मां, पराई हुई देहरी तेरी: भाग 2

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भाग- 2

मां जैसे बचपन में मेरे चेहरे की एकएक रेखा पढ़ लेती थीं, वैसे ही उन्होंने अब भी मेरे चेहरे की भाषा पढ़ ली है. वह भैया को हलकी सी झिड़की देती हैं, ‘‘तू कैसा भाई है, अपनी तरफ से ही बहन के न आ सकने की मजबूरी बता रहा है. तभी तो हमारे लोकगीतों में कहा गया है, ‘माय कहे बेटी नितनित आइयो, बाप कहे छह मास, भाई कहे बहन साल पीछे आइयो…’’’ वह आगे की पंक्ति ‘भाभी कहे कहा काम’ जानबूझ कर नहीं कहतीं.

‘‘मां, मेरा यह मतलब नहीं था.’’ अब भैया का चेहरा देखने लायक हो रहा है, लेकिन मैं व विनय जोर से हंस कर वातावरण हलकाफुलका कर देते हैं.

मैं चाय पीते हुए देख रही हूं कि मां का चेहरा इन 10 महीनों में खुशी से कितना खिलाखिला हो गया है. वरना मेरी शादी के बाद उन की सूरत कितनी बुझीबुझी रहती थी. जब भी मैं बनारस से यहां आती तो वह एक मिनट भी चुप नहीं बैठती थीं. हर समय उत्साह से भरी कोई न कोई किस्साकहानी सुनाने में लगी रहती थीं.

‘‘मां, आप बोलतेबोलते थकती नहीं हैं.’’ मैं चुटकी लेती.

‘‘तू चली जाएगी तो सारे घर में मेरी बात सुनने वाला कौन बचेगा? हर समय मुंह सीए बैठी रहती हूं. मुझे बोलने से मत मना कर. अकेले में तो सारा घर भांयभांय करता रहता है.’’

‘‘तो भैया की शादी कर दीजिए, दिल लग जाएगा.’’

‘‘बस, उसी के लिए लड़की देखनी है. तुम भी कोई लड़की नजर में रखना.’’

कभी मां को मेरी शादी की चिंता थी. उन दिनों तो उन के जीवन का जैसे एकमात्र लक्ष्य था कि किसी तरह मेरी शादी हो. लेकिन वह लक्ष्य प्राप्त करने के बाद उन का जीवन फिर ठिठक कर खड़ा हो गया था. कैसा होता है जीवन भी.  एक पड़ाव पर पहुंच कर दूसरे पड़ाव पर पहुंचने की हड़बड़ी स्वत: ही अंकुरित हो जाती है.

‘‘मां, लगता है अब आप बहुत खुश हैं?’’

‘‘अभी तो तसल्ली से खुश होने का समय भी नहीं है. नौकर के होते हुए भी मैं तो मुन्ने की आया बन गई हूं. सारे दिन उस के आगेपीछे घूमना पड़ता है,’’ वह मुन्ने को रात के 10 बजे अपने बिस्तर पर लिटा कर उस से बातें कर रही हैं. वह भी अपनी काली चमकीली आंखों से उन के मुंह को देख रहा है. अपने दोनों होंठ सिकोड़ कर कुछ आवाज निकालने की कोशिश कर रहा है. तनु भी नानी के पास आलथीपालथी मार कर बैठा हुआ है. वह इसी चक्कर में है कि कब अपनी उंगली मुन्ने की आंख में गड़ा दे या उस के गाल पर पप्पी ले ले.

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‘‘मां, 10 बज गए,’’ मैं जानबूझ कर कहती हूं क्योंकि मां की आदत है, जहां घड़ी पर नजर गई कि 10 बजे हैं तो अधूरे काम छोड़ कर बिस्तर में जा घुसेंगी क्योंकि उन्हें सुबह जल्दी उठने की आदत है.

‘‘10 बज गए तो क्या हुआ? अबी अमाला मुन्ना लाजा छोया नहीं है तो अम कैसे छो जाएं?’’ मां जानबूझ कर तुतला कर बोलते हुए स्वयं बच्चा बन गई हैं.

थोड़ी देर में मुन्ने को सुला कर मां ढोलक ले कर बैठ जाती हैं, ‘‘चल, आ बैठ. 5 जच्चा शगुन की गा लें, आज दिन भर वक्त नहीं मिला.’’

मैं उबासी लेते हुए उन के पास नीचे फर्श पर बैठ जाती हूं. उन्हें रात के 11 बजे उत्साह से गाते देख कर सोच रही हूं कि कहां गया उन का जोड़ों या कमर का दर्द. मां को देख कर मैं किसी हद तक संतुष्ट हो उठी हूं, अब कभी बनारस में अपने सुखद क्षणों में यह टीस तो नहीं उठेगी कि वह कितनी अकेली हो गई हैं. मेरा यह अनुभव तो बिलकुल नया है कि मां मेरे बिना भी सुखी हो सकती हैं.

नामकरण संस्कार वाले दिन सुबह तो घरपरिवार के लोग ही जुटे थे. भीड़ तो शाम से बढ़नी शुरू होती है. कुछ औरतों को शामियाने में जगह नहीं मिलती, इसलिए वे घर के अंदर चली आ रही हैं. खानापीना, शोरशराबा, गानाबजाना, उपहारों व लिफाफों को संभालते पता ही नहीं लगता कब साढ़े 11 बज गए हैं.

मेहमान लगभग जा चुके हैं. कुछ भूलेभटके 7-8 लोग ही खाने की मेज के इर्दगिर्द प्लेटें हाथ में लिए गपशप कर रहे हैं. बैरों ने तंग आ कर अपनी टोपियां उतार दी हैं. वे मेज पर रखे डोंगों, नीचे रखी व शामियाने में बिखरी झूठी प्लेटों व गिलासों को समेटने में लगे हुए हैं.

तभी एक बैरा गुलाब जामुन व हरी बरफी से प्लेट में ‘शुभकामनाएं’ लिख कर घर के अंदर आ जाता?है. लखनऊ वाली मामी बरामदे में बैठी हैं. वह उन्हीं से पूछता है, ‘‘बहूजी कहां हैं, जिन के बच्चे की दावत है?’’

तभी सारे घर में बहू की पुकार मच उठती है. भाभी अपने कमरे में नहीं हैं. मुन्ना तो झूले में सो रहा है. मैं भी उन्हें मां, पिताजी के कमरे में तलाश आती हूं.

