औरतें, शराब और कोरोना

आजकल एक चुटकुला बहुत वायरल हो रहा है और वह यह कि लोग तो लॉक डाउन का पालन कर पा रहे हैं लेकिन सरकार नहीं कर सकी. तभी तो सरकार ने लॉक डाउन के बावजूद चालीस दिनों से बंद शराब की दुकानों को खोलने का फैसला किया ताकि देश की आर्थिक स्थिति को संभाला जा सके. जिन्हें अब तक नाकारा शराबी समझा जाता था अब वही देश की अर्थव्यवस्था को संभालेंगे. चुटकुलों में तो शराबियों को बाहुबली के रूप में भी दिखाया जा रहा है जो गिरती हुई इकोनामी को संभालने के लिए आगे आए हैं.

लेकिन बाहुबली क्या मर्द ही हैं. उन औरतों का क्या जो पीती हैं? क्या उनको भी हमारा समाज इसी तरह स्वीकार कर सकता है? आदमी पिए और पीकर चाहे दंगा करें या मारपीट उसे इस बात की छूट मिल जाती है कि उसने पी रखी है. लेकिन जब एक औरत पीती है तो  समाज को उसे स्वीकारने में काफी दिक्कत होती है. समाज को यह दिक्कत कम है कि करोड़ों औरतों के पति पिता बेटे क्यों शराब पीते हैं क्योंकि ऐसा होता  तो सरकार दुकानें ही नहीं चलने देती जैसे ड्रग्स की दुकानें नहीं चल सकती हैं. होना तो यह चाहिए कि शराब बिके ही नहीं लेकिन टैक्स की खातिर न केवल शराब जम कर बिकवाई जाती है, जगह जगह दुकानें मंदिरों की तरह खुलवाई जाती हैं.

समस्या लड़कियों से है कि वे पीती हैं  मतलब बिगड़ी हुई हैं.

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शराब या सिगरेट पीना औरत के चरित्र से जोड़ दिया जाता है. जो औरतें पीती हैं उन्हें गलत नजर से देखा जाता है. शायद इसीलिए आजकल की युवा लड़कियां जो ज्यादातर शराब और सिगरेट दोनों के शौक रखती हैं और पीने से कोई गुरेज नहीं करतीं, वह अपने अपने बॉयफ्रेंडों की आढ़ में पी लिया करती थीं. लेकिन जब से यह लॉक डाउन हुआ है, तब से बॉयफ्रेंड से मिलना भी दूभर हो गया है. सब अपने-अपने घरों में बंद हैं. तो ऐसे में जिन औरतों को पीने का शौक है उनका क्या हो? ये लड़कियां बराबरी की होड़ में शराब सिगरेट पीने लगती हैं, इसमें संदेह नहीं.

शराब की लाइन में लड़कियां

हाल ही में एक फोटो वायरल हुई जिसमें करीब छह – सात लड़कियां एक साथ शराब की लाइन में लगी, बोतल खरीदने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं. यह नजारा हमारे देश के लिए वाकई हैरान करने वाला था. तभी तो सभी इनकी फोटो खींचने लगे, वीडियो बनाने लगे, पुलिसकर्मी भी इनके आसपास घूमने लगे, और तो और न्यूज़ चैनल वाले भी वहां पहुंचकर इन लड़कियों का “मैडम, मैडम” पुकार कर इंटरव्यू लेने लगे.

बौखला गया देश

कैसा लगा होगा इन्हें? क्या शराब की दुकान की लाइन में लगने पर उन्हें संकोच हुआ होगा? क्या इन्हें इस बात का अनुमान होगा कि सबकी नजरें आकर इन पर ही टिक जाएंगी? सब लोगों का इनके प्रति ऐसा व्यवहार – लोगों की घूरती नजरें, कुछ खुसफुसाहट, तरह तरह की बातें बनाना, इनके बारे में होते चर्चे… कितना अजीब लगा होगा कि जब आज देश की सभी शराब की दुकानों के खुलते ही सारे मर्द एक दूसरे के ऊपर चढ़कर दुकान की खिड़की तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं; सोशल डिस्टेंसिंग को ताक पर रखकर सब पुलिस वालों की बात को भी अनसुना कर रहे हैं, तब ऐसे में यह कुछ लड़कियां जो सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करते हुए अपनी जगह पर खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही है तो उनके प्रति हमारे देश में बात का बतंगड़ क्यों बन रहा है? और तो और सेलिब्रिटीज भी इनके बारे में टिप्पणी करने से बाज नहीं आ रहे. मशहूर निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने इसी फोटो को ट्वीट करते हुए लिखा की खुद शराब की दुकान पर खड़ी लड़कियां कैसे खुद को शराबियों से बचाने की बात कह सकती हैं.

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इसका जवाब प्रसिद्ध गायिका सोना महापात्रा ने दिया और कहा कि आप जैसे लोगों को सही अर्थों में शिक्षित होने की आवश्यकता है ताकि वह समझ सकें कि शराब पीने में किसी प्रकार के लिंग भेद की जरूरत नहीं. जरूरत है तो यह समझने की कि शराब पीकर हिंसक होना गलत है.

किसी काम के नहीं आजकल के ये बॉयफ्रेंड

हमारे देश में आज भी शराब या सिगरेट पीने वाली लड़की को हेय दृष्टि से देखा जाता है. उसके चरित्र को गलत आंका जाता है. यदि वह पीती है तो इसका मतलब यह है कि वह इजीली अवेलेबल है. मर्द पिए तो कोई बात नहीं, ये उसका शौक ठहरा लेकिन अगर औरत पिए तो लांछन सीधा उसके चरित्र पर उठता है. इसीलिए अक्सर लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड से शराब की बोतलें मंगा लेती हैं और अपना शौक घर बैठे पूरा कर लेती हैं, बिना अपने चरित्र को समाज में गिराए हुए. लेकिन आजकल के बॉयफ्रेंड भी किसी काम के नहीं रह गए हैं.

नहीं रहीं शिवलरी

जब लड़कियां कहती हैं कि हम हर काम में लड़कों के बराबर हैं तो लड़के भी अपनी शिवलरी भूलकर लड़कियों के साथ एकदम बराबरी करने लगे हैं. अब आज के बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड के लिए दरवाजा खोलना या डाइनिंग टेबल की कुर्सी सरकाना या फिर खाने का बिल अदा करना अपनी ड्यूटी नहीं समझते हैं. इसमें भी वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ बराबर चलते हुए बिल को भी आधा-आधा करना चाहते हैं.

जो हुआ अच्छा हुआ

अगर इन लड़कियों के बॉयफ्रेंडों ने इनका साथ दिया होता तो इन्हें क्या जरूरत थी इस तरह लाइनों में खड़े होकर शराब खरीदने की? हो सकता है इन्हें भी घर बैठे ही शराब मिल जाती और बात वहीं खत्म हो जाती. लेकिन एक तरह से अच्छा ही हुआ. बदलते हुए देश को यह तस्वीर देखनी भी बेहद जरूरी है. जैसे लाखों मर्द लाइनों में खड़े होकर शराब खरीदने की उत्सुकता दिखा सकते हैं वैसे ही मुट्ठी भर औरतें क्यों उनके साथ लाइन में खड़े होकर अपने लिए शराब नहीं खरीद सकतीं? आखिर दोनों ही इंसान हैं. जैसे एक ने पी, वैसे ही दूसरे ने. संस्कृति और संस्कारों का भोज एक ही के कंधे पर कब तक रहेगा?

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हो सकता है की भीड़ का फायदा उठाकर कुछ लोग इनसे टकराए भी हों, इनके करीब आ गए हों, इनके शरीर पर इधर-उधर हाथ लगाया हो और धक्का-मुक्की का फायदा उठाया हो. लेकिन जब तक लड़कियां खुद अपनी जरूरतें और इच्छाएं पूरी करने के लिए बाहर नहीं निकलेंगी तब तक देश की तस्वीर बदलना मुश्किल है. क्यों आज की लड़की अपने शौक पूरे करने के लिए अपने बॉयफ्रेंड का मुंह देखे? अच्छा तो यही हुआ की लड़कियां खुद ही निकलीं और खुलेआम डटकर अपने शौक को पूरा करने की हिम्मत दिखाई चाहे एक बिल्कुल ग़लत काम के लिए ही सही.

