लेखक-उषा किरण सोनी

लेकिन क्या पति की मौत के बाद भी दोनों का जिंदगी जीने का नजरिया एक रहा या अलगअलग? स्टेशन से ट्रेन के चलते ही लड़कियां अपने दुपट्टे को संभालती दोनों ओर की सीटों पर आमनेसामने बैठ कर अपनी चुहलबाजी में व्यस्त हो गईं. मैं देख रही थी कि उन के चेहरे प्रसन्नता से दमक रहे थे. सभी हमउम्र थीं और अपने ऊपर कोई बंधन नहीं महसूस कर रही थीं. मेरी अपनी बेटी कीर्ति भी उन के बीच में खिलीखिली लग रही थी. बंधन के नाम पर मैं थी और मुझे वे अपनी मार्गदर्शिका कम सहेली की मां के रूप में अधिक ले रही थीं.

गजाला ने किसी से कुछ सुनाने को कहा तो बड़ीबड़ी आंखों वाली चंचल कणिका बोल पड़ी, ‘‘अच्छा सुनो, मैं तुम सब को एक चुटकुला सुनाती हूं.’’

मैं भी हाथ में पकड़ी पत्रिका रख चुटकुले का आनंद लेने को उन्मुख हो गई.

‘‘एक बार 3 औरतें मृत्यु के बाद यमलोक पहुंचीं. उन के कर्म के अनुसार फैसले के लिए यमराज ने चित्रगुप्त की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली. वह अपनी बही संभालते हुए बोले, ‘देवाधिदेव, इन्हें कहें कि ये खुद अपने कर्मों का बखान करें. मैं बही में दर्ज कर्मों से मिलान करूंगा.’

‘‘यह सुन कर पहली महिला बोली, ‘मैं ने सारा जीवन धर्मकर्म करते, सास- ससुर व पति की सेवा में बिताया. बच्चों को पालापोसा और उन्हें उचित शिक्षा दी. मेरी क्या गति होगी, महाराज बताइए?’

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यमराज ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘हूं,’ और दृष्टि दूसरी महिला पर टिका दी.

‘‘वह थोड़ा मुसकराई फिर बोली, ‘मैं ने सासससुर को तो कुछ नहीं समझा और न ही उन की सेवा की, पर पति की खूब सेवा की. मरते दम तक उन की सेवा को अपना धर्म समझा. अब आप के हाथ में है कि मुझे स्वर्ग दें या नरक.’

‘‘यमराज ने फिर कहा, ‘हूं,’ और दृष्टि तीसरी महिला की ओर घुमा दी.’’

मैं देख रही थी कि कई जोड़ी निगाहें बिना हिले इस चुटकुले के अंतिम भाग को सुनने के लिए उत्सुक थीं. कणिका ने कहना जारी रखा :

‘‘तीसरी महिला ने लटें संवारीं, थोड़ा इठलाई, कमर को झटका दिया फिर यमराज पर बंकिम कटाक्ष किया और लिपस्टिक लगे अधर संपुट खोल अदा से बोली, ‘देखोजी, यमराजजी, मैं ने न तो सासससुर को कुछ समझा न पति को. मैं ने तो जी खूब मौजमस्ती की, क्लब गई, नाचीगाई, मैं तो जी दोस्तों की जान बनी रही.’

‘‘‘बसबस,’ उसे बीच में ही टोक कर यमराज बोले, ‘योर केस इज इंट्रेस्टिंग. चित्रगुप्त, पहली दोनों औरतों को स्वर्ग में भेज दो और (तीसरी औरत की ओर इशारा कर) तुम मेरे कक्ष में आओ.’’’

चुटकुला समाप्त होने से पहले ही डब्बे में हंसी का तूफान आ गया था. खिलखिलाहटें ही खिलखिलाहटें. लड़कियां पेट पकड़पकड़ कर हंस रही थीं. मैं भी अपनी हंसी न रोक सकी.

