पैनक्रियाटिक रोगों की बड़ी वजहें

 लेखक- डा. विकास सिंगला

युवा कामकाजी प्रोफैशनल्स में अल्कोहल सेवन, धूम्रपान के बढ़ते चलन और गालस्टोन के कारण पैनक्रियाटिक रोगों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. पैनक्रियाज से जुड़ी बीमारियों में एक्यूट पैनक्रियाटाइटिस, क्रोनिक पैनक्रियाटाइटिस और पैनक्रियाटिक कैंसर के मामले ज्यादा हैं. लेकिन आधुनिक एंडोस्कोपिक पैनक्रियाटिक प्रक्रियाओं की उपलब्धता और इस बीमारी की बेहतर सम झ व अनुभव रखने वाली विशेष पैनक्रियाटिक केयर टीमों की बदौलत इस से जुड़े गंभीर रोगों पर भी अब आसानी से काबू पाया जा सकता है.

आधुनिक पैनक्रियाटिक उपचार न्यूनतम शल्यक्रिया तकनीक के सिद्धांत पर आधारित है और इसे मरीजों के लिए सुरक्षित व स्वीकार्य इलाज माना जाता है.

पेट के पीछे ऊपरी हिस्से में मौजूद पैनक्रियाज पाचन एंजाइम और हार्मोन्स (ब्लडशुगर को नियंत्रित रखने वाले इंसुलिन सहित) को संचित रखता है. पैनक्रियाज का मुख्य कार्य शक्तिशाली पाचन एंजाइम को छोटी आंत में संचित रखते हुए पाचन में सहयोग करना होता है. लेकिन स्रावित होने से पहले ही जब पाचन एंजाइम सक्रिय हो जाते हैं तो ये पैनक्रियाज को नुकसान पहुंचाने लगते हैं जिन से पैनक्रियाज में सूजन यानी पैनक्रियाटाइटिस की स्थिति बन जाती है.

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एक्यूट पैनक्रियाटाइटिस इन में सब से आम बीमारी है, जो प्रतिदिन 50 ग्राम से ज्यादा अल्कोहल सेवन, खून में अधिक वसा और कैल्शियम होने, कुछ दवाइयों के सेवन, पेट के ऊपरी हिस्से में चोट, वायरल संक्रमण और पैनक्रियाटिक ट्यूमर के कारण होती है. गालब्लैडर में पनपी पथरी पित्तवाहिनी तक पहुंच सकती है और इस से पैनक्रियाज नली में रुकावट आ सकती है, जिस कारण एक्यूट पैनक्रियाटाइटिस होता है. बुजुर्गों में ट्यूमर ही इस का बड़ा कारण है. इस में पेट के ऊपरी हिस्से से दर्द बढ़ते हुए पीठ के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाता है. कुछ गंभीर मरीजों को सांस लेने में तकलीफ और पेशाब करने में भी दिक्कत आने लगती है.

इस बीमारी का पता लगने पर ज्यादातर मरीजों को इलाज के लिए अस्पताल में रहना पड़ता है. मामूली पैनक्रियाटाइटिस आमतौर पर एनलजेसिक और इंट्रावेनस दवाइयों से ही ठीक हो जाती है. लेकिन थोड़ा गंभीर और एक्यूट पैनक्रियाटाइटिस जानलेवा भी बन सकती है और इस में मरीजों को लगातार निगरानी व सपोर्टिव केयर में रखना पड़ता है.

ऐसी स्थिति में मरीज को नाक के जरिए ट्यूब डाल कर भोजन पहुंचाया जाता है. पैनक्रियाज के आसपास की नलियों से संक्रमित द्रव को कई बार एंडोस्कोपिक तरीके से या ड्रेनट्यूब के जरिए बाहर निकाला जाता है. उचित इलाज और विशेषज्ञों की देखरेख में एक्यूट पैनक्रियाटाइटिस से पीडि़त ज्यादातर मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाते हैं.

इस बीमारी की पुनरावृत्ति से बचने के लिए अल्कोहल का सेवन छोड़ देना चाहिए और गालब्लैडर से सर्जरी के जरिए पथरी निकलवा लेनी चाहिए. लिपिड या कैल्शियम लैवल को दवाइयों से नियंत्रित किया जा सकता है. इस के अलावा, क्रोनिक पैनक्रियाटाइटिस की डायग्नोसिस और इलाज में एंडोस्कोपिक स्कारलैस प्रक्रियाओं की अहम भूमिका होती है. इस में मरीज को लगातार दर्द या पेट के ऊपरी हिस्से में बारबार दर्द होता है. लंबे समय तक बीमार रहने पर भोजन पचाने के लिए जरूरी पैनक्रियाटिक एंजाइम की कमी और इंसुलिन के अभाव में डायबिटीज होने के कारण डायरिया की शिकायत हो जाती है. पैनक्रियाज और इस की नली की जांच के लिए इस में एमआरसीपी और एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड जैसे टैस्ट कराने पड़ते हैं.

पैनक्रियाटिक ट्यूमर भी धूम्रपान, डायबिटीज मेलिटस, क्रोनिक पैनक्रियाटाइटिस और मोटापे के कारण होता है. इस के लक्षणों में पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, पीलिया, भूख की कमी और वजन कम होना है. ऐसे मरीजों का सब से पहले सीटी स्कैन किया जाता है. जरूरत पड़ने पर ही ईयूएस और टिश्यू सैंपलिंग कराई जाती है. इस में लगभग 20 फीसदी कैंसर का पता लगते ही सर्जरी कराई जाती है, बाकी मरीजों को कीमोथेरैपी दी जाती है.

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कीमोथेरैपी के बाद बहुत कम जख्म रह जाता है और फिर मरीज की सर्जरी की जाती है. कीमोथेरैपी से पहले मरीज के पीलिया के इलाज के लिए कई बार ईआरसीपी और स्टेंटिंग भी कराई जाती है. ईआरसीपी के दौरान पित्तवाहिनी में स्टेंट डाला जाता है ताकि ट्यूमर के कारण आए अवरोध को दूर किया जा सके.