शराब सिगरेट को किसी तरह से भी स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह भी नहीं कि शराब के लिए लाइनें लगें. चाहे कर का नुकसान हो शराब को वैसे ही मान्यता नहीं दी जा सकती. हो सकता है कि सरकार को पैसे तो वेश्याघर चलाने, लड़कियों के अपहरण, जूए, हत्या, ड्रग्स आदि में भी मिल जाएं तो क्या उन्हें मान लिया जाए. शराब की शिकार औरतें ही हैं और वे ही इस बार इसका जीता जागता विज्ञापन बन गईं.

रातों का खेल: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- रातों का खेल: भाग 1

जावेद और राहिल काफी शातिर दिमाग थे. दोनों जानते थे कि स्थानीय स्तर पर ठगी का कारोबार ज्यादा दिन नहीं चल पाएगा, इसलिए फरजी कालसेंटर के जनक माने जाने वाले सागर ठक्कर उर्फ शग्गी से प्रेरणा ले कर दोनों ने द यूनाइटेड स्टेट्स सोशल सिक्युरिटी एडमिनिस्ट्रेशन के नाम पर अमेरिकी नागरिकों को ठगने की योजना बनाई. उन्होंने पहले अहमदाबाद, फिर पुणे में कुछ समय तक ठगी का कारोबार करने के बाद इंदौर का रुख किया.

इंदौर में दोनों 2018 से इस तरह के 2 कालसेंटर चला रहे थे. इस काम के लिए उन्होंने काफी हाइटेक उपकरण जमा कर रखे थे. अमेरिकी नागरिकों को झांसा देने के लिए पूर्वोत्तर राज्यों के युवकयुवतियों को नौकरी देने के नाम पर अपने साथ जोड़ लिया था.

इस के 2 कारण थे, पहला तो यह कि इन राज्यों के युवकों की अंगरेजी भाषा पर अच्छी पकड़ होती है. दूसरे उन का अंगरेजी बोलने का लहजा अमेरिकी लहजे से काफी मिलताजुलता होता है.

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इंदौर में जावेद और राहिल के 2 कालसेंटरों से जो 75 से ज्यादा युवकयुवती पकड़े गए, उन्हें जावेद रहनेखाने के खर्च के अलावा 22 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन देता था. सभी के रहने के लिए इंदौर की महंगी कालोनियों में 30 हजार रुपए प्रतिमाह किराए पर फ्लैट लिए गए थे. युवकयुवतियों को एक साथ रहने की सुविधा दी गई थी.

शटर बंद कर के करते थे काम

चूंकि ठगी अमेरिकी नागरिकों से की जाती थी, इसलिए जावेद का कालसेंटर रात 10 बजे खुलता था. वजह यह कि जब भारत में रात के 10 बजे होते हैं, तब अमेरिका में सुबह के लगभग 11 बजे का समय होता है. रात के 10 बजे शटर उठा कर सभी कर्मचारियों को अंदर कर शटर बंद कर दिया जाता था. जिस के बाद असली खेल शुरू होता था.

लीड जैक इंफोकाम और सर्वर के माध्यम से एक साथ 10 हजार अमेरिकी नागरिकों को वायस मैसेज भेजा जाता था. मैसेज द यूनाइटेड स्टेट्स सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन अधिकारी की तरफ से भेजा जाता था, जिस में कभी कर चोरी तो कभी उन की गाड़ी के आपराधिक मामले में इस्तेमाल किए जाने की रिपोर्ट से संबंधित वायस मैसेज होता था. इस के अलावा ऐसे ही कई दूसरे मामलों में उन के खिलाफ शिकायत मिलने की बात कह कर एक टोल फ्री नंबर पर कौंटैक्ट करने को कहा जाता था.

वायस मैसेज भेजने वाली नौर्थ ईस्ट की लड़कियां इस लहजे में मैसेज देती थीं कि कोई भी अमेरिकी नागरिक उन के अंगरेजी बोलने के लहजे से यह नहीं सोच सकता था कि वह किसी भारतीय लड़की की आवाज है.

इस के लिए मैजिक जैक डिवाइस का उपयोग किया जाता था. मैजिक जैक एक ऐसी डिवाइस है जिसे कंप्यूटर व लैंडलाइन फोन से कनेक्ट कर विदेशों में काल कर सकते हैं. इस से विदेश में बैठे व्यक्ति के फोन पर फेक नंबर डिसप्ले होता है. यह वायस ओवर इंटरनेट प्रोटोकाल (वीओआईपी) के प्लेटफार्म पर चलती है. इस से अमेरिका और कनाडा में काल कर सकते हैं और रिसीव भी कर सकते हैं.

एसपी जितेंद्र सिंह के अनुसार ठगी का कारोबार 3 स्तर पर पूरा होता था. ऊपर बताया गया काम डायलर का होता था. इस के बाद काम शुरू होता था ब्रौडकास्टर का. जिन 10 हजार अमेरिकी नागरिकों को फरजी तौर पर द यूनाइटेड स्टेट्स सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन अधिकारी की ओर से नियम तोड़ने या किसी अपराध से जुड़े होने की शिकायत मिलने का फरजी वायस मैसेज भेजा जाता था, उन में से कुछ ऐसे भी होते थे जिन्होंने कभी न कभी अपने देश का कोई कानून तोड़ा होता था.

इस से ऐसे लोग और कुछ दूसरे लोग डर जाने के कारण मैसेज में दिए गए नंबर पर फोन करते थे. इन काल को ब्रौडकास्टर रिसीव करता था, जो प्राय: नार्थ ईस्ट की कोई युवती होती थी.

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आमतौर पर ऐसे लोगों द्वारा किए जाने वाले संभावित सवालों का अनुमान उन्हें पहले से ही होता था, इसलिए ब्रौडकास्टर युवती सामने वाले को कुछ इस तरह संतुष्ट कर देती थी कि अच्छाभला आदमी भी खुद को अपराधी समझने लगता था.

जब कोई अमेरिकी जाल में फंस जाता था, तो उस की काल तीसरे स्टेज पर बैठने वाले क्लोजर को ट्रांसफर कर दी जाती थी.

यह क्लोजर पहले तो विजिलेंस अधिकारी बन कर अमेरिकी लैंग्वेज में कठोर काररवाई के लिए धमकाता था, फिर उसे सेटलमेंट के मोड पर ला कर गिफ्ट कार्ड, वायर ट्रांसफर, बिटकौइन और एकाउंट टू एकाउंट ट्रांजैक्शन के औप्शन दे कर डौलर ट्रांसफर के लिए तैयार कर लेता था.

इस के बाद गिफ्ट कार्ड के जरिए अमेरिकी खातों में डौलर में रकम जमा करवा कर उसे हवाला के माध्यम से भारत मंगा कर जावेद और राहिल खुद रख लेते थे. हवाला से रकम भेजने वाला 40 प्रतिशत अपना हिस्सा काट कर शेष रकम जावेद को सौंप देता था.

एसपी जितेंद्र सिंह के अनुसार यह गिरोह रोज रात को कालसेंटर खुलते ही एक साथ नए 10 हजार अमेरिकी लोगों को फरजी वायस मैसेज भेजने के बाद फंसने वाले लोगों से लगभग 3 से 5 हजार डौलर यानी लगभग 3 लाख की ठगी कर सुबह औफिस बंद कर अपने घर चले जाते थे.