तभी मां मुझे बताती हैं, ‘‘मैं ने ही उसे ऊपर के कमरे में कपड़े बदलने भेजा है. बेचारी साड़ी व जेवरों में परेशान हो रही थी.’’

मैं ऊपर के कमरे के बंद दरवाजे पर ठकठक करती हूं, ‘‘भाभी, जल्दी नीचे उतरिए, बैरा आप का इंतजार कर रहा है.’’

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भाभी आहिस्ताआहिस्ता सीढि़यों से नीचे उतरती हैं. अभी उन्होंने जेवर नहीं उतारे हैं. उन के चलने से पायलों की प्यारी सी रुनझुन बज रही है.

‘‘बहूजी, हमारी शुभकामनाएं लीजिए,’’ बैरा सजी हुई प्लेट लिए आंगन में आ कर भाभी के आगे बढ़ाता?है. भाभी कुछ समझ नहीं पातीं. मामी बरामदे में निक्की की चोटी गूंथते हुए चिल्लाती हैं, ‘‘बहू, इन को बख्शीश चाहिए.’’

‘‘अच्छा जी,’’ भाभी धीमे से कह कर अपने कमरे में से पर्स ले आती हैं.

अब तक मां के घर के हर महत्त्वपूर्ण काम में मुझे ही ढूंढ़ा जाता रहा है कि मीनू कहां है? मीनू को बुलाओ, उसे ही पता होगा. मैं…मैं क्यों अनमनी हो उठी हूं. क्या सच में मैं यह नहीं चाह रही कि बैरा प्लेट सजा कर ढूंढ़ता फिरे कि इस घर की बेटी कहां है?

‘‘21 रुपए? इतने से काम नहीं चलेगा, बहूजी.’’

भाभी 51 रुपए भी डालती हैं लेकिन वह बैरा नहीं मानता. आखिर भाभी को झुकना पड़ता है. वह पर्स में से 100 रुपए निकालती हैं. बैरे को बख्शीश देता हुआ उन का उठा हुआ हाथ मुझे लगता है, जिस घर के कणकण में मैं रचीबसी थी, जिस से अलग मेरी कोई पहचान नहीं थी, अचानक उस घर की सत्ता अपनी समग्रता लिए फिसल कर उन के हाथ में सिमट आई है. न जाने क्यों मेरे अंदर अकस्मात कुछ चटखता है.

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मध्यांतर भी नहीं हुआ अभी: भाग 1

‘‘आपका परिवार कहां है, सोम? अब तो बच्चे बड़े हो गए होंगे. मैं ने तो सोचा भी नहीं था, इस तरह अचानक हमारा मिलना हो जाएगा.’’

‘‘सब के सामने आप यह कैसा सवाल पूछने लगी हैं, चंद्राजी. कहां के बच्चे… कैसे बच्चे…अभी तो हमारी उम्र खेलनेखाने की है.’’

चंद्रा के चेहरे की मुसकान फैलतेफैलते रुक गई. उस ने आगेपीछे देखा मानो जो सुना उसी पर अविश्वास करने के लिए किसी का समर्थन चाहती हो. उस ने गौर से मेरा चेहरा देखा और बोली, ‘‘अरे भई, बाल काले कर लेना कोई बड़ी बात नहीं. उम्र छिपा कर दिखाओ तो मानें. आंखों का बढ़ता नंबर और चाल में आए ठहराव को छिपाया नहीं जा सकता. हां, अगर अपना नाम ही बदल लो तो मैं मान लूंगी कि पहचानने में मैं ही भूल कर गई हूं. आप सोम नहीं हैं न?’’

चंद्रा के शब्दों का तर्क आज भी वही है जो बरसों पहले था. वह आज भी उतनी ही सौम्य है जितनी बरसों पहले थी. बल्कि उम्र के साथ पहले से भी कहीं ज्यादा गरिमामय लग रहा है चंद्रा का स्वरूप. मुसकरा पड़ा मैं. हाथ बढ़ा कर चंद्रा का सर थपथपा दिया.

‘‘याद है तुम मुझे क्या कहा करती थीं जब हम पीएच.डी. कर रहे थे. वह आदत आज भी बदली नहीं. निहायत निजी बातें तुम सब के सामने पूछने लगती हो…’’

‘‘पहचान लिया है मैं ने. आज भी मेरे पापा की तरह सर थपथपा रहे हो. तब भी तुम मुझे मेरे पापा जैसे लगते थे…आज भी वैसे ही हो…तुम जरा भी नहीं बदले हो, सोम.’’

20-22 साल पुरानी दोस्ती और सौहार्द्र आंखों में नमी बन कर तैरने लगा था. सुबह से सेमिनार में व्यस्त था. पहचान तो बहुत लोगों से थी लेकिन कोई अपना सा पा कर यों लगने लगा है जैसे बुझते दिए में किसी ने तेल डाल दिया हो.

‘‘तुम कहां ठहरी हो, चंद्रा?’’

‘‘यहीं होस्टल में ही हमारा इंतजाम किया गया है.’’

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‘‘भूख नहीं लगी तुम्हें, 7 बज रहे हैं. आओ, चलो मेरे साथ…कुछ खा कर आते हैं.’’

मैं ने कहा तो साथ चल पड़ी चंद्रा. हम ने टैक्सी पकड़ी और 5-10 मिनट बाद ही हम उसी जगह पर खडे़ थे जहां अकसर 20-22 साल पहले हमारा गु्रप खानेपीने आया करता था.

‘‘क्या खाओगी, चंद्रा, बोलो?’’

‘‘कुछ भी हलकाफुलका मंगवा लो. भारी खाना मुझे पचता नहीं है.’’

‘‘मैं भी मीठा नहीं ले पाऊंगा, शुगर का मरीज हूं. इसीलिए भूख सह नहीं पाता. मुझे घबराहट होने लगती है.’’

डोसा और इडली मंगवा लिया चंद्रा ने. कुछ पेट में गया तो शरीर की झनझनाहट कम हुई.

‘‘तुम्हें खाने की कोई चीज पास रखनी चाहिए थी, सोम.’’

‘‘क्या पास रखनी चाहिए थी? यह देखो, है न पास में. अब क्या इन से पेट भर सकता है?’’

जेब से मीठीनमकीन टाफियां निकाल सामने रख दीं मैं ने. दोपहर में खाना खाया था. उस के बाद सेमिनार इतना लंबा ख्ंिच गया कि शाम के 7 बज गए. 6 घटे में क्या मेरी तबीयत खराब नहीं हो जाती.

