अहम होते हैं निगेटिव रोल : अक्षरा सिंह

अक्षरा सिंह ने भोजपुरी फिल्मों से अपना कैरियर शुरू किया था. इस के बाद वे हिंदी सीरियल भी करने लगीं. जल्दी ही वे दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी दिखाई देंगी. बिहार की रहने वाली अक्षरा सिंह ने अपनी स्कूली पढ़ाई पटना में की थी. उन की मां और पिता खुद ऐक्टिंग के क्षेत्र में ही हैं, इसलिए अक्षरा सिंह को लगा कि क्यों न वे भी इसी क्षेत्र में हाथ आजमाएं.

अक्षरा सिंह ने बहुत कम समय में भोजपुरी सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. इन फिल्मों में ‘सत्यमेव जयते’, ‘रामपुर का लक्ष्मण’, ‘देवदास’, ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’, ‘बजरंग’, ‘एक बिहारी सौ पर भारी’, ‘कालिया’, ‘बिगुल’ और ‘कसम गंगा मैया की’ शामिल हैं. फिल्मों के अलावा अक्षरा सिंह ने ‘सर्विस वाली बहू’ और ‘काला टीका’ जैसे हिंदी सीरियलों में भी काम किया है.

पेश हैं, अक्षरा सिंह से हुई बातचीत के खास अंश :

आप फिल्मों व सीरियलों में एकसाथ कैसे काम कर लेती हैं?

मुझे कम समय में ही भोजपुरी फिल्मों में पहचान मिल गई है. अब मैं पटना से मुंबई शिफ्ट हो गई हूं. यहीं कालेज में कौमर्स से अपनी पढ़ाई पूरी की है. जब मैं ऐक्टिंग में अपना कैरियर बनाने के लिए मुंबई आई थी, तब मन में तमाम तरह के सवाल थे. अब कैरियर को एक दिशा मिल गई है. आगे भी फिल्मों में अच्छा काम करना है, जिस से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो सके.

मैं ने फिल्मों के साथसाथ हिंदी सीरियल भी किए हैं. अब लोग मुझे घरघर में पहचानते हैं. दक्षिण और हिंदी फिल्मों में भी काम करने की योजना है. वैसे, फिल्मों और सीरियलों दोनों में एकसाथ काम करने के लिए समय को मैनेज करना पड़ता है.

फिल्म और सीरियल के काम में क्या फर्क है?

सीरियल में तो आप दर्शकों को रोज दिखते हैं. सीरियल में ज्यादा पहचान बनती है. यह जरूर है कि इस में मिलने वाले रोल से टाइप्ड होने का खतरा रहता है. ऐक्टिंग में ज्यादा हुनर टैलीविजन में दिखता है. सीरियलों में दिखाए जाने वाले निगेटिव रोल भी काफी अहम होते हैं. दर्शक इन को खूब पसंद करते हैं. कई बार तो लोग कलाकार को भूल कर किरदार को ही याद रखते हैं.

लड़कियों के लिए फिल्म लाइन को महफूज नहीं माना जाता है. आप क्या सोचती हैं?

फिल्म लाइन में लड़कियां महफूज नहीं हैं, यह गलत सोच है. पहले यह सोच हर आम परिवार के मन में बैठी हुई थी. इसी वजह से वे अपने घर की लड़की को यहां भेजने से डरते थे. उन का डर पूरी तरह से गलत भी नहीं है.

छोटे शहरों से आनी वाली लड़कियों के मन में अपार सपने होते हैं. उन सपनों को पूरा करने का भरोसा दिला कर कोई भी उन को ठग सकता है. पर अब हालात बदल गए हैं. लड़कियों को भरमाना अब आसान नहीं है.

आजकल भोजपुरी फिल्मों में आने वाली लड़कियां कई तरह के विवादों में उलझ जाती हैं. उन को ऐसे हालात से कैसे बचना चाहिए?

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाब होने के बाद छोटे शहरों की लड़कियों को ऐक्टिंग के बेहतर मौके मिलने लगे हैं. आज बड़ी तादाद में भोजपुरी फिल्में बनने लगी हैं. इस के चलते फिल्म इंडस्ट्री में आम चेहरेमोहरे वाली लड़कियों की जरूरत बढ़ रही है.

जरूरत इस बात की है कि लड़कियां खुद पर भरोसा करें और शौर्टकट रास्ता न अपनाएं. इस के साथ ही वे ऐक्टिंग को सीखें. केवल सुंदर चेहरा और खूबसूरत शरीर होने से काम नहीं चलता, हुनर भी होना चाहिए.

आप की शादी को ले कर कई तरह की अफवाहें उड़ती रही हैं. इन में कितनी सचाई है?

अभी तो मेरी ऐसी उम्र नहीं है कि मैं शादी करूं और घर बैठ जाऊं. ऐक्टिंग की दुनिया में बहुत काम करना है. शादी की कोई जल्दी नहीं है.

नए शहर में लड़कियों के सामने कई बार अजीब हालात पैदा हो जाते हैं. वे उन का मुकाबला कैसे करें?

मैं जब मुंबई आई थी, तो लोगों ने बहुत डराया, पर मुझे अपने पर भरोसा था. मैं जब पटना में थी, तब गलत हरकत करने वाले कई लड़कों की क्लास ले चुकी थी.

अब लोग लड़कियों का भावनात्मक रूप से शोषण करने की सोचते हैं. ऐसे में लड़कियों को किसी के भी साथ ऐसे संबंध बनाने से पहले उस की सचाई को जरूर समझ लेना चाहिए. अगर खुद की समझ में न आए, तो वे अपने किसी साथी, सहेली या घर के किसी सदस्य से बातचीत कर के समझने की कोशिश करें.

अपनों से झूठ नहीं बोलना चाहिए. झूठ बोलने वाली लड़कियां ही ऐसे मामलों में फंस जाती हैं.

मुंबई आ कर आप घर का क्या क्या याद करती हैं?

मैं सब से ज्यादा घर का बना खाना याद करती हूं. हमेशा बाहर खा नहीं सकती और कोई अच्छी खाने की डिश बनानी मुझे आती नहीं. मुंबई में समय की कमी होती है. देर तक काम करना होता है. ऐसे में खाना ऐसा हो, जो जल्दी बने और सेहत के लिए भी अच्छा हो.

नौसिखिया डाक्टरों से आप भी रहें सावधान

अजमत खान उत्तर प्रदेश पुलिस में सर्विलांस ऐक्सपर्ट सिपाही था. वह बुखार से पीडि़त हुआ. 11 अक्तूबर, 2015 को वह उत्तर प्रदेश के जनपद बुलंदशहर के जिला अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा. उस वक्त वहां तैनात इमर्जैंसी प्रभारी डाक्टर सचिन ने अजमत खान को 2 इंजैक्शन लगा दिए. अजमत खान खुश था कि अब उसे आराम मिल जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. घर पहुंचने के 24 घंटे के अंदर ही अजमत खान के बदन में सूजन आ गई. हालत ज्यादा बिगड़ने पर उसे तुरंत एक प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया गया. वहां पता चला कि बिना जांचपड़ताल किए और मर्ज को ठीक से समझे बिना ही दिए गए इंजैक्शनों ने उस की यह हालत की थी.

