जागरूकता: सड़क हादसे

Writer- देवेंद्रराज सुथार

देश में सड़क हादसों की बढ़ती तादाद पर लगाम लगाने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि ट्रक ड्राइवरों के लिए ड्राइविंग का समय तय किया जाना चाहिए. इस के साथ ही सैंसर की मदद से उन की नींद का भी पता लगाया जाना चाहिए, ताकि देश में बढ़ते सड़क हादसों को रोका जा सके.

कई घंटे की ड्राइविंग, इंजन की गड़गड़ाहट और सड़क पर 14 पहियों की आवाज… इस सब में ट्रक ड्राइवर के लिए थकान का सामना करना मुश्किल हो जाता है.

गाड़ी चलाते समय थकान से जू?ाना, नींद न आना ये सामान्य सी समस्याएं हैं, जिन से ट्रक ड्राइवर जू?ाते रहते हैं, लेकिन आज की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर ये ट्रक ड्राइवर सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर, दक्षिण अफ्रीका में जनवरी, 1981 और मार्च, 1994 के बीच 34 फीसदी से ज्यादा हादसे गाड़ी चलाते समय ड्राइवर के सो जाने की वजह से हुए. थकान बढ़ने से उनींदापन होने लगता है और इस का असर शराब के नशे के समान होता है.

थकान से जुड़े इन हादसों के पीछे की बड़ी वजह को हमें ट्रक ड्राइवरों द्वारा काम किए गए कुल घंटों के रूप में देखना होगा, जिस में न केवल ड्राइविंग बल्कि दूसरे काम भी शामिल हैं.

ये काम के घंटे अकसर लंबे और अनियमित होते हैं. ज्यादातर ट्रक ड्राइवर शुरू से आखिर तक अपने दम पर काम को पूरा करना पसंद करते हैं, जिस

का मतलब यह है कि किसी भी मौसम में ग्राहक को सामान पहुंचाना.

कार्य कुशलता तय की गई दूरी और पहुंचाए गए माल से मापी जाती है. काम के घंटे औसत से ऊपर हो सकते हैं. जरमनी में कई ट्रक ड्राइवर हफ्ते में

तकरीबन 40 घंटे से कम तो कई ट्रक ड्राइवर इस से दोगुने से भी ज्यादा काम करते हैं.

ऐसे ही हालात दूसरे देशों में भी हैं. दक्षिण अफ्रीका में वेतन कम है, इसलिए ड्राइवर अपनी कमाई बढ़ाने के लिए ड्राइविंग में ज्यादा समय लगाते हैं.

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भारत की रिपोर्ट बताती है कि परिवहन कंपनियां ड्राइवरों को अपना सफर पूरा करने के लिए पूरा समय देती हैं, लेकिन कई ड्राइवर ऐक्स्ट्रा माल को दूसरी जगहों पर पहुंचा कर अपनी आमदनी बढ़ाते हैं. यह ज्यादा ड्राइविंग समय की मांग करती है. फिर उन्हें समय पर कंपनी में लौटने के लिए नींद में कटौती करनी पड़ती है.

यूरोपीय संघ में कानून द्वारा अनुमानित अधिकतम घंटों का इस्तेमाल कर के एक ट्रक ड्राइवर हफ्ते में तकरीबन 56 घंटे तक ड्राइव कर सकता है, लेकिन अगले हफ्ते उसे सिर्फ 34 घंटे तक ही गाड़ी चलाने की इजाजत है. लोडिंग और अनलोडिंग समेत उस के काम के घंटे एक निरीक्षण मशीन द्वारा दर्ज किए जाते हैं.

एक दूसरी वजह भी ड्राइविंग के समय को प्रभावित करती है, वह है ट्रक मालिक का रवैया. जब काम के घंटे ज्यादा होते हैं, तो थकान होने लगती है. ऐसा तब भी होता है, जब वे असामान्य समय में सफर शुरू करते हैं.

उदाहरण के लिए, रात के एक बजे से सुबह के 4 बजे के बीच काम शुरू करना सामान्य है. यह वह समय होता है, जब कई ड्राइवर बहुत बेचैन होते हैं और उन की एकाग्रता सब से कम होती है. दबाव तब बनता है, जब ग्राहक कंपनियां स्टौक में कम माल रखती हैं और मांग करती हैं कि सामान समय पर पहुंचाया जाए.

इस का मतलब है कि ड्राइवर को सामान ले कर ग्राहक तक सही समय पर पहुंचना होता है. बिजी यातायात, खराब मौसम और खराब सड़कों के चलते देरी होती है, जिस की भरपाई ड्राइवर को किसी न किसी रूप में करनी पड़ती है.

एक जापानी कंपनी एक वीडियो कैमरे का इस्तेमाल कर के एक इलैक्ट्रौनिक मशीन पर काम कर रही है, जो यह नोट करती है कि ड्राइवर कितनी देर तक अपनी आंखें ?ापकाता है. अगर बारबार पलकें ?ापकती हैं, तो एक रिकौर्ड की गई आवाज उसे उस की खतरनाक हालत के बारे में चेतावनी देती है.

एक यूरोपीय कंपनी भी एक ऐसे ही उपकरण पर काम कर रही है, जो यह नोट करता है कि किसी गाड़ी को कितनी सटीकता से चलाया जा रहा है. अगर ट्रक हिलता है, तो केबिन में एक चेतावनी सुनाई देती है. लेकिन प्रभावी साधन उपलब्ध होने में कुछ समय लगेगा. तकरीबन हर गाड़ी में थकान एक बिन बुलाई और अप्रिय यात्री रही है. लेकिन सवाल यह है कि इस से छुटकारा कैसे पाया जाए?

कुछ ट्रक ड्राइवर तो भारी मात्रा में कैफीनयुक्त पेय पीते हैं, लेकिन थकान फिर भी उन्हें रोक नहीं पाती है. वे दूसरे उत्तेजकों का इस्तेमाल करते हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि वे चीजें सेहत के लिए बहुत ही ज्यादा खतरनाक हैं. मैक्सिको में कुछ ड्राइवर जागते रहने के लिए मिर्च खाते हैं.

शुरुआती चेतावनी के संकेतों को पहचान कर कई लोगों की जान बचाई जा सकती है. अमेरिका में नैशनल ट्रैफिक सेफ्टी बोर्ड के एक अध्ययन में भयानक आंकड़े सामने आए कि 107 हादसों में कोई दूसरी गाड़ी शामिल नहीं थी, जबकि 62 हादसे थकान से संबंधित थे.

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भारत में ट्रक ड्राइवरों के लिए अभी तक कोई सुरक्षा मानक नहीं है. अमेरिका और ब्रिटेन की बात करें, तो वहां यह तय होता है कि एक ट्रक ड्राइवर एक दिन में कितने घंटे और कितने किलोमीटर तक ड्राइव करेगा.

ट्रक ड्राइवर के लिए एक निश्चित अंतराल पर आराम करना बहुत ही जरूरी है. लंबी दूरी के ट्रक ड्राइवरों को सफर के बाद कुछ दिनों के लिए आराम करने की जरूरत होती है.

हर ट्रक ड्राइवर और उस के ट्रक का हर मिनट का डाटा सरकारी रेगुलेटर तक पहुंचता रहता है, इसलिए किसी भी तरह से नियमों के उल्लंघन की कोई गुंजाइश नहीं रहती है.

भारत के मामले में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का सु?ाव थकान के चलते बढ़ते हादसों को रोकने और सड़क सुरक्षा की दिशा में रास्ता मजबूत करता है. इस पर गंभीरता से सोचविचार किया जाना चाहिए.

पापाज बौय- भाग 1: ऐसे व्यक्ति पर क्या कोई युवती अपना प्यार लुटाएगी?

Writer- सतीश सक्सेना 

फरवरी का बसंती मौसम था. धरती पीले फूलों की चादर में लिपटी हुई थी. बसंती बयार में रोमांस का शोर घुल चुका था. बयार जहांतहां दो चाहने वालों को गुदगुदा रही थी. मेरे लिए यह बड़ा मीठा अनुभव था. मैं उस समय 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही शरीर में बदलाव होने लगे थे. सैक्स की समझ बढ़ गई थी. दिल चाहता था कि कोई जिंदगी में आई लव यू कहने वाला आए और मेरा हो कर रह जाए. मैं शुरू से ही यह मानती आई थी कि प्रेम पजैसिव होता है इसीलिए यही सोचती आई थी कि जो जिंदगी में आए वह सिर्फ मेरा और मेरा हो.

