तो पता चला कि सोमनाथ बच नहीं सके थे.

कुछ दिनों तक राजन व उस की पत्नी भारती सावित्री की भरपूर सेवा करते रहे. उन्हें जरूरत की हर चीज बिना कहे ही मिल जाती थी, पर धीरेधीरे उन के बरताव में बदलाव आने लगा था. उन्होंने सावित्री की अनदेखी करनी शुरू कर दी थी.

एक दिन भारती जब बाहर से लौटी तो अपने बेटे राजू के सिर पर पट्टी बंधी देख कर वह बुरी तरह चौंक उठी थी.

भारती के पूछने से पहले ही सावित्री ने कहा था, ‘इसे एक मोटरसाइकिल वाला टक्कर मार कर भाग गया. यह चौकलेट खाने की जिद कर रहा था. मैं ने बहुत मना किया, पर माना नहीं. चौकलेट ले कर लौट रहा था तो टक्कर हो गई. मैं डाक्टर से पट्टी करा लाई हूं. मामूली सी चोट लगी है. 2-4 दिनों में ठीक हो जाएगी.’

भारती के मन में तो जैसे ज्वालामुखी धधक रहा था. वह घूरते हुए बोली, ‘इसे ज्यादा चोट लग जाती तो… हाथपैर भी टूट सकते थे. अगर मेरे राजू को कुछ हो जाता तो हमारे घर में अंधेरा हो जाता. मैं 2-3 घंटे के लिए घर से गई और आप राजू को संभाल भी न सकीं.’

तभी राजन भी ड्यूटी से लौट आया. वह राजू की ओर देख कर चौंक उठा और बोला, ‘इसे क्या हो गया?’

‘पूछो अपनी मम्मी से, यह इन की ही करतूत है. मैं एक सहेली के घर शोक मनाने गई थी. उस के जवान भाई की हादसे में मौत हो गई है. मुझे आनेजाने में 3 घंटे भी नहीं लगे. मेरे पीछे राजू को चौकलेट लाने भेज दिया. सोचा होगा कि चौकलेट आएगी तो खाने को मिलेगी.

‘सड़क पर राजू को किसी बाइक ने टक्कर मार दी. पता नहीं, इस उम्र में लोगों को क्या हो जाता है?’

‘सठिया जाते हैं. सोचते हैं कि किसी बहाने कुछ न कुछ खाने को मिल जाए. मम्मी, यह आप ने क्या किया?’ राजन ने उन की ओर देख कर पूछा.

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‘मैं ने तो बहुत मना किया था, पर मेरी सुनता ही कौन है?’ सावित्री ने दुखी मन से कहा था.

‘जिन्हें मरना चाहिए वे परिवार की छाती पर मूंग दल रहे हैं और जिन को जीना चाहिए वे अचानक ही बेमौत मर रहे हैं,’ भारती बुरा सा मुंह बना कर बोली थी.

सावित्री चुपचाप सुनती रहीं. थोड़ी देर बाद वे वहां से अपने कमरे में आ गईं और बिस्तर पर गिर कर रोने लगीं.

इसी तरह दिन बीतते रहे. सावित्री को लग रहा था कि अपना घर, बेटा

और पोता होते हुए भी वे बिलकुल अकेली हैं.

कर्फ्यू की अगली सुबह जब सावित्री की नींद खुली तो 7 बज रहे थे. जब वे नहाने के लिए जाने लगीं तो कमला ने कहा, ‘‘दीदी, आप मेरे ही कपड़े पहन लेना.’’

‘‘हांहां क्यों नहीं,’’ सावित्री ने कहा और कमला से उस के कपड़े ले कर बाथरूम में नहाने चली गईं.

नाश्ता करने के बाद वे तीनों एक कमरे में बैठ गए. टैलीविजन चला दिया और खबरें सुनने लगे.