पैनक्रियाटिक कैंसर से पीडि़त कुछ मरीजों को तेज दर्द भी हो सकता है. ऐसे में उन्हें दर्द से नजात दिलाने के लिए ईयूएस गाइडेड सीपीएन (सेलियक प्लेक्सस न्यूरोलिसिस) कराया जाता है.

(लेखक मैक्स सुपरस्पैशलिटी हौस्पिटल, साकेत, नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंट्रोलौजी विभाग के निदेशक हैं.)     

  ब्रेन पावर के लिए खाएं ये फूड्स

हमारा ब्रेन पावर बढ़ाने में खानपान की अहम भूमिका होती है. अपने खानपान में निम्न चीजों को शामिल कर के आप तेज याद्दाश्त और दिमाग पा सकते हैं :

हरी पत्तेदार सब्जियों, जैसे पालक आदि में मैग्नीशियम और पोटैशियम प्रचुर मात्रा में होता है. इन के सेवन से मैमोरी शार्प होती है और दिमाग की क्षमता भी बढ़ती है.

नट्स और बीज में कई पोषक तत्त्व पाए जाते हैं और इन में विटामिन ई, स्वस्थ वसा और प्रोटीन होते हैं जोकि दिमाग के लिए काफी फायदेमंद हैं.

मसाले एंटीऔक्सीडैंट के अच्छे सोर्स होते हैं. हलदी, दालचीनी और अदरक का सेवन दिमाग के लिए फायदेमंद रहता है और ये मस्तिष्क में आने वाली सूजन को भी कम करते हैं.

कौफी मूड को अच्छा और शरीर को एक्टिव रखने में मदद कर सकती है. कैफीन और एंटीऔक्सीडैंट गुणों के कारण अल्जाइमर जैसी कुछ बीमारियों से भी कौफी बचाती है.

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वसायुक्त मछली, जैसे सैल्मन, ट्यूना या कौड ओमेगा-3 फैटी एसिड के अच्छे स्रोत हैं. याद्दाश्त तेज करने और मूड को बेहतर बनाने में ओमेगा-3 एस की अहम भूमिका है.

कई अध्ययनों से साफ हो चुका है कि दिमाग की ताकत बढ़ाने के लिए ब्लैकबेरी का सेवन फायदेमंद रहता है. शौर्ट टर्म मैमोरी लौस वाले इस का सेवन कर सकते हैं.

– किरण आहूजा   

छोटी छोटी खुशियां- भाग 1: शादी के बाद प्रताप की स्थिति क्यों बदल गई?

Writer- वीरेंद्र सिंह

 

सुधा ने प्रताप के सामने खाने की प्लेट रखी तो उस में मूंग की दाल देख कर वह फुसफुसाया, ‘बाप रे, फिर वही मूंग की दाल.’

प्रताप के यह कहने में न शिकायत थी, न ही उग्रता. उस की आवाज में लाचारी एकदम साफ झलक रही थी. अभी कल ही यानी अपने नियम के अनुसार बुधवार को सुधा ने मूंग की दाल बनाई थी. आज फिर वही दाल खाने का बिलकुल मन नहीं था, फिर भी बिना कुछ बोले प्रताप ने खा ली थी. प्रताप ने धीरे से कहा, ‘‘जानती हो कि मुझे मूंग की दाल जरा भी अच्छी नहीं लगती, फिर भी आज तुम ने वही बना दी है. तुम ने हद कर दी है.’’

प्रताप की पत्नी सुधा रसोई में चुपचाप खड़ी थी. 27 वर्षीया सुधा की गठीली देह गहरे आसमानी रंग के गाउन में कुछ अधिक ही गोरी लग रही थी. प्रताप ने जो कहा था, उसे सुन कर उस के सुंदर चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं आया था. अपने पतले होंठों को सटाए वह प्रताप को ही ताक रही थी. प्रताप के ये शब्द उस के कानों में पड़े, तो पलभर में ही उस की आंखों की चमक बदल गई.

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प्रताप ने चेहरा उठा कर उस की ओर देखा. सामने चूहा पड़ने पर जो चमक सांप की आंखों में होती है, कुछ वैसी ही चमक सुधा की आंखों में भी तैरने लगी थी. सुधा के बंद होंठों के पीछे जो बवंडर उठ रहा था वह तबाही मचाने के लिए बेचैन होने लगा था.

प्रताप ने आगे कहा, ‘‘आज तो इस में जलने की भी गंध आ रही है.’’

सुधा को जैसे प्रताप के इन्हीं शब्दों का इंतजार था. नाक फुला कर वह प्रताप की ओर बढ़ी, ‘‘तुम्हारे कहने का मतलब यह है कि मुझे खाना बनाना भी नहीं आता?’’ सुधा अपनी नजरें प्रताप के चेहरे पर जमा कर व्यंग्य से बोली, ‘‘तुम्हें मनपसंद खाना बनाने वाली पत्नी चाहिए थी तो क्या झक मारने के लिए मुझ से शादी की थी? रहने तक का तो ठिकाना नहीं था. भिखारियों की तरह तो रह रहे थे, चले थे विवाह करने.’’

प्रताप सिर झुकाए बैठा था. खा जाने वाली निगाहों से घूरते हुए सुधा ने कहा, ‘‘इस घर में तो मेरी ही मरजी चलेगी. मैं वही बनाऊंगी जो मेरा मन करेगा. तुम्हारी जीभ बहुत चटपटा रही हो तो स्वयं ही बना कर खा लिया करो.’’

सुधा की आवाज मारे गुस्से के तेज हो गई थी. सुधा द्वारा कहे शब्द प्रताप के कानों में गरम शीशे की तरह उतर रहे थे. लेकिन प्रताप को तो 4 साल से यही सब सुनने की आदत सी पड़ गई थी. इस तरह की बातें अब तक वह इतनी सुन चुका था कि उस पर इन बातों का कोई असर नहीं होता था.

