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Social Story : बूआजी का भूत-क्या थी इस कहानी की असलियत

Social Story. कैलाश की मां मर गई थीं. वे 75 साल की थीं. कैलाश ने अपने मामा के लड़कों के साथ रिश्तेदारों को भी खबर पहुंचा दी. तकरीबन सभी रिश्तेदार और समाज के लोग कैलाश के इस दुखद समय पर हाजिर हो गए. फिर कैलाश ने अपनी मां की अर्थी का इंतजाम कर दाह संस्कार भी कर दिया.

उसी दिन शाम को ही नातेरिश्तेदारों के साथ बैठ कर कैलाश मृत्युभोज का दिन व समय तय करने के लिए चर्चा करने लगा, तभी कैलाश के मामा के लड़के मोहन ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘भाई, अभी मृत्युभोज की तारीख तय मत करो… मैं बूआजी की गौरनी करना चाहता हूं. उस के बाद तुम मृत्युभोज कर लेना.’’

कैलाश ने पूछा, ‘‘यह गौरनी क्या होती है?’’

मोहन ने कैलाश को हैरानी से देखा, ‘‘गौरनी नहीं जानते तुम… यह गौने का छोटा रूप है,’’ फिर वह समझाने लगा, ‘‘मैं बूआजी को इज्जत से उन के मायके यानी अपने घर ले जाऊंगा. बाकायदा उन का ट्रेन, बस वगैरह का टिकट भी लूंगा. जो वे खाएंगी खिलाऊंगा, फिर समाज के लोगों को न्योता दे कर अच्छेअच्छे पकवान बना कर भोजन कराऊंगा.

‘‘उस के बाद बूआजी को नए कपड़ों और सिंगार के सामान के साथ इज्जत से तुम्हारे घर विदा कर दूंगा. भाई, फिर तुम मृत्युभोज की तारीख तय कर लेना.

‘‘पर, मां तो मर गई हैं. उन की देह को हम ने जला भी दिया है. कैसे ले जाओगे उन्हें?’’ कैलाश ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं बूआजी के पुराने कपड़ों को बूआजी समझ कर ले जाऊंगा… अब मेरी ट्रेन का समय हो रहा है. चल, जल्दी से बूआजी को मेरे साथ विदा कर दे.’’

कैलाश हैरान हो कर मोहन का मुंह ताकने लगा, तो मोहन ने उसे झिड़का, ‘‘मूर्ख, मेरा मुंह क्या ताक रहा है? जा, बूआजी के पुराने कपड़े ले आ.’’

कैलाश घर के भीतर जा कर थोड़ी देर में अपनी मां के पुराने कपड़े एक पौलीथिन बैग में रख कर ले आया. मोहन उसे देख कर चीख पड़ा, ‘‘अबे, बूआजी का दम घुट जाएगा. जल्दी पौलीथिन से बाहर निकाल.’’

कैलाश ने घबरा कर फौरन कपड़े बाहर निकाले और एक गहरी लंबी सांस ली, मानो अपनी मां को दम घुटने से बचा लिया हो, फिर मायूस हो कर उस ने कपड़े मोहन को थमा दिए. मोहन बोला, ‘‘अब बूआजी से माफी मांग और प्रणाम कर के बोल कि मां घर जल्दी आ जाना.’’

लाचार कैलाश कपड़ों से माफी मांग कर बोला, ‘‘मां, घर जल्दी आ जाना.’’ मोहन ने कपड़ों से कहा, ‘‘चलो बूआजी अपने मायके. वहां भाईभतीजे आप का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.’’ मोहन अपनी पत्नी शारदा को साथ ले रिकशा स्टैंड पर आ गया. थोड़ी देर में एक रिकशा उस के पास आ कर रुका.

‘‘कहां जाओगे?’’ ‘‘रेलवे स्टेशन. तुम 3 सवारियों का कितना पैसा लोगे?’’

रिकशे वाले ने इधरउधर देख कर पूछा, ‘‘तीसरा कौन है?’’ ‘‘देख नहीं रहे हो. मेरे हाथ में बूआजी हैं,’’ मोहन ने जवाब दिया.

रिकशे वाले ने गौर से देख कर कहा, ‘‘ये तो किसी औरत के पुराने कपड़े हैं.’’ ‘‘इन्हें कपड़े मत कहो.’’

मोहन ने नाराजगी जाहिर की, ‘‘ये मेरी बूआजी हैं. इन का अभीअभी कुछ देर पहले देहांत हो गया है.

‘‘पर, तुम चिंता मत करो, मैं बूआजी का पूरा किराया दूंगा.’’

यह सुन कर रिकशे वाला डर कर कांपने लगा, क्योंकि मोहन के चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी और माथे पर लगा तिलक तांत्रिक होने का संकेत दे रहे थे.

‘‘भैया, आप की बूआजी को बिठा कर ले जाना मेरे बस की बात नहीं है,’’ रिकशे वाला हाथ जोड़ते हुए बोला.

इतना कह कर वह रिकशा ऐसे ले कर भागा, जैसे बूआजी का भूत उस के पीछे पड़ गया हो. मोहन और उस की पत्नी उस को रोकते रह गए, पर वह नहीं रुका.

थोड़ी देर बाद एक सवारी टैंपो वहां आ कर रुका. निराश मोहन और शारदा की आंखों में चमक लौट आई. सवारी टैंपो में पहले से ही 3-4 सवारियां बैठी थीं और 4-5 सवारियों के बैठने की जगह थी. मोहन शारदा के साथ बैठ गया और पास ही खाली सीट पर बूआजी के कपड़े रख कर बोला, ‘‘बूआजी, अब आप आराम से यहां बैठिए. आप को कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

आसपास बैठी सवारियां उस की बात सुन कर हैरत से उसे और कपड़ों को देखने लगीं.

‘‘अजीब आदमी है, कपड़ों से बात कर रहा है,’’ टैंपो का कंडक्टर बोला. ‘‘भैया, खाली सीट से कपड़े उठा लो और उधर सरक कर बैठो. मुझे और भी सवारियां लेनी हैं,’’ कंडक्टर बोला.

मोहन ने तैश में आ कर जवाब दिया, ‘‘तमीज से बोलो… वे कपड़े नहीं, बूआजी हैं और उन का किराया मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘कहां हैं बूआजी?’’ कंडक्टर ने हैरानी से पूछा. ‘‘वे मर गई हैं, लेकिन उन के कपड़े ही बूआजी हैं.’’

‘‘तो क्या बूआजी के भूत को साथ ले कर चल रहा है?’’

परेशान मोहन तैश में बोला, ‘‘यही समझ ले.’’ आसपास बैठी सवारियां उन की बातें सुन कर खौफ से भर गईं और सभी एकएक कर के टैंपो से उतर गईं.

कंडक्टर ने देखा कि सवारियां डर कर उतरी हैं, तो वह भी डर गया. हालात से समझौता करते हुए कंडक्टर हाथ जोड़ कर मोहन से बोला, ‘‘भाई, तू मुझ से किराया ले ले और किसी दूसरी गाड़ी से स्टेशन चला जा, पर अपनी बूआजी को नीचे उतार ले. मेरी सारी सवारियां डर कर भाग रही हैं.’’

मोहन ने उसे समझाने की कोशिश की, पर सवारी और कंडक्टर उस की बात सुनने को तैयार नहीं हुए. मोहन थकहार कर कपड़े उठा कर टैंपो से उतर गया.

‘‘ऐसे तो हम किसी गाड़ी में नहीं बैठ पाएंगे,’’ शारदा ने कहा, ‘‘अब किसी रिकशे वाले को यह मत बताओ कि बूआजी हमारे साथ हैं.’’

‘‘बात तो तुम ठीक कह रही हो, पर इस उम्र में बूआजी को बिना भाड़ा दिए ले जाना सरासर बेईमानी है. उन की आत्मा हमें कोसेगी.’’

‘‘चलो, फिर पैदल ही चलते हैं.’’ ‘‘ठीक है,’’ कह कर मोहन और शारदा पैदल चल दिए.

थोड़ी दूर चलने के बाद शारदा बोली, ‘‘सुनोजी, बूआजी थक गई होंगी, क्यों न कहीं बैठ कर हम थोड़ा आराम कर लें?’’

‘‘ऐसे कैसे थकेंगी बूआजी. उन को तो हम उठाए हैं.’’ ‘‘मेरा मतलब है कि बूआजी को थोड़ा चायनाश्ता करवा दो, बेचारी कब से भूखीप्यासी हमारे साथ चल रही हैं.’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो. सवारी गाड़ी के चक्कर में बूआजी की भूखप्यास का मुझे जरा भी खयाल नहीं आया.’’

एक होटल में जा कर मोहन ने एक खाली कुरसी पर बूआजी के कपड़े रखे और और्डर दिया, ‘‘भैया, 3 गिलास पानी और 3 जगह 2-2 समोसे और चाय देना.’’