दंगे की वजह पता चली कि नगर में धार्मिक शोभा यात्रा निकल रही थी. दूसरे समुदाय के किसी शरारती तत्त्व ने पत्थर मार दिए. भगदड़ मच गई. देखते ही देखते लूटमार व आगजनी शुरू हो गई. प्रशासन ने तुरंत कर्फ्यू की घोषणा कर दी.

सूरज प्रकाश ने कहा, ‘‘भाभीजी, राजन व बहू के बरताव में कुछ सुधार हुआ है या वैसा ही चल रहा है?’’

‘‘सुधार क्या होना है भाई साहब… देख कर लगता ही नहीं कि यह अपना बेटा राजन ही है जो शादी से पहले हर काम मुझ से या अपने पापा से पूछ कर ही करता था. शादी के बाद यह इतना बदल जाएगा, सपने में भी नहीं सोचा था,’’ सावित्री ने दुखड़ा सुनाया.

‘‘पता नहीं, बहुएं कौन सा जादू कर देती हैं कि बेटे मांबाप को बेकार और फालतू समझने लगते हैं…’ सूरज प्रकाश ने कहा.

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(क्रमश:)

शहर में कर्फ्यू कब खुला? क्या राजन अपनी मां को लेने पहुंच पाया? पढि़ए अगले अंक में… 

छुटकारा: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- छुटकारा

शहर में अचानक दंगा भड़क जाने से सावित्री कर्फ्यू में फंस गईं. कोई भी घर जाने में उन की मदद नहीं कर रहा था कि तभी सावित्री के पुराने परिचित सूरज प्रकाश मिल गए और उन्हें अपने घर ले गए. सावित्री के बेटे राजन को यह बात पता चली तो उस ने राहत की सांस ली, पर उन्हें लेने नहीं गया.

त भी कमला बोल उठीं, ‘‘मैं ने तो ऐसा कोई जादू नहीं किया था आप पर. आप ने तो अपने मातापिता की भरपूर सेवा की है. यह बेटे के ऊपर भी निर्भर करता है कि वह उस जादू से कितना बदलता है.’’

सूरज प्रकाश ने कहा, ‘‘भाभीजी, ऐसा लगता है दुनिया में दुखी लोग ज्यादा हैं. देखो न हम इसलिए दुखी हैं कि हमारे कोई औलाद नहीं है. आप इसलिए दुखी हैं कि अपना बेटा भी अपना न रहा. वह आप की नहीं, बल्कि बहू की ही सुनता और मानता है.’’

‘‘हां, सोचती हूं कि इस से तो अच्छा था कि बेटा नहीं, बल्कि एक बेटी ही हो जाती, क्योंकि बेटी कभी अपने मांबाप को बोझ नहीं समझती.’’

‘‘इस दुनिया में सब के अपनेअपने दुख हैं,’’ कमला ने कहा.

5 दिन तक कर्फ्यू लगा रहा. इन 5 दिनों में राजन ने एक दिन भी फोन कर के सावित्री का हाल नहीं पूछा.

5 दिन बाद कर्फ्यू में 4 घंटे की ढील दी गई. सावित्री ने सूरज प्रकाश से कह कर राजन को फोन मिलवाया.

सूरज प्रकाश ने कहा, ‘‘कैसे हो राजन, सब ठीक तो है न?’’

‘हांहां अंकल, सब ठीक है. मम्मी कैसी हैं?’ उधर से राजन की आवाज सुनाई दी.

‘‘वे भी ठीक हैं बेटे. लो, अपनी मां से बात कर लो,’’ कहते हुए सूरज प्रकाश ने सावित्री को फोन दे दिया.

‘कैसी हो मम्मी?’

‘‘मैं बिलकुल ठीक हूं. भाई साहब के यहां कोई परेशानी हो सकती है क्या? इन दोनों ने तो मेरी भरपूर सेवा की है. तू ने 5 दिनों में एक दिन भी फोन कर के नहीं पूछा कि मम्मी कैसी हो?’’

