कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने चुनावी प्रचार का शुभारम्भ ‘गंगा यात्रा’ से करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. इस बार का लोकसभा चुनाव सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाला महायुद्ध नजर आ रहा है. प्रयागराज के मनैया घाट से अपनी तीन दिन की ‘गंगा-यात्रा’ का आगाज करके प्रियंका ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. वही गंगा, काशी में जिसके तट पर खड़े होकर 2014 में नरेन्द्र मोदी ने ललकार लगायी थी – ‘मुझे मां गंगा ने बुलाया है…’ वही गंगा, जिसके घाट पर 56 इंच की छाती ठोंक कर नरेन्द्र मोदी ने उसे प्रदूषण-मुक्त करने की शपथ उठायी थी और आजतक गंगा को प्रदूषण-मुक्त न कर सके, प्रयागराज में उसी गंगा की गोद में बैठ कर काशी तक 140 किलोमीटर का रास्ता बोट से तय करके प्रियंका गांधी वाड्रा ने भाजपा और मोदी की नींद उड़ा दी है. गंगा तट पर खड़े होकर उन्होंने गंगा मय्या में दूध अर्पित करते वक्त कहा – ‘मैं गंगा की बेटी हूं और मां का दर्द बेटी ही समझ सकती है.’ प्रियंका की यह भावनात्मक बात मोदी के दंभ और दावे पर भारी पड़ती है. वहीं गंगा तट पर घने बसे अत्यन्त पिछड़ी जाति के लोगों से सीधा सम्वाद स्थापित करके उन्होंने बसपा नेत्री मायावती का ब्लडप्रेशर भी बढ़ा दिया है. गंगा तट पर बसे केवट और मछुआरों को ही नहीं, बल्कि गैर यादव, गैर कुर्मी और गैर जाटव जातियों को अपने पाले में लाने की कोशिश में प्रियंका मोदी के ‘मन की बात’ सरीखी एकतरफा संवाद के विपरीत लोगों से जिस तरह आमने-सामने बातचीत कर रही हैं, उसके परिणाम कांग्रेस के हित में सिद्ध होंगे, इसमें दोराय नहीं है. गौरतलब है कि अत्यन्त पिछड़ी जातियों की संख्या उत्तर प्रदेश में करीब 34 फीसदी है, जिसमें निषाद, मछुआरा, बिंद, चौहान, धोबी, कुम्हार, केवट आदि शामिल हैं. यह जातियां गंगा के किनारे वाले इलाकों में बहुतायत से बसी हैं और  मिर्जापुर, जौनपुर, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, फतेहपुर, मुजफ्फरनगर, अंबेडकर नगर, भदोही, बनारस जैसी सीटों पर इनका खासा प्रभाव है. इस तबके को जहां भाजपा की ’सवर्ण-मानसिकता’ अपने निकट भी फटकने नहीं देती, वहीं बसपा के सत्ता में रहने पर भी इस तबके को कभी कोई खास फायदा नहीं मिला है. प्रियंका की नजर उत्तर प्रदेश के मछुआरों और निषादों पर खासतौर पर है, जो पिछले चुनावों में भाजपा को वोट करते रहे हैं. पूरे सूबे में इन जातियों की आबादी करीब 12 फीसदी है. दरअसल, गोरखपुर उपचुनाव के परिणामों के बाद निषाद सूबे में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे थे. निषादों को अपने पाले में बनाये रखने के लिए भाजपा भी जीतोड़ मेहनत कर रही है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो निषादराज की भव्य प्रतिमा बनवाने का ऐलान कर चुकी है. निषादों को साथ लाने के लिए प्रियंका ने संगम के पास छतनाग से ‘गंगा यात्रा’ शुरू करने के बजाय मनैया के घाट को चुना क्योंकि मनैया निषादों द्वारा बसाया गया गांव है. कहना गलत न होगा कि प्रियंका की ‘गंगा यात्रा’ के निहितार्थ गहरे हैं, होमवर्क पूरा है और शायद यही वजह है कि किसी भी गठबंधन से दूर कांग्रेस ने पूरे देश में अपने दम पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है.

