पौलिटिकल राउंडअप

संगमा की शिकायत

मेघालय: यहां के मुख्यमंत्री रह चुके और कांग्रेस के दिग्गज नेता मुकुल संगमा ने 19 अप्रैल को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों से ठीक पहले देश की सिक्योरिटी को मुद्दा बनाया है जबकि पिछले 5 साल में आतंकवादी हमलों में 177 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. मुकुल संगमा का दावा है कि केंद्र सरकार के रवैए ने जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर क्षेत्र, छत्तीसगढ़ और दूसरे राज्यों में हालात को गंभीर बना दिया है. इस से ज्यादा समस्याएं पैदा हुई हैं. ज्यादा लोगों में अलगाव बढ़ा है. भाजपा को भरोसा है कि धर्म कथाओं की तरह एक झूठ को 1000 लोग 1000 बार दोहराएंगे तो वह सच हो ही जाएगा.

राबड़ी की चिंता

पटना: बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी और राष्ट्रीय जनता दल की उपाध्यक्ष राबड़ी देवी ने 20 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी पर उन के पति और पार्टी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को जहर देने की साजिश रचने का आरोप लगाया. अपने ट्विटर हैंडल पर डाले गए एक मिनट के वीडियो में राबड़ी देवी ने कहा कि अगर लालू प्रसाद यादव के साथ कुछ भी गलत होता है तो बिहार और झारखंड की जनता सड़कों पर उतरेगी. चारा घोटाले के मामले में कुसूरवार ठहराए जाने के बाद रांची, झारखंड की एक जेल में सजा काट रहे लालू प्रसाद यादव का इसी शहर के बड़े अस्पताल में कई बीमारियों के लिए इलाज चल रहा है.

एप ने फंसाया

हैदराबाद: विवादित एप ‘टिकटौक’ पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और राज्य के लोगों को भलाबुरा कहने और बेइज्जत करने के आरोप में आंध्र प्रदेश के एक छात्र को गिरफ्तार किया गया. पुलिस के मुताबिक, 20 साल के आरोपी ने 14 अप्रैल को ‘टिकटौक’ पर यह वीडियो अपलोड किया था, जो वायरल भी हो गया था. तेलंगाना राष्ट्र समिति विद्यार्थी विभागम के नेता वी. राम नरसिम्हा गौड़ की शिकायत पर 20 अप्रैल को भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए और सूचना व प्रौद्योगिकी अधिनियम में मामला दर्ज किया गया. पुलिस ने आरोपी के कब्जे से 2 स्मार्टफोन भी जब्त किए. अगर इसी तरह के मामले ‘चौकीदारों’ के खिलाफ दर्ज किए जाएं तो आधे भाजपा भक्त बंद हो जाएं, पर कहा जाता है न कि जब सैयां भए कोतवाल…

प्रज्ञा झगड़ालू रही है

रायपुर: 21 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मध्य प्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वह शुरू से ही झगड़ालू रही है. उस ने 19 साल पहले यहां चाकूबाजी की थी, मारपीट की थी और वह छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती थी. प्रज्ञा सिंह ठाकुर साल 2008 में हुए मालेगांव बम धमाके के मामले में आरोपी हैं और फिलहाल जमानत पर चल रही हैं.

एक भी वोट नहीं

श्रीनगर: 23 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण की वोटिंग हुई थी. तब जम्मूकश्मीर की मुख्यमंत्री रह चुकी महबूबा मुफ्ती के गढ़ और अनंतनाग लोकसभा सीट के तहत आने वाले बिजबेहरा विधानसभा क्षेत्र में सब से ज्यादा 40 वोटिंग सैंटर ऐसे थे जहां एक भी वोट नहीं पड़ा था. बिजबेहरा महबूबा मुफ्ती का गृह निर्वाचन क्षेत्र है, जहां 93,289 लोगों के लिए 120 वोटिंग सैंटर बनाए गए थे. शाम 4 बजे वोटिंग खत्म होने तक कुल 2 फीसदी वोटरों ने ही वोट डाले थे. कश्मीरी लोगों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी चुनावों में भाग लेने को तैयार नहीं है.

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आखिर मिला इंसाफ

अहमदाबाद: सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल को साल 2002 में हुए गुजरात दंगों की पीडि़ता बिलकिस याकूब रसूल को 50 लाख रुपए मुआवजा, सरकारी नौकरी और घर देने का आदेश दिया. उन दंगों के दौरान बिलकिस के साथ भीड़ ने गैंगरेप किया था, जबकि तब वह पेट से थी. इतना ही नहीं, भीड़ ने उस के परिवार के कई सदस्यों को भी मार दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को इस मामले में गलत जांच करने में कुसूरवार पाए गए पुलिस वालों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने के बाद उन पर तुरंत सजा लागू करने का आदेश दिया. काश, हर पुलिस वाले की ज्यादती पर इस तरह का मुआवजा मिलना शुरू हो जाए.

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‘आप’ का घोषणापत्र

नई दिल्ली: 25 अप्रैल को आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए दिल्ली में अपना घोषणापत्र जारी करते हुए पढ़ाईलिखाई, सेहत, महिलाओं की हिफाजत, प्रदूषण, सीलिंग, परिवहन वगैरह से जुड़े कई वादे किए. लेकिन ऐसे ऐलान करते हुए आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल ने यह भी कहा कि ये वादे दिल्ली के पूर्ण राज्य बनने के बाद ही पूरे होंगे. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए वे नरेंद्र मोदी के अलावा किसी को भी समर्थन देने को तैयार हैं, लेकिन बदले में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले. वैसे, आम पार्टी के जीतने के आसार न के बराबर हैं, क्योंकि उस के वोट बंट कर कांग्रेस को चले जाएंगे.

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मायावती और सीबीआई जांच

लखनऊ. मायावती सरकार के समय साल 2010-11 में 7 बंद चीनी मिलों को बेचने में हुए घोटाले में 26 अप्रैल को सीबीआई लखनऊ की ऐंटी करप्शन ब्रांच ने एफआईआर दर्ज की. इस के अलावा 14 दूसरी चीनी मिलों की बिक्री को ले कर 6 अलगअलग आरंभिक जांच दर्ज की गईं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 12 अप्रैल, 2018 को 21 चीनी मिलों की बिक्री में हुई गड़बडि़यों के मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश की थी. चीनी मिलों को बेचने में हुए घोटाले के चलते प्रदेश सरकार को 1,179 करोड़ रुपए के राजस्व का घाटा हुआ था. ऐन चुनावों के समय यह जांच करना क्यों जरूरी था, यह न पूछें. निचलीपिछड़ी जातियों के गठबंधन को चोट पहुंचाने की हर कोशिश जरूरी है न.

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जांच पर लगाई रोक

चेन्नई: 5 दिसंबर 2016 को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता की राज भरे माहौल में मौत हो गई थी. इस के बाद तब के उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम मांग करने लगे थे कि जयललिता की मौत की जांच होनी चाहिए. उन्होंने तब कहा था कि जयललिता की मौत से पहले उन से मिलने की किसी को इजाजत नहीं थी. जयललिता की सहयोगी शशिकला ही अस्पताल में उन के पास थीं, जिस पर सवाल खड़े हुए थे. लेकिन 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने जे. जयललिता की मौत की वजहों की जांच कर रहे आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी. जयललिता कैसे मरीं, यह कोई पूरी तरह नहीं बताना चाहता.

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मुनमुन के बिगड़े बोल

आसनसोल. 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चौथे चरण के तहत 5 जिलों में 8 लोकसभा सीटों के लिए हुई वोटिंग के दौरान वहां हिंसा हुई. आसनसोल में भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई. केंद्रीय मंत्री और पश्चिम बंगाल में आसनसोल से भाजपा उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो की कार पर हमला भी हुआ. आसनसोल से तृणमूल की उम्मीदवार मुनमुन सेन से जब इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि थोड़ी हिंसा तो होगी ही, जैसे सब जगह होती है… आज मुझे सुबह की चाय देर से मिली… मैं काफी देर से सो कर जगी तो मुझे नहीं पता कि क्या हुआ है.

इन गरीब बच्चों की कामयाबी पर सन्नाटा क्यों?

इन पांचों के पास पहनने को लेटेस्ट डिजायन के रंग-बिरंगे कपड़े नहीं हैं, इनके घर बेहद छोटे और संकरे हैं जिनमें बुनियादी सहूलियतों का टोटा है, इनके पास शौपिंग करने अनाप शनाप तो क्या खुद की जरूरतें पूरी करने भी पैसा नहीं है.  बंगला , कार , बाईक , एसी,  फ्रिज और  गीजर जैसे लग्जरी आइटम इनके लिए सपना हैं और तो और इनके पास घर में पढ़ने के लिए टेबल कुर्सी तक नहीं हैं फिर दूसरी बातों अभावों और चीजों का तो जिक्र करना ही फिजूल की बात है.

लेकिन एक चीज जो इनके पास है वो उनकी उम्र के लाखों बच्चों के पास नहीं है. वह है मेहनत, लगन और जज्बा जो किसी बाजार में नहीं बिकता, उसे तो खुद पैदा करना पड़ता है या फिर जरूरतों और हालातों से लड़ने खुद ब खुद पैदा हो जाता है. गरीबी के दर्द को बेहद नजदीक से भुगतने बाले इन पांच बच्चों ने कामयाबी की जो इबारत लिखी है वह अपने आप में एक ऐसी मिसाल है जिसे लाखों सेल्यूट ठोके जाएं तो भी कम पड़ेंगे.

मध्यप्रदेश के बोर्ड इम्तिहान के 15 मई को आए नतीजों में टौप 10 में से कम से कम 5 ऐसे परिवारों में से हैं जिनके यहां हफ्ते भर का भी राशन नहीं होता. इसके बाद भी ये मेरिट लिस्ट में हैं तो यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि इनकी मेहनत का ही नतीजा है. अभावों और गरीबी से छुटकारा पाने की ललक ने इन पांचों होनहारों को यूं ही रातोंरात ऊंचाई पर नहीं पहुंचा दिया है. उसके लिए इन्होने हाड़ तोड़ मेहनत की है. इनके पास कोई ट्यूटर नहीं था और न ही ये आलीशान कोचिंग में गए थे. अपने कोच, मेंटर ,काउन्सलर और ट्यूटर खुद बनते-2 इन्होने एक ऐसा इतिहास गढ़ दिया है जो मेरिट लिस्ट में आने के ख्वाहिशमंद छात्रों के लिए एक सबक है. आइये देखें कौन हैं ये गुदड़ी के लाल और कैसे कामयाबी की छत तक पहुंचे .

