खुद को और स्टाइलिश बनाने के लिए फौलो करें शाहिद के ये लुक्स

फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने एक्टर “शाहिद कपूर” अपनी आने वाली फिल्म ‘कबीर सिंह’ को लेकर काफी चर्चा में है. स्टाइल आइकन और लड़कियों में खासा पौपुलर  शाहिद अपने लुक्स के लिए  जाने जाते है. इसी  के चलते शाहिद अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर स्पेशल लुक्स फैंस के साथ शेयर करते रहते हैं जिसे उनके फैंस काफी फौलो करते हैं. तो अगर आप भी अपने कौलेज, औफिस और पार्टीज़ में शाहिद की तरह कूल दिखना चाहते हैं तो आप भी ट्राय करें ये लुक्स.

मेन इन ब्लैक…

 

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हाल ही में शाहिद कपूर ने अपने इंस्टाग्राम पर एक फोटो शेयर की थी जिसमें उनहोनें ब्लैक प्लेन टी-शर्ट के ऊपर ब्लैक जैकेट और ब्लैक कलर की ही ‘rugged’ जींस पहनी हुई है. शाहिद इस  ड्रेस में बहुत कमाल लग रहें थे. अगर आप भी अपनी डेली-लाईफ और कौलेज में कूल दिखना चाहते हैं तो ट्राय कर सकते है शहिद का ये  कैसुअल लुक.

पार्टी में ओरों से अलग दिखने के लिए अपनाएं शाहिद का ये लुक…

 

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#kabirsingh 15 days to go.

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शाहिद का एक फोटो नज़र आया है जिसमें उन्होनें व्हाईट कलर की प्लेन टी-शर्ट के ऊपर डिज़ाईनर ब्लेज़र और डिज़ाईनर ट्राउज़र पहना है. शाहिद का ये ट्रेंडी डिज़ाईनर लुक फैंस को बेहद पसंद आया है तो अगर आप भी अपनी कौलेज पार्टी में सबसे ट्रैंडी दिखना चाहते हैं ता अपनाएं ये लुक.

इम्प्रेसिव दिखने के लिए ट्राय करें शाहिद का ये आउट-फिट…

 

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#kabirsingh

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शाहिद का एक कैसुअल लुक भी देखने को मिला है जिसमें उनहोनें ब्लैक कलर की प्लेन टी-सर्ट के ऊपर ब्लू लैदर जैकेट और ब्राउन कलर का जोगर पहना हुआ है. इस आउट-फिट के साथ शाहिद व्हाईट कलर के शूज़ पहने नज़र आ रहे हैं. आप भी कूल दिखने के लिए अपनी डेली-रूटीन में ये कैसुअल लुक ट्राय कर सकते हैं.

गर्मियों में ट्राय करे शाहिद का ये लुक…

 

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#kabirsingh promotion chalu machaaaa !!!

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गर्मियों के मौलम में लोगों को ये तय करने में काफी प्रौब्लम आती है की उन्हे ऐसा क्या पहनना चाहिए जिससे की वे कम्फरटेबल फील करें. इसके लिए आप शाहिद के इस लुक को अपना सकते हैं जिसमें उनहोनें येल्लो कलर के कुर्ते के साथ ब्लैक कलर का शोर्ट लोअर पहन रखा है. आप भी गर्मियों में अपना सकते हैं शाहिद का ये लुक.

बता दें की शाहिद कपूर की अप्कमिंग फिल्स ‘कबीर सिंह’ 21 जून को रिलीज़ होगी और इस फिल्म में शाहिद के साथ कियारा अडवानी भी नज़र आएंगी.

नोक वाला जूता

लेखक-  हरीश जायसवाल 

राजनगर थाने के इंचार्ज इंसपेक्टर राजेश कदम थाने में चहलकदमी कर रहे थे. उन के चेहरे पर परेशानी के भाव नहीं थे. इस की वजह यह थी कि पिछले 4-6 दिनों से मेट्रो सिटी के इस थाने में कोई गंभीर घटना नहीं हुई थी. अलबत्ता छोटीमोटी चोरी, मारपीट, जेबतराशी वगैरह की घटनाएं जरूर हुई थीं. इंसपेक्टर राजेश कदम अपनी कुरसी पर बैठने ही वाले थे कि अचानक फोन की घंटी बज उठी.

‘‘हैलो, राजनगर पुलिस स्टेशन से बोल रहे हैं?’’ फोन करने वाले ने प्रश्न किया.

‘‘जी, मैं बोल रहा हूं.’’ राजेश कदम ने जवाब दिया.

‘‘सर, मैं सुनयन हाउसिंग सोसाइटी से सिक्योरिटी गार्ड बोल रहा हूं. यहां 8वें माले के फ्लैट नंबर 3 में रहने वाले सुरेशजी ने खुद को आग लगा ली है. आत्महत्या का मामला लगता है. आप तुरंत आ जाइए.’’ सूचना देने वाले ने कहा.

‘‘सुरेशजी की मौत हो गई है या अभी जिंदा हैं?’’ राजेश कदम ने पूछा.

‘‘सर, लगता तो ऐसा ही है.’’ फोन करने वाले ने जवाब दिया.

‘‘ठीक है, हम वहां पहुंच रहे हैं. ध्यान रखना कोई भी व्यक्ति अंदर ना जाए और न ही कोई किसी चीज को हाथ लगाए.’’ राजेश कदम ने निर्देश दिया.

अपराह्न के करीब पौने 3 बज रहे थे. सुनयन हाउसिंग सोसायटी पुलिस स्टेशन से ज्यादा दूरी पर नहीं थी. सूचना मिलने के लगभग 10 मिनट के अंदर ही राजेश कदम अपनी पुलिस टीम के साथ सुनयन हाउसिंग सोसायटी पहुंच गए. फ्लैट के बाहर 15-20 लोग खड़े थे. लोगों में ज्यादातर महिलाएं थीं, क्योंकि पुरुष अपनेअपने काम पर गए हुए थे. गार्ड समेत 4 पुरुष और थे.

‘‘जी, नमस्कार. मेरा नाम सुरजीत है और मैं इस सोसायटी का सेक्रेटरी हूं.’’ एक 55-60 साल के आदमी ने आगे आ कर अपना परिचय दिया.

‘‘आप को इस घटना की सूचना कब और कैसे मिली?’’ इंसपेक्टर राजेश कदम ने पूछा.

‘‘जी, करीब आधे घंटे पहले गार्ड राम सिंह ने राउंड लेते समय नीचे से देखा कि इस फ्लैट से काफी धुआं निकल रहा है तो उस ने इस की सूचना मुझे दी. हम लोग तुरंत यहां आए, लेकिन फ्लैट में औटो लौक होने की वजह से दरवाजा बंद था.

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‘‘सोसायटी औफिस में रखी मास्टर की से जब फ्लैट खोला गया तो यह नजारा था. सुरेश के बदन में आग लगी हुई थी, वह जमीन पर पड़ा हुआ था.

‘‘हम ने उसे काफी आवाजें दीं लेकिन कोई हलचल न होते देख हम ने समझ लिया कि यह मर चुका है. इस के बाद मैं ने आप को सूचना दी. साथ ही किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया ताकि किसी चीज से किसी तरह की छेड़छाड़ न हो.’’ सुरजीत ने सारा विवरण एक ही बार में सुना दिया.

‘‘गुड,’’ इंसपेक्टर राजेश ने प्रशंसात्मक स्वर में कहा, ‘‘वैसे यह फ्लैट क्या सुरेश का खुद का है?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘नहीं, इस फ्लैट के मालिक तो मिस्टर परेरा हैं, जो पुणे में रहते हैं. सुरेश किसी इंपोर्ट एक्सपोर्ट बिजनैस में डील करता था. जब कभी कोई शिपमेंट होता, तब वह 15-20 दिन यहां रहता था.’’ सुरजीत ने बताया.

‘‘मिस्टर परेरा से तो हम बाद में बात करेंगे. वैसे आप का व्यक्तिगत मत क्या है, आप को क्या लगता है?’’ राजेश ने सुरजीत से पूछा.

‘‘ऐसा लगता है जैसे सिगरेट सुलगाते समय गलती से पहने हुए कपड़ों में आग लग गई. अचानक लगी आग से धुआं उठा और दम घुटने की वजह से सुरेश सिर के बल फ्लोर पर गिरा. सिर पर गहरी चोट लगने के कारण बेहोश हो गया और आग से उस की मौत हो गई. देखिए, उस के पास जली हुई सिगरेट भी पड़ी हुई है.’’ सुरजीत ने आशंका जाहिर की.

‘‘अच्छा औब्जर्वेशन है आप का मिस्टर सुरजीत. वैसे आप करते क्या हैं?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘जी, मैं एक प्राइवेट कंपनी में सिस्टम एनालिस्ट था, अब रिटायर हो चुका हूं.’’ सुरजीत ने बताया.

‘‘गुड एनालिसिस.’’ राजेश ने फिर तारीफ की और अपने साथ आए फोटोग्राफर को अलगअलग एंगल से फोटो लेने को कहा. अपनी टीम से लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने और जांच पूरी होने तक किसी भी चीज के साथ छेड़छाड़ न करने की हिदायत दे कर इंसपेक्टर राजेश कदम थाने लौट आए.

अगले दिन इंसपेक्टर कदम अपने सहयोगी एसआई आदित्य वर्मा के साथ बैठे थे. दोनों के बीच मेज पर घटनास्थल और सुरेश की लाश के फोटो फैले थे, जिन्हें वह बड़े ध्यान से देख रहे थे. बीते दिन घटनास्थल और लाश की सारी औपचारिकताएं वर्मा ने ही पूरी की थीं.

इंसपेक्टर कदम ने वर्मा से पूछा, ‘‘आप का क्या विचार है, इस केस के संदर्भ में मिस्टर वर्मा?’’ फोटोग्राफ्स को देखते हुए इंसपेक्टर राजेश कदम ने पूछा.

‘‘मैं भी सोसायटी के सेक्रेटरी सुरजीत की राय से सहमत हूं. यह एक एक्सीडेंट है, जो लापरवाही से सिगरेट जलाने के कारण हुआ.’’ एसआई वर्मा ने अपनी राय दी.

‘‘अब सिगरेट कंपनियों को अपनी चेतावनी के साथ यह भी लिखना चाहिए कि सिगरेट सावधानीपूर्वक सुलगाएं वरना आप की जान भी जा सकती है.’’ पास खड़े फोटोग्राफर ने मजाक में कहा.

‘‘वैसे आप का औब्जर्वेशन क्या है, सर?’’ वर्मा ने राजेश कदम से पूछा.

‘‘मेरा औब्जर्वेशन कहता है कि सुरेश सिगरेट पीता ही नहीं था.’’ राजेश ने जवाब दिया.

‘‘क्या?’’ वर्मा व फोटोग्राफर दोनों चौंक कर आश्चर्य से राजेश का मुंह देखने लगे.

‘‘आप यह बात कैसे कह सकते हैं?’’ वर्मा ने प्रश्न किया.

‘‘इन फोटोग्राफ्स को ध्यान से देखिए. अगर सिगरेट सुलगाने से कपड़ों ने आग पकड़ी होती तो आसपास कहीं माचिस या लाइटर जरूर होता. पर यहां पर दोनों ही चीजें दिखाई नहीं पड़ रहीं, जली हुई भी नहीं.

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‘‘दूसरे सुलगाते समय सिगरेट या तो होठों के बीच होती या हाथों की अंगुलियों के बीच, जो जल चुकी होती और हम उस की राख भी नहीं देख पाते. पर यहां पर सिगरेट लाश से 2 फीट की दूरी पर पड़ी है. अगर आग लगाने की वजह से सिगरेट फेंकी गई होती तो उसे पूरी ताकत लगा कर फेंका गया होता. उस कंडीशन में सिगरेट को कम से कम 4-5 फीट की दूरी पर गिरना चाहिए था.

‘‘तीसरी बात जिस तेजी से आग फैली और काला धुआं निकला, वह सिर्फ तन के कपड़ों के जलने से नहीं निकल सकता. सब से महत्त्वपूर्ण बात धुएं से जो काले निशान जमीन पर पड़े, उस में एक हलका सा निशान जूतों का दिखाई पड़ रहा है. जोकि नुकीली नोक वाले जूते का है. सुरेश ने मरते समय घर में पहनी जाने वाली स्लीपर पहनी हुई थी, जूते नहीं.’’ राजेश कदम ने दोनों को अपनी विवेचना के बारे में विस्तार से बताया.

‘‘मतलब यह एक मर्डर केस है?’’ वर्मा ने पूछा.

‘‘बिलकुल. सिगरेट तो हमें बहकाने के लिए डाली गई है.’’ राजेश ने पूरे विश्वास के साथ कहा.

‘‘पर वहां जलाने के लिए पैट्रोल, डीजल, केरोसिन आदि किसी भी ज्वलनशील पदार्थ की कोई गंध नहीं है. यहां तक कि स्निफर डौग भी इस तरह की किसी गंध को आइडेंटीफाई नहीं कर पाया.’’ फोटोग्राफर ने प्रश्न किया.

‘‘यही इनवैस्टीगेट तो करनी है.’’ राजेश ने कहा.

‘‘कहां से शुरू करें सर.’’ वर्मा ने पूछा.

‘‘देखो, मर्डर अपराह्न के 2 बजे के करीब हुआ है. कामकाज और औफिस वर्कर्स तो सुबह जल्दी ही निकल जाते हैं. बाहर का कोई आया भी होगा तो अपने पर्सनल व्हीकल से ही आया होगा. हमें ध्यान यह रखना होगा कि सिर्फ संकरी टो के जूते वाले को ही ट्रेस करना है. एक बजे से शाम तक सोसायटी में आने वाले सभी व्हीकल की बारीकी से जांच होनी चाहिए.’’ राजेश ने कहा.

‘‘सर, अभी सोसायटी के सेक्रेटरी सुरजीत से बात करता हूं. 2 घंटे में सीसीटीवी फुटेज मिल जाएंगे.’’ वर्मा ने कहा और सोसायटी के लिए रवाना हो गए.

‘‘वेरी गुड वर्मा. बेस्ट औफ लक.’’ राजेश ने उन का उत्साहवर्धन किया.

 

आदित्य वर्मा 2 घंटे से पहले ही लौट आए. आते ही इंसपेक्टर राजेश से बोले, ‘‘लीजिए सर, ये रही सीसीटीवी फुटेज. घटना चूंकि मिड औफिस आवर्स की है, इसीलिए मोमेंटम बहुत ही कम है. टोटल 22 व्हीकल आए या गए. इन में से भी ज्यादातर उन महिलाओं की कारें हैं, जो दोपहर को फ्री आवर्स में शौपिंग के लिए जाती हैं.

‘‘कुल 6 गाडि़यों से पुरुष आए या गए. इन में से भी एक गाड़ी बिजली विभाग के मीटर रीडर की है, जो उस वक्त मीटर रीडिंग के लिए आया हुआ था.

‘‘बची हुई 5 गाडि़यों में एक मिस्टर खन्ना की गाड़ी ही ऐसी है, जो लगभग एक बजे आई और 3 बजे के आसपास वापस गई. ध्यान देने वाली बात यह है सर, कि मिस्टर खन्ना 10 बजे औफिस जाने के बाद फिर आए थे. परंतु उन के जूते फुटेज में साफ दिखाई दे रहे हैं.’’

‘‘जहां शक है, वहां पुलिस है. खन्ना के बारे में डिटेल्स में कुछ पता चला है?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘सर, खन्ना उसी सोसायटी में छठे फ्लोर पर रहते हैं. वह बिजनैसमैन हैं.’’ वर्मा ने बताया.

‘‘ठीक है, उन्हीं से पूछताछ करते हैं. किस समय मिलते हैं खन्ना साहब?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘शाम को 8-साढ़े 8 तक मिल जाते हैं सर.’’

‘‘ठीक है या तो शाम का चाय नाश्ता उन के घर पर करते हैं या रात का खाना उन्हें थाने में खिलाते हैं.’’ राजेश ने कहा.

शाम को इंसपेक्टर राजेश कदम और आदित्य वर्मा सुनयन हाउसिंग सोसायटी में जा पहुंचे. उन्होंने फ्लैट की घंटी बजाई तो एक महिला दरवाजे पर आई. राजेश ने कहा, ‘‘हमें खन्ना साहब से मिलना है.’’