घिर गये हैं चौकीदार

खुद को देश का चौकीदार घोषित करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जनता से संवाद के वक्त बॉडीलैंग्वेज जहां अहंकार, कठोरता, कटुता, व्यंग्य, अतिश्योक्तियों और लड़ने-मरने जैसे भाव प्रदर्शित करती है, वहीं उससे बिल्कुल उलट प्रियंका के भाषणों में जमीन से जुड़ी, किसानों-मजदूरों की परेशानियों से जुड़ी, युवाओं के रोजगार से जुड़ी इमोशनल बातें लोगों को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. प्रियंका के वाक्यों पर गौर करें – ‘देश संकट में है, इसलिए मुझे घर से निकलना पड़ा… मैं काफी वर्षों से घर में थी, लेकिन अब देश संकट में है… आज किसानों को फसलों का सही दाम नहीं मिल रहा है… पिछले पांच साल में देश में बेरोजगारी बढ़ी है…’ इन वाक्यों से आमजन खुद का ज्यादा जुड़ा हुआ पाता है. और सबसे बड़ा और तीखा हमला तो प्रियंका ने मोदी पर यह कह कर किया है कि – ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं….’. ऐसा कह कर प्रियंका ने मोदी को उन्हीं के नारे ‘मैं भी चौकीदार’ में घेर दिया है. मोदी सिर्फ अपने खास और अमीर उद्योगपति अडानी-अम्बानी के चौकीदार हैं, प्रियंका के कथन में छिपी इस बात को समझना जनता के लिए मुश्किल नहीं है.

संभ्रांत और सेक्युलर छवि

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठन अक्सर प्रियंका को ईसाई बता कर उन पर निशाना साधते रहे हैं, लेकिन संगम तट पर लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद ‘गंगा-यात्रा’ की शुरुआत करके उन्होंने साफ कर दिया है कि उनकी रगों में हिन्दू का खून भी है. प्रियंका ने उसी जगह पर पूजा की, जहां कभी उनकी दादी इंदिरा गांधी ने पूजा की थी. ऐसा करके जहां उन्होंने इंदिरा की यादों को लोगों के दिलों में ताजा किया, वहीं उन्हें हिन्दू विरोधी कहने वालों के मुंह पर भी ताला जड़ दिया है. रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रही और देश में शान्ति-अमन की चाह रखने वाली जनता प्रियंका की इस सेक्युलर छवि से काफी प्रभावित है और इसका फायदा चुनाव में कांग्रेस को मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं है.

वहीं, अब तक जो मुसलमान बसपा, सपा और भाजपा के बीच बंट गया था, वह भी अब कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होता नजर आ रहा है. बीते पांच सालों में मोदी-राज में गोरक्षा और लवजिहाद के नाम पर जो कत्लेआम मचा उससे अल्पसंख्यकों में डर का माहौल है, ऐसे में प्रियंका की सेक्युलर छवि उन्हें आकर्षित कर रही है. इसमें दोराय नहीं है कि इस बार मुसलमान कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होगा. वहीं अति पिछड़ी जातियों से सीधा संवाद स्थापित करके प्रियंका ने सपा और बसपा के दिल में भी धुकधुकी पैदा कर दी है.

मेरठ में जिस तरह प्रियंका भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद को देखने अस्पताल पहुंचीं, उससे बसपा नेत्री मायावती की झुंझलाहट बढ़ गयी है. भीम आर्मी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत है. यहां के लोग मायावती से बड़ा नेता युवा और जोश से लबालब चंद्रशेखर को मानते हैं, जो लम्बे समय से मजदूरों के हक में आवाज बुलंद कर रहे हैं. दलित समुदाय के युवा खुद को चंद्रशेखर से जुड़ा महसूस करते हैं. ऐसे में प्रियंका का उनसे मिलना एक सीधा सियासी गणित है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एससी वोटों पर अच्छी पकड़ रखने वाले चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होगा.