मुसकरा पड़ी चंद्रा, ‘‘इस का मतलब है अब हम बूढे़ हो गए हैं. तुम्हें शुगर है, मेरा जिगर ठीक से काम नहीं करता. लगता है हमारी एक्सपायरी डेट पास आ रही है.’’

‘‘नहीं तो, ऐसा क्यों सोचती हो. हम बूढे़ नहीं हो रहे बडे़ हो रहे हैं, ऐसा सोचो. जीवन का सार हमारे सामने है. बीता कल अपना अनुभव लिए है जिस का उपयोग हम भविष्य को सुधारने में लगा सकते हैं.’’

पुरानी बातों का सिलसिला चला और खूब चला. चंद्रा के साथ विश्वविद्यालय के भव्य पार्क में हम रात 10 बजे तक बैठे रहे.

‘‘अच्छा समय था वह भी. बहुत याद आता है वह एकएक पल,’’ ठंडी सांस ली थी चंद्रा ने.

‘‘क्या बीता समय लौटाया नहीं जा सकता?’’

‘‘हमारे बच्चे हमारा बीता कल ही तो हैं, जो हमें नहीं मिला वह बच्चों को दिला कर हम अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं. जीवन इसी का नाम है…पुराना गया नया आया.’’

मुझे होटल तक पहुंचतेपहुंचते साढ़े 10 बज गए. मैं थक गया हूं फिर भी मन प्रफुल्लित है. अपनी सहपाठी से जो मिला हूं इतने बरसों बाद. बहुत अच्छी दोस्ती थी मेरी चंद्रा के साथ. अच्छे इनसान अकसर कम होते हैं और इन्हीं कम लोगों में अकसर मैं चंद्रा की गिनती  किया करता था. कभीकभी हमारे बीच झगड़ा भी हो जाया करता था जिस की वजह हमारी निजी कमी नहीं होती थी. उसूलों की धनी थी चंद्रा और यही उसूल अकसर टकरा जाते थे.

मैं कभी चंद्रा को झुकने को कह देता तो उस का जवाब होता था, ‘‘मैं केंचुआ बन कर नहीं जी सकती. प्रकृति ने मुझे रीढ़ की हड्डी दी है न. मैं वैसी ही हूं जैसी मुझ से प्रकृति उम्मीद करती है.’’

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‘‘तुम्हारी फिलासफी मेरी समझ में नहीं आती.’’

‘‘तो मत समझो, तुम जैसे हो रहो न वैसे. मैं ने कब कहा मुझे समझो.’’

7-8 लड़केलड़कियों का गु्रप था हमारा जिस में हर स्वभाव का इंसान था… बस, चंद्रा ही थी जो अपनी सीमाओं, अपनी दलीलों में बंधी थी.

मैं चंद्रा की नसनस से वाकिफ था. उस के चरित्र और बातों में गजब की पारदर्शिता थी, न कहीं कोई लागलपट न हेरफेर. कभी कोई गोलमोल बात करने लगता तो वह झुंझला जाती.

‘‘यह जलेबी क्यों पका रहे हो? सीधी तरह मुद्दे की बात पर क्यों नहीं आते…साफसाफ कहो क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘कोई भी बात कभीकभी इतनी सीधी सरल नहीं न होती चंद्रा जिसे हम झट से कह दें…कुछ बातें छिपानी भी पड़ती हैं.’’

‘‘तो छिपाओ उन्हें, आधीअधूरी भी क्यों बतानी. तुम्हें अगर लगता है बात छिपाने वाली है तो सब के सामने उस का उल्लेख भी क्यों करना. पूरी तरह छिपा लो न.’’

मुझे आज भी याद है जब हम आखिरी बार मिले थे तब भी झगड़ कर ही अलग हुए थे. वह दिल्ली लौट गई थी और मैं आगरा. उस के बाद कभी नहीं मिले थे. उस की शादी की खबर मिली थी जिस पर इक्कादुक्का मित्र ही पहुंच पाए थे.

दूसरे दिन विश्वविद्यालय पहुंचे तो नजरें चंद्रा को ही खोजती रहीं. कहने को तो ढेर सारी बातें कल हम ने की थीं लेकिन अपनी निजी एक भी बात हम नहीं कर पाए थे.

‘‘किसे खोज रहे हैं, वर्माजी? किसी का इंतजार है क्या?’’

मेरी नजरों को भांप गए थे मेरे एक सहयोगी.

‘‘हां, वह मेरी सहपाठी मिल गई थीं कल मुझे. आज भी उन्हीं को खोज रहा हूं.’’

‘‘लंचब्रेक में ढूंढ़ लीजिएगा. अभी जरा इन की बातें सुनिए. इन की बातों का मैं सदा ही कायल रहता हूं. मिसेज गोयल की फिलासफी कमाल की होती है. कभी इन के लेख नहीं पढे़ आप ने…कमाल की सोच है.’’

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

मध्यांतर भी नहीं हुआ अभी: भाग 2

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‘‘जरा किस्मत देखो, पति शादी के 5 साल बाद अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ भाग गया. औलाद कोई है नहीं. अफसोस होता है मुझे श्रीमती गोयल के लिए.’’

काटो तो रक्त नहीं रहा मेरी शिराओं में. आंखें फाड़फाड़ कर मैं अपने सहयोगी का चेहरा देखने लगा जो बड़बड़ा भी रहा था और बड़ी रुचि ले कर चंद्रा को सुन भी रहा था. इस सत्य का इतना बड़ा धक्का लगेगा मुझे मैं नहीं जानता था. ब्लड प्रेशर का मरीज तो हूं ही मैं, उसी का दबाव इतना बढ़ गया कि लंच बे्रेक तक पहुंच ही नहीं पाया मैं. तबीयत इतनी ज्यादा खराब हो गई कि अस्पताल में जा कर ही मेरी आंख खुली.

‘‘सोम, क्या हो गया तुम्हें? क्या सुबह कुछ परेशानी थी?’’

चंद्रा ही तो थी मेरे पास. इतने लोगों की भीड़ में बस चंद्रा. शायद 22 वर्ष पुरानी दोस्ती का ही नाता था जिस का प्रभाव चंद्रा की आंखों में था. माथे पर उस का हाथ और शब्दों में ढेर सारी चिंता.

‘‘अब कैसे हो, सोम?’’

50 के आसपास पहुंच चुका हूं मैं. वर्माजी, वर्मा साहब सुनसुन कर कान इतने पथरा गए हैं कि अपना नाम याद ही नहीं था मुझे. मांबाप अब जिंदा नहीं हैं और छोटी बहन भाई कह कर पुकारती है. बरसों बाद कोई नाम से पुकार रहा है. कल से यही आवाज है जो कानों में रस घोल रही है और आज भी यही आवाज है जो संजीवनी सी घुल रही है कानों में.

