चारों ओर पानी और गहन अंधकार फैला है. तभी पानी का तेज रेला आया और शालिनी का हाथ उन के हाथ से छूट गया. घबराहट से वह पसीनेपसीने हो गए. चीखने की कोशिश की पर आवाज जैसे गले में फंस गई थी, ऐसा महसूस कर के अपने सीने में उन्होंने तेज दबाव महसूस किया, फिर असहनीय दर्द, साथ ही नींद खुल गई. वह बुरी तरह से तड़फने लगे, बहुत भयंकर स्वप्न देखा था.

उन की हरकत से बगल में सोई शालिनी की नींद खुल गई. देखा तो सीने पर हाथ रखे मुकेश कराह रहे हैं. अपने पारिवारिक डाक्टर को शालिनी ने फोन लगाया. उस समय डाक्टर नर्सिंग होम में थे. वह बोले, ‘‘मुकेश को फौरन यहां ले आओ.’’

शालिनी ने बरामदे में सोए हरि को जोर से पुकारा. मालकिन की घबराई हुई आवाज सुन कर वह भागाभागा आया.

‘‘हरि, तुम जल्दी से गाड़ी निकालो, मैं साहब को ले कर आती हूं,’’ कह कर शालिनी मुकेश को उठाने की कोशिश में लगी. समय की गंभीरता समझ हरि जैसे आया था उन्हीं पैरों से वापस लौट कर चला गया और गाड़ी निकालने लगा.

डा. खन्ना ने मुकेश को आई.सी.यू. में एडमिट कर लिया. पूरे स्टाफ में हलचल मच गई. तत्काल सारी चिकित्सा सुविधाएं मिल गईं. पास खड़ी शालिनी का घबराहट के कारण बुरा हाल था, काफी देर बाद स्थिति काबू में आई. मुकेश खतरे से बाहर हैं, यह जान कर शालिनी ने राहत की सांस ली. 4 दिन अस्पताल में रहने के बाद डिस्चार्ज के समय डाक्टर ने शालिनी को समझाते हुए कहा, ‘‘मुकेश को माइनर अटैक आया था. दूसरा झटका जानलेवा सिद्ध हो सकता है इसलिए भविष्य में बहुत सावधानी रखने की जरूरत है.’’

घर आ कर भी मुकेश आंखें बंद किए शांत बैठे रहे. शालिनी ने गौर से उन की ओर देखा. इन 4 दिनों में वह कितने झटक गए हैं, जैसे महीनों से बीमार रहे हों. डाक्टर की सलाह के मुताबिक चलना बेहद जरूरी है.

नहा कर शालिनी सीधे रसोई में आ कर नाश्ता तैयार करने लगी. बहुत दिनों के बाद आज वह रसोई में आई थी. हरि को आवाज दी और उस की मदद से नाश्ता तैयार करने लगी. कई वर्षों से हरि इस घर में था और घर के सारे काम वही संभालता था. उस की मदद के बिना घर का एक पत्ता भी नहीं हिलता था. शालिनी और मुकेश प्राय: हर काम के लिए उस पर आश्रित थे.

नाश्ता ले कर शालिनी मुकेश के पास आ गई. पलंग के सिरहाने तकिए का सहारा ले कर वह आंखें बंद कर बैठे थे. शालिनी ने मेज पर नाश्ता रखा तो आहट से उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और बोले, ‘‘शालिनी, आज मेरा बंटी से बात करने का बहुत मन कर रहा है.’’

‘‘मुकेश, मैं कई बार कोशिश कर चुकी पर फोन लगता ही नहीं है. वैसे मुझे लगता है कि वह खुद ही फोन करेगा. मैं ने उसे आने को कहा है. हो सकता है आने की सोच रहा हो,’’ दलिया में चीनी डालते हुए शालिनी ने कहा तो बंटी के आने की कल्पना से ही दोनों खुश हो गए.

बंटी को आस्ट्रेलिया में रहते 4 साल हो गए हैं. जब से वह गया उस का आना ही नहीं हुआ, पहले पढ़ाई के कारण और उस के बाद नौकरी के कारण. मुकेश की तबीयत के बारे में तो उसी दिन शालिनी ने अस्पताल ले जाते वक्त बता दिया था. दोनों को उम्मीद थी कि अब आए बिना कैसे रहेगा.

