पत्रकार का स्कूटर

लेखक- सुकुमार महाजन

और उन के पैर सामने पड़ी कमजोर मेज पर बिखरी हुई गंदी फाइलों पर रखे थे. कहानी के उतारचढ़ाव के साथसाथ मेज भी आगेपीछे झूलती जाती थी. छत का पंखा आहिस्ताआहिस्ता घूम रहा था, इस पर भी कड़ी घुटन और गरमी महसूस हो रही थी. शायद कहानी में वह प्रसंग आ रहा था जब हीरो अपनी सहायिका को, जो एक सुंदरी थी, बांहों  में बांध कर यह बताता है कि किस तरह उस ने अकेले निहत्थे ही विदेशी जासूसों के दल का पता लगा कर उस का सफाया कर दिया.

तभी बाहर के कमरे में फोन की घंटी बज उठी. किसी ने फोन उठाया. थानेदार साहब का फोन था. उन्हें एक्सटेंशन दिया गया. पंजाबी में एक भद्दी सी गाली देते हुए उन्होंने किताब मेज पर दे मारी और चोंगे में जोर से ‘हां’ कहा.

‘‘मैं एस.पी. बोल रहा हूं,’’ दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘कितनी बार तुम से कहा कि फोन पर धीरे बोला करो, लेकिन तुम पर असर ही नहीं होता.’’

‘‘सर…जनाब,’’ वह तेजी से उठे और एडि़यां बजाते हुए तन कर सलाम किया, ‘‘साहब, हम लोगों को फोन पर इतना परेशान किया जाता है कि…’’

‘‘चुप रहो और मेरी बात सुनो. तुम्हारे यहां से एक पत्रकार का स्कूटर चोरी चला गया था. आज शाम तक वह मिल जाना चाहिए.’’

‘‘लेकिन, साहब,’’ थानेदार साहब ने कहना चाहा, ‘‘पहले ही 10 स्कूटरों और मोटर साइकिलों के केस पड़े हैं और…’’

‘‘बकवास मत करो. उन 10 की कोई जल्दी नहीं है. यह पत्रकार का स्कूटर है, फौरन मिलना चाहिए. जल्दी करो!’’ एस.पी. ने फोन रख दिया था.

थानेदार साहब ने गुस्से से चोंगे की तरफ देखा, फिर मेज पर पड़ी किताब की तरफ और फिर जोर से चोंगा पटक दिया.

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‘‘मुंशीजी,’’ वह दहाड़े.

बांहों पर 3 पट्टी वाले 6 फुटे मुंशीजी ने फौरन अंदर आ कर सलाम किया.

‘‘क्या किया तुम ने?’’ थानेदार ने पूछा.

‘‘क्या किया, हुजूर?’’

‘‘धत्तेरे की,’’ थानेदार साहब गरजे, ‘‘तुम दूसरे फोन पर सब बात सुन रहे थे. है न?’’

मुंशीजी ने स्वीकार किया.

‘‘फिर क्या किया तुम ने…’’ रुक कर उन्होंने सांस खींची, ‘‘क्या किया उस पत्रकार का स्कूटर शाम तक ढूंढ़ने के लिए?’’

मुंशीजी कोई जवाब दें, इस के पहले ही फोन की घंटी बजी और थानेदार साहब ने चोंगा उठाया.

‘‘जनाब सर,’’ जितना हो सकता था उतनी नम्रता से

वह बोले.

‘‘मैं सेतुरामन हूं, श्रीमान! मैं सरकारी इंजीनियर हूं और पी.वाई.जेड. कारखाने में काम करता हूं. मैं यह जानना चाहता था कि मेरे चोरी गए स्कूटर के संबंध में आप ने क्या काररवाई की है. शायद आप को याद हो, मैं ने 3 महीने पहले रिपोर्ट लिखाई थी.’’

‘‘मिस्टर सेतुरामन,’’ थानेदार ने कुढ़ कर कहा, ‘‘सरकारी नौकर होने का यह मतलब नहीं है कि आप पुलिस वालों पर हुक्म चलाएं. आप का स्कूटर ढूंढ़ने के अलावा हमारे पास और भी काम है. कुछ पता चला तो हम लोग आप को बताएंगे ही. आप बेकार हमारा वक्त क्यों बरबाद करते हैं?’’ अंतिम वाक्य उन्होंने बड़ी जोरदार आवाज में कहा.

‘‘हां, तो…’’ वह फिर मुंशीजी की तरफ मुड़े. तभी फोन की घंटी फिर बजी.

‘‘क्या है?’’ वह चिल्ला कर बोले.

‘‘मैं आई.जी. बोल रहा हूं. गधे, तुम यह कब सीखोगे कि हम प्रजातंत्र में रह रहे हैं और बदतमीजी से बोलना हमें शोभा नहीं देता, खासतौर से फोन पर.’’

थानेदार साहब ने एडि़यां बजाईं और तन कर सलाम किया, ‘‘सर, जनाब…’’ वह कुछ कहना चाहते थे मगर बात बीच में ही काट दी गई.

‘‘सुनो, एक पत्रकार का स्कूटर तुम्हारी तरफ से उठ गया है और…’’

‘‘एस.पी. साहब ने मुझे बताया था, हुजूर और…’’

‘‘गोली मारो उन को, मेरी बात सुनो. तुम्हारे इलाके से एक पत्रकार का स्कूटर चोरी चला गया है और ब्लिंक अखबार ने तूफान खड़ा कर रखा है. उन्होंने इस बात को ले कर संपादकीय में भी लिखा है, जैसे देश में और कोई समस्या है ही नहीं. जो भी हो, मैं चाहता हूं कि दोपहर को खाने की छुट्टी के पहले ही तुम स्कूटर ढूंढ़ निकालो. मिलते ही सीधे मुझे फोन करो. समझे!’’

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थानेदार साहब ने फोन की तरफ गुस्से से देखा फिर मुंशीजी की तरफ मुड़े.

‘‘तुम मेरी तरफ मरियल कुत्ते की तरह क्या घूर रहे हो?’’ वह जैसे फट पड़े, ‘‘जाओ, और जा कर कुछ करो.’’

‘‘लेकिन क्या किया जाए, हुजूर?’’

थानेदार साहब ने कुछ तेज बातें करने के लिए सांस भरी, लेकिन न जाने क्या सोच कर धीरे से छोड़ दी.

‘‘समझने की कोशिश करो, मुंशीजी, मैं तो मुसीबत में पड़ गया हूं. तुम्हारी और इस थाने की भी मुसीबत है. बस, एस.पी. भर की बात होती तो तरफदारी की बात के बहाने अपनी जान बचाई जा सकती थी. लेकिन आई.जी. के आगे…ना बाबा ना, सोचो, कुछ तो सोचो.’’

और आखिर मुंशीजी ने एक बढि़या तरकीब सोच ही निकाली, ‘‘हम लोग उस पत्रकार से लापरवाही से स्कूटर रखने के लिए जवाब तलब क्यों न करें?’’

थानेदार साहब का बस चलता तो वह मुंशीजी को कच्चा ही चबा जाते. लेकिन वह इतना ही कह कर रह गए, ‘‘तुम बुद्धू हो.’’

अचानक उन के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई. उन्होंने पूछा, ‘‘हमारे इलाके में कितने मोटर मिस्त्री हैं? खासतौर से उन के नाम बोलो, जो हमारे इस नंबरी रजिस्टर में दर्ज हैं.’’

मुंशीजी ने मूंछों पर हाथ फेरतेफेरते 2 बार खंखार कर गला साफ किया, जमीन की तरफ देखा और फिर छत की तरफ, थोड़ा सा हिलतेडुलते हुए बोले, ‘‘जी, कांस्टेबल भीमसिंह को पता होगा.’’

‘‘कहां है, वह?’’

‘‘वह अपनी बीवी को लेने स्टेशन गया है. उस के पहला बच्चा लड़का हुआ था. आज वह आ रही है.’’

‘‘मुबारक हो,’’ थानेदार साहब ने तानाकशी के साथ कहा, ‘‘और यहां मुजरिम को थाने में कौन लाएगा? तुम ही लाओगे? जाओ, जो कर सको, करो, नहीं तो आई.जी. साहब से कह दो और भुगतो,’’ फोन की तरफ इशारा करते हुए थानेदार साहब ने अपना अधूरा पढ़ा उपन्यास उठा लिया.

मुंशीजी थोड़ी देर तो खड़े रहे फिर बोले, ‘‘हुजूर…हुजूर, मुझे याद आया, भीमसिंह एक बार एक मिस्त्री के बारे में कह रहा था कि उस का नाम रिकार्ड में है रसिया…रसिया नाम है उस का.’’

निगाह उठा कर थानेदार साहब मुसकराए, ‘‘तो मुंशीजी, इंतजार किस बात का है? उसे पूछताछ के लिए बुलाओ.’’

थोड़ी ही देर में मुंशीजी थानेदार साहब के कमरे में वापस आ गए. उन के पीछे ही पीछे ग्रीस लगे हाथ पाजामे से पोंछता हुआ रसिया आया. अधजली बीडि़यां उस के दोनों कानों पर रखी उस की शोभा बढ़ा रही थीं.

मुंशीजी ने तन कर सलाम किया. जवाब में थानेदार साहब ने जैसे सिर से कोई मक्खी उड़ाई, लेकिन किताब में मशगूल रहे. पीछे जो कुछ हो, लेकिन कम से कम दूसरों के सामने पुलिस वाली औपचारिकता खूब निभाते हैं. मुंशीजी आराम से खड़े हो गए और रसिया भी खड़ा इधरउधर देखता रहा और अपने बालों पर हाथ फेरता रहा.

10 मिनट बाद किताब पढ़ चुकने पर थानेदार साहब ने रसिया की तरफ देखा और बोले, ‘‘पधारिए, रसियाजी, बैठिए, बैठिए. वाह मुंशीजी, आप ने इस बेचारे को बैठाया क्यों नहीं?’’

अपने सारे गंदे दांत निपोरते हुए रसिया कमरे में एक ओर पड़ी बैंच पर बैठ गया और उस का हाथ कान पर लगी बीड़ी पर चला गया. थानेदार साहब ने उसे बीड़ी जला लेने दी. फिर बोले, ‘‘यहां बीड़ी पीना मना है.’’ खिसियाते हुए उस ने बीड़ी बुझा दी और फिर कान पर ही रख ली.

थानेदार साहब ने मेज की दराज में से एक मोटा बेंत निकाल कर मेज पर रखा, फाइलों पर पटक कर उन की धूल साफ की, फिर उठ कर मेज के एक कोने के पास खड़े हो गए और उन्होंने रसिया व रसिया के घर वालों का हालचाल पूछा.

‘‘और धंधा कैसा चल रहा है?’’ घर का हालचाल जानने के बाद उन्होंने पूछा.

‘‘आप की किरपा से ठीक चल रहा है, माईबाप.’’

थानेदार साहब असली बात पर आए. तुम्हें इसलिए तकलीफ दी है कि एक पत्रकार का स्कूटर चोरी चला गया है. उसे आधे घंटे में ही मिल जाना चाहिए और इतनी जल्दी तो बस, तुम्हीं ढूंढ़ सकते हो.’’

‘‘माईबाप, स्कूटर तो 15 मिनट में थाने आ जाए. लेकिन बात यह है कि हम सब को अच्छा कमीशन मिलना चाहिए. बहुत अच्छी हालत में है वह.’’