‘‘सोम, क्या हुआ? तुम्हारे घर में सब ठीक तो हैं न…क्या परेशानी है…मुझ से बात करो.’’

क्या बात करूं मैं चंद्रा से? समझ नहीं पा रहा हूं क्या कहूं. डाक्टर ने आ कर मेरी पूरी जांच की और बताया… अभी भी मैं पूरी तरह सामान्य नहीं हूं. सुबह तक यहीं रुकना होगा.

‘‘तुम्हारे घर से बुला लूं किसी को, तुम्हारी पत्नी को, बच्चों को, अपने घर का नंबर दो.’’

अधिकार के साथ आज भी चंद्रा ने मेरा सामान टटोला और मेरा कार्ड निकाल कर घर का नंबर मिलाया. एक बार 2 बार, 10 बार.

‘‘कोई फोन नहीं उठा रहा. घर पर कोई नहीं है क्या?’’

मैं ने इशारे से चंद्रा को पास बुलाया. बड़ी हिम्मत की मुसकराने में.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है. सब ठीक है…’’

‘‘तो कोई फोन क्यों नहीं उठाता. तुम भी परेशान हो और मुझ से कुछ छिपा रहे हो?’’

‘‘हमारे पास छिपाने को है ही क्या, चंद्रा? तुम भी खाली हाथ हो और मैं भी. मेरे घर पर जब कोई है ही नहीं तो फोन का रिसीवर कौन उठाएगा.’’

‘‘क्या मतलब?’’

अब चौंकने की बारी चंद्रा की थी. हंसने लगा मैं. तभी हमारे कुछ सहयोगी मुझे देखने चले आए. मुझे हंसते देखा तो आंखें तरेरने लगे.

‘‘वर्माजी, यह क्या तमाशा है. हमें दौड़ादौड़ा कर मार दिया और आप यहां तमाशा करने में लगे हैं.’’

‘‘इन के परिवार का पता है क्या आप के पास? कृपया मुझे दीजिए. मैं इन की पत्नी को बुला लेना चाहती हूं. ऐसी हालत में उन का यहां होना बहुत जरूरी है.’’

पलट कर चंद्रा ने उन आने वालों से सारी बात करना उचित समझा. कुछ पल को चुप हो गए सब के सब. बारीबारी से एकदूसरे का चेहरा देखा और सहसा सब सच सुना दिया.

‘‘इन की तो शादी ही नहीं हुई… पत्नी का पता कहां से लाएंगे…वर्माजी, आप ने इन्हें बताया नहीं है क्या?’’

‘‘अपनी सहपाठी से इतने सालों बाद मिले, कल रात देर तक पुरानी बातें भी करते रहे तो क्या आप ने अपने बारे में इतना सा भी नहीं बताया?’’

‘‘इन्होंने पूछा ही नहीं, मैं बताता कैसे?’’

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‘‘श्रीमती गोयल, आप वर्माजी के साथ पढ़ती थीं. ऐसी कौन लड़की थी जिस की वजह से वर्माजी ने शादी ही नहीं की. क्या आप को जानकारी है?’’

‘‘नहीं तो, ऐसी तो कोई नहीं थी. मुझे तो याद नहीं है…क्यों सोम? कौन थी वह?’’

‘‘सब के सामने क्यों पूछती हो. कुछ तो मेरी उम्र का खयाल करो. तुम्हारी यह आदत मुझे आज भी अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘कौन थी वह, सोम? जिस का मुझे ही पता नहीं चला.’’

‘‘बस, हो गया न मजाक,’’ मैं जरा सा चिढ़ गया.

‘‘तुम जाओ चंद्रा. मैं अब ठीक हूं. यह लोग रहेंगे मेरे पास.’’

‘‘कोई बात नहीं. मैं भी रहूंगी यहां. कुछ मुझे भी तो पता चले, आखिर इस उच्च रक्तचाप का कारण क्या है. कोई चिंता नहीं, कोई तनाव नहीं, कल ठीक थे न तुम, आज सुबहसुबह ऐसा क्या हो गया कि सीधे यहीं आ पहुंचे.’’

मैं ने चंद्रा को बहुत समझाना चाहा लेकिन वह गई नहीं. सच यह भी है कि मन से मैं भी नहीं चाहता था कि वह चली जाए. उथलपुथल का सैलाब जितना मेरे अंदर था शायद उस से भी कुछ ज्यादा अब उस के मन में होगा.

सब चले गए तो हम दोनों रह गए. वार्ड ब्वाय मेरा खाना दे गया तो उसे चंद्रा ने मेरे सामने परोस दिया.

‘‘आज सुबह ही मुझे तुम्हारे बारे में पता चला कि श्रीमती गोयल तुम हो…तुम्हारे साथ इतना सब बीत गया. उसी से दम इतना घुटने लगा था कि समझ ही नहीं पाया, क्या करूं.’’

अवाक् सी चंद्रा मेरा चेहरा देखने लगी.

‘‘तुम्हारे सुखी भविष्य की कल्पना की थी मैं ने. तुम मेरी एक अच्छी मित्र रही हो. जब भी तुम्हें याद किया सदा हंसती मुद्रा में नजर आती रही हो. तुम्हारे साथ जो हो गया तुम उस लायक नहीं थीं.

‘‘मैं तुम्हारा सिर थपथपाया करता था और तुम मुझे ‘पापा’ कह कर चिढ़ाती थीं. आज ऐसा ही लगा मुझे जैसे मेरे किसी बच्चे का जीवन नर्क हो गया और मैं जान ही नहीं पाया.’’

‘‘वे सब पुरानी बातें हैं, सोम, लगभग 17-18 साल पुरानी. इतनी पुरानी कि अब उन का मुझ पर कोई असर नहीं होता तो तुम ने उन्हें अपने दिल पर क्यों ले लिया? वह इनसान मेरे लायक नहीं था. इसीलिए वहीं चला गया जहां उस की जगह थी.’’

उबला दलिया अपने हाथों से खिलातेखिलाते गरदन टेढ़ी कर चंद्रा हंस दी.

‘‘तुम छोटे बच्चे हो क्या सोम, जो इतनी सी बात पर इतने परेशान हो गए. जीवन में कई बार गलत लोग मिल जाते हैं, कुछ देर साथ रह कर पता चलता है हम तो ठीक दिशा में नहीं जा रहे… सो रास्ता बदल लेने में क्या बुराई है.’’