नौकर ने पानी, चाय, समोसे टेबल पर रख कर पूछा, ‘‘तीसरा कौन है साहब?’’

मोहन तैश में आ कर बोला, ‘‘इन कपड़ों के सामने सामान रख दे. तुझे बूआजी नजर नहीं आएंगी.’’ नौकर ने मोहन और कपड़ों को अजीब नजरों से देखा और चुपचाप नहाने चला गया. नाश्ता और पानी का गिलास कपड़ों के सामने सरका कर मोहन बोला, ‘‘बूआजी, समोसे खा कर पानी पी लो.’’

नौकर ने दूर से मोहन की बुदबुदाहट सुनी, पर उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वह डर कर सीधा अपने मालिक के पास पहुंचा.

थोड़ी देर बाद होटल मालिक मोहन के सामने जा खड़ा हुआ और बोला, ‘‘यहां क्या यह तांत्रिक पूजा चल रही है? यह होटल है, तुम्हारी तंत्र साधना की जगह नहीं. चलो, उठो यहां से.’’

मोहन हड़बड़ा कर सफाई देने लगा, ‘‘आप गलत समझ रहे हो, दरअसल…’’

मालिक झल्लाया, ‘‘मुझे मूर्ख बना रहे हो… कपड़े को समोसा खिला रहे हो, पानी पिला रहे हो और ऊपर से मंत्र बुदबुदा रहे हो. मेरे नौकर ने तुम्हें दूर से देखा है.’’

तभी नौकर ने मालिक की बात का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘मालिक, जब मैं ने तीसरी प्लेट के बारे में पूछा, तो यह आदमी बोला कि कपड़ों के सामने रख दे. यह प्लेट बुआजी की है, जो तुझे नजर नहीं आएंगी.’’

मोहन के कुछ बोलने से पहले ही मालिक बोला, ‘‘चलो, उठो यहां से. नाश्ते के पैसे भी मत दो. चलो, होटल के बाहर जाओ.’’ मोहन और शारदा बेइज्जत हो कर होटल के बाहर आ कर रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए.

रेलवे स्टेशन पहुंच कर मोहन 3 टिकट ले कर ट्रेन में जा बैठा और खाली सीट पर कपड़े रख दिए. धीरेधीरे डब्बा मुसाफिरों से भरने लगा. एक मुसाफिर ने मोहन से कहा, ‘‘भैया, कपड़े उठाओ, उधर सरको और हमें भी बैठने की जगह दो.’’ मोहन बोला, ‘‘बूआजी बैठी हैं.’’

उस मुसाफिर ने सोचा कि शायद इस की बूआजी बाथरूम वगैरह कहीं गई होंगी. वह आगे बढ़ गया, तभी दूसरे मुसाफिर ने कपड़े के लिए मोहन को टोका, तो मोहन ने वही जवाब दिया, ‘‘बूआजी बैठी हैं.’’

वह आदमी खीज कर बड़बड़ाने लगा, ‘‘हमारा देश भी अजीब है. बस सीट पर कपड़ा या रूमाल रख दो, तो आरक्षण हो जाता है.’’

डब्बा जब खचाखच भर गया और ट्रेन चलने को हुई, तो पास ही खड़े एक मुसाफिर ने पूछा, ‘‘भैया, तेरी बूआजी कब आएंगी? ‘‘आएंगी क्या…? बूआजी तो यहीं बैठी हैं,’’ मोहन बोला.

‘‘कहां बैठी हैं? हमें तो नजर नहीं आ रही हैं.’’ ‘‘कपड़े ही बूआजी हैं.’’

‘‘तो भाई ऐसा कर, अपनी बूआजी को गोद में बिठा ले,’’ उस आदमी ने तैश में आ कर कहा, ‘‘और हमें बैठने दे.’’

मोहन जिद पर अड़ गया, ‘‘नहीं उठाऊंगा. मैं ने बूआजी का टिकट लिया है,’’ मोहन की उस मुसाफिर से जम कर बहस होने लगी.

तभी वहां टिकट कलक्टर यानी टीसी आ गया. उस ने मोहन से कपड़े उठाने को कहा, तो मोहन ने जवाब दिया, ‘‘नहीं उठाऊंगा. मैं ने बूआजी का टिकट लिया है.’’

टीसी ने टिकट देख कर गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘टिकट बराबर है.’’ मोहन के चेहरे पर जीत भरी मुसकान आ गई.

टीसी ने गुजारिश करते हुए मोहन से कहा, ‘‘देखो भाई, आप सही हैं, टिकट सही है, पर दूसरे मुसाफिरों को सुविधा मिले, इसलिए अपनी बूआजी के कपड़े गोद में रख लो.’’

मोहन टीसी की बात ठुकराते हुए अपनी जिद पर अड़ा रहा, तभी टीसी के दिमाग में कुछ आया. वह मोहन से बोला, ‘‘जरा फिर से टिकट दिखाना.’’

मोहन ने उसे टिकट दे दिया. टीसी ने टिकट देख कर पूछा, ‘‘आप की बूआजी सीनियर सिटीजन हैं.’’

‘‘जी हां, मैं ने टिकट भी सीनियर सिटीजन का ही लिया है,’’ मोहन ने गर्व से जवाब दिया.

‘‘आप की बूआजी नजर नहीं आ रही हैं. मैं कैसे अंदाजा लगा लूं कि वे सीनियर सिटीजन हैं. कोई पहचानपत्र या आधारकार्ड वगैरह है?’’

अब तो मोहन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. वह हिचकिचाते हुए बोला, ‘‘जी, वह तो नहीं है.’’

टीसी ने मन ही मन सोचा कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे. ‘‘पहचानपत्र नहीं है. चलो, फाइन के साथ दोगुना किराया दे दो या इन कपड़ों को बूआजी मत कहो. अच्छी तरह समझ लो कि ये कपड़े हैं और चुपचाप उठा लो. अंधविश्वास छोड़ो, वरना जुर्माने के साथ दोगुना किराया भरो.’’

थकहार कर मोहन ने कपड़े उठा लिए, तो एक मुसाफिर उस सीट पर जा कर बैठ गया.

टीसी के जाते ही दूसरे मुसाफिर अंधविश्वास के खिलाफ चर्चा में मशगूल हो गए और इधर मोहन चुपचाप नजरें झुकाए शर्मिंदा होते हुए न चाहते हुए भी उन की बातें सुनता रहा.  Social Story

Superstition: कांवड़ यात्रा – बहुजन समाज को भटकाने का सफर

Superstition. आसान भाषा में समझें तो कांवड़ यात्रा का मतलब है एक संकल्प को मान कर किसी धार्मिक नगरी से गंगाजल कांवड़ में भर कर लाना और अपने घर के आसपास के मंदिर में उस जल से भोलेनाथ का अभिषेक करना.

चूंकि इस यात्रा में लिया गया संकल्प आप की इच्छाशक्ति का एक मजबूत हिस्सा होता है, तो जो भी इनसान इस यात्रा पर जाता है और इसे पूरी करता है, उसे ‘भोले का सेवक’ होने का समाजिक तमगा हासिल हो जाता है.

लेकिन यही कांवड़ यात्रा का एकलौता सच है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. चूंकि धर्म और सियासत का गठजोड़ भारत जैसे देश में बहुत ज्यादा मजबूत है तो इसी धर्म और उस को मानने वाले लोगों को राजनीति से जुड़े लोग अपना वोट बैंक बनाने की पुरजोर कोशिश करते हैं.

जिस तरह से पिछले एक दशक में कांवड़ यात्रा को महामंडित किया गया है, तो कहीं न कहीं यह महसूस होता है कि यह सब आस्था तो नहीं है, बल्कि सरकारों की ऐसी सोचीसम झी चाल लगती है, जिस में बहुजन समाज के लोगों को ‘भोले का सेवक’ होने का लालच दे कर उन्हें उन की मूल समस्याओं से भटकाया जा सके.

कर्ज ले कर कांवड़ ढोना

अगर हमारे देश के 80 करोड़ लोग मुफ्त सरकारी राशन पर पल रहे हैं, तो इस समाज के नौजवान कांवड़ यात्रा का खर्च कहां से उठा रहे हैं? यहां पर होड़ काम करती है. जैसे ही पता चला कि गांव के 15-20 लोग समूह बना कर कांवड़ यात्रा पर जा रहे हैं, तो अन्य लोगों में यह कीड़ा कुलबुलाने लगता है कि इस बार तो हम भी यह भगीरथ काज कर ही डालें.