ठीक वक्त पर एंट्री

नजरें लक्ष्य पर, सौम्य-सधी आवाज और बातचीत में एकदम अपनों जैसा प्यार… इन विशेषताओं के साथ प्रियंका गांधी वाड्रा अन्तत: चुनाव मैदान में हैं. सालों से पर्दे के पीछे रह कर काम करने वाली प्रियंका को राजनीति में प्रत्यक्ष उतारने की मांग बहुत लम्बे समय से होती रही है, मगर निजी कारणों का हवाला देकर इतने सालों तक उन्हें इससे अलग रखा गया. एक तो उनके बच्चे छोटे थे और दूसरा उनके भाई राहुल गांधी का करियर डांवाडोल था. अब ऐसे वक्त में प्रियंका की एंट्री हुई है, जब बच्चे भी समझदार हो गये हैं और राहुल गांधी भी ‘पप्पू’ वाली छवि तोड़ कर बतौर पार्टी-अध्यक्ष कांग्रेस की झोली में तीन राज्यों की सरकारें डालने में कामयाब रहे हैं. अब सदन के भीतर-बाहर राहुल धाराप्रवाह भाषण करते हैं. उनके अचानक अटैक और प्यार की झप्पी से तो प्रधानमंत्री मोदी तक हतप्रभ हो चुके हैं. इसलिए अब ऐसा कहना कि प्रियंका के आने से राहुल का करियर चौपट हो जाएगा, गलत है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रत्यक्ष राजनीति में प्रियंका की एंट्री से कांग्रेस दोहरी मजबूती के साथ चुनाव मैदान में है. एक और एक ग्यारह की ताकत के साथ राहुल-प्रियंका 2019 की लोकसभा की वैतरणी पार करेंगे.

दो मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं प्रियंका

प्रियंका गांधी वाड्रा आज देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं. गौरतलब है कि उनके राजनीति में उतरने की सुगबुगाहट के साथ ही भाजपा चौकन्नी हो गयी थी. जैसे ही यह ऐलान हुआ कि प्रियंका को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया जा रहा है, पांच साल तक राबर्ट वाड्रा के अवैध रूप से प्रॉपर्टी खरीद मामले में खामोशी ओढ़े पड़ी जांच एजेंसियों में अचानक हलचल देखी जाने लगी और फिर प्रवर्तन निदेशालय ने राबर्ट वाड्रा को कथित रूप से अवैध सम्पत्ति और मनी लांड्रिग मामले में पूछताछ के लिए ठीक उसी दिन तलब कर लिया, जिस दिन प्रियंका को बतौर कांग्रेस महासचिव अपना पद ग्रहण करना था. आशंका व्यक्त की जा रही थी कि इसके खिलाफ कांग्रेसी हो-हल्ला मचाएंगे, मगर राबर्ट और प्रियंका दोनों ने शालीनता और सहयोग का परिचय दिया और रॉबर्ट वाड्रा पूछताछ का सामना करने के लिए एजेंसी के सामने हाजिर हो गये. चुनावी तैयारियों और रैलियों के अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच प्रियंका अपने पति राबर्ट को पूरा सपोर्ट करती नजर आयीं. कांग्रेस महासचिव की कुर्सी पर बैठने से पहले वे पति को लेकर प्रवर्तन निदेशालय पहुंचीं और फिर वहां से कांग्रेस आॅफिस जाकर उन्होंने कार्यभार संभाला. यही नहीं, जब राबर्ट वाड्रा को पूछताछ के लिए जयपुर तलब किया गया, तब भी प्रियंका लखनऊ में रैली पूरी करने के बाद सीधी जयपुर पहुंचीं. इन बातों से प्रियंका ने साफ कर दिया है कि वह देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूती से कमर कस के खड़ी हैं और उनके यही तेवर भाजपा खेमे को डरा रहे हैं.

