समाज की सब से अहम इकाई परिवार है और हर साल 15 मई को पूरी दुनिया में ‘अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस’ मनाया जाता है. पर हमारी शहरी जिंदगी ने लोगों को इतने बड़े सपने दिखा दिए हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए वे किसी भी हद तक चले जाते हैं, पर जब वे सपने पूरे नहीं होते हैं या परिवार का ही कोई हमारी पीठ में छुरा घोंपता है, तो नतीजा दर्दनाक भी हो जाता है.

हाल ही में नोएडा, उत्तर प्रदेश में एक परिवार के फैसले ने सब को हैरान कर दिया. पैसे की तंगी के चलते 33 साल के भरत ने 13 दिसंबर, 2019 को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू मैट्रो स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी.

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बात यहीं खत्म नहीं हुई. भरत के इस तरह दुनिया छोड़ने का गम उस की 31 साल की पत्नी शिवरंजनी सहन न कर सकी और अपनी जान देने से पहले उस ने 5 साल की बेटी जयश्रीता को एक कमरे में फांसी लगा कर मार दिया और फिर दूसरे कमरे में आ कर खुद भी फंदे से  झूल गई.

चेन्नई के रहने वाले भरत एक चाय कंपनी में जनरल मैनेजर थे और सितंबर महीने में ही नोएडा आए थे.

दिसंबर, 2019 की 3 तारीख को गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में गुलशन वासुदेवा नाम के एक शख्स ने अपने परिवार के साथ खुदकुशी कर ली और इस का जिम्मेदार अपने साढ़ू को ठहराया कि उस ने उन्हें पैसों का चूना लगाया था.

गुलशन वासुदेवा ने पहले अपने दोनों बच्चों को मारा. इस के बाद अपनी तथाकथित 2 पत्नियों के साथ 8वीं मंजिल से कूद कर खुदकुशी कर ली.

21 जून, 2019 की रात को दिल्ली के महरौली इलाके के सुरेश अपार्टमैंट में रहने वाले कैमिस्ट्री के ट्यूटर उपेंद्र शुक्ला ने अपनी पत्नी अर्चना शुक्ला के साथ 8 साल की बेटी रान्या, 6 साल के बेटे रौनक व डेढ़ महीने के बेटे राजा की चाकू से गला रेत कर सिर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि घर की माली हालत ठीक नहीं थी.

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इसी तरह 1 जुलाई, 2019 की देर रात गुरुग्राम, हरियाणा के सैक्टर 49 के उप्पल साउथऐंड एस ब्लौक में रहने वाले सन फार्मा कंपनी में साइंटिस्ट ऐंड रिसर्च ऐंड डेवलपमैंट ब्रांच में हैड रहे डाक्टर श्रीप्रकाश सिंह ने अपनी पत्नी डाक्टर सोनू, बेटी अदिति व बेटे आदित्य की तेज धार हथियार से बेरहमी से हत्या कर दी थी और बाद में खुद भी पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली थी. वैसे, इस परिवार की माली हालत खराब थी, ऐसी कोई वजह सामने नहीं आई थी.

इस तरह की बहुत सी वारदातें अब शहरी जीवन में बड़ी आम सी होने लगी हैं. अखबार भरे रहते हैं ऐसी खबरों से. लेकिन इस की वजह क्या है? क्यों हम जिंदगी में थोड़ा सा फेल होते ही खुद को खत्म करने पर आमादा हो जाते हैं?

इसे जानने से पहले हम इस बात पर गौर करने से चूक जाते हैं कि जब भी किसी परिवार का मुखिया ऐसा फैसला लेता है तो वह पहले हाथ उन के खून से रंगता है, जिन को उस ने खुद जन्म दिया होता है.

पहले मामले में पति भरत की खुदकुशी में हुई मौत का सदमा उस की पत्नी शिवरंजनी सहन नहीं कर पाई और उस ने अपनी बेटी जयश्रीता को मार कर खुद को भी खत्म कर लिया.