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कामयाबी की पांच कहानियां

1 आयुष्मान ताम्रकार

कामयाबी की इन कहानियों में सबसे ऊपर नाम है सागर के आयुष्मान ताम्रकार का जिसके पिता विमल ताम्रकार शहर के एक मेरिज गार्डन में चौकीदार हैं जबकि मां बरखा मजदूरी करती हैं . सागर के मोहन नगर वार्ड की तंग संकरी गलियों में एक कच्चे मकान में यह परिवार रहता है .  किसी को भी यह जानकार हैरानी होना लाजिमी है की जिस वक्त दूसरे बच्चे मोबाइल या कंप्यूटर पर गेम खेल रहे होते थे  या मैदान में क्रिकेट के चौके छकके उड़ा रहे होते थे उस वक्त में आयुष्मान किराने की दुकान में ग्राहकों को सामान तौल कर दे रहा होता था जिससे तनख्वाह से वह फीस भर सके और जरूरी कापी किताबें खरीद सके . आयुष्मान के पिता को महज 4 हजार रु महीने की पगार मिलती है जिससे छह सदस्यों बाला  घर कैसे खींचतान कर चलता होगा इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है . विमल के चारों बच्चे अपनी पढ़ाई लिखाई का खर्च खुद कोई न कोई काम कर निकालते हैं जिससे मां बाप पर बोझ न पड़े .

आयुष्मान सागर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है उसने 10वीं की परीक्षा में 500 में से 499 नंबर हासिल कर राज्य में पहला स्थान पाया है . किराने की दुकान में नौकरी करने के अलावा उसे कभी कभी पिता की जगह भी ड्यूटी बजाना पड़ती है . इतनी बड़ी कामयाबी हासिल करने के बाद भी वह बहुत बड़े सपने नहीं देख रहा बल्कि बड़ा होकर अपने पिता और परिवार का सहारा बनने की बात कर रहा है जो उसके हकीकत में जीने का सबूत है . तय है एक दिन आयुष्मान फिर सुर्खियों में होगा जब उसके पास बहुत ज्यादा पैसों बाली नौकरी इसलिए होगी कि उसके हौसले बुलंद और इरादे चट्टान की तरह मजबूत हैं . आयुष्मान की जुड़वां बहिन आयुषी ने भी 10बी के इम्तिहान में 92 फीसदी नंबर हासिल किए हैं .

जब रिजल्ट आया और आयुष्मान यह खुशखबरी चौकीदारी कर रहे पिता को सुनाने मेरिज गार्डन पहुंचा तो वहाँ एक शादी हो रही थी  . उसके साथ उसकी माँ और बहिन भी थीं . जैसे ही शादी में शामिल होने आए लोगों को यह पता चला कि 10बी का टापर यहां के गार्ड का बेटा है तो उन लोगों ने उसे घेर लिया और उसके साथ सेलफ़ी लेने बालों की भीड़ लग गई हर कोई इस होनहार छात्र के साथ सेल्फी लेने बैचेन था .

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2 राधिका मडोतिया

चार विषयों में सौ में से सौ और साइन्स में 95 नंबर लाने बाली सागर की ही राधिका मेरिट लिस्ट में चौथे नंबर पर आई है . राधिका के पिता रामेश्वर पेशे से कार्पेंटर हैं और अपनी मामूली आमदनी से जैसे तैसे घर चला पाते हैं . रिजल्ट के बाद जैसे ही राधिका मार्क शीट लेकर पिता के पास पहुंची और उन्हें अपनी कामयाबी के बारे में बताया तो उन्होने भरे गले से बेटी को गले लगा लिया . उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनकी बिटिया ने वो मुकाम हासिल कर लिया है जिसके लिए अच्छे अच्छे बच्चे तरसते हैं .

पैसों की कमी का एहसास राधिका को था लेकिन उसके पिता हमेशा उसे हिम्मत बधाते रहे और घर के सदस्य भी उसकी लगन और मेहनत देखकर उसे खूब पढ़ने प्रोत्साहित करते रहे . राधिका ने भी घर बालों को निराश नहीं किया उल्टे मेरिट में चौथा स्थान हासिल कर उनकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा खरा उतर कर दिखाया . इस कामयाबी से बेहद खुश राधिका आईएएस अधिकारी बनना चाहती है . रामेश्वर भी कहते हैं कि जैसे भी हो वे अपनी बेटी का पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे .

राधिका ने भी जी तोड़ मेहनत की वह रोजाना छह से सात घंटे पढ़ती थी और 45 मिनिट एक विषय पढ़ती थी और फिर 15 मिनिट में जो याद किया होता था उसे लिखती थी . इससे उसकी याददाश्त भी बढ़ी और लगन भी.

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3 पूर्वा आठनेरे

साहस और समझ की धनी पूर्वा आठनेरे से बेहतर शायद ही कोई बता सके कि दरअसल में गरीबी और अभावों की मार क्या और कैसी कैसी होती है . बहुत कम उम्र में ही सयानों जैसी बातें करने बाली पूर्वा से बात करने बाला कोई भी शख्स शायद ही खुद को द्रवित होने से बचा पाये . उसके पिता एकनाथ आठनेरे भोपाल की एक फैक्टरी में मजदूरी करते थे . एक साल पहले उनकी नौकरी भी चली गई तो वे काम के लिए दर दर की ठोकरें खाने लगे . लेकिन एकनाथ और उनकी पत्नी विमला ने जैसे तैसे मेहनत मजदूरी करके अपनी बेटियों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी . पूर्वा की दो बड़ी बहिने हर्षा और रीना भोपाल के ही कालेजों से इंजीनयरिंग की पढ़ाई कर रहीं हैं .

भोपाल के आनंद नगर स्थित शासकीय हायर सेकेन्डरी स्कूल की 10बी कक्षा में पढ़ने बाली पूर्वा ने 500 में से 491 नंबर लाकर मेरिट में आठवा स्थान हासिल किया है . रोजाना छह घंटे पढ़ने बाली पूर्वा परीक्षा के दिनों में आठ घंटे पढ़ती थी . इस दौरान वह खाना पीना तक भूल जाती थी फिर खेल कूद और दूसरी मौजमस्ती पर तो उसने कभी ध्यान दिया ही नहीं या यूं कह लें कि हालातों के चलते वह ऐसा कर भी नहीं सकती थी .

पूर्वा के स्कूल के शिक्षकों को भी पूरा भरोसा था कि वह अव्वल नंबरों से पास होगी पर मेरिट में जगह बनाकर उसने सभी को न केवल चौंका दिया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि अगर आप ठान लें और अपने लक्ष्य के प्रति जीजान से जुट जाएँ तो नामुमकिन कुछ नहीं . अपूर्वा ने अपने घर के हालातों और अभावों को अपने सपने पूरे करने में आड़े नहीं आने दिया .

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4 मानसी राठोर  –

10वीं ही नहीं बल्कि 12वीं बोर्ड के इम्तिहान में भी वे बच्चे परचम लहराने में पीछे नहीं रहे हैं जिनके घर के हालत आयुष्मान पूर्वा या फिर किसी राधिका से जुदा नहीं थे. इंदौर के बालाजी गणेश मारवाड़ी स्कूल में पढ़ने बाली कामर्स संकाय में इंदौर की मानसी 500 में से 481 नंबर लेकर मेरिट में तीसरे नंबर पर रही है . मानसी के पिता मेकेनिक हैं जिनकी आमदनी इतनी नहीं है कि वे बच्चों को सीबीएसई स्कूल में पढ़ा पाते इसलिए मानसी को एमपी बोर्ड से ही पढ़ाई करना पड़ी . मानसी की मां हालांकि छोटा से ब्यूटी पार्लर चलाती हैं लेकिन उससे बहुत ज्यादा आमदनी नहीं होती है .

मेरिट में आए दूसरे छात्रों की तरह मानसी की कामयाबी से ज्यादा अहम उसकी घरेलू ज़िंदगी और हालात हैं . इंदोर के बराभाई मोहल्ले में रहने बाली मानसी के पिता मनोज राठोर की दुकान सड़क के चौडीकरण के चलते नगर निगम ने तोड़ दी थी जिससे अनियमित आमदनी का भी सहारा जाता रहा लेकिन मानसी के बुलंद इरादे उससे कोई नहीं छीन पाया . अच्छी बात यह रही कि माँ बाप और कज़िन उसकी हिम्मत बँधाते रहे . मानसी को एहसास था कि गरीबी और अभावों को रोते धोते रहने से उसे मंजिल नहीं मिलेगी लिहाजा वह भी सब कुछ भूलभाल कर पढ़ाई में जुट गई और जब नतीजा आया तो  पूरे घर बालों जिनमें उसके बुजुर्ग दादा दादी भी थे ने जश्न मनाया . मानसी अब सीए बनना चाहती है और उसका उत्साह और लगन देखकर लगता है कि वह इससे भी बड़ा मुकाम हासिल करने में कामयाब रहेगी .

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5 देवा यादव  –

कटनी के केंप इलाके के एक जनरल स्टोर में काम करने बाले देवा यादव को जब उसकी बहन ने दुकान पहुंच कर यह बताया कि भाई तूने टाप किया है तो खुशी से भर गए देवा ने बहन को गले लगा लिया और दोनों की आंखें भर आईं.  यह नजारा देख उन्हें देख रहे लोग भी भावुक हो उठे. यह किसी फिल्म की शूटिंग नहीं थी बल्कि एक ऐसी हकीकत थी जिसकी कहानी फिल्मों को भी मात करती है .

बिलहरी के सरकारी स्कूल के इस होनहार और जांबाज छात्र ने भी 12वी में 500 में से 448 नंबर हासिल कर मेरिट लिस्ट में जगह बनाई है. उसके पिता भी मजदूर हैं जो हमेशा देवा का हौसला बढ़ाते रहे जिससे उसके सपने पूरे हों और घर की माली हालत भी सुधरे . देवा एक अच्छा इंसान बनकर समाज के लिए भी कुछ करना चाहता है . उसे मालूम है कि अब आगे भी उसे पढ़ाई का खर्च खुद जुटाना है और ऐसा वह कर भी लेगा .

देवा की कामयाबी पर बिलहरी गांव में जश्न का माहौल था और हर कोई अपने गांव के इस बेटे की मिसाल दे रहा था जिसने गरीबी को धता बताते मेरिट में जगह बनाई वह भी दुकान में नौकरी करते जो वाकई एक गैर मामूली बात है .

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सन्नाटा क्यों

इन पांचों ने गरीबी से लड़ते मेरिट में जगह बनाई लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया पर इन्हें उम्मीद के मुताबिक जगह नहीं मिली तो इसकी अपनी वजहें भी हैं. पिछड़ी और छोटी जातियों के इन बच्चों का कसूर ही इसे कहा जाना चाहिए कि वे गरीब भी है. किसी रईस परिवार का बच्चा मेरिट में आता है तो मीडियाकर्मी उनके बंगलों पर लाइन लगाए खड़े नजर आते हैं . बड़े बड़े फोटो उनके छपते हैं और मोटे मोटे अक्षरों में उनकी कामयाबी की दास्तां छापी और दिखाई जाती है .