शतांश से मेरी मुलाकात क्लास में ही हुई थी. वह गजब का हैंडसम था साथ ही अमीर बाप की एकलौती संतान था. पता नहीं मुझ में ऐसा क्या था जो वह मुझ पर एकदम आकर्षित हो गया. वैसे क्लास और स्कूल में अनेक लड़कियां थीं, जो उस पर हर समय डोरे डालने का प्रयास करती थीं. मैं एक मध्यवर्गीय युवती थी और वह आर्थिक स्थिति में मुझ से कई गुना बेहतर था. पहली मुलाकात के बाद ही हमारी दोस्ती बढ़ने लगी थी. मुझे क्लासरूम में घुसते देख कर ही वह दरवाजा रोक कर खड़ा हो जाता और मुझे अपनी तरफ देखने को मजबूर करता. कभी वह मेरे बैग से लंच बौक्स निकाल कर पूरा खाना खा जाता तो कभी अपना टिफिन मेरे बैग में रख देता. वह मेरे से नितनई छेड़खानियां करता. अब उस की छोटीछोटी शरारतें मुझे अच्छी लगने लगी थीं. शायद उस दौरान ही हमारे बीच प्रेम का पौधा पनपने लगा था.

मन की सुप्त इच्छाएं उस समय पूर्ण हुईं जब शतांश ने मुझे वैलेंटाइन डे पर लाल गुलाब देते हुए कहा था, ‘आई लव यू.’ मेरे लिए वह पल सुरमई हो उठा था. हृदय में खुशी का सैलाब उमड़ने लगा था. मैं शतांश की हो जाने को बेताब हो उठी थी. कैसे उस के शब्दों के बदले अपने प्रेम का इजहार करूं, अचानक कुछ भी नहीं सूझा था. जिस हाथ से शतांश ने वह फूल दिया था, मैं ने उस हाथ को शरमाते हुए चूम लिया था, बस.

उस दिन के बाद से न ही उस ने कुछ किया और न ही मैं ने. जो कुछ किया रोमांस की हवा के झोंकों ने किया. हमारे बीच प्रेम निरंतर बढ़ता जा रहा था. हम एकदूसरे के और करीब आते गए थे. रेस्तरां में शतांश के इंतजार में बैठी शायनी अपना अतीत उधेड़े जा रही थी. तभी वेटर आ कर उस के सामने कौफी का एक कप रख गया. कौफी का एक घूंट गले में उतारते हुए शायनी फिर अतीत में खो गई. रेस्तरां के शोरशराबे ने भी उस की सोच में कोई खलल नहीं डाला.

स्कूली शिक्षा समाप्त करते ही मैं ने मैडिकल में ऐडमिशन ले लिया था और शतांश ने ग्रैजुएशन के बाद एमबीए करने की चाह में आर्ट्स कालेज जौइन कर लिया था. यह सत्य है कि प्रेम किसी सीमा का मुहताज नहीं होता. वह न जाति में बंधता है, न धर्म में. न ऊंचनीच उसे बांधती है और न ही रंगभेद. कालेज की दूरियां और समय का अभाव कभी भी हमारे प्रेम में कमी नहीं ला पाया. मेरे और शतांश के रिश्तों में रोमांस की खुशबू सदा बनी रही.

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ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह मेरे साथ मैडिकल कालेज के लड़कों को देख कर चिढ़ा हो, उन्हें बरदाश्त न कर पाया हो और न ही कभी ऐसा हुआ कि उस के साथ लड़कियों को देख कर कभी किसी शंका ने मेरे मन में जन्म लिया हो. हम अपने प्रेम के लिए पजैसिव भी थे और प्रोटैक्टिव भी. समय का अभाव जरूर हमें सालता था, पर हम अपने दायित्वों को समझते थे. हम हरसंभव प्रयास करते थे कि सप्ताहांत में मिलें और रोमांस को बरकरार रखें. उस सैक्स को जीवंत रखें, जो रोमांस के लिए जरूरी है ताकि संबंधों में मधुरता बनी रहे.

एक डेट पर जब हम दोनों ने यह एहसास कर लिया कि हम एकदूसरे के लिए ही हैं तो हम ने विवाह बंधन में बंधने का निर्णय कर लिया. उस दिन पुलक कर मैं ने न जाने कितने चुंबन उस के गाल पर जड़ दिए थे और उस ने मुझे अपनी बांहों से बिलकुल भी छिटकने नहीं दिया था. मोबाइल की घंटी बजते ही शायनी की सोच बिखर गई. फोन पर शतांश था. शायनी ने उसे लगभग डांट सा दिया. हलके से क्रोध भरे स्वर में वह बोली, ‘‘शतांश, आजकल क्या हो गया है तुम्हें? मैं आधे घंटे से तुम्हारा इंतजार कर रही हूं.’’

‘‘सौरी डार्लिंग, मैं आज नहीं आ पाऊंगा,’’ शतांश बोला. ‘‘आखिर क्यों?’’

‘‘मैं बिजी हूं. एक पल की भी फुरसत नहीं है मुझे.’’ ‘‘मुझे पहले नहीं बता सकते थे,’’ शायनी ने अपनी नाराजगी जाहिर की.

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‘‘सौरी लव, मुझे ध्यान ही नहीं रहा.’’ गुस्से में शायनी ने फोन काट दिया. सोच का रथ फिर दौड़ने लगा. तेज और तेज. जीवन में कुछ परिवर्तन अचानक होते हैं. ऐसा ही परिवर्तन पिछले कुछ दिनों से मैं शतांश के व्यवहार में देख रही हूं. यद्यपि मेरा मन कई आशंकाओं और भय से इन दिनों लगातार घिरता रहा है पर मैं ने इन आशंकाओं को अब तक अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया.

Manohar Kahaniya- गोरखपुर: मोहब्बत के दुश्मन- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

Writer- शाहनवाज

‘प्यार की कोई उम्र नहीं होती, कोई मजहब नहीं होता, कोई जात नहीं होती. प्यार तो प्यार होता है, बस हो जाता है.’ इस तरह की बातें आप ने भी फिल्मों में खूब सुनी होंगी या हो सकता है ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया हो. लेकिन क्या हमारे समाज में इन बातों की वास्तविकता पर यकीन किया जा सकता है या फिर ये केवल फिल्मों तक ही सीमित हैं?

आज भी हमारे समाज में ऐसे क्रूर लोग मौजूद हैं जिन्हें ‘प्रेम’ शब्द से चिढ़ है. प्यार करने पर समाज के कुछ लोग धर्म, जात, वर्ग इत्यादि चीजों को ध्यान में रख कर प्यार करने वालों को अलग करने के लिए हर हद पार कर देते हैं.

यहां तक कि जिन बच्चों को वह जीवन भर प्यार करते हैं, जिन की खुशी के लिए परिवार वाले कुछ भी कर सकते हैं, उन्हें ही अपना पार्टनर चुनने की इतनी भयानक सजा दे देते हैं, जिसे सुन कर रूह कांप जाती है. ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की है.

यह साल था 2015 का जब गोरखपुर के उनौली गांव के रहने वाले अनीश चौधरी (34) का उरूवा ब्लौक औफिस में ग्राम पंचायत अधिकारी के पद पर चयन हुआ था.

गोरखपुर के दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास में पोस्ट ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर चुके अनीश बहुत मेहनती था. वह खुद के दम पर कुछ बनना चाहता था और उसी के लिए वह दिनरात मेहनत करता था.

तरहतरह की सरकारी नौकरियों के फौर्म भरना, एग्जाम देना, इंटरव्यू की तैयारी करना, उस के हर दिन के जीवन का हिस्सा थी जोकि ग्राम पंचायत अधिकारी बनने के बाद उन का यह सपना पूरा हो गया था.

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अनीश के गांव में दलितों की आबादी बहुसंख्यक थी. वह खुद भी दलित समुदाय से था. लेकिन अनीश की माली हालत गांव में अन्य दलितों से काफी बेहतर थी.

अनीश बना ग्राम पंचायत अधिकारी

अनीश संपन्न परिवार का हिस्सा थे. उस के पिता और चाचा बैंकाक और मलेशिया में रह कर काम करते थे. साल-2 साल में अनीश के पिता कुछ दिनों के लिए घर आते थे और फिर काम से चले जाते थे. उन्होंने अनीश के लिए किसी तरह की कोई कमी नहीं रखी थी. अनीश के बड़े भाई, अनिल चौधरी भी उरूवा ब्लौक औफिस में कर्मचारी थे.