मुझे अपनी किशोरावस्था याद आ गई. सचमुच वे भी क्या दिन थे? जिंदगी और रंग दोनों एकदूसरे के पर्याय थे उन दिनों. वह प्यारी खूबसूरत आंखों वाली राजकंवर, लगता था नारीत्व और सौंदर्य का अनुपम उदाहरण बना कर ही कुदरत ने उसे धरती पर उतारा था. और मैं, हिरनी सी कुलांचें भरती राजकंवर की अंतरंग सखी.

सरस सलिल विशेष

मुझ में तो मानो स्वयं चपलता ही मूर्तिमान हो उठी थी. क्या एक क्षण भी मैं स्थिर रह पाती थी. सारे खेलकूद, नृत्यनाटक, शायद ही किसी प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया हो. उधर राजकंवर के कोकिल कंठ की गूंज के बिना कालिज का कोई समारोह पूरा ही नहीं होता था. वह गाती तो लगता मानो साक्षात सरस्वती ही कंठ में आ बैठी हो.

हर शरारत की योजना बनाना और फिर उसे अंजाम देना हम दोनों का काम था. याद आ गई प्रिंसिपल मैडम की सूरत, जब हम ने होली खेलते समय साइंस ब्लाक का शीशा तोड़ा था. मैडम लाख कोशिशों के बाद भी यह पता नहीं लगा सकी थीं. सारी की सारी 13 लड़कियां सिर झुकाए एक कतार में खड़ी डांट खाने के साथसाथ एकदूसरे को कनखियों से देख खुकखुक हंसती रही थीं. हार कर बिना दंड दिए उन्होंने हमें भगा दिया था और हम पूरे एक सप्ताह तक अपनी जीत का मजा लेते रहे थे.

आज इन गिलहरियों की तरह फुदकती लड़कियों को संभालते समय लगा कि सचमुच इन्हें संभालना हवा के झोंके को आंचल में बांध लेने से भी मुश्किल है, अगर किसी तरह हवा को बांध भी लो तो आंचल के झीने आवरण से वह रिस के निकल जाती है न.

गाड़ी की रफ्तार के बीच लड़कियों की ओर नजर घूमी तो पाया कि वे मूंगफलियां खाती पटरपटर बतिया रही थीं और मुद्दा था कि शाहरुख खान ज्यादा स्मार्ट है या आमिर खान. मैं ने हंसते हुए पत्रिका फिर हाथ में उठा ली. आंखें पत्रिका के एक पन्ने पर टिकी थीं पर देख तो शायद पीछे अतीत को रही थी.

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मैं और राज अब बी.ए. फाइनल में आ गए थे और हमारी बातों का विषय भी धर्मेंद्र, जितेंद्र से शुरू हो कर अपने जीवन के हीरो की ओर मुड़ जाता कि कैसा होगा?

मैं कहती, ‘राज, क्यों न हम एक ही घर में शादी करें? मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती.’

राज ने लंबी आह भर कर कहा, ‘काश, ऐसा हो सकता. मैं राजपूत और तुम ब्राह्मण. एक घर में हम दोनों की शादी हो ही नहीं सकती. ऐसी बेसिरपैर की बातें करते कब साल बीता और परीक्षाएं भी हो गईं, पता ही नहीं चला.’

घड़ी आ गई बिछड़ने की. पूरे 3 साल हम साथ रहे थे. अब बिछड़ने की कल्पना से ही हम कांप उठे, पर जाना तो था. मेरे पिता ट्रांसफर हो कर उत्तरकाशी चले गए और परीक्षा समाप्त होते ही मुझे तुरंत बुलाया था.

‘‘आप का टिकट?’’ कानों से आवाज टकराई तो सोच की दुनिया से मैं बाहर निकल आई.  सभी के  टिकट चेकर को दे कर अपने चेहरे पर आए बालों को समेट कर पीछे किया तो चेहरे और बालों का रूखापन उंगलियों से टकराया. विचार उठा, कहां खो गई वह लुनाई. शायद बीता समय चुरा ले गया, साथ ही ले गया राज को जिसे मैं चाह कर भी नहीं पा सकती.