अब ये अपनी मेहनत और बलबूते पर मेरिट में आ रहे हैं तो रस्म के तौर पर इन्हें स्पेस दिया गया.  यह भेदभाव इनकी हौसले डगमगा पाएगा ऐसा कहने की कोई वजह नहीं लेकिन एक बात जरूर साफ हो रही है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे गरीब मजदूरों के बच्चे अव्वल आकर एक चुनौती भी धनाड्य और तमाम सुख सुविधाओं में रहते बच्चों या वर्ग के सामने पेश कर रहे हैं. शिक्षा और केरियर के प्रति गरीब बच्चों में आ रही जागरूकता को शायद इसीलिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन नहीं मिलता क्योंकि ये भव्य और महंगे प्राइवेट स्कूलों की पढ़ाई की गुणवत्ता को भी कटघरे में खड़ा कर उनकी दुकान खराब कर रहे हैं.

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सोशल मीडिया पर उड़ा सोनम, दीपिका और ऐश्वर्या का मजाक

हर साल आयोजित होने वाला कांस फिल्म फेस्टिवल की धूम शुरू हो चुकी है. दुनिया भर में मशहूर ये फेस्टिवल इस में हिस्सा लेने के लिए हमारी बॉलीवुड स्टार्स भी तैयार हैं कंगना रनौत दूसरी बार कांस फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा ले रही है. वही सोनम कपूर, दीपिका पादुकोण और ऐश्वर्या राय बच्चन भी इस फेस्टिवल में धूम मचाने के लिए तैयार हैं. छोटे परदे की अक्षरा यानी हिना खान भी इस फेस्टिवल में शामिल हो चुकी हैं. लेकिन कान्स में जलवा बिखेरने से पहले ही इन बौलीवुड दीवा की पुरानी ड्रेसेस चर्चाओं में आ गई हैं. क्योंकि इंटरनेट पर एक बार फिर जमकर इनका मजाक बनाया जा रहा है.

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मीम्स  में सबसे आगे सोनम कपूर की ड्रेस

सोनम कपूर के मीम्स सबसे ज्यादा बनाये जाते है. इसमे से एक मीम्स सोनम को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने ट्विटर एकाउंट पर इसे शेयर कर डाला. इसमें सोनम कपूर की तुलना पापा अनिल कपूर से की गई है. एक यूजर ने तो सोनम कपूर की इस ड्रेस की तुलना मैगी से करते हुए लिखा कि “इसीलिए मैगी को बैन किए जाने की मांग होती है”. वहीं कुछ लोगों ने इस ड्रेस को फर वाले डोग से मैच कर डाला है, इस कमेन्ट को कई लोगों ने पसंद किया और खूब आगे बढ़ाया.

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दीपिका भी हुईं ट्रोल

दीपिका के मीम्स में एक यूजर ने उनकी इस ड्रेस की तारीफ में एक राज्य तक को शामिल कर लिया. इतना ही नहीं इनका लॉजिक पढ़कर सभी लोग सोशल मीडिया में  दीपिका को ट्रोल करने में लगे है.

डायनासोर से की दीपिका की तुलना

दीपिका ने बीते साल पहनी पिंक ड्रेस पर लोगों ने मजाक उड़ाते हुए उन्हें डायनासोर तक से मैच कर डाला. इसके अलावा एक यूजर ने लिखा कि “दीपिका खुद अपनी ड्रेस खाना चाहती हैं क्योंकि वो उनके फेवरेट गुड़िया के बाल वाले फर से बनी है”

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ऐश्वर्या की ड्रेस को बनाया बाहुबली का झरना 

ऐश्वर्या  की ड्रेस पर एक यूजर ने फिल्म बाहुबली के एक सीन से मैच कर डाला. जिसमें एक्ट्रेस तमन्ना भाटिया वाटर फौल वाले सीन में डांस कर रही थी. वही एक यूजर ने बारबी केक पर बनी डॉल तक से ऐश की ड्रेस की तुलना कर डाली.

 अब देखना होगा की इस साल भी लोग स्टार्स की ड्रेसस  पसंद करते है या फिर ट्रोल….

कम्मो

‘‘ठीक है कम्मो, जरा देखभाल कर घर जाया करो रात को. आजकल ऐसा ही जमाना है.’’ ‘‘बाबूजी, मुझे अकेले कोई डर नहीं लगता. मैं ऐसे लोगों से बखूबी निबटना जानती हूं,’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखते हुए कहा और कमरे से बाहर निकल गई. कुछ देर बाद राजेश उठे और दरवाजा बंद कर बिस्तर पर बैठ गए. राजेश की उम्र 62 साल हो चुकी थी. 2 साल पहले वे एक सरकारी महकमे से अफसर रिटायर हुए थे. परिवार में पत्नी कमला और 2 बेटे विकेश और विजय थे.

दोनों बेटों को पढ़ालिखा कर इंजीनियर बनाया. दोनों ने बेंगलुरु में नौकरी कर ली. दोनों की शादी कर दी गई और वे अपनी पत्नियों के साथ खूब मजे में रह रहे थे. जब तक पत्नी कमला का साथ रहा, राजेश को कुछ भी कमी महसूस न हुई. नौकरी के दौरान खूब पैसा कमाया. बड़ा 4 कमरों का मकान बना लिया. पिछले साल एक दिन कमला को हार्ट अटैक हुआ और अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया. कमला के मरने के बाद राजेश बिलकुल अकेले हो गए. दिन तो किसी तरह कट जाता, पर रात काटनी बहुत मुश्किल हो जाती. विकेश और विजय ने बारबार फोन कर के उन को अपने पास बुला लिया. दोनों के घर एकएक महीना बिता कर वे फिर यहां अपने मकान में आ गए. सुबह का नाश्ता, सफाई, पोंछा व कपड़ों की धुलाई का काम जमुना करती थी. दोपहर व शाम का खाना शांति बनाती थी. एक दिन राजेश ने कहा था, ‘जमुना, मैं चाहता हूं कि तुम किसी ऐसी काम वाली को ढूंढ़ दो जो सुबह 9 बजे से रात के 8 बजे तक रहे. सुबह नाश्ते से रात के खाने तक के सारे काम कर सके.’ ‘ठीक है बाबूजी, मैं तलाश करूंगी,’ जमुना ने कहा था. एक दिन सुबह जमुना एक औरत को ले कर आई. जमुना ने कहा, ‘बाबूजी, यह कम्मो है. जब मैं ने यहां काम के बारे में बताया तो यह तैयार हो गई. यह सुबह 9 बजे से रात के 8 बजे तक रहेगी.’ राजेश ने कम्मो की तरफ देखा.

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सांवला रंग, गदराया बदन, मोटीमोटी आंखें. उम्र तकरीबन 30-32 साल. माथे पर बिंदी और मांग में सिंदूर. अगले दिन सुबह कम्मो आई तो राजेश अखबार पढ़ रहे थे. कम्मो ने ‘नमस्ते बाबूजी’ कहा. ‘आओ कम्मो,’ राजेश ने उसे देखते हुए कहा, ‘बैठो.’ कम्मो वहां रखी कुरसी पर बैठ गई. ‘कम्मो, जरा अपने बारे में कुछ बताओ?’ राजेश ने पूछा. ‘बाबूजी, मेरा नाम कामिनी है, पर सभी मुझे कम्मो कहते हैं. मैं बिहार में पटना के पास ही एक गांव की रहने वाली हूं. मैं ने 10वीं तक पढ़ाई की है. मैं ने अपने मातापिता को नहीं देखा. वे दोनों मजदूरी करते थे. एक दिन एक मकान का लैंटर टूट गया तो उस में दब कर दोनों मर गए. मकान मालिक ने मेरे मामा को 3 लाख रुपए दे दिए थे तब मेरी उम्र 5 साल थी. मामामामी ने ही पाला है. ‘18 साल की उम्र में मामा ने मेरी शादी पास के ही एक गांव में कर दी. शादी के 3 महीने बाद मेरे पति की सड़क हादसे में मौत हो गई. कुछ समय बाद देवर मोहन के साथ मेरी शादी हो गई. वह शहर में एक फैक्टरी में काम करता था. रोज सुबह चला जाता और शाम को लौटता था. ‘मेरी सास नहीं थी. एक दिन दोपहर का खाना खा कर मैं आराम कर रही थी तो अचानक ही ससुर ने मुझे दबोच लिया. मैं ने बहुत मना किया, पर वह नहीं माना. मैं ने इस बारे में पति मोहन को बता दिया. ‘उन दोनों की लड़ाई हो गई. इस लड़ाई में ससुर के हाथ से मोहन की हत्या हो गई. ससुर को पुलिस ने पकड़ लिया. मैं वहां उस घर में अकेली कैसे रहती, इसलिए मैं अपने मामामामी के पास लौट गई. ‘कुछ महीने बाद एक आदमी मामा के घर आया. वह आदमी मेरी तरफ ही देख रहा था. मामा ने मुझे बताया कि यह किशनलाल है.

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मुजफ्फरनगर का रहने वाला है. यह सब्जी बेचने का काम करता है. इस की घर वाली को पीलिया हो गया था. इलाज कराने पर भी वह बच नहीं सकी. घर में 20 साल का बेटा कमल है. वह 7वीं क्लास तक ही पढ़ सका, किसी दुकान पर नौकरी करता है. ‘मामा ने एक मंदिर में मेरी शादी किशनलाल से कर दी. मैं अपने पति के साथ यहां आ गई. मुझे बाद में पता चला कि मेरे मामा ने इस शादी के लिए 40,000 रुपए लिए थे. ‘मेरी शादी कर के मामा बहुत खुश था कि रुपए भी मिल गए और छाती पर बैठी मुसीबत भी टल गई. ‘एक दिन मुझे पता चला कि मेरे ससुर को हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा हो गई है. यहां सब ठीकठाक चल रहा था. पहले तो मेरा पति कभीकभार शराब पी कर आता था, पर धीरेधीरे उसे रोज पीने की आदत पड़ गई. वह जुआ भी खेलने लगा था. ‘पति ने रेहड़ी लगानी बंद कर दी. मंडी वालों का कर्ज सिर पर चढ़ गया था. घर में जो जमापूंजी, जेवर वगैरह रखे थे, मंडी वालों को दे कर पीछा छुड़ाया. इस के बाद मैं ने घरों में काम करना शुरू कर दिया,’ कम्मो ने अपने बारे में बताया. ‘ठीक है कम्मो, अब तुम घर का काम संभालो.’ ‘बाबूजी, इतनी देर तक अपनी दुखभरी कहानी सुना कर मैं ने आप के सिर में दर्द कर दिया न? आप कहें तो सब से पहले मैं आप के लिए बढि़या सी चाय बना दूं?’ कम्मो ने हंसते हुए कहा था. राजेश मना नहीं कर सके थे. कम्मो ने घर में काम करना शुरू कर दिया. सुबह नाश्ते से ले कर रात के खाने तक सभी काम बहुत सलीके से करती थी. उसे राजेश के यहां काम करते हुए 2 महीने हो चुके थे. अकसर फर्श की सफाई करते हुए जब कम्मो पोंछा लगाती तो उस के उभार ब्लाउज से बाहर निकलने को हो जाते. राजेश कुरसी पर बैठे हुए अखबार पढ़ रहे होते तो उन की नजरें उभारों पर टिक जातीं.