डाक्टर की यह करतूत जब सुर्खियों में आई, तो बजाय कोई कार्यवाही करने के अस्पताल प्रशासन ने उसे छुट्टी पर ही भेज दिया.

उधर अजमत खान का शरीर गलना शुरू हो गया. गंभीर हालत के चलते उसे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भरती कराया गया. उस के शरीर से खून रिसने लगा. वह कोमा में चला गया और उस के गुरदों ने भी काम करना बंद कर दिया. कई दिनों के बाद उस ने दम तोड़ दिया.

मामले ने तूल पकड़ा और आरोपी डाक्टर को मरीज की अनदेखी का जिम्मेदार माना गया. डाक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. नौसिखिया डाक्टर भी हर बड़ेछोटे अस्पतालों में पाए जाते हैं. कहने को उन के पास डिगरियां होती हैं, लेकिन वे असल होती हैं या थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के हासिल की गई होती हैं, इसे कोई नहीं जानता.

कई बार डिगरी लेने के तुरंत बाद ही डाक्टर अपना निजी अस्पताल खोल कर बैठ जाते हैं. वे अनुभव को तवज्जुह नहीं देते, जिस के नतीजे कभीकभी घातक साबित होते हैं.

गाजियाबाद के रहने वाले फूड इंस्पैक्टर शिवराज सिंह दिल की बीमारी से पीडि़त थे. 29 नवंबर, 2015 को उन्होंने एक लैब में ब्लड सैंपल दिया. सैंपल लेने वाला नौजवान नौसिखिया था. उस की लापरवाही से हाथ में इंजैक्शन से हवा चली गई. नतीजतन, शिवराज का हाथ सूज कर नीला पड़ गया.

उस लैब को चलाने वालों ने अपनी लापरवाही से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को खबर की गई, तो उन्होंने गलती मानी. पता चला कि लोगों का ब्लड सैंपल एक नौसिखिया ले रहा था. उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

बरेली जिले की एक डाक्टर ने तो अनाड़ीपन की हदों को ही लांघ दिया. जचगी के दर्द के बाद नाजिम नामक नौजवान ने अपनी पत्नी मेराज को सुभाष नगर इलाके में डाक्टर राधा शर्मा के घर में बने अस्पताल में भरती कराया. डिलीवरी के दौरान उस से 10 हजार रुपए जमा कराने को कहा गया, जो उस ने जमा करा दिए.

मेराज ने नौर्मल डिलीवरी से एक बेटी को जन्म दिया. डाक्टर ने सिंकाई की बात कह कर नवजात के सीने पर इलैक्ट्रौनिक सिंकाई मशीन रख दी. इस से उस का सीना जल गया. कुछ देर बाद ही उस की मौत हो गई.

मामला बिगड़ने पर डाक्टर राधा शर्मा ने समझौते की कोशिश की, लेकिन इस बात की शिकायत पुलिस से की गई, तो पुलिस ने डाक्टर राधा शर्मा को गिरफ्तार कर लिया.

जांच में पता चला कि राधा शर्मा के पास एक ट्रेनिंग सैंटर से प्रसव सहायक का सर्टिफिकेट था. इस के बल पर उस ने खुद को डाक्टर घोषित कर के घर में ही अस्पताल खोल लिया था.

4 कमरों के अस्पताल में उस ने एक कमरे में ओपीडी बनाई हुई थी. फरवरी महीने में वह 2 नवजात बच्चों की मौत के मामले में जेल गई थी, लेकिन हाईकोर्ट से जमानत ले कर बाहर आ गई थी.

जेल से बाहर आ कर भी डाक्टर राधा शर्मा का अनाड़ीपन खत्म नहीं हुआ और न ही कोई सबक लिया गया. उस ने फिर से नया कारनामा कर दिया. इस के बाद पुलिस ने न केवल उस के अस्पताल को सील कर दिया, बल्कि उसे पेशेवर अपराधी घोषित कर दिया.

सहारनपुर के रहने वाले अनिल कुमार को बुखार था. वह एक डाक्टर के पास पहुंचा. उसे वहां इंजैक्शन लगाया गया. इस के बाद उस की तबीयत अचानक बिगड़ गई और देखते ही देखते उस की मौत हो गई. इस मामले में मुकदमा दर्ज करा दिया गया.

पता चला कि जिस ने अनिल को इंजैक्शन लगाया था, वह नौसिखिया कंपाउंडर टीटू था. बुलंदशहर जिले के किसान छोटू गिरी के 6 साला बेटे अजय की खेलते समय कुहनी की हड्डी टूट गई. वे उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल ले गए. डाक्टर ने उस का एक्सरे कराया और प्लास्टर लगा दिया गया. अगले 5 दिनों में आराम मिलना तो दूर अजय की हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई.

बाद में उन्होंने दिल्ली ले जा कर बेटे का इलाज कराया, तो पता चला कि डाक्टर ने हड्डी ही गलत तरीके से जोड़ दी थी, जिस की वजह से अजय बहुत परेशान था.

हड्डी जोड़ने वाले उस डाक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई.

गाजियाबाद जनपद में मोतियाबिंद के आपरेशन के चक्कर में 8 मरीजों की जिंदगी में अंधेरा छा गया. आंखों के एक अस्पताल के बाहर औफर वाला बोर्ड लगा था कि उन के यहां मोतियाबिंद का सफल आपरेशन केवल 2 हजार रुपए में किया जाता है.

डाक्टरों ने एक ही दिन में कई आपरेशन कर डाले. इसे लापरवाही कहें या नौसिखियापन, 8 मरीजों की एक आंख की रोशनी जाती रही. इन मरीजों में फूलवती, राजेंद्री देवी, जगवती, फरजाना, जुम्मन, अमाना खातून, शिक्षा देवी व नेपाल शामिल थे. मामले के खुलने पर अस्पताल के खिलाफ जांच बैठा दी गई.

इस तरह के मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि मरीजों की जिंदगी से नौसिखिया डाक्टर किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं.

लाला लाजपतराय मैडिकल कालेज के सुपरिंटैंडैंट डाक्टर सुभाष सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर को डिगरी मिल जाना ही काफी नहीं होता, उसे प्रैक्टिस भी करनी होती है. डाक्टरी का पेशा गंभीर है. मामूली सी लापरवाही भी किसी मरीज की जिंदगी ले सकती है.

इस मसले पर डाक्टर वीपी सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर पर शक हो, तो उस की जांच कराई जा सकती है. लापरवाही और अनाड़ीपन से बचने के लिए डाक्टर के बारे में उचित जांचपड़ताल भी मरीजों को कर लेनी चाहिए.

बेनामी जायदाद के जाल में फंसी मीसा भारती

राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उन का कुनबा कौडि़यों के भाव बेनामी जायदाद खरीदने के मामले में कानूनी शिकंजे में फंस चुका है. एक हजार करोड़ रुपए की जायदाद को औनेपौने दाम पर राजद सांसद मीसा भारती और उन के पति शैलेश कुमार के नाम से खरीदा गया है. यह सारी डील उस दौरान हुई, जब लालू प्रसाद यादव केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में मंत्री थे. जेल में बंद जैन बंधुओं के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद राजद सांसद मीसा भारती और उन के पति शैलेश कुमार की परेशानियां काफी बढ़ गई हैं.