पर कांवड़ यात्रा का खर्च कहां से निकले? अमूमन होता यह है कि वंचित समाज के गरीब घरों में चूंकि नौजवान पीढ़ी का अपने गांवदेहात में कोई उजला भविष्य नहीं होता है, तो ज्यादातर एकदूसरे के सहारे ऐसे किसी राज्य में कमाने चले जाते हैं, जहां कम ही सही रैगुलर आमदनी होती रहे. पर जब कोई इन घरों से कांवड़ यात्रा करने की इच्छा जाहिर करता है, तो आस्था के नाम पर 5,000-6,000 रुपए की एक्स्ट्रा चपत लग ही जाती है.

पर यह आस्था मजबूत कैसे होती है? अगर औरतों की बात करें तो गरीब घरों की निचले तबके की जवान लड़कियां जब शहरों में ऊंची जातियों के घरों में काम करती हैं, तो वे  झाड़ूबुहारी करने की आड़ में देखती हैं कि उन की अमीर मालकिन बहुत पूजा करती हैं. बस, यही सब देख कर उन की धर्म के प्रति आस्था और मजबूत होती है.

यहीं से घर के बेरोजगार नौजवानों पर कांवड़ यात्रा करने का दबाव पड़ता है कि क्या पता गंगाजल की ताकत से उन की गरीबी की शुद्धि हो जाए. जब से ऐसे समाज के लोग दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में कमाने गए हैं, तब से ऐसी धार्मिक यात्राओं में इस तबके की भागीदारी बहुत ज्यादा बढ़ी है.

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि जो निचली जातियां सदियों से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए अगड़ों से लड़ रही हैं, वे अचानक से कांवड़ यात्रा और धर्म के लिए क्यों लड़ने लगी हैं?

इस का जवाब है ‘हिंदू होने की फीलिंग’. देश में जब भी कोई धार्मिक उत्सव होता है या दंगा होता है तो बहुजन समाज के नौजवानों को  झंडा उठाने का सौभाग्य प्रदान किया जाता है. हाल ही में नीट आंदोलन में जब पुलिस ने जहां भी लाठीचार्ज किया था, वहां इसी तबके के नौजवान सब से ज्यादा पिटे थे.

ऐसे ही 22 जुलाई, 2022 के दिन उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक बेकाबू डंपर ने कांवडि़यों को रौंदा डाला था. इस हादसे में 6 कांवडि़यों की मौत हो गई थी, जबकि 2 गंभीर रूप से घायल हो गए थे. मरने वालों में 2 जाटव, 3 गड़ेरिया और एक ब्राह्मण था. इन की उम्र 22 से 40 साल के बीच थी.

तनाव और तनातनी

कांवड़ ढोना है या कानूनगो बनना है? सीधी सी बात है कि नई पीढ़ी को पढ़ाईलिखाई कर के समाज निर्माण में अपना योगदान देना है या धर्म का  झंडा उठा कर सड़कें नापनी हैं?

एक यूट्यूब चैनल पर एक छोटका पत्रकार भगवाधारी कांवडि़यों की जाति पूछ रहा था. कोई पासी था, कोई कुम्हार, कोई यादव तो कोई और निचली जाति का. सब पक्की सड़क किनारे भेड़चाल कर रहे थे. चेहरे पर कोई हावभाव नहीं, आंखों में कोई चमक नहीं, ऊपर से उस छोटका पत्रकार के जाति को ले कर सवाल पूछने पर कतरा रहे थे, शरमा रहे थे.

हो सकता है यह उन कांवडि़यों की थकान हो इतनी देर तक चलने की, जिस से उन में तनाव पैदा होता है और यही तनाव छोटी सी घटना होने पर उग्रता का रूप ले लेता है.

रविवार, 2 अगस्त, 2026 की देर रात हापुड़ रोड पर तिरंगा गेट के पास बुलंदशहर के कांवडि़यों के 2 गुटों में कहासुनी के बाद मारपीट हो गई थी. बाद में पुलिस ने कांवडि़यों को सम झाबु झा कर शांत किया था.

इसी तरह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में अब्दुल कलाम चौक के पास हरिद्वार की ओर से आ रही कार ने कांवड़ यात्रियों को साइड मार दी थी, जिस से कांवड़ खंडित हो गई थी.

इस के बाद गुस्सा कांवडि़यों ने कार सवार यात्रियों के साथ मारपीट की और फिर कार में तोड़फोड़ की. मौके पर पहुंची पुलिस ने कार चालक को किसी तरह से बचाया था.

फुसलाने वाला नजरिया

जब धर्म पर राजनीति हावी होती है तो लोगों के कंधे पर  झूल रहे  झंडे भी रंग बदल लेते हैं. आप नजर उठा कर देखेंगे, तो पता चलेगा कि कोई तिरंगा उठा कर चल रहा है, तो किसी जत्थे में अंबेडकरवाद का नीला  झंडा चमक रहा होता है. कोई धरती मां की फोटो हाथ में थामे है, तो कोई सेना के जवानों के नाम इस यात्रा को समर्पित कर रहा होता है.

पर आखिर में मिलता क्या है? इस पूरी यात्रा से देश में कौन सा निर्माण हुआ? कहीं भी एक ऐसी ईंट लगी, जिस ने भविष्य की बुनियाद मजबूत हुई हो?

बिलकुल नहीं. हैलीकौप्टर से कांवडि़यों पर पुष्पवर्षा कराने का ढोंग सरकारी खजाने पर सरेआम सेंध लगाने जैसा है. जो पैसा बहुजन समाज की नई पीढ़ी को समाज की मुख्यधारा से जोड़ सकता था, वह उन्हें हाईवे को पैदल नापने के लिए मजबूर कर रहा है. Superstition

Hindi Satire : ग्रहों का बौस – जोशीजी को कौन समझाए

Hindi Satire. लोगबाग जमीनी चिंता से नहीं, बल्कि आसमानी चिंता से ज्यादा त्रस्त रहते हैं. उन्हें हरदम डर लगा रहता है कि आसमान में ठिया जमाए ग्रह कहीं उन से नाराज न हो जाएं. ऊपर बैठे 9 में से न जाने कब और कौन सा ग्रह उन से नाराज हो जाए और अच्छीभली जिंदगी में मुसीबत खड़ी कर दे. ग्रहों की नाराजगी बहुत महंगी पड़ती है. वे चाहें तो अच्छे पढ़ाकू विद्यार्थी को परीक्षा में फेल कर दें, अच्छीभली नौकरी छुड़वा दें, धंधे में नुकसान करवा दें या फिर दिवालिया ही बना दें. ज्यादा ही नाराज हो गए तो फिर बिस्तर से चिपका दें या हमेशा के लिए ही सुला दें.

इसलिए वे सालभर ग्रहों को शांत करने के लिए तरहतरह के जतन करतेफिरते हैं. वे धरती की परवा नहीं करते, जिस पर उन का शरीर टिका हुआ है और जिस पर वे दिनरात अत्याचार करते रहते हैं. आखिर ज्योतिषियों ने धरती का डर जो नहीं बताया है. उन की निगाह में ऊपर बैठे ग्रह ही सब के बौस हैं.

एक हैं जोशी. ये बताते हैं कि उन का असली सरनेम कभी ज्योतिषी था. दूसरों की जन्मकुंडली पढ़ना उन का खानदानी धंधा था. पता नहीं वे खुद की कुंडली नहीं समझ पाए या दूसरों से नहीं

पढ़ा पाए, इसलिए समय के साथ घिसतेघिसते जोशी हो गए. ये जोशीजी हरदम शोकमुद्रा लादे फिरते हैं क्योंकि आसमान में बैठा कोई न कोई ग्रह इन पर नाराज रहता है. इन दुखीराम पर मंगल कई बार नाराज हो चुका है.

बचपन के खेल का वाक्य ‘एक का पीछा साढ़े सात दाम’ इन के मंगल पर कभी लागू नहीं होता. इन का अंदाजा भी इतना सटीक है कि जरा सी छींक आई तो समझ जाते हैं कि शुक्र ग्रह फेवर में नहीं है और लग जाते हैं शुक्र ग्रह को खुश करने में. कभी उपवास, कभी अंगूठी तो कभी पूजापाठ. इन के सामने शनि का नाम भी ले लें तो मारे डर के पीले पड़ जाते हैं. इसलिए भूल कर भी शनिवार नहीं बोलते. कंप्यूटर में फीड किए शब्द की तरह या तो साफ सैटरडे कहते हैं या फिर रविवार के पहले का, शुक्रवार के बाद का दिन.

वैसे भी, शनि सब से खूंखार ग्रह माना जाता है. दूसरे ग्रह तो ट्वैंटीट्वैंटी मैच खेल कर अगला शिकार ढूंढ़ने में लग जाते हैं, लेकिन शनि महाराज टैस्ट क्रिकेट की तरह लंबे समय तक जमे रहते हैं. साढ़े 7 साल. नतीजा निकलेगा ही, इस बात की गारंटी नहीं है. इसलिए लोग सालभर डोरटूडोर तेल मांगने वाले शनि महाराज को तेल की किस्त बांध देते हैं.