ग्राम पंचायत अधिकारी के पद पर चयन होने के बाद अनीश की खुशी का ठिकाना नहीं था. जब अनीश ने यह बात अपने पिता को फोन कर बताई तो उस के पिता बेहद खुश हुए और अनीश को जल्द ही घर वापस आने का भरोसा दिलाया. अनीश के अधिकारी बनने की खुशी पूरे गांव को थी.

अनीश ने अपनी खुशी का खुल कर इजहार भी किया. वह अपने गांववासियों के लिए बहुत कुछ करना चाहता था और जल्द ही उन की सेवा में व्यस्त हो जाना चाहता था. चयन के बाद अनीश अब प्रशासन से काल लैटर का इंतजार करने लगा, जिसे घर आने में ज्यादा समय नहीं लगा.

चयन किए जाने के अगले ही महीने अनीश और अन्य चुने हुए अधिकारियों को ट्रेनिंग के लिए ब्लौक औफिस में बुलाया गया. ट्रेनिंग के पहले दिन अनीश सुबह के 8 बजे तैयार हो कर ब्लौक औफिस पहुंचा. उस समय तक कुछ और लोग औफिस के मुख्य हाल में इकट्ठे हुए थे.

रिपोर्टिंग का टाइम सुबह साढ़े 8 बजे था तो अनीश को वक्त बरबाद करना ठीक नहीं लगा. अनीश ने हाल में मौजूद हर किसी से हाथ मिलाया और जानपहचान बढ़ाने के लिए उन से बातचीत की.

करीब 10 मिनट के बाद हाल के गेट से एक महिला अधिकारी अंदर आई. वह भी हाल में मौजूद अन्य अधिकारियों की तरह ही थी. उस का भी चयन हुआ था.

उस का नाम दीप्ति मिश्र (24) था. दीप्ति गोरखपुर में देवकली धर्मसेन गांव की रहने वाली थी. समाजशास्त्र से एमए की पढ़ाई कर चुकी दीप्ति का सिलेक्शन कौड़ीराम ब्लौक औफिस में ग्राम पंचायत अधिकारी के तौर पर हुआ था. यही नहीं, दीप्ति ने भी दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी से अपनी एमए की पढ़ाई की थी.

अनीश ने दीप्ति को देखा तो वह उसे पहचान गया था. कालेज के कैंपस में अकसर अनीश ने दीप्ति को घूमते हुए देखा था, कभी कैंटीन में तो कभी क्लास करते हुए. लेकिन कालेज के दिनों में उस ने कभी दीप्ति से मुलाकात या बातचीत नहीं की थी. उस की एक वजह यह थी कि अनीश का विषय कुछ और था और दीप्ति का कुछ और.

दीप्ति जब गेट से अंदर आ रही थी तो अनीश की नजर उस पर पड़ी. अनीश को दीप्ति का चेहरा जानापहचाना लगा. अनीश ने अपने दाएं हाथ में पकड़े प्लास्टिक के पानी के गिलास को टेबल पर रखा और घूम कर कमरे के अंदर प्रवेश करती हुई दीप्ति की ओर आगे बढ़ा.

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काफी देर तक सोचने के बाद अनीश को याद आ गया था और वह दीप्ति को पहचान गया. दीप्ति कमरे में मौजूद पीछे की एक खाली कुरसी पर जा कर बैठी थी तो अनीश भी उस के पास गया और एक कुरसी छोड़ उस के बगल में जा कर बैठ गया और बोला, ‘‘हैलो.’’

अनीश की बात का जवाब देते हुए दीप्ति ने उस की ओर देखा और बोली, ‘‘हाय.’’

अनीश का चेहरा देखते ही दीप्ति को भी अचानक से याद आ गया था कि हैलो बोल रहा यह शख्स कौन है. इस से पहले कि अनीश आगे कुछ कहता, दीप्ति ने उस से सवाल कर लिया, ‘‘अरे, आप तो शायद दीन दयाल उपाध्याय कालेज में थे न?’’

अनीश ने दीप्ति के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘‘जी, आप ने बिलकुल सही पहचाना. मैं ने भी उसी कालेज से पढ़ाई की थी. आप जब हाल में एंटर हुईं, तभी से ही मैं सोच में पड़ गया था कि आप को कहां देखा है. और देखिए आप ही ने मुझे भी पहचान लिया.’’

यह सुन कर दीप्ति हंस पड़ी और दीप्ति को हंसता हुआ देख अनीश भी मुसकरा दिया. ऐसे ही करिअर, पढ़ाई इत्यादि की बातें करतेकरते कब साढ़े 8 बज गए, दोनों को पता ही नहीं चला.

कमरे में सूट पहन कर कुछ उच्च अधिकारी आए और अपने रुटीन कामों की तरह वह सब के नाम परिचय इत्यादि लेने लगे. इस तरह से अनीश और दीप्ति की जानपहचान हुई.

अब क्योंकि अनीश और दीप्ति दोनों ही ब्लौक औफिस में ग्राम पंचायत अधिकारी थे तो उन का साथ में उठनाबैठना सामान्य हो गया था. पूरी ट्रेनिंग के दौरान अनीश और दीप्ति एकदूसरे के साथ ही रहे. ट्रेनिंग के बाद जब दोनों आधिकारिक रूप से अपनेअपने ब्लौक में काम करने लगे तो भी दोनों का साथ उठनाबैठना होने लगा था.

अनीश के उरूवा ब्लौक औफिस से दीप्ति के कौड़ीराम ब्लौक औफिस के बीच मात्र एक घंटे की ही दूरी थी. अनीश और दीप्ति दोनों की जानपहचान कुछ ही समय में दोस्ती में बदल गई थी. दोनों साथ में औफिस आनेजाने लगे. दोनों ही घंटों फोन पर बातचीत करने लगे.

देखते ही देखते उन के बीच की नजदीकियां भी बढ़ने लगी. वे दोनों अकसर औफिस के अलावा भी एकदूसरे से मिलते थे. अनीश और दीप्ति दोनों ही एकदूसरे को करीब से जानना चाहते थे.

दोनों अधिकारी दिलोदिमाग से चाहने लगे एकदूसरे को ब्लौक औफिस से छुट्टी के समय दोनों यूं ही घूमने के लिए निकल जाया करते. छुट्टी वाले दिन भी दोनों घर पर नहीं बैठते थे बल्कि अपने गांव से दूर घूमने निकल जाते और साथ वक्त गुजारते थे. उन की दोस्ती वक्त के साथ प्यार में बदलने लगी थी.

लेकिन ऐसे ही एक दिन जब अनीश और दीप्ति औफिस से शाम को छुट्टी के बाद साथसाथ घर जा रहे थे तो दीप्ति के एक रिश्तेदार ने दोनों को देख लिया और दीप्ति की शिकायत उस के घर पर कर दी.

शुरुआत में तो दीप्ति के घरवालों ने उसे रोकाटोका नहीं, लेकिन अंदर ही अंदर वे अनीश के बारे में पता लगाने लगे. दीप्ति अपने घर में सब से छोटी बेटी थी.

दीप्ति का बड़ा भाई अभिनव यूपी पुलिस में कांस्टेबल था. जब अभिनव को दीप्ति के किसी से संबंध होने की जानकारी घरवालों से मिली तो उस ने अपने सूत्रों के जरिए अनीश के बारे में पता लगवाया.

अभिनव को जब यह पता चला कि उस की बहन दीप्ति का संबंध किसी दलित जाति के लड़के से है तो उस ने यह बात अपने घरवालों को बताई. उस दिन मिश्र परिवार में इस बात को ले कर खूब झगड़ा भी हुआ.

परिवार वालों ने दीप्ति का फोन उस से छीन लिया, उस के आनेजाने पर लगातार नजर रखने लगे. यहां तक कि दीप्ति जब औफिस जाती तो उस के पिता नलिन कुमार मिश्र, उस के साथ जाने लगे और घर वापस आते समय दीप्ति को साथ घर ले कर आने लगे.

दीप्ति पर उस के घरवाले इस तरह से निगरानी रखने लगे जैसे कि उस ने प्यार कर के बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो.

अगले भाग में पढ़ें- दीप्ति के घर वालों ने दी धमकी

बिन सजनी घर- भाग 3: मौली के जाने के बाद क्या हुआ

‘‘तुम होती तो हैरान होती, तुम होती तो खुश होती, तुम होती तो ये खाती, तुम होती तो वो…’’ वह अमिताभ बच्चन के डायलौग के अंदाज में बोलते हुए मुसकरा रहा था.