लालू प्रसाद यादव की बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती को दिल्ली के बिजवासन इलाके में फार्म हाउस दिलाने वाली खोखा कंपनियों के कारोबारी वीरेंद्र कुमार जैन और सुरेंद्र कुमार जैन पर ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है.

लालू प्रसाद यादव और उन के परिवार के कारोबार से जुड़े दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा और रेवाड़ी के ठिकानों पर 16 मई, 2017 को आयकर विभाग ने छापे मारे. उस के बाद 18 मई, 2017 को जैन बंधुओं के खिलाफ दिल्ली की एक विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल होने से लालू प्रसाद यादव के परिवार पर संकट बढ़ गया है.

ईडी ने दिल्ली के भाटी गांव में बने जैन बंधुओं के फार्महाउस को जब्त कर लिया है. यह फार्महाउस जैन बंधुओं ने पिछले 15 सालों में बड़े नेताओं और उन के परिजनों के काले धन को खोखा कंपनियों के जरीए वैध कराने के एवज में मिले कमीशन की रकम से खरीदा था.

आरोप है कि जैन बंधुओं ने मीसा भारती और उन के पति शैलेश कुमार की बंद कंपनी मिशेल पैकर्स के 10 रुपए कीमत के एक लाख, 20 हजार शेयर 90 रुपए प्रीमियम पर खरीदे और उस से दिल्ली के बिजवासन इलाके में एक करोड़,

41 लाख रुपए में 3 एकड़ का एक फार्महाउस खरीदा. बाद में इस कंपनी के उन्हीं शेयरों को दोबारा मीसा भारती के पति शैलेश कुमार को कौडि़यों के भाव में बेच दिया. उस के बाद फार्महाउस का मालिकाना हक इन्हें सौंप दिया.

जैन बंधुओं की खोखा कंपनी के जरीए तकरीबन 8 हजार करोड़ रुपए के काले धन को सफेद करने में मदद करने के आरोप में पिछले 20 मार्च, 2017 को ईडी ने गिरफ्तार किया था.

भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राजद सांसद मीसा भारती की जायदाद की जांच की मांग करते हुए कहा है कि मीसा भारती ने जमीन खरीद कर उसे बेचने का धंधा कर के करोड़ों रुपए का घोटाला किया है. बिजवासन में 50 करोड़ रुपए की जमीन एक करोड़, 40 लाख रुपए में खरीदी गई. मिशेल पैकर्स कंपनी बना कर उस के 10 रुपए के एक शेयर को एसके जैन और वीके जैन को 90 रुपए में बेचा. उस के एक महीने के अंदर ही केवल एक रुपए में वापस खरीद लिया गया. इस कंपनी में 80 फीसदी शेयर राबड़ी देवी और 15 फीसदी शेयर तेजस्वी यादव के नाम से हैं.

23 मई, 2017 को ईडी ने मीसा भारती के सीए राजेश अग्रवाल को गिरफ्तार कर लिया. राजेश अग्रवाल पर 8 करोड़ रुपए के मनी लाउंड्रिंग का केस दर्ज किया गया है.

मीसा भारती और उन के पति शैलेश कुमार पर महंगी जायदाद को कौडि़यों के भाव में खरीदने का आरोप है. दोनों ने नई दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के पास तकरीबन 3 एकड़ के फार्महाउस को एक करोड़, 41 लाख रुपए में खरीदा था, जबकि उस की असली कीमत सौ करोड़ रुपए आंकी गई है.

इस के अलावा सैनिक फार्म में भी फार्महाउस खरीद रखा है. वह खरीदारी भी शक के घेरे में है. दोनों जमीनों के सौदे उस समय हुए, जब लालू प्रसाद यादव संप्रग सरकार में मंत्री थे.

रजिस्ट्रार औफ कंपनीज के मुताबिक, मीसा भारती और शैलेश कुमार 4 प्राइवेट कंपनियों में डायरैक्टर हैं. दिसंबर, 2002 में मिशेल पैकर्स एंड प्रिंटर्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई गई और साल 2006 में उसे घाटे में दिखा कर बंद कर दिया गया.

उसी साल दिल्ली में इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के पास करोड़ों रुपए का फार्महाउस खरीदा गया. इस के अलावा विवेक नागपाल नाम के आदमी से केवल एक लाख रुपए में केएचके होल्डिंग कंपनी खरीदी गई. बेनामी जायदाद को ले कर 28 मई, 2017 को लालू प्रसाद यादव और उन के परिवार वालों के कुल 22 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छापे मारे और एक हजार करोड़ रुपए की बेनामी लैंड डील के मामले का खुलासा हुआ.

आयकर विभाग और ईडी ने मीसा भारती और उन के पति शैलेश कुमार को नोटिस भेज कर 6 जून को पेश होने को कहा, पर दोनों हाजिर नहीं हुए. उस के बाद उन्हें 12 जून को हाजिर होने का फरमान भेजा गया और उस दिन भी दोनों ने हाजिर होने की जहमत नहीं उठाई. इस के बाद मीसा भारती और शैलेश कुमार कानूनी फंदे में बुरी तरह फंसते दिखने लगे हैं.

मीसा भारती : एक नजर

 लालू प्रसाद यादव की 9 संतानों में सब से बड़ी 40 साल की मीसा भारती ने एमबीबीएस की डिगरी ले रखी है, लेकिन उन्होंने कभी भी मैडिकल प्रैक्टिस नहीं की. वे झारखंड के एमजीएम मैडिकल कालेज की टौपर रह चुकी हैं.

साल 1999 में मीसा भारती की शादी इंजीनियर शैलेश कुमार से हुई थी, जो इंजीनियर हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले तक मीसा भारती कभी भी सियासी मंचों पर नजर नहीं आईं. लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान मीसा भारती अचानक से राजद का लोकप्रिय, युवा और ताजा चेहरा बन गईं.

मीसा भारती का नाम मीसा क्यों रखा गया, इस के पीछे भी दिलचस्प कहानी है. 1974 के जेपी आंदोलन में लालू प्रसाद यादव ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और इस के लिए उन्हें इमर्जैंसी के दौरान ‘मीसा’ यानी मेंटीनैंस औफ इंटरनल सिक्योरिटी ऐक्ट के तहत तब की कांग्रेस सरकार ने जेल में डाल दिया था.

जब लालू प्रसाद यादव जेल में बंद थे, उसी दौरान साल 1977 में राबड़ी देवी ने बड़ी बेटी को जन्म दिया था. तभी लालू यादव ने उन का ‘मीसा’ नाम रखा.

अपने नाम के बारे में मीसा भारती कहती हैं, ‘‘मेरा नाम आजाद भारत के एक सब से बड़े आंदोलन की याद दिलाता है.’’

जीएसटी का पेंच और नरेंद्र मोदी का दावा

जीएसटी लागू करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया है कि इस ‘एक देश एक टैक्स’ से करचोरी खत्म हो जाएगी और अच्छे दिन असल में आ जाएंगे. ब्लैक की बात करते हुए प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ऐसे बोलते हैं मानो हर जना जो नकद में काम करता है वह देश और समाज का गुनाहगार है. जिन गुनाहगार छोटे व्यापारियों और कारखानेदारों के लिए यह जीएसटी लगाया गया है, वे असल में बेहद गरीबी में फटेहाल हैं. वे 4 लोगों को काम दे सकते हैं तो इस का मतलब नहीं कि वे टाटा, बिड़ला, अडानी बन गए हों.