‘‘हम सब का कमीशन? क्या मतलब?’’

‘‘माईबाप, जानते होंगे,’’ रसिया व्यंग्य से बोला, ‘‘सरकार, भीमसिंह ने हर चोरी का स्कूटर बिक्री करने के लिए 250 रुपए तय कर रखा है. 150 आप के और 50-50 मुंशीजी और भीमसिंह के. यह कमीशन दे कर ही हमें बेचने का हुक्म है.’’

थानेदार साहब दंग रह गए. उन्होंने मुंशीजी की तरफ देखा, वह शर्माए से खड़े थे. रसिया का कुछ हौसला बढ़ा तो उस ने बीड़ी सुलगाने की फिर कोशिश की.

‘‘बीड़ी नहीं,’’ थानेदार साहब गरजे और डंडा मेज पर पटका, ‘‘कितने स्कूटर इस तरह बेचे गए हैं?’’

‘‘हुजूर, 10, और मैं ने पूरापूरा कमीशन चुका दिया.’’

‘‘हूं, अब जल्दी से पत्रकार का स्कूटर ले आइए.’’

‘‘लेकिन, माईबाप.’’

‘‘अगर 10 मिनट में वह स्कूटर नहीं आया,’’ थानेदार साहब ने हर शब्द पर जोर देते हुए कहा, ‘‘तो तुम्हारी खाल उधेड़ दी जाएगी.’’

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रसिया के पीछे मुंशीजी भी मुड़े, लेकिन थानेदार ने उन्हें वापस बुला लिया. दुनिया में बहुत कुछ होता है जिसे शायद खुदा भी नहीं देख पाता. और इस थाने में भी वही होता है. उन्होंने बड़ी शांति से कहते हुए फोन उठाया, ‘‘हां, तो मुंशीजी, पता है आप को कि मेरा 1,500 रुपए का कर्ज किस पर है?’’

‘‘हां, हुजूर, मुझ पर और भीमसिंह पर.’’

‘‘कितने दिन में चुकेगा?’’

‘‘कुछ ही घंटों में, हुजूर, कांस्टेबल भीमसिंह के आते ही.’’

‘‘ठीक है, तुम जा सकते हो.’’

उन्होंने आई.जी. का नंबर मिलाया. उन के बोलते ही एडि़यां बजाते हुए सलाम किया और कहा, ‘‘हुजूर, मैं ने पत्रकार का स्कूटर ढूंढ़ लिया है.’’

‘‘शाबाश…शाबाश. 3 बजे कंट्रोल रूम में ले आओ. मैं साढ़े 3 बजे पुलिस की मुस्तैदी दिखाने के लिए प्रेस कानफे्रंस बुला रहा हूं.

‘‘तुम्हारी मुस्तैदी के इस मामले को देखते हुए एंटीकरप्शन डिपार्टमेंट में तुम्हारे तबादले की बात पर और अच्छी तरह ध्यान दिया जाएगा.’’

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खुशीखुशी सीटी बजाते हुए थानेदार साहब ने घड़ी देखी. उस वक्त साढे़ 12 बज रहे थे, ‘कंट्रोल रूम जाने के लिए तैयारी का काफी समय है.’ उन्होंने सोचा, ‘तब तक एक उपन्यास और क्यों न पढ़ लिया जाए?’ और वह पढ़ कर ही गए.

एक सवाल-‘घरेलू हिंसा के कारण’

ससुराल स्वर्ग या अभिशाप… ?

मेरा एक सवाल समाज से ,घर और परिवार से क्या एक स्त्री को ससुराल भेजने के लिए ही पैदा किया जाता है ? अपनी बेटी को अचानक से एक अंजान घर में भेज दिया जाता है ,जहां उससे ये कहा जाता है कि अब तुम इस घर की बहू हो इस घर को संभालो तुम्हारी जिम्मेदारी बढ़ गई है. इतना ही नहीं वो  स्त्री सारे काम सीख जाती है,उस घर को अपना बना लेती है.लेकिन उस वक्त क्या जब उस देवी समान स्त्री को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है. कभी दहेज के रूप में ये हिंसा उसके सामने आती है तो कभी बेटे को जन्म न दे पाने के कारण ये हिंसा उसके साथ होती है.

एक माता-पिता अपनी बेटी को बड़े अरमानों के साथ ससुराल भेजते हैं और साथ उसकी सुविधा के ध्यान रखते हुए सारे सामान देते हैं और इतना ही नहीं उनकी बेटी को कोई तकलीफ न हो इसके लिए वो दहेज के नाम पर ससुराल वालों को भी कुछ समान देते हैं….लेकिन ये दहेज प्रथा आज समाज और स्त्री के लिए अभिशाप बन गई है क्योंकि यही दहेज जब कम पड़ता है और लड़के वालों की मांगे पूरी नहीं होती है तो उस स्त्री को प्रताड़ित किया जाता है. अक्सर ससुराल वाले चाहते हैं कि मेरी बहू लड़के को जन्म दे..लेकिन अगर लड़की जन्म लेती है तो उस स्त्री को फिर प्रताड़ित किया जाता है. लोग ये क्यों नहीं समझते हैं कि लड़के या लड़की का पैदा होना किसी भी मनुष्य के हाथ में नहीं है.

मैं ये नहीं कहती की हर जगह या हर  ससुराल ऐसा होता है लेकिन आज दुनिया के ऐसे बहुत से कोने हैं जहां घरेलू हिंसा जैसी वारदात होती है. आए दिन ये खबर सुनने को मिलती है कि दहेज के लालच में पति ने पत्नि को जिंदा जलाया या मारा, ससुराल वालों से तंग आकर महिला ने की खुदखुशी. 22 जून 2019 में एक खबर आई की गोवा की एक महिला ने अपने ही पति को पीट- पीट कर मार डाला क्योंकि पति पत्नी को प्रताड़ित करता था. ये खबर ये साबित करती है की इसके चलते अपराध भी बढ़ता जा रहा है. 19 मार्च 2019 में खबर आई कि अहमदाबाद में पति ने अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि उसने शैम्पू के लिए पैसे मांगे थे. 22 मई 2019 की एक खबर आईपीएस ने अपनी पत्नी को 5 करोड़ रुपए दहेज के लिए पीटा.

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घरेलू हिंसा के पीड़ितों को कई बार यह पता ही नहीं होता कि वे मदद मांगने किसके पास जा सकती हैं.

  • घरेलू हिंसा की शिकार हुई महिला कभी अपने डर से बाहर नहीं आ पाती है.
  • मानसिक आघात महिला को भीतर से तोड़कर रख देती है.
  • घरेलू हिंसा एक ऐसा दर्द ऐसा जख्म है जो शायद ही कोई महिला भूले.
  • मानसिक रोग की स्थिति में महिला पहुंच जाती है.
  • घरेलू हिंसा महिला की गरिमा को छिन्न-भिन्न कर देता है.

एक रिपोर्ट से पता चला कि मोरक्को में एक महिला हैं सलमा, 23 साल की सलमा 2 बच्चों की मां और शिक्षा कार्यकर्ता हैं, जो घरेलू हिंसा से पीड़ित थी कभी. उन्होंने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो सबसे पहले एक रेडियो स्टेशन के जरिए अपनी व्यथा व्यक्त की थी. यह रेडियो स्टेशन मोरक्को में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए काम करने वाले एक अभियान से जुड़ा है, जिसका नाम है ‘मेक योर स्टोरी हर्ड’. मोरक्को में अभियान चला कर पीड़ित महिलाओं को कानूनी मदद देकर उनके हिंसक पतियों के खिलाफ कार्रवाई करने में मदद की जा रही है. ऐसे ही कई अभियान हैं,जो भारत में भी चलाए जा रहे हैं लेकिन फिर भी घरेलू हिंसा की वारदात बढ़ती ही जा रही है.अकेले अगर भारत की बात करें तो यहां नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े दिखाते हैं कि 15 से 49 प्रतिशत महिलाओं के साथ कभी न कभी शारीरिक हिंसा हुई थी.घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 भारत की संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाना है. लेकिन फिर भी ये अपराध बढ़ते जा रहें हैं. आखिर कब तक?

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सवाल ये है कि भारत सरकार कर क्या रही है? क्या सरकार कोई कड़े कदम नहीं उठाएगी? अगर सरकार ने कुछ नहीं किया तो आने वाले समय में ससुराल सच में महिला के लिए एक घर नहीं बल्कि अभिशाप बन जाएगा….

अजीत-माया गठबंधन: अगर “हम साथ साथ” होते!

छत्तीसगढ़ में तीसरे मोर्चे के रूप में उभर कर राज्य की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी का टूट कर बिखर चुका है . प्रदेश की राजनीति को अपनी उंगलियों पर कठपुतली की भांति नचाने का गुरूर अजीत जोगी की आंखों में, बौडी लैंग्वेज में अब दिखाई नहीं देता…इन दिनों आप प्रदेश की राजनीति मैं हाशिए पर है .

मगर जब अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आलाकमान के सामने खम ठोंक कर जनता कांग्रेस ( जे ) का गठन किया था तब उनके पंख आकाश की ऊंचाई को छूने बेताब थे . यही कारण है कि अजीत जोगी के विशाल कद को देखकर बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने उनसे हाथ मिलाया और कांग्रेस के खिलाफ दोनों ने मिलकर छत्तीसगढ़ में अपनी अलग जमीन तैयार करने की कोशिश की जो असफल हो गई . अजीत जोगी के सामने 2018 का विधानसभा चुनाव नई आशा की किरणों को लेकर आया था . राजनीतिक प्रेक्षक यह मानने से गुरेज नहीं करते की अजीत जोगी जहां से खड़े हो जाते हैं लाइन वहीं से प्रारंभ होती है . मगर विधानसभा चुनाव के परिणामों ने अजीत जोगी और मायावती दोनों पर मानो “पाला” गिरा दिया. दोनों चुनाव परिणाम से सन्न, भौचक रह गए और अंततः यह गठबंधन आज टूट कर बिखर गया है .

अजीत जोगी : अकेले हम अकेले तुम
विधानसभा चुनाव के परिणाम के पश्चात अजीत जोगी और मायावती की राह जुदा हो गई . यह तो होना ही था क्योंकि अजीत जोगी और मायावती दोनों ही अति महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञ हैं . साथ ही जमीन पर पुख्ताई से पांव रखकर आगे बढ़ने वाले राजनेता भी माने जाते हैं. विधानसभा चुनाव में इलेक्शन गेम में अजीत जोगी ने कोई कमी नहीं की थी. यह आज विरोधी भी मानते हैं उन्होंने अपने फ्रंट को तीसरी ताकत बनाया उन्होंने जनता के नब्ज पर हाथ भी रखा था . संपूर्ण कयास यही लगाए जा रहे थे कि अजीत जोगी के बगैर छत्तीसगढ़ में राजनीतिक हवाओं में पत्ते भी नहीं हिलेंगे.
अगर कांग्रेस को दो चार सीटें कम पड़े तो अजीत जोगी साथ देंगे अगर भाजपा को दो चार सीटे कम मिली तो अजीत जोगी कठिन डगर में साथ देंने हाजिर हो जाएंगे . मगर प्रारब्ध किसको पता है ? छत्तीसगढ़ में अनुमानों को तोड़ते ढहाते हुए छत्तीसगढ़ की आवाम ने कांग्रेस को ऐतिहासिक 68 सीटों पर विजय दिलाई और सारे सारे ख्वाब, सारे मंसूबे चाहे वे अजीत जोगी के हो या मायावती के ध्वस्त हो गए .

