मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश के शिवपुरी और बैतूल जिले की आदिवासी समाज की ये 2 औरतें देश की 2 सब से बड़ी राजनीतिक पार्टियों के इस्तेमाल की चीज बन कर रह गई हैं.

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इस से बड़ी ट्रैजिडी और क्या होगी कि शिवपुरी जिले के कोलारस विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत रामपुरी के गांव लुहारपुरा की अनपढ़ जूली अपने हक को नहीं जानती थी, इसलिए शिवपुरी की जिला पंचायत अध्यक्ष और राज्यमंत्री का दर्जा पाने के बाद भी वह अपनी 18 बीघा जमीन के मामले में ठगी का शिकार बनी. उस का राजनीतिक इस्तेमाल करने वाले नेताओं ने उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका.

वहीं दूसरी औरत ज्योति धुर्वे रायपुर जैसे महानगर की दुर्ग यूनिवर्सिटी से राजनीति में एमए की तालीम लेने के बाद साल 2008 में अनुसूचित जनजाति आयोग की अध्यक्ष बनी और कैबिनेट मंत्री का दर्जा पाने के बाद लंबी उड़ान पर निकल पड़ी. वह 2 बार सांसद बनने के बाद आज भाजपा की राष्ट्रीय सचिव बन बैठी है. साथ ही, अपने ऊपर लगे फर्जी आदिवासी व विधवा होने के आरोप के बावजूद उस ने जायदाद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

करोड़ों रुपए में खेलने वाली भाजपा की इस पूर्व सांसद ज्योति धुर्वे का मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार बाल भी बांका नहीं कर सकी है. वजह, इस भाजपा सांसद के संरक्षक प्रदेश भाजपा कोषाध्यक्ष व पूर्व सांसद हेमंत खंडेलवाल हैं. इन के कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के बैतूल जिले की मुलताई विधानसभा से विधायक और प्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री सुखदेव पांसे से गहरे संबंधों के चलते ज्योति धुर्वे का फर्जी आदिवासी का मामला ठंडे बस्ते में जा पहुंचा है.

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एक करोड़ों में तो दूसरी कंगाल

मध्य प्रदेश की राजनीति में दोनों ही औरतें भाजपा व कांग्रेस के पूर्व विधायकों की करीबी रही हैं. जहां जूली कांग्रेस के पूर्व विधायक, जो अब नहीं रहे, राम सिंह यादव के फार्महाउस में काम करती थी तो ज्योति धुर्वे भाजपा के पूर्व सांसद, जो अब नहीं रहे, विजय कुमार खंडेलवाल, प्रदेश भाजपा कोषाध्यक्ष की भारतीय जनता पार्टी महिला मोरचा की अध्यक्ष थी.

ज्योति धुर्वे ने अपने कांग्रेसी पति पूर्व जनपद सदस्य भैसदेही जनपद प्रेम सिंह धुर्वे, जो अब नहीं रहे, की राजनीति में विपक्षी पार्टी के साथ दो कदम आगे बढ़ाए तो जूली के पति मांगीलाल ने मजदूरी करने वाली अपनी बीवी को फार्महाउस के मालिक राम सिंह यादव की कठपुतली बनने पर मजबूर कर दिया.

इन दोनों आदिवासी औरतों का राजनीतिक सफर व खात्मा भाजपा के बीते 15 सालों के राज में हुआ है. लालबत्ती लगी गाड़ी में घूमने वाली इन दोनों औरतों का एक कड़वा सच यह भी है कि दोनों में से एक असली तो दूसरी नकली आदिवासी है.

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एक है एमए दूसरी अंगूठाछाप

एक फटी, मटमैली साड़ी में लिपटी, वहीं दूसरी महंगे कपड़ों और गहनों से लदी हुई. दोनों की राजनीति में शुरुआत साल 2005 और साल 2008 में हुई.

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की जूली को वहां के पूर्व विधायक और नेता राम सिंह यादव ने जिला पंचायत का सदस्य बना दिया था. कुछ समय बाद क्षेत्र के दूसरे पूर्व विधायक वीरेंद्र रघुवंशी ने जूली को राज्यमंत्री का दर्जा दिलवा कर उसे जिला पंचायत के अध्यक्ष का पद सौंप दिया.

साल 2005 से साल 2009 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रही जूली के पति मांगीलाल राम सिंह यादव के फार्महाउस पर काम करता था. जूली भी अपने पति के साथ वहीं पर रहती थी और पूर्व विधायक के फार्महाउस पर काम करती थी.

जूली के पास उस के पिता के गांव रामगढ़ में पट्टे की जमीन थी. 9-9 बीघा जमीन पर पूर्व विधायक राम सिंह यादव के बेटे महेंद्र यादव ने भूमि विकास बैंक से ट्रैक्टर उठाया और बैंक की किस्त जमा न करने पर जब भूमि विकास बैंक ने उस के बैंक में बंधक 9-9 बीघा जमीन के पट्टे को नीलाम किया तो पूर्व विधायक राम सिंह यादव के बेटे महेंद्र यादव ने बैंक से वह पट्टे वाली 18 बीघा जमीन खरीद ली.

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जूली अब अपना सबकुछ गंवाने के बाद बकरियां चरा रही है. वर्तमान समय में जूली के साथ न तो कोई विधायक है और न पूर्व विधायक. और तो और जिस पार्टी की ओर से वह जिला पंचायत अध्यक्ष बनी थी, उस पार्टी का कोई कार्यकर्ता से ले कर पदाधिकारी भी उस के दुख में साथी बनने को तैयार नहीं है.

