5000 करोड़ की ठगी

सब्जी बेचने वाली और निम्नमध्यम परिवार की डा. नौहेरा शेख ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वो एक दिन 5000 करोड़ की संपत्ति वाले देश के जानेमाने हीरा ग्रुप औफ कंपनी की संस्थापक चेयरमैन और सीईओ के रूप में जानी जाएगी. देश के कई राज्यों में उस की कंपनी के आलीशान दफ्तर होंगे और वह देश और दुनिया में होने वाले बड़ेबड़े जलसों में शिरकत करेगी. जमीन से उठ कर बुलंदियों को छूने वाली नौहेरा शेख की उड़ान अभी बाकी थी. वह चाहती थी कि उस का हीरा ग्रुप और ज्यादा उन्नति करे और उस की कंपनी का पूरे भारत में ही नहीं बल्कि विदेश में भी परचम लहराए. इसीलिए वह प्रयासरत थी. लेकिन अचानक ही उस पर गर्दिश के ऐसे बादल फटे कि वह अब अलगअलग राज्यों की जेल की सलाखों के पीछे अपना वक्त गुजार रही है.

डा. नौहेरा शेख आखिर कौन है और ऐसा क्या हुआ कि वह अचानक ही अर्श से फर्श पर आ गई. इसे समझने के लिए पहले नौहेरा के बारे में जानना जरूरी है.

नौहेरा बेगम का जन्म तिरुपति के एक सामान्य मध्यमवर्गीय शेख नानेसाहेब के परिवार में हुआ था. उस की मां शेख बिल्किस एक घरेलू महिला थीं. नौहेरा शेख उन की एकलौती संतान थी. उस ने अपनी शुरुआती शिक्षा इसलामिक मदरसे से पूरी की. घर में जब आर्थिक तंगी हुई तो शेख बिल्किस सब्जी व फैल बेचने लगी. बाद में नौहेरा शेख ने भी अपनी मां के साथ सब्जी व फल बेचने का काम शुरू किया.

कई सालों तक यही काम करने के साथसाथ उस ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उच्चशिक्षा हासिल कर ली. बाद में उस ने ओपन इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी कोलंबो से पीएचडी की डिग्री भी हासिल कर ली. अब वह डा. नौहेरा शेख बन गई थी.

कहते हैं शिक्षा के विकास के साथ इंसान में कुछ नया करने की सोच और जज्बा पैदा हो जाता है. नौहेरा खान के अंदर भी सामाजिक कार्य करने की इच्छा जागृत हुई तो उस ने 19 साल की उम्र में लड़कियों की शिक्षा के लिए हैदराबाद में पहला मदरसा खोला. साथ ही उस ने सब्जी बेचने का काम छोड़ कर पुराने कपड़ों की सेल लगानी शुरू कर दी.

नौहेरा शेख की सोच बहुत ऊंची थी. इसे साकार करने के लिए उस ने दूसरी योजना बना रखी थी. लेकिन उस के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत थी. अपने पिता का घर बेच कर इकट्ठे किए गए पैसों से उस ने महिलाओं का एक ग्रुप बनाया. ग्रुप की महिलाओं को उस ने अपनी योजना समझा दी थी. इस के बाद उन महिलाओं ने भी अपनी क्षमता के हिसाब से नौहेरा को पैसे दिए. फिर नौहेरा ने कमेटी बना कर गोल्ड की ट्रेडिंग शुरू कर दी.

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गोल्ड ट्रेडिंग से होने वाला मुनाफा वह कमेटी की महिलाओं में ईमानदारी के साथ उन के शेयर के हिसाब से बांट देती थी. नौहेरा की यह स्कीम चल निकली और जल्द ही उसे मोटा मुनाफा होने लगा.

ब्याजमुक्त हलाल निवेश

नौहेरा ने इस कारोबार का मुनाफा देख कर 10 साल पहले हीरा गोल्ड नाम से अपनी कंपनी बनाई और इस कंपनी के मार्फत गोल्ड की ट्रेडिंग शुरू कर दी. हीरा गोल्ड कंपनी में बड़ा फंड जुटाने के लिए नौहेरा ने उन लोगों को अपना टारगेट बनाया जो इसलाम धर्म को मानते हैं और सूदखोरी के पैसे को हराम समझते हैं.

उस ने ऐसे लोगों को टारगेट कर एक पौंजी स्कीम चलाई कि अगर वह उस की हीरा गोल्ड कंपनी में पैसा निवेश करेंगे तो उन्हें मूल रकम पर हर साल 32 से 40 फीसदी का मुनाफा देगी. उस ने इस स्कीम को ब्याज मुक्त हलाल निवेश का नाम दिया.

जो लोग सूदखोरी को हराम समझते थे, उन्हें लगा कि वह एक तरह से कंपनी के हिस्सेदार हैं और हिस्सेदारी भी अच्छी है. लिहाजा जल्द ही दक्षिण के राज्यों में रहने वाले मुसलिम समुदाय के तमाम लोगों ने बड़ीबड़ी रकम नौहेरा खान की कंपनी में निवेश करनी शुरू कर दी.

नौहेरा शेख लोगों का पैसा और मुनाफा समय पर अदा करने लगी तो लोगों में उस की कंपनी के लिए भरोसा बढा. अब डा. नौहेरा शेख ने अलगअलग नाम से दूसरे तरह के काम करने वाली और भी कई कंपनियां बना लीं. हर कंपनी का शुरू का नाम हीरा रखा गया. बाद में हीरा नाम की कंपनियों के इस समूह को उस ने हीरा ग्रुप औफ कंपनी का नाम दे दिया.

नौहेरा शेख ने भारत में अपना कारोबार बढ़ाने के बाद करीब 5 साल पहले इसलामिक देशों में अपना कारोबार बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया और अपना पहला दफ्तर दुबई में खोल दिया. चूंकि नौहेरा शेख ने अपनी पौंजी स्कीम को ब्याजमुक्त हलाल निवेश के रूप में प्रचारित किया था इसलिए दुबई, संयुक्त अरब अमीरात, खाड़ी के दूसरे देशों में रहने वाले मुसलमान उस की कंपनियों में भारी निवेश करने लगे.

देखतेदेखते नौहेरा खान 5000 करोड़ के हीरा ग्रुप औफ कंपनीज की मालकिन बन गई. बाद में नौहेरा ने अपने कारोबार का ट्रैवल, फूड, टैक्सटाइल, कंस्ट्रक्शन और रिटेल जैसे क्षेत्र में विस्तार कर दिया. शुरुआत में उस ने हैदराबाद में एक एजुकेशन सेंटर चलाया. बाद में उसे बड़े स्कूल के रूप में परिवर्तित कर दिया गया. एजुकेशन के धंधे में मोटी कमाई को देखते हुए उस ने एक डीम्ड यूनिवर्सिटी भी खोल दी जिसे शुरू करने के लिए सरकारी प्रक्रिया चल ही रही थी कि उसी दौरान वह कानून के फंदे में फंस गई.

नोटबंदी का पड़ा उलटा असर

नौहेरा शेख ने लेगों को उन की गोल्ड ट्रेडिंग कंपनियों में निवेश करने पर 36 से 40 फीसदी तक रिटर्न देने का भरोसा दिया था. उस ने अपनी 21 कंपनियों में करीब 2 लाख लोगों से निवेश कराया और करोड़ों रुपए एकत्र कर लिए थे. सन 2016 में देश में हुई नोटबंदी और सन 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद हीरा ग्रुप की मुश्किलें बढ़नी शुरू हो गईं.

इस के बाद नौहेरा की कंपनियों ने निवेशकों को पहले तो हर महीने की जगह तिमाही लाभांश देना शुरू किया लेकिन सन 2017 के अंत में घाटे का बहाना बना कर वादे के मुताबिक निवेशकों को रिटर्न देना ही बंद कर दिया. इतना ही नहीं कुछ लोगों ने जब मूल रकम वापस मांगी तो उस ने उन की मूल रकम भी नहीं लौटाई.

कंपनी ने तय समय में लोगों का पैसा नहीं लौटाया तो कई शहरों में नौहेरा और उस के हीरा ग्रुप के खिलाफ लोगों ने सड़कों पर उतरना शुरू कर दिया. बात हैदराबाद से शुरू हुई थी और धीरेधीरे तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और उड़ीसा तक पहुंच गई. निवेशकों ने उस के खिलाफ अलगअलग थानों में शिकायतें दर्ज करानी शुरू कर दीं. 1 लाख 72 हजार से ज्यादा लोगों ने हीरा ग्रुप में 3000 करोड़ से भी ज्यादा निवेश किया था.

इतना ही नहीं संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में रहने वाले बहुत से एनआरआई ने भी इस कंपनी में अपनी मोटी रकम का निवेश किया था लेकिन शुरुआत में कुछ रिटर्न मिलने के बाद कंपनी ने उन की रकम हड़प ली. ऐसे एनआरआई आज तक अपनी रकम पाने के लिए विदेश मंत्रालय के जरिए कानूनी काररवाई में उलझे हुए हैं.

जब नौहेरा शेख के खिलाफ आए दिन लोग सड़कों पर उतर कर विरोध करने लगे तो पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया. अंतत: 17 अक्तूबर, 2018 को नौहेरा शेख को तेलंगाना पुलिस ने पहली बार गिरफ्तार किया.

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उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के साथी बीजू थामस और उस की पत्नी मौली थामस को भी गिरफ्तार कर लिया. बीजू थामस केरल की सुवान टेक्नोलौजी सोल्यूशन इंडिया का एमडी है.

थामस ने ही हीरा ग्रुप की कंपनियों के सौफ्टवेयर बनाए थे और वह हीरा ग्रुप के लेनदेन के खाते भी संभालता था. जबकि उस की पत्नी मौली थामस नौहेरा शेख की पीए के तौर पर काम करती थी. मीडिया में उस की छवि बनाने से ले कर देश और दुनिया भर की सेलिब्रिटीज से मिलवाने में नौहेरा की मदद करती थी.

हैदराबाद के पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार के निर्देश पर 10 सितंबर, 2018 को हैदराबाद के बंजारा हिल पुलिस स्टेशन में फरजाना उन्नेसिया मोहम्मद खाजा नाम की महिला की शिकायत पर पुलिस ने भादंवि की धारा 406 और 420 के साथ तेलंगाना वित्तीय जमा स्थापना अधिनियम 1999 औफ द प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम प्रतिबंध अधिनियम 1978 के तहत पहला मामला दर्ज किया था.

फरजाना ने आरोप लगाया था कि उन के पति ने हीरा रिटेल कंपनी में 25 लाख रुपए का निवेश किया था, लेकिन कंपनी ने न तो लाभांश दिया और न ही मूल रकम लौटाई. नौहेरा के खिलाफ निवेशकों से कई सौ करोड़ रुपए ठगने के 16 मामले और दर्ज हो गए.

तेलंगाना पुलिस ने फिर दबोचा

यह मामला दर्ज होने के बाद नौहेरा शेख कानूनी शरण लेने के लिए दिल्ली भाग आई और राजनीतिक आकाओं के पास चक्कर लगाने लगी. लेकिन तभी भनक लगने पर तेलंगाना पुलिस ने दिल्ली आ कर उसे धर दबोचा. यहां से तेलंगाना पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर हैदराबाद ले गई. वहीं पर उस से ठगी के कारनामों और निवेशकों से धोखाधड़ी के बारे में विस्तार से पूछताछ हुई थी.

लेकिन इस मामले में चंद रोज बाद ही उसे तीनों को जमानत मिल गई. जमानत पर जेल से बाहर आते ही मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने निवेशकों के साथ 300 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने के आरोप में 26 अक्तूबर को उसे गिरफ्तार कर लिया. कई निवेशकों ने उस के हीरा समूह के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायतें मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा में दर्ज करवाई थीं.

मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने 23 अक्तूबर को भिंडी बाजार निवासी शेन इलाही शेख की शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की थी. शिकायतकर्ता का आरोप था कि उस ने हीरा गोल्ड में 6 लाख रुपए इन्वैस्ट किए थे. शेन ने पुलिस को बताया कि उसे निवेश पर 2.8 से 3.2 फीसदी की मंथली रिटर्न का वादा किया गया था. उसे कुछ महीनों तक रिटर्न मिला लेकिन जून में बंद हो गया. पुलिस को शेन की तरह दूसरे निवेशकों को 300 करोड़ रुपए की चपत लगाने से जुड़ी शिकायतें मिली थीं.

लेकिन अपने पैसे और रसूख के कारण इस मामले में भी नौहेरा शेख और उस के साथियों को जल्द जमानत मिल गई. वह खुली हवा में सांस ले पाती, उस से पहले ही ठाणे पुलिस ने नौहेरा को गिरफ्तार कर लिया. ठाणे में उस के खिलाफ करीब 150 लोगों ने ऐसे ही आरोपों के आधार पर मामला दर्ज कराया था.

अब तक अलगअलग जगह की पुलिस ने नौहेरा शेख से जो पूछताछ की थी उस के मुताबिक पता चला कि हीरा समूह की प्रबंध निदेशक नौहेरा शेख ने कई तरह की निवेश योजनाएं शुरू की हुई थीं, जिन के बारे में दावा किया गया था कि वह वित्त से जुड़े इसलामिक सिद्धांतों के अनुरूप है.

मुसलिमों को ही बनाया था टारगेट

यही कारण था कि नौहरा शेख के अधिकांश निवेशक मुसलिम समुदाय से थे, जिन्हें उस ने ब्याजमुक्त हलाल बिजनैस का वादा कर के फंसाया था. उस की कंपनियों ने सोने में इन्वैस्टमेंट की स्कीम शुरू की जिस में मूल जमा पर 36 प्रतिशत से अधिक के वार्षिक रिटर्न का वादा किया गया था.

चूंकि नौहेरा शेख व उस की कंपनियों के खिलाफ कई राज्यों में आर्थिक धोखाधड़ी के मामले दर्ज हो चुके थे और इस का सीधा संबंध वित्तीय घोटाले के अलावा फंड के दुरुपयोग से जुड़ा था, इसलिए राज्यों की पुलिस ने इस बाबत प्रवर्तन निदेशालय को पत्र लिख कर मनी लौंड्रिंग एक्ट के तहत जांच करने का अनुरोध किया. लिहाजा ईडी ने भी इन शिकायतों के आधार पर मनी लौंड्रिंग एक्ट में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

प्रवर्तन निदेशालय की जांच में यह भी पता चला कि नौहेरा शेख ने हीरा ग्रुप की 21 कंपनियों के नाम भारत में 182 बैंक खाते खोल रखे थे. ईडी ने जांचपड़ताल शुरू की तो यह भी पता चला कि यूएई में भी उस की कंपनियों के 10 खाते हैं. ईडी इन सभी खातों में जमा धन की ट्रांजैक्शन पर रोक लगाने की काररवाई शुरू कर चुकी है.