नैपकिन मुकेश की गोद में डाल कर शालिनी ने दलिया का कटोरा हाथ में पकड़ाया तो उन्होंने बच्चे की तरह बुरा सा मुंह बनाया. शालिनी बोली, ‘‘दवाइयों के कारण तुम्हारे मुंह का स्वाद बिगड़ गया है पर दवाइयां खानी हैं तो नाश्ता करना पडे़गा,’’ और इसी के साथ चम्मच से उन्हें खुद खिलाने लगी.

मुकेश नाश्ता कर दवा ले कर सो गए तो शालिनी उन के पास बैठेबैठे अतीत की गलियों में खो गई. उसे लगा कि मुकेश की इस हालत के लिए बहुत कुछ दोष खुद उस का ही था.

उसे किचन में जाना बिलकुल पसंद नहीं था. बहुत मजबूरी होती तभी वह किचन में कदम रखती. कभी मुकेश किसी खास खाने की फरमाइश करते तो वह कहती, ‘हम जैसे लोगों की सुविधा के लिए ही तो बडे़ होटल खुल रहे हैं, जिन के पास समय की कमी है, होटल में आर्डर दो और खाना हाजिर.’ इस से एक तो पसंद का खाना मिल जाता, दूसरे, किचन में सामान नहीं फैलता. ड्राइंगरूम में बैठ कर खाना खा लो, उस के बाद कचरा सीधे डस्टबिन में.

मुकेश एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी से रिटायर  हुए थे. अपनी मेहनत से वह कंपनी में बडे़ ओहदे तक पहुंचे थे. आज उन के पास वह सबकुछ था जिस की कामना कर उन्होंने नौकरी शुरू की थी. अच्छा बैंक बैलेंस, बडे़ शहर में खुद का बड़ा सा बंगला, कदम से कदम मिला कर चलने वाली पत्नी, विदेश में नौकरी कर रहा बेटा…सबकुछ तो था, पर पता नहीं क्यों इतना सब होते हुए भी उन की जिंदगी में एक सूनापन अपनी जगह बनाता जा रहा है.

नौकरी में थे तो व्यस्तता की वजह से सामाजिक संबंध बनाने की न कभी जरूरत महसूस हुई और न कभी समय मिला. कभीकभी मन में विचार आते, इस से अच्छी जिंदगी तो पिताजी की थी. जब तक वह जिंदा रहे लोगों की महफिलें घर में सजी रहीं.

मुकेश के पिता निखिलेशजी बहुत बडे़ सामाजिक कार्यकर्त्ता और जनप्रतिनिधि थे. खानदानी दौलत के साथसाथ ईमानदारी की दौलत भी उन्हें विरासत में मिली थी. समाज में मानसम्मान भी बहुत था. मां लता सरल सहज स्वभाव की विदुषी महिला थीं. छोटा भाई दिनेश कालिज की पढ़ाई के साथसाथ पिता के नक्शेकदम पर चल कर राजनीति की दुनिया में प्रवेश कर चुका था.

मुकेश राजनीति की दुनिया से सैकड़ों कदम दूर रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उसी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने में लगे थे. परिवार से दूर रह कर उन की शिक्षा हुई थी. फिर दिल्ली में ही एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में नौकरी शुरू कर अपने कैरियर की ऊंचाई पाने के लिए जीजान से जुट गए.

विवाह की उम्र हुई तो मातापिता ने विवाह के लिए जोर डालना शुरू कर दिया. मुकेश का सोचना था कि अगर मैं ने परिवार वालों की इच्छा से शादी की तो जिंदगी की वे ऊंचाइयां हासिल नहीं कर सकूंगा, जिन की चाहत है. निखिलजी और लता ये बात जानते थे इसलिए उसे अपनी पसंद की लड़की से शादी करने की छूट मिल गई.

मुकेश ने अपने दोस्त विनोद से इस मामले में राय ली तो सब से पहले उस ने सवाल किया कि क्या तुम ने कोई लड़की पसंद की है? मुकेश ने भोलेपन से नहीं में जवाब दिया तो वह खिलखिला कर हंस पड़ा और बोला, ‘लगता है यह काम भी मुझे ही करना पडे़गा.’