गौरतलब है कि 2014 में जब मोदी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब राबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की बातें खूब करते थे, मगर सत्ता में आने के बाद पांच साल तक वह इस मामले में खामोशी ओढ़े रहे. जैसे ही यह खबर आयी कि प्रियंका गांधी राजनीति में पदार्पण करने वाली हैं, केन्द्र के अधीन जांच एजेंसियां अचानक नींद से जाग पड़ीं. ऐसा क्यों हुआ यह सवाल सबकी जुबां पर है. प्रियंका ने एक लाइन में इस सवाल का जवाब दिया है – ‘सबको पता है, क्या हो रहा है?’ वहीं प्रियंका की तारीफ करते हुए पति रॉबर्ट वाड्रा ने सोशल मीडिया पर लिखा – ‘प्रिय पी, तुम एक सच्ची दोस्त, परफेक्ट वाइफ और मेरे बच्चों के लिए बेस्ट मां साबित हुई हो. आज के दिन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक माहौल है, मुझे पता है तुम अपनी जिम्मेदारी को सही से निभाओगी. हम प्रियंका को देश के हवाले करते हैं. भारत की जनता इनका ध्यान रखे.’ राबर्ट के इस इमोशनल मैसेज से प्रियंका तो प्रभावित हुर्इं ही, कांग्रेसी खेमे में इस मैसेज ने संजीवनी का काम किया.

खून में दौड़ती राजनीति

राजनीति प्रियंका के खून में है. लम्बे समय से वह अमेठी और रायबरेली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की रैलियों के आयोजन का कार्यभार संभालती रही हैं. उनकी कार्यशैली अनूठी है. वे अजनबियों के साथ पलक झपकते ही स्नेहिल सम्बन्ध बना लेती हैं. उनकी खूबसूरती और मोहक मुस्कान सामने वाले को सम्मोहित कर लेती है. अपने राजनीतिक दौरों के दौरान कभी प्रियंका किसी बूढ़ी महिला का हाथ थाम कर बैठ जाती हैं, कभी उनके साथ परांठा-अचार का नाश्ता करती हैं, तो कभी रिक्शे पर अपने बच्चों को घुमाती हैं. उनका यह व्यवहार क्षेत्र के लोगों को उनसे गहरे जोड़ता है. हालांकि वे थोड़ी गुस्सैल स्वभाव की भी हैं. मगर कार्यकर्ताओं का मानना है कि उनका गुस्सा उन लोगों पर ही प्रकट होता है, जो पार्टी का काम ठीक से नहीं करते हैं. ऐसा ही आचरण उनकी दादी इंदिरा गांधी का भी था. दरअसल प्रियंका में लोगों को इंदिरा की ही छवि नजर आती है. खासतौर पर उनकी हेयर स्टाइल और लम्बी नाक. तमाम समानताओं के साथ एक समानता यह भी है कि प्रियंका गांधी का करियर भी इंदिरा गांधी की तरह ही शुरू हुआ है. प्रियंका की तरह इंदिरा भी शुरू से ही स्मार्ट थीं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखा गया था. जवाहर लाल नेहरू ने कभी उन्हें अपनी उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा. ये अलग बात थी कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी. शुरू में गूंगी गुड़िया के रूप में मशहूर इंदिरा के राजनीतिक तेवर पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में पदार्पण के साथ देश-दुनिया ने देखे. वैसे ही तेवर प्रियंका के हैं. महज 16 साल की उम्र में, प्रियंका गांधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था. तब से वह कई राजनीतिक जुलूसों, रैलियों और सम्मेलनों में हिस्सा लेती रही हैं.