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‘‘अंकल बहुत अच्छे इनसान हैं. उन की सभी तारीफ करते हैं. मैं जानता था कि अंकल के यहां आप सहीसलामत रहोगी.’’

‘‘कर्फ्यू में 4 घंटे की ढील है. तू यहां आ जा. मैं तेरे साथ घर आ जाऊंगी.’’

‘मम्मी, मैं तो बाजार जा रहा हूं कुछ जरूरी सामान खरीदना है. तुम ऐसा करो कि रिकशा या आटोरिकशा कर के घर आ जाना, क्योंकि मुझे बाजार में देर हो जाएगी.’

‘‘ऐसा ही करती हूं,’’ बुझे मन से सावित्री ने कहा और फोन काट दिया.

सूरज प्रकाश ने पूछा, ‘‘क्या कहा राजन ने?’’

‘‘कह रहा है कि कुछ जरूरी सामान खरीदने बाजार जा रहा हूं तुम रिकशा या आटोरिकशा कर के घर आ जाओ. भाई साहब, अभी 3 घंटे से भी ज्यादा का समय बाकी है. मैं बाहर से कोई रिकशा या आटोरिकशा पकड़ कर घर चली जाऊंगी,’’ सावित्री ने निराशा भरी आवाज में कहा.

‘‘भाभीजी, आप क्या बात कर रही हैं? आप अकेली जाएंगी? क्या हम से मन ऊब गया है जो इस तरह जाना चाहती हो?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी बात नहीं है. इन 5 दिनों में तो मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं बता नहीं सकती.’’

‘‘वैसे तो मैं भी आप को घर छोड़ कर आ सकता हूं, पर मैं नहीं जाऊंगा. जब कर्फ्यू पूरी तरह खुल जाएगा तब आप चली जाना. हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि राजन क्यों नहीं आया.’’

‘‘ठीक कहते हैं आप, लेकिन घर जाना भी तो जरूरी है.’’

‘‘मैं ने कब मना किया है. 3 दिन बाद कर्फ्यू खुल जाएगा, तब आप चली जाना,’’ सूरज प्रकाश ने कहा.

3 दिनों के बाद जब पूरी तरह कर्फ्यू खुला तो सावित्री ने अकेले ही घर जाने के लिए कहा.

कमला ने टोक दिया, ‘‘नहीं दीदी, आप अकेली नहीं जाएंगी. ये आप को घर छोड़ आएंगे.’’

‘‘हां भाभीजी, आप के साथ चल रहा हूं.’’ सूरज प्रकाश ने कहा.

स्कूटर सावित्री के मकान के सामने रुका. सावित्री ने कहा, ‘‘अंदर आइए.’’

‘‘मैं फिर कभी आऊंगा भाभीजी. आज तो बहुत काम करने हैं. समय नहीं मिल पाएगा.’’

सावित्री घर में घुसी.

‘‘तुम किस के साथ आई हो मम्मी?’’ राजन ने पूछा.

‘‘सूरज प्रकाश घर छोड़ कर गए हैं. मैं ने उन से बहुत कहा कि अकेली चली जाऊंगी, पर वे दोनों ही नहीं माने. कमला दीदी भी कहने लगीं कि अकेली नहीं जाने दूंगी.’’

भारती चुप रही. उसे सावित्री के आने की जरा भी खुशी नहीं हुई, पर पोता राजू बहुत खुश था.

राजन व भारती के बरताव में कोई फर्क नहीं पड़ा. सावित्री को लग रहा था कि उन्हें जानबूझ कर परेशान किया जा रहा है.

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रविवार का दिन था. सावित्री दोपहर का खाना खा रही थी, पर सब्जी में मिर्च बहुत ज्यादा थी. एक टुकड़ा खाना भी मुश्किल हो गया. उस ने चुपचाप 3-4 टुकड़े रोटी के खा लिए, पर मुंह में जैसे आग लग गई हो. पानी पी कर राजन को आवाज दी.