दूसरे दिन विनोद ने मुकेश को अपने आफिस बुलाया. लंच में वह वहां पहुंच गया. पहुंचते ही विनोद ने उस का परिचय अपने नजदीक खड़ी शालिनी से कराया. गोरीछरहरी काया की स्वामिनी शालिनी पहली नजर में  मुकेश को भा गई. उसे लगा, जिस लड़की की उसे वर्षों से तलाश थी वह यही है. विनोद उस के परिवार वालों को अच्छी तरह से जानता था. उस ने मध्यस्थता का काम कर दोनों परिवारों को मिला कर विवाह तय करवा दिया.

विवाह के पहले शालिनी की मां के मन में मुकेश के परिवार को ले कर एक दुविधा थी कि जहां पूरा परिवार परंपरावादी है वहां आधुनिक सुखसुविधाओं में पली उन की बेटी शालिनी निभा पाएगी या नहीं, पर मुकेश से मिल कर उन की सारी शंकाएं मिट गईं. मुकेश पढ़ाई के सिलसिले से प्राय: घर से बाहर ही रहे थे. महत्त्वाकांक्षी विचारों वाले खूबसूरत व्यक्तित्व के धनी मुकेश ने उन्हें बहुत प्रभावित किया. उन्हें वह हर दृष्टि से शालिनी के अनुरूप लगे. धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया. घर में पहली शादी होने की वजह से बहुत मेहमान जमा हुए थे. अखिलेशजी ने सभी को विशेष आग्रह कर के बुलाया था. कितने दिनों के बाद घर में खुशी का मौका आया तो सभी बेहद खुश थे.

दूर के रिश्तेदारों की विदाई होने के बाद अब केवल खास मेहमान बचे थे. विवाह के 5वें दिन सुबहसुबह लता नाश्ते की व्यवस्था करने किचन में गईं तो देख कर आश्चर्य में पड़ गईं. उन्होंने देखा कि नहाधो कर तैयार नई बहू गैस के पास खड़ी थी. नवेली दुलहन इस समय यहां क्या कर रही है और कपडे़ भी इस तरह के पहने हैं जैसे कहीं जा रही हो. उन्होंने पूछा, ‘तुम यहां क्या कर रही हो, बहू? अभी तो तुम्हारा रसोई प्रवेश का दस्तूर भी नहीं हुआ. रामू से कह देतीं, वह नाश्ता तैयार कर देता.’

‘मैं आज आफिस जा रही हूं,’ शालिनी की आवाज में कुछ रुखाई थी.

‘पर आज से ही, अभी तो घर मेें मेहमान हैं, वे सब क्या कहेंगे,’ लता ने समझाने का प्रयास किया.

‘मैं घर में बोर हो जाती हूं, मांजी, फिर आफिस में जरूरी मीटिंग भी है, इसलिए मेरा जाना जरूरी है,’ कहते हुए अपना सैंडविच और काफी का मग उठा कर शालिनी वहां से चली गई.

अखिलेशजी को पता चला तो उन्हें अच्छा नहीं लगा. उस समय तो वह चुप रहे पर शाम को उन्होंने शालिनी को अपने पास बुलाया और प्यार से समझाया तो वह बोली, ‘पापा, मैं ने मुकेश के साथ शादी इस शर्त पर की थी कि बाद में नौकरी नहीं छोडूंगी.’

‘मैं नौकरी करने के लिए मना नहीं कर रहा हूं पर इस घर के कुछ नियमकानून हैं और उन का पालन करना सभी सदस्यों के लिए जरूरी है,’ उन्होंने कुछ कठोरता से कहा तो शालिनी वहां से चली गई.

चंद दिनों में ही उन लोगों को पता चल गया था कि बहू अपनी मनमर्जी से चलने वाली आजाद  खयालों की लड़की है. किसी भी तरह की रोकटोक उसे पसंद नहीं है और यहां का माहौल उसे रास नहीं आएगा. जल्दी ही शालिनी के पैर भारी हो गए तो वह और भी परेशान हो गई. वह कुछ दिन के लिए मायके आ गई. अपनी गर्भावस्था के ज्यादातर दिन उस ने वहीं गुजारे. डिलीवरी होने के बाद बच्चे को ले कर शालिनी ससुराल आई तो पहला पोता होने की वजह से कई दिन तक खुशियां मनाई गईं.