‘‘अच्छाअच्छा, बस. कल की तैयारी कर ली? कपड़े कल प्रैस होने के लिए दे दिए थे न?’’ वह हंसते हुए बोली.

उसे ध्यान आया कपड़े, मशीन में कब से पड़े रह गए, भूल ही गया था, मरा…

‘‘हांहां डियर, बस, आता ही होगा चंदू. शायद वही आया, मैं बाद में बात करता हूं.’’ सच बोल कर मरता क्या, उस ने झट से झूठ बोल कर मौली के आगे अपनी साख बना ली. वाश्ंिग मशीन की ओर लपका. पानी ड्रेन आउट होने पर जो देखा, खाना बनाते वक्त लाउड म्यूजिक के शौक ने मार डाला था, कपड़ों पर नजर पड़ी तो सारा मूड खराब हो गया. उस की नई गुलाबी शर्ट इतरा कर कई कपड़ों पे अपना रंग जमा चुकी थी. उस ने सिर पकड़ लिया. साफ पानी में 2 बार निकाला पर रंग न गया. उस के चेहरे का रंग अलबत्ता उड़ गया. मौली तो बेहद गुस्सा करेगी, बर्थडे पर उस की दी पैंटशर्ट दोनों ही खराब हो गईं. सारे कपड़े जल्दीजल्दी तार पर फैला डाले. इन में से तो कोई कल पहन के जाने लायक नहीं होंगी. कोई पहले की शर्टपैंट ही उस ने छांट कर प्रैस करवा ली. पर इस काम में पूरी अलमारी, पूरे कमरे की ऐसीतैसी हो गई थी. पर वह खुश था, चलो काम तो बन गया. उस ने पास बिखरे कपड़ों में से थोड़ेबहुत उठा कर अलमारी में ठूंस दिए.

शाम को दोस्तों का फिर जमघट लगना था. फिर नाइटशो, किसी इंग्लिश मूवी का प्रोग्राम था. लेकिन उस से पहले उन्हें, वादे अनुसार, अपने हाथों की बनी स्पैशल चिकनबिरयानी खिलानी थी. उस ने सोचा, शान में हांक दिया कि बड़ी अच्छी बनाता हूं. अब फंस गया बेटा समीर. तैयारी कर ले, वरना हो नहीं पाएगा.

लगभग 2 घंटे बाद सारा घर ही उस की भीषण तैयारी से बन रही बिरयानी की गवाही दे रहा था. हौल में प्याजलहसुन के छिलके पौलिथीन में पड़े थे. अदरक के छिलके चेस की गोटियां बने टेबल पर चिपके पड़े थे. मौली के संजोए सारे मसाले कैबिनेट से बाहर आ कर गैसस्टोव के अगलबगल पूरे प्लेटफौर्म पर जैसे मार्चपास्ट करने निकले थे.

फ्रिज तो ऐसे मुंहबाए खड़ा था मानो डकैती पड़ गई हो, उस में इक्कादुक्का सामान ही नजर आ रहा था. कई प्रकार के बरतन और टूल्स, यूटेंसिल्स, गजेट इस्तेमाल करने में कोई कोताही नहीं बरती गई थी, जो उन की बेकाबू भीड़ बता रही थी.

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समीर ने गूंधे आटे का सांप बना बिरयानी के पतीले का मुंह बंद किया तो उस ने कार्य पूरा कर लेने की खुशी में गर्व से चौड़ी मुसकान चेहरे पर फैला ली. घड़ी में 7 बज रहे थे. वह बिरयानी दम पर कर नहाने के लिए बाथरूम में जा घुसा. शावर के नीचे 2 मिनट ही हुए होंगे, दरवाजे की घंटी बजी थी.

तौलिया लपेट कर उस ने दरवाजा खोला था.

‘‘बन गई तेरी बिरयानी? सामान तो खूब फैला रखा है,’’ दोस्तों ने कहा.

‘‘क्यों, लाजवाब खुशबू आ नहीं रही,’’ एक ने चुटकी ली तो सब हंस पड़े.

‘‘बस यार, आने ही वाली है खुशबू. थोड़ा सब्र करो. यार, तुम सब कोल्डडिं्रक निकालो. मैं बस अपने बदन की खुशबू का इंतजाम कर अभी आया,’’ समीर जोरों से हंसा.

पतीले का आटा मुंह खोल चुका था. बिरयानी की खुशबू आने लगी थी. समीर पतीला उठा कर डाइनिंग टेबल पर ही ले आया, ‘‘है न जोरदार खुशबू,’’ वह मुसकराया.

किसी ने खीरा, किसी ने प्याज, किसी ने गाजर तो किसी ने टमाटर ढूंढ़ कर काटे, सलाद भी बन गया. सब ने अपनी प्लेटों में चाव से परोसा और खाने बैठ गए.

‘‘कैसी लगी?’’ समीर ने कौलर ऊंचा कर पूछा.

‘‘अबे नमक तो डाला ही नहीं, खुद खा कर देख, मिस्टर लाजवाब,’’ सब हंस पड़े.

‘‘ला भई, नमक ले आ,’’ ऊपर से डालडाल कर सब ने किसी तरह बिरयानी खाई और मूवी के लिए भागे.

मूवी से लौट कर समीर ने जूतेमोजे उतारे और वैसे ही कपड़ों में बिस्तर पर पड़े गीले टौवेल के ऊपर ही सो गया. सुबह रामकली आई तो चारों ओर कूड़ा व फैला सामान देख कर उस की किटकिट शुरू हो गई.

‘‘साहब, ऐसे तो मैं काम नहीं कर पाऊंगी, रोजरोज इतना काम, मेमसाहब आ जाएं, तो बुला लेना. मैं जाती हूं.’’

‘‘अरे, कहां जाती है, मैं दे दूंगा न फालतू पैसे. वो दोस्त आ गए तो क्या करूं, जल्दी निबटाओ, मुझे औफिस भी जाना है.’’

‘‘नहीं साहब, मुझे गांव जाना है,

8 बजे की ट्रेन पकड़नी है. मां की तबीयत खराब है, सोचा था काम जल्दी कर के बोल दूंगी. पर न हो पाएगा, साहब.’’ वह केवल सिंक के बरतन धो कर चली गई थी.

‘तू और तेरी मेमसाहब, चलो छुट्टी…’ मन में बुदबुदाते हुए उस ने दरवाजा बंद किया.

कोई सामान अपनी जगह नहीं था. पानी पीने को फ्रिज खोला तो एक बोतल भी नहीं मिली. बड़ी मुश्किल से वह तैयार हुआ. बाहर ही ब्रैकफास्ट कर लूंगा, कोई नहीं. वह औफिस के लिए निकल गया. औफिस में फोन आया था मौली का. मेरी बड़ी बूआ अपनी बेटी रिंकू को परीक्षा दिलाने के लिए रात की गाड़ी से दिल्ली पहुंच रही हैं. 4 दिन घर पर ही रुकेंगी, मैनेज कर लोगे न, बाद में मैं भी पहुंच ही जाऊंगी.’’

‘‘हांहां, डोंट वरी,’’ नईनई शादी है यह नहीं बोलता तो मरता क्या.

‘‘थैंक्यू डियर, तुम्हारी पाककला शौक के बारे में सुन कर तुम से बहुत खुश हैं, बूआ, मैं ने उन्हें बताया था.’’

घर लौट कर उस ने अपनी समझ से घर को काफी दुरुस्त किया और लललाला करते हुए बूआजी को स्टेशन लेने चला गया.

चौथे दिन जब मौली ने घर में प्रवेश किया तो उस की चीख निकलतेनिकलते बची, मुंह खुला रह गया. वह फटीफटी आंखों से अपने प्यारे घर को पहचानने की कोशिश कर रही थी. क्या हौल, क्या किचेन, क्या बैडरूम, बाथरूम, देखे नहीं जा रहे थे उस से. अजीब सी गंध से जल्दी ही उस का मुंह क्या, नाक भी सिकुड़ चुकी थी. सुना ही था लोगों से आज देख भी लिया, बिन सजनी घर.

‘बाप रे, कैसे सफाईपसंद बूआ और रिंकू ने यहां 3 दिन गुजारे होंगे. यह क्या किया समीर ने.’