राजन ने पूछा, ‘‘क्या हुआ मम्मी?’’

‘‘सब्जी में मिर्च बहुत तेज है. मुझ से तो खाई नहीं जा रही है.’’

‘‘मम्मी, सब्जी तो एकजैसी बनती है. तुम्हारी अलग से नहीं बनती.’’

‘‘तू सब्जी चख कर तो देख.’’

‘‘तुम्हारे मुंह का जायका खराब हो गया है. कल तुम डाक्टर को दिखा कर आना.’’

तभी भारती रसोई से निकल कर आई और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी कह रही हैं कि सब्जी में मिर्च बहुत तेज है.’’

‘‘बनाबनाया खाना बैठेबिठाए मिल जाता है. खाना खराब है तो छोड़ क्यों नहीं देतीं. क्यों खा लेती हो दोनों टाइम?’’

‘‘छोड़ो भारती, तुम रसोई में जाओ. मम्मी तो सठियाती जा रही हैं.’’

सावित्री ने खाने की थाली एक तरफ सरकाते हुए कहा, ‘‘रहने दे राजन, मुझे नहीं खाना है. डाक्टर ने तेज मिर्च, नमक, मसाले व ज्यादा घीतेल खाने को मना कर रखा है. इस उम्र में बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. अभी तो मेरे हाथपैर चल रहे हैं. मैं अपना नाश्ता और खाना खुद बना लूंगी.’’

राजन चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया.

उस दिन के बाद सावित्री ने खुद ही अपना चायनाश्ता व खाना बनाना शुरू कर दिया.

एक रात सावित्री की सोते हुए आंख खुली. रात के 12 बज रहे थे. वे उठीं और आंगन के एक कोने में बने बाथरूम की ओर चल दीं. राजन के कमरे में बहुत कम आवाज में टैलीविजन चल रहा था. राजन और भारती की बातचीत सुन कर उन के कदम रुक गए.

‘‘तुम्हारी मम्मी से तो मैं बहुत ही परेशान हूं. तुम्हारे पापा तो चले गए और इस मुसीबत को मेरी छाती पर छोड़ गए. अगर दंगे में मारी जातीं तो हमेशा के लिए हमें भी चैन की सांस मिलती,’’ भारती बोल रही थी.

‘‘और सरकार से 5 लाख रुपए भी मिलते, जैसा कि अखबारों में छपा था कि दंगे में मरने वालों के परिवार को सरकार द्वारा 5 लाख रुपए की मदद की जाएगी,’’ राजन बोला.

यह सुन कर सावित्री सन्न रह गईं. वे थके कदमों से बाथरूम पहुंचीं और लौट कर अपने बिस्तर पर लेट गईं.

अगली सुबह सावित्री उठीं. नहाधो कर बिना नाश्ता किए सूरज प्रकाश के घर पहुंच गईं.

कमला ने चेहरे पर खुशी बिखेरते हुए पूछा, ‘‘दीदी, कैसी हैं आप?’’

‘‘हां, बस ठीक हूं,’’ सावित्री ने उदास लहजे में कहा.

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‘‘भाभीजी, पहले आप नाश्ता कर लीजिए,’’ सूरज प्रकाश ने कहा.

नाश्ता करने के बाद सावित्री ने सारी बातें बता दीं. रात की बात सुन कर तो उन दोनों को भी बहुत दुख हुआ.

सावित्री ने दुखी मन से कहा, ‘‘भाई साहब, समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? घरपरिवार होते हुए भी मैं बिलकुल अकेली सी हो गई हूं. अब तो वह घर मुझे जेल की कोठरी की तरह लगने लगा है. आप मुझे किसी वृद्धाश्रम का पता बता दीजिए. मैं अपनी जिंदगी के बाकी दिन वहां बिता लूंगी,’’ कहतेकहते सावित्री रोने लगीं.