मैं फिर अतीत के पन्ने पलटने लगी.

उत्तरकाशी अपने घर पहुंची तो पापामम्मी और भैया ने प्यार से मुझे नहला दिया. उत्तरकाशी के पहाड़ी सौंदर्य ने मुझे अभिभूत कर दिया पर राज को हर रोज पत्र लिखने का क्रम मैं ने टूटने नहीं दिया. वह भी नियमित उत्तर देती. हम दोनों के पत्रों में जिंदगी के हीरो का ही जिक्र होता.

राज ने एक पत्र में लिखा था कि उस के पिता ने उस के लिए एक डाक्टर वर चुना है, जो किसी रियासत का अकेला चिराग है. भरापूरा गबरू जवान और एक बड़ी जागीर का अकेला वारिस, शिक्षित और संस्कारी पूर्ण पुरुष.

राजकंवर के फोटो को देखते ही वह लट्टू हो गया था… उसे साक्षात देखा तो अपनी सुधबुध ही खो बैठा. और राजकंवर? अनंग सा रूप ले कर घर आए डा. राजेंद्र सिंह को देखते ही दिल दे बैठी थी. उसे लगा जैसे छाती से कुछ निकल गया हो. अपने पत्र में उस ने अपनी बेचैनी निकाल कर रख दी थी.

घर में मेरी शादी की चर्चा भी होने लगी थी. राज के पत्रों को पढ़ मैं भी उस की भांति किसी अनिरुद्ध की कल्पना से अपना मन रंगने लगी थी. राज के पत्रों से पता लगा कि उस का विवाह नवंबर में होगा. मजे की बात कि उस के विवाह के दिन ही मेरा अनिरुद्ध मुझे देखने आने वाला था.

राज की शादी के बाद उस के पत्रों की संख्या घटने लगी. उसे अपने मन की बातें बांटने को एक नया साथी जो मिल गया था.

अब मेरे मन पर भी लेफ्टिनेंट मदन शर्मा छाने लगे थे. जब वे अपने मातापिता के साथ मुझे देखने आए थे तो मैं खिड़की की झिरी से उन के पुरुषोचित सौंदर्य को देख अवाक् रह गई थी, दिल धड़क उठा और याद आ गई पत्र में लिखी राज की पंक्ति, ‘क्या सचमुच कामदेव ही धरा पर उतर आए हैं या मेरा यह दृष्टि दोष है?

मां जब मुझे उन लोगों के सामने लाईं तो मेरी आंखें ऊपर उठ ही नहीं रही थीं. कब उन्होंने अंगूठी पहनाई याद नहीं पर वह स्पर्श मेरे रोमरोम में बिजली दौड़ाता चला गया था. मुझ पर एक नशा सा छा गया था और उसी में उन के मातापिता के पैर छू कर मैं भीतर चली गई थी.

मैं ने तुरंत अपनी इस अवस्था का विस्तृत वर्णन राज को लिख डाला, पर उत्तर नहीं आया. सोचा मगन होगी. अब मेरी कल्पना के साथी थे मदन. मिलन और सान्निध्य की कल्पना से मैं सिहर उठती.

फरवरी की गुलाबी सर्दी में मेरा जीवनसाथी मुझे पल्लू से गांठ बांध कर अपने घर ले आया और मुझे अपने प्रेम सागर में आकंठ डुबो दिया. अनुशासन भरा सैनिक जीवन जीतेजीते मदन ने अब तक अपने मन को भी चाबुक मारमार कर साध रखा था. इसीलिए मेरा प्रवेश होने पर मुझे संपूर्ण पे्रम से नहला दिया उन्होंने.

मदन अपनी ओर से ढेरों उपहार ला कर देते और उन की मां और बाबूजी ने तो अपनी इकलौती बहू की प्यार और उपहारों से झोली ही भर दी थी. मदन इकलौती संतान जो थे.