‘‘जी, अंदर आइए.’’ पुलिस की यूनिफार्म देख कर महिला ने कुछ नहीं पूछा.

‘‘गुड इवनिंग सर, मेरा नाम खन्ना है.’’ 5 मिनट में ही सिल्क का कुरता पायजामा पहने, हल्की सी फ्रेंच कट दाढ़ी वाला एक सुदर्शन आदमी अंदर से आ कर बोला. उस के चेहरे से ही रईसी झलक रही थी.

‘‘गुड इवनिंग मिस्टर खन्ना, मेरा नाम राजेश कदम है. मैं आप के एरिया के थाने का इंचार्ज हूं. यहां एक केस की तहकीकात के लिए आप के पास आया हूं. मुझे विश्वास है कि आप हमें कोऔपरेट करेंगे.’’ राजेश ने अपना परिचय देते हुए आने का मकसद बताया.

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‘‘यस…यस श्योर.’’ खन्ना बोले.

बैठ कर औपचारिक बातों के बाद राजेश कदम ने यूं ही पूछ लिया, ‘‘एक सिगरेट मिल सकती है?’’

‘‘जी हां लीजिए,’’ कहते हुए खन्ना ने अपने कुरते की जेब से सिगरेट का केस निकाल कर आगे बढ़ाया. सिगरेट केस पर गोल्डन पौलिश थी और चमक बिखेर रहा था.

‘‘काफी लंबी सिगरेट है.’’ राजेश ने सिगरेट निकालते हुए कहा.

‘‘जी हां, 120 एमएम की है. मेरे पापा भी इसी ब्रांड की सिगरेट पीते थे, इसीलिए मुझे भी यही पसंद है. वैसे आप किस केस के सिलसिले में आए हैं.’’

‘‘आप सुरेश को कब से जानते थे?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘सुरेश…कौन सुरेश?’’ खन्ना ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘वही सुरेश जो आठवें माले पर रहते थे, जिन का मर्डर हुआ है.’’ राजेश ने स्पष्ट किया.

‘‘अच्छा, सुरेश नाम था उस बंदे का. मुझे तो अभी पता चला. मैं ने तो आज तक कभी उस की शक्ल तक नहीं देखी. नाम भी आप के मुंह से सुन रहा हूं. उस के मर्डर केस में मुझ से पूछताछ, आश्चर्य है. मुझ से पूछताछ का कोई आधार है आप के पास.’’ खन्ना अपनी भाषा पर पूरा संयम रखते हुए बोला.

‘‘शक का कारण यह है कि आप अकेले ऐसे शख्स थे, जो दोपहर को एक बजे अपने औफिस से वापस घर आए और 3 बजे वापस चले गए. मर्डर इन्हीं 2 घंटों के दौरान हुआ, इसलिए आप से पूछताछ तो बनती है.’’ राजेश ने स्थिति को और स्पष्ट किया.

‘‘अच्छाअच्छा, तो इसलिए शक कर रहे हैं आप. दरअसल, मुझे एक गवर्नमेंट औफिस में कुछ डाक्यूमेंट्स सबमिट करने जाना था. सारे डाक्यूमेंट मेरे लैपटौप में सेव थे, लेकिन उन्हें हार्ड कौपी भी चाहिए थी, जो घर पर रखी हुई थी. वही लेने घर आया था. घर में श्रीमतीजी ने रिक्वेस्ट की, इसीलिए उन के साथ लंच के लिए रुक गया. आप चाहें तो ये डाक्यूमेंट्स चैक कर सकते हैं, जिन पर मैं ने रिसिप्ट ली है.’’ खन्ना ने जल्दी आने के संदर्भ में अपनी सफाई पेश की.

‘‘वह तो मैं आप की सिगरेट देख कर ही समझ गया था क्योंकि जो सिगरेट लाश के पास मिली है, वह सिक्स्टी नाइन एमएम की ही है.’’ राजेश अपने शक को गलत साबित होते देख निराश भाव से बोले, ‘‘वैसे घटना उसी समय की है. हो सकता है, आप की नजर से ऐसी कोई घटना या शख्स गुजरा हो, जिस से पूछताछ की जा सके.’’

‘‘ऐंऽऽऽ कुछकुछ याद आ रहा है. उस समय मुझे लिफ्ट में उदयन मिला था. वह भी ऊपर कहीं से आ रहा था और उस के पीले जूतों पर कुछ कालिख लगी हुई थी. वह उस पैर को उठा कर दूसरे पैर की पैंट के पायचे से साफ करने की कोशिश कर रहा था.’’ खन्ना ने बताया.

‘‘उदयन…कौन उदयन? कौन से फ्लैट में रहता है?’’ एक महत्त्वपूर्ण सुराग मिलते ही राजेश उछल पड़े. उन्होंने खन्ना पर सवालों की झड़ी लगा दी.

‘‘उदयन एक इंश्योरेंस एजेंट है जो यहां से एक्सपोर्ट किए जाने वाले मटीरियल का इंश्योरेंस करता है. इस सोसायटी में ज्यादातर लोग इंपोर्टएक्सपोर्ट से जुड़े हैं, इसलिए वह घर पर ही आ कर डील कर लेता है.’’ खन्ना ने उदयन के बारे में जानकारी दी.

‘‘उदयन के औफिस का एड्रैस या फोन नंबर है क्या आप के पास?’’ राजेश ने कुछ आशा के साथ खन्ना से पूछा.

‘‘अगर मैं उदयन जैसे लोगों के नंबर सेव करने लगा तो मेरी फोन बुक एजेंटों के नाम से ही भर जाएगी. वैसे उस का विजिटिंग कार्ड मेरे औफिस में रखा है.’’ खन्ना ने बताया.

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महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलने के बाद राजेश सीधे सिक्युरिटी औफिस गए. वहां पर वह उदयन के नाम की एंट्री खोजने लगे. मगर उसे इस नाम की कोई एंट्री नहीं मिली.

‘‘उदयन नाम का आदमी कल सोसायटी में आया था लेकिन उस के नाम की कोई एंट्री दिखाई क्यों नहीं पड़ रही है?’’ राजेश ने रजिस्टर चैक करते हुए गार्ड से सख्ती दिखाते हुए पूछा.

‘‘क्योंकि रजिस्टर में सिर्फ व्हीकल से आए हुए लोगों की ही एंट्री की जाती है. अगर पैदल आए लोगों की भी एंट्री करेंगे तो काम बहुत बढ़ जाएगा. वैसे भी हमारे पास इतने आदमी नहीं हैं. घरों में कितने ही नौकर काम करने के लिए आते हैं, सभी की एंट्री संभव नहीं है.

‘‘हम चेहरे से सभी को पहचानते हैं. उदयन भी पैदल ही आता है, हर 2-3 दिन में. शायद इसीलिए उस की एंट्री नहीं की गई होगी.’’ गार्ड ने जवाब दिया, ‘‘वैसे उदयन का औफिस यहां से कुछ ही दूरी पर है. पहले मैं उसी बिल्डिंग में ड्यूटी करता था.’’ गार्ड ने आगे बताया.

गार्ड से उदयन के औफिस का पता ले कर राजेश व उन की टीम वहां पहुंच गई. उस औफिस के चौकीदार से उन्हें उदयन के घर का पता मिल गया.

राजेश ने चौकीदार को भी अपने साथ ले लिया ताकि वह उदयन को फोन कर के सूचना न दे सके. दूसरे उदयन की शिनाख्त भी उसी को करनी थी.

घर की घंटी बजने पर उदयन ने ही दरवाजा खोला. चौकीदार के साथ पुलिस को आया देख वह समझ गया कि उस का राज खुल चुका है. उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

पुलिस उसे थाने ले आई. थाने में सामने बैठा कर इंसपेक्टर राजेश कदम ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने सुरेश का मर्डर क्यों किया?’’

‘‘उस की वादाखिलाफी मेरी तरक्की में बाधा बन रही थी. सुरेश का एकएक शिपमेंट 15 से 20 करोड़ की कीमत का होता था. ऐसे में उस से बिजनैस मिलने से मुझे अच्छे प्रमोशंस मिल सकते थे. पिछले 6 महीनों में उस ने मुझ से 2 बार कोटेशंस ले कर कौन्ट्रैक्ट दिलवाने का वादा किया था. लेकिन उस ने काम किसी दूसरे को दिलवा दिया था.

‘‘तीसरी बार भी उस ने फिर मेरे साथ वादाखिलाफी की. यह कौन्ट्रैक्ट न मिलने की वजह से मुझे मिलने वाले सारे प्रमोशंस रुक गए और औफिस में मेरा मजाक बना अलग से. अपने अपमान का बदला लेने के लिए मैं ने उसे जला कर मार डाला. पुलिस को गुमराह करने के लिए वहां सिगरेट भी मैं ने ही डाली थी.’’ बोलतेबोलते उदयन गुस्से से भर उठा था.

‘‘पर तुम ने उसे जलाया कैसे, वहां पर तो पैट्रोल, डीजल, केरोसिन जैसी किसी भी चीज की गंध नहीं थी?’’ एसआई वर्मा ने पूछा.

‘‘मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं. मैं ने पढ़ा था कि एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे आर्गेनिक कैमिकल्स होते हैं, जो अत्यंत ज्वलनशील होते हैं. उन की गुप्त ऊष्मा भी बहुत अधिक होती है. इस से भी बड़ी विशेषता यह कि जलने के बाद इन की गंध तक नहीं आती.

‘‘2 दिनों पहले ही मुझे एक बौडी स्प्रे बनाने वाली कंपनी ने अपना प्रोडक्ट एक्सपोर्ट क्वालिटी चैक करने और सैंपल देने की दृष्टि से 1 लीटर मटीरियल दिया था. मैं ने उसी मटीरियल का इस्तेमाल सुरेश को जलाने के लिए किया.

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‘‘सुरेश को परफ्यूम लगाने का बहुत शौक था, इसीलिए उसे बातों में उलझा कर और भीनी खुशबू का हवाला दे कर उस पर एक लीटर परफ्यूम डाल दिया और अपने लाइटर से आग लगा दी.’’

उदयन ने आगे बताया, ‘‘अत्यधिक फ्लेम होने के कारण उसे तुरंत ही चक्कर आ गया और वह सिर के बल गिर कर बेहोश हो गया.’’

‘‘उदयन, तुम ने योजना तो खूब अच्छी बनाई थी. एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन का इग्नीशन तो तुम्हें याद रहा लेकिन जलने के बाद ओमिशन औफ कार्बन को भूल गए. एक्यूमुलेटेड कार्बन में वहां तुम्हारे जूतों के निशान बन गए और तुम हमारे मेहमान.’’ राजेश कदम ने मुसकराते हुए कहा.                      द्य

केजरीवाल को अब याद आया औटो वाला, बढ़ाया किराया

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने औटो किराया में वृद्धि को ले कर अधिसूचना जारी कर दी है. इस से मौजूदा किराए दरों में 18.75% की वृद्धि हो जाएगी.
अगले कुछ महीने में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह कदम उठाने से राजनीतिक सरगर्मियां बढ जाएंगी यह तय है, क्योंकि अभी हाल ही में दिल्ली सरकार ने बसों और मैट्रो में महिलाओं को मुफ्त यात्रा कराने की घोषणा की थी.
पिछले चुनावों में यह माना जाता है कि आम आदमी पार्टी को आगे बढ़ाने में इन आटो वालों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी.

सरकार ने वादा पूरा किया

आटो किराए में वृद्धि की पुष्टि करते हुए दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने ट्विटर पर लिखा है, “अरविंद केजरीवाल सरकार ने अपना एक और वादा पूरा किया. परिवहन विभाग ने औटो रिक्शा किराया संशोधन को अधिसूचित कर दिया है. संशोधन के बाद भी दिल्ली में औटो किराया अन्य महानगरों की तुलना में कम होगा.”

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परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में कहा, “औटो रिक्शा चालक मीटर में जरूरी बदलाव कर संशोधित दरें ले सकेंगे. हालांकि इस में दिल्ली में पंजीकृत 90,000 औटो के मीटरों में जरूरी बदलाव के लिए करीब डेढ महीने का समय लगेगा.”

संशोधित दरें क्या हैं

पहले 1.5 किलोमीटर के लिए 25 रुपए लगेंगे. फिलहाल पहले 2 किलोमीटर के लिए 25 रुपए लगते हैं. प्रति किलोमीटर शुल्क मौजूदा 8 रुपए से बढ़ा कर 9.5 रूपए कर दिया गया है. यह करीब 18.75% है.”

वहीं प्रतीक्षा शुल्क 0.75 रुपया प्रति मिनट लगाए जाने की बात भी कही गई है. वहां सामान्य शुल्क 7.50 रूपए होगा.

घटती लोकप्रियता से परेशान है आप

पहले निगम चुनाव में फिर लोकसभा चुनाव में करारी हार और वोट प्रतिशत में भारी गिरावट से परेशान आम आदमी पार्टी सरकार अब हर वर्ग के लोगों को लुभाने में लगी है.
इस से पहले दिल्ली मैट्रो में महिलाओं को मुफ्त यात्रा कराने की बात पर कई लोगों की प्रतिक्रियाएं आई थीं पर किसी राजनीतिक दल ने सीधे तौर पर इस की आलोचना नहीं की है.

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मुफ्त का दांव

दिल्ली सरकार फिलहाल बिजली पर सब्सिडी और एक मात्रा तक पानी के इस्तेमाल को मुफ्त किया हुआ है. मगर औटो किराए में वृद्धि कर आप सरकार चाहती है कि इस से 90 हजार औटो वाले व उन के परिवार को खुश कर वोट हासिल किया जाए.
वहीं, बढे किराए से छात्रों, कामकाजी लाखों लोगों को अपनी जेब ढीली करनी पङेगी और जाहिर है इस से उन में सरकार के खिलाफ नाराजगी ही होगी.

कहीं आलोचना कहीं प्रशंसा

दिल्ली सरकार की इस घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं.
कोई सरकार के इस कदम की आलोचना कर रहा है तो कोई प्रशंसा. कईयों का यह मानना है कि आम आदमी पार्टी खो चुकी अपनी जमीन को फिर से पाना चाहती है और इसलिए चुनाव से पहले घोषणाओं की झड़ी और जनता को लुभाने में लगी है.

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अगले साल होने हैं चुनाव

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अभी 6-7 महीने बाकी है. देखना है इस बार आम आदमी पार्टी पर दिल्ली की जनता कितना भरोसा करती है.

Edited By- Neelesh singh Siodia 

श्रेयस पोरस पार्डीवाला निभाएंगे पूर्व मंत्री एल के आडवाणी का किरदार 

श्रेयस पोरस पार्डीवाला ने न केवल ‘यारियां’ में बल्कि टी सीरीज की फिल्म ‘सनम रे’ और ग्रैंड मोशन पिक्चर की फिल्म ‘स्वीटी बेड्स एन आर आय’ में अपने बेहतरीन अभिनय की वजह से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई हैं. श्रेयश ज़ी 5 की एक वेब सीरीज ‘अकोरी’ में भी काम कर चुके हैं जिसमें वह नेगेटिव किरदार में नज़र आये थे.

अब श्रेयश अपनी आगामी पैरोडी फिल्म “मोदी जी की सक्सेस पार्टी” में वरिष्ठ मंत्री लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका में नजर आएंगे. श्रेयस इस किरदार को लेकर काफी उत्साहित हैं.

 

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Strawberries, cherries and an angel’s kiss in spring My summer wine is really made from all these things

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Have you seen Akoori yet? #throwback #shooting Catch me in this avatar only on #ZEE5 #Akoori

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Every great dream begins with a dreamer…

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अपने इस किरदार को वास्तविक रूप देने के लिए श्रेयश ने आडवाणी जी की सारी बारीकियों पर ध्यान दिया है. उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की कई वीडियो पर भी रिसर्च किया है. इतना ही नही श्रेयश ने अडवानी के बात करने के तरीके और उनके हावभाव को एडाप्ट किया है.

“इस फिल्म में श्रेयस अपने किरदार के बारे में बताते हैं की यह किरदार उनके करियर का अब तक का सबसे अधभूद किरदार हैं. मैंने अपने इस किरदार के लिए बहुत मेहनत की है. उम्मीद करता हूँ की लोगों को हमारी पैरोडी फिल्म जरूर पसंद आएगी.”