अनुमान है कि जावेद और राहिल के गिरोह ने अब तक लगभग 20 हजार से अधिक अमेरिकी नागरिकों से अरबों रुपए ठगे होंगे. उस के पास 10 लाख दूसरे अमेरिकी नागरिकों का डाटा भी मिला, जिन्हें ठगी के निशाने पर लिया जाना था.

गिरोह का दूसरा मास्टरमाइंड राहिल छापेमारी की रात अहमदाबाद गया हुआ था, इसलिए वह पुलिस की पकड़ से बच गया जिस की तलाश की जा रही है.

राहिल के अलावा संतोष, मिनेश, सिद्धार्थ, घनश्याम तथा अंकित उर्फ सन्नी चौहान को भी पुलिस तलाश रही है, जो इस फरजी कालसेंटर को 12 से 14 रुपए प्रति अमेरिकी नागरिक का डाटा उपलब्ध कराते थे.

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

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मध्यांतर भी नहीं हुआ अभी: भाग 3

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देर तक एकदूसरे के सामने बैठे हम अपने बीते कल और अकेले आज पर आंसू बहाते रहे, न उस ने मुझे चुप कराना चाहा और न मैं ने ही उसे रोका.

काफी समय बीत गया. जब लगा मन हलका हो गया तब हाथ उठा कर चंद्रा का सिर थपथपा दिया मैं ने.

‘‘बस करो, अब और कितना रोओगी?’’

रोतेरोते हंस पड़ी चंद्रा. आंखें पोंछ अपना पर्स खोला और मेरे लिए लाया ढोकला मुझे दिखाया.

‘‘जरा सा चखना चाहोगे, मुंह का स्वाद अच्छा हो जाएगा.’’

लगा, बरसों पीछे लौट गया हूं. आज भी हम जवान ही हैं…जब आंखों में हजारोंलाखों सपने थे. हर किसी की मुट्ठी बंद थी. कौन जाने हाथ की लकीरों में क्या होगा. अनजान थे हम अपने भविष्य को ले कर और अनजाने रहने में ही कितना सुख था. आज सबकुछ सामने है, कुछ भी ढकाछिपा नहीं. पीछे लौट जाना चाहते हैं हम.

‘‘मन नहीं हो रहा चंद्रा…भूख भी नहीं लग रही.’’

‘‘तो सो जाओ, रात के 9 बज गए हैं.’’

‘‘तुम होस्टल चली जातीं तो आराम से सो पातीं.’’

‘‘यहां क्या परेशानी है मुझे? पुराना साथी सामने है, पुरानी यादों का अपना ही मजा है, तुम क्या जानो.’’

‘‘मैं कैसे न जानूं, सारी समझदारी क्या आज भी तुम्हारी जेब में है?’’

मेरे शब्दों पर पुन: चौंक उठी चंद्रा. मुझे ठीक से लिटा कर मुझ पर लिहाफ ओढ़ातेओढ़ाते उस के हाथ रुक गए.

‘‘झगड़ा करना चाहते हो क्या?’’

‘‘इस में नया क्या है? बरसों पहले जब हम अलग हुए थे तब भी तो एक झगड़ा हुआ था न हमारे बीच.’’

‘‘याद है मुझे, तो क्या आज हारजीत का निर्णय करना चाहते हो?’’

‘‘हां, आखिर मैं एक पुरुष हूं. जाहिर सी बात है जीतना तो चाहूंगा ही.’’

‘‘मैं हार मानती हूं, तुम जीत गए.’’

‘‘चंद्रा, मेरी बात सुनो…’’ सामने बेंच की ओर बढ़ती चंद्रा का हाथ पकड़ लिया मैं ने. पहली बार ऐसा प्रयास किया है मैं ने और मेरा यह प्रयास एक अधिकार से ओतप्रोत है.

‘‘मेरे पास बैठो, यहां.’’

एक उलझन उभर आई है चंद्रा की आंखों में. शायद मेरा यह प्रयास मेरी अधिकार सीमा में नहीं आता.

‘‘सब के सामने तो तुम पूछती हो कि मेरा परिवार कहां है? मेरी पत्नी कहां है? अगर शादी नहीं की तो क्यों नहीं की? अकेले में क्यों नहीं पूछतीं? अभी हम अकेले हैं न. पूछो मुझ से कि मैं किस की चाह में अकेला रहा सारी उम्र?’’

मेरे हाथ से अपना हाथ नहीं छुड़ाया चंद्रा ने. मेरी बगल में चुपचाप बैठ गई.

‘‘बरसों पहले भी मैं तुम से हारना नहीं चाहता था. तब भी मेरे जीतने का मतलब अलग होता था और आज भी अलग है…

‘‘तुम्हें हरा कर जीतना मैं ने कभी नहीं चाहा. तब भी जब तुम सही प्रमाणित हो जाती थीं तो मुझे खुशी होती थी और आज भी तुम्हारी ही जीत में मेरी जीत है.

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‘‘चंद्रा, तुम्हारे सुख की कामना में ही मेरा पूरा जीवन चला गया और आज पता चला मेरा चुप रह जाना किसी भी काम नहीं आया. मेरा तो जीनामरना सब बस, यों ही…

‘‘देखो चंद्रा, जो हो गया उस में तुम्हारा कोई दोष नहीं. वही हुआ जो होना था. स्वयं पर गुस्सा आ रहा है मुझे. जिस की चाह में अकेला रहा सारी उम्र, कम से कम कभी उस का हाल तो पूछ लेता. तुम जैसी किसी को खोजखोज कर थक गया. थक गया तो खोज समाप्त कर दी. तुम जैसी भला कोई और हो भी कैसे सकती थी. सच तो यह है कि तुम्हारी जगह कोई और न ले सकती थी और न ही मैं ने वह जगह किसी को दी.’’

डबडबाई आंखों से चंद्रा मुझे देखती रही.

‘‘मेरे दिल पर इसी सत्य ने प्रहार किया है कि मेरा चुप रह जाना आखिर किस के काम आया. न तुम्हारे न ही मेरे. एक घर जो कभी बस सकता था… बस ही नहीं पाया… किसी का भी भला नहीं हुआ. खाली हाथ तुम भी हो और मैं भी.’’

‘‘कल से तुम्हें महसूस कर रही हूं मैं सोम. 50 के आसपास तो मैं भी पहुंच चुकी हूं. तुम जानते हो न मेरी छटी इंद्री की सूचना कभी गलत नहीं होती…जिस इनसान से मेरी शादी हुई थी वह कभी मुझे अपना सा नहीं लगा था. और सच में वह मेरा कभी था भी नहीं…उस के बाद हिम्मत ही नहीं हुई किसी पर भरोसा कर पाऊं.’’

‘‘क्या मुझ पर भी भरोसा नहीं कर पाओगी?’’

‘‘तुम तो सदा से अपने ही थे सोम, पराए कभी लगे ही नहीं थे. आज इतने सालों बाद भी लगता नहीं कि इतना समय बीत गया. तुम पर भरोसा है तभी तो पास बैठी हूं…अच्छा, मैं पूछती हूं तुम से…

‘‘सोम, तुम ने शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘मत पूछना, क्योंकि अपनी बरबादी का सारा जिम्मा मैं तुम्हीं पर डाल दूंगा जो शायद तुम्हें बुरा लगेगा. तुम्हारे बाद रास्ता ही खो गया. वहीं खड़ा रहा मैं…दाएंबाएं कभी नहीं देखा. तनमन से वैसा ही हूं जैसा तुम ने छोड़ा था.’’

‘‘तनमन से मैं तो वैसी नहीं हूं न. 2 संतानें मेरे गर्भ में आईं और चली गईं. पहले उन्हीं को याद कर के दुखी हो लेती थी फिर सोचा पागल हूं क्या मैं? जिंदा पति किसी बदनाम औरत का हाथ पकड़ गंदगी में समा गया. उसे नहीं बचा पाई तो उन बच्चों का क्या रोना जिन्हें कभी न देखा न सुना. कभीकभी तो लगता है पत्थर बन गई हूं जिस पर सुखदुख का कोई असर नहीं होता.’’