‘‘रास्ता ही खो जाए तो?’’

‘‘तो वहीं खडे़ रहो, कोई सही इनसान आएगा… सही रास्ता दिखा देगा.’’

‘‘दुखी नहीं होती हो, चंद्रा.’’

‘‘कम से कम अपने लिए तो कभी नहीं होती. खुशनसीब हूं…मेरे पास कुछ तो है. दालरोटी मिल रही है…समाज में मानसम्मान है…ढेरों पत्र आते हैं जो मुझे अपने बच्चों जैसे प्यारे लगते हैं. इतने साल कट गए हैं सोम, आगे भी कट ही जाएंगे. जो होगा देख लेंगे.’’

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‘‘बस चंद्रा, और खाया नहीं जाएगा,’’ पतला दलिया मेरे गले में सूखे कौर जैसा अटकने लगा था. उस का हाथ रोक लिया मैं ने.

‘‘शुगर के मरीज हो न, भूखे रहोगे तो शुगर कम हो जाएगी…अच्छा, एक और चीज है मेरे पास तुम्हारे लिए…सुबह होस्टल में ढोकला बना था तो मैं ने तुम्हारे लिए पैक करवा लिया था…सोचा, क्या पता आज फिर से सेमिनार लंबा ख्ंिच जाए और तुम भूख से परेशान हो कर कुछ खाने को बाहर भागो.’’

‘‘मेरी इतनी चिंता रही तुम्हें?’’

‘‘अब अपना है कौन जिस की चिंता करूं? कल बरसों बाद अपना नाम तुम्हारे होंठों से सुना तो ऐसा लगा जैसे कोई आज भी ऐसा है जो मुझे नाम से पुकार सकता है. कोई आज भी ऐसा है जो बिना किसी बनावट के बात शुरू भी कर सकता है और समाप्त भी. बहुत चैन मिला था कल तुम से मिल कर. सुबह नाश्ते में भी तुम्हारा खयाल आया.’’

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

धोनी की EX-गर्लफ्रेंड रह चुकी हैं ये साउथ एक्ट्रेस, बिकिनी गर्ल के नाम से हैं फेमस

साउथ फिल्मों की जानी मानी और पौपुलर एक्ट्रेस राई लक्ष्मी (Raai Laxmi) ने बीते ही दिन यानी कि 5 मई 2020 को अपना 31वां जन्मदिन सेलिब्रेट किया. आपको बता दें, साउथ फिल्मों की ये एक्ट्रेस इंडियन क्रिकेट टीम के कैप्टन रह चुके महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) का भी दिल जीत चुकी हैं. जी हां खबरों की माने तो धोनी और राई लक्ष्मी एक साथ रिलेशनशिप में भी रह चुके हैं.

राई लक्ष्मी (Raai Laxmi) दिखने में बेहद ही खूबसूरत हैं और तो और उनकी बोल्डनेस (Boldness) का तो कोई जवाब ही नहीं. राई लक्ष्मी बिकिनी गर्ल के नाम से भी जानी जाती हैं और इस बात का अंदाजा उनकी फोटोज देख कर ही लगाया जा सकता है कि उन्हें बिकिनी (Bikini) पहनने का और बीच पर घूमने का कितना शौंक है.

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चलिए आपको दिखाते हैं राई लक्ष्मी (Raai Laxmi) की कुछ ऐसी ही हौट और बोल्ड फोटोज जिसे देख आप भी अपने आप पर काबू नहीं कर पाएंगे. जी हां, राई लक्ष्मी की पर्सनैलिटी है ही ऐसी की कोई भी उन्हें देख उनके प्यार में गिरने से खुद को रोक नहीं पाएगा.

 

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I dint change I just found myself. 🥰❤️ #mondaymotivation #mondayblues #sealove ❤️

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❤️❤️❤️

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Do what u love everyday 🧡 #WeekendVibes 😁

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Someone once said to me “I don’t know how you do it “ I told them “I wasn’t given a choice”☺️❤️💪

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🌹🌹🌹

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She remembered who she was and the game changed. ❤️❤️❤️ #selflove

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आपको बता दें, कि राई लक्ष्मी को बिकीनी (Bikini) और मोनोकिनी (Monokini) पहनना बेहद पसंद है. राई लक्ष्मी ने अब तक 50 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है और वे इस समय साउथ फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेसेस में से एक हैं. राई लक्ष्मी की खूबसूरती का अंदाजा तो आपने इन फोटोज को देख लगा ही लिया होगा और शायद यही कारण है कि उनके औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर 2.5 मिलियल से भी ज्यादा फौलोवर्स हैं.

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Lockdown में ऐसे फैंस का दिल बहला रही हैं मोनालिसा, शौर्ट ड्रेस में गिराई बिजलियां

भोजपुरी इंडस्ट्री (Bhojpuri Industry) की जानी मानी और बेहद पौपुलर एक्ट्रेस मोनालिसा (Monalisa) ज्यादातर सुर्खियों में बनी ही रहती हैं. मोनालिसा के फैंस उन्हें काफी पसंद करते हैं और उनकी हर फिल्म, हर वीडियो और यहां तक की हर फोटो पर भी फैंस जमकर प्यार बरसाते हैं और बहुत ही जल्द वायरल भी कर देते हैं. भोजपुरी फिल्मों की क्वीन (Bhojpuri Queen) मोनालिसा सोशल मीडिया (Social Media) पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ साथ वे अपने फैंस से जुड़ी रहती हैं.

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You Will Find Me chasing The Sun…. #goodmorning #beautiful #day #sunkissed #me #expression #happy #positivevibes

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि कोरोना वायरस (Corona Virus) जैसी बिमारी के चलते पूरा देश लौकडाउन (Lockdown) है, ऐसे में सभी फिल्मों और सीरियल्स की शूटिंग भी रुकी हुई है. इसी के चलते सभी एक्टर्स अपने अपने घरों में कैद हैं और सोशल मीडिया के जरिए ही अपने फैंस के साथ अपने दिल की बातें शेयर कर रहे हैं. लौकडाउन के चलते कोई भी अपनी मर्जी से कहीं नहीं घून पा रहा और ऐसा कहा जा सकता है कि अपने घरों में रह कर हर कोई अब परेशान हो चुका है.