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निर्देशक ने “मोदी जी की सक्सेस पार्टी ” पैरोडी में दिखाएंगे कि कैसे आडवाणी जी को पार्टी ने दरकिनार करने के फैसले से वह नाराज हैं और उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दे रहे हैं.

Edited By-  Neelesh Singh Sisodia 

रावण की शक्ल

लेखक-परशीश

रावण जलने में कुल 10 दिन ही बचे हैं. शफ्फू भाई के हाथ तेजी से चल रहे हैं कि कुंभकर्ण और मेघनाद की तरह रावण का पुतला भी बन कर तैयार हो जाए.

शफ्फू भाई ने कल ही कुंभकर्ण का पुतला बनाने का काम खत्म किया है. उस से कुछ दिन पहले मेघनाद का काम खत्म हुआ था, पर शफ्फू यह भी जानते थे कि रावण का पुतला तैयार करना आसान नहीं है क्योंकि पुतले की कदकाठी को उस के नाम के अनुरूप बनाना बड़ी मेहनत और जीवट का काम है. हर साल उसे बनाने में शफ्फू भाई को पसीने छूट जाते हैं.

मेले में आए हर देखने वाले की निगाह रावण के पुतले पर ही तो टिकी रहती है. कैसा बना है इस बार का रावण. उस के चेहरे में, आंखों में कैसा भाव लाया गया है…फिर वही मक्कारी झलकती है उस की आंखों में या ढीठ, जिद्दी नजर आता है.

इस तरह के हजारों भाव लोग रावण के चेहरे में ढूंढ़ते हैं. इसी से उस के मुंह को बनाते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है.

रावण एक, भाव अनेक…जैसा समाज वैसा रावण…शफ्फू भाई सोच रहे हैं कि होंठों को किस तरह का कोण दें, भौहों का तिरछापन कितना हो ताकि देखने वाले देखें और संतोष से कहें कि हां, ऐसा ही होना चाहिए था रावण का मुंह.

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तकरीबन 2 दशकों से रामपुर महल्ले के लोग रावण दहन का आयोजन कर रहे हैं. शुरुआत की छोटी भीड़ धीरेधीरे बड़ी भीड़ में बदल चुकी है. अब तो लोगों की भीड़ संभालने के लिए कई पुलिस वाले भी जमा रहते हैं.

रामपुर महल्ले के दशहरे को देखने के लिए लोग दूरदूर से आते हैं और महीनों तक चर्चा का प्रमुख विषय होता है शफ्फू भाई के हाथों से बनाया गया रावण का मुंह. जाने उस के मुंह में वह कौन सी विशेषता भर देते थे कि लोग देख कर हैरान रह जाते.

रावण के अंदर की मक्कारी को दिखाने में शफ्फू  भाई का जवाब नहीं था इसीलिए हर साल रावण बनाने का जिम्मा शफ्फू भाई पर ही होता था. हर साल आयोजक आ कर हिदायत भी दे कर जाते कि रावण का पुतला तो सिर्फ तुम्हारे ही हाथ का बना होना चाहिए. अब तो रावण का पुतला बनाने में वह इतने सिद्धहस्त हो चुके हैं और इतना नाम हो चुका है कि पर्वों का मौसम शुरू हुआ नहीं कि उन का आतिशबाज दिमाग रावण निर्माण में लग जाता.

शफ्फू भाई शहर के बहुत बड़े आतिशबाज हैं. उन की आतिशबाजी देखते ही बनती है. रावण दहन के समय उस के पेट और दसों सिर से चमक के साथ जो धमाके होते हैं और उन के साथ जिस तरह की रंगीन रोशनियां निकलती हैं उन्हें देख कर भीड़ दांतों तले उंगली दबा लेती है.

वैसे तो शफ्फू भाई शादी, विवाह, ईद, दीवाली सब में अपनी आतिशबाजी का कमाल दिखाते हैं पर रावण की देह में पटाखों की जो कला वह ‘फिट’ करते हैं, उस का कोई जवाब नहीं होता. अपनी इस कला के बारे में वह हंस कर बस, इतना ही कहते हैं कि मैं तो कुछ नहीं जानता, बस, इन हाथों से जो कुछ बन पड़ता है कर देता हूं. लोगों को पसंद आता है तो मुझे भी खुशी होती है.

रावण दहन से शफ्फू भाई को खास लगाव सा था क्योंकि उन के पूर्वज कभी हिंदू रहे थे और वे रामलीला में बहुत बढ़चढ़ कर भाग लिया करते थे. शायद यही वजह रही हो कि सबकुछ छूटतेछूटते भी रावण दहन से उन का प्रेम बचा रह गया हो और उसी प्रेम के वशीभूत हो रावण के पुतले के निर्माण में लगे रहते हैं.

वही शफ्फू भाई अब रावण बनाना तो दूर रावण दहन हो इस के भी खिलाफ हो चले हैं, बिलकुल खिन्न…बिलकुल अनमने.

पर क्यों? उन का मन कुरेदकुरेद कर उन से पूछता, फिर समझाता, यह तो बुराई पर अच्छाई की जीत है. इस से आज के बिगड़ते समाज को सही दिशा मिलती है. अब तो ऐसी लीलाओं की समाज को और भी जरूरत है. कारण, समाज ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार के दलदल में धंसा पड़ा है. देश के बड़े नेता से ले कर पंडित, मुल्लामौलवी, यहां तक कि छोटेछोटे कर्मचारी भी भ्रष्टाचार के कुंभ में डुबकियां लगा रहे हैं. कुआरी मांएं बेखौफ घूम रही हैं. खुद ही खुद पर फिल्में बनवा रही हैं. जब तक डी.एन.ए. टेस्ट नहीं होता अवैध बच्चे का बाप राम बना खड़ा रहता है.

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समाज जो कुछ झेल रहा है उसे झेलना शफ्फू भाई जैसे लोगों के वश की बात नहीं है. राम के चरित्र को निभाने वाले पात्र अपने निजी जीवन में कई औरतों के साथ बलात्कार कर चुके हैं. वे रेप करने के तरीकों पर भी अनेक प्रयोग करते हैं. कभी ट्रेन में, कभी चलती कार में.

कई बार शफ्फू भाई का मन चीख- चीख कर कहता, नहीं, मैं रावण नहीं बनाना चाहता. मुझे बख्श दो मेरे भाई… मेरे रावण का मजाक मत उड़ाओ. मेरे रावण ने तो सीता को सिर्फ कैद कर रखा था. वह उस से नित्य विवाह प्रस्ताव करता था. प्रणय निवेदन भी करता था, मगर यह सब भी आग्रह के साथ करता था, कोई जोरजबरदस्ती नहीं. आज के राम तो रावण जैसे पात्र पर पलीता लगाने के बजाय खुद अपने पर ही पलीता लगा रहे हैं.

इस बार के रावण दहन के मुख्य अतिथि का नाम सुन कर शफ्फू भाई और भी जमीन में गड़ गए थे.

भोला बाबू अभी 2 माह पहले ही वार्ड का चुनाव जीत कर जनता के नए हमदर्द बने हैं. शफ्फू भाई के मुंह से अनायास ही बोल फूटे, कल का चोर आज का नेता है. अरे, इस के बारे में जो न जानता हो उस के लिए तो यह मजाक हो सकता है पर आश्चर्य तो यह है कि अतीत में जिनजिन को इस ने डंसा है वे भी अब इसे महान समाज सुधारक कहते नहीं थकते हैं.

यहां के लोग तो यह भी भूल चुके हैं कि यही भोला बाबू कुछ दिन पहले ही 2 समुदायों में झगड़ा करा कर खुद हाथ सेंक रहे थे. जाने कितने घरों को लूटा कि देखतेदेखते उस की छोटी सी झोंपड़ी विशाल बंगले में बदल गई.

शफ्फू भाई ने दंगों के दौरान ही भोला के असली चेहरे को देखा था और तभी वह समझ भी गए थे कि गुंडा और नेता दोनों की जात और धर्म एक होता है. उस सांप्रदायिक आग की लपटों में जलते शहर को बचाने के बजाय भोला ने सीता और सलमा दोनों को लूटा था. रात में खून की होली खेली थी. हर सुबह यही आदमी गिरगिट की तरह रंग बदल कर समाज सुधारक बना और सब की मदद करता था.

वह रावण दहन के लिए भी बड़ी मुश्किल से तैयार हुए हैं. वह भी इसीलिए कि रावण के माध्यम से भोला बाबू समाज को बताना चाहते हैं कि देखो, कितना दुष्ट था रावण. इसी के कारण सोने की लंका नष्ट हो गई. इस ने लात मार कर अपने छोटे भाई विभीषण का अनादर किया. सीता माता का अपहरण कर कैद कर लिया. अबलाएं कितनी असुरक्षित थीं उस के राज में. तभी तो राम को अपना बल प्रयोग करना पड़ा. आप सभी राम बन कर समाज में पनप रहे रावणों को जला कर खत्म कर दें…

शफ्फू भाई को लगता है कि भोला बाबू रावण से भी बड़े महारावणों की कतार में खड़े हैं. अगर कोई तौले तो रावण का सारा अपराध उन के कुकर्मों के आगे बहुत कम वजन का होगा.

शफ्फू भाई को गुस्सा आता है पर वह कर भी क्या सकते हैं? किसे मना करें कि रावण दहन मत करो, ऐसे कलयुगी रावण का दहन करो. पर जनता तो भेड़चाल चलती है. जो देखेगी बस, वही करती जाएगी. जिस हाथ से चाबुक की मार खाती है उसी हाथ को प्यार करती है.

शफ्फू भाई अब पूरे मनोयोग के साथ रावण का मुंह बना रहे हैं, यह सबकुछ सोचतेसोचते आधा मुंह बन कर तैयार हो गया था, पर जब पूरा हुआ तो वे चौंक उठे.

उन्हें लगा, अनजाने में यह तो भोला बाबू का चेहरा उतर गया है.

वह तो सिर्फ सोच रहे थे और मन ही मन भोला बाबू को कोस रहे थे. उन की आकृति बनाने का उन का कोई इरादा नहीं था. पर अब बन ही गया है तो क्या किया जाए. हां, यह हो सकता है कि इस बार रावण का मुंह यही रहने दिया जाए. इस तरह उन का अपना अपराध कम हो जाएगा. और भोला बाबू अनजाने में रावण का नहीं खुद का दहन कर देंगे. आगे की ऊंचनीच पर गौर करने के बाद कि कहीं आयोजक किसी मुसीबत में न फंस जाएं, शफ्फू भाई ने झब्बू मूंछ वाले भोला बाबू की इस मुखाकृति में बदलाव के लिए तीरनुमा मूंछ बना दी ताकि देखने वालों की आंखों को धोखा हो जाए. यही नहीं, आंखों को नीला कर दिया और दांतों को थोड़ा बाहर निकाल दिया जबकि पहले वे अंदर थे.

अब शफ्फू भाई ने ध्यान से देखा तो उन्हें ऐसा लगा कि यह चेहरा भोला का तो नहीं लगता पर इस में भी झलक किसी नाम वाले नेता की ही है.

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मक्कार कहीं का. रावण दहन का उद्घाटन करने आ रहे हैं. देश, राज्य, शहर, महल्ले, घरघर में रावणों की फौज खड़ी है. फिर बेचारे इस रावण का दहन कैसा और वह भी ऐसे हाथों से जिस के हाथ खुद खून से रंगे हों.

इस रावण ने तो एक ही सीता पर बुरी निगाह डाली थी. आज का रावण तो इतना गिर गया है कि महल्ले की हर बहूबेटी को रात के अंधेरे में लूट लेना चाहता है.

4 दिन बाद भोला बाबू रावण दहन का उद्घाटन कर रहे थे और रावण को देखते हुए मन ही मन सोच रहे थे कि रावण के रूप वाले इस चेहरे को उन्होंने कहीं देखा है पर कहां यह याद नहीं आ रहा था.

नेताओं को भी तो चेहरा तभी याद आता है जब वह किसी एक का हो. भीड़ का चेहरा किसे याद आता है और शफ्फू भाई ने इस बार ‘कामन’ शक्ल का रावण बनाया था.           द्य

जैसा रंगीन राजा वैसी रंगीन नगरिया…

लेखक- निखिल अग्रवाल

भारत में भले ही आजादी के बाद राजशाही खत्म हो गई, लेकिन दुनिया के कई देशों में आज भीराजशाही कायम है. थाईलैंड भी ऐसा ही देश है. वहां चुनावों के बावजूद राजशाही की ताकत ज्यादा है. थाईलैंड में राजा को पिता के समान माना जाता है. थाईलैंड और वहां की राजधानी बैंकाक का नाम आते ही जेहन में रंगीनियत और मस्ती का चित्र उभरने लगता है. यह देश दुनिया भर में पर्यटन का सब से बड़ा केंद्र है, साथ ही सैक्स टूरिज्म के लिए भी मशहूर है. यहां की रंगीन रातों के जलवे अलग ही होते हैं, जिन की वजह से दुनियाभर के सैलानी खिंचे चले आते हैं. यहां का पर्यटन और नाइट लाइफ  जितनी रंगीन होती हैं, उतनी ही रंगीनियत से भरी है वहां के राजा महा वजीरालौंगकोर्न की कहानी.

मौजूदा राजा महा वजीरालौंगकोर्न की अंतिम प्रेम कहानी प्रेम कहानी 10 साल पुरानी है. इसी प्रेम कहानी के चलते राजा ने बीती एक मई को सुथिदा तिदजई से शादी कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. खास बात यह है कि राजा वजीरालौंगकोर्न 66 साल के हैं और सुथिदा 40 साल की. दोनों की उम्र में 26 साल का अंतर है. सुथिदा इस से पहले राजा की बौडीगार्ड थीं. लेकिन शादी के बाद उन्हें थाईलैंड की क्वीन का दरजा मिल गया. राजा वजीरालौंगकोर्न की यह चौथी शादी है. इस से पहले वे 3 शादियां रचा चुके हैं. तीनों पत्नियों से उन का तलाक हो चुका है. तलाकशुदा पत्नियों से राजा के 7 बच्चे हैं.

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3 जून 1978 को बैंकाक में जन्मी सुथिदा तिदजई एसंपशन यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में कम्युनिकेशन आर्ट्स की डिग्री हासिल की थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद सुथिदा ने थाई एयरवेज में फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में नौकरी शुरू की. कहा जाता है कि थाईलैंड के राजकुमार वजीरालौंगकोर्न ने सुथिदा को किसी सफर के दौरान देखा था और वे उन पर मोहित हो गए थे. हालांकि उस समय तक राजकुमार के अपनी तीसरी रानी सिरीरास्म सुवादे से अच्छे संबंध थे.

राजा ने धीरेधीरे बढ़ाया अपने प्यार को

माना जाता है कि राजकुमार वजीरालौंगकोर्न के कहने पर 5 फुट 4 इंच लंबी सुथिदा ने थाई एयरवेज की नौकरी छोड़ दी और 14 मई 2010 में रौयल थाई आर्मी में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर नई नौकरी जौइन कर ली. वजीरालौंगकोर्न के कारण सुथिदा को जल्दीजल्दी पदोन्नतियां मिलने लगीं.

नवंबर 2010 में उन्हें फर्स्ट लेफ्टिनेंट बना दिया गया. एक अप्रैल 2011 को वे कैप्टन और एक अक्तूबर 2011 को मेजर बन गईं. 6 महीने के अंतराल में इस के अगले साल ही उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल और कर्नल के पद पर पदोन्नति दे दी गई. यह सब वजिरालोंगकोर्न के प्रेम की वजह से हुआ.

उधर राजकुमार वजीरालौंगकोर्न का 2014 में अपनी तीसरी रानी सिरीरास्म से 13 साल पुराना दांपत्य जीवन टूट गया. दोनों ने तलाक ले लिया. तीसरी रानी से तलाक के बाद 61 साल के वजीरालौंगकोर्न के जीवन में सूनापन आ गया.

इसी दौरान सुथिदा से राजकुमार की मुलाकातें बढ़ गईं. दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे. भले ही दोनों के बीच उम्र का बड़ा फासला था, लेकिन प्यार में ना अमीरीगरीबी की बंदिश होती है और ना ही उम्र की. इसलिए दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा.