‘‘असर होता है. असर कैसे नहीं होता?’’ और इसी के साथ मैं ने चंद्रा को अपने पास खींच लिया. फिर सस्नेह उस का माथा सहला कर सिर थपथपा दिया.

‘‘असर होता है तुम पर चंद्रा. समय की मार से हम समझदार हो गए हैं, पत्थर तो नहीं बने. पत्थर बन जाते तो एकदूसरे के आरपार कभी नहीं देख पाते.’’

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मेरे हाथों की ही सस्नेह ऊष्मा थी जिस ने दर्द की परतों को उघाड़ दिया.

‘‘यदि आज भी एकदूसरे का हम सहारा पा लें तो शायद 100 साल जी जाएं और उस हिसाब से तो अभी मध्यांतर भी नहीं हुआ.’’

नन्ही बच्ची की तरह रो पड़ी चंद्र्रा. बांहों में छिपा कर माथा चूम लिया मैं ने. छाती में जो हलकाफुलका दर्द सुबह शुरू हुआ था सहसा कहीं खो सा गया.

रातों का खेल: भाग 1

घटना 10 जून, 2019 की है. इंदौर साइबर सेल के एसपी जितेंद्र सिंह ने साइबर सेल के अफसरों और कुछ सहकर्मियों को अपने केबिन में बुला कर इंदौर के किसी क्षेत्र में छापा डालने के बारे में बताया. छापेमारी में कोई चूक न हो इस के लिए हर पुलिसकर्मी की शंका और उस के समाधान के बारे में 4 घंटे तक मीटिंग चली. इस के बाद एसपी जितेंद्र सिंह के निर्देश पर रात लगभग साढ़े 12 बजे 2 टीमें बनाई गईं.

इन टीमों में एसआई राशिद खान, आमोद राठौर, संजय चौधरी, विनोद राठौर, रीना चौहान, पूजा मुबेल, अंबाराम प्रधान व सिपाही आनंद, दिनेश, रमेश, विजय विकास, राकेश और राहुल को शामिल किया गया. इन टीमों को सी-21 मौल के पीछे स्थित टारगेट पर धावा बोलना था. समय तय कर दिया गया था.

मामला काफी गंभीर था, इसलिए टीमों के रवाना होने के बाद एसपी जितेंद्र सिंह बैकअप देने के लिए औफिस में ही बैठे रहे. उन्हें भेजी गई टीमों से मिलने वाली सूचनाओं का इंतजार करना था. साइबर सेल के एसपी जितेंद्र सिंह को 25 दिन पहले सी-21 मौल के पीछे स्थित प्लाजा प्लैटिनम के 2 तलों पर संदिग्ध गतिविधियां संचालित होने की जानकारी मिली थी.

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एसआई राशिद खान ने जो सूचना जुटाई थी, उस के अनुसार प्लैटिनम में 2 औफिस रात को 11 बजे खुलते थे और सुबह होते ही बंद हो जाते थे. लगभग सौ सवा सौ युवकयुवतियां रात 11 बजे औफिस में जाते थे. इस के बाद सुबह तक के लिए शटर बंद हो जाता था. वहां क्या होता है, इस का किसी को पता नहीं था. हां, इतना आभास जरूर था कि वहां जो भी होता है, वह कानून के दायरे के बाहर थी.

एसपी जितेंद्र सिंह ने इस संबंध में जो जानकारी जुटाई, उस में पता चला कि संदिग्ध औफिस के मालिक पिनकेल डिम व श्रीराम एनक्लेव में रहने वाले जावेद मेनन और राहिल अब्बासी हैं, जो रईसी की जिंदगी जी रहे हैं. ये लोग क्या काम करते हैं, इस की जानकारी किसी को नहीं थी.

एसपी जितेंद्र सिंह को सब से बड़ी बात यह पता चली कि इन औफिसों में काम करने वाले युवकयुवतियों में 80 प्रतिशत से अधिक भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से हैं.

जावेद ने इन लोगों को आसपास के इलाकों में किराए पर फ्लैट ले क र दे रखे थे. पूर्वोत्तर के नागरिक आसानी से इंदौर के लोगों में घुलमिल नहीं सकते थे, इसलिए साफ था कि ऐसे कर्मचारियों का चुनाव आमतौर पर तभी किया जाता है, जब संबंधित व्यक्ति अपने कार्यकलाप को गुप्त रखने की मंशा रखता हो.

एसपी जितेंद्र सिंह इस बात को अच्छी तरह समझते थे, इसलिए दबिश देने पर आपराधिक गतिविधियों का खुलासा हो सकता था. एसपी साहब ने इस मामले की सूचना पुलिस महानिदेशक पुरुषोत्तम शर्मा, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राजेश गुप्ता व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अशोक अवस्थी को पहले दे दी थी. अब उन्हें परिणाम का इंतजार था.

उस समय रात का 1 बजा था, जब एसआई राशिद खान की टीम ने सी-21 मौल के पीछे स्थित टारगेट के दरवाजे पर दस्तक दी. कुछ देर के इंतजार के बाद शटर उठाया गया तो एसआई राशिद खान पूरी टीम के साथ धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल हो गए. औफिस में अंदर रखी करीब 20-22 टेबलों पर 60-70 कंप्यूटरों की स्क्रीन चमक रही थीं.

110-112 के आसपास युवकयुवतियां एक ही स्थान पर मौजूद थे. उस दिन किसी महिला कर्मचारी का जन्मदिन था, इसलिए औफिस का मालिक जावेद मेनन भी वहां मौजूद था. उस ने युवती का जन्मदिन सेलिब्रेट करने के लिए खुद ही केक मंगवाया था.

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पुलिस को आया देख वहां मौजूद सभी कर्मचारी घबरा गए. राशिद खान की टीम ने उन्हें केक काटने का समय दिया. इस के बाद वहां चल रहे कंप्यूटरों की जानकारी खंगाली गई तो टीम की आंखें फटी रह गईं. वास्तव में वहां की 2 मंजिलों पर 2 ऐसे कालसेंटर चल रहे थे, जो इंदौर में बैठ कर हाइटेक तरीके से अमेरिकी नागरिकों को ठगने का काम करते थे.

कालसेंटर के मालिक जावेद मेनन ने पहले तो पुलिस को अपने द्वारा किए जा रहे काम को लीगल ठहराने की कोशिश करते हुए वहां से खिसकने की सोची, लेकिन साइबर सेल की सतर्कता से उसे ऐसा मौका नहीं मिला.

इस दौरान हुए खुलासे की जानकारी मिलने पर एसपी जितेंद्र सिंह खुद भी मौके पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के बाद देर रात शुरू हुई काररवाई अगले दिन सुबह तक चली. इस काररवाई में जावेद मेनन और उस के राइट हैंड शाहरुख के साथ 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिन में पूर्वोत्तर राज्यों की रहने वाली लड़कियां भी शामिल थीं.

पुलिस टीम ने कालसेंटर से 60 कंप्यूटर, 70 मोबाइल फोन, सर्वर और अन्य गैजेट्स तथा लगभग 10 लाख अमेरिकी नागरिकों का डाटा बरामद किया.

गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में स्थिति साफ होने पर उन के खिलाफ 468, 467, 471, 420, 120बी, आईपीसी और 66 डी आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया.

गिरफ्तार किए गए सभी 78 युवकयुवतियों को 2 चार्टर्ड बसों में भर कर अदालत ले जाया गया और उन्हें अदालत के सामने पेश किया गया, जहां से पुलिस ने पूछताछ के लिए जावेद मेनन, भाविल प्रजापति और शाहरुख मेनन को रिमांड पर ले लिया, जबकि नगालैंड, मेघालय, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा सहित 10 राज्यों के रहने वाले 75 युवकयुवतियों को जेल भेज दिया गया.