जोशीजी का मानना है कि जब भी उन की तबीयत गड़बड़ होती है तो वे समझ जाते हैं कि शुक्र नाराज हैं. हाथपैर टूटे, तो यह शनि के कोप का नतीजा है. दूसरी नौकरी के लिए इंटरव्यू में फेल हो गए, तो यह गुरू का गुस्सा है. अनचाहा खर्च हुआ यानी बुध ने जेब काट ली. किसी से झगड़ा हुआ है तो राहु को ढंग से नहीं खुश किया होगा.

एक बार उन पर सूर्य की कुदृष्टि पड़ गई. वैसे सूर्य पर जब केतु नाराज होता है तो वह मुंह छिपा लेता है. समझदार लोग इसे सूर्यग्रहण कहते हैं, लेकिन वही सूर्य जोशी पर रुष्ट हो गया. उन की आंखें लाल, सिरदर्द, बदन गरम, हरदम प्यास. दौड़ेदौड़े पंडित के पास गए. पंडितों के पास हर मर्ज की दवा होती है, जो डाक्टरों के पास भी नहीं होती. वे केतु को प्रसन्न करने का इलाज नहीं बताते, बल्कि सूर्य को मनाने का तरीका जानते हैं.

डाक्टर दवा खाने की सलाह देते हैं लेकिन पंडित तो खिलाने को कहते हैं यानी उन्हें स्वयं को खिलाने को. उन के नुस्खे में पीडि़त के लिए हवन, पाठ और उपवास होता है. वे तो चौकी पर बैठ कर सूर्य से पीडि़त की सिफारिश करते हैं. तो जोशीजी को पंडित ने दवा की पर्ची लिख दी और डाक्टरों के अनुसार तयशुदा दुकानदार से ही खरीदने को कहा. पूरे एक सप्ताह तक हवन होता रहा. इसलिए दफ्तर की छुट्टी. चूंकि सूर्य का प्रकोप था, इसलिए रविवार को उपवास करने को कहा. बेचारे जोशीजी.

एक रविवार ही तो मिलता है, जब भरपेट माल उड़ाने को मिलता है, लेकिन सूर्य देवता को प्रसन्न करने में परिवार के दूसरे सदस्यों को माल उड़ाते देख वे मन मसोस कर रह जाते. उन्हें समझाने की जरूरत नहीं है भले ही आप के अच्छे मित्र ही क्यों न हों. वे आप पर उखड़ पड़ेंगे. यदि वे किसी समझदार की बात मान लें तो सूर्यदेव उन्हें कभी भी तंग नहीं करेंगे. बस, छाता तान कर बाहर निकलें. यदि आप फिर भी समझाएं तो सुनने को मिलेगा, ‘‘तुम्हें जरूर विदेशों से पैसा मिलता है. तुम जैसे लोगों के कारण ही भारत की दुर्दशा हो रही है.’’ और वे अज्ञात भूतकाल में गुम हो जाएंगे जब देश में दूध की नदियां बहती थीं, सोने के पहाड़ हुआ करते थे, चंदन के जंगल हुआ करते थे.

उन की राय में छाते से सूर्य को खुश करने की सलाह देने वालों के कारण ही नदियां गटर बन गई हैं और पहाड़ों के सिर कट गए. जंगलों की हजामत हो रही है. ‘‘देखना 9 के 9 ग्रह मिल कर जब तुम पर हमला बोलेंगे न, तब पंडितों के यहां चक्कर लगालगा कर जूते घिस जाएंगे,’’ और वे दुर्वासा बन कर कोई श्राप देंगे.

वे ये सब खटकर्म इसलिए करतेफिरते हैं ताकि सारे ग्रह एकमत से खुश हो कर उन्हें नौकरी में प्रमोशन दिलवा दें, लेकिन ऐसा होता नहीं. हर साल कोई और ही प्रमोशन ले जाता. उन का जूनियर तक उन से आगे बढ़ गया. उन्हें मिले भी तो कैसे? जिन ग्रहों को वे पूजते हैं, वे ही उन की राह के रोड़े बन जाते हैं. जगराते के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती, इसलिए दफ्तर में झपकियां लेते रहते. उपवास की कमजोरी की वजह से औफिस का काम ठीक तरह से नहीं कर पाते. जबतब बीमार पड़ते और छुट्टी लेते, सहकर्मियों पर झल्लाते और बौस की डांट खाते. जाहिर है उन्हें प्रमोशन नहीं मिलता.

उन की राय में कभी शुक्र नाराज तो कभी गुरू. मंगल भी पीछा नहीं छोड़ता. उन पर यदि राहु खफा हुआ तो उन के लिए पूर्णिमा को भी अमावस्या होती है. इस बार प्रमोशन लैटर आए. बौस ने एकएक कर सब को केबिन में बुलाया और लैटर दिए. जब बौस के केबिन में जाने की बारी आई तो पहले जोशीजी ने तमाम अंगूठियों और तावीजों को चूमा, फिर सभी ग्रहों को याद किया और अपनी ओर उन का ध्यान खींचा, लेकिन जो होना था वही हुआ.

सालाना परंपरा के अनुसार केबिन से मुंह लटकाए बाहर निकले यानी इस बार भी ग्रहों ने साथ नहीं दिया. उस दिन बुधवार था. उन्होंने कारण ताड़ लिया और कहा, ‘‘अब की बुध ने साथ नहीं दिया. प्रमोशन के लैटर तो कल ही आए थे. दिए आज हैं, इसलिए सब गड़बड़ हो गया. कल देते तो प्रमोशन पक्का था. लगता है मेरी पूजा में ही कुछ कमी रह गई होगी वरना उसे तो मुझ से खुश होना था. अब दूसरे पंडित के पास जाऊंगा और दूनी भक्ति से बुध की पूजा किया करूंगा.’’

यदि कोई उन्हें समझाता कि अगर उन्हें प्रमोशन चाहिए तो वे इन ऊपरी ग्रहों की खुशामद करने के बजाय सब ग्रहों के बौस को खुश रखें. यह बौस आसमान में नहीं रहता, बल्कि धरती पर रहता है और हम इसे देख सकते हैं, छू सकते हैं, इस से बात कर सकते हैं. लेकिन वे सलाह देने वाले को इस तरह देखते मानो वह पगला गया हो. ग्रहों का कोई बौस कैसे हो सकता है? उसे खुश कैसे किया जा सकता है? ऐसा होता भी है कभी?

दफ्तर का बौस. जी हां, वही है सब ग्रहों का बौस. जोशीजी उसे खुश रखें तो उन के सारे दुख दूर हो जाएं. एक तो उसे अपने काम से खुश रखें यानी समय पर दफ्तर आएं और देर से जाएं. काम ढंग से और समय पर करें. ग्रहों को बारबार याद करने के बजाय बौस को हर सुबह आने पर गुडमौर्निंग कहें. जाने के पहले गुड डे कहें. उन का जन्मदिन याद रखें और दफ्तर में ही केक मंगवाएं. उन के विवाह की सालगिरह के दिन उन्हें बधाई दें. दफ्तर की पार्टी में उन की पसंद के गाने गाएं. चुटकुले सुना कर उन्हें हंसाएं. उन के ड्रैस सैंस की तारीफ करें. अपने लायक काम के बारे में पूछें. कभी बाहर जाएं तो उन के लिए मिठाई लाया करें. देखो, वह खुश होते हैं या नहीं, प्रमोशन आसमान से नहीं, धरती से मिलेगा. कोई एक तरीका आजमाएं. अगली बार बौस के केबिन से खुशीखुशी लौटेंगे.

बहरहाल, बहुत दिन हुए जोशीजी नजर नहीं आए. इसलिए कोई नहीं जानता कि वे अब किस बौस को खुश करने में लगे हैं, ऊपर वाले या दफ्तर वाले. Hindi Satire

Superstition: अंधविश्वास के घोड़े, तरक्की में रोड़े

Superstition. राम सजीवन के घर बेटा पैदा हुआ. पंडित ने पोथीपत्रा पलटने के बाद कहा, ‘‘बेटे की नाक के दाहिनी ओर तिल है. ज्योतिष विद्या के अनुसार यह बहुत शुभ है. ऐसे तिल वाला इनसान सुखी और मालामाल होता है.

‘‘इस बच्चे को जिंदगीभर रुपएपैसे की कमी नहीं होगी. अगर नाक के बाएं हिस्से पर तिल होता, तो इसे जिंदगीभर कड़ी मेहनत करनी पड़ती. फिर भी यह सुखी न रहता. कई बार मुश्किल हालात का सामना भी करना पड़ता. अगर आप के बेटे की नाक के बीच में तिल होता, तो यह जिंदगीभर सफर ही करता रहता.’’