‘‘भाभीजी, क्या बात कर रही हैं आप? आप वृद्धाश्रम में क्यों रहेंगी? आप अपने घर में न रहें, यह आप की इच्छा है, पर हमारी भी एक इच्छा है, अगर आप बुरा न मानो तो कह दूं?’’

‘‘हांहां, कहिए.’’

‘‘क्या यह नहीं हो सकता कि आप हम दोनों के साथ इसी घर में रहें. हम दोनों भी बूढ़े हैं और अकेले हैं. हम तीनों मिलजुल कर रहें, इस से हम तीनों का अकेलापन दूर हो जाएगा,’ सूरज प्रकाश ने कहा.

तभी कमला बोल उठीं, ‘‘दीदी, मना मत करना. मैं एक बात जानना चाहती हूं कि हमारी दलित जाति के चलते आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’

‘‘नहींनहीं, हम दोनों परिवारों के बीच यह जाति कहां से आ गई. आप के यहां इतने दिन रह कर तो मैं ने देख लिया है. आप जैसे परिवार का साथ पाने को भला कौन मना कर सकता है.’’

‘‘भाभी, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सभी शहरों में अकेलेपन की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए समान विचारों के 3-4 बूढ़े इकट्ठा रहने लगें?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं हो सकता ऐसा,’’ सावित्री ने कहा. उन्हें लग रहा था कि उन के दिल से भारी बोझ उतर रहा है.

शाम को जब सावित्री घर पहुंचीं तो राजन ने कहा, ‘‘आप कहां चली गई थीं? फोन भी यहीं छोड़ गई थीं. कहां रहीं सुबह से अब तक?’’

सावित्री ने अपने कमरे में कुरसी पर बैठते हुए कहा, ‘‘भारती को भी बुला ले. मुझे तुम दोनों से बात करनी है.’’

राजन ने भारती को आवाज दी. उसे लग रहा था कि मम्मी के दिल में कोई ज्वालामुखी धधक रहा है. भारती भी कमरे में आ गई.

सावित्री बोल उठीं, ‘‘मैं ने कल रात तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. मैं अपने ही घर में अपनी औलाद पर बोझ बन गई हूं. मैं इतनी बड़ी मुसीबत बन गई हूं कि तुम दोनों मुझ से छुटकारा चाहते हो. तुम चाहते थे कि मैं भी दंगे में मारी जाती और तुम्हें 5 लाख रुपए सरकार से मिल जाते.’’

राजन और भारती यह सुन कर सन्न रह गए.

‘‘बेटे, अब तक तो मैं तेरे और पोते के मोह के जाल में थी. अपने खून का मोह होता है, पर रात को जो मैं ने सुना उसे सुन कर सारा मोह खत्म हो गया है.’’

‘‘यह मकान, नकदी जोकुछ भी मेरे पास है, सब तुम्हारा ही तो था, पर तब जब मेरी सेवा करते. मेरे बुढ़ापे का सहारा बनते. अब तो मेरी इच्छा है कि मैं अपनी सारी जायदाद किसी ऐसे वृद्धाश्रम को दान कर दूं, जहां लोग अपनी नालायक औलाद से पीडि़त और दुखी हो कर पहुंचते हैं. अब मैं यहां नहीं रहूंगी. कल ही मैं यहां से चली जाऊंगी.’’

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‘‘कहां जाओगी?’’ राजन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी.

‘‘मैं सूरज प्रकाश के घर जा रही हूं. हम तीनों मिल कर अपना बुढ़ापा आराम से काट लेंगे.’’

‘‘सूरज अंकल तो दलित हैं… क्या आप उन के घर में रहोगी?’’

‘‘मैं ने कर्फ्यू में वहां इतने दिन गुजारे तब तो तू ने कुछ नहीं कहा. अब मैं वहां हमेशा रहने की बात कर रही हूं तो तुझे उन की जाति दिखाई दे रही है,’’ सावित्री ने गुस्से भरे लहजे में कहा.

राजन और भारती उन से नजरें नहीं मिला पा रहे थे.