‘‘चुप क्यों हो, बोलो न? किसी अच्छे घर की लड़की लाने की हिम्मत थी तुम्हारी?’’ अग्निबाण की तरह दनादन सुधा के होंठों से शब्द छूट रहे थे. प्रताप सिर झुका कर सोच में डूब गया था. सुधा की भी बातें अपनी जगह सच थीं. उसे अपना अतीत याद आ गया.

5 साल पहले प्रताप को बैंक में नौकरी मिली तो वह गढ़वाल का अपना गांव और मांबाप को छोड़ कर दिल्ली आ गया था. शुरू में 1 सप्ताह तो वह अपने बड़े भाई के साथ रहा. उस के बड़े भाई पत्नी और बच्चों के साथ दिल्ली में एक कच्ची कालोनी में रहते थे. वे एक प्राइवेट फैक्टरी में नौकरी करते थे. उन्होंने उस कच्ची कालोनी में 25 गज का छोटा सा प्लौट खरीद कर 1 कमरे का छोटा सा मकान बना लिया था. फैक्टरी में उन्हें बहुत ज्यादा वेतन नहीं मिलता था. किसी तरह वे 5 लोगों का परिवार पाल रहे थे.

उन के यहां रह कर बैंक में नौकरी करना प्रताप के लिए आसान न था. उस का बैंक वहां से लगभग 25 किलोमीटर दूर था. वहां से आनेजाने के लिए बसों की सुविधा भी ठीकठाक न थी. इसलिए न चाहते हुए भी उसे अपने रहने की व्यवस्था अलग करनी पड़ी. दिल तो उस का नहीं मान रहा था परंतु वहां परेशानियां अधिक थीं. प्रताप ने बैंक के पास ही एक कमरा किराए पर ले लिया. वहां से वह 10 मिनट में ही बैंक पहुंच जाता था. उसी बीच आनंद मामा उस के लिए एक रिश्ता ले आए थे.

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आनंद मामा की गिनती अपने इलाके के भले आदमियों में होती थी. वे प्रताप की मां के मौसेरे भाई थे. प्रताप के मांबाप गांव में ही रह रहे थे. गांव में जो थोड़ी खेती थी, उसे पिता संभाल रहे थे. बूढ़े मांबाप को आनंद मामा ने बड़े प्रेम से समझाया था, ‘इस तरह की सुंदर और पैसे वाले घर की लड़की प्रताप के लिए जल्दी नहीं मिलेगी. बहुत बड़े घर की बेटी है. दरअसल, लड़की की सगाई कहीं और हुई थी, लेकिन वह टूट गई है. इसीलिए लड़की के मांबाप प्रताप के साथ शादी करने को तैयार हैं. वरना उन के सामने तुम्हारी कुछ भी हैसियत नहीं है.’

दो कदम तन्हा- भाग 2: अंजलि ने क्यों किया डा. दास का विश्वास

Writer- डा. पी. के. सिंह 

डा. दास ने प्रश्न सुना लेकिन जवाब नहीं दिया. वह बगल में बाईं ओर मेडिसिन विभाग के भवन की ओर देखने लगे.

अंजलि ने थोड़ा आश्चर्य से देखा फिर पूछा, ‘‘कितने बच्चे हैं?’’

‘‘2 बच्चे हैं.’’

‘‘लड़के या लड़कियां?’’

‘‘लड़कियां.’’

‘‘कितनी उम्र है?’’

‘‘एक 10 साल की और एक 9 साल की.’’

‘‘और कैसे हो, दास?’’

‘‘मुझे दास…’’ अचानक डा. दास चुप हो गए. अंजलि मुसकराई. डा. दास को याद आ गया, वह अकसर अंजलि को कहा करते थे कि मुझे दास मत कहा करो. मेरा पूरा नाम रवि रंजन दास है. मुझे रवि कहो या रंजन. दास का मतलब स्लेव होता है.

अंजलि ऐसे ही चिढ़ाने वाली हंसी के साथ कहा करती थी, ‘नहीं, मैं हमेशा तुम्हें दास ही कहूंगी. तुम बूढ़े हो जाओगे तब भी. यू आर माई स्लेव एंड आई एम योर स्लेव…दासी. तुम मुझे दासी कह सकते हो.’

आज डा. दास कालिज के सब से पौपुलर टीचर हैं. उन की कालिज और अस्पताल में बहुत इज्जत है. लोग उन की ओर देख रहे हैं. उन्हें कुछ अजीब सा संकोच होने लगा. यहां यों खड़े रहना ठीक नहीं लगा. उन्होंने गला साफ कर के मानो किसी बंधन से छूटने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘बहुत भीड़ है. बहुत देर से खड़ा हूं. चलो, कैंटीन में बैठते हैं, चाय पीते हैं.’’

अंजलि तुरंत तैयार हो गई, ‘‘चलो.’’

बेटे को यह प्रस्ताव नहीं भाया. उसे भीड़, रोशनी और आवाजों के हुजूम में मजा आ रहा था, बोला, ‘‘ममी, यहीं घूमेंगे.’’

‘‘चाय पी कर तुरंत लौट आएंगे. चलो, गंगा नदी दिखाएंगे.’’

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गेट से निकल कर तीनों उत्तर की ओर गंगा के किनारे बने मेडिकल कालिज की कैंटीन की ओर बढ़े. डा. दास जल्दीजल्दी कदम बढ़ा रहे थे फिर अंजलि को पीछे देख कर रुक जाते थे. कैंटीन में भीड़ नहीं थी, ज्यादातर लोग प्रदर्शनी में थे. दोनों कैंटीन के हाल के बगल वाले कमरे में बैठे.

कैंटीन के पीछे थोड़ी सी जगह है जहां कुरसियां रखी रहती हैं, उस के बाद रेलिंग है. बालक की उदासी दूर हो गई. वह दौड़ कर वहां गया और रेलिंग पकड़ कर गंगा के बहाव को देखने लगा.