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I Am A Scorpio, I Have Different Mood Swings …. Yesss Its Meeeee 🤷‍♀️…. #goodmorning #different #mood

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हाल ही में मोनालिसा (Monalisa) ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से अपनी कुछ फोटोज शेयर की हैं जिसमें वे अपने मूड स्विंग्स (Mood Swings) फैंस के सामने ला रही हैं. ऐसे में मोनालिसा अपनी हर फोटो में एक अलग ही एक्सप्रेशन (Expression) देती दिखाई दे रही हैं. किसी फोटो में वे हंस रहीं है किसी में वे शर्माती हुई नजर आ रही हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि मोनालिसा अपनी हर फोटो में इतनी खूबसूरत लग रही हैं कि किसी को भी उनसे प्यार हो जाए.

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मोनालिसा के फैंस उन्हें काफी पसंद करते हैं और उनकी हर फोटो पर उनकी तारीफों से भरे कमेंट्स करते रहते हैं. मोनालिसा अपनी हर एक्टिविटी सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस तक पहुंचाती ही रहती है. लौकडाउन में भी मोनालिसा अपनी फिटनेस का खूब खयाल रख रही हैं और इस बात का सबूत है उनकी योगा वीडियोज जो कि वे अपने सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं और साथ ही अपने फैंस को भी फिट रहने के लिए प्रेरित करती हैं.

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Lockdown 3.0 में इस भोजपुरी गायिका के हुए 2 गाने रिलीज, देखें Video

भोजपुरी बेल्ट में सबसे अपने भोजपुरी गानों से लोगों के दिलों पर राज करनें वाली अंतरा सिंह प्रियंका (Antra Singh Priyanka) के दो भोजपुरी गाने इस लौकडाउन 3.0 में रिलीज किये गये. जो रिलीज होते ही भोजपुरी बेल्ट में छा गए हैं. आजकल भोजपुरी बेल्ट के हर शख्स की जुबान पर यही गाने हैं.

अंतरा सिंह प्रियंका (Antra Singh Priyanka) का हाल ही में भोजपुरी के सर्वाधिक चर्चित गायकों और अभिनेताओं में शुमार रितेश पाण्डेय (Ritesh Pandey) के साथ “लॉकडाउन में लूडो” भोजपुरी वीडियो सौंग रिलीज किया गया है. इस वीडियो में रितेश पांडे (Ritesh Pandey) और अंतरा सिंह प्रियंका (Antra Singh Priyanka) नें अपनी आवाज दी है जिसके गीत आर. आर. पंकज (R.R. Pankaj) नें लिखें हैं.

गाने के संगीत निर्देशक आशीष वर्मा (Ashish Verma) और अरेंजर कैलाश जी और आशीष वर्मा हैं. इसे निर्देशन आशीष यादव (Ashish Yadav) और संपादन सोनू वर्मा (Sonu Verma) नें किया है. डिजिटल की जिम्मेदारी विक्की यादव (Vicky Yadav) नें निभाई है. इस भोजपुरी वीडियो सौंग को रिद्धि म्यूजिक वर्ल्ड (Riddhi Music World) के यूट्यूब चैनल पर रिलीज किया गया है. इस गाने को लोग बार-बार देख और सुन रहें हैं.

वहीं दूसरा भोजपुरी सौंग (Bhojpuri Song) कोरोना से कैंसिल वियाह हो गया (Corona Se Cancle Biyah Ho Gya) को भी इसी के साथ रिलीज किया गया है. जिसके गीत रौशन सिंह विश्वास (Raushan Singh Vishwas) नें लिखे हैं जब की संगीत प्रियांशु सिंह (Priyanshu Singh) नें दिया है. इसके प्रचार का डिजाइन गोपी बाथ (Gopi Bath) नें किया है और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी  गौरव सूरी (Gaurav Suri) नें निभाई है. इसे स्पीड रिकौर्ड्स भोजपुरी (Speed Records Bhojpuri) के यूट्यूब चैनल के प्लेटफार्म पर रिलीज किया गया है.

बीते साल अंतरा सिंह प्रियंका (Antra Singh Priyanka) का भोजपुरी वीडियो सॉंग (Bhojpuri Video Song) काफी पॉपुलर हुआ था जिसे अभी तक करोड़ो बार देखा जा चुका है. वहीं इस साल उनका गाना लहंगा लखनऊआ भी काफी हिट रहा था. आज के दौर में अंतरा सिंह प्रियंका (Antra Singh Priyanka) सभी मेल गायकों की पहली पसंद बनीं हुई हैं.

आईएएस रानी नागर का इस्तीफा: संगठित हिंदुत्व ने उजाडे ख्वाब

हरियाणा सरकार के सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग की अतिरिक्त निर्देशक रानी नागर ने कल सोशल मीडिया के माध्यम से अपना इस्तीफा भेज दिया. सामाजिक न्याय व अधिकार देने वाले विभाग की वरिष्ठ अधिकारी खुद सामाजिक न्याय की जंग हार गई.

रानी नागर ने जिस अधिकारी के ऊपर उत्पीड़न का आरोप लगाया था उसी के साथ डयूटी दी गई और महिला आयोग में शिकायत की तो उसी मैडम आहूजा को सवाल-जवाब करने की जिम्मेदारी दी गई जो पहले से रानी नागर को मामला दबाने की नसीहत दे रही थी.

पिछले दिनों रानी नागर का पीछा हुआ,धमकियां दी गई तो रानी नागर अपनी बहन रीमा नागर के साथ रहने लगी व सोशल मीडिया के माध्यम से साफ किया कि अगर मेरी हत्या होती है तो आरोपी अधिकारी व सरकार जिम्मेदार होगी.

कल अचानक खबर आई कि रानी नागर ने इस्तीफा भेज दिया और हरियाणा सरकार ने रानी को अपने पैतृक घर गाजियाबाद जाने के लिए गाड़ी उपलब्ध करवाई जिसका खर्चा खुद रानी नागर ने वहन किया है.

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बात साफ है कि रानी नागर को प्रताड़ित किया गया और इतना दबाव बनाया गया कि आईएएस रानी नागर टूट गई और अपना इस्तीफा भेज दिया.शायद सरकार भी यही चाहती थी क्योंकि जिस तरह फटाफट गाड़ी उपलब्ध करवाकर घर पहुंचाया गया उससे तो यही जाहिर हो रहा है.रानी नागर आईएएस है तो नियमों के मुताबिक हरियाणा सरकार को अपनी टिप्पणी के साथ यह इस्तीफा केंद्र सरकार को भेजना है.