अपनी बात मनवाने में माहिर हैं प्रियंका

सरस सलिल विशेष

रायबरेली के पुराने लोग प्रियंका में हमेशा इंदिरा को देखते हैं. इंदिरा की तरह वे भी सीधी और भावुक बातें करके लोगों को वह करने पर मजबूर कर देती हैं, जो वह चाहती हैं. यह बात तो रायबरेली की पहली ही जनसभा में ही साबित हो गयी थी. वह 1999 का लोकसभा चुनाव था. कांग्रेस ने रायबरेली सीट से कैप्टन सतीश शर्मा को खड़ा किया था. भाजपा ने जवाब में राजीव गांधी के ममेरे भाई अरुण नेहरू को टिकट दिया था. अरुण नेहरू और राजीव गांधी में रिश्ते बिगड़ गये थे. वे कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गये थे. अरुण नेहरू मजबूत नेता थे. वहीं कैप्टन सतीश शर्मा सोनिया परिवार के घरेलू मित्र थे. प्रियंका उन्हें अंकल कहती थीं. कैप्टन रायबरेली से लगभग हारे हुए कैंडिडेट नजर आ रहे थे. उन्होंने प्रियंका से आग्रह किया कि वह उनकी एक चुनावी सभा में आ जाएं. तब प्रियंका सिर्फ 27 साल की थीं. रायबरेली में उनकी पहली जनसभा थी. प्रियंका ने वहां सिर्फ एक लाइन बोली – ‘मेरे पापा के साथ जिसने गद्दारी की. पीठ में छुरा भोंका, ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’ भीड़ ने प्रियंका की डांट सुनी. एक सन्नाटा खिंच गया चारों ओर. प्रियंका को लगा कि कुछ ज्यादा हो गया. उन्होंने बात संभाली और बोलीं – ‘मेरी मां ने ये कह कर भेजा था कि कभी किसी की बुराई मत करना. लेकिन मैं आपसे भी अगर अपने दिल की बात नहीं कहूंगी, तो किससे कहूंगीं.’ और प्रियंका के इस इमोशनल सम्बोधन के बाद पूरा चुनाव ही पलट गया. कैप्टन सतीश शर्मा जीत गये और अरुण नेहरू का राजनीतिक करियर खत्म हो गया. कैप्टन खुद मानते थे कि ये चुनाव उन्हें अकेली प्रियंका की एक मीटिंग ने जिता दिया था.

27 साल की तब की प्रियंका और 47 साल की आज की प्रियंका में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है. वे आज भी उसी तरह इमोशनल बातें करके लोगों का दिल जीत जीतने में उस्ताद हैं, मगर कोई कार्यकर्ता काम से जी चुराये तो डांट-डपट भी करने से नहीं चूकतीं. राजनीति उनके खून में है और मेच्योरिटी लेवल भाई राहुल गांधी से कहीं ज्यादा. यही वजह रही कि इतने साल तक सोनिया ने उन्हें राजनीति से दूर रखा ताकि राहुल ठीक तरह से स्थापित हो सकें.

भय्याजी के नाम से मशहूर हैं प्रियंका

राहुल और सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी और रायबरेली में प्रियंका बचपन से ही काफी सक्रिय रही हैं. क्षेत्र के लोग राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका को भी ‘भय्याजी’ के सम्बोधन से पुकारते हैं. इन दोनों जगहों को प्रियंका अपने घर के रूप में देखती हैं. प्रियंका की खासियत है कि वो लोगों से जल्दी जुड़ जाती हैं. इस बात के गवाह कई लोग हैं कि रायबरेली में प्रियंका गांधी कभी भी अचानक ही बीच सड़क पर रुककर किसी भी कार्यकर्ता को नाम से पुकार लेती थीं और उसका हालचाल लेती थीं. वर्ष 2004 के आम चुनाव में उन्होंने रायबरेली में सोनिया गांधी के लिए अभियान प्रबंधक के रूप में जबरदस्त काम किया था. वहीं अमेठी में भाई राहुल गांधी के अभियान की निगरानी भी उन्होंने की. वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत का परचम लहराया तो पार्टी में प्रियंका का कद बढ़ गया. हालांकि वह एक उम्मीदवार के रूप में या प्रचारक के रूप में पार्टी की चुनावी जीत में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाती थीं, लेकिन वह इसके पीछे थीं.

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जब राहुल गांधी अपने राज्यव्यापी अभियान में व्यस्त थे, प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली क्षेत्र की दस सीटों पर अपनी ऊर्जा और प्रयास केन्द्रित किया. आम चुनाव 2009 और 2014 में, प्रियंका गांधी ने अमेठी और रायबरेली के निर्वाचन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रचार किया और अपने भाई और मां के लिए जीत हासिल करने में मदद की.