जीएसटी से जिस तरह कंप्यूटरों पर टिक कर सारा व्यापार चलाया जाएगा, उस से आधा पढ़ालिखा व्यापारी, छोटा कारखानेदार, छोटा ठेकेदार, उन के साथ काम करने वाले मजदूर काले धन को धोने के नाम पर गंदे नाले में बह जाएंगे और देश में गरीब हायहाय करने लगें, तो बड़ी बात नहीं.

काला धन सरकार की वजह से पैदा होता है. कोई अमीर अपनी जेब में टैक्स चोरी का पैसा नहीं रखना चाहता, क्योंकि यह पैसा उस के भी किसी काम का नहीं होता. वह उस से छोटामोटा सामान खरीद सकता है, पर असली महंगे सामान के लिए तो उसे बड़ी कंपनियों के पास ही जाना होता है, जो काले पैसे में भरोसा नहीं करतीं.

काला धन असल में है तो नेताओं, मंदिरोंमसजिदों और बिचौलियों के पास. जीएसटी उन्हें छू भी नहीं रहा. असली काला धन वहीं का वहीं रहेगा. सरकार की नजर से बचा पैसा पैसा है, कालासफेद नहीं. जिस देश में अभी भी 95 प्रतिशत जनता गरीब हो, वहां कैसे काले पैसे की बात की जा रही है, समझ नहीं आता. नोटबंदी के बाद जैसे नकद धंधा चालू रहा, वैसे ही जीएसटी के बाद हो सकता है. अगर कहीं फायदा होगा तो सरकार को होगा कि उस की आमदनी बढ़ जाएगी, पर यह गरीबों की जेब कट कर बढ़ेगी, अमीरों की नहीं.

जीएसटी एक अश्वमेध यज्ञ की तरह है, जिस में हिंदू राजा अपनी सेनाओं को मंत्रजंतर पढ़ने वालों के इशारे पर बेमतलब में चारों ओर दौड़ा दिया करते थे. हाथ में आता कुछ नहीं था, पर जनता से जमा किया पैसा हवनों और सेनाओं में बरबाद हो जाता था. अब हर कंप्यूटर हवनकुंड बन गया है, हर सरकारी अफसर, सैनिक और पाप के दुश्मनों को मारने का नाटक शुरू हो गया है.

हवालात की हवा खा चुके हैं ये बॉलीवुड सितारे

बॉलीवुड में ऐसे कई बड़े स्टार हैं जो किसी न किसी अपराध की वजह जेल जा चुके हैं. ऐसे ही कुछ स्टार्स के बारे में हम आपको बता रहे हैं

  1. संजय दत्त

संजय दत्त को साल 1993 के मुंबई हमलों के दौरान गैर कानूनी ढंग से हथियार रखने के जुर्म में दोषी पाया गया था. वे स जुर्म में दोषी साबित हुए थे और इसलिए साल 2006 में उन्हें दोषी करार दिया गया था.

अभिनेता संजय ने 18 महीने जेल में गुजारे और फिर जमानत पर बाहर आए. मार्च 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सजा को जारी रखा लेकिन उनकी छह साल की सजा को घटा कर पांच साल कर दिया.

  1. सैफ अली खान

सुपरस्टार सैफ अली खान भी साल 2012 में जेल की हवा खा चुके हैं. सैफ ने मुंबई के एक होटल में खाना खाने पहुंचे एक एनआरआई को घूंसा मारा. पीड़ित की नाक तक टूट गई थी. पीड़ित के मुताबिक उन्होंने सैफ से धीमी आवाज में बात करने को कहा था, जिस पर सैफ अली खान ने उसकी नाक पर घूंसा मार दिया.

  1. शाइनी आहूजा

शाइनी आहूजा को साल 2011 में अपने घर में काम करने वाली महिला के बलात्कार के आरोप में 27 दिनों तक जेल में रहना पड़ा. इसके बाद वह जमानत पर बाहर आए. बाद में महिला ने मामला वापस ले लिया लेकिन इस बात का शाइनी के करियर पर काफी प्रभाव पड़ा.

  1. मधुर भंडारकर

डायरेक्टर मधुर भंडारकर महिलाओं पर आधारित चांदनी बार, सत्ता, पेज 3 और फैशन जैसी फिल्में बना चुके हैं. मधुर भंडारकर पर अभिनेत्री बनने की इच्छुक एक लड़की ने बलात्कार का आरोप लगाया इसी वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा लेकिन सबूतों के अभाव में भंडारकर को बरी कर दिया गया.

  1. फरदीन खान

फिरोज खान के बेटे फरदीन खान भी जेल की हवा खा चुके हैं. साल 2001 में उन्हें कोकेन रखने के मामले में गिरफ्तार किया गया. फरदीन के पुनर्सुधार कार्यक्रम के लिए तैयार हो जाने पर अदालती कार्रवाई बंद हो गई.

 

 

नम: पितरायै : धर्म और कर्म का अजीब खेल

एक दिन सुबहसुबह पंडितजी दरवाजे पर आ धमके. उन के हाथ में पोथीपत्रा था. मैं डर गया. दरवाजा खुलते ही उन्होंने तकरीबन डांटते हुए कहा, ‘‘जानते नहीं आज पंचमी है?’’

‘‘पंचमी,’’ यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया था, ‘‘पंचमी है, तो क्या हुआ?’’

‘‘इसीलिए मैं कहता हूं घोर कलयुग है, घोर कलयुग. लोगों को अपने पितरों की फिक्र ही नहीं. एक मैं हूं, जो सब को याद दिलाता रहता हूं,’’ वे मुझे घूर रहे थे.

मैं कुछ बोलता, इस से पहले ही वे दोबारा बरस पड़े, ‘‘यह पितर पक्ष है. आज ही के दिन तुम्हारे पिता का ‘स्वर्गवास’ हुआ था, इसलिए आज के दिन तुम्हें श्राद्ध कराना चाहिए.’’

अपनी बात के सुबूत में उन्होंने मुझे पत्रा में वह दिन भी दिखाया, जिस दिन मेरे पिताजी का स्वर्गवास हुआ था. उन के रहने की जगह स्वर्ग में है या नरक में, यह मैं नहीं जानता, पर पंडितजी के पत्रे के पन्ने में पंचमी की तिथि जरूर लिखी थी. 2 महीने पहले ही तो पिताजी की मौत हुई थी.

मैं ने पंडितजी को इज्जत से अंदर बिठाया. सब से पहले उन्हें गरमागरम चाय पिलाई, फिर पूछा, ‘‘पंडितजी, आप तो बड़े ज्ञानीध्यानी हैं, कृपा कर के यह बताइए कि यह श्राद्ध क्यों जरूरी है?’’

‘‘तुम क्या वाकई कुछ नहीं जानते, इस बारे में. पितर की आत्मा इस पखवारे अपने प्रियजनों से भोजनपानी लेने के लिए बेचैन रहती है. पितर पक्ष में श्राद्ध करने से उन्हें शांति मिलती है,’’ पंडितजी ने हाथ नचाते हुए जवाब दिया, जैसे मेरे पितर उन के सामने हवा में दिखाई दे रहे थे.