शिवरंजनी ने तो बचकाना फैसला लिया, लेकिन इस में 5 साल की जयश्रीता की क्या गलती थी? उसे किस बात की सजा दी गई? ऐसी ही कुछ नाइंसाफी दूसरे मामलों में उन बच्चों के साथ हुई, जिन्हें परिवार की माली हालत से कोई लेनादेना नहीं था और शायद वे जिंदा रहते तो अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकते थे. पर गुलशन वासुदेवा, उपेंद्र शुक्ला और डाक्टर श्रीप्रकाश सिंह ने अपने कलेजे के टुकड़ों को उन की जिंदगी नहीं जीने दी.

कानून ऐसी हत्याओं पर किसी को सजा नहीं दे सकता है, क्योंकि मारने वाला ही खुद को खत्म कर चुका होता है, लेकिन ऐसे लोग यह नहीं सम झते हैं कि अगर किसी महल्ले या सोसाइटी में ऐसा डरावना कांड हो जाता है तो दूसरे लोगों खासकर उन के बड़े होते बच्चों पर इस का क्या असर पड़ता है? देखते ही देखते आप के पड़ोस में कोई हंसताखेलता परिवार खत्म हो गया और आप शांति से रह लोगे? बिलकुल नहीं. पूरा इलाका ही बदनाम हो जाता है. वहां नए लोग मकान खरीदने से डरते हैं. लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने में कतराते हैं. बच्चे उस घर के आसपास होने पर ही घबराने लगते हैं.

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आज के नए दौर में सब से बड़ी समस्या तो हमारे परिवारों के टूटने की है. यह किसी अच्छे समाज की निशानी नहीं है. ठीक है कि पैसा हमारे सपनों को पूरा करता है, पर यह जो जल्दी से जल्दी और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की हवस है न, वह हमें या तो अपराध की तरफ धकेलती है या खुद को खत्म करने के लिए उकसाती है.

गांवदेहात में भी जिस किसान की जमीन बिक गई और अचानक अंटी में ढेर सारा पैसा आ गया तो उस की भी मति मारी जाती है. फिर ऊलजुलूल खर्चे बढ़ जाते हैं, उधार लेनेदेने का चलन हो जाता है. महंगी गाड़ी खरीद कर उसे फुजूल में सड़कों पर दौड़ाने की ऐसी गंदी आदत पड़ती है कि अंटी कब खाली हुई पता ही नहीं चलता है. इस के बाद खर्चे पूरे करने के लिए कई लोग अपराध की डगर पकड़ लेते हैं या फिर कर्ज के मारे अपने परिवार को ही खत्म कर देते हैं.

इस सब से बचने का एक ही तरीका है जोश में होश न खोना, क्योंकि हर इनसान की जिंदगी में उतारचढ़ाव आते हैं. अमिताभ बच्चन इस की सब से बड़ी मिसाल हैं. फिल्मों में खूब दाम और नाम कमाया, फिर ऐसा दौर भी आया जब उन का हाथ इस कदर तंग हुआ कि ठनठन गोपाल हो गए. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी या अपने परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि फिर दोगुने दम से मेहनत की, बौलीवुड में नाम कमाया और आज 77 साल के होने के बावजूद उन नौजवानों से दोगुना काम करते हैं, जो या तो अपनी बेरोजगारी का रोना रोते रहते हैं और अपराध के नाम पर किसी औरत की चेन  झपट लेते हैं.

14 फरवरी का ‘वैलेंटाइन डे’ तो सब याद रख लेते हैं और अपना प्यार पाने के लिए कुछ भी कर जाते हैं, फिर परिवार भी बना लेते हैं, पर 15 मई का ‘परिवार दिवस’ अपने जेहन में ही नहीं आने देते हैं, जो हमारे समाज और देश के लिए बहुत जरूरी है. और जो इनसान अपने परिवार को याद रखता है, वह उसे खत्म करने की सोच भी नहीं सकता है, फिर चाहे उस का कंगाली में आटा ही क्यों न गीला हो जाए.

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