जावेद मेनन, भाविल प्रजापति और शाहरुख मेनन से पूछताछ के बाद उन के औफिस दिव्या त्रिस्टल, प्लैटिनम प्लाजा, घर पिनेकल डीम और श्रीराम एनक्लेव में छापा मारा गया. करीब 5 घंटे की तलाशी के बाद पुलिस ने वहां से फरजीवाड़े से संबंधित ढेरों सामग्री जब्त की.

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इस के बाद पूछताछ में तीनों आरोपियों ने जो बताया, उस के आधार पर पता चला कि जावेद मेनन और उस का दोस्त राहिल अब्बासी मूलरूप से अहमदाबाद के रहने वाले थे. दोनों 2018 में इंदौर आए थे. यहां उन्होंने बीपीओ कंपनी की आड़ में कालसेंटर शुरू किए.

इंदौर में दोनों ने जिस कंपनी के नाम से किराए पर इमारतें लीं, वे विपिन उपाध्याय के नाम से रजिस्टर्ड हैं. जबकि इस के वास्तविक मालिक जावेद और राहिल हैं. कंपनी विपिन के नाम थी, इसलिए इस कंपनी के नाम से ही किराए का एग्रीमेंट किया गया था.

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

गहरी पैठ

कुछ माह पहले 2 बैंकों के बंद हो जाने का सदमा अभी कम हुआ नहीं था कि अब एक बड़ा बैंक यस बैंक लगभग दिवालिया हो गया है. इस में जमा खातेदारों का हजारों करोड़ अब खतरे में है और साथ ही यह डर है कि यह बैंक दूसरे कई बैंकों को न ले डूबे.

जिन का पैसा डूबेगा उस में अगर लखपति व करोड़पति हैं तो गरीब भी हैं, जिन्होंने कुछ हजार रुपए जमा कर रखे थे. अगर अमीर किसी तरह बचे पैसे से काम चला भी लें तो हजारों गरीबों की पूरी बचत स्वाहा हो चुकी होगी.

इन गरीबों को अब फिर साहूकारों के पास जाना होगा जो अगर कर्ज देते हैं तो मोटा ब्याज लेते हैं और अगर बचत रखते हैं तो ब्याज देना तो दूर मूल भी ले कर भाग जाते हैं. देशभर में चिटफंड कंपनियों के कारनामे जगजाहिर हैं. इसी तरह की और कंपनियां भी देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह खुली हुई हैं, जो पैसा जमा कर लूट रही हैं. बैंकों से जो थोड़ीबहुत आस थी वह भी एकएक कर के बैंकों के ठप होने से खत्म होती जा रही है.

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यह देश के गरीब और आम आदमी के साथ सब से बड़ा जुल्म है. बैंकों ने पहले तो हर गांवकसबे में पांव पसार कर लोगों को यह भरोसा दिला दिया कि साहूकार से वे अच्छे हैं. अच्छेभले साहूकर खत्म हो गए और सिर्फ शातिर ठग बचे हैं जो मोटे ब्याज के लालच में गांवगांव से पैसा जमा करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. बीसियों चिटफंड व डिपोजिट कंपनियां लोगों का पैसा खा चुकी हैं. अब तो जेवर भी खा कर बैठने लगी हैं.

यस बैंक के फेल हो जाने का मतलब है कि अब बैंकों में पैसा जमा करने में खतरा है. यदि यही चला तो लोग तो कंगाल हो ही जाएंगे, देश भी कंगाल हो जाएगा, क्योंकि बैंक लोगों का पैसा जमा नहीं करेंगे तो कर्ज कैसे देंगे, कैसे नए कारखाने चलेंगे, कैसे व्यापार होगा, कैसे पैसा इधर से उधर जाएगा.

यह कहर किसान, मजदूर, व्यापारी, ठेकेदार सब को लील सकता है. यस बैंक अकेला ही गलत कर रहा होता तो बात दूसरी थी, हर दूसरे सभी बैंकों में कमोबेश यही सा हाल है चाहे वे सरकारी हों या प्राइवेट. यस बैंक में उस को शुरू करने वाले राणा कपूर, उस की पत्नी, उस की बेटियों ने मनमाना खर्च करने की छूट पाने के लिए ऐसे बहुतों को कर्ज दिया जिन का धंधा लड़खड़ा रहा था जिन में मुकेश अंबानी के छोटे भाई अनिल अंबानी शामिल हैं. जिन की कंपनी को राफेल लड़ाकू हवाईजहाज बनाने का ठेका मिला है. जीटीवी जिस पर प्रधानमंत्री की तरफदारी ले कर रातदिन खतरें जारी होती हैं, ने भी यस बैंक से कर्ज लिया और लौटाया नहीं.

यस बैंक ने देश को जो नुकसान पहुंचाया है उस के लिए सरकार जिम्मेदार है जिस ने सैकड़ों नियमकानून बैंकों के लिए बना रखे हैं.

देश के सभी शहरों, कसबों और यहां तक कि गांवों में भी आम लोगों की जमीन, सड़क, पटरी, बाग पर दुकानें बन जाना आम और आसान है. इस में कुछ ज्यादा नहीं करना पड़ता. पहले दिन एक जना कहीं भी चादर बिछा कर या बक्से पर रख कर सामान बेचना शुरू कर देता है और 4-5 दिनों में ही यह उस का हक बन जाता है. इस आम आदमी की घुसपैठ देश की जनता पर बंगलादेश के लोगों की घुसपैठ से ज्यादा खतरनाक है, पर रातदिन पनप रही है. इस में गलती और अपराधी असल में आम आदमी ही हैं, सरकार जिस में पुलिस, म्यूनिसिपल कारपोरेशनें, राज्य सरकारें कम हैं.

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दिक्कत है कि लोग इतने आलसी और बेवकूफ हैं कि वे सड़क पर राह चलती दुकान से कुछ भी खरीदने को तैयार हो जाते हैं जहां न दुकानदार का नाम है, न पता. वे क्या खरीद रहे हैं, यह भी नहीं मालूम. खाने की चीजों की दुकान है तो वहां नकली जहर हो चुका सामान तो नहीं बिक रहा, इस की परेशानी नहीं है. सामान चोरी का हो तो कोई डर नहीं. क्वालिटी बेहद खराब हो तो फर्क नहीं पड़ता. खरीदारों की यह आदत इन दुकानों के लिए जिम्मेदार है.

कोई भी दुकान तभी लगाएगा और चलाएगा जब वहां बिक्री होगी. खरीदार हैं तो दुकान हैं. पहले सामान खरीद कर आम जनता दुकानदार को पाले और फिर सरकार को कोसे कि देखो कहीं भी दुकान लगाने देती है, कहां से सही बात हो सकती है.

इन दुकानों के ग्राहक असल में अपने को लुटवाते हैं और दुकानदारों का कल भी खराब करते हैं. सड़क पर बनी नाजायज दुकान से पुलिस वाला, म्यूनिसिपल कारपोरेशन वाला, कोई माफिया हफ्तावसूली करने लगता है. जिस सड़क पर बैठे हों, वहां का अफसर हटाता तो नहीं पर वसूली में हिचकिचाता नहीं. अगर ग्राहक न हों तो कोई 4 दिन दुकान न चलाए. इन दुकानों को पनपने की वजह सिर्फ और सिर्फ ग्राहक हैं.

यह कहना गलत है कि पक्की दुकानों में सामान महंगा मिलता है. यह गलतफहमी है. पटरी दुकानदार को मोटे ब्याज पर सामान लाना होता है, क्योंकि वह कोई चीज गिरवी या किसी तरह की जमानत नहीं देता. रोज की कमाई में से तिहाई से आधा हिस्सा तो पैसा लगाने वाले खा जाते हैं. पटरी दुकानदार को लगता है कि उस की दिहाड़ी निकल गई, काफी है, पर यह उस को कल को पक्की दुकान में जाने से रोकता है. उसे हुनर सीखने से रोकता है.