रानी नागर एक किसान परिवार से है.लिहाजा नेता व मीडिया बोलेंगे नहीं.किसान परिवारों के बच्चे वैसे भी उच्च पदों पर कम ही पहुंचते है और जो पहुंचते है उनको ऐसी जगह लगाया जाता है जहां जनता का सीधा तालुक कम ही रहता है.पद के श्रेष्ठता क्रम के हिसाब से कहीं ढंग की पोस्टिंग मिल जाती है तो रानी नागर बनाकर घर भेज दिया जाता है.

जो लोग पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं की प्रताड़ना को लेकर चिंतित है उनको बताना चाहता हूँ कि आरएसएस के हिंदुत्व के हिसाब से रानी नागर हिन्दू है व सुब्रमण्यम स्वामी की वर्ण व्यवस्था के हिसाब से क्षुद्र है मगर किसान के रूप में माना जाता है.यह भारत की हिन्दू महिला आईएएस अधिकारी है जो भारत के हरियाणा राज्य में पदस्थापित थी जहाँ आरएसएस-बीजेपी की हिंदुत्व रक्षक सरकार है.

जिस अधिकारी के ऊपर रानी नागर ने उत्पीड़न का आरोप लगाया था वो भी हिन्दू है,जिस महिला आयोग में रानी ने शिकायत की उसमे सारे अफसर हिन्दू है.रानी को धमकियां देने वाले,मामला दबाने वाले व महिला आयोग में रानी से सवाल जवाब के नाम पर मामला रफा-दफा करने की नसीहत देने वाली मैडम तक सब हिन्दू ही है.

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रानी को इस्तीफे के लिए मजबूर करने वाली व गाड़ी से गाज़ियाबाद भेजने वाली हरियाणा सरकार का मुख्यमंत्री शाखा से प्रशिक्षित हिन्दू है इसलिए शक की कोई गुंजाइश कहीं नहीं बचती है.रानी का इस्तीफा आज या कल टिप्पणी के साथ केंद्र की हिन्दू हृदय सम्राट की सरकार के पास भेज दिया जाएगा और जाहिर से बात है कि कड़ी से कड़ी जब हिंदुओं की नीचे से लेकर ऊपर तक जुड़ी हुई है तो इस्तीफे की स्वीकारोक्ति को लेकर कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए!

दरअसल, ओबीसी/एससी/एसटी के लोगों को खतरा मुसलमानों से नहीं, बल्कि सत्ता-संसाधनों पर काबिज वर्ग विशेष से है तो लोग गंभीरता से नहीं लेते है!ओबीसी/गुर्जर समाज की आईएएस रानी नागर जब मुखर्जी नगर से शाहजहां रोड तक गई तो देश बदलने के बहुत ख्वाब देखे होंगे मगर हिंदुओं के संगठित विशेष वर्ग ने उनके ख्वाबों को उजाड़कर वापिस अपने गांव भेज दिया है.

बहुत से किसानों के बच्चे व बच्चियां अफसर बनकर भी इन हिंदुओं की प्रताड़ना के शिकार होते है और जहर के घूंट पीकर चुप रहते है!रानी नागर की जहर पचाने की ताकत कमजोर रह गई और अपने आत्मसम्मान की रक्षार्थ इस्तीफा दे दिया!यह इस्तीफा उन किसान कौम के नेताओं,समाजसेवियों व गले मे हिंदुत्व का गमच्छा डालकर घूम रहे युवाओं के मुँह पर तमाचा है जो रोज कहते रहे कि हिंदुत्व खतरे में है!असल मे रानी नागर ने आईएएस के पद से इस्तीफा नहीं किसान कौमों के मुर्दा जमीर का पार्सल भेजा है.

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मगरमच्छ के जबड़े से बची जान, भाई बना मददगार

मगरमच्छ को देख कर जहां अच्छेअच्छों की सिट्टीपिट्टी गुम हो जाती है, वहीं एक बकरीपालक को मगरमच्छ ने अपने जबडे़ में ऐसे जकड़ लिया मानो छोड़ने को तैयार न हो, पर वहां मौजूद लोगों की मदद से उस के भाई ने अपनी जान की बाजी लगा कर उस को नया जीवनदान दिया.

यह मामला राजस्थान के करौली में घूसई चंबल घाट पर देखने को मिला, जहां मगरमच्छ के हमले में एक बकरीपालक गंभीर रूप से घायल हो गया.

जानकारी के मुताबिक, करीलपुरा गांव का रहने वाला रामधन मीणा 3 मई की शाम प्यासी बकरियों को पानी पिलाने घूसई चंबल घाट पर गया था. वहां बकरियों को पानी पिलाने के दौरान पहले से ही घात लगा कर पानी में बैठे मगरमच्छ ने रामधन पर हमला कर दिया और अपने जबड़े में फंसा लिया.

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तभी मौके पर मौजूद रामधन के भाई और वहां मौजूद लोगों ने उसे छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मगरमच्छ भी अपने शिकार को आसानी से छोड़ने वाला नहीं लग रहा था. किसी तरह मगरमच्छ के जबड़े से उस युवक को छुड़ाया गया.

इस हमले में रामधन मीणा के दोनों हाथों में गंभीर रूप से चोटें आईं. घायल को करणपुर अस्पताल पहुंचाया गया, जहां से गंभीर अवस्था में करौली रेफर कर दिया.

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वहीं इस से पहले दूसरी घटना पंजाब के मुक्तसर जिले के गिद्दड़बाहा के एक गांव गुरुसर के पास की है. वहां 21 अप्रैल को नहर के किनारे मगरमच्छ मिला. एक किसान ने इस की पूंछ पकड़ कर घुमाने की कोशिश की, पर वह जल्दी से नहर में घुस गया. नहर में मगरमच्छ के आने से गांव के लोगों में दहशत है. वैसे, गुरुसर गांव के लोग गरमी में इस नहर में नहाते हैं और दूसरी जरूरी चीजों के लिए पानी भी भरते हैं.

फिलहाल तो लॉकडाउन की वजह से लोग नहर की तरफ नहीं जा रहे हैं, फिर भी एहतियात के तौर पर नहर में मगरमच्छ की सूचना गांव वालों ने वन विभाग को दे दी है.

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भले ही चौकस रहते हुए बकरीपालक रामधन मीणा को उस के भाई ने मगरमच्छ के जबड़े से बचा लिया हो, पर ऐसे मौकों पर ज़्यादा जागरूक रहना चाहिए, तभी बच सकते हैं. वहीं खेतों में काम करने वाले किसानों के साथ ही साथ नदी, नाले व नहर के आसपास रहने वालों को घड़ियाल व मगरमच्छों से सावधान रहने की जरूरत है.