वे इधरउधर देखने की कोशिश करते, पर फिर भी उन की नजर कम्मो की गदराई जवानी पर आ कर ठहर जाती. वे अखबार की आड़ ले कर एकटक उसे देखते रहते. कम्मो भी यह सब जानती थी कि बाबूजी क्या देख रहे हैं. वह चुपचाप अपने काम में लगी रहती मानो उसे कुछ पता ही न हो. एक दिन कम्मो ने राजेश से कहा, ‘‘बाबूजी, कमल के पापा की तबीयत ठीक नहीं चल रही है. उस को किसी अच्छे डाक्टर को दिखाना पड़ेगा.’’ ‘‘क्या हो गया है उसे?’’ ‘‘भूख नहीं लगती. कमजोरी भी आ गई है. महल्ले का डाक्टर कह रहा था कि शराब पीने के चलते गुरदे खराब हो रहे हैं.’’ ‘‘जब इतनी शराब पीएगा तो गुरदे तो खराब होंगे ही.’’ ‘‘बाबूजी, मुझे कुछ पैसे दे दीजिए.’’ ‘‘कितने पैसे चाहिए?’’ ‘‘5,000 रुपए दे दीजिए. डाक्टर की फीस, टैस्ट, दवा वगैरह में इतने तो लग ही जाएंगे.’ ‘‘ठीक है, रात को जब घर जाएगी तो मुझ से लेती जाना.’’ कम्मो ने चेहरे पर मुसकान बिखेर कर कहा, ‘‘बाबूजी, आप बहुत अच्छे इनसान हैं जो हम जैसे गरीबों की कभी भी मदद कर देते हो.’’ ‘‘जब तुम यहां इतना अच्छा काम कर रही हो तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं तुम्हारी मदद करूं,’’ राजेश ने कम्मो की तरफ देखते हुए कहा. कुछ दिन बाद राजेश का एक पुराना दोस्त मदनलाल दिल्ली से आया. वह उन का पुराना साथी था.

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वह भी सरकारी नौकरी से रिटायर हुआ था. कम्मो चाय व कुछ खाने का सामान ले कर आई और मेज पर सजा कर चली गई. चाय पीतेपीते मदनलाल ने कहा, ‘‘यार राजेश, यह नौकरानी तो एकदम पटाखा है. कहां से ढूंढ़ कर लाए हो?’’ ‘‘बस अपनेआप ही मिल गई.’’ ‘‘तुम्हारी किस्मत तो बहुत ही तेज है डियर, जो ऐसी जबरदस्त नौकरानी मिल गई. एकदम हीरोइन लगती है. अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो ऐसी मस्त नौकरानी से खूब मजे लेता. अरे भाई, हमारे पास रुपएपैसे की कमी नहीं है. हमारी औलादें खूब मजे में हैं. वे बढि़या नौकरी पर हैं. हम क्यों और किस के लिए कंजूसी करें? हमें भी तो अपनी बाकी जिंदगी हंसीखुशी और मजे में गुजारनी चाहिए.’’ राजेश ने कोई जवाब नहीं दिया. कुछ देर बाद कम्मो चाय के खाली बरतन उठाने आई तो मदनलाल उस की तरफ एकटक देखता रहा. ‘‘अच्छा राजेश डियर, मैं चलता हूं,’’ एक घंटे बाद मदनलाल बोला. ‘‘वापस दिल्ली कब जाना है?’’ ‘‘शाम को ही लौट जाऊंगा. अगर तुम रात को कम्मो को यहीं रोक सको तो मैं भी रुक जाऊंगा.’’ ‘‘यार, लगता है कि तुम मेरी नौकरानी को भगा कर ही रहोगे.’’ ‘‘यह तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी, क्योंकि तुम जैसे इनसान बहुत कम हैं जो किसी की मजबूरी का फायदा नहीं उठाते. यह भी हो सकता है कि यह किसी दिन तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठा ले.’’ ‘‘वह कैसे?’’ ‘‘मैं क्या बताऊं, यह तो समय ही बताएगा,’’ मदनलाल ने कहा और हंसते हुए राजेश से विदा ली. रात का खाना खा कर राजेश आराम कुरसी पर बैठे थे. उन के दिमाग में मदनलाल की बातें घूमने लगीं. उन की आंखों के सामने कम्मो का हंसतामुसकराता चेहरा, गदराया बदन, ब्लाउज से बाहर निकलते उभार आने लगे. दिल और दिमाग में अजीब सी बेचैनी होने लगी. वे आराम कुरसी पर सिर पकड़ कर बैठ गए. कुछ देर बाद कम्मो ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘क्या हुआ बाबूजी? लगता है, आप की तबीयत खराब है.’’ ‘‘सिर में दर्द हो रहा है,’’ राजेश ने झूठ बोल दिया.

‘‘मैं आप का सिर दबा देती हूं. आप बिस्तर पर लेट जाइए. माथे पर बाम भी लगा देती हूं.’’ राजेश बिस्तर पर लेट गए. कम्मो ने उन के माथे पर बाम लगाते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, यह सिरदर्द ज्यादा सोचने से होता है, आप ज्यादा न सोचा कीजिए. भला आप को क्या कमी है? आप को किस बात की चिंता है? फिर इतना क्यों सोचते हैं आप?’’ राजेश के एक हाथ की उंगलियां कम्मो की कमर पर चलने लगीं. ‘‘बाबूजी, यह क्या कर रहे हैं आप?’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखते हुए कहा. ‘‘कुछ नहीं कम्मो, आज मन बहुत बेचैन हो गया है,’’ राजेश ने धड़कते दिल से कम्मो को अपनी ओर खींच लिया. कम्मो ने मना नहीं किया. कुछ देर बाद कम्मो ने कमरे से बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबूजी, अब मैं चलती हूं.’’ ‘‘ठीक है, जाओ,’’ राजेश ने कहा और बिस्तर पर लेटेलेटे वे बहुत देर तक उन पलों के बारे में सोचते रहे जो अभी कम्मो के साथ बिताए थे. सुबह कम्मो आई तो एकदम नौर्मल थी. रात की घटना की कोई नाराजगी उस के चेहरे पर न थी. यह देख राजेश को तसल्ली हुई कि कम्मो नाराज नहीं है. एक रात कम्मो ने घर जाने से पहले राजेश के पास आ कर कहा, ‘‘बाबूजी, आप से एक बात कहनी थी.’’ ‘‘हांहां, कहो.’’ ‘‘पहले यह बताइए कि आप की तबीयत तो ठीक है न? कहो तो आप का सिर दबा दूं?’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखा. राजेश ने उसे अपनी तरफ खींच लिया. कुछ देर बाद कम्मो बिस्तर से उठ कर जाने लगी तो राजेश ने पूछा, ‘‘तुम कुछ कह रही थी न कम्मो?’’ ‘‘हां बाबूजी, कमल फलों की रेहड़ी लगाना चाहता है.

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अगर आप कुछ मदद कर दें तो वह रेहड़ी लगा लेगा.’’ ‘‘कितने रुपए में लग जाएगी रेहड़ी?’’ ‘‘तकरीबन 15,000 रुपए…’’ ‘‘ठीक है, कल ले जाना रुपए.’’ ‘‘बाबूजी, आप बहुत अच्छे इनसान हैं,’’ कम्मो ने कहा और मुसकराते हुए चली गई. एक महीने बाद काम करतेकरते कम्मो को अचानक उलटी हो गई. राजेश ने कम्मो को बुला कर पूछा, ‘‘क्या बात है कम्मो? तबीयत तो ठीक है न?’’ ‘‘बाबूजी लगता है कि मैं पेट से हो गई हूं. मुझे महीना भी नहीं हुआ है.’’ ‘‘तुम डाक्टर से चैकअप कराओ. शाम को नर्सिंग होम में चली जाना. नर्सिंग होम से सीधे अपने घर पहुंच जाना. मुझे मोबाइल पर बता देना जैसा भी डाक्टर बताता है.’ रात को राजेश को कम्मो ने सूचना दे दी कि वह पेट से हो गई है. अगले दिन सुबह जब कम्मो काम करने आई तो राजेश ने उसे अपने कमरे में बुलाया. कम्मो बोली, ‘‘बाबूजी, आप ने मेरे साथ संबंध बनाए तो उसी के चलते मैं पेट से हो गई हूं. अब मेरे पेट में आप का बच्चा पल रहा है.’’ ‘‘कम्मो, यह तुम कैसे कह सकती हो कि यह मेरा ही बच्चा है, यह तुम्हारे पति का भी तो हो सकता है.’’ ‘‘बाबूजी, कमल का पापा तो 3 महीने से मेरे पास आया ही नहीं, वह बीमार रहता है.’’ ‘‘कम्मो, मेरा कहा मानोगी…’’ ‘‘कहिए बाबूजी?’’ ‘‘तुम अपना बच्चा गिरवा लो.’’ ‘‘नहीं बाबूजी, मैं बच्चा नहीं गिराऊंगी. मैं हत्या नहीं कराऊंगी. चाहे यह बेटा हो या बेटी, मैं इसे पालपोस कर बड़ा करूंगी. ‘‘मेरा कहना मान लो कम्मो, तुम बच्चा गिरा दो.’’ ‘‘नहीं बाबूजी, आप मुझे ऐसी सलाह न दें. इस के पैदा होने पर मैं सभी को बता दूंगी कि इस का पापा कौन है, क्योंकि इस की शक्ल आप से मिलेगी.’’ ‘‘अगर मुझ से शक्ल न मिली तो…?’’ ‘‘तो मैं इतनी भोली भी नहीं हूं जो चुपचाप बैठ जाऊंगी. मैं सब से पहले इस बच्चे का डीएनए टैस्ट कराऊंगी और मीडिया को बता दूंगी कि यह बच्चा भी आप की जायदाद का वारिस है,’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखते हुए कहा.

उस के चहरे पर मुसकान थी. यह सुन कर राजेश को पसीना आ गया. वे तो कम्मो को बहुत भोली समझ रहे थे, पर यह तो जरूरत से ज्यादा समझदार व चालाक है. इस ने तो उसे ही जाल में फंसा दिया है. राजेश ने कहा, ‘‘सुनो कम्मो, जो होना था हो गया. अब तुम यह बताओ कि इस मुसीबत से बचने के लिए मैं तुम्हें कितने रुपए दे दूं?’’ ‘‘बाबूजी, मुझे आप पर तरस आता है. आप बस 5 लाख रुपए दे दो. मैं बच्चा गिरवा दूंगी.’’ ‘‘5 लाख रुपए…? क्या कह रही हो तुम? पागल हो गई हो क्या?’’ ‘‘बाबूजी, मैं नहीं उस रात तो आप पागल हो गए थे जिस का नतीजा मेरे पेट में पल रहा है.’’ ‘‘मैं तुम्हें 5 लाख तो नहीं, 50,000 रुपए दे सकता हूं.’’ ‘‘बाबूजी, आप की इज्जत और आप के इस बच्चे की कीमत महज 50,000 ही है क्या?’’ इस के बाद सौदेबाजी हुई और कम्मो 2 लाख रुपए लेने पर मान गई. राजेश ने दोपहर को बैंक से 2 लाख रुपए निकाल कर कम्मो को दे दिए. ‘‘बाबूजी, मैं कल ही सफाई करा लूंगी. इस के बाद 5-7 दिन मुझे आराम भी करना पड़ेगा.’’ ‘‘कोई बात नहीं, तुम अपने घर पर आराम कर लेना.’’ ‘‘मैं किसी दूसरी कामवाली को भेज दूंगी, ताकि आप को कोई परेशानी न हो.’’ ‘‘तुम किसी को न भेजना. मैं कुछ दिन के लिए बेंगलुरु चला जाऊंगा अपने बेटे के पास,’’ राजेश ने कुढ़ते हुए कहा. कम्मो चुपचाप काम में लग गई. राजेश ठगे से कुरसी पर बैठ गए. उन को अपने किए पर पछतावा हो रहा था. अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्हें 2 लाख रुपए देने पड़े. कम्मो ने उस रात की भरपूर कीमत वसूली है. कुछ दिन बेटे के पास बेंगलुरु में रहने के बाद फिर वापस यहीं लौटना है. यहां लौट कर फिर अकेलापन घेर लेगा.