प्रवर्तन निदेशालय भी जुटा जांच में

जांच में पता चला है कि नौहेरा शेख ने इन सभी बैंक खातों में जमा निवेशकों की रकम को अपने व साथियों के निजी बैंक खातों में ट्रांसफर कर के इस रकम से चलअचल संपत्तियां खरीद ली थीं. ज्यादातर फंड को दूसरे काम में निवेश कर दिया था.

ईडी के पास इन तमाम साक्ष्यों के बाद इस बात का पुख्ता आधार है कि उस के खिलाफ मनी लौड्रिंग एक्ट यानी धनशोधन कानून के तहत धन का गलत दुरुपयोग किया है. ईडी ने पुख्ता आधार मिलने के बाद ही 16 मई, 2019 को डा. नौहेरा शेख, उस के साथी बीजू थामस और बीजू की पत्नी मौली थामस को ठाणे पुलिस से अपनी हिरासत में ले लिया.

ईडी ने तीनों को 7 दिन की पूछताछ के लिए अपनी हिरासत में रख कर पूछताछ की तो पता चला कि महाठगिनी डा. नौहेरा शेख ने अपनी उच्चशिक्षा और मुसलिम समाज के कुछ नियमों की आड़ में ठगी के कारनामों को अंजाम दिया था.

वैसे नौहरा शेख की पहली मुसीबत सन 2016 में तब शुरू हुई थी, जब मुंबई पुलिस ने एक हवाला रैकेट का परदाफाश करते हुए उस की कंपनी में काम करने वाले 2 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया था. उन से पता चला था कि हीरा ग्रुप का संबंध हवाला करोबार से भी है.

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लेकिन तब तक नौहेरा शेख राजनीति और नौकरशाही में अपना बड़ा रसूख बना चुकी थी. समाजसेवा के नाम पर नौहेरा ने देश के बड़े राजनेताओं और सेलिब्रिटीज से संबंध बना लिए थे. हीरा ग्रुप की कंपनियों के समारोहों में राजनेताओं के अलावा बौलीवुड के बड़ेबड़े कलाकारों को बुलाया जाता था.

कारोबार से ले कर सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यों में रसूखदार लोगों के साथ तसवीरें खिंचवा कर उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल कर के नौहेरा शेख अपना कारोबार बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती थी. ऐसी तस्वीरें इंटरनेट पर खूब देखी जा सकती हैं.

इंटरनेट पर मौजूद ये तमाम तसवीरे इस बात की भी गवाही देती हैं कि नौहेरा देशविदेश में फैशन, फिल्म और शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले चैरिटी समारोह में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब बुलेट ट्रेन प्रोजैक्ट की आधारशिला रखी तो नौहेरा शेख ने कई शहरों में मोदी को धन्यवाद देने के लिए हीरा ग्रुप की तरफ से होर्डिंग और पोस्टर लगवाए थे, जिन में नौहेरा शेख के बड़ेबड़े फोटो लगे थे और वो पीएम मोदी का शुक्रिया अदा कर रही थी.

महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ भी नौहेरा की तसवीरें मौजूद हैं. यही कारण था कि देश के लाखों निवेशकों को नौहेरा शेख और हीरा ग्रुप की कंपनियों की विश्वसनीयता पर भरोसा हो गया था. इसे देख कर ही निवेशक हीरा ग्रुप में निवेश करने लगते थे.

सियासत की गलियों में अपना कद ऊंचा रखने के लिए भी नौहेरा शेख अपनी काली कमाई को दोनों हाथों से खर्च करती थी. केरल में बाढ़ सहायता के नाम पर जब नौहेरा शेख ने केरल सरकार को एक करोड़ रुपए की सहायता राशि का चैक दिया तो अखबारों के पन्ने उस की तारीफों से रंग गए.

नौहेरा शेख अपने इसी रसूख के कारण लंबे समय तक कानून के शिकंजे में आने से बचती रही थी.

ग्रैजुएशन करने के बाद नौहेरा शेख ने बिजनैस मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की और उस ने लड़कियों के लिए मदरसा भी शुरू किया. सन 2017 में नौहेरा शेख को दुबई के प्रिंस के हाथों संयुक्त अरब अमीरात की टौप बिजनैस वूमेन का अवार्ड भी मिला था.

सन 2017 में नौहरा शेख ने औल इंडिया महिला इंपौवरमेंट पार्टी यानी एमईएम का गठन किया और उस की पार्टी ने अगले ही साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव के में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.

इस चुनाव के दौरान नौहेरा की पार्टी ने तीन तलाक पर आए आदेश का सर्मथन किया तो उस की पार्टी सियासी लोगों के निशाने पर आ गई. लेकिन दिलचस्प बात यह थी कि उस की पार्टी को इस चुनाव में बौलीवुड के कई अभिनेताओं का समर्थन मिला था.

सियासत में भी हो गई फेल

बौलीवुड के दबंग सलमान खान के भाई अरबाज खान, सोहेल खान, संजय दत्त, सोनू सूद, अभिनेत्री ईशा गुप्ता, टेनिस स्टार सानिया मिर्जा, फराह खान तक ने उस की पार्टी के समर्थन में प्रचार किया था.

चुनाव के बाद जब नौहेरा खान के हीरा ग्रुप की कंपनियां निवेशकों को उन का पैसा लौटाने में नाकामयाब रही थीं, तो अलगअलग राज्यों में उस की कंपनी के खिलाफ शिकायतें दर्ज होने लगीं और फिर वह कानून के शिकंजे में फंस गई.

कथा लिखे जाने तक नौहेरा शेख, बीजू थामस और उस की पत्नी मौली थामस से प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ चल रही थी.द्य

स्टाइलिश दिखने के लिए अपनाएं आयुष्मान खुराना के ये 4 लुक्स…

बौलीवुड इंडस्ट्री के औल राउंडर कहे जाने वाले अभिनेता आयुष्मान खुराना एक्टिंग के साथ-साथ फैशन में भी अपने जलवे बिखेर रहे हैं. आयुष्मान खुराना अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपने फैंस के लिए अक्सर अपनी स्टाइलिश फोटोज शेयर करते रहते हैं. आइए देखते हैं उनके कुछ लुक्स जो आप अपनी रियल लाइफ में ट्राय कर सकते हैं…

  1. ओरेंज बार इन द कार…

हाल फिलहाल उनकी लेटेस्ट फोटो सामने आई है जिसमें उनहोनें लाईट पिंक कलर की प्रिंटिड टी-शर्ट और ट्राउसर के साथ ओरेंज कलर का लौंग कोट पहन रखा है, साथ ही में उन्होनें कैप्शन में लिखा है कि “ओरेंज बार इन द कार”. इस फोटो में आयुष्मान काफी अच्छे और ट्रेंडी लुक में नज़र आ रहें हैं. आप सब भी आयुष्मान का यह लुक किसी भी कैज़ुएल पार्टी में ओरों से बहतर और ट्रेंडी दिखने के लिए ट्राई कर सकते हैं.

 

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Orange bar in the car.

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2. कलरफुल कपड़ों का ट्रेंड…

जहां 90 के दशक में गोविंदा जैसे बड़े अभिनेता ने रंग-बिरंगे कपड़े पहने बडे पर्दे पर नज़र आते थे वहीं आयुष्मान की एक लेटेस्ट फोटो सामने आई है जिसमें उन्होनें कलरफुल जैकेट के साथ कलरफुल लोअर पहन रखा है. ऐसा लगता है कि आयुष्मान फिर से वही पुराना ट्रेंड वापस लाना चाहते हैं. फैंस ने इस फोटो को काफी पसंद किया है और काफी अच्छे कमेंटस भी किए हैं. आप इस लुक को कहीं भी अपने डेली यूज़ में ट्राई कर सकते हैं.

 

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3. आप भी ट्राई कर सकते हैं आयुष्मान का औफिस लुक…

औफिस जाने वाले लोगों को अक्सर समझ नहीं आता कि उन्हे औफिस में किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए जिनसे वे और स्टाइलिश दिख सकते हैं. आयुष्मान का एक औफिशियल लुक भी सामने आया है जिसमें उन्होनें व्हाइट कलर की शर्ट, ब्लैक कलर की वी-नैक स्वैटर और क्रीम कलर का कोट पहना हुआ है. आयुष्मान इस लुक में काफी स्टाइलिश नजर आ रहें हैं, तो अगर आप भी अपने औफिस में स्टाइलिश नजर आना चाहते है तो आप भी आयुष्मान के इस लुक को ट्राई कर सकते हैं.

 

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4. कौलेज जाने वाले यंगस्टर्स करें आयुष्मान का ये लुक ट्राई…

आयुष्मान का एक कौलेज लुक भी देखने को मिला है जिसमें वे एक किताब पड़ते नजर आ रहे है. इस फोटो में आयुष्मान ने व्हाइट कलर की टी-शर्ट के ऊपर ब्लैक और रेड कलर की प्रिंटेड शर्ट पहन रखी है. कौलेज जाने वाले युवा अपने पहनावे को ले कर काफी सोच विचार करते हैं ताकी वे अपने कौलेज में ओर ज्यादा स्टाइलिश और ट्रेंडी दिख सकें.

 

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#WorldBookDay

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बता दें कि आयुष्मान बेहतरीन एक्टर होने के साथ एक अच्छे सिंगर, पोएट, और टेलिविजन होस्ट भी हैं. आयुष्मान ने अपने अब तक के करियर में कई सारे अवार्डस भी जीते हैं जिनमें से तीन फिल्म फेयर अवार्ड भी शामिल हैं. वो जल्द ही फिल्म आर्टिक्ल 15 में नजर आएंगे, जिसमें वो एक पुलिस औफिसर का किरदार निभा रहे हैं.

फिल्म ‘शमशेरा’ की शूटिंग से ब्रेक लेकर गोवा वेकेशन पर निकली वाणी कपूर

सभी सेलेब्रिटीज इस समय समर वेकेशन के मूड में हैं और इसी कड़ी में नाम आ गया हैं  वाणी कपूर. हाल ही में वाणी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट अपने गोवा वेकेशन की फोटोज शेयर की जिसे फैंस खासा पस्द कर रहें हैं. वाणी ने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘शमशेरा’ का पहला शेड्यूल खत्म किया है. अपना काम खत्म करते ही वाणी कपूर अपनी दोस्तों संग गोवा वेकेशन पर जा पहुंची हैं. वाणी ने यहां बिकिनी में फोटोज क्लिक कराईं जिसमें वो काफी हौट लग रही हैं.

कौलेज फ्रेंड की शादी के लिए एक्साइटेड

बहुत जल्द ही वाणी की कौलेज फ्रेंड की शादी होने वाली हैं जिसे लेकर वो काफी एक्साइटेड हैं. ऐसे में शादी से पहले वाणी ने अपनी दोस्त को बैचलरेट पार्टी का तोहफा दिया है.  यही वजह है कि गोवा में वाणी अपनी दोस्तों के साथ जा पहुंची हैं. वाणी अपने दोस्तों से बेपद प्यार करती हैं. इस गर्ल गैंग बैचलरेट पार्टी में वाणी ने अपने गर्ल गैंग के साथ मिलकर खूब मस्ती की जिसकी फोटोज उन्होंने अपने फैंस के लिए सोशल मीडिया पर शेयर की.

बिकिनी में दिखी वाणी

इस वेकेशन के दौरान वाणी बिकिनी में नजर आई. सेक्सी लुक्स में दिखी वाणी ने परपल कलर की बिकिनी में काफी हौट लग रही थी. बाणी अपनी फ्रेंड्स के साथ स्वीमिंग पूल में वाणी सेक्सी अंदाज में पोज देती नजर आईं.

 

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Staying together Slaying together 🦋

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Pick your mood 👻

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LIFE is BEAUTIFUL 🌈☀️🌸🌟💗

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रणबीर कपूर के साथ रोमांस करती नजर वाणी

वाणी इस समय फिल्म ‘शमशेरा’ में व्यस्त चल रही हैं. ये फिल्म वाणी के करियर की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म होने वाली है. इस फिल्म ‘शमशेरा’ में वाणी रणबीर कपूर के साथ रोमांस करती नजर आएंगी. फैंस को इस फिल्म का बेसबरी से इंतेजार हैं.

एक और निर्भया…

इस लड़की को निर्भया नाम दिया गया था. लेकिन अब अगर गैंगरेप का कोई मामला होता है तो लड़की या महिला को निर्भया कह देते हैं. जबकि निर्भया शब्द उस के लिए सही नहीं है. अगर वह निर्भया होती तो… लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी. राजस्थान में 2 चरणों में मतदान होना था. पहले चरण में 13 सीटों के लिए 29 अप्रैल को वोट डाले जाने थे, जबकि दूसरे चरण में 12 सीटों के लिए 6 मई को मतदान होना था. पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार जोरों पर था. एक तरफ सूरज आग उगल रहा था और दूसरी तरफ सियासत की गरमी थी. अलवर जिले में एक तहसील है थानागाजी. अलवरजयपुर स्टेट हाइवे पर विश्व प्रसिद्ध सरिस्का बाघ अभयारण्य थानागाजी तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर है.

बीती 26 अप्रैल की बात है, दोपहर के करीब 3 बजे थे. आसमान में कुछ बादल घिर आने से सूरज के तेवर कम हो गए थे. थानागाजी इलाके में एक नवदंपति मोटरसाइकिल पर तालवृक्ष की तरफ जा रहे थे. पति मोटरसाइकिल चला रहा था और पत्नी निर्भया उस के पीछे बैठी थी. निर्भया 19 साल की थी और उस का पति 20 साल का. दोनों की कुछ ही दिन पहले शादी हुई थी.

थानागाजी अलवर बाइपास पर दुहार चौगान वाले रास्ते से कुछ दूर अचानक 2 मोटरसाइकिलों पर सवार 5 युवक तेजी से उन के पास आए. इन युवकों ने नवदंपति की बाइक के आगे अपनी मोटरसाइकिलें लगा कर उन्हें रोक लिया. पतिपत्नी समझ ही नहीं पाए कि क्या बात हो गई, उन्हें क्यों रोका गया.

वे कुछ सवाल करते, इस से पहले ही पांचों युवक उन्हें धमकाते और अश्लील शब्द कहते हुए वहां से सड़क के एक तरफ कुछ दूर बने रेत के बड़ेबडे़ टीलों की तरफ ले गए. रेत के ये टीले इतने ऊंचेऊंचे थे कि उन के पीछे क्या हो रहा है, सड़क से गुजरते लोगों को पता नहीं लग सकता था. टीलों के पीछे से सड़क तक आवाज भी नहीं पहुंच सकती थी.