इस बीच, राजकुमार वजीरालौंगकोर्न ने वर्ष 2014 में सुथिदा को अपनी निजी बौडीगार्ड यूनिट का डिप्टी कमांडर नियुक्त कर दिया था. निजी बौडीगार्ड यूनिट में नियुक्ति मिलने से वजीरालौंगकोर्न और सुथिदा की मुलाकातें बढ़ गईं. दोनों एकदूसरे के ज्यादा करीब आ गए, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इन के किस्से चर्चा में आने लगे.

राजकुमार वजीरालौंगकोर्न इस दौरान सुथिदा से डेटिंग करते रहे, सुथिदा के साथ वह विदेशों में घूमते रहे. राजकुमार काफी समय जर्मनी में भी रहे. जर्मनी में वजीरालौंगकोर्न का अपना महल है. पिछले साल राजा जर्मनी में एक बनियान पहने हुए नजर आए, साथ में उन की प्रेमिका सुथिदा भी थीं. थाईलैंड में इस की काफी आलोचना भी हुई थी.

अक्तूबर 2016 में वजीरालौंगकोर्न के पिता भूमिवोल अदुलयादेद का निधन हो गया. भूमिवोल 70 साल से थाईलैंड के राजा थे. उन के निधन पर थाईलैंड में 50 दिन तक शोक छाया रहा. पिता के निधन से राजकुमार वजीरालौंगकोर्न दुखी थे, लेकिन संवैधानिक तौर पर उन का राजा बनने का रास्ता साफ  हो गया था.

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सुथिदा ने वजीरालौंगकोर्न को पिता के निधन से शोक से उबरने में काफी मदद की. वजीरालौंगकोर्न जब शोक से उबरे, तो अपने प्यार पर इतने आसक्त हो चुके थे कि उन्होंने दिसंबर 2016 में सुथिदा को लेफ्टिनेंट जनरल का पद दे कर राजा की गार्ड की स्पैशल औपरेशन यूनिट का मुखिया बना दिया. बाद में अक्तूबर 2017 में सुथिदा को रौयल थाई आर्मी का जनरल नियुक्त कर दिया गया.

संवैधानिक तौर पर वजीरालौंगकोर्न को पिता के निधन के बाद 1 दिसंबर, 2016 को राजा की उपाधि और राजगद्दी मिल गई थी, लेकिन उन का राज्याभिषेक समारोह इस साल मई के पहले सप्ताह में बैंकाक में शुरू हुआ. राजा बनने पर वजीरालौंगकोर्न को लोग 10वें किंग रामा के नाम से जानने लगे.

राज्याभिषेक से पहले ही एक मई को राजा वजीरालौंगकोर्न ने सुथिदा से शादी कर अपनी करीब 9 साल पुरानी प्रेम कहानी को विराम दे दिया. शादी के बाद राजा ने सुथिदा को थानपुइंग यानी क्वीन की उपाधि दे दी.

परंपराओं में बंधा देश

थाईलैंड की परंपरा के मुताबिक शादी की रस्मों के लिए सुथिदा रेंग कर शाही दरबार में सोने के सिंहासन पर बैठे राजा वजीरालौंगकोर्न के सामने पहुंचीं. राजा के पैरों में नतमस्तक हो कर सुथिदा ने उन्हें उपहार दिया. राजा ने पवित्र जल छिड़क कर सुथिदा को टीका लगाया. उस समय वह सिल्क की परंपरागत सुनहरी पोशाक पहने हुए थीं.

राजा की शादी की रजिस्ट्री पर हस्ताक्षर करने के लिए रौयल कोर्ट के रजिस्ट्रार और अन्य सदस्यों को दरबार में बुलाया गया. वे भी रेंग कर दरबार में पहुंचे. इस दौरान अन्य सभी लोग पेट के बल जमीन पर बैठे रहे. बाद में राजा को शादी की बधाई देने के लिए लोग रेंगते हुए दरबार में पहुंचे. थाईलैंड में इस शाही शादी को टेलीकास्ट भी किया गया.

66 साल के वजीरालौंगकोर्न का राजतिलक समारोह 4 मई को बौद्ध और ब्राह्मण रीतिरिवाज से हुआ. बैंकाक में आयोजित इस समारोह की शुरुआत चकाचौंध भरे कार्यक्रम से शुरू हुई. 3 दिवसीय इस कार्यक्रम पर करीब 25 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है.

प्राचीन परंपराओं के तहत राजतिलक समारोह के पहले दिन सुबह राजा सब से पहले राजमहल पहुंचे. उन्होंने बौद्ध धर्म के गुरु से उपदेश लिया. इस के बाद उन्होंने सफेद राजकीय पोशाक बदल कर सोने के तारों से सिली हुई राजा की पोशाक पहनीं. सुबह 10 बज कर 9 मिनट पर राजा को थाईलैंड की विभिन्न जगहों से लाया गया पवित्र जल सौंपा गया. यह पवित्र जल राजा ने ग्रैंड पैलेस परिसर के भीतर स्थित पवित्र स्थान पर अपने चेहरे पर छिड़का. इस मौके पर राजा को तोप चला कर सलामी दी गई. बौद्ध महंतों ने मंत्रोच्चार किया. इस दौरान हिंदू ब्राह्मण भी मौजूद थे.

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राजा को पवित्र किए जाने के बाद राजसिंहासन पर बैठाया गया. ब्राह्मणों ने उन्हें राज चिह्न, सोने का राजदंड और कीमती पत्थर से बनी तलवार सौंपी. इस के बाद राजा वजीरालौंगकोर्न को साढ़े 7 किलो सोने से बना मुकुट पहनाया गया. इस मुकुट पर प्राचीन भारत का हीरा जड़ा है. इस मौके पर नए राजा ने ‘धर्म और न्याय’ के साथ शासन करने की प्रतिबद्धता जताई.

राजतिलक के बाद दूसरे दिन 5 मई को राजा वजीरालौंगकोर्न ने नगर भ्रमण किया. वे सोने की पालकी में सवार थे. यह पालकी शाही सेना के 16 सिपाहियों ने कंधों पर उठा रखी थी. राजा की सवारी का नेतृत्व लाल रंग की वरदी में बाएं चल रही महारानी जनरल सुथिदा कर रही थीं.

यह सवारी दिवंगत राजा भूमिवोल द्वारा कंपोज कराई गई धुन पर आगे बढ़ रही थी. सड़क किनारे राजा की सवारी देखने की इजाजत केवल उन लोगों को ही थी, जो पीले कपड़े पहन कर आए थे. इस से पहले बैंकाक में 1963 में तत्कालीन राजा भूमिवोल की शाही सवारी निकली थी.

राजतिलक के जश्न पर खर्च हुए 25 करोड़

3 दिवसीय राजतिलक समारोह के आखिरी दिन 6 मई को थाईलैंड के नए राजा वजीरालौंगकोर्न के सम्मान में बैंकाक के ग्रेंड पैलेस के सामने सफेद रंग के 11 हाथी लाए गए. इन हाथियों ने राजा के सम्मान में घुटने टेके. हाथियों के दांतों पर मालाएं लगी थी.

हाथियों के अलावा राजा और उन के परिवार को देखने आए लोगों ने भी नतमस्तक हो कर प्रणाम किया. नए राजा ने बालकनी से हाथ हिला कर लोगों का अभिवादन किया. थाईलैंड में हाथी को शाही ताकत का प्रतीक माना जाता है.

राजा वजीरालौंगकोर्न चक्री वंश के 10वें सम्राट हैं. थाईलैंड में इस वंश का 1782 से शासन है. पहले शासक बुद्ध योद्फ  चुललोक थे. उन्हें किंग रामा प्रथम के नाम से जाना जाता था. उन का शासनकाल 1782 से 1809 तक रहा.

किंग रामा द्वितीय के नाम से जाने गए थाईलैंड के दूसरे राजा बुद्ध लोएत्ल नभले का कार्यकाल 1809 से 1824 तक रहा. तीसरे राजा नंगलव ने 1824 से 1851 तक शासन किया. मोंग्कुट चौथे राजा बने, उन का कार्यकाल 1851 से 1868 तक रहा.

पांचवें राजा चुललंगकरण को किंग रामा-5 के नाम से जाना गया. उन का राज 1868 से 1910 तक रहा. वाजिर्वुध छठे राजा हुए, उन्होंने 1910 से 1925 तक शासन किया. थाईलैंड के सातवें राजा प्रजाधिपोक का शासनकाल 1925 से 1935 तक रहा. आठवें राजा आनंद महिदोल ने 1935 से 1946 तक शासन किया.

इस के बाद 1946 में भूमिवोल थाईलैंड के 9वें राजा बने. उन्हें किंग रामा-9 के नाम से जाना जाता था. उन का राजतिलक 1950 में किया गया था. भूमिवोल का निधन अक्तूबर 2016 हुआ. वे 70 साल तक थाईलैंड के राजा रहे.

28 जुलाई 1952 को बैंकाक में क्वीन सिरीकिट की कोख से जन्मे राजकुमार वजीरालौंगकोर्न की पहली शादी 3 जनवरी, 1977 में उन की ममेरी बहन सोमसावली से हुई थी. इन की 7 दिसंबर, 1978 को एक बेटी हुई. वजीरालौंगकोर्न का सोमसावली से जुलाई 1993 में तलाक हो गया.

इसी बीच राजकुमार वजीरालौंगकोर्न ने दूसरी शादी अभिनेत्री युवहिदा पोलप्रेजर से की. उन से राजा के 5 बच्चे हुए. बाद में दोनों का तलाक हो गया और रानी युवहिदा रहने के लिए ब्रिटेन चली गईं.

रंगीनियों में डूबे देश का सनकी राजा

राजकुमार वजीरालौंगकोर्न की तीसरी शादी 10 फरवरी 2001 को श्रीरास्मी सुवादे से हुई. इनसे 29 अप्रैल, 2005 को राजा का एक बेटा हुआ. वर्ष 2014 में श्रीरास्मी और वजीरालौंगकोर्न का तलाक हो गया. इस के बाद राजकुमार वजीरालौंगकोर्न ने अब सुथिदा से चौथी शादी की है.

राजा वजीरालौंगकोर्न के बारे में एक किस्सा मशहूर है. किस्सा यह है कि उन्होंने एक बार अपने प्रिय डौग फू फू  को रौयल थाई एयरफोर्स का चीफ मार्शल नियुक्त कर दिया था. लोगों को उन के इस फैसले पर काफी आश्चर्य हुआ था.

बाद में जब उस डौग की मौत हो गई, तो थाईलैंड में राष्ट्रीय शोक मनाया गया. जल्दी ही गुस्से में आ जाने वाले वजीरालौंगकोर्न ने अपनी तीसरी बीवी श्रीरास्मी को एक बार करीबकरीब टौपलेस कर के फोटो खिंचवाई थी. पता चलने पर इस की काफी आलोचना हुई थी.

अब बात करते हैं थाईलैंड के बारे में. दक्षिण पूर्वी एशिया के इस देश का प्राचीन नाम स्याम है. थाईलैंड की सीमाएं लाओस, कंबोडिया, मलेशिया और म्यांमार से सटी हुई हैं. वर्ष 1238 में थाईलैंड में सुखोथाई राज्य की स्थापना हुई. इसे पहला बौद्ध थाई राज्य माना जाता है.इस के एक सदी बाद अयुध्या के राजा ने सुखोथाई पर अपना राज कायम कर लिया. वर्ष 1767 में बर्मा द्वारा अयुध्या के पतन के बाद थोंबुरी राजधानी बनी. सन 1782 में थाईलैंड में चक्री राजवंश की स्थापना हुई. इसे ही आधुनिक थाईलैंड का आरंभ माना जाता है. वर्ष 1992 में थाईलैंड को नया संवैधानिक राजतंत्र घोषित कर दिया गया. यहां मुख्य रूप से बौद्ध धर्म है.थाईलैंड की राजधानी बैंकाक है. थाईलैंड में वैसे तो प्रौस्टीट्यूशन गैरकानूनी है, लेकिन इसे रोकने के लिए कभी सख्ती नहीं हुई. यही कारण रहा कि बैंकाक पूरी दुनिया में सैक्स टूरिज्म के नाम से चर्चित होता गया. एचआईवी और एड्स के आंकड़े जुटाने वाली संस्था एवीईआरटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक थाईलैंड में करीब एक लाख 23 हजार सैक्स वर्कर हैं.

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बैंकाक के साथ थाईलैंड के शहर फुकेट, पटाया और फीफी आइलैंड को नाइट लाइफ  के लिए जन्नत माना जाता है. दुनिया भर के हजारों सैलानी रोजाना थाईलैंड आते हैं. यहां आने वाले सैलानियों को खासतौर से बार और मसाज पार्लर लुभाते हैं.

अकेले पटाया शहर में ही एक हजार से ज्यादा बार और मसाज पार्लर हैं. थाईलैंड की जीडीपी में पर्यटन उद्योग की भागीदारी करीब 10 फीसदी है. थाईलैंड में डांस वैध है, लेकिन इस की आड़ में जिस्मफरोशी का कारोबार चलता है.

बैंकाक में बार और मसाज पार्लर के अलावा जुआखाने भी हैं. बौडी मसाज और बार में बीयर परोसने के बहाने यहां की लड़कियां सैक्स के अनैतिक धंधे में लिप्त हैं. पोल डांस भी सैलानियों को लुभाता है. पटाया की सड़कों पर हाथ में बार रेस्तरां के पोस्टर लिए खड़ी लड़कियां सैलानियों को रिझाती हैं.बहरहाल, थाईलैंड में जितनी रंगीनी है, वहां के राजा भी उतने ही रंगीनमिजाज हैं. थाईलैंड भले ही छोटा सा देश है, लेकिन यहां शाम होते ही रंगीनियत छा जाती है. दुनिया भर से आने वाले सैलानी आधी रात के बाद तक रंगीनियों में खोए रहते हैं. भारत से सब से ज्यादा सैलानी थाईलैंड जाते हैं. इन में अधिकांश सैलानियों का मकसद मौजमस्ती होता है. बैंकाक से अब भारत में सोने की तस्करी भी बड़े पैमाने पर होने लगी है.

इंटीरीयर डिजाइनर का खूनी इश्क

पिछले 15-20 सालों में नोएडा और ग्रेटर नोएडा का बहुत तेजी से विकास हुआ है. इस के आसपास के गांव भी विकास की दौड़ में शामिल हैं. ग्रेटर नोएडा क्षेत्र का गांव बिसरख 20 साल पहले भले ही गांव था, लेकिन अब छोटेमोटे शहरों से बेहतर है. यहां पर गौर सिटी-2 की टाउनशिप बन गई है. प्रशांत कुमार गौर सिटी-2 के गैलेक्सी नार्थ एवेन्यू-2 के फ्लैट नंबर ए-1468 में रहता था. उस के फ्लैट से 2 फ्लोर नीचे उस के दोस्त रूपेंद्र सिंह चंदेल का फ्लैट था. प्रशांत और रूपेंद्र के बीच गहरी दोस्ती थी. 28 अप्रैल, 2019 को रविवार की छुट्टी थी. उस दिन शाम करीब साढ़े 6 बजे प्रशांत घर पर ही था और पत्नी व बच्चों के साथ मौल घूमने जाने की तैयारी में लगा था. उसी वक्त उस के मोबाइल पर रूपेंद्र के बहनोई ओमवीर का फोन आया.

ओमवीर इसी सोसायटी के फ्लैट नंबर-244 में रहता था. ओमवीर ने फोन पर प्रशांत को जो कुछ बताया, उसे सुन कर वह चिंतित हो उठा. ओमवीर ने बताया था कि रूपेंद्र दोपहर में अपनी सफेद रंग की फोर्ड फिगो कार ले कर घर से गया था. उसे कुछ पैसों की जरूरत थी. वह घर से पत्नी के गहने ले कर गाजियाबाद के पी.सी. ज्वैलर्स के पास गिरवी रखने के लिए निकला था. लेकिन साढ़े 3 घंटे गुजर जाने के बावजूद अभी तक वह घर नहीं लौटा है.