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अब तो इस अकेलेपन को दूर करने का कुछ न कुछ उपाय करना ही होगा. अगले दिन से ही राजेश ने अखबार व इंटरनैट पर ऐसे वैवाहिक विज्ञापन देखने शुरू कर दिए जिन में विधवा, छोड़ी गई व तलाकशुदा औरतों को जीवनसाथी की तलाश थी. उन को लग रहा था कि बाकी की जिंदगी अकेले बिना साथी के काटना बहुत मुश्किल होगा. द्य

चक्कर बीस लाख के बीमे का…

23जनवरी, 2019 की बात है. सुबह के यही कोई 9 बजे थे. लोग अपनेअपने कामधंधे
पर जा रहे थे. तभी अचानक रतलाम जिले के कमेड गांव में रहने वाले हिम्मत पाटीदार के घर से रोनेचीखने की आवाजें आने लगीं. हिम्मत पाटीदार के पिता लक्ष्मीनारायण पाटीदार घर के बाहर चबूतरे पर गमगीन बैठे थे.
गांव के लोगों ने जब उन से पूछा तो उन्होंने रोते हुए बताया कि रात को किसी ने उन के बेटे हिम्मत की हत्या कर दी है. थोड़ी ही देर में यह खबर पूरे गांव में फैल गई. हिम्मत की लाश गांव से बाहर खेत में पड़ी हुई थी. कुछ ही देर में उस जगह गांव के तमाम लोग पहुंच गए.
हिम्मत को दबंग किसान माना जाता था. उस के ताऊ के बेटे संजय पाटीदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जिला स्तर के पदाधिकारी थे. हिम्मत पाटीदार भी आरएसएस से जुड़ा था, इसलिए उस की हत्या से गांव के लोगों में काफी आक्रोश था.

इस घटना की जानकारी बिलपांक थानाप्रभारी विनोद सिंह बघेल को मिली तो वह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. हिमत की लाश उस के खेत में पड़ी हुई थी. पुलिस ने जब लाश का मुआयना किया तो देखा, उस का गला रेता हुआ था.
पहचान छिपाने के लिए हत्यारे ने उस का चेहरा जलाने की कोशिश भी की थी, जबकि उस की पहचान की दूसरी चीज मोबाइल उस के पास पड़ा था. साथ ही उस की जैकेट व पैंट की जिप खुली हुई थीं. उस की पौकेट डायरी में फोटो व दूसरे कागज रखे मिले.
थानाप्रभारी ने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. कुछ ही देर में एडीशनल एसपी प्रदीप शर्मा, एसडीपीओ मान सिंह चौहान भी घटनास्थल पर आ गए. दोनों अधिकारियों ने भी लाश का मुआयना किया. उन्हें आश्चर्य इस बात पर हुआ कि जब हत्यारों ने मृतक की पहचान छिपाने के लिए उस के चेहरे को जलाया था तो उस की पहचान की दूसरी चीजें वहां क्यों छोड़ दीं.
मौके पर एफएसएल अधिकारी अतुल मित्तल को भी बुला लिया गया था. उन्होंने घटनास्थल से सबूत जुटाए. उसी दौरान एसपी गौरव तिवारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. मौकामुआयना करने के बाद एसपी गौरव तिवारी ने आईजी (उज्जैन रेंज) राकेश गुप्ता को स्थिति से अवगत कराया. इस के बाद हिम्मत पाटीदार के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.
मृतक की जेब से जो पौकेट डायरी मिली, पुलिस ने उस की जांच की तो उस में एसबीआई इंश्योरेंस, एफडी, एटीएम पिन आदि की जानकारी थी.

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मोबाइल की जांच की तो वाट्सऐप मैसेज, काल रिकौर्डिंग, गैलरी की फोटो, वीडियो, हिस्ट्री आदि डिलीट मिले. जबकि उस मोबाइल पर रात को इंटरनेट यूज किया गया था.
मृतक के शरीर पर स्ट्रगल का कोई निशान नहीं था. एक चश्मदीद ने पुलिस को बताया कि हिम्मत रात को खेत पर आया तो था लेकिन उस ने पंपसेट चालू नहीं किया था. यह सारी बातें पुलिस के लिए शक पैदा करने वाली थीं.
छानबीन करने पर जहां हिम्मत पाटीदार के एक प्रेमप्रसंग की बात पता चली तो वहीं पुलिस को पता चला कि गांव से मदन मालवीय नाम का एक आदमी लापता है. मदन पहले हिम्मत के खेत पर मजदूरी किया करता था.

संघ से जुड़े लोग हिम्मत पाटीदार के हत्यारों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे. इस संबंध में पुलिस प्रशासन पर भी दबाव बनाया जा रहा था. पुलिस को डर था कि कहीं संघ से जुड़े लोग इस मामले को ले कर कोई आंदोलन खड़ा न कर दें. लिहाजा पुलिस तत्परता से जांच में जुट गई.
एसपी गौरव तिवारी ने दूसरे दिन भी घटनास्थल की बारीकी से जांच की. हिम्मत परिवार के परिजनों ने उन्हें बताया कि 22 जनवरी की रात को हिम्मत बाइक से खेतों में पानी लगाने के लिए पंपसेट चालू करने गया था. सुबह खेत में उस की लाश मिली.
पुलिस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि हिम्मत जब पंपसेट चालू करने गया था तो उस ने पंपसेट चालू क्यों नहीं किया. साथ ही यह भी कि वह अपने साथ घर से पंपसेट के कमरे की चाबी भी नहीं ले कर गया था, जबकि रात को काफी ठंड थी.
एसपी गौरव तिवारी को यह जानकारी भी मिल चुकी थी कि हिम्मत पाटीदार के यहां मदन मालवीय नाम का जो नौकर काम करता था, वह भी घटना वाली रात से ही लापता है. लिहाजा उन्होंने थानाप्रभारी को मदन मालवीय के बारे में जांच करने के निर्देश दिए.
2 दिन बाद गांव में चर्चा होने लगी कि हिम्मत हत्याकांड में पुलिस हिम्मत के जिस पुराने नौकर मदन मालवीय को खोज रही है, उस की भी हत्या हो चुकी है. लोगों का मानना था कि हिम्मत के खेत में जो लाश मिली थी, वह हिम्मत पाटीदार की नहीं बल्कि नौकर मदन मालवीय की थी.
चूंकि पुलिस को पहले ही लाश की शिनाख्त पर शंका थी, इसलिए एसआई कैलाश मालवीय ने पोस्टमार्टम के समय लाश के थोड़े से अंश को डीएनए टेस्ट के लिए सुरक्षित रखवा लिया था.
पुलिस को गांव से बाहर कुछ दूरी पर एक जोड़ी जूते पड़े मिले थे. उन जूतों की पहचान मदन मालवीय के जूतों के तौर पर हुई. इस से सवाल उठा कि अगर हिम्मत पाटीदार की हत्या करने के बाद मदन मालवीय गांव से फरार हो रहा था तो अपने जूते फेंक कर नंगे पांव क्यों गया होगा.

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घटना वाली रात मदन एक खेत पर सिंचाई कर रहा था, उस के जूतों पर जो गीली मिट्टी लगी मिली, वैसी ही मिट्टी हिम्मत की बाइक पर पिछले फुटरेस्ट पर लगी मिली. इस से शक हुआ कि घटना की रात मदन हिम्मत पाटीदार की बाइक पर बैठा था. पुलिस का शक बढ़ा तो उस ने मदन मालवीय के मामले की जांच तेजी से शुरू की.
पुलिस ने हिम्मत के खेत से जो लाश बरामद की थी, उस का अंडरवियर ले कर मदन के घर पहुंची. मदन के घर वालों ने उस अंडरवियर को तुरंत पहचान लिया. वह मदन का ही था. इस शिनाख्त के बाद पुलिस ने मदन के परिजनों के खून के नमूने ले कर डीएनए टेस्ट के लिए सागर स्थित लेबोरेटरी भेज दिए.
दूसरी तरफ पुलिस ने अब हिम्मत पाटीदार की जिंदगी में झांकने की कोशिश शुरू कर दी. पता चला कि हिम्मत के ऊपर 26 लाख का कर्ज हो गया था. इस से वह काफी परेशान था. लगभग महीने भर पहले ही उस ने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस से अपना 20 लाख रुपए का बीमा करवाया था, जिस का उत्तराधिकारी उस ने अपनी पत्नी को बनाया था.
बीमे की सिलसिलेवार जानकारी हिम्मत ने अपनी पौकेट डायरी में नोट कर रखी थी, जो घटनास्थल पर मिली थी. इस से पुलिस को यह शक हुआ कि संभव है हिम्मत ने अपनी कदकाठी के मदन की हत्या कर खुद को मृत साबित करने की कोशिश की हो ताकि उस की मौत पर पत्नी को बीमा राशि मिल जाए.
यह शक उस समय और भी पुख्ता हो गया जब 2 दिन बाद सागर लेबोरेटरी से डीएनए की जांच रिपोर्ट आ गई. इस से साफ हो गया कि खेत में मिला शव हिम्मत का नहीं, बल्कि उस के नौकर मदन मालवीय का था.
इस जानकारी के बाद पुलिस टीम गांव पहुंच गई. इस दौरान हिम्मत के परिवार वाले चिता के ठंडे होने पर अस्थि चुन कर ले लाए थे. चूंकि डीएनए जांच से उस लाश की पुष्टि मदन मालवीय के रूप में हो चुकी थी, इसलिए पुलिस ने हिम्मत के घर वालों से अस्थि कलश मदन के परिजनों को दिलवा दिया.
मदन की हत्या की पुष्टि होने पर उस गरीब के घर का माहौल गमगीन हो गया. बूढ़ी मां बेहोश हो गई तो मदन की मूकबधिर पत्नी अपना होशोहवास खो बैठी.