पतिपत्नी को रेत के टीलों के पीछे ले जा कर पांचों युवकों ने उन से मारपीट की. पति को अधमरा कर एक तरफ बैठा दिया गया. फिर पांचों युवकों ने 19 साल की उस निर्भया से दरिंदगी की. पति ने पत्नी को बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह दरिंदों का मुकाबला नहीं कर सका.

पांचों दरिंदे निर्भया को नोचते रहे. वह हाथ जोड़ कर छोड़ने की भीख मांगती रही, लेकिन दरिंदे अपने साथियों की मर्दानगी पर हंसते और अट्टहास लगाते रहे. निर्भया चीखती रही, लेकिन उस की आवाज उस जंगली इलाके के रेतीले टीबों में ही गूंज कर रह गई.

दरिंदों ने निर्भया के कपड़े फाड़ कर दूर फेंक दिए. इस दौरान वे हैवान अपने मोबाइल से दरिंदगी का वीडियो भी बनाते रहे. इस दौरान युवक आपस में छोटेलाल, जीतू और अशोक के नाम ले रहे थे. जब दरिंदों का मन भर गया तो उन्होंने निर्भया के पति का मोबाइल नंबर लिया. फिर उसे जान से मारने और वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर पांचों मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर भाग गए.

उन के जाने के काफी देर बाद तक लुटेपिटे पतिपत्नी एकदूसरे को ढांढस बंधाते हुए अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाते रहे. कुछ देर बाद जब उन के होशहवास ठीक हुए तो वे फटे कपड़े लपेट कर मोटरसाइकिल से अपने गांव गए.

गांव पहुंच कर उन्होंने घर वालों को इस घटना के बारे में बताया. निर्भया और उस का पति अनुसूचित जाति से होने के साथ गरीब भी थे. दरिंदगी का वीडियो वायरल करने, पति को मारने की धमकी दिए जाने के कारण निर्भया ने उस समय पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई. घटना के दूसरे दिन निर्भया अपने मायके चली गई और उस का पति जयपुर चला गया, जहां वह पढ़ रहा था.

तीसरे दिन 28 अप्रैल की सुबह निर्भया के पति के मोबाइल पर छोटेलाल का फोन आया. वह मिलने के लिए कह रहा था. निर्भया के पति ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘बेटा, मिलना तो तुझे पड़ेगा वरना वीडियो वायरल कर देंगे.’’

निर्भया के पति ने कहा कि तुम से मेरा भाई मिल लेगा. उस ने छोटेलाल को चचेरे भाई का मोबाइल नंबर दे दिया. इस के बाद पति ने यह बात अपने चचेरे भाई को बता दी. उस ने यह सच्चाई निर्भया के पति के सगे भाई को बता दी. छोटेलाल उसे कभी कराणा बुलाता तो कभी थानागाजी आने की बात कहता.

दोपहर में छोटेलाल का फिर फोन आया और उस ने 10 हजार रुपए की डिमांड की. निर्भया के पति ने कहा कि मैं पढ़ता हूं, 10 हजार कहां से दूंगा. इस पर उस ने कहा, ‘‘देने तो पड़ेंगे चाहे एक हजार रुपए कम दे देना.’’

 

वीडियो वायरल के डर से निर्भया के पति ने उसे कुछ हजार रुपए भिजवा भी दिए. पति के भाई ने यह बात पिता को बताई तो उन्होंने अपने बेटे को जयपुर से बुलवा लिया.

रुपए ऐंठने के बाद भी दरिंदों ने निर्भया के पति को काल कर के फिर पैसे मांगे तो निर्भया का परिवार अपने परिचितों के माध्यम से थानागाजी के विधायक कांती मीणा के पास पहुंचा. उन्होंने विधायक को सारी बात बताई. विधायक ने उन की रिपोर्ट दर्ज करवाने और आरोपियों के खिलाफ काररवाई कराने का आश्वासन दिया, लेकिन चुनाव के बाद.

30 अप्रैल को निर्भया और उस का पति अलवर जा कर एसपी राजीव पचार से मिले. निर्भया ने रोतेरोते एसपी को पति के सामने हुए सामूहिक दुष्कर्म की आपबीती बताई. एसपी ने थानागाजी के थानाप्रभारी सरदार सिंह को वाट्सऐप पर पीडि़ता की रिपोर्ट भेज कर मुकदमा दर्ज करने को कहा.

पुलिस को गैंगरेप भी मामूली सी घटना लगा

 

पुलिस ने इस शर्मनाक वारदात को भी साधारण तरीके से लिया. थानागाजी थानाप्रभारी ने 2 मई को दोपहर 2.31 बजे इस मामले में धारा 147, 149, 323, 341, 354बी, 376डी, 506 आईपीसी और एससी/एसटी ऐक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. रिपोर्ट में छोटेलाल गुर्जर निवासी कराणा बानसूर और जीतू व अशोक के नाम थे, जबकि 2 आरोपी अज्ञात थे.

भले ही पुलिस ने घटना के 7वें दिन मुकदमा दर्ज कर लिया, लेकिन मीडिया से इसे छिपा लिया. पुलिस ने मामले की जांच में भी लापरवाही बरती. उस दिन पीडि़ता का मैडिकल भी नहीं कराया गया. न ही अभियुक्तों को पकड़ने की कोई काररवाई की गई.

पुलिस को यह बात भी बता दी गई थी कि दरिंदे बारबार फोन कर के वीडियो वायरल करने की धमकी दे रहे हैं, लेकिन पुलिस ने न तो इसे गंभीरता से लिया और न ही इस के दूरगामी परिणामों के बारे में सोचा.

 

रिपोर्ट दर्ज होने के दूसरे दिन 3 मई को पुलिस ने अलवर में पीडि़ता का मैडिकल कराया. पुलिस ने उसी दिन पीडि़ता, उस के पति, पिता और ससुर के बयान दर्ज किए. उसी दिन पुलिस ने पीडि़ता को साथ ले जा कर मौका नक्शा बनाया.

लापरवाही इतनी रही कि एक आरोपी का नामपता और मोबाइल नंबर होने के बावजूद पुलिस ने उसे पकड़ना तो दूर, उसे थाने बुलाने की जहमत तक नहीं उठाई. इस से उन दरिंदों के हौसले बढ़ गए. इस बीच फोन पर बारबार धमकाने के बावजूद जब दोबारा पैसे नहीं मिले तो दरिंदों ने 4 मई को सोशल मीडिया पर वे वीडियो वायरल कर दिए, जो उन्होंने निर्भया से दरिंदगी करते हुए बनाए थे.

6 मई तक ये वीडियो असंख्य मोबाइलों तक पहुंच चुके थे. 6 मई को ही राजस्थान में अलवर सहित 12 लोकसभा सीटों के लिए मतदान था. मतदान के बाद पुलिस ने इस घटना को मीडिया में उजागर किया. तब तक सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो बम बन चुका था, जो किसी भी गैरतमंद आदमी को हिला देने के लिए काफी था.

7 मई को राजस्थान के मीडिया में थानागाजी गैंगरेप की सुर्खियों ने लोकसभा चुनाव की गरमी को भी ठंडा कर दिया. मीडिया ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए सवाल उठाए कि चुनाव के कारण इस घटना का खुलासा नहीं कर पुलिस क्या किसी को सियासी फायदा देना चाहती थी? या फिर समझौता कर इस मामले को रफादफा करना चाहती थी? पुलिस कहीं आरोपियों के पक्ष में तो नहीं थी? अगर ऐसा नहीं था तो वीडियो वायरल होने के बाद ही पुलिस ने यह घटना उजागर क्यों की?

 

वीडियो वायरल होने से यह घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई. इस के बाद सरकार और पुलिस अफसरों की नींद खुली. सरकार ने आननफानन में अलवर के एसपी आईपीएस अधिकारी राजीव पचार को हटा कर पदस्थापन की प्रतीक्षा में रख दिया. थानागाजी के थानाप्रभारी सरदार सिंह को निलंबित कर दिया गया. इसी थाने के एएसआई रूपनारायण, कांस्टेबल रामरतन, महेश कुमार और राजेंद्र को लाइन हाजिर कर दिया गया.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि पुलिस की ओर से अगर किसी भी स्तर पर लापरवाही हुई है तो सख्त काररवाई होगी. महिला सुरक्षा के प्रति सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी सामूहिक दुष्कर्म की इस घटना को बेहद शर्मनाक बताया.

डीजीपी कपिल गर्ग ने जयपुर में प्रैस कौन्फ्रैंस कर कहा कि थानागाजी थाने के सभी पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच की जाएगी. रिपोर्ट दर्ज होने के 5 दिन तक निष्क्रिय बैठी पुलिस ने आननफानन में अभियुक्तों को पकड़ने के लिए 14 टीमों का गठन कर दिया. अलवर से ले कर दिल्ली, गुड़गांव और बीकानेर तक पुलिस टीमें भेजी गईं.

पुलिस ने भागदौड़ कर एक 22 वर्षीय अभियुक्त इंदराज गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया. वह जयपुर जिले के प्रागपुरा का रहने वाला था. इस के अलावा वीडियो वायरल करने के आरोप में काली खोहरा निवासी मुकेश गुर्जर को सरिस्का के जंगल से पकड़ा गया.

 

गैंगरेप में भी राजनीति

 

सामूहिक दुष्कर्म की घटना सामने आने पर एक ओर जहां लोगों में गुस्सा था, वहीं राजनीति भी शुरू हो गई थी. थानागाजी कस्बे में सर्वसमाज की विशाल पंचायत हुई. इस में राज्यसभा सांसद डा. किरोड़ीलाल मीणा और थानागाजी विधायक कांती मीणा भी शामिल हुए.

पंचायत में फैसला लिया गया कि 24 घंटे में सभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर कस्बे के बाजार बंद कर आंदोलन किया जाएगा. डा. किरोड़ीलाल मीणा ने 8 मई को हजारों कार्यकर्ताओं के साथ जयपुर में मुख्यमंत्री कार्यालय का घेराव करने की भी चेतावनी दी. राजनीति में ऐसा ही होता है.

जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह ने तुरतफुरत पीडि़ता को 4 लाख 12 हजार 500 रुपए की आर्थिक सहायता राशि मंजूर कर दी. दरअसल एससी/एसटी की महिला से दुष्कर्म का मुकदमा होने पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की ओर से प्रथम किस्त के रूप में इतनी राशि देने का प्रावधान है.

 

8 मई को इस घटना के विरोध में अलवर से ले कर जयपुर तक धरनाप्रदर्शन होते रहे. थानागाजी में हजारों लोगों ने अलवरजयपुर सड़क मार्ग जाम कर दिया और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, मंत्री और अधिकारी पीडि़ता से मिलने के लिए थानागाजी से 7 किलोमीटर दूर उस के गांव पहुंच गए.

लोगों ने कहा कि पुलिस प्रशासन के साथ नेता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. हम ने घटना की जानकारी देने के लिए कई नेताओं को फोन किए लेकिन किसी ने मदद नहीं की.

पीडि़त परिवार ने राजस्थान सरकार के श्रम राज्यमंत्री और अलवर ग्रामीण के विधायक टीकाराम जूली को 30 अप्रैल को फोन किया तो उन्होंने कहा कि अभी चुनाव में व्यस्त हैं. बाद में जूली ने माना कि फोन आया था, लेकिन यह नहीं पता था कि मामला इतना गंभीर है.

जयपुर में राज्यसभा सांसद डा. किराड़ीलाल मीणा एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री आवास के पास सिविललाइन फाटक पर प्रदर्शन किया. इस दौरान प्रदर्शनकारी और पुलिस आपस में गुत्थमगुत्था हो गए. आधे घंटे तक हंगामा होता रहा.

बाद में प्रदर्शनकारियों ने राजभवन जा कर राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया. राजस्थान यूनिवर्सिटी में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के पुतले के साथ प्रदर्शन किया. अलवर में विभिन्न संगठनों के अलावा महिलाओं ने भी जुलूस निकाले और अधिकारियों को ज्ञापन दिए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में प्रसंज्ञान ले कर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया. साथ ही मुख्य सचिव और महानिदेशक से 6 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी.

इस मामले में उस समय नया मोड़ आ गया, जब पीडि़ता के पति ने राज्य के पूर्वमंत्री और थानागाजी के पूर्व विधायक हेमसिंह भड़ाना पर समझौते का दबाव बनाने का आरोप लगाया. हालांकि भड़ाना ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता कर सिरे से नकार दिया.

पुलिस ने 8 मई की रात तक 3 अन्य आरोपियों अशोक गुर्जर, महेश गुर्जर और हंसराज गुर्जर को भी गिरफ्तार कर लिया. मुख्य आरोपी छोटेलाल गुर्जर अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगा था.

9 मई को भी अलवर और जयपुर सहित पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन होता रहा. इस के बावजूद सरकार की लापरवाही रही कि वायरल वीडियो ब्लौक करने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश तक नहीं दिए. यह वीडियो गूगल, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया पर 9 मई तक पीडि़तों की इज्जत तारतार करता रहा. भाजपा ने अलवर में धरना दे कर मामले की जांच सीबीआई से कराने, पीडि़ता को 50 लाख रुपए मुआवजा देने, एसपी व थानाप्रभारी पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की.

 

महिला आयोग भी आया आगे

 

राष्ट्रीय महिला आयोग के दल ने थानागाजी पहुंच कर पीडि़ता से मुलाकात की. आयोग की सदस्य डा. राहुल बेन देसाई और नेहा महाजन ने इस दौरान मौजूद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विजिलेंस गोविंद गुप्ता और आईजी एस. सेंगाथिर को सोशल मीडिया पर वीडियो फोटो अपलोड करने वालों पर तुरंत एक्शन लेने के निर्देश दिए. देश भर से विभिन्न जनसंगठनों के पदाधिकारी भी थानागाजी पहुंचे और पीडि़त परिवार से मिले.

पुलिस ने घटना के 13 दिन बाद मुख्य आरोपी छोटेलाल गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया. उसे सीकर जिले के अजीतगढ़ से पकड़ा गया, जहां वह एक ट्रक में छिपा हुआ था. छोटेलाल इस ट्रक में सवार हो कर गुजरात भागने की फिराक में था. छोटे शराब की दुकान पर सेल्समैन का काम करता था. बानसूर के रतनपुरा गांव निवासी छोटेलाल के खिलाफ 2 आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं.

दूसरी ओर, पुलिस ने अलवर की अदालत में पीडि़ता के धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराए. वहीं, राज्य सरकार ने मामले की प्रशासनिक जांच के लिए जयपुर के संभागीय आयुक्त को नियुक्त किया. इस के अलावा चुनाव आचार संहिता लगी होने के कारण निर्वाचन आयोग से अनुमति मिलने के बाद आईपीएस औफिसर देशमुख पारिस अनिल को अलवर का एसपी नियुक्त किया गया.

पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाने पर 10 मई को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष एल. मुरुगन इस घटना की जांच करने थानागाजी पहुंचे. वे पीडि़ता और उस के परिवार से भी मिले. इस दौरान राजस्थान के मुख्य सचिव डी.बी. गुप्ता और पुलिस महानिदेशक कपिल गर्ग मौजूद रहे.

आयोग के उपाध्यक्ष ने पीडि़ता से मुलाकात के बाद कहा कि 30 अप्रैल को एसपी को परिवाद देने के बाद भी पुलिस ने 2 मई को मुकदमा दर्ज किया और 7 मई को ऐक्शन में आई, यह साफतौर पर सरकार की लापरवाही है. हम राज्य सरकार की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं.

फिलहाल प्रशासन को पीडि़ता के परिवार की नौकरी की मांग और सरकारी सहायता देने के लिए कहा गया है. इस के अलावा केस दर्ज करने में लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और और पीडि़त परिवार की स्थाई सुरक्षा की व्यवस्था करने को भी कहा गया है.

मुरुगन ने कहा कि आयोग के निर्देश पर यूट्यूब से घटना के वीडियो हटवाए गए हैं. पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए हर जरूरी कदम उठा रहे हैं.

 

जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उच्चस्तरीय बैठक कर ऐसे मामलों में कड़े कदम उठाने का फैसला किया. उन्होंने कहा कि अगर कोई थानेदार थाने में एफआईआर दर्ज नहीं करेगा तो एसपी को दर्ज करनी होगी. ऐसे थानेदार के खिलाफ सख्त काररवाई होगी. महिला अत्याचार की घटनाओं की मौनिटरिंग के लिए हर जिले में महिला सुरक्षा डीएसपी का नया पद सृजित किया जाएगा.

यह सिर्फ महिलाओं के अपहरण, दुष्कर्म, गैंगरेप आदि मामलों की जांच करेगा. यह डीएसपी महिला थानों की मौनिटरिंग के साथ सामाजिक न्याय व महिला बाल विकास विभाग से समन्वय स्थापित करेगा और महिलाओं व बच्चों पर होने वाले अत्याचार के मामलों में काररवाई करेगा. गहलोत ने कहा कि थानागाजी के मामले को केस औफिसर स्कीम में ले कर आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी.

11 मई को थानागाजी गैंगरेप मामले में देश की सियासत गरमा गई. लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजस्थान सरकार को सीधे निशाने पर लिया.

मोदी ने कहा कि अलवर में एक दलित बेटी के साथ कुछ दरिंदों ने सामूहिक दुष्कर्म किया, लेकिन राजस्थान में चुनाव थे इसलिए वहां की कांग्रेस सरकार और पुलिस इस मामले को दबाने में जुटी रही.

 

पीडि़त से हमदर्दी सिर्फ नाम की,

बस मुद्दा उछलता रहा

 

मायावती ने लखनऊ में आयोजित चुनावी रैली में इसे अतिघृणित घटना बताते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस सरकार के चलते उस दलित महिला को इंसाफ मिलेगा.

पुलिस ने इस मामले में अलवर जेल में न्यायिक अभिरक्षा भुगत रहे 3 आरोपियों हंसराज गुर्जर, महेश गुर्जर व इंदरराज गुर्जर की शिनाख्त परेड कराई. इस के बाद इन्हें 13 मई तक रिमांड पर लिया गया. 3 आरोपी पहले ही 13 मई तक रिमांड पर थे. बाद में अदालत से सभी 6 आरोपियों की रिमांड अवधि 16 मई तक बढ़वा ली गई.

14 मई को इस मामले में जयपुर कूच करने निकले सांसद डा. किरोड़ीलाल और उन के समर्थकों ने दौसा में जयपुरदिल्ली रेलवे ट्रैक जाम करने का प्रयास किया. पुलिस ने खदेड़ा तो किरोड़ी समर्थकों ने पथराव किया. पथराव के कारण कई ट्रेनें बीच रास्ते में रोक दी गईं. काफी देर तक लाठीभाटा जंग होती रही.

इस जंग में 5 पुलिसकर्मियों सहित 8 लोग घायल हो गए. एसपी व एडीएम सहित कई अधिकारियों को भी चोटें आईं. बाद में पुलिस ने किरोड़ी के साथ पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़, विधायक हनुमान बेनीवाल व गोपीचंद को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.

दूसरी ओर, पीडि़ता के पिता ने कहा कि उन का परिवार इस घटना के बाद लोगों के आनेजाने और इस से हुई बदनामी से परेशान है. उन्होंने सरकार से मांग की कि पीडि़त दंपति को सरकारी नौकरी दे कर किसी ऐसी जगह भेज दिया जाए, जहां उन्हें कोई न पहचान सके. 7 दिन में इतने नेता और लोग घर पहुंचे कि पूरे देश और समाज को पता चल गया कि वीडियो में दिखे पतिपत्नी का मकान यह है.

15 मई को भी अलवर व जयपुर सहित प्रदेश के कई हिस्सों में आंदोलन होते रहे. थानागाजी में सर्वसमाज ने आक्रोश रैली निकाली. इस दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का थानागाजी आने का कार्यक्रम था लेकिन मौसम खराब होने से उन का हेलीकौप्टर दिल्ली से उड़ान नहीं भर सका.

16 मई को राहुल गांधी थानागाजी क्षेत्र में पीडि़ता से मिलने उस के घर पहुंचे. राहुल ने पीडि़ता, उस के पति और उस के परिवार के लोगों से करीब 15 मिनट तक अकेले में बात कर घटना की जानकारी ली. घटना के बारे में बताते हुए पीडि़ता व उस का पति रो पड़े तो राहुल भी भावुक हो गए.

 

राजनीति के लिए नेताओं के घडि़याली आंसू

 

राहुल ने पीडि़ता के पति को गले लगाया अैर कहा कि यह राजनीति नहीं है, आप को न्याय जरूर मिलेगा. परिवार ने पीडि़ता व उस के पति के पुनर्वास, सरकारी नौकरी व आरोपियों को कठोर सजा दिलाने की मांग रखी.

इस दौरान मौजूद मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि पीडि़ता के लिए सरकारी नौकरी का इंतजाम किया जाएगा. अलवर जिले में अपराध के आंकड़ों को देखते हुए 2 एसपी लगाए जाएंगे. इस केस में 7 दिनों में चालान पेश कर दिया जाएगा.

पुलिस ने सभी आरोपियों को रिमांड अवधि पूरी होने पर अलवर की अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस ने अदालत में अर्जी पेश कर पीडि़ता के पति को मोबाइल पर धमकी दे कर 10 हजार रुपए मांगने के आरोपी छोटेलाल की आवाज के नमूने लेने की अनुमति मांगी.

17 मई को इस मामले की प्रशासनिक जांच कर रहे जयपुर के संभागीय आयुक्त के.सी. वर्मा ने अलवर में जनसुनवाई कर घटना से संबंधित तथ्य जुटाए. दूसरी ओर राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने राजस्थान में बढ़ रहे यौन अपराधों के मामले में स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लेते हुए पुलिस महानिदेशक और सरकार से जवाब तलब किया है.

यह विडंबना ही है कि चुनाव के दौरान थानागाजी का यह मामला पूरे देश में चर्चा में आ गया. इस से राजनीति में भी उबाल आया. सभी प्रमुख दलों के नेता बयानबाजी करते रहे. कुछ लोग राजनीतिक रोटियां भी सेकते रहे. जबकि जरूरत थी पीडि़ता का दर्द कम करने की. इस के लिए जरूरी था कि राजनीति बंद होती.

 

पीडि़ता का पुनर्वास होना जरूरी है. सरकारी नौकरी से उसे कुछ सहारा मिलेगा तो शायद वह अपने कामकाज में व्यस्त हो कर दिल दहलाने वाली इस घटना को भुलाने की कोशिश कर सके. साथ ही ऐसे दरिंदों को कठोर सजा मिलनी चाहिए, ताकि ऐसी मानसिकता के लोगों को सबक मिल सके.

थानागाजी गैंगरेप मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने के 16 दिन बाद 18 मई को अलवर की अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी. 500 पेज की चार्जशीट में 6 आरोपी हैं. इनमें 5 मुलजिमों के खिलाफ गैंगरेप, अपहरण, रास्ता रोकने, मारपीट, निर्वस्त्र करने, जातिसूचक शब्द बोलने, मानसम्मान को ठेस पहुंचाने, डकैती व धमकी देने सहित प्रताडि़त करने और एक अभियुक्त पर वीडियो वायरल करने का आरोप है.

पुलिस ने मामले की त्वरित सुनवाई के लिए केस औफिसर नियुक्त किया है. अदालत में दिनप्रतिदिन सुनवाई के लिए अरजी दी गई है, ताकि आरोपियों को जल्द सजा मिल सके. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ जिन धाराओं में चालान पेश किया है, उन में आरोप साबित होने पर इन दरिंदों को मरते दम तक उम्रकैद की सजा हो सकती है.

मामले का वीडियो फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करने पर पुलिस ने यूट्यूब पर बने एक चैनल टौप न्यूज 24 के खिलाफ अलवर शहर कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया है. यह मुकदमा कोतवाली थानाप्रभारी कन्हैयालाल ने खुद दर्ज कराया है.

दूसरी ओर, सरकार ने पीडि़ता को सरकारी नौकरी देने की तैयारी शुरू कर दी है. सरकार ने उसे राजस्थान पुलिस या जेल पुलिस में से कोई एक कांस्टेबल पद चुनने का विकल्प दिया है. इस में पीडि़ता ने राजस्थान के जयपुर सिटी में पोस्टिंग मांगी है.   द्य

—पीडि़ता का निर्भया नाम काल्पनिक है

 

 

50 करोड़ का खेल

लेखक- निखिल अग्रवाल

21मार्च, 2019 की बात है. उस दिन होली थी. होलिका दहन के अगले दिन रंग गुलाल से खेले जाने वाले त्यौहार का आमतौर पर दोपहर तक ही धूमधड़ाका रहता है. दोपहर में रंगेपुते लोग नहाधो कर अपने चेहरों से रंग उतारते हैं. फिर अपने कामों में लग जाते हैं. कई जगह शाम के समय लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मिलने भी जाते हैं. भीलवाड़ा के पाटील नगर का रहने वाला शिवदत्त शर्मा भी होली की शाम अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने के लिए अपनी वेरना कार से बापूनगर के लिए निकला था. शिवदत्त ने जाते समय पत्नी शर्मीला से कहा था कि वह रात तक घर आ जाएगा. थोड़ी देर हो जाए तो चिंता मत करना.

शिवदत्त जब देर रात तक नहीं लौटा तो शर्मीला को चिंता हुई. रात करीब 10 बजे शर्मीला ने पति के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद शर्मीला घरेलू कामों में लग गई. उस के सारे काम निबट गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया था. शर्मीला ने दोबारा पति के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन इस बार भी उस का फोन स्विच्ड औफ ही मिला. उसे लगा कि शायद पति के मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई होगी, इसलिए स्विच्ड औफ आ रहा है.

शर्मीला बिस्तर पर लेट कर पति का इंतजार करने लगी. धीरेधीरे रात के 12 बज गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया. इस से शर्मीला को चिंता होने लगी. वह पति के दोस्त राजेश त्रिपाठी को फोन करने के लिए नंबर ढूंढने लगी, लेकिन त्रिपाठीजी का नंबर भी नहीं मिला.

शर्मीला की चिंता स्वाभाविक थी. वैसे भी शिवदत्त कह गया था कि थोड़ीबहुत देर हो जाए तो चिंता मत करना, लेकिन घर आने की भी एक समय सीमा होती है. शर्मीला बिस्तर पर लेटेलेटे पति के बारे में सोचने लगी कि क्या बात है, न तो उन का फोन आया और न ही वह खुद आए.

पति के खयालों में खोई शर्मीला की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. त्यौहार के कामकाज की वजह से वह थकी हुई थी, इसलिए जल्दी ही गहरी नींद आ गई.

 

वाट्सऐप मैसेज से मिली

पति के अपहरण की सूचना

 

22 मार्च की सुबह शर्मीला की नींद खुली तो उस ने घड़ी देखी. सुबह के 5 बजे थे. पति अभी तक नहीं लौटा था. शर्मीला ने पति को फिर से फोन करने के लिए अपना मोबाइल उठाया तो देखा कि पति के नंबर से एक वाट्सऐप मैसेज आया था.

शर्मीला ने मैसेज पढ़ा. उस में लिखा था, ‘तुम्हारा घर वाला हमारे पास है. इस पर हमारे एक करोड़ रुपए उधार हैं. यह हमारे रुपए नहीं दे रहा. इसलिए हम ने इसे उठा लिया है. हम तुम्हें 2 दिन का समय देते हैं. एक करोड़ रुपए तैयार रखना. बाकी बातें हम 2 दिन बाद तुम्हें बता देंगे. हमारी नजर तुम लोगों पर है. ध्यान रखना, अगर पुलिस या किसी को बताया तो इसे वापस कभी नहीं देख पाओगी.’

 

मोबाइल पर आया मैसेज पढ़ कर शर्मीला घबरा गई. वह क्या करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. पति की जिंदगी का सवाल था, घबराहट से भरी शर्मीला ने अपने परिवार वालों को जगा कर मोबाइल पर आए मैसेज के बारे में बताया.

मैसेज पढ़ कर लग रहा था कि शिवदत्त का अपहरण कर लिया गया है. बदमाशों ने शिवदत्त के मोबाइल से ही मैसेज भेजा था ताकि पुष्टि हो जाए कि शिवदत्त बदमाशों के कब्जे में है. यह मैसेज 21 मार्च की रात 9 बज कर 2 मिनट पर आया था, लेकिन उस समय शर्मीला इसे देख नहीं सकी थी.

शिवदत्त के अपहरण की बात पता चलने पर पूरे परिवार में रोनापीटना शुरू हो गया. जल्दी ही बात पूरी कालोनी में फैल गई. चिंता की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त पर अपने एक करोड़ रुपए बकाया बताए थे और वह रकम उन्होंने 2 दिन में तैयार रखने को कहा था.

शर्मीला 2 दिन में एक करोड़ का इंतजाम कहां से करती? शिवदत्त होते तो एक करोड़ इकट्ठा करना मुश्किल नहीं था लेकिन शर्मीला घरेलू महिला थी, उन्हें न तो पति के पैसों के हिसाबकिताब की जानकारी थी और न ही उन के व्यवसाय के बारे में ज्यादा पता था. शर्मीला को बस इतना पता था कि उस के पति बिल्डर हैं.