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शायद यहां भी उस रचनाकार ने मेरी व राज की जीवनी में एक सी पंक्ति लिख दी थी. हम दोनों के पति अपनेअपने परिवार की इकलौती संतान थे. मधुयामिनी के बाद मांबाबूजी के अकेले रह जाने के भय से हम मधुमास मनाने कहीं बाहर नहीं गए. मैं और मदन, मदन और मैं, दोनों आत्मसात हो गए एकदूसरे में.

एक सप्ताह बाद जब भैया मुझे लेने आए तो बाबूजी ने कहा, ‘मदन की डेढ़ महीने की छुट्टी बाकी है इसलिए बहू को यहीं रहने दो. मदन के जाने के बाद ले जाना.’ फोन पर पापा ने भी अपनी सहमति दे दी. भैया ने वापस जाते समय राज के 2 पत्र मुझे दिए जो मेरी गैर मौजूदगी में आए थे.

बिना संबोधन के राज ने लिखा था, ‘रीता, राजेंद्र आगे की पढ़ाई करने 2 साल के लिए विदेश जा रहे हैं. मैं तो 2 दिन नहीं रह सकती राजेंद्र के बिना ये 2 साल कैसे बीतेंगे? मैं राजेंद्र में इतनी खो गई थी कि तुझे पत्र लिखने की याद ही न रही. मेरा तो सारा संसार ही राजेंद्रमय हो गया है. सच, रीता, तू शादी मत करना. जानती है, आदमी शादी के बाद पागल हो जाता है, मेरी तरह.’

मैं पढ़ कर हंसी. कैसा संयोग था कि उस की शादी के दिन मेरे मदन मुझे देखने आए थे और मेरी शादी के समय उसे ससुराल में रहने के कारण सूचना न मिल पाई थी क्योंकि कार्ड मैं ने उस की मां के घर भेजा था.

मैं ने मदन को राज के पत्र दिखा कर अपनी गहरी दोस्ती की बात बताई. पतियों संबंधी कल्पनाओं और शरारतों को सुन मदन हंसे बिना न रह सके. बोले, ‘सच ही तो है कि शादी के बाद आदमी पागल हो जाता है,’ और उन्होंने मुझे अपनी बांहों में समेट लिया…मैं राज को पत्र लिखना भूल गई.

मुट्ठी में बंधी रेत की तरह मदन की छुट्टियों के दिन खिसक गए. उन के जाने का समय निकट जान मैं घबरा उठी. क्या यह इंद्रजाल सा मोहक जीवन मेरी मुट्ठी से फिसल जाएगा. नहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी, पर क्या सोचने से ऐसा हो पाया है. क्या सचमुच मदन मुझे यहां छोड़ कर चले जाएंगे? पता नहीं मन क्यों दुश्ंिचताओं से घिरा जा रहा है.

पापा मुझे लेने और मदन से मिलने आ गए थे.

मदन सामान बांधे खड़े थे और मेरा रोरो कर बुरा हाल था. वे भीतर आ कर बोले, ‘रीतू, बस, तुम घर जा कर अपनी मां से मिल आओ तब तक मैं क्वार्टर का इंतजाम कर लूंगा और तुम्हें ले जाऊंगा फिर हम होंगे और हमारी बसंत ऋतु.’

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आखिर मदन चले गए और उसी दिन शाम को मैं पापा के साथ उत्तरकाशी चली गई. मदन से दूर मन उदास और अतृप्त था, पर मां के प्यार व भैया और पापा के दुलार से तपन को थोड़ी शांति मिली.

मां मुझे सुखी देख प्रसन्न थीं. मुझे हर रोज मदन का प्यार में भीगा एक पत्र मिलता. मैं खुश हो उठती और तुरंत उत्तर देती. 3-4 दिनों बाद मैं ने मां से कहा, ‘आज मैं राज को पत्र लिखूंगी, इधर उस का कोई समाचार नहीं मिला.’

मां उदास हो कर बोलीं, ‘बेटी, मैं ने तुम्हें पत्र में नहीं लिखा. दरअसल, राज के साथ अनहोनी हो गई. राजेंद्र जिस हवाईजहाज से विदेश जा रहे थे वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया और राजेंद्र नहीं रहे. राजेंद्र की मौत का समाचार सुनते ही राज की हृदयगति रुक गई और उस ने भी शरीर छोड़ दिया. वह सती थी.