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अब तक कहानी साफ हो चुकी थी कि हिम्मत पाटीदार ने बीमे की बड़ी रकम हड़पने के लिए अपनी कदकाठी के मदन मालवीय की हत्या करने के बाद उस के शव को अपने कपड़े पहनाए और शव के आसपास अपनी पहचान की चीजें छोड़ दीं. यानी उस ने खुद को मरा साबित करने की कोशिश की थी, इसलिए पुलिस अब हिम्मत पाटीदार की तलाश में जुट गई.
एसपी गौरव तिवारी ने हिम्मत पाटीदार की तलाश के लिए एक टीम गठित कर दी. टीम जीजान से जुट गई थी. 4 दिन की मेहनत के बाद पुलिस टीम ने हिम्मत पाटीदार को राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले की अरनोद तहसील स्थित प्रसिद्ध होरी हनुमान मंदिर के पास एक धर्मशाला से गिरफ्तार कर लिया. बिलपांक थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो पूरी कहानी इस प्रकार सामने आई—

कमेड निवासी हिम्मत पाटीदार खुद को बड़ा नेता समझता था. उस के शाही खर्च थे, जबकि आमदनी सीमित थी. धीरेधीरे हिम्मत पर 26 लाख रुपए का कर्ज हो गया. इस कर्ज के चलते वह पिछले 2 सालों से काफी परेशान था. कर्ज से छुटकारा पाने का उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था.
इसी बीच करीब 6 महीने पहले हिम्मत ने टीवी पर एक ऐसा क्राइम सीरियल देखा, जिस में एक व्यक्ति खुद को मरा साबित करने के लिए अपनी ही कदकाठी के एक दूसरे युवक की हत्या कर उस का चेहरा बिगाड़ने के बाद लाश को खुद के कपड़े पहना कर फरार हो जाता है. इस तरह वह पुलिस और समाज की नजरों में मर जाता है.
इस सीरियल को देख कर हिम्मत का दिमाग घूम गया. उसे लगा कि वह भी ऐसा कर के कर्ज से छुटकारा पा सकता है. लेकिन इस से कोई फायदा नहीं होने वाला था, क्योंकि वह मृत साबित तो हो जाता लेकिन उस का कर्ज तो यूं का यूं ही रह जाता, इसलिए सोचविचार के बाद उस ने एक महीने पहले एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस से अपना 20 लाख रुपए का बीमा करवा लिया.
यह पैसा हिम्मत की मौत के बाद उस की पत्नी को मिलने वाला था. इतना करने के बाद उस ने एक डायरी बना कर उस में वे तमाम बातें सिलसिलेवार लिख दीं, जिन की मदद से उस के बाद पत्नी और परिवार वाले आसानी से उस के मरने का लाभ उठा सकें.
अब हिम्मत को तलाश थी, किसी एक ऐसे व्यक्ति की जिस की कदकाठी उस से मिलतीजुलती हो, ताकि अपनी जगह वह उस की हत्या कर सके. इस के लिए उस ने गांव में कल्लू नाम के एक युवक का चयन कर उस से दोस्ती बढ़ा ली.

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वह अकसर उसे रात के समय अपने खेत पर पार्टी के लिए बुलाने लगा, लेकिन कल्लू और हिम्मत में एक अंतर था. हिम्मत अपने बाल छोटे रखता था, जबकि कल्लू के बाल काफी बड़े थे. सो हिम्मत ने प्रयास कर के कल्लू के बाल कटवा कर अपनी तरह के करवा दिए.
सारी व्यवस्था बना कर 22 जनवरी की रात को उस ने कल्लू का कत्ल करने की योजना बना ली. वह रात एक बजे घर से खेत की सिंचाई करने की बात कह कर बाइक ले कर निकल गया. खेत पर पहुंच कर उस ने कल्लू को फोन किया, लेकिन कल्लू ने उस का फोन रिसीव नहीं किया.
हिम्मत ने कल्लू के अलावा इस काम के लिए अपने पुराने नौकर मदन मालवीय का भी दूसरे नंबर पर चयन कर रखा था. मदन की कदकाठी भी हिम्मत जैसी ही थी. मदन आजकल दूसरे किसान के खेत पर काम करता था, लेकिन उस के पास मोबाइल नहीं था. इसलिए हिम्मत बाइक ले कर मदन को लेने खुद ही उस के खेत पर पहुंच गया.
हिम्मत के कहने पर मदन मालवीय उस के साथ बाइक पर बैठ कर उस के खेत पर आ गया. मौका देख कर हिम्मत ने तलवार से मदन मालवीय की गरदन काट कर हत्या कर दी.
फिर उस का चेहरा जलाने के बाद उस के शव को अपने कपड़े जूते पहना दिए. इस के बाद अपनी पहचान के कागज उस की जेब में ठूंस कर वह वहां से फरार हो गया.
हिम्मत की योजना थी कि पत्नी को बीमा का पैसा मिल जाने के बाद उसे ले कर कहीं दूर जा कर बस जाएगा, लेकिन पुलिस टीम ने हिम्मत पाटीदार की पूरी योजना पर पानी फेर दिया.

तीन करोड़ के लिए…

बात 7 फरवरी, 2019 की है. मथुरा जिले के बरसाना थाने में किसी ने सुबह 7 बजे फोन
कर के सूचना दी कि बरसाना-छाता मार्ग पर आजनौख गांव के पास एक कार जली हुई हालत में खड़ी है.
सूचना मिलते ही बरसाना थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने जली हुई कार का निरीक्षण किया तो उस में 2 आदमियों की लाशें मिलीं. वह मारुति की ईको कार थी, उस के 2 पहिए सड़क पर थे जबकि 2 फुटपाथ पर. थानाप्रभारी ने यह सूचना एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज को दे दी. मामला गंभीर था, इसलिए एसएसपी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया.
जांच में एक शव कार के बाहर खिड़की के पास पड़ा मिला और दूसरा अंदर ड्राइविंग सीट और पीछे की सीट पर. दोनों शव कंकाल मात्र थे. पुलिस ने अनुमान लगाया कि कार में शार्ट सर्किट की वजह से आग लगी होगी. दोनों शव इतनी बुरी तरह से जले हुए थे कि उन की शिनाख्त तक नहीं हो सकी. अलबत्ता कार में एक जला हुआ पर्स जरूर मिला, जिस में एक अधजला फोटो था. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. लाशों की शिनाख्त के लिए पुलिस ने इस की सूचना सीमावर्ती जिले की पुलिस को दे दी.

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अगले दिन अखबारों में जब कार में 2 जली हुई लाशें मिलने का समाचार छपा तो हरियाणा के जिला पलवल के हथीन थाने की पुलिस टीम बरसाना पहुंच गई. हथीन पुलिस ने बताया कि 4 युवक मंडकोला से कार से गोवर्धन आए थे, वे अभी तक घर नहीं पहुंचे हैं.
उन्होंने जब कार नंबर बताया तो जांच में कार वही निकली, जिस में 2 लाशें जली हालत में मिली थीं. अब सवाल यह उठा कि जब कार में 4 युवक लालाराम, लेखन, रोहताश और कुंवरपाल आए थे तो 2 कहां चले गए. यह भी पता नहीं था कि जो 2 लाशें जली हालत में मिली थीं, वे किसकिस की थीं. यह जानकारी भी मिली कि लालाराम और रोहताश घर से डेढ़ लाख रुपए ले कर निकले थे.
हथीन पुलिस ने छाता पुलिस को मारुति ईको कार के मालिक लालाराम का फोन नंबर दिया. उस का फोन नंबर स्विच्ड औफ आ रहा था. बरसाना पुलिस ने वह नंबर सर्विलांस पर लगा दिया. जैसे ही उस ने अपना मोबाइल औन किया तो कालडिटेल्स और लोकेशन के आधार पर वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया.
थाने ला कर पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारी सच्चाई बता दी. उस ने बताया कि उस ने ही अपने दोस्त रोहताश के साथ मिल कर लेखन और कुंवरपाल को साजिशन कार में जला कर मार डाला. कार से मिले जले हुए पर्स में जो फोटो था, वह लेखन का था. उस ने उन की हत्या की जो कहानी बताई, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली निकली—

हरियाणा के पलवल जिले का एक गांव है मंडकोला. इसी गांव में लालाराम और रोहताश रहते थे. ये दोनों साझे में चप्पलों का कारोबार करते हैं. लालाराम एक शातिरदिमाग इंसान था. वह हमेशा मोटी कमाई करने के उपाय खोजता रहता था.
दोनों दोस्त अकसर जल्द अमीर बनने के बारे में सोचते रहते थे. इसी दौरान उन के दिमाग में आया कि क्यों न बड़ी रकम की इंश्योरेंस पौलिसी ले कर खुद को मृत दिखा दिया जाए. इंश्योरेंस कंपनी वह पैसा नौमिनी को दे देगी.
यही योजना बना कर उन्होंने जनवरी 2019 में अपना 3 करोड़ 20 लाख का जीवनबीमा करा लिया. बीमा कराने के बाद वह अगली काररवाई की योजना बनाने लगे. इस के लिए उन्होंने गांव के ही लेखन और कुंवरपाल को चुना. योजना के अनुसार 6 फरवरी, 2019 को ये दोनों दोस्त लेखन और कुंवरपाल को मथुरा घुमाने के बहाने अपनी मारुति ईको कार में बैठा कर ले गए.

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मथुरा घूमने के बाद 7 फरवरी को चारों वापस घर लौटने लगे. रात को लौटते समय चारों ने साथसाथ शराब पी. लालाराम और रोहताश ने कुंवरपाल और लेखन के गिलासों में नींद की गोलियां डाल दीं. शराब और नींद की गोलियों के असर से वे दोनों सीट पर ही लुढ़क गए. उस समय उन की कार बरसाना-छाता रोड पर आजनौख गांव के नजदीक थी.
उसी समय लालाराम ने कार सड़क किनारे खड़ी कर दी और सीएनजी लीक करने के बाद कार में आग लगा दी. आग लगाने के बाद लालाराम अपने दोस्त रोहताश के साथ वहां से चला गया. उधर कुछ ही देर में कार से तेजी से लपटें उठने लगीं. लेखन और कुंवरपाल जीवित ही कार में जल गए.
इधर लालाराम के बड़े भाई चिरंजीलाल ने थाना हथीन में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उस ने पुलिस को बताया कि लालाराम से उस की बात उस समय हुई थी, जब वह मथुरा में था. उस के बाद उस से कोई संपर्क नहीं हो सका. उधर लेखन के भाई अजीत ने भी हथीन थाने में भाई के गुम होने की सूचना दी तो पुलिस ने उसे टाल दिया.
लालाराम के खुलासे के बाद पुलिस भी हैरान रह गई. पुलिस ने बीमा करने वाले एजेंट से भी पूछताछ की तो उस ने भी 3 करोड 20 लाख रुपए का बीमा करने वाली बात बता दी.