शर्मीला और उस के परिवार की चिंता को देखते हुए कुछ लोगों ने उन्हें पुलिस के पास जाने की सलाह दी. शर्मीला परिवार वालों के साथ 22 मार्च को भीलवाड़ा के सुभाषनगर थाने पहुंच गई और पुलिस को सारी जानकारी देने के बाद अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने शर्मीला और उन के परिवार के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि कपड़ा नगरी के नाम से देश भर में मशहूर भीलवाड़ा के पथिक नगर की श्रीनाथ रेजीडेंसी में रहने वाले 42 साल के शिवदत्त शर्मा की हाइपर टेक्नो कंसट्रक्शन कंपनी है. शिवदत्त का भीलवाड़ा और आसपास के इलाके में प्रौपर्टी का बड़ा काम था. उन के बिजनैस में कई साझीदार हैं और इन लोगों की करोड़ोंअरबों की प्रौपर्टी हैं.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने इस की जानकारी एडिशनल एसपी दिलीप सैनी को दे दी. इस के बाद पुलिस ने शिवदत्त की तलाश शुरू कर दी. साथ ही शिवदत्त की पत्नी से यह भी कह दिया कि अगर अपहर्त्ताओं का कोई भी मैसेज आए तो तुरंत पुलिस को बता दें.

चूंकि शिवदत्त अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी के घर जाने की बात कह कर घर से निकले थे, इसलिए पुलिस ने राजेश त्रिपाठी से पूछताछ की. राजेश ने बताया कि शिवदत्त होली के दिन शाम को उन के पास आए तो थे लेकिन वह रात करीब 8 बजे वापस चले गए थे.

 

जांचपड़ताल के दौरान 23 मार्च को पुलिस को शिवदत्त की वेरना कार भीलवाड़ा में ही सुखाडि़या सर्किल से रिंग रोड की तरफ जाने वाले रास्ते पर लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पुलिस ने कार जब्त कर ली. पुलिस ने कार की तलाशी ली, लेकिन उस से शिवदत्त के अपहरण से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. कार भी सहीसलामत थी. उस में कोई तोड़फोड़ नहीं की गई थी और न ही उस में संघर्ष के कोई निशान थे.

पुलिस ने शिवदत्त के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन मोबाइल के स्विच्ड औफ होने की वजह से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जांच की अगली कड़ी के रूप में पुलिस ने शिवदत्त, उस की पत्नी और कंपनी के स्टाफ के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा शिवदत्त के लेनदेन, बैंक खातों, साझेदारों के लेनदेन से संबंधित जानकारियां जुटाईं. यह भी पता लगाया गया कि किसी प्रौपर्टी को ले कर कोई विवाद तो नहीं था.

 

पुलिस जुट गई जांच में

 

इस बीच 24 मार्च का दिन भी निकल गया. लेकिन अपहर्त्ताओं की ओर से कोई सूचना नहीं आई. जबकि उन्होंने 2 दिन में एक करोड़ रुपए का इंतजाम करने को कहा था. घर वाले इस बात को ले कर चिंतित थे कि कहीं अपहर्त्ताओं को उन के पुलिस में जाने की बात पता न लग गई हो. क्योंकि इस से चिढ़ कर वे शिवदत्त के साथ कोई गलत हरकत कर सकते थे.

शर्मीला पति को ले कर बहुत चिंतित थी. अपहर्त्ताओं की ओर से 3 दिन बाद भी शिवदत्त के परिजनों से कोई संपर्क नहीं किया गया. ऐसे में पुलिस को भी उस की सलामती की चिंता थी.

पुलिस ने शिवदत्त की तलाश तेज करते हुए 4 टीमें जांचपड़ताल में लगा दी. इन टीमों ने शिवदत्त के रिश्तेदारों से ले कर मिलनेजुलने वालों और संदिग्ध लोगों से पूछताछ की, लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला. शिवदत्त की कार जिस जगह लावारिस हालत में मिली थी, उस के आसपास सीसीटीवी फुटेज खंगालने की कोशिश भी की गई, लेकिन पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल सका.

इस पर पुलिस ने 25 मार्च को शिवदत्त के फोटो वाले पोस्टर छपवा कर भीलवाड़ा जिले के अलावा पूरे राजस्थान सहित गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के पुलिस थानों को सार्वजनिक स्थानों पर चस्पा करने के लिए भेजे.

 

पुलिस को भी नहीं मिला शिवदत्त

 

जांच में पता चला कि शिवदत्त ने कुछ समय पहले महाराष्ट्र में भी अपना कारोबार शुरू किया था. इसलिए किसी सुराग की तलाश में पुलिस टीम मुंबई और नासिक भेजी गई. लेकिन वहां हाथपैर मारने के बाद पुलिस खाली हाथ लौट आई.

उधर लोग इस मामले में पुलिस की लापरवाही मान रहे थे. पुलिस के प्रति लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा था. 26 अप्रैल, 2019 को ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधि मंडल ने भीलवाड़ा के कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन दे कर शिवदत्त को सुरक्षित बरामद कर अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार करने की मांग की. ऐसा न होने पर उन्होंने आंदोलन की चेतावनी दे दी.

दिन पर दिन बीतते जा रहे थे, लेकिन न तो अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त के परिजनों से कोई संपर्क किया था और न ही पुलिस को कोई सुराग मिला था. इस से शिवदत्त के परिजन भी परेशान थे. उन के मन में आशंका थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त के साथ कुछ गलत न कर दिया हो. क्योंकि इतने दिन बाद भी न तो अपहर्त्ता संपर्क कर रहे थे और न ही खुद शिवदत्त.

पुलिस की चिंता भी कम नहीं थी. वह भी लगातार भागदौड़ कर रही थी. पुलिस ने शिवदत्त के फेसबुक, ट्विटर, ईमेल एकाउंट खंगालने के बाद संदेह के दायरे में आए 50 से अधिक लोगों से पूछताछ की.

पुलिस की टीमें महाराष्ट्र और गुजरात भी हो कर आई थीं. शिवदत्त और उस के परिवार वालों के मोबाइल की कालडिटेल्स की भी जांच की गई. भीलवाड़ा शहर में बापूनगर, पीऐंडटी चौराहा से पांसल चौराहा और अन्य इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई, लेकिन इन सब का कोई नतीजा नहीं निकला.

बिल्डर शिवदत्त के अपहरण का मामला पुलिस के लिए एक मिस्ट्री बनता जा रहा था. पुलिस अधिकारी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर अपहर्त्ता शिवदत्त को कहां ले जा कर छिप गए. ऐसा कोई व्यक्ति भी पुलिस को नहीं मिल रहा था जिस ने राजेश त्रिपाठी के घर से निकलने के बाद शिवदत्त को देखा हो. त्रिपाठी ही ऐसा शख्स था, जिस से शिवदत्त आखिरी बार मिला था. पुलिस त्रिपाठी से पहले ही पूछताछ कर चुकी थी. उस से कोई जानकारी नहीं मिली थी तो उसे घर भेज दिया गया था.

जांचपड़ताल में सामने आया कि शिवदत्त का करीब 100 करोड़ रुपए का कारोबार था. साथ ही उस पर 20-30 करोड़ की देनदारियां भी थीं. महाराष्ट्र के नासिक और गुजरात के अहमदाबाद में भी उस ने कुछ समय पहले नया काम शुरू किया था.

 

शिवदत्त ने सन 2009 में प्रौपर्टी का कारोबार शुरू किया था. शुरुआत में उस ने इस काम में अच्छा पैसा कमाया. कमाई हुई तो उस ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. एक साथ कई काम शुरू करने से उसे नुकसान भी हुआ. इस से उस की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने लगी तो उस ने लोन लेने के साथ कई लोगों से करोड़ों रुपए उधार लिए. भीलवाड़ा जिले का रहने वाला एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भी शिवदत्त की प्रौपर्टीज में पैसा लगाता था.

शिवदत्त भीलवाड़ा में ब्राह्मण समाज और अन्य समाजों के धार्मिक कार्यक्रमों में मोटा चंदा देता था. इस से उस ने विभिन्न समाजों के धनी और जानेमाने लोगों का भरोसा भी जीत रखा था. ऐसे कई लोगों ने शिवदत्त की प्रौपर्टीज में निवेश कर रखा था.

शिवदत्त के ऊपर उधारी बढ़ती गई तो लेनदार भी परेशान करने लगे. शिवदत्त प्रौपर्टी बेच कर उन लोगों का पैसा चुकाना चाहता था, लेकिन बाजार में मंदी के कारण प्रौपर्टी का सही भाव नहीं मिल रहा था. इस से वह परेशान रहने लगा था. लोगों के तकाजे से परेशान हो कर उसने फोन अटेंड करना भी कम कर दिया था.

हालांकि शर्मीला ने पुलिस थाने में पति के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस को एक भी ऐसा सबूत नहीं मिला, जिस के उस के अपहरण की पुष्टि होती. एक सवाल यह भी था कि शिवदत्त अगर उधारी का पैसा नहीं चुका रहा था तो अपहर्त्ता उन के किसी परिजन को उठा कर ले जाते, क्योंकि लेनदारों को यह बात अच्छी तरह पता थी कि पैसों की व्यवस्था शिवदत्त के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता.

 

घूमने लगा पुलिस का दिमाग

 

आधुनिक टैक्नोलौजी के इस जमाने में पुलिस तीनचौथाई आपराधिक मामले मोबाइल लोकेशन, काल डिटेल्स व सीसीटीवी फुटेज से सुलझा लेती है, लेकिन शिवदत्त के मामले में पुलिस के ये तीनों हथियार फेल हो गए थे. उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. सीसीटीवी फुटेज साफ नहीं थे. काल डिटेल्स से भी कोई खास बातें पता नहीं चलीं.

प्रौपर्टी का काम करने से पहले शिवदत्त के पास बोरिंग मशीन थी. वह हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर सहित कई राज्यों में ट्यूबवैल के बोरिंग का काम करता था. इन स्थितियों में तमाम बातों पर गौर करने के बाद पुलिस शिवदत्त के अपहरण के साथ अन्य सभी पहलुओं पर भी जांच करने लगी.

इसी बीच शिवदत्त की पत्नी शर्मीला ने राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी. इस में शर्मीला ने अपने पति को ढूंढ निकालने की गुहार लगाई. इस पर हाईकोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि शिवदत्त को तलाश कर जल्द से जल्द अदालत में पेश किया जाए.

अब पुलिस के सामने शिवदत्त मामले में दोहरी चुनौती पैदा हो गई. पुलिस ने शिवदत्त की तलाश ज्यादा तेजी से शुरू कर दी. मई के पहले सप्ताह में शिवदत्त का मोबाइल स्विच औन किया गया. इस से उस की लोकेशन का पता चल गया. पता चला कि वह मोबाइल देहरादून में है. भीलवाड़ा से तुरंत एक पुलिस टीम देहरादून भेजी गई. देहरादून में पुलिस ने मोबाइल की लोकेशन ढूंढी तो वह मोबाइल एक धोबी के पास मिला.

धोबी ने बताया कि पास के ही एक गेस्टहाउस में रहने वाले एक साहब के कपड़ों में एक दिन गलती से उन का मोबाइल आ गया. उस मोबाइल को धोबी के बेटे ने औन कर के अपने पास रख लिया था. मोबाइल औन होने से उस की लोकेशन पुलिस को पता चल गई.

पुलिस ने 4 मई, 2019 को धोबी की मदद से शिवदत्त को देहरादून के अरोड़ा पेइंग गेस्टहाउस से बरामद कर लिया. शिवदत्त अपने औफिस के कर्मचारी राकेश शर्मा की आईडी से इस गेस्टहाउस में ठहरा हुआ था. देहरादून से वह लगातार जयपुर की अपनी एक परिचित महिला के संपर्क में था. इस दौरान शिवदत्त ने देहरादून में एक कोचिंग सेंटर में इंग्लिश स्पीकिंग क्लास भी जौइन कर ली थी.

42 दिन तक कथित रूप से लापता रहे शिवदत्त को पुलिस देहरादून से भीलवाड़ा ले आई. उस से की गई पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी.

 

नाटक और हकीकत में फर्क होता है

 

शिवदत्त ने प्रौपर्टी व्यवसाय में कई जगह पैर पसार रखे थे. उस ने भीलवाड़ा में विनायक रेजीडेंसी, सांगानेर रोड पर मल्टीस्टोरी प्रोजैक्ट, अजमेर रोड पर श्रीमाधव रेजीडेंसी, कृष्णा विहार बाईपास, कोटा रोड पर रूपाहेली गांव के पास वृंदावन ग्रीन फार्महाउस आदि बनाए. इन के लिए उस ने बाजार से मोटी ब्याज दर पर करीब 50 करोड़ रुपए उधार लिए थे, लेकिन कुछ प्रोजैक्ट समय पर पूरे नहीं हुए.

बाद में प्रौपर्टी व्यवसाय में मंदी आ गई. इस से उसे अपनी प्रौपर्टीज के सही भाव नहीं मिल पा रहे थे. जिन लोगों ने शिवदत्त को रकम उधार दी थी, वह उन पर लगातार तकाजा कर रहे थे. ब्याज का बोझ बढ़ता जा रहा था. इस से शिवदत्त परेशान रहने लगा. वह इस समस्या से निकलने का समाधान खोजता रहता था.

इस बीच जनवरी में शिवदत्त अपने घर पर सीढि़यों से फिसल गया. उस की रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी. कुछ दिन वह अस्पताल में भरती रहा. फिर चोट के बहाने करीब 2 महीने तक घर पर ही रहा. इस दौरान उस ने अपना कारोबार पत्नी शर्मीला और स्टाफ के भरोसे छोड़ दिया था. पैसा मांगने वालों को घरवाले और स्टाफ शिवदत्त के बीमार होने की बात कह कर टरकाते रहे.

 

घर पर आराम करने के दौरान एक दिन शिवदत्त ने सारी समस्याओं से निपटने के लिए खुद के अपहरण की योजना बनाई. उस का विचार था कि अपहरण की बात से कर्जदार उस के परिवार को परेशान नहीं करेंगे. उन पर पुलिस की पूछताछ का दबाव भी नहीं रहेगा. यहां से जाने के बाद वह भीलवाड़ा से बाहर जा कर कहीं रह लेगा और मामला शांत हो जाने पर किसी दिन अचानक भीलवाड़ा पहुंच कर अपने अपहरण की कोई कहानी बना देगा.

अपनी योजना को मूर्तरूप देने के लिए उस ने होली का दिन चुना. इस से पहले ही शिवदत्त ने अपनी कार में करीब 8-10 जोड़ी कपड़े और जरूरी सामान रख लिया था. करीब एक लाख रुपए नकद भी उस के पास थे. शिवदत्त ने अपनी योजना की जानकारी पत्नी और किसी भी परिचित को नहीं लगने दी. उसे पता था कि अगर परिवार में किसी को यह बात बता दी तो पुलिस उस का पता लगा लेगी. इसलिए उस ने इस बारे में पत्नी तक को कुछ बताना ठीक नहीं समझा.