उन्हीं दिनों मुकेश का ट्रांसफर चंडीगढ़ हो गया तो शालिनी की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने अपना ट्रांसफर भी चंडीगढ़ करवा लिया और पति के साथ आ गई. दादादादी की पोता खिलाने की साध अधूरी ही रह गई…पर क्या करते.

यहां मुकेश को कंपनी की तरफ से बड़ा सा बंगला और साथ ही गाड़ी भी मिली थी. शालिनी के अरमानों को जैसे पंख लग गए थे. यहां उसे पूरी आजादी थी, जैसे चाहे रहो. मुश्किल हुई तो बस, बंटी के कारण, सुबह अफिस जाते समय मुकेश उसे पालना घर में छोड़ देते थे पर लौटते समय बहुत देर हो जाती, शालिनी और मुकेश दोनों में से एक भी समय पर उसे लेने नहीं पहुंच पाते. मुकेश देर तक आफिस में रहते तो उन से कुछ उम्मीद करना बेकार था.

शालिनी को हमेशा पालनाघर के इंचार्ज की शिकायत सुननी पड़ती. उस दिन भी जब वह आफिस से लौटी तो शाम गहराने लगी थी. सारे बच्चे जा चुके थे. सिर्फ बंटी इंचार्ज के कमरे के बाहर सीढि़यों पर घुटने पर सिर टिकाए उदास सा बैठा था. उसे देख कर बंटी धीरे से मुसकराया और उठ कर खड़ा हो गया. इंचार्ज ने बाहर आ कर कहा, ‘मैडम, आप हमेशा लेट आती हैं, सारे बच्चे चले जाते हैं. यह अकेला रह जाता है तो रोता रहता है. एक दिन की बात हो तो ठीक है पर रोजरोज तो यह नहीं चल सकता.’

शालिनी इंचार्ज की बात सुन कर समझ गई कि वह देर तक रुकने के पैसे चाहता है. उस ने इंचार्ज को अतिरिक्त पैसे दे कर बंटी के देर तक रुकने का इंतजाम कर लिया. और कोई चारा भी तो नहीं था. घर के काम के लिए नौकर भी कंपनी से ही मिला था. जिंदगी मजे से गुजर रही थी. उस में भूचाल तभी आता जब बंटी बीमार होता या पालनाघर बंद होता.  ऐसे में दोनों एकदूसरे को छुट्टी लेने को कहते.

गरमी के दिन थे. स्कूल बंद हो गए तब भी बंटी नियम से पालनाघर जाता. एक दिन शाम को शालिनी, बंटी को ले कर लौटी तो उसी समय लखनऊ से मुकेश के पापा का फोन आया था. उन्होंने बताया, ‘दिनेश की शादी तय हो गई है और इसी महीने की 30 तारीख को शादी है. मेरी इच्छा है कि तुम लोग समय से पहले आ कर अपनी जिम्मेदारी संभाल लो. घर की अंतिम शादी है, बहुत मेहमान आएंगे,’ पापा बहुत उत्साह से बता रहे थे.

शालिनी सोचने लगी, इस समय आफिस में ढेरों काम हैं, कैसे जाना होगा. तभी पापा ने टोका, ‘तुम सुन रही हो न,’ तो वह चौंकी, ‘हां, पापा, हम लोग समय से पहले आ जाएंगे.’

उस समय तो शालिनी ने कह दिया पर वे गए ऐन वक्त पर ही, जब शादी की सारी तैयारियां हो चुकी थीं. मेहमानों से घर भरा था. धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ. इस बार मां छांट कर अपनी पसंद की बहू लाई थीं. आते ही छोटी बहू ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली.

फिर 2 वर्षों तक मुकेश व शालिनी का लखनऊ जाना ही नहीं हुआ. एक दिन दिनेश का फोन आया कि पापा की तबीयत बहुत खराब है. आप लोग तुरंत आ जाओ. वे पहुंचे तब तक उन का देहांत हो चुका था. मां बेहद दुखी थीं. शालिनी को वापस लौटने की तैयारी करते समय कुछ ध्यान आया. बात उस ने मुकेश से कही, ‘पापा के जाने के बाद मां बहुत अकेलापन अनुभव कर रही हैं. क्यों न हम उन्हें कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले चलें?’