ओमवीर ने यह भी बताया कि रूपेंद्र की पत्नी अमृता और वह खुद कई बार रूपेंद्र से फोन पर संपर्क करने की कोशिश कर चुके हैं, मगर दूसरी ओर से काल रिसीव नहीं की जा रही.

यह ऐसी बात थी जिसे सुन कर किसी को भी चिंता हो सकती थी. रूपेंद्र तो वैसे भी प्रशांत का बहुत अच्छा दोस्त था. लिहाजा वह फटाफट जीने की सीढि़यां उतर कर रूपेंद्र के फ्लैट पर पहुंच गया. ओमवीर वहां पहले से ही मौजूद था. रूपेंद्र की पत्नी अमृता के चेहरे पर उड़ रही हवाइयां साफ बता रही थीं कि वह बेहद परेशान है. प्रशांत ने जब अमृता से रूपेंद्र के बारे में पूछा तो उस ने भी वही सब बताया जो कुछ देर पहले ओमवीर ने फोन पर उसे बताया था.

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वह घबराते हुए बोली, ‘‘भैया, वो सोने के जेवर ले कर गए हैं. इतनी देर हो गई, न तो वापस आए हैं और न ही फोन रिसीव कर रहे हैं. मेरा दिल बहुत घबरा रहा है. आप को तो पता है कि यह इलाका कितना खराब है. यहां आए दिन लूटपाट और न जाने क्याक्या होता रहता है. कहीं उन के साथ कुछ ऐसावैसा तो नहीं हो गया? मैं चाहती हूं कि एक बार आप लोग सोसायटी के बाहर जा कर उन्हें आसपास के इलाके में देख लें.’’

कहतेकहते अमृता की आंखों में आंसू छलक आए.

‘‘घबराइए मत भाभीजी, कुछ नहीं होगा रूपेंद्र को. हम लोग अभी पुलिस को खबर कर देते हैं.’’ प्रशांत ने कहा.

‘‘नहीं प्रशांत भाई, अभी हमें पुलिस को इनफौर्म नहीं करना है. मैं चाहता हूं कि पहले हम कुछ लोग मिल कर रूपेंद्र को तलाश कर लें, अगर वह नहीं मिलता तो फिर पुलिस को सूचना दे देंगे.’’ ओमवीर ने बीच में बात काट कर अपनी राय दी.

‘‘हां, यह भी ठीक है. पहले हम लोग तलाश कर लेते हैं.’’ प्रशांत बोला.

पुलिस में जाने से पहले प्रशांत की खोजबीन

इस के बाद प्रशांत और ओमवीर सोसायटी के दफ्तर में पहुंचे. वहां से ओमवीर ने सोसायटी के गार्ड और औपरेटर का काम करने वाले सुमित को अपने साथ ले लिया. प्रशांत ने सोसायटी में रहने वाले अपने दोस्तों संजीव और रोबिन को भी साथ ले लिया.

इस के बाद वे सभी कार ले कर आसपास के इलाके में रूपेंद्र को तलाश करने के लिए निकल पड़े. एक घंटे में उन लोगों ने आसपास के 6-7 किलोमीटर का रास्ता देख लिया लेकिन न तो उन्हें कहीं रूपेंद्र की कार दिखाई दी और न ही आसपास के इलाके में कहीं कोई दुर्घटना होने की जानकारी मिली.

सभी लोग आगे की काररवाई पर विचार करने के लिए वापस सोसायटी की तरफ लौटने लगे. तब तक रात के 10 बज चुके थे. गौर सिटी से कुछ दूर ब्रह्मा मंदिर है. जैसे ही वे लोग कार से मंदिर के पास से गुजरे कि तभी सुमित ने चिल्ला कर कहा, ‘‘सर, कार रोको… कार रोको.’’

‘‘क्या हुआ भाई, कुछ हो गया क्या?’’ कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे प्रशांत ने कार की गति धीमी करते हुए सुमित से पूछा.

सुमित ने मंदिर के पास सर्विस रोड की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘सर, वो देखो वहां एक सफेद रंग की कार खड़ी है. मुझे लगता है, वह रूपेंद्र सर की ही है.’’

सभी ने चौंकते हुए सर्विस रोड की तरफ देखा तो वहां वाकई एक सफेद रंग की कार खड़ी नजर आई. प्रशांत ने फौरन अपनी कार आगे बढ़ा दी. कुछ दूर आगे जा कर यू टर्न ले कर वह कार को सर्विस रोड पर वहां ले गया, जहां सफेद रंग की कार खड़ी थी.

पास पहुंचते ही प्रशांत ने देखा कि वाकई वह फोर्ड फिगो कार थी और उस का नंबर यूपी95जे 9096 था, जो रूपेंद्र की कार का था. कार का नंबर पढ़ते ही प्रशांत और ओमवीर साथियों के साथ जल्दी से नीचे उतरे और उन्होंने गाड़ी के शीशे से भीतर झांका तो उन के हलक से चीख निकल गई. क्योंकि कार के भीतर ड्राइविंग सीट पर खून से लथपथ रूपेंद्र का शव पड़ा था.

प्रशांत व ओमवीर ने दरवाजा खोल कर रूपेंद्र को हिलाडुला कर देखा तो ओमवीर की मौत हो चुकी थी.

‘‘ओह माई गौड! मुझे जिस बात का शक था, वही हुआ. लगता है बदमाशों ने लूटपाट कर के रूपेंद्र को मार दिया है.’’ कहते हुए ओमवीर ने अपना माथा पकड़ लिया.

जिस की तलाश में प्रशांत और उस के साथी निकले थे, वह तलाश पूरी हो चुकी थी. रूपेंद्र जिंदा तो नहीं मिला अलबत्ता उस की लाश जरूर मिल गई थी. उस की मौत कैसे हुई? क्या हादसा हुआ? यह पता लगाना पुलिस का काम था.

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लिहाजा करीब साढ़े 10 बजे प्रशांत ने पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी. कुछ ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुंच गई. ओमवीर ने भी तब तक अपनी पत्नी और रूपेंद्र की पत्नी को इस बारे में खबर कर दी थी. गौर सिटी के कुछ दूसरे लोग भी रूपेंद्र की लाश मिलने की सूचना पा कर वहां पहुंच गए.

पीसीआर गाड़ी से आए पुलिसकर्मियों ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद यह खबर स्थानीय बिसरख थाने को दे दी. बिसरख थाने के एसएचओ मनोज पाठक पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल की जांचपड़ताल के बाद सीओ पीयूष कुमार सिंह, एसपी (देहात) विनीत जायसवाल और फोरैंसिक टीम को खबर कर दी. कुछ ही देर में फोरैंसिक टीम और पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए.

जांचपड़ताल में पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान नहीं मिला, जिस से पता चल पाता कि रूपेंद्र की हत्या लूटपाट के लिए या लूटपाट का विरोध करने के कारण हुई है. सब से बड़ी बात यह थी कि उस की हत्या उस के निवास से करीब ढाई किलोमीटर की दूरी पर हुई थी.

रूपेंद्र की पत्नी अमृता भी अपने 6 साल के बेटे आयुष्मान के साथ वहां पहुंच गई थी. पति की मौत के बाद एक पत्नी का दुख और सदमा उस पर क्या असर करता है, अमृता का विलाप देख कर समझा जा सकता था. ओमवीर की पत्नी शिखा जो रिश्ते में अमृता की ननद थी, उस ने कुछ दूसरी महिलाओं व लोगों के साथ मिल कर रो रही अमृता को सांत्वना दी.

फोरैंसिक टीम ने मृतक की कार के भीतर से फिंगरप्रिंट व दूसरी तरह के नमूने एकत्र कर लिए थे. मौके की काररवाई निपटाने के बाद इंसपेक्टर मनोज पाठक ने रूपेंद्र का शव रात में ही पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही उन्होंने मृतक के परिजनों से इस मामले की एफआईआर दर्ज कराने के लिए लिखित शिकायत देने के लिए अगली सुबह थाना बिसरख आने के लिए कहा.

थाने में रिपोर्ट लिखाने से भी किया मना

लेकिन हैरत की बात यह कि अगली सुबह रूपेंद्र की पत्नी या उस के बहनोई ओमवीर में से कोई भी थाने नहीं पहुंचा. हां, रूपेंद्र का दोस्त प्रशांत जरूर अपने दोस्तों को ले कर बिसरख थाने पहुंच गया था. इंसपेक्टर पाठक ने जब उस से पूछा कि रूपेंद्र की पत्नी या परिवार के लोगों में से कोई एफआईआर कराने क्यों नहीं आया तो प्रशांत ने बताया कि उस ने रूपेंद्र के परिवार वालों से थाने चलने के लिए कहा था. लेकिन उन्होंने कहा कि रिपोर्ट लिखाने से क्या होगा, इस से रूपेंद्र जिंदा तो हो नहीं जाएंगे.

परिजनों का जवाब बेहद चौंकाने वाला था, लेकिन पुलिस को जांच आगे बढ़ाने के लिए महज शिकायत की जरूरत होती है. घटना से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा कोई भी शख्स शिकायत कर सकता है.

लिहाजा इंसपेक्टर पाठक ने प्रशांत से ही लिखित में शिकायत ले कर 29 अप्रैल, 2019 को भादंसं की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने उसी दिन रूपेंद्र के शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव उस के घर वालों को सौंप दिया. तब तक रूपेंद्र के पिता और भाई के अलावा उस के दूसरे रिश्तेदार तथा अमृता के परिजन भी आ चुके थे.

सुबह से ही इंसपेक्टर पाठक ने रूपेंद्र हत्याकांड की जांच का काम तेज कर दिया. उन्होंने एसआई पीयूष और वीरपाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया. साथ ही उन्होंने एसपी (देहात) की टीम के कांस्टेबल सुधीर और संजीव को मृतक के परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल फोन की कालडिटेल्स निकलवाने और उन के फोन को सर्विलांस पर लगवाने की जिम्मेदारी सौंप दी.

पुलिस टीम ने रूपेंद्र के परिजनों से पूछताछ की. इस के अलावा गैलेक्सी सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगालनी शुरू कर दी.

काल डिटेल्स, सीसीटीवी कैमरों की फुटेज आदि की जांच के बाद पुलिस ने पहली मई को ओमवीर को हिरासत में ले लिया. ओमवीर मृतक का बहनोई था. इंसपेक्टर मनोज पाठक ने थाने ला कर जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपने खिलाफ पुलिस के पास मौजूद सबूतों को देख कर आसानी से सच उगल दिया.

पुलिस के सामने जब रूपेंद्र की हत्या का सच आया तो सब हैरान रह गए क्योंकि ओमवीर ने रूपेंद्र की हत्या अपनी सोसायटी के गार्ड सुमित और एक अन्य साथी भूले के साथ मिल कर की थी. पुलिस की एक टीम ने उसी दिन उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया. ओमवीर और उस के दोनों साथियों से पूछताछ हुई तो रूपेंद्र हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

रूपेंद्र सिंह चंदेल (33 वर्ष) मूलरूप से उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के गांव मोहारी का रहने वाला था. उस के पिता अर्जुन सिंह चंदेल पीएसी में हैडकांस्टेबल हैं और इन दिनों उन की नियुक्ति प्रयागराज में है. रूपेंद्र का एक मंझला भाई राघवेंद्र भी शादीशुदा है और गांव में रहता है. राघवेंद्र वकालत की पढ़ाई कर रहा है. रूपेंद्र का एक छोटा भाई भी है, जो दिल्ली में रहता है. रूपेंद्र ने एमबीए किया था और पढ़ाई पूरी करने के बाद सन 2012 में उस की नौकरी ग्रेटर नोएडा की बिसकुट कंपनी हिंज प्राइवेट लिमिटेड में लग गई थी.

नौकरी लगने के एक साल बाद सन 2013 में परिवार वालों ने उस की शादी महोबा की रहने वाली अमृता सिंह से कर दी. अमृता न सिर्फ सुंदर थी बल्कि पोस्टग्रैजुएट भी थी. अमृता से शादी के बाद रूपेंद्र की जिंदगी में तेजी से बदलाव आने लगा.

एक साल बाद ही वह एक बच्चे का पिता बन गया, जिस का नाम आयुष्मान रखा. अमृता के जीवन में आने के बाद रूपेंद्र ने तेजी के साथ तरक्की की सीढि़यां चढ़ीं और वह सेल्स मैनेजर के ओहदे तक पहुंच गया.

करीब 3 साल पहले उस ने फोर्ड फिगो कार खरीदी थी, उस के बाद एक साल पहले यानी मई 2018 में रूपेंद्र ने गैलेक्सी नार्थ एवेन्यू-2 में 35 लाख रुपए में 2 बैडरूम का फ्लैट भी खरीद लिया था. रूपेंद्र की अच्छी सैलरी थी, इसलिए ये तमाम चीजें उस ने लोन ले कर खरीदी थीं. मकान खरीदने के बाद रूपेंद्र ने अपने मकान में 2-3 लाख रुपए खर्च कर के इंटीरियर डिजाइनिंग का कुछ काम भी कराया था.

ओमवीर इंटीरियर डिजाइनर से बना बहनोई

रूपेंद्र के फ्लैट में इंटीरियर का काम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के मोहारी गांव के रहने वाले ओमवीर सिंह ने किया था. ओमवीर गैलेक्सी-2 सोसायटी के फ्लैट संख्या ई-244 में अपने भाई कृष्णवीर तथा 2 रिश्तेदारों के साथ रहता था. ये सभी गौर सिटी की सोसायटियों में इंटीरियर डिजाइनिंग का काम करते थे.

उस ने गैलेक्सी-2 सोसायटी में भी करीब 20 से अधिक फ्लैटों का इंटीरियर डिजाइन किया था. रूपेंद्र को जब ओमवीर से बातचीत में यह बात पता चली कि ओमवीर भी ठाकुर है तो उस ने अपने फ्लैट की इंटीरियर डिजाइन का काम ओमवीर से ही कराया.

कुछ दिन रूपेंद्र के घर में काम करने के दौरान ओमवीर और रूपेंद्र की दोस्ती हो गई. ओमवीर 4 भाइयों में सब से बड़ा था. उस का एक छोटा भाई कृष्णवीर उसी के साथ काम करता था जबकि बाकी दोनों भाई गांव में ही रह कर खेती करते थे. ओमवीर पढ़ालिखा और अच्छे परिवार का लड़का था.

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जब रूपेंद्र से ओमवीर की दोस्ती हो गई तो रूपेंद्र के घर उस का अकसर आनाजाना हो गया. रूपेंद्र रोजाना सुबह को नौकरी पर निकल जाता और शाम को ही घर लौटता था. लेकिन ओमवीर का अपना काम था. वह ज्यादातर गैलेक्सी सोसायटी में ही रहता था. इसलिए वह जबतब रूपेंद्र की गैरमौजूदगी में भी उस के घर चला जाता था.

चूंकि ओमवीर रूपेंद्र का दोस्त था, इसलिए ओमवीर जब भी रूपेंद्र की अनुपस्थिति में उस के घर जाता तो अमृता ओमवीर को एक पारिवारिक दोस्त की तरह सम्मान और सत्कार देती थी. शुरुआत में तो ओमवीर कभीकभार ही रूपेंद्र के घर आता था, लेकिन धीरेधीरे अमृता की खूबसूरती उस के मन में बस गई.

अमृता को पति से प्यारा लगने लगा ओमवीर

इस के बाद तो वह रोज ही कुछ घंटों के लिए रूपेंद्र की गैरमौजूदगी में उस के घर जाने लगा. शुरू में ओमवीर और अमृता औपचारिक रूप से ही बातचीत करते थे, लेकिन जब ओमवीर का अकसर आनाजाना शुरू हुआ तो दोनों की झिझक दूर हो गई और वे खुल कर बातचीत करने लगे.

जनवरी 2019 में दोनों की झिझक इस हद तक दूर हो गई कि ओमवीर अमृता से शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा. जब अमृता ने उस की इस तरह की हंसीमजाक का कोई विरोध नहीं किया तो ओमवीर की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद वह इस से भी एकदो कदम आगे बढ़ गया.

उस ने हंसीमजाक में पहले अमृता को एकदो बार अपनी बांहों में भर लिया था. लेकिन जब अमृता ने इस का भी विरोध नहीं किया तो बात इस के आगे चुंबन तक पहुंच गई. दरअसल, रूपेंद्र जहां गंभीर और सीधे स्वभाव का युवक था, वहीं ओमवीर तेजतर्रार और आधुनिक विचारधारा का लड़का था.