‘‘समीर, दिस इज टू मच, यार,’’ उस ने घर का बिगड़ा नक्शा दिखा कर पूछना चाहा था.

‘‘क्या करता, बदमाश मेड तुम ने रखी थी, छुट्टी ले कर चली गई. मैं क्या करता?’’ खैर, ये सब छोड़ो, बूआजी और रिंकू मार्केट से आती होंगी. तुम फ्रैश हो कर जल्दी आओ और खाना लगाओ, आज तुम्हारी पसंद का सब बाहर से ले आया हूं,’’ वह मुसकराया. मौली के आ जाने से आज वह बेहद खुश, बहुत चैन की सांस ले रहा था. ललललाला करते हुए उस ने लाउड म्यूजिक लगा दिया.

फ्रैश…ऐसे कबाड़ में? फ्रैश होने से पहले तो दसियों काम करने को दिख रहे हैं, समीर.’’ पर समीर को लाउड म्यूजिक में कुछ न सुनाई दिया.

मौली ने सैंडल एक ओर कर चुन्नी कमर में बांधी और सब से पहले मेड का नंबर मिला दिया…

सांझ पड़े घर आना- भाग 2: नीलिमा की बौस क्यों रोने लगी

वह धीरे से अपनी सीट से उठी और मेरी साड़ी के पल्लू से मेरे आंसू पोंछने लगी. फिर सामने पड़े गिलास से मुझे पानी पिलाया और मेरी पीठ पर स्नेह भरा हाथ रख दिया. बहुत देर तक वह यों ही खड़ी रही. अचानक गमगीन होते माहौल को सामान्य करने के लिए मैं ने 2-3 लंबी सांसें लीं और फिर अपनी थर्मस से चाय ले कर 2 कपों में डाल दी.

उस ने चाय का घूंट भरते हुए धीरेधीरे कहना शुरू किया, ‘‘मैम, मैं तो आप से बहुत छोटी हूं. मैं आप के बारे में न कुछ जानती हूं और न ही जानना चाहती हूं. पर इतना जरूर कह सकती हूं कि कुछ गलतियां आप की भी रही होंगी… पर हमें अपनी गलती का एहसास नहीं होता. हमारा अहं जो सामने आ जाता है. हो सकता है आप को तलाक मिल भी जाए… आप स्वतंत्रता चाहती हैं, वह भी मिल जाएगी, पर फिर क्या करेंगी आप?’’ ‘‘सुकून तो मिलेगा न… जिंदगी अपने ढंग से जिऊंगी.’’

‘‘अपने ढंग से जिंदगी तो आज भी जी रही हैं आप… इंडिपैंडैंट हैं अपना काम करने के लिए… एक प्रतिष्ठित कंपनी की बौस हैं… फिर…’’ कह कर वह चुप हो गई. उस की भाषा तल्ख पर शिष्ट थी. मैं एकदम सकपका गई. वह बेबाक बोलती जा रही थी. मैं ने झल्ला कर तेज स्वर में पूछा, ‘‘मैं समझ नहीं पा रही हूं तुम मेरी वकालत कर रही हो, मुझ से तर्कवितर्क कर रही हो, मेरा हौंसला बढ़ा रही हो या पुन: नर्क में धकेल रही हो.’’

‘‘मैम,’’ वह धीरे से पुन: शिष्ट भाषा में बोली, ‘‘एक अकेली औरत के लिए, वह भी तलाकशुदा के लिए अकेले जिंदगी काटना कितना मुश्किल होता है, यह कैसे बताऊं आप को…’’ ‘‘पहले आप के पास पति से खुशियां बांटने का मकसद रहा होगा, फिर बेटी और उस की पढ़ाई का मकसद. फिर लड़ कर अलग होने का मकसद और अब जब सब झंझटों से मुक्ति मिल जाएगी तो क्या मकसद रह जाएगा? आगे एक अकेली वीरान जिंदगी रह जाएगी…’’ कह कर वह चुप हो गई और प्रश्नसूचक निगाहों से मुझे देखती रही. फिर बोली, ‘‘मैम, आप कल सुबह यह सोच कर उठना कि आप स्वतंत्र हो गई हैं पर आप के आसपास कोई नहीं है. न सुख बांटने को न दुख बांटने को. न कोई लड़ने के लिए न झगड़ने के लिए. फिर आप देखना सब सुखसुविधाओं के बाद भी आप अपनेआप को अकेला ही पाएंगी.’’

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मैं समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या कहना चाहती है. मेरे चेहरे पर कई रंग आ रहे थे, परंतु एक बात तो ठीक थी कि तलाक के बाद अगला कदम क्या होगा. यह मैं ने कभी ठीक से सोचा न था. ‘‘मैम, मैं अब चलती हूं. बाहर कई लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं… जाने से पहले एक बार फिर से सलाह दूंगी कि इस तलाक को बचा लीजिए,’’ कह वह वहां से चली गई.

उस के जाने के बाद पुन: उस की बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया. मेरी सोच का दायरा अभी तक केवल तलाक तक सीमित था…उस के बाद व्हाट नैक्स्ट? उस पूरी रात मैं ठीक से सो नहीं पाई. सुबहसुबह कामवाली बालकनी में चाय रख कर चली गई. मैं ने सामने वाली कुरसी खींच कर टांगें पसारीं और फिर भूत के गर्भ में चली गई. किसी ने ठीक ही कहा था कि या तो हम भूत में जीते हैं या फिर भविष्य में. वर्तमान में जीने के लिए मैं तब घर वालों से लड़ती रही और आज उस से अलग होने के लिए. पापा को मनाने के लिए इस के बारे में झूठसच का सहारा लेती रही, उस की जौब और शिक्षा के बारे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करती रही और आज उस पर उलटेसीधे लांछन लगा कर तलाक ले रही हूं.

तब उस का तेजतर्रार स्वभाव और खुल कर बोलना मुझे प्रभावित करता था और अब वही चुभने लगा है. तब उस का साधारण कपड़े पहनना और सादगी से रहना मेरे मन को भाता था और अब वही सब मेरी सोसाइटी में मुझे नीचा दिखाने की चाल नजर आता है. तब भी उस की जौब और वेतन मुझ से कम थी और आज भी है. ‘‘ऐसा भी नहीं है कि पिछले 25 साल हमने लड़तेझगड़ते गुजारे हों. कुछ सुकून और प्यारभरे पल भी साथसाथ जरूर गुजारे होंगे. पहाड़ों, नदियों और समुद्री किनारों के बीच हम ने गृहस्थ की नींव भी रखी होगी. अपनी बेटी को बड़े होते भी देखा होगा और उस के भविष्य के सपने भी संजोए होंगे. फिर आखिर गलती हुई कहां?’’ मैं सोचती रही गई.

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अपनी भूलीबिसरी यादों के अंधेरे गलियारों में मुझे इस तनाव का सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था. जहां तक मुझे याद आता है मैं बेटी को 12वीं कक्षा के बाद यूके भेजना चाहती थी और मेरे पति यहीं भारत में पढ़ाना चाहते थे. शायद उन की यह मंशा थी कि बेटी नजरों के सामने रहेगी. मगर मैं उस का भविष्य विदेशी धरती पर खोज रही थी? और अंतत: मैं ने उसे अपने पैसों और रुतबे के दम पर बाहर भेज दिया. बेटी का मन भी बाहर जाने का नहीं था. पर मैं जो ठान लेती करती. इस से मेरे पति को कहीं भीतर तक चोट लगी और वह और भी उग्र हो गए. फिर कई दिनों तक हमारे बीच अबोला पसर गया. हमारे बीच की खाई फैलती गई. कभी वह देर से आता तो कभी नहीं भी आता. मैं ने कभी इस बात की परवाह नहीं की और अंत में वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था. बेटी विदेश क्या गई बस वहीं की हो गई. फिर वहीं पर एक विदेशी लड़के से शादी कर ली. कोई इजाजत नहीं बस निर्णय… मेरी तरह.

प्यार न माने सरहद- भाग 2: समीर और एमी क्या कर पाए शादी?

Writer- Kahkashan Siddiqui

ताया को अधिक धार्मिक होते देख दादा ने एमी के पिता पर अधिक अनुशासन नहीं लगाया और वे इकोनौमिक्स के प्रोफैसर बन गए. एमी की मां नैंसी अमेरिकन थीं और पिता की सहपाठी. वे अब नरगिस हैं. उन्होंने इसलाम कुबूल कर लिया और दादादादी की देखरेख में नमाजी और उर्दू बोलने वाली बहू बन गईं. दादा तो अब नहीं रहे, दादी साथ रहती थीं, हिंदी फिल्मों की दीवानी. एक सुखी परिवार है.