बेहद शातिरदिमाग लालाराम और रोहताश ने अपने स्वार्थ के लिए लेखन और कुंवरपाल को अपनी खौफनाक साजिश का शिकार तो बना लिया लेकिन यह नहीं सोचा कि उन के बीवीबच्चों का क्या होगा. लेखन के 3 बच्चे हैं 2 बेटे और 1 बेटी.
दरअसल उस की पत्नी मेमवती उस के बड़े भाई महेंद्र की पत्नी थी लेकिन महेंद्र की मौत हो जाने के बाद उस का विवाह लेखन से करा दिया था. इस तरह वह दूसरी बार विधवा हो गई.
उधर कुंवरपाल के भी 9 और 12 साल के 2 बच्चे हैं. उस की पत्नी का पहले ही निधन हो चुका था. बच्चों की देखरेख कुंवरपाल ही कर रहा था.
पुलिस ने लालाराम से पूछताछ के बाद उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया, जबकि रोहताश का पता नहीं चल सका. पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस मामले में इन दोनों अभियुक्तों के घर वालों की तो कोई भूमिका नहीं है.

सोफी चौधरी ने शेयर की बिकिनी में फोटोज, लोगों ने किये ऐसे कमेंट्स

बौलीवुड एक्ट्रेस और सिंगर सोफी चौधरी इन दिनों फ्रांस में छुट्टियां बिता रही है. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी कुछ फोटोज शेयर की. सोफी चौधरी की ये फोटोस को कुछ लोग पसंद कर रहे है, तो कुछ उनका मजाक उड़ा  रहे है…

 

फ्रांस में छुट्टियां बिताते नजर आईं सोफी चौधरी

एक्ट्रेस सोफी चौधरी अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से लगातार फोटोज शेयर करती रहती हैं. जिन्हें फैंस काफी पसंद भी करते है. हाल ही में सोफी चौधरी ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कुछ बिकनी वाली फोटोज शेयर की हैं जिसमें वो फ्रांस में छुट्टियां बिताती दिख रही हैं. सोफी ने जो फोटोज अपने सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर की हैं, उनमें वो ब्लैक बिकिनी और सिर पर एक बड़ी सी हैट में नजर आ रही हैं. सोफी इन फोटोज में किसी सोच में डूबी दिखाई दे रही हैं.

 

इससे पहले मालदीव में मनाया था वेकेशन

सोफी कुछ समय पहले मालदीव में भी वेकेशन मनाकर आई हैं, उस वक्त भी उनकी वेकेशन की फोटोज इंटरनेट पर खूब वायरल हुई थीं. उन तस्वीरों में भी सोफी बहुत ही हौट नजर आई थीं.

बौल्डनेस में सबसे आगे

बौलीवुड की सबसे हौट एक्ट्रेस की अगर बात करे तो सोफी चौधरी का नाम आना लाजमी है. वो अक्सर अपनी बोल्डनेस के कारण चर्चा में रहती हैं. फिर चाहे वो उनकी बिकनी फोटोज हो या फिर सेक्सी सीन. सोफी हमेशा चर्चा में रहती हैं. बोल्ड अवतार के साथ-साथ सोफी का स्टाइल सेंस भी लोगों को काफी भाता है. कई सारे लोग सोफी को इसीलिए भी फौलो करते हैं क्योंकि वो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर स्टाइलिश फोटोज शेयर करती हैं.

38 की उम्र में भी फैंस के दिलों पर राज करती हैं श्वेता तिवारी

“कसौटी जिंदगी की” में प्रेरणा का किरदार निभाने वालीं श्वेता तिवारी भोजपुरी फिल्मों की उन एक्ट्रेस में से एक है जो अपनी बड़ती उम्र में भी फैंस की फेवरेट बनी हुई हैं. उनकी हौट फोटोज जब भी सोशल मीडिया पर आती हैं फैंस जमकर तारीफ करने में लग जाते हैं. श्वेता स्क्रीन पर  जितनी बौल्ड नजर आती है असल जिंदगी में वो उतनी ही शांत और सरल स्वभाव वाली हैं.

 

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#clinicplus #shwetatiwari @muznah_shaikh #hahahaha

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सोशल मीडिया में छाया जादू

श्वेता तिवारी की फैन फौलोविंग की अगर बात करे तो अकेले इंस्टाग्राम में उनके 1 मिलियन फौलोवर्स है. श्वेता अक्सर अपने फैंस के लिए फोटोज शेयर करती रहती हैं.

 

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BCL …. Thanks @niveditabasu 😘

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भोजपुरी फिल्मों में कैरियर

श्वेता की पहली भोजपुरी फिल्म थी “हमार सैंया हिन्दुस्तानी” जिसमें उनके साथ भोजपुरी स्टार रवि किशन और उनके पहले पति राजा चौधरी थे. इसके बाद वो “ये भौजी की सिस्टर” में भोजपुरी सिंगर और एक्टर मनोज तिवारी के साथ आईं. लोगों ने श्वेता को खूब पसंद किया. शायद यही वजह रही की श्वेता जल्दी ही भोजपुरी फिल्मों की स्टार बन गई.

 

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पर्सनल लाइफ रही सुर्खियों में

श्वेता ने साल 2007 में अपने पहले पति राजा चौधरी के साथ तलाक लिया. दरअसल श्वेता ये अरोप लगाया था की राजा उनको रोज मारते-पीटते है और शराब के आदी है. इसके बाद साल 2013 में श्वेता ने अभिनव कोहली के साथ शादी की, दोनों साथ में बहुत खुश है. उन्होंने 2016 में एक बेटे को जन्म दिया. श्वेता की अपने पहले पति राजा चौधरी से एक बेटी “पलक” भी है, जो जल्द ही ग्लैमर इंडस्ट्री में नजर आने वाली हैं.

 

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🦋The purest Love ❤️

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वचन हुआ पूरा

‘‘बस, कह दिया मैं ने कि नहीं जाऊंगी तो नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘मगर, क्यों नहीं जाएगी?’’ जगदीश जरा नाराज हो कर बोला. ‘‘उन साहब की नीयत जरा भी अच्छी नहीं है.’’ ‘‘तू नहीं जाएगी तो साहब मुझे परमानैंट नहीं करेंगे…’’ इस समय जगदीश की आंखों में गुजारिश थी. पलभर बाद वह दोबारा बोला, ‘‘देख रामकली, जब तक ये साहब हैं, तू काम छोड़ने की मत सोच. साहब मेरी नौकरी परमानैंट कर देंगे, फिर मत मांजना बरतन.’’ ‘‘देखोजी, मुझे वहां जाने को मजबूर मत करो. औरत एक बार सब की हो जाती है न…’’ पलभर बाद वह बोली, ‘‘खैर, जाने दो. आप कहते हैं तो मैं नहीं छोड़ूंगी. यह जहर भी पी जाऊंगी.’’

‘‘सच रामकली, मुझे तुझ से यही उम्मीद थी,’’ कह कर जगदीश का चेहरा खिल उठा. रामकली कोई जवाब नहीं दे पाई. वह चुपचाप मुंह लटकाए रसोईघर के भीतर चली गई. जब से ये नए साहब आए हैं तब से इन्हें बरतन मांजने वाली एक बाई की जरूरत थी. जगदीश उन के दफ्तर में काम करता है. 15 साल बीत गए, पर परमानैंट नहीं हुआ है. कितने ही साहब आए, सब ने परमानैंट करने का भरोसा दिया और परमानैंट किए बिना ही ट्रांसफर हो कर चले गए. ये साहब भी अपना परिवार इसलिए ले कर नहीं आए थे कि उन के बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, इसलिए यहां एडमिशन दिला कर वे रिस्क नहीं उठाना चाहते थे. बंगले में चौकीदार था. रसोइया भी था. मगर बरतन मांजने के लिए उन्हें एक बाई चाहिए थी. साहब एक दिन जगदीश से बोले थे, ‘बरतन मांजने वाली एक बाई चाहिए.’ ‘साहब, वह तो मिल जाएगी, मगर उस के लिए पैसा क्यों खर्च करें…’ जगदीश ने सलाह दी थी, ‘मैं गुलाम हूं न, मैं ही मांज दिया करूंगा बरतन.’ ‘नहीं जगदीश, मुझे कोई बाई चाहिए,’

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साहब इनकार करते हुए बोले थे. तब जगदीश ने सोचा था कि मौका अच्छा है. बाई की जगह वह अपनी लुगाई को क्यों न रखवा दे. साहब खुश होंगे और उसे परमानैंट कर देंगे. जगदीश को चुप देख कर साहब बोले थे, ‘कोई बाई है तुम्हारी नजर में?’ ‘साहब, मेरी घरवाली सुबहशाम आ कर बरतन मांज दिया करेगी,’ जगदीश ने जब यह कहा, तब साहब बोले थे, ‘नेकी और पूछपूछ… तू अपनी जोरू को भेज दे.’ ‘ठीक है साहब, उसे मैं तैयार करता हूं,’ जगदीश ने उस दिन साहब को कह तो दिया था, मगर लुगाई को मनाना इतना आसान नहीं था. उसे कैसे मनाएगा. क्या वह आसानी से मान जाएगी? रामकली के पास आ कर जगदीश बोला था, ‘रामकली, मैं ने एक वादा किया है?’ ‘वादा… कैसा वादा और किस से?’ रामकली ने हैरान हो कर पूछा था. ‘साहब से?’ ‘कैसा वादा?’ ‘अरे रामकली, उन्हें बरतन मांजने वाली एक बाई चाहिए थी. मैं ने कहा कि चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. इस के लिए रामकली है न.’ ‘हाय, तू ने मुझ से बिना पूछे ही साहब से वादा कर दिया.’ ‘हां रामकली, इस में भी मेरा लालच था?’ ‘लालच, कैसा लालच?’ रामकली आंखें फाड़ कर बोली थी. ‘देख रामकली, तू तो जानती है कि मैं अभी परमानैंट नहीं हूं. परमानैंट होने के बाद मेरी तनख्वाह बढ़ जाएगी. इन साहब ने मुझ से वादा किया है कि वे मुझे परमानैंट कर देंगे. तुम साहब के यहां जा कर बरतन मांजोगी तो साहब खुश हो जाएंगे, इसलिए मैं ने तेरा नाम बोल दिया.’

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‘अरे, तू ने हर साहब के घर का इतना काम किया. बरतन भी मांजे, पर किसी भी साहब ने खुश हो कर तुझे परमानैंट नहीं किया. इस साहब की भी तू कितनी भी चमचागीरी कर ले, यह साहब भी परमानैंट करने वाला नहीं है,’ कह कर रामकली ने अपनी सारी भड़ास निकाल दी थी. जगदीश बोला था, ‘देख रामकली, इनकार मत कर, नहीं तो यह मौका भी हाथ से निकल जाएगा. तब फिर कभी परमानैंट नहीं हो सकूंगा. छोटी सी तनख्वाह में ही मरतेखपते रहेंगे. ‘‘मैं अपनी भलाई के लिए तुझ पर यह दबाव डाल रहा हूं. इनकार मत कर रामकली. साहब को खुश करने के लिए सब करना पड़ेगा.’ ‘ठीक है, तुम कहते हो तो मैं चली जाया करूंगी. हम तो छोटे लोग हैं. साहब बहुत बड़े आदमी हैं,’ कह कर रामकली ने हामी भर दी थी. इस के बाद रामकली सुबहशाम साहब के बंगले पर जा कर बरतन मांजने लगी थी. रामकली 3 बच्चों की मां होते हुए भी जवान लगती थी. गठा हुआ बदन और उभार उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे. रामकली के ऐसे रूप पर साहब भी फिदा हो गए थे.