अमृता ओमवीर जैसे तेजतर्रार लोगों को पसंद करती थी. यही कारण रहा कि उस ने कभी ओमवीर की किसी हरकत का बुरा नहीं माना था. इस से ओमवीर की हरकतें और बढ़ने लगीं. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. दोनों के बीच उस रिश्ते ने जन्म ले लिया, जिसे समाज अवैध संबंध कहता है. अमृता को ओमवीर के जिस्म का ऐसा चस्का लगा कि बाद में दोनों के बीच अकसर ही यह खेल खेला जाने लगा.

रूपेंद्र उन के खेल से पूरी तरह अनजान था. अमृता की शारीरिक जरूरतें पूरी होने लगीं तो उस ने धीरेधीरे पति में दिलचस्पी लेनी बंद कर दी. ओमवीर ही उस के लिए सब कुछ हो गया था. लेकिन ओमवीर के मन में कुछ और ही खिचड़ी पकने लगी थी. उस ने सोचा कि अमृता के साथ अगर रूपेंद्र का ये मकान भी उसे मिल जाए तो नोएडा जैसी औद्योगिक नगरी में वह अपना बड़ा बिजनैस खड़ा कर सकता है. इसलिए अब उस ने धीरेधीरे अमृता के दिलोदिमाग में रूपेंद्र के खिलाफ जहर के बीज बोने शुरू कर दिए.

अपनी लच्छेदार बातों में फंसा कर ओमवीर ने अमृता के दिमाग में नफरत भर दी. बात यहीं खत्म नहीं हुई. 2019 के फरवरी महीने में रूपेंद्र की मौसी की लड़की शिखा 15 दिन के लिए रूपेंद्र के घर रहने के लिए आई थी. शिखा अमृता जैसी खूबसूरत तो नहीं थी लेकिन सीधीसादी थी. उसे देख कर ही ओमवीर के मन में खयाल आया कि क्यों न रूपेंद्र के घर में बेरोकटोक आने के लिए शिखा से शादी कर ली जाए.

जब यह बात उस ने अमृता से कही तो बात उस की भी समझ में आ गई. अमृता ने इस बारे में पति से बात की तो रूपेंद्र को भी लगा कि जवान मौसेरी बहन के लिए अगर ओमवीर जैसा बिरादरी का ही लड़का मिल जाए तो इस से अच्छा और क्या होगा. ओमवीर ठीकठाक कमा भी लेता था.

रूपेंद्र ने जब महोबा में रहने वाली अपनी मौसी से यह बात की तो वह तैयार हो गईं. फरवरी के आखिरी हफ्ते में दोनों परिवारों की रजामंदी से ओमवीर और शिखा की शादी हो गई. शादी के कुछ रोज बाद शिखा अपने पति ओमवीर के पास नोएडा आ गई. वह गैलेक्सी-2 सोसायटी में पति के साथ रहती थी. शिखा का अभी गौना भी होना था, लिहाजा 10 दिन बाद वह अपने मायके चली गई.

लेकिन इसी दौरान एक दिन न जाने क्यों रूपेंद्र को अमृता के किसी व्यवहार से शक हो गया कि ओमवीर से उस के संबंध कुछ अलग तरह के हो चुके हैं. हालांकि उसे सिर्फ शक था लेकिन फिर भी उस के मन में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. लिहाजा रूपेंद्र ने अमृता से ओमवीर से दूरी बना कर रखने की बात कह दी. रूपेंद्र के ऐसा कहते ही अमृता समझ गई कि हो न हो रूपेंद्र को उन के संबंधों पर शक हो गया है.

बनने लगी हत्या की योजना

अमृता ने जब यह बात ओमवीर को बताई तो उसे भी लगा कि उसे अगर अमृता व उस की संपत्ति हासिल करनी है तो रूपेंद्र को रास्ते से हटाना होगा. यह काम करने का यही अच्छा मौका है. यह बात उस ने अमृता से कही. अमृता तो उस के प्यार में अंधी हो चुकी थी, लिहाजा वह पति की हत्या कराने के लिए तैयार हो गई.

ओमवीर ने अमृता से कहा कि अगर वह कुछ पैसे खर्च कर दे तो वह ऐसे लोगों का इंतजाम कर देगा जो रूपेंद्र को उन के रास्ते से हटा देंगे. अमृता ने ओमवीर से कह दिया कि वह उसे पैसे दे देगी, वह भाड़े के हत्यारों का इंतजाम कर ले.

योजना के अनुसार, अमृता ने इस दौरान ओमवीर से दूरी बना ली. उसे ओमवीर से जो बात करनी होती वह या तो उसे फोन कर देती या फिर वाट्सऐप पर मैसेज कर के बात कर लेती थी. इधर रूपेंद्र इस बात से अनजान था कि ओमवीर तथा अमृता उस के खिलाफ एक खूनी साजिश रच चुके हैं. इस साजिश को अमली जामा पहनाने के लिए ओमवीर ने अपनी ही सोसायटी के एक गार्ड सुमित को भी पैसे का लालच दे कर साजिश में शामिल कर लिया.

सुमित हापुड़ जिले की बाबूगढ़ तहसील के गांव भडंगपुर का रहने वाला था. पिछले 2 सालों से वह गैलेक्सी-2 सोसायटी में गार्ड की नौकरी कर रहा था. सुमित हैबतपुर गांव में किराए का एक कमरा ले कर रह रहा था.

सुमित ओमवीर से कई बार कह चुका था कि वह कोई ऐसा काम बताए, जिस से उसे मोटी रकम मिल सके. उस रकम से वह अपना कोई कामधंधा शुरू कर लेगा. ओमवीर के कहने पर सुमित ने जिला बुलंदशहर के बीबीनगर के रहने वाले अपने एक दोस्त भूले को भी इस साजिश में शामिल कर लिया.

लेकिन बिना पैसा लिए वे इस काम को अंजाम देने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने इस काम के लिए 3 लाख रुपए की मांग की थी. ओमवीर ने यह बात अमृता को बताई तो अमृता ने 23 अप्रैल को ओमवीर के साथ जा कर अपनी सोने की 2 चूडि़यां और एक हार बेच कर एडवांस में डेढ़ लाख रुपए दे दिए.

लालची ओमवीर ने इन पैसों में से 50 हजार रुपए अपने पास रख कर 50-50 हजार रुपए सुमित और भूले को दे दिए. बाकी रकम उस ने काम पूरा होने के बाद देने का वायदा कर लिया.

काम को अंजाम देने के लिए सुमित ने 8 हजार रुपए में .32 बोर की कंट्री मेड पिस्टल और कुछ कारतूस खरीद लिए. अब सही मौका देख कर सुमित की हत्या की वारदात को इस तरह अंजाम देना था कि लूट की घटना लगे.

28 अप्रैल, 2019 को रविवार का दिन था और रूपेंद्र की उस दिन छुट्टी थी. ओमवीर ने उस दिन को खासतौर से इसलिए चुना था क्योंकि उन्हें जो कहानी बनानी थी, उस के लिए रूपेंद्र की छुट्टी का दिन ही सब से मुफीद लगा था.

ओमवीर छुट्टी के दिन अकसर रूपेंद्र के घर उस से मिलने चला जाता था. उस दिन भी वह उस के घर आया. वे दोनों चाय पी कर निबटे ही थे कि अमृता ने रूपेंद्र से दोपहर के वक्त कहा कि रसोई की चिमनी खराब हो गई है उसे दूसरी चिमनी खरीदनी है. लिहाजा दोपहर के वक्त रूपेंद्र चिमनी खरीदने की बात कह कर अपने फ्लैट से निकला.

घर में घुस कर विश्वास जीता फिर लगा दिया ठिकाने

रूपेंद्र के साथ लिफ्ट में नीचे तक ओमवीर भी आया. लेकिन वह नीचे आ कर रूपेंद्र से यह कह कर अपने फ्लैट की तरफ बढ़ गया कि उसे हैबतपुर जाना है, वह पार्किंग से गाड़ी निकाल कर सोसायटी के बाहर उस का इंतजार करे. तब तक वह अपने फ्लैट से कुछ सामान ले कर आता है. रूपेंद्र अपनी कार निकालने के लिए पार्किंग की तरफ चला गया. तभी ओमवीर ने सुमित और भूले को सोसायटी के बाहर पहुंचने को कहा. इतनी देर में ओमवीर अपने फ्लैट पर पहुंचा और वहां से पिस्टल और कारतूस जेब में रख कर सोसायटी के बाहर पहुंच गया.

रूपेंद्र को भी पार्किंग से कार ले कर बाहर पहुंचने में 15 मिनट का समय लगा. वहां रुक कर वह ओमवीर का इंतजार करने लगा. सोसायटी से थोड़ा आगे वह रूपेंद्र के पास पहुंचा तो उस ने कुछ ही दूरी पर खड़े सुमित व भूले से पूछा, ‘‘अरे भाई, तुम यहां कैसे खड़े हो, किस का इंतजार कर रहे हो?’’

सुमित ने जोर से चिल्ला कर कहा, ‘‘भैया, आटो का इंतजार कर रहे हैं. तिगड़ी गोलचक्कर तक जाना है.’’

ओमवीर ने वहीं से चिल्ला कर कहा, ‘‘अरे आ जाओ, रूपेंद्र भैया उधर ही जा रहे हैं. तुम लोगों को भी छोड़ देंगे.’’

ओमवीर खुद तो रूपेंद्र की कार में बैठ ही गया, उस ने रूपेंद्र से सुमित व उस के साथी को भी तिगड़ी गोलचक्कर तक लिफ्ट देने की सिफारिश कर कार में बिठा लिया.

गरमी के कारण गौर सिटी की हैबतपुर जाने वाली सर्विस रोड पर दिन के वक्त छुट्टी वाले दिन कुछ ज्यादा ही सन्नाटा रहता है. सोसायटी के करीब ढाई किलोमीटर दूर जाने पर अचानक ओमवीर ने रूपेंद्र से कार रोकने को कहा तो रूपेंद्र ने बिना कुछ सोचेसमझे कार रोक दी.

कार रोकने के बाद उस ने ओमवीर से जैसे ही पूछा कि क्या हुआ, कार क्यों रुकवाई तो वह यह देख कर चौंक गया कि तब तक ओमवीर अपनी कमर में खोंसे पिस्टल को निकाल कर उस की तरफ तान चुका था. जब तक रूपेंद्र कुछ समझता तब तक ओमवीर ने उस की कनपटी से पिस्टल सटा कर गोली चला दी.

गोली चलते ही खून की धारा बहने के साथ ही रूपेंद्र का सिर स्टीयरिंग पर लुढ़क गया. उसे जब इत्मीनान हो गया कि वह ढेर हो चुका है तो उन तीनों ने रूपेंद्र की घड़ी, पर्स, अंगूठी और गले में पहनी सोने की चेन निकाल ली ताकि पुलिस यही समझे कि मामला लूटपाट के लिए हुई हत्या का है. चूंकि दोपहर के वक्त इलाके में सन्नाटा था, इसलिए न तो किसी ने गोली की आवाज सुनी और न ही किसी ने उन्हें वारदात को अंजाम देते हुए देखा.

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इस के बाद तीनों वहां से निकले और पिस्टल बाकी बचे कारतूसों के साथ कुछ ही दूरी पर झाडि़यों के पीछे एक गड्ढे में फेंक दी. भूले वारदात के बाद अपने गांव चला गया था, जबकि ओमवीर तथा सुमित सोसायटी में वापस आ गए. सुमित वापस आ कर सोसायटी में अपनी ड्यूटी करने लगा जबकि ओमवीर ने घर पर आ कर अपने कपड़े बदले क्योंकि उस की शर्ट पर खून के निशान लग गए थे.

इस के 3-4 घंटे बाद योजना के मुताबिक अमृता ने अपना नाटक शुरू किया. उस ने ओमवीर को बुला कर कहा कि अब सभी से यही कहना है कि रूपेंद्र घर से गहने ले कर निकला था. वह गहने उसे गाजियाबाद में पीसी ज्वैलर्स के पास गिरवी रखने थे. दोनों ने यही कहानी गढ़ी.

उसी के बाद ओमवीर ने घटना का गवाह बनाने के लिए रूपेंद्र के पड़ोसी प्रशांत को फोन कर के इस बारे में बताया और उस के बाद रूपेंद्र को ढूंढने का नाटक शुरू हुआ. सब कुछ पहले से तय था. इन लोगों ने सुमित को इसलिए जानबूझ कर साथ लिया कि वह नाटक रचते हुए उन्हें रूपेंद्र की कार तक ले जाए. यही उस ने किया भी.

चूंकि पुलिस को जांच के दौरान पता चला था कि रूपेंद्र का मोबाइल तो उस की जेब में है लेकिन उस का पर्स, अंगूठी और सोने की चेन उस के पास नहीं थी, इसलिए उस रात पुलिस भी इस वारदात को लूटपाट के लिए हुई हत्या की घटना मान कर जांच करने में लगी थी.

अमृता का व्यवहार ही बना शक की वजह

लेकिन अगले दिन बिसरख के एसएचओ मनोज पाठक को पहली बार रूपेंद्र की पत्नी अमृता का यह व्यवहार अजीब लगा कि पति की हत्या की सूचना के बाद जब वह घटनास्थल पर पहुंची तो उस ने पुलिस को कोई शिकायत नहीं दी. वह बस यही कहती रही कि किसी ने जेवर लूटने के लिए उस के पति की हत्या कर दी. अगले दिन भी जब उस ने कोई शिकायत नहीं दी तो उस पर शक और गहरा गया.

जांच में एसएचओ का शक उस वक्त और भी ज्यादा बढ़ गया जब अमृता से पूछताछ की तो वह एक रटीरटाई थ्यौरी के मुताबिक बेधड़क हो कर मामले को लूटपाट का बताने पर अड़ी रही.

जब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि जिस समय दोपहर में रूपेंद्र को गोली मारी गई थी, उसी वक्त ओमवीर ने उसे फोन कर के लंबी बातचीत की थी और वाट्सऐप पर कहा था कि काम हो गया है.

हालांकि ओमवीर और सुमित ने पूछताछ में यह बताया था कि वे वारदात के वक्त सोसायटी में थे. लेकिन वारदात के वक्त उन के मोबाइल की लोकेशन रूपेंद्र के मोबाइल की लोकेशन के साथ ही मैच हो रही थी.

सोसायटी के आउट गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे की जांच करने पर पता चला कि जिस वक्त रूपेंद्र सोसायटी के बाहर अपनी कार ले कर निकला था, उस के 2-4 मिनट के अंतराल से ओमवीर तथा सुमित एक अन्य व्यक्ति के साथ पैदल सोसायटी के बाहर निकले थे. इतना ही नहीं, सुमित और ओमवीर डेढ़ घंटे बाद एक साथ सोसायटी के अंदर प्रवेश करते हुए सीसीटीवी फुटेज में दिखे.

ओमवीर और सुमित के बीच इसी दौरान हुई बातचीत और ओमवीर की अमृता के साथ लंबीलंबी बातचीत तथा वाट्सऐप संदेशों ने भी पुलिस को ओमवीर तथा अमृता पर शक करने की वजह दे दी. ओमवीर पर पुलिस का शक उस वक्त यकीन में बदल गया जब 29 अप्रैल की सुबह रूपेंद्र के बैंक खाते से किसी ने 10 हजार रुपए की 2 बार एटीएम में ट्रांजैक्शन की. इस का मैसेज पुलिस के कब्जे में मौजूद रूपेंद्र के फोन पर आया तो पुलिस चौंकी.

पुलिस की एक टीम उसी समय उस एटीएम की जांच करने के लिए गई. शाम होतेहोते सीसीटीवी की फुटेज देखने पर पुलिस को पता चला कि यह रकम एटीएम से ओमवीर ने निकाली थी. बस फिर क्या था, पुलिस के सामने सारी कडि़यां जुड़ती चली गईं. पुलिस ने सब से पहले ओमवीर को हिरासत में ले कर कड़ी पूछताछ की. उस ने सारा सच उगल दिया. इस के बाद इंसपेक्टर पाठक की टीम ने उसी दिन सुमित और भूले को भी धर दबोचा.