मैं ने सुन रखा था कि ‘आत्मा’ कभी नष्ट न होने वाली चीज है. यह सभी चीजों से परे है. यह न जलती है, न गलती है, न सूखती है. इस पर किसी चीज का कोई असर नहीं पड़ता. फिर इसे भूखप्यास कैसे लगती है? इसे भोजनपानी की जरूरत क्यों है? यह मैं समझ नहीं पा रहा था. पर पंडितजी से बहस कर के उन्हें और गुस्सा करना नहीं चाहता था.

‘‘तो फिर मुझे क्या करना होगा, पंडितजी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कुछ खास नहीं. पास ही किसी बहती हुई नदी में पितरों की शांति के लिए तर्पण करना होगा. उस के बाद कुछ ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथसाथ दान देना होगा,’’ उन्होंने ऐसे कहा, जैसे यह कुछ भी नहीं है.

‘‘तर्पण के लिए क्या करना होगा?’’

‘‘थोड़ा सा जौ, तिल, दूध, शहद वगैरह ले लो. कुछ सामान मेरे पास है. एक लोटा ले लो और मेरे साथ चलो.’’

मैं ने उन के द्वारा बताई हुई चीजों को आननफानन इकट्ठा किया. तर्पण न कर के मैं पितरों का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था. पता नहीं, कोई पितर कुछ नुकसान न कर डाले. जीतेजी तो पिताजी ने मुझे डांटा तक नहीं, पर अब तो उन की ‘आत्मा’ है. ‘आत्मा’ का क्या भरोसा?

खैर, मैं पंडितजी के साथ सामान को लिए नदी की ओर चल पड़ा.

नदी तट पर जा कर पंडितजी ने मुझ से कहा, ‘‘सब से पहले तुम नहा लो, उस के बाद तर्पण का काम करेंगे.’’

नदी का पानी काफी गंदा था. उस में नहाना भले ही मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, पर तर्पण के लिए नहाना जरूरी था. किसी तरह आंख, कान और नाक मूंद कर मैं ने डुबकी लगा ही ली.

पानी पर कूड़ाकचरा, गंदगी तैरते हुए मेरे करीब से गुजर रहे थे. पर मैं मजबूर था, नाक भी मूंद नहीं सकता था. इस के बाद पंडितजी ने पानी में मिट्टी घोल कर मेरे बदन पर यहांवहां लेप दी. ऐसा करते समय वह कुछ बुदबुदा भी रहे थे.

‘‘चलो, अब इधर आओ,’’ नदी किनारे बैठते हुए पंडितजी ने कहा.

मेरे वहां आ जाने पर उन्होंने मेरी उंगली में घास की एक अंगूठी पहना दी और कहा, ‘‘यह कुश है. इसे पहनने से मन साफ होता है. इसे पहन कर किए गए वादे जान दे कर भी पूरे करने चाहिए.’’

लोग तो न वादों को निभाते हैं, न ही उन्हें सही फैसला मिलता है. पर लोग एक घास के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहते हैं. वाह रे घास.

खैर, आगे उन्होंने मुझे जौ के आटे में दूध, शहद और तिल मिला कर लड्डू बनाने को कहा.

मैं ने लड्डू बनाते हुए पूछा, ‘‘पंडितजी, इस का क्या होगा?’’

‘‘इन्हीं से तो तर्पण होगा. तुम्हारे पितरों को ये लड्डू ही मिलेंगे. सब के नाम पर एकएक लड्डू संकल्प कर बालू पर रखने होंगे.’’

ये लड्डू बालू पर ही लुढ़कते रहेंगे या मेरे पितरों के मुंह में जाएंगे, यह मैं नहीं जानता, पर इतना तो कह सकता हूं कि जीतेजी उन्होंने कभी जौ का कच्चा आटा क्या, पका आटा भी नहीं खाया. और यह भी कोई खाना था. अगर मैं जानता कि ये मेरे पितरों के भोजन हैं, तो मैं दालचावल, सब्जी पका कर न ले आता.

अब उन प्यासों को पानी पिलाना था. पंडितजी बोले, ‘‘नदी में कमर भर जल में उतर कर अंजली में भरभर कर पितरों को पानी पिलाओ.’’

यह गंदा पानी पितरों के पीने के लिए है? मुझे संकोच हो रहा था. ऐसे गंदे पानी को पी कर क्या उन्हें हैजा नहीं हो जाएगा? तब उन के लिए डाक्टर कहां मिलेगा? पहले जानता, तो घर से साफ पानी ले आता.

किसी तरह इन सारे कामों से निबटा. पंडितजी ने आगे का कार्यक्रम बताया, ‘‘अब घर जा कर आटा, घी, चीनी, दूध, सब्जी का इंतजाम करो. कुछ रसगुल्ले भी लेते आना. मैं ब्राह्मणों को ले कर दोपहर को तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा.

‘‘याद रखना, तुम जिनजिन पकवानों का भोग लगाओगे, तुम्हारे पितरों को वे ही पकवान वहां यानी स्वर्ग में प्राप्त होंगे.’’

आदेश दे कर पंडितजी चले गए. अब यह गाज गिरी सो गिरी, ऊपर से मनों का मूसल सिर पर झुला दिया. दोपहर को 10 ब्राह्मणों के साथ पंडितजी पधारे. नाक के नथुनों को फुलाफुला कर उन्होंने चारों दिशाओं की हवाओं को समेटा. जब उन की नाक में मन की इच्छानुसार सुगंध न भरी, तो वे कुछ सशंकित हो गए.

मुझे एक कोने में खींच कर ले गए और बोले, ‘‘सबकुछ मंगवा लिया है न? देखो, ब्राह्मणों के भोजन में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए. तुम यहां इन्हें जो खिलाओगे, तुम्हारे पितरों को स्वर्ग में वही सब मिलेगा.’’

‘‘पंडितजी, आप चिंता क्यों करते हैं? मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है. आप निश्चिंत रहें,’’ मैं ने उन्हें भरोसा दे कर शांत किया.

थोड़ी देर बाद उन्हें आसन पर बिठा कर पत्तल परोसी गई. मैं वहीं सामने ही खड़ा था. सभी 11 ब्राह्मण बैठ चुके थे. मेरा बेटा एक परात में सूखी रोटियां ले कर उन्हें परोसने लगा और बेटी भी पीछे से आलू और सायोबीन की सब्जी परोस रही थी.

पंडितजी यह सब देख कर आगबबूला हो गए. कहां वे तर माल उड़ाने के लिए अपनी लपलपाती जीभ बारबार होंठों पर फेर रहे थे, और कहां यहां की सूखी रोटी और आलू और सोयाबीन की सब्जी. वे पैर पटकते हुए उठ खड़े हुए.

पंडितजी चिल्ला कर बोले, ‘‘यह क्या मजाक है? यह तो घोर अपमान है हम ब्राह्मणों का. तुम्हारी यह हिम्मत कैसे हुई?’’

मैं ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया, ‘‘शांत पंडितजी, शांत, शांत हो जाइए. मैं ने कोई गलती नहीं की है. जरा मेरी बात तो सुनिए.