राम सजीवन बेहद खुश हुए कि बेटे को रुपएपैसे की कमी नहीं रहेगी. वह हमेशा खुशहाल रहेगा. बेटा बड़ा हो कर स्कूल जाने के काबिल हुआ, तो भी उसे स्कूल नहीं भेजा गया.

गांव के सरपंच ने कहा, ‘‘इसे स्कूल भेजो. अगर यह पढ़ेगा नहीं, तो जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा. इस के साथ के बच्चे स्कूल जाने लगे हैं.’’

यह सुन कर राम सजीवन कहता, ‘‘सरपंचजी, आप ने सुना नहीं कि पंडितजी ने इस के जन्म पर क्या कहा था. इसे कभी भी रुपएपैसे की कमी नहीं रहेगी. इस की नाक के नीचे दाहिनी ओर तिल है. आखिर, पढ़लिख कर करेगा क्या… कोई सरकारी नौकरी पा जाएगा बस.’’

राम सजीवन ने पंडित की बात मान कर अपने बेटे को स्कूल नहीं भेजा. उस के साथ के कई बच्चे पढ़लिख कर अफसर बन गए, लेकिन राम सजीवन का बेटा अपने खेत में घास काटता रह गया.

इसी तरह की एक और घटना है. कामचोर गनपत को गांव के पुजारी शिवशंकर ने बताया कि अगर धनदौलत चाहिए, तो कमल पर बैठे गणेशजी की पूजा करो, जल्द ही मालदार हो जाओगे. पर इस बात का ध्यान रहे कि शरीर पर मात्र धोती होनी चाहिए और कोई कपड़ा नहीं होना चाहिए. सुबह और शाम को सूरज डूबते ही रात के 10 बजे तक मंत्र के साथ लगातार हवन करो.

गनपत को अमीर बनने का जुनून सवार हो गया. वह कमल पर बैठे गणेश की तसवीर के सामने पूजा करने के लिए बेचैन हो गया. बाजार में कमल पर बैठे गणेश की तसवीर खूब ढूंढ़ी, पर उसे नहीं मिली.

एक दुकानदार को उस ने कहा कि जितना भी पैसा लगे, ले लो और कमल पर बैठे गणेश वाली तसवीर मंगाओ.

उस ने गनपत से 3 सौ रुपए ले कर कमल पर बैठे गणेश की तसवीर मंगा कर दे दी, जबकि ऐसी तसवीर 10 रुपए में आसानी से मिल जाती है.

गनपत सुबहशाम घर के सारे काम छोड़ कर केवल धोती पहन कर गणेश की पूजा करता. शरीर का ऊपरी हिस्सा खुला होने की वजह से उसे मच्छरों ने खूब काटा, जिस से उसे मलेरिया बुखार हो गया.

अंधविश्वास के चक्कर में वह अमीर तो नहीं बना, लेकिन घर में जो पैसा था, वह भी उस के इलाज में चला गया.

कीर्ति का बेटा पढ़ने में कमजोर होने के साथसाथ फुजूल की बातों में ज्यादा ध्यान देता था. स्कूल से रोज उस की शिकायत आती थी कि वह होमवर्क नहीं करता.

कीर्ति एक बाबा के पास अपनी सहेली के साथ बेटे को ले कर दिखाने गई. बाबा ने 501 रुपए लिए और उसे एक लौकेट दे दिया और कहा कि इसे हमेशा गले में पहना कर रखो. बेटा पढ़ने लगेगा.

उस बाबा ने यह भी कहा कि अपने बेटे की जगह तुम हरे रंग के गणेशजी की पूजा करो, क्योंकि बुद्धि का कारक बुध ग्रह होता है और हरे रंग का कारक बुध है. अगर ऐसे लोग हरे रंग के या पन्ने से बने गणेशजी की पूजा करें, तो उन के बुध ग्रह से संबंधित सभी दोष कम हो जाएंगे और इस का उन्हें लाभ मिलेगा.

कीर्ति अपने बच्चे की ओर ध्यान देने के बजाय बाबा के चक्कर में पड़ गई. गणेश की पूजा में ज्यादा से ज्यादा समय गंवाने लगी. नतीजतन, उस का बेटा स्कूल के हर टैस्ट में फेल होता गया.

पुराने खयालों की श्यामा की नईनवेली बहू आई. महल्ले के लोगों ने देख कर खूब सराहा कि श्यामा की बहू बहुत सुंदर और गुणी है. लेकिन महल्ले की राधा से रहा नहीं गया और उस ने कह दिया, ‘‘बाकी सब तो ठीक है, लेकिन बहू के दाएं गाल पर तिल है. पता नहीं, श्यामा को फलेगा कि नहीं.’’

श्यामा का भी ध्यान बहू के तिल पर गया और वे परेशान हो उठीं. दूसरे ही दिन वे बीमार पड़ गईं. नातेरिश्तेदार कहने लगे कि बहू के कदम पड़ते ही सास बीमार पड़ गई. न जाने क्या होगा.

पढ़ीलिखी होने की वजह से बहू रत्ना ने घर वालों से कहा, ‘‘यह आप लोगों का वहम है. तिल होने से कुछ नहीं होता. आप लोगों को परेशानी है कि मेरे दाएं गाल पर तिल है. मैं कल ही यह तिल हटवा दूंगी.’’

सास ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या ऐसा भी हो सकता है?’’

‘‘हो सकता है. लेजर मशीन से शरीर के किसी भी हिस्से का तिल हटाया जा सकता है,’’ रत्ना ने कहा.

रत्ना दूसरे दिन ही ब्यूटीपार्लर में जा कर दाएं गाल का तिल हटवा कर घर आ गई. उस की सास ने देखा कि गाल पर तिल अब नहीं है. उस ने राधा को बुला कर दिखाया और कहा, ‘‘देख, मेरी बहू के दाएं गाल पर तिल नहीं है.’’

राधा मुंह बना कर चली गई. तिल से घर में कुछ हुआ नहीं, लेकिन बेवजह तिल हटवाने के लिए हजारों रुपए चले गए.

शंकर का कारोबार नहीं चल रहा था. वह परेशान रहता था. उस की पत्नी आरती ने कहा, ‘‘जरूर दुकान पर कोई टोटका कर गया है, इसलिए दुकान नहीं चल रही है. पड़ोसन संध्या बता रही थी कि एक बाबा हैं, जो लोगों की परेशानियां हल कर देते हैं.’’

शंकर ने कहा, ‘‘मैं बाबाओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता. सब के सब ढोंगी होते हैं. पिछली बार भी तुम्हारे कहने पर एक बाबा के पास गया था, तो दुकान तो चली नहीं, लेकिन 10 हजार रुपए का नुकसान हो गया था.’’

आरती ने एक दिन बाबा से मिल कर सारी बातें बताईं. बाबा ने कहा कि तंत्र शास्त्र में ऐसे कई टोटके हैं, जिन से ऐसी सभी समस्याएं तुरंत हल हो जाती हैं. तुम्हारी मुसीबत का हल निकालने के लिए 5 हजार रुपए खर्च करने होंगे.

आरती ने शंकर को सारी बातें बताईं. पहले तो वह तैयार नहीं हुआ, लेकिन बाद में वह पत्नी के दबाव के आगे  झुक गया. 5 हजार रुपए देने के बाद भी शंकर की माली हालत में कोई सुधार नहीं आया.

थकहार कर शंकर ने अपने दोस्त हरीश को सारी बातें बताईं. उस ने सलाह दी कि तुम जूस या फिर आइसक्रीम की दुकान खोलो. आसपास ऐसी दुकान नहीं है.

शंकर ने वैसा ही किया और उस की दुकान चल निकली.

दरअसल, कोई तांत्रिक, साधु, पंडित और ज्योतिषी घाटे में चल रहे उद्योगधंधे को न तो फायदे में पहुंचा सकते हैं और न ही कुछ और कर सकते हैं. टोटके से केवल समय और पैसे की बरबादी होती है. अंधविश्वास के खूंटे में बंधे रहने से न तो समाज की तरक्की होगी और न ही देश की.

रमेश कुमार ‘रिपु’

Superstition: जानलेवा दगना

Superstition: मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय में अगर ठंड के समय जब नवजातों को निमोनिया या डबल निमोनिया हो जाता है, तब उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है.

पेटदर्द, दस्त की शिकायत पर परिवार वाले बीमार बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल न ले जा कर नवजातों और बच्चों को को ठीक करने के लिए दगना कुप्रथा का सहारा लेते हैं.

आदिवासियों का मानना है कि बच्चों को यह समस्या किसी बीमारी की वजह से नहीं, बल्कि रूहानी ताकत के चलते होती है. ऐसे में दागने से उन के बच्चों की यह बीमारी ठीक हो जाएगी.