‘क्या?’ मेरे मुंह से निकला और मैं चेतनाशून्य हो गिर पड़ी. मां ने घबरा कर भैया को डाक्टर बुलाने भेज दिया.

आंखें खुलने पर मैं ने पाया कि मां के चेहरे पर गंभीरता की जगह मुसकान थी. वह मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘बेटी, खुद को संभालो. जीवन में ऐसे क्षण तो आते ही हैं. उस का दुख न करो, वह सती थी. अपना ध्यान रखो. अब तुम्हारा उदास रहना ठीक नहीं. तुम अब मां और मैं नानी बनने वाली हूं.’

मैं पुन: चौंक पड़ी. मैं मां बनने वाली हूं? इस एक शब्द ‘मां’ ने मुझे राज के दुख से उबार लिया. पलकें शर्म से झुक गईं और आंचल में अपना चेहरा छिपा लिया.

पिता बनने की सूचना पा मदन बौरा से गए थे. लगभग हर रोज उन का पत्र आता. इस पत्र में उन्होंने लिखा था, ‘मैं अति शीघ्र आ रहा हूं, तुम्हें यहां ला कर इस समय का हर पल तुम्हारे साथ जीना चाहता हूं.’

मैं मदन की प्रतीक्षा में थी पर आया उन का मात्र 2 पंक्तियों का पत्र, ‘रीतू, मैं युद्ध में कश्मीर जा रहा हूं, मेरी कीर्ति को संभाल कर रखना. तुम्हारा मदन.’

इस समाचार के पाते ही मेरे सास- ससुर मुझे लेने आ गए पर मेरे पिता के अनुरोध पर प्रसव तक यहीं रहने की अनुमति दे चले गए.

मेरे भीतर जीवन कुलबुलाने लगा था. मैं उस सुख को जी रही थी. आखिर वह प्रतीक्षित क्षण भी आ गया. कीर्ति का संसार में पदार्पण मांपापा और अम्मांबाबूजी के आनंद को सीमित नहीं कर पा रहा था पर मेरी खुशी तो मदन के बिना अधूरी थी. नन्हे मदन के रूप में बगल में सोई बेटी को देख मैं सुख से अभिभूत हो गई.

कुदरत ने यहां भी मेरी व राज की जीवन जिंदगी की जीवनी एक ही लेखनी से, एक ही स्याही से लिखी थी. अस्पताल से आए अभी 15 दिन ही हुए थे कि कश्मीर में गिरे बम के टुकड़े मेरी छाती पर आ गिरे और मेरा सिंदूर पोंछ, चूडि़यां तोड़ गए. मैं हतबुद्धि हो कल्पना में मदन को देखती रही. मांपापा का कं्रदन और कीर्ति की चीखें भी मेरा ध्यान विचलित न कर सकीं.

मां ने चीखती कीर्ति को मेरी गोद में डाल दिया. बच्ची के दूध पीने के उपक्रम में दर्द मेरी छाती में रेंग उठा. जड़ता टूट चली और बांध टूट गया. पापा ने कहा, ‘इसे रो लेने दो, जितना रोएगी उतनी ही शांति पाएगी और बच्ची से जुड़ती चली जाएगी.’

कालरात्रि मेरा सबकुछ समेट कर बीत गई. समय चलता गया. कीर्ति मुझे अपनी तोतली बोली से बांधने का प्रयास करती. मैं अपने दुख में यह भी भूल गई थी कि अम्मांबाबूजी ने भी अपना इकलौता बेटा खोया था. मूल गंवा ब्याज के रूप में वे मेरा और कीर्ति का मुख देखा करते.