‘‘आप ने ही तो कहा था कि ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाओगे, वही मेरे पितरों को मिलेगा.

‘‘पंडितजी, मेरे पिताजी का हाजमा हमेशा कमजोर रहा. वे कभी भी घी पचा नहीं पाए. जिंदगीभर सूखी रोटी ही चबाते रहे. आलू और सोयाबीन की सब्जी उन की पसंद की सब्जी थी. इसलिए मैं ने वही सब्जी बनाई है, ताकि मेरे पिताजी को उन की पसंद का खाना मिल सके.

‘‘अब इस में मेरी गलती कहां है, पंडितजी? यह श्राद्धतर्पण तो मैं अपने पिता के लिए ही कर रहा हूं न. फिर उन की सुविधाअसुविधा का खयाल तो रखना ही पड़ेगा.’’

पंडितजी यह बात सुन कर चुप हो गए. उन्होंने मुझे घूर कर देखा, फिर मजबूरन पत्तल को हाथ लगाया. मन ही मन वे मुझे हजारों गालियां दे रहे होंगे. मुझे बेवकूफ कह रहे होंगे. न जाने शाप ही दे रहे होंगे. क्योंकि उन की जूती उन्हीं के सिर पर जो पड़ गई थी.

भोजन खत्म होने के बाद वे जो भाग खड़े हुए, सो आज तक मेरे दरवाजे पर नहीं आए. वे अपनी दक्षिणा मांगते कैसे? मेरे पितरों को पैसों की जरूरत तो थी ही नहीं.

वायरल हुईं इस सिंगर की हौट अदाएं

अगर आप भी इस बार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स को देखने में शुमार हुए हों तो आपको इस बात की जानकारी जरूर होगी कि साल 2017 के फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में ‘बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर’, का खिताब अपने नाम करने वाली गायक कोई और नहीं, बेहद खूबसूरत और बोल्ट नेहा भसीन हैं. इस बार उन्हें ये अवार्ड मिला है.

हम आपको बता देना चाहते हैं कि उन्हें ये अवॉर्ड ‘जग घुमया तेरे जैसा ना कोई’ गाने के लिए मिला है. ये गाना नेहा ने फिल्म ‘सुल्तान के लिए गाया था. अगर आर देखें तो अन्य बाकि गायकों की अपेक्षा नेहा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव दिखाई देती हैं. और यहां उनकी तस्वीरों को देखकर इतना तो पता चलता है कि उन्होंने बॉडी के कई पार्ट्स पर बहुत सारे टैटू बनवाए हुए हैं.

वे इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव रहती हैं और आए दिन अपनी बोल्ड तस्वीरों को इंस्टग्राम पर शेयर करती रहती हैं.

नेहा भसीन को बॉलीवुड में अपनी एक पहचान बनाने में लगभग 16 सालों का समय लगा गया. सिंगिंग करियर को लेकर गायिका का कहना है कि बॉलीवुड एक पुरूष वर्चस्व वाला क्षेत्र है, जहां महिला गायकों का उचित अवसर नहीं मिलते.

फिल्म ‘सुल्तान’ साल 2016 के गीत ‘जग घुमिया’ के लिए में अधिकतर पुरस्कार हासिल करने वाली 34 साल की गायिका का कहना है कि एक नई और असामान्य आवाज के लिए संगीत जगत में अपनी पहचान बनाना काफी कठिन है.

यहां देखिए नेहा की ये सभी बोल्ड तस्वीरें जो इंस्टाग्राम से ली गई हैं.

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सबके सामने कपड़े खोलकर कैमरे में पोज दे रही थीं ये अभिनेत्री

अपनी रिवीलिंग ड्रेस में सेक्सी फिगर फ्लॉन्ट करना, एक्ट्रेसेस के लिए फैशन स्टेटमेंट बन गया है. वहीं कई बार इसी फैशन स्टेटमेंट की वजह से ये एक्ट्रेसेस वॉर्डरोब मालफंक्शनिंग का शिकार हो जाती हैं. बाद में ये तस्वीरें उनके लिए शर्मिदंगी का कारण बन जाती हैं. ऐसा ही कुछ हॉलीवुड की एक अभिनेत्री के साथ हुआ लेकिन कई लोगों का कहना ये भी है कि उन्होंने पब्लिसिटी के लिए जानबूझ कर अपना ये ऊप्स मूमेंट क्रिएट किया.

कौन थी ये एक्‍ट्रेस?

ऑस्‍ट्रेलिया और न्‍यूजीलैंड टीवी पर्सनेलिटी शेर्लोट डावसन हाल ही में थाई हाई स्लिट ड्रेस पहनी कर एक इवेंट में पहुंची थी इस ड्रेस में शेर्लोट बेहद हॉट तो लग रही थीं लेकिन कई बार उन्होंने ड्रेस कुछ ऐसे ऊपर उठाई कि उनके प्राइवेट पार्ट दिख गए. कैमरे में कैद हुए Oops मूमेंट शेर्लोट की ये ड्रेस ऊपर-नीचे सभी जगह से इतनी रिवीलिंग थी कि अगर वे ड्रेस न भी पहनती तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता. शेर्लोट का ये ऊप्स मूमेंट कैमरे में कैद हो गया.

ड्रेस में दिखाई बेहूदगी

अभिनेत्री शेर्लोट ने इस ड्रेस में कुछ इस तरह बेहूदगी दिखाई कि देखने वाला भी अपने आप ही शरमा जाए.

खुद ही बार-बार खींच रही थीं अपना ड्रेस

शर्लोट कई बार अपनी ड्रेस जानबूझ कर ऊपर-नीचे से खींचती हुई नजर आ रही थीं.

लाइमलाइट में आने के लिए कुछ भी!

खुद को लाइमलाइट में आने का एक भी मौका छोड़ती नहीं हैं. इस बार इन्‍होंने बड़ा ही मजेदार तरीका चुना है. इस बार उन्‍होंने जो कपड़े पहने उनके अंदर अंडर गार्मेंट्स को जानबूझकर नहीं पहना ताकि उनका शरीर कैमरे में कैद हो सके.

डबल वार्डरोब मॉलफंक्शनिंग

ये अभिनेत्री बिना इनरवियर थीं, जिससे लोगों को लग रहा था कि वे डबल वार्डरोब मॉलफंक्शनिंग का शिकार हो रही थीं, पर दरअसल तो, शेर्लोट अपनी ऐसी फोटोज क्लिक करवाने के लिए बहुत उत्साहित रहती हैं.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है

हम आपको बता देना चाहते है कि ये कोई पहली बार नहीं हो रहा था कि वे बिना पूरे कपड़े पहनें कहीं पहुंच गईं हो.ये ऑस्‍ट्रेलियन टीवी पर्सनेलिटी पहले भी ऐसा कर चुकी हैं. कुछ साल पहले ईबिजा बीच पर अपने पुरुष मित्रके साथ भी वे कुछ ऐसी ही नजर आई थीं.