अगर “हम साथ साथ होते” !
मायावती ने निसंदेह जल्दी बाजी की और छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत जोगी और अपनी पार्टी के लिए स्वयं गड्ढा खोदा . विधानसभा चुनाव के अनुभव अगरचे मायावती और अजीत जोगी देश की 17 वीं लोकसभा समर में साथ होते तो कम से कम दो सीटें प्राप्त कर सकते थे . विधानसभा चुनाव में बिलासपुर संभाग की तीन लोकसभा सीटों पर इस गठबंधन को बेहतरीन प्रतिसाद साथ मिला था . और यह माना जा रहा था कि बिलासपुर और कोरबा लोकसभा सीट पर बसपा और जोगी कांग्रेस कब्जा कर सकते हैं . इसके अलावा तीसरी सीट जांजगीर लोकसभा में बहुजन समाज पार्टी के दो विधायक के साथ अच्छी बढ़त मिली जिससे यह माना जा रहा था कि यह गठबंधन बड़ी आसानी से यह लोकसभा सीट पर पताका फहरा सकता है . मगर बहन मायावती ने भाई अजीत जोगी जैसे मजबूत खंबे पर विश्वास नहीं किया और अपने प्रत्याशियों को मैदान-ए-जंग में उतारा . अजीत जोगी मन मसोस कर रह गए .

लोकसभा में दोनों की साख बढ़ती
यहां यह बताना आवश्यक है कि अजीत जोगी और मायावती की पार्टियों को विधानसभा चुनाव में आशा के अनुरूप भले ही परिणाम नहीं मिले मगर यह मोर्चा तीसरे मोर्चे के विरुद्ध समर्पित हो गया अजीत जोगी को 5 सीटें मिली और मायावती को सिर्फ दो विधान सभा क्षेत्रों मैं सफलता मिली . संभवत: इसी परिणाम से मायावती नाराज हो गई . क्योंकि छत्तीसगढ़ में बसपा को 2 से 3 सीटों पर तो विजयश्री मिलती ही रही है . ऐसे में यह आकलन की अजीत जोगी से गठबंधन का कोई लाभ नहीं मिला तो सौ फीसदी सही है मगर इसके कारणों का भी पार्टी को चिंतन करना चाहिए था जो नहीं किया गया और लोकसभा में अपनी-अपनी अलग डगर पकड़ ली गई जो भाजपा और कांग्रेस के लिए मुफीद रही .
लोकसभा समर में बसपा को कभी भी एक सीट भी नहीं मिली है अगरचे यह गठबंधन मैदान में होता तो बसपा आसानी से एक सीट पर विजय होती . यह क्षेत्र है जांजगीर लोकसभा का . मगर बसपा ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली भाजपा के नये चेहरे की राह आसान कर दी . दूसरी तरफ जोगी और उनकी पार्टी का भविष्य भी अंधकारमय हो चला .

नगरीय-निकाय चुनाव में क्या होगा ?
अजीत जोगी ने विधानसभा चुनाव में हाशिए पर जाते ही पार्टी की कमान अपने सुपुत्र अमित ऐश्वर्य जोगी को सौंप दी है . प्रदेश में वे अपना मोर्चा खोलकर आए दिन रूपेश सरकार की नाक में दम किए हुए हैं . अपने हौसले की उड़ान से अमित जोगी ने यह संदेश दिया है कि वे आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती भाजपा और कांग्रेस के लिए बनेंगे . उन्होंने अकेले दम पर नगरीय चुनाव पंचायती चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है . इधर बीएसपी ने भी अपने बूते चुनाव लड़ने की घोषणा की है मगर बीएसपी नगरीय चुनाव में कभी भी अपना एक भी महापौर जीता पाने में सफलीभूत नहीं हुई है .

यह तथ्य समझने लायक है कि अजीत जोगी और मायावती की युती छत्तीसगढ़ में बड़े गुल खिला सकती थी. अजीत जोगी की रणनीति और घोषणा पत्र को कांग्रेस ने कापी करना शुरू किया और अपने बड़े संगठनिक ढांचे के कारण कांग्रेस आगे निकल गई अन्यथा अजीत जोगी के 2500 रुपए क्विंटल धान खरीदी और बिजली बिल हाफ फार्मूला को अगर कांग्रेस नहीं चुराती तो जोगी और बसपा की स्थिति आश्चर्यजनक गुल खिला सकती थी . राजनीति में संभावनाओं के द्वार खुले रहते हैं ऐसे में भविष्य में क्या होगा यह आप अनुमान लगा सकते हैं.

आम्रपाली-निरहुआ: कमाल है भोजपुरी फिल्मों की ये जोड़ी

भोजपुरी स्टार्स के अपने अंदाज होते है शायद यही कारण है की उनकी पौपुलिटी में कभी कमी नहीं आती और फैंस उनसे जुड़ा हुआ मेहसूस करते हैं. कुछ ऐसे ही है निरहुआ (Nirahua) यानी दिनेश लाल यादव और आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey). बौलवुड हो या भौजपुरी सभी जगह ऐसे एक्टर्स मिल ही जाएंगे जो अपने असल नाम से ज्यादा उनके रखे नामों से जाने जाते हैं. निरहुआ और आम्रपाली दुबे भोजपुरी फिल्में के उन चुनिंदा एक्टरों में शूमार है जिनकी फिल्मों का इंतजार सभी को रहता  हैं. उनकी एक्टिंग स्टाइल हो या गाने का अंदाज निरहुआ (Nirahua) और आम्रपाली ने छोटे तपके से लेकर बड़े तपके तक का दिल जीता.

आम्रपाली और  निरहुआ की जोड़ी हैं हिट

आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey) भोजपुरी सिनेमा की सबसे पौपुलर एक्ट्रेस में से एक हैं. आम्रपाली दुबे और निरहुआ (Nirahua) की जोड़ी को भोजपुरी सिनेमा (Bhojpuri Cinema) की नंबर वन जोड़ी भी कहा जाता है. इन दोनों सितारों ने एक साथ कई फिल्मों में काम किया है और इनकी ज्यादातर फिल्में सुपरहिट रही हैं. हाल ही में आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey) और  निरहुआ (Nirahua) का एक गाना ‘नई झुलनी के छैया’ काफी वायरल हुआ था. दोनों की कैमिंस्ट्री देखते ही बनती हैं.

वीडियो सौंग में भी हिट है जोड़ी

यू ट्यूब पर इस जोड़ी के काफी वीडियों हैं जिसको करोड़ो लोगों ने पसंद किया हैं. आम्रपाली दुबे और निरहुआ के वीडियो को लोग खूब पसंद भी कर रहे हैं. उनके इन भोजपुरी सौंग की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि  उनके एक गाने को यूट्यूब पर अभी तक 7 करोड़ 88 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है और इसे देखने का सिलसिला अभी जारी है.

 

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दोनों ने की कहा से शुरुआत

आम्रपाली ने अपने कैरियर की शुरुआत “रहना है तेरी पलकों की छांव में” से की थी. जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई फिर वो जी टीवी पर “सातवें”,“मायका” और “मेरा नाम करेगी रोशन” जैसे शोज में भी नजर आईं. वही निरहुआ ने 2006 में आई फिल्म “चलत मुसाफिर मोह लिया रे” से की.

5 फिल्में है कतार में

बता दे की इस साल इस जोड़ी की पांच फिल्में ‘आए हम बराती, बरात लेके’ ‘पटना जंक्शन’ ‘वीर योद्ध महाबलि’ ‘निरहुआ चला ससुराल’ और  ‘तुझको रखें राम तुझको अल्लाह रखें’  आने वाली हैं. जिसका फैंस इंतजार कर रहे हैं.

मैच के बाद विराट से यूं गले मिले रणवीर सिंह

कल का दिन सभी भरतीयों के लिए एक खास दिन था. क्रिकेट प्रेमी हो या ना हो लेकिन जब बात भारत और पाकिस्तान के मैच की हो तो सभी में एक अलग जुनून देखा जाता है. चाहे बौलीवुड के स्टार्स हो या आम जनता सभी के लिए ये दिन दिवाली से कम नही था. कल मैनचेस्टर के ट्रेफोर्ड स्टेडियम में भारत और पाकिस्तान के बीच जबरदस्त मुकाबला हुआ. इस खास मौके पर ऐसे में बौलीवुड स्टार रणवीर सिंह भी इस मैच को लाइव देखने मैनचेस्टर पहुंचे. सोशल मीडिया पर उनकी कुछ फोटोज वायरल हो रही हैं जिसमें उनका क्रिकेट  के लिए प्यार देखते ही बनता हैं.

मैच का सबसे खास पल  

इस पूरे मैच में रणवीर ने अपने अंदाज से सभी का दिल जीता. पर एक वीडियों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खीचा, मैच खत्म होते ही  रणवीर ने  विराट कोहली को गले लगाया. ये नजारा देख सभी के अंदर एक जोश भर दिया. पूरा स्टेडियम इंडिया इंडिया चियर्स करने लगा. फैंस रणवीर के इस “अंदाजे बया” को काफी पसंद कर रहे हैं.

भारत और पाकिस्तान के मैच में होता है ज्यादा जोश  

भारत -पाकिस्तान का मैच  हो और लोगों में उत्साह ना हो ऐसा हो नहीं सकता और साथ में जब रणवीर जैसे स्टार्स स्टेडियम में मौजूद हो तो ये उत्साह और डबल हो जाता हैं. रणवीर की इन फोटोज से साफ झलक रहा है कि वो मैच के दौरान कितना उत्साहित थो. इस मैच में उन्होंने काफी फोटोड भी क्लिक कराई. जो सोशल मीडिया पर काफी पसंद की जा रही हैं.

भज्जी के साथ रणवीर

इन सबके बीच एक और फोटो काफी वायरल हो रही है. जिसमें रणवीर, भज्जी यानी हरभजन सिंह के साथ नजर आ रहे हैं. इस क्रिकेट मैच में दोनो ने काफी फोटोज खींची. इन फोटोज में रणवीर और हरभजन का जबरदस्त उत्साह देखने को मिला. रणवीर ने मैच शुरु होने से पहले शिखर धवन के साथ भी खूब बातें की. सोशल मीडिया में ये  फोटोज काफी शेयर की जा रही हैं.


जैनब अब्बास और गुरु रंधावा के साथ भी रणवीर

स्टेडियम में मौजूद पाकिस्तानी एंकर जैनब अब्बास के साथ भी रणवीर ने तस्वीर क्लिक कराई. वही जाने माने गायक गुरु रंधावा भी इंडिया-पाकिस्तान मैच को देखने के लिए मैनचेस्टर पहुंचे थे.

 

क्या यही वाकई इंसाफ हैं

लेखक- सुरेशचंद्र मिश्र  

अशोक चंदेल को उस के गुनाह की जो सजा मिली है, क्या वो…   उस दिन अप्रैल, 2019 की 19 तारीख थी. वैसे तो रविवार को छोड़ कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हर रोज चहलपहल रहती है लेकिन उस दिन न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा व न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की स्पैशल डबल बैंच में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. पूरा कक्ष लोगों से भरा था. पीडि़त व आरोपी पक्ष के दरजनों लोग भी कक्ष में मौजूद थे.

दरअसल, उस दिन एक ऐसे मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था, जिस ने पूरे 22 साल पहले बुंदेलखंड क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी.