मैं ने खुद को समेटना शुरू किया. ज्योंज्यों मेरा बिखरना कम होता गया, कीर्ति निखरती चली गई. मैं ने अम्मां- बाबूजी से कहा कि मैं आप को मदन की कमी नहीं खलने दूंगी. मैं अब रीता नहीं, रीतामदन हूं. बाबूजी के साथ मैं ससुराल चली आई. मदन की पेंशन और बाबूजी की बचत से घरखर्च आराम से चल रहा था पर आगे कीर्ति का पूरा जीवन पड़ा था.

मैं ने मन ही मन एक निश्चय किया और बाबूजी से आगे पढ़ने की अनुमति मांगी. वे तो जैसे तैयार ही बैठे थे, तुरंत ‘हां’ कह दिया. उन की बात पूरी होने से पहले ही अम्मांजी बोल पड़ीं, ‘घर का जरा सा तो काम है, मैं बेकार ही बैठी रहती हूं, सब कर लूंगी. तुम जरूर पढ़ो. तुम्हारा दिल भी लग जाएगा तथा कीर्ति का भविष्य भी बना सकोगी.’

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जीवन का अब एक नया दौर शुरू हुआ. मैं ने पहले एम.ए. फिर बी.एड. किया. युद्ध में मारे गए सैनिक की पत्नी होने के कारण नौकरी मिलने में सुविधा हुई. कालिज में प्राध्यापिका बनी. मुझे व्यस्त रहने का बहाना मिला. अम्मांबाबूजी के चेहरों पर संतोष झलक आया. उन्हें लगा मानो उन का मदन लौट आया हो.

हमारी आंखों की ज्योति कीर्ति कब नर्सरी से कालिज पहुंच गई, पता ही नहीं चला. अम्मांबाबूजी हमेशा यही ढूंढ़ते रहते कि कीर्ति के चेहरे पर किसी असुविधा की शिकन तो नहीं? कीर्ति के रूप में मानो वे एक बार फिर मदन को जवान कर रहे हों.

अचानक मुझे जोर का झटका लगा तो यादों का सिलसिला टूट गया. खिड़की से बाहर झांका तो गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुक रही थी. यात्री अपना सामान ले कर उतरने की तैयारी में थे. मैं भी अपना सूटकेस ले लड़कियों को संभल कर उतरने का निर्देश देने लगी. स्टेशन पर सभी लड़कियों के मातापिता उन्हें लेने आए थे. चारों ओर शोर बरपा था. चहकती लड़कियां अपने मातापिता को इस टूर की पूरी रिपोर्ट स्टेशन पर ही दे डालना चाहती थीं.

रीता और कीर्ति रिकशा ले कर घर की ओर चल पड़ीं. रीता के विचारों में फिर राज आ बैठी.  सोचने लगी, कैसा संयोग था. दोनों सहेलियों को पति सुख से वंचित होना पड़ा, पर क्या सचमुच ही नियति ने दोनों की जिंदगी का लेखा- जोखा एक सा लिखा था.

शायद नहीं. एक सा होते हुए भी एक सा नहीं.

राज को सभी ने सती की संज्ञा दी. सभी उस का नाम आदर से लेते. सभी कहते, ‘वह सती थी, उस ने पति के साथ ही देह त्याग दी.’

घर आ गया था और मैं अपनी सोच से बाहर निकल आई थी पर मन में एक अनुत्तरित प्रश्न ले कर कि राज को तो सती की संज्ञा दी गई और मुझे. क्या मैं इस संज्ञा की अधिकारी नहीं?

मैं ने जो त्यागा, यह मैं जानती थी. पति का सुख, शरीर की चाहत, हंसनाबोलना, चहचहाना जो किशोरा- वस्था में मेरा और राज का अभिन्न अंग था, सभी तो त्यागा मैं ने. राज के देह त्याग से कहीं ज्यादा. रातदिन एक कर के मैं ने घर को संभाला, कीर्ति को बड़ा किया, मदन के मातापिता की बेटे की तरह सेवा की और लोग कहते हैं, ‘राज सती थी.’ क्या यह सही है. धर्म के चक्करों में पड़े समाज से मैं यह प्रश्न पूछना चाहती हूं पर किसकिस से पूछूं.         द

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