योजना के अनुसार, शिवदत्त होली की शाम पत्नी से अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने जाने की बात कह कर कार ले कर घर से निकल गया. वह अपने दोस्त से मिला और रात करीब 8 बजे वहां से निकल गया. शिवदत्त ने राजेश त्रिपाठी के घर से आ कर अपनी कार सुखाडि़या सर्किल के पास लावारिस छोड़ दी. कार से कपड़े और जरूरी सामान निकाल लिया. कपड़े व सामान ले कर वह भीलवाड़ा से प्राइवेट बस में सवार हो कर दिल्ली के लिए चल दिया.

भीलवाड़ा से रवाना होते ही शिवदत्त ने अपने मोबाइल से पत्नी के मोबाइल पर खुद के अपहरण का मैसेज भेज दिया था. इस के बाद उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया. भीलवाड़ा से दिल्ली पहुंच कर वह ऋषिकेश चला गया.

ऋषिकेश में शिवदत्त ने अपने औफिस के कर्मचारी राकेश शर्मा की आईडी से नया सिमकार्ड खरीदा. फिर एक नया फोन खरीद कर वह सिम मोबाइल में डाल दिया. कुछ दिन ऋषिकेश में रुकने के बाद शिवदत्त देहरादून चला गया. देहरादून में 29 मार्च को उस ने राकेश शर्मा की आईडी से अरोड़ा पेइंग गेस्टहाउस में कमरा ले लिया.

 

खेल एक अनाड़ी खिलाड़ी का

 

देहरादून में उस ने दिखावे के लिए इंग्लिश स्पीकिंग क्लास जौइन कर ली. वह अपने कपड़े धुलवाने और प्रैस कराने के लिए धोबी को देता था. एक दिन गलती से शिवदत्त का पुराना मोबाइल उस के कपड़ों की जेब में धोबी के पास चला गया. इसी से उस का भांडा फूटा.

शुरुआती जांच में सामने आया कि देहरादून में रहने के दौरान शिवदत्त मुख्यरूप से जयपुर की एक परिचित महिला के संपर्क में था. इस महिला से शिवदत्त की रोजाना लंबीलंबी बातें होती थीं. जबकि वह अपनी पत्नी या अन्य किसी परिजन के संपर्क में नहीं था.

भीलवाड़ा के सुभाष नगर थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने शिवदत्त को 6 मई को जोधपुर ले जा कर हाईकोर्ट में पेश किया और उस के अपहरण की झूठी कहानी से कोर्ट को अवगत कराया. इस पर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस संदीप मेहता और विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने शिवदत्त के प्रति नाराजगी जताई. जजों ने याचिका का निस्तारण करते हुए अदालत और पुलिस को गुमराह करने पर याचिकाकर्ता शर्मीला पर 5 हजार रुपए का जुरमाना लगाते हुए यह राशि पुलिस कल्याण कोष में जमा कराने के आदेश दिए.

बाद में सुभाष नगर थाना पुलिस ने शिवदत्त के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. उस के खिलाफ अपने ही अपहरण की झूठी कहानी गढ़ कर पुलिस को गुमराह करने, अवैध रूप से देनदारों पर दबाव बनाने और षडयंत्र रचने का मामला दर्ज किया गया. इस मामले की जांच सदर पुलिस उपाधीक्षक राजेश आर्य कर रहे थे.

पुलिस ने इस मामले में 7 मई, 2019 को बिल्डर शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर 6 दिन के रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि में भी शिवदत्त से विस्तार से पूछताछ की गई, फिर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

बहरहाल, बिल्डर शिवदत्त मोहमाया के लालच में अपने ही बिछाए जाल में फंस गया. अपहरण की झूठी कहानी से उस के परिजन भी 42 दिन तक परेशान रहे. पुलिस भी परेशान होती रही. भले ही वह जमानत पर छूट कर घर आ जाएगा, लेकिन सौ करोड़ के कारोबारी ने बाजार में अपनी साख तो खराब कर ही ली. इस का जिम्मेदार वह खुद और उस का लोभ है.          द्य

 

कूड़ा नं. 343

लेखक- असित कुमार

एक नए मेयर ने नगर महापालिका की मखमली और मुलायम कुरसी पर खुद को बैठाने की पूरी तैयारी कर रखी थी. कुरसीमान होते ही नए मेयर ने शहरियों को अपनी नीतियों से अवगत कराया. उन की नीतियां नई तो क्या खाक होतीं बस, तेवर कुछकुछ नए थे. पिछले मेयर निहायत ही आलसी थे. वह कोशिश यही करते थे कि ज्यादातर काम बैठेबैठे ही करें. मसलन, भाषण देना, शहर की खूबसूरत औरतों के साथ फोटो खिंचवाना आदि. इसीलिए उन का नारा था : ‘‘हमें अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा रह कर महापालिका को एक आदर्श निकाय के रूप में स्थापित करना है.’’

अब इस दावे की सचाई यह रही कि उन के कार्यकाल के समाप्त होने तक महापालिका की हालत इतनी पतली हो गई थी कि खुद मेयर साहब को तनख्वाह से महफूज रहना पड़ गया था.

यह अलग बात थी कि मेयर के बेटे ने बाप के कार्यकाल के दौरान नगर की सफाई, प्रकाश व्यवस्था आदि के ठेकों में 9 करोड़ बना लिए थे. खैर, यह सब तो नए मेयर का दोषारोपण था और इस तरह की टांग खिंचाई राजनीति में चलती रहती है. किसी पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाना, जांच कराने के लिए शोर मचाना आदि. फिलहाल तो पुराने मेयर साहब भूमिगत हैं जब बाहर निकलेंगे तो स्वयं ही निबट लेंगे.

हां, तो मसला यह था कि शहर गंदगी से बजबजा रहा था क्योंकि         97 प्रतिशत सफाई कर्मचारी वेतन न मिलने की वजह से हड़ताल पर थे और जो 3 प्रतिशत सफाईकर्मी पुराने मेयर के चहेते थे वे उन के साथ लपेटे में फंसे होने की वजह से छिपे हुए थे. शहर के लोग इधरउधर जमा गंदगी के ढेर से भयभीत थे. एक खतरा आवारा घूमते चौपाए जानवरों से भी था कि पता नहीं कब उन का मूड खराब हो जाए और किसी दोपाए इनसान को लपेटे में ले लें.

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कुरसी पर बैठते ही नए मेयर ने जनता के उद्धार का बीड़ा उठाया और आननफानन में सारी औपचारिकताएं पूरी कर के नगर के दौरे पर निकल पड़े.

मेयर साहब के साथ उन का पूरा स्टाफ कलमकागज ले कर उन के काफिले में शामिल था और उन की हर टिप्पणी को उसी समय नोट कर रहा था. इस तरह नगर प्रमुख का यह काफिला अभी शहर का चौथाई रास्ता ही तय कर पाया था कि उसे रुकना पड़ा क्योंकि गली के हर मोड़ पर पड़े कूड़े के ढेर से उठती दुर्गंध इस कदर दमघोंटू थी कि नाकमुंह पर मास्क पहनने के बाद भी बदबू हलक में उतर रही थी.

उस पर सूअरों के एक झुंड ने मेयर साहब की जम कर अगवानी की और कूड़े के ढेर नंबर 343 से ले कर ढेर नंबर 357 तक आगेआगे सूअर व पीछेपीछे मेयर साहब का अमला दौड़ रहा था.

दौरा स्थगित हो गया. उस बदबूदार और कीचड़ से लथपथ मेयर रूपी मानवाकृति को वापस अपनी पुरानी स्थिति में लाने के लिए एक टैंकर पानी के साथसाथ आधा दर्जन साबुन की टिकियाएं अपने ऊपर खर्च करनी पड़ीं. साथ ही अपने 5 फुट 10 इंच लंबे शरीर पर मेयर ने एक पूरी शीशी परफ्यूम की स्प्रे कर दी. इस के बाद भी उन का दम घुटता रहा और अपनी सही स्थिति पाने में उन्हें 3 दिन लग गए.

स्वास्थ्य लाभ के बाद अपनी कुरसी पर बैठते ही मेयर ने जोरदार शब्दों में शहर को सूअर और कूड़े के ढेर से आजाद करने की घोषणा की और आने वाले सोमवार से सफाई कार्यक्रम शुरू करने का बिगुल बजा दिया.

सभी न्यूज चैनलों, रेडियो स्टेशन और अखबार वालों को इस की खबर दे दी गई. नगर प्रमुख की पार्टी के कार्यकर्ताओं से अपील की गई कि वे भरपूर मात्रा में झाड़ू, डंडे और सफाई की आवश्यक सामग्री ले कर महापालिका के दफ्तर पर सुबह 6 बजे जमा हों.

शहर भर के बड़े ढाबे वालों एवं होटल वालों को मौखिक आदेश दे दिया गया कि वे कार्यकर्ताओं के स्तर के हिसाब से अपने अपने यहां लंच पैकेट तथा कोल्ड ड्रिंक का प्रबंध रखें.

वह दिन भी आ गया. चुस्त जींस, रंगीन टीशर्ट और सफेद टोपी पहन कर मेयर साहब ने अपने आवास के बाहर कदम रखा. बाहर पहले से ही तैनात टीवी और समाचारपत्र संवाददाताओं ने अपने कैमरे चालू किए और विभिन्न मुद्राओं में उन के चित्र उतारे. नंगे सिर, टोपी के साथ, एक हाथ में झाड़ू तथा दूसरे में सूअर पकड़ने का विशेष जाल लिए मेयर साहब के फोटो खींचे गए.

इस तमाशेबाजी के साथ मेयर साहब ने कूड़े के कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया और शीघ्र ही वह कूड़े के ढेर नंबर 343 के पास पहुंच गए जहां सूअर के एक झुंड से उन का वास्ता पड़ा था और जिस ने उन के सफेद कपड़ों पर कीचड़ के छींटे मारने की गलती की थी.

जुलूस वहां पहुंचा और अचानक ही नारे लगने बंद हो गए क्योंकि सामने से वैसे ही जुलूस के साथ विपक्षी पार्टी के सदस्य सूअर बचाओ आंदोलन के बैनर लिए पहले से ही मौजूद थे.

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किसी प्रकार का असमंजस या कन्फ्यूजन न हो इस के लिए वे सभी अपने सिरों पर सूअर के मुंह के आकार वाली टोपियां पहने थे. कूड़े के ढेर के चारों ओर एक गोलाकार घेरा बना कर सूअर बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता हाथों में लाठियां और डंडे लिए खड़े थे. उन के पीछे कूड़े के ढेर में दूसरे चौपाए जानवरों के साथ सूअरों का झुंड बड़े इत्मीनान के साथ विहार कर रहा था.

मेयर अपने दलबल के साथ जैसे ही वहां पहुंचे दूसरी ओर से यह नारा लगा :

‘‘मेयर नहीं कसाई है, सूअर हमारा भाई है.’’

जोश में एक महिला ने कूड़े के ढेर पर खड़े हो कर लोगों को यह जताने का प्रयास किया कि सूअर वास्तव में पर्यावरण के संरक्षक…इस के आगे के शब्द अनसुने ही रह गए क्योंकि तब तक वह कूड़े के ढेर में धंस कर अदृश्य हो चुकी थी.

इस के बाद तो सूअर बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता अपनेअपने बैनर और झंडे छोड़ कर कूड़े के ढेर पर पिल पड़े. इस अप्रत्याशित हमले से घबरा कर चौपाए जानवर इतने बौखला गए कि अपनी ही जाति के लोगों से भिड़ गए.

‘अरे, मार डाला रे,’ के जोरदार चीत्कार को सुन कर मीडिया वालों ने अपने कैमरे उधर घुमाए तो पाया कि शहर के जानेमाने रंगकर्मी चुरुल बाबू एक बिदके सांड के सींगों के बीच

टंगे लोगों से जरा बचाने की गुहार कर रहे हैं.

तभी लोगों ने देखा कि सांड ने चुरुल बाबू को किसी राकेट लांचर की तरह उछाल कर कूड़े के ढेर की

ओर फेंका तो वह अपने साथसाथ 2 और लोगों को ले कर कूड़े के ढेर में समा गए.

मीडियाकर्मियों की हंसी उड़ाती निगाहों ने मेयर साहब को मजबूर कर दिया कि वह कूड़ा रणक्षेत्र से पीछे न हटें बल्कि ऐसा कुछ करें कि सब का मुंह बंद हो जाए. वह जानते थे कि मीडिया वाले सुरक्षित स्थानों पर डटे हुए दूर से ही कैमरे का फोकस करेंगे और अनापशनाप बोलना शुरू कर देंगे, क्योंकि यही तो उन की रोजीरोटी का जरिया है.

चुरुल बाबू और सूअर बचाओ आंदोलन की नेत्री अभी भी कूड़े के ढेर में गुम थे और इन दोनों को बचाने के लिए की जा रही कोशिशों को सूअर, कुत्तों और सांडों के गठबंधन ने पूरी तरह विफल कर डाला था.

इस सारे दृश्य का एक सीधा अर्थ था कि अब वहां मौजूद जनसमूह की निगाहें मेयर साहब के रूप में अपने नए तारनहार को देख रही थीं. ऐसे में कोई भी गलत कदम उन की कुरसी को हिला सकता था. मेयर साहब ने असमंजस से अपनी टोपी उतार कर सिर खुजलाया.

उधर जुगाली करते हुए एक बैल को 2 सूअरों ने थूथन मार कर राह से हटाने का प्रयास किया. बैल को ताव आ गया और उस ने सिर झुका कर दोनों सूअरों को दौड़ा लिया.

दोनों सूअर जान बचाने के लिए उधर की तरफ भागे जिधर मेयर साहब पीठ किए खड़े थे. वह अपने एक हाथ में जाल को लटकाए हुए थे तो दूसरे हाथ में टोपी और झाड़ू थामे थे. एक सूअर गोली की रफ्तार से उन के पैरों के बीच से निकल भागा तो दूसरा उन की एक टांग पर थूथन मारता हुआ निकल गया.

घबराहट और अचंभे की मिलीजुली चीत्कार मेयर के मुख से निकली. उन के समर्थकों ने पलट कर देखा तो पाया कि बैल के दोनों सींग मेयर के हाथ में लटके जाल में उलझ गए थे. वह जाल लिए भागता चला गया और साथ में शहर के मेयर भी.

बैल से बचने और जाल को छुड़ाने की कोशिश में कब मेयर बैल की पीठ पर सवार हो गए पता ही नहीं चला और आश्चर्य से आंखें फाडे़ प्रत्यक्षदर्शियों ने देखा कि बड़ी बहादुरी से बैल को जाल में फांसे मेयर दनादन झाड़ू बरसाने में लगे हैं.