डा. दास और अंजलि भी कुरसी मोड़ कर उधर ही देखने लगे. गरमी नहीं आई थी, मौसम सुहावना था. मोतियों का रंग ले कर सूर्य का मंद आलोक सरिता के शांत, गंभीर जल की धारा पर फैला था. कई नावें चल रही थीं. नाविक नदी के किनारे चलते हुए रस्सी से नाव खींच रहे थे. कई लोग किनारे नहा रहे थे.

मौसम ऐसा था जो मन को सुखद बीती हुई घडि़यों की ओर ले जा रहा था. वेटर चाय का आर्डर ले गया. दोनों नदी की ओर देखते रहे.

‘‘याद है? हम लोग बोटिंग करते हुए कितनी दूर निकल जाते थे?’’

‘‘हां,’’ डा. दास तो कभी भूले ही नहीं थे. शाम साढ़े 4 बजे क्लास खत्म होने के बाद अंजलि यहां आ जाती थी और दोनों मेडिकल कालिज के घाट से बोटिंग क्लब की नाव ले कर निकल जाते थे नदी के बीच में. फिर पश्चिम की ओर नाव खेते लहरों के विरुद्ध महेंद्रू घाट, मगध महिला कालिज तक.

सूरज जब डूबने को होता और अंजलि याद दिलाती कि अंधेरा हो जाएगा, घर पहुंचना है तो नाव घुमा कर नदी की धारा के साथ छोड़ देते. नाव वेग से लहरों पर थिरकती हुई चंद मिनटों में मेडिकल कालिज के घाट तक पहुंच जाती.

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डूबती किरणों की स्वर्णिम आभा में अंजलि का पूरा बदन कंचन सा हो जाता. वह अपनी बड़ीबड़ी आंखें बंद किए नाव में लेटी रहती. लहरों के हलके छींटे बदन पर पड़ते रहते और डा. दास सबकुछ भूल कर उसी को देखते रहते. कभी नाव बहती हुई मेडिकल कालिज घाट से आगे निकल जाती तो अंजलि चौंक कर उठ बैठती, ‘अरे, मोड़ो, आगे निकल गए.’

डा. दास चौंक कर चेतन होते हुए नाव मोड़ कर मेडिकल कालिज घाट पर लाते. कभी वह आगे जा कर पटना कालिज घाट पर ही अनिच्छा से अंजलि को उतार देते. उन्हें अच्छा लगता था मेडिकल कालिज से अंजलि के साथ उस के घर के नजदीक जा कर छोड़ने में, जितनी देर तक हो सके साथ चलें, साथ रहें. वेटर 2 कप चाय दे गया. अंजलि ने बेटे को पुकार कर पूछा, ‘‘क्या खाओगे? बे्रडआमलेट खाओगे. यहां बहुत अच्छा बनता है.’’

Satyakatha: फरीदाबाद- नफरत का खतरनाक अंजाम- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

Writer- शाहनवाज

इस हत्या के दोनों आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद उन से पूछताछ के दौरान इस पूरे हत्याकांड की वजह सामने आई. दरअसल, नीरज और उस की पत्नी आयशा के जीवन में सब कुछ सही चल रहा था, लेकिन नीरज के मन में आयशा को ले कर उसे शक होता था.

आयशा अकसर अपने बचपन के दोस्तों के साथ फोन पर बातचीत किया करती थी. कई बार वह बातों में इतनी मशगूल हो जाती थी कि आयशा का ध्यान नीरज पर होता ही नहीं था.

इस के अलावा आयशा खुले दिमाग वाली युवती थी. दोस्तों के संग बातचीत, हंसीमजाक करना उसे बेहद पसंद था. लेकिन कहीं न कहीं आयशा का इस तरह का बर्ताव करना नीरज को पसंद नहीं आता था. इसी को ले कर अकसर नीरज और आयशा के बीच झगड़े होते रहते थे.

दोनों के बीच झगड़े इतने बढ़ जाते थे कि उन के बीच सुलह के लिए आयशा के मायके वालों को आना पड़ता था.

इसी बीच पिछले साल, नीरज ने आयशा के भाई यानी अपने साले गगन से 10 लाख रुपए उधार भी मांगे थे. एनआईटी फरीदाबाद का रहने वाला नीरज अपने इलाके में एक टेलर मैटेरियल की दुकान खोलना चाहता था, जिस के लिए उसे पैसों की जरूरत थी.

उस ने गगन से पैसे ले कर साल भर में वापस करने की बात भी कही थी. लेकिन जब एक साल से ज्यादा का समय हो गया तो गगन नीरज को पैसे लौटाने के लिए कहने लगा.

कोरोना की वजह से धंधा नहीं चलने के कारण नीरज के पास गगन को लौटाने के लिए पैसा इकट्ठे नहीं हो सके. वह गगन को आज कल कह कर हर दिन पैसे लौटाने की बात किया करता, लेकिन वह पैसों का जुगाड़ नहीं कर पा रहा था. ये बात कहीं न कहीं गगन को भी समझ आ गई थी कि उस के जीजा के पास पैसे नहीं है.

जब यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो आएशा की मां सुमन ने नीरज को ताना मारना शुरू कर दिया. सुमन और गगन के साथसाथ आएशा को जब कभी मौका मिलता, वे सब उसे पैसे लौटाने के लिए कहते, नहीं तो उसे किसी न किसी बहाने ताने मारते थे.

यही नहीं, पिछले एक साल से आयशा अपने बेटे सक्षम के साथ अपने मायके में ही थी. दोनों के बीच झगड़े के बाद आयशा अपने बेटे को ले कर अपने मायके रहने के लिए आ गई थी. और यह बात नीरज को काफी खटकने लगी थी.

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ये सब देखते हुए और इन सभी चीजों से परेशान हो कर उस ने इस हत्याकांड की प्लानिंग अपने दिमाग में ही रच ली थी.