आरोपी पक्ष के लोग कयास लगा रहे थे कि इस मामले में सभी आरोपी बरी हो जाएंगे, जबकि पीडि़त पक्ष के लोगों को अदालत पर पूरा भरोसा था और उन्हें उम्मीद थी कि आरोपियों को सजा जरूर मिलेगी.

दरअसल, निचली अदालत से सभी आरोपी बरी कर दिए गए थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सुनवाई हो रही थी. सब से दिलचस्प बात यह थी कि इस मामले में एक पूर्व सांसद व वर्तमान में बाहुबली विधायक अशोक सिंह चंदेल आरोपी था.

उस ने साम दाम दंड भेद से इस मुकदमे को प्रभावित करने का प्रयास भी किया था. काफी हद तक वह सफल भी हो गया था, लेकिन अब यह मामला उच्च न्यायालय में था और फैसले की घड़ी आ गई थी, जिस ने उस की धड़कनें तेज कर दी थीं. लोग फैसला सुनने के लिए उतावले थे.

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स्पैशल डबल बैंच के न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा व न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने ठीक साढ़े 10 बजे न्यायालय कक्ष में प्रवेश किया और अपनीअपनी कुरसियों पर विराजमान हो गए. उन्होंने अभियोजन व बचाव पक्ष के वकीलों पर नजर डाली.

फिर अंतिम बार उन्होंने मुकदमे की फाइल का निरीक्षण किया. वकीलों की बहस पहले ही पूरी हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने ठीक 11 बजे फैसला सुना दिया. फैसले की यह घड़ी आने में 22 साल 2 महीने का समय लग गया था.

आखिर ऐसा क्या मामला था, जिस का फैसला जानने के लिए लोगों में इतनी उत्सुकता थी. इस के लिए हमें 2 दशक पुरानी घटना को जानना होगा जो बेहद लोमहर्षक थी.

अशोक सिंह चंदेल मूलरूप से हमीरपुर जिले के थाना भरूआ सुमेरपुर के टिकरौली गांव का रहने वाला था. लेकिन उस की शिक्षादीक्षा कानपुर में हुई थी. छात्र जीवन में ही उस ने राजनीति का ककहरा सीख लिया था.

कानपुर शहर के किदवईनगर के एम ब्लौक में पिता का पुराना मकान था. इसी मकान में रह कर उस ने पढ़ाई पूरी की थी. अशोक सिंह चंदेल तेजतर्रार था. अपनी बातों से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित कर लेना उस की विशेषता थी. पढ़ाई के दौरान उस ने डीवीएस कालेज से छात्र संघ के कई चुनाव लड़े, किंतु सफलता नहीं मिली. वह जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव का था, वह विरोधियों को मात देने में भी माहिर था.

सन 1985 में अशोक सिंह का रुझान व्यापार की तरफ हुआ. काफी सोचविचार के बाद उस ने एम ब्लौक, किदवई नगर में पंजाब नैशनल बैंक वाली बिल्डिंग में शालीमार फुटवियर के नाम से जूतेचप्पल की दुकान खोली. 14 नवंबर, 1985 को धनतेरस का त्यौहार था. इसी दिन दुकान का उद्घाटन था. उद्घाटन के बाद उस की दुकान पर ग्राहकों का आनाजाना शुरू हो गया था और बिक्री होने लगी थी.

शाम 5 बजे बाबूपुरवा कालोनी निवासी कांग्रेस नेता रणधीर गुप्ता उर्फ मामाजी अशोक चंदेल की दुकान पर चप्पल लेने पहुंचे. चूंकि दोनों एकदूसरे से परिचित थे, अत: बातचीत के दौरान रणधीर गुप्ता ने जूतेचप्पल की दुकान खोलने को ले कर अशोक पर कटाक्ष कर दिया. अशोक ने उस समय रणधीर से कुछ नहीं कहा. चप्पल खरीद कर वह अपने घर चले गए.

रात 10 बजे रणधीर गुप्ता किसी काम से थाना बाबूपुरवा गए थे. जब वह वहां से लौट रहे थे तो अशोक की दुकान के सामने उन के स्कूटर का पैट्रोल खत्म हो गया. अशोक नशे में धुत बंदूक लिए दुकान से बाहर खड़ा था. दिन में किए गए रणधीर के कटाक्ष को ले कर दोनों में कहासुनी होने लगी.

इस कहासुनी में अशोक सिंह चंदेल ने कांग्रेस नेता रणधीर गुप्ता को गोली मार दी. गोली पेट में लगी और वह गिर पड़े. गोली मारने के बाद अशोक सिंह चंदेल वहां से फरार हो गया.

यह जानकारी रणधीर गुप्ता के घर वालों को हुई तो उन की पत्नी कमलेश गुप्ता रोतेपीटते परिजनों के साथ मौके पर पहुंची और पति को उर्सला अस्पताल ले गई. लेकिन डाक्टरों के प्रयास के बावजूद रणधीर गुप्ता की जान नहीं बच सकी.

थाना बाबूपुरवा में अशोक सिंह चंदेल के खिलाफ हत्या का मुकदमा कायम हुआ. पुलिस ने अशोक को पकड़ने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाया लेकिन वह पकड़ा नहीं गया. आखिर में तत्कालीन एसएसपी ए.के. मित्रा की अगुवाई में एसपी (सिटी) राजगोपाल ने कोर्ट के आदेश पर अशोक सिंह चंदेल के एम ब्लौक किदवईनगर स्थित पुराने घर की कुर्की कर ली.

बाद में एक साल बाद अशोक ने अदालत में सरेंडर कर दिया. कुछ ही दिनों में उस की जमानत हो गई. बाद में अशोक सिंह चंदेल ने कानपुर शहर छोड़ दिया और अपने गृह जिला हमीरपुर में रहने लगा. बहुत कम समय में अशोक सिंह चंदेल ने ठाकुरों में अपनी पैठ बना ली.

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वह गरीब तबके के लोगों की मदद में जुट गया और राजनीतिक मंच पर बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगा. अशोक सिंह चंदेल ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां हमीरपुर तक ही सीमित नहीं रखीं, बल्कि पूरे चित्रकूट मंडल में बढ़ा दीं. उस ने अपने समर्थकों की पूरी फौज खड़ी कर ली.

सन 1989 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए. यह चुनाव अशोक सिंह चंदेल ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर हमीरपुर सदर से लड़ा और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों को धूल चटाते हुए उस ने जीत हासिल की.

इस अप्रत्याशित जीत से अशोक सिंह चंदेल का राजनीतिक कद बढ़ गया. उस ने हमीरपुर में मकान खरीद लिया और इस मकान में दरबार लगाने लगा. वह गरीबों का मसीहा बन गया था. धीरेधीरे अशोक सिंह चंदेल की क्षेत्र में प्रतिष्ठा बढ़ने लगी.

अशोक सिंह का राजनीतिक कद बढ़ा तो उस के राजनीतिक प्रतिद्वंदी भी सक्रिय हो गए. इन प्रतिद्वंदियों में सब से अधिक सक्रिय थे राजीव शुक्ला. वह मूलरूप से हमीरपुर शहर के रमेडी मोहल्ला के रहने वाले थे. उन के पिता भीष्म प्रसाद शुक्ला प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. गरीबों और असहाय लोगों की मदद करना वह अपना फर्ज समझते थे. रमेडी तथा आसपास के लोग उन्हें लंबरदार कहते थे.

भीष्म प्रसाद शुक्ला के 3 बेटे थे राकेश शुक्ला, राजेश शुक्ला और राजीव शुक्ला. भीष्म प्रसाद भाजपा के समर्थक थे. उन की मृत्यु के बाद तीनों बेटे भी भाजपा के समर्थक बन गए. तीनों भाइयों में राजीव शुक्ला सब से ज्यादा पढ़ेलिखे थे. वह व्यापार के साथसाथ वकालत के पेशे से भी जुड़े थे. पिता की तरह राजीव शुक्ला और उन के भाई भी विधायक अशोक सिंह चंदेल के धुर विरोधी थे.

सन 1993 के विधानसभा चुनाव में अशोक सिंह चंदेल जनता दल में शामिल हो गया. पार्टी ने उसे टिकट दिया और वह चुनाव जीत गया. यह चुनाव जीतने के बाद उस के विरोधियों के हौसले पस्त पड़ गए थे. विरोधियों को धूल चटाने के लिए अशोक सिंह चंदेल अब और ज्यादा सक्रिय रहने लगा.

चंदेल और शुक्ला परिवार में राजीतिक दुश्मनी सन 1996 के विधानसभा चुनाव में खुल कर सामने आ गई. इस चुनाव में राजीव शुक्ला गुट ने अशोक सिंह चंदेल का खुल कर विरोध किया. नतीजतन अशोक सिंह चंदेल चुनाव हार गया.

हार का ठीकरा चंदेल ने राजीव शुक्ला पर फोड़ा. अब दोनों के बीच प्रतिद्वंदिता बढ़ गई और दोनों एकदूसरे के दुश्मन बन गए. दोनों गुट जब भी आमनेसामने होते तो उन में तनातनी बढ़ जाती थी.

शुरू हुई राजनीति की खूनी दुश्मनी

अशोक सिंह चंदेल के पास दरजनों सिपहसालार थे, जो उस की सुरक्षा में लगे रहते थे. राजीव शुक्ला ने भी 2 सुरक्षागार्डों वेदप्रकाश नायक व श्रीकांत पांडेय को रख लिया था.

शुक्ला बंधु जहां भी जाते थे, ये दोनों सुरक्षा गार्ड उन के साथ रहते थे. अशोक सिंह चंदेल के मन में हार की ऐसी फांस चुभी थी जो उसे रातदिन सोने नहीं देती थी. आखिर उस ने इस फांस को निकालने का निश्चय किया.

26 जनवरी, 1997 की शाम करीब 7 बजे अपने एक दरजन सिपहसालारों के साथ अशोक सिंह चंदेल अपने दोस्त नसीम बंदूक वाले के घर पहुंचा. नसीम बंदूक वाला हमीरपुर शहर के सुभाष बाजार सब्जीमंडी के पास रहता था. बहाना था रमजान पर मिलने का. सड़क पर अशोक चंदेल व उस के समर्थकों की कारें खड़ी थीं तभी दूसरी ओर से राजीव शुक्ला की कारें आईं.

कार में राजीव शुक्ला के अलावा उन के बड़े भाई राकेश शुक्ला, राजेश शुक्ला, भतीजा अंबुज तथा दोनों निजी गार्ड थे. दरअसल राकेश शुक्ला अपने भतीजे को ले कर उस के जन्मदिन के लिए कुछ सामान खरीदने जा रहे थे.

चूंकि अशोक चंदेल और उस के समर्थकों की कारें सड़क पर आड़ीतिरछी खड़ी थीं, ऐसे में राजीव शुक्ला ने कारें ठीक से लगाने को कहा ताकि उन की कारें निकल सकें. अशोक चंदेल के गुर्गे जानते थे कि राजीव शुक्ला उन के आका का दुश्मन है, इसलिए गुर्गों ने कारें हटाने से मना कर दिया.

इसी बात पर विवाद शुरू हो गया. विवाद बढ़ता देख नसीम और अशोक चंदेल घर से बाहर आ गए. राजीव शुक्ला व उन के भाइयों से विवाद होता देख अशोक चंदेल का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. फिर क्या था, तड़ातड़ गोलियां चलने लगीं.

