निखिल अग्रवाल

इसी साल अप्रैल महीने की बात है. मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र से एक युवक मिलने पहुंचा. उस ने अपना नाम शुभम साहू
और पता राजनगर एक्सटेंशन का बताया. युवक ने झिझकते हुए एसएसपी से कहा, ‘‘मैडम, मैं परेशान हूं. आप को एक महत्त्वपूर्ण सूचना देना चाहता हूं.’’
एसएसपी रुचिवर्धन मिश्र ने युवक को सामने रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘शुभम, तुम क्या बताना चाहते हो, खुल कर बताओ. हम से जो मदद हो सकेगी, करेंगे.’’
‘‘मैडम, बात दरअसल यह है कि कुछ लोग फरजी आयकर अफसर बन कर लोगों को नौकरी दिलाने के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं. इस के एवज में वे मोटी रकम लेते हैं.’’ शुभम ने डरतेडरते बताया.
‘‘तुम्हें यह बात कैसे पता चली कि वे फरजी तरीके से आयकर विभाग में नौकरी लगवा रहे हैं.’’ एसएसपी ने सवाल किया.
एसएसपी के सवाल पर शुभम चुप हो गया. इस पर एसएसपी ने उसे भरोसा दिलाते हुए पूछा, ‘‘वे कौन लोग हैं और कहां रहते हैं.’’
‘‘मैडम, मैं जौब की तलाश में था. इस बीच मेरे दोस्त पवन सोलंकी ने एक दिन मेरी मुलाकात देवेंद्र डाबर से करवाई.’’ शुभम ने धीरेधीरे कहा, ‘‘देवेंद्र डाबर ने खुद को इनकम टैक्स का चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर बताया था.’’
आयकर विभाग के चीफ इनवैस्टीगेशन औफिसर की बात सुन कर इस मामले में एसएसपी की भी दिलचस्पी बढ़ गई. उन्होंने अर्दली से कह कर शुभम के लिए पानी मंगवाया. शुभम ने पानी पी लिया तो एसएसपी ने उस से कहा, ‘‘देवेंद्र डाबर से मुलाकात में आप की क्या बात हुई?’’
एसएसपी के प्यार भरे व्यवहार से शुभम की झिझक कम हो गई थी. उस ने कहा, ‘‘मैडम, देवेंद्र का शानदार औफिस है. उस के पास खाकी वरदीधारी चपरासी, ड्राइवर, सरकारी गाड़ी और कई लोगों का स्टाफ है.’’

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