पूरी प्लानिंग के चलते नीरज ने बीते कुछ दिनों से ससुराल के लोगों को राजीनामे के बहाने अपनी बातों में फंसाना शुरू कर दिया, ताकि उस पर कोई शक न कर सके.

इसी के चलते 15-16 दिन पहले नीरज ससुराल के लोगों से राजीनामा करने के बहाने मोहब्ताबाद गया और पूरी कोठी को अपनी नजरों में उतार लिया था.

उस ने इस हत्याकांड को अंजाम देने के लिए पैसों का लालच दे कर अपने करीबी दोस्त लेखराज को भी इस में शामिल कर लिया था.

इस हत्याकांड को अंजाम देने के लिए नीरज ने एक महीने पहले हापुड़ से 35 हजार रुपए में 2 देसी तमंचे, 2 चाकू और कुछ कारतूस खरीद लिए थे.

नीरज ने कभी न तो हथियार रखे और न ही चलाए थे, लेकिन पत्नी के चरित्र और पैसे के लेनदेन के चलते तीनों की हत्या करने के लिए उस ने तमंचा चलाना भी सीख लिया था. फिर उस ने 21 अक्तूबर, 2021 की रात को घटना को अंजाम दे दिया.

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कोई भी जीवित न बचे, इसलिए नीरज और लेखराज ने गोली चलाने के साथसाथ चाकुओं से भी वार किए.

सास सुमन को एक गोली लगी और चाकू के कई वार किए गए. आयशा को 2 गोली लगी थीं. राजन शर्मा को एक गोली सीने में लगी, जबकि गगन के कमर में गोली लगी थी.

नीरज को अनुमान था कि इस गोली से गगन की मौत हो जाएगी. लेकिन वह जीवित बच गया. दोनों आरोपियों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

घर का भूला- भाग 4: कैसे बदलने लगे महेंद्र के रंग

‘‘नहीं, आभा, अभी हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे. पहले मालती का पीछा कर उस के घर व घरवाले का पता लगाऊंगा, तब तुम मेरा खेल देखना. पापा अपने को बहुत होशियार समझते हैं.’’

‘‘मुझ को डर लग रहा है कि कहीं वह कमबख्त इस घर में धरना ही न दे दे.’’

‘‘अपना उतना बड़ा परिवार छोड़ कर क्या वह यहां पापा के साथ आ सकेगी?’’

‘‘ऐसी औरतें सब कर सकती हैं. अखबार में जबतब पढ़ते नहीं कि अपने 6 बच्चों को छोड़ कर फलां औरत अपने प्रेमी के साथ भाग गई, पति बेचारा ढूंढ़ता फिर रहा है.’’

‘‘उस औरत को भी क्या कहें? अभी मां को गए एक साल भी पूरा नहीं हुआ और पापा को औरत की जरूरत पड़ गई, धिक्कार है.’’

‘‘भैया, अगर ऐसी नौबत आई तो मैं मामा के पास चली जाऊंगी,’’ वह आंसू पोंछ कर बोली.

‘‘अपने भैया को बेसहारा छोड़ कर? तब मैं कहां जाऊंगा?’’

‘‘तब तो हम दोनों को नौकरी की तलाश करनी चाहिए. हम किराए का मकान ले कर रह लेंगे. सौतेली मां की छांह से भी दूर. तब मामा आदि के पास क्यों जाएंगे भला, इसी शहर में रहेंगे.’’

‘‘मां, तुम हम दोनों को बेसहारा छोड़ कर क्यों चली गईं. राह दिखाओ मम्मी, हम दोनों कहां जाएं, क्या करें?’’ अमित का धैर्य भी आंसू बन कर फूट पड़ा, आभा भी रो पड़ी.

दूसरे दिन अमित जल्दी घर से निकल कर मालती के इंतजार में स्कूटर लिए छिपा खड़ा था. जैसे ही वह घर से निकली वह छिपताछिपाता पीछे लग गया. उस का घर लगभग 2 किलोमीटर दूर था. अमित ने देखा उस के घर से छिपा कर लाई रोटीसब्जी मालती ने अपने बच्चों और पति में बांट दी. बच्चे खा कर यहांवहां खेलने निकल गए और जल्दी से अपने घर का काम निबटा कर मालती अपने घरवाले के जाते ही सजधज कर निकली. अमित उस के पीछेपीछे चलता रहा. वह मेन बाजार में जा कर खड़ी हो गई. थोड़ी देर बाद पापा गाड़ी ले कर आए. मालती लपक कर कार में बैठ गई. कार फिर उसी होटल की ओर बढ़ी. वे दोनों फिर उसी होटल में जा पहुंचे. अमित लौट आया.

दूसरे दिन मालती के घर से निकलते ही वह उस के पति हरिया के पीछे लग गया. घर से जब वह दूर आ गया तब स्कूटर उस के सामने कर के खड़ा हो गया, ‘‘सुनो भैया, हमारे यहां ढेरों सामान इकट्ठा है. वह हमें बेचना है.’’

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‘‘कहां है, आप का घर?’’ वह खुश हो कर बोला.

‘‘वह है दूर. अब आज नहीं कल ले चलूंगा. वह मालती तुम्हारी घरवाली है?’’

‘‘हां, तुम कैसे जानते हो?’’ वह बोला.

‘‘वह हमारे घर के पास ही काम करती है इसलिए जानता हूं. इस टाइम वह कहां जाती है?’’

‘‘वह किसी साहब के यहां जाती है, नौकर है वहां?’’

‘‘परंतु मैं ने तो उसे एक साहब के साथ बड़े होटल में जाते देखा है.’’

‘‘कब? कहां?’’ वह आंखें फाड़ कर बोला.