जब नवजात को सांस लेने में तकलीफ होती है या दस्त के कारण उस के पेट की नसें बाहर दिखने लगती हैं, तब उन्ही नसों को गरम लोहे की कील, काली चूड़ी, नीम या बांस की डंठल से दागा जाता है.

यह काम गांव में ?ाड़फूंक करने वाली विशेष समुदाय की महिलाएं करती हैं. इन महिलाओं को नवजातों की मालिश के अलावा दागने की जिम्मेदारी दी जाती है. इन इलाकों में काली चूड़ी से टोटका दूर करने की भी कुरीति चलन में है.

दागना है खौफनाक

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल गांवों में यह प्रथा छोटे बच्चों के लिए बहुत पीड़ादायी है और ज्यादातर मामलों में दागे जाने वाले बच्चों और बच्चियों की मौत हो जाती है, क्योंकि वे दर्द सहन नहीं कर पाते हैं.
जरा सोचिए, गरम सलाखों से महज कुछ ही दिनों के मासूम को अगर जगहजगह पर दाग दिया जाए, तो उसे कितनी तकलीफ होती होगी. उस तकलीफ को आप सिर्फ एहसास ही कर सकते हैं, जबकि वे मासूम तो बोल कर बयां भी नहीं कर सकते हैं.

दर्दनाक घटनाएं

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में सिंहपुर थाना क्षेत्र का एक गांव है कठौतिया. इसी गांव में 3 महीने की बच्ची रुचिका कोल को दागने की एक घटना हुई थी. बच्ची की मां रोशनी कोल का कहना है कि बच्ची को सांस लेने में आ रही दिक्कत की वजह से उसे दागने वाली स्थानीय महिला को दिखाया.

लेकिन दागने के बाद बच्ची की हालत बेहद नाजुक हो गई, तो उसे शहडोल के जिला सरकारी मैडिकल कालेज में भरती करवाया गया, जो गांव कठौतिया गांव से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन बच्ची को नहीं बचाया जा सका.

इस मामले में डाक्टरों का कहना है कि सलाखों से दागने के बाद बच्ची के निमोनिया का इन्फैक्शन और बढ़ गया, जो उस की मौत की वजह बन गया.

इस घटना के कुछ दिन बाद ही बाद कठौतिया गांव से 3 किलोमीटर दूर सलामतपुर गांव में दागने का एक और मामला आया. इस मामले में 3 महीने की बच्ची को 24 बार गरम सलाखों से दागा गया था, पर बाद में उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उस की भी मौत हो गई.

जागरूकता की कमी

एक संस्था गौतम बुद्ध जागृति समिति के सचिव श्रीधर पांडेय ने बताया कि स्वास्थ्य महकमे ने दागने जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए आशा कर्मी, एएनएम और आंगनबाडि़यों को घरघर निगरानी का जिम्मा सौंपा है, जो बच्चों के बीमार होने पर उन्हें सीधे अस्पताल ले जाने में मदद करेंगी.

लेकिन बीमार बच्चों के परिवार वाले चुपके से बच्चे को झाड़फूंक करने वाली महिला के पास ले जाते हैं, जहां दागने की वजह से हालत बिगड़ने पर ही वे लोग बच्चे को अस्पताल ले जाने को मजबूर होते हैं.

स्वास्थ्य महकमे से जुड़ी एक आशाकर्मी का कहना कि इस क्षेत्र में लंबे से समय से चली आ रही इस कुप्रथा के चलते ही यहां के लोग अस्पताल का रुख कम ही करते हैं.

श्रीधर पांडेय बताते हैं कि दगना कुप्रथा को ले कर बुजुर्गों में आज भी बड़ा विश्वास देखने को मिल रहा है. प्रशासन ने भले ही उन्हें जागरूक करने के लिए गांव में रैली और दीवारों पर नारे लिखवाए हों, लेकिन जो विश्वास उन के मन में बैठा है उसे बाहर निकलना बड़ी चुनौती है.

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि नवजातों के अलावा उन के शरीर के दर्द, जोड़ों का दर्द समेत दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए उन के पास सब से सटीक इलाज दागना ही होता है.

इस मसले पर यहां के जागरूक स्थानीय निवासियों और प्रशासन का कहना है कि आदिवासी इलाकों में होने वाली दागने की कुप्रथा दशकों पुरानी है, जिस की रोकथाम और जागरूकता के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य महकमे सहित दर्जनों एनजीओ भी काम कर रहे हैं. फिर भी बच्चों के साथ होने वाली दागने की घटनाओं पर रोक नहीं लग पा रही है.

कुपोषण है वजह

श्रीधर पांडेय बताते हैं कि ज्यादातर गरीब आदिवासी परिवारों के बच्चे कुपोषण से ग्रसित होते हैं. इस का कारण गर्भावस्था के दौरान मां का खानपान है, क्योंकि इन महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है और बच्चा जन्म लेने के बाद कुपोषण का शिकार हो जाता है, जिस की वजह से बच्चा बारबार बीमार पड़ता है.

बच्चे के बीमार पड़ने पर यहां के लोग इलाज के लिए तांत्रिकों, ओझाओं वगैरह के पास जाते हैं या झोलाछाप डाक्टरों के पास ही जाते हैं. जहां कई बार सलाखों से दागने के उपाय के साथ इलाज किया जाता है.

कानून का डर नहीं

दगना प्रथा की रोकथाम के लिए बच्चे के परिवार वालों और दागने वाली महिला तांत्रिकों के खिलाफ आपराधिक मामलों में केस भी दर्ज किए जाते हैं. इस के बावजूद इस प्रथा पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.

शहडोल जिले की बंधवा की रहने वाली रामबाई अपने मायके उमरिया के बकेली गई थी. यहां उस के बच्चे राजन की तबीयत बिगड़ गई. गांव में इलाज नहीं मिलने पर रामबाई की मां दाई को बुला लाई.

दाई ने घर में गरम चूड़ी से बच्चे को पेट पर कई बार दागा. इस के बाद उस बच्चे की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और उसे झटके आने लगे.

डेढ़ महीने के इस बच्चे के मांबाप अस्पताल ले गए जहां डाक्टरों ने पाया कि उस बच्चे की सांसें काफी तेज चल रही थीं. पेट पर सूजन और दागने के काफी निशान थे. बच्चा बेहद गंभीर हालत में भरती किया गया था. इस वजह से उस ने दम तोड़ दिया.

अस्पताल प्रबंधन ने इस की जानकारी पुलिस को दी. इस मामले में शहडोल पुलिस ने गांव की झाड़फूंक करने वाली महिला सहित बच्चे के दादा और मां के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

भयावह हैं आंकड़े

पत्रकार अनुराग कुमार श्रीवास्तव ने शहडोल, उमरिया और अनूपपुर जिलों में ऐसी घटनाओं पर जानकारी इकट्ठा करने के लिए कई लोगों से बातचीत की और दागना प्रथा से प्रभावित आंकड़ों को जमा किया.

पत्रकार अनुराग कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि पिछले 5 साल में तीनों जिलों से तकरीबन 4,000 बच्चे दगना कुप्रथा का शिकार हो चुके हैं. इन में से तकरीबन 2 दर्जन बच्चे अपनी जान तक गंवा चुके हैं. इस के बावजूद यह कुप्रथा रुकने का नाम नहीं ले रही है.

ओडिशा भी पीछे नहीं

श्रीधर पांडेय जिस संस्था से जुड़े हैं, वह ओडिशा राज्य में भी लोगों को अंधविश्वास और कुपोषण से बचाव के मसले पर काम कर रही है. उन का कहना है कि ओडिशा में अंधविश्वास के चलते नवजात बच्चों को ‘बुरी आत्मा’ से बचाने के लिए गरम लोहे से दागा जाता है.

श्रीधर पांडेय के मुताबिक, ओडिशा स्थानीय भाषा में ‘चेंका’ कही जाने वाली प्रथा, आमतौर पर बच्चे के जन्म के 7 से 21 दिनों के बाद की जाती है. कभीकभार मातापिता तब तक इंतजार करते हैं, जब तक कि उन्हें बच्चे के पेट पर नीली इस दिखाई नहीं दे जाती, जिसे वे स्थानीय रूप से ‘पिल्ही’ नामक पेट दर्द की मूल वजह मानते हैं.

जब कोई बच्चा बीमार पड़ता है या नीली नस दिखाई देती है, तो समुदाय का मानना है कि बच्चे पर किसी आत्मा का असर है और गरम लोहे से बच्चे के पेट को दागने से आत्मा बाहर निकल जाएगी और बच्चा बुरी नजर से बच जाएगा. लेकिन ज्यादातर मामलों में बच्चों की मौत हो जाती है.