यही नहीं, कईकई पटरी दुकानदार एकजैसा सा सामान बराबर बेचते रहते हैं. आधे समय खाली रहते हैं. उन्हें अपनी दिहाड़ी निकालने के लिए खाली समय का पैसा भी कीमत में जोड़ना होता है. वे सस्ता, अच्छा सामान दे ही नहीं सकते. हां दलितों, अछूतों को जरूर थोड़ा फायदा होता है, क्योंकि उन्हें पक्की दुकान में घुसने में आज भी डर लगता है. पर क्या इसी वजह से देश की सारी पटरियां, सारे बाग, सारी खुली जगहें, सड़कें संकरी, मैली करने दी जाएं? ग्राहक, आम जनता मामला हाथ में ले, सरकार पर न छोड़े.

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मां, पराई हुई देहरी तेरी: भाग 1

कमरे में पैर रखते ही पता नहीं क्यों दिल धक से रह जाता?है. मां के घर के मेरे कमरे में इतनी जल्दी सब- कुछ बदल सकता है मैं सोच भी नहीं सकती थी. कमरे में मेरी पसंद के क्रीम कलर की जगह आसमानी रंग हो गया है. परदे भी हरे रंग की जगह नीले रंग के लगा दिए गए हैं, जिन पर बड़ेबड़े गुलाबी फूल बने हुए हैं.

मैं अपना पलंग दरवाजे के सामने वाली दीवार की तरफ रखना पसंद करती थी. अब भैयाभाभी का दोहरा पलंग कुछ इस तरह रखा गया है कि वह दरवाजे से दिखाई न दे. पलंग पर भाभी लेटी हुई हैं. जिधर मेरी पत्रिकाओं का रैक रखा रहता था, अब उसे हटा कर वहां झूला रख दिया गया?है, जिस में वह सफेद मखमली सा शिशु किलकारियां ले रहा है, जिस के लिए मैं भैया की शादी के 10 महीने बाद बनारस से भागी चली आ रही हूं.

‘‘आइए दीदी, आप की आवाज से तो घर चहक रहा था, किंतु आप को तो पता ही है कि हमारी तो इस बिस्तर पर कैद ही हो गई है,’’ भाभी के चेहरे पर नवजात मातृत्व की कमनीय आभा है. वह तकिए का सहारा ले कर बैठ जाती हैं, ‘‘आप पलंग पर मेरे पास ही बैठ जाइए.’’

मुझे कुछ अटपटा सा लगता है. मेरी मां के घर में मेरे कमरे में कोई बैठा मुझे ही एक पराए मेहमान की तरह आग्रह से बैठा रहा है.

‘‘पहले यह बताइए कि अब आप कैसी हैं?’’ मैं सहज बनने की कोशिश करती हूं.

‘‘यह तो हमें देख कर बताइए. आप चाहे उम्र में छोटी सही, लेकिन अब तो हमें आप के भतीजे को पालने के लिए आप के निर्देश चाहिए. हम ने तो आप को ननद के साथ गुरु  भी बना लिया है. सुना है, तनुजी ‘बेबी शो’ में प्रथम आए?थे.’’

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मैं थोड़ा सकुचा जाती हूं. भैया मुझ से 3 वर्ष ही तो बड़े थे, लेकिन उन्हीं की जिद थी कि पहले मीनू की शादी होगी, तभी वह शादी करेंगे. मेरी शादी भी पहले हो गई और बच्चा भी.

भाभी अपनी ही रौ में बताए जा रही हैं कि किस तरह अंतिम क्षणों में उन की हालत खराब हो गई थी. आपरेशन द्वारा प्रसव हुआ.

‘‘आप तो लिखती थीं कि सबकुछ सामान्य चल रहा है फिर आपरेशन क्यों हुआ?’’ कहते हुए मेरी नजर अलमारी पर फिसल जाती है, जहां मेरी अर्थशास्त्र की मोटीमोटी किताबें रखी रहती थीं. वहां एक खाने में मुन्ने के कपड़े, दूसरे में झुनझुने व छोटेमोटे खिलौने. ऊपर वाला खाना गुलदस्तों से सजा हुआ है.

‘‘सबकुछ सामान्य ही था लेकिन आजकल ये प्राइवेट नर्सिंग होम वाले कुछ इस तरह ‘गंभीर अवस्था’ का खाका खींचते हैं कि बच्चे की धड़कन कम हो रही है और अगर आधे घंटे में बच्चा नहीं हुआ तो मांबच्चे दोनों की जान को खतरा है. घर वालों को तो घबरा कर आपरेशन के लिए ‘हां’ कहनी ही पड़ती है.’’

‘‘अब तो जिस से सुनो, उस के ही आपरेशन से बच्चा हो रहा है. हमारे जमाने में तो इक्कादुक्का बच्चे ही आपरेशन से होते थे,’’ मां शायद रसोई में हमारी बात सुन रही हैं, वहीं से हमारी बातों में दखल देती हैं.

मेरी टटोलती निगाह उन क्षणों को छूना चाह रही है जो मैं ने अपनी मां के घर के इस कमरे में गुजारे हैं. परीक्षा की तैयारी करनी है तो यही कमरा. बाहर जाने के लिए तैयार होना है तो शृंगार मेज के सामने घूमघूम कर अपनेआप को निखारने के लिए यही कमरा. मां या पिताजी से कोई अपनी जिद मनवानी हो तो पलंग पर उलटे लेट कर रूठने के लिए यही कमरा या किसी बात पर रोना हो तो सुबकने के लिए इसी कमरे का कोना. मेरा क्या कुछ नहीं जुड़ा था इस कमरे से. अब यही इतना बेगाना लग रहा है कि यह अपनी उछलतीकूदती मीनू को पहचान नहीं पा रहा.

‘‘तू यहीं छिपी बैठी है. मैं तुझे कब से ढूंढ़ रहा हूं,’’ भैया आते ही एक चपत मेरे सिर पर लगाते हैं. भाभी के हाथ में कुछ पैकेट थमा कर कहते हैं, ‘‘लीजिए, बंदा आप के लिए शक्तिवर्धक दवाएं व फल ले आया है.’’ फिर मुन्ने को गोद में उठा कर अपना गाल उस के गाल से सटाते हुए कहते हैं, ‘‘देखा तू ने इसे. मां कह रही थीं बचपन में तू बिलकुल ऐसी ही लगती थी. अगर यह तुझ पर ही गया तो इस के नखरे उठातेउठाते हमारी मुसीबत ही आ जाएगी.’’

‘‘मारूंगी, ऐसे कहा तो,’’ मैं तुनक कर जवाब देती हूं. मुझे यह दृश्य भला सा लग रहा है. अपने संपूर्ण पुरुषत्व की पराकाष्ठा पर पहुंचा पितृत्व के गर्व से दीप्त मुन्ने के गाल से सटा भैया का चेहरा. सबकुछ बेहद अच्छा लगने पर भी, इतनी खुश होते हुए भी एक कतरा उदासी चुपके से आ कर मेरे पास बैठ जाती है. मैं भैया की शादी में भी कितनी मस्त थी. भैया की शादी की तैयारी करवाने 15 दिन पहले ही चली आई थी. मैं ने और मां ने बहुत चाव से ढूंढ़ढूंढ़ कर शादी का सामान चुना था. अपने लिए शादी के दिन के लिए लहंगा व स्वागत समारोह के लिए तनछोई की साड़ी चुनी थी. बरात में भी देर तक नाचती रही थी.

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मां व मैं घर पर सारी खुशियां समेट कर भाभी का स्वागत करने के लिए खड़ी थीं. भैया भाभी के आंचल से अपने फेंटे की गांठ बांधे धीरेधीरे दरवाजे पर आ रहे थे.

‘‘अंदर आने का कर लगेगा, भैया.’’ मैं ने अपना हाथ फैला दिया था.

‘‘पराए घर की छोकरी मुझ से कर मांग रही है, चल हट रास्ते से,’’ भैया मुझे खिजाने के लिए आगे बढ़ते आए थे.