यह देख कर उन के समर्थकों के होंठों पर प्रशंसा के शब्द वाहवाह ‘आ’ गए. मीडियाकर्मी फटाफट कैमरे चालू कर के तसवीरें खींचने लगे और टेलीविजन पर उन की इस वीरता का आंखों देखा हाल प्रसारित होने लगा.

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मेयर समर्थक आकाशभेदी नारे बुलंद करने लगे, ‘‘देखो, फंसा शिकंजे में, बैल मेयर के पंजे में.’’

उधर इस  सब से अनजान मेयर साहब अपनी जान बचाने के लिए संघर्षरत थे. दोनों पैरों को बैल के पेट पर चिमटे की तरह फंसाए, सींगों को साइकिल के हैंडिल की तरह कभी इस हाथ से तो कभी उस हाथ से पकड़ने के चक्कर में उन की टोपी एक सींग में इस तरह फंस गई कि कोल्हू के बैल की तरह उस की एक आंख ही बंद हो गई.

बैल बेतहाशा उछलकूद कर के उस नामाकूल टोपी से छुटकारा पाने की जुगत में लगा था लेकिन सब बेकार इधर चक्कर, उधर घुमाव लेते हुए आखिर में उस की हिम्मत ने साथ छोड़ दिया और वह कूड़े के ढेर पर ढेर हो गया.

दूर खड़े प्रत्यक्ष- दर्शियों ने जोरदार नारे लगा कर मेयर की बहादुरी का स्वागत किया. 2-3 उत्साही पार्टी कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़ कर मेयर साहब को बैल पर से उतारा और कंधों पर लाद कर विजयी उद्घोष करते हुए कूड़े के चारों ओर चक्कर काटने लगे.

अपने थके हाथपांवों और भयंकर पीड़ा से दुखते शरीर के बावजूद मेयर साहब हंसहंस कर इस जयजयकार को स्वीकार करने लगे.

दूसरे हाथ से उस  पर ‘छुट्टा पशु पकड़ो’ दल के कर्मचारियों ने विजय नारे लगाते हुए जाल में फंसे बैल को उठा कर ट्रक में डाला और सरपट निकल चले. उन के जाते ही डंपर, ट्रक और कूड़ा उठाने वाली क्रेन और मशीनें आ गईं, युद्धस्तर पर काम होने लगा और ट्रकों में कूड़ा भरभर कर नगर के बाहर सूखे पड़े एक तालाब पर ले जाया जाने लगा. वहां एक नई कालोनी बनाने का इरादा था.

इन सब के बीच किसी युद्ध विजेता की तरह सीना फुलाए मेयर साहब हाथ में लंबी जमादारी झाड़ू, जाल लिए तिरछी टोपी लगाए एक ओर खड़े मुसकरा रहे थे.

17 घंटे चले इस सफाई अभियान के बाद महल्ले की सड़कें ऐसे जगमगा उठीं जैसे कभी कूड़ा वहां रहा ही न हो. इस प्रकार मेयर ने ढेर नंबर 343 पर उस सूअर द्वारा की गई अपनी फजीहत का बदला ले लिया था.            द्य

‘मर्द’ में जल्द नजर आयेंगे रणदीप हुड्डा

अपने देसी अंदाज के लिए जाने जाने वाले बौलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा एक बार फिर सुर्खियों में हैं. बहुत जल्द फिल्म ‘मर्द’ में दमदार किरदार में रणदीप हुड्डा नजर आने वाले हैं. फिल्म के मेकर्स ने सोशल मीडिया पर एक फोटो शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा- ‘आधिकारिक घोषणा… रणदीप हुड्डा #Mard में प्रमुख भूमिका में. इस फिल्में के अनाउन्समेंट के बाद से ही रणदीप को काफी लोग विश करते दिख रहे हैं. हरयाणवी छोरे रणदीप की बात की जाए तो औन स्कीन उनकी इंटेंस एक्टिंग को काफी पसंद किया जाता रहा  हैं. बता दे रणदीप पिछले दिनों इम्तियाज अली की फिल्म ‘लव आज कल 2’ को लेकर सुर्खियों में बने हुए थे. फिल्म में भले ही कार्तिक आर्यन और सारा अली खान लीड रोल में है लेकिन रणदीप हुड्डा का किरदार इनसे कुछ कम नहीं हैं। लेकिन अब एक्टर रणदीप हुड्डा को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही हैं

‘मर्द’ एक नए जमाने की प्रेम कहानी हैं इस फिल्म को साई कबीर डायरेक्ट कर रहे हैं.  राजू चड्ढा और राहुल मित्रा निर्मित इस फिल्म की शूटिंग 9 नवंबर से शुरू होगी. 2020 तक फिल्म रिलीज हो सकती हैं. इस फिल्म के जरिए रणदीप हुड्डा एक बार फिर बड़े पर्दे पर रोमांस का तड़का लगाते दिखाई देंगे.

इस फिल्म का टाइटल ‘मर्द’ बौलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म से लिया गया हैं. अमिताभ बच्चन की ये फिल्म साल 1985 में रिलीज हुई थी. आपको बता दें, मेकर्स ने अभी तक फिल्म रिलीज डेट का ऐलान नहीं किया है. लेकिन फिल्म की शूटिंग शुरू होने के साथ ही मेकर्स इसको लेकर बड़ी घोषणा करेंगे.

Summer में ट्राय करें विक्की कौशल के ये 3 लुक्स फौलो

कहते हैं फिल्म समाज का आइना होता है, शायद इसलिए ही लोग फिल्मों से इतना प्रभावित होते हैं. लेकिन बौलीवुड के फेयर एंड हैंडसम हीरोज के बीच एक हीरो ऐसा भी है जिसने चौकलेटी बौय की इमेज को तोड़ते हुए बहुत ही कम समय में लोगों के दिलों को जीत लिया है. टौल, डार्क एंड हेंडसम वाले इस हीरो का नाम हैं विक्की कौशल. डस्की कलर वाले विक्की की फैन फौलोविंग देखते ही बनती हैं. विक्की की स्टाइल को यंग डस्की बोय्स काफी फौलो करते हैं. फिल्में ‘मशाल’ में एक  आम लड़के के रोल में नजर आए विक्की ने कभी सोचा भी नहीं होगा की वो इतने कम समय में बौलीवुड पर राज करेंगे. फिल्म ‘राजी’ हो या ‘उरी’  विक्की के सोल्जर लुक को काफी पसंद किया गया. उनकी स्टाइल- स्टेटमेंट की बात करें तो काफी चूजी हैं. आज हम आपके बतायेंगे की आप कैसे आपने डास्की कलर में भी विक्की की तरह हैंडसम दिख सकते हैं.

प्रिंटेट शर्ट और प्रिंटेट कोट वाले विक्की के  इस लुक को आप किसी भी पार्टी या फंगशन पर ट्राय कर सकते हैं. इस लुक आप आउटडोर या इनडोर दोनों टाइम पहन सकते हैं.

समर में लाइट कलर पहनना आपकी स्किन के साथ- साथ आपकी हेल्थ के लिए भी काफी अच्छा होता हैं. विक्की के इस लाइट कलर टि-शर्ट और ओवर शर्ट लुक को कौलेज में ट्राय कर सकते हैं.

चेक कोट पेंट का ट्रेंड 90 के दशक से यूज किया जाता रहा हैं. विक्की के इस लुक को आप औफिस के लिए भी और पार्टीस में  भी यूज कर सकते हैं. कोट पेंट को आप कभी  भी रेडीमेट ना खरीदे क्योंकि इसकी फिटिंग पर असर पड़ सकता हैं.

विक्की के इन लुक्स को फौलो कर आप भी स्टाइलिश दिख सकते हैं.

क्रिकेट वर्ल्ड-कप के साथ ही पूनम पांडे का नया फोटोशूट Viral

हमेशा सोशल मीडिया पर तेहलका मचाने वाली एक्ट्रेस पूनम पांडे  का क्रिकेट वर्ल्ड-कप से एक गहरा नाता रहा हैं. वर्ल्ड-कप 2019 का धमाकेदार आगाज हो गया हैं इसके साथ पूनम पांडे भी चर्चाओं में आ गई हैं. हाल ही में पूनम ने कुछ बोल्ड फोटोज शेयर की है, जिस कारण इंटरनेट हिल गया है. भारत ने वर्ल्ड-कप 2019 में साउथ अफ्रीका को हराकर शानदार आगाज किया है, जिस खुशी में पूनम पांडे ने अपनी सेमी-न्यूड तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं. यह फोटोज शेयर करते हुए पूनम पांडे ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर लिखा है कि अब वर्ल्ड-कप शुरू हो गया है. इससे कहीं न कहीं वो इशारा देना चाह रही हैं कि आने वाले समय में वो ऐसी कई सारी और फोटोज शेयर करेंगी.

फैंस के कमेंट से भरा पोस्ट

पूनम की इन फोटोज में फैंस लगातार कमेंट कर रहे हैं और उनकी खूबसूरती की तारीफ कर रहे हैं. लोग पूछ रहे हैं कि जब इंडिया वर्ल्ड-कप जीतेगी तो क्या होगा? पूनम पांडे ने जो कमेंट किया है, उससे लग रहा है कि वो भारत की हर जीत के साथ बोल्ड तस्वीर शेयर करेंगी.अभी तो भारत ने एक मेच ही जीता हैं और पूनम ने ये फोटोज शेयर की,अगर भारत जीत गया तो शायद पूनम की और भी बोल्ड फोटोज देखने को मिल सकती हैं. कई लोग कर रहे हैं आलोचना

 

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It starts Now. #CRICKETWORLDCUP 2019

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आलोचको की भी कमी नहीं

पूनम की इस फोटोज को ऐसा नहीं है की सभी पसंद कर रहे है. कई लोग ऐसे भी हैं जो पूनम पांडे की आलोचना कर रहे हैं. इन फोटोज में पूनम काफी एक्सपोज करती नजर आ रही हैं. जिसे कुछ लोग पोर्नोग्राफी से जोड़कर उनको ट्रोल कर रहे हैं. बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि इंटरनेट पर पूनम पांडे का एक निजी वीडियो भी लीक हो गया था. इस वीडियो ने इंटरनेट पर काफी हंगामा मचाया था.

 

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Come play with me. Only on #ThePoonamPandeyAPP

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दुनियाभर में हैं करोड़ो फैंस

पूनम पांडे को अच्छी तरह से पता है कि उन्हें खबरों में कैसे बने रहना है. यही कारण है कि उन्हें कॉन्ट्रोवर्सी क्वीन कहा जाता है. पूनम पांडे अपनी बोल्डनेस के कारण देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में मशहूर हैं. उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर उनके फैंस के दुनियाभर से कमेंट आते हैं.

अपने एप के कारण करती हैं बोल्ड फोटोज शेयर

आपको बता दें पूनम पांडे अपने एप को प्रमोट करने के लिए इंस्टाग्राम का यूज करती हैं. वो लगातार ऐसी बोल्ड फोटोज शेयर करती हैं और फैंस को अपनी एप पर आने के लिए कहती हैं. पर जिन-जिन लोगों ने पूनम पांडे का एप डाउनलोड किया है, उनका एक्सपीरियंस बहुत अच्छा नहीं रहा है. जिस कारण कुछ समय पहले उनकी काफी आलोचना हुई थी.

नतीजा: लोकसभा चुनाव 2019 फिर लौटी भाजपा

अगर पिछली बार मोदी की लहर थी तो इस बार क्या माना जाए? साल 2014 से अब साल 2019 तक पिछले 5 साल में बहुमत में आए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अगुआ नरेंद्र मोदी को मई की 23 तारीख बहुत रास आई. लोकसभा चुनाव की कुल 542 सीटों में से राजग ने 350 से ज्यादा सीटें जीत कर पूरे विपक्ष को चारों खाने चित कर दिया. अकेली भारतीय जनता पार्टी ने 300 से भी ज्यादा सीटों पर कब्जा जमाया जबकि अपने वजूद से जूझ रही कांग्रेस और उस की सहयोगी पार्र्टियां 86 सीटें ही अपने नाम कर पाईं.

हालांकि कांग्रेस ने 52 सीटें जीत कर उम्मीद से कुछ बेहतर किया, पर वह मोदी और शाह के बनाए इस चुनावी चक्रव्यूह में उलझ कर रह गई. राहुल गांधी इस चक्रव्यूह के भीतर तो चले गए थे, पर भेद नहीं पाए.

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के अलावा बचे अन्य दलों और आजाद उम्मीदवारों के हिस्से में 104 सीटें रहीं. कुलमिला कर पूरा विपक्ष मिल कर भी नरेंद्र मोदी के राष्ट्रवाद के आगे घुटने टेक गया.

ढीला महागठबंधन

सब से बड़ी लड़ाई तो 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रही थी. वहां खंडहर हो चुकी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने दलितों की मसीहा बहुजन समाज पार्टी की मायावती के साथ मजबूत तालमेल किया था ताकि भारतीय जनता पार्टी साल 2014 वाला खेल न खेल जाए. उस समय अकेली भाजपा ही 73 सीटें जीत गई थी, जिस से उस का केंद्र में सरकार बनाना और भी आसान हो गया था.

लेकिन समाजवादी पार्टी के यादव वोटों और बसपा के दलित वोटों का ट्रांसफर पूरी तरह से नहीं हो पाया. भाजपा की सीटें जरूर कम हुईं, लेकिन मायावती और अखिलेश यादव का गठबंधन उसे उतनी ज्यादा चोट नहीं पहुंचा पाया, जो उम्मीद की जा रही थी. समाजवादी पार्टी को 5 सीटें मिलीं तो बसपा को 10 सीटें. हां, मायावती जरूर फायदे में रहीं, क्योंकि पिछली बार तो वे खाता तक नहीं खोल पाई थीं.

कांग्रेस तो उत्तर प्रदेश में उबर ही नहीं पाई. उसे महज 1 सीट मिली. राहुल गांधी जिस जोश के साथ अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को पहले कांग्रेस में और बाद में चुनाव प्रचार में तुरुप का इक्का बना कर लाए थे, वह रणनीति भी काम न आई. अमेठी में भाजपा की स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी. नतीजे के दिन उन में जीत के लिए चूहेबिल्ली का सा खेल चलता रहा. आखिर में स्मृति ईरानी जीत गईं.

इन चुनावों में राहुल गांधी ने अकेले ही सत्ता पक्ष से लोहा लिया था. उन्होंने राफेल घोटाले के मसले पर मोदी सरकार को खूब घेरा था, पर चूंकि उन्हें बाकी विपक्ष का सही साथ नहीं मिला इसलिए वे जनता को यह समझाने में चूक गए कि देशहित में वे जो कह रहे हैं, वह कितना अहम है.