मुकेश बोले, ‘मैं भी यही सोच रहा था. बंटी के कारण उन का मन भी लग जाएगा.’ इस के बाद शालिनी मूल उद्देश्य  पर आ गई और बोली, ‘हमें बंटी को पालनाघर में नहीं छोड़ना पडे़गा. वैसे भी अब तो बंटी का स्कूल में दाखिला हो जाएगा तो आधा दिन वह वहीं रहेगा और बाकी समय मां संभाल लेंगी.’

शालिनी की बात मुकेश को ठीक लगी पर मां पता नहीं इस के लिए तैयार होंगी या नहीं. मुकेश ने दुविधा जताई तो वह तपाक से बोली, ‘नहीं, मां कभी मना नहीं करेंगी. पोते का मोह उन्हें मना करने से रोकेगा.’

मां से पूछा तो वह आसानी से तैयार हो गईं. नन्हे बंटी का लगाव उन्हें खींच कर अपने साथ ले गया.

चंडीगढ़ में उन के बंगले के सामने बहुत बड़ा लौन था. सैकड़ों प्रकार के पेड़पौधे लौन की खूबसूरती बढ़ा रहे थे. मां बंटी को ढेरों कहानियां सुनातीं, उस के साथ लूडो खेलतीं, कई किताबें दोनों साथसाथ पढ़ते. बंटी और दादी  ने बाहर बाग में बहुत से पौधे साथसाथ लगाए. बंटी अपनी दादी से बहुत सवाल करता था. उसे पता था कि उन के जवाब सिर्फ दादी मां ही दे सकती हैं, वह उन से ही पूछपूछ कर अपनी जिज्ञासा शांत करता वरना मम्मीपापा के पास तो उस के लिए छुट्टी वाले दिन भी वक्त नहीं था.

उस दिन रविवार था. दादी मां सुबह ही नहा कर रसोई में चली गईं. रविवार के दिन मां बंटी के लिए अपने हाथ से हलवा बनातीं और बंटी को खिलाती थीं. उन्होंने अभी कटोरी में हलवा निकाल कर रखा ही था कि बंटी के जोर से चीखने की आवाज आई. भाग कर  दादी मां बाहर गईं तो देखा बरामदे में खड़ा बंटी अपने गाल को सहला रहा है और बड़ी कातर नजरों से दादी की ओर देख रहा था. तभी वहां मुकेश आ गए, ‘क्या शालिनी, बच्चे के साथ तुम भी बच्ची बन जाती हो. यह सब काम तुम बंटी के जाने के बाद भी तो कर सकती थीं.’

‘बंटी के जाने के बाद, बंटी कहां जा रहा है?’ दादी मां ने आश्चर्य से पूछा. ‘बंटी को हम बोर्डिंग में भेज रहे हैं. कुछ दिनों से हम देख रहे हैं कि वह बिगड़ता जा रहा है. वहां रहेगा तो ठीक रहेगा,’ कहते हुए मुकेश ने उसे गोद में उठा लिया.

दादी मां ने विरोध जताते हुए कहा, ‘अभी तो बंटी बहुत छोटा है. इस समय तो उसे मां की गोद और पिता के साए की जरूरत है.’

‘मां, अब  वह समय गया जब सारी जिंदगी बच्चों को मांबाप के साए की जरूरत होती थी. आजकल बच्चों को अपने रास्ते खुद तलाश करने पड़ते हैं, तभी वे जीवन में आगे बढ़ते हैं. बंटी को गोद से उतारते हुए मुकेश ने कहा, ‘आज हमारा बेटा अपने पापा के साथ बाजार जाएगा और ढेर सारे खिलौने खरीदेगा.’

जाने वाले दिन सुबह बंटी दादी से विदा लेने आया था. वह कुछ उदास सा था, यह देख कर दादी का दिल भर आया. वह पोते को ले कर बाहर आ गईं. हरि गाड़ी निकाल चुका था. शालिनी बंटी का सामान रखवा रही थी. मुकेश बोले, ‘मां, हम बंटी को छोड़ कर रात तक वापस आ जाएंगे, तुम अपना ध्यान रखना. मैं ने हरि से कह दिया है कि वह तुम्हारे पास रहेगा.’