प्रियंका गांधी की छवि और कार्यशैली में उनकी दादी इंदिरा की छाप और असर है. कांग्रेस पार्टी में प्रियंका से बड़ा स्टार प्रचारक कोई नहीं है. अबकी लोकसभा में कांग्रेस की नय्या पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका पर है. गांधी परिवार की इस सदस्या के सक्रिय राजनीति में उतरने की राह लोग काफी समय से देख रहे थे. प्रियंका गांधी वाड्रा का लक्ष्य भी हालांकि सत्ता प्राप्त करना है, मगर यह सत्ता वह अपने भाई राहुल गांधी के लिए पाना चाहती हैं. वह लम्बे समय से पार्टी और राहुल के लिए काम कर रही हैं. मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों में संयोजक के तौर पर उनकी भूमिका हमेशा प्रभावशाली रही है. उनकी तेजी और स्मरण शक्ति गजब की है. अमेठी और रायबरेली में वह अपने कार्यकर्ताओं को बकायदा नाम से पुकारती हैं. उनकी यह खूबी उन्हें कार्यकर्ताओं से सीधे जोड़ती है. 2019 के चुनाव में उनका उतरना विपक्षी दलों के लिए चिन्ता का विषय है.

भाजपाइयों में उत्साह नदारद

भाजपा का सीधा मुकाबला इस बार कांग्रेस से है, यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनका गोदी-मीडिया भलीभांति समझ रहा है. प्रियंका के आने के बाद कांग्रेस पार्टी मजबूती से खड़ी हुई है, इस बात से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इत्तेफाक रखते हैं. कांग्रेस का सपा और बसपा से गठबंधन न करना यह साफ जाहिर करता है कि प्रियंका की लीडरशिप में अबकी बार पार्टी पूरे कॉन्फिडेंस में है. विरोधी खेमा प्रियंका-प्रलय का आंकलन करने में जुटा है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कुम्भ स्नान के बाद से ही हवा का रुख भांपने में लगे हैं. पुलवामा में सीआरपीएफ के चालीस जवानों की शहादत और पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक कर मोदी-शाह जनता पर ‘भाजपा की देशभक्ति’ का रौब गालिब करने में उस तरह सफल नहीं हो पाये, जैसा कि उनकी सोच थी. उलटे वह कई संगीन और संवेदनशील सवालों के घेरे में आ फंसे हैं. कई जवानों के परिजनों ने यह सवाल उठा दिये हैं कि पुलवामा में एक आतंकी इतना विस्फोटक लेकर पहुंचा कैसे? सुरक्षा में इतनी बड़ी खामी आखिर किसकी गलती से हुई? पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक कर सेना के कारनामे को अपना कारनामा बताने वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने आखिर अब तक पुलवामा हमले की जांच क्यों नहीं करवायी? यह तमाम सवाल चारों ओर से उठ रहे हैं और ऐसे में प्रियंका गांधी वाड्रा का अनेक शहीद जवानों के परिजनों से जाकर मिलना और उनसे संवाद स्थापित करना मोदी-शाह की मुश्किलें बढ़ा रहा है.

अबकी बार भाजपा कार्यकर्ताओं में भी जोश 2014 के मुकाबले जरा कम ही नजर आ रहा है. संघ के भीतर से भी कई बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अलग-अलग मत सामने आ चुके हैं. 2014 में जहां भाजपा के दिग्गज नेताओं ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकारा था और संघ की पूरी ताकत उनके पीछे थी, वहीं अबकी बार यह ताकत कुछ कम दिख रही है. ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ या ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसा कोई प्रभावी नारा भी अभी तक जनता के कानों में नहीं पड़ा है. ‘मैं भी चौकीदार’ मुहिम भी टांय-टांय फिस्स ही दिख रही है. प्रधानमंत्री मोदी की इस मुहिम में शामिल होकर जब पंकजा मुंडा ने ट्वीट किया – ‘मैं भी चौकीदार’ तो इस पर उनको मिला एक मजेदार जवाब – ‘चिक्की कौन खाया?’

पार्टी कार्यकर्ताओं में ही नहीं, बल्कि भाजपा के धुरंधर नेताओं में भी इस बार जोश नदारद है. राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, उमा भारती, शाहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, अरुण जेटली जैसे कई दिग्गज भाजपाई खामोशी ओढ़े बैठे हैं, तो वहीं पुराने भाजपाई कलराज मिश्र, सैयद शाहनवाज हुसैन अपने टिकट कटने से नाराज दिख रहे हैं. ऐसे में चुनाव प्रचार उस गर्मजोशी से परवान चढ़ेगा, जैसा कि 2014 में था, ऐसा लगता नहीं है.

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