एमी की परवरिश में देशी और अमेरिकी संस्कृति का समावेश था. अत: वह सभ्य, अनुशासित, समय की पाबंद थी. सुंदर थी, साथ ही अपनी सुंदरता को संवार कर और संभाल कर रखने वाली भी थी. अमेरिकियों की तरह सुबह जल्दी उठना, व्यायाम करना, रात में जल्दी सोना और वीकैंड पर घूमना उस की दिनचर्या में शामिल था. उस के घर में उर्दू भाषा ही बोली जाती. वह उर्दू जानती थी पर बोलती इंग्लिश में थी. एमी के विषय में जान कर समीर को अच्छा लगा. समीर को एमी से प्यार हो गया. वह हर कीमत पर उसे पाना चाहता था. परंतु पाकिस्तानी मूल का होना… कैसे बात बनेगी?

दोनों 6 महीनों से साथ थे. एकदूसरे में रुचि अब एकदूसरे को पाने की चाह में बदल गई थी.

एमी ने समीर को अपने घर वालों से मिलने के लिए बुलाया. घर वालों से यह कह कर मिलाया कि यह औफिस का मित्र है समीर. एमी की दादी को देख कर समीर को अपनी दादी याद आ गई. सलवारसूट में वैसी ही लग रही थीं. प्रोफैसर साहब बहुत हंसमुख थे. तुरंत घुलमिल गए. फुटबौल के दीवाने थे. सीएटल टीम के फैन. समीर को यहां का फुटबौल अजीब लगता था. हाथपैर दोनों से खेला जाता. अधिकतर बौल हाथ में ले कर भागते हैं.

एमी की मां सभ्यशालीन महिला थीं. एमी बिलकुल अपनी मां जैसी थी. एमी की मां ने बिलकुल देशी खाना बनाया था. समीर लखनऊ से है, यह सुन कर दादी तो गदगद हो गईं. अपने बचपन के मायके के किस्से सुनाने लगीं. एक लंबे समय बाद वह इतनी देर हिंदी में बोला. उसे अच्छा लगा. यहां तो वह जब से आया है मुंह टेढ़ा कर के ऐक्सैंट में बोलने की कोशिश करता रहा है.

समीर ने ध्यान दिया दादी, प्रोफैसर, नरगिस सभी उर्दू में बात करते हैं. पर एमी इंग्लिश में जवाब देती. कभीकभी हिंदी में भी. उर्दूहिंदी एकजैसी भाषाएं हैं, जिन्हें वह अपने यहां भी सुनताबोलता था. बस इन के उर्दू में कुछ शब्द गाढ़े उर्दू के हैं पर बात समझ में आ जाती है. उसे यहां अपनापन लगा. एमी के घर वालों को भी समीर अच्छा लगा और उसे बराबर आते रहने का न्योता दिया.

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एमी ने समीर के जाने के बाद जब घर वालों से पूछा कि समीर उन्हें कैसा लगा तो वे लोग बोले कि अच्छा है. तब उस ने बताया कि समीर और वह शादी करना चाहते हैं.

यह सुन उस की दादी तो खुश हो गईं क्योंकि वह उन के मायके से जो था और उन्हें समीर नाम से मुसलमान लगा था. प्रोफैसर ने आपत्ति की कि वह पाकिस्तानी नहीं भारतीय है. एमी की मां ने अपना शक जाहिर करते हुए कहा कि कहीं ग्रीन कार्ड के लालच में शादी तो नहीं करना चाहता है. लड़के को अमेरिकन सिटीजन होना चाहिए.

एमी ने धीरेधीरे समीर के बारे में 1-1 बात बताई कि वह भारतीय भी है और हिंदू भी. उस का परिवार भारत में है. अत: कभी भी वापस जा सकता है.

दादी, प्रोफैसर और नरगिस सब ने एकसाथ आपत्ति की कि हिंदू से शादी नहीं हो सकती.

एमी बोली, ‘‘अब तक वह आप सब को बहुत पसंद था पर उस के हिंदू और भारतीय होने से वह बुरा कैसे हो गया?’’

जब कोई प्यार में होता है तो उसे धर्म, भाषा, नागरिकता कुछ दिखाई नहीं देता. दिखता है तो केवल प्यार से भरा मन और वह व्यक्ति जो उस के साथ जीवन बिताना चाहता है. वहीं दूसरे लोगों को व्यक्ति और उस का मन, उस के गुण नहीं दिखते, केवल धर्म दिखता है.

‘‘डैडी आप और ममा ने भी तो दूसरे धर्म में शादी की थी, फिर आप लोग कैसे कह रहे हैं?’’

‘‘बेटी, तुम्हारी मां को हम अपने घर लाए थे. वह हम में रचबस गई. उस ने इसलाम कुबूल कर लिया. तुम्हें दूसरे घर जाना है. यह अंतर है. कल को वह लड़का तुम्हें हिंदू बना ले तो तुम्हारी तो आखरत (मरने के बाद की जिंदगी) गई.’’

एमी ने समीर को सारी बातें बताईं और कहा, ‘‘हम दोनों को जब कोई प्रौब्लम नहीं तो उन्हें क्यों है? हम जब चाहें शादी कर सकते हैं. हमें कोई रोक नहीं सकता पर मैं चाहती हूं कि मेरी फैमिली मेरे साथ हो,’’ यह एमी की देशी परवरिश की सोच थी.

समीर ने कहा, ‘‘तुम मेरा साथ दोगी?’’

‘‘मरते दम तक.’’

‘‘तो ठीक है अपने घर वालों से मेरी मीटिंग करवाओ.’’

रविवार को समीर एमी के घर वालों से मिलने गया. शाहरुख खान की मूवी की डीवीडी दादी के लिए ले गया. दादी शाहरुख खान की दीवानी थीं सो खुश हो गईं. प्रोफैसर कुछ ठंडे थे. समीर ने उन से सीएटल टीम फुटबौल की बातें छेड़ दीं. वे भी सामान्य हो गए. नरगिस के लिए कबाब ले गया था. वे भी कुछ नौर्मल हो गईं.

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फिर समीर ने अपनी मंशा बताई, ‘‘मैं और एमी एकदूसरे से प्यार करते हैं…जीवन भर साथ रहना चाहते हैं…शादी करना चाहते हैं. मगर आप सब की मरजी से…’’ मैं नेशनैलिटी के लिए शादी नहीं कर रहा हूं. मेरी कंपनी ने मेरा ग्रीन कार्ड अप्लाई कर दिया है. हां, मैं इंडियन हूं और मैं भारत आताजाता रहूंगा, मेरे परिवार को जब भी मेरी आवश्यकता होगी मैं उन के पास जाऊंगा… इसी प्रकार जब आप लोगों को भी मेरी जरूरत होगी तो मैं आप का भी साथ दूंगा. रहा धर्म तो यदि मैं आप को दिखाने के लिए मुसलिम बन जाऊं और मन से हिंदू रहूं तो आप क्या कर सकते हैं? धर्म में हम उसे ही याद करते हैं जिसे न आप ने देखा न मैं ने. उसे किस नाम से पुकारें इस पर लड़ाई है, किस प्रकार याद करें इस पर सहमति नहीं. इंसान जिन्हें एकदूसरे से प्यार है वे इसलिए शादी नहीं कर सकते, क्योंकि वे ऊपर वाले को अलगअलग नामों से पुकारते हैं, अलगअलग तरह से याद करते हैं.’’

लक्ष्य- भाग 3: क्या था सुधा का लक्ष्य

तभी निलेश ने उस का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘मां, यह सुधा है, दिल्ली से आई है. कालेज में मेरे साथ पढ़ती थी.’’ उस की मां सुधा से औपचारिक बातें करने लगीं, पर सुधा की नजरें दीवार पर लगी उस तसवीर पर टिकी थीं.

निलेश ने कहा, ‘‘सुधा, यह मेरे पिताजी की तसवीर है. वह पलंग से उठ कर उस तसवीर को स्पर्श कर भावविह्वल हो गई. उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. निलेश की मां देख कर समझ गई कि  यह बहुत भावुक लड़की है.’’