सरस सलिल विशेष

दादी मां ने कुछ जवाब नहीं दिया. उन की निगाहें तो बंटी पर लगी थीं, जो जाते वक्त उन से सट कर खड़ा हो गया था. पलकों से आंसू छलकने को थे. उन्होंने बंटी का हाथ पकड़ कर उसे गाड़ी में बैठा दिया. बंटी ने दादी की ओर देख कर नन्ही हथेली से अपने आंसू पोंछे और दादी ने अपने आंसू अपनी पलकों में समेट लिए और कुछ पलों के लिए मुंह फेर लिया.

गाड़ी चल पड़ी. शालिनी और बंटी हाथ हिला रहे थे. जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए, दादी मां देखती रहीं.

बंटी के जाने के बाद उस घर में फिर उन का मन नहीं लगा. शालिनी एवं मुकेश के आने पर उन्होंने अपना फैसला सुना दिया कि अब वह यहां नहीं रहेंगी. रुकने की कोई वजह ही नहीं थी. जिस के लिए वह आई थीं वही नहीं था, तो किस के लिए रुकतीं. उन के जाने का इंतजाम हो गया और वह चली गईं. शालिनी ने भी राहत की सांस ली.

शालिनी के आफिस की मीटिंग सिंगापुर में थी. कंपनी की तरफ से कुछ लोगों का चुनाव किया गया. जिन्हें भेजा जाना था उन में शालिनी का भी नाम था. उस दिन वह बेहद खुश थी. यह बात वह मुकेश को बताना चाहती थी पर मुलाकात ही नहीं हो रही थी. मुकेश भी आजकल बेहद व्यस्त थे. रात में कब आते पता ही नहीं चलता. सुबह जब वह उठते तो शालिनी जा चुकी होती. एक सप्ताह ऐसे ही निकल गया. उस दिन रविवार था. दोनों एकसाथ सो कर उठे. चाय पीते वक्त शालिनी बोली, ‘मुकेश, हमारे आफिस से एक टूर सिंगापुर जा रहा है. उस में मेरा भी नाम है.’

मुकेश को अच्छा नहीं लगा. वह बोले, ‘शालिनी, तुम शायद भूल गई हो. बंटी के पेपर खत्म होने वाले हैं और हमें उसे लेने जाना है.’

‘बंटी को तुम ले आना. वह हरि के साथ रह लेगा. मैं इतना अच्छा मौका नहीं छोड़ सकती. अगर कंपनी को फायदा होता है तो समझो मेरा प्रमोशन पक्का है,’ कह कर वह उठ खड़ी हुई.

मुकेश अकेले ही गए और बंटी को ले आए पर बंटी के आने के पहले शालिनी जा चुकी थी. बंटी हरि के साथ अपना वक्त बिताता. उस दौरान मुकेश भी बहुत व्यस्त थे.

शाम को बहुत तेज बारिश हो रही थी. बंटी बरामदे में बौल खेल रहा था. हरि घर पर नहीं था. बारबार वह बौल में जोर से किक मारता, बौल बाहर जाती तो वह उठाने दौड़ पड़ता. जब तक हरि आया तब तक बंटी पूरा भीग चुका था. हरि को लगा कहीं बंटी बीमार न हो जाए तो फौरन ही उस के कपड़े बदलवा दिए. तब भी बंटी को जुकाम हो गया था. मुकेश जब आफिस से लौटै तो वह सो चुका था. दूसरे दिन बंटी को होस्टल जाना था. हरि ने उस की सारी तैयारी कर दी. वैसे भी हर बार यह काम उस के जिम्मे ही रहता था.

मुकेश बंटी को भेज कर लौटे तो काफी रात हो गई थी. वह बहुत थक गए क्योंकि बारिश के कारण रास्ता खराब हो गया था. दूसरे दिन आफिस जाने के समय उन के मोबाइल पर रिंग आई, ‘बंटी को कल से तेज बुखार है,’ बंटी के होस्टल से मैनेजर मि. राय का फोन था.

‘मैनेजर साहब, आप जानते हैं कि मैं कल रात को उसे छोड़ कर वापस आया हूं. इतनी जल्दी मैं दोबारा कैसे आ सकता हूं?’