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जब तीनों को पुलिस ने गिरफ्तार किया, तभी अमृता को अपनी गिरफ्तारी की आशंका हो गई थी. पुलिस उस तक पहुंचती, उस से पहले ही वह फरार हो गई. इंसपेक्टर पाठक ने ओमवीर तथा उस के साथियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल और कई जिंदा कारतूस भी बरामद किए.

पुलिस ने ओमवीर, सुमित और भूले को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने अमृता को पकड़ने के लिए जाल बिछाया. सर्विलांस की मदद से आखिर 4 मई को अमृता को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस से मिली जानकारी के बाद ओमवीर को एक बार फिर से पुलिस रिमांड पर लिया तो उस की शिनाख्त पर पुलिस ने ज्वैलर्स के यहां से डेढ़ लाख रुपए में बेचे गए आभूषण भी बरामद कर लिए.

अगर पुलिस रूपेंद्र की हत्या को केवल लूटपाट का विरोध करने के दौरान हुई मौत पर ही अपनी जांच केंद्रित करती तो अमृता और ओमवीर अपनी साजिश में कामयाब हो जाते. आरोपियों ने एक के बाद एक ऐसी कई छोटीछोटी गलतियां कर दी थीं कि पुलिस धीरेधीरे उन कडि़यों को जोड़ कर उन तक पहुंच गई.

ननदोई के इश्क में गिरफ्तार हुई अमृता के पास अब न तो पति है और न ही प्रेमी. नाजायज संबंधों के चक्कर में उस ने अपने सुखी संसार को खुद ही उजाड़ लिया.

—कथा पुलिस की आरोपियों से हुई पूछताछ पर आधारित

(कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां)

साउथ एक्ट्रेस का हौट अवतार कर चुकी है ‘अर्जुन रेड्डी’ में काम

तेलूगु फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ की एक्ट्रेस शालिनी पांडे की एक्टिंग के तो सभी दिवाने हैं. फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ से खासा पौपुलैरिटी बटोरमे वाली शालिनी ने सोशल मीडिया में धमाल मचा दिया हैं. दरअसल शालिनी ने  हाल ही में अपनी कुछ बिकिनी फोटोज को सोशल मीडिया पर शेयर किया था. और देखते ही देखते ही ये फोटोज सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गई. इन फोटोज से शालिनी के फैंस के बीच खलबली मच गई है. फैंस शालिनी की फोटोज को काफी पसंद कर रहे  हैं वही कुछ उनको ट्रोल करने में भी पीछे नहीं हैं.

बिकिनी में दिखी शालिनी

इस फोटो में शालिनी नें ग्रे कलरफूल बिकिनी में अपना बेक दिखाते नजर आईं. बिकनी पहनकर शालिनी ने लाखों-करोड़ों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. शालिनी को ट्रैवलिंग का भी काफी शौक है और शूटिंग से समय निकालकर वह अक्सर घूमने निकल जाती है और फैंस के लिए फोटोज शेयर करती हैं. शालिनी को नेचर के आसपास वक्त बिताना ज्यादा पसंद है जिसका सबूत हैं उमकी ये फोटोज.

 

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“I would much rather have been merry than wise.” ~ Jane Austen 📸: @khushboo_dixit ♥️

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I’m nobody’s child. I’m like a flower, just growing wild. 📷 : @khushboo_dixit

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फिटनेस फ्रीक हैं शालिनी

शालिनी अपनी सेहत का बेहद ध्यान रखती हैं. आएं दिन वो सोशल मीडिया पर अपने जिम की फोटोज और वीडियों शेयर करती रहती हैं. शालिनी जिम में घंटो पसीने बहाती हैं ताकि वो सेहतमंद रहें.

 

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I’ll never hate gym if you make me workout everyday 😎 @ritika_offl Also I again got distracted 🤦🏽‍♀️

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Because there are too many distractions while working out 😂 @ritika_offl

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अपकमिंग फिल्म के लिए कर रही हैं तैयारी

बता दें कि इन दिनों शालिनी कई प्रोजेक्ट्स में बिजी हैं. अपनी अपकमिंग फिल्म के लिए शालिनी ने वजन कम किया है. फैंस को अपने बारे में अपडेट करने के लिए ही शालिनी ने बिकिनी में फोटो शेयर की. लेकिन यूजर्स को शालिनी का बोल्ड अंदाज पसंद नहीं आया.

कठुआ गैंगरेप और मर्डर केस: उड़ते पंख कटे

10 जनवरी, 2018 को बकरवाल समुदाय से ताल्लुक रखने वाली 8 साला बच्ची का अपहरण किया गया. इस के बाद 17 जनवरी को उस की लाश कटीफटी बरामद हुई थी. कठुआ में इस बच्ची को ड्रग्स दे कर दरिंदगी की जाती रही. बच्ची को ड्रग्स के नशे में इसलिए रखा गया, ताकि वह दर्द के मारे चिल्ला भी न सके.

यह खुलासा जम्मूकश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच की उस 15 पन्नों की चार्जशीट में हुआ है जो पठानकोट की अदालत में पेश की गई.  इस बच्ची को मन्नार कैंडी यानी गांजा और एपिट्रिल 0.5 एमजी जैसी दवाएं दी गईं. ड्रग्स की बहुत ज्यादा मात्रा के चलते वह रेप और हत्या का विरोध नहीं कर पाई.

बच्ची को आरोपियों ने 11 जनवरी, 2017 को जबरदस्ती 0.5 एमजी की क्लोनाजेपाम की 5 गोलियां दीं जो सुरक्षित डोज से ज्यादा थीं. बाद में भी उसे और गोलियां दी गईं.

अपने फैसले में जज ने बस इतना ही कहा कि इस केस में तथ्य बहुत हैं लेकिन सच एक ही है- एक आपराधिक साजिश के तहत एक बेकुसूर 8 साला मासूम का अपहरण किया गया, उसे नशीली दवाएं दी गईं, रेप किया गया और आखिर में उसे मार दिया गया.

इस तरह 8 साला मासूम को 17 महीने यानी 380 दिन बाद पठानकोट जिला एवं सत्र न्यायालय से इंसाफ मिल गया. मुख्य आरोपी सांझी राम एक स्थानीय मंदिर का पुजारी था, जहां बच्ची को कैद कर के रखा गया था. सांझी राम और उस के दोस्त परवेश कुमार व स्पेशल पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया को रणबीर पैनल कोड यानी आरपीसी की धारा 302 (हत्या), 376 (रेप) और 120 बी (आपराधिक साजिश) के तहत कुसूरवार पाया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई. साथ ही, अपराध के पहलुओं से संबंधित कई दूसरी सजाएं भी दी गईं जो आजीवन कारावास के साथ ही चलती रहेंगी. तीनों पर एकएक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया, वहीं 3 पुलिस वालों सबइंस्पैक्टर आनंद दत्ता, स्पैशल पुलिस अधिकारी सुरेंदर वर्मा और हेड कांस्टेबल तिलक राज को आरपीसी की धारा 201 (सुबूतों को मिटाना) के तहत कुसूरवार पाया गया. इन्हें 5 साल की सजा दी गई और 50,000 रुपए जुर्माना लगाया गया.

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अभियोजन पक्ष ने मामले को रेयरेस्ट औफ द रेयर बता कर मौत की सजा की मांग की. 10 जून 2019 की शाम 4 बज कर 50 मिनट पर कोर्ट ने जैसे ही उम्रकैद की सजा सुनाई तो सांझी राम ने कोर्ट में खुद को बेकुसूर बताया, वहीं कोर्ट के बाहर सांझी राम की बेटी ने भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की बात कही.

एक सच को छिपाने के लिए भले ही कितने झूठ का सहारा ले लो, पर जज ने भी अपना फैसला सुना कर यह जता दिया कि अपराधी कहीं न कहीं कोई ऐसा सुराग छोड़ जाता है जो अपराध के होने की वजह बनता है.

यह फैसला उन वहशियों के लिए एक सबक हैं जो आएदिन ऐसी ही तमाम वारदातों को अंजाम देते हैं और खुलेआम छुट्टा घूमते हैं कि देखते हैं कि हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा. जो भी सामने आएगा उसे भी इसी तरह मौत के घाट उतार देंगे.

पेचीदा मामला होने के बावजूद भी पठानकोट जिला और सत्र न्यायाधीश डॉक्टर तेजविंदर सिंह ने अपनी पैनी निगाहों से जो फैसला सुनाया वह दूसरों के लिए सबक है.

आरोप जो तय हुए

सांझी राम- आरपीसी की धारा 302 (हत्या), 376 (रेप), 120 बी (साजिश) के तहत दोषी करार. रासना गांव में देवीस्थान, मंदिर के सेवादार सांझी राम को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया है. सांझी राम बकरवाल समुदाय को हटाने के लिए इस घिनौने काम को अंजाम देना चाहता था. इस के लिए वह अपने नाबालिग भतीजे  समेत दूसरे 6 लोगों को लगातार उकसा रहा था.

आनंद दत्ता- आरपीसी की धारा 201 (सुबूतों को मिटाना) के तहत दोषी करार. सबइंस्पैक्टर आनंद दत्ता ने सांझी राम से 4 लाख रुपए रिश्वत ले कर अहम सुबूत मिटाए.

परवेश कुमार- आरपीसी की धारा 120 बी, 302 और 376 के तहत दोषी करार. वह साजिश रचने में शामिल था. उस ने बच्ची के साथ रेप किया और गला दबा कर उस की हत्या की.

दीपक खजुरिया- आरपीसी की 120बी, 302, 34, 376डी, 363, 201, 343 के तहत दोषी करार. विशेष पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया ने बच्ची को नशीली दवाएं दे कर रेप किया. इस के बाद उस का गला घोंट कर मार दिया.

सुरेंदर वर्मा- आरपीसी की धारा 201 के तहत दोषी करार. जम्मूकश्मीर में विशेष पुलिस अधिकारी सुरेंदर वर्मा ने भी सुबूत मिटाने दिए.

तिलक राज- आरपीसी की धारा 201 के तहत दोषी करार. हेड कांस्टेबल तिलक राज ने भी सांझी राम से रिश्वत ले कर अहम सुबूत मिटाए.

-कठुआ गैंगरेप और मर्डर केस में सातवें आरोपी सांझी राम के बेटे विशाल को कोर्ट ने बरी कर दिया.

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पुलिस ने पठानकोट कोर्ट में जो चार्जशीट पेश की, उस के मुताबिक:

4 जनवरी, 2018 : साजिशकर्ता सांझी राम ने बकरवाल समुदाय को इलाके से हटाने के लिए खजुरिया और परवेश कुमार की इस योजना में शामिल होने के लिए अपने नाबालिग भतीजे को तैयार किया.

7 जनवरी, 2018 : दीपक खजुरिया और उस के दोस्त विक्रम ने नशे की गोलियां खरीदीं. सांझी राम ने अपने भतीजे विशाल को कहा कि वह बच्ची का अपहरण कर ले.

8 जनवरी, 2018 : नाबालिग ने अपने एक दोस्त को इस बारे में जानकारी दी.

9 जनवरी, 2018: नाबालिग ने भी कुछ नशीली दवाएं खरीदीं.

10 जनवरी, 2018 : साजिश के तहत नाबालिग ने मासूम बच्ची को घोड़ा ढूंढऩे में मदद की बात कही. वह उसे जंगल की तरफ ले गया. बाद में बच्ची ने भागने की कोशिश की लेकिन आरोपियों ने उसे धर दबोचा. इस के बाद उसे नशीली दवाएं दे कर उसे एक देवीस्थान के पास ले गए, जहां रेप किया गया.

11 जनवरी, 2018: नाबालिग ने अपने दोस्त विशाल को कहा कि अगर वह मजे लूटना चाहता है तो आ जाए. परिजनों ने बच्ची की तलाश शुरू की. देवीस्थान भी गए लेकिन वहां उन्हें सांझी राम ने झांसा दे दिया. दोपहर में दीपक खजुरिया और नाबालिग ने मासूम को फिर नशीली दवाएं दीं.

12 जनवरी, 2018 : मासूम को फिर नशीली दवाएं दे कर रेप. पुलिस की जांच शुरू. दीपक खजुरिया खुद जांच टीम में शामिल था जो सांझी राम के घर पहुंचा. सांझी राम ने रिश्वत की पेशकश की. हेड कांस्टेबल तिलक राज ने कहा कि वह सबइंस्पेक्टर आनंद दत्ता को रिश्वत दे. तिलक राज ने डेढ़ लाख रुपए रिश्वत ली.

13 जनवरी, 2018 : विशाल, सांझी राम और नाबालिग ने देवीस्थान पर पूजा की. इस के बाद लड़की के साथ रेप किया और उसे फिर नशीली दवाएं दीं. इस के बाद बच्ची को मारने के लिए वे एक पुलिया पर ले गए. यहां पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया ने कहा कि वह कुछ देर और रुक जाएं क्योंकि वह पहले रेप करना चाहता है. इस के बाद उस का गला घोंट कर मार दिया गया.

15 जनवरी, 2018: आरोपियों ने मासूम के शरीर को जंगल में फेंक दिया.

17 जनवरी, 2018 : जंगल से मासूम बच्ची का शव बरामद.

Edited By- Neelesh Singh Sisodia 

टूटता विश्वास

भाग-1

लेखक- रेनू मंडल

‘‘21वीं सदी में रातदिन हम अपने को आधुनिक और प्रगतिशील होने का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन समाज में यदि एक विधवा स्त्री के विवाह को ले कर शोर मचाया जाए, अड़चनें डाली जाएं तो मुझे ऐसे समाज पर, लोगों की बौद्धिक परिपक्वता पर शक होता है,’’ आवेश भरे स्वर में मैं बोला था.

‘‘बेटे, ऐसी ऊंचीऊंचीं बातें भाषणों में बोलने के लिए होती हैं, आम जीवन में उतारने के लिए नहीं. क्या कहा तुम ने, शक होता है, लोगों की बौद्धिक परिपक्वता पर, यानी मैं और तुम्हारी मां बौद्धिक रूप से परिपक्व नहीं हैं,’’ पिताजी ने अपनी लाललाल आंखों से मुझे घूरा.

‘‘क्या भैया, आप भी बस, दुनिया की सारी लड़कियां क्या मर गई हैं जो आप एक विधवा से विवाह करना चाहते हैं,’’ मेरी छोटी बहन सीमा भी मुझे ताना मारने से नहीं चूकी थी.

दिल चाहा था कि चिल्ला कर कहूं, विधवा क्या हाड़मांस की बनी नहीं होती, उस के सीने में दिल नहीं होता, उस में भावनाएं और संवेदनाएं नहीं होतीं किंतु प्रकट में मैं खामोश बैठा एकटक उन सब का चेहरा देखता रहा जिन के  मन में मेरी भावनाओं की कोई कीमत नहीं थी.

वहां से उठ कर मैं अपने कमरे में आ गया. मां खाने के लिए बुलाने आईं तो मैं ने सिरदर्द का बहाना बना कर उन्हें वापस भेज दिया. उस रात देर तक मुझे नींद नहीं आई और 2 साल पहले की एक घटना चलचित्र बन कर आंखों के आगे घूम रही थी.

जीवन बीमा निगम में प्रमोशन पा कर मैं देहरादून आया था. रोज की तरह उस सुबह भी मैं बालकनी में बैठ कर चाय पीते हुए कुदरती दृश्यों में खोया था कि सहसा मेरी नजर सामने वाले घर की बालकनी पर पड़ी, जहां मेरी कल्पना की रानी साकार रूप लिए खड़ी थी. मैं मंत्रमुग्ध सा देर तक पौधों में पानी देती उस युवती के रूपसौंदर्य में खोया रहा. तभी कालबेल की आवाज ने मुझे चौंका दिया.

दरवाजा खोला, मेरा मित्र सौरभ, जो अब मेरा बहनोई भी है, आया था. उसे देखते ही मैं ने कहा, ‘तू बिलकुल ठीक समय पर आया है. जल्दी इधर आ. तुझे तेरी होने वाली भाभी से मिलवाऊं,’’ और सामने की ओर मैं ने इशारा किया.

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‘सचमुच तेरी पसंद लाजवाब है. कौन है यह लड़की और तुझे कब मिली?’