11 साल बाद: भाग 2

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इस केस में अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाह भी पेश किए गए थे. पिछले महीने यानी सितंबर में सारी गवाहियां पूरी हो चुकी थीं और अदालत ने फैसले की तारीख 10 अक्तूबर, 2019 तय कर दी थी. इस मामले में रविंदर कौर को सजा होनी तय थी.

23 सितंबर, 2019 को जालंधर देहात के एसएसपी नवजोत सिंह माहल को फैजाबाद की फैमिली कोर्ट से एक फैक्स प्राप्त हुआ. उस फैक्स में लिखा था कि रविंदर कौर बनाम जगजीत सिंह उर्फ सोनू पुत्र मंजीत सिंह बग्गा निवासी 13, गुरुनानक नगर, रायबरेली, उत्तर प्रदेश.

केस नंबर 104/2009  धारा 125 में उस के खिलाफ 4 लाख 32 हजार रुपए का कंडीशनल वारंट जारी किया गया है. आरोपी जालंधर देहात क्षेत्र में कहीं छिपा बैठा है. तत्काल प्रभाव से उसे गिरफ्तार कर फैजाबाद की अदालत में पेश किया जाए.

दरअसल, फैजाबाद की अदालत में जज के सामने केस की बहस के दौरान रविंदर कौर के वकील विजय शंकर पांडेय ने कहा था कि जगजीत सिंह जिंदा है और वह जालंधर में किसी स्थान पर छिपा बैठा है. इस के बाद फैजाबाद, उत्तर प्रदेश की अदालत ने फैक्स द्वारा जालंधर देहात के एसएसपी नवजोत सिंह माहल को रविंदर कौर के पति जगजीत सिंह बग्गा को ढूंढने का आदेश दिया था.

अदालत के आदेश पर पंजाब पुलिस का एक्शन

उक्त फैक्स मिलने के बाद एसएसपी नवजोत सिंह माहल ने जालंधर देहात क्षेत्र के थाना लांबड़ा के थानाप्रभारी एसआई पुष्प बाली को उक्त फैक्स देते हुए आरोपी को शीघ्र तलाश कर अरेस्ट करने के आदेश दिए. एसआई पुष्प बाली को यह आदेश 24 सितंबर, 2019 को प्राप्त हुआ और उसी दिन से उन्होंने आरोपी की तलाश शुरू कर दी.

25 सितंबर को रविंदर कौर थाना लांबड़ा पहुंची और एसआई पुष्प बाली से मिल कर हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना की कि अगर उस के पति जगजीत को शीघ्र न ढूंढा गया तो निर्दोष होते हुए भी आने वाली 10 अक्तूबर को अपने पति की हत्या के आरोप में उसे और उस के परिवार को जेल जाना पड़ेगा. रविंदर कौर ने जांच अधिकारी को अपने पति जगजीत सिंह के लापता होने का शुरू से अंत तक का सारा मामला समझाया और वह फोन नंबर भी दिया, जिस से कुछ दिन पहले उसे जालंधर से पति का फोन आया था.

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एसआई पुष्प बाली ने उस फोन नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवा कर जांच की. वह फोन किसी आटो वाले का था. उन्होंने आटो वाले को बुला कर उस से लंबी पूछताछ की.

आटो वाले ने बताया, ‘‘साहब, गांव सिंघा में हरनेक ढाबे पर काम करने वाले एक आदमी ने उस से फोन मांग कर काल की थी.’’

समय न गंवाते हुए पुष्प बाली हरनेक ढाबे पर पहुंच गए. उन के साथ रविंदर कौर भी थी. जांच अधिकारी ने ढाबे पर काम करने वाले सभी लोगों को अपने सामने खड़ा किया तो रविंदर कौर एक आदमी को बड़े गौर से देखने लगी. वह उस के पति की तरह लग रहा था, लेकिन वह उसे एकाएक नहीं पहचान पा रही थी.