तोड़ आसान नहीं

सीनियर डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि अंधविश्वास से केवल गरीब और आदिवासी ही नहीं जकड़े हैं, बल्कि इस की जद में पढ़ेलिखों की एक भारी जमात भी शामिल है, इसलिए जब पढ़ालिखा इनसान अंधविश्वास का शिकार हो सकता है, तो गरीब आदिवासियों का अंधविश्वास में विश्वास करना आम बात है.

डाक्टर वीके वर्मा आगे कहते हैं कि सोशल मीडिया से ले कर पूरा तंत्र इस तरह के पोंगापंथ का शिकार है, इसलिए अंधविश्वास की दीवार को तोड़ना आसान नहीं है. वे दिल्ली प्रैस के अंधविश्वास के पोल खोलने वाले लेखों से बेहद प्रभावित रहते हैं. उन का मानना है कि अगर मीडिया अंधविश्वास को ले कर जनता को जागरूक करे, तो भी इस पर काफी लगाम लगाई जा सकती है. Superstition

Superstition: मेरी चाची बहुत अंधविश्वासी हैं और टोनाटोटका करती हैं

Superstition: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 25 साल की लड़की हूं और दिल्ली में रहती हूं. हमारे इलाके में ही थोड़ी दूर मेरी चाची भी रहती हैं. वे बहुत ज्यादा अंधविश्वासी हैं और हर दिन किसी न किसी तरह का टोनाटोटका करती रहती हैं. एक दिन तो वे किसी के घर के आगे सिंदूर में लिपटे नीबू छोड़ आईं. किसी ने उन्हें ऐसा करते देख लिया, तो वहां क्लेश हो गया. मेरे चाचाजी ने माफी मांगी तो लोगों ने चाची की जान छोड़ी. हम सब उन्हें समझासमझा कर थक गए हैं, पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है. इस तरह लोगों ने उन से दूरी बना ली है और उन का हुक्कापानी बंद कर दिया है. इस दुविधा से निकलने के लिए हम ऐसा क्या करें कि चाची को अक्ल आ जाए?

जवाब –

यह बहुत विकट समस्या है कि अंधविश्वासी लोग न तो खुद चैन से रहते हैं और न ही दूसरों को रहने देते हैं. जब समझाने से चाची कुछ नहीं समझ रहीं तो आप सभी उन से थोड़ी सख्ती से पेश आएं. जैसे दूसरों ने उन का हुक्कापानी बंद कर दिया है, वैसा ही कुछकुछ रुख आप लोग भी अपनाएं.

हालांकि, इसे भी वे किसी के किएकराए का असर मानते हुए फिर टोटके करेंगी, लेकिन इस बाबत उन्हें साफ लफ्जों में समझा दें कि अब आप लोग उन की बेजा हरकतें और ज्यादा बरदाश्त नहीं कर सकते. अंधविश्वासों की पोल खोलती पत्रिकाएं ‘सरिता’ और ‘सरस सलिल’ घर में रखें और ऐसे लेख व कहानियों की चर्चा तेज आवाज में करें, जिस से उन का ध्यान इस तरफ जाए.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Superstition

Superstition: धार्मिक कर्मकांड के चंगुल में नौजवान

Superstition: ‘‘बाबा, अगर यह पूजा करा दूं, तो नौकरी पक्की हो जाएगी न?’’

बिहार की राजधानी पटना के एक बड़े मंदिर के बाहर खड़े 25 साल के रोहित ने पुजारी से यह सवाल किया. बीटैक पास रोहित पिछले डेढ़ साल से नौकरी की तलाश में है. सरकारी इम्तिहान दिए, प्राइवेट इंटरव्यू दिए, लेकिन नतीजा वही, नौकरी नहीं मिली. अब रोहित के भरोसे की आखिरी डोर भगवान और कर्मकांड है.

यह कहानी सिर्फ रोहित की नहीं, बल्कि आज के लाखोंकरोड़ों नौजवानों की है. पढ़ाईलिखाई में अच्छे, तकनीक के इस्तेमाल में आगे, लेकिन जिंदगी की चुनौतियों के सामने जब हार महसूस होती है, तो वे धर्म और कर्मकांड की शरण में चले जाते हैं.

धर्म की ओर लौटते नौजवान

यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जो नौजवान इंटरनैट पर रील बनाता है, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की बातें करता है, वही मंदिर में मन्नत का धागा भी बांधता है. पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 22 साल की नेहा कहती है, ‘‘हम पढ़ेलिखे हैं, लेकिन कभीकभी लगता है कि कोई ताकत तो है, जो सब बदल सकती है. शायद पूजा करने से किस्मत भी बदल जाए.’’

मंदिरों में नौजवानों की बढ़ती भीड़ इस का सुबूत है. पूजापाठ के बाद सोशल मीडिया पर फोटो डालना, शिवभक्ति के गानों पर रील बनाना, यूट्यूब पर धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनना, यह नई पीढ़ी के रूटीन का हिस्सा बन गया है.

बेरोजगारी और निराशा की तरफ

बेरोजगारी इस सोच की सब से बड़ी वजह है. गांव का पढ़ालिखा लड़का जब शहर में स्ट्रगल करता है और नाकाम होता है, तो उस का भरोसा सिस्टम से ज्यादा ‘ऊपर वाले’ पर होने लगता है.

बिहार के औरंगाबाद के 27 साल के विकास की जबानी सुनिए, ‘‘मैं ने एमए किया. 3 बार शिक्षक भरती का फार्म भरा, लेकिन रिजल्ट नहीं आया. अब हर मंगलवार को हनुमानजी के मंदिर में जाता हूं. मन्नत मांगी है कि इस बार नौकरी मिल जाए.’’

आधुनिकता के साथ अंधविश्वास

तकनीकी युग में अंधविश्वास ने भी नए रूप ले लिए हैं. इंस्टाग्राम पर ‘शिवभक्त’ लिखने वाले नौजवान शनिवार को नीबूमिर्च जरूर टांगते हैं. बिल्ली रास्ता काट दे तो कार रोकी जाती है. नया बिजनैस शुरू करने से पहले मुहूर्त देखा जाता है. डाक्टर के इलाज के बाद भी श्रेय मंदिर और मजार को दिया जाता है.

एक रिटायर्ड डाक्टर का कहना है, ‘‘हम इलाज करते हैं, ठीक होना भगवान की मरजी है.’’

जब डाक्टर ही ऐसा मानते हैं, तो आम नौजवान क्या करेगा?

पढ़ेलिखे तबके में भी धार्मिकता की जड़ें

आज इंजीनियरिंग और मैनेजमैंट पढ़े नौजवान भी पत्थर की मूर्तियों से आशीर्वाद मांगते हैं. धार्मिक गुरुओं के प्रवचन, टीवी चैनल और सोशल मीडिया ने इस सोच को और गहरा कर दिया है. ‘संतोषी माता’ फिल्म से संतोषी माता की पूजा शुरू हुई. टीवी पर रामसीता के दर्शन होते ही लोग हाथ जोड़ने लगते हैं.

मुसलिम समाज भी घेरे में

सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि मुसलिम समाज के नौजवान भी धार्मिक कर्मकांडों में ज्यादा सक्रिय हुए हैं. रोजा रखना, मजार पर चादर चढ़ाना, दुआ के लिए ख्वाजा की दरगाह जाना, यह सब नई पीढ़ी की धार्मिक पहचान का हिस्सा बन रहा है.

धार्मिक शिक्षा का बढ़ता असर

मदरसे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थान बचपन से धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं. बच्चे मिट्टी की मूर्ति के सामने खड़े हो कर सरस्वती से विद्या मांगते हैं. यह धार्मिकता बड़े होने पर भी बनी रहती है.

मीडिया और धर्म का बिजनैस

धर्म अब उद्योग बन चुका है. टीवी चैनल 24 घंटे प्रवचन, कथा और कीर्तन दिखा रहे हैं. हर जगह बड़े यज्ञ, कीर्तन और प्रवचन हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर धार्मिक इंफ्लुएंसर्स करोड़ों के फौलोअर बना चुके हैं.

क्या है समाधान

अंधविश्वास नाम की सामाजिक बीमारी खतरनाक है. जरूरत है वैज्ञानिक सोच विकसित करने की. स्कूलकालेजों में तार्किक और वैज्ञानिक नजरिए की शिक्षा को मजबूत करना होगा. नुक्कड़ नाटक, सैमिनार और वर्कशौप के जरीए गांवों में जागरूकता फैलानी होगी. मीडिया को भी धार्मिक अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक जानकारी पर फोकस करना होगा.

आज का नौजवान लाभ तो विज्ञान से उठाता है, लेकिन इस का श्रेय ईश्वर और देवीदेवताओं को देता है. अगर हमें एक सजग और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो नौजवानों को वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा.