प्रेमी को भरी सभा में गर्म सरिया से दागा, पंचों का तालिबानी फैसला

बिहार राज्य के सिवान जिला अंतर्गत जानकीनगर गाँव में पंचायत ने एक युवती को तालिबानी सजा दी है. प्रेमी के साथ फरार रहने के आरोप में उसे भरी पंचायत में गर्म सरिया से दागा गया. पंचायत में युवती अपनी सफाई देती रही लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी.

इस तरह की घटनाएँ पूरे देश से आते रहती है. कहीं तो चुपके रूप से कभी बेटी की हत्या उसके परिवार वालों द्वारा  किया जाता है.कभी प्रेमी प्रेमिका दोनों की हत्या की जाती है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रेम करना महापाप घोर अन्याय के रूप में देखा जाता है.

जब गाँव में प्रेम का कोई मामला आता है तो पंचायत बुलायी जाती है. फैसला करने वाले अधिकांशतः गाँव के बुजुर्ग और प्रतिष्ठित लोग होते हैं. जिनका गाँव में मान सम्मान होता है.आज भी लोग गाँव में दकियानूसी विचारों से ग्रसित होकर तरह तरह के तालिबानी फैसला सुनाते रहते हैं.थूक गिराकर चटाना,बाल मुड़ाकर चुना का टीका लगाकर गधा पर बैठाकर पूरे गाँव में घुमाना, पाँच जाति के लोगों द्वारा दस दस जूते मारना से लेकर आर्थिक और शारीरिक दण्ड देने का रिवाज आज भी कमोवेश चालू है.आज भी डायन के नाम पर महिलाओं को पेशाब पिलाने,नँगा करके घुमाने जैसी कुकृत्य इन पंचों द्वारा सुनाये जाते हैं.

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बहुत सारी इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में नहीं आती.गाँव स्तर तक ही सीमित रहकर दबा दी जाती है. अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों के पास एंड्रॉयड मोबाइल है और इस तरह की घटनाओं का वीडियो वायरल होने लगा है जिसकी वजह से बहुत सारे मामले प्रकाश में आ जाते हैं.

हम अपने लड़के लड़कियों को पढा लिखाकर नॉकरी कराना चाहते हैं.अपने आपको गाँव में भी रुतबा दिखाना चाहते हैं. लेकिन वही लड़के लड़कियाँ जब आपस में प्रेम करने लगते हैं. साथ जीने मरने का ख्वाब देखने लगते हैं तो नागवार गुजरने लगता है. इज्जत में बट्टा लगने लगता है. ऐसा महसूस होने लगता है कि अब हम समाज में रहने लायक नहीं हैं.

गाँव में अगर अपने जाति बिरादरी में कोई लड़का लड़की प्रेम करता है तो यह घोर अपराध है. एक ही गाँव में एक जाति के लड़के लड़कियों की शादी नहीं हो सकती.दूसरी तरफ अन्य जाति वाले लोगों से तो प्रेम करना भी पाप है और अगर कहीं कर लिया और लोगों को जानकारी हो गयी तो दोनों लोगों की खैरियत नहीं.

यहाँ प्यार करनेवाले लोगों के लिए सिर्फ एक ही उपाय है. वह है पलायन.यानी लड़का लड़की को सदा के लिए अपने माँ बाप को छोड़कर कहीं दूसरे जगह चले जाना.उसमें भी अगर पुलिस वाले ने पकड़ लिया तो तरह तरह की परेशानियाँ. मारपीट धमकी से लेकर जेल तक.

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हम एक सभ्य समाज मे जी रहें हैं.इस तरह के पंचायत में जो फैसले लिए जाते हैं.जिनके द्वारा यह फैसला सुनाया जाता है.वे गाँव के सबसे मानींदे और उँच्चे कद के ब्यक्ति होते हैं.उनका सम्मान और इज्जत पूरे गाँव वालों द्वारा किया जाता है.तभी तो उनकी किसी भी हद दर्जे तक निच्चे गिरी हुवी बातों को भी पूरा समाज मान लेता है.अगर आप गाँव के सम्मानित ब्यक्ति हैं तो आपका सोंच भी उँच्चे दर्जे का होना चाहिए लेकिन अफसोस इस बात का है कि भौतिक रूप से हम भले ही कुछ विकसित हो गए है.वैचारिक रूप से हम आज भी जात ,धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं.

हमारा समाज आज जितना भी आधुनिक और मॉडर्न होने का राग अलापते रहे.अलग धर्म जाति में प्रेम और विवाह करने के मामले में हमारा सोंच अभी भी दकियानूसी विचारों को ही ढो रहा है.पढ़े लिखे बुद्धिजीवि प्रगतिशील कहे जाने वाले लोग भी इस खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं.

आय दिन समाज और परिवार वालों द्वारा प्रेम करने वाले लड़के लड़कियों को जब इजाजत नहीं दी जाती तो प्रेम में मर मिटने की कसम खाने वाले युवा युवती आत्महत्या तक का रुख अपना रहे हैं.

युवा हो रहे लड़के लड़कियाँ आपस मे प्रेम करेंगे ही.यह जरूरी नहीं है कि प्रेम अपने जाति बिरादरी और अपने धर्म सम्प्रदाय वाले के बीच ही हो.प्रेम तो इन सबसे ऊपर ही होता है.

जरूरत है कि भौतिकता के साथ साथ आधुनिक सोंच को भी वैज्ञानिक और तर्क के दृष्टिकोण से वास्तविक बातों को धरातल पर सोंचने का प्रयास करें.

जब हमारे बच्चे इंजीनियरिंग डॉक्टरी और अन्य पढ़ाई पढ़ने के लिए कॉलेजों विश्वविद्यालयों

में जायेंगे तो वहाँ विपरीत लिंगों के साथ आकर्षण बढ़ना एक स्वभाविक प्रक्रिया है.हम अपने लड़के लड़कियों के हर बदलाव खान पान,रहन सहन,उनके बदलते संस्कार को जब स्वीकार कर रहें है तो प्रेम को भी स्वीकार करना पड़ेगा तभी हम विकसित और मॉडर्न समाज की कल्पना कर सकते हैं.

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सिर्फ हमें फिल्मों और कहानियों में तो प्यार की कहानियाँ अच्छी लगती है. लेकिन जब हमारे समाज परिवार में लड़के लड़कियाँ आपस में प्यार करते हैं. साथ मरने जीने की कसमें खाते हैं तो हमें नागवार गुजरता है. बदलते दौर में हमारी मानशिकता भी बदलनी होगी.सोंच को नया आयाम देगा होगा.

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