‘यह कौन है, नाम क्या है, यह मैं नहीं जानता पर कब मिली…तो भाई, अभी 2 मिनट पहले दिखाई दी है पर सौरभ, तू यह रिश्ता पक्का समझ, यार.’

‘तो भाई, लगेहाथों यह भी बता दो कि शादी का मुहूर्त कब का निकला है?’

‘बस, पंडितजी के आने की देर है, वह भी निकल आएगा,’ इतना कहते- कहते मैं और सौरभ खिलखिला कर हंस पड़े थे.

मैं सामने वाले घर में जाने का कोई मुनासिब बहाना तलाश ही रहा था कि मेरी यह समस्या अपनेआप ही हल हो गई थी. एक सुबह गेट खोल कर एक सज्जन अंदर आए और बोले, ‘बेटा, मेरा नाम शिवकांत है. तुम्हारे सामने वाले घर में रहता हूं और आज तुम्हें एक तकलीफ देने आया हूं.’

‘आप बैठिए, प्लीज,’ प्रसन्न मन से उठ कर उन की ओर कुरसी बढ़ाते हुए मैं बोला, ‘जी, कहिए.’

‘मैं ने सुना है कि तुम जीवन बीमा निगम में काम करते हो. शायद तुम्हें पता हो, 2 माह पहले ही मेरे इकलौते बेटे की एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. मेरे बेटे मनीष ने अपना 1 लाख रुपए का बीमा करवा रखा था. मैं चाहता हूं कि तुम उस की पत्नी को जल्दी से जल्दी वह रकम दिलवाने में मेरी मदद करो.’

इतना कह कर उन्होंने एक लिफाफा मेरी ओर बढ़ाया जिस में पालिसी बांड रखा था.

आफिस  जा कर मैं ने मनीष की पालिसी के बारे में पता किया. शाम को शिवकांतजी के घर उन की बहू के हस्ताक्षर करवाने गया तो उन की लड़की को भी करीब से देखने की तमन्ना दिल में कहीं न कहीं छिपी हुई थी.

शिवकांतजी और उन की पत्नी के सामने एक फार्म रख कर मैं बोला, ‘अंकल, इस पर भाभीजी के हस्ताक्षर करवा दीजिए ताकि मैं चेक इश्यू करवा सकूं.’

‘आरती बेटे, जरा यहां आना,’ शिवकांतजी ने आवाज लगाई. अगले ही पल ड्राइंगरूम की तरफ से मुझे कदमों की आहट आती सुनाई दी. परदा हटा और उस खूबसूरत चेहरे को देख कर मेरे मन की वीणा के तार यह सोच कर झंकृत हो उठे कि जरूर यह शिवकांतजी की बेटी होगी लेकिन शिवकांतजी ने जब यह कहते हुए परिचय कराया कि यह मेरी बहू आरती है तो मुझे सहसा उन की बातों पर विश्वास न हुआ.

आरती के हस्ताक्षर करवा कर मैं जल्दी ही वहां से वापस चला आया पर 2 दिनों तक मन बुझाबुझा रहा. आरती की उदास, गमगीन सूरत आंखों में तैरती रही.

तीसरे दिन सौरभ के साथ मैं शाम को मालरोड पर घूम रहा था तो वह पूछ बैठा कि भाई, पंडितजी ने शादी का कब मुहूर्त निकाला है?

उस की तरफ प्रश्न भरी नजरों से देखते हुए मैं ने आरती के बारे में बताया और इस बारे में जो सोचा था वह सब भी बताया तो वह गंभीर हो गया. कुछ देर रुक कर सौरभ बोला, ‘भाई, समाज को देखते हुए तो मैं भी यही कहूंगा कि तुम उस का खयाल छोड़ दो. तुम्हारे परिवार में एक विधवा को कोई भी स्वीकार नहीं करेगा.’

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‘नहीं सौरभ, मैं ने आरती को ले कर जो फैसला किया है वह खूब सोचसमझ कर किया है. विधवा है तो क्या हुआ? मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’

‘मैं हर हाल में तेरे साथ हूं,’ सौरभ ने मेरा हौसला बढ़ाया.

एक सप्ताह बाद बीमा कंपनी का चेक ले कर मैं आरती के घर पहुंचा. चेक थामते ही शिवकांतजी की आंखों में आंसू आ गए. मैं ने उन्हें दिलासा दिया और कुछ देर बाद जाने लगा तो शिवकांतजी बोले, ‘बेटा, कभीकभी आते रहना.’

एक दिन आरती के साथ एक डाक्टर को घर से निकलते देखा तो मैं अपने को रोक न सका और पास जा कर पूछा, ‘क्या बात है, आरती? यह डाक्टर क्यों आया था?’

‘पापा को तेज बुखार है. आप अंदर बैठिए, मैं दवा लेने जा रही हूं.’

‘लाओ, परचा मुझे दो. दवाइयां मैं ला दूंगा,’ मैं अधिकारपूर्वक बोला.

बाद के 3 दिनों तक मैं रोज फल ले कर वहां जाता रहा. मेरे जाने से उन के घर का बोझिल वातावरण हलका हो जाता. कभी मैं उन्हें अपने आफिस के दिलचस्प किस्से सुनाता तो कभी चुटकुले सुना कर उन्हें हंसाता. धीरेधीरे वे लोग इस दुख से उबरने लगे.

एक शाम मैं शिवकांतजी के घर पहुंचा तो पता चला कि वह पत्नी के साथ कहीं गए हैं. मैं ने वहां रुकना मुनासिब नहीं समझा. वापस जाने को ज्यों ही पलटा कि आरती ने यह कहते हुए रोक लिया कि मम्मीपापा आते ही होंगे तबतक आप एक कप कौफी पी लीजिए.

कौफी पीते हुए मैं ने कहा, ‘आरती, क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अपनी जिंदगी के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए?’

‘क्या मतलब?’ बड़ीबड़ी सवालिया नजरें मेरे चेहरे पर टिक गईं.

‘तुम ने एम.फिल कर रखा है. कोई नौकरी क्यों नहीं करतीं. इस तरह घर में पडे़पडे़ तुम जिंदगी को र्बोझिल क्यों बना रही हो?’

‘आप ठीक कह रहे हैं. मेरी भी नौकरी करने की बहुत इच्छा है पर ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि मम्मीपापा ने विवाह के समय ही कह दिया था कि हम लड़की से नौकरी नहीं करवाएंगे.’

‘उस समय की बात दूसरी थी अब स्थिति दूसरी है. मैं बात करूंगा अंकलआंटी से.’

मैं ने प्रयास किया तो आखिर में अंकलआंटी ने आरती को नौकरी करने की इजाजत दे दी. नौकरी लग जाने से आरती की जिंदगी बदल गई और उस का खोया आत्मविश्वास लौटने लगा था.

6 माह बीत गए थे. मेरे और उस के बीच अब दोस्ती का रिश्ता कायम हो चुका था. अपनी हर छोटीबड़ी समस्या अब वह बेझिझक मुझ से कहने लगी थी.

एक बार बुखार के कारण मैं आरती के घर नहीं जा पाया. तीसरे दिन सुबह शिवकांतजी चले आए और यह जान कर मुझ पर बिगड़ पड़े कि क्यों मैं ने उन्हें बीमारी की खबर नहीं की.

दोपहर में आरती आई. उसे आया देख आश्चर्य के साथ मुझे खुशी भी हुई कि चलो, मेरी कुछ फिक्र उसे भी है.

‘अब कैसी है आप की तबीयत?’ उस ने पूछा.

‘अभी तक तो खराब थी किंतु अब ठीक होने की कुछ उम्मीद हो चली है,’ मैं ने शरारत से उस की आंखों में झांका तो वह कुछ झेंप सी गई थी.

‘तुम आज कालिज नहीं गईं?’ मैं ने पूछा.

‘कालिज तो गई थी पर मन नहीं लगा.’

‘क्यों?’ मैं थोड़ा उस के और करीब आ कर बोला, ‘क्यों मन नहीं लगा. आरती, बोलो न.’

‘रवि, तुम्हारी तबीयत…नहीं, मेरा मतलब है आज लैक्चर नहीं था,’

उस की घबराहट देख मैं मुसकरा दिया. उस की आंखों की तड़प और बेचैनी को देख सहज अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस के मन में भी मेरे प्रति कोमल भावनाएं हैं.

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रात में जाग कर आरती के बारे में सोचता रहा और यह सुखद अहसास मन को भिगो जाता कि मेरी तरह वह भी मुझे चाहने लगी थी. ठीक ही तो था, मात्र 26 साल की उम्र थी और इस छोटी सी उम्र में वैधव्य की चादर ओढ़ लेने से ही सभी इच्छाएं मर तो नहीं जातीं. यही तो वह उम्र होती है जिस में हर लड़की आंखों में सतरंगी स्वप्न संजोती है. सिर्फ 6 महीने का ही साथ मिला था उसे पति मनीष का और इन 6 महीनों की सुखद यादें जीवन भर की बैसाखी तो नहीं बन सकतीं. ऐसे में उस का टूटा हृदय मेरे प्रेम की शीतल छांव में आसरा पाना चाहता था तो इस में गलत क्या था?

उस दिन के बाद से मैं आरती से एकांत में बात करने का मौका तलाशने लगा था. और यह मौका मुझे 20 दिन बाद मिला था. उस दिन मैं आफिस से कुछ जल्दी निकल पड़ा था. मौसम खराब था. अत: मैं जल्दी घर पहुंचना चाहता था. तभी मैं ने सड़क के किनारे आरती को बस का इंतजार करते देखा. मैं ने स्कूटर उस के पास ले जा कर रोका तो वह हंस दी.

मैं बोला, ‘अगर एतराज न हो तो मेरे साथ चलो. मैं घर छोड़ दूंगा.’

‘नहीं रवि, हमारा इस तरह जाना ठीक नहीं होगा. महल्ले के लोग क्या सोचेंगे?’

‘तुम ठीक कह रही हो. चलो, फिर नजदीक किसी रेस्तरां में एकएक कप कौफी पीते हैं. मेरे विचार में यह किसी को भी बुरा नहीं लगेगा,’ मैं ने मुसकरा कर कहा और फिर हम एक रेस्तरां में जा पहुंचे.

कौफी का आर्डर दे कर मैं ने एक भरपूर नजर आरती पर डाली और गला साफ कर बोला, ‘आरती, आज मैं तुम से अपने मन की बात कहना चाहता हूं. सच कहूं तो अपनी बात कहने के लिए ही मैं यहां कौफी पीने आया हूं.’

आरती ने बड़ीबड़ी सवालिया नजरों से मुझे देखा.

‘मैं तुम्हारा साथ पाना चाहता हूं, आरती. जिंदगी भर का साथ.’

मेरे इस प्रणय निवेदन पर आरती हैरान हो उठी. चेहरे पर लालिमा आ गई और निगाहें शर्म से झुक गईं. कुछ पल वह यों ही बैठी रही. फिर अचानक उस के चेहरे के भाव बदल गए और आंसू की दो बूंदें गालों पर लुढ़क पड़ीं.

‘क्या बात है, आरती? तुम रो क्यों रही हो?’ बेचैनी से पहलू बदला मैं ने.

‘रवि, तुम जानते हो कि मैं विधवा हूं, फिर भी ऐसी बात…’

‘मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूं.’

‘किंतु मुझे फर्क पड़ता है रवि, मेरे दोनों परिवारों को फर्क पड़ता है.’

आश्चर्य से उस के दोनों हाथों को पकड़ कर मैं बोला, ‘तुम पढ़ीलिखी हो कर अनपढ़ों जैसी बात क्यों कर रही हो? तुम्हारा परिवार आधुनिक सोच का है,’ उन्हें भला क्या एतराज हो सकता है? अच्छा बताओ, तुम्हारे भैयाभाभी क्या यह जान कर खुश नहीं होंगे कि उन की छोटी बहन का घर फिर से बसने जा रहा है. तुम्हारे सासससुर, वे भी तुम्हारे दुख से कम दुखी नहीं हैं.’

‘हां रवि, दुख तो उन्हें भी है,’ आरती मेरी ओर देख कर बोली, ‘पर बेटी के आंसू और बहू के आंसुओं में अंतर होता है, रवि. बेटी के आंसुओं से मांबाप का हृदय जितना द्रवित होता है बहू के आंसू उतना असर नहीं छोड़ पाते,’ इतना कहतेकहते आरती का स्वर भीग गया.

कुछ देर की खामोशी के बाद मैं ने फिर कहा, ‘आरती, हादसे किसी के भी साथ हो सकते हैं. जीवन इतना सस्ता नहीं कि उसे एक हादसे की भेंट चढ़ा दिया जाए और फिर आज अंकल व आंटी दोनों तुम्हारे साथ हैं, कल जब वे नहीं रहेंगे तब तुम क्या करोगी?’

मैं ने अपनी बात का असर देखने के लिए उस की आंखों में झांका. मुझे संतुष्टि हुई कि मेरी बातों का उस पर अनुकूल असर पड़ा था.

अगली 3-4 मुलाकातों में मैं ने आरती को अपने संपूर्ण पे्रम का विश्वास दिलाना चाहा. उस में साहस पैदा किया ताकि वह विवाह का जिक्र छिड़ने पर हुई अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रतिक्रिया को झेल सके.. अपनी तन्हा जिंदगी को संवारने में वह भी अब पूरी इच्छा से मेरे साथ थी.

अगले हफ्ते आफिस की 2 लगातार छुट्टियां थीं. मैं मां और पिताजी के पास दिल्ली चला गया. हर बार की तरह उन्होंने शाम की चाय पीते हुए मेरे विवाह का जिक्र छेड़ा. मैं ने उन्हें आरती के बारे में बताया. मेरी आशा के विपरीत घर में इस बात को ले कर कोहराम मच गया. मुझे मां और पिताजी की बातों का उतना दुख नहीं हुआ जितना दुखी मैं अपनी छोटी बहन सीमा के व्यवहार को ले कर हुआ था. उस ने मेरे दोस्त सौरभ से प्रेमविवाह किया था और इस विवाह में मैं ने दोनों को अपना भरपूर सहयोग दिया था. अब जबकि मुझे उस के साथ की जरूरत थी, वह मेरा विरोध करने पर तुली हुई थी.

सोचतेसोचते मैं कब सो गया, मुझे पता ही नहीं चला.

अगली सुबह मां कमरे में चाय ले कर आईं, उस समय मैं जूते के फीते बांध रहा था. मुझे तैयार देख वह हैरान हो बोलीं, ‘‘रवि बेटे, इतनी सुबहसुबह तैयार हो कर कहां जा रहा है?’’

‘देहरादून,’ मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

मां मेरे करीब चली आईं और बोलीं, ‘‘रवि, मैं जानती हूं, तू नाराज हो कर जा रहा है पर सोच बेटा, हम क्या तेरे दुश्मन हैं? एक विधवा को अपनी बहू बना कर ले आएगा तो समाज में हमारी क्या इज्जत रहेगी?’’

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‘‘मां, प्लीज, अब खत्म कीजिए इस बात को और अपनी इज्जत संभाल कर रखिए,’’ मैं बैग उठा कर दरवाजे की ओर बढ़ा तो कानों में पिघलते सीसे की तरह पिताजी की कड़कती आवाज पड़ी, ‘‘रवि की मां, यह जाता है तो इसे जाने दो. इस की खुशामद करने की जरूरत नहीं है. हां, जातेजाते तुम यह अच्छी तरह से जान लो कि जब तक मैं जिंदा हूं, यह शादी नहीं हो सकती.’’

पिताजी की बेवजह की कठोरता ने मुझ में हिम्मत पैदा कर दी और मन ही मन सोचा कि आप जिद्दी हो तो मैं महाजिद्दी हूं. आखिर मैं आप का ही

तो खून हूं. पर प्रत्यक्ष में कुछ बोला नहीं. चुपचाप बैग उठा कर घर से बाहर आ गया.

बस स्टैंड पर पहुंच कर मुझे याद आया कि सीमा को भी तो अपने साथ ले कर देहरादून जाना था, सौरभ से यही बात हुई थी. मानसिक तनाव में मैं यह बात बिलकुल भूल गया और अब वापस घर जाने का मेरा मन न हुआ. अत: मैं बस में बैठ गया.    -क्रमश

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