‘‘वह तो सजधज कर रोज जाती है. चलो, तुम्हें दिखाऊं,’’ बिना कुछ सोचे- समझे वह ठेला एक तरफ फेंक कर  उस के साथ हो लिया. रास्ते भर अमित नमकमिर्च लगा कर ढेरों बातें बताता चला गया. सुन कर वह क्रोध से पागल हो उठा.

‘‘उधर…ऊपर 22 नंबर कमरा खटखटाओ, साहब के साथ मालती जरूर मिलेगी. एक बात और, मेरा जिक्र किसी से मत करना, यही कहना कि मैं ने तुम्हें कार में बैठे देखा था, तभी से पीछा करते यहां आया हूं.’’

‘‘हां, भैया, यही कहूंगा. आज मैं उस की गति बना कर रहूंगा. कहती थी खाना बनाने जाती हूं,’’ इतना ही नहीं ढेर सारी भद्दी गालियां बकता हुआ वह कमरे की ओर बढ़ रहा था.

अमित एक कुरसी पर बैठ कर आने वाले तूफान का इंतजार करने लगा. उसे अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा. ऊपर से घसीटते, मारते, गालियों की बौछार करते वह मालती को नीचे ले आया. चारों ओर भीड़ जुटने लगी. तभी पुलिस भी आ पहुंची. पीछेपीछे भीड़ थी. थोड़ी देर की हुज्जत के बाद अमित ने देखा कि पुलिस वाले पापा का कालर पकड़े उन्हें धकियाते नीचे घसीटते ला रहे हैं. पापा का मुंह लज्जा से लाल पड़ गया था पर उसे दया नहीं आई. पुलिस वाले गालियों की असभ्य भाषा में उन्हें झिंझोड़ रहे थे. शायद वह ऊपर से खासी मरम्मत कर के लाए थे.

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पुलिस वाले ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ मालती के मुंह पर भी दे मारा, उस के मुंह से चीख निकल गई. मुंह से खून बह आया, उसे देख कर पापा पर घड़ों पानी पड़ गया, शर्म से सिर झुकाए वह पुलिस का हाथ झटक कर कार की ओर बढे़, तभी हरिया ने पीछे से उन का कालर पकड़ा, ‘‘ऐ साहब, मैं ऐसे ही नहीं छोड़ूंगा तुम्हें, मेरी औरत की इज्जत लूटी है तुम ने, मैं इस की डाक्टरी जांच कराऊंगा, समझा क्या है तुम ने?’’

‘‘छोड़ कालर, पहले तू अपनी औरत को संभाल फिर बात कर. जब वह राजी है तो दूसरों को दोष क्यों देता है?’’

‘‘तुम ने क्यों बहकाया मेरी घरवाली को?’’

‘‘पहले उस से पूछ, वह क्यों बहकी?’’

‘‘साहब, आप को थाने चलना पडे़गा,’’ पुलिस वाले ने बांह पकड़ कर खींचा.

भीड़ बढ़ती जा रही थी. वह किसी तरह फंदे से निकल कर कार स्टार्ट कर भाग छूटे, लोग चिल्लाते ही रह गए, इधर अमित भी स्कूटर स्टार्ट कर के घर की ओर रवाना हो गया. आते ही उस ने आभा को पूरी घटना बयान कर डाली. सुन कर आभा का मन जहां खुश था वहीं पिता के न आने से दोनों ने रात आंखों ही में काटी. वे दोनों उन के मोबाइल पर भी बात नहीं कर पाए.

दूसरे दिन न मालती आई न पापा. अमित छिप कर मालती के घर के चक्कर लगा आया. वह घर पर जैसे कैद थी. हरिया दरवाजे पर पहरा लगाए बैठा था. जब 3 दिन तक पापा का कुछ पता न लगा तो दोनों ने घबरा कर सब रिश्तेदारों को फोन कर दिए. तुरंत ही सब घबरा कर दौड़े आए. घर आ कर सब चिंता में पड़ गए. अमित ने अपनी चतुराई की रत्ती भर चर्चा नहीं की. वह पिता की व परिवार की नजरों में पाकसाफ रहना चाहता था. आभा ने भी होंठ नहीं खोले.

वे लोग अखबारों में विज्ञापन देने की सोच रहे थे कि दिल्ली से फोन आया कि वह आगरा आदि घूम कर घर लौट रहे हैं. सुन कर सब का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा. जब  वह वापस आए, किसी ने कुछ नहीं पूछा. अमित भी ऐसा बना रहा जैसे उसे कुछ मालूम ही नहीं है. वे दोनों अपने पापा को वापस अपने बीच पाना चाहते थे, शर्मिंदा करना नहीं चाहते थे. पापा के चेहरे पर भी पश्चात्ताप साफ नजर आ रहा था. सब को देख कर वह न हैरान हुए न परेशान, यह जरूर बतलाया कि उन्होंने अपना ट्रांसफर दूसरे शहर में करा लिया है. वह शीघ्र ही यहां से रिलीव हो कर चले जाएंगे.

तभी एक दिन बूआ ने पास बैठ कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘महेंद्र, अगर तू चाहे तो कहीं किसी विधवा से या तलाकशुदा किसी लड़की से बात चलाएं. पेपर में विज्ञापन देने से ढेरों आफर आ सकते हैं.’’

‘‘अरे  नहीं, दीदी, अब इस की जरूरत नहीं है. माया की याद क्या कभी दिल से निकल सकेगी? अब तो अमित और आभा के लिए सोच रहा हूं. दोनों को अच्छे मैच मिल जाएं तो घर आबाद हो जाएगा. मैं अमित को बिजनेस में डालने की सोच रहा हूं. जब तक इस का कारोबार जमेगा आभा भी एम.ए. कर लेगी. अब यहां मेरा मन नहीं लगता, न इन बच्चों का लगता है, क्यों अमित?’’

‘‘हां, पापा, अब यहां नहीं रहेंगे,’’ दोनों चहक उठे. तभी उन्होंने अकेले में अमित से पूछा, ‘‘अमित, तुम ने उस दिन की घटना किसी से बताई तो नहीं?’’ अमित को समझते देर न लगी कि पापा ने उस दिन उसे घटना वाली जगह पर देख लिया था.