 

 

चीन की मंशा और भारत की सोच

चीन ने अपने वन बैल्ट वन रोड इनीशिएटिव को अमली जामा पहना कर नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया नारे पर पानी फेर दिया है. भारत का मेक इन इंडिया प्रोग्राम मुख्यतया उन देशों के लिए उपयुक्त था जो यूरोप से महंगा सामान नहीं खरीद सकते थे और चीन के एकाधिकार से भयभीत थे. पश्चिमी एशिया, पूर्वी यूरोप, दक्षिणपूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के देश ही भारतीय सामान को खपा सकते हैं जो क्वालिटी में ठीक न होते हुए मगर सस्ते हो सकते थे.

अब चीन ने इन देशों तक अपनी फैक्टरियों का सामान पहुंचाने का प्रबंध करना शुरू कर दिया है और साथ ही, इन देशों के श्रमिकों को चीन आने का रास्ता सुलभ कर दिया है.

चीन बड़े पैमाने पर दूसरे देशों में रेलें, बंदरगाह, सड़कें, पुल, सुरंगें बना रहा है और चूंकि पैसा चीन का लग रहा है चाहे उधार का, वही इन का अधिकारपूर्वक उपयोग कर पाएगा.

18वीं व 19वीं शताब्दी में इंगलैंड, फ्रांस, डच देशों ने बड़ी नौसेनाएं विकसित की थीं ताकि वे एशिया से व्यापार करने का अधिकार अपने हाथ में रख सकें. ब्रिटिश साम्राज्य के पीछे उस का समुद्री मार्गों पर कब्जा था.

अब चीन अपने विशाल भूभाग का इस्तेमाल कर रहा है. वह मंगोलिया, रूस, पाकिस्तान, कोरिया, जापान, दक्षिणपूर्व एशिया से सीधे जुड़ा है और उन के माध्यम से उस की रेलें अब लंदन, मैड्रिड पहुंचने लगी हैं चीनी माल भरभर कर.

भारत अब अलगथलग पड़ गया है. शंघाई कोऔपरेशन और्गेनाइजेशन की सहायता मिलने के बावजूद भारत का कहीं स्थान नहीं है. और यही वजह है कि भारत की उत्पादन वृद्धि दर अचानक घटने लगी है.

हमारे नेताओं का ध्यान वैसे भी गौपूजा, कश्मीर, हिंदू संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने में लगा है. उत्पादन नहीं, हमें नोटबंदी की वाहवाही और गाय के आधारकार्ड की पड़ी है. दोनों से फैक्टरियां तो नहीं चलेंगी, यह पक्का है.

हम हल्ला चाहे जितना मचा लें पर असल में हम फैक्टरियों के नहीं, आश्रमों, गौशालाओं, घाटों, मंदिरों के निर्माण में लगे रहेंगे, यह पक्का है. इन दोनों में नौकरियां हैं पर वर्गजाति विशेष के लिए, आम भारतीयों के लिए नहीं.

शिवराज सिंह चौहान : अकेले पड़े, अकेले लड़े

जून के पहले हफ्ते में महाराष्ट्र से शुरू हुए किसान आंदोलन का जो जोरदार विस्फोट मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में हुआ, उस के पीछे के सच अब धीरेधीरे लोगों को समझ आ रहे हैं. किसानों का गुस्सा दरअसल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर था, जिन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनाव की सभाओं में किसानों से बढ़चढ़ कर वादे करते उन्हें तरहतरह के सब्जबाग दिखाए थे. ये वादे कैसे और किस तरह के थे, इस के पहले यह जान लेना जरूरी है कि मंदसौर की पुलिस फायरिंग में 6 जून को हुई 6 किसानों की मौतों से सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इमेज अब हमेशा के लिए बिगड़ गई है.

आंदोलन कर रहे किसान कर्जमाफी और अपनी उपज का वाजिब दाम मिलने की मांग कर रहे थे. ये बातें दरअसल  किसानों के जेहन में डालीं तो नरेंद्र मोदी ने ही थीं, जो प्रधानमंत्री बनते ही उन्हें भूल गए. लेकिन किसान नहीं भूला कि उस ने किन वादों और बातों के एवज में नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने के लिए भाजपा को वोट दिया था.

वादे और हकीकत

2014 की अपनी चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी ने दहाड़ते हुए वादा किया था कि इस बात की गारंटी वे लेते हैं कि किसानों को अपनी फसल की लागत के ऊपर 50 फीसदी कीमत मिलेगी. अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया तो किसानों के लागत मूल्य पर 50 फीसदी का मुनाफा जोड़ कर उन्हें कीमत अदा की जाएगी.

नरेंद्र मोदी ने लागत और मुनाफे का गणित किसानों को समझाते हुए यह भी कहा था कि खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी मिला कर किसान को फसल पैदा करने में जो लागत आती है उस पर 50 फीसदी मुनाफा जोड़ कर समर्थन मूल्य तय किया जाएगा. किसानों को यूपीए के राज में कभी 200 तो कभी 250 रुपए और कभी 300 रुपए के हिसाब से समर्थन मूल्य मिलता है जिस से उन की पैदावार बरबाद होती है, एनडीए सरकार इस खामी को दूर करेगी.

ये लुभावने वादे चुनाव के साथ खत्म भी हो गए. किसी फसल का बढ़ा समर्थन मूल्य किसान को नहीं मिला. उलटे, पैदावार की कीमतें लगातार गिरती रहीं.

इसी दौरान मंडी गए किसानों को यह एहसास भी हुआ कि 8 नवंबर की नोटबंदी की मार सीधे उन पर पड़ रही है. खरीदार और व्यापारी नकदी न होने का रोना रोते उन्हें कम दाम में फसल बेचने को मजबूर कर रहे हैं तो उन का गुस्सा और भड़क उठा कि भाजपा या नरेंद्र मोदी को वोट देने से हम किसानों को क्या फायदा हुआ, उलटे नुकसान और झेलना पड़ रहा है. इस से किसान परेशान हो कर भड़क उठे और सड़कों पर आ गए.

शिवराज पर गिरी गाज

महाराष्ट्र के अहमदनगर और नासिक से शुरू हुआ किसान आंदोलन सड़क के रास्ते मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ इलाकों में आया तो इस पर सरकार और प्रशासन ने कोई तवज्जुह नहीं दी जो एक बड़ी भूल साबित हुई. 4 जून को जब रतलाम, नीमच और मंदसौर जिलों में किसान सड़क पर आए तब भी आला अफसरों ने आंदोलन से कोई सरोकार नहीं रखा. शिवराज सिंह सहित उन के मंत्रिमंडल के सदस्य लगातार उग्र होते आंदोलन की तरफ से आंखें मूंदे भोपाल में सोते रहे.

फिर एकाएक ही 6 जून को मंदसौर में हिंसक होते किसानों की भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं तो 6 किसानों की मौत हो गई. इन मौतों पर हड़कंप मचना स्वाभाविक बात थी.

अब मुद्दा आंदोलन या मांगों से ज्यादा किसानों की फायरिंग में मौत का हो गया था जिस के बाबत सरकार के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था. झूमाझटकी के दौरान किसानों ने मंदसौर के कलैक्टर और एसपी से भी बदसुलूकी की तो किसी मंत्री या नेता की हिम्मत मंदसौर जाने की नहीं पड़ी. किसानों के गुस्से का आलम यह था कि अगर कोई मंत्री या नेता उस वक्त उन के सामने पड़ जाता तो तय है वे अफसरों से ज्यादा उस की दुर्गति करते.