चौतरफा गोलियों की तड़तड़ाहट से सुभाष बाजार गूंज उठा. कुछ देर बाद फायरिंग का शोर थमा तो चीत्कारों से लोगों के दिल दहलने लगे. सड़क खून से लाल थी और थोड़ीथोड़ी दूर पर मासूम बच्चे सहित 5 लोगों की खून से लथपथ लाशें पड़ी थीं.

मरने वालों में राजेश शुक्ला, राकेश शुक्ला, राजेश का बेटा अंबुज शुक्ला तथा उन के सुरक्षा गार्ड वेदप्रकाश नायक व श्रीकांत पांडेय थे. हमलावर दोनों सुरक्षा गार्डों की बंदूकें भी लूट कर ले गए थे.

इस सामूहिक नरसंहार से हमीरपुर शहर में सनसनी फैल गई. घटना की सूचना मिलते ही एसपी एस.के. माथुर भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने घायल राजीव शुक्ला व अन्य को जिला अस्पताल भेजा और उन की सुरक्षा में फोर्स लगा दी. इस के बाद माथुर ने नसीम बंदूक वाले के मकान पर छापा मारा. छापा पड़ते ही वहां छिपे हत्यारों ने पुलिस पर भी फायरिंग शुरू कर दी.

पुलिस ने भी मोर्चा संभाला, लेकिन हत्यारे चकमा दे कर भाग गए थे. इस के बाद एसपी माथुर ने मृतकों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

इधर राजीव शुक्ला अस्पताल में भरती थे. वह रात में ही घायलावस्था में पुलिस सुरक्षा के बीच थाना हमीरपुर कोतवाली पहुंचे और पूर्व विधायक अशोक सिंह चंदेल, सुमेरपुर निवासी श्याम सिंह, पचखुरा खुर्द के साहब सिंह, झंडू सिंह, हाथी दरवाजा के डब्बू सिंह, सुभाष बाजार निवासी नसीम, सब्जीमंडी निवासी प्रदीप सिंह, उत्तम सिंह, भान सिंह एडवोकेट तथा एक सरकारी गनर के खिलाफ इस मामले की रिपोर्ट दर्ज करा दी. यह रिपोर्ट भादंवि की धारा 147, 148, 149, 307, 302, 395, 34 के तहत दर्ज की गई.

आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस जगहजगह छापेमारी करने लगी. पुलिस की पकड़ से बचने के लिए ज्यादातर नामजद आरोपियों ने हमीरपुर की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था.

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लेकिन पूर्व विधायक अशोक सिंह चंदेल राजनीतिक आकाओं की छत्रछाया में एक साल तक छिपता रहा. उस के बाद जज से सांठगांठ कर के एक दिन वह कोर्ट में हाजिर हो गया. गंभीर केस में भी जज आर.वी. लाल ने उसे उसी दिन जमानत दे दी.

न्यायालय पर हावी रहा अशोक चंदेल

न्यायिक अधिकारी के इस फैसले से राजीव शुक्ला को अचरज हुआ. उन्होंने पैरवी करते हुए हाईकोर्ट से अशोक सिंह चंदेल की जमानत निरस्त करवा दी, जिस से उसे जेल जाना पड़ा.

यही नहीं, राजीव शुक्ला ने जमानत देने वाले जज आर.वी. लाल की भी हाईकोर्ट में शिकायत की. शिकायत सही पाए जाने पर हाईकोर्ट ने जज आर.वी. लाल को निलंबित कर दिया और उन के खिलाफ जांच बैठा दी. जांच रिपोर्ट आने के बाद जज आर.वी. लाल को बर्खास्त कर दिया गया.

इधर हाईकोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद सामूहिक नरसंहार के मुख्य आरोपी अशोक चंदेल ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के जमानत निरस्त वाले फैसले पर रोक लगा दी, जिस से अशोक चंदेल जेल से बाहर तो नहीं आ सका लेकिन उसे राहत जरूर मिल गई.

इस के बाद उस ने अपने खास लोगों के मार्फत बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख सुश्री मायावती से संपर्क साधा और सन 1999 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए टिकट मांगा. मायावती ने अशोक सिंह चंदेल की हिस्ट्री खंगाली और फिर बाहुबली मान कर उसे टिकट दे दिया.

सन 1999 के लोकसभा चुनाव में चंदेल को टिकट मिला तो उस ने चुनाव का संचालन जेल से ही किया और पूरी ताकत झोंक दी. परिणामस्वरूप वह जेल से ही चुनाव जीत गया.

अब तक कोतवाली हमीरपुर पुलिस अशोक सिंह चंदेल समेत 11 आरोपियों की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर चुकी थी. सामूहिक नरसंहार का यह मामला अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अश्वनी कुमार की अदालत में विचाराधीन था. इसी दौरान एक आरोपी झंडू सिंह की बीमारी की वजह से मौत हो चुकी थी.

न्यायिक अधिकारी अश्वनी कुमार ने 17 जुलाई, 2002 को इस बहुचर्चित हत्याकांड का फैसला सुनाया. उन्होंने मुख्य आरोपी अशोक सिंह चंदेल सहित सभी 10 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया.

अदालत के इस फैसले से राजीव शुक्ला को तगड़ा झटका लगा. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. वह समझ गए कि अशोक सिंह चंदेल ने करोड़ों का खेल खेल कर जज को अपने पक्ष में कर लिया है. अत: राजीव शुक्ला ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की. साथ ही न्यायिक अधिकारी पर मनमाना फैसला सुनाने का आरोप लगाया.

पीडि़त राजीव शुक्ला की शिकायत पर हाईकोर्ट ने विजिलेंस और जुडीशियल जांच कराई, जिस में न्यायिक अधिकारी अश्वनी कुमार को मुकदमे में जानबूझ कर कपट व कदाचार से ऐसा निर्णय देने का आरोप सिद्ध हुआ. जांच अधिकारी की आख्या और हाईकोर्ट की संस्तुति पर तत्कालीन गवर्नर ने न्यायिक अधिकारी अश्वनी कुमार को बर्खास्त करने की मंजूरी दे दी.

वादी राजीव शुक्ला की आंखों के सामने उन के 2 भाइयों व भतीजे को गोलियों से छलनी किया गया था. जब भी वह दृश्य उन की आंखों के सामने आता तो उन का कलेजा कांप उठता था. यही कारण था कि राजीव ने न्याय पाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था.

जब घटना घटी थी तब उन का खुद का व्यवसाय था, लेकिन घटना के बाद वह दिनरात आरोपियों को सजा दिलाने में जुट गए थे. हालांकि उन्हें सुरक्षा मिली थी, फिर भी पूरा परिवार दहशत में रहता था.

राजनीति की गोटियां बिछाता रहा अशोक चंदेल

राजीव शुक्ला जहां न्याय के लिए भटक रहे थे, वहीं अशोक सिंह चंदेल अपनी राजनीतिक गोटियां बिछा रहा था. चूंकि चंदेल सहित सभी आरोपी दोषमुक्त करार दिए गए थे, अत: अशोक चंदेल खुला घूम कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटा था.

अशोक सिंह चंदेल दलबदलू था. वह जिस पार्टी का पलड़ा भारी देखता, उसी पार्टी का दामन थाम लेता था. 2007 के विधानसभा चुनाव में उस ने बसपा से भी नाता तोड़ कर सपा का दामन थाम लिया. सपा ने उसे टिकट दिया और वह जीत हासिल कर तीसरी बार हमीरपुर सदर से विधायक बन गया.

अगले 5 साल तक उस ने पार्टी के लिए कोई खास काम नहीं किया. इस से नाराज हो कर सन 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उसे टिकट नहीं दिया. तब उस ने सपा छोड़ कर बसपा व भाजपा से टिकट पाने की कोशिश की लेकिन दोनों पार्टियों ने उसे टिकट देने से साफ इनकार कर दिया. इस के बाद उस ने मजबूर हो कर पीस पार्टी से चुनाव लड़ा और हार गया.

अशोक सिंह चंदेल राजनीति का शातिर खिलाड़ी बन चुका था. वह हार मानने वालों में से नहीं था. अत: सन 2017 के विधानसभा चुनाव में उस ने फिर से जुगत लगाई और संघ के एक उच्च पदाधिकारी की मदद से भाजपा से नजदीकियां बढ़ाईं.

परिणामस्वरूप अशोक चंदेल भाजपा से हमीरपुर सदर से टिकट पाने में सफल हो गया. राजीव शुक्ला भी भाजपा समर्थक थे. भाजपा पदाधिकारियों में उन की भी पैठ थी. पार्टी द्वारा अशोक चंदेल को टिकट देने का उन्होंने विरोध भी किया.

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इतना ही नहीं, समर्थकों के साथ लखनऊ जा कर धरनाप्रदर्शन भी किया. केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी चंदेल को टिकट देने का विरोध किया. फिर भी उस का टिकट नहीं कटा. मोदी लहर में चंदेल ने इस सीट पर विजय हासिल की और चौथी बार हमीरपुर सदर से विधायक बना.

इधर कई सालों से सामूहिक हत्या का मामला हाईकोर्ट में चल रहा था. तारीखों पर तारीखें मिल रही थीं. लेकिन निर्णय नहीं हो पा रहा था. देरी होने पर राजीव शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई की गुहार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने सामूहिक हत्याकांड की परिस्थितियों को देखते हुए निर्देश दिया कि वह मुख्य न्यायाधीश इलाहाबाद को प्रार्थनापत्र दें.

इस के बाद राजीव शुक्ला ने सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को प्रार्थनापत्र दिया और जल्द सुनवाई की गुहार लगाई. मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर एक स्पैशल डबल बैंच का गठन हुआ, जिस में न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा तथा न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने सुनवाई शुरू की. सुनवाई शुरू हुई तो राजीव शुक्ला को जल्द न्याय पाने की आस जगी.

सामूहिक हत्याकांड मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष अधिवक्ता ओंकारनाथ दुबे ने बहस की और बचावपक्ष की ओर से अधिवक्ता फूल सिंह ने. राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता कृष्ण पहल भी इस बहस में शामिल थे. वकीलों की बहस और गवाहों की जिरह पूरी होने के बाद उच्च न्यायालय की स्पैशल डबल बैंच ने सभी आरोपियों को दोषी माना और अपना फैसला सुरक्षित कर लिया.

आखिर मिल ही गया न्याय

19 अप्रैल, 2019 को हाईकोर्ट की स्पैशल डबल बैंच के न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति दिनेश कुमार ने इस मामले में फैसला सुनाया. खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

सजा पाने वालों में विधायक अशोक सिंह चंदेल तथा उस के सहयोगी रघुवीर सिंह, डब्बू सिंह, उत्तम सिंह, प्रदीप सिंह, साहब सिंह, श्याम सिंह, भान सिंह, रूक्कू तथा नसीम थे. कोर्ट ने सभी दोषियों को सीजेएम हमीरपुर की अदालत में सरेंडर करने के आदेश दिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से जहां विधायक खेमे में मायूसी छा गई, वहीं पीडि़त परिवारों में खुशी के आंसू छलक आए. साथ ही 22 साल पहले हुआ वीभत्स हत्याकांड फिर से जेहन में ताजा हो गया.

पीडि़त परिवार को मिली तसल्ली

राजीव शुक्ला के आवास पर मोमबत्तियां जला कर खुशी मनाई गई तथा दिवंगत सभी 5 लोगों को श्रद्धांजलि दी गई. देर शाम उन के घर की महिलाओं ने घर की रेलिंग व चबूतरे पर मोमबत्तियां जलाईं.