जब भी वह बरतन मांजती, किसी न किसी बहाने भीतर आ कर उस के उभारों को एकटक देखते रहते थे. रामकली सब समझ जाती और अपने उभारों को आंचल में छिपा लेती थी. वे उस की लाचारी का फायदा उठाएं, उस के पहले ही वह सचेत रहने लगी थी. यह खेल कई दिनों तक चलता रहा था. आखिरकार मौका पा कर साहब उस का हाथ पकड़ते हुए बोले थे, ‘रामकली, तुम अभी भी ताजा फूल हो.’ ‘साहब, आप बड़े आदमी हैं. हम जैसे छोटों के साथ ऐसी नीच हरकत करना आप को शोभा नहीं देता है,’ अपना विरोध दर्ज कराते हुए रामकली बोली थी. ‘क्या छोटा और क्या बड़ा, यह ऐसी आग है कि न छोटा देखती है और न बड़ा. आज मेरे भीतर की लगी आग बुझा दो रामकली,’ कह कर साहब की आंखों में हवस साफ दिख रही थी. साहब अपना कदम और आगे बढ़ाते, इस से पहले रामकली जरा गुस्से से बोली, ‘देखो साहब, आप मेरे मरद के साहब हैं, इसलिए लिहाज कर रही हूं. मैं गिरी हुई औरत नहीं हूं. मेरी भी अपनी इज्जत है. कल से मैं बरतन मांजने नहीं आऊंगी,’ इतना कह कर वह बाहर निकल गई थी. आज रामकली ने जगदीश से साहब के घर न जाने की बात कही, तो वह नाराज हो गया. कहता है कि मुझे परमानैंट होना है. साहब को खुश करने के लिए उस का बरतन मांजना जरूरी है, क्योंकि ऐसा करना उन्हीं साहब के हाथ में है. जगदीश अगर परमानैंट हो जाएगा, तब उस की तनख्वाह भी बढ़ जाएगी. फिर किसी साहब के यहां जीहुजूरी नहीं करनी पड़ेगी. क्या हुआ, साहब ही तो हैं.

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उन को खुश करने से अगर जगदीश को फायदा होता है तो क्यों न एक बार खुद को उन्हें सौंप दे. वैसे भी औरत का शरीर तो धर्मशाला होता है. उस के साथ सात फेरे लेने वाले पति के अलावा दूसरे मर्द भी तो लार टपकाते हैं. उस ने कई ऐसी औरतें देखी हैं, जो अपने मर्द के होते दूसरे मर्द से लगी रहती हैं. फिर आजकल सुप्रीम कोर्ट ने भी तो फैसला दिया है कि अगर कोई औरत अपने मर्द के अलावा दूसरे मर्द से जिस्मानी संबंध बना भी लेती है, तब वह अपराध नहीं माना जाएगा. फिर वह तो अपने जगदीश के फायदे के लिए जिस्म सौंप रही है. जिस्म सौंपने से पहले साहब को साफसाफ कह देगी. इस शर्त पर यह सब कर रही हूं कि जगदीश को परमानैंट कर देना. इस मामले में मर्द औरत का गुलाम रहता है. इस तरह रामकली ने अपनेआप को तैयार कर लिया. ‘‘देखो रामकली, एक बार मैं फिर कहता हूं कि तुम साहब के यहां बरतन मांजने जरूर जाओगी,’’ जगदीश ने फिर यह कहा तो रामकली बोली, ‘‘हां बाबा, जा रही हूं. तुम्हारे साहब को खुश रखने की कोशिश करूंगी. और मैं भी उन से सिफारिश करूंगी कि वे तुझे परमानैंट कर दें,’’ कह कर रामकली साहब के बंगले पर चली गई. अभी हफ्ताभर भी नहीं बीता था कि जगदीश ने घर आ कर रामकली को बताया, ‘‘साहब ने काम से खुश हो कर मेरा परमानैंट नौकरी का और्डर निकाल दिया है. तनख्वाह भी बढ़ जाएगी.’’ ‘‘क्या सचमुच तुझे परमानैंट कर दिया?’’ खुशी से उछलती रामकली ने पूछा. ‘‘हां रामकली, साहब कह रहे थे कि तू ने भी सिफारिश की थी,’’

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जगदीश ने जब यह कहा, तब रामकली ने कोई जवाब नहीं दिया. वह जानती है कि साहब से उस के जिस्म के बदले यह वचन लिया था. उसी वचन को साहब ने पूरा किया, तभी तो इतनी जल्दी आदेश निकाल दिया. उसे चुप देख जगदीश फिर बोला, ‘‘अरे रामकली, तुझे खुशी नहीं हुई?’’ ‘‘मुझे तो तुझ से ज्यादा खुशी हुई. मैं ने जोर दे कर साहब से कहा था,’’ रामकली बोली, ‘‘उन्होंने मेरे वचन को पूरा कर दिया.’’ ‘‘अब तुझे बरतन मांजने की जरूरत नहीं है. मैं साहब के लिए दूसरी औरत का इंतजाम करता हूं.’’ ‘‘नहीं जगदीश, जब तक ये साहब हैं, मैं बरतन मांजने जाऊंगी. मैं ने यही तो साहब से वादा किया है. चलती हूं साहब के यहां,’’ कह कर रामकली घर से बाहर चली गई.

उधार के गहनों से करें तौबा

बड़े भाई ने उसे सोने के झुमके जो तोहफे में दिए थे. बरात दुलहन के घर गई, खूब नाचगाना हुआ, फेरे पड़े और फिर नईनई ननद बनी रचना अपनी भाभी को घर ले आई. शादी में रचना के झुमकों की भी खूब तारीफ हुई थी. खूबसूरत होने के साथसाथ वे महंगे भी थे.

शादी की गहमागहमी कम हुई, तो रचना ने वे झुमके संभाल कर लोहे की अपनी अलमारी में रख दिए. कुछ दिनों के बाद रचना के पड़ोस की एक सहेली मेनका के मामा की बेटी की शादी थी. एक दिन वह रचना से बोली, ‘‘सुन, तू मुझे 2 दिन के लिए अपने नए झुमके उधार दे दे. शादी में उन्हें पहनूंगी तो लड़कों पर रोब पड़ेगा.’’ रचना का मन तो नहीं था, पर वह अपनी दोस्ती भी नहीं तोड़ना चाहती थी. उस ने अपनी मां से पूछे बिना ही मेनका को झुमके दे दिए और संभाल कर रखने की भी हिदायत दी. रचना को जिस बात का डर था, वही हुआ. मेनका से वे झुमके खो गए. दरअसल, शादी के घर में एक दिन जब वह बाथरूम से नहा कर निकली तो वे झुमके वहीं भूल गई. फिर उन झुमकों पर किस ने हाथ साफ किया, पता ही नहीं चला. मेनका की तो जैसे जान सूख गई. मातापिता से खूब डांट खाई, लेकिन उस की असली समस्या तो यह थी कि रचना का सामना कैसे करेगी. और जब रचना को यह खबर लगी तो उस का रोरो कर बुरा हाल हो गया.

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घर में पता चला तो सब को बहुत दुख हुआ, पर अब कर भी क्या सकते थे. मेनका से झुमकों के पैसे भी किस मुंह से मांगते. लेकिन उस दिन के बाद रचना और मेनका में पहले जैसी पक्की दोस्ती नहीं रही. यह कोई एक किस्सा नहीं है, बल्कि न जाने कितने सालों से हमारे देश में औरतों और लड़कियों में एकदूसरे के गहने उधार लेने का चलन सा रहा है. क्या वजह है कि औरतें या लड़कियां कुछ समय के लिए ही सही, इतनी आसानी से महंगे गहनों की उधारी कर लेती हैं? इस का सब से आसान जवाब उन का गहनों के प्रति प्रेम होता है. अगर वे महंगी धातु जैसे सोने या चांदी के हों तो यह मोह पूरी तरह उमड़ने लगता है. फिर मुफ्त का माल कौन नहीं चाहेगा, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे गहनों को संभाल कर रखेंगी. पर जब वे चोरी हो जाते हैं या उन में किसी तरह का दूसरा नुकसान हो जाता है तो फिर मचता है घमासान. मालती और राधा के मामले में गहनों की चोरी भी नहीं हुई थी, पर गहनों को ले कर उन की दोस्ती में खटास जरूर आ गई थी. हुआ यों था कि राधा ने मालती से उस का गहनों का एक नकली सैट कुछ दिनों के लिए उधार लिया था. सैट ज्यादा महंगा भी नहीं था, पर चूंकि नकली था तो इस्तेमाल करने पर उस की पौलिश थोड़ी उतर गई थी. जब राधा ने वह सैट वापस किया तो मालती को अपने सैट की हालत देख कर बुरा लगा. उस ने शिकायत की तो राधा ने गलती मानने के बजाय कहा कि सैट की पौलिश तो पहले से उतरी हुई थी. बस, इसी बात पर मामला इतना बिगड़ा कि आज वे दोनों एकदूसरे का मुंह तक देखना पसंद नहीं करती हैं. पराए गहनों के लिए यह प्यार गांवदेहात की औरतों में भी खूब देखा जाता है. बड़े भाई की शादी हुई नहीं कि छोटी बहन भाभी के गहनों पर अपना हक समझने लगती है.

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गहने क्या वह तो उस की सिंगारदानी, चमकीले कपड़ों को अपनी बपौती मानने लगती है. भाभी थोड़ी चिंता जता दे या इशारों में मना करने की कोशिश करे तो पूरा ससुराल पक्ष ही उसे दुश्मन समझने लगता है. यहां पर दहेज के सामान को साझा इस्तेमाल करने का मनोविज्ञान ससुराल वालों पर हावी रहता है कि बाप ने बेटी को जो दिया, उस पर बहू की सास, ननद और भाभीदेवरानियों का हक बनता है. इस में गहनों के इस्तेमाल और उन के खोने या खराब होने पर मचे बवाल से ही कई बार घर बनने के बजाय बिगड़ते चले जाते हैं. रिश्ते की हमउम्र कुंआरी बहनों में गहनों की अदलाबदली की यह रीत ज्यादा दिखाई देती है.

चूंकि उन्हें गहने मातापिता या बड़े भाई बनवा कर देते हैं इसलिए उन्हें उन की कीमत का अंदाजा नहीं होता है. पर उन की इस उधारी के गहनों के नुकसान का खमियाजा कई बार उन के आपसी संबंधों को कमजोर कर देता है. लिहाजा, जो गहने आपसी रिश्तों में खटास लाएं, उन की उधारी नहीं करनी चाहिए. खुद के पास जैसे भी गहने हों असली या नकली, कम या ज्यादा, उन्हीं से काम चला लेना चाहिए. वैसे भी आजकल गांव हों या शहर, औरतों के साथ होने वाली लूट की वारदातों में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी हो गई है कि गहनों को मांग कर पहनने की सोच को ही दूर से सलाम कर देना चाहिए. सादगी से रहें, सुखी रहें.

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