अगर नौजवानों में यह सोच पैदा नहीं होगी तो धार्मिक अंधविश्वास उन के दिमाग पर नैगेटिव असर डालेगा वे फैसले लेने से डरेंगे. कर्मकांड के चक्कर में अपना पैसा बरबाद करेंगे, जो उन्हें नकारा बना देगा. Superstition

बलि और हैवानियत का गंदा खेल

हमारे देश में सैकड़ों सालों से अंधविश्वास चला आ रहा है. दिमाग में कहीं न कहीं यह झूठ घर करा दिया गया है कि अगर गड़ा हुआ पैसा हासिल करना है, तो किसी मासूम की बलि देनी होगी. जबकि हकीकत यह है कि यह एक ऐसा झूठ है, जो न जाने कितनी किताबों में लिखा गया है और अब सोशल मीडिया में भी फैलता चला जा रहा है.

ऐसे में कमअक्ल लोग किसी की जान ले कर रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं. मगर पुलिस की पकड़ में आ कर जेल की चक्की पीसते हैं और ऐसा अपराध कर बैठते हैं, जिस की सजा तो मिलनी ही है.

सचाई यह है कि यह विज्ञान का युग है. अंधविश्वास की छाई धुंध को विज्ञान के सहारे साफ किया जा सकता है, मगर फिर अंधविश्वास के चलते एक मासूम बच्चे की जान ले ली गई.

देश के सब से बड़े धार्मिक प्रदेश कहलाने वाले उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में एक तथाकथित तांत्रिक ने2 नौजवानों के साथ मिल कर एक 8 साल के मासूम बच्चे की गला रेत कर हत्या कर दी थी और तंत्रमंत्र का कर्मकांड किया गया था. उस बच्चे की लाश को गड्डा खोद कर छिपा दिया गया था.

ऐसे लोगों को यह लगता है कि अंधविश्वास के चलते किसी की जान ले कर के वे बच जाएंगे और कोई उन्हें पकड़ नहीं सकता, मगर ऐसे लोग पकड़ ही लिए जाते हैं. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

अंधविश्वास के मारे इन बेवकूफों को लगता है कि ऐसा करने से जंगल में कहीं गड़ा ‘खजाना’ मिल जाएगा, मगर आज भी ऐसे अनपढ़ लोग हैं, जिन्हें लगता है कि जादूटोना, तंत्रमंत्र या कर्मकांड के सहारे गड़ा खजाना मिल सकता है.

समाज विज्ञानी डाक्टर संजय गुप्ता के मुताबिक, आज तकनीक दूरदराज के इलाकों तक पहुंच चुकी है और इस के जरीए ज्यादातर लोगों तक कई भ्रामक जानकारियां पहुंच जाती हैं. मगर जिस विज्ञान और तकनीक के सहारे नासमझी पर पड़े परदे को हटाने में मदद मिल सकती है, उसी के सहारे कुछ लोग अंधविश्वास और लालच में बलि प्रथा जैसे भयावाह कांड कर जाते हैं, जो कमअक्ली और पढ़ाईलिखाई की कमी का नतीजा है.

डाक्टर जीआर पंजवानी के मुताबिक, कोई भी इनसान इंटरनैट पर अपनी दिलचस्पी से जो सामग्री देखतापढ़ता है, उसे उसी से संबंधित चीजें दिखाई देने लगती हैं, फिर पढ़ाईलिखाई की कमी और अंधश्रद्धा के चलते, जिस का मूल लालच है, अंधविश्वास के जाल में लोग उल?ा जाते हैं और अपराध कर बैठते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता सनद दास दीवान के मुताबिक, अपराध होने पर कानूनी कार्यवाही होगी, मगर इस से पहले हमारा समाज और कानून सोया रहता है, जबकि आदिवासी अंचल में इस तरह की वारदातें होती रहती हैं. लिहाजा, इस के लिए सरकार को सजग हो कर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए.

हाईकोर्ट के एडवोकेट बीके शुक्ला ने बताया कि एक मामला उन की निगाह में ऐसा आया था, जिस में एक मासूम की बलि दी गई थी. कोर्ट ने अपराधियों को सजा दी थी.

दरअसल, इस की मूल वजह पैसा हासिल करना होता है. सच तो यह है कि लालच में आ कर पढ़ाईलिखाई की कमी के चलते यह अपराथ हो जाता है.

लोगों को यह सम?ाना चाहिए कि किसी भी अपराध की सजा से वे किसी भी हालत में बच नहीं सकते और सब से बड़ी बात यह है कि ऐसे अपराध करने वालों को समाज को भी बताना चाहिए कि उन के हाथों से ऐसा कांड हो गया और उन्हें कुछ भी नहीं मिला, उन के हाथ खाली के खाली रह गए.

धर्म बना देता है लोगों को गुलाम

सुप्रीम कोर्ट चाहे लाख कह ले कि हर वयस्क को प्रेम व विवाह का मौलिक अधिकार है और किसी बजरंगी, किसी खाप, किसी सामाजिक या धार्मिक गुंडे को हक नहीं कि इस अधिकार को छीने, मगर असल में धार्मिक संस्थाएं विवाह के बीच बिचौलिए का हक कभी नहीं छोड़ेंगी. विवाह धर्म की लूट का वह नटबोल्ट है जिस पर धर्म का प्रपंच और पाखंड टिका है और इस में किसी तरह का कंप्रोमाइज कोई भी धर्म नहीं सहेगा, सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कहे.

जो भी धर्म के आदेश के खिलाफ जा कर शादी करेगा, सजा सिर्फ उसे ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और रिश्तेदारों को भी मिलेगी. सब को कह दिया जाएगा कि इस परिवार से कोई संबंध न रखो. कोई पंडित, मुल्ला, पादरी शादीब्याह न कराएगा. श्मशान में जगह नहीं मिलेगी, लोग किराए पर मकान नहीं देंगे, नौकरी नहीं मिलेगी.

धर्म का जगव्यापी असर है. जब लोग 7 समंदर पार रहते हुए भी कुंडली मिलान के बाद विवाह करते हों, गोरों व कालों की कुंडली भी बनवा लेते हों ताकि सिद्ध किया जा सके कि धर्म, रंग और नागरिकता अलग होने के बावजूद विवाह विधिविधान से हुआ है, तो क्या किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट की फुसफुसाहट हिंदुत्व के नगाड़ों के बीच खो जाएगी.

पारंपरिक शादियां चलती हैं, तो इसलिए कि शादी चलाना पतिपत्नी के लिए जरूरी होता है, उन का कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड, धर्म से कोई मतलब नहीं होता. शादी दिलों का व्यावहारिक समझौता है. एकदूसरे पर निर्भरता तो प्राकृतिक जरूरत है ही, सामाजिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी है और इस के लिए किसी धर्मगुरु के आदेश की जरूरत नहीं. यदि प्यार हो, इसरार हो, इकरार हो, इज्जत हो तो कोई भी शादी सफल हो जाती है. बच्चे मातापिता पर अपनी निर्भरता जता कर किसी भी बंधन को, शादी को ऐसे गोंद से जोड़ देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट, कानून या कुंडली की जरूरत नहीं.

कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड के प्रपंच पंडितों ने जोड़े हैं, ये धर्म की देन हैं, प्राकृतिक या वैज्ञानिक नहीं. शादी ऐसा व्यक्तिगत कृत्य है जो व्यक्ति के जीवन को बदल देता है और धर्म इस अवसर पर मास्टर औफ सेरिमनीज नहीं मास्टर परमिट गिवर बन कर पतिपत्नी को जीवन भर का गुलाम बना लेता है.

शादी में धर्म शामिल है, तो बच्चे होने पर उसे बुलाया जाएगा और तभी उसे धर्म में जोड़ लिया जाएगा ताकि वह मरने तक धर्म के दुकानदारों के सामने इजाजतों के लिए खड़ा रहे.

विधर्मी से विवाह पर धर्म का रोष यही होता है कि एक ग्राहक कम हो गया है. चूंकि दूसरे धर्म का ग्राहक भी कम होता है, दोनों धर्मों के लोग एकत्र हो कर इस तरह के विवाह का विरोध करते हैं. आमतौर पर शांति व सुरक्षा तभी मिलती है जब पति या पत्नी में से एक धर्म परिवर्तन को तैयार हो.

अगर उसी धर्म में गोत्र या सपिंड का अंतर भुला कर शादी हो रही हो तो धर्म के दुकानदारों के लिए दोनों को मार डालने के अलावा कोई चारा नहीं होता. शहरों में तो यह संभव नहीं होता पर गांवों में इसे चलाना आसान है, संभव है और लागू करा जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना कह ले, जब तक देश में धर्म के दुकानदारों का राज है और आज तो राज ही वे कर रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन आ चुके हैं, जैसा है.

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