वजह यह कि जगजीत सिंह 11 साल पहले जब घर से लापता हुआ था, तब उस के सिर पर बाल और पगड़ी थी और वह पूरी तरह तंदुरुस्त था, जबकि सामने खड़ा कमजोर सा मोना व्यक्ति किसी भी रूप में उस का पति नहीं लग रहा था. काफी देर तक दोनों मौन खड़े एकदूसरे को देखते रहे. यह दृश्य किसी की भी आत्मा को झकझोर देने वाला था. कुछ देर बाद उस व्यक्ति ने रविंदर कौर को पुकारा, ‘‘सोनी…’’

सामने खड़े व्यक्ति के मुंह से यह शब्द सुनते ही रविंदर कौर के सब्र का बांध टूट गया और वह फूटफूट कर रोते हुए जगजीत सिंह से लिपट गई. इस के बाद पुलिस ने जगजीत सिंह को हिरासत में ले लिया.

जब रविंदर और जगजीत की शादी हुई थी, तब वे हनीमून मनाने शिमला गए थे और जगजीत ने प्यार से रविंदर कौर का नाम सोनी रखा था. इतना ही नहीं, उस ने अपनी बाजू पर सोनू और सोनी गुदवाया भी था. पुरानी यादें एक बार फिर से ताजा हो गई थीं.

पति के मिल जाने के बाद रविंदर कौर ने थाने से ही फोन कर जगजीत की बात अपने बेटों हरप्रीत बग्गा और हरमीत बग्गा से करवाई. बेटों की आवाज सुन कर जगजीत काफी भावुक हो गया था. जिस समय उस ने घर छोड़ा था, तब हरप्रीत 5 साल का था जो अब 17 साल का गबरू जवान हो गया था.

थानाप्रभारी पुष्प बाली ने किया कमाल

इस मामले को हल करने में थानाप्रभारी पुष्प बाली को इतनी खुशी और आत्मसंतोष मिला, जितना उन्हें अपनी पूरी नौकरी के दौरान नहीं मिला था. दो बिछड़े हुओं को मिलाना और 4 निर्दोषों को सजा से बचाना बहुत बड़ी बात थी.

वैसे तो इस मामले में थानाप्रभारी पुष्प बाली का कोई वास्ता नहीं था. उन का काम सिर्फ इतना था कि वे अदालत के आदेश को मान कर जगजीत सिंह को फैजाबाद की अदालत तक पहुंचाएं. पर मामला इतना दिलचस्प था कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण की जगजीत सिंह और रविंदर कौर से पूछताछ की. पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह कम चौंकाने वाली नहीं थी.

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गुरुनानक नगर, थाना कोतवाली, रायबरेली, उत्तर प्रदेश में करोड़ों की चलअचल संपत्ति का मालिक जगजीत सिंह बग्गा उर्फ सोनू सिर्फ अपनी पत्नी को फंसाने के लिए ढाबे पर बरतन साफ कर रहा था. सोनू के पिता का वहां पर कपड़े का बड़ा कारोबार था. खुद की फैक्ट्री लगी हुई थी. वहां पर वह ऐश की जिंदगी जीता था.

शादी के कुछ सालों बाद पत्नी के साथ विवाद शुरू हुआ तो उस ने पत्नी से तलाक मांगा. पत्नी ने तलाक देने से मना कर दिया तो वह वहां से भाग कर जालंधर आ गया और थाना लांबड़ा के अंतर्गत मुद्दा गांव में एक ढाबे पर बरतन मांजने की नौकरी करने लगा.

3 साल तक मुद्दा गांव में ढाबे पर काम करने के बाद वह नौकरी छोड़ कर गांव सिंघा में हरनेक ढाबे पर बरतन मांजने का काम करने लगा. ढाबे पर उसे 4 हजार रुपए पगार के साथसाथ खाना और कपड़े मिल रहे थे, जिन से वह अपना गुजारा कर रहा था.