खुद शिवराज सिंह चौहान भी तुरंत मंदसौर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. उन्होंने भोपाल में बैठेबैठे ही एक बेतुका बयान, जिस पर उन का काफी मजाक भी बना, यह दे डाला कि मंदसौर की हिंसा के पीछे कांग्रेस और असामाजिक तत्त्वों का हाथ है.

किसानों की पीड़ा और मांगें तो दरकिनार हो गईं, पूछा यह जाने लगा कि आखिर किसानों पर गोलियां किस के आदेश से चलीं. सूबे के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने इस बाबत बारबार अपने बयान बदले, तो साफ लगा कि कहीं कोई बड़ा गड़बड़झाला है.

फायरिंग के तुरंत बाद 6 जून की दोपहर में भूपेंद्र सिंह ने बयान दिया कि गोलियां पुलिस ने नहीं चलाईं बल्कि मौजूदा भीड़ में से ही किसी ने चलाईं. शाम होतेहोते उन्होंने अपने दोपहर के बयान से पलटते कहा कि गोलियां किस ने चलाईं, यह जांच के बाद साफ होगा. हैरानी उस वक्त और बढ़ गई जब इन्हीं भूपेंद्र सिंह ने 8 जून को एक और बयान में यह माना कि गोलियां पुलिस ने ही चलाईं थीं जिस से किसानों की मौतें हुईं.

सूबे के गृहमंत्री के गैर जिम्मेदाराना बयानों और रवैये का असर यह हुआ कि लोग सीधे शिवराज सिंह चौहान को कोसने लगे जिस की वजह भी मुकम्मल थी कि वे मुख्यमंत्री होते हुए भी पुलिस फायरिंग पर बोलने से कतरा रहे थे. दूसरी तरफ जैसे ही प्रधानमंत्री के दफ्तर ने गोलीकांड पर रिपोर्ट मांगी, सियासी गलियारों में यह चर्चा गरमा उठी कि किसानों की मौतों को सीएम की कमजोरी मान कर उन्हें चलता किया जा सकता है.

अपनों और गैरों से घिरे

किसानों की मौत पर काफी होहल्ला मचा तो कांग्रेस भी मौका ताड़ते हमलावर हो आई. दिग्गज कांग्रेसी नेताओं कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 6 जून को काला दिन करार देते सीएम के इस्तीफे की मांग कर डाली. मुद्दत से सूबे की सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही कांग्रेस को सुनहरा मौका शिवराज सिंह को घेरने को मिल गया.

मत चूको चौहान की तर्ज पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी ड्रामाई अंदाज में भागेभागे मंदसौर आए जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. राहुल गांधी ने समझदारी दिखाते शिवराज सिंह चौहान के साथसाथ नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा कि ये लोग तो किसानों को गोलियां भर देते हैं जबकि उद्योगपतियों का अरबों रुपए का कर्ज माफ कर देते हैं.

6 किसानों की मौतों का बवंडर देशभर में मचा और मध्य प्रदेश के बाहर के नेताओं ने नरेंद्र मोदी पर ही निशाना साधा. एनडीए से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में लगे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी नरेंद्र मोदी को कोसा और आम आदमी पार्टी ने भी मोदी को ही इस का जिम्मेदार यह कहते ठहराया कि वे 2014 में किसानों से किए वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं, इसलिए किसान आंदोलन पर उतारू हो आए हैं.

सब से दिलचस्प बयान मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने दिया कि किसानों की हिंसा के पीछे कांग्रेस का कोई हाथ नहीं है. सरकार से किसानों की नाराजगी की वजह से आंदोलन हिंसक हुआ.

अकेले पड़े तो उपवास

मंदसौर हादसे के तीसरे दिन दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई जिस में गृहमंत्री राजनाथ सिंह, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और कृषि मंत्री राधामोहन सिंह खासतौर से शामिल हुए थे.

इस अहम मीटिंग में मंदसौर में मारे गए किसानों पर चर्चा हुई और भाजपा ने इसे साजिश बताया. यह किस की और कैसी साजिश थी, इस का ब्योरा पेश नहीं किया गया.

इधर, 72 घंटे तक दिल्ली की तरफ मुंह कर के सोए रहे शिवराज सिंह को अपनी पार्टी के आलाकमान और प्रधानमंत्री से अपने हक की कोई बात नहीं सुनाई दी तो वे मायूस हो उठे. यह चर्चा भी हुई कि शिवराज सिंह चूंकि लालकृष्ण आडवानी के खेमे के हैं और नरेंद्र मोदी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं इसलिए भी जानबूझ कर उन की नजरअंदाजी की जा रही है.

दिल्ली की मीटिंग में जाहिर है इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई कि किसान बौखलाया हुआ क्यों है, जिन उम्मीदों से उस ने 2014 में भाजपा को वोट दिया था वे कितनी पूरी हुई हैं और अब इतना बड़ा हादसा हो जाने के बाद किसानों के हक में क्या किया जाए कि उन्हें राहत मिले.

अलगथलग पड़ गए शिवराज सिंह चौहान को समझ आ गया कि केंद्र सरकार उन की कोई खास मदद नहीं कर रही है जिस के अपने सियासी माने ये हैं कि उन की हालत पार्टी में दोयम दरजे की कर दी गई है. अगर सख्ती दिखाते उन्हें हटाया नहीं जा रहा है तो बनाए रखने के लिए भी कोई जतन नहीं किया जा रहा है.

हिम्मत न हारते शिवराज सिंह चौहान 11 जून को उपवास करने भोपाल के बीएचईल के दशहरा मैदान पर बैठ गए और 24 घंटे बाद किसानों के हक में ताबड़तोड़ घोषणाएं कर दीं जिन का थोड़ाबहुत असर किसानों पर पड़ा लेकिन तब तक उन की साख पर बट्टा तो लग ही चुका था.

केंद्र सरकार की बेरुखी तो अपनी जगह थी पर आम लोग, खासतौर से शिवराज सिंह समर्थक भाजपाई, उस वक्त भी निराश हो उठे जब नरेंद्र मोदी के मुंह से किसानों के हक में हमदर्दी के दो बोल भी न फूटे. शिवराज सिंह के समर्थक एक भाजपा कार्यकर्ता का कहना है कि अंत कुछ भी हो पर अब हम सूबे में किसानों से वोट मांगने लायक नहीं रह गए हैं. 2014 में नरेंद्र मोदी के वादों पर किसानों ने भाजपा के पक्ष में एकतरफा वोटिंग की थी पर मंदसौर हादसे पर प्रधानमंत्री की चुप्पी से पार्टी को करारा झटका लगा है और इमेज मुख्यमंत्री की बिगड़ी है.

बात सच भी है क्योंकि केंद्र सरकार और भाजपा आलाकमान की मंदसौर के किसानों की मौतों पर चुप्पी का ही यह नतीजा था कि सूबे का कोई मंत्री मंदसौर नहीं गया. कांग्रेस किसानों के मुद्दे पर लगातार भारी पड़ रही है. ऐसे में 2018 का विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के लिए उतना आसान नहीं रह गया है जितना किसान आंदोलन के पहले दिखाई पड़ रहा था.

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