बिना घबराए वह बोला, ‘‘नहीं, पापा, मेरी तो समझ में नहीं आया था कि यह क्या हो रहा है. मैं तो रोज की तरह उधर से गुजर रहा था कि झगड़ा और शोर सुन कर उधर आ गया, पता नहीं मालती किस के साथ थी, नाम आप का लग गया. जो हो गया उसे भूल जाइए, पापा. नए शहर में नया माहौल और नए लोग होंगे. आप यहां का सब भूल जाएं तो अच्छा है. इज्जतआबरू बची रहे यही सब से बड़ी बात है,’’ उसे विश्वास हो गया था कि पापा को जो ठोकर लगी है वह जिंदगी भर के लिए एक सबक है. सुबह का भूला घर आ गया था.

Akshara Singh का रिलेशनशिप को लेकर फूटा गुस्सा, कही ये बात

भोजपुरी एक्ट्रेस (Bhojpuri Actress) अक्षरा सिंह (Akshara Singh) अक्सर अपने बयानों से सुर्खियों में छायी रहती हैं. उनके बेबाक अंदाज को फैंस काफी पसंद करते हैं. अब उन्होंने लव लाइफ पर लेकर बड़ी बात कही है. आइए बताते हैं क्या कहा एक्ट्रेस ने.

अक्षरा सिंह ने रिलेशन को लेकर कहा कि ‘लड़के धोखेबाज हैं, पहले पटाते हैं उसके बाद आपको पता है, क्या कहते हैं? एक्ट्रेस का ये वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. एक्ट्रेस के इस बयान से लगता है कि एक्ट्रेस का लव लाइफ (Akshara Singh love life) से विश्वास ही उठ चुका है.

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दरअसल अक्षरा सिंह का एक पुराना वीडियो उनके फैन पेज पर शेयर किया गया है, जो इन दिनों वायरल हो रहा है. एक्ट्रेस  किसी स्टेज परफॉर्मेंस के लिए गई हैं और वहां उन्हें कहते हुए सुना जा सकता है कि लड़के धोखेबाज हैं, पहले झूठ बोलते हैं फिर पटाते हैं और बाद में, बाद में क्या कहते हैं आपको पता ही है?

 

एक्ट्रेस के फैन पेज पर इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा गया है, मोहब्बत की हर एक गली में बिके हैं, ये लड़के कभी एक पर ना टिके हैं.

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अक्षरा सिंह का लव लाइफ काफी विवादों में रहा. वह और पवन सिंह के काफी लंबे समय तक रिलेशन में रहे थे. जब एक्ट्रेस का ब्रेकअप हुआ तो सारी बातें खुलकर सामने आई. अक्षरा सिंह ने ब्रेकअप के अंतिम समय में एक्टर पर कई आरोप लगाए थे. उन्होंने उन पर मारपीट, गाली-गलौच के आरोप भी लगाए थे.

अनुपमा ने स्ट्रीट डॉग्स के साथ काटा केक, Video शेयर कर बताई ये बात

टीवी सीरियल अनुपमा (Anupama) फेम रूपाली गांगुली (Rupali Ganguly) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. वह आए दिन फैंस के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती हैं. रूपाली गांगुली का सीरियल अनुपमा लंबे समय से दर्शकों का फेवरेट शो बना हुआ है. सोशल मीडिया पर रूपाली गांगुली के फॉलोअर्स की संख्या 2 मिलियन यानी 20 लाख हो गई है. जी हां, एक्ट्रेस ने अपनी फोटो शेयर कर फैंस को शुक्रिया कहा है.

अनुपमा ने 2 मिलियन फॉलोअर्स को खास अंदाज में सेलिब्रेट किया है और इसका वीडियो भी इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया. इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि अनुपमा स्ट्रीट डॉग्स के साथ केक काट रही है, और उन्हें खिला रही. इस केक पर 2M लिखा है, जिसका मतलब है 2 मिलियन. रूपाली इस केक को काटकर अपने हाथ से उन्हें खिलाती नजर आ रही हैं.

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अनुपमा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, ‘मेरा मानना है कि मेरे द्वारा हासिल किया गया हर मील के पत्थर में इनका आशीर्वाद एक बड़ा कारण है. मेरे फर बेबीज जो कि मेरे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं, उन्हें इसका भी हिस्सा बनना है.

उन्होंने आगे लिखा कि जैसा कि आप में से ज्यादातर जानते हैं कि इन बेघरों के लिए काम करना मेरे जीवन का असली उद्देश्य है. उन्होंने मुझे बिना शर्त प्यार करना, वफादारी और जब किसी को आपकी सबसे ज्यादा जरूरत हो तब उनके साथ रहना सिखाया है.

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इस सेलिब्रेशन को सेलिब्रेट करने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है. उन्होंने ये भी लिखा है कि यह केक खासतौर पर कुत्तों के लिए बेक किया हुआ है जो कि मीठा नहीं और शुद्ध शाकाहारी केक है. अनुपमा के फैंस को उनका यह वीडियो काफी पसंद आ रहा है. वे उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं.

 

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अनुपमा सीरियल की बात करे तो वनराज ने बा को घर से निकाल दिया है, उसने कहा है कि जब तक बापूजी इस घर में वापस नहीं आ जाते तब तक बा भी घर के अंदर नहीं आ सकती.  ऐसे में बा अनुपमा से मदद मांगने गई है.  अनुपमा ने वनराज को खूब सुनाया है. वह वनराज को बा का अपमान करने से रोकेगी.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि वह याद दिलाएगी कि जो गलती बा ने की अपने पति का अपमान करके की है वही वनराज अपनी मां का अपमान करके कर रहा है. लेकिन अनुपमा की बातें सुनकर वनराज उसे बाहर वाली करके चुप कर देगा.