जांच में सामने आया कि जगजीत के परिजनों को पता था कि वह जालंधर, लांबड़ा के सिंघा गांव में है. उस ने अपने परिवार वालों से अपनी बदहाली की बात इसलिए कभी नहीं बताई थी कि कहीं वे आर्थिक मदद न भेज दें और फंस जाए. यहां तक कि वह अपने पिता या परिवार के किसी सदस्य से जब भी बात करता था तो रिश्तेदारों के फोन पर करता था. उसे डर था कि कहीं परिवार के फोन के जरिए पुलिस उस तक न पहुंच जाए.

जगजीत कुछ महीने पहले से अपनी पत्नी रविंदर कौर को अलगअलग नंबरों से फोन करता रहता था. इस के लिए वह ढाबे पर आने वाले ट्रक ड्राइवरों से मोबाइल मांग लेता था. इसीलिए पुलिस उस का फोन ट्रेस नहीं कर पाई थी. आखिरी काल उस ने एक आटो वाले के फोन से की थी, उसी के जरिए वह पकड़ में आ गया था.

अपनी ही गलती से पकड़ा गया जगजीत

आखिरी काल में जगजीत ने रविंदर कौर से कहा था, ‘‘तुम मेरे घर वालों को बिना वजह क्यों तंग कर रही हो. मैं जिंदा हूं. इस समय कहां हूं, यह नहीं बताऊंगा. अगर किसी में दम है तो ढूंढ कर दिखाए.’’ इतनी बात कह कर उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी थी.

दरअसल रविंदर कौर ने जगजीत और उस के परिवार वालों पर खर्चे का जो केस डाल रखा था, वह जीत गई थी और उस के पिता को अदालत में साढ़े 4 लाख रुपए जमा करने थे.

इस से पहले जगजीत सिंह जब भी पत्नी को फोन करता था तो वह अपना नाम नहीं बताता था. रविंदर कौर केवल आवाज से ही पहचान पाती थी कि वह उस के पति की आवाज है. लेकिन इस बार उस ने रविंदर से बात करते समय साबित कर दिया था कि वह जगजीत ही है.

पति के जीवित होने की पुष्टि हो जाने के बाद रविंदर कौर बहुत खुश हुई क्योंकि 10 अक्तूबर को इस मामले में सजा जो सुनाई जाने वाली थी. रविंदर ने पति के जीवित होने की बात अपने वकील के माध्यम से फैजाबाद कोर्ट को बता दी. कोर्ट ने इस बाबत जालंधर देहात के एसएसपी को फैक्स भेज कर जगजीत सिंह का पता लगाने के आदेश दिए.

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जगजीत सिंह के मिल जाने के बाद जालंधर देहात के एसएसपी नवजोत सिंह माहल ने इस की जानकारी फैजाबाद की अदालत को दे दी. फैजाबाद अदालत की तरफ से एसएसपी माहल को ईमेल आया कि वह पुलिस कस्टडी में पूरी सुरक्षा के साथ जगजीत सिंह व रविंदर कौर को फैजाबाद अदालत में पेश करें, इस का पूरा खर्च अदालत वहन करेगी.

थानाप्रभारी ने कागजी काररवाई पूरी करने के बाद 28 सितंबर, 2019 को जगजीत सिंह को फैमिली कोर्ट, फैजाबाद में पेश किया. वहां से उसे रायबरेली की ट्रायल कोर्ट में पेश किया गया.

हर अपराधी को यह गलतफहमी होती है कि उस ने जो अपराध किया है, उसे कोई पकड़ नहीं सकता. जैसेजैसे समय गुजरता है, वैसेवैसे अपराधी का आत्मविश्वास भी बढ़ने लगता है. यही गलतफहमी जगजीत सिंह उर्फ सोनू को भी थी और वह गलती कर बैठा. लेकिन उस की इस गलती ने 4 निर्दोष लोगों को जेल जाने से बचा लिया था. – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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