उन्होंने उस का ध्यान हटाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘बेटी, मेरे पति जिंदा होते तो तुम्हें देख कर बहुत खुश होते, पर नियति को कौन टाल सकता है. आओ, मेरे पास बैठो. लगता है तुम मेरे बेटे से बहुत प्यार करती हो. तभी तो इतनी दूर से मिलने आई हो वरना इस कुटिया में कौन आता है. मेरी बूढ़ी आंखें कभी धोखा नहीं खा सकतीं. क्या तुम मेरे बेटे को पसंद करती हो?’’

यह सुन सुधा ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘हम और निलेश कालेज में बहुत अच्छे दोस्त थे.’’

जब निलेश की मां ने कहा, ‘‘तो क्या अब नहीं हो?’’ मुसकराते हुए उस ने बड़ी सहजता से कहा, ‘‘हां, अभी भी मैं उस की दोस्त हूं, तभी तो मिलने आई हूं.’’

निलेश की मां मुसकराने लगीं, और उस के सिर पर हाथ रख कहा, ‘‘सदा खुश रहो बेटी, मेरा बेटा बहुत अच्छा है, पर मेरी बीमारी के कारण वह कोई डिगरी न पा सका. मैं ने बहुत समझाया कि दिल्ली जा कर अपनी पढ़ाई पूरी कर ले, मेरा क्या है, आज हूं कल नहीं रहूंगी. पर उस की तो पूरी जिंदगी पड़ी है.’’

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सुधा ने तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘मांजी, आप बहुत जल्दी ठीक हो जाएंगी. आप को इस हालत में छोड़ कर कोई भी बेटा कैसे जा सकता था?’’

तभी निलेश चाय का प्याला ले कर कमरे में उपस्थित हुआ और सुधा की बातें सुन कर सोचने लगा कि क्या यह वही सुधा है? जो परिवार की जिम्मेदारी के नाम से कोसों दूर भागती थी. मां को खुश करने के लिए कितना अच्छा नाटक कर रही है. न जाने क्यों झूठी तसल्ली दे रही है. वह उस के करीब जा कर कहने लगा, ‘‘सुधा, तुम सफर में थक गई होगी, फ्रैश हो कर चाय पी लो.’’ चाय मेज पर रखते हुए उसे आदेश दिया.

निलेश की मां पलंग से उठीं और अपने कमरे से बाहर चली गईं ताकि वे दोनों आपस में बातें कर सकें. उन के जाते ही सुधा निलेश से सवाल कर बैठी,  ‘‘निलेश, क्या चाय तुम ने बनाई है?’’

‘‘हां, सुधा, मुझे सबकुछ काम करना आता है और कोई है भी तो नहीं हमारी मदद करने के लिए घर में.’’

सुधा आश्चर्यचकित होती हुई बोली, ‘‘तुम लड़का हो कर भी अकेले कैसे सब मैनेज कर लेते हो. अब तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए, ताकि तुम्हें जीवन में कुछ आराम तो मिलता.’’

निलेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘यह तुम कह रही हो सुधा. आजकल की लड़कियां घर की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं रहना चाहतीं. हर लड़की के सपने होते हैं. किसी लड़की के उन सपनों को मैं बिखेरना नहीं चाहता. मैं जैसा भी हूं, अकेले ही ठीक हूं.’’

सुधा अचानक एक प्रश्न कर बैठी, ‘‘क्या तुम मुझ से शादी करना चाहोगे?’’

वह उस की तरफ देख कर फीकी हंसी हंसते हुए बोला, ‘‘सुधा, क्यों मजाक कर रही हो?’’

‘‘यह मजाक नहीं निलेश, हकीकत है. क्या तुम मुझ से शादी करोगे? तुम से बिछड़ने के बाद एहसास हुआ कि जीवन में एक हमसफर तो होना ही चाहिए. अब जीवन में मुझे किसी चीज की कोई कमी नहीं है. मैं ने जो चाहा, सब किया पर खुशी की तलाश में अब तक भटक रही हूं. मुझे लगता है कि वो खुशी तुम हो, कोई और नहीं. न जाने क्यों दिल तुम्हें ही पुकारता रहा. तुम ने ठीक कहा था. प्यार कब किस से हो जाए पता नहीं चलता, जब पता चला तो दिल पर तुम्हारा ही नाम देखा. तुम्हारी प्यारभरी बातें, मुझे सोने नहीं देतीं.’’

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‘‘यही तो प्यार है, सुधा, दो दिल मिलते हैं पर कभीकभी एकदूजे को समझ नहीं पाते, और जब समझते हैं तो बहुत देर हो जाती है. सुधा, सच तो यह है कि मैं तुम्हें खुश नहीं रख पाऊंगा. क्या तुम इस गांव के वातावरण में मेरे साथ रह पाओगी? मेरी परिस्थिति अब तुम्हारे सामने हैं. जैसी जिंदगी तुम्हें चाहिए, मैं नहीं दे सकता. तुम्हें बंधन पसंद नहीं और मैं उन्मुक्त नहीं. तुम्हारे सपने अधूरे रह जाए, यह मुझे मंजूर नहीं.’’

चाय की चुस्की लेते हुए सुधा ने कहा, ‘‘निलेश, मेरे सपने तो अब पूरे होंगे. अब तक मैं शहर के बच्चों को पढ़ाती रही, चित्रकला भी सिखाती रही पर अब तुम्हारे गांव के बच्चों के साथ बिताना चाहती हूं. शहर में तो सभी रहना चाहते हैं, पर अब मैं तुम्हारे गांव के बच्चों को पढ़ाऊंगी. एक अलग अनुभव होगा मेरे जीवन में. इस तरह तुम्हारी मां की देखभाल भी कर पाऊंगी, अब मेरा नजरिया बदल गया है. जिम्मेदारी और प्यार का एहसास तो तुम्हीं ने कराया है. तुम ठीक कहा करते थे कि बंधन में सुख भी होता है और दुख भी.’’

वह सुधा की बातें सुन, अवाक उसे देखने लगा. उस का जी चाहा कि सुधा को गले लगा ले. वह सोचने लगा, वक्त ने सुधा को कितना परिपक्व बना दिया या मेरी जुदाई ने प्यार का एहसास करा दिया है कि जब किसी से प्यार होता तो सभी परिस्थितियां अनुकूल दिखाई देने लगती हैं.

‘‘क्या सोच रहे हो, निलेश, दरअसल, तुम से जुदा हो जाने के बाद मुझे एहसास हो गया कि दोस्ती और प्यार के बिना इंसान जीवनपथ पर चल नहीं सकता. कभी न कभी औरत हो या पुरुष दोनों को जीवन में एकदूसरे की आवश्यकता होती ही है. फिर तुम क्यों नहीं मेरी जिंदगी में. आज उस प्यार को स्वीकार करने आई हूं जो कभी ठुकरा दिया था. बोलो, क्या मुझे स्वीकार करोगे?’’

‘‘सुधा, बात स्वीकार की नहीं, लक्ष्य की है. तुम तो अपनी सफलता की सारी मंजिले पार कर गई. पर मैं आज भी लक्ष्यविहीन हूं. तुम्हारे शब्दों में कहूं तो समय पर भरोसा जो करता था.’’

उसे दिलासा देते हुए सुधा ने कहा, ‘‘निलेश, परिस्थितियां इंसान को बनाती हैं, और बिगाड़ती भी हैं. इस में तुम्हारा कोई दोष नहीं. तुम ने तो अपनी मां के लिए अपना कैरियर दांव पर लगा दिया. ऐसा बेटा होना भी तो आजकल इस संसार में दुर्लभ है. क्या तुम्हारा यह लक्ष्य नहीं? आज मुझे तुम पर गर्व है. तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. तुम्हारे पास अभी भी समय है, अपनी अधूरी शिक्षा पूरी कर सकते हो. बीए कर सेना में भरती हो सकते हो तुम्हारे पिता की भी यही इच्छा थी न?’’

यह सुन निलेश की खुशी का ठिकाना न रहा,‘‘तुम सचमुच ग्रेट हो. यहां आते ही मेरी हर समस्या को तुम ने ऐसे सुलझा दिया जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो.’’

तभी दरवाजे की ओर से निलेश की मां ने जब यह सुना तो खुशी से फूले न समाईं. अपने बेटे के भविष्य को ले जो उन के हृदय पर संकट के बादल घिर आए थे, वे सब छंट गए. आगे बढ़ कर सुधा को उन्होंने गले लगा लिया.

सुधा ने कहा, ‘‘आंटी, यदि आप इजाजत दें तो मैं अपनी नौकरी और शहर छोड़ कर यहीं आ जाऊं?’’