उधर कांग्रेस नेता रणधीर गुप्ता की पत्नी कमलेश गुप्ता ने कहा कि उसे इस बात की तसल्ली हुई कि भले ही उस के पति की हत्या के मामले में न सही, पर दूसरे केस में बाहुबली विधायक अशोक चंदेल और उस के गुर्गों को सजा तो मिली.

बेवा कमलेश गुप्ता ने बताया कि पति रणधीर गुप्ता की हत्या के बाद उन का परिवार आर्थिक रूप से टूट गया था. हालात यह हैं कि आज दोजून की रोटी के भी लाले हैं. उन्होंने बताया कि पति किदवईनगर के ई-ब्लौक में एक हार्डवेयर की दुकान चलाते थे. साथ ही प्लंबिंग के काम की ठेकेदारी भी करते थे.

घर पर विश्व शिक्षा निकेतन के नाम से स्कूल भी चलता था. उन की हत्या के बाद बुजुर्ग ससुर ने दुकान संभाली पर वह नहीं चली और बंद हो गई. आर्थिक रूप से कमर टूटी तो बिजली का बिल भी बकाया होता चला गया. आखिर में बिजली कट गई. तब से आज तक परिवार अंधेरे में ही रहता है.

विधवा कमलेश कुछ देर शून्य में ताकती रही फिर बोली कि 40 साल की बड़ी बेटी नमन अविवाहित है. बीए तक पढ़ाई करने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली. एक बेटा अखिल नौबस्ता में रह कर कार ड्राइवर की नौकरी करता है. सब से छोटा बेटा नवीन नौबस्ता की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करता है. उसे 5 हजार रुपया वेतन मिलता है.

नवीन की नौकरी से ही घर चलता है. जेठ बी.एल. गुप्ता जो वडोदरा में रहते हैं, तथा पीलीभीत में रहने वाली ननद मीरा गुप्ता उन की आर्थिक मदद करती हैं, जिस से परिवार का भरणपोषण होता रहता है.

उन्होंने बताया कि आर्थिक परेशानी के कारण ही वह पति की हत्या के मुकदमे में पैरवी नहीं कर सकीं, जिस से मामला अभी भी अदालत में विचाराधीन है. अशोक सिंह चंदेल बाहुबली विधायक है. उस के आगे मुझ जैसी विधवा भला कैसे टिक सकती है. फिर भी सुकून है कि उसे दूसरे मामले में उम्रकैद की सजा तो मिली.

4 बार विधायक और एक बार सांसद रहे अशोक सिंह चंदेल ने अकूत संपत्ति अर्जित की थी. राजनीति में आने के बाद उस ने विवादित प्रौपर्टी खरीदने का खेल शुरू किया. कानपुर किदवईनगर के एम ब्लौक में उस का तिमंजिला मकान पहले से था. उस के बाद उस ने जूही थाने के सामने एक वृद्ध महिला का मकान औनेपौने दाम में खरीदा और फिर तीन मंजिला कोठी बनाई.

इसी तरह उस ने ई-ब्लौक किदवई नगर में गुप्ता बंधुओं का विवादित मकान खरीदा. इस समय इस मकान में पहली मंजिल पर देना बैंक है. अशोक सिंह चंदेल ने जिस पीएनबी बैंक वाली बिल्डिंग में जूतेचप्पल की दुकान खोली थी, उस पर भी उस का कब्जा है.

अशोक सिंह चंदेल ने विधायक कोटे से भी 2 मकान आवंटित करा लिए थे. एक मकान गाजियाबाद में आवंटित कराया तथा दूसरा जूही कला कानपुर में. बाद में एक कोटे से 2 मकानों का आवंटन सामने आने पर मामला फंस गया. जब यह मामला कोर्ट गया तो कोर्ट ने उस का एक मकान निरस्त कर दिया. इन सब के अलावा भी हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट आदि शहरों में उस की करोड़ों की प्रौपर्टी है.

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने इस बारे में बताया कि उच्च न्यायालय से आजीवन सजा मिलने के बाद अशोक सिंह चंदेल की विधानसभा की सदस्यता रद्द हो जाएगी. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार 2 वर्ष से अधिक सजा मिलने पर संबंधित व्यक्ति जनप्रतिनिधित्व के अयोग्य हो जाता है.

इस नियम के तहत हमीरपुर सदर विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव निश्चित है. इस के लिए हाईकोर्ट से सूचना सचिवालय को जाएगी. इस के बाद सचिवालय इस सीट को रिक्त कर इस की सूचना चुनाव आयोग को देगा और चुनाव आयोग इस सीट पर उपचुनाव का कार्यक्रम तय करेगा.

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जिस समय उच्च न्यायालय द्वारा यह फैसला सुनाया गया, विधायक अशोक सिंह चंदेल हमीरपुर स्थित अपनी कोठी में था. पत्रकारों ने जब उसे उम्रकैद की सजा सुनाए जाने की जानकारी दी तो वह बोला कि उस ने हमेशा गरीबों के आंसू पोंछने का काम किया है. कोई भी ऐसा काम नहीं किया कि उसे सजा मिले. फिर भी अदालत का फैसला स्वीकार्य है. वह न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएगा.

बहरहाल कथा संकलन तक विधायक अशोक सिंह चंदेल के अलावा सभी दोषियों ने हमीरपुर की सीजेएम कोर्ट में सरेंडर कर दिया था, जहां से सजा भुगतने को उन्हें जिला जेल भेज दिया गया था.

—कथा कोर्ट के फैसले तथा लेखक द्वारा एकत्र की गई जानकारी पर आधारित

 

हम जनता के सेवक हैं

लेखक- सुरेश सौरभ

लखीमपुर के सिद्धार्थनगर महल्ले के बाशिंदे अमित कुमार ग्रीन फील्ड एकेडमी स्कूल से इंटर का इम्तिहान पास करने के बाद छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर यूनिवर्सिटी पढ़ने चले गए थे और वहीं से बीए करने के बाद वे दिल्ली की ओर रुख कर गए थे. अमित कुमार ने दिल्ली में बाजीराव ऐंड रवि कोचिंग में सिविल सेवा की तैयारी शुरू की और एक साल के बाद पहली ही कोशिश में इतना बड़ा इम्तिहान पास कर के लोगों के हीरो बन गए. अमित कुमार ने बताया कि वे मूल रूप से हरगांव सीतापुर के गांव नुकरी के रहने वाले हैं और वहीं उन का बचपन बीता था.

वर्तमान समय में सिविल सोसाइटी के लोग तमाम राजनीतिक दखलअंदाजी के चलते कैसे सही काम कर पाएंगे? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार ने बताया, ‘‘सत्ता का दबाव तो रहता है, पर तमाम तरह के दबावों को दरकिनार करते हुए हमें अपने हकों और फर्ज पर अडिग रहना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं तो राजनीतिक दबाव को बहुत हद तक कम किया जा सकता है और जनता का काम आसानी से किया सकता है.’’

किसी बड़ी कामयाबी को पाने के लिए नौजवानों को क्या करना चाहिए? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘‘नौजवानों को अगर कोई बड़ी कामयाबी पाने की इच्छा है तो उन्हें अपना टारगेट ले कर चलना पड़ेगा और उसी टारगेट पर बिना रुके बिना थके तब तक चलना होगा जब तक कि कामयाबी नहीं मिल जाती.’’

आज के समय में जब पूरा देश भ्रष्टाचार और गरीबी से जूझ रहा है, ऐसे में सिविल सेवा में गए लोगों को क्या करना चाहिए, जिस से इस सब पर काबू पाया जा सके? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘‘हमारा काम जनता की सेवा करना है. हम जनता के सेवक हैं. अगर सिविल सेवा में गए लोग सेवा भाव से काम करेंगे तो काफी हद तक इस समस्या का समाधान किया जा सकता है.’’

अमित कुमार के पिता वीरेंद्र भारती प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं और मां सुमन देवी गृहिणी हैं. अपने बेटे की कामयाबी पर पिता बहुत खुश हैं और कहते हैं, ‘‘अमित जैसा बेटा पा कर हमें गर्व महसूस होता है. हर मांबाप को अमित जैसा होनहार और काबिल बेटा मिलना चाहिए.’’

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अमित कुमार के 2 भाई और एक बहन हैं.

अमित कुमार की इस कामयाबी पर तमाम संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है. दलित महापरिसंघ के प्रमुख चंदन लाल बाल्मीकि ने अमित कुमार के सम्मान में एक बड़ी प्रैस कौंफ्रैंस कराई और उन्हें परिसंघ की ओर से सम्मानित भी किया.

अमित कुमार गौतम बुद्ध, डाक्टर भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, ज्योतिराव फुले और अपने गुरु सतीश कुमार वर्मा को अपना आदर्श मानते हैं.

सिविल सेवा में जाने के लिए नौजवानों को पढ़ने के लिए किनकिन किताबों की मदद लेनी चाहिए? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं कि एनसीआरटी की किताबें इस की तैयारी के लिए बहुत ही कारगर होती हैं.

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सीसैट लागू होने पर हिंदी बैल्ट के बहुत से छात्र सिविल सेवा में नहीं जा पा रहे हैं. क्या यह बात सही है? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘‘शुरुआत में हिंदी बैल्ट के छात्रों पर फर्क पड़ा था, मगर अब हालात बदल गए हैं और हिंदी बैल्ट के छात्र सीसैट पैटर्न में लगातार कामयाबी हासिल कर रहे हैं.’’

बालमवा नादान

लेखक- लाजपत राय ठाकुर

सिर उठा कर देखा तो लीना जा चुकी थी लेकिन बेडरूम से उस के गाने की आवाज आ रही थी, ‘बालमवा नादान…समझाए न समझे मन की बतियां…’

हमारे माथे पर पसीने की बूंदें फूट पड़ी थीं और दिल भी जोरजोर से धड़क रहा था. पिछले कुछ दिनों से लीना इस तरह की खबरों से हमें लगातार दहला रही थी.

यह सिलसिला तब से शुरू हुआ जब से हमें दीवाली के बोनस की रकम मिली थी. यद्यपि हम ने लीना को बोनस मिलने की हवा तक न लगने दी थी पर उस को जाने कहां से दीवाली का बोनस मिलने की भनक लग गई. और उस ने जेवर व कपड़ों की नित नई फरमाइश करनी शुरू कर दी. हम ने भी हाथ तंग होने का रोना रोेते हुए लीना की फरमाइशों को एक कान से सुन दूसरे से उड़ाना शुरू किया तो उसी दिन से लीना ने समाचारपत्रों से ऐसी खबरें ढूंढ़ कर हमारे सामने रखनी शुरू कर दीं.

पहले दिन की खबर थी कि किसी पतिव्रता ने सब्जी में कोई जहरीला कीड़ा उबाल कर पति को खिलाया और उस का ऊपर का टिकट कटा दिया. कारण, पति ने पत्नी की पसंद की अंगूठी की फरमाइश को अंगूठा दिखा दिया था.

उसी दिन शाम को जब हम आफिस से घर पहुंचे तो बडे़ जोरों की भूख लगी थी उस पर रसोई से आती सब्जी की खुशबू ने मेरी भूख और भी बढ़ा दी थी.