‘‘मैं तो नहीं हटूंगी,’’ मैं भी अड़ गई थी.

‘‘कमल, झिकझिक न कर, नेग तो देना ही होगा,’’ मां और एक बुजुर्ग महिला ने बीचबचाव किया था.

‘‘तुम्हीं बताओ, इसे कितनी बख्शीश दें?’’ भैया ने स्नेहिल दृष्टि से भाभी को देखते हुए पूछा था.

भाभी तो संकोच से आधे घूंघट में और भी सिमट गई थीं. किंतु मुझे कुछ बुरा लगा था. मुझे कुछ देने के लिए भैया को अब किसी से पूछने की जरूरत महसूस होने लगी है.

अपनी शादी के बाद पहले विनय का फिर तनु का आगमन, सच ही मैं भी अपनी दुनिया में मस्त हो गई थी. मुझे खुश देखती मां, पिताजी व भैया की खुशी से उछलती तृप्त दृष्टि में भी एक कातर रेखा होती थी कि मीनू अब पराई हो गई. मां तो मुझ से कितनी जुड़ी हुई थीं. घर का कोई महत्त्वपूर्ण काम होता है तो मीनू से पूछ लो, कुछ विशेष सामान लाना हो तो मीनू से पूछ लो. शायद मेरे पराए हो जाने का एहसास ही उन के लिए मेरे बिछोह को सहने की शक्ति भी बना होगा.

‘‘संभालो अपने शहजादे को,’’ भैया, मुन्ने को भाभी के पास लिटाते हुए बोले, ‘‘अब पड़ेगी डांट. मैं यह कहने आया था कि मेज पर मां व विनयजी तेरा इंतजार कर रहे हैं.’’

खाने की मेज पर तनु नानी की गोद में बैठा दूध का गिलास होंठों से लगाए हुए है.

मेरे बैठते ही मां विनय से कहती हैं, ‘‘विनयजी, मैं सोच रही हूं कि 3 महीने बाद हम लोग मुन्ने का मुंडन करवा देंगे. आप लोग जरूर आइए, क्योंकि बच्चे के उतरे हुए बाल बूआ लेती है.’’

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मैं या विनय कुछ कहें इस से पहले ही भैया के मुंह से निकल पड़ता है, ‘‘अब ये लोग इतनी जल्दी थोड़े ही आ पाएंगे.’’

मैं जानती हूं कि भैया की इस बात में कोई दुराव नहीं है पर पता नहीं क्यों मेरा चेहरा बेरौनक हो उठता है.

विनय निर्विकार उत्तर देते हैं, ‘‘3 महीने बाद तो आना नहीं हो सकता. इतनी जल्दी मुझे छुट्टी भी नहीं मिलेगी.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

रंगीला ‘रतन’ का खत डियर डैडी के नाम

लेखक- ब्रजकिशोर पटेल

माई डियर वीर बहादुर डैडी, आप को यह जान कर खुशी होगी कि मैं आप के ही नक्शेकदम पर चल रहा हूं यानी मेरे इम्तिहान के नतीजे भी आप के इस साल के चुनावी नतीजे की तरह ही रहे हैं… टांयटांय फिस.

डैडी, आप मेरे सम ादार पिता हैं और अगर मेरे इम्तिहान के रिजल्ट की जानकारी आप को मेरे बताने से पहले ही मिल भी गई हो, तो मु ो यकीन है कि आप ने कभी भूल कर भी यह नहीं सोचा होगा कि मैं शर्म के मारे मरा जा रहा होऊंगा या कहीं डूब मरने के लिए चुल्लूभर पानी की तलाश कर रहा होऊंगा.

मैं अपने बहादुर डैडी का हिम्मती बेटा हूं. अपनी मरजी से सिर मुंड़ाता हूं, तो फिर ओले की परवाह भी नहीं करता हूं. हारजीत के मायामोह से मैं कोसों दूर हूं और आप के ही इस फलसफे का कायल हूं कि ‘गिरते हैं घुड़सवार ही मैदानेजंग में…’

और फिर डैडी, जिस तरह आप बहुत थोड़े से वोटों के अंतर से अपना तकरीबन जीता हुआ चुनाव हार गए थे, मैं भी बहुत थोड़े अंकों की कमी से पास होतेहोते रह गया हूं.

आदरणीय पिताजी, चुनाव हारने के बाद आप ने अपने पै्रस नोट में कहा था कि आप हारे नहीं हैं, बल्कि साजिशन हराए गए हैं, क्योंकि विरोधियों ने फर्जी वोटिंग कराई थी.

आप के चुनाव हारने की एक बहुत बड़ी वजह ‘भितरघात’ भी रही है. मेरे साथ भी कुछ भितरघातियों ने खुराफात की है.

मैं जिन्हें अपना खास दोस्त सम ाता रहा, उन्होंने जानबू ा कर ‘भूगोल’ के परचे के दिन मेरी जेब में ‘इतिहास’ की चिटें और ‘इतिहास’ के परचे के दिन ‘अर्थशास्त्र’ की चिटें रख दी थीं,

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वरना डैडी आप ही सोचिए कि आप का पूत इतना

कपूत तो नहीं हो सकता

कि ठीक से नकल भी न

कर सके.

प्रिंसिपल के नोटिस से आप को पता चला ही होगा कि इस साल मु ो नकल करते रंगे हाथों पकड़ा

गया था.

ऐसा मेरे विरोधियों की चाल के चलते हुआ है. उन्होंने साजिशन मेरी जेब

में पहले से ही नकल

की परचियां और चाकू रख दिए थे, वरना डैडी, मैं तो अपने कारतूस इस तरह छिपा कर रखता हूं कि सीबीआई भी जांच करे तो हाथ कुछ नहीं लगे.

डियर डैडी, चुनाव में हारने के बावजूद जिस तरह आप ने हिम्मत नहीं हारी थी और पार्टी के संगठन की जिम्मेदारी उठाने के लिए हाईकमान का आदेश सिरआंखों पर ले लिया था, ठीक इसी तरह ‘नकल कांड’ और 3 साल तक इम्तिहान से वंचित किए जाने के बाद मु ो कोई गिलाशिकवा नहीं है. इन 3 सालों में मैं कालेज की छात्र यूनियन को मजबूत करने का काम पूरा मन लगा कर करूंगा.

सीनियर होने के नाते जूनियर छात्रों द्वारा आसानी से नेता मान लेने का फायदा तो मु ो मिलेगा ही, आप को यह जान कर खुशी होगी कि हमारी छात्र यूनियन ने उत्तर प्रदेश के नकल विरोधी कानून के बावजूद वहां के छात्रों द्वारा नकल परंपरा को जिंदा रखने और किए गए हिफाजत के उपायों की स्टडी करने के लिए वहां एक दल भेजने का फैसला लिया है.

यह दल उत्तर प्रदेश से लगे हुए हमारे मध्य प्रदेश के भिंड, मुरैना, शिवपुरी वगैरह जिलों में अपनाई जाने वाली ‘बेहतरीन’ नकल तरीकों की भी स्टडी करेगा.

अब आप यह तो सम ा ही गए होंगे कि इस दल की जिम्मेदारी भी मु ो ही सौंपी गई है.

अभी मुझे यह खबर मिली है कि मेरे सुपर डैडी ने कमाल कर दिया है. आप ने मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोंक दिया है. सत्ता दल के

25 विधायकों को तोड़ कर उसे अल्पमत में ला दिया है. ऐसा लग रहा है, जैसे आप सप्लीमैंट्री एग्जामिनेशन में पास हो गए हैं. वैरी गुड डैडी. आप को अब 5 साल का इंतजार नहीं करना पड़ा. मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण से पहले ही आप को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.

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डियर डैडी, इंतजार तो मु ो भी नहीं करना पड़ा, अगले इम्तिहान का सालभर. रीटोटलिंग की फैसिलिटी का फायदा उठा कर मैं एक विषय में पास हो गया. नतीजतन, मु ो पूरक परीक्षा का पात्र मान लिया गया. पूरक परीक्षा में कुछ नकल टीप ली और कुछ प्रिंसिपल को डराधमका कर पासिंग मार्क्स हासिल कर लिए.