‘‘आंटी नहीं, सुधा, आज से तुम मुझे मां कहोगी,’’ निलेश की मां ने जब यह कहा तो दोनों मुसकरा पड़े. सुधा ने अपने मातापिता की इजाजत ले कर निलेश से शादी कर ली और गांव में ही जीवन व्यतीत करने लगी.

निलेश ने स्नातक की परीक्षा पास कर सेना में भरती होने के लिए अर्जी दे दी थी. आज वह अपने देश की सीमा पर तैनात है. शादी के 6 महीने बाद ही निलेश की मां की मृत्यु हो गई थी.

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आज वे जीवित होतीं तो कितनी खुश होतीं. सीमा पर तैनात निलेश यही सोच रहा है. शायद यही जीवन की रीत है. कभी मिलती खुशी तो कभी गम की लकीर. पर जिंदगी रुकती तो नहीं है. सुधा ठीक तो कहा करती थी कि इंसान चाहे तो कभी भी, कुछ भी कर सकता है. पर आज अगर अपने लक्ष्य तक पहुंचा हूं तो सुधा के सहयोग से. जीवन का हमसफर साथ दे तो कोई भी जंग इंसान जीत सकता है.

Manohar Kahaniya: कातिल घरजमाई- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

तेजस की चुप्पी से धीरेधीरे शोभना की हिम्मत बढ़ती गई और वह जब देखो तब तेजस का अपमान करने लगी. उसी को ही नहीं, उस के मांबाप और भाईबहन को भी अपशब्द कहने लगी थी. उन का आनाजाना तो उस ने कब का बंद करा दिया था.

तेजस को उन से फोन पर भी बातें करते देख या सुन लेती तो उस के बाद तेजस की जम कर बेइज्जती करती ही, फोन छीन कर उन लोगों को भी बुरी तरह बेइज्जत करती.

अपमान का घूंट पी कर रह जाता तेजस

इस से तेजस दुखी तो रहता ही था, उसे शोभना के साथ रहने में घुटन सी होने लगी थी. अब वह ससुराल में बिलकुल नहीं रहना चाहता था. पर मजबूरी में उसे रहना पड़ रहा था.

ऐसे में ही उस ने कुछ दिनों पहले शोभना से कहा भी था, ‘‘अब अगर तुम ने मेरे घर वालों को कुछ कहा तो मैं तुम्हारे साथ या तुम्हारे और अपने साथ कुछ कर लूंगा.’’

एक तरह से तेजस ने शोभना को धमकी दी थी. यह बात शोभना ने अपनी मां से बताई भी थी. पर उस समय किसी ने तेजस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया था. आखिर उस ने जो धमकी दी थी, पूरी ही कर डाली.

इधर शोभना की मांगें भी बढ़ गई थीं. जब देखो, तब वह किसी न किसी चीज की फरमाइश करती रहती थी. तेजस की आमदनी सीमित थी. इसलिए पत्नी की हर मांग वह पूरी नहीं कर सकता था. मांग पूरी न होने पर शोभना तेजस को बुरी तरह अपमानित कर देती.

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शोभना अपने घर में ही नहीं, मांबाप और भाई के सामने भी उस की शिकायत कर के उसे अपमानित करती. एक तरह से शोभना ने उस का जीना हराम कर दिया था. उस की हालत ऐसी कर दी थी कि वह न जी सकता था और न मर सकता था.

इधर शोभना ने तेजस पर एक आरोप और लगा दिया. इस में कितनी सच्चाई थी, यह तो तेजस जानता था या शोभना. शोभना का कहना था कि तेजस के किसी अन्य महिला से अवैध संबंध हैं. किस से संबंध हैं, यह शोभना किसी को नहीं बता सकी. इस बात को वह साबित भी नहीं कर सकी.

पर इस बात को ले कर घर में रोज झगड़ा होने लगा था. इस बात को ले कर शोभना ने तो उस का जीना हराम कर ही रखा था, सासससुर और सालेसलहज भी उसे परेशान कर रहे थे.

तेजस का दुख ऐसा था, जिसे वह किसी से कह नहीं सकता था. कहता भी किस से, कोई सुनने वाला भी तो नहीं था. ससुराल में उस की कोई सुनता नहीं था. घर वालों से वह कुछ कह नहीं सकता था. क्योंकि शोभना उसे कहने ही नहीं देती थी. अगर कहता भी तो घर वाले कुछ कर नहीं सकते थे. इसलिए तेजस मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगा.

सारी परेशानी की जड़ नजर आई पत्नी

इस सारी परेशानी की जड़ उसे शोभना ही लग रही थी. इसलिए अब उस के मन में आने लगा कि अगर शोभना को खत्म कर दिया जाए तो उस की सारी परेशानी खत्म हो जाएगी.

लेकिन शोभना को खत्म करना उस के लिए आसान नहीं था. पर आदमी जब परेशान हो जाता है तो उसे कोई भी काम मुश्किल नहीं लगता. तेजस भी शोभना से इतना परेशान और दुखी हो चुका था कि वह उस की हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बारे में सोचने लगा.

आखिर में गृहक्लेश और प्रेम प्रकरण के आरोप से तंग आ कर घरजमाई के रूप में अपमान का घूंट पीते हुए तेजस इस बात पर विचार करने लगा कि पत्नी और बेटी को कैसे ठिकाने लगाया जाए?

इस के लिए वह यूट्यूब और गूगल पर सर्च करने लगा कि चूहे को मारने वाला जहर कौनकौन सा है, मौत कैसे होती है  हाऊ टू गिव डेथ रैट किलर व्हाट इफेक्ट आन मैन, पौइजन, द रैट किलर पौइजन, हाऊ टू किल ए मैन विद पिलो.

पूरी जानकारी एकत्र कर तेजस चूहा मारने वाली दवा खरीद लाया. 10 अक्तूबर, 2021 को उस ने अपनी योजना को अंजाम देने के लिए शाम को आइसक्रीम ला कर रख दी.

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रात का खाना खा कर काव्या रात करीब 10 बजे अपनी मामी के साथ सोसायटी के कौमन प्लौट में गरबा खेलने चली गई. शोभना घर में ही थी. तेजस भी घर में ही था. पर उस के हावभाव से ऐसा कुछ नहीं लग रहा था कि वह इतना बड़ा कांड करने वाला है. हां, वह शांत जरूर था.

रात साढ़े 11 बजे काव्या गरबा खेल कर ऊपर आई तो तेजस ने जहर मिली आइसक्रीम पत्नी और बेटी को खाने को दी और खुद बिना जहर मिली आइसक्रीम खाई. आइसक्रीम खा कर सभी सोने के लिए लेट गए.

शोभना और काव्या तो सो गईं, पर तेजस जागता रहा. रात साढ़े 12 बजे जहर ने अपना असर दिखाया तो शोभना जाग गई. तकलीफ की वजह से वह रोने लगी तो तेजस फुरती से उठा और शोभना के सीने पर सवार हो कर उस का गला पकड़ कर दबाने लगा. शोभना ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की तो इसी छीनाझपटी में तेजस का नाखून शोभना के गले में लग गया.

करीब 10 मिनट तक गला दबाए रहने के बाद जब तेजस को विश्वास हो गया कि अब शोभना मर गई है तो उस के बाद उस ने काव्या के मुंह पर तकिया रख कर दबाया कि कहीं बेटी जीवित न रह जाए.

इस की वजह यह थी कि वह नहीं चाहता था कि काव्या जीवित रहे. क्योंकि अगर वह जीवित रह गई तो वह उसे कैसे अपना मुंह दिखाएगा? क्योंकि उस ने उस की मां की हत्या की है.

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जहर देने और गला दबाने के बाद भी वह करीब एक घंटे तक यह देखता रहा कि कहीं मांबेटी जीवित तो नहीं हैं. जब उसे पूरा विश्वास हो गया कि मांबेटी मर चुकी हैं, तब रात करीब डेढ़ बजे नीचे जा कर उस ने साले को जगा कर बताया कि पता नहीं क्यों शोभना उठ नहीं रही है. इस के बाद जब शोभना और उस की बेटी को अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि उन की तो मौत हो चुकी है.

तेजस से पूछताछ के बाद पुलिस ने सारे सबूत जुटा कर डीसीपी लखधारी सिंह झाला ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर मांबेटी की हत्या का खुलासा किया. इस के बाद 13 अक्तूबर को तेजस पटेल को बड़ौदा की अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया.

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