Crime: अब यू ट्यूब पर लोभी लालची सीखते हैं तंत्र मन्त्र!

रुपए की लालची एक गुरु चेले की जोड़ी ने कई लोगो को तंत्र मन्त्र के झांसे में लेकर शिकार बनाया था. और इसका अंत हुआ एक हत्या से, अंततः दोनों आरोपी 9 वर्ष बाद पुलिस के हत्थे चढ़े और अब जेल की चक्की पीस रहे हैं.

आज आधुनिक सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव अब दिखाई देने लगे हैं. दुर्भाग्य है कि यूट्यूब ऐसा माध्यम बन गया है जहां से अपराध के गुर सीखे जाते हैं और उन्हें अंजाम देकर के अशिक्षित और पैसों के लालची अपनी जिंदगी दांव पर लगा करके जेल जा रहे हैं.

दरअसल, हुआ यह कि  राम प्रसाद साहू ने छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला के थाना हिर्री आकर रिपोर्ट कराई कि उसके छोटे भाई सुरेश कुमार साहू को किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा धारदार हथियार  से गले व  चहरे में वार कर हत्या कर दी गई है.  हत्या कुछ रहस्यमय ढंग से की गई थी. जिसका अपराध पंजीबद्ध कर पुलिस विवेचना में लिया गया. मामले में पेंच दर पेंच देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक  दीपक कुमार झा  द्वारा अधिनस्थों को आवश्यक दिशा निर्देश दिए गये जिनके अनुसार आरोपियों की लगातार पतासाजी की जा रही थी, परन्तु आरोपियों का कोई पता नहीं चल रहा था.मगर पुलिस द्वारा लगातार प्रयास जारी था.

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मृतक सुरेश साहू से सम्बंधित सभी व्यक्तियों के सम्बन्ध में पुलिस  पृष्ठभूमि की‌ भीतरी जानकारी निकाल रही थी, इसी दौरान मृतक सुरेश साहू के जादू टोन व गड़े धन को तलाश करने में संलग्न रहने का पता पुलिस को चला. पुलिस अधिकारी दीपक झा ने हमारे संवाददाता को बताया कि ऐसे में ऐसे व्यक्तियों जो मृतक से जुड़े थे उनकी पतासाजी प्रारम्भ की गयी. अनवरत प्रयास के बाद पुलिस को पता चला की घटना के बाद से सम्बंधित व्यक्तियों में आरोपी सुभाष दास मानिकपुरी एवं माखन दास दोनों ही आसपास से घटना के  बाद  से गायब है.

पुलिस ने अपने ढंग से इनके सम्बन्ध में पतासाजी प्रारम्भ की गयी परन्तु कई वर्षो से इन दोनों के परिवार वालो से इनका सम्बन्ध ख़राब होने के कारण कोई भी व्यक्ति इनके संपर्क में नहीं था , जिसके कारण इनके सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. इसी दौरान  जानकारी प्राप्त हुई कि घटना के कुछ दिन बाद माखन दास ने बताया था कि वह सुभाष के साथ जबलपुर, मध्य प्रदेश में रह रहे है.

इसी आधार पर आरोपियों की पतासाजी हेतु टीम रवाना की गयी जो जबलपुर जाकर पतासाजी करने पर आरोपी के सतना, मध्यप्रदेश में मेडिकल कालेज में काम करने की  जानकारी मिली. अब यहां पुलिस ने  गहन छानबीन करने के बाद बामुश्किल आरोपी माखन दास को हिरासत में लिया . पुलिस पूछताछ में उसने सुभाष को जबलपुर में गार्ड की नौकरी करना बताया जिसकी निशानदेही पर आरोपी सुभाष को भी पकड़ा गया. जिनसे घटना के सम्बन्ध में कड़ाई से पूछताछ करने पर अपना जुर्म कबूला और पुलिस को अपने दिए गए इकबालिया बयान ने बताया कि गड़े धन व हंडा के लालच में आकर मृतक सुरेश साहू की बलि दी गई थी.

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जादू टोना, तंत्र मंत्र का परिणाम हत्या

पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि पूछताछ करने पर  आरोपी सुभाष वर्ष 2012 से गड़े धन की तलाश कर रहा है व जादू टोना का काम कर रहा है जिसकी पहचान गड़े धन खोजने के चक्क्कर में माखन दास से हुई जो सुभाष को नए नए लोग से मिलवाता था जिनको कोई पारिवारिक समस्या रहती थी. जिसे सुभाष जादू टोने से ठीक करने का दावा कर पैसे वसूल लेता था. इसी दौरान माखन ने अपने पूर्व परिचित अपने गाँव के सुरेश साहू का भी परिचय सुभाष से कराया सुरेश भी कई वर्षो से गड़े धन की तलाश कर रहा था. जिससे इनके बीच घनिष्टता बढ़ गयी. आगे रुपयों पैसों के लालची यह लोग गुगल के ‌ यू ट्यूब पर जादू टोने के नए नए विडियो देखते व उसपर अलग अलग जगहों पर प्रयोग करते थे.

इसी बीच सुभाष और माखन ने सुरेश की बलि देकर गड़े खजाने को खोज निकालने का प्लान बनाया. जिसके लिए नवरात्रि के पहले की अमावस्या का दिन तय किया और उसी दिन मुरु पथराली खार क्षेत्र में तंत्र मन्त्र कर कुल्हाड़ी से सुरेश की हत्या कर दी हत्या के बाद जब कोई चमत्कार नहीं हुआ तंत्र मंत्र ने काम नहीं किया तो उन्हें हकीकत का एहसास हुआ कि हमारे हाथों को अपराध हो गया है और अब जेल जाना पड़ेगा और पकडे जाने के भय से फरार हो गये . कहते हैं ना कि अपराध छुपाए नहीं छुपता आखिर लगभग 9 वर्ष पश्चात मामले का खुलासा हुआ आरोपी जेल में चक्की पीसने के लिए मजबूर हो गए.

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