आप के आशीर्वाद से मैं भी आप की ही तरह जुगाड़तुगाड़ कर के आखिरकार पास हो ही गया. आखिर बेटा किस

का हूं.

डियर डैडी, इस लिहाज से हम

दोनों की कामयाबी तो यही साबित करती है कि भारतीय लोकतंत्र में ‘जुगाड़तुगाड़’ बहुत जरूरी कला है. जो इस कला में माहिर है, वह हार कर भी जीत सकता है. और तो और जो इस कला से अनजान है, वह जीत कर भी हार सकता है.

आप का होनहार वारिस,

रंगीला ‘रतन’.

कोरोना के नाम पर भ्रम फैलाता अंधविश्वास

कोरोना वायरस से जहां पूरा विश्व परेशान है, वहीं सोशल मीडिया पर अंधविश्वास का बाजार गरम है. दूसरे बाहरी देशों की तरह भारत में भी कोरोना वायरस तेजी से पांव पसार रहा है, मगर दूसरी तरफ सुरक्षा के तमाम उपायों की अपील के बावजूद धर्म के ठेकेदारों द्वारा अंधविश्वास फैला कर लोगों को गुमराह किया जा रहा है.

इन दिनों कैसेकैसे अंधविश्वास फैला कर लोगों को गुमराह किया जा रहा है, आप भी जानिए:

रामचरितमानस और कोरोना

सोशल मीडिया पर फैल रही इस अफवाह ने एक बार फिर 90 के दशक में फैली अफवाह की याद ताजा करा दी है, जिस में यह दावा किया गया था कि मंदिरों, घरों में रखी गणेश की मूर्ति दूध पीने लगी है. इस अफवाह की वजह से लोगों का हुजूम मंदिरों में उमड़ पड़ा था और हजारोंलाखों लिटर दूध नालियों में बहा दिया गया था.

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आज जहां कोरोना वायरस महामारी बन चुका है, इस के खतरों के बीच आजकल सोशल मीडिया पर एक अंधविश्वास खूब फैलाया जा रहा है, जिस में यह दावा किया जा रहा है कि रामचरितमानस के बालकांड के पन्नों  को ध्यान से देखने पर उन में एक बाल दिख सकता है. यह बाल उसी को दिखेगा जो धर्म के रास्ते पर चलता है या भगवान की आराधना करता है.

लोगों को बताया जा रहा है कि गंगाजल या जिस के पास गंगाजल उपलब्ध नहीं है वह घर में एक साफ लोटे में पानी भर ले और इस बाल को उस में डाल कर पूरे परिवार को यह पानी पिला दे तो उसे और उस के परिवार का कोरोना वायरस कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.

दायां अंगूठा और हलदी

उत्तराखंड की रहने वाली रानी बिष्ट को किसी ने ह्वाट्सएप पर भेजा कि ग्राम नागेलाव, वाया पीसांगन, जिला अजमेर के एक अस्पताल में एक बालिका का जन्म हुआ. बालिका ने जन्म लेते ही बोला कि भारत में जो कोरोना वायरस संक्रमण फैला हुआ है, उस के बचाव के लिए भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने दाएं पैर के अंगूठे के नाखून पर हलदी का लेप लगाना है. इस से कोरोना का संक्रमण खत्म हो जाएगा और सभी नागरिक सकुशल रहेंगे.

यह कह कर बालिका की उसी समय मौत हो गई. यह देख कर अस्पताल के डाक्टर भी हैरान रह गए. आप से निवेदन है कि आप भी तत्काल इस तरह का लेप अपने दाएं पैर के अंगूठे के नाखून पर लगा कर कोरोना वायरस संक्रमण से अपनी और अपने परिवार की जिंदगी बचाएं.

रानी बिष्ट ने फोन पर बताया कि कोरोना वायरस से हम लोग काफी डरे हुए हैं और इसी डर की वजह से हम ने सोचा कि चलो क्या हर्ज है इस में, सो खुद भी लेप लगाया और परिवार के दूसरे लोगों को भी लगा दिया.

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डर का माहौल 

सोशल मीडिया पर आजकल शास्त्रों और ग्रंथों का हवाला दे कर यह दावा किया जा रहा है कि इस महामारी का उल्लेख सैकड़ों साल पहले साधुसंतों ने अपने लिखित ग्रंथों में किया था और यह दावा किया था कि पृथ्वी पर कलियुग का अंत महामारी और प्रलय से होगा. लाखोंकरोड़ जीवजंतु मारे जाएंगे, इसलिए अधिक से अधिक लोग धर्म के रास्ते पर चलें और देवीदेवताओं व गुरुओं की आराधना करें.

जाहिर है, यह डर भी धर्म के उन्हीं पाखंडियों की ओर से फैलाया जा रहा है जो चाहते हैं कि लोग विज्ञान का रास्ता छोड़ कर ऊपर वाले की आराधना में लगे रहें, पूजापाठ करें जिस से वे तो मजे में रहें, जनता लुटतीपिटती रहे.

सिलबट्टे का शोर

ग्रामीण क्षेत्रों में एक अंधविश्वास जोरों पर है. इस में एक सिलबट्टे पर किसी बरतन या बालटी को रख कर उसे गोबर से पाट दिया जाता है. कुछ देर बाद उस बरतन को पकड़ कर उठाने के लिए बोला जाता है.

अफवाह फैला दी गई है कि बरतन को पकड़ कर उठाने से अगर सिलबट्टा छूट कर नहीं गिरा तो समझो कि उस के घर कोरोना वायरस का असर नहीं होगा. जिस का सिलबट्टा हट कर गिर जाएगा उसे खतरा है और इस के लिए उसे हवन व पूजापाठ कराना होगा.

यह एक कोरा अंधविश्वास है जो भौतिकी के सिद्धांत पर आधारित है. विशेषज्ञ मानते हैं कि गोबर भारी होता है और सिलबट्टे और बालटी के बीच आने से वैक्यूम बन जाता है यानी इस में हवा का दबाव होता है जो सिलबट्टे और बालटी को मजबूती से जकड़ लेता है.

यह थ्योरी भी उसी सिद्धांत पर काम करती है जो एक गिलास में भरे हुए पानी पर कागज रख कर उलटा करने पर भी गिलास में से पानी के नहीं गिरने जैसी होती है. यह कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि विज्ञान है.

ऐसे बचें कोरोना से

दुनियाभर के वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जोर दे कर कहा है कि कोरोना वायरस का संक्रमण एक इनसान से दूसरे इनसान में होता है. कोविड 19 नामक यह बीमारी संक्रमित आदमी के संपर्क में आने, खांसने और छूने के बाद उस वायरस के मानव शरीर में प्रवेश करने की वजह से होती है.

अभी तक इस की कोई वैक्सीन या दवा उपलब्ध नहीं है और जितना संभव हो लोगों से हाथ मिलाना, उन के करीब जाना, भीड़भाड़ वाले इलाके से दूर रहना आदि से ही इस का बचाव संभव है.

विशेषज्ञों ने लोगों को इस दौरान धार्मिक जगहों पर भी जाने से मना किया है तो जाहिर है कि इस बीमारी का इलाज तथाकथित देवीदेवता आदि के हाथों में तो कतई नहीं है.

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बेहतर यही होगा कि सरकार और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझावों को मानें, तभी इस जानलेवा बीमारी से बचा जा सकता है. धार्मिक अंधविश्वास के चक्कर में तो कतई न पड़ें.

यह बीमारी पूरी दुनिया में अब भयंकर रूप ले चुकी है. हर देश के डाक्टर, नर्स और दूसरे मुलाजिम युद्ध स्तर पर इस बीमारी से जूझ रहे हैं. उन सब की यही अपील है कि घरों में रहें.

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