जहां जूली की जाति पर किसी ने सवाल नहीं उठाया, तो वहीं दूसरी ओर ज्योति धुर्वे अपनेआप को असली आदिवासी साबित नहीं कर सकी है.

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल बैतूल जिले के भाजपा सांसद व प्रदेश भाजपा कोषाध्यक्ष विजय कुमार खंडेलवाल ने ज्योति धुर्वे को साल 2008 में मध्य प्रदेश राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की अध्यक्ष की कुरसी और कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिलवा दिया था.

विजय कुमार खंडेलवाल की साल 2007 में हुई मौत के बाद उन के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में उन के छोटे बेटे हेमंत खंडेलवाल साल 2008 में लोकसभा के उपचुनाव में सांसद बने, लेकिन इस बीच बैतूल लोकसभा सीट आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हो जाने के चलते उस सीट पर उन की राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में ज्योति धुर्वे की ताजपोशी हुई.

ज्योति धुर्वे ने साल 2009 में लोकसभा का चुनाव लड़ा और उन का आदिवासी का जाति प्रमाणपत्र विभाजित मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ से साल 2009 में जारी किया गया.

उस समय ज्योति, पिता महादेव ठाकुर का पता समता कालोनी, रायपुर था. रायपुर जिला कलक्टर सुबोध सिंह के समय बने जाति प्रमाणपत्र में ज्योति धुर्वे को पिता की जाति के आधार पर आदिवासी बताया गया. इसी प्रमाणपत्र को ग्राम पंचायत चिल्कापुर, तहसील भैसदेही ने अटैस्ट किया और उस आधार पर एसडीएम भैसदेही ने साल 2009 में नया जाति प्रमाणपत्र पिता के बदले पति की जाति के आधार पर जारी कर दिया.

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2 बार सांसद रही ज्योति धुर्वे की साल 2014 में घोषित संपत्ति 2 करोड़, 62 लाख रुपए थी. वे वर्तमान में भाजपा की राष्ट्रीय सचिव हैं और ग्राम चिल्कापुर, गुदगांव में उन का एक पैट्रोल पंप भी है.

जाने कहां गए वे दिन

जिला पंचायत अध्यक्ष के साथ ही जूली को एक बार शासन की ओर से राज्यमंत्री का दर्जा भी मिल गया था. फिर क्या था, लालबत्ती की कार में घूमने वाली जूली का रुतबा काफी बढ़ गया था. बड़ेबड़े अफसर और मुलाजिम ‘मैडम’ कह कर उस का आदर करने लगे थे. पद जाते ही मानो जूली की पूरी जिंदगी बदल गई.

एक समय पर इज्जत और सुख के साथ जीने वाली इस औरत की जिंदगी अंधकार और परेशानियों से भर गई. अब गुजरबसर के लिए जूली लुहारपुरा में

रह कर बकरी चराने को मजबूर हो गई है. इन दिनों वह गांव की तकरीबन 50 बकरियां चराने का काम करती है.

जूली के मुताबिक, हर बकरी के लिए उसे 50 रुपए हर महीने मिलते हैं. इस से जो कमाई होती है, उसी के दम पर वह घरपरिवार का पालनपोषण करती है.

पश्चिम बंगाल

कटखने कुत्तों का कहर

देश के सारे बड़े शहरों की तरह पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे हावड़ा जिले में कटखने कुत्तों के कहर से निबटने के लिए हर साल सरकार को लाखों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं.

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हावड़ा जिला स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि हर साल जिले में 20,000 से ज्यादा लोग कुत्ते के काटने का शिकार होते हैं. इस से उन्हें अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इस के बावजूद किसी भी नगरनिगम, नगरपालिका, ग्राम पंचायत या ब्लौक की ओर से कुत्तों की बढ़ती तादाद पर काबू पाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है.

हावड़ा नगरनिगम द्वारा 2 साल पहले 50 कुत्तों की नसबंदी कराई गई थी, लेकिन इस का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. रात को हर मोड़ व नुक्कड़ पर दर्जनों आवारा कुत्ते मिल जाते हैं. प्रशासन का कहना है कि ऐसे कुत्तों की हत्या नहीं की जा सकती है, लेकिन उन के पास इन की तादाद कंट्रोल करने के लिए इतनी बड़ी मैडिकल व्यवस्था भी नहीं है.

हावड़ा जिला स्वास्थ्य विभाग ने कुत्तों द्वारा लोगों को काटे जाने का जो आंकड़ा जारी किया है, उस के मुताबिक, साल 2014 में 20,689, साल 2015 में 21,133, साल 2016 में 19,632, साल 2017 में 20,842, साल 2018 में 23,621 और साल 2019 में अप्रैल महीने तक 8,341 लोगों को कुत्तों ने काटा यानी 6 साल में 1 लाख, 14 हजार, 258 लोगों को कुत्ते काट चुके हैं.

इन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हर साल औसतन 19,043 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं. इस से बचने के लिए सरकार के जहां लाखों रुपए रेबिज इंजैक्शन पर खर्च हुए हैं, वहीं लोग खुद को महफूज नहीं कर पा रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग ने यह स्वीकार किया है कि कुत्तों द्वारा काटे गए लोगों को बचाने के लिए सरकार को हर साल लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं.

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