लीना ने मुसकराहट के साथ हमारा स्वागत किया तो हमारे मुंह से निकला, ‘‘लीनाजी, आज बडे़ जोरों की भूख लगी है, आप जल्दी खाना लगा दें. मैं अभी हाथमुंह धो कर आता हूं.’’

‘‘अभी लगाती हूं,’’ लीना ने मुसकरा कर कहा, ‘‘वह मेरी अंगूठी?’’

‘‘भई, क्या बताऊं. बोनस न मिलने के कारण आजकल आफिस के सारे साथी कड़के हैं,’’ कह कर हम हाथमुंह धो खाने की मेज पर आ कर बैठ गए.

मेज पर रखी थाली में एक कटोरी मटरपनीर की सब्जी थी, दूसरी में मूंग की धुली हुई दाल थी. एक प्लेट में पापड़ और दूसरी में गाजर का अचार था. सलाद एक बड़ी प्लेट में सजा हुआ था. थाली में एक तरफ देसी घी से चुपड़ी चपाती रखी थी. लीना दूसरी गरम चपाती लाने को रसोई में गई थी.

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हम ने पहला कौर मुंह में रखा और सलाद की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि नजर पनीर की सब्जी की कटोरी पर जा कर अटक गई. देखा कि कोई कांटेदार चीज उभर कर डूब गई. ‘जहरीला कीड़ा,’ हमारे दिमाग में एकदम से उभरा और इसी के साथ मुंह से रोटी का टुकड़ा फिसल कर खाने की मेज पर आ गिरा.

कहीं लीना ने ‘कनखजूरा’ सब्जी में उबाल कर तो हमें नहीं परोस दिया? हम ने एकदम से अपना हलक पकड़ लिया ताकि कनखजूरे का जहर हलक से नीचे न उतर पाए.

‘‘क्या हुआ?’’ लीना चपाती प्लेट में रखते हुए पास में खड़ी हो कर बोली, ‘‘आप भी खाने के लिए कितने बेसब्र हैं, बिना फूंक मारे बच्चों की तरह गरम ग्रास मुंह में रख लिया.’’

‘‘सब्जी में…कनखजूरे का छौंक लगा है,’’ हम ने मटरपनीर की कटोरी की तरफ इशारा किया.

‘‘हाय राम, ‘‘कहां है भला?’’

‘‘ऊंह, बड़ी भोली बनती हो. लो, अपनी आंखों से देखो,’’ हम ने दोबारा कटोरी की ओर इशारा किया.

लीना ने सब्जी की कटोरी में चम्मच डाला और कुछ निकालते हुए बोली, ‘‘वाकई बहुत जहरीला कनखजूरा है,’’ और इसी के साथ उन के होंठों पर मुसकराहट खिल गई.

‘‘दांत मत निकालो…मुझे जल्दी से डाक्टर के पास ले चलो.’’

‘‘आप अपनी आंखें टेस्ट करवाइए,’’ लीना ने सब्जी से भरा चम्मच हमारे सामने कर दिया, ‘‘आप को यह प्याज का ऊपर वाला हिस्सा कनखजूरा नजर आता है?’’

चम्मच में सचमुच प्याज की जड़ों वाला टुकड़ा था.

‘‘लगता है जल्दी में यह भी तड़के में चला गया,’’ लीना ने प्याज का वह हिस्सा प्लेट में रख दिया.

‘‘मैं अभी सब्जी की दूसरी कटोरी लाती हूं.’’

‘‘रहने दो. भूख खत्म हो गई.’’

इस के कुछ दिन बाद नेल पालिश के घेरे में सजी एक और खबर थी कि किसी सुघड़ सुहागन ने बिना ग्रिल वाली खिड़की में खडे़ अपने ‘सुहाग’ को पीछे से ऐसी लात जमाई कि पति ने तीसरी मंजिल से सड़क पर गिरने के बाद पानी तक नहीं मांगा.

बेचारे पति का कुसूर सिर्फ इतना था कि उस ने पत्नी की पसंद की साड़ी ला कर नहीं दी थी.

आधी रात को लीना ने हमारा कंधा हिला कर हमें जगाया और कहा, ‘‘ सामने वाली खिड़की में जा कर देखना. बाहर से धमाकों की आवाज आ रही है.’’

लीना ने सामने वाली खिड़की की ओर उंगली उठाई. उस खिड़की के ऊपरी आधे भाग में सलाखें नहीं थीं.

बिना ग्रिल की खिड़की की तरफ देखते ही हमारा माथा ठनका. सुबह की सजीसजाई खबर आंखों के सामने नाचने लगी और साथ ही लीना की साडि़यों की फरमाइश कानों में गूंज उठी. तो क्या वह खिड़की में से लात जमा कर हमें नीचे सड़क पर पहुंचा कर अपनी साडि़यों की फरमाइश का बदला लेना चाहती है? यह सोच कर ही हम कांप उठे.

‘‘लीना डार्लिंग, मुझे बड़ी जोरों की नींद आ रही है.’’

‘‘आप को क्या सिर के बल खडे़ होना है? उठिए, मेरा हाथ थामिए,’’ लीना ने हाथ फैला दिया.

लीना का हाथ कस कर थामे हम आधी ग्रिल वाली खिड़की के पास खडे़ हो गए. हमें भरोसा था कि हमारा हाथ पकडे़ लीना हमें पीछे से ऐसी लात न जमा पाएगी कि हम सड़क पर पहुंच पानी की फरमाइश भी न कर सकें और अगर लीना ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो हम खबरदार हो जाएंगे और खिड़की से एक तरफ हट कर अपना बचाव करेंगे.

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दूर कहीं रंगबिरंगी रोशनियां आकाश की ओर उठ रही थीं और धमाके हो रहे थे.

‘‘ऊंह, ख्वाहमख्वाह नींद खराब कर दी. आतिशबाजी हो रही है. शायद किसी की शवयात्रा है,’’ हम ने लीना का हाथ छोड़ दिया.

‘‘शवयात्रा,’’ लीना चौंक पड़ी.

‘‘मेरा मतलब, किसी की बरात है.’’ सुबह का सफेद साड़ी…शवयात्रा वाला समाचार हमारे दिमाग में चकरा रहा था. हम ने जल्दी से भूल को सुधारा.

बाकी की रात लीना डबल बेड के एक ओर पड़ी खर्राटे भरती रही और हम बरात में फटने वाले पटाखों के धमाकों का लेखाजोखा करते रहे.

कुछ दिनों से लीना अपनी छोटी बहन की शादी में जाने और वहां पर शगुन देने के लिए काफी भारी भरकम रकम का तकाजा करती आ रही थी. हम ने लीना को बोनस का कुछ हिस्सा, उधार उठा कर लाने के नाम पर देने की बात कही थी. मगर इतनी छोटी रकम बहन की शादी में खर्च करना उस की शान के खिलाफ था और इस से उसे हमारे खानदान की नाक कटती महसूस होती थी.

हम ने और ज्यादा उधार न मिलने का रोना रोते हुए लीना को इतनी रकम से ही काम चलाने को कहा था और यह भी बताया था कि हमारे खानदान की नाक बहुत ऊंची है अगर थोड़ीबहुत कट भी गई तो कोई फर्क न पडे़गा. मगर लीना ने ब्याह में जाने का प्रोग्राम कैंसल करने में अपनी शान समझी थी.

आज डिनर पर लीना ने जो समाचार हमें परोसा था वह रोंगटे खडे़ कर देने वाला था. लाल लिपस्टिक से सजाई गई इस खबर में एक पत्नी ने अपने प्रेमी से मिल कर अपने पति के नाम की सुपारी किसी पेशेवर हत्यारे को दी थी और उस ने पति का रामनाम सत्य कर दिया था.

वजह पत्नी की भतीजी की शादी थी और कम अकल पति उसे शादी में जा कर दिल खोल कर शगुन करने में नानुकुर कर रहा था. सो पत्नी ऐसे कगार पर पहुंच गई थी कि मायके में अपमान करवाने के बजाय आत्महत्या कर ले या फिर पति को ऊपर का टिकट थमा दे.

पत्नी ने आत्महत्या के पाप से बचने के लिए अपने प्रेमी से मिल कर पति के लिए स्वर्ग की सीट बुक करा कर पुण्य कमा लिया था.

हम ने इस समाचार को एक आंख से पढ़ कर दूसरी आंख से उड़ा दिया था क्योंकि हम जानते थे कि लीना केवल हमें दहला कर बोनस की पूरी रकम हथियाना चाहती है, हत्या करवाना नहीं.

डबल बेड के गुदगुदे गद्दे पर लीना आंखें बंद किए लेटी थी और साथ ही हम भी पैर पसारे आराम से सो रहे थे.

सोने से पहले हम लीना वाले गद्दे को उठा कर तसल्ली कर चुके थे कि बोनस के नोटों वाला लिफाफा बिलकुल सुरक्षित तो है न. हम ने लक्ष्मी को वहां इसलिए सुरक्षित समझा था क्योंकि हमें यकीन था कि लीना बोनस की रकम की तलाश में पूरे घर में छापामारी करेगी फिर भी उसे यह खयाल न आएगा कि लिफाफा उस के ही बेड पर बिछे गद्दे तले छिपा है.

आधी रात के बाद अचानक हमारी नींद खुल गई. अधखुली आंखों से बल्ब की धुंधली रोशनी में देखा कि लीना ने अपने तकिए में हाथ डाल कर मोबाइल निकाल कर लेटेलेटे कान से लगाया.

‘‘मैं दरवाजे पर खड़ा हूं, दरवाजा खोल दो,’’ लीना के मोबाइल से किसी मर्द की भारी आवाज उभरी…

लीना ने एक बार हमारी ओर देखा तो हम ने झट से आंखें बंद कर लीं और गहरी नींद में होने का नाटक किया. वह बेड से उठ कर दबे पांव दरवाजे की ओर बढ़ी. इस समय लीना ने किस की काल रिसीव की? यह सोच कर हमारे कान खडे़ हो गए.

बाहर वाले दरवाजे की कुंडी खुलने के साथ ही कोई दबे कदम अंदर आया और फिर दरवाजे के हलके से बंद होने की आवाज आई. थोड़ी देर तक लीना और किसी मर्द की फुसफुसाहट आती रही मगर बात हमारे पल्ले न पड़ी.

आने वाला कौन हो सकता है? यह सवाल हमारे जेहन में उभरा. ‘प्रेमी हत्यारा,’ सवाल का जवाब भी साथ ही उभरा था.

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तो क्या बोनस के इन रुपयों की खातिर आज के समाचार की तरह लीना भी अपने किसी हत्यारे प्रेमी से मिल कर हमें यमपुरी पहुंचाने की ठान चुकी थी? इतने सालों का वैवाहिक जीवन गुजारने के बाद वह आज बहन की शादी में जाने की रुकावट बनने वाले कांटे को, यानी हमें अपने जीवन से निकाल फेंकेगी?

‘लानत है ऐसी पत्नी पर…और…और थू है हम पर भी,’ हमारी अंतरात्मा की आवाज आई, ‘जो बोनस के कुछ हजार रुपए की खातिर पत्नी को हत्यारिन बनाने पर तुला है, और अगले ही पल हम ने पूरा बोनस लीना के हवाले करने का फैसला कर लिया.

लीना दरवाजे पर आई और धीरेधीरे डबल बेड की ओर बढ़ी.

‘‘लीनाजी,’’ हम ने कहना शुरू ही किया था कि एक झटके में ही उन्होंने अपना हाथ हमारे मुंह पर रख दिया ताकि हम शोर न मचा पाएं.