‘जैसा आप ठीक समझें मि. मलहोत्रा, आप को सूचित करना हमारा फर्ज था. वैसे मैं ने डाक्टर को दिखा दिया है, उन्होंने दवा दे दी है. उसे वायरल फीवर है, 2-4 दिन में ठीक हो जाएगा.’

मुकेश के बिना पूछे ही बता कर फोन काट दिया. वायरल फीवर होने की बात सुन उन्हें राहत मिल गई थी. इस में 2-3 दिन में आराम हो जाता है. आफिस जाने के पहले होस्टल के मैनेजर के नाम एक चेक भेज दिया.

जैसेजैसे बंटी बड़ा होता गया उस का घर आना धीरेधीरे कम होता गया था. इस बार आया तो मोबाइल का टूथ इयर पीस पूरे समय कान में लगाए रहता या कंप्यूटर के आगे बैठा घंटों चैटिंग करता रहता. मुकेश और शालिनी के होने न होने का उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. अपने में ही मस्त रहता. जब जितने पैसे की जरूरत होती अपने मम्मीपापा को बता देता. उसे पैसे मिल जाते.

स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही उच्च शिक्षा के लिए बंटी ने आस्ट्रेलिया जाने का फैसला किया. 4 साल बाद वह वहीं नौकरी भी करने लगा. मुकेश शालिनी का बहुत मन था कि नौकरी ज्वाइन करने से पहले एक बार वह इंडिया आ जाता पर वह नहीं आया. हां, यह जरूर कहता था कि मैं आप लोगों को यहां बुलाना चाहता हूं. कुछ दिन यहां रहना, बहुत मजा आएगा.

अपने ही अतीत के बारे में सोचतेसोचते मुकेश कब सो गए उन्हें पता ही नहीं चला. शाम गहराने लगी ?आसमान में कालेकाले बादल छाने से मौसम कुछ अच्छा था, सो शालिनी ने बाहर बरामदे में नौकर से चेयर लगवा ली थी. फिर पुराने अलबम उठा कर ले आई और खोलखोल कर मुकेश को दिखाने लगी. नौकरी में थे तो कभी इतनी फुरसत ही नहीं मिली कि बैठ कर फोटो देखते.

अपने विवाह की तसवीरें, नन्हे बंटी की तस्वीरें देखतेदेखते बहुत देर हो गई तो दोनों भीतर आ गए. नौकर ने पूछा, ‘साहब, खाना लगा दूं?’ तो मुकेश बोले, ‘बंटी का फोन आने वाला है. उस से बात करने के बाद हम खाना खाएंगे.’ इस के बाद तो देर तक दोनों बंटी के फोन का इंतजार करते रहे पर फोन नहीं आया. तभी शालिनी को याद आया कि हो सकता है कि बेटे ने मेल किया हो. बहुत दिन से चैक नहीं किया. मेल बाक्स में गई तो देखा बंटी का छोटा सा नोट था.’

‘‘हाय मौम, डैड, आई एम वेरी बिजी, सो आई एम नाट कमिंग, आई एम सेंडिंग यू द चेक.’’

बंटी का लैटर पढ़ कर शालिनी सन्न खड़ी रह गई थी. लगा, इतने दिनों से वह एक भ्रम में जी रही थी. भ्रम में जीवन जिया जा सकता है पर उस के टूटने का आघात झेलना कितना मुश्किल होता है यह आज महसूस हुआ.

डाक्टर का सख्त निर्देश था कि ऐसी कोई भी बात नहीं होनी चाहिए जिस से मुकेश को सदमा पहुंचे. यह सोच कर फीकी सी हंसी उस के चेहरे पर आ गई. यही तो माडर्न युग की त्रासदी है. पहले संयुक्त परिवार होते थे, कई बच्चे होते थे. उन में से 1-2 पढ़ने या कमाने बाहर निकल भी गए तो घर खाली नहीं होता था. अकेलापन छू भी नहीं पाता था, पर एकल परिवार संस्कृति की वजह से आज जीवन संध्या व्यतीत करने वाले प्राय: हर परिवार के दरवाजे पर अकेलापन देखने को मिलता है.

Tags:
COMMENT