यहां भी विपक्ष बेहाल

40 सीटों वाले बिहार में इस बार बिना लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल पूरी तरह अनाथ दिखा. उन के परिवार में जबरदस्त गुटबाजी रही. तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव की आपसी रंजिश चुनाव में दिखी. मुसलिम और यादव वोटों की एकता पूरी तरह चरमरा गई. संप्रग खेमे को 1 सीट ही मिल पाई, इस के उलट भाजपाई गठबंधन ने 39 सीटें जीत कर सब को चौंका दिया.

कांग्रेस भी कोई खास करिश्मा नहीं कर पाई, जबकि वाम दल तो जैसे पहले ही हार मान चुके थे.

सब से ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे पश्चिम बंगाल में रहे. वहां 42 सीटों पर तृणमूल और भाजपा में टक्कर रही.

चुनाव से पहले भाजपा ने ममता बनर्जी को कमजोर सत्ताधारी साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया था, क्योंकि भाजपा को यकीन था कि अगर वह उत्तर प्रदेश में ज्यादा सीट नहीं जीत पाएगी तो उन की भरपाई यहां से कर लेगी या कोशिश करेगी.

ममता बनर्जी को भी अंदेशा हो गया था कि जिस तरह अमित शाह उन्हें हिंदुओं की विरोधी साबित करने पर तुले हुए हैं, उस पर बहुत से लोग आंख मूंद कर यकीन कर लेंगे और बाद में हुआ भी यही. भाजपा ने उन के दुर्ग में सेंध लगा दी.

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महाराष्ट्र और गुजरात में तो जैसे विपक्ष का सूपड़ा ही साफ हो गया. वहां कांग्रेस और दूसरे दल राजग के सामने कहीं नहीं ठहरे. महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार ही ऐसे बड़े नेता थे, जो मोदी को टक्कर दे सकते थे. लेकिन महाराष्ट्र में राकांपाकांग्रेस की जोड़ी को मुंह की खानी पड़ी. जिन शरद पवार को प्रधानमंत्री पद की दौड़ में एक भागीदार माना जाता था, वे अपने ही किले को बचाने में नाकाम रहे.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल सियासी बाजीगरी में पूरी तरह से चूक गए. लोकसभा चुनाव से पहले वे दावे कर रहे थे कि ‘आप’ सातों सीटें जीतने वाली है, लेकिन जब उन्हें लगा कि अकेले  भाजपा से लोहा नहीं लिया जा सकता है तो उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की बात कही थी, लेकिन वह नहीं हो सका.

बीएस येदियुरप्पा के कर्नाटक में भाजपा ने बंपर जीत हासिल की, जबकि आंध प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू ने तो विधानसभा चुनाव भी गंवा दिए.

जातिवाद की मची जंग

जिस बात का डर था वही हुआ. साल 2014 का लोकसभा चुनाव जीत कर बतौर प्रधानमंत्री पहली बार संसद पहुंचे नरेंद्र मोदी जब अक्तूबर महीने के खुशनुमा मौसम में दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती में पहुंचे थे और वहां झाड़ू लगा कर ‘स्वच्छ भारत’ अभियान की शुरुआत की थी, तब लगा था कि हो न हो, अब देश में अच्छे दिन आ जाएंगे.

तब एक और उम्मीद बंधी थी कि शायद अब देश में जातिवाद के नाम पर जलालत का जहर पी रही दलित जातियों पर हो रहे जोरजुल्म कम हो जाएंगे और अगला लोकसभा चुनाव जातिधर्म की सियासी बाजीगरी से नजात पा लेगा.

पर अफसोस, ऐसा हो न पाया, क्योंकि इस बार का चुनाव, चाहे किसी भी राजनीतिक दल की बात कर लें, सरेआम जाति के नाम पर लड़ा गया. सोशल मीडिया पर उन के आईटी सैल ने जाति को खूब भुनाया.

देश के बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार के नेता तो जाति और अपने समाज के नाम पर वोट मांगते दिखे ही, दिल्ली और हरियाणा में चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी भी जाति के जंजाल में उलझती दिखी, तभी तो दिल्ली में आतिशी मार्लेना और हरियाणा में नवीन जयहिंद को भी बताना पड़ा कि वे जाति से राजपूत और ब्राह्मण हैं.

राहुल गांधी और जनेऊ

जब भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार अपने पिछले 5 साल की नाकामियों पर विपक्ष खासकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पूछे गए तल्ख सवालों जैसे नोटबंदी और जीएसटी की नाकामी, बढ़ती बेरोजगारी, किसानों की खुदकुशी, धर्म के नाम पर लोगों में विभाजन, दलितों और आदिवासियों की समस्याओं पर ठोस जवाब नहीं दे पाई तो उस ने राहुल गांधी की जाति का ही जहरीला जुमला उछाल दिया. राहुल गांधी इस चाल में फंस भी गए थे, तभी तो वे मंदिरमंदिर घूमते दिखे. उन्हें अपना गोत्र तक बताना पड़ा.

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती का महागठबंधन पूरी तरह से जाति के वोटों पर टिका था. दोनों दलों में दलित और यादव समाज के बल पर अपनी लोकसभा सीटों को बढ़ाने की पूरी ललक दिखी.

दलितों में जाटव और अन्य पिछड़ा वर्ग में यादव के अलावा जाट और गुर्जर समाज पर भी सब की नजर रही थी. यह एक तरह का इम्तिहान भी था कि क्या आज भी चुनाव में लोग जाति के नाम पर अपना वोट डालते हैं या नहीं?

इस बार के चुनावी माहौल में इनसानों की तो छोडि़ए, हनुमान की जाति पर भी गरमागरम बहस हुई थी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल 2018 के नवंबर महीने में राजस्थान में चुनाव प्रचार के दौरान हनुमान को दलित बताया था.

योगी आदित्यनाथ ने तब कहा था, ‘बजरंग बली हमारी भारतीय परंपरा में एक ऐसे लोक देवता हैं, जो स्वयं वनवासी हैं, गिरवासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं, पूरे भारतीय समुदाय उत्तर से ले कर दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक सब को जोड़ने का काम बजरंग बली करते हैं.’

योगी आदित्यनाथ का इतना कहना था कि देश के भगवा खेमे में ही बवाल मच गया. ज्योतिष व द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने

दोटूक कहा कि हनुमान की जाति बता कर मुख्यमंत्री ने पाप किया है. जबकि यह एक सोचीसमझी चाल के तहत बोला गया था ताकि दलित और पिछड़े तबके के लोगों को लुभा कर उन के वोट अपनी तरफ खींच लिए जाएं.

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इसी तरह बिहार में भी हर दल जाति के रंग में रंगा दिखा. साल 2015 के विधानसभा चुनावों में उछला ‘जाति तोड़ो, जनेऊ तोड़ो’ बस एक नारा बन कर रह गया. वहां भी एक ही फार्मूला दिखा कि उसी जाति के उम्मीदवार को टिकट दो, जिस के वोट की गारंटी हो. जाति के नाम पर बने सामाजिक समूह पूरे दमखम के साथ सामने आए.

मध्य प्रदेश में तो भोपाल सीट पर लड़ा गया चुनाव पूरे देश में जातिवाद को उभारने की अति कर गया. साध्वी प्रज्ञा और दिग्विजय सिंह के बीच मानो धर्मयुद्ध और हठयुद्ध सा छिड़ गया था.

वोटिंग का दिन आतेआते दिग्विजय सिंह भी हिंदुत्व के रंग में रंगे दिखाई दिए. इन दोनों उम्मीदवारों में खुद को सब से बड़ा हिंदूवादी होने की होड़ सी लग गई थी. दिग्विजय सिंह द्वारा कराया गया कंप्यूटर बाबा का हवन तो अंधविश्वास की हद था. यह नौटंकी जातिवाद की चाशनी में लिपटी ऐसी खतरनाक मिठाई थी जिस से पूरा समाज और देश मधुमेह से पीडि़त होता दिखाई दिया.

भाजपा का छिपा एजेंडा

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यही छिपा एजेंडा था कि अगर उसे मुसलिम वोट न भी मिलें तो देश में इस तरह का माहौल बना दिया जाए जिस से अगड़े और बाकी निचले समाज में सोच की खाई इतनी बढ़ जाए कि सारे अगड़े वोट उसे मिलें और निचले तबके के वोट बाकी पार्टियों में बंट जाएं.

हरियाणा में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला. भाजपा सरकार ने गैरजाट जातियों के मन में यह बिठा दिया कि जाट समाज के नेता बस अपने लोगों की चौधराहट जमाए रखने की राजनीति करना चाहते हैं. इन चुनावों में जाट बनाम जाति तमाम को ध्यान में रख कर अपनीअपनी गोटियां फिट की गई थीं.

कम शब्दों में कहा जाए तो जम्मूकश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से पश्चिम बंगाल तक हर राज्य में हर सियासी दल ने जाति और धर्म की राजनीति खूब खेली. इस का सब से बुरा नतीजा यह रहा कि गांवदेहात के साथसाथ अब शहरों में भी लोग अपनी जाति की पहचान को अहमियत देने लगे हैं, जो धीरेधीरे नई पीढ़ी को भी अपनी चपेट में ले रहा है.

किस मुंह से मांगेंगे गरीब

अब आगे क्या होगा? जिस तरह से पूरी दुनिया में अति दक्षिणपंथी और बड़बोले नेता सत्ता पर काबिज हो रहे हैं, वह यकीनन चिंता की बात है. भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना आदर्श मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के

लिए देश को सुगमता से चलाने की

सब से बड़ी चुनौती वह भारतीय अर्थव्यवस्था रहेगी जो पूरी तरह से चरमराती दिख रही है.

याद रहे, किसी देश को आगे बढ़ाने में वहां के किसान और मजदूर अपना सब से ज्यादा योगदान देते हैं. भारत में इन दोनों वर्गों में पिछड़े और दलित तबके के लोग ज्यादा हैं. लेकिन अफसोस, इन की हालत बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है. जब साल 2014 में मोदी सरकार आई थी तब लगा था कि ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा इन दबेकुचलों के अच्छे दिन तो ले ही आएगा, लेकिन समय के साथसाथ यह जुमला ही

साबित हुआ.

इन चुनावों से पहले जिस तरह से देश में किसानों और दलितपिछड़ों ने अपने हक में आवाज उठाई थी, उस से लगा था कि इस का गंभीर नतीजा सत्ता पक्ष को भुगतना पड़ेगा. लेकिन अब चूंकि राजग सरकार दोबारा केंद्र में आ गई है तो आने वाले कम से कम 3 साल तक तो किसानों और मजदूरों को चुप्पी साध कर रखनी होगी.

हम यह नहीं कह रहे हैं कि हर किसान या मजदूर ने सत्ता पक्ष को वोट दिया होगा, पर जिस तरह से राजग को बहुमत मिला है, अब यह वर्ग मुंह खोल कर अपने हकों को उठा नहीं पाएगा. जो केंद्र सरकार से मिलेगा, उसे अपनी तकदीर मान कर कबूल कर लेना होगा.

लेकिन इस का जो सब से बड़ा नुकसान होगा, वह यह

कि धीरेधीरे यह कमेरा तबका दिशाहीन हो जाएगा. हालफिलहाल तो वह यह समझने की हालत में ही नहीं रहेगा कि कौन उस का हक मार रहा है. वे कौन सी छिपी ताकतें हैं जो उस के मेहनतकश हाथों को कुंद कर रही हैं. पर जब तक वह समझ पाएगा, तब तक देर हो चुकी होगी.

पिछले 5 साल में विपक्ष ने जनता के सामने जो मुद्दे रखे, उन सब पर नरेंद्र मोदी का नाम भारी पड़ता दिखा. लोगों ने हर समस्या को दरकिनार कर बस इस नाम को अहमियत दी. पर याद रखें कि भावनाओं में बह कर वोट करना और चिडि़या का खेत चुगना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, क्योंकि बाद में पछताने से कोई फायदा नहीं होता है. द्य

…तो इसलिए पूरा जोर नहीं लगा पाया विपक्ष

इस चुनाव में कांग्रेस का जो भी हाल रहा, पर एक बात तो साबित हो गई कि इस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी का खुद पर और अपने नेताओं पर बहुत ज्यादा भरोसा है. यही वजह रही कि कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ लालच वाला गठबंधन नहीं किया, जबकि अगर ये दोनों दल दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में मिल जाते तो नतीजे कुछ और बेहतर हो सकते थे.

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सब से ज्यादा हैरानी वाला गठबंधन तो उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव के बीच हुआ था. वहां भी उम्मीद की जा रही थी कि चूंकि उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एकसाथ चुनाव लड़ा था तो अखिलेश यादव कुछ भी कर के कांग्रेस को भी अपने महागठबंधन में आने का न्योता देते. इस से उत्तर प्रदेश में समीकरण ही बदल जाते.

भाजपा की लगातार होती तानाशाही इमेज और धर्मजाति के नाम पर लोगों को बांटने की राजनीति पर यह तिहरी चोट बड़ा असर दिखाती और वोटरों में यह संदेश जाता कि भारत में चुनाव प्रधानमंत्री चुनने के लिए नहीं लड़े जाते हैं, बल्कि अपने इलाके का विकास करने वाले जनप्रतिनिधि को संसद में भेजने का रिवाज है.

सभी विपक्षी दल जानते थे कि नरेंद्र मोदी यह चुनाव अपनी उपलब्धियों पर नहीं लड़ रहे हैं और जहांजहां वे फेल हो रहे हैं या हो चुके हैं जैसे नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, किसानों की अनदेखी, औरतों, दलितों और आदिवासियों की सुरक्षा पर उन को जिस तरह से घेरना चाहिए था वह हो नहीं पाया.

इन चुनावों में क्षेत्रीय दल अपने में ही सिमटे दिखाई दिए. जब सब जानते थे कि लोकसभा चुनाव में नैशनल लैवल के मुद्दों पर वोटिंग होती है तो उन्हें मिल कर हर उस मुद्दे पर पुरजोर बहस करनी चाहिए थी जो पूरे देश के हित से जुड़े थे. लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अपना राज्य बचाती दिखाई दीं तो बिहार में लालू प्रसाद यादव का परिवार अपने वजूद की लड़ाई में ही उलझा रहा. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को अपनी जमीन खिसकती दिखाई दी तो हरियाणा में तमाम जाट नेता ही बंट चुके थे.

महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को कोई मजबूत साथी नहीं मिला. दक्षिण भारत के नेताओं का भी कमोबेश यही हाल रहा. विपक्ष की यही कमजोरी नरेंद्र मोदी की सब से बड़ी ताकत बनी और नतीजा आप सब के सामने है.

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