‘‘मत मारो मुझे…मेरी हत्या…मत करो,’’ हम ने घुटी हुई आवाज में कहते हुए बेड से उठने की कोशिश की.

‘‘शोर मत मचाओ,’’ लीना सख्त मगर सांप की फुंकार जैसी आवाज में बोली. और उस ने हमारे मुंह को जकड़ कर हमारे उठने की कोशिश को विफल कर दिया.

हमारे बेडरूम के दरवाजे की ओर भागते हुए कदमों की आवाजें आईं.

हम ने लेटेलेटे ही तिरछी नजरों से बेडरूम के दरवाजे की तरफ देखा.

जीरो पावर के बल्ब की नीली रोशनी कमरे में बिखरी थी. हमें बेडरूम के दरवाजे पर कोई लंबातगड़ा आदमी, हाफ पैंट और बनियान पहने खड़ा दिखाई दिया. उस के हाथ में एक फंदा झूल रहा था और यह फंदा एक झटके में हमारा गला घोंट देगा.

‘‘ब…चा…ओ…ब…चा…ओ’’ हत्यारे को सामने पा कर हमारे गले से जोरजोर की चीखें निकल रही थीं.

‘‘क्यों आधी रात में शोर मचा कर महल्ले को जगा रहे हैं,’’ लीना ने अपने दोनों हाथ हमारे मुंह पर रख हमारी आवाज को हलक में घोंटने का यत्न किया.

‘‘मेरी हत्या मत करो…यह लो…यह लो.’’ और हम ने बोनस वाला लिफाफा लीना को पकड़ाते हुए दूसरे हाथ से अपने मुंह को छुड़ाने की आखिरी कोशिश की.

हत्यारा जल्दी से कमरे में आ गया और उस ने फंदे वाले हाथ को ऊपर उठाया. फंदा हमारी आंखों के सामने लहरा गया.

‘हिच’ की आवाज के साथ बेडरूम ट्यूब की रोशनी से भर गया.

हम ने फटी आंखों से सुपारी ले कर हत्या करने वाले उस गुंडे की ओर देखा तो दीवार के पास बिजली के स्विच पर हाथ रखे बलदेव भैया खडे़ थे. उन के दूसरे हाथ में अधखुली टाई लहरा रही थी.

‘‘बलदेव भैया आप?’’ हम बेड पर बैठ गए.

‘‘हां, मैं, लीना ने फोन किया था कि वह किसी कारणवश शादी में न पहुंच पाएगी. हम लोग समझ गए कि लीना शादी में न आने पर मजबूर है. शायद हम ने तुम्हें ठीक से न्योता न दिया था. सो मैं खुद ही उसे लेने चला आया.’’

आधी रात को दरवाजे की घंटी से तुम्हारी नींद खराब न हो इस के लिए मैं ने लीना के मोबाइल पर अपने पहुंचने और दरवाजा खोल देने की बात की.

एक पल को रुक  कर बलदेव भैया ने कहा, ‘‘मनोज, तुम्हें क्या हो गया है? ऐसे क्यों चिल्ला रहे थे कि जैसे कोई तुम्हारी जान ले रहा है. मैं कपडे़ बदलते बदलते भागा चला आया.’’

‘‘शायद सोते में कोई भयानक सपना देखा है…’’ लीना ने बोनस वाले लिफाफे में झांका. उस के चेहरे पर खुशी फूट पड़ी थी.

‘‘हां हां, सोते में डर गया था,’’ हम ने जल्दी से बात बनाई और लीना के हाथ में पकडे़ नोटों वाले लिफाफे को हसरत भरी नजरों से देखा.

अगली सुबह शादी में जाने के लिए अपना सामान पैक करते हुए लीना वही ‘बलमा नादान, समझाए न समझे मन की बतिया’ गा रही थी और हम ड्राइंग रूम में बैठे सोच रहे थे कि हम कितने बडे़ नादान बल्कि मूर्ख, पाजी और जाने क्याक्या हैं.

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बालम नादान…हो नादान…हां नादान, लीना तान बदलबदल गाए जा रही थी और हम अपना सिर पीट कर तबले पर संगत करना चाह रहे थे.

बौलीवुड एक्टर्स को भी मात दे रहा हैं ये भोजपुरी एक्टर…

भोजपुरी फिल्मों में यूं तो काफी एक्टर एक्ट्रेसेस हैं, पर कुछ ही ने देश विदेश में नाम हासिल किया हैं. जिनको भोजपुरी स्टार आइकन के रुप में देखा जाता हैं. जिन्होंने वाकई भोजपुरी फिल्मों को बुलंदियों तक पहुंचाया. उनमें से एक हैं खेसारी लाल यादव. अपने अनोखे अंदाज के कारण मशहूर इस एक्टर ने बहुत कम समय में ना सिर्फ लोगो का दिल जीता बल्कि उस दिल में खुद की अलग जगह बनाई. लिट्टी चोखा बेचकर जिंदगी गुजारने वाले खेसारी लाल ने भोजपुरी स्टार तक का सफर तय किया. खेसारी लाल एक मिसाल हैं की अगर आप ठान ले तो कुछ भी मुश्किल नहीं हैं. सफलता के इस मुकाम को हासिल करने के बावजूद खेसारी खुद को जमीन से जोड़कर रखते हैं शायद यही कारण हैं की लोग उनसे काफी कनेक्ट फील करते हैं.

हौटनेस की दौड़ में सबसे आगे  खेसारी

बात अगर हौट भोजपुरी एक्टर्स की कि जाए और खेसारी का नाम ना आएं तो ऐसा हो नहीं सकता. उनकी फिटनेस और बौडी शेप सभी को काफी पसंद हैं. फैंस उनकी हर स्टाइल को फौलो करते हैं. इंस्टाग्राम पर उनकी शर्टलेस फोटो काफी वायरल होती रहती हैं. उनके लुक्स के फैंस ही नहीं भोजपुरी एक्ट्रेसेस भी काफी कायल हैं. फिल्में चुनते समय सभी की पहली पसंद खेसारी होते हैं. सिंगर और एक्टर के रुप के बाद खेसारी, भोजपुरी स्टाइल आइकन बन चुके हैं. फिल्मों में एक्ट्रेसेस के साथ उनकी कौमेडी काफी पसंद की जाती हैं.

 

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Song shoot of film “hogi pyar ki jeet”

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Beautiful morning to all of u

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पौपुलेरिटी में भी आगे

खेसारी लाल ने साल 2011 में फिल्म ‘साजन चले ससुराल नीलेश राजा’ से की. पर मेन लीड में वो फिल्म ‘नागिन’ में नजर आए जिसके बाद खेसारी ने पीछे पलटकर नहीं देखा और सफलता की ओर बढ़ते चले गए.  2011 से 2013 तक उन्होंने 15 फिल्में की. उनके अकेले इंस्टाग्राम पर 226 हजार फौलोवर्स हैं. साल 2016 में भोजपुरी सिने अवार्ड ने खेसारी लाल को ‘BEST POPULAR ACTOR’ से सम्मानित किया वहीं साल 2018 में उनको “BEST ACTOR” से नवाजा गया.

 

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भोजपुरी गानों को किया पौपुलर

खेसारी के नाम कई रिकार्ड दर्ज हैं उनके कई गानों को YouTube पर 2 करोड़ से भी ज्यादा लोगों नें देखा हैं. वो एक मात्र ऐसे भोजपुरी एक्टर हें जिसने ये रिकार्ड बनाया हैं. हाल ही में आया गाना ‘नून रोटी खाएंगे’ काफी पसंद किया गया. जल्द ही उनकी फिल्म ‘हेराफेरी’ और ‘मेहरबालियां’ आने वाली हैं जिसकी शूटिंग अभी चल रही हैं.

भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी का फिटनेस फ्रीक लुक देख, रह जाएंगे हैरान

भोजपुरी इंडस्ट्री की एक्ट्रेसस का जलवा अपने आप में सबसे अलग हैं, फिर चाहे उनके गाने हो या एक्टिंग स्टाइल, भोजपुरी स्टार्स ने सब के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाई हैं. पर अब समय बदल रहा हैं. भोजपुरी एक्ट्रेसस अब बौलीबुड एक्ट्रेसस की तरह ना सिर्फ खुद को समय के साथ बदल रही हैं बल्कि बौलीबुड एक्ट्रेसस की तरह  खुद फिट रखने में भी पीछे नहीं हैं. इन्हीं एक्ट्रेसस की कड़ी मैं पहला नाम आता भोजपुरी स्टार रानी चटर्जी का, वैसे तो रानी की एक्टिंग के सभी दिवाने हैं लेकिन इन दिनों वो अपने फिटनेस फ्रीक अंदाज के लिए चर्चा में हैं. आए दिन इंस्टाग्राम में रानी अपनी गिमिंग की फोटोज शेयर करती रहती हैं जिसे उनके फैंस खासा पसंद कर रहें हैं.

 

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Functional workout bole to waaat lagne wala day #gymastic #instalove #fitnessjourney #nowmore #hardworker 💓💓💓

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#functional #training #depends #balance #adnaan #killed d #today #goal #10 #kg

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चर्चाओं में रहना हैं पसंद

रानी भोजपुरी फिल्मों की उन चुनिंदा एक्ट्रेसस में से एक हैं जो सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. वो रोजोना अपनी कसरत की फोटोस शेयर कर फैंस को अपडेट करती रहती  हैं. रानी हमेशा से अलग करने के लिए जानी जाती हैं फिर चाहे उनका फिल्म चुननें का तरीका हो या फिर एक्टिंग, लोगों के दिल में रानी राज करती आई हैं. शायद यही कारण हैं की उनको बेस्ट पौपुलर एक्ट्रेसस से सम्मानित भी किया जा चुका हैं. रानी ने अपने कैरियर की शुरुआत “ससुरा बड़ा पइसा वाला” से की, जो भोजपुरी फिल्मों की सुपर हिट फिल्मों में से एक है. 2013 भोजपुरी फिल्म अवार्ड में रानी को “बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड” मिला. इसके बाद मौरीशस में आयोजित एगो फिल्म अवार्ड में उनकों “बेस्ट पौपुलर एक्ट्रेस अवार्ड” से सम्मानित किया गया.

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पौपुलर होना चाहती थी रानी

रानी का जन्म मुंबई में हुआ था.  वही से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की. रानी का बचपन से ही सपना था की वो बहुत पौपुलर हो और अपने इस सपने को पूरा करने क् लिए उन्होंने बहुत मेहनत की और 2004 में भोजपुरी फिल्म से डेब्यू किया, रानी ने अपने सपने को  बखूबी पूरा भी किया. रानी ने भोजपुरी फिल्मों नें कई सारी हिट फिल्में देकर मेकर्स के दिल तो जीता ही साथ ही भोजपुरी फिल्म के स्तर को भी बढ़ाया.

 

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 फैंस कर रहें हैं फिटनेस को फौलो

रानी के फोटोस और वीडियों को फैंस काफी  फौलो कर रहें हैं. उनकी जिमिंग फोटोस काफी वायरस हो रही हैं. फैंस उनके बदलते लुक्स की तारीफ कर रहें हैं वही कुछ उनको इस मेहनत भरे वर्कआउट के लिए विश कर रहें हैं.

जल्द ही रानी की फिल्म “रानी की हुकुमत” आने वाली हैं जिसे लेकर वो काफी एक्साइटेड हैं.

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